Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Anannt

Joshi,himansu · 2010/12

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अन्ततः प्रकाशक पूर्वोदय प्रकाशन, दिल्ली हिमा पोसी अन्तत.

कहानी संग्रह
प्रकाशक
पूर्वोदय प्रकाशन
८ नेताजी सुभाष माग
दिल्ली
ल्या तीन रुपये पपास से
प्रथम सस्करण
मुक
राष्ट्र मारठी प्रेस
षा पेसान दरियागज
रिल्लो ६

भारती विद्या दिर
रामानर
'निर्मल वर्मा को

थे कहानियों लगभग सात माठ वर्षों की अवधि म जितनी कहानियां लिखी उन में से कुछ यहाँ एकत्रित की गई हैं-समय एव विविधता के क्रम से। -मेरे प्रयम कहानी-संग्रह के रूप म। मृष्टि के साथ-साथ दृष्टि बदलती है । इसलिए कहानियों म भी वलाव दीखे तो पचरज नहीं। कहानी मात्र कहानी ही नहीं रही भव परम्परा से परे कुछ मौर भी है--पयाप का तटहीन प्रतिविम्बन-एक नए सदभ में एक सचाई!-साकेतिक शानों का एसा सगीतमय साकार सजीव चित्र-सरकरामा की तरह जिस विविष मायाम होत हुए भी हर मायाम अपने म पूण -एक पूरा चित्र हो ।-कुछ- पुछ इसी दिशा में इधर सोचने लगा । इसलिए मही-कहीं यह कहानी छूट गई है जिस अब तक लाग पहानी मानते माए हैं। कहानी लिसन के बनिस्बत भाग्य लिखने में अधिक रुचि नहीं रही जसा मपना ही पानी के कुछ लोग प्रयतम करत माए ह । वस्तुत' हर रिएटिव कसाकार अपने म परेला होता है । हर नहाना स्वय को स्वत प्यरत करती है। जिम दिया की भोर मेरा इगित है वह मेरी कहानियों से प्रतिविम्बित हुमा तो अपना प्रयास सफल समझूगा। कहानियामा इस रूप में समान मा थय भाई प्रदीप जी का है जिना मामारी नहीं है। अपना का ही नही मामार माना जाता है! नई दिल्ली मात्र १९६५ हिमाशु जोगी

अन्तत
प्रादमी जमाने का
स्वभाव
प्रमाद
परिणति
मई बात
रगित
पूर पानी
सिमटा
एमा पुस
रिनारेमोग
जिी एप पर में

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अन्तत. यावता है विरजू। निरा पावला। पव से गोसार वावा गए, नूरी रिनिया न अपन मह ने मासे पाला-पोसा । पर टूटे परम की रेण मिट न पाई। परम-वता की पूनी पर जा उमन पम मान-मनौती म की। सीरप-भरत के लिए टमा पहा । सरिन एमा कोई दिन नहीं छिन नी जय उसने हरजीचे पान मजा अपनी विपन मुनाई। परमेमर वो सबकी मुनत है । पर उमी के भाग पो-तोरपा । सबके मारे मो-सगन ग मिहनत-मजदूरी पल है । कपा-मूमा पृछ वो को मिलता ही है। रिन्तु विनियो का विस्तू कुछ मही करता । नि भर टासा फिरता है। कहीं के बर म उनी चुमी बोड़ी बटोर सिए । किमी र पा-गुयन से तन साप निया! टा मूटा रही दुरा मिल गया तो टूम लिया। नहीं तो राम नाम मात्र, पटीरिया हानमो। बुहारे के भार गबिनिया की कमर मुक पाई । मान सन की तरह सफा गए। मुरझाए मुराहे पर मनगिना रेयाएं पिर गई। भागों १०/अन्तत को नोत भी भव उतनी न रही । फिर भी दिन रात मिट्टी से सनी रहती। परसा घाम सांझ-सकारे की कुछ भी परम्प न थी उसे। दो दुधमुहे, मनाप धेवते साव-खाव पर घर माते हो चिपट बाते। विरज भाड पोछ पर सब दिन में ही साफ पिए रहता। मवरे घर दिन में दो बार पूह जलते हैं। पर प्रभागो निनिया अपनी रोती हडिया म षया उवासे। उपतों को माप म क्या सके ! च हा तो रोग हो जसता सेफिन अधिक तर मेवल धुएं का गुबार उमर कर रह पाता। - फूम मोम के मेले मे इम यरम नौटकी पाई है। रिसन महाराज को लीना है। गांव भर के छोट-चर सभी छोकरा में दिना से मूसा हो रही थी। अन्त म जय सच हा दसमी का दिन माया सच ही सय मल गए तो विरजू भी अपने को जाने से रोक न पाया। यह भी पीछे-पीछ पल पहा। सभी ने दो पंमे माने दो भाने के टिकट खरी । ठाठ से मन्दर घुसे । पर विरजू के पास पसे वहाँ ! फिर कहा फिर उसे पन्दर पाने भी न देता ? मत द्वार पर ही झिा कर परे पोम दिया। गैस-वत्तियों को रोगनी गाने बजाने की प्राधार बाहर भीतर की धमा दमम उसे बरी भली मगी। बहुत रात तर यह टिन की पादरी को माट से इधर उपर से छेड़-मूरासो स ताप झांक मरता रहा। पापी रात गए बड़ी मुश्किल से घर लौटा। रिसन महाराज की मोला छोरने को मन न होता। लेकिन अब कोई जवरदस्ती घरेस पर सही चला तो क्या करता! रास्त में ही कभी वह एक परि परसहा होकर बमुरिया बजाने का स्योग मरता। सभी रास-सीला का। कमीपहीं पड की लटरती जा दोपती उसी को दोनों हापों से मस पर जाड़ सता मोर नाग-मर्दन की तरह देर तर पार-उधर हवा में घुमाता रहता। फिर निनाता उछलता रखा। वासबासों की तरह बरी भरता । मौर फिर कभी पिटक

अन्तत /११
पाता। विहिन गापिपापों की तरह हाय हवा में उछाल-उछाल पर
पीने पर परकना और पनायास प्रकार रो पाता।
लोग ये परतर दव पर ठहाका मार कर हसते पिन दिर को
बया!
पर तौर पर मोया पर नी कहाँ
दूमरे नि भोर उगते हो मम्मा से बोला- माई हम भो गया
दध्यिा पराएगे। पनाई महाराज बनेंगे । यस यमुरिया माद।
मोल रोज मारवन मिमरीगीन !
रिमो गया पराएगा' घर मा गूटी भी गड़ी है एक
सीमनी हुई युनिया माई बोली- 'मासन मिमरो हो माग मा होती तो
मै पुटहा परम स + भारिया मा जनमतो ही पाहे को?
विरत पर बठने वाताव पा' मुवह उग्ने हो पडोसिन मनिया
भी गाय भस पोरन लगा तो हापा-पाई सरी नौवा मा गई गाती
गौर स-निगोहे दाढ़ीगार पर हीन सोस लिही सबने
परफारना शुरू रिया।
तय नि भर परिणाम माराए सार गांव पा परसराता
रहा। पर इस पाग के हवाल भपन और गरगरता कौन । प्रत में
पमपी उग पार नगर परी। दमा-विसनुवार दो बन पर रहे
है। माटी लिए उपर बगुप भागा पौर उहें ही जगस हॉर म पना।
माम रोटीर समय पर पाग भी सौर माया । विमनुवारे पान
में उगरारा बनाई महाराज गरा विमनपा मो
मागन मिमरी!
बिसनुको झारिया से बाहर माया। दगा freम पान सपा पर
गरपर रन है। पपरत म गेला-रिया बना गरम
यामि।
"feyमरा मोरत है वार' तुना र रिय बौना माएर
नार! पो मागन मिमहाराज जाय।

१२/ अन्ततः विसनुर्वा की बहू किवार के प्रोट खही झा रही थी। गुड की रसी लाती हुई मुसकराकर बोली-~ले मो लस्ला। गया घराय के मिलत है माखन मिसरी बल पराय के नही। मगहन मा परमसर में सुनी हो गया खरीदेंगे तव मिलेगी महाराज को माखन मिसरी । इतने पर ही विरजू सतुष्ट होरपना गया । पव-सब यही उसका नेम-नियम हो चला । विप्सनुधा के बल प्रपा कर हापी हो गए । एकाध रनी गुरु बनाई-महाराज को भी मिलती रही। उसी पर वे मगन रहे । हाप में निगाले की बासुरी मापे पर मोर-पसना पीठ मे काली समलिया लिए फिरत रहे। यत इस साल सबर उसे कि हरिमपुरा म राम लीला होगी। सात-पाठ दिन तक रहगी। सूब रोनक रग धूम धाम मचगी। तब वह भी एक मसरिया मोर-पबना लिए जा धमका। चौधरी चाचा भुमेटी के परधान परता घरता य । मत उनके पास जा विनती के किसी हा ता शिका के मुर मे बोला- क्मनिया हरीस को तो राम-लछिमन को पाठ दिहों पोर कनाई-महाराज की कोने म्पयर नहिं । धौधरी घाघा क्या करते । क्या महते इस बावरे से ! कुछ सोचते हुए टालत हुए बोले- राम-लीला मा तो राम पछिपन ही होते है किसन-बनाई नहीं। जब महाराज की लौता होगी तो क्नाईमा पाठ तुम हो ही लिया जायगा। लामो मोर-पखना सम्हानिक घगे। यस्त पर काम मावेगा। विरजपी सहज बुदि ने सहम ही इस भी स्वीकार कर लिया । ठीक ही तो रहते है कारा! राम लछिमन की लीला म महाराज पा पाठ से प्राएगा समिन फिर भी यह रोग बिना मागा सीला देखने जाता। सोता हरन पौर सरप-मरन के नि तो वह सप ही फूट कर कर रोने लगा। भरत मी मात्र भक्ति पर उसकी प्रगाय मास्था पी। गिन्तु उसमे मी !

मन्तत /१३
मधिक प्रभावित पा-बजरग से। प्रयोध्या की पमम-दमक जनापुरी
पावभव क्लिास कुछ भी उसे अपनी पोर खोप न पापा। बस लम्बी
छ पासे राम भरत बन्दरा ही पुजारी बन वठा वह । लका दहन के
दिन तो पोर भी मावला हो उठा। बजरग बली सीज
1"
पहता हुमा स्टन की तरफ प्रा मूदे सपरा तो दो घार स्वप-सेवको ने
रोक लिया। भनेको तरह से समभाया-बुभाया। नहीं ता न जाने गया
परवठया!
दूसरे दिन से वह रोज बजरग-ज्वधर दहा रे पर जारर बढी
पदा से प्रणाम करता। घारगपी छाप उसके भगोप हय पर ऐसी
पड़ी कि मोर पसना धोमुरिया बिसनुवां के रस सब भूल गया। अपने
कोही होने वाली सीसा रा बजरग समभने सगा भव ।
सोनी टेवी-मदी सरशी सम्बो पूछ बना ली। मुगार पर पटे
पुराने पोपट सपेटार हनुमान की गदा भी मन गई । दिन रात उहीं के
साज गगार म लगा रहता। यो पोई भी मिसता उसी से पहता-ये
६ सास यमरग बल्दी हो सरा जराप गरेंगे। सौता माई म हरन ते
पहले ही पवन रापमु मारिगरेंगे
दिन भर पिरमर पन्त में राम्या को पर पाता। मान ही पद
पूरावा- माई मात्र मूरिसो सव मा काम गरने गई? माई - मुय से
पही भूम स गुमर पपान मा नाम निम्न पाता तो उसकी सारी देह फुरु
पाती । विपीम पर शोष से पांरत हुए पिन्नाता पह-- सरसनी है
तू! गिर रावन के गर माराहे म ' राम सछिमन रे गत मा जापो !
मिमीगन-गुगरीव महाराबरे यत मा नामो । पनर महारास र पेठ मा
पापो। मुसा रापन र गत मा गई तो बगरण टोरी भरिया पराप
गरेंगेमर सारिणे! वह पारेश में मुगर पुमान ममता ।
मनारायसी तरह हाप-पांव मनाना शुरू कर देना।
एक नि म जाने रामहर पड़ी। परेशान-मा मीपा मारण
मुरिम पर पमरा मारी राज गोया नहीं। मांगों मान

१२/मन्तत सिनुषर्षा की बहू किवाड के प्रोट सटी मांक रही थी। गुरु की ग्लो लाती हुई मुसकराकर बोली-~ से भो लल्ला! गया पराय के मिलत है माखन मिसरी बल पराय के नही। अगहन मा परमेसर ने सुनी तो गया खरीदेंगे तब मिलेगी महाराज का माम्बन मिसगे। इतने पर ही विरजू मन्तुष्ट होकर चला गया । जव-तब यही उसमा नेम नियम हो पला । विसनुवां के रल मचा कर हाथी हो गए। एकाम डली गुड बनाई-महाराज को भी मिलती रही। उसी पर दे मगन रहे । हाय म निगाले की यांसुरी माथे पर मौर-पखना पीठ में कासी कमलिया लिए फिरत रहे। इस साल सवर उडी पि हरिमपुरा में राम लीला होगी । सात-पाठ लिन तप रहगी। सूध रोना रग धूम धाम मचगी। तब वह भी एक बसुरिया मोर-पखना लिए जा धमका। चौपरी पाचा कुमटी ने परधान, परता परप्ता । मत उनके पास जा विनती के किसी हर तक शिफा यत के सुर म बोला-- कुमनियो हरीस को तो राम-लछिमन को पाठ दिहों पोर बनाई महाराज सो कोने खयर नहिं । चौधरी चाचा क्या करते । क्या कहते इस बापरे से | कुछ सोचते हुए टालत हुए बोर-- राम-लोला मा तो राम पछिमन ही होत है सिन-बनाई नहीं । जन महाराज को सीला होगी तो मनाई का पाठ तुम को ही लिया जायगा। जाभो मौर-पखना माहानिर पसे । वकत पराममायेगा। विरजी महल बुद्धि ने सहज हो इसे भी स्वीकार कर लिया । ठी ही तो पहन हैं कारा। राम मछिमन की लीला में महाराज का पाठ हो म पाएगा। लपिन फिर भी वह रोज दिना नागा सीला देसने जाता। सीता हरन मोर दसरप-मरन के नि तो वह सप ही फूट-फूट कर रोने लगा। भरत की प्रा भक्ति पर उसकी पगाध मास्था पी। शिन्तु उसमे भी अन्तत /१२ अधिक प्रभावित पा-बजरण से । भयोध्या पी धमक दमक जनापुरी का यमय विलास कुछ भी उसे अपनी मोर खींच न पाया। बस लम्बी वाले राम भक्त यन्दर ना ही पुगारी बन बठा वह सका दहन के दिन को भार भी बावला हो उठा। बजरग बली पीज पहता हुमा स्टा की तरफ मास मूदे लपका तो दो घार स्वय-मवको ने रोक लिया। प्रनेषों तरह से समभाया-बुमाया। महीं ता न जाने क्या परपठया! दूसरे न स बह रोत्र बजरगदवघर दद्दा के पर जाकर बड़ी पता से प्रणाम करता। मजरगी छाप उसरे मनोप हृदय पर ऐसी पड़ोनि मोर-पसना बामुरिमा रिसनुवा के बल सब भूल गया। अपने पो ही होने वासी लीला का बजरग समझने सगा भव । मोरपीटती-मेढ़ी सस्तीको सम्बी पूछ यना सी । मुगार पर फटे पुराने पीपा सपेपर हनुमान की गदा भी बन गई। दिन रात उही के शार शृगार में लगा रहता । जो कोई भी मिलता उसी से पता-'ये ईसास सरग जस्दी ही सरा राय गरेंगे। सीता माई क हरन ते पहले ही रावन रापम मारि गरेंगे । नि भर फिर पर मत में सम्या को घर माता । प्राव ही पद पूना- 'माई पार लूपिमरे रोत मा नाम करने गई? माई + मुख से पही भूल स मुमर पपान मा नाम निपल पाता तो उसकी सारी देह फक पाती । दांत पीम रोष में बरते हुए रिम्नाना वह-- रासनी है दूरि रावन गत मागाहे गई ' राम समिन रे पत मा जामो ! मिभीमन-मुगरीर महारार के रोव मा जामो । पनर महाराम रे सन मा पापो। मुमा रावन ध मा गई ता यसरग मोरा मपरिया राय पणे! पर ताहिरण ! वह प्रादेश में मुगर भूमाने सपना । ममान सरपरी तरह हाप-पांव नबाना शुरू कर देवा । एष दिन न आने सा महर पड़ी। परेशान-मा मीषा भगरप दुरिसरे पर जा पमका । जार मागे राव मोया महीं। प्रांतों में लाल -

१४/ अन्तत
और साफ झलक रहे थे। लोला के हनुमान की तरह राम को दण्डवत
प्रणाम दिया। घुटनों ने बस या दोनों हाथ जोड़ता हुमा फिर बाला-
महाराज वातौ वतामो! बजरग ने लवा जराई। महाराज अपने
हायों रावन मारि हो । पर रावन तो हम रोज ही देखत है
महाराज।
कहा सहज विस्मय स भगीरप ने पूछा।
तिमजला मा वठि क तिजारत करत है। विरजू उसी रफ्तार से
भौता गाव को पधान बनत है। भावत बार बुलावत रहा। तमात्र
सानो विरजुपा दोनत रहा । हम पुर के धुनमार देहन- हम विरजुमा
नहीं बजरग हैं । हम महाराज के घर जात है। रावन तू देखत का है !
तोरी लकापुरी मब के हम जराय हारेंगे।
हि स स। जीभ फाटते हुए भगीरथ वोले यह क्या ? सुमेर
पधान का घर जलाने को कहता है । कहीं सुन लिया तो खाल उधेर
दी तरी । जानता नहीं महाजन है। दो गांव के पपान । सब बिरजू,
सूरा गया है रे !
सार की तरह फुफकारता बिरजू घोला-हत मा हो! महाराज
हो कररत हो । तुम राज-पाठ रो। हम जराय हारेंगे सका सारी!
चुप-चुप कहते हुए मगीरप चुप रराने सग । सेक्नि दूसरी पोर
भाग पर पो छूट रहा था- सीला म तो धनुष ल के रावन मारत हो!
यहाँ मुप-चुप करात हो । महाराज होरा तुम भी ररत हो
'लीला तो सीला है विर! ऐसी बातें नहीं सकते। मेरी मुदरिसी
सनरे म पर जाएगी । तेरा क्या है। सूतो रोज का फिरपा है !
बाल-बच्चे वाना
बिरजू उरस पहा-'तो हम यतामो1 मठ-मूठ मोला गह देत
पाहत होक भूनी सीमा रचत हो। पाखण करत हो!
भगीरथ पया कहें। बपामहर सममाए-बुमाएं। सौता तो कीमा
है । उसको रात पौर है विरज । यह तो घररी बात है।
सिसि
१

अन्तत / १५ . 1 । पाने स्वर म यो। प्रपत् बोलत हो उरत हो रापम से ! मठ सीना रचत हो ! निगोडा। रावन मरिने उठन है 'मिन्य होई जात है । तिमना मा बठि सिंजारत भरत है। ढोर गवई-गवार गमम ये हमको टगत हो । घोमा देत हो । भूठे राम वनन हो । पहल पद रावन की सपा नहीं झूठे राम-तारी मजुध्या जराय हारेंगे । फूर सारंग दुनिया सारी। पाण्डाल टगत हो हम पाया म वह मुगार नचाता हुमा बाज की तरह भपा । लोगों ने किसी तरह चीच-बचाव पिया और उमसे पल्ला छावाया । हारे सिपाही भी तरह हता। निराश विरज पर सौ।। पोप में उमरा पागलपन पान परम सीमा पर था। मगरी उमी ममप उसने माग में झोर दी। पूछ तोड मरोगर पर गली पोर पोल पर हाथ-पांव पगारे यमुप सेट गया। साम र समय मी सुती। जागा। पपनी पी परिया नगर पर पहमा । उदास योगा- मा इस गोद मा हमारी गुजर माहीं । सर मूल दादीमार बमत है हिंया । हम जाम है। उत्तरी प्रतीक्षा लिए बिना ही विरजू पाहर निरन परा। में रिया हाप में मटिया लिए उम पपिपारे में न मालूम हो यो गया ! पूरी माई पोसलीपिन्माती रोती रही। पर रिपोरम भाया। महीने मौत गए। रिजू पापोई पता-पानी न मिमा । होई हरिनागभी परप तो पोई मागर की तरप साता। पोई पहा दिर पर पूरा पगना हा ग्यामोईमा-हिर ने पराग मनिपा रिति रिम में गिर गाए पर-पूरर पपने पूरपरम को पेनी एती। मान मनौती हितगुरुदीहरगी रे पान में पोर गोर से परियार १६/अन्तत पहची। लेकिन कहीं कोई प्रासार झलकते म । सभा के समय एक दिन दरवाजे पर मावाज सुनाई दी-"मा हावड़ाती हुई वह द्वार की भोर सपको-फोन बि र जू! दरवाजा खोलकर देखा-दुवल हहियों का ढोषा खहा है । हाय में साठी एक फा घोषडा फमर म सपेटे। दूसरा कप में । बनावटी ऊन की बरे फी सी दाढ़ी है। पाखों पर गोल-गोल छल्ले-स पर है-पश्मे की तरह । को-न! हमार बिरजुवा है रे तू घुघली प्रोिं को बुढ़िया ने फिर मता। 'बिरजू निरज । 1 - विरजुवा हिरजुवा हम नाहिं जानत है माई ! हम तो दादी बावा है। जमीन मागत है दान मा । घला-टका मांगत है। देपो जमीन ! गाधी महराज को हुषुम है! मा लिपट पड़ी। इत्त रोज को प्रय प्रायो! का सच ही बौराय गयो बिरजू । रोत गेत हम प्रघा होइ गइन पर मा वठो । बोनी मिनिया करपे हम सवावहिं वि र जू ! बिरजू मा ही खरा । जसे कुछ भी सुना समझा न हो। धैसे ही बहके स्वर में बोला-मिरजुवा मिरजुवा नही । देभो माई कुछ जमीन देपो विरजू जे कामहत है। हता बुढ़िया ने कहा जर-अमीन हमरे तग मौन धरी है। दूसरा के खेत मा काम करत हैं। पठो विरजुवा । हाड दोबत हैं । बीमार भो है का? कुछ मो गेल न पाया वह । दर तक खड़ा रहा । फिर मुहता हुमा भीगी पावाड म बढे सगा- मुला मुतक मा जाना है माई । हमरे लगे पहा कोन ठोर धरी है ! गाव-गाव पर पर यही पर उसका नियम हो घना । सुना पा हरिनपुरा म एक बार जमीन मांगने के लिए एक यावा माए थे। ननरी

गातों रा स ऐसा रग हारि उस नि से रहों का पेसा बन बैठा।
मैसी ही दादी पसा ही रूप रण बनार मटाता रहता-~पर घर, द्वार
द्वार दीन-दुखियों सा मसीहा बनरर मसत जगाता ।
एर सम्मे मर्म तक विरजू की फिर कोई खबर न सगी। याद में
पता चला शिवह वागर म बीमार पडा है। मीन मोगने के सिस
सिमे म भगा हो गया । रिसी पुराने जमीदार रे यूगार मुहलगे सस्तों
में उस निहते पर लाठी मार दी। शिमाले म यह पपमरा पड़ा है।
पानी के लिए भी पूछने वाला नहीं।
ममागिन दुरिमा नया करे ! सारे परोसियों को दही-देहरी नाकर
पपना दुसरा रोई। रिमी तर गांव बनामी या सोर-माररेर
से रमियाजारा, सिम्रन से माना पश्यिा में साझ और परत
जीराम मानने माराम सपार हुए। गतों रात दवागर पहप ।
देखा-रित प्रथेत पग है । परे तार-तार फटे है । जगह जगह रिमते
पाव है । पोर मूग है। बात गिरे। रह रहार सराहने मी पावार पा
ही-१पो जमीन देप्रो । गोपी महाराजको भाषा
पो जमीनदयो ।
मी म
गगी पर मार बिनियो पर माई । नि राठ रहन-सी मममी
दी। गया हाप टूट गया था। सारा शरीर जम्मी पा! हर रण
मरणानुगवा एला। हिनी सोनी भारी पर दम से मी
मा
मुनिष पी एनिमा भून रहे ५ । पमी र मनी रात गर
मामीमोगन पी।
मामा परराव हो' भूप से हममुमाती मुनिका महा।
रव पि देगवा रहा राता रहा। मे रिमी दूरी दुनिया
परगहो। पूण् मोरवाहमा रिरमोसा-नाहि मानाहि! य
म सब हिमागेर भागे।
-

१८/अन्तत
हाप जोरि पांव
सुनियों ने अपनी नहीं हथेली से समेट कर सब सामने रख दिया।
उसमे से भुवा बिरजू ने बटोर लिए । सुतली में गूप कर दाढी वना भी।
फिर राहता हमा, पसे ही मारकर बोला- सुनो सुनो ! बाबा भाखत
है। सुनो।
फटी गुलिया के ऊपर अपना दुधला सन रखा। किसी तरह पाल्पी
मार सी। पदरिया का फटा टुकडा वादा की तरह धे में लपेट लिया।
खोखला पश्मा दिनों पहले मारयोर म न आने कहा चना गया था! र
तक सोचता रहा। विधान न बना । अन्त में हार मान सी। यसे ही
मोसना गुरू किया धोनों वग्यों का निवर ला, हाप बुढा के विठला
दिया।
मुलप मुलक मा गरीवी है । भरपरी है । जमीन जिगरे लगे ज्यादा
है, दूसरे गरीवन को निहो । जर-जमीन सब परमेसर भी है। हवा-पानी
परमेसर की है। यावा अपने ताई नाहि भासत हैं।
परि महत हैं। मो अमोन पला-वामो
दानों बच्चे भवाक हाप पोरे वठ थे। सब देख मुन रहे 2 । पर
समझ में कुछ पा न पाना। पिटाई कर से दम साप चठ पहली
रोके । इतने में समिहान से नानी लोरमाई। दरवाजे पर खड़ी मी सही
देखती रह गई।
'मुनत नहिं पानी माई ! भसत है। हाय जोरिठो ।
धीरू ने धीरे से सुना कर कहा । पुरिया भी ठगी-ठगी सी सच ही हाप
मोरपर बैठ गई।
मुला मुनर या पाकर फाटि रे मावत । उमी रफ्तार से
बिरजू बहता रहा देप्रो ! नहीं तो महाई होई !
मारा मारि
हो। बाग जुगत दस रहा है। दिन सगे जोन है भो । बारा
की मोपी रिमो! पांच पून मोहो है । छग एक हहि मान
लिहो। हमारा हिस्सा हमें दमो। दे मोना। बोम-बोल रे छोरे
का देव है! छोरीतका देत है! माई! बोल रिमाई दा

