Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Pramaprameya No.-18

Dr.v.p.johrapurkar · 2010/08

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Front matter

प्रकाशक:
गुलावचंद हिराचंद दोशी,
जैन संस्कृति संरक्षक संघ,
सोलापूर
सर्वाधिकार सुरक्षित
मुद्रक:
स. रा. सरदेसाई, बी. ए., एल्एल्.वी.,
'वेद-विद्या' मुद्रणालय, ४१ बुधवार पेठ,
पुणे २.

JĪVARĀJA JAINA GRANTHAMĀLĀ No. 18
GENERAL EDITORS
1
Dr. AN UPADHYE & Dr. H L JAIN
Bhāvasena's
w
PRAMĀPRAMEYA
(A treatise on Logical Topics )
Edited Authentically for the First Time with
Hindi Translation, Notes ete.
By
Dr V P JOHRAPURKAR, M A , Ph D.
Asst Professor of Sanskrit, Govt Degree College,
Mandla (M P.)
Published by
GULABCHAND HIRACHAND DOSHI
Jaina Samskrti Samrakşaka Samgha.
Sholapur
1966
All Rights Reserved
>
Price Rs. Five Only

First Edition : 750 Copies Copies of this book can be bad direct from Jaina Samskſti Samrakshaka Sangha, Santosha Bhavana, Phaltan Galli, Sholapur (India) Price Rs 5/- Per copy, exclusive of Postage है I जीवराज जैन ग्रंथमालाका परिचय सोलापूर निवासी ब्रह्मचारी जीवराज गौतमचदजी दोशी कई वर्षोंसे ससारसे उदासीन होकर धर्मकार्यमे अपनी वृत्ति लगा रहे थे । सन १९४० में उनकी यह प्रबल इच्छा हो उठी कि अपनी न्यायोपानित संपत्तिका उपयोग विशेष रूपसे धर्म और समाजकी उन्नतिके कार्य करें। तदनुसार उन्होंने समस्त देशका परिभ्रमण कर जैन विद्वानोंसे साक्षात् और लिखित सम्मतिया इस बातकी संग्रह की कि कौनसे कार्य में संपत्तिका उपयोग किया जाय । स्फुट मतसचय कर लेनेके पश्चात् सन् १९४१ के ग्रीष्म कालमें ब्रह्मचारीजोने तीर्थक्षेत्र गजपंथा (नासिक) के शीतल वातावरणमें विद्वानों की समाज एकत्र की और ऊहापोहपूर्वक निर्णयके लिए उक्त विषय प्रस्तुत किया। विद्वत्सम्मेलन के फलस्वरूप ब्रह्मचारीनीने जैन संस्कृति तथा साहित्यके समस्त अंगोंके सरक्षग, उद्धार और प्रचारके हेतुसे 'जैन सस्कृति संरक्षक संव' की स्थापना की और उसके लिए ३००००, तीस हजारके दानकी घोषणा कर दी। उनकी परिग्रहनिवृत्ति बढ़ती गई, और सन् १९४४ में उन्होंने लगभग २,००,०००, दो लाखकी अपनी सपूर्ण संपत्ति सवको ट्रस्ट रूपसे अर्पण कर दी । इस तरह आपने अपने सर्वस्व का त्याग कर दि.१६-१-५७ को अत्यन्त सावधानी और समाधानसे समाधिमरण की आराधना की । इसी संघके अंतर्गत 'जीवराज जैन ग्रंथमाला'का संचालन हो रहा है। प्रस्तुत ग्रंथ इसी प्रथमालाका अठारहवाँ पुष्प है ।

प्रमाप्रमेय maveine स्व ब्रह्मचारी जीवराज गौतमचन्दजी दोशी स्यापक, जैन मस्कृति सरक्षक संघ, सोलापूर.

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विषयसूची 1-11 १५. १६. ७. General Editorial ११. परोक्ष प्रमाण के भेद * Introduction iil-IV १२. स्मृति ८ प्रस्तावना (२)-(६) १३. प्रत्यभिज्ञान ९ १. प्रारम्भिक १४. ऊहापोह १० २.ग्रन्थकार तर्क ११ ३. प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम अनुमान १२ ४. विश्वतत्त्वप्रकाश तथा प्रमाप्रमेय १७. पक्ष ५. प्रमाप्रमेय तथा कथाविचार १८. साध्य १४ ६. सपादनसामग्री १९. हेतु १४ प्रमुख विषय २०. दृष्टान्त ८. कुछ प्रमुख विशेषताएं २१. उपनय-निगमन १६ ९. उपसंहार २२, हेतु पक्ष का धर्म होता है १६ मूल ग्रन्थ तथा अनुवाद २३. पक्षधर्म हेतु व्याप्तिमान होता है१८ १. मंगलाचरण १ २४. अपक्षधर्म हेतु नही होता १९ २. प्रमाण का लक्षण २५. हेतु के लक्षण का समारोप २० ३. प्रत्यक्ष प्रमाण के भेद २ २६. अन्वयव्यतिरेकी अनुमान २१ ४. इन्द्रिय प्रत्यक्ष २ २७. केवलान्वषी अनुमान २२ ५.मानस प्रत्यक्ष ३ २८. केवलव्यतिरेकी अनुमान २३ ६. अवग्रह आदि ज्ञान २९. अनुमान के तीन मेद २५ ७. योगिप्रत्यक्ष-अवधिज्ञान ४ ३०. अनुमानाभास ૨૧ ८. मनःपर्याय ज्ञान ३१. असिद्ध के भेद २७ ९. स्वसंवेदन प्रत्यक्ष ६ ३२. सपक्ष के होते हुए विरुद्ध १..प्रत्यक्षाभास ६ के भेद ३. M (२) ५४ ५५ ३१ ३३. सपक्ष के अभाव में विरुद्ध के भेद ३४. पक्षव्यापक अनैकान्तिक के भेद ३५. पक्षकदेशी अनैकान्तिक के भेद ३६. अकिंचित्कर ३७. अनध्यवसित ३८. कालात्ययापदिष्ठ ५४. असिद्धाटिसमा ५५. अन्यतगसिद्धसमा ५६. प्राप्तिसमा-अप्राप्तिसमा ५७. प्रसंगसमा ५८. प्रतिष्टान्तसमा ५९. उत्पत्तिसमा ५७. ५८ ५८ ३ ६०. सशयसमा ५९. ६१. प्रकरणममा ३९. प्रकरणसम १ ४०. अन्वयदृष्टान्ताभास ६१ m. है ६२. अहेतुममा ४० ६३. अर्थापत्तिसमा ४२ ६४, अविशेषसमा ४३ ६५. उपपत्तिसमा ६२ ६६. उपलब्धिसमा-अनुप- ४३ लब्धिसमा ४५ ६७. नित्यसमा व अनित्यसमा . ६३. ४७ ६८. कार्यसमा ४८ ६९. जातियों की सस्या ६५ ४८ ७०. निग्रहस्थान ४९ ७१. प्रतिज्ञाहानि प्रतिज्ञान्तर ५१ ७३, प्रतिनाविरोध ६७ ५१ ७४. प्रतिज्ञासंन्यास ५२ ७५. हेत्वान्तर ५३ . ७६. अर्थान्तर ५४ ७७ निरर्थक ६९ - ४६. ४१ व्यतिरेक दृष्टान्ताभास ४२. दृष्टान्ताभासों में व्याप्ति की विकलता ४३. तर्क ४४. तर्क के दोष ४५. छल वाक्छल ४७. सामान्यफल ४८. उपचाग्छल .४९. नातिया ..५०. साधर्म्यसमा-वैधर्म्यसमा ५१. उत्कर्षसमा अपकर्षसमा ५२. वर्ण्यसमा-अवर्यसमा -:५३. विकल्पसमा - ७२. - (३) ६९ १०२. पत्र के विषय में जय ७८. अविज्ञातार्थक ७९, अपार्थक और पराजय ८०. अप्राप्तकाल १०३. वाद और जल्प " १०४. चार कथाएं ९१ १०५. तीन कथाएं ८१. हीन ८२. अधिक ८३. अन्य निग्रहस्थान ७१ ८४. निग्रहरथानों का उपसंहार ७२ ८५. छल आदि का प्रयोग ७३ १०६, वाद के लक्षण का खण्डन ९४ १०७. जल्प के लक्षण का स्वण्डन ९६ ८६.वाद १०८. वाद और जल्प मे भेद नही ९७ ७३ ८७. व्याख्यावाद १०९. क्या वाद का साधन ७६ प्रमाण है ? ९९ ८८. गोष्ठीवाद ८९. विवादवाद ९०. वाद के चार अंग ७७ ११०. क्या वाद का साधन तर्क है? ९१. सभापति ७९ १११. क्या वाद का सिद्धान्त ९२. सम्य ८० १०२ ८२. ९३. पक्षपात की निन्दा ९४. वादी और प्रतिवादी अविरुद्ध होता हैं? ११२. वाद के पाच अवयव ११३. वाद और अनुमान में भेद ८३ ९५, तात्विक वाद ८४ ९६. प्रातिभवाद ८५ ११४. पाच अवयवों का ८६ ९७. नियतार्थवाद ९८. परार्थनवाद दूसरा अर्थ १०५ ११५. वाद मे पक्ष और प्रतिपक्ष १०६ ९९. पत्र का लक्षण ८७ ११६, जल्प के लक्षण का स्वण्डन १०७ १००. पत्र के अंग ८८ ११७. वितण्डा के लक्षण १०१, पत्र का स्वरूप ८९ का खण्डन

(४)
११८. जल्प-वितण्डा तत्त्व के
१२५.द्रव्यप्रमाण
रक्षक नही है ११०
१२६. क्षेत्रप्रमाण
१२०
११९. वाद ही तत्व का रक्षक है १११
१२७. कालप्रमाण
१२१
१२०. क्या जल्प-वितण्डा विजय
१२८. उपमानप्रमाण
१२१
के लिए होते हैं ? ११२
१२९, अन्य प्रमाणों का
१२१. वाद विजय के लिए
अन्तर्भाव
१२३
होता है
१२२. वाद और जल्प में अभेद ११५
१३०. उपसहार
१२४
१२३. आगम
तुलना और समीक्षा १२५-१५६
१२४. आगमाभास
११८ श्लोकसूची
१५७-५८
११७ तुलना

GENERAL EDITORIAL Bhāvasena-Traividya belongs to Mülasamgha and Senagana. He is well-known as a successful disputant. He bears the title Traividya which indicates his proficiency in Vyākarana, Nyāya and Siddhānta. He is to be assigned to the latter half of the thirteenth century A. D. Additional details about him and his works are already given in the Introduction to the V1śvatattva-Prakāśa, published, in this Series, as No. 16. One more work, the Pramāprameya, of Bhāvasena is being presented in this volume along with Hindi translation etc. The title of the text is differently mentioned by the author bimself. It is called Pramāprameya in the opening verse, but at the end of the work it is described to be the first Pariccheda, Pramāna-nirūpana by name, of the Siddhā. ntasära-Mokşaśāstra. Obviously then it is a part of a bigger work which has not come to light so far. Its contents, however, make it a self-sufficient unit. In a way the topics dealt with here are complimentary to those in the Visvatattva-Prakāśa which too, like this work, is an opening portion of a bigger treatise. The Pramāprameya is a manual and presents in a simple style the details about Pramāna as understood in Jaina metaphysics and logic. The treatment is more of the Nyāya pattern and very well suited to introduce the students into the preliminaries of Jaina Nyāya. The author's discussion about anumāna, ābhāsa, vāda etc, is exhaustive. Bhāvasena has presented a useful .manual the duscussion in which is founded on the fundamentals of Jainism but absorbs a good .dcal of the Nyāya school.

(ii) Our sincere thanks are due to Dr. V.P. JOHRAPURKAR whoplaced this valuable edition of the Pramāprameya at our disposal for publication Besides the Hindi translation of the text, he has added valuable Notes at the end which will help the reader to grasp allied material from other works. It is hoped that he would bring to light other unpublished' works of Bhấyasena, of the Mss (now in Germany) of which we bave been able to secure the microfilm copies. gives us pleasure to record our sincere gratitude to the members of the Trust Committee and Prabandhasamiti of the Sangha for their keen interest in the progress of the Jivarāja Jaina Granthamālā It is a pleasure to be guided by the President of the Trust Committee, Shriman GULAB- CHAND HÜRACHANDAJI who shows enlightened liberalism in shaping the policy of the Granthamālā Further, we offer our sincere than's to Shriman WALCHAND DEVACAANDAJI and to Shriman MANIKCHANDA VIRACHANDAJI Who are taking active interest in these publications But for their co-operation. and help it would have been difficult for the General Editors to pilot the various publications from a distance Kolbapur Jabalpur -7-1-1966 A. N UPADHYR HL JAIN General Editors. 1 1 1 preto INTRODUCTION (Summary of Hindi Prastāvanā) The Pramāprameya is the second philosophical treatise - of Bhāvasena coming to light We have given detailed infor= mation about the author in our introduction to his V 16vatattvaprakāśa. He was a prominent teacher of the Sena-gana and flourished in the latter half of the 13th century He wrote two books on grammar and eight on logic and metaphysics This book is styled as the first chapter of Siddhāntasāra. Moksaśāstra, containing discussion about Jaina theories of valid knowledge (pramāna) Probably the latter part of the book was devoted to the subjects of valid hoowledge prameya) but iis existence is not known We may note here that Tiszatattraprakāsa is also styled by the author as the first chapter of a Moksasāstra. In a way, these two books are complimentary to each other We have prepared this edition from the Nāgarī transscript of a palm-leaf manuscript in Kannada characters obtained from the Jaina Matha of Humcha through the kind co-operation of Swami DEVENDRARĪRTIJI The transcript was prepared by Mr PADMANABHA SHARMA of Mysore The MS is in a fairly good condition The text is obscure in only one or two places As noted above, the book contains a discussion of the Jaina theories of valid bnowledge. The author has tried to synthesise the traditional Jaina theories with the thenavailable Buddhist and Nyāya doctrines He diyiges directknowledge (pratyaksa) in four categories . sensation, mental (iv) consciousness, self-consciousness and the knowledge of the Yogins. His description of the nature of reason (hetu) mainly follows the Nyāya views. Various faults in a debate (jāti and nu grahasthāna) are also described according to the Nyāya tradition The author criticises the three or four types of debate (vāda, jalpa and vitandā) described in the Nyāya Sūtra. He classifies the debate in three (oyākhyā, gosthi and vivāda) or four (tāttoika, prātıbha, niyatārtha and parārthana) types. He devotes the concluding paragraphs to various methods of counting and measurements, and includes them in Karana-Pramāna. Though smaller in size than the Visvakattoaprakāša, this book is more important, as it brings to light a new approach to the problems of Jaina epistemology. We hope that other Works of Bhāvasena will also be published in pear future प्रस्तावना १. प्रारम्भिक--आचार्य भावसेन त्रैविद्यदेव का विश्वतत्त्वप्राश नामक ग्रन्थ कुछ ही समय पहले इसी ग्रन्थमाला में प्रकाशित हुआ है। उन का न्यायविषयक दूसरा ग्रन्थ 'प्रमाप्रमेय ' अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं । २. ग्रन्थकार--इस ग्रन्थ के कर्ती आचार्य भावसेन का विस्तृत परिचय हमने विश्वतत्त्वप्रकाश की प्रस्तावना में दिया है। अतः यहा उस का सारांश ही देना काफी होगा । अन्थकार मूलसव, सेनगण के आचार्य थे। विद्य यह उन की उपाधि थी अर्थात वे व्याकरण, तर्क और आगम इन तीन विद्याओं में पारंगत थे। उन के समाधिमरण का स्मारक आन्ध्र प्रदेश के अनन्तपुर जिले में अमरापुरम् ग्राम के समीप है । इस स्मारक का शिलालेख कन्नड भाषा में है तथा विश्वतत्त्वप्रकाश की प्रशस्ति के कुछ पद्य भी कन्नड में है। अतः ग्रन्थकार भी कन्नडभापी रहे होंगे ऐसा प्रतीत होता है। उन के नाम से ग्रन्थसूचियों में निम्नलिखित ग्रन्थों का पता चलता है- १. विश्वतत्वप्रकाश, २. कातन्त्ररूपमाला, ३. प्रमाप्रमेय, ४. सिद्धान्तसार, ५. न्यायसूर्यावली, ६. भुक्तिमुक्तिविचार, ७. सप्तपदा टीका, ८. शाकटा- यनव्याकरण टीका, ९. न्यायदीपिका तथा १०. कथाविचार | इन में से पहले दो प्रकाशित हो चुके हैं । तीसरा इस पुस्तक में प्रकाशित हो रहा है। चौथे, पाचवें तथा छठवें ग्रन्थ के सूक्ष्मचित्र जर्मनी से प्राप्त हुए है किन्तु . उन के अध्ययन का प्रबन्ध अभी नहीं हो सका है। शेप ग्रन्थों के बारे में अधिक विवरण नहीं मिल सका है। ग्रन्थकार का समय तेरहवीं सदी के उत्तरार्ध में अनुमानित है । उन्हों ने बारहवीं सदी तक के ग्रन्थों का उपयोग किया है तथा तुरुष्कशास्त्र का उल्लेख किया है, अत. सन १२५० यह उन के समय की पूर्वमर्यादा है। उन की कातन्त्ररूपमाला की एक प्रति सन १३६७ की लिखी है, यही उन के समय की उत्तरमर्यादा है। ३. प्रस्तुत ग्रन्थ का नाम--ग्रन्थकर्ता ने इस ग्रन्थ के नामका दो प्रकार से उल्लेख किया है - प्रथम श्लोक में प्रमाप्रमेय यह नाम AN-KH M (२) दिया है तथा अन्तिम पुष्पिका में इसे सिद्धान्तसार मोक्षशा का प्रमाण- 'निरूपण नामक पहला परिच्छेद बतलाया है। इन मे स हम ने पहला नाम ही शीर्षक के लिए उपयुक्त समझा है क्यों कि एक तो उस का उल्लेख पहले हुआ है, दूसरे, वह अन्य के विषय के अनुरूप है तथा अन्यसूचियों में भी वही उल्लिखित है । ग्रन्थकता द्वारा उल्लिखित दुसरे नाम के सिद्धान्तसार तथा मोक्षशास्त्र ये दोनों अंश दूसरे ग्रन्थों के लिए प्रयुक्त हेतेि आये हैं - जिनचन्द्रकृत सिद्धान्तसार माणिकचन्द्र ग्रन्यमाला में प्रकाशित हो चुका है तथा नरेन्द्रसेनकृत सिद्धान्तसारसग्रह इसी जीवराज ग्रन्थमाला में प्रकाशित हुआ है - अत इस नाम को हम ने गौण स्थान दिया है। उस नाम से ग्रन्थ के विषय का बोध भी नही होता। ४. विश्वतत्वप्रकाश तथा प्रमाप्रमेय----यहा एक बात ध्यान देने योग्य है कि प्रमाप्रमेय को ग्रन्थकार ने सिद्धान्तसार-मोक्षशास्त्र का प्रमाण- निरूपण नामक पहला परिच्छेद बताया है, इस से अनुमान होता है कि इस ग्रन्थ का अगला परिच्छेद प्रमेयों के वारे में होगा। इसी प्रकार विश्व- तत्त्वप्रकाश-मोक्षशास्त्र के पहले परिच्छेद के अन्त में आचार्य ने उसे अशेष- परमतविचार यह नाम दिया है, इस से अनुमान होता है कि उस के दूसरे परिच्छेद में स्वमत का समर्थन होगा। दुर्भाग्य से इन दोनों ग्रन्थों के उत्तरार्ध प्राप्त नही हैं । एकतरह से ये दोनों पूर्वार्ध एक-दूसरे के पूरक हैं क्यो कि इस प्रमानमेय में प्रमाणों का विचार है तथा विश्वतत्त्वप्रकाश में प्रमेयों का विचार हैं। ५. प्रमाप्रमेय तथा कथाविचार--ग्रन्थकर्ता ने विश्वतत्त्वप्रकाश में तीन स्थानों पर कथाविचार नाम का उल्लेख करते हुर सूचित किया कि उस में अनुमानसबंधी विविध विषयोंकी चर्चा है । वे प्रायः सब विषय इस प्रमाप्रमेय में वर्णित हैं। तथा इत्त के परिच्छेद १०३ से १२२ तक विशेष रूप से कथा (वाद के प्रकारों) का ही विचार किया गया है। अतः सन्देह होता है कि आचार्य ने इसी अंश का विश्वतत्त्वप्रकाश में उल्लेख किया होगा। किन्तु यह भी सभव है कि इस विषय पर उन्हों ने .

(३) कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ भी विस्तार से लिखा हो क्यों कि शब्द के अनित्यत्व के विपत्र में प्राभाकर मीमासको के मत का खंडन इस प्रमाप्रमेय में नही पाया जाता जिसका उल्लेख विश्वतत्त्वप्रकाश पृ. ९३ पर है। ६. सम्पादनसामग्री--इस ग्रन्थ की एकमात्र ताडपत्रीय प्रति के दर्शन हमने हुम्मच के श्रीदेवेन्द्रकीर्ति स्वामीजी के मठ में किये थे। यह प्रति कन्नड लिपि में है। मैसूर के श्री पद्मनाभ शर्मा के सहयोग से इस का देवनागरी रूपान्तर हमे प्राप्त हुआ। मठ से प्रति प्राप्त करने में श्रीमान पडित भुजवलि शास्त्रीजी का सहयोग भी उल्लेखनीय रहा। इसी प्रति से यह संस्करण तैयार किया गया है । प्रति बहुत शुद्ध है । केवल एक स्थान पर (परिच्छेद २५ में ) हम अर्थनिर्णय करने में असफल रहे हैं । जैसा कि ऊपर कहा है - यह ग्रन्थ एक वडे ग्रन्थ का पहला परिच्छेद है । अतः इस में किसी उप- विभाग या प्रकरण आदि का विभाजन नहीं है। अध्ययन तथा अनुवाद की सुविधा के लिए हमने इसे १३० परिच्छेदों में विभक्त किया है तथा विषयानुसारी शीर्षक दिये है । अनुवाद प्रायः शब्दश. किया है तथा स्पष्टी- करण का भाग ब्रैकेटों मे रखा है। ७ प्रमुख विषय-इस ग्रन्थ में आचार्य ने प्रमाण अर्थात यथार्थ ज्ञान के स्वरूप से संबवित सभी विषयों का वर्णन किया है। प्रथम परिच्छेद में मंगलाचरण तथा विषयनिर्देश करने के बाद दूसरे परिच्छेद में प्रमाण का लक्षण सम्यक् ज्ञान अथवा पदार्थयाथात्म्यनिश्चय यह बतलाया है। परि० ३ से १० तक प्रत्यक्ष प्रमाण तथा उस के चार भेदों का - इन्द्रियप्रत्यक्ष, मानसप्रत्यक्ष, योगिप्रत्यक्ष एवं स्वसंवेदनप्रत्यक्ष का वर्णन है। परि. ११ से १५ तक परोक्ष प्रमाण तथा उसके प्रकारो का - स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क व ऊहापोह का वर्णन है। परोक्षं प्रमाण का सब से महत्त्वपूर्ण प्रकार अनुमान है, उस के छह अवयवों का पक्ष, साध्य, हेतु, दृष्टान्त, उपनय, तथा निगमन का वर्णन परि. १६ से २१ तक है। इन अवयवों में से हेतु लक्षण की विशेष चर्चा परि. २२ से २५ तक है। परि. २६ से २८ तक अनुमान के तीन प्रकार बतलाये हैं - केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी तथा अन्वयव्यतिरेकी । परि. २९ में इस से भिन्न प्रकार भी बतलाये हैं - दृष्ट, - के (४) है। पर. सामान्यतोदृष्ट तथा अदृष्ट । अनुमान के आभास के संबंध में असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक, अनव्यवसित, कालात्ययापदिष्ट, अकिंचित्कर तथा प्रकरणसम इन सात हेत्वाभासों का वर्णन परि. ३० से ४२ तक है। परि. ४३-४४ में आत्माश्रय, इतरेतराश्रय आदि तर्क के प्रकार तथा उन के दोषों का वर्णन है । परि. ४५ से ४८ तक छल तथा उस के तीन प्रकारों का - वाक्छल, सामान्यछल और उपचारछल का वर्णन हैं। परि. ४९ से १९ तक जाति अर्थात झूठे दृषणों के चौबीस प्रकारों का वर्णन ७० से ८५ तक निग्रहस्थान अर्थात वाढ में पराजय होने के कारणों के वाईस प्रकारों का वर्णन है । परि. ८६ से ९८ तक वाट के प्रकारों तथा अंगों का वर्णन है | व्याख्यावाढ, गोष्ठीवाद तथा विवादबाद ये वाढ के तीन प्रकार हैं । अथवा तात्त्विक, प्रातिम, नियतार्थ एवं पर्थिन ये वाद के चार प्रकार हैं । तथा सभापति, सभासद, वादी और प्रतिवादी ये वाद के चार अंग हैं। परि. ९९ से १०२ तक पत्र तथा उस के अंगो का वर्णन है। परि. १०३ से १२२ तक वाद और जल्प के न्याय-दर्शन में कहे गये लक्षणों का खण्डन करके बाद और जत्प में अभेद स्थापित, किया है। परि. १२३-१२४ में आगम तथा उस के आभास का वर्णन है। परि. १२५ से १२८ तक करण प्रमाण अर्थात नापतील की पद्धतियों का वर्णन है। परि. १२९ में अन्य दर्शनों में वर्णित प्रमाणों का उपर्युक्त व्यवस्था में समावेश करने की रीति बतलाई है तथा परि. १३० में अन्तिम पुष्पिका है। ८. कुछ प्रमुख विशेषताएं--आचार्य ने प्रमाण के विविध विषयों पर जो विचार व्यक्त किये हैं उन की अन्य जैन - सेनेतर आचार्यों के विचारों से तुलना करने का प्रयास हमने अन्तिम टिप्पणों में किया है। यहां इस तुलना से ज्ञात होनेवाली कुछ प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करते हैं। (अ) प्रमाण के लक्षण में अपूर्वार्थ या अनधिगतार्थ के ग्रहण जैसा, कोई शब्द नही है। (आ) प्रत्यक्ष प्रमाण के चार भेद किये हैं- इन्द्रियप्रत्यक्ष, मानस प्रत्यक्ष, योगिप्रत्यक्ष, स्वसंवेदनप्रत्यक्ष । ४ (५) (इ) परोक्ष प्रमाण के छह भेद किये हैं - स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, ऊहापोह, अनुमान, आगम । (ई) अनुमान के छह अवयव माने हैं - पक्ष, साध्य, हेतु,' दृष्टान्त, उपनय, निगमन । (उ) हेतुका लक्षण अन्यथानुपपत्ति न मानकर व्याप्तिमान पक्षधर्म होना माना है। (ऊ) अनुमान के दो प्रकारों से भेद किये हैं - केवलान्वयी, केवल- व्यतिरेकी तथा अन्वयव्यतिरेकी; दृष्ट, सामान्यतोदृष्ट, अदृष्ट । (ऋ) हेत्वाभासो के सात प्रकार किये है-असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक, अकिंचित्कर, अनध्यवसित, कालात्ययापदिष्ट तथा प्रकरणसम । (ऋ) आत्माश्रय, इतरेतराश्रय आदि के लिए भी तर्क शब्द का प्रयोग किया है। (ल.) जातियोंकी संख्या बीस बतलाई है। (ए) वाद के तीन (व्याख्या, गोष्टी, विवाद) तथा चार (तात्त्विक, प्रातिभ, नियतार्थ, परार्थन) प्रकार बतलाये है । (ऐ) वाढ और जल्प में भेद होने का प्रबल खण्डन किया है । (ओ) करणप्रमाण के अन्तर्गत द्रव्य, क्षेत्र तथा काल के नापने के प्रकार वतलाये है। (औ) उपमानप्रमाण के अन्तर्गत आगमिक परंपरा के पल्य, रज्जु आदि की गणना भी बतलाई है । इन बातों के अवलोकन से स्पष्ट होगा कि जहा आचार्य ने प्राचीन जैन आगमिक परम्परा के भावप्रमाण, करणप्रमाण, प्रत्यक्ष-परोक्ष आदि भेदों को सुरक्षित रखा है, वहा प्रत्यक्ष के भेद, हेतु का लक्षण, हेत्वाभास आदि के वर्णन में बौद्ध तथा नैयायिक विद्वानों के विचारों से भी लाभ उठाया है। जैन जेनेतर विचारों के समन्वय की इस दृष्टि से यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।

(६) ९. उपसंहार-आचार्य भावसेन का यह दूसरा न्यायविषयक ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है। उन के पहले अन्य विश्वतत्त्वप्रकाश की तुलना में यह ग्रन्थ काफी छोटा है तथा प्रत्येक विषय की साधक-बाधक चर्चा भी में उतने विस्तार से नहीं है । तथापि विचारों की स्वतन्त्रता की दृष्टि इस का महत्त्व अधिक सिद्ध होगा। हमें आशा है कि आचार्य के शेष ग्रन्थों के प्रकाशन का प्रबन्ध भी निकट भविष्य में हो सकेगा। इस ग्रन्थ की प्रति की प्राप्ति के लिए हम श्रीदेवेन्द्रकीर्ति स्वामीजी, हुम्मच, श्री. पंडित मुजवलि शास्त्रीजी, मुडविद्री तथा श्री. पद्मनाम शर्मा, मैसूर के बहुत आभारी हैं। इस के प्रकाशन की स्वीकृति के लिए आदरणीय डॉ. उपाध्येजी तथा डॉ. हीरालालजी के प्रति भी हम कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। जावरा दीपावली शक १८८६ विद्याधर जोहरापुरकर .

श्री-भावसेन-विद्यदेव-विरचितं प्रमाप्रमेयम् [सिद्धान्तसार-मोक्षशास्त्रस्य प्रथमः परिच्छेदः ] ॥ नमः सिद्धेभ्यः॥ [१ मङ्गलाचरणम् ] श्रीवर्धमानं सुरराजपूल्यं साक्षात्कृताशेपपदार्थतत्त्वम् । सौस्याकरं मुक्तिपतिं प्रणम्य प्रमाप्रमेयं प्रकटं प्रवक्ष्ये ॥१॥ वालव्युत्पत्त्यर्थ शास्त्रमिदं रच्यते मया स्पष्टम् । उद्देशलक्षणादी सोढव्यं विश्वविद्वद्भिः ॥२॥ [२. प्रमाणलक्षणम् ] मथ किं प्रमाणम् । पदार्थयाथात्म्यनिश्चयः प्रमाणम् । तच्च भाव- प्रमाणं करणप्रमाणमिति द्विविधम् । प्रमिति प्रमाणमिति भावव्युत्पत्त्या [ अनुवाद] देवों के राजा-इन्द्रों द्वारा पूजित, सुख के आकर - श्रेष्ठ निधि, मुक्ति के स्वामी, तथा समस्त पदार्थों के स्वरूप को जिन्हों ने साक्षात्-प्रत्यक्ष जाना है उन श्रीवर्धमान-महावीर जिन को प्रणाम कर के मैं प्रमाप्रमेय-प्रमाण तथा उन के विपयों का स्पष्ट वर्णन करूंगा ।। अज्ञानी लोगो को ज्ञान कराने के लिए मै इस शास्त्र की स्पष्ट रूप से रचना करता हूं। इस के उद्देशों-सज्ञाओं में तथा लक्षणों-- व्याख्याओं आदि में (कोई त्रुटि हो तो उसे ) समस्त विद्वान सहन करें ( क्षमा कर के सुधारें)॥ प्रमाण का लक्षण प्रमाण क्या है ? पदार्थ के वास्तविक स्वरूपके निश्चय को (-यथार्थ ज्ञान को) प्रमाण कहते हैं। उसके दो प्रकार हैं - भाव प्रमाण तथा करण - प्रमाप्रमेयम् [१.३- सम्यक् ज्ञानमेव प्रमाणम् । प्रकर्येण संशयविपर्यासानध्यवसायव्यवच्छे- देन मीयते निश्चीयते वस्तुतत्त्वं येन तत् प्रमाणमिति करणव्युत्पत्त्या सम्यक्झानसाधनं प्रमाणम् । तत् प्रत्यक्षं परोक्षमिति द्विविधम् ॥ [३. प्रत्यक्षप्रमाणभेदाः] तत्र पदार्थानां साक्षात् प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन वेदनं प्रत्यक्षम् । तत्साधनं च । तच इन्द्रियप्रत्यक्ष मानसप्रत्यक्ष योगिप्रत्यक्ष स्वसंवेदन- प्रत्यक्षमिति चतुर्धा ॥ [४. इन्द्रियप्रत्यक्षम् ] आत्मावधानेनान्यत्रमनसा सहकृतात् निर्दुम्नेन्द्रियात् जातम् इन्द्रियप्रत्यक्षम् । इन्द्रियं च स्पर्शनरसनत्राणचक्षुश्रोत्रेन्द्रियमिति पञ्च- विधम् । तत् प्रत्येकं द्रव्यभावमेदात् द्विविधम् । निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्ये- न्द्रियम् । तत्र निर्वृत्तिः नानाक्षुकुन्दफुड्मलमसूरयवनालीसंस्थाना। प्रमाण । प्रमिति ही प्रमाण है इस भाव-व्युत्पत्ति के अनुसार सम्यक् ज्ञान ही प्रमाण है । उत्तम रीतिते अर्थात् संशय, विपर्यास तथा अनिश्चय को दूर कर के जो वस्तुतत्त्वका का निश्चय करता है वह प्रमाण है इस करण-व्युप्तत्ति के अनुसार सम्यक् ज्ञान का सावन प्रमाण कहलाता है | प्रमाण के दो प्रकार हैं-प्रत्यक्ष तथा परोक्ष । प्रत्यक्ष प्रमाण के भेद साभात अर्थात दूसरे ज्ञान के व्यवधान के विना जो पदार्थों का जानना है वह प्रत्यक्ष प्रमाण है। टस जानने के साधन को भी प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं । उस के चार प्रकार हैं - इंद्रिय प्रत्यक्ष, मानस प्रत्यक्ष, योगिप्रत्यक्ष तथा स्वसंवेदन प्रत्यक्ष । इन्द्रिय प्रत्यक्ष आत्मा का अवधान होने पर तथा मन व्यग्र न हो उस समय - इन दोनों के सहकार्य से निर्दोष इंद्रिय से प्राप्त होनेवाला ज्ञान इंद्रिय-प्रत्यक्ष है। इदिर पाच प्रकार के हैं - स्पर्शन, रसन, प्राण, चक्षु तथा श्रोत्र | इन में प्रत्येक के दो प्रकार हैं - द्रव्य-इन्द्रिय तया भाव-इन्द्रिय । द्रव्येन्द्रिय के दो भाग ३ - निवृत्ति तथा उपकरण | इन में निवृत्ति ( इन्द्रिय का अन्तर्भाग) (सर्शनेन्द्रिय के लिर) कई प्रकारको, (रमनेन्द्रिय के लिए) खुरपी के मानसप्रत्यक्ष स्पशन- उपकरणं सर्वाङ्गत्वजितानासागोलकपक्ष्मपुटकर्णशष्कुलीविवरप्रभृति। मनसो हृदये अष्टदलपद्माकारं द्रव्येन्द्रियम् । लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम्। तत्र ज्ञानावरणक्षयोपशमः लब्धिः। आत्मनो ग्रहणव्यापार उपयोगः । -स्पर्श रसगन्धरूपशव्दात्मस्मृत्यादयो विपयाः॥ [५. मानसप्रत्यक्षम् ] आत्मावधानेन सहकृतात् मानसात् जातं मानसप्रत्यक्षम् । रसनत्राणश्रोत्रेन्द्रियं प्राप्ता] ज्ञानजनकम्। चक्षुरप्रातार्थे । मानसं स्वात्मनि आकार की, (घ्राणेन्द्रिय के लिए ) कुन्द की कली जैसी, (चक्षु इन्द्रिय के लिए ) मसूर के दाने जैसी तथा ( कर्ण इन्द्रिय के लिए ) जौ की नाली जैसी होती है । ( स्पर्शनेन्द्रिय के लिए ) उपकरण' सपूर्ण शरीर की त्वचा है, (रसनेन्द्रिय के लिए) जीभ, (घ्राणेन्द्रिय के लिए) नाक गोल भाग, (चक्षु इन्द्रिय के लिए ) पलके, तथा (कर्ण इन्द्रिय के लिए) कान का शकुलीविवर उपकरण होता है । हृदय स्थान में आठ पखुडियो के कमल के आकार का मन है, वह मन के लिए द्रव्येन्द्रिय (द्रव्य मन) समझना चाहिए । भावेन्द्रिय के दो भाग है - लब्धि तथा उपयोग। ज्ञाना- वरण कर्म के क्षयोपशम को लब्धि कहते हैं। आत्मा द्वारा (पदार्थ के) ग्रहण (जानने ) के लिए प्रयत्न करना यह उपयोग कहलाता है । स्पर्श, रस, गन्ध, रूप, शब्द तथा अपना स्वरूप एवं स्मृति आदि (इन इन्द्रियों के तथा मन के) विपय हैं। का मानस प्रत्यक्ष आत्मा के अवधान के सहकार्य से मन द्वारा जो ज्ञान प्राप्त होता है वह मानस प्रत्यक्ष है । स्पर्शन, रसन, प्राण तथा श्रोत्र ये इद्रिय प्राप्त अर्थ का (- जिस से सपर्क हो उसी पदार्थ का ) ज्ञान कराते हैं। चक्षु अप्राप्त अर्थ (जिस से सपर्क न हो उस पदार्थ ) का ज्ञान कराता है। आत्मा तथा उसकी बुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, द्वेप एव प्रयत्न के प्रात होने पर मन उन के विषय में प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न करता है । स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, ऊहापोह, ४ प्रमाप्रमेयम् [१.६- तदीयबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेपप्रयत्ले च प्राप्ते प्रत्यक्षं ज्ञानं जनयति । स्मृति- प्रत्यभिज्ञानोहापोहतर्कानुमानागमादिपरोक्षज्ञानम् अप्राप्ते जलयति ॥ [६. अवग्रहादयः] अनभ्यस्ते विषये सर्वेन्द्रियेभ्यः अवग्रहावायधारणाज्ञानानि जायन्ते। तत्र इन्द्रियार्थसंवन्धादुत्पन्नमाद्यज्ञानम् अवग्रहः। अयमेकः पदार्थ इति । अवग्रहगृहीतार्थे विशेषप्रतिपत्तिः ईहा। पुरुपेणानेन भवि-- तव्यमिति । ईहितार्थे निर्णयः अवायः। पुरुप एवायमिति । कालान्तरा- विस्मरणहेतुसंस्कारजनक धारणाजानम् । स एवायं वृक्षः इति । अभ्यस्त- विषये त्वादावेव अवायधारणे जायेते । न त्ववग्रहेहे ॥ [७. योगिप्रत्यक्षम्--अबधिज्ञानम् ] ध्यानविशेषादावरणक्षयात् विशुद्धात्मान्तःकरणसंयोगात् जातम सकलपदार्थस्पष्टावभासः योगिप्रत्यक्षम् । ज्ञानावरणस्य विशिष्टक्षयोपश-- तर्क अनुमान तथा आगम इत्यादि परोक्ष ज्ञान अप्राप्त अर्थ के विषय में मनः उत्पन्न करता है। अवग्रह आदि ज्ञान जब विषय परिचित नही हो तब सब इन्द्रियों से उस के बारे में अवग्रह, ईहा, अवाय तथा वारणा ये ज्ञान होते हैं। यह एक पदार्थ हैं इस तरह इन्द्रिय और पदार्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाला प्राथमिक ज्ञान अवग्रह कहलाता है । अवग्रह से जाने हुए पदार्थ के विषय में विशेष विचार को ईहा कहते हैं, जैसे - यह पुल्प होना चाहिए। ईहा से जाने हुए पदार्थ के बारे में निश्चय होना यह अवाय ज्ञान है, जैसे-यह पुरुपही है। समय वीतने पर भी उस पढार्थ को न भूलने के कारणभूत संस्कार को उत्पन्न कर वह धारणाबान है, जैसे यह वही वृक्ष हैं। परिचित विषय के बारे में पहले ही अवाय तथा वारणा ज्ञान होते हैं, अवग्रह तथा ईहा ज्ञान नहीं होते ! योगिप्रत्यक्ष -- अवधिज्ञान- विशिष्ट ध्यान से (जानके ) आवरण का क्षय होने पर विशुद्ध आत्मा का अन्तःकरण से संयोग होने पर जो सभी पदार्थों का स्पष्ट ज्ञान ।

-१.७] योगिप्रत्यक्ष माजातम् अवधिमनःपर्यायज्ञानमीषद्योगिप्रत्यक्षम्। पुद्गलान् संसारि- जीवान् अवधीकृत्य जानातीत्यवधिनानम् , देशपरमसर्वावधिसेदात् त्रिविधम् । तत्र देशावधि भवप्रत्ययो गुणप्रत्ययश्च । भवप्रत्ययो देशावधे. मध्यमः। स च तीर्थकरकुमारदेवनारकाणां सर्वाङ्गोत्थः। गुणप्रत्ययः मनुष्यतिरश्चां नामरुपरितनस्वस्तिकनन्द्यावर्तादिशुभचिह्नोत्थः। तद्- विभङ्गो नारधस्तनद१राद्यशुभचिह्नोत्थः। देशावधेर्जघन्यः सामान्य- मनुप्यतिरश्वाम् । उत्कृष्टः संयतानामेव । ऋजुमतिमन पर्यायश्च । गुण- 'प्रत्ययावधौ अनुगाम्यननुगाम्यवस्थितानवस्थितवर्धमानहीयमानभेदाश्च । परमावधिसर्वावधी चरमशरीरविरतानामेव । विपुलमतिमनःपर्यायश्च ।। होता है उसे योगिप्रत्यक्ष कहते हैं। ज्ञान के आवरण के विशिष्ट अयोपशम से उत्पन्न हुए अवधिज्ञान तथा मनःपर्यायज्ञान ईपयोगि- प्रत्यक्ष हैं। पुद्गल तथा संसारी जीवों को विशिष्ट अवधि (मर्यादा) तक जानता है उसे अवविज्ञान कहते हैं। उस के तीन प्रकार हैं - देशावधि, परमावधि तथा सर्वावधि । देशावधि दो प्रकार का होता है-भवप्रत्यय तथा गुण- 'प्रत्यय । भवप्रत्यय (विशिष्ट जन्म के कारण प्राप्त होनेवाला) अवधिज्ञान देशा- चधि का मध्यम प्रकार है, वह तीर्थंकरो को बाल अवस्था मे तथा देवों और नारकी जीवों को (जन्मतः ) प्राप्त होता है तथा संपूर्ण शरीर में उद्भूत होता है । गुणप्रत्यय (तपस्या आदि विशिष्ट गुणों से प्राप्त होनेवाला ) अवधिज्ञान -मनुष्य तथा तिर्यचों (पशु-पक्षियों ) को प्राप्त हो सकता है तथा नाभि के ऊपर के स्वस्तिक, नन्द्यावर्त आदि शुभ चिन्हों से उद्भूत होता है ! इस ज्ञान का विभंग (मिथ्यात्व से युक्त गुणप्रत्यय अवविज्ञान) नाभि के नीचे के दर्दुर (मेंढक ) जैसे अशुभ चिन्हों से उद्भूत होता है। देशावधि का जघन्य प्रकार सामान्य मनुष्य तथा तिर्यंचों को प्राप्त हो सकता है। देशावधि का उत्कृष्ट प्रकार सिर्फ संयता ( महाव्रतधारी मुनियों ) को ही प्राप्त हो सकता है । ऋजु- मति मन पर्यायज्ञान भी सयतों को ही होता हैं। गुणप्रत्यय अवधिज्ञान के छह भेट होते हैं- अनुगामी (एक स्थान से दूसरे स्थान में साथ जाये वह ), अननुगामी (दूसरे स्थान में साथ न जानेवाला ), अवस्थित , जिस की जानने की शक्ति स्थिर हो), अनवस्थित (जिस की जानने की शक्ति कम-अधिक होती हो ), वर्धमान (बढनेवाला) तथा हीयमान (कम होनेवाला)। परमा- ६ प्रमाप्रमेयम् [१.८- . [८. मनःपर्यायज्ञानम् ] परमनसि स्थितमर्थ मनसा पर्येति जानातीति मनःपर्यायनानम् । प्रजुविपुलमती इति द्वैधम् । ऋजुमनोवाक्कायस्थितवर्तमानपुरुपचिन्ति" तमर्थ जानद् जुमति । ऋजुवक्रमनोवाक्कायस्थित-अनीतानागतवर्तमान- पुरुपचिन्तितमर्थ जानद् विपुलमति ।। [९. स्वसंवेदनप्रत्यक्षम् ] सकलज्ञानानां स्वस्वरूपसंवेदनं स्वसंवेदनप्रत्यक्षम् ।। [१०. प्रत्यक्षाभासः] मनःपर्यययोगिस्वसवेदनप्रत्यक्षादन्यत्र प्रत्यक्षाभासोऽपि। संशयविपर्यासभेदात् द्वेधा। अनध्यवसायस्य अभावत्वेन प्रत्यक्षाभासत्वा- वधि तथा सर्वावधि एवं विपुलमति मन पर्यायज्ञान केवल चरमशरीरी मुनियो को ( जो उसी जन्म के अन्त में मुक्त होंगे उन्हीं को ) प्राप्त होता है । मनःपर्याय ज्ञान दूसरे के मन में स्थित अर्थ-विचार आदि को मन से प्रात करे अर्थात जाने वह मनःपर्याय ज्ञान है। इस के दो प्रकार हैं- ऋजुमति तथा विपुलमति। सरल मन, वाणी तथा शरीर से युक्त वर्तमान समय के पुरुषों के विचारे हुए अर्थ को जाने वह ऋजुमति मन पर्याय ज्ञान है। भूतकाल, भविष्यकाल तथा वर्तमानकाल के सरल तथा वक्र दोनों प्रकार के मन, वाणी तथा शरीर युक्त पुरुषो के विचारे हुए अर्थ को जाने वह विपुलमति मनःपर्यायज्ञान है। स्वसंवेदन प्रत्यक्ष सभी ज्ञान अपने अपने स्वरूप को जानते हैं इसी ज्ञान को स्वसवेदन- प्रत्यक्ष कहते हैं। प्रत्यक्षामास मनःपर्याय, योगिप्रत्यक्ष तथा स्वसंवेदन प्रत्यक्ष को छोड कर अन्यत्र (दूसरे) प्रत्यक्ष ज्ञानों के आभास भी होते हैं । उस के दो प्रकार हैं-समय तथा विपर्यास । अनध्यवसाय (निश्चय का अभाव) प्रत्यक्षाभास नही है क्यों कि (ज्ञान का) अभाव यह उस का स्वरूप है (गलत ज्ञान को. से -१.१०] प्रत्यक्षाभास भावः। तत्र साधारणाकारदर्शनात् विशेषादर्शनात् उभयविशेषस्मरणात् संशयः। अयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति । वादिविप्रतिपत्तेः शब्दो नित्यः अनित्यो वेति । क्वचिदनुपलब्धेश्च अत्र पिशाचोऽस्ति न वेति। साधा- रणाकारदर्शनात् विशेषादर्शनात् विपरीतविशेषस्मरणात् विपर्ययः। पुरुषजानम्, रजौ सर्पवुद्धिः, शुक्तिकाशकले रजतप्रतिपत्तिः, मरीचिकायां जलाववोधः। अर्थानामप्रतिपत्तिः अनध्यवसायः। स च जानस्य प्रागभावः संस्काररहितप्रध्वंसाभावश्च, न तु गच्छत्तृणस्पर्शादि- ज्ञानम् , तस्यावग्रहादिनानत्वेन प्रमाणत्वात् । इति प्रत्यक्षप्रपञ्चः॥ आभास कहते हैं, अनध्यवसाय में निश्चय का अभाव हान से उसे सही या गलत नहीं कह सकते, अतः वह आभास नही है)। दो पदाथों मे सामान्य आकार के देखने से, उन के विशेष (अन्तर) के न देखने से तथा उन विशेषों के स्मरण से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान संशय कहलाता है । जैसे- यह टूठ है या पुरुष है । वादियों के मतभेद से शब्द नित्य है या अनित्य है (ऐसा संशय भी होता है)। कहीं कहीं कुछ ज्ञान न होने से भी संशय होता है, जैसे- यहां पिशाच है या नही । साधारण आकार के देखने से, विशेप के न देखने से तथा विरुद्ध विशेष के स्मरण से जो ज्ञान होता है उसे विपर्यय कहते हैं, जैसे ढूंठ को पुरुष समझना, रस्सी को सॉप मानना, सीप के टुकडे में चांदी का ज्ञान तथा मृगजल में जल का ज्ञान | पदार्थो के ज्ञान के न होने को अनध्यवसाय कहते हैं, वह ज्ञान का प्रागभाव है (ज्ञान होने पहले उसका जो अभाव है वह प्रागभाव कहलाता है) अथवा संस्काररहित प्रध्वसाभाव है ( ज्ञान नष्ट होने के बाद जो उस का अभाव है वह प्रध्वसा- भाव कहलाता है, ऐसा प्रध्वसाभाव जिस में पहले हुए ज्ञान का कोई संस्कार न बचे- अनध्यवसाय कहलाता है)। मार्ग में जाते दुए घासफूस आदि के स्पर्श के ज्ञान को अनध्यवसाय नही कहना चाहिए क्यों कि वह ज्ञान अवग्रह-ज्ञान होने से प्रमाण है (अत: उसे प्रत्यक्षाभास नहीं कह सकते)। इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाण का वर्णन पूरा हुआ।