मतता/१६
बाबा
देव है। जात है। "जा
विरजू मी भावाज महसडा पाई। स्वर ट गया। प्रपनी टूटी होती
मपने माग पमार दी मोर पचेन होकर गिर पड़ा।
मिरज विरजू ! धुरिया माई उसकी भोर लपकी-होई
गया पिरतू । का रहात है। गला भर माया युतिया का 'हमरे
सग पाच पून नहि । एसो तू ही है । तू ही । सब तोर है । ये हि गुड़ी
समान जोन पाहत है स लामा । सब स जापो बिरजू
1
सब
स
पर बिरजू ने न सुना । न दया । सदा रे रीत हाप इस बार भी
रीन थे । पुरिया मुवा मुबर पर रोती रही। पार-बार उस दूरी हलो
को उलगनट पर देयती रही। घूमती रही।
नाहि नाहिं घिर माहि । उसन मोस से भीगी गोली
मागे मुटटी भर जमीन से उठाई । उस रोती टटी हपेली में रख दी पौर
मापा लिया।
चिरजू !'
पर दूसरी पोर से कोई भावार म माई।

आदमी जमाने का पूरे तीस यप की सरकारी नौकरी के बाद मरवारी तौर पर यकार यापित होकर पानी कि सन्यास-माधम में प्रविष्ट हावर पाल याची मी छोटी बटालियन के साथ गाय लौटा दो पुग्धू यावू के दान सबमे पहने हुए । उहान पहले ही पत्र भेज कर मूचित कर पिया था धूपि मैं उनका पुराना जिगरी दोस्त हू परदे से घर लौट रहा हू मौर उनी दा-सेवा के बरे भले हर काम म हर तरह का सहडिल म साथ ने पा वारा कर पुका --प्रत व मरे स्वागत में खद रहेंगे। यही हुपा भी। प्रारम्भिक पाठगाला पाठ-दस भवोध बच्चों को लिए मा म भोई फा पुराना भण्डा सवाए बस के माह पर ठप। छोटे-मोरे हाप हवा में उछालते हुए को बांस की तह गसा पाहते हुए-~-मिमिरी जी निलवा गगनमदी नारा लगाते हुए उन्हें देखा तो हैरान रह गया। हृदय गद्गद् हो उठा । पलकें गीली हो याद । पसार उन्होंने मुझे पपने सौन मे लगा लिया। मेर दोनों घुटनों को प्रपन सीने म क्सकर पर ये-जस सच्चा मपस रहा हो। सम्भवत इसम ऊपर व पहप भी मादमो नमाने का/२४ उह तो नहा सरत। में कोई राजनेता नहीं विशाल शास्त्र-वेत्ता नहीं वनस्पति विज्ञान पा एक साधारण-सा गरीव प्रप्यापक । फिर घुग्धू बाबू की यह दरिया दिसी नहीं तो और क्या थी। साब सफरबी सम्बी थान रे पारण लम्बा सटा था। पूछ बहुत परूरीकामा म मन उलमा पा। तभी गांव गिराम पाठ-दस मिल मादमी पर परमा खडे हुए। मन मार पर उठना पड़ा। यीमतीगी से पाय बनाने को कहा। गरम पाय स जसी जीम का नोर सिसियारर इधर उधर सरसात हुए सव सम्मना पी पव तर हिंपी वासू पर चिपषी जुबान पर माटोमणि पी की तरह घसने सगी- -पुग्धू बाबू से परमा इसापा पमा उठा मिसिरा जी। गधरेमा पानी राया पर सरम-दान म सागर बना गता। पूरा पिचास हाप मम्बा यही कोई म्यालीस हाप पोटा-साऊ समन्दर है ! समन्दर । भैस भी दूब जाती है। ऊपमी पप्पा को उपर जान की मनाही है। परो पौरत सात भी उपर जान से परती है। पुरन घटने तर जारर ही मौर माना है। -पा रतन पाटासा भी यही मायनेसत है 'नहीं की। एस न उगती ही रहा- नहा सागरकार मसामहा पूछ ! भपसर हपम म सर भगवर राता रात इमारत मार दी। पर मुई दीवार परमान ग पहन ही मोर ग । भगवान का मुरर ममझो। मगर जा रही भरपूर परसात म गिरती तो राम गान क्या होता। गांव म एप भी पा कारक मिरा नहा परतावस परामरापी एक पास मिन नामसीको पोट पायम टोग री। उग मोग रमा ममप एपधाम मा पापू मायूवहां तो जान पाए मरिन ममाग्न अपने पोटरमशरन बनी मापने पर उटारर सपा मापानगातही ना ग पाया। परन हापों - आदमी जमाने का पूरे तोस यप की सरकारी नौकरी के बाद सरकारी तौर पर बनार धापित होकर पानी कि सन्यास-माधम म प्रदिप होर बाल बच्चों छोटी बटालियन के साथ गांव लौटा तो घाम या रे दान सबसे पहले हुए। उन्होंने पहले ही पत्र भेज पर भूपित कर लिया पा पूमि में उनका पुराना जिगरी दोस्त हू परदेश से घर लौट रहा ह और उनसी न-सवा के पुरे भसे हर काम में हर तरह का तहदिल म माय देने का वादा कर पुरा--मत वे मेरे स्वागत में पर रहेंगे। यही हमा भी। प्रारम्भिक पाठशाना के माठ-समवोध वग्चों को लिए लारी म कोई पता-पुराना झण्डा नावाए बम के प्रा पर बठे थे। छोट-मोटे हाप हघा म उछालते हए फट बांस की तरह गला पाडले हए-मिसिरों की निगाबाद वा गगनभेदी नारा लगाते हुए उन्हें देखा तो हैरान रह गया। छत्य गद्ग हो उठा । पलमें गोली हो पाई। समार उन्होंने मुझे अपने सीने मे मगा दिया। मर दोनों घुटनों को अपने सीने म बसार जर ये-जैसे बना मवम रहा हो । सम्भवतः इसम ऊपर व पहुष भी प्रादमी बमाना/२९ दो मही सपत थे। में कोई राजनेता नहीं विशाल शास्त्र वेत्ता नही, मनस्पति विज्ञान सी का एक साधारण-सा गरीब अध्यापक ! फिर पुग्धू बाबू दरिया यह दिसी नहीं तो मोर मया पी। सम्ब मपर को सम्बी पान के कारण लम्बा लेटा पा । कुछ बहुत जस्तीपामा म मन उलझाया। तभी गाव गिराम पाठ-दम भले मादमी उन्हें घर पर भा बड़े हुए। मन मार पर उठना पड़ा । श्रामसीजी से चाय बनाने को कहा। गरम चाय में पली जीभ की नार खिसियापर इधर-उधर उरमान हुए सय सरगना की प्रव सर मिपी तालू पर चिपकी जुबान पव माटोमरिक पसी की तरह पतने लगी- -~-पप्पू यादू परसा इलाका धमा उठा मिसिरा जा । गरेका पानी पावा पर सरम-दान स सागर बना डाला। पूरा पिचास हाय सम्या महा कोई म्यालीस हाप घोटा-साऊ समन्दर है ! समन्दर। भेरा भी स्व जाती है। ऊपमी वचा से उपर जाने की मनाही है। घरो पोरन जात मा उपर जान से डरती है । पुग्ने पान वर जाकर हा मोर पाता है। या रसन पाटासा भी इहीपी बोलत ह । इन्हीं की। एक ने मी गारमहा-नही ता सरकार मला कहा पूछ अफसर हाम म मा नगागर राता रात सारत सही परा पर मुई दीवार परमात ग पहन ही सोर गद । भगवान का मुगर समभो। अगर जा रहा भरपूर परमात म गिरवीता राम पाने गया होता। गांव म एक भावना र क लिए नहा नपसा । वल दरामरा की एक पान मिपी माली पार माई वन टागी । उम माग उमा समय एपठाम म गए । पप्पू वायू वहां तो जा न पाए, सरिन प्रभागन पपने साराम रे मारन सी नहीं, मर गई वा अपने रपे पर सगर समपरान ही मयान तब उस पढ़वाया । भरने हायों ! - २२/ अन्तत भाग दी । अपनी कोख की क्या मी तरह जलाया। जो कोई गाव म बीमार होता है वद के साथ-साय ब्राह्मण भी बुसा लाते हैं-धू मानू! सादे तीन हाथ पपड़ा हर पड़ी पर पर धरा रहता है। कौन जाने कब जारत मा टपके । माखिर पाने मयाने हैं न! -प्रखवार-कागज वास कहते हैं कि सरम-दान से सवा तीन मील लम्बी सड़फ देश म पहने-पहस पहाने ही बनवाई थी-मिसिरा जी। भाप तो दो प्रोख वाले हैं। देखते होगे। कहते हैं उससे ना होकर सरमार-दरबार ने इलाके घी भलाई के लिए हजारो रपए की मग दी। उससे घुम्पू बाब ने या सम्बा चौडा यगीचा नौ पानी का रिगया (परपर की छत से छही-पारा भोर से बन्द पक्की वावडिया) भौर एक गाधी पाहत घर'का निरमान किया। घुग्यू बाबू के मार म जब तब कुछ मुनता रहता था लपिन रचना स्मर काय म वितीया जी की तरह इतनी गहरी पठ होगी इसका मनु मान न था। पाठशाला की हमारत गिर गई। इसम उन वेचारामा क्या दोषसायना की पमो होगी। यह वह हाथी-छाप वाघ बनाने पी उनकी क्या वो। इतना भी दिया तो कम है । ढोर गरायो तो पानी मिल ही जाता होगा! उगीचा । पचायत घर । मन ही मन एक गरीय अध्यापक न घुम्पू बाप जसे परोपकारी पुरुप को प्रणाम दिया। एक पे बाद एक पच वर्षीय योजना के प्रमों भी भागी घुट दौड की तरह बातों का सिलसिला भी बता रहा । मवक कहने फा तात्पर्य यही पा कि-चूकि मव में बाहर की विघ्न-शाधामों से बच पर परमसर और रल की पा से सकुगात मुरक्षित घर मोगह इसलिए मुझ उनके काम में सहयोग देकर मामा भागी बनना चाहिए। यह मरा सौभाग्य है कि मैं उनका बचपन का मित्र मौर मब परोसी हू। बातों के इसी क्रम म पागे मासूम हुपा कि पल जो इलाके से महा माय रिप्टी कमिश्नरी अमोल साहय दौरे पर पधारने वास है उहोंने पाय म में बगीमा पचायत पर पादिका निरीगण भी रमा -

मादमी जमाने का /२३
है। जमीन साहब पूपि मेरे पुराने सहपाठी हैं। ममी सव व मुझे भूसे
महीं है--पन व हर घडी मुझे अपने साथ रखेंगे । इसलिए मरा फतथ्य
है कि पपू वाया महायता पर गाय मी तरक्की की दो या उनके
मानों तब भी परवाऊ।
मुझ नया मापत्ति!
व पर गए ता में श्रीमती जी से बोला कि उनके सामन वठ इस ठूठ
पिताची-मोह ग तो पुग्पू याय हजार भस है । इलाका रोशन पर लिया।
अपना नाम रोशन पर दिया। पपा है। माना पर हर कोई भरता
माझ रामय हम ही यातों मसल्सीन प रिया--पुग्पू बार
पपरा वतहाशा भाग पा रह हैं दुम-वर सरगोपी तरह।
जमीन पर पसिरता हमा जामा मेर लम्ब नाना पर सापटी टोपी
राभाल पर1
मिगिरी जी में मार पाग पाया है। पानी पुरानी पादत
२
मनुमा
ना से बोर हुए उहाने पहा । पोहो पार- यार दो
पारियों र योम नार पीनार के स दरारर धार-चार माफ की
सों ! सी! फर । फिर मरा मुह सारते रह ।
मागार में पागत के लिए माग मा सो-नही नहीं !
हम गोयर समोर निद-मी जगए बहुत है-मिमिरों जी!"
नाक पर पारण दो-मीन मार गिराय परा पोर पास्थी मार पर
पापरही गर तर जम गए । मरेपरा मनापरने पर भी
माने नहीं।
उसने मुझे मूचित रियानि में उनए पहरा दोस।। 4 मुझे
'परना गमभन । ती सगरण मुभगे पुण् निर परता पारले
हैसागरा भेनपा सर।
रिमी तरह नामर पापा बाहर परमा a उरोने पर उपर
। देवा-धीमठीबीपी पोर तिरपे घमूठ मेरा मिला। भी बाहर
-

२४/मन्तत चली गई। फिर दरवाजे बन्द करने का मादेश हुमा, वह भी दिया। अन्त मे घोले-कुण्डा मजबूती से पढ़ा दिया जाय और लालटेन बुझा दी जाय। क्याकि उनके स्वर्गीय दादा जी कहा करते थे कि दीवार के भी कान होते हैं मोर कम्बस्त दरवाजे भी देखा करते हैं। वह भी यात्र की तरह हुमा तो हुक्म हुमा कि मव में बव जाऊ । कुर्सी पर मैं बह गया। उन्होंने मधेरै में मेरे पवि टटोले । जिन्हें मैंने पीछे हटा लिया । पास हो फुर्सी के नीचे पांवा के पास मेरे बरसाती गम-बूट परे थे। वे प्रापे से बाहर थे। उन्ही पर मापा टिकाए, अधीर होकर फूट पड़े। मोले--मैं उनका एकमात्र मित्र है। वे गले गरे तक हब गए हैं। मरा परम पम है कि मैं उ हे तिनके का सहारा दू । सुदामा श्रीकृष्ण के परवार में विना मुट्ठी भर घावल सिप रीत हाप माया है । माज प्राणों की भीख मांग रहा है। मेरे मारवय का ठिकाना न रहा। हमार बार मेरे पूछने पर भी वे कुछ बताने को राजी न थे। केवल भरवस मान दुलगाए जा रहे थे। मैं उठकर उन्हें पग पर से उठाने सगा कि उहोंने फसपर मेरे दोनों पाव जमरे की तरह जम लिए । स्थ वण्ठ से बोले कि मैं वचन दि म उनकी बात मानूगा और किसी से कुछ कहूगा नहीं। गोपनीयता के लिए मुझ से मेरे दुधमुहे बच्चों की रुणा धम-पत्नी से दिवगत पूय पिताजी की और मेरे अनेकों मित्रो की जिनसे उना कोई लेन-देन न या चार बार सम दिलावर रहोंने महना प्रारम्भ पिया- जमील साहब भापके दोस्त है म जी हो। 'हो कस वे हमारे ग्राम-समा के सहाारी-बगीचे में माएगेन' मैंने सिर हिलाया। सो पारो वे मरने साथ रखेंगे न? ?

प्रादमी जमाने मा|२५ शायदा तो पाप धुप रहियेगा। बाकी हम देख सँगे। बया? क्या? मनायाप मैंने उनकी मोर देया। वस पाप नुप रहिए । मधिर पूछे तो गोप की सरनवी के दो पण पहिए । नहीं तो होठ सिए बठे रहिए । बस, बापी हम खुद देख सेंगे। ! पुग्पू यादू!' परेशान होकर मैंने कहा- प्रपना दिमाग बो। है। यात सममा नहीं।-माखिर माप क्या देय सने को मत है ! बात गया है। बात भी कुछ हमा परती है मिसिरों जी! माप भी निरे नादी है।' उहोंने मुझ नासमझ भी मोर देवा । दुछ ठहर पर निर दूसरे स्वर में बोले- क्या रह ! पिसम पहूं!-इन दो-पाए भूरण मुगा का हाम। एक हाप से उन्होंने अपना बररमा सा दो भगुल योग मापा पामा-बस ये मेरे प्राणों पर उतर पाए हैं मिसिरोंजी! मरी सास सींचने से प्रामादा है। होंने मेरी सयाही रप दी है। वहीं का भी मही गा मारतलाइए । पुप पयों है ! भाप हो पतलाइए न। मैं पपाप! पहो तो पहर सारवर म हैरत में उनकी मोर दगता रहा । भता में से बहन मगा कि वे पद पार पपरजाय पा नरें! मागिर गया हो पड़ा मने पिसापा से पिरन पिया। पात भो छ हपापली है भिगिनी! मनमापर उनि यही पुराना भरत-पाय सिर दुहरापा मगर मारा तो है है। तिनी मुपीपत म! पिर मुभमे पूछकर जान पर मरी दोना पागों म पमुनिया रास र है। पुष्पहोम बना । उनरी पोर तारता का। पधीरे-राव नपार । माता दीपनामीन रम्भापरा पर ममापान में उन्हाने प्रस्तुत निगगि शिप्त सार यह । ऐसा।

२६ / मसत । है कि उहाने सहकारी फलोद्यान के लिए अपनी जमीन दी। पपना संघस्व सुटाया लेकिन गांव वालों ने सब स्वाह कर गला | उनके विरुद्ध सबने सध्यान रवा--भोला समझकर। मोर उनका मेरे ममावा भव कोई भी नहीं है। स्तिने पेड लगवाए ? यह भी कोई पूछने की बात है मिमिरों जी । नाग-पचमी के दिन परमेसर का नाम लेकर पहले सपा इक्कीस पेट लगाए--लकिन मरी मगोर रिवा न मुए रावणा ने चौपट पर दो। यह दिया-मरी गया ने साए में । मैंने उमेड पर पिसी पौर को वेष दिए थे।--- क्या जाने । भागे फिर कमे साहस करता । फ्लो में पौधा को यो नुघवाने म भगवान भी गया कहते ! इसलिए घप रहा उन्होंने मागे बसलाया कि उनकी जगह म होता तो क्या मरता । साथ दुष्टा के वीष मला मला मादमी पर ही क्या सकता है । तो पब यया होगा? आपने ता कहा था--पाच सौ पेड लग गए । मरे मोठ न पाए। उहाने सोपत हुए महा शिवे इसीलिए सो मर पास माए है । मगर तो वे फ्लामी तीन चार सौ टहनियाँ तुडवालें और जमीन पर गाइ दें। यह पामो भासानी से निकल सकता है सपिन परमानी समुरी मुछ और है। सोक्या? मप्रनेव यार पूछने पर उहोंने बताया कि पानी की डिग्गिर्यो में पानी नहीं पाता। 'जोबनाईवयाची? सम्हाने यतलाया कि प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए। एक बार पानी के सम्म प म गांव वासा से भगाते समय उहोंने पहा पा कि यदि गाय मनोटिगियो न समेपर सो प्रपन पाप मी मोलाद नहीं । सो अपने बार की प्रौसाद बनने के लिए । प्रागे चार पगर में रह सो वे उनमें पावमी जमाने 1/२७ रात को ही मालियों में पानी भरवा लेंगे। गांधी पपायत पर से सपने सच्चा को प्रभी उठा लेंगे । भरा मागन म वधी रहने देंगे। यदि मैं गहू तो ये गाहब से यह देंगे कि ग्राम ममा भी सहमारी भग है । गरीष बच्चों को मुफ्त दूध यरता है। ये बन रहे लग्न मरे मन म नाना प्रकार से नाग मोग्न रह । मैंने परा उठाई-गुना व मुयल इस्पेगन परेंगे। यहाँ यो पहचाना गहतो। पपन मोने नहीं नहीं। उहाँने मा म गिर हिनाया- 'माहृय प उ मुबह रे बजाय रात को ही सारी पाएगे । य मब टीर पर लगे । उसने पानी मे पानही वेर है। यह गनार मग मन पर पापा । इस सबके लिए मैं तयार नपा। पह गोरप पपा अपन यासा नहीं घापू गादू' पर पत्थर पर पर रिमी सरह रहा- मया है माप पमिनर साल रे सामन प्राना पागप मान में। बासीर में नियारा दूगा पौर । 'पाराप पसार काउनिगा। मेरा मयूग वााय वाम मही पार हाता-पाया रह ह मिगिरी जी। पानी एग भरपोती ने -पारा भजारि गया है। मुम जग पापी गरोगा पर भगप नको मूरत प पु पर मान र समाहै। उनम्बर मा पास। मएर पापारा र परपिर परिवार- इस माराप महा मिनिसनी यह सामनरेगा। फिर पारमोरिए ने २ मिशिदना गुपमही पिया ! फिर पमा पतपर मभने गिर तिमियामोपान-गा पाराप रिया! पायst भगापू पर मर सभा नगरपातो सौन-गा पारापा! मन परसी। पाभरने सेन गान रामासनयुमिगतोपररा! .

२८/अन्तत , उपक्का लेकिन धुग्धू बाबू मेरा मन इस सब के लिए तयार नहीं। कहकर मैं दरवाजे की पोर लपका। वे बाज़ की तरह मेरी पोर मपटे । पर उससे पहले ही में किवाड खोलकर निकल गया। सुना कुछ देर तक दे भौचरके मांखें फाहे देखते रहे । फिर बड़बड़ाते हुए गाली देते हुए चले गए । सुना अपने भागन की मुहर पर सहे हाप हिला हिसार रहते -मैंने देश में रण्डियों का व्यापार पिया। उम्होंने अपनी पांखों से देखा । मैं दुगचारी हू । दगाबाज हूँ। मव गांव में क्या पाया गाव तवाह हो गया ! मैंने सुनी की मनसुनी पर दी। रात को बिछौने पर लेटा ही था frदेखता हू-दरवार पर दरजन भर बच्चो के साथ एक महिला सही है-कह रही हैं कि वे मेरी भाभी हैं। मुझे वे अपने बड़े भाई से ज्यादा समझती हैं। लक्नि में उनसरी माग का सिंदूर पोछन पर तुला हूँ। यदि विधवा हो गई मौर मेर. या माई साह्य गुजर गए तो मुझ ही उनके घर मा मार उठाना होगा । चार जवान पाए दहरी पर वठी है-दहेज दामार सब मेर मत्ये। में पान मां-बाप का इकलौता है। मरे कोई छोटे-वर भाई नहीं। इस चिरन्तन सरप के बाद भी मुझे बहना पहा दि अपन वह भाई साहन से मुझ पूरी हमदर्गी है। और मैं अपनी भाभी पा सिन्दूर पोंछना नही पाहता। मरे इस कपन के दाव भी मेरी भाभी कहती रही कि प्रपन बड़े भाई साहब पर मैंने न जान कौन-मा टोना चला गिया है । न जान क्या सिला दिया है। जब से वे मर पर स गए हैं प्रापे से बाहर है । पागलों का जस हास कर रहे हैं । जहमी माती वगत मै दबाए जगस की मोर भाग रह थे । यह तो सोगा न समय पर पह लिया। महीं हो परमेसर मन पया हास होता ! मेरी भाभी रोने लगी। मर दरमन भर भतीन भतीनियो उनके सुर

मादमी जमाने 1/२९
में सुर मिलारर रोने लग! मरे हो। हिरन हो गए । घर भर के लोग
जग परे । श्रीमती जो माने कपाल पर दुहत्ती मार पर यरस पहीं कि
में रितना हल्यहीन हू | पकारण इन गरीव बरुचा को अपन पर पर
मुला पर दुरा" रहा हूं-जो उनसे देसा नहीं जाता।
प्रपनी भाभी का रोना किसी तरह पात किया। वचा को पुप
पिया।
'मासिर में क्या चाहते हैं? हताश होरर अपनी गनी सोपरी
पा पमीना पाउन हुए मैंने पूछा ।
यह तो मुझे ही मासूम होगा। हिनरिया भरल हुए उहाँने कहा
fr उग्ह साफ-माफ मालूम नहीं। व तोता ही रहते हैं कि उनका
छोरा भाई होत हुए भी मैं उनकी प्राजा नहीं मानता । थे तो मरा मला
पाहो । मेरिन मृतघ्नवा मरी ही पार से है। य तो इसा ही पहते
FIR मैं बस साहार साप रह । पप रहू। जो पूछे-हा 'ना में
ही उमा उत्तर यस । दस बात का वपन वे पहले भी चिट्टी भेज
रस पुरनि उना में हर तरह मे माय निमाऊगा । सा पय मौके
पर प्रनिशा भग भर में मुरर रहा हूँ।
परापरता
इस माथी रात म यह समागा' पिण्ड एन
के
लिए मैंने 'हो रह गमा मोर दिपिया।
मुबह पो पाने में पहन ही दरवार गरे।
पर पम्पू गार गामने गये। गिलहरी की तरह मर पांव पर
सोहुए बोर मन पम पमग म भी अपरा-गुरामा को मित्रता
निभाई है। उनरा पूरा जनम मा गगा माई पर।
पुण् दर २८ रहे। बात समर य रह गए रिपरि रहूं
तोमी गगी म माया गाना मेरे ही परपर बनगा। भाकिये
(साई) र पुरान महाठा है। पररामी गाने गारोहमा
भेगा है। पोर मर कहने पर म्पर्य उ (पप्पू गो) भी मरे पर
पर मोचन पाने में पाणि न होगी।