प्रमाप्रमेयम् [१.११- -- अथ [११. परोक्षभेदाः] परोक्ष च आत्मावधानप्रत्यक्षादिकारणकं स्मृतिप्रत्यभिज्ञानोहापोह- तर्कानुमानागमभेदम् ॥ [१२. स्मृतिः] संस्कारोबोधजनिता तदिति प्रतीतिः स्मृतिः। स देवदत्तः इत्यादि। स्मृति प्रमाणं दत्तनिक्षेपादिपु प्रवृत्तिप्राप्तिग्रहणान्यथानुपपत्तेः। स्मृत्योद्योधितप्राक्तनानुभवात् देवदत्तादिपु प्रवृत्यायुपपत्ते अर्थापत्ते- रन्यथोपपत्तिरिति चेत् न। प्राक्तनानुभवस्य विनष्टस्य उद्बोधना- संभवात् । तथा हि-प्राक्तनानुभवो नोबुध्यते इदानीमविद्यमानत्वात् चिरविनष्टत्वात् रामादिवत् । प्रवृत्त्यादिहेत्वनुपपत्तश्च । तथा हि-प्राक्त- नानुभवो दत्तादिषु इदानींतनप्रवृत्त्यादिहेतुर्न भवति प्रवृत्यादिकालेs- परोक्ष प्रमाण के भेद परोक्ष प्रमाण वह है जिस में आत्मा के अवधान के साथ प्रत्यक्ष आदि कोई प्रमाण कारण होता हो । इसके छह प्रकार हैं - स्मृति, प्रत्याभिज्ञान, ऊहापोह, तर्क, अनुमान और आगम | स्मृति (पहले हुए ज्ञान के ) संस्कार के उद्बोधन से उत्पन्न होनेवाले वह' इस प्रकार के ज्ञान को स्मृति कहते हैं, जैसे-वह देवदत्त। स्मृति प्रमाण है क्यों कि इस के विना दिये हुए अथवा धरोहर रखे हुए (धन आदि) के विषय में प्रवृत्त होना, प्राति अथवा स्वीकार की उपपत्ति नही लगती ( स्मृति के प्रमाण होने पर ही ये व्यवहार हो सकते हैं)। स्मृति के द्वारा जागृत हुए पुराने अनुभव से ही देवदत्त आदि के विषय में प्रवृत्ति होती है इस उपपत्ति से-अर्यापत्ति से दूसरे प्रकारसे (उक्त व्यवहार की) उपपत्ति लगती है ( अतः स्मृति को प्रमाण मानना जरूरी नहीं) यह कहना ठीक नहीं क्यो कि पुराना अनुभव जागृत होना संभव नहीं क्यों कि वह नष्ट हो चुका होता है । जैसे कि (अनुमान-प्रयोग होगा-) पुरातन अनुभव जागृत नही हो सकता क्यों कि वह इस समय विद्यमान नही है तथा राम आदि के समान बहुत पहले ही नष्ट हो चुका है । प्रवृत्ति आदि के कारण होने की ९ । -१.१३] प्रत्यभिज्ञान विद्यमानत्वात् चिरविनत्वात् रामादिवदिति। तथा स्मृति प्रमाणं सम्यग्ज्ञानत्वात् सातार्थाव्यभिचारित्वात् वाधकेन विहीनत्वात् निर्दुष्ट. प्रत्यक्षवत् । अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः स्मरणाभासः। यनदत्ते स देवदत्त इति प्रतीतिः इत्यादि । [१३. प्रत्यभिज्ञानम् ] दर्शनस्मरणकारणकं संकलनं प्रत्यभिज्ञानम्। तदेवेदं तत्सदृशं तद्विलक्षणं तत्प्रतियोगि तदुक्तमेवेत्यादि । यथा स एवायं देवदत्त, गोसदृशो गवयः, गोविलक्षणो महिपः इदमस्माद् दूरम्, वृक्षोऽय- मित्यादि । वोतं प्रत्यभिज्ञानं प्रमाणम् अविसंवादित्वात् गृहीतार्थाव्यभि- भी इस तरह उम्पत्ति नहीं लगती। जैसे कि - पुरातन अनुभव दिये हुए (धन) आदि के विषय में इस समय की प्रवृत्ति आदि का कारण नहीं हो सकता क्यो कि वह इस प्रवृत्ति के समय में विद्यमान ही नहीं है, वह राम आदि के समान बहुत पहलेही नष्ट हो चुका है । स्मृति इसलिए भी प्रमाण है कि वह यथार्थ ज्ञान है, ज्ञात अर्थ ( जाने हुए पदार्य ) से उस का विरोध नहीं होता, उन में बाधक नहीं है, इन सब बातों में स्मृति निर्दोष प्रत्यक्ष -के ही समान है । जो वह नही है उस के विषय में वह' इस प्रकार का -ज्ञान होना स्मरण का आभास है, जैसे यज्ञदत्त के सिप में 'वह देवदत्त' इस प्रकार का स्मृति-ज्ञान स्मृति का आभास प्रत्यभिज्ञान (किसी वस्तु के ) देखने तथा (पहले देखी हुई कि मी वस्तु का) स्मरण करने से जो सकलिन ज्ञान होता है उसे प्रत्यभिज्ञान कहते हैं जैसे- यह वही हैं, यह उस जैसा है, यह उस से भिन्न है, यह उस के उलटा है, यह पहले ही कहा हुआ है इत्यादि । उदाहरणार्थ-यह वही देवदत्त है, गवय -गाय जैसा है, भैंसा गाय से भिन्न है, यह यहासे दूर है, यह वृक्ष है इत्यादि । यह प्रत्यभिज्ञान प्रमाण है क्यों कि वह अविसंवादी है (पदार्थों के स्वरूप से उस का विरोध नहीं होता) जाने हुए पदार्थ से वह विरुद्ध नहीं होता, वह वावित नहीं होता, उस में वावक नहीं है, इन सब बातों में यह दोषरहित प्रत्यक्ष ज्ञान के समान ही है। सब वस्तुए क्षणिक हैं । है १० प्रमाप्रमेयम् [१.१४- चारित्वात् अबाध्यत्वात् वाधकेन हीनत्वात् निर्दुष्प्रत्यक्षवत् । अथ सर्व क्षणिक सत्त्वात् प्रदीपवत् इत्यनुमानं बाधकमस्तीति चेन्न। तस्यान- ध्यवसितत्वेन हेत्वाभासत्वात् । ननु लूनपुनर्जातनखकेशादौ प्रत्यभि- बानस्य भ्रान्तिदर्शनात् अप्रामाण्यमिति चेत् तहिं रज्जुसदिौ प्रत्यक्षस्य श्रान्तिदर्शनात् सर्वस्य प्रत्यक्षस्य अप्रामाण्यं स्यादिति अतिप्रसज्यते । सदृशे तदेवेदं तस्मिन्नेव तन्सदृशम् इत्यादि प्रत्ययः प्रत्यभिनाभास ॥ [१४. उहापोहः ] अनेनेदं भवतीति विना न भवतीत्यादि याथात्म्यज्ञानम् ऊहापोहः । क्यों कि वे सत् हैं जैसे दीपक इस अनुमान ले (प्रत्यभिज्ञान के प्रमाण होने मे ) वाधा उपस्थित होती है ( सब पदार्थ एक ही क्षण अस्तित्व में रहते हैं अत. यह वही है आदि ज्ञान-जो कि अनेक क्षणों में पदार्थ के अस्तित्व पर आधारित हैं-अप्रमाण हें ऐसा मानना चाहिए) यह कथन ठीक नहीं । यह हेतु जो सत हैं वे क्षणिक हैं यह कहना ) अनव्यवसित (अनिश्चित ) होने से हेत्वाभास है । एक बार काटने पर नख तथा केश पुन उगते है उन में ( ये वही नख केश हैं इस प्रकार का ) प्रत्यभिज्ञान भ्रमपूर्ण होता है ऐसा देखा जाता है अत. उसे अप्रमाण मानना चाहिए ऐसा यदि कहे तो रम्सी को सांप समझ्ने में प्रत्यक्ष भी भ्रमपूर्ण होता है अत. सभी प्रत्यक्ष को अप्रमाण मानन का अतिप्रसंग आयेगा (ता.पर्य-जिस तरह रस्सी में सांप का ज्ञान भ्रान्त होने पर भी सभी प्रत्यक्ष ज्ञान भ्रान्त नहीं होते उसी तरह फिर से उगे हुए नखो में प्रत्यभिज्ञान भ्रान्त होने पर भी सभी प्रत्यभिज्ञान भ्रान्त नहीं होते)। जो उस जैसा है उस के विषय में यह वही है ऐसा समझना, उसी के विषय में यह उस जैसा हे ऐसा समझना आदि प्रयभिज्ञान के आभास. होते हैं। ऊहापोह इस से यह होता है, इस के विना यह नही होता इस तरह के वास्त- विक ज्ञान को ऊहापोह कहते हैं । जैसे-इच्छा पूरी होने से सब को सन्तोष ।

-१.१५] तर्क ११ इच्छाप्रतिपालनेन सर्वेपां प्रीति इच्छाविघातेन सर्वेषां टेप इत्यादि। तद्विपरीतः तदाभास ॥ [१५. तर्कः] साध्यसाधनयो व्याप्तिज्ञानं तर्क। साधनसामान्यस्य साध्य--- सामान्येन अव्यभिचारः संवन्धो व्याप्तिः। सा चान्वयव्यतिरेकभेदात् द्वेधा। सपक्षे भूयः साधनसभावदर्शने साध्यसद्भावदर्शनेन निश्चिता अन्वयव्याप्तिः। यो यो धूमवान् स सर्वोऽ'यग्निमान् यथा महानसादि- रिति। विपक्षे भूय साध्याभावदर्शने साधनाभावदर्शनेन निश्चिता व्यतिरेक्व्याप्तिः। यो योऽग्निमान् न भवति स सर्वोऽपि धूमवान् न भवति यथा हृदादिरिति । अव्याप्ती व्याप्तिनानं तर्काभासः यद् यत् प्रमेयं तत् तन्नित्यमित्यादि ॥ होता है, इच्छा मे रुकावट आने से सब नाराज होते हैं इत्यादि । इस के विपरीत (अवास्तविक ) ज्ञान को इस का आभास समझना चाहिए । तर्क साध्य और साधन की व्याप्ति के ज्ञान को तर्क कहते हैं। साधन के सामान्य स्वरूप का साध्य के सामान्य स्वरूप से कभी न वदलनेवाला जो सव होता है उसे व्याप्ति कहते है । उस के दो प्रकार हैं - अन्यय तथा व्यतिरेक | समान पक्ष मे वारवार साधन का अस्तित्व देखने के समय साध्य का भी अस्तित्व देखने से जिस का निश्चय हुआ हो वह अन्वयव्याप्ति होती है । जैसे - जो जो धुए से युक्त होता है वह सब अग्नि युक्त होता है जैसे - रसोईवर ( यहा रसोईघर आदि समानपक्षों में धुंआ इस साधन के होनेपर अग्नि इस साध्य का भी अस्तित्व बारवार देखा गया है अत. जहां बुआ होता है वहा अग्निभी होता है यह अन्वयव्याप्ति निश्चित हुई )। विरुद्ध पक्ष में बारबार साध्य का अभाव देखने पर साधन का भी अभाव देखने से जिस का निश्चय हो वह व्यतिरेकव्याप्ति होती है । जैसे -जो जो अग्नि युक्त नही होता वह सब धुए से युक्त भी नही होता जैसे सरोवर आदि । जहा व्याप्ति न हो वहा व्याति समझना तर्क का आभास है, जैसे - जो जो प्रमेय है वह वह नित्य होता है ( यहा जो प्रमेय होता है वह नित्य होता है यह. " १२ प्रमाप्रमेयम् [१.१६- [१६. अनुमानम् ] सम्यक्साधनात् साध्यविज्ञानम् अनुमानम्। स्वार्थपरार्थमेदात द्विविधम् । परोपदेशमन्तरेण साधनदर्शनात् साध्यविज्ञान स्वार्थानु- मानम् । स्वार्थानुमानपरामर्शिपुरुषवचनात् मातं पराधीनुमानम् । नद्- वचनमपि तद्हेतुत्वात् परार्थानुमानमेव । तच अनित्य शब्दः कृतक- त्वात्, यो यः कृतकः स सर्वोऽप्यनित्यः यथा घटः, यद्यदनित्यं न भवति तत् तत् कृतकं न भवति यथा व्योम, कनकवायं शब्दः, तस्माद- नित्य इति । पक्षसाध्यहेतुधान्तोपनयनिगमनान्यवयवा' पट् प्रलिहा.॥ [१७. पक्षः । सिपाधविपितधर्माधारोधर्मी पक्षः। शन. इति। पक्षस्त्र प्रसिद्धन्वं व्याप्ति नही हो सकती क्यों कि बहुतसे प्रमेय अनि-य भी होते हैं, अतः इसे यदि व्यानि माना जाता है तो उस ज्ञान को तीमास कहा जायेगा)। अनुमान योग्य सावन से साध्य का ज्ञान होना यह अनुमान प्रमाण है । इस के दो प्रकार हैं - स्वार्थानुमान तथा परार्थानुमान । दूसरे के उपदेश के बिना सावन को देखने से जो साध्य का ज्ञान होता है वह स्वानुमान है। स्वार्यानुमान के जाननेवाले पुरुष के कहने से जो ज्ञान होता है वह परार्था- नुमान हैं । उस का कारण होने से ऐसे अनुमान के कथन को भी परार्या- नुमानही कहते हैं ( वाक्य शब्दों से बना होता है अत' वह जड होता है इस लिए प्रमाण नही हो सकता किन्तु यहां का वाक्य परार्यानुमान का ज्ञान कराने का कारण है अत उसे व्यवहार से अनुमानप्रमाण कहते हैं )। उस का उठाहरण- शब्द अनित्य है क्यों कि वह कृतक है, जो जो कृतक होता है वह सभी अनित्य होता है जैसे घट, जो जो अनित्य नही होता वह कृतक नहीं होता जैसे आकाश, और यह शब्द कृतक है इस लिए यह अनित्य है। अनुमान के छह अवयव प्रसिद्ध है - पक्ष, साध्य, हेतु, दृष्टान्त, अनय तथा "निगमन । -पक्ष जिसे सिद्ध करने की इच्छा है उस चर्म (गुण) के आधार धर्मी (धर्म ।

- १.१५] अनुमान १३ प्रमाणात् विकल्पात् उभयाच्च। प्रमाणं प्रागुक्तलक्षणम्। पर्वतोऽग्निमान् । घूमवत्त्वात् महानसवत् इत्यादी प्रमाणप्रसिद्धः पक्ष । विकल्पस्तु प्रमाणा- प्रमाणसाधारणज्ञानम् जलमरीचिकासाधारणप्रदेशे जलज्ञानवत् । वेदस्याध्ययनं सर्व गुर्वध्ययनपूर्वकम् वेदाध्ययनवाच्यत्वादधुनाध्ययन यथा, अस्ति सर्वज्ञः असंभवद्वाधकप्रमाणत्वात् करतलवत् इत्यादी विकल्पसिद्ध. पक्षः । अनित्यः शब्दः कृतकत्वात् घटवत् इत्यादी उभय- प्रसिद्धः पक्ष ॥ पढता है से युक्त पदार्थ ) को पक्ष कहते हैं, जैसे ( उपर्युक्त अनुमान में अनित्यत्व इस धर्म का आधार है) शब्द । पक्ष तीन प्रकार से प्रसिद्ध होता है - प्रमाण से, विकल्प से तथा दोनों से । 'पर्वत अग्नियुक्क है क्यो कि वह चूमयुक्त है, जैसे रसोईघर ' इस जैसे अनुमान में पक्ष प्रमाण से प्रसिद्ध है (पर्वत इस पक्ष का प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञान हो चुका है)। प्रमाण और सप्रमाण दोनों में जो हो सकता है ऐसे ज्ञान को विकल्प कहते हैं. जैसे जहा मृगजल हमेशा दीखता हो ऐसे प्रदेश में होनेवाला जल का ज्ञान (जहा हमेशा मृगजल दीखने की सभावना हा ऐसे प्रदेश में जल दीखने पर विकल्प होगा कि यह वास्तविक जल है या मृगजल है)। सभी वेदाध्ययन गुर्वध्ययनपूर्वक है (शिष्य वेद यह तभी सभव है जब गुरु ने वेद पढा हो अत. शिष्य के अध्ययन से पूर्व नियम से गुरु का अव्ययन हुआ है ) क्यों कि वह वेदाध्ययन है जैसे आजकल का वेदाध्ययन, इस अनुमान पक्ष विकरपसिद्ध है (सभी वेदाध्ययन यह पक्ष है इस का अनुमान करनेवाले को जो ज्ञान हुआ है वह विकल्पसिद्ध है - सभी वेदाध्ययन को, उसने प्रमाण से नहीं जाना है)। इसी प्रकार सर्वज्ञ है क्यों कि उस के अस्तित्व मे वाधक प्रमाण संभव नहीं हैं, जैसे अपना हाथ ( अपने हाथ के अस्तित्व में कोई बावा नहीं उसी तरह सर्वज्ञ के अस्तित्व में कोई बाधा नही है) इस अनुमान में भी विकल्पसिद्ध पक्ष है (सर्वज्ञ यह पक्ष है वह प्रतिवादी के लिए अज्ञात और वादी के लिए ज्ञात है अत विकल्पसिद्ध है)। शब्द अनित्य है क्यों कि वह कृतक है जैसे घट- ऐसे अनुमानों में पक्ष उभयप्रसिद्ध है (कुछ वादियों के लिए इस पक्ष शब्द का ज्ञान प्रमाणसिद्ध है तो कुछ के लिए विकल्पसिद्ध है)। में का 1 प्रमाप्रमेयम् [१.१८- [१८. साध्यम् ] स्वसिद्ध परासिद्ध साध्यम् । अनित्य इति ।। [१९. हेतुः] व्याप्तिमान् पक्षधर्मो हेतु । कृतकत्वात् इति । तस्य हेतोः पक्षधर्मत्वं सपक्षे सत्त्वं विपक्षेऽसत्त्वम् असिद्धसाधकप्वम् अबाधितविषयत्वम् असत्प्रतिपक्षत्वमिति पड् गुणा । तत्र साध्यवर्माधारो धर्मी पक्ष , पक्षे सर्वत्र हेतो. प्रवर्तनम् पक्षधर्मत्वम्। साध्यसमानधर्मा धर्मी सपक्षः सपक्षे सर्वत्र एकदेशे वा हेतोः प्रवर्तन सपक्षे सत्त्वम्। साध्यविपरीत- धर्मा धर्मी विपक्षः, विपक्षे सर्वत्र हेतोरप्रवर्तनं विपक्षेऽसत्त्वम्। प्रति- वादिनः संदिग्धविपर्यस्ताप्रतिपन्नम् असिद्धम्, तत्साधनं हेतोरसिद्ध- साधनत्वम् । अवाधितसाध्ये पक्षे हेतो. प्रवर्तनम् अवाधितविषयत्वम् । साध्य जो अपने लिए सिद्ध हो और दूसरे के लिए असिद्ध हो (उसे सिद्ध कर बतलाना हो ) वह साध्य है, जैसे (उपर्युक्त अनुमान में शब्द का) अनित्य होना । हेतु . व्याप्ति से युक्त पक्ष के धर्म को हेतु कहते हैं । जैसे- (उपर्युक्त अनु- मान में ) क्यों कि (शब्द) कृतक है। हेतु के छह गुण होते हैं - पक्ष का धर्म होना, सपक्ष में अस्तित्व, विपक्ष में अभाव, ऐसी बात को सिद्ध करना जो अब तक सिद्ध नही हुई हो, ऐसी बात को सिद्ध करना जो बाधित न हो तथा जिस में प्रतिपक्ष संभव न हो। सिद्ध करने योग्य धर्म के आधार को पक्ष कहते हैं, पक्ष में हेतु का सर्वत्र अस्तित्व होना यह पक्षधर्मत्व नाम का पहला गुण है । साध्य के समान धर्म जिस वर्मी (गुणयुक्त पदार्थ) में होते हैं उसे सपक्ष कहते हैं, सपक्ष में सर्वत्र या एक हिस्से में हेतु के होने को सपक्ष में सत्त्व कहते हैं (यह दूसरा गुण है)। साध्य के विरुद्ध वर्म जिस वर्मी में होते हैं उसे विपक्ष कहते हैं, विपक्ष में सर्वत्र हंतु का अभाव होना यह विपक्ष में अतत्व नामका तीसरा गुण है । प्रतिवादी के लिए जो संदेहयुक्त, विपर्यास-युक्त या अज्ञात होता है उसे अनिद्ध कहते हैं, ऐसे साध्य को सिद्ध -१.२०] दृष्टान्त १५ यद्यपि विपरीते हेतोः अत्रिरूपत्वम् असत्प्रतिपक्षत्वं, तच्च विपक्षे असत्त्वात् नार्थान्तरम् । हेतोः विपक्षे असत्त्वनिश्चये साध्यविपरीते अत्रि- रूपत्वं निश्चितमिति । तथापि श्रोतृणां व्युत्पत्त्यर्थ पृथइ निरूपणम् ॥ [२०. दृष्टान्तः] दृष्टौ अन्तौ साध्यसाधनधर्मों तदभावौ वा वादिप्रतिवादिभ्याम् अविगानेन यस्मिन् धर्मिणि स दृष्टान्त । स च अन्वयो व्यतिरेकश्चेति द्वेधा । साधनसद्भावे साध्यसद्भावो यत्र प्रदश्यते सोऽन्वयदृष्टान्तः। यो य. कृतक. स सर्वोऽप्यनित्यः यथा घटः इति । साध्याभावे साधना- भावो यत्र वीक्ष्यते स व्यतिरेकदृष्टान्तः। यद् यदनित्य न भवति तत् तत् कृतकं न भवति यथा व्योमेति ॥ करना वह असिद्धसावनत्व नामका चौथा गुण है। जिस पक्ष में साध्य वावित न हो उस में हेतु का होना अवाचितविषयत्व नाम का पाचवा गुग है। यद्यपि साध्य के विरुद्ध पक्ष में हेतु के तीन रूप (पक्षधर्मत्व, सपक्ष-सत्त्व तथा विपक्षे असत्त्व ) न होना यही असत्प्रतिपक्षत्व नामका छठा गुण है तथा यह विपक्ष में अभाव इस तीसरे गुण से भिन्न नहीं है, विपक्ष में हेतु का अभाव निश्चित होनेसे ही साध्य के विरुद्ध पक्ष में हेतु के तीन रूप न होना निश्चित हो जाता है, तथापि श्रोताओं को स्पष्ट रूप से समझानेके लिए इसे अलग गुण के रूप में बतलाया है। दृष्टान्त वादी और प्रतिवादी दोनों की मान्यता से जिस धर्मी में दो अन्त अर्थात् साध्यधर्म और साधनधर्म देखे जाते हैं अथवा साध्यधर्म और सावन- धर्म का अभाव देखा जाता है उस धर्मी को दृष्टान्त कहते हैं। उस के दो प्रकार है - अन्वय दृष्टान्त तथा व्यतिरेक दृष्टान्त । जिस में साधन के होनेपर साध्य का होना बतलाया जाय उसे अन्वय दृष्टान्त कहते है। जैसे-जो जो कृतक होता है वह सभी अनित्य होता है जैसे घट ( यहा वट इस दृष्टान्त में कृतकत्व यह साधनधर्म है तथा अनित्यत्व यह साध्य धर्म है इन के अन्वय के कारण यह अन्वय दृष्टान्त है )। साध्य के न होने पर साधन का न होना जिस में देखा जाय वह व्यतिरेक दृष्टान्त है । जैसे-जो जो अनित्य नही होता -- १६ प्रमाप्रमेयम् [१.२१- [२१. उपनयनिगमने] पक्षधर्मत्वप्रदर्शनार्थ हेतोरुपस्कारः उपनयः। कृतकश्चाय शब्द: इति । उक्तोपसंहारार्थ प्रतिनायाः पुनर्वचनं निगमनम् । तस्मादनित्यः इति॥ - [२२. हतोः पक्षधर्मत्वम् ] ननु पक्षधर्मो हेतुरित्ययुक्तम् उदेष्यति शकटं कृत्तिकोदयात् इत्यादे अपक्षधर्मस्यापि सस्य गहेतुत्वात् इति चेत् न । अपक्षधर्मस्यासिद्धत्वात् । तथा हि, अनित्यः शब्द. चाक्षुपत्वात् इत्यविद्यमानसत्ताकस्य स्वयमेक निरूपणात् । वीता हेतव उसिद्धाः अपक्षधर्मत्वात् शब्दे चाक्षुपत्ववदिति प्रयोगाच्च । चाक्षुपत्वस्य अन्यत्र सस्तेऽपि पक्षे असत्त्वादेवालिद्धत्वम् वह कृतक नहीं होता जेसे आकाश (यहा आकाश इस दृष्टान्त मे अनित्यत्व यह साध्यधर्म तथा कृतकत्व यह साधनधर्म दोनों नही है)। उपनय और निगमन हेतु पक्ष का धर्म है यह बतलाने के लिए हेतु को उपस्कृत करना यह उपनय है। जैसे ( उपर्युक्त अनुमान में)-ओर यह शब्द कृतक है (शब्द पक्ष है, उस में कृतकत्व हेतु का उपस्कार किया गया, यही उपनय है)। कहे गये अनुमान के उपसहार के लिए प्रतिज्ञा को पुनः कहना यह निगमन है । जैसे ( उपर्युक्त अनुमान में)-इस लिए शब्द अनित्य है । हेतु पक्ष का धर्म होता है यहां प्रश्न होता है कि हेतु को पक्ष का धर्म कहना ठीक नही क्यों कि (कुछ समय बाद) रोहिणी नक्षत्र का उदय होगा क्यों कि (इस समय) कृत्तिका नक्षत्र का उदय हुआ है इत्यादि अनुमानों में जो हेतु पक्ष का धर्म नही हे वह भी योग्य हेतु होता है (उपर्युक्त अनुमान मे कृत्तिका का उदय यह हेतु रोहिणी इस पक्ष का गुण नही है फिर भी उस से रोहिणी के उदय का यथार्थ अनुमान होता है)! यह शंका ठीक नही क्यों कि जो हेतु पक्ष का धर्म नहीं होता वह असिद्ध होता है | जैसे -शब्द अनित्य है क्यों कि वह.

२७ -- १.२२] हेतु पक्षका धर्म होता है नान्यथा, अतिप्रसंगात्। तस्य साध्याविनाभावाभावात् असिद्धत्वे विरुद्धानकान्तिकाकिंचित्कराणामपि अमिद्धत्वमेवेति एक एव हेत्वा- भामः स्यात् । तथा च चत्वारो हेत्वाभासा. असिद्धविरुद्धानकान्तिका- किंचित्कराः इत्यसंगतं स्यात् । तस्मात् हेतोः पक्षधर्मत्वे सत्येव विव- क्षितपक्षे प्रकृतसाध्यप्रसाधकत्वम् नाविनाभावमात्रात् । अन्यथा पर्वतोऽ- निमान् महानसस्य धूमवत्वात् इत्यादेरपि साध्ये प्रसाधकत्वं स्यात् तस्यापि साध्यविनाभावसद्भावात् , न चैवं, ततः पक्षधर्म एव सम्यम् हेतुरित्यगीकर्तव्यः॥ चाक्षुप (आखों से देखा जानेवाला ) है यह हेतु अविद्यमान सत्ताक है ( इस हेतु का अस्तित्व ही नहीं है क्यों कि शब्द आखों से नही देखा जाता ) यह शंकाकार ने स्वयं कहा है (इसी प्रकार जो हेतु पक्ष का धर्म नही होता वह असिद्ध होता है )। ऐसा अनुमान प्रयोग भी कर सकते हैं - ये हेतु (जो •पक्ष के वर्म नहीं हैं ) असिद्ध हैं क्यों कि वे पक्ष के धर्म नही हैं जैसे शब्द का चाक्षुप होना । आखों से देखा जाना दूसरे पदार्थों में तो पाया जाता है किन्तु पक्ष (शब्द) में नहीं है इसी लिए उसे असिद्ध कहते हैं और किसी कारण से नही, अन्यथा अतिप्रसंग होगा। इस हेतु का साध्य से अविना- भाव ( उस के होने पर ही यह होता है इस तरह का नियत संबध) नहीं है अत' वह असिद्ध है ऐसा कहें तो विरुद्ध, अनैकान्तिक, अकिचित्कर ये सत्र हेत्वाभास भी असिद्धही होंगे (क्यों कि इन का भी साध्य से अविनाभाव नही होता ) अत. हेत्वाभास एकही होगा और हेत्वाभास चार हैं - असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक और अकिंचित्कर - यह शकाकार का कथन सुसंगत नही होगा। इस लिए हेतु पक्ष का धर्म हो तभी वह किसी पक्ष में इष्ट साध्य को सिद्ध कर सकता है केवल, अविनाभाव से नही | अन्यथा पर्वत अग्नि से युक्त है क्यों कि रसोई घर में बुआ है इत्यादि हेतु भी साध्य को सिद्ध कर सकेगे (तात्पर्य- धुंआ और अग्नि इन का अविनाभाव सबंध होने पर भी धुए से अग्नि का अनुमान तभी होगा जब वह पर्वत इस पक्ष में विद्यमान हो) क्यों कि उन का भी साध्य से अविनाभाव है, किन्तु ऐसा नहीं होता, अतः 'पक्ष का धर्म ही योग्य हेतु होता है ऐसा मानना चाहिए । प्र.प्र.२ . १८ प्रमाप्रमेयम् [२३. पक्षधर्मस्य हेतोः व्याप्तिमत्त्वम् ) ननु स कथमङ्गीक्रियते । देशान्तरं गत पुत्रः स श्यामो मैत्रतनय. त्वात् इतरतत्तनयंवत् इत्यादेः पक्षधर्मस्यापि असम्यगहेतुत्वात् इति चेन्न। तस्य भूयोदर्शनात् व्याप्तिग्रहणकाल एव एकपिजन्यानामेकवर्णव्यभि चारेण व्याप्तिवैकल्यादेव असस्यग्हेतुत्वात् । तस्मात् व्याप्तिमान् अपक्ष- धर्मः व्याप्तिरहित पक्षधर्मः वान सम्यग्हेतुः । किंतु व्याक्तिमान् पक्ष- पक्ष का धर्म हेतु व्याप्तियुक्त भी होना चाहिए यहां प्रश्न होता है कि पक्ष के धर्म को ही हेतु मानना कैते रचित है? मैत्र का एक पुत्र जो विदेश में गया है, सावला है क्यों कि वह मन्त्र का पुत्र है जैसे मैत्र के दूसरे पुत्र - इस प्रकार के अनुनान में हेतु पभ का धर्म होने पर भी योग्य हेतु नहीं है ( मैत्र का पुत्र होना यह हेतु विदेश में गये हुए मैत्र के पुत्र में ~ पक्ष में विद्यमान है फिर भी उस से उस का सावला होना सिद्ध नहीं होता ~ वह मैत्र का पुत्र गोरा भी हो सकता है, अत: हेतु पक्ष का धर्म होने पर योग्य ही होगा ऐसा नहीं कह सकते )। किन्तु यह शंका ठीक नहीं है । यहां वार बार देखने से व्याति का ग्रहण करने के समय मे ही एक पिता के कई पुत्र एक ही रग के नहीं होते यह देखने से (जो मैन्न का पुत्र वह सावला होता है यह ) व्याप्ति गलत सिद्ध होती है अत. उसी कारण से हेतु भी गलत होता है ( हेतु के गलत होने का कारण पक्ष का धर्म होना यह नहीं है - व्याप्ति गलत होना यह हेतु गलत होने का कारण ) । अत. जो व्याप्ति से युक्त हैं किन्तु पक्ष का धर्म नहीं है वह योग्य हेतु नही होता, तथा जो व्यामि से रहित है और पक्ष का धर्म है वह भी योग्य हेतु नहीं होता । जो व्याति से युक्त होते. हुए पभ का धर्म है वही योग्य हेतु होता है । फिर कृत्तिका के उदय से रोहिणी के उदय का अनुमान किस तरह होता है ( क्यों कि कृत्तिका-उदय यह हेतु रोहिणी इस पक्ष का धर्म नही है ) इस प्रश्न का उत्तर यह है कि यहां कुशल व्यक्ति अनुमान का प्रयोग इस प्रकार करते हैं - यह कृत्तिका नक्षत्र का उदय एक वटिका के बाद रोहिणी नक्षत्र के उदय से युक्त होता है क्यों कि यह कृत्तिका का उदय है जैसे पहले देखे हुए कृत्तिका के उदय (इस अनुमान-प्रयोग मे कृत्तिका है -१.२४] हेतु का पक्षधर्मत्व १९ धर्म पव सम्यगहेतुः। तर्हि शकटोदयकृत्तिकोदयानां गम्यगमकभावः कथमिति चेत बीतः कृत्तिकोदय. मुहूतान्ते शकटोदयवान् कृत्तिकोदय- त्वात् प्राक्परिदृष्टवृत्ति कोदयवत् इत्यादि कुशलप्रयोगादिति चूमः ॥ [२४ हेतोः अपक्षधर्मत्वनिषेधः] ननु नदीपुरोऽप्यधोदेशे वृत्तः सनुपरिस्थिताम् । नियम्यो गमयत्येव वृत्तां वृष्टिं नियामिकाम् ॥ ३॥ पित्रोच्च ब्राह्मणत्वेन पुत्रव्राह्मणतानुमा। सर्वलोकप्रसिद्धान पक्षधर्ममपेक्षते ॥४॥ उपरि वृष्टो देवः अधोटेगे नदीपूरस्यान्यथानुपपत्तेः, पुत्रः ब्राह्मण. माता- पत्रो. ब्राह्मण्यस्यान्यथानुपपत्ते, इत्यादेरपक्षधर्मस्यापि गमकत्वमस्ति इति चेन्न । अपक्षधर्मस्य कल्प्यस्य गमकत्वानुपपत्तेः । कुत इति चेत् पक्ष का उदय यह पक्ष हुआ, इस में कृत्तिका का उदय होना यह हेतु विद्यमान है अतः उस से वटिका के बाद रोहिणी के उदय से युक्त होना यह साध्य सिद्ध होता है)। जो पक्ष का धर्म नहीं वह हेतु नहीं होता यहां प्रश्न होता है कि नदी में वाढ नीचे के प्रदेश में होती है किन्तु उस नियम्य ( साधन ) ले ऊपर के प्रदेश में हुई नियामिका (साध्य) भारी वर्षा का अनुमान होता ही है (यद्यपि यहां वाढ यह हेतु ऊपर का प्रदेश इस पक्ष में नहीं होता )। इसी प्रकार मातापिता के ब्राह्मण होने से पुत्र के ब्राह्मण होने का अनुमान होता है यह सब लोगों में प्रसिद्ध है, यहा भी (मातापिता का ब्राह्मण होना यह हेतु पुत्र इस पक्ष में नहीं है अत.) हेतु में पक्षधर्म होना जरूरी नही है । ऊपर के प्रदेश में वर्षा हुई है, अन्यथा नीचे के प्रदेश में नदी में वाढ आई है इस की उपपत्ति नहीं लगती; पुत्र ब्राह्मण है क्यो कि उस के माता-पिता ब्राह्मण होने से वह अन्यथा नहीं हो सकता इत्यादि अनुमानो में जो हेतु पक्ष का धर्म नही है वह भी साध्य का बोध कराता है। किन्तु शकाकार का यह कथन ठीक नही है । जो पक्ष का धर्म नहीं है वह हेतु कल्पित होगा अतः वह साध्य का बोध कराये यह संभव नहीं है। ऐसा क्यों है इस प्रश्न का उत्तर है कि पक्ष में हेतु का अभाव है २० प्रमाप्रमेयम् [१.२५- तभावस्यैव कल्पकाभावत्वात् असिद्धत्वादिति यावत् । अथ पक्षा- दन्यत्र विद्यमानत्वात् गमकत्वमिति चेत् तर्हि सर्व सर्वस्य गमकं स्यादित्यतिप्रसज्यते ॥ [२५. हेतुलक्षणोपसंहारः] अथ निश्चितव्याप्तिकं सर्व स्वव्यापकस्य सर्वस्य गमकमिति चेत् न चैतद्वास्ति । कल्पकस्यास्य क्वापि व्याप्तिनिश्चयाभावात् । न तावत् सपक्षे तनिश्चयः तस्य सपक्षाभावात् । अथ पक्षे एवास्य व्याप्तिनिश्चय इति चेन्न । अपक्षधर्मस्यास्य पक्षे अभावात् तत्र तन्निश्चयानुपपत्तेः। पक्षे तस्य सद्भावेऽपि तत्र कल्प्यस्य निश्चये तेन कल्पकस्य व्याप्तिनिश्चया- योगात् तत्र तन्निश्चये अर्थापत्तेः आनर्थक्यम् व्याप्तिनिश्चयात् पूर्वमेव पक्षे कल्प्यल्य निश्चितत्वात् । अनिश्चितव्याप्तिकस्यापक्षधर्मस्यापि गमकत्वे इसी कारण वह साध्य का वोधक नहीं हो सकता वह असिद्ध होता है। पक्ष से अन्यत्र हेतु रहेगा और साध्य का बोध करायेगा यह कहना भी संभव नही क्यों कि ऐसा कहने से सभी हेतु सभी साध्यों के वोधक हो जायेंगे। (धुंआ रसोईघर में होगा और अग्नि का बोध पर्वतपर होगा) यह अतिप्रसंग है । हेतु के लक्षण का समारोप जिस की व्याप्ति निश्चित है वह सब अपने व्यापक सब (पदार्थों) का बोध कराता है यह कहें तो वह बात भी यहां (जो पक्ष का धर्म नही है उस हेतु में ) नही पाई जाती । कारण यह है कि इस कल्पित हेतु की व्याप्ति का निश्चय ही कहीं नही हो सकता। उस की व्याप्ति का निश्चय सपक्ष में नही हो सकता क्यों कि उस के कोई सपक्ष ही नही है (जिस का पक्ष में अस्तित्व हो उसी के बारे में सपक्ष और विपक्ष की कल्पना संभव है, जिस का पक्ष ही न हो उस का सपक्ष कैसे हो सकता है)। पक्ष में ही इस (हेतु ) की व्याप्ति का निश्चय होता है यह कथन भी योग्य नही । यह हेतु पक्ष का धर्म ही नहीं है अत' पक्ष में उस का अभाव है इसलिए पक्ष में इस की व्याति का निश्चय सभव नही हो सकता । ( यहा एक वाक्य का अर्थ हमें ज्ञात नहीं हो सका)। जिस की व्याप्ति निश्चित नही तथा जो पक्ष का -१.२६] अन्वयव्यतिरेकी अनुमान २१ काकस्य कार्यात् धवलः प्रासादः इत्यादेरपि गमकत्वं स्यात् । अथ विपक्षेऽसत्त्वात् व्याप्तिनिश्चय इति चेत् केवलव्यतिरेकानुमान तत्, नापत्तिः। तस्याप्यपक्षधर्मत्वे अगमकत्वमेव । पक्षे सपक्षेऽप्यविद्यमानो हेतुः स्वसाध्यं क्व प्रसाधयेत्, न क्वापि । तहिं नदीपूरवृष्टयादीनां गम्यगमकभावः कथमिति चेत् वीतः नदीपूरः वृष्टिपूर्वका विशिष्टपूरत्वात् संप्रतिपन्नपूरवत् , वीत. पुमान् ब्राह्मण एव ब्राह्मणमातापितजन्यत्वात् संप्रतिपन्नब्राह्मणवत् इत्यादिकुशलप्रयोगादिति चूम । तस्मात् व्याप्तिमान पक्षधर्म एव सम्यग् हेतुर्भवति ।। [२६. अन्वयव्यतिरेकि अनुमानम् ] स हेतु. अन्वयव्यतिरेकी केवलान्वयी केवलव्यतिरेकी इति त्रिधा । धर्म नहीं वह हेतु भी यदि साध्य का बोध करा सके तो 'महल सफेद है क्यों कि कौआ काला है ' ऐसे हेतु भी साध्य के बोधक सिद्ध होंगे विपक्ष में अभाव होने से इस हेतु की व्याप्ति का निश्चय होता है यह कथन भी उचित नही क्यों कि ऐसी स्थिति में उसे केवलव्यतिरेकी अनुमान ही कहेंगे, व्याप्तिसमर्थक अर्थापत्ति नही । ऐसा हेतु भी (जिस का विपक्ष में अभाव, है) यदि पक्ष का धर्म नहीं है तो वह साध्य का बोध नहीं करा सकता । जो हेतु पक्ष में और सपक्ष में भी न हो वह साध्य को कहां सिद्ध करेगा-अर्थात कहीं भी सिद्ध नहीं कर सकेगा। फिर नदी की वाढ से वृष्टि का बोध किस तरह होता है इस प्रश्न का उत्तर यह है कि यहां कुशल व्यक्ति इस प्रकार अनुमान का प्रयोग करते हैं - यह नदी की वाढ दृष्टिपूर्वक होती है क्यों कि यह विशिष्ट बाढ हैं जैसे पहले देखी हुई वाढ ( यहा नदी की बाढ इस पक्ष में वृष्टिपूर्वक होना यह साध्य हे तथा विशिष्ट वाढ होना यह हेतु यहाँ पक्षा का ही धर्म है)। इसी प्रकार यह पुरुप ब्राह्मण है क्योंकि यह ब्राह्मण माता- पिता से उत्पन्न हुआ है जैसे पहले दख हुए ब्राह्मण (यहा यह पुरुष इस पक्ष में ब्राह्मण माता-पिता से उत्पन्न होना यह हेतु विद्यमान हे अत. उस से ब्राह्मण होना यह साध्य सिद्ध होता है)। इसलिए व्याप्ति से युक्त पक्ष का धर्म ही योग्य हेतु होता है। अन्वयव्यतिरेकी अनुमान हेतु के तीन प्रकार है - अन्वयव्यतिरेकी, केवलान्चयी तथा केवल- ३ प्रमाप्रमेयम् [१.२७- सपक्षविपक्षसहित. अन्वयव्यतिरेकी । पर्वतोऽग्निमान् घूमवत्वात् , यो यो धूमवान् स सर्वोऽप्यग्निमान् यथा महानसः, यो योऽग्निमान् न भवति स सर्वोऽपि धूमवान् न भवति यथा हृदः, धूमवांश्वायं पर्वतः तस्मात् अग्निमान् भवति इत्यादि । [२७. केवलान्वयि अनुमानम् ] विपक्षरहितः सपक्षरहितः केवलान्वयी। वीतः सदसद्वर्गः कस्य- चिदेकज्ञानालस्बनमनेकत्वात् , यद् यदनेकं तत् कस्यचिदेकनानालम्बनं, यथा पञ्चाङ्गुलम् , अनेकश्चायं सदसद्वर्गः तस्मात् कस्यचिदेकज्ञाना- लम्बनमित्यादि । ननु केवलान्वयि न प्रमाणं विपक्षाद् व्यावृत्तिरहितत्वात् अनैकान्तिकवत् इति मीमांसकः प्रायोक्षीत् । तत्र विपक्षग्रहणव्यावृत्ति- स्मरणयोरभावे विपक्षाद् व्यावृन्तिरहितत्वस्य ज्ञातुमशक्ते. अज्ञातासिद्धो - व्यतिरेकी । सपक्ष और विपक्ष दोनों से सहित हेतु अन्वयन्यतिरेकी होता है। जैसे - यह पर्वत अग्नियुक्त है क्यों कि यह धुंए से युक्त है, जो धुए से युक्त होता है वह सब अग्नि से युक्त होता है, जैसे रसोईघर, जो अग्नि से युक्त नहीं होता वह धुंए से युक्त भी नहीं होता, जैसे सरोवर, और यह पर्वत धुंए युक्त है, अत. यह अग्नि से युक्त है । (यहां धुंए से युक्त होना यह हेतु अन्वयव्यतिरेकी है क्यों कि इस में रसोईघर आदि सपक्ष हैं और सरोवर आदि विपक्ष हैं)। केवलान्वयी अनुमान जो हेतु सपक्ष से सहित किन्तु विपक्ष से रहित होता है उसे केवला- न्वयी कहते हैं। उदा.- विचार का विषय सत् तथा असत् (भावरूप तथा अभावरूप) पदार्थों का समूह किसी एक के ज्ञान का विषय होता है क्यो कि वह अनेक है, जो अनेक होता है वह किसी एक के ज्ञान का विषय होता है, जैसे पांच अंगुलियां, ये सत् तथा असत् पदार्थ भी अनेक हैं, इस- लिए वे किसी एक के ज्ञान के विषय होते हैं । (यहां अनेक होना यह हेतु सदसद्वर्ग इस पक्ष मे है, पचगंगुल इस सपक्ष में है, किन्तु इस का कोई विपक्ष नहीं है क्यों कि ससार के जितने भी पदार्थ हैं उन सबका सदसद्वर्ग इस पक्ष में अन्तर्भाव हो जाता है, अतः यह हेतु केवलान्त्रयी है)। यहां .-१.२८] केवलव्यतिरेकी अनुमान २३ हेतुः स्यात् । विपक्षग्रहणसंभवे केवलान्वयित्वाभावात् कस्याप्रामाण्यं प्रसाध्येत, न कस्यापि । अपि च व्यावृत्तिर्नाम अभावः,रहितत्वमपि प्रतिषेध एव । तथा च प्राभाकरपक्षे अभावप्रतियोगिप्रतिषेधाभावात् स्वरूपासिद्धो हेत्वाभास । विपक्षाव्यावृत्तिरहितत्वं नाम विपक्षस्वरूपमेव । तत्र केवलान्वयिनि नास्तीति स्वरूपासिद्धो हेतुः स्यात् । तस्मात् केवलान्वयि प्रमाणं व्याप्तिमत्पक्षधर्मत्वात् धूमानुमानवदिति स्थितम् ।। [२८. कवलव्यतिरेकि अनुमानम् ] सपक्षरहित. विपक्षसहित केवलव्यतिरेकी। आत्मा चेतनः नात- शंकामार मीमालक का प्रश्न है कि केवलान्वयी हेतु प्रमाण नही होता क्यों कि इस में विपक्ष में अभाव यह गुण नहीं है, अनैकान्तिक हेत्वाभास में भी विपक्ष में अभाव यह गुण नहीं होना इसीलिए वह हेत्वाभास होता है अतः इस कंवलान्वयी हेतु को भी प्रमाण नहीं मान सकते। किन्तु इस आक्षेप में विपक्ष में अभाव न होना यह जो हेतु है यह अज्ञातासिद्ध है (इस का अस्तित्व सिद्ध नहीं हुआ है ) क्यों कि इस केवलान्वयी हेतु में अमुक विपक्ष है इस तरह का ग्रहण तथा उस में इस हेतु का अभाव है इस प्रकार का स्मरण नहीं हो सकता इसलिए विपक्ष में अभाव न होने का ज्ञान ही नही हो सकता । यदि विपक्ष के अस्तित्व का ग्रहण हो सके तो यह हेतु केवला- न्वयी ही नहीं रहेगा अत. अप्रमाण किसे सिद्ध करेंगे ? प्राभाकर मीमासकों के पक्ष में भी विपक्ष में अभगव न होना यह आक्षेप स्वरूपासिद्ध है (उस का स्वरूप सिद्ध नहीं हैं ) क्यों कि उन के मतानुसार व्यावृत्ति का अर्थ अभाव है तथा रहित होने का अर्थ भी अभाव ही है । प्राभाकर मीमासकों के मता- नुसार विपक्ष में व्गवृत्ति के अभाव का अर्थ है विपक्ष का स्वरूप । और इस केवलान्वयी हेतु में विपक्ष ही नहीं है इसलिए विपक्ष में अभाव नहीं है यह कहना स्वरूपासिद्ध हो जाता है | इसलिए बुए अग्नि के अनुमान के समान ही केवलान्वयी हेतु भी प्रमाणभूत होता है क्यों कि वह व्याप्ति से युक्त तथा पक्ष का वम है यह निष्कर्ष स्थिर हुआ । केवलव्यतिरेकी अनुमान जिस हेतु में विपक्ष होता है किन्तु सपक्ष नहीं होता उसे केवलव्यति- प्रमाप्रमेय [१.०८- त्यात् , यो य चेनतो न भवति म मर्चाऽपिकाना न भवनि, या पदा, माता चायमात्मा, तम्माचेतनो भवनि प्रत्यादि । ननु वलयनिक न प्रमाणं सपक्षमत्त्वहिनत्वात् विगत त्यपि मीमांसफः प्रागुन। अन सपथग्रहणसत्त्वम्मरणयोरभावे नपक्षासवरहिनन्यन्य सामगश्य- त्वात् अपातासितो हेतुः स्यात्। नपक्षग्रहणम्भवे वलयतिरेकि त्वाभावात् कस्याप्रामाण्यं प्रमाध्यत न कम्यापि। प्राभाकर पर नपठे सत्त्वरहितत्वं नाम स्पक्षधरपमात्रमेव । नटर ग्रेवन्दव्यतिविणि नास्तीति स्वम्पारिरद्धलं हेतो यात। ततः चलव्यतिरेकि प्रमाणे व्याप्तिमत्पक्षधर्मत्वात् धृमानुमानचदिति स्थितम । 1 कि इस में रेकी कहते हैं । उदा मात्मा चतन है क्यों कि वह जाता है, जो बनन नहीं होता वह ज्ञाता नही होता जन बम्ब, आमा जाना है, अतः बद चलन है । ( इस अनुमान में समा इन पक्ष में चेत्न होना लाय? नया जाना होना हेतु है, इस में पट इत्यादि विपक्ष तो नंम्ब है किन्तु सपक्ष नमन, नहीं है क्यों कि जिन्ने भी जाता है वे सब आमा होने से पक्ष में ही समा- विष्ट हो जाते हैं अतः यः हेतु केबन्तव्यतिरेकी है)। यहा भी मीमगरक शकाकार प्रश्न करते हैं कि केवलयतिरेकी अनुमान प्रमाण नहीं होना क्यों सपक्ष मे हेत का अस्तित्व होना यह गुण नहीं हैं। विन्द्ध हेत्वा- भास में भी साक्ष मे अस्तित्व न होना यही दोप होता है और उसी से वह अप्रमाण होना है । मीमासकों के इस आक्षेप में सपक्ष में अस्तित्व न होना यह हेतु अज्ञातासिद्ध है । उसका होना सिद्ध नहीं है ) क्या कि मपक्ष का अस्तित्व ग्रहण करना तथा उम में हेतु के अस्तित्व को स्मरण करना यहाँ संभव नहीं है (यहा सपक्ष ही नहीं है अत: मपक्ष में हंतु है या नहीं है यह कहना सभव नही है। यदि सपक्ष का ज्ञान सभव हो तो वह हेतु केवलव्यति- रेकी नहीं रहेगा, फिर अप्रमाण किले सिद्ध करेंगे। प्राभाकर मीमानकों के पक्ष में भी सपक्ष में अस्तित्व के अभाव का अर्थ सपक्ष का स्वरूप ही है। वह सपक्ष इस केवल व्यतिरेकी हतु में है ही नहीं अत. सपक्ष में अस्तित्व नहीं यह कहना स्वरूपासिद्ध हो जाता है । इमलिए केवलव्यतिरेकी हेतु भी प्रमाणभूत होता है क्यों कि धुंए से अग्नि के अन्मान के समान ही यहां भी व्याप्ति से -१.२९] अनुमान के तीन भेद २५. [२९, अनुमानभेदत्रयम् ] तत् सर्व त्रिविधं दृष्टानुमानं सामान्यतोदृष्टानुमानम् अदृष्टानुमान चेति। अस्मदादिप्रत्यक्षगृहीतव्याप्तिकम् अस्मदादिप्रत्यक्षग्रहणयोग्यार्था- नुमापकं दृष्टानुमानम । पर्वतोऽग्निमान् धूमवत्त्वात् महानसवत् इत्यादि। अस्मदादिप्रत्यक्षेण सामान्यतो गृहीतव्याप्तिकम् अतीन्द्रियार्थानुमापर्क सामान्यतोदृष्टानुमानम । रूपादिपरिच्छित्तिः करणजन्या क्रियात्वात् , या या क्रिया सा सा करणजन्या यथा घटक्रिया, क्रिया चेयं रूपादि- परिच्छित्तिः, तस्मात् करणजन्या इत्यादि। आगमेनैव निश्चितव्याप्तिकम् युक्त होना तथा पक्ष का धर्म होना ये दोनों गुण हेतु मे है यह मत स्थिर हुआ। से अनुमान के तीन भेद उपर्युक्त सभी अनुमानो के तीन प्रकार होते है-दृष्ट अनुमान, सामान्य- तोदृष्ट अनुमान तथा अदृष्ट अनुमान ! जिम अनुमान की (आधारभूत ) व्याप्ति का ज्ञान हम जैसे लोगों क प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा हुआ हो तथा हम जैसे लोगों के प्रत्यक्ष ज्ञान द्वारा जानने योग्य पदार्थ का ही जिम से बोध होता हो वह दृष्ट अनुमान कहलाता है जैसे- पर्वत अग्नियुक्त है क्यों कि यह धुए से रक्त है जैसे रसोईघर (धुए युक्त होता हे तब अग्नि से युक्त होता ही है) ( यहां धुंआ और अग्नि इन की व्याप्ति प्रत्यक्ष से जानी गई है तथा अनुमान से जाना गया पदार्थ अग्नि भी प्रत्यक्ष से जाना जा सकता है अतः यह दृष्ट अनुमान है)। जिस की व्याप्ति का सामान्य रूप से हम जैसे लोगों के प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञान होता है किन्तु जिस से ज्ञात हानेवाला पदार्थ अतीन्द्रिय (इन्द्रियप्रत्यक्ष स न जाना जाये) होता है उस अनुमान को सामान्यतोदृष्ट कहते हैं । जैसे-रूप आदि का ज्ञान साधनसे होता है क्यों कि वह क्रिया है, जो जो क्रिया होती हैं वह वह साधन से निष्पन्न होती है जैसे घट की क्रिया यह रूप आदि का ज्ञान भी क्रिया है अत यह भी साधन से निष्पन्न होती है ( यहा क्रिया और साधन से निप्पन्न होना इन की व्याप्ति सामान्यत हमारे प्रत्यक्ष से ज्ञात होती है किन्तु इस अनुमान मे बोधित होनेवाला पदार्थ - रूप आदि का ज्ञान साधन से निष्पन्न होता है - इन्द्रियप्रत्यक्ष से नही ।