३०/अन्ततः । मैं उनकी मूरत देखता रहा । दोपहर दल गई। श्रीमती जी भोजन तैयार किये उपती रही। सक्नि माहब के माने में नोई भी मामार दीसत न थ । मालूम हुमा है कि साहब मा गधा जमा सीधा घोग जिन्गी में पहली बार खूटा तुनाकर जगत भाग गया है । डिप्टी कलकर पन्यारी पेशमार तहसीलगर मव पगल का पत्ता पत्ता छान रहे हैं। पर वे भर साझ को ही पधारेंगे। माझ तले घे पाये तो पुग्धू बाबू ने गांव भर के वध्वो की कवायद शुम्भ करवा डाली चमिश्नर साय मी ज । गाधी जी की ज मेता की जा के गूजते नारो से मूनी पारिया गुमजार हो गह। जगत जानवर विदकने सगे । तिरगेदार सजी भणिया। साह्य को बुरी तरह फूला से लाद लिया गया था। इतना स्वागत-सत्यार देखकर साहय हैरत म थे। निरीक्षण के समय विभोर होकर पारा मोर देखने लगे । जसे सोता नाव पर चर पर पानी की लहरों की भोर कमूहम से निहार रहा हो ! लाल पीसा काटत दुए बोन- मिस्टर मिग्रा भाप तो माटॉनी पढे हैं। बतलाइए जरा य पौष व पल देंगे। उन्हान चिम्नी पत्ती सहलाई। घुग्घू बाबू प्रारण कप पाए। वहीं पौधा जड से ही उम्पड़ जाता यही पौये पांचवें साहब ने मेरी भोर देवा सो बहना पहा- सास। इतने ही पीय सव लगाए तो मिस्टर मिया पया हमार पहाड़ स्विट्जरसा नगे बन सकते । परिन एक्स-चन्ज की पान दूर नहीं हो सस्ती! मन-एम्प्लापमष्ट प्रावसम साल्व नहीं हो सपना ? मैंन मौन समति दी। दगीप मे दोदार थे। उत्तरमा दयानन्द-हार भौर दक्षिणा पादमो नमाने पा/३१ यह सब शिवानन गार। पमिश्नर माहर ने इममें सचोमन रसा । यार-नाय का उसर द्वार और साउथा दरिद्वार होना चाहिए। इगम नगनल इन्टिगगन पा मजबूती मिपती है। क्या मिया । में पुप सिर हिलाता रहा। वापसी मतम जो साया पाकि पुवान सागा नहीं। दापनाद रे गाय लिम्पियावीरपियो गया । एल एन पानी माया । पमिश्नर साह मुग्ध माव से दमत रहे । ही गाव म एप साप पानी की नौ-पहिग्गिा ! नशन पिठनी सरकी पर है उनी पाय यम प्लान' की वजह स है । माहर मान पाप दुरात रह । यहवागते रह । पूमद रहे । भपत रह । गांधी पचायत पर सपाटन दीरर जलारपा । वमा ने मारगर जी साप रोजी पाठासामा प्रायना दुहगाई-उर आग मुसाफिर भोर भई। एम पर दूरगति पम पाल नाममम न लगन पिया fr पह राम रामय है। इस पर दान सहए माहर यो- नहीं नहीं । यही पनमा मांगेगा ! यही । र नाग मुमारित मानिए-शॉग नहीं है। यह तो । मेघनम प्रारगर । पिर "मातरम् गम्भीर गत भी गया। भस की स्लीम मासको येह पर पाई। पान हापा होने गरीर पगारो दूध बाग मोर ने नमसर मार म भी। मग गुप। पाच जातियो पर रह । मरिन मरा मापा पाया हा पा । मुभा रास पान मा मुमाराम गाय गे क्षमा पाला पर पर पाररिवारमर मर गया । पानगरपाrि राउरोमगातार पर बोहारों पर तीन पर तर भारपा दौराएा। पास मार - ३२ / अन्ततः में गरीब लोग भीगते रहे । पर पल्ले कुछ न पटा । केवल वक्ता के मुह की भोर ताकते रहे। सबने वाली पीटी तो रट चट् गाती पोट देते। पुग्धू बाबू को माहब ने जमाने का प्रारमी बतलाया और उसके मादा चरित्र के अनुकरण की बच्चों को विशेष रूप से सलाह दी और कहा कि माने वाली पीदिया उनका नाम घटा से लेंगा। क्योकि मर पर भी जो मरते नहीं भमर रहते हैं उन बुनियादी मच्चे जन-सेवकों म से है । फिर पुग्धू बाबू का भाषण हुमा । उहोने कमिन्नर साहब को देश के प्रमुख पादा प्रशासकों की श्रेणी में रखा । मौर उनकी काय-कुचलता अनुकरणीय यतलाई। उनके कर्मठ जीवन से प्ररणा लेने की बात कही। फिर पाखें मूद कर गांव को गरीबी का वर्णन किया। इतना ममस्पर्णी करुण मि साहब की पल भोग माइ । घग्घू याबू न पन्त में दोनों हाथ पसार पर सरकारी सहायता के लिए भोली फैला दी। मरे रिन उठा नहीं कि श्रीमती जी ने भरभोरा। कहा कि मैं हमेशा का लापरवाह हू । उनकी बात सुनता नही । सुना पुग्धू बाबू पीपीमों के लिए साहब ने पह हजार की सहायता दिलवाने का चपन लिया है । घुप्प वावू क सड़को को नौकरी दिलान का प्राश्वासन भी मिला है। मुना जाते समय साहब नकद इनाम म सौ रुपये उनके हाप म घर गए। चारों भोर घुग्घू वायू पी पाहवाही हो रही है। पोर मैन तो पिन्गी यों ही मार दी। घ्यय का वनस्पति विज्ञान मेकर न जाने बहा रहा घाम सोता रहा !

स्वभाव
क्या पा
7
गोरे पा एर मपरी-
मोरारतभरी पी पी ।
परिपामा मिन्ना
विछोने पर सेटो
पण मासती ने पराल हर सम्म सी। पिर धूप र बपने की तरह
पारों पगुलिया रसार म गमगर माप पर मगात हुए अपनी घुघली
निगाहोंगर दरवारे को पोर पानी पेप्टापटप दीपा
नहीं। पर गए पाहगा पाई। फिर भी पी हमी। फिर
पुणे नि मागहलो पीरा।
तभी पारपारको मानि पटग बाहर fruit ।
बारामाह का पापीना वारा पापराता मारमाया।
और हमी पिन्नी पती सामने मा । गम हवा में
हो पर उपर गिरे पासमी तरह उमन । मापरवाही मे पाने
सामान पोगों गामरे गा मा पा सिनरी
मा भान पामीर मह म मा पोटगी मतमा
परमोमी- पुरे भाभी उमर मपन पर पाए।

३४/ मन्ततः सौना बढ़ घंग से उठने गिरने लगा। मीनी चुनरिया मफ्लर की तरह गले पर डाल पर उसके नीचे झुके दोना पल्ले खीचकर भासें तरेरकर देखा- 'सच्ची घौत बुरे हैं भाभा । दरवाजे तक दन जो गई कि निगोरी घडी रह गई वस लाट साहब की तरह हाय मागे बढ़ा दिया । माहार यो एठार वोन-चुड़र पड़ी बाध । वाधने लगी ता घड़ी के साथ साथ हाप भी पाड लिया । फिर सामने की तरफ झषी चोटी हथली पर घर कर सूघने लग । मैंने कहा-सूपते क्या हो हजुर तुम्हारा घमेली का तल नहा लगाया ! तो चुप झूठा कहार गान पर एक चपत जमा दी। फिर नागन कहार मरी पाटी पक्डकर जोर-जार से खीवन सगे । दखो कही बाल उतर जात तो।।। मामा की बुभी पलकें बड़ी हो पाइ । जस नहा विनारा बार के जल से मनायास विस्तार पा गया हो। सक्नि मिन्नी उसी गति सरहती चली गई- मैंने कही तो !' मगुली पर सजी स छल्ल की तरह दुपट्ट का किनारा लपेटती उफेरती मोली- नहीं तो पहने मग गिलरी दिना पूछ के भो दुरी म लगे है। क्या पट्टो! फिर विना बात हो हो हो हसने लगे। मैंने मुख घिदोर पर गुस्स से देखा तो सच्ची भाभी- लवलो लवली पहर पल गए। सा न ज भी पाई यात है। घर म भी मगरेजी बोलत है! उपनती-उवलती मिनी चली गई। भाभी देखती रही । सोचती रही। दाधार मनदुझ पर पर मन मनायास भटक पापा-मांछी के पण्ठ म फमी कटिया की तरह। सभी पाप भी पूरा गुजरा न होगा कि इसी पहले मगल पो सांझ रे यसत सीढ़िया स हा हो-हम्सा मचाता हुमा जितेन भाया था। मोघे मागन पर सहा मावार लगाता मा पुगार युवार सर पर्ने लगा पा असे रिमी यही । चियावान वन म पुकार रहा हो- परि मा सुन्ती मुम्ती हो! देखो यह बया पका कर साया हू जगत से !

स्यमय/३५
तुम्हारपासपी बसम सब भव बस वेव पर सो जापो । पा-याहर
पादुममा काम रोगो । वतन भार माजगी । पपड़े उसे धोएगा । बुहारी
समागो, मांगन पर। यग पान स महरी या वाम ठप्प पट्ट से
पटनी मनात हप, उसने पपनी पुगनी मादत म भनुगार एर पार
निमगाइए यहा था--पो क्या है। गिलहरी है। हैन ।
मालती ने दमा-आप ही सामने गिलहरी सही है।
जितनान पर बडा है--
माग्विा भाभी।
पह माया Pिान पे लिए भी तो भाभी महा नही कर पर,
सिमिया मुसग भर दो। एर उसी उसी सी धोण मारान पसी
सग पूरा स्याह एटा पर मार होन पो ही विमरग। फापर
दुनो चिोट पोर पोरे धीर मोमल हो चली।
पर पायो ? भाभी ने घुपट म मानी तन स पानी की
रातानिागमोडीपार मा दिपा। फिर चमर पीस
गई तारिमामन वामी भी बठ गरे। पर मयाा पादम केबमानस
रिना की जगह सारी पारी म यही दुर्मी
है मिल मामन जिन
'मा मिनीपरको।' निरासमोर से पावार सोरी।
पा हो! मटो भी न!' मामी मे पहा
ran हरा मिमिटर होनस पासामी पतसी-सी बौनपी
पमा प्रम जगह परेवा पई।
पानी हो पाराम
मारा गईर मर
Tfrry ही रण की जातीmm बिमा या
पुरवी गएपापा FRIENप परेपा नहार पर वह
ममीना भी मानाने पर पाय दी। त्रिगमें नगर
पुरारीको मोपी पी। उपर मपग्रवार
१

२६/अन्तत . म प्र के फटे दिल से ठको एक किताव थो, स्पाही मोर पेन्सिल के मिथित प्रक्षरों से हिन्दी मग्रजी मे कुछ लिखा था। छुट्टियो में पढने के लिए साई थी-पयोकि भन पी ने छुट्टियां पिसते समय कहा जो पा वि खानामों को हसी ठट्ठा में समय बरबाद नहीं करना चाहिए । सो समय वरवाद न मरने के लिए ही वह वदरिया के बच्चे की तरह घसीट फिर रही थी। पसे एक बार भी उसने पन्ने पलटे नही तो क्या हुमा ! माज से पहले भी वह एक बार कभी यहा माई यो । तव वह शायद पासपोट साइज मी थी। लडकियां कितनी बड़ी हो जाती हैं एपदम मालती क्या कहे! एकाएम बोलने को पुछ मूझता न था। गर्मी की छुट्टिया में पाई है तो कुछ सोचते हुए उसने सहानुभूति से महा-'इम्तहान दे के प्राई होगी न । थकी पकाई! मुह के सामने से मयती साने मी तरह हाय या ही झटके से हिलाता हमा चट रितेन बोर उठा- थकने के चार यह हाल है तो पता नहीं पहले क्या होगे हरे राम हुए एक गहरी सांस भरपर प्रितेन ने मिनी की मोर देखा-- भाभी पहनी थी कि इसका पेट पापी है चकी' हाथ भर ऊचा दर एक याप्त म हजमगर जाती है। ऊपर से चूंट भर पानी भी नहीं निगलती। सुना हमारे यहा इतना नहीं मिलेगा हो हो हो हो । वह फिर मुह फमा के हसने लगा। मिनी भैप गई। मालती ने पजीब-सा मह बनाया । जसे वह कहना चाहता थी कि उमे एसी बात नहीं कहनी पाहिए पी। वात सम्हालता हुमा पस्सियो लेकर शितेन बोला मजाविण टोन म-मरी भाली मठी-विठाई पटल नगरी म परतीमा! इसलिये यहाँ प्रामत्रित पर लापा । गह पपना है । जपी वह भाभी, सी यह रोगया पर विश्राम करती रानी साहिया पी देख रेप हो जाएगी। स्वय मुझे पार-छ दिन पयटन पर रहना होगा। लोह पय-गामिनी से हाथ जोरते स्वभाव/ ३७ पात्रापरली होगी। हर कण्ठ में गगाजत गरन वाला तो कोई पाहिए यह पतामहता स्वप ही इस पहा । फिर स्वामाविर बहाव म बोसा-मई माह साश भी पया है। दोस्त हो तो एसा हो। महने सणा-या तू मोज से दूर पर जा । होते हमारे चिन्ता रिस पीडभी। सेरा न म पुरैसो काई राजस्थानी न्यूट मिले गे गले टोग देना । पर सिम पर इस पौन-सी मिनिस्ट्री सम्हासनी है । जिनन ने मटात देसार मिन्नी भोठ सिमोड मूह बनाए- ! बम बिहार रे गुरमे में दस रही है। त म न कुछ ही भार- दिनों में इस गिलहरी में बड़ा पन्धर मा गया है। एमापनि ता यों ही फूहा मनी रही। न सलीके से करें पहनने र म पारी पाइने पान उठने-बटने का घोलवी तो बम बोमती मती जाग्गी बनान पर बतरत पहिए की सरह । पर होने जा रही है। या बोल जा रही है। जिससे बोसे जा रही है मुप नहीं। -मामी, हमारी माडी पनौरा बानो मामी भोगी ममानगर है। हम सब उन्हें मम्देर भाभी रहते हैं। पहन माया स सरेंगी। कि मपाग, fr मे गे प्राने पायोपाने मार परम पर पगा! सभी भाभी मरण मौत ये है। बहन है- पौरत मान को मा सगाना पाया मही। तुममीदाम मौन सोरहा है। पारी मो सहमी हैन मामी सबका सिरी हसरतीमाता हो पा माती है। हरहता है कि यह मागे पनार मनेमा बाम पो। भोर-गारियों को मानान बनेगे। तर मी मुम भूमेगी -रमार रामभरो-मिग पुरी सीहोरमा मारियों कोरुपएफ.राम महागातीप्न-पन पानना नोप बार मे पर निया है सागरत है सपा मे प्यार है। तभी पर पान रहा है। हो साता ३८/अतत तक खा लेती हैं पौर अपनी परिया पर हो सुसाती है । -और भाभी यो मिसेज गपुर! हर साल मुर्गी के प्रण को सरह एक बच्चा वह अपनी एक अगुली हवा में सभी करती। फिर भाभी के सनिक पास खिसक कर कहेगी-भाभी हमें एक मुग्छन मास्टर जो पढ़ाने पाते थे। ठिगने दिगने से 4 । वे मुझ से रिना बात गुस्सा होते और गुस्से मे मुझ गी' कहते । एक दिन वे मुझ से रहने लग fr में बड़ी मूम्ब हू । गवार हू । इत्ती यही हो गई कगारू मी तरह अभी तक मुझ 'दादी की बात नहीं पाती। पहले वे जहाँ पढ़ाते थ वहां इसी इतो छोटी छोकरिया भी सब पानती थी। पर मैं ही हूं जो । एर दिन हमारी मण्ही घनौरा वाली भाभी ने सम्ची भामी खुद अपने मानो से सुना । वावा से नहा। दावा भी बिना बात उस विचार पर लाठी लिए पिल पड । पता नही भोगी विलिया की तरह का भागा। नि ग्वि खि वह फिर हसने साती। लेकिन धीरे धीर पद हालत इधर गाफी बदल गई है। मालती को यह भन्दाजा लगाना कठिन हो जाता है कि यह पापई भोती है या तरह पी ऊरपटांग मातें बनाएर उम बनाया परती है। मी भी ता समझदारों स भी भली सयानी वात पर बठती है। भय कम से कम एक घण्ण गमवसाने में पपता है। पार छ दिन म हो मितेन की मुगपित तेल की सारी सीधी माये पर उस हासी है। जितन माफिम से सिर का पतूट लाया था भिमसे उमने वीरों नापन रग हाल हैं । सारे दिन भी सामने रहेगा। सध्या को गाजस सगारे प्रोखों में तल रास एत की मुर पर धठो म मासूम मचा-या निहारती रहगी! फिर मीर उतर पर गहरी सांस भर पर दीना हाथों को हवा मक्ती हुई होंठा ही हटों में रहगी--हर, हो गई । भाभी माम इत्ती पदेर तर मी भक्ष्या सौर नहीं' मासको सय देखती है। सुनती है। सरिन साफ-साफ समझम पाता स्वमाव! ३१ मही । मधिक पढ़ी-मिानी नहीं है वह। बचपन में नाना मी फटकार या मम्मी नारी मे दुमार के कारण रामायन महाभारत भौर राम र छा पर सेती है। न्याह में गिनों म जिमन रहता था कि यह पता देगा। पर प्रय पहा पाया भी राव बिमरा गई। गिलगी की यात सर मान लिया टीम भो हो। जिमके कुछ माने भो ।। रेग्नि जरूर कुछ पात है । सभी सो पर म प्रग्रजी वारत है । मिन्नी टोव मरती है। मन उसको माता मालती पा। उगे लगता उसकी एणह भीगते सम्बन की तरह भाग होती चली जा रही है। शन पान सांस सेने म मी पटिनाई हो रही है। पिटले सदा माल मी बीमारी म प्रतना रमजोर उसन पपने मोभी भी मांग नहीं दिया। जितेन परले मी उसा उभागा रहता निभीरदात मोगी वसेतोपाहोरिया परसा पा। पापिग नाम में भी तन-मन मे जग रहता था। पर दम मवान्म परमही बीत जाते हैं। विमो-किमो दिन तो पापी एमेर दुपहर भो ही हाजिर 'मिन्नी मजान परना तो कोई तुम मेसीये मेन्निस जगहमरतोपना भी। तरे हाप की पारियो पार वैमन म नपरम मिमयी। रिपगान मे दराना मोतीपा ममरीन हा जाती है। पास रे प्यासे में पानी में पाये वह भी मिनी ग पानी पापी ने दोपहार फिर निमोहमा पा- रोग कार | 'सनी पोरी कि ममुरी पो नहीं पानी माग ग्यारही पसरा गानाबयां । निगाकर मिनी पर प्रम जाती है मामी जानती है उसमारपरनिnanीतगह पेशाम म! म मामा गाण भी दियो गे मासगी है। माने रोप्रोपोगमा मगर पानी को गिने पाट-न्य मोने से पतीलाहोरामी पराजिनानारावार रात परर एगा। पारिम रोमाने वरदी निगाहोंगे रेवम तरार - ४०/अन्तत देश भर लेता है। उसका जी चाहता है कि पहले की सरह उसके तपते मापे को सहलाए उससे बातें करें, उसका मन रहलाए । उसके साथ छ- कर, बग्ची के बारे मे बातें करने में उसे अजीब-सा सुख मिलता है। वह उसके हाथों को अपने हाथो से याभार अपनी मुदी पलकों पर टिका देती है। पौर खोई-खोई-सौ सुनती जाती है और जितेन कहता चला जाता है मष्ट्र को वह स्कूल भेजेगा ! टिंकू क्तिना समझदार है ! वने छोटे कम पक्म के बच्चे इस वरह रह सकते हैं, इसकी पल्पना नहीं की जा सकती ! परसों को चिट्ठी माई थी । वह अपरचाकर देवता-मालसी को प्राखो में उसमें मोती । पौर उसनी सारी हयेसी महा पाई है!--एक मार बस केवल एक बार कभी ऐसी बातें सुनने के लिए वह तरस उठती है। पर जब से मिन्नी माई है ! सब से ! उसका मन काप के टूटत टुकडों की तरह सनस्सना माता भोर मयाह में पूब जाता। मिसेन भव अधिकतर जापरी पाल कमरे में बैठा रहता है। मिन्नी पठी रहती है। उसकी मसाई से घडी खोलती है। जूते उतारती है। मोजे उतारती है । परीने से उसके पडे सह करके हगर म सजाता है। उसके लिए यह स्माल ही नहीं पकिए का 'स्वीट ड्रीम' लिसा गिलाफ भी काटने को कहती है। और कभी कहती है कि वह चादर भी सादगी- मेम-यूटों पाली। भइया पाग मापने खाना नहीं खाया । अच्छा नहीं बना गया ? 'सातो पिया। "ह महाँ साया ! बस इसे सामा म ! पिता पी मगा है। किसी मिहनन से सेंब-सेंक कर बनाई है-मारके लिए !' न बम। नहीं भाया । "ना ना! यह पपने दोनों पसे, उल्टे हाथों से पानी डा देवा मौर मपनी मोर सपा सेता।

स्वभाव/४१
प
!
,
पर मिन्नी माने तब न ! वह जबरदस्ती निशाना साप पर रोटी
गेरती है।
न्च
मिन्नी देखती रहती है- मैं सिलाइ माया ।
पास ही दूगरेकमरे में भरत-सी लेटी मालती साप उठती है। उसने
सगे हहियों वाले शरीर में एक साप हमारा सइयां सकने लगती है।
उसापारीर बर्फ स पाटगराता है । वह सन्न रह जाती है । जसे सारी
पेतना पुष गई हो। तभी पिर मिलरारी भौर हसी ने पम्वारे ! वह
अपने कानों पर हपसी पर देती है ।
भोर थाली पर ही हाप घोरर जितेन याहर ही बाहर घूमने निक्स
पाता है।
मिनी फिर भागती भीतर भाती है। उसरा उमगा परीर सित रहा
है। पाव पिस रह हैं। मांगे मभी सर भी नाच रही हैं --- 'मामी भाप
पया मेंगी
छ मही।
दुए तो सो भाभी
! जो महो मो बना दू
माया भी पा! भारण वह हम पता-देगोन सामा
गो-गाउ धोनम ही उस पान है-भव नहीं पाना । मम पम् ।
पानी परे पर दोनो हापा मेहर सेते है । मेपिन जब में पान हार्यों
ठोर-शोरर निगो गिमातीतो गनी भाभी दो-तीन रोरिया
पौर परापाई है। बता में मना नहीं करंगी मुह पसाते रहेंग
पौर देगोन भाभी पानी भी मुभी दो रिताना पाता है पम्पों की
हिर मामी उनी पेहरे पी पोर देगी।
"मा पारोबार प्यारा मामी। हमारे पान नगरपान
का हमारी मापी मामा यो रिसा पार पख है उसरा भी

४२ / मन्तत
-
भधिन । घो हमारी लच्छेदार भाभी तो वस्स्
मालती मा झलसा मन वुभ-सा पाता।
परसों भइया महते थे भाभी !
मापको
बुखार तो नहीं भाभी !' वह बिल्ली की तरह उछत पर
पलगी पाटी पर जा विराजती। माथे पर हाथ फेरती-'पप रहा है
भाभी भट्टी की सरह ! कहते हैं वरफ की पली धरने से ठण्डफ पड
जाती है। भाभी योग तलुगों को मल दू ! भाप महती है उससे ठणाई
परती है। प्राणों को सुख मिलता है।
नहीं नहीं। मालती भटने से कहती जसे बिच्छू ने डक मार
सासा हो। तुम खा लो मिली जामो रोटियां ठण्डी हो जाएगी।
भइया कहते हैं भाभी नि मरे साप वठकर खाने में उन्हें बहुत
पच्छा लगता है।
भामी मी पोर से कोई उत्तर नही लौरता। तव मिनी धीरे-से
उठती है। मुडकर फिर देखती है-दनी पी माज धुरता हो गया,
मामी
इस महीन दस वो ही सारा मत्तवान चार गला। होती तो इत्ते
से ही महीना दम नि पौर निकास देती । पी चुमा चुमा व साम-सफारे
पराठ बिलाती जाधोगी तो बचेगा क्या? मासती मन में माता पर
पहन पाती।
-
--
भाभी पाप बहुत नुरी हैं । मण्ट्र-टिपू यो म जाने नहीं भेज दिया
है! एक मार दिखनाया तक नहीं । सुना बहुत प्यारे हैं । यहुत खूबसूरत
हमा भइया पर गए हैं।
मासनी मौन देसती रहती है।
पापोय पापी या नहीं पाती भाभी ?'
मारती मह न पाती।

स्पमाष/
भाभी, सन्धी हमारे बुस सरकार भइया कहते हैं कि मैं पड़
सिस पर मारनी बनन वाती हूँ । मरे जनम-पतरे म भी मानी रहती
६ पुस एसा ही मोग है। हर सध्या भाभी, में इलाज कर प्रापको
मष्टा पर दूगो। माया तो पुछ करते परत नहीं। भाज-बलक
गार मए निगा हान हैं। हमार बुल"मर मे है एर भाभी। वह
जिमा साज मरता है यही पर हो जाता है।
।
भाभी यचों को हमारे पर भादो! सम्धी, मैं पागी ।
भाभी माया मय निसरी विलग नही महते। मरी चिउरी पर दो मगु
सिया पर सभी सथी सवारी । पह देते हैं । सब पता नहीं है
मो परमा जाना है। मची भाभी भरा मुम लात हो जाता है-पो
घरगीतह
मालती रोएछ गुनाई नहीं दता । वह पास पार पीसा पुर
दुर होंड गार विभिन-सी इतकी पारपती रही है। खिड़की
टोल र मग्यिारे पार्यों के पास हया भी जाता है। हा हवा से
अपनर निजिगनाथ में पसरार या मोर गत माह मदत
है। मन गम्पिो र मारते ही वह पावरण र जाता है। पर इस
पास पहा हा है।-उससे मम्मो धीमारी कारण । मरिया
ममम उसभरपार पा है। नासा उस पार स एr
तयार टोनी है प्रियम प्रब पर भारी पड़ गो है। मस्ति
एमान गने त म ा भी उसरी पना गनती है-
उरवीर उभरपर र भाती है-मामती-म)। प्रपती-यो ।नयन
।
मामन महिनी पोर पान मसाट पिसान पर है। पर
है। प्रदूषक परापार रामर भूम गया दा1 AM
rt करनी पौ। पोप प्रपय पिणारे मार्ग मानना था
माrnपा-मामी दुम भी माना हो मादी!
पापी.

मन्तत तब से मोई सस मोर जा न पाया। परसों टिंकू का पत्र था। पेन्सिल से लिखा था- मम्मी, यहां सब हमसे झगड़ते हैं। कहते हैं हमारी मम्मी नीमार है। मरने वाली है। मटू माधी रात को नी म चिल्लाने लगता है। वह अब साना नही खाता । दूध भी नहीं पीता। हमें बुला मी मम्मी !' सच ही मालती मा गला सूख भाता। चीखने को मन होला । पर गले मै परथर जम जाता । पर फूट कर बाहर न पा पाता । मिन्नी पानी दो पानी गले से उतरने पर हाश पाते। मिन्नी की मोर देखती। हाफती रोती- मिन्नो सुम्ह भया मच्छे लगते हैं ! ये भी तो तुम्हें प्यार परत है न कर सकोगी। "मेरे बच्चों की देख रेस कर सकोगी मिनी। उहे प्यार विलाल तुम्हारे भैया पर गए हैं। पोड़ी देर बाद मालती सयत होती तो स्य ही पछताने लगती। हाय यह क्या कह गई मिनी से । नही । मही । वह बस र चार पाईनी पाटी से जा लगती । जस भूचाल से धरती फट रही हो। वाण पान के लिए यह अन्तिम महारे से मिपदी जा रही हो। वहीं मम पार म जिनका मोर चूमि मिन्नी की छट्टियां भर चिनारे पर है। चूमि जल्दी ही उसे पर अपने पाहर लोरमा है। धूरि जितेन न ही सम्भवन उस उपसाया हो मत पान प्रात से हो वह तुसी पी जित निनोम कभी उसने चिड़ीपर मही देखा । इसलिए आज इतवार का दिन होन से छुरी है। इसलिए उसे अवय दिपलाया जाय । नहीं तो वह वहा सोटर श्या पहेगी! पाया न पाती येर टेमन म सास भइया से कहा था कि वह इस बार भवस्य पूरी स्लिी देसार मौरनी चाहिए । भइया ने सिर

स्वभाव |
हिनाते हुए हामी भी मरी पी। लेग्नि ।
जिन ने पहल भघिर बोत्री होन की बात कही। फिर 'हो'
की मोर मत म जामिन्नी नहीं मानी तो उसने श्रीमती जी की भोर
देखा-'यह गांव पी गितहरी मन से पटने नही दगी। पतामो क्या करू !
दो-पार पए का पानी यों ही हो आएगा
मालती न सोई उनर न दिया । सुपना युमा मोर बच्चों की
नई पिटलो की बातें उपर मिाही शान शसी।
पन्त म मिन्नी न धोरगुम अधिक मचाया तो वह मनमने भाव से
तयार हमा । मिनी पापन भीमापार वें पुनातामा मालती
रे सामने स मममार गुमरा।
पर राग मा सोनियो म हमान की और हेडी से उतरते जूता की
पद-पद भावार माई । पिर मम्मिलित हमी भासा र व्यापा।
पालना माती रह गई तो ये सूनी दीवारें मरन की सी मुनिगड
निए उसे अपनी भागी। यह पायें मीथे यार-बार परवर वसती
रही भी उमरियारको यतय सारसों वाली घुमावर मील के
frनार गैनी वनमा रानियों की एपात हम हरी हरी मस
मसा मुमायम दव पर ही मिन्नी दीपा । जिवन दीरता इ-तरह
भी मुगगी या मोटीश गुनाई दी। मटने से बह रपट
मनी पौर मागोमदती।
भारिर मररने पर फिर यहा दृष्य पर मिनी र घुटनों के
पारा भारमान को मार महरिए रितन मग है। सोया हो।
प्रना होगे पनिया माप पार मोनार' गुमगार सजा दी
है, पर मही। मिन्नी उगमस की पगीन मी पूर्णकारने
हे ग पाया है। जिन र पर पांगरी गरमल पराम कामो को
मरी तरह पामा मती है। फिर म से मगुमाएर
ऐसा है-र मुपासा पूरी गालाई रा वा नहीं। सिरे
मित नहीं मान र दायरामी र माया है।
-

४४/अन्तत
तब से पोई उस मोर जान पाया।
परसों टिक का पत्र था। पेन्सिल से लिखा था- मम्मो यहां सब
हमसे झगरते हैं। कहते हैं हमारी मम्मी बीमार है । मरने वाली है।
मष्ट्र माधी रात को नी में चिल्लाने लगता है। वह भव साना नहीं
सावा । दूष भी नहीं पीता। हम बला लो मम्मी
सच ही मालती का गला सूख पाता। चीखने को मन होता। पर
गले में पत्थर जम जाता । फूट कर बाहर न मा पाता।
मिनी पानी
दो
पूट
पानी गले से उतरने पर होश पाते । मिन्नी की मोर देखती।
होफसी रोती-मिन्नो तुम्हें भया मच्छे लगत हैं वे भी तो तुम्हें
प्यार परत है न
.
मरे बच्चों की देख रेख कर सकोगी मिग्नी। उरें प्यार
कर सकोगी! विलकुस सुम्हारे भपा पर गए हैं।
पोडी देर बाद मालती सयत होती तो स्वय ही पछताने लगती । हाय
यह क्या कह गई मिनी स । नही । नही । वह बस पर पार
पाई बी पाटी से जा लगती । जसे भूपाल से धरती फट रही हो। वाण
पान के लिए वह मन्तिम सहारे से लिपटी जा रही हो। वही मम
धार मनिनवा मौर
-
पूनि मिन्नी की छट्टियां मर किनारे पर हैं। धूरि जल्दी ही उसे
पव पपने पाहर लोटना है। चूषि जितेन न ही सम्मवत उस उपसाया
हो मन' मात्र प्रात से हो वह सुली पी गि इस गिना म पभी उसने
पिडीपर नहीं देखा । इसलिए भार इतवार का दिन होन से छी है।
इसलिए उसे प्रवाप दिसलाया बाप । नहीं सो वह वहा मौरपर गया
पहेगी! याया ने पाती यर टेसन मे पलास भइया से कहा था कि वह
इस मार मय पूरी ल्सिी दरार सोनी पाहिए । माया ने सिर

ममी मुलायमदूब पर दो मिनीदीपप्ती। प्रितेनपत्रासह तरह
पोग्ग-गोया मीटी वा मुना देसी। मटरमबहरवट
परपिर मानेपरपिरही प्यार मिन्नापनोंके
पाम पामपानी पार मह पिए मिठन मगह- सोया हो।
पूनागेपगुनिया कबीच पारमीनारनरपपजा रही
पर होत महामिनी उमममदापगोपने
Tenा। जिनपरेपारमेगागदपनामोशे
भीतरह पगुमो ममारती। सिर पर
मिनमदीप मागम करा पाग।
Part-पर मुपा पापूरी गाना रागनगमिरे
स्वमाय/४५
हिसाते हुए हामी भी मरी यो । सकिन
पिता ने पहन प्रषिक 'बीजी होने की बात कही। फिर 'हा'
पीपौर अन्त म जब मिन्नी नहीं मानी तो उसने धीमता जी को मोर
देसा- यह गाव नो गिलहरी धन से वटने नहीं देगी। बताभो क्या पर।
दो-चार रपए वा पानी यो हो हो जाएगा पर
मालती न सट पोई उत्तर न लिया । मुम्बना दुमा पोर पञ्चों की
नई चिटीपी याने उघपर गिा ही या हासी।
मन्त म मिन्नी न गोरगुल अधिर मचाया तो वह अनमने भाव से
सैयार हुपा । मिनी के पहापन की दो-चार वा युवावा हमा मालती
के मामने मममनार गजरा।
पर दाग पा गोटियों म ढलान की भोर तेजी से उतरते जूतों की
पर-घर पावार माई। पिर मम्मिलित हमी का जसा र व्यापा।
मामती माती रह गई तो व मूनी नीवारें मनान वी सी मनिगी
लिए उमे भपन यो भागीं। व प्रोय मीच पार-बार करवट व सती
रही।भी उग गिध्यापर गरी वमस-पारमा वाती घुमावर के
पिनार गैस की स्त्रीनमा हालियो की एति घोह में हरी-ह । मम्स
-
पदमनी पौरपागे मदनी।

४६ / मन्तत मिन्नी दो प्रगृसिया की नोक से उन्हें फिर फिर मिलाने की असफल घेष्टा कर रही है। दोनो घुप हैं। उस मोर रास्त से इक्के-दुक्के मोग गजर रहे हैं सक्नि मिनी की उपर पीठ है। उसने जितन का धूप का काला प'मा पहन रखा है। --सुम मेरी तरफ या धूर कर फ्यो देख रहे हो ? -तुम्हारी दो भाखो म छोट-छोट दो जितन खिलाई दे रहे है । फिर दोनो चुप है। -घर लोटरयाद परेगी न मिनी? वह एक बार उसकी भोर देखती है । हस भर देती है। गिलहरी जव हसती है तो निवनी भली सगती है ! ममने-सा भोला मुखडा । रुई क गोस-स कोमल गुनायी गालो पर गड्ढे । कच्चे अनार के सफर दानो की तरह मोतियां दात मालती में पूर्व मन में तीर-सा घुमा। लपक कर उसने पास ही मेज पर घरी पानीमारसी उठाई। अपने घहरे के सामने रस र अपने से ही मासे पार करती देखती रही, मविचलित माव से। देखत रेखते उसमा मह मलिन हो पाया। मासोने कोर भीज गए। दोपहर से बाहर की जाफरी के विवाद का पुण्णा मटका । मासती ने पौक्कर झापा ।-मानों नीद मे जागी हो। मरे स्म प्रबेर। घम् धम् पर मिनी दाखिल हुई हाप में प्लास्टिक बोरीवी टोपरी मघाती हुई। मालती ने यों ही दसा- वे नहीं पाए ! प्रधर मनचाहे सुले । यही सी' साक तरफ गए हैं। पिसी मगसी दोस्त ने पर मुछाम बतान थे वह घाम से निहरपी परमराता दुर्सी पर गिर पी। पास ही पूर्सी बी पीठ पी पाटी पर मटपे मालती के धुप्त माउन स पर्स ना पोछती हुई बिखरे वामों को दोनो हापा म पनपटी से ऊपर से समटार, माये | इत्ती

सीक
मी मोर ये पीछे ने गई। फिर पुटनो पर दोना पुनियाँ टिमाकर,
दोनों झापा र गेडी थामती पहल उठी-'मला भा गया 'हर हो गई
भाभी भइया भी गया है ! सच्ची में मरठी-मरती यहो सर मा पाई।
साखिला लिया सम्म! जहाँ पर भी सानाकाई पाज़ दाती नहीं
एस हमारे युसा दसरमी कमेटी के पूहा नठाने वाले बल की तरह अपने
मार ठिप पहे। भगन की पकोडी मिनाई। दही भल पिलाए ।
इस रस्ते जन्तरे तु मरने हापों कोसार पिलाए । पर सदो नहीं
नही तीन भरी टणी बोतलें पिलाई । मैं मिसी मनाहा परती भया सी
परम करत। पहले~म सागी नहीं हो अपनी मामीनी
तरह
समाई मनमानी। सोती यर सो येह मरा माया भाभी।
पीबगस म बटने मोटोर मिल गई। मत्या गिनगन पर सब दिखाते
2-मिया गेट । हवाईगाड़ी का महा ।
दस सहरीमोगर यस
भी पपा है मामी! मए पो मटर सगते है । सभी भत्या मरे ऊपर
पिर पाने पोरयभीम मायाकार!
मालती रे मन भाया रि यह यह भी पूपरिपाया मिटियापरतो
पुमा नादी देश मिया होगा पिर सारे नि क्या पल रह । भीमरे
रिनारे घर पर भी बहोगम। भमा म गया।
तभी रातिन मा सामा।
मामती मे मनगरिया कि पटोर सोमरहो पा एमरे
मुहमारा गिर गया । रिमी ग वगने कोई बात नीमोर
सने को तरह निजाम मेन
पल मीता मा पा पादु परमा मी! निरमों
पर
मिमी पर पीएदी। ममो मेरो टौर है।
पाणीपार तो पिरोना गाभागा!
गरम पमरे में मात्र गुहमा पनि

४८/ अन्तत मे छट्टी का बहाना बना लिया हो। मिन्नी जितेन के जूते के तश्मे बापती है। पौर उसके हाथ को अपने हाथ म थामकर पड़ी। मालती सिर से पांव तक कान धनी है। जितन के हाप में कल शाम पर भाते समय कागजों का एक पुलन्दा था । हो न हो गिलहरी के लिए कोई चीज़ लाया हो। पल दिन से वह परेशान है । बातें करते फरत काटने को भागता है। दोनों बने पता नहीं क्या-चपा बातें कर रहे हैं । लाते हैं। भगरते हैं। भी फ्भी हस भो मते हैं। वह भाज फिर 'गिलहरी गिलहरी' चिढ़ा रहा है । नागन' कहता हुमा उसकी पोटो खीच रहा है। उसके बालों में फूल खोंसता मुई अगरेजी में भी कुछ बह रहा है । पौर समभा रहा है कि उस प्रय सलीके से कपड़े पहनने पाहिए। सलीके से बोलना चाहिए । सलीके से उठना-वटना चाहिए । क्योरि प्रव वह यच्ची नहीं है। गांवों में तो उसकी उमर की लडरियो के दो-दो बच्च हो जाते हैं । भौर वह सिर हिला पर हामी भर रही है कि उसकी पनारो चुपा को छोटो सहकी कुलवती का प्याह विरन पुरा में हुमा है। समकी (मिन्नी मी) मांजी कहती हैं कि वह उमर म उसस कम है । लेग्नि इमी पिछले पैत म एम वच्चाहमा है। बाहर घर पर पर मरता हुपा स्यूटर खड़ा है। जितेन सीदिया पर खडा भावाज लगा रहा है-'सुन्ती नहीं, परि मो दुहेल! मिनी हडपड़ाती सड़ी है। उसी गरीने हत्ये वाली प्लास्टिक पी टोकरी नहीं मिल पा रही है। प्रद उसी मागपत्र वासी भाभी उसका थाद परसेगी। पणी बड़ी उपल-पुथल के पश्चात् यही पठिनाई से पोपसे पी रीती बोरी से दवी मिल जाती है । भार सगाते समय शायद मेहतरानी बी मेहरयानी हो।

स्वमार/ - मेरे 'भइया र साप भी हमारे पर मम्यो ह भाभी ! मालती के प्रधर सुस परते हैं- हाँ हो ! क्यों नहीं । मिनी के हाप में पमी टोरी पये की तरह पूमती जाती है- पारा महो हैं भाभी भिगर में पढ़ने में सीस नहीं रही तो मैं मागे पदूगी नहीं। तय साता-पीता भन्ठा पर दूर पर मेरा प्याह हो जाएगा। पाह में तो मानोगी म भाभी। मष्ट्र टिपू को भी लइयो है। मालती मया हे ! होले से इस देती है। मीचे से फिर मावा पाती है कि गाडीमा समय हो गया है। सपा पर रही है। मिन्नी उतापने में हाप पोरने की तरह अपने दोनों हापोंदी पंगुलियो रेपम दूर से ही मिला दती है- मटा भाभी । सीरिया उतर पर पल भर बाद पुन हाफती मोर पाती है- मुई पादही नही रही भाभी यह जान से मार म परीज में लिपटीमोई पीर निपामती है यह मइया ना पोट लिए गा रही। माग से मांग पर-हो । यहाँ परनी मरवा निम्ती को सिमाऊगी । मरी धनीरा वाली भाभी को भी। बुन मर में हमारे दूर के रिफरारे मरे जममर माया भी ऐन मन गिन नश्या पमे ही हमारे पर रोट पाने-बाने । मरेपो पर दोनों हाप पररओ गे वाल है। पहले है , सरे मामा परे है या पाये ! पभी-कभी व मुभ पकाने पोर मा पुमाने को भी पहने है । तुम रहो ठो उनमो भी दिगमागी भाभी! एप सांग मह र मिन्नी देसी म पनी जानी है। पूरम पहन मिन्नी पटती है ।रिमितेन । राम सामने परपीपोरामिए मामतीमार पीट। गिरीक सीरों पारेरी गरही है। यूरोपागाती-गो से freने पहिए पूमर है। गली पानिपाती है। भाभी।

५२/प्रतत
.
भी मिली नहीं।
मन्छा 5 5 ! लक्षी वाऊ ने मजीय ढग की सूरत बनाई।
तराजू मे भर भर कर फिर माना तोलने लगे और सामने सड ग्राहक
के खुमे पले म फटाफट गेरने लगे। उहें फिर मरी उपस्थिति का मी
भान न रहा-म ये लल्सा वित्ता गुट ! धुली मूग को दास पाव
माटटा गनेशी-छाप अपने ताई नहीं। फोफ्टी का माल
नहीं बेचते-समझे ! मये रामदीन के छोपरे । बरता उठा,
घट्टा ।
मैं चला गया।
लाखी ताऊ के इस नौते बेटे घम्बन और हमारे दास भया की कमी
गहरी दोस्ती थी । वर्षों तक दे साप-साथ पढ़े बन और सन ५ । इसी
पारण हमारे मौर उनके घरा मे मी भाना-जाना था। परत है बम्बन
भया उगती तरुणाई म ही भगवान के प्यारे हो गए। तब स लक्खी
ताऊ दास भया को भोर भी प्रपिन पाहने लगे थे। दास भया पर भी
पर माने सक्क्षी ताऊ स मिले बगर नहीं जाते थे।
पर दास भया मना रहां से माने लगे! मघरी सारी गनी के
पुमावतार मोहों से गुजरता हुमा सोचता रहा-
घर की पिपर ही उहै हाती तो इन पिछले तीन पार सालों में
एक बार भी पर न पाते । पत्र भेजकरो ममी सर-सवरन सन |--
यन्य से हैं । पम्मा स्मो है । पायें देखती हैं या नहीं। बीमार हो
नहीं रहती ! सान से होता है या नहीं । हम जीत है या
मरते हैं । -मी भूल कर भी जानने की कोगिन पी गर्ने ।
और फिर मपन यह हाल | नौकरी के यह ! पल का भरोसा
महीं।-या होगा!
जो उचर-मा माया 1 पढ़ाने में भी मन सगा नहीं। रिमी तरह नि
पटा । ट्यूगन का एक घण्टा पूरा दिया। समापी तरह उपमा उदास
पर सौटा तो दीपा-पांझ घिर पाई है। परों म दीए जस पुरे है।
।

मभाष| ५३
पर पान पमरे में मभी ता भी पथरा है रोज की तरह । अम्मा टिन
की विदरी जलाए रसोई घर में साग छोंक रही हैं। पप्पू जूता की भाट
मुनते ही भपियारे में भागता हुमा मेरो पोर लपका। पांवों पर लिप
टमा हुमा घोला-परा!'
दास भैया का सबसे छोटा बेटा है-पप्पू । जो अभी सक भी
तुवाता-तुतला पर बासता है ।कारे बसे प्रवरा पहता है।
मुसान को भसफ्म पष्टा पर मैंने उस मांहों म उठाया और उसने
पूल से 8 उदाम मुपरे यो घूम लिया।
समी मम्मा योम स्टी-रिन्नू ! हाप में भमकतो लिवरी लिए
बाहर मी पोर भारने लगा, मुध बुबुदाती, बडबडाती हुई। अम्मा को
सुनाई पौर लियाई बम देवा है। दास भया के बारे म सोपले-सापते
पभी-भी उन्ह न जाने क्या हो जाता है। यों ही मसारण सपावर
बाम पाहती है-चिनू !
ध्यान दिया नही मैंने । पपू को गोली म सिए एन पी मोतियों भी
पोर बनने सगा। तभी पणू ने अपनी म ही बाहें मेरे गले म पोर से
सपेसी--प्रसार
देर ता टहलता रहा। सभी तारामी मोर भी दूर पाई तक
५१ अपरें में पिरे पुसिष्टम् , पैरोंपी और तारता रहा।
पाराम पाला मगे! पपू ने वामगदी।
पण
पापा हम माना देता है । माव मो मोवे नहीं ।'
।
शिसोदे पराा मोने पे सात सूप पाती है।
दो राज ठ गाता
"माउ Rat पारा'
R1 रन देना। हर सामता मा पर हो गया।
परम रहगरा।
-

५४/अन्तत'
क्षण भर बाद फिर बोल उठा-मका, हमाली पृठो बिस्ती का
मुख काला है।
मैंने सहमति प्रकट की। सिर हिलाया-हां, है।
वह जूय वोसती है न प्रक्का ।
'दिदी बहती है जो जूष बोलता है उछका मुख काला होता
है। मैं जूप नहीं बोलता न भक्का ।
हा तुम बहुत सच्चे हो। मैंने उसके मसे बालों को सहलाया।
पृछी दूर पीती है पना।
हो यहुत बुरी है पूसी । दूध पीती है न ।
में भी दूर पियूगा प्रका!
हाँ तुम भी पियोग ।
इत्ता-इत्ता पियूगा ! छव पियूगा ! एव। उसने अपनी दाना बौनी
महिं फ्ला दी।
वहार में मुहर पर मा धटा । प्रभी तर भी निगाहें
रुप ऊचे दानवरार युकलिप्टम् के पेड़ो पर टिपी पी। जाम मोर
पन पौरपात हो भाए थे।
पपू गोरी से उतर र पा पर खेलने लगा। कोने में कुछ
कोयले
विसर पड़ । उही से हाथ पास करन सगा। पोड़ी देर मा गोदी
पर मा लपरा। दोनों राली याहे जोर से गल म लपेट मर मुहको
भोर तापने मगा- ममा!
बाहों पीप गमे पर छा गई। मौज का पालर कासिप से
पुत पाया । रूमाल से यों ही पोंछपाछपर फिर टहलने लगा। फिर
मुम्रपरमठ गया।
मीन से तभी सासने पा-सा स्वर मुनाई दिया। मुक पर भाका
तो साएछ दीसा नहीं। मरे पमर म मय घुघसी-सी टिबरी भनक
ही थी। मटमला प्रकाय था-धीमा। पृहास से पिरा जसा। ऐसे

प्रमर मम्मा रोग हो हमर में दिया बात देती है। फिर नई बात नया! में निश्चित करा रहा। पधिमार म वठा-वठा न जाने क्या-क्या होता ग्य। सभी पिर पसिनोमी पावाज माई। पण मी इस यार परसापार देखने लगा। भसा पाज घस माईपाया। उत्सुकता में पूछा। पप्पू पास होनभाया १ "न्तिम मैंने भोर मधिल निमामा से दुरापा। समन पाना मना गा सिर हिताया कि यह नहीं जानता तरी दोपहो गई। चिो गरने शिमोर पस। उमप पाम बो-गन्दी गोदिया माधन सा पम्मा ने हमापा भीमर कोन माया है। पर मामा हाँगे । उनोन ही पानेोगिा पापौर और होगा। Er७ मा मरिवार परामर होरे ममा। देश- रोकार fr, एमा पर पाप पm गरदन भराए कोई है। पासो म पाग है। गिर पा पुमो धनुरी पोर उठ रहा मामा जीता गिपर पौत मी } রায় ময়া মা সহ पो-गयाही गामा हनिम पाणे को पार हा वो देखा- राम भार भागे मरे होगे पर सिगरेट प्रसौ PR बारिरिसरमा भी भान नहीं है। देगा एगमारीऔर- ५६/ मन्तत माखें गहरे में पसी हैं । दुहरा मोटा चश्मा नीचे की भोर मुका है। गोरा दूप-सा घुला रग उह कर स्याह पढ़ गया है। दाढ़ी दिनो से मनी नही । रूखे बाल सफे हो गए है-पास की तरह । पपरी सगे मोठ भिचे हैं। पतर्फे मुदो हैं । सिगरेट अपने प्राप मुलग रही है। धुए की हल्की-सी लकीर ऊपर की भोर उठ रही है हवा म भापती। पाहार भी पास भमा को जगा न पाया। दबे पांव हाले मे कमरे से बाहर निकल पम । दरवाज फिर ठक दिए। रह पाते। . पास भया कभी कितने ठाट वाट से रहते थे! मक्खनी सिल्क की समीर नीली मादाई की पष्ट चमचमाते जूते मुह पर फैप्सटन दवाए जिपर निक्स पढ़त लोग देखते पही दास भया मात्र एसे मिचे मिचे बैठ है बुझे हए । शरीर निघुड़ा हुमा । पेहरा- दयनीय मातर' । पर गए बीते भले कुपैसे-सिपुरे हुए। क्या ये वही दास भया है!--हडिडमों में षि मात्रा मन साख मनाए, मानता नपा। मम्मा तुमने यतलापा भी नही दास भया भाए है ! ये तो सुना, सुबह ही मा गए पे मेरे जाने में थोड़ी ही देर बाद ! शिकायत में स्वर मे मम्मा से जब पूछा तो वे कुछ भी कह न पाइ। भम्मा की भासें माज अधिक साल है। अधिक भीगी। यह ठीक है कि रसाई में घुमा भषिक है । अम्मा को दिखलाई सम देता है। माखों में पानी भरता रहता है लेकिन ! मम्मा की मोर देख न सका। लौट पर बरामदे में टहलता रहा। कमरे से तमो फिर सासने दी मावाज माई। पणू को गोदी में पामे उपर बह निकला। दास भया जग गए थे। पण भर दोनों एक-दूमरे को देशत रहे। कोई पुनह पाया। "कब प्राए मया? मनापास मुह से निकल पड़ा।