२६ प्रमाप्रमेयम् [१.३०- अतीन्द्रियार्थानुमापकम् अदृष्टानुमानम्। मुक्तात्मा सकलक्लेशरहितः सकलकर्मरहितत्वात् , यो यः सकलक्लेशरहितो न भवति स सर्व सकलकर्मरहितो न भवति यथा संसारी, सकलकर्मरहितश्चायं मुक्तात्मा, तस्मात् सकलक्लेशरहितः इत्यादि । [३०. अनुमानाभासः व्यातिपक्षधर्मतारहितहेतोः साध्यसाधनम् अनुमानामासः। तत्र पक्षधर्मरहितो हेतुरसिद्धः। व्याप्तिरहिता हेतवः विरुद्धानकान्तिकान- ध्यवसितकालात्ययापदिष्टप्रकरणसमा। सिद्धे प्रत्यक्षादिवाघिते च साध्ये प्रयुक्तो हेतुरकिंचित्करः। अकिंचित्करस्य व्याप्तिपक्षधर्मताराहि- जाना जा सकता अत: यह सामान्यतोदृष्ट अनुमान है)। जिस की व्याति का निश्वर केवल आगम से ही होता हो तथा जिस से ज्ञात होनेवाला पदार्थ भी अतीन्द्रिय हो उस अनुमान को अदृष्ट कहते हैं। जैसे-मुक्त आत्मा सभी दुखों से रहित होता है क्यों कि वह सभी कर्मों से रहित होता है, जो सभी कमों से रहित नहीं होता वह सभी दुःखों से रहित नही होता जैसे संसारी जीव, मुक्त आत्मा सभी कर्मों से रहित होता है, अतः वह सभी दुखों से रहित होता है (यहां मुक्त आत्मा का सभी दुखों से रहित होना यह विषय अतीन्द्रिय है तथा जो कर्मरहित होता है वह दु खरहित होता है. यह व्याति भी प्रत्यक्ष से नहीं जानी जाती, इस का निश्चय केवल आगम से होता है अत. यह अदृष्ट अनुमान है)। अनुमान के आभास जो व्याति से रहित है तथा पक्ष का धर्म नहीं है ऐमे हेतु से साव्य को सिद्ध करना यह अनुमान का आभास है । जो हेतु पक्ष का धर्म नहीं होता उसे असिद्ध कहते है। विरुद्ध, अनैकान्तिक, अनध्यवसित, कालात्यया- पदिष्ट तथा प्रकरणमम ये हेतु व्याति से रहित होते है । जो साध्य पहले ही सिद्ध हो उस के विषय में तथा जो प्रत्यक्ष आदि से बावित हो उस के विषय में प्रयुक्त हेतु अकिंचित्कर कहलाता है । अकिंचित्कर हेतु व्याति से रहित नहीं होता तथा पक्षमवरहित भी नही होता फिर उसे (हेतु का) आभास कैसे कहा जाय ऐसा प्रश्न हो सकता है, उत्तर यह है कि उस का अनुमान के आभास २७ त्याभोवस्तर्हि तस्यामासत्वं कौतस्कुतमिति चेत् प्रतिवाद्यसिद्धाप्रमादक त्वात्। साध्यविकलादिदृष्टान्ताभासाश्च व्याप्तिरहिताः। तद् यथा। अनिश्चितपक्षवृत्तिः हेतुरसिद्धः। पक्षविपक्षयोरेव वर्तमानो हेतुः विरुद्ध । पक्षत्रयवृत्तिर्हेतुः अनैकान्तिकः । प्रतिवादिग्रसिद्धसाध्ये प्रयुक्तो हेतुर- किंचित्करः। अनिश्चितव्याप्तिकः पक्ष एव वर्तमानो हेतुः अनध्यवसितः। चाधितसाध्ये पक्षे प्रयुक्तो हेतुः कालात्ययापदिष्ट । स्वपरपक्षसिद्धाव- पित्रिरूपो हेतुःप्रकरणसमः॥ [३१. असिद्धभेदाः] तत्रासिद्धभेदा । पक्षेऽविद्यमानो हेतु स्वरूपासिद्ध , अनित्य शब्द: चाक्षुपत्वात् प्रदीपवत् । भिन्नाधिकरणे प्रयुक्तो हेतुः व्यधिकरणासिद्धः, प्रमादपूर्ण (दोषपूर्ण) न होना प्रतिपक्षी के लिए असिद्ध है (प्रतिपक्षी उस हेतु मे दोप वतला सकता है अत. उसे हेतु का आभास कहा है)। साध्य- विकल आदि दृष्टान्ताभास भी व्याप्ति से रहित होते हे ( इन का आगे वर्णन करेंगे)। (हेवाभासों के लक्षण ) इस प्रकार हैं - जिस हेतु का पक्ष में अस्तित्व निश्चित नही हो वह असिद्ध होता है। जो हेतु पक्ष में तथा विपक्ष में ही हो (सपक्ष में न हो) वह विरुद्ध होता है । जो हेतु नीनों पक्षों में (पक्ष सपक्ष तथा विपक्ष मे ) हो वह अनैकान्तिक होता है। प्रतिबादी के लिए जो साध्य पहले ही सिद्ध होता है उस के विषय में प्रयुक्त हेतु अकिंचित्कर होता है । जो हेतु पक्ष में ही हो किन्तु जिस की व्याति अनिश्चित हो वह अनध्य- चसित होता है । जिस पक्ष में साध्य का अस्तित्व बाधित है उस के विषय में प्रयुक्त हेतु कालात्यापदिष्ट होता है । जिस हेतु के तीनों रून (पक्ष में अस्तित्व, सपक्ष में अस्तित्व, विपक्ष में अभाव ) अपने पक्ष के तथा प्रतिपक्ष के - दोनों के सिद्ध करने में प्रयुक्त होते हैं वह प्रकरणसम होता है (इन सब हेत्वाभासों के उपभेद तथा उदाहरण अब क्रमशः बतायेगे)। असिद्ध हेत्वाभास के प्रकार असिद्ध हेत्वाभास के भेद इस प्रकार हैं-जो हेतु पक्ष मे विद्यमान न हो वह स्वरूपासिद्ध होता है, जैसे-शब्द अनित्य है क्यों कि वह चाक्षुप है (चाक्षुष होना यह हेतु शब्द इस.पक्ष में विद्यमान नही है अत. यह स्वरूपासिद्ध है)।

प्रमामयम् पर्वतोऽग्निमान् महान सम्य धूमवत्त्वात गटवत् । रक्षकदेशे वर्तमानी हेनु: भागासिद्धः, अनिन्य शब्दः प्रयन्नजन्यत्वात् पश्चत् । पऽनियमान- विगेप्यो हेनु: विशेष्यासिनः, अनित्यः शब्दः सामान्यवान मति चाचप- त्वात् । पक्षेऽविद्यमानविपणो हेतु विशेषणानिता, अनिन्यः गन्दः चाक्षुपन्चे सति सामान्यवत्त्वात् । पटरे अशातो हेतुः अमाताग्निता, रागादिरहित कपिलः उत्पन्नतवमानत्वात। मंदिग्धानिलयायमेव । पत्रे संदिग्धविगेयो हेतु संदिग्धविशेष्यालिद्धः, फपिलो गगादिमान पुग्यत्वे सति अनुत्पन्नतत्त्वज्ञानन्यात् । पक्षे संदिग्धविशेपणो हेतुः नंदिग्यविशे- (पक्ष से ) भिन्न स्थान में प्रयुक्त हेतु व्यधिकरणासि होता है, अमे-पर्वत अग्नि से युक्त हैं क्यों कि रसोईवर धुंए से युक्त है जैस मठ (यहां से युक्त होना यह हेतु पर्वत इस पक्ष में न बतला कर उस से भिन्न स्थान रसोईघर में बतलाया है अत: यह व्यधिकरणामिद्ध है)। पक्ष के पक हिन्ले में जो विद्यमान हो (वर्वत्र न हो ) उन हेतु को भागासिद्ध कहते हैं, जैने इन्ट अनित्य है क्यो कि यह प्रयत्न से उत्पन्न होता है जैसे अन्न ( यहां प्रयत्न से उत्पन्न होना यह हेतु शब्द इस पक्ष के एक हिस्से में विद्यमान है, सर्वत्र नहीं, क्यो कि अक्षरात्मक शब्द तो प्रयत्न से उत्पन्न होता है और मेघगर्जनादि अन्ट विना प्रयत्न के भी उत्पन्न होता है अतः यह हेन भागा- सिद्ध है)। जिस का विशय पक्ष में विद्यमान न हो वह हेतु विशश्यासिद्ध होता है, जैसे- शब्द अनित्य है क्यों कि वह सामान्ययुक्त होते हुए चाक्षुष, होता है ( यहां सामान्ययुक्त होते हुए चाक्षुप होना इस हेतु का विशेष्य अर्थात चाक्षुप होना शब्द इस पक्ष में नहीं पाया जाता अत. यह हेतु विश- ध्यासिद्ध है)। जिस हेतु का विशेषण पक्षमें विद्यमान न हो वह विशेषणासिद्ध होता है जैसे- शब्द अनित्य है क्यों कि वह चाक्षुष होते हुए सामान्ययुक्त है (यहा चाक्षुष होते हुए सामान्ययुक्त होना इस हेतु का विशेषण अर्थात चाक्षुष होना शब्द इस पक्ष में नहीं पाया जाता अत. वह हेतु विशेषणासिद्ध है)। पक्ष में जिस हेतु के अस्तित्व का ज्ञान न होता हो,यह अज्ञाता सिद्ध होता है,जैसे-- कपिल राग आदि से रहित है क्यों कि उन्हें तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ है (यहां कपिल इस पक्ष में तत्त्वज्ञान उत्पन्न होना इस हेतु का अस्तित्व जाना नही गया १.३१] असिद्ध हेत्वाभास २९ पणासिद्ध , कपिलो रागादिमान अनुत्पन्नतत्वज्ञानत्वे सति पुरुषत्वात् । निरर्थविशेष्यवान् हेतु व्यर्थविशेप्यासिद्धः, अनित्यः शब्दः कृतकत्वे सति सामान्यवत्त्वात् । निप्प्रयोजनविशेषणवान् हेतुः व्यर्थविशेषणासिद्धः, अनित्य शब्दः सामान्यवत्वे सति कृतकत्वात् । प्रमाणेनासिद्ध पक्षे प्रयुक्तो हेतुः आश्रयासिद्धः, अस्ति प्रधानं विश्वपरिणामित्वात् । एतत् नाद्रियते जैन, पक्षस्य विकल्पसिद्धत्वप्रतिपादनात् ॥ है अतः यह अज्ञातासिद्ध हेतु है)। इसी को सदिग्वासिद्ध भी कहते हैं । जिस का अस्तित्व विशेष्य में है या नहीं इस में सन्देह हो वह हेतु संदिग्धविशेष्या- सिद्ध होता है। जैसे-कपिल राग आदि से युक्त है क्यों कि पुरुष होते हुए उसे तत्त्वज्ञान उत्पन्न नही हुआ है (यहा तत्त्वज्ञान उत्पन्न न होना यह विशेष्य- कपिल इस पक्ष में है या नहीं यह संदिग्ध है अत यह सीदग्धविशेष्यासिद्ध हेतु हुआ)। जिस के विशेषण का अस्तित्व में पक्ष मे सदिग्ध हो वह हेतु संदिग्ध- विशेषणासिद्ध होता है। जैसे-कपिल राग आदि से युक्त है क्यों कि तत्त्वज्ञान उत्पन्न न होते हुए वह पुरुष है (यहा तत्त्वज्ञान उत्पन्न न होना यह विशेषण कपिल इस पक्ष में संदिग्ध है अत. यह हेतु संदिग्वविशेषणासिद्ध हुआ)। जिस हेतु में विशेष्य निरर्थक हो वह व्यर्थविशेष्यासिद्ध होता है । जैसे- शब्द अनित्य हैं क्यों कि वह कृतक होते हुए सामान्य से युक्त है (यहा सामान्य से युक्त होना यह विशेष्य निरुपयोगी है अत' यह हेतु व्यर्थ विशेष्यासिद्ध हुआ)। जिस हेतु का विशेषण निरुपयोगी हो वह व्यर्थ विशेषणासिद्ध होता है । जैसे- शब्द अनित्य है क्यों कि वह सामान्ययुक्त होते हुए कृतक है (यहा सामान्य- युक्त होते हुए यह विशेषण निरुपयोगी है अत. यह हेतु व्यर्थ विशेपणासिद्ध हुआ)। जो पक्ष प्रमाण से सिद्ध न हुआ हो उस के विषय में प्रयुक्त हेतु आश्रयासिद्ध होता है । जैसे-प्रधान (प्रकृति) का अस्तित्व है क्यों कि यह 'विश्व उसी का परिणाम है (विकसित स्वरूप है) (यहां प्रकृति इस पक्ष का अस्तित्व प्रमाणसिद्ध नहीं है अत' इस के बारे में सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे) जैनों द्वारा इस को (आश्रयासिद्ध हेत्वाभास को ) मान्यता नहीं दी जाती क्यों कि वे पक्ष को विकल्पसिद्ध भी मानते हैं ( जिस का अस्तित्व है या नहीं इस के विषय में सन्देह हो वह पक्ष विकल्पसिद्ध होता है-उस के विपय में भी अनुमान हो सकता है ऐसा जैनों का मत है)।

प्रमाप्रमेयम् [१.३२--- [३२. सपक्षसद्भावे विरुद्धभेदाः] साध्यविपरीते निश्चितव्याप्तिको हेतु विरुद्धः। तभेदाः सति लपक्ष चत्वारो विरद्धाः पविपक्षव्यापको यथा-नित्य शब्दः कार्य- त्वात् । पसरूपे शब्दे कार्यत्वमस्ति, विपक्षरूपे अनित्ये घटपटादौ च सर्वत्रास्ति कार्यत्वम् । विपक्वेशवृत्तिःपक्षव्यापको यथा-नित्य शब्द:- सामान्यवत्वे सति अस्मदादिवाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात्। विपक्षरूपे घटादी वाह्येन्द्रियग्राह्यत्वास्ति, विपक्षरूपे सुखादी तन्नास्त्येव, पक्षीकृतेपु शब्देपु सपक्ष के रहते हुए विरुद्ध हेत्वाभास के प्रकार जिस की च्यामि साध्य के विरुद्ध पक्ष में निश्चित हो उस हेतु को विरुद्ध कहते हैं । सपक्ष के रहते हुए उस विरुद्ध हेत्वाभाल के चार प्रकार होते हैं । पक्ष तथा विपक्ष में व्यापक विरुद्ध हेत्वाभास का उदाहरण- शब्द नित्य हैं क्यों कि वह कार्य है । यहां शब्द इस पक्ष में कार्य होना (यह हतु) है, विपक्ष अर्थात घट पट इत्यादि अनित्य पदार्थों में भी सर्वत्र कार्य होना (यह हेतु) विद्यमान है (अत यह हेतु पक्षविपक्षधारी विन्ह हेलाभान है) पक्ष में व्यापक तथा विपक्ष के एक भाग में रहनेवाले विरुद्ध हेत्वाभाम का उदाहरण-शब्द नित्य है क्यों कि सामान्य से युक्त होते हुए वह हम जैसे. लोगों को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञात होता है। यहा घट इत्यादि विपक्ष में (अनित्य पढार्यों में) बाह्य इन्द्रियों से ज्ञात होना ( यह हेतु) है, सुख इत्यादि विपक्ष में (अनित्य पदार्थों में) वह नहीं है (वे बाह्य इन्द्रियो से ज्ञात नहीं होते) तथा शब्द इस पक्ष में सर्वत्र बाह्य इन्द्रियों से ज्ञात होना (यह हेतु ) विध- मान है (अत यह विपभैकदेशदृत्ति पक्षव्यापक विरुद्ध हेत्वाभास है)। पक्ष तथा विपक्ष दोनों के एक भाग में रहनेवाले विरुद्ध हेत्वाभास का उदाहरण शब्द नित्य है क्यो कि वह प्रयत्न से उत्पन्न होता है । यहा पक्ष में जो शब्द ताल, होंठ आदि की हलचल से उत्पन्न होते हैं उन में तो प्रयत्नजनित होना यह हेतु है किन्तु नही की आवाज, मेघगर्जना आदि शब्दों में वह हेतु नही है (वे भब्द प्रयत्नजनित नही हैं), घट इत्यादि विपक्ष में वह (प्रयत्नजनित होना) विद्यमान है किन्तु प्रागभाव जैसे विपक्ष में वह नहीं है (प्रागभाव प्रयत्नजनित नही होता, किसी वस्तु के उत्पन्न होने से पहले उस का जो - -१.३३] विरुद्ध हेत्वाभास ३१ AJ सर्वत्र वाहोन्द्रियग्राह्यत्वमस्ति । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिर्यथा-नित्य शब्द प्रयत्नजन्यत्वात् । पक्षीकृते ताल्बोष्ठपुटव्यापारजनिते शब्दे प्रयत्नजन्यत्व- मस्ति, नदीघोषमेघगर्जनादौ तन्नास्ति, विपक्षरूपे घटादौ तद् विद्यते, प्रागभावे तन्नास्ति । पक्षकदेशवृत्तिः विपक्षव्यापको यथा-नित्या पृथिवी कृतकत्वात्। पक्षरूपे पृथिव्यादौ कृतकत्वसस्ति, पृथ्वीगततत्स्वरूपपरमाणुषु तदपि नास्ति, विपक्षरूपे अनित्ये घटपटादौ सर्वत्र कृतकत्वं व्यानमस्ति । [३३. सपक्षाभाचे विरुद्धभेदाः] असति सपक्षे चत्वारो विरुद्धा । पक्षविपक्षव्यापको यथा- आकागविशेषगुण शब्दः प्रमेयत्वात् । पन्नीकृते शब्दे सर्वत्र प्रमेयत्व- मस्ति । शब्दं विहायान्यपदार्थाः आकाशविशेषगुणा न भवन्ति अत एव अभाव होता है उसे प्रागभाव कहते है वह स्वाभाविक होता है प्रयत्ननिर्मित नहीं) ( इस प्रकार यह हेतु पक्षविपक्षकदेशव्यापी विरुद्ध हेत्वाभास है)। पक्ष के एक भाग में रहनेवाला और विपक्ष में व्यापक विरुद्ध हेत्वाभास इस प्रकार होता है -पृथिवी नित्य है क्यो कि वह कृतक है। यहा पृथिवी इस पक्ष में कृतक होना ( यह हेतु ) है, किन्तु पृथ्वी मे समाविष्ट उस के स्वरूप के परमाणुओं मे वह (कृतक होना) नहीं है (न्यायमत के अनुसार पृथ्वी आदि के परमाणु नित्य है, वे किसी के द्वारा बनाये नहीं जाते, उन परमाणुओ से ईश्वर पृथ्वी आदि का निर्माण करता है, अत' पृथ्वी - कृतक है किन्तु पृथ्वी- परमाणु कृतक नहीं हैं ), वट पट इत्यादि विपक्ष मे ( अनित्य पदार्थों में ) सर्वत्र कृतक होना (यह हेतु) व्यात है (अत यह पक्षकदेशवृत्ति विपक्षव्यापक विरुद्ध हेत्वाभास है)। सपक्ष के अभाव मे विरुद्ध हेत्वाभास के चार प्रकार- सपक्ष न हो तो विरुद्ध हेत्वाभास के चार प्रकार होते है। पक्ष और विपक्ष में व्यापक विरुद्ध का उदाहरण-शब्द आकाश का विशेष गुण है क्यो कि वह प्रभेय है । यहा प्रमेय होना यह हेतु शब्द इस पक्ष में सर्वत्र व्याप्त है, शब्द को छोड अन्य पदार्थ आकाश के विशेष गुण नही होते अत' वे सब विपक्ष है, उस घट पट आदि विपक्ष में सर्वत्र प्रमेय होना यह हेतु है -- प्रमाप्रमेयम् - ते विपक्षाः। विपक्षरूपेषु तेषु चटपटादिषु सर्वत्र प्रमेयत्वमस्ति । पक्ष- विपक्षकदेशवृत्तिर्यथा-आकाशविशेषगुण शब्दःप्रयत्नानन्तरीयकन्वात् । पक्षतां प्रपन्ने ताल्योष्टपुटव्यापारघटिते शब्दे प्रयत्नानन्तरीयकत्वमस्ति, पर्जन्यगर्जनादिशब्दे नास्ति । विपक्षरूपेषु घटपटादिपु सोऽयं हेतुरस्ति। प्रागभावादी स न संभाव्यते । पक्षव्यापको विपक्षकदेशवृत्तिर्यथा- आकागविशेषगुणः शब्द अस्मदादिवाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात्। पक्षीकृतेषु शन्देपु हेतुः सर्वत्रास्ति, विपक्षरूपे घटपटाढावपि हेतुरयं समस्ति, सुखादी हेतुरयं न विद्यते। विपक्षव्यापकः पश्यैकदेशवृत्तिः यथा-- आकाशविशेपगुण' शब्दः अपदात्मकन्वात्। विपक्षरूपेषु घटपटादिपु A - (अत' यह पक्षविपक्षव्यापी विरुद्ध हेत्वाभास है )। पक्ष और विपक्ष के कुछ भाग में व्यापक विरुद्ध का उदाहरण- शब्द आकाश का विशेष गुण है क्यों कि वह प्रयत्न से उत्पन्न होता है। यहां पक्ष में नमाविष्ट शब्दों में जो नाल, होंठ आदि की क्रिया से उत्पन्न होते हैं उन शब्दों में प्रयत्न से उत्पन्न होना यह हेतु है, किन्तु मेवगर्जना आदि शब्दों में यह हेतु नहीं है (वे शब्द प्रयत्न जन्य नहीं होते ); तथा वट, पट आदि विपक्षों में यह हेतु है किन्तु प्रागभाव आदि में नहीं है प्रागभाव आदि प्रयत्नजन्य नहीं होते) (अतः यह पक्ष और विपक्ष दोनों के एक भाग में रहनेवाला विरुद्ध हेत्वाभास है)। पक्ष में व्यापक और विपक्ष के एक भाग में रहनेवाले विरूद्ध का उदाहरण शब्द आकाश का विशेप गुण है क्यों कि वह बाह्य इन्द्रियों से ज्ञात होता है । यहां शब्द इस पक्ष में बाह्य इन्द्रियों से ज्ञात होना यह हेतु सर्वत्र व्याप्त हैं, घट पट आदि विपक्ष में भी यह हेतु है किन्तु सुखदुःख आदि विपक्ष में यह हेतु नहीं हैं (वे वाह्य इन्द्रियों से ज्ञात नहीं होते) (अतः यह पक्षव्यापी विपक्षकदेशवृत्ति विरुद्ध हेत्वाभास हैं)। विपक्ष में व्यापक तथा पक्ष के एक भाग में रहनेवाले विरुद्ध का उदाहरण- शब्द आकाश का विशेप गुण है क्यों कि वह पदरूप नहीं है । यहा घट पट आदि विपक्ष में सर्वत्र पदरूप न होना यह हेतु व्यात है, पक्ष में समाविष्ट नदी का ध्वनि, मेवगर्जना आदि शब्दो में भी यह हेतु है (वे शब्द पदरूप नहीं होते) किन्तु तालु, होठ आदि की क्रिया से उत्पन्न शब्दों में यह हेतु नही है (वे शब्द पदरूप -१.३४] अनैकान्तिक हेत्वाभास ३३ पदारकत्व सर्वत्र व्यात्मस्ति, पक्षरूपे नदीघोपजलधरनिनदादौ च अपनात्मकत्वं विद्यते, तात्वोटपुटव्यापारजनिते शब्ढे नास्ति। ननु पक्षेत्रदेशवर्तिना भागासिद्धत्वेन अग्निद्धभेदत्वात् तेपा किमर्थमत्र प्रयोग इति चेत् केपांचित् हेदनासुभयढोपसद्भावप्रदर्शनार्थम् ॥ [३४ अनेकान्तिकसेदाः पक्षव्यापकाः] विपक्षेऽपि वृत्तिमान् हेतुरनेकान्तिक । तद्भेदाः। पक्षत्रयव्यापको यथा-ॐनित्य शब्द प्रमेयत्वात् । पक्षरूपे शब्दे सर्वत्र प्रमेयत्वमस्ति, सपक्षे घटपटादी चास्ति. तथा नित्यरूपे विपक्षे आकाशादौ च प्रमेयत्वं सर्वत्र व्यातम्। पक्षव्यापकः सपक्षविपक्षकदेशवृत्ति यथा-अनित्य शब्दः अस्मदादिवाहेन्द्रियत्राह्मत्वात्। पक्षरूपे शब्दे अस्मदादिप्रत्यक्षत्वं सर्वत्र व्याप्तमस्ति, अनित्यरूपे सपक्षे घटपटादो अस्ति, अनित्यरूपे -- होते हैं ) (अत या विपक्षव्यापी पक्षकदेशवृत्ति विरुद्ध हेत्वाभास है)। यहा प्रश्न होता है कि जो हेतु पक्ष के एक भाग मे ही होता है (अन्य भागों मे नहीं होता ) वह भागामिद्ध होता है, वह आसिद्ध हेत्वाभास का प्रकार है, फिर यहा उस का प्रयोग क्यो किया है। उत्तर यह है कि कुछ हेतुओं मे दोनो दोप (असिद्ध होना और विरुद्ध होना) होते हैं यह बतलाने के लिए (ऐसे उदा- हरण दिये है)। पक्ष से व्यापक अनैकान्तिक हेत्वाभास , जो हेतु विपक्ष मे भी विद्यमान होता है उसे 'अनैकान्तिक हेत्वाभास कहते हैं। उस के प्रकारों के उदाहरण इस प्रकार हैं। तीनो पक्षो मे ( पक्ष, सपक्ष तथा विपक्ष में) व्याप्त होनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण-शब्द अनित्य है क्यों कि वह प्रमेय है । यहा शब्द इस पक्ष में सर्वत्र प्रमेय होना यह हेतु विद्यमान है, घट पट इत्यादि सपक्ष मे भी यह विद्यमान है तथा आकाश इत्यादि जो नित्य हैं उन विपक्ष के पदार्थों में भी प्रमेय होना सर्वत्र व्याप्त है। पक्ष मे व्यापक तया सपक्ष और विपक्ष के एक भाग मे रहनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण -शब्द अनित्य है क्यों कि वह हम जैसे लोगो के वाह्य इन्द्रियो द्वारा ज्ञात होता है । यहा शब्द इस पक्ष मे हम जैसे लोगों को प्रत्यक्ष ज्ञात प्र.प्र.३ ३४ प्रमाप्रमेयम् [१.३४- सपक्षे सुखादौ नास्ति, निन्यविपक्षरूपायां पृथिव्याम् अस्मदादिप्रत्यक्ष- त्वमस्ति, तद्गतपरमाणुपु नास्ति । पक्षमपक्षव्यापको विपक्षकदेशवृत्ति- यथा-गौरयं विषाणित्वात् । अयमिति पुरोवतिनि पक्ष विपाणित्वं व्याप्तमस्ति, तथा सपक्षरूपेषु अन्यगोषु च विषाणिवमस्ति, गवां विपक्षरूपे महिपादौ च विपाणित्वं विद्यते, तेपां विपक्षरूपे खरतुरगादी विषाणित्वं न प्रकाशते । पक्षविपक्षव्यापकः सपक्षकदेशवृत्तिः यथा- नायं गौ. विपाणित्वात् । अयमिति पुरोभागिपने चिपाणित्वं व्यानमभूत् । गौर्न भवति महिषीत्यस्य विपक्षो गौर्भवतीति तत्रापि वियाणित्वं विद्यते । गौन भवतीत्यस्य सपक्षो महिष्यादिः तेषु च विपाणित्वं विद्यते, खरतुर- गादौ नास्ति ।। - होना यह हेतु सर्वत्र व्याप्त है, सपक्ष में बट पट इत्यादि अनित्य पदार्थों में वह है किन्तु सपक्ष के ही सुख इत्यादि अनित्य वस्तुओं में यह हेतु नही है विपक्ष में नित्य पृथ्वी में हम जैसों को प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञात होना यह हेतु किन्तु उसी पृथ्वी के परमाणुओं में यह हेतु नही हैं | पक्ष और सपक्ष में व्यापक तथा विपक्ष के एक भाग में रहनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण- यह बैल है क्यों कि इसे सींग है । यह इस शन्द द्वारा वर्णित जो सामने स्थित है उस प्राणी में अर्थात पक्ष में सींग होना यह हेतु है, जो सपक्ष उन दूसरे बैलों में भी यह सींग होना विद्यमान है, बैलों के लिए विपक्ष ऐसे भैंस आदि में भी सींग होना यह हेतु है किन्तु उसी विपक्ष के गवे, घोडे आदि प्राणियों में यह हेतु नहीं है । पक्ष और विपक्ष में व्यापक तथा सपक्ष के एक भाग में रहनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण-यह वैल नहीं है क्यों कि इसे सींग हैं। यहां यह इस शब्द द्वारा वर्णित आगे खडे हुए प्राणी अर्थात पक्ष में सींग होना यह हेतु व्याप्त है, जो बैल नहीं है उस भैंस का विपक्ष बैल यही होगा, उस विपक्ष में भी सींग होना यह हेतु है, भैस आदि सपक्ष-जो बैल नही हैं उस में भी यह हेतु (सींग होना) विद्यमान है, किन्तु सपक्ष में ही समाविष्ट (जो बेल नहीं हैं ऐसे ) गधे, घोडे आदि में यह हेतु नही है।

-१.३५] अनेकान्तिक हेत्वाभास ३५ [३५ अनैकान्तिकभेदाः पक्षकदेशवर्तिनः] पक्षत्रयैकदेशवृत्तिः यथा-अनित्या पृथिवी अस्मदादियाह्येन्द्रिय- प्रत्यक्षत्वात् । पृथिव्यां पक्षरूपायाम् अस्मदादिप्रत्यक्षत्वमस्ति, तद्गत- ‘परमाणुपु नास्ति । सपक्षरूपेऽनित्ये घटपटादी अस्मदादिप्रत्यक्षत्वमस्ति न सुखादौ । नित्यरूपे विपक्ष प्रध्वंसाभावे अस्मदादिप्रत्यक्षत्वं विद्यते, कालान्माकाशादिषु नास्ति । पक्षसपश्चैकदेशवृत्तिः विपक्षव्यापको यथा- द्रव्याणि दिक्कालमनांसि अमूर्तत्वात् । पक्षरूपे दिक्काले अमूर्तत्वमस्ति, -मनसि नास्ति। सपने आत्माकाशेपु विद्यते, द्रव्यरूपेषु घटादिपु अमूर्तत्वं -नास्ति । अद्रव्यरूपे प्रागभावप्रध्वंसाभावेतरेतराभावात्यन्ताभावे अभाव- चतुष्टये अमूर्तत्वं सर्वत्र व्यातम् । पक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः सपक्षव्यापको न्यथा-न द्रव्याणि दिक्कालमनांसि अमूर्तत्वात् । पक्षरूपे दिक्काले में हम जैसे यक्ष के एक भाग में रहनेवाले अनैकान्तिक हेत्वाभास नीनो पक्षों के (पक्ष सपक्ष तथा विपक्ष के) एक भाग मे रहनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण-पृथ्वी अनित्य है क्यो कि वह हम जैसे लोगों के बाह्य इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष जानी जाती है । यहा पृथ्वी इस पक्ष -लोगों को प्रत्यक्ष ज्ञात होना यह हेतु है किन्तु इसी पक्ष में अन्तर्भूत पृथ्वी के परमाणुओं में यह हेतु नही है । सपक्ष में जो अनित्य घटपट आदि है उन में हमारे जैसे लोगों द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञात होना यह हेतु है किन्तु सपक्ष के ही सुख आदि में यह हेतु नहीं है । विपक्ष में जो प्रध्वंसाभाव आदि नित्य है उन में यह हेतु अर्थात हम जैसे लोगों द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञात होना विद्यमान है किन्तु काल, आत्मा, आकाश आदि नित्य पदार्थों में यह हेतु नही है । पक्ष और सपक्ष के एकभाग मे तथा विपक्ष में सर्वत्र रहनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण-दिशा, काल और मन द्रव्य हैं क्यों कि वे अमूर्त हैं । यहा पक्ष में शामिल दिशा और काल मे अमूर्त होना यह हेतु है किन्तु मन मे यह हेतु नही है । आत्मा, आकाश आदि सपक्ष मे यह हेतु (अमूर्त होना) है किन्तु घट आदि जो द्रव्य हैं ( अत एव सपक्ष हैं) उन में यह हेतु नहीं है। (विपक्ष में अर्थात ) जो द्रव्य नहीं हैं उन चार अभावों में - प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव एव अत्यन्ताभाव मे यह हेतु अर्थात अमुर्त हाना सर्वत्र व्याप्त है । पक्ष और विपक्ष के एक भाग में तथा सपक्ष में सर्वत्र ३६ प्रमानमयम [२.३५- अमूर्तत्वमस्नि, मनसि नास्ति । विपके द्रव्यरूपे आमाकाटोऽमर्तन्यास्ति, घटपटादो नास्ति । लपले अन्नध्यन् पेपु अभावचतुयेषु अमृतचं सर्वत्र व्यानस । लपक विपक्ष व्यापकः पक्षकदेशवृत्तिः यथा-न द्रव्याणि विकालात्माकागमनांसि आकाशचिोएगुपरहिनन्गत्तसपने द्रव्य- रपे असावचतुहये आकाशाविनेगुणरहितत्वं सर्वत्र व्यापनम् । विपने दुव्यरूपे घरपटादिपुचश-दाणरहितत्व सर्वच व्यान्म । पछीकृतेषु सर्वे विकालात्ममन तु आवागविशेषगुणरहितन्यमरित, आसान तनास्ति । [३६. अकिचित्करः] लिद्धे साध्यं हेतुर्न किंचित् करोतीति अविचित्वर । तेजसः प्रदीप उष्णस्पर्शवत्त्वात् पायकवत् । रहनेवाले अनेकान्तिक का उदाहरण -- दिगा, काल और मन द्रव्य नहीं है क्यों कि वे अमृत हैं । यहा पक्ष में शामिल दिया और काल में अमूर्त होना यह हेतु है किन्तु मन में नहीं है। जो द्रव्य है उन मे अर्थात विपक्ष में -बटपट आदि मे यह हेतु नहीं है, आत्मा, आकाश आदि में यह अमर्त होना विद्यमान है । जो द्रव्य नहीं है ऐसे चार प्रकार के अभावों में अर्थात सपक्ष में अमूर्त हो। यह हेतु सर्वत्र व्यास है । लपक्ष और विपक्ष में नर्वत्र तथा पक्ष के एक भाग में रहनेवाले अनैकान्तिक का उदाहरण - दिशा, काल, आत्मा, आकाश, मन ये द्रव्य नहीं है क्यों कि ये आकाश के विशेष गुण से रहित हैं । यहा जो द्रव्य नहीं हैं ऐसे चार अभावों में अर्गत सपक्ष मे हेतु अर्थात आकाश के विशेप गुण से रहित होना सर्वत्र व्याप्त है। विपक्ष जो द्रव्य हे उन घट पट आदि में भी यह हेतु अर्थात शब्द गुण स रहित होना सर्वत्र व्याप्त है । पक्ष मे शामिल दिशा, आत्मा, काल मन इन में यह हेतु है किन्तु आकाग मे यह हेतु नहीं है । अकिचित्कार हेत्वाभास जहा साध्य पहले ही सिद्ध हो वहा हेतु कुछ भी नहीं करता अतः उस अकिचिकर कहते हैं। जैसे दीपक तेज से बना है क्योंकि वह अग्नि वनमान उष्ण स्पर्श से युक्त है ( बहा दीपक का तैजस होना पहले ही सिद्ध हे अत उस के लिए उपस्पर्शयुक्त होना आदि हेतु व्यर्थ है - उन्हे अविचित्कार सहना चाहिए। - -१.३७] अनव्यवसित हेत्वाभास - [३७ अनध्यवसितः] जनध्यावसितमेदास्तु - अविद्यमान सपक्षविपक्ष पक्षव्या को यथा- सर्व क्षणिकं सत्वात् ! क्षणिकाक्षणिकयो. सपक्षविषयोः सर्वमित्यत्रेव अन्तर्भावात् सत्त्वादित्यस्य हेतोः ल तयो प्रवृत्तिः। सर्वेषु आकाशघट- पटादिपु पदार्थेषु सत्त्वादितीदं हेतुत्वं सर्वत्र व्यातमरित। भविद्यमानस- 'पक्षविपक्षः पक्षकदेशवृत्तिः यथा - सर्वमनित्यं कार्यत्वात् । अत्रापि सपक्षविपक्षयो अनित्यनित्ययो सर्वमित्यत्रैव अभेददर्शनात् न कार्यत्वस्थ पृथक् प्रवृत्ति । अत एव पो कचित् घटपटादी कार्यत्वमस्ति आत्मादिपु नास्ति। विद्यमानसपक्षविपक्षः पक्षव्यापको यथा- अनित्यः शब्दः आकागविगेपगुणत्वात् । सपक्षविपक्षरूपेषु घटपटात्मकालेपु प्राग- भावोऽनित्य सपझे प्रध्वं लाभाव विपक्षे सर्वत्र आकाशविशेषगुणाभावः। स्वीकृते शब्दे सर्वत्र आकाशविशेषणगुणत्वं व्यातं समस्ति । विद्यमानस- अनध्यवसित हेत्वाभास इस के प्रकार निम्नलिखित हैं | पक्ष में व्यात किन्तु सपक्ष तथा विपक्ष मे रहित अनव्यवसित का उदाहरण - सत्र पदार्थ क्षणिक है क्यों कि उन का अस्तित्व है। यहां जो भणिक हे वे पदार्थ सपक्ष होंगे तथा जो क्षणिक नही है वे विपक्ष होंगे किन्तु इन दोनों का सत्र पदार्थ इस पक्ष में ही अन्तर्भाव हो जाता है अत अस्तित्व होना यह हेतु सपक्ष या विपक्ष मे प्रवृत्त नहीं हो सकता। आकाश, वट, पट आदि जितने पदार्थ हैं उन सब में अस्तित्व होना यह हेतु सर्वत्र व्याप्त है । जिस में सपक्ष और विपक्ष नही हैं तथा जो पक्ष के एक भाग में है ऐसे अनध्यवसित का उदाहरण पदार्थ अनित्य हैं क्यों कि वे कार्य है। यहां भी अनित्य पदार्य सपक्ष होंगे -तथा नित्य पदार्थ विपक्ष होंगे किन्तु इन दोनों का सब पदार्थ इस पक्ष में ही अन्तर्भाव होने से कार्य होना यह हेतु अलग से सपक्ष या विपक्ष में प्रवृत्त नहीं हो सकता। यहां पक्ष में कहीं कहीं घट, पट आदि में कार्य होना यह हेतु है, आत्मा आदि पदार्यो में यह हनु नही है । पक्ष मे व्यापक तथा सपक्ष और विपक्ष ने युक्न अनध्यवमित का उदाहरण - शब्द अनित्य है क्यों कि वह आकाश का विशेष गुण है । यहा घट, पट आदि सपक्ष है, सव ३८ प्रमाप्रमेयम् [१.३७- पक्षविपक्षः पक्षकदेशवृत्तिः यथा - सर्व द्रव्यमनित्यं क्रियावत्त्वात् । सपक्षविपक्षस्पयोःप्रागभावप्रध्वंसाभावयो सतोरपि तत्र क्रियावत्त्वादिति हेतोरप्रवृत्ति । पक्षरूपेषु घटपटादिपु क्रियावत्त्वमस्ति, आकाशादिए नास्ति । अविद्यमानविपक्ष विद्यमानस पक्षः पक्षव्यापको यथा- सर्व कार्य नित्यम् उत्पत्तिधर्मकत्वात् । सर्वमित्यस्य विपक्षाभाव । सपक्षस्य प्रध्वं- साभावस्य विद्यमानत्वेऽपि हेतोत्पत्तिधर्मकत्वस्याप्रवृत्तिः। सर्वमिति पक्षीकृते घटपटादी उत्पत्तिधर्मकत्व व्याप्तमन्ति। अविद्यमान विपक्षः विद्य- मानसपक्षः पक्षकदेशवृत्तिर्यथा - सर्व कार्य नित्यं सावयवत्वात् । पूर्ववत्, सर्वमित्यस्य विपक्षाभावः। सपक्षे प्रध्यसाभावे सत्यपि सावयवत्वाभावः- आत्मा, काल आदि विपक्ष हैं, इन दोनों में आकाश का विशेष गुण होना यह हेतु नहीं है । इसी प्रकार सपक्ष में शामिल प्रागभाव अनित्य होता है उस में तथा विपक्ष में शामिट प्रध्वंमानाव नित्य होता है उस में भी यह हेतु नहीं हैं। ( पक्ष के रूप में ) स्वीकृत शब्द में सर्वत्र आकाश का विशेष गुण होना यह हेतु व्याप्त है । सपक्ष और विपक्ष के होते हुए पक्ष के एक भाग में रहनेवाले अनध्यवसित का उदाहरण सब द्रव्य अनित्य है क्यों कि वे क्रिया से युक्त हैं। यहां प्रागभाव यह म्पक्ष है (क्यों कि वह अनित्य है) तथा प्रध्वसाभाव यह विपक्ष है (क्यों कि वह नित्य है ) किन्तु इन दोनो में क्रियायुक्त होना यह हेतु नहीं पाया जाता । यहा पक्ष में शामिल घट, पट आदि में क्रियायुक्त होना यह हेतु है परन्तु आकाश आदि में ( वे द्रव्य है तथापि ) यह हेतु नहीं पाग जाता। जिस में विपक्ष न हो, सपक्ष हो तथा जो पक्ष में व्यापक हो एसे अनध्यवसित का उदाहरण नित्य हैं क्यों कि उन्पत्ति यह उन का धर्म है । यहां सब कार्य यह पक्ष है अतः इस में विपक्ष नहीं हो सकना । यहां प्रध्यमाभाव यह सपक्ष है (क्यो कि वह नित्य है ) तथापि रस में उत्पत्ति हाना यह हेतु नहीं पाया जाता। पक्ष में शामिल सब कार्यों में - घट, पट आदि में उत्पत्ति हाना यह हेतु व्याप्त है । जिस में विपक्ष न हो, साक्ष हो तथा जो के विद्यमान हो ऐसे अनध्यवासित का उदाहरण सब कार्य नित्य है क्यों कि वे अवयवसहित हैं। यहां पूर्वोक्त उदाहरण के समान ही मत्र कार्य यह पक्ष - सव कार्य- क्ष एक भाग में -१.३८]] कालात्ययापदिष्ट ३९ कार्यरूपे घटादौ सावयवत्वं विद्यते, कार्यरूपे प्रध्वंसाभावे नित्यत्वे विद्यमानेऽपि सावयवत्वं नास्ति । [३८. कालात्ययापदिष्टः ] कालात्ययापदिष्टस्तु कथ्यते । पक्षे साध्यस्य वाधा प्रत्यक्षानुमाना- गमलोकस्ववचनैः। तत्र प्रत्यक्षवाधा - अग्निः अनुप्णः द्रव्यत्वात् जलवत् । अनुमानवाधा - अनित्यः परमाणुः मूर्तत्वात् घटवत् इत्युपजीवकानुमान नित्यः परमाणुः अविभागित्वात् आत्मवत् इत्युपजीव्यानुमानेन वाध्यते । यत्रानुमानयोः उपजीव्योपजीवकभावे सति विरोधः तत्रोपजीव्यानुमानेन होने से विपक्ष का अस्तित्वही नहीं हो सकता। सपक्ष प्रध्वंसाभाव है किन्तु उस में अवयवसहित होना यह हेतु नहीं है । पक्ष में शामिल कार्यों में घट, पट आदि में अवयवसहित होना यह हेतु है किन्तु प्रध्वंसाभाब इस कार्य में नित्य होने पर भी अवयवसहित होना यह हेतु नहीं पाया जाता । कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास अब कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास का वर्णन करते हैं । (जिस का साध्य बाधित हो उस हेतु को कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभास कहते हैं यह ऊपर बता चुके हैं)। पक्ष में साध्य के बाधित होने के पाच प्रकार हैं- प्रत्यक्ष से. अनुमान से, आगम से, लोकरीति से तथा अपने ही कथन से । प्रत्यक्ष से बाधित साध्य का उदाहरण है- अग्नि उष्ण नहीं है क्यों कि वह द्रव्य है जैसे जल ( यहां अग्नि का उष्ण न होना यह साध्य प्रत्यक्ष से बाधित है)। अनुमान से बाधित साध्य का उदाहरण - परमाणु अनित्य है क्यो कि वह मूर्त है जैसे घट । यहां परमाणु के अनित्य होने का अनुमान उपजीवक है ! परमाणु नित्य है क्यों कि वह अविभागी है जैसे आत्मा इस उपजीव्य अनुमान से उपर्युक्त उपजीवक अनुमान बाधित होता है। जहां दो अनुमानों में एक उपजीवक तथा दुमरा उपजीव्य हो तथा उन में विरोध हो वहां उपजीव्य अनुमान के द्वारा उपजीवक अनुमान बाधित होता है। जहां ( अनुमानों में उपजीव्य-उपजीवक संबंध न होते हुए ) केवल विरोध हो वहां उसे प्रकरणसमा जाति समझना चाहिए। विरोधी अनुमान से आक्षेप उप- स्थित करना यह प्रकरणसमा जाति है (किन्तु यह जाति अर्थात झूठा दूषण प्रमामयम् [१.३१- उपजीवकानुगान बाध्यते । यत्र ग्रेवलं विरोधः नत्र प्रत्यनुमान प्रत्यय- स्थानं प्रकरणसमा जातिरेच न तु धाया। यत्र केव टमुपजीवोपनीयक- भाव तत्रोपजीवानुमानं लाभकामेव न तु बाधकम। जागमवावा -- प्रेत्यानुखप्रदो धर्म पुग्णाधिनत्वात् अधर्मवत् । लोकवाधा नरविष्टा शुचि नरशारीरजन्यात् स्तनलीरवदिति। वय वनवाया -माना में बन्ध्या पुरुषलंयोगेऽपि अगत्वात् प्रसिन्दवन्ध्यावदिनि । [३९ प्रकरणममः] प्रकरणसमो यथा - अनित्य शब्द. पक्षसपक्षयोरन्यनरन्यात् सपनवदित्युक्ते नित्य शब्दः पक्ष पयोरन्यरत्वात् सपशवदिति। एतद् अनेकान्तिकानार्थान्तरम् । विपझेऽपि वृत्तिमत्वात् उभयत्र अभि- है) यह वास्तविक वाया नहीं है। जहां दो अनुमानों में (विगध न होने हुए) एक उपजीव्य तथा दूसरा उपजीवक हो यहां उपजीव्ध अनुमान (उरजीवक अनुमान का) साधक ही होता है, बाधक नहीं होता। भागम से बाधित साध्य का उदाहरण--वर्म मृत्यु के बाद दु.ख दना है क्यों कि वह पुरुप पर अधित है, जैसे अधर्म ( यहां मृत्यु के बाद धर्म दुःख देता है यह लाव्य आगम से बाधित है)। लोकरीति से वाचित साध्य का उदाहरण - पुरुप का मल पवित्र है क्यों कि वह पुरुष के शरीर से निकलता है जैसे माना का दूध ( यहा मल का पवित्र होना यह साध्य लोकरीति से बाधित है)। अपने ही बाक्य से बाचित साध्य का उदाहरण - मेरी माता वन्ध्या है क्यों कि पुरुष क सयोग के बाद भी उसे गर्भ नहीं रहता, जैसे अन्य वन्च्याएं ( यहां मेरी माता इस कथन से ही कन्व्या होना यह साध्य बाधित है)। प्रकरणसम हेत्वाभाम इस का उदाहरण-निम्नलिखित है - शब्द अनित्य हैं क्यों कि वह पक्ष या सपक्ष में से एक है। यहा यह भी कहा जा सकता है कि गब्द नित्य है क्यों कि वह पक्ष या सपक्ष में से एक है (ता-पर्य, यह हेतु पक्ष के साध्य के लिए और उम क विरुद्ध साध्य के लिए - दोनों प्रकरणों के लिए समान है)। यह हेत्वाभास अनैकान्तिक से भिन्न नहीं है क्यो कि यह प्रकरणसम -१.३९] चारित्वाञ्च । किं च. पवनत्वं सपक्षे सत्वं विपक्षात् व्यावृत्ति त्रैस्प्यम्। तत्र हेतोः विपात् व्यावृत्तिः निश्चिता चेत् विपक्षे त्रैरूवाभात्रो निश्चित एव। तव्यावृत्तिनिश्चये स्वपक्षे त्रैलप्यानावो निश्चितः स्यादिति न कस्यापि हेतो उभयत्र त्रैरूज्यं जावटीति । अथ पसलअयोरन्यतरवादिति पक्षत्वादिति अस्य हेतोः उभयत्र त्रैलय जावटीति इति चेन। तदसंभ- वात् । तथाहि । - पक्षसपक्षयोरन्यनरत्वादिति पक्षवादित्यभिप्रायः सपक्षत्वादिति वा । आये पक्षवादित्वस्य हेतो सपझे अभावात् सपझे सत्वाभावेन त्रैमयाभावः। द्वितीये सपात्वादिन्यस्य हेतो. पने अलनेन पक्षधर्मत्वाभावात् त्रैरूयाभाव । तथापि श्रोतृगां शुम्परचर्य पृयर निरूपणं प्रकरणसमस्य ।। - विपन में भी विद्यमान होता है तथा (मपक्ष और विपक्ष) दोनों में अनिय- मित रूप से पाया जाता है (- व्यभिचारी, है ) । पक्ष का धर्म होना, साक्ष में होना तथा विपक्ष मे न होना ये हेतु के तीन रूप ( आवश्यक गुण) हैं। यदि विपक्ष में हेतु नहीं है यह निश्चित हो तो उस हेतु के विपक्ष में ये तीन रूप नहीं होंगे यह निश्चित है । तथा यदि विपक्ष में हेतु का अभाव नहीं (विपक्ष में भी हेतु पाया जाता है) यह निश्चित हो तो स्वपक्ष में इन तीन रूपों का अभाव निश्चित होता है । अत. किसी भी हेतु के तीनों रूप (पक्ष और विपक्ष ) दोनों में घटित नही होते । उपर्युक्त उदाहरण मं पक्ष ओर मपक्ष में से एक होना इस हेतु का तात्पर्य-पक्ष होना यह हो तो दोनों पक्षो मे हेतु के तीनों रूप संभव हैं यह कयन भी उचित नहीं क्यों कि यह असभव है। पक्ष और सपक्ष में से एक होना इस पक्ष का तात्पर्य पक्ष होना यह होगा अथवा सपक्ष होना यह होगा । पहले पक्ष में पक्ष होना यह हेतु सपक्ष में नहीं हो सकता अत. उस के तीन रूपों में सपक्ष में होना इस एक रूप की कमी होगी। इसी प्रकार सपक्ष होना यह हेतु मानें तो वह पक्ष में न होने से पक्षधर्म होना इस रूप का अभाव होगा और इस प्रकार भी तीन रूप नही हो सकेंगे। (इस प्रकार प्रकरणसम का अनैकान्तिक से भिन्न अस्तित्व नहीं है ) तथापि श्रोताओं के ज्ञान के लिए यहां प्रकरणसम हेत्वाभास का अलग से वर्णन किया है।