प्रभाव | ५७
1" उनके मुरमाए
दास भैया अस नाद स अगे। उपरकर ऐसे देगने सगे मानो स्पष्ट
मुछ दीपना न हो।-कौन मु पो ६ ल
मोठ फरने।
'मुबह की गारी से पाए श्या ?'
'चिट्ठी भी नहीं भैमी ! गरिए पा राह देखतेखते पक गए
।
"मामा पीपा जवाबी पत्र मिला?
'मम्मा को घर बुगार पपिन रहता है। दमा भी बन गमा
पपू मोडियो पर पिमत पापा । नाई की ही टूट गई। छोटे
मामा जी ने अपने परम शायर लाज परवाया ! यहाँ तो सरकारी
पातान में सार पानी हर नहीं। प्राइवट के लिए पसे
दाम भया योस दुछ भी न पाए ! ऐपन पुप देखन रहे।
मिरा मनमान रहा।
पपू दानों पाहें मम पर सपेट मामने बैठ मजनवीनी मोर निकासा
से पा रहा था। मौना पानी सम्बी पोती रापसा ta स प्यार
दरबार महारे पहरी दी। उमपी मापी कुछ पी-दमाई पोसिया है,
रिपर यह तमाम पर सती है।
'पापमानता नहीं पाता! तू मे नमस्त कहा मैंने मौन
मारिया शारासिनगिमा टटोलने के लिए।
भारतमा पासा। एक बार उसने मेरी मोर देसा। फिर
निगाहे मीलीकर
हमरे में पिर सन्नाटा हा, देर तर । भैपाकी पनियों
और पो पापी मे पति मगरे तर राग हो। मन्त्री
7
-

५८/ अन्तत राख की सफे- सकौर अभी तक भी गिरी न थी। पप्पू कमी मेरी मोर देखता भी सामने की भोर । नीना अगुली में रासी की तरह बट पर धोती का पल्ला लपेट रही थी। पांव के प्रगूठे से बिना बात मिट्टी पा फा खुरच रही पौ। 'नोना तू कहाँ पनी गई थी ? वह घुटनमरा सन्नाटा सहा नहीं जा रहा पा । प्रत मैंने वही साक्त लगा कर कहा रखे कण्ठ सूखे स्वर म 'पापा माए हैं । सांझ के समय तो घर पर रहना चाहिए। देखो न, लिया भी दर से जला । शायद अम्मा ने जलाया होगा। नहीं तो अभी तक भी धरा रहता। प्रत्युत्तर म नीना से कुछ भी कहा नहीं गया। थोड़ी दर पश्चात् मम्मा न चौके से भावाज सगाई तो उठार पाला गया। देग तो विनू पो भूख लगी होगी ! सुवह भी कुछ साया नहीं। रोटिया अभी बन रहा है। तू पाल में सा लीजो हा मीना पाली र माई तो एक बार दास भया ने उसे पूरा दवा- सिर से पाव तर । योले मुछ नहीं। यों ही रोटी तोड कर निवाले निरलने लग। बाच-बीच म गल से नीच उतारने + लिए पानी का सहारा सना भी न भूलते। ध्यान उनका रोटियारी पोर नहीं माने दी पार नहीं न जाने कही और था। दोमान गटिया यो मुश्किल से तोडी होगी । साया प्रनपाया पर, रूमाल गएप पोधरपटगा और सिगरट के बम सोचने गे। प्रपती माया म तपा मोर उड़ते हुए घुए की मारी-मोरी पारी पानी लगोगें की पोर देखने लग । म सान वटा सो मम्मा प्रभी सर भी रहे जा रही थीं-मिनू ने मुयह भी नहा सापा और शाम भी। साना नहीं पाएगा तो तदुपरसी मनेगीग1 तभी सो गूस पर बांटा रह गया है। रंग ही मासा पा गया है। अब पापा तो पहनाना ता नहीं। सप चिनूमो क्या हो

प्रमाव / ५६
-
गया है
इसने ना यार समया पर भाए । लेकिन घर म कुछ भी परि
बतन बही भनाता नहा । यही रोज पी उनासी । घड़ी रोज मा मूना
पन । मौना वमो ही चुप । पप्पू वसा ही चुप । पम्मा प्रव बिलकुल
भी धोरती नहीं।
लगता है इन तीन चार सामों म दाम भैया बूढ़े हो गा। पहरे पर
भूरियां पिर पार है। पासा म सफेी। मर झसी-मी । शरीर सूखा
सा । गाते समय नै दया हाथ की उमरी मोरी नमों के तार
साफ ममर रहे थे। हड्डियां साफ दीय रही थी। पपर भी
ऐसे ही गए-गुमरे। रिस्तरा तर साथ नहीं । सघ दास भया क्या
मिट्टी से पुती, पुए गे पीती परी दीवारों पी मोर पता रहा।
पापू गोरीप ही बा-बटा सो गया है । नीना बाहर बठी पुर सिल रही
है। पम्मा गत का यत्तन मांग रहा है सांगतो हुई। दाप भया
गूग-ग यह है । मैं बाह।
गला माप महए दाम मैया रेमि हर पिपित गरे-
पपू समुस जाता है
"
म उगो पाटामा म पाते हो?
तुम प्रिय महान ता पाग ना रिसा रागा न
भने मिाि- नहीं।
सौगार मी हो पौरपारिश गरी उगाहीबातों में दार दाग नैया
परो।
गुग्ह उर - भवानी भरपाई नाप fram.
पापपरा गो गिरे पापान नर पर गते
VIce र रा पर नी गए। पिर मोर र मार मही।

६०/ अन्ततः घुप अधियारे में सोने की तरह सिगरेट की माग कभी चमकती, कमी मदम पड़ जाती। पहले अम्मा रोज कहती पों-चिन्नू एक बार भी घर पाए तो उसके बच्चे उसे सौंप कर गगा नहा लूं। ममा बुढ़ापे का भरोसा क्या! रिसी घडी प्रांखें मुद गई सो इन सबका क्या होगा! लगिन उसे तो कुछ फिकर हो नहीं रती मर भी फिकर होती तो एक वार पर न माता ! दो घार से ही ममी बच्चा के लिए नही भेजता । परदेशा कौन नहीं जाता पर यो पलेजे पर पत्पर बांध कर भला पौन बैठता होगा। एसे-पेड़े जसे बच्चे ! वह है कि न जाने क्या विराग ते पठा है। किसी दिन जोग न ले ले ! अम्मा फिर मेरी मोर देवती-- एक तू है |-गुमसुम पा रहता है बन मोसरह । चिट्ठी भी नही गेरता | तू घिरठी देता सो क्या वह सवाय भी नहीं सोराता! चिन्नू को मैं जाने है। मा निठोर सो कभी न था। भला अपनी बोस की सन्तान के लिए । बहत-कहते मम्मा पीमा निराधार भूय पर पटक भाती। पिर पर पो दिनों से मम्मा रट लगाए पी- विन्न का पत्ता तू जाने है सुगौल ! मुझे पहुंचा दे । एकाघ महीना यहीं पर जाएगा। सतो मी नाती रहती थी कि उपर जमनाजी पास हैं। कभी नहा मूंगी-अपने दिन के परसाद । मौन जाने यही मर पही तो जमनाजी में खो वहा ही देगा ! पर एसे धन्न भाग कह ! अम्मा रे मरिसप्त में नि रात मुबह पाम पाठोपहर दास भैया देरे में ही विचार उमात रहो । अम्मा की कपणता पारण वस दास भपा है। पितनी बार सममाया-चुमाया । मने । मामा जी ने। मेक्नि फिर-विन्नू गाने के लिए पौके पर बना तो हर रोज प्रम्मा माजी परोमती रोपीयेपनी दानती पुयुगाती रहती-- मैं मर जाऊगी तो मेरे चिन्नू चिन्न ।

प्रभाव | ६९
.
करता
• बम्बों का रया होगा रे सुशीस ! मम्मा फिर मेरी गम्भीर प्राकृति
पा माव हार जाती। पर हो जाती। पर दूसरे ही क्षण कह उठती-
चिन्नू पाने का क्या करता होगा। पसे ही रित्ता सापरवाह है । लोग
पहते हैं गांव-गांव घर पर घूमने फिरने भो नौररी है। कौन जाने
पैसा मुलर है। पोन उमरी रोटियां माता होगा! कौन देस रेस
दमा ही भूगा पा रहता होगा।
मोर पिर पायें पोंछनी मनमाने दुहरा हासती- क्या पता नौकरी
है भी या नहीं। रही या हो तो पिरा नहीं परता वावरा ।
पाए तो पूलू। मरिन !
दाम भया को भाए प्रब इतन रोज हो गए। पर मम्मा ने एक बार
भी पूछा नही। एप बार भी पहा नहीं। कितनी बार दास भैया के
कमरे में जाती है पर घर मोर पाती है। मांग पूरे फिर एकान्त में
मरने पार पहाती रहती हैं। मारण मरने से वापरती रहती है।
हमेगा मी तरह गुरह होती है। दिन उतता है । रात पिरती है
गोप-गाय पर सम भया जमे पाए वरो नहीं पाए। कोई बदलाव
पही नहीं। वही उगी। वीरानी।
पाट नापी परीक्षाएं पय समीर है। टयूशनों में भी पर पपिक
पमय देना परता है। गुवह निएर गाता हूं ठो मूनापन रहता है पर
पर। और रामोशीमगान पो मी उगमी!
दाम भैया लिनों निोदी दिया में पाए ! पर तोरपा पर्मा
हो गया 1-4 सोमा पोरता एप दिन पर मोर पा पा । मनर पहपा
होणपि मागापा मारा। पापों पर चोर मे सिपर परा-
मने उगने में गया ही पाहिदह फिर पहा--ना
उगागभीगा-गा पा। गूरल-नी-माई भरी।
रमें सारे! टमरे गिरे बालों को नियों म गवारते
RTणपरमोना नहीं पे में मुह जिजाए पापा।

६२/प्रततः क्या हमा । मैंने माश्चय से पूछा। इस बार यह बोलने के बदले मोर जोर से फ्वक पड़ा। क्या हुमा नीना । पप्पू को किसने मारा!-सूने । नीना वेसन से सने हाय लिए नगे सिर सोही रसोईपर से बाहर निक्ल भाई। माग हमने कुछ मही कहा । क्षीण-स्वर में वह मोली-- सुबह सिगरेट के विखरे टको पटोर रहा था। फिर घूल्हे से माग जलाकर कोने में छिपा पी रहा था। पापा ने धमकाया तो रोने लगा। सुबह से ममी तक इसने खाया नहीं । केवल पक्का मक्का कह पर रोता है । पापा ने कितना मनाया। पसे लिए। लेकिन इसने छु तक नहीं। प्रच्छा, तो यह बात है। हमारे पप्पू बेटा को हमारी गरहाजरी में तुम सब लोग पीग करते हो न ! अब किसी ने हाथ उठाया तो बुरी घात होगी। नीना ला भया के लिए रोटी ! कहता हुमा मैं छत पर चला गया। पप्पू अभी सक भी सिसक रहा पा गोनी में बैठा। मैं रोटी खिला रहा था तो वह एकाएक उचर बठा- मका, उछने माला उछने मक्का ! पप्पू मरे मुह की मोर गुस्से से तस्या हमा बोला। मिसन मारा राजा घटा को। उछने ! उसने मीच कमरे की मार इशारा पिया, उछने! पाप बहुत युरे है न! हमारे राजा बेटा को इस तरह मारा करते . पापा बहुत युले हैं-~मसायह फिर मिसाण्डा हम सोती नहा देंगे। दू नहीं देंगे। व महत पुल है ! बहुत । जार से वह रो पा। पा मुश्किल स मनाग । रोग सिसाकर फिर निकल पा पाहर । एष टयूगन पमी और पूरा भरमा पा। दाग भैया ममी तर मी मात्र सौट न थे। मुना पा सुबह निकल

प्रभाव ६२
गए पे, विना खाए हो । अम्मा मभी तन मुबह की रोगी सबै वैठी थीं।
लोग तो नाफा गत हो गई थी। अम्मा यतन मान चुकी थी।
नीना याहर गार पर पती सवती, रिवाया म माथा टिभाए दुला पही
भी। दाम भपा पमरे से वोलन मी-सी मावाज मा रही थी। शिवरी
घुमा उगल रही थी।
'तू हमारे साप पसेगा?
'तुझे मय नहीं मारेंगे~हो।'
.
-
मीना के साय र स्मूल पाता है?'
नीना ग भगावा दो नहीं"
तुक प मिलता है।'
ना ।
पानी ममी भी याद नही प्राणी कमी ?
.
'मा नहीं पाती
बमोबीनी
रिमी राग पागमान पिरा है। गुरमई या मशिर पनना
रिमा मगर मापार ठोभमा ही है। मबह गालि रही
परी मागीमा हो रही है। पाचानाओ परी प्राराम हो
नईहर में पानीमा मगर रामगंगा पा!
TRITI पर सो समारोपात रहा कभी "मुमी

१४/प्रसत
सुसी
! कहती मम्मा कमरे में बली भाइ ।
चिन्न माग जाने को कहता है। अम्मा की आवाज भर्रापी यो।
क्या मात्र ही घले जाने को कहते हैं ? तनिक विस्मय से मैंने
पूछा।
तो शाम को बस से घने जाएगे ! जल्दी क्या है ! तब तक मैं
भी लौट माऊगा।
'यही तो कह रही हूं। मानता नहीं। भाहत स्वर मे अम्मा वोलीं,
'वल मनला देतातो राम्ते के लिए पबना बना देती। सभी के लिए कुछ
खाना तयार कर देती। लेकिन वह तो जिद पर है। भूखा ही चले जाने
को पहे है ! अम्मा का स्वर पादया। मासों में प्रजव-सी येवसी ।
मजब-सा सूनापन । जो मय पर भारी हो पाया था।
तरमे वापर दास भपा के कमरे की पोर बढ़ा। लेकिन फमरा
शाली था। फिर छप्त पर देखा । दास भया पोती पहने मगे बदन
पर्सि मीपे मुरेर पर पठ दातून पर रहे हैं। सामने पानी की बाल्टी
है। सोटा तौलिया है । लेकिन उहें सुध नहीं ।
"दास भया ।
दास भया ने दातून पे छिल पूकते हुए मा खोली। उनका
घेहरा पा सघ ही बहस भारी था।
'शाम या पल सुबह पी बस से जाकर नहीं हो सरता ! मम्मा
कुछ पबना बना देंगी । भूखे जाना भी ठीक नहीं। पाम तक मैं भी मौव
पाऊंगा । वसेरल सो मेरी भी छुट्टी है।
दास भया मेरे महबी पोर वारते रहे। पछा! भपा-तुला
सशिप्त-मा उत्तर देके घुप हो गए।
दूसरे नि मुबह यो हो सिसवट-पो पो स टके दास भया यार
सड़े हो गए। मम्मा मे पौ फटने से पहले ही नगर रसोई का नाम
पृरूपरया। पप्पू भी सटर-पटर मुन र माज पोर दिनों से पस्दी

प्रभाव | ११ पाग गया था। नगा ही चौके में घुसकर गुमसुम बैठा था। कुर हुकुर बही-बड़ी भोपों से सब देख रहा था। नीना मम्मा का हाप वटा रही थी। अहो सक बन सका मम्मा ने माज वे मारी चीजें बनाइ जो दास भैया को पसन्द थी। रायता पा। सावुत उरद की दाल थी। कुछ तसे पापर थे। यडिया थी-जिनमें दास भैया के मारण नमक ज्यादा छोड़ा गया था। पर दास भया ने दो-तीन टपडे मुश्किल से तोठे होंगे। यसे ही साने पा स्वांग पर हाथ धोया और बाहर पा गए। कमरे में पडे-सरे छत वी पोर न जाने क्या ताकते रहे। दास भया तयार सो हो गए, पर जाने का सरचा है भी या नहीं। में बाहर पड़ा सोचता रहा। भसमजस में हवा कुछ भी निर्णय न कर पाया। "दास भैया पसे हैं ?' बडी मुश्किल से मैंने पूछ ही लिया। सहया मुटकर मेरी मोर देखा उहाँने, मया तुझे पाहिए ?" यो ही मपर सुत-से पाए। पीले पीके दांत पोड़-रो धमके। फिर मिच गए। में हस पड़ा। नहीं तो! मेरा मससव सरपे से है। मापके पाने - दे बोस न पाए । सो देखते रहे। सोवत रहे। फिर मेरी मोर देखने हए सिसियानी मरी मुस्कान होंगों पर साने पी घेष्टा करते हुए योले- तेर पास हैं दुध परो! पायद पम पटेंगे।' दारा भैया मड़ी मुरिस से बह पाए-इतना मात्र ! पहा प्रबोध बालक की तरह पा-निविषार पात सहमा हुमा । ट्यूशन से मिस पीस करए बचे थे। जो रागन वाले के लिए रण छोड़े थे। वे ही दो नोट मैंने सन्दूप से निकाल पर मागे बढ़ा दिए। पर खरपेरे लिए कम परेंगे दो। नहीं, नहीं ! सरपा घस जाता है। परी मौर हैं।' टामते ए मने पहा । मोर रहता भी क्या!

६४/भन्तत
सुसी ! कहती अम्मा कमरे में चली पाइ ।
विन्न पाज पाने को कहता है। मम्मा की प्रावाज भर्रायी थी।
क्या पाम ही चले जाने को कहते हैं ? सनिक विस्मय से मैंने
पूछा।
-
'तो शाम की बस से चले आएगेपल्दी मया है। धन तक
भी लौट भाऊगा।
'यही तो कह रही है। मानसा नहीं। भाहत स्वर में मम्मा बोली,
'कस पतला देता सो रास्ते के लिए घना बना देती । ममी के लिए कुछ
साना वैयार कर दती। लेकिन वह तो जिद पर है। भूखा ही पसे जाने
को पहे है । अम्मा का स्वर भाद्र था। पार्यो म मजब-सी बेबसी !
मजर-या मूनापन । जो मन और मारो हो मामा था ।
समे बाधकर दास भपा के पमरे की पोर बढ़ा। सेपिन नमरा
खाली था। फिर छत पर देखा। पास भया पोती पहने नगे बदन
पास मीचे मुटेर पर बैठ दातून पर रहे हैं। सामने पानी की माल्टी
है। सोटा तौलिया है। लेकिन उन्हें सुध नहीं।
दास भैया
पास भया ने दातून के छिसरे पूकते हुए मासे सोती। उनका
घेहा माज सच ही बहुत भारी था।
'पाम या बल सुरहमी बस से लाकर नही हो सकता !
कुछ पचना बना देंगी । भूखे जाना भी ठीक नहीं। शाम तक मैं भी सौट
पाऊगा । वसे कल ठो मेरी भी छुट्टी है।
दाम भेग मेरे
की मोर सारते रहे। मच्छा!' मपा-सुसा
सगिप्त-सा उत्तर देके प हो गए।
दूसरे नि मुबह से ही सिनवट-परे प स टरे दास भया तैयार
सोहो गए। मम्मा ने पौ फटने से पहले ही पग पर रसोई का दाम
कर लिया। पपू भी सार-पटर सुन र मान मोर निों से गस्दी

अमाव | ६१ बाग गया था। नगा ही चौके में घुसकर गुमसुम षठा था। कुर टुकुर वही-चढी भांखों से सब देख रहा था। नीना मम्मा का हाथ वटा रही थी। जहां तक बन सपा मम्मा ने माज वे सारी चीजें बनाइ जो दास भया को पसन थी। रायता था। साबुत उरद की दाल थी। कुछ तले पापड़ थे। वडिया पी-जिनमें दास भया के कारण नमक ज्यादा छोड़ा गया था। पर दास भया ने दो-तीन टुकड़े मुश्किल से तोडे होगे। से ही साने का स्वांग कर हाथ धोया मौर बाहर मा गए । कमरे में खरे-खड़े छत की पोर न जाने क्या ताक्ते रहे। दास भैया तयार तो हो गए, पर जाने का वरचा है भी या नहीं। में बाहर सहा सोक्ता रहा । प्रसमजस म हवा कुछ भी निणय न कर पाया। "दास भया पसे है ? बडी मुश्किल से मैंने पूछ ही लिया। सहसा मुठकर मेरी भोर दखा उहाने, मया तुझे चाहिए ?" यों ही प्रपर खुल-स माए। पीले पीके दांत योर से चमके। फिर मिच गए। मैं हस पडा। मेरा मतलव खरच से है। मापके जाने के बोल न पाए। पड़े देखते रह । सोमते रहे। फिर मेरी मोर देखते हुए सिसिपानी मरी मुस्मान होंग पर पाने पी पेयपरते हुए मोत- तेर पास हैं कुछ पस! शायर बम पड़ेंगे। पाग मैया परी मुस्सि से रह पाए-इतना मात्र ! चहरा प्रयोप बामरी तरह पा-निर्विरार पात सहमा हमा। ट्यूान से मिल बीस लाए यच थे। जो राशन पास के लिए छोरेपे। वे ही दो नोट मैने सदूप मनिराम पर भाग मागि। पर खरच के लिए पम परेंगे तो!' 'नहीं नहीं ! सरपा पम पाता है। पंग पो ran मने पहा । पोर रहता भी पा! नहीं तो। घे परिणति वितस्ता ने खाली के मेल-यूटे पासे रगीन भारी पर्दे रिंग पर एक मोर समेटे तो देवा-दूर गेट के पास कोई छापा-सी सही है । व्यस्तता के कारण उधर भधिक ध्यान न दे पायो। यों ही देखा-पनवा परके डाइग-सम की मोर घमी गयी । उसका मन माज न जाने क्या इतना भारी उदास है ।ही भी जी सगाए लगवा नहीं। नातकी प्लेटें मगो पी। भदईरघे पर गमछा सटकाए बडे पदय से ठहर ठहरकर गिलासों में पल भर रहा था। एक भी वूद घोसेसे टेविस-वलाप पर मिसरी नहीं मिउसे बही शालीनता में साप गमछे में समेट लेता। चिरन्तन ने समाचार पत्र परे रसने हुए एर हलकी-सी प्रगड़ाई सी। इपर-उधर देखा तो निगाहें वितस्ता पर ठहर गयो । सामन की मुर्मी पर यह गूंगी-दुसहिन की तरह होंठ सिपे पुप बैठी है। दोनों पुनिया मेज पर पिाए हतियों में ठोड़ी पासे परि मूटे पता नहीं क्या सोप रही है। इस परह से पर भी वह पिसी भाव म लीन रहती है तो परिणति /६९ उसकी यह भगिमा विरतन को बहुत अधिक भाती है । विवादा घर-बाहर का साग काम-काज जानती है । कला के प्रति उसकी ममिमि है। यह बहुत मोठा गाता है ! सितार बहुत अच्छा बजा सेतो है । अपने भयमुदे अपरे कमरे मे जर कमी साझ के समय वह, बमम होकर तारौं मोघेती है तो प्रशान्त बातावरण म एक महर-सी पोर जाती है। एक अजीब सी वेदना हमण में व्याप जाती है। पों सक पता नहीं कब तक उसकी उगमरमर-सी सफेो तराशी हुई वारीन सम्बी माबुर उगलिया दारों को सहलाती रहती हैं। पीरे धीरे हवा यम जाती है । उगलियों ठहर जाती हैं । सिधार के मनमनाते तार पकपाना छोडकर सांस साधे एक-से माते हैं। विस्तवा गरदन मना लेती है । माषा सितार पर गिरा देती है। सर उसकी माइति भाव-य हो जाती है। एकदम प्रतिमा की तरह शान्त । निन्तु दूसरे ही क्षण ज्याही गरदन पर उठाती हुई ओर से पतरें मौंपठी है कमी-कभी यूद मर सारा पानी मासों स उतरकर गालों पर उलक पड़ता है। सन मिनी विचित्र है वितस्ता घिरसन क्षण भर उसे देखता एपिहोले-से कुर्सी से उठकर उसके पीछे खड़ा हो गया। उसके सन्यो पर विसरी अगीली सटों को सहलाता हुमा, उनी भासों की गहराइयों में कुछ स्टोसने लगा। वितस्ता ने भी उसी भाव से गरदन ऊपर उठायी तो बिरतन ने सामने मिना भार अपने दोनों हाथों में भर सिया--- क्या सोच रही हो पितो? वितस्ता न केवल सिर हिनाया---'जी, कुछ भी नहीं।' कुछ तो।। ना "पुर । भूप।' पहला हुमा यह भोर कर गया और अपने पधन्ते होठ उसो रविंदम कपोलों पर रखने ही शसा यामि भी दरवाजे भी निगोरी मॉम-देन टनदुनाई। मामाकर,सम्हसकर दोनों गहरी मोर

७० भन्ततः
भारने सगे जसे कही चोरी न पका सी गयी हो।
भदई टिकोजी से ठका टी-पाट माता-साता ठहर गया। साहब को
कहीं उठकर देखने का प्रप्ट न हो मत स्वय मसा ही दरवाजे की भोर
मुठा।
'कहिए!
मिस्टर चिरतन हैं ?
माइए।
भदई ने पसे खाना पूरी भी। बसे हो मुह सटकाए कहा । वास्तव
म मदई को इस प्राकृति में सनिक भी नवीनता नहीं दीखती। अक्सर
वक्त-वक्त इसी तरह घण्टी यजती है । नाइनॉनी मा म लिपी पस
हाप म झलाती लिपिस्टिक-पुते मधरो से मुस्कराती कोई पिटिए
माती है और वघटक चिरन्तन मे कमरे में चली जाती है ।
चिरन्तन में विवाह के बाद आज बहुत दिना पापात् यह पहली बार
पापी है । मत भाति म पुछ प्रसमजस का घर पटा भाष है । पावा में
पनिश्चितता । घे सधै ढगस पात्मविपास के माय माग या नहीं
पा रहे हैं।
पाइए! पाइए ! चिरन्तन न भागे बदमारस्वागत किया- 'कम
इन ! पाप दोनों का परिचय करा दू । माप हैं वुमारी जुया पोर
भाप यानी कि पानी पि प्राद मौन
'समभी समभी!
पहकर सामने खड़ी कुमारी ने वितस्ता
मी मोर मुसराकर देसा । अभिवादन किया और यह तपाक म हाप
मिसाया।
रपित्त पर सोनों बटार घड़ी घेतकल्लुफ पाते परने सग। विसस्ता
कुछ बम बोलती अपने स्वभाव अनुसार पर पिरन्तन और जुग
साहित्य से सेपर मास तक हर टापिक पर देर सा निस्सपोप वापरते
रहे । वितस्ता को पड़ा प्राचय इमा मि कोई नारी किगी पर रप
पवनी स्पट बात पर सरदी है।

परिणति / ७१ किसी माम के बहाने उठार दिसस्ता दूसरे कमरे में चली गयी। भाई को गमतों पर पानी देने मार पश मो साधुन से धोने के बारे में कुछ हिदायतें देती रही। फिर रसोई घर म घुसकर सारा काम स्वय रेसने संगी। घुए के कारण उसकी मोसों में पानी भर पाया। पास से पस पोछती जब यह टाइग रूम मी मोर लौट रही थी कि उसकी भाखो के माणे बिजली-मी कौंधी। उसके चलते पोव एकाएक ठहर ग--एरदम घेतना गम हो गये। अशा चिरन्तन की बाहों में घिरी पो और यह उसको कासी विसरी अल्पो को हापा में समटे तीनो प्राणी-जो जहा पर थे वही पर मुन्न सहे रह गय । न चिरन्तन पुछ बोला न जुर्वेदा कुछ कहने का माहस जुटा पायो भौर म वितस्ता ने ही कुछ कहने की पाश्पपता अनुभव को । शाम को चिरन्तन का मन घर लौटने को न था। फिर भी यह लौट रहा पा । भनेक पापाए उठ रही थी। पिनस्ता से सामनार पाने भी हिम्मत न थी। मुबह के अपने व्यवहार से वह बेहद भुग्ध पा। उसे स्वर पर मुभलाहट हो रही थी कि वह एमा प्रभट प्यवहार क्या कर रहा। विवाह हुए पभी गिन ही कितन चीते हैं। फिर ऐसी हरकतें क्या शोभा देती है ! लनी पडी नौ है इतना मग जिम्मेदारी का भोरदा है धान है शोहरत है भागेनाम है । फिर यह वितस्ता क्या सोचती होगी। उसरे स्थान पर पाई और होती सो या माचती !! उमने जय घर की देहरी पर पाय घर तो चारों मोर रोज की तरह नाग था। वितुरता प्रपन ममोम रिता पदर के पास सहला रही थी । ६६ की एक हलकी सी लहर वायु म पुल घुमकर एक गीतरागी पाण-प रप रही थी। दरवार को सोपने को पाक पर सीमेंट के पापर पूता की ७२ / अन्ततः प्राइट से वितस्ता की सग टूटी। यह लपककर पागे वदी। हमेगा की तरह मुस्कराती सामने खड़ी हो गयी। बोली-बड़ी देर पर दी भाज! चिरन्तन चुप था । कुर्सी पर बसा ही पामि वितस्ता उसके पांवों के पास पर पर मठ गयो । जूते के तपम खोलने लगी। फिर निश्चित स्थान पर जूते रबार कुर्सी के सहारे उसके सामने खड़ी हो गमी। बोली- मधीमत तो ठीक है न ! प्रत्युत्तर म चिन्तन से कुछ भी रहा न गया । वितस्ता उसके ठण माये को अपनी गरम हथेलियो मे सहलाने भगी- इतनी रात बाहर रहते हो सभी तो मेहत खराव रहती है।मैं न जाने कब से खिसकी पर खही-सडी प्रतीक्षा पाती पक गयो । पिता उलटने सगी तो मन लगा नहीं। सितार भी कम तक बजातो पिरतन प्रपलर उसकी भोर पता रहा । म मासूम एप साप निसनी परछाइया पिसने भाव किसने विचार भरत से उभर-उमरकर धूप-छांव की सरह पाए पोर पोझल हो गये। ममी सक भी चिरन्तन को पुप देवार वितस्ता उसके पोर समीप शिष मायौ । उगमे पुपराले वासों को उन्स की तरह उगमियों में मपैरती पिरती रहा। पिर सामने खरी, उसकी टाई को गांठ खोसने सगौ- "कितनी बार से बोरवे हैं माप ! गएन में दर्द नहीं होता। - 'चलो उठो! सालो से पा-पग ठण्डा हो गया। विनी मेहनत से भाज सही सन्जी खरीदकर मायौ, खुद ही मनायी। परसब । वह चिरन्तनमा हाप पा रटाने मगी। पिरन्तनोइम सब की पल्पना हाम पीन वितरता पर पर ही बठी पी। न घर में भरा पान उसके पर पहुंचने ही वह रिफरी। म पसने रोत हुए ही यह कहा कि सुनिए, मुझे मेरे मैके पहुधा दीजिए।

परिणति / ७३ इश्क ही लगना या तो फिर म्याह क्यों किया? रिसी एक को जिन्दगी से यों खिलवाह परके भापको क्या मित्रा। पर वितस्ता चुप थी । उसको निर्विकार सुशा त सुनिश्चित प्राकृति की भोर यह न मालूम इस तरह से क्या देखता रहा । और फिर पालतू पशु की तरह चुपचाप उठा भौर पीछे-पीछे चल दिया। निवाल तोड-तोड कर, मयाघ शिशु की तरह वितस्ता उसे खिलाने लगी। तुमने खा लिया। जी खा लूगी। इतनी जल्ली क्या है। पहले पाप नीजिए न !" घिरतन का निगाह घड़ी की मोर मुडी तुम्हे खाकर सो जाना चाहिए या । साना भाई खिला देता या सुजानो । इतनी जल्दी नाम काज समाप्त करने घर चली गयी क्या? क्यों खिला देती जो कोई-होते हुए मरे । वितरप्ता कहर भी कह न पायो । रेवत बुबुदाकर धुप हो गई। चिरतन ने पोर के साथ-साय दोन्तान धार उमकी फ्लासवीन-सौ पतली नाजुक उगनिया भी काट डाली। मतिम ग्रास के साथ वह पारारस स मुस्कराता हुमा वितस्ता होंगों के पास मुह स गया को वितस्ता चौद कर पीये हर गयी। चिरन्सन रे मुह स दाराव की वदयू पा रही थी। क्या हमा 'जी भुछ नही । विवस्ना हम पड़ी। वह हसी उसके दिल को पीर पर पता नही क्सि गहराई से निकली यो। सोते समम पितस्ता उसके माथे यो सहलाती रही । चिरन्तन में मन मेम जाने कौन-सा उवार उमड़ रहा था। न जाने कौन सा झमावास उसे भमोर रहा था। शाप उपो मन्तःकरण मी मपराय भावना उसे मप रही पी। शायः यह होगम नहीं था-'तुम बहुत मोटी हो। हो म! वह युवुदामा- 'सेपिन चुदा तुमसे भौ ?

७४/अन्ततः वह गर थी। चिरतन मी पया जी वह भापको बहुत अच्छी लगती है ? हा। श्या पालियन है उसमें सासिपत! यह वह जोर से बड़े भद्दे ठग से हमा-कोई जवान हो । उम पर लड़की हो। उस पर खूबसूरत हो यह क्या रम है। सनिव एक पर निरतन घोसा-शायर अव यह बिलकुल हो मे नपा-सी इज रियला स्वीट। वह यह मोहा दग से मुस्कराती है हमती है बातें करती है चलती है । उसके विक्ने सुडौल गोरे शरीर में साप की में चली-मी वारीय नाइनॉन की फिसलती हुई माटी सूब फबती है । बदा स्टिव हग रो स्मोष करती है । वास होस भोर शरावी निगाहों से देखती हुई दाम्पेन के ! मोह दी इस रियली स्वीट ! उसने जोर से वितस्ता पो अपनी भोर खीचा जसे मापन विवस्ता नहीं जुबेलाही हा और फिर पास मूरे जोर से उसे घूमता हुमा पुमपुरााया-- स्वोट सोस्वीट । सोमीट! सरिन दूमगे मोर वितस्ता पा मन धौन्वार कर उठा । यह पसी हो यस पटी रही। विरतन जव थप पर सा गया तो वह दौल से भपने कमर म गयो पोर फिर सारी रात सितार उसकी यादमि लिपटा न जाने क्यों राता रहा - मुबह पिर ताचे पनापी तरह वितस्ता ताजी पी। पर प्यार से उमन चिरतन को जगाया। विरतरे पर ही मॉपी ा गरम प्पाला उसो हाँग गमगाती है वोली- दसिए पाप क्तिने लापरवाह हैं एक तो माफिम म राम बहुम रहता है गरे रात कोरस ागते रहते हैं । इसपोहत सराव की जाती है। दसो प्रापमा पास स्तिनी मात है--गूजी हुई। वितस्ता पास ही मेज पर रसा नीशा उसके पामने तर नापी। पर चिरन्तन पीर की भोर नहीं कदम उराती

परिणति / ७५
माकृति की मोर दखता हुमा हस पडा । वितस्ता की समझ में कुछ न
भामा । चिरन्तन ने शीशे का मुह वितस्ता की भोर कर दिया और कॉफी
का गरम पाला उसके हाथा स पाम लिया।
वितस्ता सचमुक चित्तस्था लगती न थी। उसका चेहरा बेहद सूजा
हमा था। मांस गुडहल के फूल की वरह सुस यी ।
लगता है रात भर जागता रही ?
'नहीं तो!
फिर.
फिर पया
या हो हसने का प्रयास करती स्तिस्ता ने कहा-
"मेरी पासे इपर बहुत कमजोर हो गयी हैं न तभी तो थोड से ही
धीत में सूज जाती हैं।
चिरन ने दो ही पूंट म प्याला रीता पर लिया। वितस्ता ने फिर
सोई रात न की। मेवल चुपये से रीता प्याला उठा कर चली गयो ।
महा-रूम म भामाशोगे सामने अपना प्रतिविम्ब तोरने लगी-
सयपुच उसकी उदास भो भर पहे की तरह सहमा एसा मापी ।
प्रपन को सम्हासती हुई यह गाधी पाप रूम गयी। रियार भीतर से
पदर खूब जी भर रोती रही।
पन्त म, हससीहार नहा पोर पर बसार ते की मेज
पर पायी ता दा चिरन्तन स प्रतीक्षा पर रहा है। पट्र में
मरते गिगरदरे हेर सारे टूट-वर सर रह है और ममी सर यह
भगातार घुमो उगा रहा है ।
उसे दमते ही विरतन का मूड बन गया- मात्र तो तुम एक
खूबसूरत लग रही हो। पूरी की पूरी सिगर उन ऐन्द्र म बो
पाती और फिर भटहरी चम्मच सरर स्वर रोगमय सिके रवा
पर मासन की मोटी मोटी परतें पलने लगा-'माज तो एपदम पत्ता
पाउन नजर पाती हो। बार-नस नालांना तीन ।
बालॉनी गाओ, इतना नाराम पामोर पहने हो और इतनी गहरी

७६ / मन्तत लिपिस्टिक फि जुवेना भी पानी भरने चली जाय । वितस्ता लाज से सिकुर फर चौयाई रह गयी। गैस जानती हो? यस जानदी तो नहीं । माप कहेगे तो सोख लूगी। चिन्तन फिर सिगरेट पसा चुका था। घुए के गान-गोल छल्ले एक पे बाद एक छत पी मोर उडान लगा । वितस्ता प्यासियो में दूध मल कर फिर चम्मच से पह हिलाने लगी। भाज ठण्ड कुछ पधिप थी। इसलिए उसका दान पपरपा रहा था। चिर तन के मुह से सिगरेट छोन पर वितस्ता न अपने रंगीन मघरों पर लगाया। एक का जोर म साचन हुए कहा वह एस ही पीती है! कहिए म भव तो पापको माछी लग रही । तभी सांसी तुम हुई । वह इतनी फोर से इतनी दर तर लगातार बासनी रहो कि उसकी मातो म पानी भर माया । विन्नु दूगरी भोर चिरतन ठहावे लगाता रहा। चिरतम माफ्मि जाने लगा तो माज पितम्ता सस छोहन गर सक गयी। बात सपप भपनी नाजुर उगतियां हवा म हिलाती हुई योनी- दसिए प्राज पाफ्मि स सीध पर पाइएगा। पनब जाना चाहग तो मैं भी साथ चलूगो। दूपुछ बनने लगी तो विनम्ना मी भावान उमी अनुपात स ऊची हो पायी जम पिर ठन को पुरसम सुनायी पडता हो माजमापसे कुछ बहुम जारी बातें करनी है। टोह बजे पहुंच जाना हो।' वह सपा पर पोर पाम पनी भायो । उसा मधो पर मुस्ती हुई मो-लिभर मोती बरी-बैठी वोर हो जाती है। यदि नि म ममी पापको पौन र ल तो पाप डिस्व काम होंगे। चुरा तो नहीं मानेंगे समको चिरतन प्रापिस रो उठ पर सीधा पर चला पाया। हिस्सा इस पिछाए पाप बन से ही द्वार पर पी पी । चिरन्तन से 1 - परिणति / ७७ देखते ही उसकी सदास मार्खे धमक उठीं । मह तप कर मागे बड़ी मोर उससे लिपट पड़ी। पास हो मदई फूला में पानी ६ रहा यह सब देख रहा था । मत उसी भोर दष्टि जाते ही वह राम स लाल हो लपक पर भीतर चली गयो । भदई भी अपने को पोमता पानी का फव्वारा यामे दूसर कोने में सहा हा गया। वितस्ता न एक वदत सुदर क्लारमा नया मलवम उसके सामने बहामा सालीवठ वठ क्या करती । मापर यक्स में कितने सुन्दर-सुन्दर फोटो यो ही भास पूड की तरह ठुसे थे । सोचा रह ही ठीन कर।' उह दमत हो घिरतन को कुछ कहत न बना । वह मौन भाव से, दानिए-नग से पने पसटता रहा । ये व चित्र ये जो उसकी पूर्व प्रमि पामो ने पमित-स्तह के साथ कमी समर्पित किये थे। कोई नारी ऐमा व्यवहार भी पर सस्ती है वह सोच नहीं सकता पा। पर यह पितस्ता नाम को लड़को पस्तुत क्या है-उसकी समझ मनभाता था। 'हे देख कर सुम्ह ईर्ष्या नहीं हुई ? ' ईया षयोको भला। या महा भाव से वितस्ता करने सगी- 'गो मापनी प्रिय है 4 सब मुझ भी प्रिय है। गिहें पापने अपने प्राणों सभी मपिन पाहा मरे लिए उनका मूल्य मेर प्रारणा से भी अधिक पयों न हो पियाह की बदी पर परमात्मा को मापी रसपर मैंने सोगप पाई है कि जिस ढग से पाप सुधी रह जो पापको भन्ठा सगे उसी को अच्छा मान पर भापरे परणा पर बठी, जीवन-पयन्त मापी सेवा करती रहगो । मरी मुगिया का सारा ससार पाप पर ति है- ऐपत माप पर!' वितस्ता की भावा भारी हो गयी। दूमर नि रविवार की छुट्टी थी। चिरन्तन सोन म ती पुसियां हाल धूप सेंपता हुमा मगरगैना ये पन्ने पलट रहा था। मोर पास ही विसस्ता उस लिए रोएँदार मुलायम ऊन का पूरी प्रास्त्रीना

७८/पन्तत
स्वटर बुन रही थी और बार-बार घडी की मोर देख रही थी।
माज भी मापनो माफिस जाना है ! सच कह रहे है !
हो, तो!
मैं सोच रही थी, माज पाप पसद की डिश बनाम्गी । भाम
धूप में वठे हम दोनों साथ-साथ भोजन करेंगे।"
चिरन्तन घसे ही पन्ने पलटता रहा ।
कभी-रभार एक दिन मुम भी तो दीजिए । देवत इसी दिन की
इन्तजारी म अपना सारा सप्ताह किस तरह से गुजारती ( मापको
क्या पता
चिरतन की भोर से उत्तर इस बार न माया तो समझोता परती
वितस्ता बोली- मष्टा तो शाम को जल्दी माइएगा हो।
शाम को! चिरन्तन ने गरदन उठा कर उपर देखा और ऐसे
पहा जस पहली ही बार मुन रहा हो- शाम को भी समय कहाँ
मिलेगा! जोनल कमटीनी मीटिंग पभोकभी तो रात ये माठ-नौ
बजे तक चलती रहती है। फिर ।
इस फिर का वितस्ता के पास कौन-सा समाधान हो सकता था।
पत घर पुप हो गयी और पिरतन भी समय पर गाडी सकर मापिस
पला गया।
वितस्ता का यह वेबसी से ला प्रलापन बहुत भमरने लगा। वह
परेसी ही अपने माप म जूभती मगहनी रही। कभी उममा मन रोने
को होता। मभी अपने वाला को नोभने मो। सकिन फिर एक पाशा
की गुनही सह-सो दौड़ती पौर वह प हो जाती । उगे इस पर ही
दृष्छ म मन्तोष न था विपना इन नि म चिरतन में कुछ सो
परिवतन प्रा ही गप है। धीर धीर एक दिन पूरा ही यदल गाय तो
मया मागय । जुवा बाण वार भी उसने नाम लिया न था पोर
नभीएवी यायें हो रही थी और न रमी सौरने म ही मारण
बत दिसम्य दिया था।

परिणति/७१
पर वह बैठी-बैठी क्या कर। हर तरह से खीझ कर अब वह पीठ
केवल विस्तर पर लेटकर छत पर टके रगीन लाल बल्ब की ओर
देख रही थी। भाज सितार बजाने को मन न था। न फूलो को
सजाने को भौर न पुस्तको को पढ़ने या घर के किमी मौर काम-काज
मै ही।
तभी कमरे के विवाह पटरे । वह चौंक कर उठे इससे पहले ही
विन्दा हथेली में भरी प्लेट थामे सही हो गई-- महिए थीमती वितस्ता
देवीजी एम० ए० भयशास्त्र प्राप निस पल्पना नगरी में विचरण
फर रही हैं' विन्दो ने सदा को सरह शरारत से मजीव-सा मुह
बनाया।
विन्दो उसकी बचपन की सहली है। यही पास ही सी सवायर में,
पीसी-मोठी की मालकिन है। मालिक देश विदेश म इम्पोर एक्सपोट
मा पपा कहते हैं पौर यह घर पर अकेली रहती है। सूब पमे और
खूब वाम-बच्चों वाली है। किसी किस्म का पष्ट नहीं। वचपन से ही
मुशमिजाज है । मिलनमार है। इसलिए जब भी समय मिलता है कोई
न कोई माम का महाना बनाकर स्वत हो चली माती है।
वितस्ता सहसा बिस्तर पर ही उठ वठी। सामने विखरे बालो को
परे हटाती हुई बोली- मरी बठो न ! यह मा ले भापी?
प्रचार तुम्हारे लिए।
क्यों?
भरी भोतो!' हाय नचावे हुए विना बिलकुल पास ही सटार
मठ गयी- हममे छिपाती हो रानी! अव ता प्रचार खान को मन
करने लगा होगा।
प्रचार सान मोरक्या?
'स्व । मम साहिबा य बनाने पानी बातें पिसी पोर करना)
हम सब जानते हैं। वह हस पड़ी।

८०/मतत
मरी यया जानती हो ? वाइगर मैं समझी नहीं।
सच बित्ती तू तो एकदम निरी निरी ही है री। उसके मुह
पर मीठ प्रचार की एक पांव ल जाती हुई बोली- सप तू कमी
इतनी सुर लगती है कि बस चूमने को जी चाहता है । सन्धी तू
पुरुष हाती तो मैं तुझ स ही शादी करती !
दोना खिलखिला पर हस पड़ी।
थोडा पार याहर से मगाया था। कुछ पल बाद सयत होकर
विन्दो न कहा- सोचा तुम्हारा शेयर तुम्ह दे माऊ। सुन जव जरूरत
पठे निस्मकोष बना। तुम्हार लिए तो मैं प्रचार का कारखाना तक
सुलया दूगो
दिन्दो मुस्कराती हुई उठ सही होती है-भरी सुन तो! देस,
माज मदई से मालूम हुमा पि साहब माफिस गये हैं। हम भी अकेले
है। यही साच र सिनेमा में दो टिक्ट मगा लिये। ये दसो। उसने
पपने म्लाउन म से मुड तुड़े दो टिकट निसले पोर सामने की पोर
बढ़ा लिये।
वितस्ता मसमनस में सोचती रही-'उनसे पूछ विना!
ज्यमा तो क्या गजब हो जाएगा हालिग । तुम्हार साहय सास
पाठ म प ले सौटने * नहीं और हम छह से पहले ही पर पर हाजिर!
पिर' ।' बांह पकार बिनो ने उम पसग पर से उठाया- जव
देखो तब पमग पर । परी पलग क्या इतनी माछी सगती कि !
म्याह सो समोर हाते हैं पर दुनिया का भी तो कुछ लिहाज कर!'
उम मह भीचार हाती देष विवस्ता भी अपनी हसी रोर न
पापी।
पारसव म वितस्तापापही भी गाने को मन न पा । सरिन यह
बोकी तरह ऐसी सिएर गयो नि
जाते रान पिकचर गुरू हो चुकी थी। हाल में प्रपियारा गया

परिणति / ८१ था । सामने के सफर पर्दे पर डाक्युमण्ट्री वटी तेजी से फिमल रही थी। पौडी देर बाद फिर अमली पिचर प्रारम्भ हुई। वितस्ता ने देखा पाम छुट्टी का रिन होने के कारण हाल खचाखच भरा हुमा है । लोग छुट्टी के मूड में है। क्तिन ही दम्पति साथ साथ वठे सिनेमा का पूरा पूरा पानन्द ल रहे हैं। वाहा में बाहें डारेबीच बीच मे फुसफुसा रहे हैं । मनायाम खिलखिला रहे हैं। और एक है-उसके पति जो छुट्टी के दिन भी पापिस जाते हैं । जोनल कमटी की मीटिंगै जिहे माये दिन सामे जाती हैं । जस प्राक्सि पलावा जीवन म उनके लिए और कुछ है ही नहीं ! सामने तीसरी कतार पर वठे एक दम्पत्ति पर उसकी निगाह ठहर गयो । मभी ममी अपरा होत ही बिहान बही भदा से एक दूसर को पिस' कर लिया था । वितस्ता के सारे गरीर में सुरसुरी-सी फल गयो । पिस्वर यहाँ से शुरू हुई कहां तक पहुच गयो ~ उसे फिर कुछ पता न पला। सेक्नि इप्टरवल म ज्यों ही सहसा प्रकारा फ्ला उसकी मुदी पलके खुली जसे पहनी म जागो। अपकचाकर उसने विन्दो की मोर देखा पौर फिर सामने तीसरी पतार में बठ दम्पत्ति की पीठ पर पलकें गड़ गयी पौर खुली-मी-बुली रह गयी। चिरन्तन बगल की सीट पी पिछली पाटी पर दूर तक अपनी बाहें पसाये पटा पा । बाहा की सीमा रसा पास वठी जुबार दाहिने किनारे के फों तक को घर थी । चिर वन मुस्करा रहा था। जुबेदा भी बालों में पीस फूल खोंसे मुस्कराकर पिरन्तन को मांखों ही मासो म पीकर 'कोका की स्तिमा म रही थी। वितस्तारे पांवों तसे धरती खिसक गयी। सारी की सारी रात टूटकर उसके सिर पर गिर पड़ी । वह मिर-दारहाना बना कर सीट से उठी और सीप घरपी मोर निकस पसी। शाम को चिरन्तन काफी दर से लौटा। विवस्वा माज रोगको ६४/ अन्ततः वितस्ता ने मासुमों से भीगा मुखमा उपर उठाया- लक्नि दखिए में ऐसा न मम्गी । मपने पावों के पास पाडी-सी टौर द दीजिए। वहीं पर मही रहार जिन्गी गुजार दूगी। मभी उफ सर न वागो ! वितस्ता जोर से फूट पड़ी। चिरन्तन ने उस वाहो में समट कर उठाया । उसका प्रामुमो स भीगा मुपहा होगों से छुमा मोर मपनो हपलियो में छिपा लिया ।

नई वात जय पहा व्याह की बात न चली दरजा दस तक पडान लिखान के या भी सायकता मिद न हुई मौर दिया होकर पर विटलाना पहा- पौर पर मर-वठ भी बदनामी होने लगी तो घाबरलभ उपरती नै अपनी बहन पता को पहाड से दिल्ली भजन को लिख दिया। गरमिया नि पे--सपते । भरी दुपहरी । प्लू के पपड़ो के बीच, इस दुषमा साइरिल सवार हांपता हुमा विनय-नगर 'मेन मारपीट की मोर गुमरला दौसता। और पासमान म मोई पाल महराती गोवे पाय-बाय पर गली नानियों म सूसी घोंच मुवोत तो~-एन-~गरमी में लिपरी पुपती उदासी भाग मोर विसर जाती। पावलम धनुप पागेर की तरह, गले में जनेऊ डास मात्र मणर-धीयर पहने, मपनी जाम जैसी सुसी ढीली यांसपी सटिया पर गिरा-कमी पाहिसाव जोड़ रहा था (हर महीने पाप-पाच रुपए जम पर परसर प्यार पर लगा कर, दुरा भपने को पूरा समभने पाले पपरा. सिया सपा प्रमाव में विसबिलाने पर भी अपनी पाठ निमोरने वाले- t

४/अन्ततः
वितस्ता ने भासुमो से भीगा मुसहा उपर उठाया- लेकिन दखिए में
एसा न करूणी । अपने पावो के पास पोड़ी-सी और दीजिए । यही पर
पही रहार जिदगी गुजार दूगी। कभी उफ तक न कम्गी !'
विवस्वा जोर स फूट पड़ी।
चिरन्तन ने उसे वाहो में समेट कर उदाया । उसका पासुमा स भोगा
मुखडा होने से छुमा मोर मपनी हालियो म छिपा लिया ।