४२ प्रमाप्रमेयम् [१.४.- [४०. अन्वयदृष्टान्ताभासाः] दृष्टान्ताभासा अन्वये साध्यसाधनोभयविकला आश्रयहीनाप्रदर्शित- व्यातिविपरीतव्यात्यश्च । व्यतिरेके साध्यसाधनोभयाव्यावृत्ता आश्रय- हीनाप्रदर्शितव्याप्तिविपरीतव्यातयश्च । अमूर्तत्वात् यद् यदमून तत् तन्नित्यं यथेन्द्रियमुखम् इत्युक्ते साध्य- विकलः। यथा परमाणुरित्युक्ते साधन विकलः । यथा पट इत्युक्ते उभय- विकलः । यथा खपुग्पमित्युक्त आश्रयहीनः । आकाशवदित्युके नप्रदगिंत- व्याप्तिः । यन्नित्यं तमूर्त यथा व्योम इत्युक्ते विपरीतव्याप्तिकः ॥ उदाहरणम-नित्य. अन्वयदृष्टान्तामास अन्वय-दृष्टान्त के आभाम छह प्रकार के हैं - साध्यविकल, साधन- विकल, उभयविकल, आश्रयहीन अप्रदर्शितव्याति तथा विपरीतव्याति ! यतिरेक दृष्टान्त के यामास भी यह प्रकार के है- साध्याव्यावृत्त, साधना- व्यावृत्त, उमयाव्यावृत्त, आध्यहीन, अप्रदर्शितव्याति, तथा विपरीतव्याति । अन्वयदृष्टान्ताभासों के उदाहरण इस प्रकार है शब्द नित्य है क्यों कि वह अमूर्त है, जो अमूर्न होता है वह नित्य होता है. जैसे इन्द्रियों से प्रान सुख है इस अनुमान मे दृष्टान्त स्राव्यविकल है (नित्य हाना यह साध्य इन्द्रियसुख इस दृष्टान्त में नहीं है ) इसी अनुमान में परमाणु का उदाहरण साधनविकल होगा ( अमूर्त होना यह साधन परमाणु इस दृष्टान्त में नहीं है)। घट का दृष्टान्त उभयविकल होगा (इस में नित्य होना यह साध्य और अमूर्त होना यह साधन दोनों नहीं हैं)। आकाशपुष्प का दृष्टान्त आश्यहीन होगा ( आकाशपुष्प का अस्तित्व ही नहीं है अतः उत्त में साध्य या साधन नहीं हो सकते)। जो अमूर्त है वह नित्य होता है इस च्याप्ति को न बतलाते हुए केवल) जैसे आकाश है यह कहा तो अप्रदर्शितच्याति दृष्टान्ताभास होगा। जो नित्य है वह अमूर्त होता है जैसे आकाश है ऐसा कहा हो तो वह विपरीतव्याति दृष्टान्तामास होगा ' यहा जो अमूर्त होता है वह निन्य होता है ऐसी व्याप्ति बतलानी चाहिए क्यों कि नित्यत्व साध्य है, जो नित्य होता है वह अमूर्त होता है यह इस के उलटी व्याप्ति है अत' यह- विपरीतव्याप्ति दृष्टान्ताभास है)।

-१.४२] व्यतिरेकदृष्टान्ताभास ४३. [४१. व्यतिरेकदृष्टान्ताभासाः] व्यतिरेके यत् न नित्यं तत् नामूर्त यथा परमाणुरित्युक्ते साध्या- व्यावृत्तः। यथेन्द्रियरखम इत्युक्त साधनाच्यावृत्त । यथा व्योमेत्युक्ते उभयाच्यावृत्तः। यथा खपुप्पमित्युक्ते आश्रयहीनः। पटवत् इत्युक्ते अप्रदर्शितव्याप्तिः। यन्नामूर्त तत् न नित्यं यथा घट इत्युक्ते विपरीत- याप्तिकः॥ [४२. दृष्टान्ताभासानां व्याप्तिवैकल्यम् । तत्रान्वये साध्य विक्ला व्यतिरेके साधनाच्यावृत्ताश्च व्याप्तिरहितार नान्ये । तेषां साध्यरहिते धर्मिणि साधन प्रदर्शकत्वाभावात् । तथा हि। व्यतिरेक दृष्टान्ताभास व्यतिरेक दृष्टान्ताभासों के उदाहरण इस प्रकार हैं-जो नित्य नही होता. वह अमूर्त नहीं होता जेस परमाणु इस अनुमान में दृष्टान्त साध्याव्यावृत्त है (नित्य होना इस माध्य से परमाणु यह दृष्टान्त व्यावृत्त नहीं है क्यों कि परमाणु, नित्य होता है। इसी अनुमान में इन्द्रियमुख का उदाहरण साधनाव्यावृत्त होगा (अमूर्त होना इस साधन से इन्द्रियसुख व्यावृत्त नहीं है, सुख अमूर्तही होता है)। आकाश का दृष्टान्त उभाच्यावृत्त होगा (नित्य होना यह साध्य तथा अमूर्त. हंना यह साधन दोनों से आकाश यह दृष्टान्त व्यावृत्त नहीं है, वह नित्य भी है और अमूर्त मी)। आकाशपुष्प का दृष्टान्त आश्रयहीन होगा (इस का अस्ति व ही न होने से साध्य या साधन का सबंध ही नहीं हो सकता)। वस्त्र का दृष्टान्त अप्रदर्शितव्याप्तिक होगा ( इस में जो नित्य नहीं वह अमूर्त. नहीं इस व्याप्ति को न बतला कर केवल 'जैसे वस्त्र' इतना कहा गया है- व्याप्ति प्रदर्शित नहीं की गई है)। जो अमूर्त नहीं होता वह नित्य नहीं होता जसे घट यह दृष्टान्त विपरीतव्याप्तिक होगा (जो व्याप्ति का वाक्य होना चाहिए उसके ठीक उलटा वाक्य यहा प्रयुक्त किया है)। दृष्टान्ताभासों में व्याप्ति की विकलता उपर्युक्त दृष्टान्ताभासो में अन्वय में साध्यविकल दृष्टान्ताभास तथा व्यतिरेक में साधनाव्यावृत्त दृष्टान्ताभास ये दो ही व्याति से रहित होते हैं- F प्रमाप्रमेयम् [१.४२- साधनविकलसाध्याव्यावृत्तयोः सपक्षत्वात् तत्र क्वचिद्रप्रवृत्तस्यापि धूमा- देाति कल्याभावात् । सपने सर्वत्राम्वृत्तस्य विरुद्वत्वेन अनध्यवलि- तत्वेनैव वा व्याप्तिवैकल्लनिश्चयो नान्यथा । उभयविकले साव्ययावृत्त्या साधनव्यावृत्तिदर्शनात् यातिनिश्चयो न तवैकल्यम्। उभयाव्यावृत्ते साध्यव्यावसाचनप्रतिपत्तेः तत्रापि तथा । आयवहोंने आप्रयाभावात्. आप्रयिणो साध्यसाधनयोरप्यभावात् रातिनिश्चयो न तवैकल्यम्। अपरी वचनदोपाविति सर्वेऽपि प्रत्यपी रदन ततो न व्यातिवैकल्याव- वोधहेतृ॥ अन्य दृष्टान्ताभास व्याति से रहित नहीं होते। अन्न दृष्टान्ताभासा में धर्मी साव्य से रहित होता है अत. उस में साधन बतलाने की संभावना नही होती । इसी को स्पष्ट करते हैं ! (अन्वर में) सावनविकल तथा (व्यतिरेक में) लाव्याच्यावृत्त ये दृष्टान्ताभास सपक्ष होते हैं, और सपक्ष मे कहीं कहीं धूम आदि (हेतु ) न भी हों तो भी उतने से व्याप्ति का अमात्र सिद्ध नहीं होता । व्याप्ति के अभाव का निश्चय तब होता है जब हेतु सपक्ष में कहीं “भी न हो अथवा विन्द्ध हो (विपक्ष में ही हो) अथवा अनध्यवसित हो (सपक्ष और विपक्ष दोनों मे हो)। जो दृष्टान्त उभयविकल है (साधन- विकल भी है और साध्यविकल भी हैं ) उस में तो व्याप्ति का निश्चय ही होगा - व्याति का अभाव ज्ञात नहीं होगा - क्यों कि वहा साध्य के न होने पर साधन का न होना ही देखा जाता है। इसी प्रकार उभपाच्यावृत्त (साधनाव्गवृत्त होते हुए साध्याव्याहत्त) दृष्टान्ताभास में भी व्याति का निश्चय ही होगा क्यों कि वहा जहां साध्य है वहा मावन है इस प्रकार च्याति ही ज्ञात होगी । आश्रयहीन दृष्टान्ना भास में आश्रय के ही न होने से उस में आश्रित साध्य और साधन दोनों का अभाव ज्ञान होगा, इस तरह भी व्याप्ति का निधन ही होगा, व्याप्त क अभाव का ज्ञान नही होगा। अप्रदर्शितव्याप्तिक तथा विपरत पातिक ये दो दृष्टान्ताभास तो वाक्य के दोष है यह सभी मानते हैं अत. वे व्याति क अभाव का निश्चय नहीं कराते यह भी स्पष्ट है (इन दो दृष्टान्ताभासों में व्याति गलत नही हाती, केरल उस को प्रस्तुत न करना या उलटा प्रस्तुत करना यह दोष होता है)।

-१.४३] तर्क ४५ [४३. तर्कः व्याप्तिवलेन परस्यानिटापादनं तः। स च आत्माश्रय उत्तरेतरा- श्रयश्चमकाय अवस्था अतिमसति प्रकार । स्वस्थ रखनेवो- पाठक प्रत्युतं उत्पत्तिपत्रे आत्माश्रय । माया कुतः उत्पद्यते स्वत एवेत्यादि । स्वस्य स्वयमेव नापक उन्युक्ते अप्तिपत्रे आत्माश्रय । ब्रह्म देतायते स्वेनैवेत्यादि । द्वयोः पररपरसुत्पादकत्वे उत्पत्तिपः इतरे- तराश्रयः। माया कुत उत्पद्यते अविद्यान , अविद्या कुत उत्पद्यते मायात इत्यानियोः पररपर नापकत्वे नतिपक्षे इतरेतराश्रयः। आत्मा केन नायते नानेन, ज्ञान केन जायते आत्मनेत्यादि । व्यायष्टान्तानां परस्पर- मुत्पादकत्वे उत्पत्तिपने चऋकाश्रयः। जीव. कस्माजायते उविद्यात . तर्क व्याप्ति के बल से प्रतिपक्षी के लिए अनिष्ट वात को सिद्ध करना तर्क कहलाता है । उस के पाच प्रकार हैं - आत्माश्रय, इतरेतराश्रय, चक्रकाश्रय, अनवस्था तया अतिप्रसंग । ( कोई पदार्थ) अपनी उत्पत्ति स्वय करता ऐसा कहने पर उत्पत्ति की दृष्टि से आत्माश्रय होता है, जैसे माया कहा से उत्पन्न होती है (यह पूछने पर कहना कि) स्वय ही उत्पन्न होती है। अपना ज्ञान स्त्रय कराता है यह कहने पर ज्ञान की दृष्टि से आत्माश्रय होता है, जैसे - ब्रह्म किस से जाना जाता है (यह पूछने पर कहना कि) स्वय ही जाना जाता है। दो पदार्य एक दुसरे के उत्पादक हे ऐसा कहने पर उत्पत्ति की दृष्टि से इतरतराश्रय होता है, जैसे – माया कहा से उत्पन्न होती है (यह पूछने पर कहना कि) अविद्या से (उत्पन्न होती है) तथा अविद्या कहा से उत्पन्न होती है (यह पूछने पर कहना कि) माया से ( उत्पन्न होती है)। ढो पढार्य एक दूसरे का ज्ञान कराते है यह कहने पर ज्ञान की दृष्टि से इतरेतराश्रय होता है, जैसे - आत्मा का ज्ञान किस से होता है ( यह पूछने पर कहना कि) ज्ञान से (आत्मा जाना जाता है) तथा ज्ञान किस से जाना जाता है (यह पूछने पर कहना कि) आत्मा द्वारा (जान जाना जाता हे )। तीन से ले कर आठ तक वस्तुए एक दूसरे की उत्पादक है ऐसा कहने पर उत्पत्ति की दृष्टि से चक्रकाश्रय होता है, जैसे - जीव किस से उत्पन्न ४६ प्रमाप्रमेयम् [१.४३- अविद्या कुतो जायते मायातः, माया कस्माज्जायते संस्कारात्, संस्कारः कस्माज्जायते जीवात्, जीवः कस्माज्जायते इत्यादि। याद्यष्टान्तानां परस्परं ज्ञापकत्ये क्षतिपक्षे चक्रकाश्रयः। पावक केन जायते धूमेन, धूमः केन नायते मेवेन, मेव. केन नायते अशनिवा, अशनि' केन नायते पावके नेत्यादि। उत्पादकज्ञापकप्रश्नयोः अपरिनिष्ठा अनवस्था। सस्य कस्माज्जायते वीजात् , बीजं कस्माज्जायते प्राक्तनसस्यात् , तदपि कुत प्राक्तनवीजात् इत्यादि उत्पत्तिपक्षे अनवस्था। ज्ञान केन ज्ञायते अनु- व्यवसायेन, सोऽपि केन ज्ञायते अपरानुव्यवसायेन, सोऽप्यपरेणेति ज्ञप्ति- - होता है (यह पूछने पर कहना कि ) अविद्या से, अविद्या किस से उत्पन्न होती है (यह पूछने पर कहना कि) माया से, माया किस से उत्पन्न होती है (यह पूछने पर कहना कि) संस्कार से, संस्कार किस से उत्पन्न होता ( यह पूछने पर कहना कि) जीव से, फिर जीव किस से उत्पन्न होता है (तो उत्तर नहीं होगा - अविद्या से)। तीन से ले कर आठ तक वस्तुएं एक दूसरे का ज्ञान कराती हैं ऐसा कहने पर ज्ञान की दृष्टि से चक्रकाश्रय होता है, जैसे - अग्नि कैसे जाना जाता है (तो उत्तर है) धुंए से, धुंआ कैसे जाना जाता है (तो उत्तर है ) बादल से, बादल कैसे जाना जाता है -(तो उत्तर है) विजली से, बिजली कैसे जानी जाती है (तो फिर उत्तर होगा) अग्नि से | उत्पादक अथवा ज्ञान कराने वाले के बारे में प्रश्न समात ही न होना यह अनवस्था होती है, जैसे - फसल कहां से उत्पन्न होती है (तो उत्तर है) बीज से, बीज कहा से उत्पन्न होता है (तो उत्तर है) उस के पहले की फसल से, वह (फसल) कहां से उत्पन्न हुई थी (तो उत्तर होगा) उस के पहले के बीज से - इस प्रकार उत्पत्ति की दृष्टि से अनवस्था होती है। ज्ञान कैसे जाना जाता है ( उत्तर है) है) अनुव्यवसाय को जाननेवाले ज्ञान से), वह (अनुव्यवसाय) कैसे जाना जाता है (तो उत्तर हैं ) दुसरे अनुव्ववसाय से (ज्ञान को जाननेवाले ज्ञान को जाननेवाले ज्ञान से) वह (दूसरा अनुव्यवसाय ) भी तीसरे (अनुव्यवसाय) से ( जाना जाता है) इस प्रकार ज्ञान की दृष्टि से अनवस्था होती है । जो व्याप्य और व्यापक प्रसिद्ध हैं उन में व्याप्य का स्वीकार करने पर व्यापक का से (ज्ञान -१.४४] तर्क के दोष ४७ पक्षे अनवस्था। प्रसिद्धव्याप्यव्यापकयोः मध्ये व्याप्यागीकारे व्यापका- -ङ्गीकारप्रसञ्जनमतिप्रसंगी मायावादिभिः ब्रह्मस्वरूपस्य भ्रान्तिविषयस्य च 'प्रमातुरवेद्यत्वाङ्गीकारे ब्रह्मस्वरूपमसत् प्रमातुरवेद्यत्वाद् रज्जुसर्पवत्, रज्जुसादि सदूपं प्रमातुरवेद्यत्वाद् ब्रह्मस्वरूपवदित्यादि । [४४. तर्कदोपाः] मूलशैथिल्यं मिथोविरोध इष्टापादनं विपर्ययेऽपर्यवसानमिति तर्क- दोषाश्चत्वारः। तत्र तर्कस्य मूलभूतव्याप्तेर्व्यभिचारो मूलशैथिल्यम् । अनिष्टापादकव्याप्ते. आपाद्यानिष्टस्य च विरोधो मिथोविरोधः। आपाधा- निष्टधर्म परस्येष्टश्चेत् इष्टापादनम् । व्याप्त्या परस्यानिष्टमापाद्य तद्- विपर्यये पर्यवसानाकरणं विपर्ययेऽपर्यवसानम् ॥ - भी स्वीकार करना पडेगा यह कथन अतिप्रसग होता है, जैसे मायावाढी यह स्वीकार करते हैं कि ब्रह्म का स्वरूप प्रमाता द्वारा जाना नही जा सकता तथा भ्रम का विषय भी प्रमाता द्वारा जाना नहीं जा सकता, इस पर यह कहना कि ब्रह्म का स्वरूप प्रमाता द्वारा नहीं जाना जाता अत. वह रस्सी में प्रतीत होनेवाले सर्प के समान असत है, अथवा रस्सी में प्रतीत होनेवाले सर्प आदि सत् हैं क्यों कि वे भी ब्रह्म के स्वरूप के समान ही प्रमाता द्वारा जाने नहीं जाते (यह अतिप्रसग कहलाता है)। तर्क के दोप तर्क के चार दोप होते है - मूलशैथिल्य, मिथ. विरोध, इष्टापादन तथा विपर्यय में अपर्यवसान | तर्क की मूलभूत व्याप्ति गलत होना यह मूल में शिथिलता नाम का पहला दोप है । (प्रतिपक्षी के लिए) अनिष्ट बात को सिद्ध करनेवाली व्याप्ति में तथा (उस व्याप्ति से) सिद्ध होनेवाली अनिष्ट बात में (परस्पर) विरोध होना यह मिथः विरोध नाम का दूसरा दोप है। सिद्ध किया जानेवाला अनिष्ट गुण यदि प्रतिपक्षी को इष्ट ही हो तो वह इष्टापाटन नाम का तीसरा दोष होता है । व्याप्ति के द्वारा प्रतिपक्षी के लिए अनिष्ट बात को वतला कर फिर उस की विरुद्ध बात को पूरा न करना यह विपर्यय मे अपर्यवसान नाम का चौथा दोष होता है। ।

४८ प्रमाप्रमयम [१.४५- [४५. छलम् ] साधनाद् वृषणाद यस्मात् न स्यात् पवस्व निश्चयः। तरन्यनरत्याली नमामास.प्रकीर्यते ॥५॥ छलादयस्तदासम्म तदविताना मातेन च। वर्जनादसावने गं स्वधायपरवाश्ययो.॥६॥ ततस्तेऽपि दिलायन्ने बालानां प्रतिबुद्धये। आपाद्यार्थान्तरं वाक्यविधातः छलमुच्यते ॥ ७ ॥ तञ्च वाक्लं सामान्य छलनुपचारछलमिति त्रिविधम् ॥ [४६. वाक्टलम] अनेकवाचके शब्ने प्रयुक्ते जुवादिना । वक्तुर्मन स्थाढन्यस्य प्रतियोहि वाक्छलम् ॥ ८ ॥ उदाहरणम-आयोऽयं नवकवलत्वात् इति समक्षसोऽवीत् । तत्र छलवादी प्रत्यारयत कुतोऽस्य नव कम्बला इति । प्रत्यग्रकम्बलसम्बन्धिवं जिस साइन से व दूपण से दो पक्षों में एक का निश्चय न हो वह सावनाभास व दृष्णाभास कहलाता है। छल इत्यादि ये साधनाभास व दृपणाभास हे उनको जान बिना अपने वाक्यों से उन्हें दूर रखना और प्रतिवादी के वाक्यों में उन्हें पहचानना संभव नहीं हैं। अत अज्ञानी शिष्यों को समझाने के लिए उन का भी वर्णन करते हैं। (वक्ता के इष्ट अर्थ को छोड कर) दृसर ही अर्थ की कल्पना कर कं वात काटना यह छल कहलाता है । इस के तीन प्रकार हैं - वाक्छल, सामान्यछल तथा उपचारछल। वाक्छल सरल भावना से वाटी द्वारा अनेक अयो के वाचक किसी शब्द का प्रयोग किये जाने पर उस के मन में विवक्षित अर्थ (को छोड कर उस) से भिन्न अर्थ ( की कल्पना कर के उस ) का निषेध करना बाक्छल है । उनाहरण-किसी समझदार ने कहा कि इस व्यक्ति का कम्बल नव है अतः - -१.४७] सामान्य छल यः अभिप्रेतम् । छलबादी तु नवसंत्यावच्छिनकस्थलसम्बन्धित्व- मारोप्य असमवेन न्यपेधीत् कुत्तोऽस्य नव मम्बला इति । तमेवं पृच्छेत् । अनेकवाचकशब्दादिसं विगेपं कुतो व्यनालीः त्वमिति। न कुनश्चित् । तस्माद नावात्रके शप्रयोने अस्य शब्दस्य मनावन्तोऽर्थी समाव्यन्ते। तन्मध्ये कतममर्थम् अविवक्षी त्वमिति वक्तारं पृच्छेत् । पश्चात् विपश्चित् तनिश्चित्य तमभ्यनुजानीयात् तदुपरि दूपणं वा दद्यात् । नो चेदभिप्रेता- “परिनानेन नि रह प्रलज्यते ॥ [४७ सामान्यच्छलम् ] हेतुत्वकारणत्वाभ्यां विकल्प्य प्रतिषेधनम् । वास्ये संभाव्यमानार्थ सामान्य छलमुच्यते ॥९॥ बामणश्चतुर्वेदाभिन्नः इति समक्षस. प्रत्यपीपदत् । तत्र छलवादी प्रत्यवा- यह श्रीमान प्रतीत होता है । वहा छल का प्रयोग करनेवाला आक्षेप करता है कि इस के पास नौ कम्बल कहां से हो सकते हैं (एकही कम्बल है)। वहा पहले बोलनेवाले नवकम्बलत्य का अर्थ नये कम्बल युक्त होना यह है । छलवादी ने नौ सख्या से युक्त कम्बलों से युक्त होने की कल्पना कर के और उसे असभव बतला कर उस का निषेध किया। ऐसे छलबादी को इस प्रकार प्रश्न करे कि अनेक अर्थो के वाचक इस (नव) शब्द का यह विशिष्ट अर्थ (नौ) तुमने कैसे जाना । इस का कोई साधन नहीं है। अत. अनेक अर्थों के वाचक शब्द का प्रयोग करने पर इस शब्द के इतने अर्थ हो मकते हैं इन में से तुम्हें कौनसा अर्थ विवक्षित है ऐसा वक्ता को पूछना चाहिए, फिर बुद्धिमान व्यक्ति उस का निश्चय कर के उसे स्वीकार करे अथवा उस में दूपण बताये । नहीं तो अभिप्रेत अर्थ को न समझने का दोष प्राप्त होता है। •सामान्य छल वाक्य मे जहा संभावना का अर्थ व्यक्त करना हो वहा उस में हेतु अथवा कारण होने की कल्पना कर के निषेध करना सामान्य छल कहलाता है। जैसे-किसी समझदार ने कहा कि ब्राह्मण चार वेदों को जानता है। वहा छल का प्रयोग करनेवाला आक्षेप करता है कि ब्राह्मण होना चार वेदों मन म से प्र.प्र.४ प्रमाग्रमेयम् [५.४५ तिष्ठिपत् । ब्राह्मणत्वं चतुर्वेदाभिमन्ये हेतुर्न भवति अनवीनेनानेकान्नात् : कारणं न भवति अनधीतेऽपि तन्कारणत्वप्रसदादिति । सोऽप्यभिप्रेता- परिज्ञानेन निगृहीतः स्यादिति। ब्राह्मणे चतुर्वेदाभिन्नत्वसंभावनस्योक्त- त्वात् यथात्र क्षेत्र प्रत्यक्षं संपनीपद्यत इति ॥ [४८. उपचारच्छलम् ] उपचारेण वक्त्रा यदभिधेयनिस्पगे। प्रधानत्वनिषेधे तदुपचारच्छल भवेत् ॥ १० ॥ वादी गझायां ग्रामः प्रतिवसतीत्यवादीत् । तत्र छलवादी प्रन्यवोचत् !! गगा नाम जलप्रवाहः, जलप्रवाहे ग्रामस्य अवस्थानासम्भवान् तद- युक्तमवादीस्त्वमिति। सोऽयमितापरिज्ञानेन निगृहीतः स्यात् । को जानने का हेतु नहीं है क्यो कि जो पढ़ा नहीं है उस स इस का अने- कान्त है ( जो पढा नही हैं वह ब्राह्मण होने पर भी वेदों को नहीं जानता); तथा ब्राह्मण होना चार वेढा को जानके का कारण भी नहीं है, यदि होता ता जो पटा नही है उस के विषय में भी वह बंदो को जानने का कारण होता । ऐसा छलबादी अभिप्रेत अर्थ को न नमझने के ढोप से दूषित होता है क्यो कि इस वाक्य में ब्राह्मण के चार बेटों के जानकार होने की सभावना व्यक्त की है और यह इस जगह प्रत्यक्षही देखा जाता ह ( अत वेदनान की सभावना के मुख्य अर्थ को छोड कर उन के हेतु अथवा कारण की कल्पना कर निषेध करना व्यर्थ है-छल है)। उपचारछल वक्ता द्वारा विषय का वर्णन उपचार से किये जाने पर प्रधान अर्थ के निपच पर जोर देना यह उपचारछल कहलाता है। उदाहरणार्थ - वादी ने कहा कि गगा पर गाव बसा है । यहा छलवाटी ने कहा कि गगा तो जल का प्रवाह है, जल के प्रवाह पर गाव नहीं बस सकता अत. आपन अयोग्य बात कही । ऐसा छलवादी अमिप्रत अर्थ को न समझने के दोष से दूषित होता है क्यों कि यहां 'गगा पर ' इस शब्द का प्रयोग उपचार से 'गंगा -१.४९] साधर्म्यसमा-वैधर्म्यसमा ५१ -- अधिकरणनिरूपणं सामीप्यौपचारिकयोः इति गङ्गाशब्देन समीपस्योप- चरितत्त्वात् ॥ [४९. जातयः] उक्ते हेनौ विपक्षेण साम्यापादनवाक्यतः। जातिः प्रतिविधिः प्रोक्ता विंशतिश्चतुरुत्तरा ॥ ११ ॥ साधर्म्य - वैधर्म्य - उत्कर्ष - अपकर्ष - वर्ण्य - अवर्ण्य - विकल्प - असि- द्धादि -प्राप्ति - अप्राप्ति-प्रसङ्ग-प्रतिदृष्टान्त-अनुत्पत्ति-संशय-प्रकरण- अहेतु-अर्थापत्ति-अविशेष-उपपत्ति-उपलब्धि-अनुपलब्धि-नित्य-अनित्य कार्यसमा जातय ॥ [५०. साधर्म्यवैधर्म्यसमे] तत्र स्थापनाहेतो प्रयुक्ते साधर्येण प्रत्यवस्थानं साधर्म्यसमा जातिः। वैधय॑ण प्रत्यवस्थानं वैधर्म्यसमा जातिः। तयोः उदाहरणम् । भनित्यः शब्दः कृतकत्वात् घटवदित्युक्ते जातिवाद्याह। घटसाधर्म्यात् के समीप' इस अर्थ में हुआ है । अधिकरण का प्रयोग औपचारिक सामीप्य के अर्थ में होता है ऐसा नियम है। जातियाँ हेतु के कहने के बाद विपक्ष से समानता बतलानेवाले वाक्य से दिया हुआ उत्तर जाति कहलाता है । जातियाँ चौवीस हैं- साधर्म्यसमा, वैधर्म्यसमा, उत्कर्षसमा, अपकर्षसमा वर्ण्यसमा, अवर्ण्यसमा, विकल्प- समा, असिद्धादिसमा, प्रातिसमा, अप्रातिसमा, प्रसङ्गसमा, प्रति- दृष्टान्तसमा, अनुत्पत्तिसमा, संशयसमा, प्रकरणसमा, अहेतुसमा, अर्थांपत्ति- समा, अविशेपसमा, उपपत्तिसमा, उपलब्धिसमा, अनुपलब्धिसमा, नित्यसमा, अनित्यसमा तथा कार्यसमा ( इन का अब क्रमश. वर्णन करेंगे)। साधर्म्यसमा तथा वैधर्म्यसमा जाति (किसी साध्य को) स्थापित करनेवाले हेतु का प्रयोग करने पर उस की समानता से कोई आक्षेप उपस्थित करना यह साधर्म्यसमा जाति होती है तथा उस से भिन्नता वतला कर कोई आक्षेप उपस्थित करना यह वेधर्म्यसमा जाति है । इन के उदाहरण क्रमश. इस प्रकार हैं । शब्द अनित्य है क्यों कि , - प्रमाप्रमेयम् [१.५०- इतमत्वात् शब्ने अनिन्यन्वं प्रसाध्यते चेत् आकागसायान् अमृतत्वात् नित्यत्वमपि प्रसाध्यते । उनि प्रत्ववस्थान सावर्यममा जातिः। आनाश- वैधात् कृनकन्वात् शट अनिन्यत्वं प्रसाध्यते चेत् घटवैधात अमृत- व्यात् नित्यलमपि प्रसाध्यत इति प्रत्यवस्थान वैचम्बलसा आदि !! [५१. उत्कर्पापकर्पसमे] दृष्टान्ते दृष्टस्यानिष्टधर्मस्य दान्ति योजनमुत्कर्षसमा जानिः । तदनिष्टधर्मनिवृत्ती पक्षस्य साध्यवर्मनिवृत्तिः अपकर्षसमा जाति.। तयोरुदाहरणम् । अनित्य. शब्दः शतकत्वात् बटवदित्युक्ने घटे नावट- वह कृतक है जैसे वट, इस अनुमान के प्रयोग करनेपर जातिवादी कहता है- वट के समान कृतक होने न शब्द का अनित्य सिद्ध किया जाय तो आकाश के समान अमूर्त होने से शब्द नित्य भी सिद्ध किया जा सकता है । इस प्रकार के आक्षेप को साधर्म्यसमा जाति कहते हैं। यदि आकाश ने भिन्न अर्थात कृतक होने से शब्द को अनित्य सिद्ध किया जाय तो घट से भिन्न अर्थात अमूर्त होने से शब्द को नित्य भी सिद्ध किया जा सकता है । ऐले आक्षेप को वैवर्म्यसमा जाति कहते है । ( ये दोनों आक्षेप जाति अर्थात झुठे दूषण हैं-वास्तविक दूपण नहीं हैं क्यों कि इन में अनुमान की मूलभूत व्याति-जो कृतक होता है वह अनित्य होता है-को गलत सिद्ध नहीं किया है, केवल विरोधी उदाहरण दृढने की कोशिश की गई है, इस में शब्द को अमूर्त कहा है वह मी ठीक नहीं है)। उत्कर्षसमा तथा अपकर्पसमा जाति दृष्टान्त में कोई अनिष्ट वर्म (साध्य के प्रतिकूल गुण ) दग्खा गया हो तो उसे दाष्टन्ति में (साध्य में ) जोड देना यह उत्कर्पसमा जाति होती है। दृष्ट्रान्त से अनिष्ट धर्म के हटाने पर पक्ष से साव्य गुणधर्म हटेगा ऐसा कहना अपकर्पसमा जाति होती है। इन दोनो के उदाहरण इस प्रकार हैं। शब्द अनित्य हे क्यो कि वह कृतक है जैसे घट इस अनुमान के प्रस्तुत करने पर यह कहना कि वट मे अनित्यता के साथ अश्रावणता (सुना न जाना) की च्याति है ऐसा देखा गया है, यदि घट का अनित्यत्व यह व्याप्य शब्द में स्वीकार किया जाता है तो उसका व्यापक अश्रावणत्व भी स्वीकार किया जाना -१.५२] वर्ण्यसमा अवर्ण्यसमा ५३' नित्यमश्रावणत्वेन व्याप्तं दृष्टं तदनित्यत्वं व्याप्यं शब्देऽङ्गीक्रियते तर्हि तद्व्यापकमश्रावणत्वमप्यङ्गोक्रियेत इत्युक्ते उत्कर्षममा जाति । शन्दे व्यापकमश्रावणत्वं नेष्यते चेत् व्याप्यमनित्यत्वमपि नेष्टव्यमित्युक्ते अप- कर्षसमा जाति । अत्राश्रावणत्वमुपाधिरिति ज्ञातव्यम् । साधनाव्यापकः साध्यव्यापक उपाधिरिति तस्य लक्षणम् ।। [५२ वर्ष्यावर्ण्यसमे] साध्यस्य यथा हेतुसाध्यत्वं तथा दृष्टान्तस्यापि हेतुसाध्यत्वेन भन्तिव्यमित्युक्त वर्ण्यसमा जाति । दृष्टान्तवत् साध्यस्याप्यहेतुलाध्यत्वं स्यादित्युक्ते अवर्ण्यसमा जाति. ॥ चाहिए-यह उत्कर्पसमा जाति है । इसी अनुमान में व्यापक अश्रावणव शब्द में स्वीकार नहीं किया जा सकता (क्यो कि शब्द श्रावण है-सुना जाता है) उस का व्याप्य अनित्यत्व भी शब्द में नदी मानना चाहिए यह कहना अपकर्षममा जाति है । यहा अश्रावणत्व को उपाधि समझना चाहिए । जो साध्य मे व्यापक हो किन्तु मावन में व्यापक न हो वह उपाधि है ऐसा उस का क्षण हे । ( उत्कर्पसमा तया अपकर्षसमा ये जानिया अर्थात झूठे दुपण हैं क्यो कि इन में प्रस्तुत अनुमान की मूलभूत व्याप्ति को जो कृतक होता है वह अनित्य होता है इस कथन को छोड कर दृष्टान्त के अश्रावणत्व इस गुण पर जोर दिया गया है तथा जो अश्रावण होता है वह अनित्य होता है यह गलत व्याति बनाई गई हैं । यह व्याति ही गलन होने से उस पर आवारित आक्षेप भी झूठे है )। वर्ण्यसमा तथा अवर्ण्यसमा जाति जिस प्रकार साध्य हेतु से सिद्ध किया जाता है उसी प्रकार दृष्टान्त भी हेत से सिद्ध किया जाना चाहिए ऐमा कहना वर्ण्यममा जाति है। जिस प्रकार दृष्टान्त हेतु से सिद्ध नहीं किया जाता उसी प्रकार साध्य भी हेतुः के विना ही सिद्ध मानना चाहिए ऐमा कहना अवर्ण्यसमा. जाति है।

५४ प्रमाप्रमेयम [१.५३- [५३. विकल्पसमा] दृष्टान्ते धर्मविकल्पप्रदर्शनेन दान्तिके धर्मान्तरापादनं विकल्प- समा जातिः । अनित्यः शब्दः कृतकत्वात् घटवदित्युक्ते कृतकत्वाविशे- पेऽपि किंचिन्मूर्त हवं यथा घटादि किंचिदमूतं दृष्टं यथा रूपादि तद्वत् कृनकत्वाविशेपेऽपि पटादिकमनित्यं शब्दादि नित्यं भवेदित्यादि विकल्प- समा जाति ॥ [५४. असिद्धादिसमा] हेतोः साध्यसद्भावाभावोभयधर्मविकल्पनया असिद्धविरुद्धानका न्तिकतापादनम् असिद्धादिसमा जातिः। अनित्यः शब्दः कृतकत्वात् घटवदिन्युक्ते कृतकत्वादयं हेतु साध्यसद्भावधर्मः अभावधर्म उभय- विकल्पसमा जाति दृष्टान्त में गुणधों का विकल्प बतला कर दान्तिक (दृष्टान्त पर आधारित साध्य ) में दूसरे गुणधर्म की कल्पना करना विकल्पसमा जाति है। जैसे- शक अनित्य है क्यों कि वह कृतक है जैसे बट इस अनुमान में यह कहना कि समान रूप से कृतक होने पर भी कुछ वस्तुएं मर्त होती हैं जैसे घट तथा कुछ अमूर्त होती हैं जैसे रूप, उसी प्रकार समान रूप से कृतक होने पर भी वस्त्र आदि को अनिल्य तथा शब्द आदि को नित्य माना जा सकता है (यहां दृष्टान्त में मूर्तत्व तथा अमूर्तत्व का विकल्प बतला कर दार्टान्तिक अर्थात शब्द में निन्यन्त्र की कल्पना की गई है अतः यह विकल्बममा जाति है)। असिद्धादि समा जाति हेतु साध्य मे है अथवा उसका अभाव है अथवा दोनो हैं इस प्रकार विकल्प कर के हेतु को असिद्ध, विरुद्ध अथवा अनैकान्तिक बतलाना यह असि- द्वादिसमा जाति होती है । उदाहरणार्थ-शब्द अनित्य है क्यों कि वह कृतक है जैसे बट इस अनुमान के प्रस्तुत करने पर यह कहना कि यहा कृतक होना इस हेतु का साध्य में अस्तित्व है, अभाव है, अथवा अस्तित्व तथा अभाव दोनों हैं, इन में पहला पक्ष स्वीकार करें (हेनु का साध्य में सद्भाव माने) तो अभी साध्य का अस्तित्व ही सिद्ध नहीं है अत उस के गुणधर्मरूप हेतु को भी असिद्ध १.५५] अन्यतरासिद्धसमा धर्मो वा । आद्ये अद्यापि साध्यसद्भावस्य असिद्धत्वात् तद्धर्मस्य हेतोः असिद्धत्वं द्वितीये साध्यविपरीतस्य धर्मत्वात् विरुद्वत्वम्। तृतीये -उभयधर्मत्वादनैकान्तिक इत्यादि । [५५ अन्यतरासिद्धसमा] एकान्तानेझान्तादिविकल्पेन हेतोः अन्यतरासिद्धत्वापादनम् अन्य- तरासिद्धसमा जाति । पूर्वप्रयोगे कृतकत्वादयं हेतुः एकान्त अनेकान्तः बा, आद्ये जैनानामसिद्धः द्वितीये अन्येामसिद्धः। अमणिका क्षणिको वा, ही मानना होगा, यदि दूंमरा पक्ष स्वीकार करे (हेतु का साध्य में अभाव माने ) तो वह हेतु विरुद्ध होगा क्यों कि वह साध्य के विरुद्ध गुणधर्म होगा, तथा तीसरे पक्ष में दोनों (सद्भाव और अभाव ) मानें तो वह हेतु अनैका- न्तिक होगा (क्यों कि साव्य मे उस का अस्तित्व या अभाव निश्चित नहीं है) ( यह असिद्धादिसमा जाति है, वास्तविक दूपण नही, क्यों कि इस मे साध्य और हेतु के सबब को गलत ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत उदा- -हरण में अनित्य होना यह साध्य है, इस में कृतक होना यह हेतु है या उस का अभाव है आदि प्रश्न निरर्थक हैं, आक्षेप करनेवाले को यह बताना चाहिए कि जो कृतक होता है वह अनित्य होता है इस व्याप्ति में क्या दोप है, वह न बतला कर दूमरी कल्पनाएं करने से कोई लाभ नही)। अन्यतरासिद्धसमा जाति एकान्त, अनेकान्त आदि विफल्यो से हेतु को किमी एक पक्ष के लिए असिद्ध बतलाना यह अन्यतरासिद्धसमा जाति हाता है। उदाहरणार्थ - पूर्वोक्त अनुमान में (शब्द अनित्य है क्यो कि वह कृतक है इस कथन में) यह कहना कि यहां कृतफ होना यह हेतु एकान्त से है या अनेकान्तसे है, यदि वह एकान्त से हो तो जैनों के लिए वह असिद्ध होगा (क्यो कि जैन एकान को नहीं मानते) तथा यदि वह अनेकान्न से हो तो बाकी सब मतों के लिए असिद्ध होगा (क्यों कि जैनेनर मत अनेकान्त को नहीं मानते)। इसी तरह यह हेतु अक्षणिक है या क्षणिक है, यदि अक्षणिक हो तो बौद्धो के लिए वह असिद्ध होगा (क्यो कि बौद्ध सब वस्तुओं को क्षणिक मानते ई) तथा यदि क्षणिक हो तो अन्य सब मतों को अमान्य होगा (क्यों कि ५६ प्रमाप्रमेयम् [२.५६- आये वौद्धानामसिद्ध , द्वितीये अन्येयामग्निद्धः । अब्रह्मान्मको ब्रह्मान्मको वा, आये वेदान्तिनामसिद्ध द्वितीये अन्येपामसिद्धः। अप्रतिपरिणाम: प्रकृतिपरिणामो चा, आये सारयानामसिन्हा, द्वितीये अन्येयामसिद्धः इत्यादि ।। [५६ प्राप्यप्राप्तिसमे. हेतो प्राप्त्या प्रत्यवस्थान प्राप्तिसमा जातिः। अप्राप्त्या प्रत्यवस्थानम् अप्राप्तिसमा जातिः। अनित्य शब्दः कृतकत्वाद् घट्वनित्युक्ते अवं हेतुः वोडेतर मत क्षणिकगद को नहीं मानते ) । यह हेतु ब्रह्मरूप है या अब्रह्म- रूप है, यदि उ-ब्रहरूप हो तो वह बन्दान्तियों के लिए अद्धि होगा ( क्यों कि वे सभी वस्तुओ का ब्रह्मरूप मानते है ) नया ब्रह्मरूप हो तो अन्य स्व मतों को अमान्य होगा। यह हतु प्रकृति का परिणाम है या नहीं- है यदि यह प्रकृति का परिणाम नहीं है तो साक्ष्यों के लिए असिद्ध हागा तथा प्रकृात का परिणाम हो तो अन्य सब मतो के लिए असिद्ध होगा। इस प्रकार का कथन ग्रामविक दपण न हो कर दृषण्णाभास अर्थात जाति है क्यो कि जो कृतक होता है -ह अनि-य होता हैं इस मूलत च्यामि मे कोई दाप इस से प्रकट नहीं हारा, वृतक होना एकान्त से ग अनेकान्त से है आदि प्रश्नों का प्रस्तुत अनुमान स के ई सम्बन्ध नहीं है प्राप्तिसमः व अप्रप्तिममा जाति हेतु के (माध्य को) प्राप्त होने की आपत्ति उपस्थित करना प्राप्ति- समा जाति है । तथा अप्रान हान की आपत्ति उपस्थित करना अप्राप्तिममा जानि है। उदाहरणार्थ - गन्द अनित्य है क्या कि वह घट जैसा कृतक है इस अनुमान का प्रयाग करने पर प्रश्न करना कि यहां हेतु माध्य को प्राप्त हो कर उसे सिद्ध करता है या प्राप्त किय बिना ही सिद्ध करता है, यदि हनु साध्य को प्राप्त हा कर उसे मिद करे ना वह आसद्ध होगा क्यों कि वह अभी साध्य का प्राप्त होना है ( जो साध्य में नहीं है वह हेत असिद्व हाता है, यह हेत अभी माध्य का प्राप्त नही हुआ है अत अमिद्ध है ) जैसे साव्य का म्बाप । साय का स्वरूप जिस तरह अमित है उसी तरह यह हेन भी असिद्ध होगा क्यों कि यह अभी साध्य को प्राप्त नहीं हुआ है ) ! यदि हेतु, ।