नई वात जब कहाँ व्याह की वात न चली, दरजा दस तर पड़ान लिसाने # था भी सायरता मिट न हुई भौर विमा होकर पर विठनाना पठा- पौर घर वठ-बैठ भी मनामी होने लगी तो चद्रा यल्लम उपरती ने अपनी बहन कती । पहाड से दिल्ली भनने को लिप दिया। गमियों नि प-तपत । भरी दुपहरी । सू के थप रे बीच, या-दुका माइपिल समार हॉफ्ता हा विनय-नगर मन मारती?' की भोर गुजरसा दीखता 1-और प्रासमान म कोई चाल मरराती कोव पाय-बाय र गन्दी नालियो म मूली चोंय बीते तो-ए-गरमो म लिपटी धूपली उदासी चारों भोर विसर जाती। घा यल्लम धनुप बी मेरी तरह गले में जनेऊ गते मात्र पलर-वीपर पहले अपनी बाल सौ सुसी ढीसी योस को सटिया पर गिरा-रमी हिमाव जोर रहा था (हर महाने पाच-पाच रुपए जम पर परसरम्यान पर नगार कुछ मपने को 'पृष्ठ सममने पाले पपररा- सियों सपा प्रामाव में दिसबिताने पर भी अपनी पोंठ निमोरने पाले- - ८६/मन्तत समातीय मधुमों ने मह-मुष्टि के लिए इस व्यवस्था का नाम कमेटी रखा था) इस अगले महीने की पहली को सेवा-नगर हीतविष्ट के पवाटर में 'कमेटी थी।-पद्रा वल्लभ गुरू महलाने तथा गत माह से दफ्तरी स तरक्की होकर जूनियर वला होने की वजह से सिवरेटरी था।- उसे अपना हिमाय हयातसींग को नियत समय पर सौरना था। साकि भीटिंग ठीच चल सके । विन्तु सवा-सेरह माने का जोर मिलता न पा। इसलिए बार बार वह अपने छोटे से कपाल पर पॅसिस वा पुन्दा ठोफ रहा था। चार मरियल वच्चाकीमा उसकी परम पत्नी-मोदि जिसके गारे गाला पर 'छोए पर गए थे जिसकी गोदी पर लिपटा पसाने से नहाया नगा यच्चा दूध मिमोड रहा था- उप रही पी। तमा बाहर गली पर हार पी सी भावाज भाई। प्राचाते उसने सुना-कोई चारा वल्लच पुषार रहा है। जापरी पेशा से मापा एक तगा रपता रपता मार पर मुहता एकता दिखलाई निया- देखत री पावं फस-सी माह उस-६ मारी नेति जसी !-देखो तो हो! मसो मोसरह पाय पति पर स गिल पर नीची पोर र गइ- घा बातम हाप पापागज हाप म पामे मुनीमा की तरह पन्सिल पान न पापकर हरवहातामा साइमा । प्रजीद सारदा से पाठ की स्लेटी रग की जाफरी में वर्गाशर पों के गीच~-दोना हापों पी प्रगुनिया का गोत्र घरा बनाए इस तरह दसन लगा, जरा सा बच्चे दोदा पस म बाइपोप रे बस के भीतर माते हैं। सांग को पगली सौर पर साग यार को बगर न घोनी में हर पीपहपती बटी है। पिछली सीट पर न पा पारामा सीट पर प्रमद, सहम-स पास्थी मारे पठहैं।

तांगे वाला केतकी का हाथ पकड कर बहे जतन से उतार रहा
है।-कहीं गिर न पर! बेटी महकर उसकी पीठ पर हाथ फर रहा
मई यात७
पावलम को यह मच्छा न लगा।
तजी से वह नीचे उतरा। हिकारत की नजर से तागेवाले की मोर
देखा । पमे चका कर मुह पाला क्यिा।
पद्राबल्लभ ने फिर करा को प्रणाम रिया।-चरण छूकर ।
फिर कुतुब मीनार की तरह सड़ी नेतकी को देसा-जो भव पहले की
तरह वच्ची नहीं भरी-पूरी भारत सी लगती थी।
पो उसे भजीव-सा सगा।
दोना मोटे मोट हायों में मोरी मोती लाल चूडियो । विशाल मांसस
शरीर म टोरी मी धोती-टसना ये उपर तर उठी।-यह भद्दे ढग से
पहनी-पहरों म एसे पोह ही पहनत हैं ।
उसने पाव छुए
चारपाई पर पसरत हुए कमा ने मपनी मैलो पुचती फी गरम
टोपी पर गौरय एव मात्म विवास के साथ उतारी और अपने ऊपर
उठ पुटने पर रपी-
दिती स्यरग है यार घ! तुम लोगो में पिछले जनम रे फरम
हैं। हमने ता पहरसह म पर पर उमर पिता दी। तरे परसाद
पाज यह नि भाव्य लिया ।
पायल्लम न पयना अनुमय वा।
मार पर ग्ह हॉग पा!
न हो मुझे तो मुरादाबाद से पिसी ५ यरस ऊपर बटने को
ठोर मिल गई थी। पर हमारीपति परान हो । गाडी म भी पढी नहीं
पी-मांच लगता सिर घूमता या ।--उम पर मीट से रल-पेल म दयी
रही। पादमी पर मदमी पायही उतरत समय पहली थी-'हाइ दुस
रहे हैं।
! पितटरीवास रोग सपाधव भरा पा
।

६८/ अन्ततः
+का ने अपने दोना पाव दूर तक तनकाए । सो मगुलिया एक दूसरे
पर कधी की तरह फसा कर सिर के नीचे पट्टी की तरह तान पर
अपने गगास पी सस्वी का कुछ पता चला हो! सुना दिल्ली
में पी?
क्मका डराईभर कहने ये
ममा ने घर की तरफ की बहुत मी बातें पतसा । यह भी कहा कि
मिलटरीयानो ने रानीखेत के पास एक भौरत में साथ वरपली की।
पौरत बकरे पर थी-मर गई। सरपच हम लोगों के घड़े से बाहर
है। एक दिन कुल्हाडी उघार हमें मारने मोभाया था।
पहा व लभ माथा हिलाता रहा चुप । केतकी पिलबिलाती हसती
अपने छोट भाई सदिया को इतने जोर से धूम रही थी कि उसे बीच में
टापना पहा
शाम को भोग्न के लिए ठन परा जब कपड़े उतार घोगी पहन
पर चौक पर यिराज तो उहोंने पहाड-युगण की वासो वा टेली
विष्टर फिर खोल दिया-
गाव-गाव में मोटर सारा मन गई है हो। घलोक वाले भर गए
है। हमने भी पपने घरोक्मर गिराए पर लगाए हैं-चौरह रपए
पर । तीन वालोर थे बाबू रहते हैं । रमीयमी घर में ही था लेते
पोर रातको समय मिलने पर हमारी वेनि मो भी पाया ले
पा-दे विचार न होते तो कसि दस साल म भी पा स पास
म पर पाती। मपन हाप से रसम पार पर लिसना मियाते।
माने मे सरितारनतम सरोदर साव 1 उस पलमोनिया बाबू ने
तोबड़ी मात दी। पेनि जाने और वह नाने अव देयो पाने म!
हमारे पर पाती और पता पा रेतिको दिल्लीम से जापो हो
भा, यहीं पराभेत पागवार बसोकपी मौकरी में ममा देंगे।

नई बात /८६ खूब तरक्की करेगी। खुश रहेगी। जसी हमारी बहिन है बसी यह भी - 'हमने सोचा केति दिल्ली जाएगी तो हमारी प्रानन्दी का भी सुपर पाएगा । वह भी पढ नेगी ।-विना पढ़े अव शहरों की तरह गांव घरा मे भी पर मिलना मुश्किल है। जमाना ही बदल गया हो चद्रा! भानन्दी चन्द्रा बल्लम के ठल कमा परमानन्द की बड़ी बेटी है । ठूल कका को उसके भविष्य की भी चिन्ता है। "हमारी मानन्दी भी पद समानी होगी रोटियां बेलती गोविन्दी ने पूघट के मोट से कहा । द न पूछोऽ! इस पाच गते पूस को उसे सत्रह पूरे हुए हैं । लकिन सगती ज्वान-जमान है । हमारी केति से इक्कीस होगी, उन्नीस नहीं पढ़ती हैं न! फराफर पढती है। पटवारी पेशकार पाते हैं तो उनक सामने बैठती है । बातें करती है।' फका घासलेट से पहे फुलके एक के याद एक निगलते रहे। पदा यस्लम अपनी मोर के अधिक नहीं किफायत से बोलता है। वह भी भाज धोती लपेट कर चौके पर वठा है। नहीं तो ठुल कका घर जाकर घरम-झूमने की बात कहकर बदनामी करेंगे। हाइ इसकूल खुलने से गाव में बड़ी तरक्की हो रही है। सो घर घर से लौटने पर सुना रहा था । घा वल्लम ने पुछ कहने के लिए महा। 'तरक्की-चरसकी तो क्या होती । यार, शहरो की तरह गावा मे भी 'लोफर' भर गए हैं। गुग्ग-गर्दी मच रही है। ग्राम-देवियों तो किस्से हो मौर है ! कराने सेर भरका मोटा सिर से दूर ऊपर पर उठाया । मरने की सी लम्बी धार गटा-गट गले में मेरते रहे । एक हो सांस में सोटा रीता कर दिया। फिर भोगो मूछोगो पोछते हुए नियाले तोडने सग ।-

६०/मन्तत
तेरी चिट्ठी जब पिष्ठसे दिन पाई तो हमने गांव में भेली बोटो।
सब वहने ये-पोलाद हो तो ऐसी हो । सेरा-वासो मा लहमा होनहार
निरला । दफ्तरी से किसक हो गया। पटवारी में घरावर सनसा पाता
है । कुर्सी पर बैठकर काम चलाता है ।
अपने होनहार' होन मी वात मुनपर चा धनम मन ही मन
बहुत मगन हुमा । उसकी पत्नी का चेहरा भी एकाएर खिल उठा । भले
ही पापिम म अभी तक भी वह पहले की तरह चिप्पिया ही चिपका रहा
था।किन्तु लोगा के बीच एक मादर मा स्थान तो धन हो चुका था।
घह सचमुच मोम बन गया भव । सुशाम के लहजे मे बोना-
कमा प्रापन हो
कुछ साया नहीं। माहार कम हो गया क्या?
पाहार वाहार तो ठीव ही है वटा। पका ने परम विराग से
पहा- पर मय शरीर म सुस्ताई जैमी पा गई है हो। पसी पुदाली
चलाई नहा जासी । पजमानी से जमता क्या है। नोन-तेल मा भी पूरा
नहीं पड़ता । इन 4 यामो के भए मे उरण हो जाता वो जग नाप जी
पा पुग्न मिल जाता
परान पापारण गिला मी बठी देतवी मी पोर देवा। जिस
अभी तक भी रेल पा लग रह ५ । बो अभी तक भी सारी वस्तुमा
मोपचरज स देस रही थी।
रेति, मी सगी निम्ली? पमा ने साने के बाद हाथ पोछार
सीक से दाताको पुरेदते हुए पूछा।
देवको यतीमा दिपला कर फीर विहम दी।
।
नीं न माई चा बल्लभ पो। 'मटी का हिसाव छ मसर हो
गया था। भव समस्या पी-पेप्तीनी। उसने उपग म प्रापर किसी
पान को निरासा रिया था पर यहाँ भार कौन-सी समस्याए उठ खड़ी
होंगी-याचा म था।
पपरासिपों के सास पोर वाटर म एक जाफरीदासा कमरा सेपर

नई यात / ६१ पिछने सपा साल से गुजारा कर रहा था। दूसरे में कोई रोहतक की सरफ पा छडा पा-प्रकना । भव एक ही कमरे में सात मामी कैसे रहेगे ! ए में साथ क्स निभेगी । कहीं कुछ घात हो पढी तौ--जमाना विगह पका है । रिसी का भी ईमान नही । सुबह नहा घोर उल पका ध्यान में बैठे। पद्रा वल्लभ राशन व दूधिए का हिमाय जोडता रहा। माने वाले महीने में गुजारा मुश्किल था । उस पर ठुल क्का के माने जाने का खर्चा-सो अलग । यह सोचता था कमेटी से कुछ पस निकाल लेगा। परन्तु सत्तर फा पिछला बकाया गत तीन महीने से उतर न पाया था। ह हो चदा वल्लभ ! पूजा के पासन से उठने के बाद ठुल क्का मो जैस फुछ सहमा याद मा पहा- यहां मुना है पुतलीपर है ! तेरी काकी के घाघरे के लिए दस-बाहर गज फिरप तो मित हो जाएगी न । पाचलम ने सिर हिलाया-केवल । चाय का हाथ भर सम्बा गिलास क्का ने हाठों पर गाया- यार, पुछ प४ वरठ मिलवा देना हो-हमारी +ति के लिए।-देसी फसन के । वहा समय ही नहीं मिला । फिर गाय-गराम म मिलता भी तो महगा है ! दुकानगरों ने लुट्यौल' मचा रखी है । जितना मुह म माया उतना दाम पह देत हैं। परा ने चाय के माय बाही भी मुलगा ली पहा म जुनम प्रशाल पडा है हो । एक समय माने यो भी रासन नही मिनमा । लोगों को लाज रपना गरिन हो गया है। चीनी की यान तो दूर रही लोगों को बीमार के लिए बांस मिसरी सब मुहम्या नहीं है तू मव कुछ पर वाला नी मग्न परहो ! पदा पसभ पाठशामा विद्यार्थी को सरह हर बात पर सिर हिताता है। शाम को स इरिल पसिनता रमेटीरी मीटिंग के बार पर A

१२/मतत
मोटा-यद हारा पका हुआ। मना छोट लच्छू को लिए मारमोट'
गए हैं। ममी व लोरे नहीं । मेतको धाहर पारसाई पर मगरमच्छ की
तरह लटी है।
इनरे लच्छन भले नहीं हो ! गोविदी ने पति के गानों पर
फुसफुसाते हुए कहा।
क्यों? सापचय पावलम ने देखा।
'इनरी बक्सी म चिट्ठिया ही चिट्ठियां भरी पटी हैं। पता नहीं किस
पिस को 1-कैरम बार लिखी है
पदा बल्लम ने कुछ कहा नही । पिचित मागे सरक् माया--
रिसपी है?
क्या पता ? मुह-जले मलौष धानों की होगी। इसकूल के मास्टरों
की होगी । बनिए को गुलस की सरह बरसी भरी पड़ी है
अमौन पसने लगती है-उसरे पार्यों से ।
मुनो तो
! यह भोर पास माई-- वसा बेशरम जमाना हो
गया है। किमी स महना नही-!
एक अजीब-सी स्थिति हो गई चद्रा बल्लम की। यह सब जानने
सुनने को वह तपार न पा । एक्दम गूगे मी सरह सास रोष चुप रहा ।
पनी को इस मामले में बढ़ावा देना उसे ठीक न लगा।
वही रिमी पल्ले गोप देवे-~गुपचुप । यहाँ बनामी हो पही
वो फिर कहा जाएगे! रूप भरने को भी ठौर न रहेगी !-परदेस का
मामला व्हरा
। चिनुत भाव स स्यानेपन साथ रहार गोविन्दी
पुप हो गई।
देर सक सन्नाग रहा । वुछ टोनते-सोत्रत हुए चलायल्लम ने पत्नी
से मोर दसा- तू तो दिन मर यही रहती है। अपनी नगाह पर
रस। -बनामीम होगी।
बया' पम्नी भी पसरे पर गा-ग्नि मर में भेड़ों की तरह
हकी रखवाली पर। सारा दिन पिसी पर बठी, बाहर भातर

नई पात /६३ । माती-जाती ताक झांक ररती रहती हैं। यह मुसण्ड । (उमने दीवार की मोर इगित किया । उसमा तात्पर्य छठे पड़ोसी से पा)-माज दोपहर को ही छुट्टी लकर घर मा गया पा । तब से वह जाने या यह । दरवाजे पर खूटे की तरह गड गई हैं। मैं किसी काम स बाहर जाती है तो वह लपक भर कागज की गोली फैक्ता है और यह खित्त से हस देती हैं अमन निलग्ज पडोसी पर घद्रा वल्लभ को वहद गुस्सा पाया । पर पान्त भाव से पानी की तरह पी गया। अगीठी के कोयले से बीडी मुल गाता-वसा ही रोज की तरह अण्डरवीयर पहने वठा रहा । पद्रा पल्सभ को माता केतकी ने देखा था पर वह वसी ही पड़ी रही । लकिन देर तक भैया भाभी को गुप-चुप वातें करते मुन उसे न जाने क्या प्रतिक्रिया हुई । यास बिखेरे भाचल बहाए, बरगद के पेर की तरह यह पाखें मलवी खडी हो गई। दोनों भव घुप पे । । १ दहा फत पपने मौफिस से पाठ-स लिफाफे ला दोगेन' क्या "हमारे पडोस म जो वे भारत नन्दन ग्लौर-बाबू रहते हैं न उनकी दुस्हणी को चिटठी ग्विनी है। दिल्ली माती घेर कहती थी- सली, वहाँ पहुचने पर कम से कम चिटठी गैरवर ही याद पर लना भारत नन्दन बाबू कहते थ–माडौं म छुट्टियाम दिल्ली पाऊगा ता तुम्हार ही पर पर एगा। भारत नदन वायू बहुत अच्य है । ठून मा को मा-चौ महकर पुकारते हैं। रेल के जिन मी तरह चव लभ भ मा भीगे परिता रहा। पसी के पाउज में एर छोग-सा पॅन लगा था। पद्रा यल्लम ने पों ही पूछा- यह पहो स माया मेरा है। मिस मिस हमती रेतकी बोली- 'गुमाइ राम मास्टर पी ने इनाम म दिया है। पहले य--इसमे को भी लिखता है, पास हो पाता है। मैंन भी इसी से मिसा पा। तभी सा पास हुई। .

६४/मन्तत ठ्ठल ममा पूर छ दिन रुने-माज जाता हू पर जाता हू करके । अपने लिए वास्कट का कपडा छतरी मोर पदर की पानी के लिए बारह गज मिरप का पहास जाना भी न भूल । पूरा फरी-घालों का सा गट्ठर बना कर चलने को तयारीमरने लग- ह हो चद्रा यहाँ मलमोडारे हमार तिवारी वकील साहब के सड़के भी रहते हैं। सुना पफ्सर हैं । उनको सोहबत म रहा कर पार उसका भी पिर कुछ रुक पर सोचते हुए बोले- 'गांव में जर ने जुलम मचा रखा है हो । लोग रहत हैं तरी दिल्ली में बड़ी पहप है। हो सके तो बदोवस्त करवा देना हो पदा बल्तम बन्दोबस्त करवाएगा या बनोवस्त नहीं करवाएगा- पुछ नही महता। टुन सपा को कुतुय-मीनार विरला-मदिर सय पचन करा के धावल्लभ यह स्टान तक पहने जाता है । जान जात भी नया पम्प पायोपराते रहत है- पति दुरली पौर मानदी का भार तरे पर है । उनके लिए पर भी तलाश परत रहना । पर-सरचा भेगना हो। प्रपनीको के लिए गागा की एक मातस मोर मर लिए जाठा म पहनने क लिए एप पाना उनी वास्वट जप सब रोपना हरी न हु सौटी न यजी गुरमयुर पहिए न घूमने लगेगा प्रवचन दव रह-चा चम्मम हा मा तो पति या छ मौर पगमिपा देना । उमा जनम मुघर जाएगा । मुम्हार पडोम मा लामा बडा हानहार है-बीए एम तर पड़ा निपा |-पता था मतगी को में पढ़ा दूगा। म पाना बात परषा पर माया हूँ मग वम्सम पर सौग्ने सगा ता उस पाव नापन सा-न जाने उमा पानो म पृमपुसाकर गावित प्राज कौन-गो नई बात वहगो'

दशित
"
भले ही लोग कहते रहें दि दद्दा मरे नही लडाई म मारे गये-
शहीद हो गये । पर बाबूजी का पायल मन, किसी दूसरी ही दुनिया में
पर-टे पछी की तरह छटपटाता रहता है।
६दर भाज पया वार है बेटा? घर में अम्मा-बाबू जी मुझ
इसी नाम से पुकारते हैं।
'मगल है सायद ।'
'तुम्हारे दद्दा को गुडरे फित्ते महीन हुए
में उगलियों मे हिसाब लगाता हूँ। कुछ पोहता हूँ। कुछ घगता
हूँ 'बरस पूरा होने में अभी दो-ढाई महीने हैं शायर
'ह दो दा ! बाबू जी के रूम होंठ पुतत है। वे इस
तरह दपत हैं कि मैं कही गलत तो नही कह रहा ।
मी पगग मसगार मोचता है।
इमस जहाज बना दो न पाल जी हम इसम बठकर पापा
पास योमरीला जायेंगे।

।
६६/अन्ततः
मैं कुछ भी उत्तर नहीं देता तो वह वछिया की जसी बडी-वरी निरीह
पोखों से मरे उस चेहरे की पोर साक्वा है।
माप भी सरन जायेंगे न प्रमल जी ! सिर हिलाकर पूछता है।
हो। म यो ही कह देता हूँ।
वह कमीज भी पास्तीन से नाक पोंछता है। फिर पाखें मिमिधाता
है पापो तो गुस्सा नही माता ! फिर से सरेंगे? हमक्ल जी!
में मक्खन के गोले को अपनी दोनों हथेलियो रे बीच भरता हूं।
पास खीचता है। उसकी छोटी-सी पसनी माफ के दो हल्के से छोटे छेद
ऐसे सगते हैं जसे दियाससाई की वारीक नोक से मभी-अभी पुमोकर
बनाय हों।
में उसे जूठा कर्म इससे पहले ही यह उछलता है । घसा जाता है।
पर मैं उसी परिधि पर फिर फिर घूमने सगता हू।
हाँ पराग ठीक कहता है। में लड़ाई में नहीं जा सकता । मुझे पर
गुम्सा नहीं पाता । कभी-भी मैं स्वय भी सोपता है मुझे गुस्सा क्यों
महीं मावा है!
नदी के किनारे विम्बरे पत्मगें भी तरह मुझे पसभ्य सपाट मातियाँ
रिसलाई देती है। पर एक भी ऐसी नही जिसस प्रकारण मर सके।
भगड सकू । मन की सारा पानें जिस पर उगल म।
मेरी रीतो मासें तब प्रकाश विहीन मय-सार ये हरे की तरह
निरपर पागे मोर पूमती है । फिर प्रपमुझे दरवाजे पर टिक परती हैं।
ए गूगी-सी गहरी परसाई दूर नहीं से उपर ठहर जाती है।
पीपी जमी मोतीपत सोले मरी मोर देखती है।
11 च्यापी माति यह पूछने मगती है उमर में इसनी
परीर भी, 'पाप म मघरे कमरे में प्रये मयो बैठे रहते हैं।
म
धरह नहीं पाता।
"मने गे सदुदरती माती रहती है न!'
नोरेन दा

दशित / ६७ मुझ ख्याल भाता हैहो वह ठीक कह रही है। मैंने भी हाई नीन को कौस को किताब में पाया शायद-यूमने से तदुपस्ती अच्छी रहा करतो है। "पाप कहते थे न" यह मजीय-मा मह वनावर दुपट्टे का और छल्ले की तरह प्रगुलियों में सपेटती है पाप नहने थे न भगसे जानें में स्कूटर खरीफ भूरा-सा मूट सिलवायेंगे। एक छोटा-सा मर पर बनायेंगे। जिसमें नीले-नीले पररे होंगे। एक नया नोला सोफा सेट होगा। पदों की तरह जिसकी गड़ियों का रंग भी एक्दम गहरा नीला होगा। एक सूबसूरत खूब गानेवाला रेडियो और मौर "और कुछ नहीं।" यह विस्मय से देखती है 'मौर कुछ भी नहीं ? । - . उसरे माथे पर रेशम की लकीरों की तरह हल्ली हल्की सिलवटें पह माती है। ये गस्से से वह पूर पर देखती है 'भो कहीं के विद्या पसम कहो । नहीं कहते थे ! "श्या नही कहता था क्या नही पहता था मह मह विगाहती है तुम अड़े हो नहीं कहने पे किएर यहा-सा पिंजरा होगा । उमम एक मुनिया होगी। एक गौरेया होगी। एक छोगेसी च बोलने वाली घोलने वाली, पो माली-बासी मधमली मैना होगी। और एक मेरे बराबर वही गल्या- जिसकी मेरी मी पासें भरे जसे दात ! पहले बहने एकाएक वह घहक उठती है । ताली पीटती हुई किल पती है नौरेन दा सच्ची भाप बूरे हो गये। भापके सारे बालों पर सफदी विसर रही है। में सबमे यह दगी। वह ही-हो-ही इसने सगती है। में उसने क्या ये भोसल जैस उलमे वालों को नोचता है "अगली नहीं को! ममी तर पाल नही पाई। इतनी बड़ी हो गई~-पिवली के ६६/अन्तत मैं कुछ मी उत्तर नहीं देता तो वह बछिया की जसी बड़ी-बड़ी निरीह पासों समरे उदास चेहरे की मोर तापता है। माप भी सरन जायेंगे न भरल जी! सिर हिलाकर पूछता है। हा। मैं यो ही कह देता हूँ। वह कमीज वी भास्तीन से नाक पोंछता है। फिर माखें मिपमिचाता है मापको तो गुस्सा नहीं पाता ! फिर से सरेंगे? हमाल जी! में मक्खन के गोसे को अपनी दोनों हथेलियों के बीच भरता हूं। पास सीघता हूँ। उसकी छोटी-सी पतमी नाम के दो हल्ले से छोटे छेद ऐसे सगते हैं उसे रियाससाई की बारीक नोक से भभी-अभी चुमोकर पनाय हों। मैं उसे जूठा करू इससे पहले ही वह उछलता है । चला जाता है। पर मैं उसी परिधि पर फिर फिर घूमने सगता हूँ । हो पराग ठीक कहता है। मैं सड़ाई में नहीं जा सकता । मुझे भय गुस्सा नहीं पाता। पभी-भी मैं स्वय भी सोचता हूँ मुझे गुस्सा पयों मही भाता है। मदी के निारे विसरे परपरों की तरह मुझे ममस्य सपाट मातियां खिलाई देती है। पर एस भी ऐसी नहीं जिसस प्रसारण सह सके। भगा राकं । मन की सारा या जिस पर चडेल सर्व । मेरी रीती प्रसेिं तर प्रमाण विहीन सच-साइट रे हण्हे की तरह निरपर पागे पोर पूमती है । फिर अपने दरवाजे पर ठिठक परती हैं। एर गंग-गी गहरी परछाई दूर नहीं से उहार टहर पाती है। पीपी जमी पोती पसके मोसे मरी प्रोर देयती है। नीरेम दा! ययों मी भौति वह पूछने मगती है उमर में इतनी पड़ी पर भी 'भाप इस प्रघरे कमरे में मरेमे क्यों बठे रहते है?' पुण्पह नहीं पाता। 'पृमने गठदुम्सी अच्छी रहती है न!