-१.५७] प्रसंगसमा प्राप्य साध्यं प्रसाघयत्यप्राप्य था। आद्येऽसिद्धो हेतु प्राप्यसाध्यत्वात् साध्यस्वरूपवत् । द्वितीये तो साध्यसाधनभावरहितो मिथोऽप्रातत्वात् सह्यविन्ध्यवदिति ॥ [५७ प्रसंगसमा] प्रमाणादिप्रश्नानवस्थानं प्रस्गसमा जाति । अनित्यः शब्दः कृतक-- त्वात् घटवत् इत्युक्ते घटे तकन्वात् अनित्यत्वं केन सिद्धम् , प्रत्यक्ष त्यवते प्रत्यक्षस्थापि प्रामाण्यं के न, अन्येनेत्युक्ते तस्यापि केनेत्यादि । साध्य को प्राप्त किय बिना ही सिद्ध करता है ऐसा कहा जाय तो इस हेतु में और साध्य मे साध्यसाधन का सबन्ध नहीं हो सकेगा क्यों कि वे दोनों सहः पर्वत और विध्यर्वत के समान परम्पर अप्रत ( असद्ध) हैं। (ये आक्षेप वास्तविक पण न हो कर दृपणाभास अर्थात जाति है क्यो कि इन में है और साध्य क र वाभाविक स्वध को न समझते हए अनावश्यक प्रश्न उ' स्थित किये है, जहा धुंआ होता हे हा अग्नि होता हे इस नियत सवन्त्र के कारण ही धुआ दखने पर अग्नि वा अन्मान होता है यहा धुआ अग्नि हा कर सिद्ध करता है या प्राप्त हुए बिना सिद्ध करता है आदि प्रश्न निग्थक हैं।) प्रसंगममा जाति १ को प्राप्त प्रमाण आदि क प्रश्नों से अनवम्था प्रसंग उपस्थित करना (एक के बाद दूसरे प्रश्न का उपस्थित करत जाना प्रसगसम्म जाति है। जैस इन्ट अनित्य है क्यों कि वह कृतव है जैसे घट इस अनुमान के प्रस्तुत काने पर यह पूछा कि घट कृतक है अत अनित्य है यह किस प्रमाण से सिद्ध हुआ है, यह प्रत्यक्ष प्रमाण म सिद्ध है ऐसा उत्तर मिलने पर फिर पूछना कि वह प्रत्यक्ष प्रमाणभूत कैस है इम पर दूसर प्रमाण का उत्लेख कग्नपर फिर पूछना कि वह प्रमाणात कसे है (इस प्रकार प्रश्नो की परम्परा से मुल विपय को टालना ही प्रसगसमा जाति है)।

प्रमाप्रमेयम् [१.५८- [५८. प्रतिदृष्टान्तसमा ] प्रत्युदाहरणेन प्रत्यवस्थानं प्रतिष्टान्तसमा जातिः। अनित्यः शब्द. कृतकत्वात् घटवत् इत्युक्ते आकाशवमूर्तत्वात् नित्योऽपि स्यादिति ॥ [५९ उत्पत्तिसमा] कारणविघटनया कार्यानुत्पत्तिप्रत्यवस्थानम् उत्पत्तिसमा जाति । पूर्वप्रयोगे शब्दादिकार्योत्पत्तेः प्राक् तात्वादीनां के प्रति करणत्वं, तदा प्रतिदृष्टान्तसमा जाति प्रतिकूल उदाहरण द्वारा उत्तर देना प्रतिदृष्टान्तसमा जाति होती है । जैसे- शब्द अनित्य है क्यों कि वह कृतक है जैसे बट इस अनुमान के विरोव में यह कहना कि शब्द आकाश के समान अमूर्त है अतः वह नित्य भी सिद्ध होगा (यहां जो कृतक होता है वह अनित्य होता है इस व्याप्ति पर आधारित हेतु के बारे में कुछ न कह कर केवल वट इस दृष्टान्त के प्रतिकूल आकाश यह दृष्टान्त उपस्थित कर दिया हे अतः यह उचित दुषण नहीं है- प्रतिदृष्टान्तसमा जाति है)। उत्पत्तिसमा जाति कारण के विवटन द्वारा यह आपत्ति उपस्थित करना कि कार्य की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती-उत्पत्तिसमा जाति होती है। उदाहरणार्थ- शब्द अनित्य है क्यों कि वह कृत्रिम है इस पूर्वोक्त अनुमान के विरोव में यह कहना कि शब्द इत्यादि कार्य के उत्पन्न होने के पहले तालु, होंठ इत्यादि किस के साधन होते हैं (-वे शब्द के कारण है ऐसा नहीं कहा जा सकता क्यों कि ) उस समय संबद्ध कार्य का (शब्द का) अभाव हैं (शब्द अभी उत्पन्न नहीं हुआ है ) अतः वे ताल आदि किसी के साधन नहीं है अतः वे कारण भी नहीं हैं। कारण ही नहीं है तो गब्द यह कार्य किस से उत्पन्न -होगा (अर्थात वह उत्पन्न ही नहीं हो सकता) जिस से उसे अनित्य सिद्ध किया जा सके (शब्द उत्पन्न ही नहीं हुआ तो उसे अनिन्य सिद्ध करना भी संभव नहीं है)। ( इस जाति का प्रयोग करनेवाला कहता है कि कारण और कार्य दोनों एक ही समय होने चाहिये-तालु आदि तभी कारण होंगे जब शब्द हो -वह कारण और कार्य के क्रमशः होने को अस्वीकार करता -~१.६०] संशयसमा ५९ . प्रतियोगिकार्याभावात् , न किंचित् प्रतीति ताल्वादीनां कारणभावाभाव । कारणाभावे शब्दकार्य कुत उत्पद्येत यतोऽनित्यं स्यादिति ॥ [६०. संशयसमा] भूयोदर्शनात् निश्वितव्याते. साधम्यवैधम्र्योपाधिप्रतिकूलतर्कादिना “पक्षे संदेहापादनं संशयसमा जाति. 1 उपाधिप्रतिकूलतर्कादिकम् असद् दूषणं सदूषणेष्वपठितत्वात् अन्यतरपक्षनिर्णयाकारकत्वात् व्याप्तिपक्ष- 'धर्मवैकल्यानिश्चायकत्वात् पक्षे साध्यसंदेहापादकत्वात् जातित्वात् . साधर्म्यवत् । अथ प्रत्यनुमानप्रतिकूलतर्कयोः को भेद इति चेत् एकस्मिन् धर्मिणि साध्यविपरीतप्रसाधकं प्रत्यनुमानम्, तद्धर्मिणि धर्मान्तरे वा विरुद्धप्रसाधकः प्रतिकूलतः ।। में है, किन्तु कारण और कार्य का क्रमश होना प्रत्यक्षसिद्ध है अत. इस आक्षेप को जाति (दूपणाभास ) कहते हैं, वास्तविक दूषण नही, जब शब्द प्रत्यक्ष द्वारा जाना जाता है तब शब्द उत्पन्न नहीं हो सकता यह आक्षेप काल्पनिक ही होगा, वास्तविक नहीं)। संशयसमा जाति वारवार देखने से जिस की व्याति निश्चित हो चुकी है उस पक्ष भी समानता, भिन्नता, उपाधि, प्रतिकूल तर्क आदि के द्वारा सन्देह व्यक्त करना यह संगयसमा जाति होती है । उपाधि, प्रतिकूलतर्फ आदि झूठे दूषग है, वास्तविक दुषणों में इन का समावेश नहीं किया जाता, ये किसी एक पक्ष का निर्णय नहीं कर सकते, व्याति की गलती या पक्ष के धर्म होने की गलती का निश्चय इन से नही हो सकता, वे केवल पक्ष में साध्य के होने के बारे में सन्देह व्यक्त करते हैं, अत. वे साधर्म्यसमा आदि के समान जाति हैं ( पृठे दूषण हैं, वास्तविक दूषण नही हैं ) । यहा प्रश्न होता है कि प्रत्यनुमान और प्रतिकूलतर्क में क्या भेद है (क्यों कि प्रत्यनुमान से विरोध करन को प्रकरणसमा जाति कहते हैं यह अगले परिच्छेद में बताया है)। उत्तर यह है कि एक ही धर्मी (धर्मयुक्त पक्ष) में साव्य के विरुद्ध बात को सिद्ध करना चाहे वह प्रत्यनुमान होता है,उसी धर्मी में या किसी अन्य धर्मी में विरुद्ध वात को सिद्ध करना चाहे वह प्रतिकूलतर्क होता है।

६०. प्रमाप्रमेयम् [१.६१- [६१. प्रकरणसमा] प्रत्यनुमानेल प्रत्यवस्थानं प्रकरणसमा जाति । अनित्य' शब्दः कृतक्त्वाद् घवनियुक्ते नित्य शब्द श्रावणत्वात् शब्दत्ववदिति ॥ [६२. अहेतुसमा] त्रिकालेऽपि साधनासंभवेन प्रत्यवस्थानम् अहेतुसमा जातिः। पूर्वप्रयोगे अयं हेतुः साध्यात् प्राकालभावी उत्तरकालभावी समकाल- प्रकरणममा जाति विरोधी अनुमान का प्रयोग कर उत्तर देना यह प्रकरणसम जाति है । जैसे - उच्च अनित्य है क्यो कि वह घट जमा कृतक है इम अनुगन के उत्तर में यह कहना कि शब्द नित्य हे क्यों कि वह शब्दत्व के समान श्रावण (सुनने योग्य) है । ( वादी द्वारा उपस्थित किये गए हंत में दूषण बतलाना यह प्रतिवादी का पहला काम है वह + कग्न हुए प्रतिकूल पक्ष का समर्थक उन्मान प्रस्तुत करना वाट की गति के विरुद्ध है अत इसे जाति अर्थात झुठा दुपण कहा है अहेतुसमा जाति हीनों कालों में हित से स व्य को) सिद्ध करना असंभव है यह कह कर । स्नुमान का विरोध करना यह हेत्स्मा जाति है। जैसे - पृर्वोक्त उनुमान में ( शब्द कृत्व है अत निन्य है इस कथन में ) यह कहना कि यह हत ( शब्द का कृतक हो-1) सा-य के (शब्द क अनित्य होने के) परलं के समय विद्यमान होता है, बाद के समय होता है या समान समय मे होता है. यदि हेतु साध्य के पहले हो गया हो तो उस समय साध्य के न होने मे हेतु किसे सिद्ध करेगा - अर्थात हेतु से सिद्ध करनेयोग्य साध्यही त्व नहीं है; यदि हेतु साध्य के वाद होता है तो वह साध्य हुन के पहले ही सिद्ध है फिर हेतु के प्रयोग से क्या लाम; तथा द हंतु यार साध्य म्मान समय में है तो उन मे साध्यसायन- स्वध नही हो स्वता क्या कि वे समकालीन हैं, जैसे गाय के दाहिने और वायें सीग में साव्यसाधनसबन्ध नहीं हो सकता (एक सींग दूसरे का कारण -१ ६४] अर्थापत्तिसमा ६१ भावी वा । आद्ये प्राक्काले साध्याभावाद् हेतुः कस्य साधको भवेत् , न कस्यापि। द्वितीये साध्यस्य प्रागेव सिद्धत्वात् किमोन हेतुना। तृतीये तो साध्यसाधनभावरहितो समकालभावित्वात् सव्येतरगोवियाणवदिति। [६३. अर्थापत्तिसमा] अर्थापत्या प्रत्यवस्थानम् अर्थापत्तिसमा जाति । उदाहरणम्- अनित्य शब्दः कृतकत्वाद् घरवदित्युक्ते सकेतव्यवहारान्यथानुपपत्तेः शब्दो नित्य. स्यादिति ॥ [६४ अविशपसमा एतद्धर्माविशेषेण प्रतिकूलप्रसंगः अविशेपसमा जातिः। उदा- हरणम्-अनित्य शब्दः कृतकत्वात् घटवदिति प्रसाध्येत तर्हि अनित्य- नहीं हो सकता) क्यों कि वे दोनो समान समय में विद्यमान है। (इन आक्षेपो को जाति इसलिए कहा कि उन में कोई तथ्य नहीं हैं, हेतु साध्य से पहले है या बाद मे इससे अनुमान के सही होने में कोई अन्तर नहीं पडता; कृत्तिका के उदय से रोहिणी के उदय का अनुमान सही है, यहा हेतु साध्य से पहले विद्यमान है, बाढ से वपी का अनुमान सही होता है, यहा हेतु साध्य के बाद भी विद्यमान है, बुंए से अग्नि के अनुमान में हेतु और साध्य दोनों एक ही समय मे विद्यमान होते हैं)। अर्थापत्तिसमा जाति अर्थापत्ति का प्रयोग कर के उत्तर देना यह अर्यापत्तिसमा जाति है। जैसे शब्द अनित्य है क्यों कि वह घट जैसा कृतक है इस अनुमान के उत्तर में यह कहना कि शब्द नित्य है क्यों कि ऐसा माने विना संकेतो के व्यवहार की उपपत्ति नही लगती । (आगे परिच्छेद ६९ मे आचार्य ने इस जाति को प्रकरणसमा जाति से अभिन्न बतलाया है)। अविशेपसमा जाति उसी गुणधर्म की समानता बतला कर विरोध का प्रसग व्यक्त करना यह अविशेपसमा जाति है । जैसे-शब्द अनित्य है क्यो कि वह घट जैसा ऋतक है ऐसा सिद्ध किया जाने पर यह कहना कि घट के समान सत् (विद्य- प्रमाप्रमेयम् [१.६५- माकाशादिकं सावात् बटवदित्यादिकं स्यादिति । अयमेव प्रतिकृलतर्क इति ज्ञातव्यः॥ [६५ उपपत्तिममा] उभयत्रैकहेतपपत्या प्रत्यवस्थानम् उपपत्तिसमा जातिः। अनित्यः शब्द. पक्षपक्षयोः अन्यतरत्वात् सपक्षवत् , नित्यः शब्दः पक्षसपक्षयोः अन्यतरत्वात् सपशवदिति । निन्या भू. गन्धवत्वात्. अनित्या भृ. गन्ध- वत्त्वात् इन्यादि ॥ [६६. उपलब्ध्यनुपलब्धिसमे) सपटने हेतुरहितसाध्योपलब्ध्या प्रत्यवस्थानम् उपलन्धिसमाः जातिः। अनित्यः शब्दः कृतकत्वाद् घटवदित्युक्ते प्रागभावे कृतकन्वा- मान) होने से आकान मादि भी अनित्य सिद्ध होंगे। इसी को प्रतिकृलतर्क भी कहते हैं । ( यह जाति अर्थात झूठा दृषण है क्यों कि इस में शब्द अनित्य है इस साध्य के बारे में कुछ न कह कर आकाश अनित्य सिद्ध होगा यह प्रस्तुत विषय से असंबद्ध बात उठाई गई है, यह स्पष्टतः विषयान्तर है)। उपपत्तिसमा जाति दोनों पक्षों में एक ही हेतु की उपपत्ति वतला कर उत्तर देना यह उपपत्तिसमा जाति होती हैं । जैसे - शब्द अनित्य है क्यों कि वह पक्ष और तपक्ष में से किसी एक में विद्यमान हैं जैसे सपक्ष, शब्द नित्य है क्यों कि वह पक्ष और सपक्ष में से किसी एक में विद्यमान है जैसे सपक्ष। (दूसरा उदाहरण - ) पृथ्वी नित्य है क्यों कि वह गन्ध से युक्त है, पृथ्वी अनित्य है क्यों कि वह गन्ध से युक्त है। उपलब्धिसमा तथा अनुपलब्धिसमा जातियां सपक्ष मे जहा साव्य पाया जाता है किन्तु हेतु नही पाया जाता ऐसा उदाहरण दे कर आक्षेप उपस्थित करना यह उपलविसमा जाति होती है । जैसे-शब्द अनित्य है क्यों कि वह बट जैसा कृतक है इस अनुमान के उत्तर ने कहना कि प्रागभाव कृतक नहीं हैं फिर भी उस में अनित्यता पाई जाती है अत कृतक होना अनित्य होने का गेधक कैसे होगा ? (यह वास्तविक khe -१.६७ नित्यानित्यसमा ६३ भावेऽपि अनित्यत्वं दृश्यते, कथमेतद् गमकं स्यादिति ॥ अनुपलब्धेरभाने साध्ये अनुपलब्धेरप्यनुपलम्भन प्रत्यवस्थानम् अनुपलब्धिसमा जातिः।। उदाहरणम् शब्द उच्चारणात् पूर्व नास्ति अनुपलब्धे. इत्युक्ते अनुपलब्धेरप्यनुपलम्भ एव इन्द्रियलिङ्गशब्दानामनुपलब्धिसम्बन्धरहित- त्वेन तद्ग्रहणायोगादिति ॥ [६७ नित्यानित्यसमे] पक्षस्यानित्यधर्मस्य नित्यत्वापादनेन प्रत्यवस्थानं नित्यसमा जातिः। अनित्य. शब्दः कृतकत्वाद् घटवदित्युक्ते शन्दे अनित्यत्वं सर्व- दृषण नहीं है क्यो कि इस मे व्याप्ति के सही रूप को न समझते हुए आक्षेप किया है। जो कृतक होते है वे अनित्य होते हैं ऐसी व्याति इम अनुमान मे है किन्तु आक्षेप करनेवाला कह रहा है कि जो अनित्य हे वे सभी कृतक होने चाहिए, यह ठीक नहीं है)। किसी वस्तु का अभाव सिद्ध करने के लिए अनुपलब्धि (न पाण जाना ) यह हेतु दिये जाने पर अनुपलब्त्रि की भी अनुपलब्धि है यह कह कर उत्तर देना अनुपलब्बिसमा जाति होती है। जैसे-उच्चारण के पहले शब्द नहीं है क्यों कि वह ज्ञात नहीं होता ऐसा कहने पर आक्षेप करना कि यहा शब्द ज्ञात नहीं होता यह बात भी ज्ञात नहीं हो सकती क्यो कि यह अनुलपब्धि इन्द्रियप्रत्यक्ष से अथवा अनुमान से अथवा शब्द से (आगम से ) भी ज्ञात नही हो सकती-अनुलब्धि का इन्द्रिय प्रत्यक्ष आदि से सम्बन्ध ही नहीं होता ( यह जाति है - वास्तविक दृषण नहीं है क्यो कि इस में किसी वस्तु के अभाव का ज्ञान ही अस्वीकार किया गया है, वस्तु के अभाव का ज्ञान प्रत्यक्ष से ही होता है यह बात आक्षेपकर्ता भूल गया है । वस्तु के अभाव का अभाव है यह कहने का तात्पर्य होगा कि वस्तु का आस्तित्व है और यह वात प्रत्यक्ष से ही ज्ञान होती है)। नित्यसमा तथा अनित्यसमा जाति पक्ष के अनित्य गुणधर्म को नित्य बतला कर उत्तर देना यह नित्यसमा जाति होती है। उदाहरणार्थ - शब्द अनित्य है क्यो कि वह कृतक है जैसे घट इस अनुमान के प्रस्तुत करने पर यह कहना कि शब्द में अनित्यत्व सर्वदा ६४ प्रमाप्रमे त्रम् [१.६८- दास्ति कदाचिद्गा आये शब्दस्यापि सर्वत्र नद्भाव । धर्मसभावस्य धर्मिसमावसन्तरण अनुपपत्ते 1 द्वितीये सदा अनित्ययो न प्रय नवा नित्य एवेति ॥ एकस्यानित्यत्वे सर्वत्र अनित्यत्वप्रतिपाइनन् अनिवलमा जाति । प्राक्तनप्रयागे सर्वमनित्य सत्वात् बच्वमिति ।। [६८ कार्यसमा] कार्यत्वादिहेतूनां संदिग्धासिद्धत्वापादनं कार्यसमा जातिः। होता है या कभी कभी होता है, प्रथम पक्ष में (यदि शब्द में अनित्यत्व सर्वदा होता हो तो) शब्द का भी अस्तित्व सर्वदा सिद्ध होगा क्यों कि गुणवर्म का अस्तित्व वमी के अस्तित्व के बिना नहीं हो सकता (अतः यदि अनित्यत्व यह गुण सर्वदा रहेगा तो उस का धारक शब्द भी सर्वदा रहेगा अर्थात वह नित्य सिद्ध होगा), दूसरे पक्ष में (यदि गव्द में अनित्यत्व कभी कभी रहता है तो) जब शब्द में अनित्यत्व यह गुणवर्म नहीं होगा तब वह नित्य ही सिद्ध होगा (यह भी वास्तविक दूपण नहीं हें, शब्द अनित्य है ऐसा वादी ने कहा तभी यह गृहांत हो जाता है कि जिस गन्द का एक समय अस्तित्व है - उसका दूसरे समय अभाव होगा, अत: उस में यह पूछना कि अनित्यत्व सर्वढा रहेगा या कभी कमी - निरर्थक है)। एक वस्तु को अनित्य बतलाने पर सभी को अनित्य बतलाना यह अनित्यसमा जाति होती है। जैसे - पूर्वोक्त अनुमान में (शब्द अनित्य है यह कहने पर) कहना कि सभी वस्तुएं अनित्य हे क्यों कि वे सत् हैं जैसे घट । (परि. ६, में आचार्य ने बतलाया है कि यह जाति अविशेपसमा जाति से भिन्न नहीं है)। कार्यसमा जाति कार्यत्व इत्यादि हेतुओं को सदिग्वासिद्ध बतलाना यह कार्यसमा जाति होती है। जैसे पूर्वोक्त अनुमान में (शब्द अनित्य है क्यो कि वह कृतक है जैसे घट) यह कहना कि शब्द का कृतक होना सदिग्ध है क्यों कि ताल आदि शब्द के कारण हे अथवा केवल व्यक्त करनेवाले हैं इस विषय में वादियो में मतभेद है अत (शब्द कृतक है या नहीं इस विषय - में) सन्देह होता है। (यह जाति है अर्थात वास्तविक दूरण नहीं है क्यों १.७० ] जातियों की संख्या ६५ प्राक्तनप्रयोगे शब्दे कृतकत्वं संदिग्धं ताल्वादीनां कारणत्वं व्यञ्जकत्वं वेति वादिविप्रतिपत्ते संदेहादिति । इति जातयः॥ [६९. जातिसंख्याविचारः] वये साध्यस्य संभूतेः पृथग् नास्य निरूपणम् । प्रत्युदाहरणं चापि साधर्म्य लब्धवृत्तिमत् ॥ १२ ॥ अर्थापत्युपपत्ती चाभिन्ने प्रकरणादिह । अनित्यत्वसमाजातिविशेषान्न भिद्यते ॥ १३ ॥ इति पञ्चापसारेणासिद्धाधुपचयेन च । जातयो विंशतिस्ताः स्यु पुनरुक्ति विना पुनः ॥१४॥ [७०. निग्रहस्थानानि] वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरस्य पराजयनिमित्तं लिग्रहस्थानम् । प्रति नाहानि. प्रतिज्ञान्तरं प्रतिनाविरोधः प्रतिन्नासंन्यासः हेत्वन्तरम् अर्थान्तरं- निरर्थकम् अविनातार्थम् अपार्थकम् अप्राप्तकालं हीनम् अधिकम् पुनरु कि यहां प्रस्तुत हेतु मे कोई स्पष्ट दोप न बतला कर केवल वादियों के मतभेद पर आधारित संदेह को महत्त्व दिया है)। इस प्रकार जातियों का वर्णन पूरा हुआ। जातियों की संख्या वर्यसमा जाति में साध्यसमा जाति का अन्तर्भाव होता है अत. उस का पृथक वर्णन नहीं करना चाहिए, प्रत्युदाहरण जाति का समावेश साधर्म्य- समा जाति में होता है, अर्थापत्तिसमा तथा उपपत्तिसमा जातियां प्रकरणसमा जाति से भिन्न नही है तथा अनित्यममा जाति अविशेषसमा जाति से भिन्न नहीं है। इस प्रकार पुनरुक्ति छोडकर पाच जातियों को कम करने से तथा असिद्धादिसमा जाति का अधिक समावेश करने से जातियोंकी सख्या बीसह होती है। निग्रहस्थान वादी और प्रतिवादी में से किसी एक के पराजय का जो कारण होता है उसे निग्रहस्थान कहते हैं। प्रतिज्ञाहानि से हेत्वाभास तक (जो नाम मूल प्रमाप्रमेयम् [१.७१- क्लस् अननुभाषणम् अन्नानम् अप्रतिमा विश्वेपः सतानुना पर्यनुयोज्यो- ऐक्षणं निरनुयोज्यानुयोग. अपसिद्धान्तः हेत्वाभासाश्चेति द्वाविंशति- निग्रहस्थानानि ॥ [७१. प्रतिज्ञाहानिः उक्ते हेतो दूपणोद्भावने प्रतिपक्षाभ्युपगम. प्रतिज्ञाहानि म निग्रह- स्थानम्। तस्योदाहरणम्-अनित्यः शब्दः कृतकत्वाद् घटवदित्युक्ते प्रध्वंसाभावेन हेतो. अनेकान्तोदभावने नित्यो भवेदिति ॥ ७२. प्रतिज्ञान्तरम् । सिद्धसाध्यत्वेन हेतोः अकिंचित्करत्वोद्भावने पश्चात् साध्यविशेष- गोपादानं प्रतिज्ञान्तरं नाम निग्रहस्थानम् । उदाहरणम्-आद्यं चैतन्यं । में गिनाये हैं वे ) बाईम निग्रहस्थान होते हैं (इन का क्रमश वर्णन अब करेंगे)। प्रतिज्ञाहानि निग्रहस्थान कहे हुए हेतु में दोष बतलाने पर प्रतिपक्ष को स्वीकार कर लेना यह प्रतिज्ञाहानि नाम का निग्रहस्थान है। उस का उदाहरण है-शब्द अनित्य है क्यों कि वह वट जैसा कृतक है इस अनुमान के प्रयोग में हेतु में प्रध्वंसाभाव से अनेकान्त-दोष बतलाने पर (प्रव्वसाभाव कृतक है किन्तु अनित्य नही अत. कृतकत्व यह हेतु प्रध्वसाभाव इस नित्य विपक्ष में भी होने से अनैकान्तिक है ऐसा कहने पर ) यह कहना कि शब्द नित्य होना चाहिए। प्रतिज्ञान्तर निग्रहस्थान साध्य के पहले ही सिद्ध होने के कारण हेतु को अकिचित्कर बतलाये जाने के बाद साध्य में किसी विशेपण का ग्रहण करना यह प्रतिज्ञान्तर नाम का निग्रहस्थान है। उदाहरण पहला (जन्मसमय का) चैतन्य चैतन्यपूर्वक होता है (चैतन्यसे ही चैतन्य उत्पन्न होता हैं ) क्यों कि वह चेतना का विवर्त है जैसे कि मध्यकालीन चेतना-विवर्त होता है इस अनुमान के प्रयोग करने पर पहले (जन्मसमय के) चैतन्य के पहले माता-पिता का चैतन्य होता ही है यह स्वीकृत हे अतः पहला - -१.७४] प्रतिज्ञाविरोध ६७ चैतन्य पूर्वक चिद्विवर्तन्वात् मध्यचिद्विवर्तचदित्युक्ते आद्यचैतन्यस्य मातापितृचैतन्यपूर्वकत्वाझीकारात् सिद्धलाध्यत्वेन हेतोः अकिंचित्कर- योमायने पश्चात् आचं चैतन्यम् एक संतानचैतन्यपूर्वकं चिद्विवर्तत्वात् मध्यचिद्विवर्तवदित्यादि । [७३. प्रतिज्ञाविशेषः। धर्मधर्मिविरोधः प्रतिनाविरोधो नाम निग्रहस्थानम्। सर्वजो न 'किंचिद् जानाति जिज्ञासारहितत्वात् सुपुतवदित्यादि । केचित् साध्य- साधनयो विरोध प्रतिनाविरोधमाचक्षते, तन्मतेऽस्य विरुद्धहेत्वाभास- स्वेनैव निग्रहत्वात् ।। [७४. प्रतिज्ञासंन्यासः] उक्ते हेतो दूपणोद्भावने स्वसाध्यपरित्यागः प्रतिज्ञासंन्यासो नाम चैतन्य चैतन्यर्वक होता है यह साध्य पहले ही सिद्व है अतः यहां हेतु अकिंचि कर ( व्यर्थ ) है ऐसा कहने पर फिर यह कहना कि पहले (जन्मसमय के) चैतन्य के पहले एक ही सन्तान का चैतन्य होता क्यों कि वह चेतना का विवर्त है जैसे कि मध्यकालीन चेतनाविवर्त होता है (यहा पहली प्रतिज्ञा यह थी कि पहला चैतन्य चैतन्यपूर्वक होना है, बाद में इस प्रतिज्ञा को बदल कर यह स्वरूप दिया गया कि पहला चैतन्य तथा उस के पहले का चैतन्य एकही सन्तान के - एकही व्यक्तित्व के होने चाहिए अत यह प्रतिज्ञान्तर निग्रहस्थान हुआ)। प्रतिज्ञाविरोध निग्रहस्थान धर्म (गुण) और वर्मी (गुणवान् ) में विरोव होना यह प्रतिज्ञा- विरोध नाम का निग्रहस्थान है । जैसे-सर्वज्ञ कुछ नही जानता क्यों कि वह सोए हुए व्यक्ति के समान जिज्ञासारहित है (यहा सर्वज्ञ अर्थात जो सव जानता है वह धर्मी है, उस का कुछ न जानना इस वर्म से स्पष्ट ही विरोध है अत' यह प्रतिज्ञाविरोव निग्रहस्थान हुआ)। प्रतिज्ञासंन्यास निग्रहस्थान हेतु बतलाने पर दूषण दिखलाने पर अपने साव्य को छोड देना यह प्रतिज्ञासन्यास नाम का निग्रहस्थान है । जैसे-शब्द अनित्य है क्यों कि वह ६८ प्रमाप्रमेयम् निग्रहस्थानम् । अनित्यः शब्द कृतकत्वाद् घटवदित्युक्ते प्रध्वंसाभावेन देतोः अनेकान्तोदभावने नाहं शब्दमनित्यं ब्रवीमीत्यादि । । ७५. हेत्वन्तरम् ] अविगेपे हेतो व्यभिचारण प्रतिषिद्धे पश्चाद् विशेषणोपादानं हेत्व- न्तरं नाम निग्रहस्थानम् । उदाहरणम्-पूर्वप्रयोगे पूर्ववदनेकान्तोद्भावने. पश्चाद अनित्यः शब्द. भावत्वे सति कृतकान्वाद घटवदित्यादि । [७६ अर्थान्तरम् ] प्रकृतप्रमेयानुपयोगिवचनम अर्थान्तरं नाम निग्रहस्थानम्। उदाहरणम् कृतक हैं जैसे बट इस अनुमान के प्रस्तुत करने पर हेतु में प्रध्वंसाभाव से अनेकान्त बतलाया गया (प्रध्वसाभाव कृतक होने पर भी नित्य है अतः कृतकत्व यह हेतु नित्य और अनित्य दोनों पदार्थों में पाया जाता है-वह अनैकान्तिक है ऐसा कहा गया) तब मैं शब्द को अनित्य नहीं कहता ऐसा कहना (प्रतिज्ञासंन्यास होगा, शब्द अनित्य है यह बाढी की प्रतिज्ञा थी उस से वह मुकरता हैं यही प्रतिज्ञालन्गस है)। हेत्वन्तर निग्रहस्थान विशेषणरहित हेतु का प्रयोग करने पर (प्रतिवादी द्वारा) व्यभिचार--- दोष दिखलाने पर ( हेतु मे ) विशेषण का स्वीकार करना यह हेत्वन्तर नाम का निग्रहस्थान हैं । जैसे-उपर्युक्त अनुमान में (शब्द अनित्य है क्यों कि वह कृतक है जैसे घट) उपर्युक्त प्रकार से अनेकान्त - टोप बतलाने पर (प्रध्वंसाभाव कृतक है किन्तु नित्य है अत. कृतकत्व यह हेतु नित्य और अनित्य दोनो पढार्थों में पाया जाता है अत. वह अनैकान्तिक है) यह काहना कि शब्द अनित्य है क्यों कि वह भाव हैं तथा कृतक है जैसे घट (यहां मूल हेतु कृतकत्व में भावत्व के साथ होना यह विशेषण अधिक जोडा है अत. यह हेत्वन्तर निग्रहस्थान हुआ)। अर्थान्तर निग्रहस्थान प्रस्तुत विषय के लिए निरुपयोगी बाते कहना यह अर्थान्तर नाम का निग्रहस्थान है जले-शब्द अनित्य है. क्या कि वह कृतक है यह हेतु है, हेतु -१.७८] अविज्ञातार्थक निग्रहस्थान ६९ नाम अनित्यः शब्दः, कृतकत्वादिति हेतु., हेतुश्च हिनोतेस्तुन्प्रत्यये उणादिकं पदं तस्य लिङ्गसनानन्तरं स्यात् व्युत्पत्तिः, हेतु. हेतू हेतवः इत्यादि । [७७. निरर्थकम् । अर्थरहितशब्दमात्रोच्चारणं निरर्थक निग्रहस्थानम् । उदाहरणम्- अनित्यः शब्दः अवहडमठपरतत्वात् नयभजखगसदचलव- दित्यादि । [७८. अविज्ञातार्थकम् ] वादिना त्रिरुपन्यस्तमपि परिषत्प्रतिवादिभि परिषत्प्रतिवादिभि अविज्ञायमानम् अविनातार्थकम् नाम निग्रहस्थानं वादिनः । प्रतिवादिनोऽप्येवम् ।। में उस के and शब्द हि धातु को उणादि तुन् प्रत्यय लगाने से बना है, उस की व्युप्तत्ति "लिङ्ग और संज्ञा के बाद होती है, (प्रथमा रूप हेतुः हेतू हेतवः ( यहां हेतु शब्द का व्याकरण बतलाना अर्थान्तर है क्यों कि इस का शब्द के अनित्य होने से कोई संबंध नहीं है - साध्य के लिए यह निरुप- -योगी है)। निरर्थक निग्रहस्थान विना अर्थ के केवल ध्वनि का उच्चारण करना यह निरर्थक नाम का निग्रहस्थान है । जैसे-शब्द अनित्य है क्यो कि वह नयभजखगसदचल जैसा अवहडमठपरत है ( यहा अवहडमठपरत तथा नयभजखगसढचल विना अर्थ के केवल व्वनि हे अतः यह निरर्थक निग्रहस्थान हुआ)। अविज्ञातार्थक निग्नहस्थान वादी के तीन बार कहने पर भी जिस को सभा तया प्रतिवादी न समझ सकें उसे वादी के लिए अविज्ञातार्थक नाम का निग्रहस्थान कहना चाहिये । इसी प्रकार प्रतिवादी के लिए भी निग्रहस्थान होगा (यदि उस के तीन बार कहने पर भी वादी और सभा उसे न समझ पाये)।

७० प्रमाप्रमेयम् [१.८०-- [७९. अपार्थकम् ] समुदायार्थापरिनानम् अपार्थक नाम निग्रहस्थानम् । अग्निः कृष्णो वायुत्वात् जलवत् । समुद्र. पीयते मेघे अहमद्य जरातुरः। अमी गर्जन्ति पर्जन्या हरेरावतः प्रियः ॥ १५॥ इत्यादि। [८० अमाप्तकालम् ] अवयवविपर्यासवचनम् अप्राप्तकालं नाम लिग्रहस्थानम् । घटवत् कृतकत्वादनित्य शब्द इत्यादि ।। अपार्थक निग्रहम्थान (शब्दों के ) समूह के अर्थ का ज्ञान न होना यह अपार्थक नाम का निग्रहस्थान है। जैसे - अग्नि काला है क्यों कि वह वायु है जैसे जल ( यहा अग्नि, कृष्ण, वायु और जल ये चारों शब्द सार्थ होने पर भी उन के समूह का कोई अर्थ सगत नहीं हो सकता)। समुद्र मेघों द्वारा पिया जाता है, में अब बुढापे से पीडित हू, ये बादल गरज रहे हे, इन्द्र को ऐरावत प्रिय, है (यहां चारो वाक्यखड सार्थ होने पर भी उन के समूह में अर्थ की कोई सगति नहीं है अतः यह अपार्थक निग्रहस्थान हुआ)। अप्राप्तकाल निग्रहस्थान (अनुमान वाक्य के ) अव्यबो को उलट-पलट कर कहना यह अप्राप्तकाल । नाम का निग्रहस्थान है । जैसे - घट के समान कृतक होने से अनित्य हैं गन्द (यहा शब्द यह पक्ष अन्त में, अनित्य होना यह साध्य उस के पहले, कृतक होना यह हेतु उस के पहले तथा घट यह दृष्टान्त प्रारंभ में कहा है, अनुमान वाक्य की रीति के अनुसार इन का क्रम ठीक उलटा अर्थात पक्ष-साध्य-हेतु-दृष्टान्त इस प्रकार होना चाहिए, अतः क्रम ठीक न होने से यह अप्राप्तकाल निग्रहस्थान, हुआ)। -- -१.८३] हीन-अधिक निग्रहस्थान ७१ [८१. हीनम् ] अन्यतमेन अवयवेन न्यून हीनं नाम निग्रहस्थानम्। अनित्यः शब्दः कृतकत्वात्, यो यः कृतकः स सर्वोऽप्यनित्य , यथा घटः, कृतक- श्चायं शब्द इति ॥ [८२. अधिकम् ] द्वयादिहेतुदृष्टान्तमधिकं नाम निग्रहस्थानम्। आकाशं वाह्येन्द्रिय- ग्राह्यगुणरहितं नित्यत्वात् निरवयवत्वात् स्पर्शरहितत्वात् कालवत् आत्मवत् इत्यादि। [८३. शेषाणि निग्रहस्थानानि ]. शब्दार्थयो. पुनर्वचनं पुनरुक्तं नाम निग्रहस्थानम् अन्यत्रानुवादात् । परिपदा परिक्षातस्य , वादिना त्रिरुपन्यत्तस्याप्रत्युच्चारणम् अननुभाषणं हीन निग्रहस्थान अनुमान का वाक्य किसी एक अवयव से न्यून हो तो वह हीन नामक निग्रहस्थान होता है । जैसे-गब्द अनित्य है क्यो कि वह कृतक है, जो जो कृतक होता है वह सभी अनित्य होता है, जैसे घट, और यह शब्द कृतक है । (यहां अनुमान के वाक्य में अन्तिम अवयव निगमन-इस लिए शब्द अनित्य है - का प्रयोग नहीं किया गया है अतः यह हीन निग्रहस्थान - 1 - हुआ)। अधिक निग्रहस्थान दो या अधिक हेतुओं तथा दृष्टान्तों का प्रयोग करना यह अधिक नाम का निग्रहस्थान है । जैसे - आकाश में वाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य गुण नही है क्यों कि वह काल के समान और आत्मा के समान नित्य है, अवयव- रहित है तथा स्पर्शरहित है (यहा नित्यत्व, निस्वयत्व, स्पर्शरहितत्व इन तीन हेतुओं का तथा काल और आत्मा इन दो दृष्टान्तों का प्रयोग किया गया है अत यह अधिक निग्रहस्थान हुआ)। शेप निग्रहस्थान किसी शब्द या अर्थ का दुवारा प्रयोग करना यह पुनरुक्त नामक F है ७२ प्रमाप्रमेयम् [१.८४- नाम निग्रहस्थानम्। साधन प्रयोगे दूपणापरिज्ञानंदूपणोद्भावने परिहारा- प्रतिपत्ति अप्रतिभा नाम निग्रहस्थानम् । व्यासंगाद् भीते अप्रतिभादेवा प्रारब्धकथाविच्छेदो विक्षेपो नाम निग्रहस्थानम्। स्वपक्षोक्तदोषमपरिहत्य परपक्षे दोपसुद्भावयतो मतानुज्ञा नाम निग्रहस्थानम् । प्राप्नदोयानुद्भावनं पर्यनुयोज्योपेक्षणं नाम निग्रहस्थानम् । दोपरहितस्य दोपोभावनं निर- नुयोज्यानुयोगो नाम निग्रहस्थानम्। स्वीकृतागमविरुद्धप्रसाधनम् अप- सिद्धान्तो नाम निग्रहस्थानम्। असिद्धाद्यो हेत्वाभासा नाम निग्रह- स्थानानि ॥ [८४. निग्रहस्थानोपसंहारः। लिङ्गकारककालादिस्खलनं निग्रहो भवेत् । तत्प्रतिमाभ्युपेतस्य नान्यस्य सुखवादिनः ॥ १६॥ निग्रहस्थान होता है, किन्तु (प्रतिवादी के कथन का खंटन करनेके लिए) दुहराना यह निग्रहस्थान नहीं होता। जिसे सभा ने समझ लिया हो तथा वादी ने तीनबार जिस का उच्चारण किया हो उसे न दुहरा सकना यह अननुभापण नामका निग्रहस्थान होता है । (प्रतिपक्षी द्वारा) किसी साधन (हेतु) का प्रयोग किये जाने पर उस में दृषण न सूझना तथा (प्रतिपक्षी द्वारा) दूषण दिये जाने पर उस का उत्तर न सूझना यह अप्रतिभा नामका निग्रहस्थान होता है । (अन्य विषय में ) रुचि होने से, (पराजय के) डरसे या उत्तर न सूझने से शुरू की हुई चर्चा को रोक देना यह विभेर नाम का निग्रहस्थान होता है। अपने पक्ष में बताये गये दोप का उत्तर न देकर प्रतिपक्ष में दोष बताना यह मतानुज्ञा नाम का निग्रहस्थान होता है । (प्रतिपक्ष में) प्राप्त हुए दोष को न बतलाना यह पर्यनुयोज्योपेक्षण नाम का निग्रहस्थान होता है। निर्दोष कथन में दोष बतलाना यह निरनुयोज्यानुयोग नाम का निग्रहस्थान होता है। अपने द्वारा मान्य आगम के विरुद्ध तत्व को सिद्ध करना यह अपसिद्धान्त नाम का निग्रहस्थान होता है । असिद्ध इत्यादि हेत्वाभास नाम के निग्नहस्थान है (जिन का विस्तार से वर्णन पहले हो चुका है। निग्रहम्थान चर्चा का समारोप जिस ने वैसी प्रतिज्ञा की हो उस वादी के लिए लिंग, कारक, काल --१८६] वाद ७३ तथा साधनदूषणानुपयोगिनां प्रतिभाक्षयकारिणां कलह-गालिप्रदान सहभापण-वृथाप्रहसन-कपोलवादन-तलप्रहार-शिरःकम्पन-ऊरुताडन नर्तन-उत्पवन-आस्फोटनादीनामपि निग्रहस्थानत्वम् ॥ [८५. छलादिप्रयोगनियमः ] स्वयं नैव प्रयोक्तव्या. सभामध्ये छलादयः । परोक्तास्तु निराकार्या वादिना ते प्रयत्नतः ॥ १७ ॥ यदा सदुत्तरं नैव प्रतिभासेत वादिनः । प्राप्ते पराजये नित्यं प्रयोक्तव्याश्छलादयः ॥ १८ ॥ छलायुद्भावने शक्तः प्रतिवादी भवेद् यदि । वादी पराजितस्तेन नो चेत् साम्यं तयोर्भवेत् ॥ १९ ॥ १८६. वादः] उक्तानि साधनदूषणानि । तैः क्रियमाणो वाद उच्यते । । . आदि की गलती भी निग्रहस्थान होती है, मुखपूर्वक वाद करनेवाले अन्य चादी के लिए वह निग्रहस्थान नहीं होती। इसी प्रकार पक्ष के साधन या दूपण के लिए अनुपयोगी एवं प्रतिभा को कम करनेवाले झगडे, गाली देना, साथ बोलना, फालतू हंसना, गाल बजाना,ताली बजाना,सिर हिलाना, छाती पीटना, नाचना, उडना, चिल्लाना आदि को भी निग्रहस्थान समझना चाहिए। छल आदि के प्रयोग के नियम सभा में स्वयं छल आदि का प्रयोग कभी नही करना चाहिए किन्तु प्रतिवादी द्वारा उन का प्रयोग किये जाने पर वादी को प्रयत्नपूर्वक उन का निराकरण करना चाहिए । जव वादीको सही उत्तर सूझता ही न हो तथा पराजय का प्रसंग आया हो तब हमेशा छल आदि का प्रयोग करना चाहिए। यदि प्रतिवादी छल आदि को स्पष्ट बतला सके तो उस के द्वारा वादी पराजित होता है, अन्यथा दोनो में समानता रहती है । चाद अब तक साधन और दृषणों का वर्णन किया। अब उन से किये উঃ -- प्रमाप्रमेयम् [१.८६- विवादपदमुद्दिच्य वचोसिर्युक्तयुक्तिभिः। अङ्गीकृतागमार्थनां वचनं वाट उच्यते ॥२०॥ वादस्य स्वपक्षसाधनं साधनसमर्थनं परपक्षदूपणं दूपणसमर्थन शब्ददोपवर्जनमिति ज्वयवा पञ्च। अपशब्दापप्रयोगानन्वयदुरन्वया- प्रसिद्धापदानीति शब्दवोपाः पञ्च । तत्र वक्ष्यमाणमापा पोटा। प्राकृतसंस्कृतमागधपिशाचभाषाश्च शौरसेनी च। पष्टोऽत्र भूरिभेदो देशविशेषादपभ्रंश. ॥ २६ ॥ , प्रतिवाद्यभिवाञ्या एवंविधयुक्तियुक्तभापाभिः अभिप्रेतार्थवादनं वाद: वादं विधा वदिप्यन्ति व्यास्यागोष्टीविवादतः। गुरुविद्वजिगीषूणां शिप्यशिष्टप्रवादिभिः॥ २२॥ ८ जानेवाले वाट का वर्णन करते हैं। विवाद के विपय को लेकर उचित युक्तियों के वाक्यों द्वारा अपने द्वारा स्वीकृत आगम (शास्त्र) के अर्थ का वर्णन करना यह वाद कहलाता है। बाद के पाच अवयव हैं - अपने पक्ष की सिद्धि करना, उसके साधनों का समर्थन करना, प्रतिपक्ष के दूपण बतलाना, उन दूषणों का समर्थन करना तथा शब्द के दोषों से दूर रहना । शब्द के दोप पाच प्रकार के हैं - अपशब्द, अपप्रयोग (गलत प्रयोग), अनन्वय (असबद्ध प्रयोग), दुरन्वय (जिसका संबन्ध तमझना कठिन हो वह प्रयोग) तथा अप्रसिद्ध शब्दों का प्रयोग । बाट मे बोली जानेवाली भापाएं छह प्रकार की है - प्राकृत, सस्कृत, मागव, पिशाच, शौरसेनी तथा छठवी. भापा अपभ्रश, जिसके भिन्न भिन्न प्रदेशों कारण बहुतस प्रकार हुए है। इस प्रकार की युक्तिसंगत भाषाओं द्वारा प्रतिवादी की इच्छानुसार अपने समत यर्थ को कहना यह बाढ है। बाद के तीन प्रकार हैं - व्याख्यावाद,. जो गुरु शिष्य के साथ करता है, गोष्टीवाद, जो विद्वान शिष्ट लोगों के साथ करता है, तथा विवादबाद, जो विजय की इच्छा करनेवाला वादी प्रतिवादी के साथ करता है - ये वे तीन प्रकार है। 7 -१.८७] व्याख्यावाद [ ८७. व्याख्यावादः] तत्र व्यारयावादे- कुर्यात् सदाहं शिप्यो विचारे शास्त्रगोचरे। चुभुत्सुस्तत्वयाथात्म्यं न क्दाचिद् दुराग्रहम् ॥ २३॥ सदाग्रहः प्रमाणेन प्रसिद्धार्थवाग्रह । दुराग्रहो मनोभ्रान्त्या वाछितार्थदृढाग्रहः ।।१४॥ सत्साधनेन पक्षस्य स्वकीयस्य समर्थनम् । सदृपणैर्विपक्षस्य तिरस्कारो गुरो क्रिया ॥२५ ॥ सत्साधनदूषणे कीदृक्षे इत्युक्ते वक्ति- व्याप्तिमान् पक्षधर्मश्च सम्यक्साधनमुच्यते । तवैकस्यविभावस्तु सरयग्दृप णमुच्यते ॥२६॥ असिद्धादय साधनाभासाः। छलादयो दुपणाभासा । व्याख्यावाद व्याख्यावाद में शास्त्रसबंधी विचार होता है, उस मे शिष्य तत्त्वों का वास्तविक स्वरूप जानने की इच्छा करते हुए सत्य के विषय मे आग्रह करे, दुराग्रह कभी न करे । प्रमाण से सिद्ध होनेवाले विषय मे दुढ आग्रह होना यह सवाग्रह ( सत्य का आग्रह अथवा योग्य आग्रह ) है। मन के भ्रम के कारण प्रमाणविरुद्ध विषय में दृढ आग्रह होना यह दुराग्रह कहलाता है। उचित साधनो से अपने पक्ष का समर्थन करना तथा उचित दूपणों से प्रतिपक्ष का निषेध करना यह (व्याख्यावाद में ) गुरु का कार्य होता है रचित साधन तथा दूषण कैसे होते हैं यह पूछने पर कहते हैं च्याति से युक्त पक्ष के वर्म को उचित साधन (हेतु) कहते है ( जिस का पहले विस्तार से वर्णन कर चुके है ) तथा रचित साधन की कमी वतलाना यही उचित दूषण होता है । असिद्ध इत्यादि सावन (हेतु) के आभास हैं तथा छल आदि दूषण के आभास हैं ( इन दोनो का पहले विस्तार से वर्णन हो चुका है)। अनुग्रह के योग्य शिष्य के साथ. समझानेवाले गुरु अरह के लिए - ७६ प्रमाप्रमेयम् [१.८८- अनुग्राह्यस्य शिष्यस्य वोधकैर्गुरुभिः सह । अनुग्रहाय कृतत्वान्न स्तां जयपराजयौ ॥ २७ ॥ [८८. गोष्ठीवादः] गोष्ठीवादे-असूयकत्वं शठताविचारो दुराग्रहः सूक्तिविमाननं च । पुंसाममी पञ्च भवन्ति दोषा तत्त्वार्थबोधप्रतिवन्धनाय ॥२८॥ सुजनैः किमजानद्भिः किं जानद्भिरसूयकैः । भाव्यं विशिष्टगोष्ठीपु जानद्भिरनसूयकै. ॥२९॥ मूर्खरपक्ववोधैस्तु सहालापश्चतुम्फलः। वाचां व्ययो मनस्ताप. ताडनं दुःप्रवादनम् ॥ ३० ॥ तस्मात् समं जनैर्भाव्यं शास्त्रयाथात्म्यवेदिभिः। प्रामाणिकैः प्रवादेषु कृताभ्यासै कृपालुभिः ॥३१॥ गोष्टयां सत्ताधनैरेव स्वपक्षस्य समर्थनम्। सद्रूषणैर्विपक्षस्य तिरस्कारस्तयोर्मत ॥ ३२ ॥ यह व्याख्यावाद करते हैं इसलिए इस में विजय अथवा पराजय का प्रश्न ही नही होता। गोष्ठीवाद गोष्टीवाद में पुरुषों के लिए तत्व का अर्थ समझने में बाधा डालनेवाले 'पांच दोप इस प्रकार होते है-मत्सर, दुष्टता, अविचार, दुराग्रह तथा अच्छे वचनों की अवहेलना । न जाननेवाले सज्जनों से अथवा जाननेवाले मत्सरी लोगों से क्या लाभ ? विशिष्ट गोष्टी में भाग लेनेवाले लोग जाननेवाले किन्तु मत्सर न करनेवाले होने चाहिए | अबूरी समझवाले मूखोंसे बातचीत के चार फल प्राप्त होते हैं-शब्द खर्च होना, मन को कष्ट होना, मारपीट होना अथवा निंदा होना। अत. गोष्टी के सदस्य शास्त्री का वास्तविक रूप जाननेवाले, समानशील, प्रामाणिक, दयालु तथा वादविवाद का अनुभव रखनेवाले होने चाहिएं। गोष्टी में उचित साधनों से ही अपने पक्ष का समर्थन करना चाहिए तथा उचित दूषणों से ही प्रतिपक्ष का निषेध करना चाहिए । गोष्टीवाद और - च्याल्यावाद में तत्व का ज्ञान दृढ होना यही उद्देश होता है अंत अपप्रयोग -१.८९] विवादवाद ७७ गोष्ठीव्यारयानयोरत्र- व्याख्यावादे च गोष्टयां च तत्त्वज्ञानढार्थयो । अपप्रयोगदु शब्दपौनरुक्त्यं न दूपणम् ॥ ३३ ॥ विशिष्टे. क्रियमाणायां कथायां विदुषां सढौ। तत्त्ववृत्तिदृढार्थत्वात् न स्तां जयपराजयो॥ ३४॥ [८९. विवादवादः] विवादवादे-ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम् । तयोरेच विवादः स्यात् न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ ३५ ।। नैवारोहेत् तुलां जातु गरिष्ठो लघुना सह । लघुरुन्नतिमायाति गरिष्ठोऽधो बजेद् यत ॥३६ ।। इत्येके । असमेनापि दृप्तेन सतां वादो यशस्करः। गुणाः किं न सुवर्णस्य व्यज्यन्ते निकयोपले ॥ ३७॥ परप्रवर्पप्रहितेन चेतसा व्यपेक्षया दर्पभरेण वा नृपाः। वाद रणं वासुरवृत्तयो जना कर्तुं यतन्ते न तु धर्मवृत्तयः ॥३८॥ (अनुमान का गलत प्रयोग), गटत शब्दो का प्रयोग अथवा पुनरुक्ति ये दपण नहीं होते । गोष्ठी-चर्चा विशिष्ट विद्वानों में तत्त्वज्ञान को दृढ करने के लिए की जाती है अत इस में जय अथवा पराजय का प्रश्न ही नही होता है। विवादवाद विवादवाट मे जिनका वन समान हो तथा जिनका अध्ययन समान हो उन्हीं में विवाद होता है, सवल तथा दुर्बल में विवाद नहीं हो सकता। गरिष्ठ (भारी अथवा श्रेष्ट ) व्यक्ति को लघु (हलके अयवा नीच ) व्यक्ति से तुलना नहीं करनी चाहिए क्यों कि ऐसी तुलना हलका व्यक्ति ऊपर जाता है तथा भारी व्यक्ति नीचे जाता है ऐसा कुछ लोग कहते है (जिस तरह तराजू में एक ओर हलकी और दूसरी ओर भारी चीज हो तो हलकी चीज का पलडा ऊपर जाता है और भारी चीज का पलडा नीचे जाता है उसी तरह श्रेष्ट और नीच व्यक्ति में विवाद हो तो श्रेष्ट व्यक्ति की अधोगति और नीच व्यक्ति की उन्नति होती हैं)। जो समान नही है किन्तु अभिमान कर रहा है उस के साथ सत्पुरुष वाढ करें तो वह कीर्ति बढानेवाला होता है; मे । :- प्रमाप्रमेयम् - [१.८९- यगोराय वृत्तेन तत्त्वविप्लवकारिणा। नतोऽपि त्रुवता बानी वादं कुर्यात् त्रिभिः सह ।। ३२ ॥ न रात्रौ नापि चैमान्ले नेवासाभिमाचरेत् । विवादं पूर्वसर यानां परिनो मूर्ख भूपतेः ।। ४० ।। “दुराग्रहो सूर्खता। प्रतिना तु न कर्नव्या वादे युद्धे च धीमता। फलमेव सतामाह सत्यासत्यव्यवस्थितिम ॥ ११ ॥ द्रुतं विलम्वितं क्लिष्टम् अव्यक्तमनुनासिकम् । अप्रसिद्धपदं वादे न द्रूयात् शावित् सदा ।। ४२ ।। म एव विवादः स्याद् यदि युक्त. सदुक्तिभिः । अथ यहिजपेटाभिः तत्र वाचंयमा क्यम् ।। ४३ ।। सोने के गुण क्या कसौटी के पत्थर पर प्रकट नहीं होते ? ( यद्यपि सोना और पत्थर परस्पर समान नहीं है तथापि उन के सवर्ष से सोने के गुण स्पष्ट होते हैं उसी प्रकार विद्वान व्यक्ति अभिमानी अल्पज्ञ के साथ वाद करे तो उस की विद्वत्ता की कीर्ति बढती है)। केवल दूसरों से संवर्ष करने के आग्रह से अथवा गर्व से जो विद्वान या राजा विवाद या युद्ध करते है वे असुरों (राक्षसों) जसी वृत्ति के हैं, वर्म के अनुकूल वृत्ति के नहीं । (प्रतिपक्षी की) कीर्ति नष्ट करने का जिस ने निश्चय किया है तथा जो तत्वोंका विलय करता है (तात्त्विक चर्चा में गडबडी फैलाना ही जिस का उद्देश है, कोई तत्त्व सिद्ध करना जिसे इष्ट नही) उस से भी वादी तीन सहयोगियों के साथ वाद करे । रात्रि में, एकान्त में, तथा बिना किसी साभी के विवाद न करे (क्यों कि ऐसे बाद में विजय का लाभ नहीं मिलता), जहा सभासद मूर्व हों अथवा - राजा मूर्ख हो वहा बाद न करे, यहां मूर्खता का तात्पर्य दुराग्रह से हैं (यदि सभासद या राजा दुराग्रही हो तो वे पक्षपात करेंगे अत. ऐसी सभा में वाट न करे)। वाद मे तथा युद्ध में वुद्धिमान व्यक्ति प्रतिज्ञा न करे (शर्त न लगाये) सत्पुरुषों के लिए ( वाढ या युद्ध का ) फल ही सत्य और असत्य का निर्णय वतलाता है। शास्त्र को जाननेवाला गदी वाढ मे बहुत जलदी, बहुत धीरे, चहुत कठिन, अस्पष्ट, नाक में अथवा अप्रसिद्ध शब्द न बोले । यदि उचित वाक्यों से युक्त बाद हो तो हम बोलेंगे ही, किन्तु लाठी या यन्यडों से वाद होना हो तो वहां हम चुप ही रहते हैं ( ऐसी योग्य वादी की वृत्ति होनी चाहिए)।

-१.९१] वाद के चार अंग ७९ [९०. चत्वारि वादाङ्गानि।] मात्सर्येण विवाद स्यात् चतुरङ्गश्चतुर्विध । प्रतिज्ञातार्थसिड्यन्ततत्वात् लोकविवादवत् ॥ ४४ ॥ अगालि चत्वारि भवन्ति वादे सैन्ये यथा भूमिपतीश्वराणाम्। सभापति सभ्यजन प्रवादी वादी च सर्व स्वगुणैरुपेता.॥ ४५ ॥ [९१. सभापतिः] तत्र सभापतेः लक्षणम् । समञ्जस कृपालुश्च सर्वसिद्धान्ततत्त्ववित् । अबाधितार्थसंत्राही बाधितार्थविहायक ॥ ४६॥ आज्ञावान् धार्मिको दाता विद्वद्गोष्ठीप्रिय. सुधीः । नियन्तान्यायवृत्तीनां राजा स स्यात् सभापति ॥४७॥ आदिशन् वादयेद् वादे वादिनं प्रतिवादिना । न स्वयं विवदेत् ताभ्यां धर्मतत्त्वविचारक. ॥४८ ॥ वाद के चार अंग (वादी और प्रतिवादी के) मत्सर से जो विवाद होता है वह चार प्रकार का तथा चार अगो से सपन्न होता है। लोगो के विवाद के समान यह विवाद भी प्रतिज्ञा किये हुए अर्थ की सिद्धि होने तक चलता है। राजाओं के सैन्य मे जिस तरह चार अंग (हाथी, घोडे, रय और पदाति) होते हैं उसी तरह बाद में चार अग होते है । अपने गुणों से युक्त वे सब अंग इस प्रकार हैं- सभापति, सम्जन, प्रतिवादी तथा बादी । सभापति उन (चार अगों) मे सभापति का लक्षण इस प्रकार है । वह राजा सभापति होना चाहिए जो समझदार, दयालु, सब सिद्धान्तो के तत्त्वों को जाननेवाला, अवाचित अर्थ का संग्रह कर के बाचित अर्थ को छोडनेवाला, आज्ञा देने में समर्थ, वार्मिक, दानशील, विद्वानो की चर्चा जिसे प्रिय है ऐसा, बुद्धिमान् , व अन्याय के बरताव को नियत्रित करनेवाला हो । सभापति चादी को आदेश देते हुए प्रतिवादी से वाद कराये । धर्म के तत्वा का विचार प्रमाप्रमेयम् सभापतिर्वदेद वादे साधनं दृपणं यदि। को विवादात् घटेत् तेन कुतस्त्यस्तत्त्वनिश्चयः ॥ ४२ ॥ जानन्नुभयसिद्धान्तौ गुणदोषो तयोर्मती। राजा सभ्यर्विचार्यैव देयाज्जयपराजयो ।॥ ५० ॥ [९२. सम्याः] सभ्यानां लक्षणमुच्यते। अपक्षपातिन प्राज्ञा स्वयमुद्ग्रहणे क्षमा । सर्वसिद्धान्तसारना. सभ्या दुर्वाक्यवारकाः ॥ ५१ ॥ उक्तंच। अपक्षपातिन. प्रामा सिद्धान्तद्वयदिन। असदवादनिपेद्धार प्रालिका प्रनहा इव ॥५२ ।। (प्रमेयमलमार्तण्ड पृ. १९५), करते हुए वह स्वयं उन से विवाद न करे । यदि सभापनि ही बाद में साधन या दूषण बताये तो उस से विगढ कैसे होगा तथा तत्व का निश्चय कहां ने होगा (तात्पर्य - सभापति का कार्य निर्णय देना है, स्वयं वाट करना नही) 1 दोनों पक्षों के सिद्धान्तों को, उन के गुणदोषो को तथा विचारों को जानते हुए राजा सभासदो से विचार करके ही जय अथवा पराजय का. निर्णय दे। सभासद अब सभासदों का लक्षण बतलाते हैं। जो पक्षपाती नहीं हैं, बुद्धिमान है, स्वयं तत्त्व को समझ सकते हैं, सभी सिद्धान्तों के तात्पर्य को जानते हैं तथा गलत वचनों को रोक सकते हैं वे सभासद होते हैं। कहा भी है - पक्षपात न करनेवाले, बुद्धिमान, दोनों सिद्धान्तो को जाननेवाले तथा गलत वचनों को रोकनेवाले प्राधिक (सभासद) प्रग्रह के (लगार के) समाना होते हैं (दोनों पक्षों को नियन्त्रित कर उचित मार्ग पर वनाये रखते हैं)। समासद सात, पाच या तीन होने चाहिए, व दानों मतों के विशेषों को जाननेगले हों, समझदार हों तथा जो चीजें छोडने योग्य हैं उन से (अप- शब्द आदि से ) दृर रहनेवाले हाँ! कहा भी है - जिन्हों ने कई बाट देखे --१.९२] सभासद ८१ +4 प्रानि सप्तमिर्भाव्यमथवा पञ्चभित्रिभिः। मतद्वयविगेप.. वयंभीरुसमजलैः ॥ ५३ ।। तथा चोक्तम्। दृष्टवादै. श्रुतज्येष्ठ. त्रिभि पञ्चभिरेव वा। माध्यस्थ्यादिगुणोपेतै भवितव्यं परीक्षकैः ॥ ५४॥ अलाभे एकेनापि पर्याप्तम्। नार्थसंवन्धिनो नाप्ता न सहाया न वैरिण.। न दृष्टदोषा मध्यस्था न व्याध्याः न दूपिता ॥५५॥ वादिनी स्पर्धयेद् वृत्तो सभ्यै सारेतरेक्षिभिः। राना च विनियन्तव्यौ तत्सांनिध्यं वृथान्यथा ॥ ५६ ॥ आज्ञागाम्भीर्यदातृत्वविवेकनिधिभर्तृकाम् । सभामानिविशेग्नेयादनिशं बहुनायिकाम् ।। ५७ ॥ अज्ञाततत्त्वचेतोभिः दुराग्रहमलीमसैः । युद्धमेव भवेत् गोष्टयां दण्डादण्डि कचाकचि ॥५८ ॥ 1 हैं, जिन का अध्ययन बढा चढा है, तथा जो तटस्थता आदि गुणों से युक्त हैं ऐसे तीन या पाच परीक्षक (सभासद) होने चाहिएं । यदि (ऐसे अधिक परीक्षक) न मिले तो एक भी काफी होता है । सभासद (वादी अथवा प्रति- चादी से) धन के मामलो में संबंधित (कर्जदार या साहूकार) न हों, वे उन के रिश्तेदार न हों, मित्र न हों तथा शत्रु भी न हों, वे दोष देखनेवाले, -रोग से दुखी या अन्य दोष से दूषित न हों, तटस्थ हों। (अनुमान का) -सार तथा निस्सार होना जाननेवाले सभासदों से घिरा हुआ राजा वादी तथा 'प्रतिवादी में वाद कराये, राजा उन्हें नियन्त्रित भी करे (स्वैर वर्ताव न करने दे) अन्यथा उस का समीप होना व्यर्थ होगा। ऐसी सभा में जाना चाहिए 'जिस का स्वामी (राजा) आज्ञा देनेवाला, गम्भीर, उदार, व विवेकशील हो। ऐसी सभा में कभी न जाये जिस में बहुतसे नेता हों (यदि बहुतसे नेता होते हैं तो उन में आपस में न पटने पर वाद में विघ्न आते हैं)। जिन के मन में तत्त्वों का ज्ञान नही है, जो दुराग्रह से मलिन हैं ऐसे लोगों के साथ चर्चा करने में डण्डे मार कर तथा केश घसीट कर लडाई ही होती - प्रमाप्रमेयम् [१.९३- उक्तं च। राजा विग्लावको यत्र लभ्याश्चासमवृत्तय । तत्र वादं न कुर्वीत सर्वोऽपि यदि स्वयम् ॥ ५९॥. [९३. पक्षपातनिन्दा अयथार्थ वतां सभ्यसभापतीनां निन्दा निगद्यते । युक्तायुक्तमतिक्रम्य पक्षपाताद्ववेद यदि । ब्रह्मनादधिकं दुखं नरकेपु समनुने ।। ६० ।। ब्रह्मध्नानां च ये लोका ये च त्रीवालवातिनाम् । मित्रगृहां कृतन्नानां ते ते स्युबतोऽन्यथा ॥ ६ ॥ पक्षपाताद् वटेद योऽपि गुणदोपातिलचनात् । सोऽपि ब्रह्मविघातेन यदु खं तद्भजत्यसौं ।। ६२ ।। अपि च । अपृच्या यत्र पूज्यन्ते पृज्यानामवमानना । तत्र देवकृतो दण्ड सद्यः पतति दारुणं ॥३॥ है (वास्तविक विचारविमर्श नही हो सकता)। कहा भी है - जहां राजा गडबडी पैदा करता हो तथा सभासद समान भाव न रखते हो (पक्षपाती हों) वहा वादी स्वय सर्वज्ञ भी हो तो वाद न करे (क्यो कि ऐसे बाद में पक्षपात से निर्णन होता है, वादी के ज्ञान का कोई उपयोग नहीं होता)। पक्षपात की निन्दा असत्य बोलनेवाले सभासद तथा सभापति की निन्दा इस प्रकार की जाती है । यदि (सभापति या सभासद) योग्य और अयोग्य को छोड कर पक्षपात से बोलता है तो वह ब्राह्मण की हत्या करनेवाले से भी अधिक दुःख प्राप्त करता है । असत्य बोलनेवाले को वही गति प्रात होती है जो ब्राह्मण की हत्या करनेवालो को. स्त्री तथा बच्चो की हत्या करनेवालो को तथ मित्रो की हत्या करनेवाले कृतन लोगों को प्रात होती है। गुण और दोष को छोड कर जो नी पक्षपात से बोलता है वह कोई भी हो, उसे वही दुख प्राप्त होता है जो ब्राह्मण की हत्या करनेवाले को मिलता है । और भी कहा है-जहा पूज्य लोगों का अपमान होता है और अपूख्य लोगों का आदर होता है वहा तत्काल देवकृत दण्ड का आवात होता है । जहा जहा विट्टानो +- नरक म -१.९४] वादी और प्रतिवादी विद्योगैरविद्वांसो यत्र यत्र प्रपूजिताः । तत्र सद्य सतां मृत्यु अर्थहानिः प्रजायते ॥ ६४ ॥ व्याधि पीडा मनोग्लानिरनावृष्टिर्भयं तत । पक्षपातं विना तत्त्वनानिनं मानयेद् भृशम् ॥ ३५॥ राज्ये सप्ताइसंपत्तिरायु सौख्याभिवर्धनम् । सुवृष्टि सुफलं क्षेममारोग्यं तत्मपूजनात् ॥ ६६ ॥ यो दद्यादाश्रयानादि तत्वयाथात्म्यवेदिने । . स भुक्त्वा याति निर्वाणमन्येभ्यो भवसंतति ॥ ६७ ॥ कुत एतत् । अनानोपास्तिरनानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः। दाति यहि यस्यास्ति सुप्रसिद्धमिदं वच ॥ ६८ ॥ इत्युक्तत्वात् ॥ (इटोपदेश श्लो. २३) [ ९४. वादिप्रतिवादिनौं] वादिलक्षणमुच्यते । विदितस्वपरैतिह्य कविताप्रतिपत्तिमान क्षमी वाग्मी। अनुयुक्त प्रतिवक्ता कृतपक्षपरिग्रहो वादी ॥ ६९ ॥ । . --- के साथ अविद्वानों का भी आदर हो वहा तत्काल सज्जनो की मृत्यु तथा धन की हानि होती है, तथा रोग, दुख, मन की उदासी, अनावृष्टि और भय होता है । इस लिए पक्षपात न करते हुए तत्त्वज्ञानी का बहुत सम्मान करना चाहिए । तत्त्वज्ञानी के आदर से राज्य मे सातो अगों की प्राप्ति होती है, आयु और सुख बढता है, अच्छी वर्षा होती है तथा फल अच्छा मिलता है, सर्वत्र कुशल तथा आरोग्य रहता है । तत्त्वो के वास्तविक ज्ञाना को जो आश्रय, अन्न आदि देता हूँ वह उपभोग प्राप्त कर अन्त में निर्वाण प्राप्त करता है, दूसरे लोग ससार की परंपरा मे ही भ्रमण करते रहते हैं। ऐसा क्यो कहने हैं ? कहा भी है- अज्ञान की उपासना से अनान प्राप्त होता है तथा ज्ञानी के आश्रय से ज्ञान मिलता है, यह वचन सुप्रसिद्व कि जिस के पास जो हो वही वह दे सकता है। वादी और प्रतिवादी अब वाढी का लक्षण कहते है - अपने तथा दूसरे (प्रतिपक्षी) के ८४ प्रमाप्रमेयम् [१.९५- प्रतिवादिलक्षणमुच्यते । क्षमी स्वपरपक्षनः कविताप्रत्तिपत्तिमान् । अनूद्य दूधको वादे प्रतिवादी प्रशस्तवाक् ॥ ७० ॥ इति चतुरङ्गानि ॥ [ ९५. चतुर्विधे वादे तात्विकवाद: इदानीं चातुर्विध्यसुच्यते । तात्त्विका प्रातिभश्चैव नियतार्थः परार्थन। यथाशास्त्रं प्रवृत्तोऽयं विवादः स्याच्चतुर्विधः।। ७१ ।। तत्र तात्विक उच्यते। यत्रता न प्रयुज्यन्ते निप्फलाश्छलजातयः। उक्ता अपि न दोपाय स वादस्ताविको भवेत् ।। ७२ ।। यावन्तो दूषणाभासास्ते शास्त्रे छलजातयः । ते चात्मपरतत्त्वस्य सिद्धयसिद्धयोरहेतवः।। ७३ ।। वृत्तान्त को जाननेवाला, कविता को समझनेवाला, सहनशील, बोलने में निपुण, प्रश्न किये जाने पर उत्तर देनेवाला तथा किसी पक्ष का जिसने. स्वीकार किया है वह वादी होता है । अब प्रतिवादी का लक्षण कहते हैं। सहनशील, अपने तथा दूसरे (प्रतिपक्षी) के पक्ष को जाननेवाला, कविता को समझनेवाला, प्रशंसनीय वचनों का प्रयोग करनेवाला तथा वाद में (वादी के कथन को) दुहरा कर उस में दोष बतलानेवाला प्रतिवादी होता है। इस प्रकार (वाद के) चार अंगों का वर्णन पूरा हुआ। तात्त्विक वाद अव (वाद के) चार प्रकारों का वर्णन करते हैं। शास्त्र के अनुसार होनेवाला यह विवाद चार प्रकार का होता है - तात्त्विक, प्रातिभ, नियतार्थ तथा परार्थन । उन में तात्त्विक वाद का वर्णन इस प्रकार है । जिस में छल, जाति इत्यादि निष्फल बातों का प्रयोग नहीं किया जाता तथा करने पर भी जहां वे (प्रतिपक्षी के लिए) टोप के कारण नहीं होते उस वाद को तात्त्विक बाद कहते हैं । शास्त्र में जितने झूठे दूषण हैं वे छल, जाति आदि अपने तत्त्व को सिद्ध करने को लिए या प्रतिपक्षी के तत्त्व को असिद्ध बतलाने के -१.९६] प्रातिभावाद ८५ . तात्त्विकवादे जयपराजयव्यवस्था कथ्यते । वादिना साधने प्रोक्त दोपमुद्भाव्य साधनम्। स्वपक्षे प्रतिवादी चेत् ब्रूते वादी निगृह्यते ।। ७४ ॥ तद्हेतो दोषमुद्भाव्य स्वपक्षे साधनं पुनः । वक्तुं नेशः प्रवादी स्यात् यदा साम्यं तयोर्भवेत् ॥७५ ॥ वायुक्ते साधने दोषो नेक्ष्यतेऽसत् प्रयुज्यते । परेण वादिनोद्धारे प्रतिवादी निगृह्यते ॥ ७६ ॥ तदुद्धरणसामर्थ्याभावे साम्यं तयोर्भवेत् ॥ [९६. प्रातिभवादः] प्रातिभ उच्यते। स्यात् पद्यगद्यभाषाणां मिश्रामिश्रादिभेदतः। नियतेश्चाक्षरादीनां प्रातिभोऽनेकवर्त्मनः ॥ १७ ॥ । लिए कारण नहीं हो सकते १.अब तात्त्विक वाढ में जय और पराजय की व्यवस्था. बतलाते है । वादी द्वारा (अपने पक्ष की सिद्धि के लिए) हेतु वताये जाने पर प्रतिवादी उस में दोप बता कर अपने पक्ष में हेतु . बतलाये तो वादी पराजित होता है। यदि वादी द्वारा बताये गये हेतु में दोष बताने के बाद प्रतिवाढी अपने पक्ष में हेतु न बता सके तो दोनों में समानता होती है । वादी द्वारा बताये गये हेतु में दोप न दिखाई दे और प्रतिवादी झूठा दूपण बताये तथा वादी उस झूठे दूषण का उत्तर दे दे तो प्रतिवादी पराजित होता है। यदि वादी उस झूठे दूषण का उत्तर न दे सके तो उन दोनों में समानता होती है। - प्रातिम वाद अव प्रातिभ वाद का वर्णन करते हैं । पद्य, गद्य, भाषा, मिश्र,अमिश्र, अक्षर आदि के नियमों से अनेक प्रकार का प्रातिभ वाद होता है । वचनों की विशिष्ट रचना यह इस को स्वरूप है और यह वक्ता के अभ्यास से संभव होता है । अत तत्त्व का निर्णय करनेवालो के लिए उस की कुछभी उपयोगिता नही है । (वस्तुत' इसे वाद न कह कर काव्यप्रतिभा की स्पर्धा कहना चाहिए, एक या दो ही अक्षरों का प्रयोग कर श्लोक लिखना, रूक्ष - प्रमाप्रमेयम् [१.१७- वचोगुम्फविशेषोऽयं वक्तुरभ्याससंभवी। तत्त्वनिर्णयकर्तृणां न तस्यैवोपयोगिता ।। ७८ ॥ [९७. नियतार्थवादः] नियतार्थ उच्यते । हेतुदृष्टान्तदोषेषु प्रतिज्ञातैकदोषतः । नियतार्थः प्रतिनातकमायां भगवाहनम् ।। ७९ ।। प्रातिमे नियतार्थे वा जयः स्यान्नियमोक्तितः । नियमस्य विघातेन भङ्गो वादिप्रवादिनोः ॥ ८० ॥ [९८. परार्थनवादः परार्थन उच्यते । प्रतिवाद्यानुलोम्येन भूपसभ्यार्थनेन वा । परार्थनो भवेद् वाद. परस्येच्छानुवर्तनात् ॥ ८१ ।। विषय का पद्य में वर्णन करना, ललित विषय को गद्य मे वर्णन करना, दो भाषाओं के मिश्रण से रचना करना आदि प्रकारो की स्पर्धाएं राजसभाओं में प्रायः होती थीं)! - नियतार्थ वाद shar अब नियतार्थ वाद का वर्णन करते हैं । हेतु अथवा दृष्टान्त के दोषों 'में किसी एक दोप (को वतलाने ) की प्रतिज्ञा करने पर उस प्रतिज्ञा की परिधि में (प्रतिपक्षी की बात को) निरस्त करना यह नियतार्य वाद (प्रतिपक्षी का हेतु असिद्ध बतला कर मैं उसे पराजित करूगा अथवा विरुद्ध बतला कर पराजित करूगा इस प्रकार नियम कर के उसी के अनुसार प्रति- पक्षी को उत्तर देना यह नियतार्थ वाद का स्वरूप है)। प्रातिभ वाद में तथा नियतार्थ वाद में नियम के अनुसार बोलने पर वादी-प्रतिवादी का विजय होता है तथा नियम तोडने पर पराजय होता है । परार्थन वाद । अब परार्थन वाद का वर्णन करते हैं । प्रतिवादी के अनुरोध को स्वीकार करने से अथवा राजा या किसी सभासद के निवेदन पर जो वाद पत्र का लक्षण परार्थ तात्त्विकस्येव स्यातां जयपराजयौ। कथाया अवसानोऽपि जयाजयसमाप्तितः ।। ८२॥ [९९. पत्रलक्षणम् ] इदानी पत्रावलम्बनविषयः । पत्रलक्षणमुच्यते । मात्सर्येण विवादस्य वृत्तौ वादिप्रवादिनोः । पत्रावलम्बनं तत्र भवेन्नान्यत्र कुत्रचित् ।। ८३ ॥ तत्तन्मतप्रसिद्धाझं गूढार्थ गृढसत्त्वकम् । स्वेटप्रसाधकं वाक्यं निर्दोपं पत्रमुत्तमम् ॥ ८ ॥ प्रसिद्धावयवं गृढपदप्रायं सुशब्दकम् । स्वेष्टप्रसाधकं वाक्यं निव्यग्रं पत्रमुच्यते ॥ ८५ ॥ उक्तं च । प्रसिद्धावयवं वाक्यं स्वेष्टस्यार्थस्य साधकम्। साधुगूढपदप्रायं पत्रमाहुरनाकुलम् ॥ ८६ ॥ (पत्रपरीक्षा पृ. १) होता है उसे परार्थन कहते हैं क्यो कि वह दूसरे की इच्छा के मानने से होता है । परार्थन बाद में जय-पराजय के नियम तात्विक वाढ के समान होते हैं तथा जय अथवा पराजय में समाप्त होने पर कथा (उस चर्चाः) का अन्त होता है। - पत्र का लक्षण अव पत्र के सम्बन्ध में विचार करेगे। पत्र का लक्षण इस प्रकार है- चादी तथा प्रतिवादी में मत्सर से युक्त (प्रतिपक्षी पर विजय प्रात करने की ईया से सहित ) विवाद हो वहां पत्र का आश्रय लिया जाता है, अन्यत्र कहीं भी नहीं । वह वाक्य निर्दोप तथा उत्तम पत्र होता है जो उस उस मत म (पत्र का प्रयोग करनेवाले वादी के मत मे) प्रसिद्ध अंगों से युक्त हो, जिस का अर्थ तथा तात्पर्य गूढ हो तथा जो अपने इष्ट तत्व को सिद्ध करता हो । जिस में प्रसिद्ध (अपने मत की रीति के अनुसार) अवयव हों, जिस के शब्द अच्छे किन्तु प्राय गूढ हों तथा जो अपने इष्ट तत्त्व को सिद्ध करता हो उस चौक्य को निर्दीप पत्र कहते है । कहा भी है-प्रसिद्ध अवयवों से युक्त, अपने इष्ट अर्थ को सिद्ध करनेवाला तथा अच्छे किन्तु प्रायः गूढ शब्दों से बना हुआ चाक्य निदोंप पत्र होता है।

८८ प्रमाप्रमेयम् [१००, पत्रस्य अङ्गानि] पञ्चावयवान् योगश्चतुरो मीमांस मञ्च सारयञ्चीन् । जैनो द्वौ ल च बौद्धस्त्वेकं हेतुं निरूपयति ॥ ८७ ।। अपि च जैनमते चित्राद्यदन्तराणीयमारेकान्तात्मकत्वत । यदित्थं न तदित्थं न यथा किंचिदिति त्रयः॥ ८८ ।। ( पत्रपरीक्षा पृ. १०) NON *- पत्र के अंग पत्र (में वर्णित अनुमान वाक्य के पांच अवयत्र होने चाहिएं ऐसा नैयायिक कहते हैं, मीमांसक चार, सांख्य तीन, जैन दो तथा बौद्ध केवल हेतु इस एक ही अवयव को आवश्यक समझते हैं । कहीं कहीं जैन मत में भी (यहाँ की एक पंक्ति का अर्थ नीचे देविर ) जो ऐसा नहीं है वह ऐसा नहीं होता जैसे अमुक ये तीन अवयव होते है । उदाहरणार्थ-जो धूमयुक्त नहीं है वह अग्नियुक्त नही होता जैसे सरोवर | और यह वैसा है ऐसा कहने पर चार अव- यत्र होते हैं (उदा०-और यह पर्वत वूमयुक्त है ) । इसलिए वह ऐसा है ऐसा कहने पर पाच अवयव होते हैं ( उदा० -इसीलए यह पर्वत अग्नियुक्त है ) ऐसा वर्णन भी पाया जाता है । (चित्रात् आदि पंक्ति का स्पष्टीकरण-यहा के तीन शब्दों का स्पष्टी- करण विद्यानन्दि स्वामी के कथनानुसार इस प्रकार है-चित्र अर्थात् एक अनेक, भेद, अभेद, नित्य, अनित्य आदि विविधताओं को अतति अर्थात् व्याप्त करता है वह चित्रात् अर्थात् अनेकान्तात्मक है; यदन्त का अर्थ विश्व है क्यों कि सर्वनामों की गणना में विश्व शब्द के बाद यद् शब्द आता है, यद् जिसके बाद में आता है वह यदन्त अर्थात् विश्व शब्द है; राणीर अर्थात् कहने योग्य क्यों कि रा धातु का अर्थ शब्द करना यह होता है; यदन्तराणीय अर्थात् यदन्त इस शब्द द्वारा कहने योग्य अर्थात् विश्व, यदन्तराणीयम् चित्रात् अर्थात् विश्व अनेका-- न्तात्मक है, आरेका अर्थात् संशय, आरेकान्त अर्थात् प्रमेय क्यों कि न्याय- दर्शन के प्रथम सूत्र में वर्णित सोलह पदार्थों में प्रमेय के बाद सशय शब्द -१.१०१] पत्र का स्वरूप ८९ तथा चेदमिति प्रोक्ते चत्वारोऽवयवा मता । तस्मान तथेति निर्देश पञ्च पत्रस्य कस्यचित् ।। ८९ ॥ (उपर्युक्त) इति निर्देशोऽप्यस्ति ॥ [१०१. पत्रस्वरू पम्] त्रायन्ते वा पढान्यस्मिन् परेभ्यो विजिगीपुणा। कुतश्चिदिति पत्रं स्याल्लोके शास्त्रे च रूढितः॥९०॥ (पत्रपरीक्षा पृ.२) मुख्यं पदान्वयं वाक्यं लिप्यामारोप्यते लिपे । पत्रस्थत्वाच तत् पत्रम् उपचारोपचारतः॥९१ ॥ तत्पत्रेण कीदृषेण भवितव्यमित्युक्ते वक्ति । सौवर्ण राजतं तानं भूर्जपत्रमथापरम्।. स्वेष्टप्रसाधकं पत्रं राजद्वारे शुभावहम् ॥ २२ ॥ का उल्लेख है; आरेकान्तात्मकत्व अर्थात प्रमेयात्मकत्व अर्थात् प्रमेयत्व, आरेकान्तात्मकत्वतः अर्थात् प्रमेयत्व के कारण, इस प्रकार पूरे वाक्य का तात्पर्य हुआ यदन्तराणीयम् (विश्व ) चित्रात् (अनेकान्तात्मक है ) आरे-- कान्तात्मकत्वत (क्यों कि वह विश्व प्रमेय है, सब प्रमेय अनेकान्तात्मक होते है अतः विश्व अनेकान्तात्मक है)। . पत्र का स्वरूप विजय की इच्छा रखनेवाला (वादी).प्रतिवादी से अपने पदों (शब्दों), की इस में किसी तरह रक्षा करता है ( गूढ शब्दों का प्रयोग कर के प्रति- वादी से अपने वाक्य की रक्षा करता है ) इस लिए इसे (इस गूढ वाक्य को) लोगों के व्यवहार में तथा शास्त्र चर्चा में रूढि के कारण पत्र कहते हैं (प = पद तथा त्र = रक्षक अत' पत्र = पदों का रक्षक ऐसा यहां शब्द- च्छेद किया है ) । मुख्यत वाक्य शब्दों से बनता है, लिपि में वाक्य होने का आरोप किया जाता है (वाक्य के शब्द लिपि में अकित किये जाने पर व्यवहार से उन लिपि-चिन्हों को भी वाक्य कहा जाता है ) तथा ये लिपि- चिन्ह पत्र पर अंकित होते है अतः उपचार के भी उपचार से उस पत्र को भी वाक्य कहते है (और इस तरह वादी द्वारा प्रयुक्त गूढ वाक्य को पत्र यह संज्ञा मिलती है)। वह पत्र कैसा होना चाहिये यह पूछने पर उत्तर:

१९० प्रमाप्रमेयम् [१.१०२- , श्रीतालं खरतालं वा पत्रं स्वेष्टार्थसाधकम् । वितस्तिहस्तमात्रं वा राजद्वारे शुभावहम् ॥ ९३ ॥ [१०२. पत्रविचारे जयपराजयौ। जातपत्रार्थको विद्वान् पत्रस्थमनुमानकम् । अनूद्य दूपणं ब्रूयान्नान्यदर्थान्तरोक्तितः ॥ ९४ ॥ अङ्गीकृतं वस्तु विहाय विद्वान् भीते. प्रसंगान्तरमर्थमाह । तदास्य कृत्वा वचनोपरोध स्वपक्षसिद्धावितरो यतेत ॥९५ ॥ पत्रार्थ न विजानाति यदि संपृच्छतां परः। सोऽपि सम्यग् वदेत् स्वार्थ ततो दूपणभूषणे ॥ २६ ॥ असंकेताप्रसिद्धादिपदैः पत्रार्थवोधनम् । प्रवादिनो न जायेत तावता न पराजयः ॥ ९७ ॥ . देते हैं। अपने इष्ट तत्व को सिद्ध करनेवाला शुभसूचक पत्र सोने का, चादी का, तात्रे का अथवा भूर्जवृक्ष का हो सकता है, उसे राजसभा के द्वार पर (प्रस्तुत किया जाता है)। राजसभा के द्वार पर शुभसूचक पत्र अपने इष्ट अर्थ को सिद्ध करनेवाला होना चाहिये, वह श्रीताट अथवा खरताल वृक्ष का भी हो सकता है, वह एक वालिश्त या एक हाथ लम्बा होना चाहिये। पत्र के विषय में जय और पराजय की व्यवस्था पत्र के अर्थ को जान कर (प्रतिपक्षी) विद्वान पत्र में वर्णित अनुमान को दुहराए तथा उस में दोप बताये, अन्य चर्चा न करे क्यों कि वह (दूसरे विषय की चर्चा करना) विषयान्तर होगा । (पत्र. में ) ली हुई बात को छोड कर (प्रतिपक्षी ) विद्वान (पराजय के) डर से विषयान्तर करके कोई चाक्य कहे तो उस के बोलने को रोक कर दूसरा (पत्र का प्रयोग करनेकला वादी) अपने पक्ष को सिद्ध करने का प्रयत्न करे :- पूछने पर भी यदि प्रति- 'पक्षी पत्र के अर्थ को न समझे तो वाटी अपने अर्थ को योग्य रीति से चतलाये, उस के बाद दोष और गुगों की चर्चा को जाय । सकेतरहित (वे शब्द जिन का विशिष्ट अर्थ में प्रयाग रूढ नही हैं) अथवा अप्रसिद्ध वे शब्द जिन का प्रयोग प्राप. नही होता) शन्दों के कारण प्रतिरक्षी पत्र के अर्थ को न समझ सके तो उसने से ही उस का पराजय नही होता।

~१.१०४ वाद और जल्प - am [[१०३ वादजल्पौ] साधनं दूषणं चापि सम्यगेव प्रयुज्यते । पक्षपक्षयोर्यस्मिन् स वादः परिकीर्तितः॥९८ ।। यस्मिन् विचारे पक्षविपक्षयोर्यथाक्रमम् सम्यक्साधनदूषणे एवं प्रयुज्यते स विचारो वाद इति परिकीय॑ते । उक्तो वादः । इदानीं जल्प उच्यते । सम्यगेव तदज्ञाने तदाभासोऽपि युज्यते । पक्षवैपक्षयोर्यत्र स जल्पः परिभाष्यते ॥९९ ॥ यत्र विचारे पक्षविपक्षयोर्यथाक्रम सम्यगेव साधनदूषणे प्रयुज्येते, तयोर- 'परिक्षाने साधनदूषणाभासावपि प्रयुज्यते स विचारो अल्प इति 'परिभाष्यते ॥ [१०४. कथाचतुष्कम् ] उको जल्पः । इदानीं तयोः वितण्डे उच्यते । विपक्षस्थापनाहीनो वादजल्पौ प्रकीर्तितौ । वितण्डे इति शास्त्रेपु न्यायमार्गेपु सद्बुधैः ॥ १०० ।। बाद और जल्प जिस में पक्ष में और विपक्ष में योग्य सावनों और योग्य दुपणों काही प्रयोग किया जाता है उसे वाद कहते हैं। अर्थात जिस विचारविमर्श में अपने पक्ष में योग्य साधनों का ही प्रयोग किया जाता है तथा प्रतिक्ष में योग्य दूपण ही दिये जाते हैं उसे वाद कहा जाता है । इस प्रकार वाद का वर्णन हुआ। जल्प का वर्णन करते हैं । जिस मे पक्ष और विपक्ष में योग्य साधनों और योग्य दूषणों का ही प्रयोग किया जाता है किन्तु उन योग्य साधन-दूषणों का ज्ञान न होने पर साधनाभास तथा दूपणाभास का भी प्रयोग होता है उसे जल्प कहते हैं, । अर्थात जिस विचारविमर्श में अपने पक्ष में योग्य साधनों का ही प्रयोग किया जाता है किन्तु योग्य साबन न सूझने पर साधनाभास का भी प्रयोग किया जाता है तथा प्रतिपक्ष में योग्य दूषण ही दिये जाते हैं किन्तु योग्य दूपण न सूझने पर दूप गाभास भी -प्रयुक्त किये जाते हैं उसे जल्प कहा जाता है। ‘कथा के चार प्रकार ऊपर जल्प का वर्णन किया । अब उन दोनों (वाद और जल्प) की .