दगित /
मुझे स्याल पाता है-~हो वह ठीक कह रही है। मैंने भी हाई
जीन की कौत की कितार में पा था शायद-यूमने ससदुरुस्ती प्रच्छी
रहा करती है।
"माप कहते थे न।" वह मजीव-सा मह बनाार दुपट्टे का छोर
ल्ले की सरह मालियो में लपेटती है भाप बहते थे न भगले मागे
मैं स्कूटर खरोगे । एक भूरा-सा सूर सिरवायेंगे। एक छोटा-सा पुर
पर बनायेंगे । जिस मोले-नीले परे होंगे ! एक नया नोला सोफा सेट
होगा। परीकी सरह जिसकी गदियों का रण भी एकाम गहरा नीला
होगा। एक सूबसूरत खूब गानेवासा रेरियो और और ।"
और कुछ नहीं।'
यह विस्थय से देखती है 'भौर पुछ भी नहीं ?
'हो।
उसके माथे पर राम की कारों की तरह हनीदला मिलर पर
पाती हैं। वे गम्म म यह धूर कर दमठा है, "पहीशि
मसन मही! नहीं पहने य ।
क्या नही पता था?

६ अन्ततः
सम्भे से भी कधी?
यह बातों को छुडान के लिए छरपटाती है।
मता यहा पयों माई यो? में उपस कर देखता हूँ।
बिम्जोस मिलने ! वह भटका देती है बसाई महीनदूर
चली जाती है।
निगाह जाओं को फीकी धूप की तरह फिर विसी पर बिखर पडतो
है-उतास । इटा से पटी छोटा-सी सकरा गसोमादमी ही पादमी !--
पीटियो की तारमी छरहा इन मोग इस माली-सो दम घोटन वाली
मपी-गसी से हार महा माते जात होग ! मैं फिर धरण ५ पेड़ भी घोटी
की पोर दसता हू छत की महती है । जहा मनु सुयह नहा र दर
छारे गोल रराम को कघा पर मिलेर देती है। नाइलोनी घुए के उस पार
प्रम्प म सापती पता नहीं क्या-क्या सोचती रहती है !
मुझ लगता है मनु ठार रहती है । रापमुघ मर वालों पर राख
मिसरवा पला जा रही है । एष धार मम्मा ने एसा हो मुए छल पातों
पोमास पर चुप हो गई थी। पर पाबू जी जब बमा मर सफद बालों
भी मोर दसत ह ता उनको घसी-सा पुतलिपा म एक पनव-मा रण
उमर माता है। सफर ग्लजी कागजो तरह जिनमकोई भी भाव
पस भर ठहर नहीं पाता।
धाम परामप फूल जात हैं क्या पूम जाते हैं ! पारमी समय से
पहल भूरा हो जाता है -ययो हो जाता है ! पोहरा समय म सगिया
स समाय रापन पता नहा महा पन जान है ! प्रभी दुनिया हा मन निसनी
सी है। मगर दाहता पा में भी भभी सबरी तरह यूनिवर्सिटी
मनहा पदया। पासार दुहर पा । म पनि रात पिसता रहना !
पापलप-तुम्हपान र लिए परिन भनग! मरासिभर माता
है। मटर मा माता पार फिर पृष्ट ठहर पर फिर उसी
पाम मा । परागभी पोस दहा की मानवामी पी
.

धशित / ६६ हरिद्वार जाने माने का खर्चा और बाबू जी की दवा का हिसाब लगाता हूं-- इसा दरवाजे पर फिर यही परछाइ ठहर पहती है-विम्लो स मिलने के बहाने । जी, यहाँ विज्जो नहों माई?' "ना। ना के साथ उसे चला जाना चाहिए था लेकिन यह ठिठक पडती है। नीरन दा प्राप बिलकुल बल गय है सच्ची !' उसने जैसे मुझे पाहत यो वाद दम्बा पौर महुत गहरे में उतरते हुए कहा भाप इतना सारा काम पिसके लिए करते हैं ! न समय पर खाते है न पीते है न सोते हैं। बिजो कहती थी नीरेन दा को मी न पाने की वीमारी हो गई है। सच, भापका चेहग मनाम भजीय-सा हो गया है। दूर से दखने पर उर-सा लगती है में अपने रूख होठो को जीम स भिगोता हूँ । घर पर उसकी भोर दखता है । वह सहम जाती है। घरमा 1' सरोप कहता हूँ। वह पास मार खड़ी हो जाती है। वा सामन कुर्सी सीच! यह धर्मी खीपती है। यजा। सिर पर वठ जाती है। मा सघ-मच यता | मुझ सरर डर लगता है ? व नवम सिर हिलाती है-- ना भर बोलती है । लगता है न - । नहा तो फिर क्यों कहता थी। भू मूठ रहता थी 'भूठ-मूठ रहती थी! मुटठी भर तार तार सुनहा सूखा रसम हवा

१००/अन्तत
-
से उप पर पिर माथे पर कर जाता है । मैं उसरे मासूम-मुसोनी मोर
देखना हूँ। बरी-बड़ी भूरी पारी माग की मोर ।
मध्धा वा मुझ दए र हर नही लगता तो मा साना है ?'
पह विना मोचे मनापास बहती है अच्छा लगता है
में
हम पड़ा है। मुम हमता देख वह मी यो हो हसने लगती है।
पुछ गया फिर म नाटा रहता है।
मैं सिगरेट के सिर की राख की लम्बी सरीरमी मोर पता है।
फिर वही सलसी में साथ रहता हू 'देख गनु ।
पनु सचमुर देखने लगती है।
वायू जी बुरे हो गये न।
वह पराग पीताह सिर हिलाती है हो ।
'सूरसती है अम्मा इस पर में भी लिना राम परता
परता है । अव से बिम्जो गई कोई भी हाय नेवासा नहीं रहा
पह प्रपालर देखती रहती है।
माभी गुरु हो दुमी है । उस पर दिन रात नोपते रहते हैं।"
हो। वह फिर माया हिमाती है। जैसे यह बात मी वह आनती है।
मौर पिर दहा रे गुजर जाने से याद कमानेवाडा पोला में हो
-
तो
तो गुन ही पता इतनीको गरी मनमरसे सीपीआयगी!
तुम्हारे को पीसरह तो सब परो वाले नहीं होते न ।'
बनु बोगी से निकाल पालों में रखा गया-मागर सिमट
भाता है। बोयो पासरे टीस बनत , रिगट जाते हैं।
हो नीरन का यह मत देर तर सोपती रहती है सो पाए
पारीयों नहींर मेते।
T! मरिमर में बह उठता है वापर ! यों ?
*या ग? हमारा पामर मिारगीन!

दशित/ १०१ । में कुछ भी कह नहीं पाता । माझे मोचे पता नहीं क्या क्या सोचता रहता है। हो कहती तो ठीक हो जो घर का सारा भार उठा ले मगर ऐसी मोरत मिल पाती तो " मनु वान काटती है। भाश्चय से कहती है क्या रहा, मौरत से पारी करोगे नीरन दा लडके लोग तो लडक्यिों से पाह किया करते हैं ! यह अपनी प्रबूझ हमी में खिल खिल हसने लगती है, सच्ची, में सबस कह दूगी वह नपास भी तरह हल्ली हो जाती है। मुभम कुछ भी पहत नहीं बनता । यह गया है। किसी भी बात को गहराई से फ्यो नही ले सक्ती । मुझे उस पर हसी माती है । दुःख होता है । क्तिनी वही हो गई। इमकी उमर मी सारी लक्यिों की शादी हो गई है। पर यह मभी तक बच्चो जसी उडी उही बातें रिया करती है कि अपने सपद बाला को पहले कुछ गिना तर एक-एक कर नोष कर निकालता रहा । पर यह कम भी भय छूट गया। चेहरे की झाइयां गिनने स क्या! अपनी ही भाति पद मुझे अपरिचित लगती है। भय-सा महमूस होता है। पर यह क्या ! मनु भव बहुत दूरदूर क्यों रहती है ! कभी भी दसती महो। विग्जो पहनी है इनोर चली गई है, ममसी दुमा के पास 1 इस घुटन भरी बोभिल जिन्दगी से हार पर पक कर मन मनायास जहाजरे पछी की तरह फिर फिर उसी मोर पस छटपटाता है। सेरिन पनु जब से युमा के यहां से लौटी है मदसी-बदली-सी सगती है। इन दो ही महीनो म उसरा वषपना न जाने पर्दा चला गया है ! मय न वह हराती है न बोसती। खोई-खोई-सी न जाने किस भवर म

१०२/ अन्ततः
एबी रहती है।
एक रिन देयता हूँ वह भारी मारी हग मरती नमरे म मा रही
है । इस बार यह नहीं कहती कि विग्जो से मिलने माई है। पडे विवाम
के माय दरवाजे यों ही वन्द पर पास ही पुर्सी पर वठ जाती है । जहाज
के पर की तरह चेहरा भारी है-निराश
नौरेन दा। यह जम सपने में है। हवा से याने कर रही है।
क्या एमा नहीं हो साता कि कोई एक ऐसी लहपो मिल जाय जो
घार जी वीरेख भाल कर रे। मां जो ये काम म हाथ वा से । मामी
यो भी कु" सहारा मिल जाय पौर मापकी सवा भी पर गके तो
माप उसमपानी मगन नरेनदा
मुझ का भी उत्तर नहीं मूमता । मुभमे कुछ भी कहा नहीं जाता।
वह पर वार दो बार बार बार अपनी बातें दुहरानी है लक्नि
मेरी जुबान पर सरवा मार गया है। मैं यहा गया है न ।
पह प्रत म एप गहग निवाग होती है मौर चली जाती है।
पाम दोष छोटी-गी चिट रिकी पे हाथ भिजवा दती है।
पौर उमो बार पनु पिर कभी भी नियमा नहीं देती। न पिहनी
पासती है न एन पर राम मपानी है।
पौर में भी काम म पव दुरी तरह पिसा रहता हूँ । पता ही नहीं
घसता पर पोपी पव साम दली।
दहावी वर्षी नि ! हम हरिद्वार होपर माये ५ ।
बाहर
मीर मोगोंरा जमपर जुटा पा । पाहणापम पम म निबर पर
पाने पमरे में पाया तो एक माने गोपा। सारा मगार सोया था।
पाहर पौवीर भीगने की प्रावाज मा रही थी। पाम म पमरे
मनाभी गिगपने मा स्वर पराग हात मा म बीमार है मेरी
पम्पा मोरोछ पार नि हो गर ।
रोनी तवा एती है। मैं यस्य की मार दमता रहता । तभी

इशित | १०३
दरवाजे का बुग्डा-सा सकता है। दो निरीह माखें मेरी मोर न जाने
क्सि भाव से झरिती हैं !
.
प्रवीर म डूबी सफट हपी-सी राख की लकीर-मी !
'परी का से खड़ी हो ?
माज बहरी बनने की वारी क्नु को है न !
सुना था तुम्हारा व्यार हो गया ?
फन टक्टको बांधे मेरो प्रोर भयभीत माखा से दखती रहती है।
मुनिया उड गयी। नीले पर्दो का चमक्सा रग स्याह पड गया !
घर खरीदने से पहले ही विक गया ! लगता है रेडियो प्रव सगीत नहीं,
मसिया पुनाया मरता है न!
पनु के गुलावी अधरा पर जामनी रग पिर गया! । बुझे दिये की
परह उसकी भारति-समा पूय हो गयी है ।
जीरेना! वह माचल में मह छिशकर, दांता से होंठ काट
पर फ्पा-पफा पर फूट पड़ता है।
पौर कुछ क्षण उसी तरह खड़ी रह कर सिसकती हुई मोमल हो
जाती है।
पराग पब मसवार नहा नोवता । यह भी नहीं कहता कि मैं जहाज
भना दू । वह उडकर पापा के पास मीमा पर जायगा। भाभी भव
बाह कर भी रा नहीं पातीं। उनकी मांसों से मासू दुसरत ही नहीं।
सकर मन है-या। जी दवा नहीं पीत । कहते हैं-व्यय में पसे जाया
परने मे क्या मां भव मुए तनवाल को भी नही कोसती । मनु भूलकर
भी एक भर नहीं देखती।
में दिन भर इन धूत मरी सह म मारा-मारा पिरता हूँ। पर में
घुसते ही पिता जी मागा पर सहे मिलते हैं कुछ मिला !
इन 'तीन' पदों पत्रव्यूह में भेद नहीं पाता। उत्तर दिये बिना

१०४/अन्ततः ही चला जाता है। छत पर लेटा-सटा पासमान पर सनी नीली चादर की मोर देखता हूँ । सोग महते है-नु हर समय उदास रहती है । म खिदमी नहीं सोसता । भव बाहर नहीं दसती । शायद सभी-कभी दर से झलक पड़ती है तो उसफ हापौ-सात जसे गोर हायो म महसी स्तिनी मन्धी लगती है ! जब वह सार म गोल पर पलाने के लिए झक्सी है तो उसकी सुनहरी चूड़ियो की धमक बिजली की सरह वाघ जाती है ! मांग में सिन्दूर क्विना सुदर लगता है ! रेसम का लाल गेरा-सा ! लड़को का म्याह लहरिया से हुमा करता है । न्याह के माद सब बदस पात है। कनु भी बदल गयी है। विजोमहवी है बनु सचमुच बहुत बदल गयी है । पद बहुत सुख में रहती है । पर उसका बचपना ममी तर मी गपा नहीं। उसने मपन समरे म पिवन ही टर सारे नाल-नील पर्दे मकारण मटका रस हैं। गहरा नीला सोपा-सेट है। पूव बोलनकासा खूबसूरत रखियो। पौर स्विनी हा मुनिया, गौरपा पाल रखी है । मुनहरे पिंजरे म एक मखमली काला मना है । जोगिन रात बिदुर बिदुर चीयती रहती है । जसरठ मसाटासा पा हो । मैं धीरे म दपता है । कुछ भी सो दिखलामी नही देखा। कपाल पिपुरती सिमटती रगहीन सोसती दीवारों का प्रतिबिम्ब एर-दूसरे से परामराकर विसर पड़ता है।

वृंद पानी इतना सारा यह सामान क्सिका धरा पड़ा है रन्नी? भाफिस से सौरते हुए, घर की देहरी पर पाय रखते हुए माये पर उमरी पसीने पीयूमो तिरछी मगुलिया से समेट कर दूर छिपते हुए विश्व वर ने पूछा क्या यो भया पाये हैं गाय से ? पालिन्दी ने जमे सुना नहीं । समतमाता मुह झटके से फर कर सामने से मुही पौर दूसरे कमरे में मोमल हो गयी। वि वेदवर ठिठन पड़ा । नीम की नोक को दाहिने जबड़े के दुखते दांत पर टिगाये किंचित् प्रघर खोले दसता रहा । फिर वसा ही खोया- सोया-सा मागे की ओर बढ़ा। पर देहरी के पास दो फटे टापर के मोट सलुवेमाले, पितक्यरे पेशल मूस मुह फार वठे हैं । विवे'वर समझ गया बड भमा होंगे या पानी ! पर एकाएर पैसे ? चिट्ठी तन गरी नहीं ! पपड़े उतार, पीठ मल खटिया पर यह गिर पड़ा । छत पर तेजी से पूमते, परपराते पुराने पक्षे मी मोर देखता रहा ।

१०६/अन्तत हद हद तू पोर । मा कालिदो पाय रखकर चली गयी उगे पता नहीं । गुरुडो रिसवती भायो लेग्नि उसने देखा नहीं । किसी ने पुकारा कुछ कहा लपिन उमन सुना नहीं। टक्टकी वाघ वह मेवल पखे की पोर देखता रहा देखता रहा । पसा तेजी से हवा काट रहा है । एकाध सूखी पास के तिनके ऊपर से सटकते हुए युरी तरह पाप रहे हैं। पिछले नाठों में मापद चिड़िया ने घोंसला बनाया था। घोसना कहां गया? चिडियां वहाँ गयी? तू मरजानी मुई! चुप कुटटी 1 मावासी भायी तभी। विश्वेश्वर महरे से उठ बैठा। जैस नींद से जागा। प्रधाचा कर घर-उधर देखने लगा लेकिन दीखा कुछ नहीं । कान लगाकर फिर सेट गया हो घारपाई के नीचे खटर परको सी प्राग मनायी दी। पूछ छीना मपी कुछ मार-पीट कुछ दवा हुमा शोग्गुल विलियों की जसी सा मौन गुमो! चौतर पारपाई को पाटी के महारे अक्कर झोका-एक-दूगरे से बाल नोचने म धार न हे-नहे हप व्यस्त हैं। सूब गुत्थम गुस्सा हो रही है। पर उमे रेखते ही जो जहाँ था यही पर र गया । जम चलतो मगान को मिली सासा सपाप्त हो गई हो। सांस रोरे चार वढी-बरी भयभीत पोरों सहम पर उमरी पोर देमने मगीं। र र! मे पौन? पारपई से उछरते हुए विश्वावर नेपहा उपामिन्दी! ये रिस प्रगायबघर से ! भापके गाय रे मोर बहो । मुह फरत हा पानिनी में कहा मोर सनर पर पोती का पल्ला पीये पाती समन सी हो गई। हाप हा में हिमासी हुई धोती देयत गया भया जी पोवारीफ माये है। दो गायुमारों को भी साप म ये है। पूरे महीने दो महीने रेरा लसर पर रहेंगे। निरासो दो सौपाये ना ! म होतो एकाम ।

। दूर पानी /१०७ मेरे गहने गिरवी रख कर सामो । मया जी माये हैं न गाव से ! सानोगे मसे नहीं? विश्वेश्वर मह सोल मासिन्दी पी मोर रेखता रहा। कुछ कहे, उससे पहर ही र एक पर कुत्त के पिल्ले की तरह बाहर घसीट कर पालिदी ने दोनो बच्चे निघाले पोर सामने खड़े कर दिये। पलीमा यह व्यवहार उमे मला न सगा। घुटने तक लम्बै स्याह मलसिया के पुरत मौर फटे हुए धुमरेले मारकीन के पाजामे में लिपटे दोनों बच्चर सपिले लग । जस उनसे कोई महत यदा अपराध हो गया हो और अभी भी जिसकी कोर सखा सुनाई जानेवाली हो। दो मासूम चेहरे खूबसूरत [उदाम ! विश्वेश्वर गेम गया । भणीव-से युतुहन से देखता रहा मनोसी-सी गोर-गोल भारति, कलाई भरी घडी पटरी गुस्सली गरी ई मासे मिले हुए नह मघर । हमी पारा बिना न रही उसे । (मरे यह कौन ? पहर कर यह बोला हमाला दोन नेता है मोल मोल यह बिन्ती । विदो लानी मई, तुम लोग ता पहचान नही जावे रप कसा हो गया जग सगीत असा! पाना बच्ने एक-दूसरे का मुह साकन लगे। हम से नमस्त महा?" फिर दोनो की माल मिला। पास शायद समझ म मायी नही। छाट बच्चे को विश्वेश्वर न गोदी म उठा लिया। जो मिला पाया । उसको बहती नार पुले सौलिए से पाछने लगा सो कालिदी ने गुस्म म उसी पोर देसा, पर उमी तरह उसका सारा मह पाछता हमा गिर हिला पर यौला, क्या हरजठ, मिस ममाययपर से समारीफ न । - माय

१०८/प्रसत
सपा और छोग हो गया।
'गाव म घोबी भी मही पान ! नाई भी नहीं पा ची भी
नही पी मे
मालू के जमे दाल बना रसे हैं-या लम्रे-सम्द! मरे
पानी तो होगा ही धोने के लिए । क्यों ? बयो? दो प्रगलियो के बीच
चिमटी की सरह उसकी नाक पकहते हुए हिसाते हुए विश्वर ने कहा
पयों
मालिनी यह देख कर जल कर राख हो गई। जैसे उसने पिये
पराये पर पानी उतर पा हो । हाय नघाती हुई बोली
चाय पीनी
है या नाटक मेखना । छ बजे मापी दोस साहब अपनी धरम-पत्नी
राहिन यान-गोरालो मी पस्टन लिए पधारने वाल हैं साने हो। बुला
वो लिया वह रोव स । घर मे है भी पुछ। बनाऊ क्या अपना सिर !
विव वर ताट गया। पहले तो क्षण भर गम्भीर रहा फिर
पुस्वियों मना हुपा बनापती धीम स्वर म योना क्या पायेंगे व पल्टन
से पर इस तरह स! हमने उनका क्या बिगाटा है जो वे साने दो
उतार हा ? यह विवेवर हरा पड़ा। पारिनी भी पारे । हस
बिना न रह सकी। फिर भी गुस्से से वोतो, 'देसतो टू पा पा रहे
है। एना उन्हीं से !
'पर तुम गया परगान होमी हो । बोई नवाब मी पौलाद तो है
महीं। पायेंगे तो घर म जो होगा मिला देंगे। यम।
हाय नचाया पारितीने पर म भूनी भाग भी नहीं।
उम पर पूछ भी बोरनगर रह गई तो उन्ही रे मामन मुम पर मारा
पड़ेंगे। जग मन ही जानाम पर युरा बनाया। भोर पर म तो को
गामान परा-गहा मारहा है। दमज्म नि तर पपने दोस्तों को
सर मये-नय पिम्म गार मुनाो पिरोगे । वात-वधान तरह नरहरे
नाने में पारा । गरम हरे-माहमयमाता र पोखी तेजी से
कामिदीनमी
मुरार दोनों को भार माना गिसाया वो मरा नाम वस दना।

यूब पानी / १०६ बुला लाते हैं जिसे जी में प्राता है! जैसे धरमशाला है चौके मी भोर से अतिम चेतावनी भाई। चूल्हे पर पढ़ी पतीली उतर गई। रसोईघर क फिवाह घडाफे से घद हो गये। कालि दी मुह बिशेर कर अपने कमरे मे चली गई। पलग की पाटी पर वठ कर नीचे की ओर लटफ्ते पाधों को हिलाती हुई कुछ सोचती हुई कुछ परशान-मी उलझी हुई बुनाई की सीकों में साग पिरोने लगी। हाय तेजी से चल रह है। हृदय तजी से घड़क रहा है। नथुने तेजी से पड रहे है । होठ गुम्स से नाप रहे हैं। और बुनाई गलत हो रही है । पेकिन उसे क्या ! होती रहे ! लास हाती रहे-बला से ! एक ही सांस मे पानी की तरह चाय पी कर विश्वेश्वर ने ठण्डा प्याला परे रख दिया। नाश्ते की तश्तरी धोनो बच्चा के सामने धर दी। फिर पलग पर लेट गया और छत पर लटकने पखे की मोर देखने लगा। कुछ क्षरण वाद उठा तो देखा काफी वक्त गुज़र गया है । कनी मरी भो कालो। बड़े प्यार से मीठी मावास में बोला, 'भई पहा पली गई हो।" बाहर सहन फी मोर भांगा। बद रसोईघर की पोर झाका । कुछ पौर मागे वदा कामिदी! कालिन्दी न मुह पुना जिया यलून को तरह । कालिन्दी बोल सो वह कालिदी ही क्या । याह यही वठी है रानी साहिबा । म मरे-कमरे में विरही यक्ष की तरह बावला-मा भटक रहा हूँ। बाहर बरामदे म उदास पड़ी मगीठी के घर पे उमटते घुमड़त वारला से सन्दशा भेन रहाष्टू पर तुम सुनती नहीं। फिर कुछ सदर योला 'न् । चौद प्रो यहा निकला ! मैं बहू पान रोगनी पहा ! पालि ने मुह पर लिया। विश्वेश्वर उसा माप पसग पर बठ गया। पुछ और सट फर बैठ गया। बघे पर बिखरी सगे को सहलाता हुपा बोला तुम मुस्कराती

-
1
११०/मततः
हो तो यरवस फूल झड़ने सगत है। तुम गुस्सा होती हो तो और भी
प्रपिर मुहर लगती हो । पिता हू पकार कितना मूरख प्राणी है ।
तुम्हारी तरफ न देखकर चार की मोर क्यो
वस-बस रहने दो। मुम यह वकवास मच्छी नहीं लगती। मुझे
छोड़ दो यम । गुस्से से पालिन्दी पौर परे हर गर्न ।
पहले यह वतलामो हमें कौन-सी छूत की बीमारी है। हम
पौन-मा ऐसा भमकर सक्रामा प्रसाध्य रोग है जिमकी यजह से सुम
दूर भागती हो । सब यह पौर विसामो कालिन्दी दूर चली
गई पोर पलग के दूसरे सिरे पर यठ गई।
विपवर सोचता रहा। फिर तनिर मोर मागे पडता हुपा मारी
पावाउ म बोला तुम्हें मुझमे नपरत है न कालिदी।
पालिदी मुप पी।
हाँ हो ! हो । भोसो । हरदी क्यों हो-मैं बहुत बुरा हूँ
न! विवेवर की निगाहे सामने मेग पर टिकी थी।
मानिन्दी पिर भी चुप रही।
बोलो मी-मैं बहुत युरा ह न !"
हो। मालिन्दी ने होंगे को मिले हुए सिर हिलाया।
वो लो! बस उसे मनचाही पात मिल ग। उसने मेज पर
र सम्त्री ने पामा धापू गया और सामन रप दिया 'सो!
मोम । दराती गया हो! लो।
विवर उमरी मिषी मुटी में जबरदस्ती पाडूमी मूठ दव
सपा और पह गुस्गे म मममाती वपाप रमे संगी। एगी सीमा
भारी म मेरा म जाने वह गिर गया। मान जाने हो गिर गई।
पापा पर 1 जान पहा मुार पहा । वालिनीनी माइयों को
विपरीरमा योपा रही हैं । योच जाही!'छोटो
'भी। हो भी 11 कामिनीपानी पसी जा रही है ।
परी मुसिस मे भाये माप शारिरीने प्राने छापा ।

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Anannt

Author
Joshi,himansu
Title
Anannt
File name
Anannt
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2010/12
Publisher
Delhi,purvoday Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514867
Barcode
4990010022542.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
zfwDBxn4M3c
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