५२ प्रमाप्रमया [2-1-1- यादः प्रतिपक्षस्थापनाहीतो यदि नद यादविता पोऽपि विपक्ष- स्थापनाहीनोत् जरएविनण्टा स्यादिनि न्यायमा पु सदबुधः उम्रौन- करादिभि. चतन्त्र. क्याः परिमर्दिताःतिन वीतरागक्थे वादवितण्द निर्णयान्ततः। विजिगीषु ये जत्पवितण्डे तदभावत. ॥ १०१ ।। चादवादवितण्टे चीनरागमथे भवत्त । गुमध्यः विशिष्टविद्भिवी श्रेयोऽधिमिः तावुभुत्लुभिः अमसरन्यतरपनिर्णयपर्यन्तं क्रियमाण- त्यात । जल्पजरपवितण्टे विचिगीएक्थे स्याताम् । चादिप्रतिवादिसमा- पतिप्राश्निपाङ्गत्यात् । लाभपूजाल्यातियामः समन्सः तत्त्वमानसंर- वितण्डाओं का वर्णन करते है । जिस बाद और जाप में प्रतिपक्ष कीन्यापना नहीं की जाती उन्हें अच्छे विद्वान न्याय-मार्ग के गानों में वितण्डा कहते हैं । अर्यात-बाद में यदि प्रतिपक्ष की स्थापना न हो तो यह वादवितण्डा होती है तथा जरप में प्रतिपक्ष की स्थापना न हो तो वह जल्पवितण्डा होती है ऐसा न्याय के मार्ग में अच्छे विद्वानों ने - उद्योतकर आदि ने कहा है, इस प्रकार कथा के चार प्रकार होते है ( बाद, वादवितण्डा, जल्स तथा जल्पवितण्डा)। इन में बाट तथा वाद वितण्डा (तत्त्व के ) निर्णय होने तक की जाती हैं अत. ये वीतराग कथाएं हैं तथा जल्य और जल्लवितण्डामें उस का अभाव है ( तत्त्व का निर्णय मुख्य न हो कर वादी का जय अथवा पराजय मुख्य है, बादी का जय होते ही कह नमात होती है) अत. ये कथाए विजिगीषु कथाए हैं । वाद तथा वादवितण्डा ये वीतराग कयाएं है क्यों कि ये गुरुशिष्यों में अथवा उन विशिष्ट विद्वानों में होती हैं जो कल्याण के इच्छुक, तत्त्व जानने के लिए उत्सुक तथा मत्सर से दूर होते हैं, ये कथाएं एक पक्ष के निर्णय होने तक की जाती हैं (इन में किसी की हार या जीत का प्रश्न नहीं होता, कौनसा तत्त्व सत्य है यह निर्णय होता है)। जल्प और जल्पवितण्डा ये विजिगीषु कथाएं हैं, इनमे वादी, प्रतिवादी, समा- पति तथा प्राश्निक (परीक्षक सभासद) ये चारो अंग होते हैं, लाभ, आदर तथा कीर्ति की इच्छा रखनेवाले मत्सरी वादी (अपने पक्ष के ) तत्ववर्णन के रक्षण के लिए ये कथाएं करते हैं तथा प्रतिवाटी के पराजय तक ही ये कथाएं . n -१.१०५] कथा-के तीन प्रकार ९३ क्षणार्थिभिः प्रतिवादिस्खलनमात्रपर्यन्तं क्रियमाणत्वाञ्च । इति कश्चिद्- पश्चिमो विपश्चित् कथाचतुष्टयम् अचीकथत् ॥ [१०५. कथात्रितयम् ] तथा प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ. सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वाद (न्यायसूत्र १-२-१) छलजातिनिग्रहस्थान साधनोपालम्भ. सिद्धान्ताविरुद्ध पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो जल्पः । जल्प एव प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा। तत्त्वज्ञानार्थ वादः । तत्त्वज्ञानसंरक्षणार्थ जत्पवितण्डे वीजप्ररोहसंरक्षणार्थ कण्डिकशाखा- चरणवत् । तथा हि । जल्पवितण्डे विजिगीपुविषये तत्त्वज्ञानसंरक्षणार्थ- की जाती हैं । इस प्रकार किसी श्रेष्ठ विद्वान ने कथा के चार प्रकारों का चर्णन किया है। कथा के तीन प्रकार जिस में प्रमाण और तर्क के द्वारा साधन और दूषण उपस्थित किये जाते हैं, जो सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं होता, पाच अवययों से संपन्न होता है तथा पक्ष और प्रतिपक्ष को स्वीकार कर के किया जाता है उसे वाढ कहते हैं। जिस में छल, जाति, तथा निग्रहस्थानों द्वारा भी साधन और दूषण दिये जाते हैं, जो सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं होता, पाच अवयवों से सपन्न होता है, तथा पक्ष और प्रतिपक्ष को स्वीकार करके किया जाता है उसे जल्प कहते है । जल्प में ही यदि प्रतिपक्ष की स्थापना न की जाय तो उसे वितण्डा कहते हैं। वाद तत्त्व के ज्ञान के लिए होता है। जिस प्रकार वीज से निकले हुए अंकुर के रक्षण के लिए कॉटोभरी वाड लगाई जाती है उसी तरह तत्त्वज्ञान के संरक्षण के लिए जल्प और वितण्डा होते हैं। जल्प और वितण्डा विजय की इच्छा से किये जाते हैं, क्यों कि वे तत्त्वज्ञान के संरक्षण के लिए होते हैं, चार अंगों से (वादी, प्रतिवादी, सभापति तथा सभासदो से) संपन्न होते हैं, लाभ, सत्कार तथा कीर्ति के इच्छुक लोगों द्वारा किये जाते हैं, मत्सरी वादियों द्वारा किये जाते हैं, प्रतिवादी की गलती होते ही समाप्त किये जाते हैं, छल इत्यादि से सहित होते है, इस सब के उदाहरण के रूप में श्रीहर्ष की कथा (जल्प और वितण्डा) समझनी चाहिए।

' प्रमाप्रमेयम् [१.१०६- ,त्वात् चतुरङ्गत्वात् लाभपृजाग्यातिकामः प्रवृत्तत्त्वात् समन्सरः कृतत्वात् प्रतिवादिस्खलितमात्रपर्यवसानत्वात् छलादिरहितत्वात श्रीहर्षयाथावत् । तथा चादस्तत्वाध्यवसायसंरक्षणरहितादिमान चतुरङ्गादिरहिनन्यान श्रीहर्पक्थावत इति पूर्वपूर्वप्रसाध्यत्वे इतरं पञ्च हेतुत्वेन द्रव्या' । नत्- सकलहेतुसमर्थनार्य च बादस्तत्वाध्यवसायसंरक्षणरहितादिमान् अविजिगीषुविषयत्वात् श्रीहर्षकथावत् इत्यपरः कश्चित् तार्किक कथात्रय प्रत्यतिष्टिपत् तदेतत् सर्व क्रमेण विचार्यते ॥ [१०६. वादलक्षणखण्डनम् ] तत्र प्राचीनपने साधनं दृपणं चापि सम्यगेव प्रयुज्यते इति वाद- लक्षणम् असमञ्जसम् । वादिना पाहतुदृष्टान्तदोषवर्जितम्सन्साधनो- पन्यासे प्रतिपादिन सवयणोदभावनासंभवात् । प्रतिवादिना व्यानिपक्ष- (इस के प्रतिकूल) वाद में तत्त्व के निश्चय का संरक्षण आदि उपर्युक्त बाते नहीं होती, क्यों कि चार अगों से संपन्न होना आदि उपर्युक्त बातें उस में नहीं होती, इस के उदाहरण के रूप में श्रीहर्ष की कथा (बाद ) समझनी चाहिए । इन उपर्युक्त (तत्त्व का सरक्षक होना आदि पाच) बानो में पहली साव्य हो तो बाद की उस की साधक हेतु होती है ऐसा समझना चाहिए । इन सभी हेतुओं का समर्थन इस प्रकार होता है - बाट मे तत्व के निश्चय का सरक्षण आदि-बातें नहीं होती क्यों कि वह विजय की इच्छा से नहीं किया जाता उदाहरणार्थ - श्रीहर्ष की कथा (बाद)। इस प्रकार किती दूसर तार्किक (तकशास्त्रज्ञ विद्वान ) न तीन कथाओं की स्थापना की है। अब इन सब बातों का क्रमश विचार करेंगे। वाद लक्षण का खण्डन उपर्युक्त वाद-लक्षण मे पहले पक्ष न यह कहा है कि बाद में सावन और दूपण उचित हो तो ही उन का प्रयोग किया जाता है-यह कथन मुसगत नही है । जब बाटी ऐने उचित मावन (हेतु) का प्रयोग करे जिस्त- में पक्ष, साध्य या दृष्टान्त का कोई टोप न हो तो प्रतिवादी उस हेतु में रचित दृपण नही बतला सकता । यदि प्रतिवादी काई ऐसा उचित दूर- बतलाता है जिस से हेतु की व्यामि में या पक्ष का धर्म होने मे गलती निश्चित क ~~१.१०६] वादके लक्षण का खण्डन ९५ - धर्मतावैकल्यनिश्चायकसदृपणोद्भावने स्थापनाहतो सत्साधनत्वा- योगाच । कथं यो. सम्यक्त्वं जाघटीति । यदि यथोक्तसत्साधनोपन्या- सेऽपि सट्टपणोदभावनं वोभवीति नर्हि न किंचित् सत्ताधनं स्यादिति न कस्यापि स्वपक्षसिद्धिः । सदृपणस्यापि सत्साधनपूर्वकत्वात् तदभावे तस्याग्वभाव स्यादिति सर्व बिलवते । तस्माटेकविषयलाधनदूषणयोरे केन आभासेन भवितव्यम् । ननु बादे सत्साधनदूपणोपन्यास इत्यभि- प्रायनियमो न वस्तुनियम इति चेन्न । स्थापनाहेतोः सत्साधनत्वनिश्चये- प्रतिवादिन सद्वृषणोदभावनाभिप्रायायोगात । स्वहेतौ सट्टपणोद्भाव-- ननिश्चये वादिनः सन्साधन प्रयोगाभिप्रायायोगाच्च । ननु तदभावे वादि- प्रतिवादिनी समाधन दूपणप्रयोगोदभावनाभिप्रायो न जाघटीति इति. होती हो तो (उस का अर्थ यह है कि) (वादी द्वारा अपने पक्ष की) स्थापना के लिए दिया गया हेतु उचित साधन नहीं हो सकता। दोनों (सावन और दूषण ) उचित केमे हो सकते है ! यदि ऊपर कहे हुए प्रकार से उचित साधन का प्रयोग करने पर भी उचित दृपण बतलाया जा सकता हो तो कोई भी सावन उचित नहीं होगा अत कोई भी अपने पक्ष को सिद्ध नहीं कर सकेगा । इचित दृषण भी तभी सभव है अब रचित साधन हो, यदि रचित साधन का अभाव हो तो उचित दूपण का भी अभाव होगा अत सत्र गडवडी हो जायगी। इस लिए एक ही विषय में जो साधन और दूपण प्रयुक्त होते हैं उन में एक आभास होना ही चाहिए. ( या तो साधना गलत होगा या दूपण गलत होगा) । यहा प्रतिपक्षी कहते हैं कि वाढ में, उचित साधन और दूपण ही प्रयुक्त किये जाने का (वादी और प्रतिवादीका) आभिप्राय होना चाहिए यह हमारा नियम है, वस्तुन.. ( उचित ही साधन और दूपण होंगे ऐसा ) नियम नहीं है, किन्तु यह कहना ठीक नही है । यदि मूल पक्ष की स्थापना करनेगला हेतु रचित साधन है ऐसा निश्चय होता है तो प्रतिबादी के मन में उचित दूपण बतलाने का अभिप्राय नहीं हो सकता । यदि वादी को यह निश्चय हो कि उस के हेतु मे उचित दूषण. बतलाया जा सकता है तो उस का अभिप्राय उचित साधन प्रस्तुत करने का नहीं हो सकता । ऐसा न हो तो वाढी का अभिप्राय उचित साधन प्रस्तुत करने का नही हो सकेगा तथा प्रनिबाडी का अभिप्राय उचित दूषण बतलान। .

-९६ प्रमाप्रमेयम् [१.१०७- चेन्न । उक्तप्रमेये सत्लाधनसद्भावे सन्दूषणाभावः, सद्पणसद्भावे सत्साधनाभावः इति प्रागेव शिक्षाकाले निश्चितत्वात् । ततो नाभिप्राय- नियमोऽपि । न वस्तुनियम इति स्वयमेव प्रत्यपीपदत् अत्रास्माकं न प्रयासः । तस्मात् वादलक्षणमयुक्तं परस्य । [१०७. जल्पलक्षणखण्डनम् ] जल्पे तदाभासोऽपि युज्यत इति अयुक्तम् । जल्पस्य चतुरङ्गत्वेन सभामध्ये क्रियमाणत्वात् तत्र तदाभासप्रयोगनिषेधात् । तत् कथमिति चेत् 'स्वयं नैवाभिधेयानि छलादीनि समान्तरे' इत्यभिहितत्वात् । अथ एकान्तेन तदा प्राप्ते प्रयोज्यानि पराजये' इत्यभिधानात् तत्प्रयोगो . 1 का नहीं हो सकेगा यह कथन भी ठीक नहीं । अमुक विषय मे उचित साधन संभव हो तो उचित दूषण नहीं हो सकता तथा उचित दूषण संभव हो तो उचित साधन नहीं हो सकता यह तो (वे वादी और प्रतिवादी) अध्ययन के समय ही निश्चित कर लेते है । अत. (वादी और प्रतिवादी का) अभिप्राय उचित प्रयोग का ही होगा यह नियम भी नहीं हो सकता। वस्तुतः रचित ही प्रयोग होता है ऐसा नियम नहीं है यह आपने स्वयं कहा है अत. इसे सिद्ध करने का प्रयास करने की हमें जरूरत नहीं है। अतः • (वाद में उचित साधन और उचित दूषण ही प्रयुक्त होते है यह) प्रतिपक्षी द्वारा कहा हुआ वाद का लक्षण अयोग्य है । जल्प के लक्षण का खण्डन जल्प में साधन और दूषण के आभास का भी प्रयोग होता है यह कथन उचित नहीं । जल्प चार अंगों से ( सभापति, सभासद, वादी तथा प्रतिवादी से) संपन्न होता है तथा सभा में किया जाता है अतः जल्प साधनाभास तथा दूषणाभास के प्रयोग का निषेध है । वह किस प्रकार है इस प्रश्न का उत्तर है कि 'स्वयं सभा में छल इत्यादि का उपयोग कभी -नही करना चाहिये' ऐसा कहा गया है। यहां शंका होती है कि 'जहां पराजय निश्चित प्रतीत हो वहां छल आदि साधनाभास-दूषणाभासों का प्रयोग करना चाहिये' इस कथन से छल आदि के उपयोग का विधान भी मिलता है किन्तु यह कथन उचित नही । ऐसे छल आदि का प्रयोग करने + -- - : -१.१०८] वाद और जल्प विधीयत इति चेन्न। तदुद्भावने पराजयस्यावश्यंभावित्वेन तत्प्रयोगा- प्रयोगात्। ननु अनुभावने साम्यं भविष्यतीति धिया प्रयुज्यत इति चेन्न। सत्साधनपणापरिज्ञानात् नदाभासप्रयोगोभावनस्य च वादेऽपि समानत्वात् । इत्यतिव्यापकं जत्पस्य लक्षणम। किं च 'वर्जनोद्भावने चैयां स्ववाक्यपरवाक्ययो.' इत्यभिधानात् तवर्जनस्यैव विधानं न तत्प्रयोगस्य । ननु परवाक्ये नदुद्भावनान्यथानुपपत्तः जल्पे तत्प्रयोगोऽ- स्तीति चेन्न । सत्साधनपणापरिज्ञानात् तत्प्रयोगस्य वाटेऽप्यविशेपात् ।। [१०८. वादजल्पयोः अभेदः] तस्मात् सम्यक्साधनपणवत्त्वेन वादान्न भिद्यते जल्पः। तद्- पर जब प्रतिबाढी उस का दूषित स्वरूप स्पष्ट करता है तब पराजय निश्चित होता है अत छल आदि के प्रयोग का विधान ठीक नहीं है। यदि प्रतिवादी दोष न बता सके तो वादी-प्रतिवादी में समानता सिद्ध होगी इस इच्छा से छल आदि का प्रयोग किया जाता है यह कथन भी उचित नहीं । उचित साधन तथा दृषण न सूझने पर साधनाभास तथा दृपणाभास का प्रयोग करना तथा उन्हे बतलाना बाद में भी समान रूपसे पाया जाता है। अत यह जल्प का लक्षण अतिव्यापक है ( उस मे वाद का भी समावेश हो जाता है)। अपने वाक्यों में छल आदि को टालना चाहिए तथा दूसरे के वाक्यों में इन दोपो को पहचान कर प्रकट करना चाहिए' इस कयन से भी छल आदि को टालने का ही विधान मिलता है - उन के प्रयोग करने का नही । यदि प्रतिपक्षी के वाक्य में छल आदि न हो तो उन्हें पहचानना सभव नही, किन्तु जल्प मे प्रतिपक्षी के वाक्य में ये दोष पहचानने का विधान है, अत जल्प में इन का प्रयोग भी होता है यह कथन भी उचित नहीं। उचित साधन और दूपण न सूझने पर सावनाभास -दूपणाभासों का प्रयोग समान रूप से वाद में भी पाया जाता है ( अत इसी कारण से वाद से जल्प को भिन्न वतलाना सभव नहीं है)। वाद और जल्प म भेद नहीं है उपर्युक्त प्रकार से जल्प मे भी उचित साधनो और उचित दूषणो का ही प्रयोग होता है अतः वह वादसे भिन्न नहीं है। इसी तरह वाढवितण्डा भी जल्प- प्र.प.७ ९८ प्रमाप्रमेयम् [१.१८- वितण्डापि वादवितण्डातो न भिद्यते । ततो वादो जल्प इत्यनान्तरम् । तद्वितण्डेऽपि तथा । तत एव कथाया वीतरागविजिगीपुविषयविभागो नास्त्येव । तथा च प्रयोगः। कथा वीतरागविजिगीषुविषयविभागरहिता प्रमाणवाक्यसाधनोपालम्भत्वात् प्रसिद्धविचारवत् । अयमसिद्धो हेतुरिति चेन्न । वीतो विचारः प्रमाणवाक्यसाधनोपालम्भः सत्साधनदूपणोपेतत्वात् वस्तुविषयत्वाच्च प्रसिद्धविचारवदिति तसिद्धेः। तथा जल्पो वीतराग- कथा सिद्धान्ताविरुद्धार्थविषयत्वात् पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहत्वात् निग्रहस्थान- वत्त्वाञ्च वादवत् । अपि च वादो विजिगीषुकथा पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहत्वात् निग्रहस्थानवत्त्वात् सिद्धान्ताविरुद्धार्थविषयत्वात् जल्पवत् । अथ वितण्डासे भिन्न नही है। अत' वाट और जल्पमें कोई अन्तर नही है तथा उन की वितण्डाओं में भी अन्तर नहीं है। इसीलिए वीतराग कथा तथा विजिगीपु कथा इस प्रकार कथा के विषयों का विभाजनही ठीक नहीं है। इसी को अनुमान प्रयोग के रूप में बतलाते हैं । सर्वत्र प्रसिद्ध विचारविमर्श के समान कथा में भी प्रमाण वाक्य ही साधन और दूषण होते है अत. कथा में वीत- राग कथा तथा विजिगीपु कथा इस प्रकार विषयों का विभाजन नही हो सकता यह हेतु ( प्रमाणवाक्य ही साधन और दूपण होना ) असिद्ध है यह कथन ठीक नहीं क्यों कि उक्त विचार (कथा) प्रसिद्ध विचारविमर्श के समान ही उचित साधनो और उचित दूपणों से युक्त होता है तथा वह वस्तु के विषय में होता है अतः उस में साधन और दूषण प्रमाणवाक्य ही हो सकते हैं इस प्रकार उक्त हेतु सिद्ध होता है । इसी प्रकार (दूसरा अनुमानप्रयोग हो सकता है -) जल्प भी वाद के समान वीतराग कथा है क्योंकि वह सिद्धान्त से अविरोधी वस्तु के विषय में होता है, पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार करके किया जाता है तथा निग्रहस्थानों से युक्त होता है । इसी प्रकार वाद भी जल्प के समान विजिगीपु कथा है क्यों कि वह पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार कर के किया जाता है, निग्रहस्थानों से युक्त होता है तथा सिद्धान्त से अविरोधी वस्तु के विषय में होता है | वाद निग्रहस्थानों से युक्त होता है यह कथन असिद्ध है यह कहना ठीक नही क्यों कि वाद भी जल्प के समान विचार की समाप्ति तक किया जाता है अतः वह निग्रहस्थानों से युक्त होता ही है । वाद और -१.१०९] लक्षण विचार ९९ वादस्य निग्रहस्थानयत्वमसिद्धमिति चेन्न । धादो निग्रहस्थानवान् परिसमातिमद्विचारत्वात् जल्पवदिति । कथाया अविशेषेण वीतरागविजिगीपुविषयत्वे 'वीतरागकथे वादवितण्डे निर्णयान्ततः। विजिगीपुकथे जल्पवितण्डे तदभावतः' इत्ययं कथाविभागोन जाघटीति ॥ [१०९. वादस्य प्रमाणसाधनत्वम् ] अग्रेतनाक्षपादपक्षे वादः प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः इत्यत्र प्रमाणं नाम न प्रत्यक्षम्। विप्रतिपन्नं प्रति तस्य साधनदूपणयोः असमर्थत्वात् । नागमोऽपि तं प्रति तस्यापि तादृशत्वात् । अपि तु अनुमानमेव । तदप्यु- जल्प दोनों तत्र समाप्त किये जाते है जव विचारविमर्श में एक पक्ष का जय और दूसरे का पराजय होता है, पराजय के कारण को ही निग्रहस्थान कहते है, अतः वाद ओर जल्य दोनो में निग्रहस्थान होते हैं । कथा में वीतराग तथा विजिगीषु इस प्रकार का विषयों का विशिष्ट विभाजन नही होता इस लिए वाद तथा वादवितण्डा वीतराग कथाए है क्यों कि वे निर्णय होनेतक की जाती हैं तथा जल्प और जल्पवितण्डा ये विजिगीषु कथाएं है क्यो कि उन निर्णय का अभाव होता है' यह कया का विभाजन उचित सिद्ध नही होता । बाद का साधन प्रमाण है यह कथन उचित नहीं पूर्वोक्त नैयायिको के कथन में वाद को प्रमाण और तर्क इन साधन- -दूषणों से सपन्न बतलाया है । यहा प्रमाण शब्द से प्रत्यक्ष प्रमाण का ताप्तय नही हो सकता क्यों कि विवाद करनेवाले के लिए प्रत्यक्ष-प्रमाण साधन या दूपण में समर्थ नहीं है (प्रत्यक्ष से ज्ञात वस्तु के विषय में वाद नही होता)। इसी प्रकार प्रमाण शब्द से आगम प्रमाण का तात्पर्य भी नही हो सकता क्यों कि इस विषय में उस की भी वही स्थिति है ( प्रतिवादी के लिए आगम द्वारा कोई बात सिद्ध करना सभव नही क्यों कि उसे आगम मान्य ही नहीं है)। अर्थात् प्रमाण शब्द से अनुमान का ही तात्पर्य समझना चाहिए । वह अनुमान भी ऐसा होना चाहिये जिस की व्याप्ति दोनो (वादी च प्रतिवादी) के लिए प्रमाण से सिद्ध हो तया जो पक्षधर्मत्व से युक्त हो । अन्यथा वह अनुमान अपने पक्ष की सिद्धि या प्रतिपक्ष के दूषण मे समर्थ १ प्रनाप्रमेयम् [१.२१०- अयप्रमाणप्रसिद्धच्याप्तिकं पक्षधर्मन्वविशिष्टम् अङ्गीकर्तव्यम् । अन्यथास्य स्वपरपक्षसाधनदपणसामर्थ्यायोगात् ।। [११० वादस्य तर्कसाधनत्वम् ] तर्कोऽपि व्यानिवलमवलम्ध्य परस्य अनिष्टापादनम् । स चोभय- प्रमाणप्रसिद्धव्यानिक. अन्यतरप्रमाणप्रसिव्याप्तिको वा। प्रथमपोऽसौ प्रमाणमेव उभयप्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिकन्वात् धृमानुमानवत्। वीतोऽसौ. तर्को न भवति उभयप्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिकत्वात् तद्वदिति च । द्वितीय- पचे वादिप्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिक' प्रतिवादिप्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिको वा।। तत्र प्राचीनपक्षे विप्रतिपन्न प्रतिवादिनं प्रति तस्य स्वपरपक्षसाधन- दुषणयो.सामर्थ्यानुपपत्ति तत्प्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिपूर्वकत्वाभावात्।अन्यथा नहीं हो सकेगा। (अत वाढ का साधन प्रमाण है यह कथन उचित नहीं। दानो को मान्य च्याप्ति पर आधारित अनुमान प्रमाण ही वाद का साधन होता है।) प्या वाद का साधन तर्क होता है ? (बाद का सावन तर्क होता है यह उपर्युक्त लक्षण में कहा है किन्तु) तर्क का अर्थ है व्याति के बल से प्रतिपक्षी के लिए अनिष्ट बात को सिद्ध करना ! उस तर्क की व्याप्ति या तो (वादी और प्रतिवादी ) दोनो के लिए प्रमाण-प्रसिद्ध (प्रमाणरूप में मान्य) होगी अथवा दो में से एक के लिए प्राणप्रसिद्ध (तथा दूसरे के लिए अमान्य ) होगी। पहले पक्ष के अनुसार चंद नर्क की व्याप्ति (वाढी-प्रतिवादी दोनों के लिए प्रमाणरूप में मान्य हो तो यह तर्क भी वूम ( से अग्नि के ) अनुमान के समान प्रमाण ही होगा (अतः प्रमाण से भिन्न रूप में उस का उल्लेख करना व्यर्थ होगा)। यह कथन तक नहीं होगा (-प्रमाण ही होगा) क्यों कि यह यूम (मे अग्नि के ) अनुमान के समान ही दोनों (वादी-प्रतिवादी) के लिए मान्य व्याति पर आधारित है। दूसरे पक्ष में (दोनो मे किसी एक को वह व्याति मान्य हो तो) या तो उन नर्क की व्याति बादी के लिए प्रमाणसिद्ध होगी अथवा प्रतिवादी के लिए प्रमाणसिद्ध होगी | इन में से पहले पक्ष में जो विवाद कर रहा है उस प्रतिवादी के प्रति यह तर्क अपने पक्ष को सिद्ध करने मे या प्रतिपक्ष को --१.११०] क्या वाद का साधन तर्क होता है ? १०१ 'लपामपि स्वप्रमाणप्रसिद्धया स्वेष्टानिहसाधनदूषणप्रसंगात् । पराचीन- पक्षेऽपि प्रतिवादिप्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिकात् तर्कात् कथं वादी स्वपक्षं प्रतिष्ठापयेत् , प्रतिपक्षं च निराकुर्यात् । वादिनं प्रति तर्कस्य मूलभूत- च्याप्तेरभावान् । अथ परप्रमाणप्रसिद्धव्याप्तिकात् तर्कात् परस्य प्रकृत- हानिः अप्रकृतस्वीकारश्च विधीयत इति चेत् तर्हि तर्कात् विपक्षोपालम्भ एव स्यात् , न स्वपक्षसाधनम् । ननु प्रमाणात् साधनं तांदुपालम्भ इति यथासंख्यात् व्याख्यानात् तत् तथैवेति चेत् तर्हि प्रमाणादुपालम्भाभावः प्रसज्यते । अस्त्विति चेन्न। असिद्धाधुभावने प्रमाणोपन्यासदर्शनात् । दुषित सिद्ध करने में समर्थ नही हो सकता क्यों कि उसकी व्याप्ति (केवल चादी को मान्य है ) प्रतिवादी के लिए प्रमाणसिद्ध नहीं है। अन्यथा ( यदि केवल वादी की मान्यता से ही उस के पक्ष की सिद्धि हो जाय तो) सभी चादी केवल अपने पक्ष के प्रमाणभूत मानने से ही अपने इष्ट पक्ष को सिद्ध करेंगे तथा अनिष्ट (प्रतिपक्ष ) को दूपित सिद्ध करेंगे। दूसरे पक्ष में भी जिस तर्क की व्याति केवल प्रतिवादी को मान्य है (वादी को मान्य नही) उस से वादी अपने पक्ष को सिद्ध कैसे करेगा तथा प्रतिपक्ष का निराकरण कैसे करेगा। उस तर्क की मूलभूत व्याप्ति ही वादी को मान्य नहीं है ( अत. वह उस से अपना पक्ष सिद्व नही कर सकता)। जिस तर्क की व्याप्ति प्रतिपक्षी को मान्य है उस से प्रतिपक्षी को इष्ट तत्त्व का खण्डन करना तथा उसे अनिष्ट हो उस तत्व को स्वीकार कराना यह तर्क का कार्य है यह कहना भी उचित नही क्यों कि ऐसा कहने पर तर्क से सिर्फ विपक्ष में दोष बतलाना ही सभव होगा, अपने पक्ष को सिद्ध करना सभव नहीं होगा (जब कि लक्षण-सूत्र के अनुसार तर्क का उपयोग प्रतिपक्षखण्डन तथा स्वपक्ष समर्थन इन दोनों में होना चाहिए)। (मूल सूत्र में प्रमाण-तर्क-साधनोपालम्भ शब्द इस मे) प्रमाण से (स्वपक्ष का) साधन तथा तर्क से (प्रतिपक्ष का) दूपण होता है इस प्रकार क्रमश व्याख्या करने से यही बात ठीक है ऐसा कहें तो उस का परिणाम यह होगा कि प्रमाण से (प्रतिपक्ष में) दूपण बतलाना संभव नही होगा। यह मान्य है ऐसा कहना भी सभत्र नहीं क्यों कि असिद्ध आदि (हेत्वाभासों के दोप ) बतलाने में प्रमाणों का प्रयोग ( देखा ही जाता है प्रमाप्रमेयम् [१.१११--- जनु प्रमाणात् साधनमुपालम्भश्च तर्कादुपालम्भ एवेति चेन्न । प्रमाण- तर्कसाधनोपालम्भ इत्यत्र तथाविधविभागनियामकत्वाभावात् । तदयुक्तं विशेषणम् ॥ १११ वादस्य सिद्धान्ताविरुद्धत्वम् ] सिद्धान्ताविरुद्ध इत्यत्रापि वाटस्य विचारत्वेन वादिप्रतिवादिनो समानत्वात् कस्य सिद्धान्ताविरुद्धः स्यात् । न तावद बादिसिद्धान्ता- विरुद्धः, प्रतिवादिसिद्धान्तोपन्यासस्य वादिसिद्धान्तविरकृत्वात् । न प्रति- वादिसिद्धान्ताविरुद्धोऽपि, वाद्युपन्यासस्य प्रतिवादिसिद्धान्तविरुद्धत्वात् । नाप्युभयसिद्धान्ताविरुद्धः । वादिप्रतिवादिनोः परस्परविरुद्धार्थोपन्यास- दर्शनात् । ततो न कस्यापि सिद्धान्ताविरुद्धः स्यात् । तस्मादेतद् विशेष- णमप्ययुक्तम् ॥ है। प्रमाण स (स्वपक्ष का) साधन तथा ( प्रतिपक्ष का) दृपण दोनों होते हैं और तर्क से केवल (प्रतिपक्ष का) दृपण होता है यह कहना भी ठीक नहीं क्यों कि प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ इस शब्द में इस प्रकार का विभाजन करने का कोई नियमित कारण नहीं है । अत (वाद के रक्षण में) यह विशेषण उचित नहीं है। क्या वाद सिद्धान्त से अविरोधी होता है? (उपर्युक्त लक्षण में वाद को) सिद्धान्त से अविराधी कहा है यहां भी (विचारणीय है कि ) वाद में विचारविमर्श होता है अतः वह वादी और प्रतिवादी दोनो के लिए समान है किर उसे किस के सिद्धान्त से अविरोधी कहा जाय ? वह वादी के सिद्धान्त से अविरोधी नहीं हो सकता क्यों कि प्रतिवादी जब अपने सिद्धान्त का वर्णन करता है तो वह वादी के सिद्धान्त के विरुद्ध होता ही है । इसी तरह वाद प्रतिबादी के सिद्धान्त से अविरोधी भी नही हो सकता क्यों कि बाढी का वर्णन प्रतिबादी के सिद्धान्त के विरुद्ध होता ही है । वाद ( वाटी और प्रतिवादी इन ) दोनों के सिद्धान्तों से अविरोधी होता है यह कहना भी सम्भव नही क्यों कि वे वादी और प्रतिवादी परस्पर विरुद्ध अर्थ का वर्णन करते देखे जाते हैं । अत वाद किसी के भी सिद्धान्त ते अविरोवी नहीं होता। अतः यह विशेषण भी योग्य नहीं है ।

- १.११२] वाद के पांच अवयव १०३ [११२. वादस्य पञ्चावयवत्वम् ] पञ्चावयवोपपन्न इत्यत्र पञ्चभिरवयवै उपपन्नो निष्पन्न इति वक्त- व्यम् । न च तेषां मते पृथिव्यप्तेजोवायुपरमाणुद्वयणुकादिव्यतिरेकेण अन्चे अवयवाः सन्ति, न च वादस्तैरुपपन्नः । तस्य पार्थिवाद्यवयवित्वा- भावात् विप्रतिपन्नार्थविचाररूपत्वाञ्च व्यतिरेके पटवत्। अथ प्रतिज्ञाहेतू- दाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः तैरुपपन्नो वाद इति चेन्न । प्रतिनादीनां वाक्यत्वेन शब्दरूपत्वात्, शब्दस्य च तन्मते आकाशगुणत्वेन अवयवरूपता- भावात् । तथा हि । न प्रतिज्ञादिवाक्यानि अवयवाः शब्दत्वात् वीणावाद नवत् , स्पर्शादिरहितत्वात् गुणत्वात् अमूर्तत्वात् रूपादिवत् । न वादोऽ- प्यवयवैः उपपन्न अनवयवित्वात् अद्रव्यत्वात् अमूर्तत्वात् स्पर्शादिरहित त्वात् रूपादिवत् । किं च । प्रतिज्ञादिवाक्यानामवयवरूपत्वाङ्गीकारे तेषां रूपादिमत्त्वं तैरुपपन्नस्यावयवित्वं प्रसज्यते । तथाहि । प्रतिज्ञादिवाक्यानि वाद के पांच अवयव वाद को पचावयवोपपन्न कहा है । यहा पांच अवयवों से उपपन्न अर्यात निर्मित होना यह अर्थ कहना चाहिए किन्तु उन के मत में (न्याय- दर्शन में ) पृथ्वी, जल, तेज तथा वायु के परमाणुआ और व्यणुकों आदि से भिन्न कोई दुसरे अवयव नहीं माने गये है तथा वाद इन (परमाणु आदि अवयवों ) से निर्मित नहीं होता । वाट पृथ्वी आदि से निमित अवयवी नहीं है, वह विवादग्रस्त विषय के बारे में विचार के रूप का होता है, अतः वह वस्त्र आदि के समान अवयवों से निष्पन्न नही होता । प्रतिज्ञा, हेतु,उदाहरण, उपनय और निगमन ये पाच अवयव हैं उन से वाद निष्पन्न होता है यह कहना भी ठीक नहीं क्यों कि प्रतिज्ञा आदि वाक्य होते हैं, वे शब्दों से निर्मित हैं तथा न्याय मत में शब्द को आकाश का गुण माना है अत. उस में अवयवो का रूप नही हो सकता । इसी को अनुमान के रूप में प्रस्तुतः करते हैं-प्रतिज्ञा आदि वाक्य अवयव नही हो सकते क्यों कि वे वीणावादन आदि के समान शब्द हैं तथा रूप आदि के समान स्पर्शादि रहित है तथा गुण है एवं अमूर्त हैं । वाद भी अवयवों से निष्पन्न नहीं होता, वह अवयवी नहीं है, द्रव्य नही है ; मूर्त नही है तथा स्पर्श आदि से रहित है अतः रूप an १०४ प्रमाप्रमेयम् [१.११३- रूपादिमन्ति अवयवित्वात् तन्त्वादिवत् । वादोऽप्यवयविद्रव्यम् अवयवैः उपपन्नत्वात् पटादिवदिति । तस्मात् तेषाम् अवयवरूपता नाङ्गीकर्तव्या । तथा च न वादः पञ्चावयवोपपन्नः स्यात् ।। [११३. वादानुमानयोर्भेदः] किं च। प्रतिज्ञादिभिर्वाक्यैरनुमानमेवोपपद्यते, न वादः। अथ अनुमानमेव वाद इति चेन्न । अनुमानप्रमाणस्य वादव्यपदेशाभावात् । ननु 'परार्थानुमानस्यैव वाव्यपदेश इति चेन्न। ग्रन्थस्थानुमानानां परार्थानु- मानत्वेऽपि वाव्यपदेशाभावात् । अथ आत्मविभुत्ववादः शब्दनित्यत्व- बाद इति ग्रन्थस्थानुमानानां वादव्यपदेशोऽस्तीति चेन्न । वादिप्रति- आदि के समान वह भी अवयवों से निर्मित नही है। प्रतिज्ञा आदि वाक्यों को अवयव माने तो वे रूप आदि से युक्त सिद्ध होंगे तथा उन से निर्मित (वाद) को अवयवी मानना होगा । जैसे कि -प्रतिज्ञा आदि के वाक्य अव- यव हैं अतः तन्तु आदि के समान वे भी रूप आदि से युक्त होगे। वाद अवयवों से निर्मित है अत. वत्र आदि के समान वह भी अवयवी द्रव्य सिद्ध होगा । अतः उन प्रतिज्ञा आदि वाक्यों को अवयव नही मानना चाहिए । अत. वाद पाच अवयवों से निष्पन्न नहीं होता । बाद और अनुमान में भेद दूसरी बात यह है कि प्रतिज्ञा आदि वाक्यों से अनुमान प्रस्तुत किया जाता है - वाद नहीं । अनुमान ही वाद है यह कहना ठीक नहीं क्यों कि अनुमान प्रमाण को वाद यह नाम नहीं दिया जाता । परार्थ-अनुमान को ही बाद यह नाम दिया जाता है यह कहना भी ठीक नहीं क्यों कि ग्रन्थो में परार्थ अनुमान होते हुए भी उन्हें वाद नहीं कहा जाता । अन्यों में लिखित अनुमानों को भी आत्मविभुत्ववाद, शब्दानित्यत्ववाद इस प्रकार वाद यह नाम दिया जाता है यह कहना भी ठीक नहीं क्यों कि (न्यायदर्शन के लक्षणानुसार) वाटी और प्रतिवादी पक्ष और प्रतिपक्ष का स्वीकार कर के जो विचार करते हैं उसे ही वाद कहा जाता है। दूसरी बात यह है कि अनुमान अवयवों से बनता है इस कथन में भी पहले कहा - लिखे हुए अनुमान 7 -१.११४] भिन्न प्रकार से पांच अवयवों का विचार वादिभ्यां पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण क्रियमाणस्य विचारस्यैव वादव्यपदेशात्। किं च। अनुमानस्यापि अवयवरुपपनत्वाङ्गीकारे प्राक्तनाशेषदोषः प्रसज्यते ॥ [११४. प्रकारान्तरेण पञ्चावयवविचारः] ननु पक्षसाधनं प्रतिपक्षसाधनदूषणं साधनसमर्थन दूषणसमर्थन शब्ददोपवर्जनमिति अवयवाः पञ्च तैरुपपन्नो वाद' इति चेन । पक्षसाधना- दीनां वाक्यत्वेन शब्दरूपत्वात् प्राक्तनाशेषदोषानतिवृत्तः। किं च । • चादिना सत्लाधनोपन्यासे प्रतिवादिनः सदूषणोद्भावनासंभवेन तूर्णी- भावे अथवा प्रतिवाद्युद्भावितासवणपरिहारेण प्रतिवादिन तूष्णी- भावेऽपि पञ्चकस्यानुपपत्ते कथं तदुपपनत्वं वादस्य । अथवा प्रतिवादिना सदूषणोद्भावने वादिन. साधनसमर्थनाभावेन प्रतिवादिना स्वपक्षे हुआ संपूर्ण दोप (कि प्रतिज्ञा आदि वाक्य होने से अवयव नहीं हो सकते) प्राप्त होता है (अतः अनुमान अथवा वाट अवयवों से उपपन्न होता है यह कथन ठीक नही है)। भिन्न प्रकार से पांच अवयवों का विचार अपने पक्ष को सिद्ध करना, प्रतिपक्ष की सिद्धि में दूषण बतलाना, (अपने) साधन का समर्थन करना, (प्रतिपक्ष के ) दूषण का समर्थन करना तथा शब्द के दोषों को टालना ये पाच अवयव हैं, इन से वाद संयुक्त होता है यह कथन भी ठीक नहीं । पक्ष का सावन आदि ये पाच अवयव भी चाक्यही हैं अतः शब्दों से बने है अत. पूर्वोक्त सनी दोप यहा भी दूर नहीं होता (इन वाक्यों को भी अवयव नही कहा जा सकता)। दूसरी बात यह है कि जब वादी उचित साधन प्रस्तुत करता है तथा प्रतिवादी उचित दूषण' बतलाना सभव न होने से चुन रहता है, अथवा प्रतिवादी द्वारा बताये गये झुठे दूपण को दूर करने पर जब प्रतिवादी चुप रहता है तब भी (उस बाद में) ये पाच अवयव नही हो सकते (केवल पक्षसावन यह एकही अवयव होगा अयत्रा पक्षसाधन, प्रतिपक्ष दूपण तथा दूषगपरिहार ये तीन ही अश्यत्र होंगे) अतः बाद पाच अवयवों से संयुक्त कैसे होगा । अथवा प्रतिवादी के उचित दूपण चलाने पर जब वादी अपने पक्ष का समर्थन नहीं कर पाता तथा प्रतिवादी १०६ प्रमाप्रमेयम् [१.११५- स त्साधनोपन्यासे यादिनः प्रतिपक्षसाधनदूपणसमर्थनयोः अभावेनापि पञ्चकम्यानुपपत्तेः अव्यापकत्वं लक्षणस्य। तस्मात पञ्चावयवोपपनर इत्येतदपि विगेपणमयुक्तं परस्य ।। [११५ वादस्य पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहत्वम् ] पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वाद इत्यपि असमञ्जसम्। कदाचित् स्वस्यापि नित्यानित्यादि पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहस्य विद्यमानत्वेऽपि तस्य वादन्वाभा- वात् । अथ वादिप्रतिवादिनो पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहोवाद इति चेन्न । सौगत- सांख्ययोः योगवेदान्तिनोः सर्वदा पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहस्य विद्यमानेऽपि वादत्वाभावात् । अथ पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण विचारो वाद इति चेन्न । स्वस्यैकस्य तत्सद्भावेऽपि वाढत्वाभावात् । अथ वादिप्रतिवादिनोः पक्ष- प्रतिपक्षपरिग्रहेण क्रियमाणो विचारो वाद इति चेन्न । जल्पवितण्डयो- जब अपने पक्ष में उचित साधन प्रस्तुत करता है तब वादी उत्त प्रतिपक्ष के साधन में टोप नही बतला सकता तथा उसका समर्थन भी नहीं कर सकता तब भी इन (स्वपक्षसमर्थन तथा प्रतिपक्षदृपण एव दूपणसमर्थन ) अवयवों के अभाव में पाच अवयव पूरे नहीं हो सकते अतः इस प्रकार भी वाद का यह लक्षण अव्यापक ही रहेगा। इसलिए पंचावयवोपपन्न यह प्रतिपक्षीद्वारा दिया हुआ वाद का विशेषण भी अयोग्य है । वाद मे पक्षप्रतिपक्ष का स्वीकार पक्ष और प्रतिपक्ष के स्वीकार करने से वाद होता है यह कहना भी उचित नहीं। किसी किसी समय (एक व्यक्ति) स्वय ही नित्य-अनित्य जैसे पक्ष और प्रतिपक्ष का स्वीकार करता है किन्तु वह बाद नहीं होता। वादी और प्रतिवादी का पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार करना यह वाद कहलाता यह कथन भी ठीक नहीं । बौद्ध और सांख्य, तथा नैयायिक और वेदान्ती इन में पक्ष और प्रतिपक्ष का स्वीकार सदा ही बना रहता है किन्तु उसे वाद नही कहते | पक्ष और प्रतिपक्ष के स्वीकार से किये गये विचार को वाद कहते हैं यह कयन भी उचित नहीं क्यों कि ऐसा विचार एक व्यक्ति स्वयं भी कर सकता है। वादी और प्रतिवादी द्वारा पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार कर के किये गये विचार को वाद कहते है यह कहना भी ठीक नही क्यों - -१.११६] जल्प के लक्षण का विचार १०७ अथ रतत्सद्भावेऽपि वादव्यपदेशाभावात् । पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण स्साघदूपणोपन्यारेन च वादिप्रतिवादिनो विचारो वाद इति चेन्न । रक्षण सत्रे तथाविधविशेषणाभावात् । तस्मात् लक्षणसूत्रमेतदयुक्तम् ।। [११६. जल्पलक्षणविचारः] जल्पलक्षणेऽपि छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भ इत्यसंगतम् । तेषां साधनदूषणसामर्थ्यायोगात् । तथा हि। छलादयो न साधनसमर्थाः- साधनाभासत्वात् दूषणाभासवत् । नोपालम्भसमर्थाश्च दूषणाभासत्वात् कल्पितचौर्यवत् । आभासश्छलाढय असत्साधनदृपणत्वात् तद्वत् ।। असत्साधनदूषणास्ते सत्साधन दूषणयोरपठितत्वात अन्यतरपक्षनिर्णया- कारकत्वाच्च श्रद्धाशापादिवत् । ततो जत्पलक्षणसूत्रमपि युक्त्या न संभाव्यते॥ कि जल्प और वितण्डा मे ऐसा विचार होने पर भी उन्हें वाद नही कहा जाता | पक्ष और प्रतिपक्ष का ग्रहण कर के उचित साधनो और दूषणों को प्रस्तुत करते हुए वाटी और प्रतिवादी जो विचार करते है उसे बाद कहा जाता है यह कथन भी उचित नहीं क्यों कि वाद के लक्षण के सूत्र में ऐसे विशेषण नहीं दिये गये है । अत. यह लक्षण-सूत्र अयोग्य है । जल्प के लक्षण का विचार जल्प के लक्षण में उसे छल, जाति निग्रहस्थान इन साधनों व दृपणों से संपन्न कहा है यह अनुचित है क्यो कि छल आदि में साधन या दूषण का सामर्थ्य नहीं हो सकता | छल आदि दूषणाभास के समान (स्वपक्ष के) साधन में समर्थ नहीं हो सकते क्यो कि साधनाभास है । छल आदि (प्रतिपक्ष के ) दूषण में भी समर्थ नहीं है क्यों कि वे कल्पित चोरी के समान दूपणाभास है । छल इत्यादि आभास हैं क्यो कि वे कल्पित चोरी के समान सत् साधन या सत् दृपण नहीं है । श्रद्धा अथवा शाप के समान छल आदि भी सत-साधना व सत्-दूषणों में समाविष्ट नहीं है तथा किसी एक पक्ष का निर्णय भी नहीं करा सकते अतः वे सत-साधन या सत्-दूषण नही है । इस प्रकार जल्प के लक्षण का सूत्र भी युक्ति सगत नही है ।

“१०८ प्रमाप्रमेयम् “ [११७. वितण्डालक्षणविचारः] तदसंभवे स एव प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा इत्यायसांप्रतम् वादे जल्पे च पक्षप्रतिपक्षयोः मध्ये अन्यतरस्य निराकरणे अपरस्य साधनप्रयोगमन्तरेण सुप्रतिष्टितत्वात् अर्थिप्रत्यार्थिनोः एकस्य तप्तायः- पिण्डग्रहणादिना दौस्थ्ये अपरस्य तद्ग्रहणमन्तरण सौस्थ्यसंभववत् । चादिना सत्साधनोपन्यासे प्रतिवादिन सदूपणादर्शनेन तृणीभावेन तेन दूषणाभासोद्भावने वादिना तत्परिहारे च वादे जल्पेऽपि प्रतिपक्ष- स्थापनासंभवाच । ननु सोऽपि वितण्डा भविष्यतीति चेन्न । यत्र प्रति- वादिना स्थापनाहेतुं निराकृत्य तृष्णीमास्ते सा वितण्डा इत्यगीकारात् । अत्र तु वादे स्थापनाहेतुनिराकरणाभावेन प्रतिवाद्युद्भावितदूपणाभास- स्यैव निराकृतत्वात्। तावताप्रतिभया प्रतिवादिनः तूष्णीभावात् केयं वितण्डा का लक्षण जल्प के लक्षण में उपर्युक्त असंगति होने से 'वही जल्प प्रतिपक्ष की स्थापना से रहित होने पर वितण्डा कहलाता है' यह कथन भी अनुचित सिद्ध होता है । वाद में और जल्प में भी पक्ष और प्रतिपक्ष में किसी एक का निराकरण करने से दूसरा पक्ष किसी समर्थक अनुमान-प्रयोग के बिना भी विजयी सिद्ध होता है; (जैसे न्यायालय में ) वादी और प्रतिवादी इन दोनों में से तरे हुए लोहे के गोले को पकडने जैसी परीक्षा से एक पक्ष गलत सिद्ध होने पर दूसरा पक्ष वैसी परीक्षा के बिना भी सही सिद्ध होता है (तात्पर्य - बाद या जल्प में पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों का समान रूप समर्थन होना ही चाहिए ऐसा नहीं हैं, एक पक्ष के पराजय से दुसरे का विजय स्वत सिद्ध हो जाता है)। वादी जब उचित हेतु का प्रयोग करता और प्रतिवादी उस में उचित दोष नही देख पाता तब चुप रहता है (तथा यदि) प्रतिवादी झूठमूठ दोष बतलाता है ता वाढी-उस का उत्तर देता है (तब फिर प्रतिवादी चुप हो जाता है) इस प्रकार वाढ और जल्प में भी प्रतिपक्ष की स्थापना सभव नही है। ऐसे प्रसग को भी वितण्डा कहगे यह कहना भी सभव नहीं क्यों कि जहा प्रतिवादी स्थापना के हेतु, का निराकरण ‘कर के ही चुप हो जाता है वह वितण्डा है ऐसा (नैयायिकों का) कथन -१.११७] वितण्ड का लक्षण १०६. कथा स्यात् । न तावत् जल्पवितण्डे तल्लक्षणाभावात् । वाद एवेति वक्तव्यम् । अथ वादे दूपणाभासोद्भावना नोपयोयुजतीति चेन्न ! सत्साधनोपन्यासे सदूपणोद्भावनस्यासंभवात् । न च व्याप्तिपक्षधर्म- वत्सत्साधनस्य सद्दपणं संभवति। अन्यथा एकस्यापि सत्साधनस्या-- संभवात् न कस्यापि स्वपक्षसिद्धिः स्यात् । सद्वृषणस्यापि सत्साधन- पूर्वकत्वात् तदभावे तस्याप्यभाव स्यादिति सर्व विप्लवते । तस्मादेक- विषयसाधनदृपणयो एकनाभासेन भवितव्यम् । तत एव वादेऽपि साधनदयणाभासप्रयोगोद्भावनं प्रतिपक्षस्थापनामावश्च सभाव्यते है तथा है। इस प्रसंग मे वाद में स्थापना के हेतु का निराकरण तो नहीं हुआ है, सिर्फ प्रतिवादी द्वारा बताये गये झूठे दृपण का ही निराकरण किया है। उस के बाद कुछ न सूझने से प्रतिवादी चुप हुआ है । अतः इस प्रसंग को कौन सी कथा कहेंगे ? जल्प या वितण्डा नहीं कह सकते क्यों कि उन के लक्षण इस में नहीं है । अत इसे बाद ही कहना होगा । वाद में झूठे दूषण नही बताये जाते (अत यह प्रसग वाद नहीं है) यह कयन भी उचित नहीं है। (वस्तुत.) रचित हेतु का यदि प्रयोग किया गया है तो उस मे उचित दृपण नही बताया जा सकता (यदि उचित हेतु मे भी कोई दूपण बताया जाये तो वह झूठा दृषण ही होगा)। जो उचित हेतु च्याति से युक्त पक्ष का धर्म है उस मे वास्तविक पण नहीं हो सकता। अन्यथा ( यदि उचित हेतु मे भी दूपण वास्तविक होने लगें तो) एक भी हेतु उचित नही होगा तथा किसी का भी पक्ष सिद्ध नहीं हो सकेगा। उचित दूपण तभी होते हैं जब उचित हेतु हों, यदि उचित हेतु ही नही है तो उचित दूपण भी नही होंगे इस प्रकार सर्वत्र गडवडी हो जायगी। अत एक ही विषय में जो हेतु और दूपण प्रस्तुत किये जाते हैं उन में से एक अवश्य ही झुठा होता है (यदि हेतु उचित हो तो दृपण झुठा होगा, तथा दूपण सही हो तो हेतु अयोग्य होगा)। अत वाट मे भी सावन तथा दृपण के आभास का प्रयोग एव वतलाना तथा प्रतिपक्ष की स्थापना का अभाव हो सकता है । अत जल्प और वितण्डा के लक्षण अतिव्यापक हे ( उन की कुछ बातें वाद में भी पाई जाती हैं)। यही बात अनुमान-प्रयोग के रूप मे बतलाते. - ११० प्रमाप्रमेयम् [१.११८- इत्यतिव्यापकं जल्पवितण्डयोलक्षणम् । प्रयोगश्च चादः छलादिप्रयोगवान् निग्रहस्थानवत्त्वात् परिसमातिमद्विचारन्यात् पक्षप्रतिपश्नपरिग्रहत्वात् जल्पवदिति। तदेतत् निरूपणमयुक्तं परस्य ।। [११८. जल्पवितण्डयोः तत्वाध्यवसायसंरक्षकत्लामावः] यञ्चोकं तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थ जल्पवितण्डे वीजप्ररोहसंरक्ष. णार्थ कण्टकशाखावरणवत् इति तसंगतम्। तयोस्तत्त्वाध्यवसायसंरक्षण - सामायोगात् । तथाहि । जल्पवितण्डे न तत्वाध्यवलायमंरक्षणसमय असत्साधनदूपणवत्त्वात् निखिलवाधकनिराकरणासमर्थत्वाञ्च अवला- कलहवत् । न चासत्साधनदूषणत्वमसिद्ध छलजातिनिग्रहस्थानसाधनो- पालम्भो जल्पः स एव प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा इत्यभिधानात् । L - बाद में छल इत्यादि का प्रयोग होता है क्यों कि वह भी जला के समान ही निग्रहस्थानों से युक्त है, विचारविमर्श की समाप्ति तक चलता है तथा पक्ष और प्रतिपक्ष को स्वीकार कर किया जाता है। अतः प्रतिपक्षी (नैयायिकों) का यह (वाद, जल्प और वितण्डा के वर्णन का) कयन योग्य नहीं हैं। जल्प और वितण्डा तत्व के रक्षक नहीं हैं (न्यायदर्शन का) यह कथन भी उचित नहीं है कि जल्प और वितण्डा तत्त्व के निश्चय के रक्षण के लिए होते हैं, उसी प्रकार जैसे बीज से निकले हुए छोटे अंकुर की रक्षा के लिए कॉटोभरी टहनियों का बाडा लगाया जाता है । जल्न और वितण्डा में तत्त्व के निश्चय की रक्षा का सामर्थ्य -नही हो सकता। जल्प और वितण्डा में साधन और दृषण असत् होते हैं तया उन में बाधक आक्षेपों को पूरी तरह दूर करने का सामर्थ्य भी नहीं होता अतः स्त्रियों के कलह के समान जल्प और वितण्डा भी तत्व के निश्चय की रक्षा में समर्थ नहीं हो सकते । जल्प और वितण्डा में सावन और दूपण असत् होते हैं यह हमारा कथन असिद्ध नहीं है क्यों कि न्यायदर्शन में ही कहा है कि जिस में छल, जाति तथा निग्रहस्थानों द्वारा साधन और दूपण उपस्थित किये जाते है वह जल्प कहलाता है तथा उसी में यदि प्रतिपक्ष की -स्थापना न की जाये तो उसे वितण्डा कहते हैं। हमारे उपर्युक्त कथन का 44 .-१.११९] वाद ही तत्त्व के निश्चय का संरक्षक तथा द्वितीयोऽपि हेतुः नासिद्धः। जल्पवितण्डे न निखिलवाधकनिरा. करणसमर्थे असत्साधनदूषणोपेतत्वात् अवलाकलहवत् । छलादयो वा न तत्वाध्यवसायसंरक्षणसमर्था असत्साधनदूषणत्वात् शापादिवत् । छला- दीनि असत्साधनदूपणानि अन्यतरपक्षनिर्णयाकारकत्वात् आभासत्वाच शापादिवत् । छलादयस्तदाभासा इति निरूपितत्वात् नासिद्धो हेतुः॥ [११९. वादस्यैव तत्वाध्यवसायसंरक्षकत्वम् ] किं च । जल्पवितण्डाभ्यां वदनात् वादी तत्त्वाध्यवसायरहित एव परनिर्मुखीकरणे प्रवृत्तत्वात् तत्त्वोपप्लववादिवत् । तस्मात् वाद एव तत्वाध्यवसायसंरक्षणसमर्थः प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भत्वात् व्यतिरेके दूसरा हेतु (वाधक आक्षेपों को दूर न कर सकना) भी असिद्ध नही है। जल्प और वितण्डा में सभी बावक आक्षेपों को दूर करने का सामर्थ्य नही होता क्यों कि स्त्रियों के कलह के समान ही उन के साधन और दूषण असत होते हैं। छल आदि (जिन का प्रयोग जल्प और वितण्डा मे होता है) असत् साधन व असत् दूषण हैं अत शाप आदि के समान वे (छल आदि) भी तत्त्व के निश्चय के रक्षण में समर्थ नहीं हो सकते । छल इत्यादि किसी एक पक्ष का निर्णय नहीं कर सकते, वे शाप आदि के समान आभास हैं अत. उन्हे असत् साधन और असत् दूषण कहा जाता है। छल इत्यादि आभास हैं ऐसा न्याय दर्शन में भी कहा है अत. हमारा यह कथन असिद्ध नही है। बाद ही तत्त्व के निश्चय का संरक्षक होता है जल्प और वितण्डा का प्रयोग करनेवाला वादी तत्त्व के निश्वय से रहित होता है क्यों कि तत्त्वोपप्लव वादी के समान वह केवल प्रतिपक्षी को चुप करने के लिए ही बोलता है (अपनी कोई बात सिद्ध करना उस का उद्देश नही होता)। अत. वाद ही तत्त्व के निश्चय के सरक्षण में समर्थ होता है क्यों कि वह प्रमाण और तर्क द्वारा साधन-दूषणों का उपयोग करता है जिस के प्रतिकूल कलह होता है ( झगडे में प्रमाण या तर्क का उपयोग नही होता अत. वह तत्त्व के निश्चय के सरक्षण में समर्थ नहीं है)। बाद का उपयोग कर बोलनेवाला ही तत्त्व का निश्चय कर सकता है क्यो कि वह दूसरे ११२ प्रमाप्रमेयम् [१.१२०- क्लहवत् । वादेन वदव तत्वाध्यवसायी परप्रतिबोधनाय प्रवृत्तत्वात् अभिमततत्त्वज्ञानिवत् ॥ [१२० जल्पवितण्डयोः विजिगीषुविषयत्त्वम् ] यदपि व्यरीरचद् योग -जल्पवितण्डे विजिगीपुविपये तत्त्वज्ञान- संरक्षणार्थत्वात् चतुरङ्गत्वात् ख्यातिपूजालाभकामः प्रवृत्तत्वात् समत्सरैः कृतत्वात् प्रतिवादिस्खलितमात्रपर्यवसानत्वात् छलादिमत्वाच लोक-- प्रसिद्धविचारवत व्यतिरेके वादवदिति तत् स्वमनोरथमात्रम् । तत्त्वज्ञान-- संरक्षणादिहेदना वाटेऽपि सद्भावेन व्यभिचारात् । तथा हि । वादः- तत्वाध्यवसायसंरक्षणार्थ स्वसिद्धान्ताविरद्धार्थविषयत्वात स्वाभिप्रेतार्थ- व्यवस्थापनफलत्वात् विचारत्वात् पक्षप्रतिपक्षपरित्रहत्वात् निग्रहस्थान- वत्वात् परिसमाप्तिमद्विचारत्वात् जत्यवत् । तथा चतुरनो बादः लाभ- (प्रतिपक्षी) को समझाने में प्रवृत्त हुआ है, जैसे कोई भी मान्य तत्त्वज्ञानी होता है। क्या जल्प और वितण्डा विजय के लिए ही होते हैं ? नैयायिकों ने जो यह कहा है कि जल्प और वितण्डा विजय की इच्छा से किये जाते हैं क्यो कि वे तत्त्वज्ञान के सरक्षण के लिए होते हैं, उन के चार अग होते है, कीर्ति, सम्मान आदि लाभ की इच्छा रखनेवाले ही उन में प्रवृत्त होते हैं, मत्सरी वादी उन में भाग लेते हैं, प्रतिवाढी की गलती होते ही वे समाप्त होते हैं तथा वे छल आदि से युक्त होते हैं, इन सब बातों में वे जल्प और वितण्डा लोगों मे सुप्रसिद्ध विचारविमर्श के समान हैं, बाद में ये सब बातें नहीं पाई जाती-यह नैयायिको का कयन उन की कल्पना- मात्र है ( वस्तुतः उचित नहीं है)। ऐसा कहने का कारण यह है कि, तत्त्वज्ञान का सरक्षण करना आदि ये सब हेतु बाद में भी विद्यमान हैं अत. उक्त हेतु व्यभिचारी है (वे जल्पवितण्डा इस पक्ष में तथा बाद इस विपक्ष में दोनों में पाये जाते है)। इसी को स्पष्ट करते हैं-बाट तत्व के निश्चय के सरक्षण के लिए होता है क्यो कि अपने सिद्धान्त से अविरोधी अर्थ उस का विषय होता हैं, अपने लिए इष्ट अर्थ की स्थापना करना यह उस का फल ---१.१२१] पूर्वोक्त हेतुओं की निर्दोषता ११३ पूजाख्यातिकामै प्रवृत्तो वादः समत्सरैः क्रियते वाद प्रतिवादिस्खलित- मात्रपर्यवसानो वादः छलादिमान् वादःविचारत्वात् पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहा 'न्वितत्वात् निग्रहस्थानवत्त्वात् परिसमाप्तिमत्कथात्वात् 'सिद्धान्ता- विरुद्धार्थ विषयत्वात् स्वाभिप्रेतार्थव्यवस्थापनफैलत्वात् जल्पवदिति पञ्चसाध्येपु प्रत्येकं पट् हेतवो द्रष्टव्याः ॥ [१२१. उक्तहेतूनां निर्दोपता] सर्वत्र विप्रतिपत्तिनिराकरणेन स्वपक्षसोस्थ्यकरणमेव स्वाभि- प्रेतार्थः तद्व्यवस्थापनफलं वादे जल्पेऽपि समानम्। अन्यहेतव. अङ्गी- कृताः परैः वादे जल्पेऽपि । ततश्च उक्तहेतूनां पक्षे सद्भावात् न ते स्वरूपासिद्धा न व्यधिकरणासिद्धाश्च, पक्षस्य प्रमाणसिद्धत्वात् नाश्रया- होता है, वह विचारविमर्श होता है, पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार कर के किया जाता है, निग्रहस्थानों से युक्त होता है, तया विचारीवमर्श की समाति तक किया जाता है, इन सब बातों में वह जल्प के समान ही है । वाद चार अंगों से संपन्न होता है, लाभ, कीर्ति, सत्कार आदि की इच्छा रखनेवाले बाद में प्रवृत्त होते है, मत्सरी वादी-प्रतिवादी वाद करते है, प्रतिवादी की गलती होते ही वाद समाप्त किया जाता है, वाद छल आदि से युक्त होता है ये ( उपर्युक्त कथन में ) पाच साध्य है, इन में से प्रत्येक के समर्थन लिए छह हेतु दिये जाते हैं वे इस प्रकार है-बाट विचारविमर्श है, वह पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार कर के किया जाता है, वह निग्रहस्थानों से युक्त होता है, विचारविमर्श की समाप्ति तक किया जाता है, सिद्धान्त के अविरोधी अर्थ उस के विषय होते है, तया अपने इष्ट अर्थ की स्थापना यह, उस का फल है, इन सब बातों में वह जल्प के समान है ( अतः जल्प और वितण्डा विजय के लिए है एवं वाद विजय के लिए नहीं है यह भेद उचित नहीं है)। पूर्वोक्त हेतुओं की निर्दोषता सभी प्रसंगों में विरोवी आक्षेपों को दूर कर के अपने पक्ष को उचित सिद्ध करना यही वादी को अभीष्ट बात होती है उस की व्यवस्था करना यह फल वाद और जल्प दोनों में समान है। शेष हेतु वाद और जल्प दोनों में है यह प्रतिपक्षियों ने (नैयायिकों ने) भी स्वीकार किया है । यह पूर्वोक्त हेतु प्र.प्र.८ ११४ प्रमाप्रमेयम् [१.१२१- -- सिद्धा' 1 पक्षे सर्वत्र प्रवर्तमानत्वात् न भागासिन्दा। पत्रे निश्चितत्वात नानातासिद्धाःन संदिग्यासिद्धाश्च । विपरीते निश्चिताविनाभावाभावात. ल विरुद्धा.। विपक्षे वृत्तिविरहितत्वात् नानकान्तिकाः। सपः सत्त्वात् जानध्यवसिताः। पक्षे साध्याभावावेटकप्रमाणाभावात् न कालात्यया- एदिष्टाः। स्वपटने सविस्पत्वात् परपये असत्निम्पत्वात् न प्रकरण- समाः। यथोक्तसाध्यसाधनानां जरपे सद्भावात न दृष्टान्तोऽपि साध्य- साधनोभयविक्लो नाश्रयहीनश्च। ततो निदुरेभ्यो हेतुभ्यः तत्त्वज्ञान- संरक्षणादीनां वाटे सद्भावसिद्धी तदुक्तसाधनानां व्यभिचार. सिद्धः। लोकप्रसिद्धविचारे तत्त्वज्ञानसंरक्षणादितदुक्तहेतृनामभावान् साधनशून्यं में पक्ष ( वाद) में विद्यमान है अत. व स्वरूपासिद्ध नहीं हैं तथा व्यधिकरणा सिद्ध भी नहीं हैं। यहा पक्ष प्रमाणों से ज्ञात है अत ये हेतु आश्रयासिद्ध नही हैं । पक्ष में सर्वत्र विद्यमान हैं अत वे भागासिद्ध नहीं हैं। पक्ष मे उन का होना निश्चित है अतः वे अज्ञातासिद्ध नहीं हैं तथा संदिग्धासिद्ध भी नहीं हैं । विपरीत पक्ष मे उन का अविनाभाव संबंध नहीं हैं यह निश्चित है अत. वे हेतु विरुद्ध नही हैं। विपक्ष में उन का अस्तित्व नहीं है अत वे अनेका- न्तिक नहीं हैं। सपक्ष में उन का अस्तित्व है अत वे अनव्यवसित नहीं हैं ! पक्ष मे साध्य का अभाव बतलानेवाला कोई प्रमाण नही है अत. ये हेतु कालात्ययापदिष्ट नहीं हैं। स्वपक्ष में इन के तीन रूप हैं (वे पक्ष हैं, सपक्ष हे तथा विपक्ष में नहीं है ) नथा विरुद्ध पक्ष में इन के तीन रूप नही है अत. वे प्रकरणसम नहीं है। पूर्वोक्त साध्य और साधन दोनों ही जल्प में विद्यमान हैं अत. जल्प का दृष्टान्त भी साध्यविकल, साधनविकल या उभयविकल नही है तथा आश्रयहीन भी नहीं है। इस प्रकार निर्दोष हेतुओं से बाद में तत्त्वज्ञान का सरक्षण करना आदि साध्यों का अस्तित्व सिद्ध होता है इसलिए उन के (नैयायिकों के) द्वारा प्रस्तुत साधन (हेतु) व्यभिचारी हैं (विपक्ष में भी पाये जाते हैं)। लोगों में प्रसिद्ध विचारविमर्श में तत्त्वज्ञान का सरक्षण करना आदि रक्त हेतु नहीं होते अत. उन का दृष्टान्त भी साधन विकल है। उन के द्वारा कहे गये हेतु बाद में भी पाये जाते है अतः उन का व्यतिरेक दृष्टान्त भी साधन-अव्यावृत्त है । अत. जल्प .

-१.१२२ वाद और जल्प में भेद नही ११५ - । च तनिदर्शनम्। वादे तदुक्कसाधनाना सद्भावात् साधनाव्यावृत्तो व्यतिरेकदृष्टान्तोऽपि । ततः कथं जल्पवितण्डयोविजिगीपुविषयत्वं न्यरू- रुपस्त्वम्॥ [१२२ वादजल्पयोः अभेदः ] किं च जल्पवितण्डे न विद्वद्गोष्ठीयोग्ये असत्साधनदूषणोपेतत्वात् कलहवत् । छलादयो वा न विद्वद्गोष्ठीयोग्या. असत्साधनदूषणत्वात् शापादिवत् । एतेन यदपि प्रत्युचिरे योगाः-वादो न विजिगीपुविषयः तत्त्वज्ञानसंरक्षणरहितत्वात् चतुरङ्गरहितत्वात् लाभपूजाख्यातिकामैः अप्रवृत्तविषयत्वात् समत्सरैरकृतत्वात् प्रतिवादिस्खलितमात्रापर्यवसान- त्वात् छलादिरहितत्वात् श्रीहर्पकथावत् , तथा वादः तत्त्वाध्यवसायसर- क्षणरहितादिमान् चतुरङ्गरहितादित्वात् श्रीहर्षकथावत् इति पूर्वपूर्व- और वितण्डा विजय के इच्छुको द्वारा किये जाते हैं (तथा वाद विजय के इच्छुकों द्वारा नहीं किया जाता - वीतरागों द्वारा किया जाता है) ऐसा निरूपण आपने किस प्रकार किया है (अर्थात ऐसा भेद करना प्रामाणिक नही है)। वाद और जल्प मे भेद नहीं है (नैयायिको द्वारा वर्णित ) जल्प और वितण्डा विद्वानों की चर्चा में प्रयुक्त होने योग्य नहीं है क्यो कि कलह के समान इन जल्प-वितण्डाओ में भी अनुचित साधन और दूपण प्रयुक्त होते है । छल आदि भी विद्वानो की चर्चा में प्रयुक्त होने योग्य नहीं हैं क्यो कि शाप आदि के समान ये छल आदि भी अनुचित साधन यां दूषण है। अतः नैयायिकों ने जो यह उत्तर दिया था कि वाद विजय की इच्छासे नही किया जाता, क्यों कि वह तत्त्वज्ञान का संरक्षण नहीं करता, चार अगों से सपन्न नहीं होता, लाभ, सत्कार या कीर्ति की इच्छा रखनेवालो द्वारा नहीं किया जाता, मत्सरी वादियो द्वारा नहीं किया जाता, प्रतिवादी की गलती होते ही समाप्त नहीं किया जाता, छल आदि से युक्त नहीं होता जैसे श्रीहर्प की कथा (वाद), तथा बाद तत्त्वज्ञान के सरक्षण से रहित होता है क्यों कि वह चार अगो से रहित होता है जैसे श्रीहर्ष की कथा (वाद) इस प्रकार जहां पहला कथन साध्य हो वहा वाद के कथन हेतु ११६ प्रमाप्रमेयम् [१.१२२- प्रसाध्यत्वे उत्तरोत्तरैकैकप्रसाध्यत्वे इतरं पञ्च हेतुत्वेन दृष्टच्या इति तन्निरस्तम्। उकसकलहेतुमालाया असिद्धत्वात् । कथमिति चेत् प्रागुक्त प्रकारेण वादे तत्त्वज्ञानसंरक्षणादीनां सद्भावसमर्थनात् । यच्चा- न्यत् प्रत्यवातिष्टिपित् तत् सकलहेतुसमर्थनार्थ वादः तत्त्वज्ञानसंर- क्षणरहितादिमान् अविजिगीपुविषयत्वात् तद्वदिति तदप्यसिद्धम् । तथा हि-वादो विजिगीपुविषयः सिद्धान्ताविरुद्धार्थविषयत्वात् स्वाभिप्रेतार्थ- व्यवस्थापनफलत्वात् विचारत्वात् पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहत्वात् नित्रहस्थान- चत्त्वात् परिसमाप्तिमत्कथात्वात् जल्पवदिति । यत्किंचिद् वादे निषिध्यते जरपे समर्थ्यते परैः तत्सर्वमेतैर्हेतुभिवादे समर्थनीयं जल्पे निषेधनीयम्। तथा जल्पो वीतरागविषयः सिद्धान्ताविरुद्धार्थविषयत्वात् स्वाभिप्रेतार्थ- व्यवस्थापनफलत्वात् विचारत्वात् पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहत्वात् निग्रहस्थान- के रूप में समझने चाहिये-यह (सब कथन हमारे उपर्युक्त प्रमाणों से) खण्डित हुआ क्यों कि उन की पूर्वोक्त हेतुओं की पूरी मालिका ही असिद्ध है। वह कैसे असिद्ध है इस प्रश्न का उत्तर है कि ( हमारे द्वारा) पहले बताये गये प्रकार से बाद में तत्त्वज्ञान का सरक्षण करना आदि सब बातों का अस्तित्व पाया जाता है इस का समर्थन होता है । नैयायिकों ने जो यह और कहा था कि बाद में तत्वज्ञान का सरक्षण करना आदि बातें नही होती क्यों के वह विजय की इच्छा से नहीं किया जाता-यह भी असिद्ध है ! जैसे कि- बाद विजय की इच्छा से किया जाता है क्यों कि वह सिद्धान्त से अविरोधी विषय के बारे में होता है, अपना इष्ट तत्त्व सिद्ध करना उस का 'फल होता है, वह विचारविमर्श के रूप में होता है, पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार कर के किया जाता है, निग्रहस्थानों से युक्त होता है, कथा की समाप्ति तक किया जाता है-इन सब बातों में वह जल्प के समान है। इस प्रकार प्रतिपक्षी (नैयायिक) बाद में जिन बातों का निषेध करते हैं (अभाव बतलाते हैं) तथा जल्प में उन बातों का समर्थन करते हैं उन सबका उपर्युक्त हेतुओं द्वारा वाद में समर्थन तथा जल्प में निषेध करना चाहिये। जैसे कि- जल्प वीतरागों द्वारा किया जाता है क्यों कि वह सिद्धान्त से अविरोधी विषय के बारे में होता है, अपने इष्ट तत्त्व को सिद्ध करना यह उस का फल होता आगम -१.१२३] ११७ वरवात् परिसमाप्तिमत्कथात्वात् वाडवदिति । एवं वादजल्पयोः सदृक्- साधनदूषणत्वात् अविशेषेण वीतरागविजिगीपुविषयत्वाच्च संभाषणं यादः संजल्पः विचारः कथा उपन्यास इत्यनन्तरम् । तथा हि गृहीत विपक्षं प्रति युक्त्या संभाप्यत इति संभाषणं, विप्रतिपन्न प्रति युक्त्या स्वाभिप्रेतार्थवदनं वादः, तथा जल्पनं जल्पः, तेषां धात्वर्थप्रत्ययार्थयोः मेदाभावादमेद एव । तथा विचारणं विचार', कथनं कथा, उपन्यसनम् उपन्यास इति च । इत्यनुमानप्रपञ्चः ॥ [१२३. आगमः] आप्तवचनादिजनितपदार्थज्ञानम् आगमः ।यो यत्राभिज्ञत्वे सत्य वञ्चकः स तत्राप्तः। तद्वचनमपि ज्ञानहेतुत्वादागम एव । ततो जातं तत्त्वयाथात्म्यज्ञानं भावश्रुतम्। तत्वयाथात्म्यप्रति पादकं वचनं द्रव्यश्रुतम् । है, वह विचारविमर्श के रूप में किया जाता है, पक्ष और प्रतिपक्ष स्वीकार कर के किया जाता है, निग्रहस्थानों से युक्त होता है तथा कथा की समाप्ति तक किया जाता है-इन सब बातों में वह वाद के समान है। इस प्रकार वाद और जल्प दोनों में सावन और दुषण समान हैं, दोनों समान रूप से वीतराग- विषय तथा विजिगीविषय हैं (विजय की इच्छासे या उस के विना किये जाते हैं ), अत' वाद, सभाषण, संजल्प, विचार, कथा, उपन्यास ये सब एकार्थक शब्द हैं । जिससे विरुद्ध पक्ष लिया है उस से युक्तिपूर्वक बोलना यही संभाषण है, विरुद्ध पक्ष के वादी को युक्तिपूर्वक अपनी इष्ट बात बतलान यही वाद है, जल्पन (बोलना ) यही जल्प हैं, इन सब शब्दो में धातु कत अर्थ तथा प्रत्यय का अर्थ इन दोनो में कोई भेद नही है अतः उन शब्दों के यर्थ में भी कोई भेद नहीं है । इसी प्रकार विचारण, विचार, कथन, कथा, उपन्यसन, उपन्यास ये भी एकार्थक शब्द हैं । इस प्रकार अनुमान का विस्तृ कथन पूर्ण हुआ। आगम आप्त के वचन आदि से उत्पन्न हुए पदार्थों के ज्ञान को आगम कहते है | जो जिस विषय को जानता हो तथा अवश्चक हो (- धोखा न देता हो- सत्य बोलता हो) वह उस विषय के लिए आप्त होता है। आप्त के ११८ प्रमाप्रमेयम् [१.१२४- तबाहाङ्गवाह्यमे देन द्विया। तत्राझं द्वादशविधम्। आचाराई सूत्रकृताई स्थानाङ्गं समवायाझं व्याख्याप्रत्रप्त्यङ्गं नातकथाङ्गम् उपासकाध्ययनाङ्गम् अन्तकृदशाङ्गम् अनुत्तरोपपादकदशाङ्ग प्रश्नव्याकरणाझं -विपाकसूत्रानं. दृष्टिवादाङ्गमिति द्वादशाङ्गानि । तत्र दृष्टिवादाने परिकर्मसूत्रप्रथमानुयोग- पूर्वचूलिका इति पञ्चाधिकाराः । तत्र पूर्वाधिकारे उत्पादपूर्व-अग्रायणीय- चीर्यानुप्रवाद - अस्तिनास्तिप्रवाद - ज्ञानप्रवाद- सत्यप्रवाद-आत्मप्रवाद- कर्मप्रवाद - प्रत्याख्यान -विद्यानुवाद-कल्याण-प्राणावाय-क्रियाविशाल- लोकविन्दुसार-पूर्वाश्चेति चतुर्दश पूर्वाधिकाराः। अगवाह्ये सामायिक- चतुर्विशतिस्तव - वन्दना-प्रतिक्रमण-वैनयिक कृतिकर्म-दशवैकालिक- उत्तराध्ययन-कल्प-व्यवहार-कल्पाकल्प-महाकल्प-पुण्डरीक-महापुण्उ- रीक-अशीतिका-प्रकीर्णकानीति चतुर्दशाधिकाराः॥ [१२४. आगमाभासः] अनातवचनादिजनितमिथ्याज्ञानमागमाभासः। अज्ञानदुवाभिप्राय- चाननाप्त । तद्वचनमप्यागमाभास एव । सर्व दुःखं सर्व क्षणिकं सर्व वाक्यों को भी आगम ही कहते हैं क्यों कि वे वाक्य आगमज्ञान के कारण हैं (वाक्य शब्दों से बने हुए अतएव जड हैं, वे प्रमाण नही हो सकते, किन्तु आगम-ज्ञान के कारण होने से उन्हें उपचार से आगम-प्रमाण कहते हैं ) उन से उत्पन्न तत्त्वों का वास्तविक ज्ञान भाव-श्रुत कहलाता है। तत्वों के वास्तविक स्वरूप को बतलानेवाले वाक्य द्रव्य-श्रुत कहलाते हैं। द्रव्यश्रुत के दो प्रकार हैं - अग तथा अंगवाह । अंगों के बारह प्रकार हैं - आचारांग से दृष्टिवाद अंग तक वे बारह अग हैं (नाम मूल में गिनाये हैं)। दृष्टिबाद अंग में पाच अधिकार (विभाग) हैं - परिकर्म, सूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्व तथा चूलिका । इन में से पूर्व-अविकार के चौदह भाग है - उत्पाद पूर्व लोकबिन्दुसार तक (जो मूल में गिनाये हैं) चौदह पूर्व हैं। अगबाह्य के चौदह अविकार हैं-सामायिक से प्रकीर्णक तक (नाम मूल में गिनाये हैं)। आगमाभास अनाप्त के वाक्य आदि से उत्पन्न मिथ्या ज्ञान को आगमाभास कहते हैं । जो अज्ञान तथा दूषित अभिप्राय से युक्त हो वह अनाप्त होता है। उस. । i --१.१२५] आगमाभास ११९ निरात्मकं सर्व शून्यमित्यादि । प्रकृतेमहांस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गुणश्च घोडशकः । तस्मादपि पोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्च भूतानि ॥ इत्यादि । अलानि मञ्जन्ति, ग्रावाणः 'लवन्ते, अन्धो मणिमविन्धत् , तमनगुलि- रावयत् , उत्ताना वै देवगवा वहन्ति इन्यादि । इति परोक्षप्रपञ्चः। इति भावप्रमाणनिरूपणम् ॥ [१२५. करणप्रमाणम्-द्रव्यप्रमाणम् ] करणप्रमाणं द्रव्यक्षेत्रकालभेदेन त्रिविधम् । तत्र द्रव्यप्रमाणमिन्द्रि- यार्थतत्संबन्धहेतुदृष्टान्तव्याविशब्दार्थसंकेतादय मानोन्मानावमान 'प्रतिमानतत्प्रतिमानगणनामानानि । तत्रं मानं पोडशिका-अर्धमान- मानसिद्धप्रस्थादि । उन्मानं वासुछिन्नवर्तिकातुलादि । अवमानं चतुर झुलचुलुकपाणे पुटप्रभाते । प्रतिमानं गुजाकपर्दिकाकडिलादि । तत्- के वाक्यों को भी आगमाभास ही कहते है। (जगत में) सब दु.ख है, सब क्षणिक है, सब निरात्मक है, सब शून्य है आदि वाक्य आगमाभास है। प्रकृति से महान् , महान् से अहकार, अहंकार से सोलह (तत्त्वा) का समूह तथा उन सोलह में से पाच (तन्मात्रों) से पाच भूत (व्यक्त होते) हैं आदि वाक्य आगमाभास हैं । तूबी डूबती है, पत्थर तैरते हैं, अधेने रत्न को बींधा, उस में बिना अगुली के मनुष्य ने धागा पिरोया, देवों की गायें उलटी बहती हैं आदि वाक्य आगमाभास है । इस प्रकार परोक्ष प्रमाणों का और उसके साथ भाव प्रमाण का वर्णन पूर्ण हुआ। करणप्रमाण-द्रव्यप्रमाण करण प्रमाण के तीन प्रकार हैं - द्रव्यप्रमाण, क्षेत्रप्रमाण तथा काल प्रमाण । इन्द्रिय और पदार्थ तथा उन के सम्बन्ध के हेतु और दृष्टान्तोंपर आधारित शब्द और अर्थ के सकेत आदि को द्रव्यप्रमाण कहते है। उस के भेद इस प्रकार हैं,- मान, उन्मान, अवमान, प्रतिमान, तत्प्रतिमान तथा गणनामान । षोडशिका, अर्धमान, मान, सिद्धप्रस्थ आदि मान (धान्यमार) के प्रकार हैं । त्रासु, छिन्न, वर्तिका, तुला आदि उन्मान (तौल ) के प्रकार । चार अगुल, चुल्लू, अजलि आदि अवमान के प्रकार हैं । गुजा, कौडी, १२० प्रमाप्रमेयम् [१.१२६- प्रतिमानं कय्यपदार्थस्य मूत्यं काकिणीविंशत्रिशार्धपादपादपणनिष्कादयः गणनामानं संख्यातासंरयातानन्तभेदात् त्रिधा । तत्र संख्यातं जघन्य- मध्यमोत्कृष्टभेदात् त्रिविधम् । असंख्यातमनन्तं च परिमितयुद्विकचार- भेदात् त्रिविधम् । तत्प्रत्येकं जघन्यमध्यमोत्साभेदात् विविधमिति गणनामानम् एकविंशतिभेदभिन्नम् । लिहितसाभिमुक्तिस्थापित- पापाणादयश्च ॥ [१२६ क्षेत्रप्रमाणम् ] क्षेत्रप्रमाणम् -उत्तममध्यमजघन्यभोगभृकर्मभृजशिरोरुहेलक्षतिलय- पाशुलान्यागुणितानि। द्वादशाहगुलैः वितस्तिः। बितस्तिभ्या कहिला आदि प्रतिमान (बाट) के प्रकार हैं। खरीदनेयोग्य पदार्थ के मूल्य को तत्प्रतिमान कहते है, जैसे काकिणी, विश, त्रिंग, अर्धपाद, पाद, पण, निष्क आदि । गणनामान के तीन प्रकार हैं - संख्यात, असंख्यात और. अनन्त ! सख्यात के तीन प्रकार है - जवन्य, मध्यम और उत्कृष्ट । असं- ख्यात और अनन्त के तीन-तीन प्रकार है - परिमित, युक्त तथा द्विरुक्त (परिमित असंख्यात, युक्त असख्यात, असख्यात असख्यात, परिमित अनन्त, युक्त अनत, अनत अनत)। इन में प्रत्येक के जवन्य, मध्यम और उत्कृष्ट ये तीन-तीन भेट होते हैं । इन सत्र को मिलाकर गणनामान के इक्कीस प्रकार हैं । इस के अतिरिक्त लिखित (दस्तावेज), साक्षी, अधिकारी आदि द्वारा स्थापित (सीमा बतानेवाले) पत्थर आदि का भी द्रव्यप्रमाण में. समावेश होता है। क्षेत्रप्रमाण क्षेत्रप्रमाण की गणना इस प्रकार है - उत्तम भोगभूमि, मध्यम भोग-- भूमि, जघन्य भोगभूमि, तथा कर्मभूमि के मनुष्यों के सिर के केश की चौडाई आठ आठ गुनी है। कर्मभूमि के मनुष्य के सिर के केश की चौडाई के आठगुना १ लक्ष होता है । आठ लक्षों का १ तिल होता है। r .. -- -१.१२७] कालप्रमाण १२१ हस्तः । चतुर्हस्तैः दण्डः। द्विसहस्त्रदण्डैः क्रोशः। चतुकोशैः योजनम् इत्यादि। [१२७. कालप्रमाणम् ] कालप्रमाणम्-असंरयातसमयः आवलिः। संरयातावलिसमूहैरु-- च्वास सोच्छ्वासै. स्तोकः । सस्तोकैः लवः । साष्टत्रिशल्लवैः यटिका । घटिकाभ्यां मुहूर्त । त्रिंशन्मुहूतैः दिनम्। पञ्चदशदिनैः पक्षः। पक्षाभ्यां मासः। मासाभ्याम् ऋतुः। त्रिऋतुभिः अयनम् । अयनाभ्यां संवत्सरः। पञ्चसंवत्सरैः युगम् । द्वादशयुगै मण्डलम्। चत्वारिंशत्- सहस्राधिक्लक्षमण्डलैः पूर्वाह्नम् । पूर्वाह्नवर्गः पूर्वम् इत्यादि ।। [१२८. उपमानप्रमाणम् ] उपमानप्रमाणं क्षेत्रप्रमाणं कालप्रमाणं च भवति। तद् यथा पल्योपमसागरोपमसूच्यगुलप्रतराष्द्गुलघनाङ्गुलजगच्छ्रेणीजगत्प्रतरलोका ८ तिल = १ यव, ८ यव = १ अगुल; १२ अंगुल = १ वितरिता २ वितस्ति = १ हस्त; ४ हस्त = १ दंड; २००० दण्ड = १ कोश, तथा ४ क्रोश = १ योजन होता है। काल प्रमाण काल प्रमाण की गणना इस प्रकार है-असंख्यात समय = १ आवलि; सख्यात आवलि = १ उच्छ्वास; ७ उच्छ्वास = १ स्तोक; ७ स्तोक = १ टव, ३८३ लव = १ घटिका, २ घटिका = १ मुहूर्त, ३० मुहूर्त = १ दिन १५ दिन - १ पक्ष, २ पक्ष = १ मास, २ मास = १ ऋतु; ३ ऋतु = अयन, २ अयन = १ संवत्सर; ५ संवत्सर = १ युग; १२ युग = १ मंडल, १ लक्ष ४० हजार मंडल = पूर्वीग, पूर्वीग x पूर्वांग = १ पूर्व ।। उपमान प्रमाण उपमान प्रमाण दो तरह का है-क्षेत्र प्रमाण तथा काल प्रमाण । इस के आठ प्रकार हैं -पल्योपम, सागरोपम, सूच्यंगुल, प्रतरांगुल, धनागुल, जगच्छ्रेणी, जगत्प्रतर तथा लोक । इस में पल्य के तीन भेद हैं-व्यवहारपल्य,, १२२ प्रमाप्रमेयम् [१.१२८- इत्यष्टप्रकाराः। तत्र पल्यं व्यवहार- उद्धार -बहारमेटेन त्रिविधम् । यथाक्रम संख्याद्वीपसमुद्रकर्मस्थितिव्यवस्थापकम्। प्रमाणयोजनोत्सेध- विस्तारवृत्तगर्ते उत्तमभोगभूमिजाजकेशान् समखण्डान् शिखां परिहार्य वर्षशतान्ते एकैकापनयने यावत्कालेन परिसमाप्तिः तावत्कालसमय- संख्या व्यवहारपल्यम्। व्यवहारपल्यकेशानसंख्यातखण्डान विधाय तथापनयने तत्काले समयसंस्था उद्धारपत्यम्। उद्धारपल्यकेशान- संख्यातखण्डान् विधाय तथापनयने तत्कालसमयसंख्या अद्धारपल्यम्। पल्यानां संदृष्टिः । प। पतेपां पल्यानां दशकोटिकोटिसंख्या सागर । तस्य संदृष्टिः। स । पल्यछेदनामात्रपल्यानामन्योन्याभ्यासे सूच्यंगुलम् । तस्य संदृष्ठिः।२। सूच्यंगुलस्य वर्ग. प्रतरांगुलम्। तस्य संदृष्टिः।। उद्धारपल्य तथा अद्धारपल्य । इन तीनों का उपयोग क्रमशः संख्या, द्वीप- समुद्र तथा कर्मस्थिति के विषय में होता है । एक प्रमाण योजन ऊंच और. उतने ही व्यास के गोल गढे में उत्तम भोगभूमि में उत्पन्न हुए बकरे के समस्त केशों के बहुत बारीक टुकडे कर के समतल भर दिये जायें तथा एक एकसी वर्ष वाढ एक एक टुकडा निकाला जाय तो जितने समय बाद वह केश समाप्त होंगे उतने समय को एक व्यवहारपल्य कहते हैं। व्यवहारपल्य के केशों के असंख्यात टुकडे कर के उसी प्रकार (सौ सौ वर्ष बाद एक एक टुकडा निकाल कर ) जितने समय में वे केश समाप्त होंगे उतने समय को एक उद्धारपल्य कहते हैं । इस उद्धारपल्य के केशों के असंख्यात टुकडे कर उसी प्रकार (सौ सौ वर्ष बाद एक एक टुकडा) निकालने पर जितने समय में वे समाप्त होंगे उतने समय को एक अद्धार पल्य कहते हैं। (ग्रन्यों में उदाहरणों आदि में ) पल्य के लिए । प | यह संदृष्टि (प्रतीक) उपयोग में आती है । दप कोटि - कोटि पल्यों का एक सागर होता है। सागर का प्रतीक । स ! यह होता है । एक पल्य के जितने अब छेद होते हैं उतने "पल्यों का-परस्पर गुणाकार करने से एक सूच्चंगुल होता है उस का प्रतीक तस्य - ~१.१२९] दूसरे प्रमाणों का समावेश १२३ सूच्यंगुलस्य धनो धनांगुलम् । तस्य संदृष्टिः।६। पल्यछेदनानामसंख्या- तैकभागमात्रे घनांगुलानामन्योन्याभ्यासे जगच्छ्रेणिः । तस्य संदृष्टिः।-! जगच्छेणेः वर्नो जगत्प्रतरः । तस्य संदृष्टिः । = । जगच्छेणेः घनो लोकः। तस्य संदृष्टिः ।। जगच्छृणेः सप्तमभागो रज्जुः । संदृष्टिः। ॥ [१२९. प्रमाणान्तराभावः ] अथ उपमानार्थापत्त्यभावप्रमाणानि निरूपणीयानीति चेत् तत्सर्व 'निरूपितमेव । तत् कथम् । गोसदृशोऽयं गवयः, अनेन सदृशी मदीया गौ., इत्युपमानस्य सादृश्यप्रत्यभिज्ञानेन, नदी पूराद्यर्थापत्तेः अनुमानत्वेन- अभावप्रमितेः प्रतियोगिकग्राहकप्रमाणत्वेन निरूपणात् ।। १२। है । सूच्यंगुल का वर्ग प्रतरागुल कहलाता है उसका प्रतीक । ४ । है । -सूच्यंगुल का घन घनागुल कहलाता है उस का प्रतीक 1६। है। पल्य के छेदों के असंख्यातवें एक भाग में घनागुलों का परस्पर गुणाकार करने से जगत श्रेणी प्राप्त होती हैं । इस का प्रतीक 1 - 1 है । जगत्श्रेणी का वर्ग जगत्प्रतर होता है उस का प्रतीक | - 1 होता है । जगत् श्रेगी का धन लोक होता है । उस का प्रतीक । । है । जगत् श्रेणी के सातवे भाग को रज्जु कहते हैं । उस का प्रतीक | 11 होता है । दूसरे प्रमाणों का समावेश यहां उपमान, अर्थापत्ति तथा अभाव इन प्रमाणों का भी वर्गन करना चाहिये ऐसा कोई कहें तो उत्तर यह है कि इन का वर्णन पहले हो चुका है। यह गवय गाय जैसा है, मेरी गाय इस जैसी है आदि उपमान प्रमाण का सादृश्य प्रत्यभिज्ञान में अन्तर्भाव किया है। नदी को बाढ आई है अत. ऊपर वर्षा हुई होगी आदि अर्थापत्ति प्रमाण का अनुमान में अन्तर्भाव किया है । अभाव की प्रमिति तथा प्रतियोगी वस्तु के ग्रहण करने वाले प्रत्यक्ष में कोई भेद नहीं है । इस तरह उपमान, अर्थापत्ति एवं अभाव ये पृथक् प्रमाण - नहीं हैं। ।

१२४ प्रमाप्रमेयम् [१.१३०-- - [१३०, उपसंहारः] भावलेनत्रिविद्यार्यो वादिपर्वतवज्रभृत् । सिद्धान्तसारशास्त्रेऽस्मिन् प्रमाणं प्रत्यपीपदत् ॥ १०२॥ इति परवादिगिरिसुरेश्वरश्रीमद्भावसेनत्रैविद्यदेवविरचिते सिद्धा- न्तसारे मोसशाचे प्रमाणनिरूपणं नाम प्रथमः परिच्छेदः ।। वादी रूपी पर्वतों के लिए इन्द्र के समान भावसेन त्रिविद्यार्य ने इस सिद्धान्तसार शास्त्र में प्रमाण का प्रतिपादन किया। इस प्रकार प्रतिपक्ष के वाढीरूपी पर्वतों के लिए इन्द्र सदृश श्रीभावसेन" विद्यदेव द्वारा रचित सिद्धान्तसार मोक्षशास्त्र का प्रमाणनिरूपण नामक पहला परिच्छेद समाप्त हुआ । , - तुलना और समीक्षा प्रमाण का लक्षण (परि०२) तर्कशास्त्र के प्रारम्भिक युग में प्रमाण शब्द का उपयोग किसी लक्षण के बिना ही किया गया है । न्यायसूत्र' तथा जैन आगमों के' उल्लेख इसी प्रकार के हैं । वात्स्यायन, उमास्वाति तथा पूज्यपाद ने प्रमाण शब्द की व्युत्पत्ति वतलाई है । समन्तभद्र ने स्व तथा पर को जाननेवाली बुद्धि को प्रमाण कहा है तथा एकसाय सब को जाननेवाला सर्वज्ञ का ज्ञान और क्रमशः होनेवाला स्याद्वाद-संस्कृत ज्ञान ये उस के प्रकार बतलाये हैं। सिद्ध- सेन ने प्रमाण के लक्षण में स्व-पर के ज्ञान में वावा न होना इस विशेषता का समावेश किया है। बौद्ध आचार्यों के प्रमाण-लक्षण में अविसंवादि ज्ञान: इस शब्दप्रयोग द्वारा इसी बाधा न होने की विशेषता को स्वीकार किया गया है । मीमांसक आचार्यों ने उस ज्ञान को नमाण माना है जो किसी नये (अथवा अज्ञात = अगृहीत =अपूर्व) पदार्थ को जानता हो१० | अकलंक विद्यानन्द तथा माणिक्यनन्दि ने उपर्युक्त लक्षणों का समन्वय करते हुए स्व १. न्यायसूत्र १-१-१ तथा १-१-३ । २. अनुयोगद्वारस्त्र (स. १३१) इत्यादि । ३. न्यायभाष्य १-१-३।प्रमीयते अनेनेति करणार्याभिधानो हि प्रमाणशब्दः। "४. तत्त्वार्थभाष्य १.१२ प्रमीयन्ते अर्था. तैः इति प्रमाणानि । ५. सर्वार्थसिद्धि १-१२ प्रमिणोति प्रमीयते अनेन प्रमितिमात्रं वा प्रमाणम्। ६. स्वयम्भूम्तोत्र ६३।स्वपरावभासकं यथा प्रमाण भुवि बुद्धिलक्षणम् । ७. आप्तमीमासा १०१तत्त्वज्ञान प्रमाण ते युगपत् सर्वभासनम् । क्रमभावि च. यज्ञानं स्याद्वादनयसंस्कृतम् ॥ ८. न्यायावतार १। प्रमाण स्वपराभासि ज्ञानं वाधविवर्जितम् । ९. प्रमाणवार्तिक २-१ प्रमाणमविसवादि ज्ञानम् । १०. मीमासाश्लोक वार्तिक में कुमारिलः तत्रापूर्वार्थविज्ञान निश्चितं वाधव. र्जितम् । अदुष्टकारणारब्धं प्रमाण लोकसंमतम् ।। १२५ १२६ प्रमाप्रमेयम् १ तथा अपूर्व अर्थ का निश्चय करनेवाले ज्ञान को प्रमाण कहा है। । हेमचन्द्र ने अपूर्वार्थग्रहण विशेषण को अनावश्यक समझ कर वस्तु का यथार्थ निर्ण यही प्रमाण का लक्षण माना है। आचार्य भावसेन का पदार्थयाथात्म्य- निश्चय यह लक्षण भी इसीका अनुसरण करता है। नैयायिक विद्वानों ने प्रमाणशब्द की व्युत्पक्ति को ही लक्षण का रूप देने की पद्धति अपनाई है। इस में प्रमा का साधन प्रमाण होता है अत' ज्ञान के साथ साथ इन्द्रिय और पदार्थों के सम्बन्ध को भी प्रमाण कहा जाता है। प्रमाण शब्द के रूढ अर्थ में विश्वसनीयता का अश महत्त्वपूर्ण है - विश्वासयोग्य ज्ञान को ही प्रमाणभूत समझा जाता है । बौद्ध और जैन आचार्यों के लक्षण इस अर्थ के अनुकूल | इस पक्ष में प्रमाणशब्द का भावरूप अर्थ प्रमुख है। नैयायिक, विद्वान प्रमाण शब्द के साधन रूप अर्थ पर जोर देते हैं। प्रमाणों के प्रकार (परि० २) भावसेन ने प्रमाण के दो प्रकार बतलाये हैं - भावप्रमाण तथा करण प्रमाण; एव करण प्रमाण के तीन भेदो का (द्रव्य, क्षेत्र, काल ) ग्रन्थ के. अन्तिम भाग (परि. १२५-२७) में वर्णन किया है। इन चार भेदों का एकत्रित उत्लेख अनुयोगद्वारसूत्र में मिलता है किन्तु वहां भाव तथा करणा यह वर्गीकरण नहीं पाया जाता। हैं । १. अष्टसहस्त्री पृ १७५ । प्रमाणमविसवादि जानमनधिगतार्थाधिगम- लक्षणत्वात् । परीक्षामुख १-१ स्वापूर्वार्थ व्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्। २. प्रमाणमीमासा १-१-२ सम्यगर्थनिर्णयः प्रमाणम्। ३. न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका पृ. २१ प्रमासाधन हि प्रमाणम् । न्यायसार पृ २रा सम्यगनुभवसाधन प्रमाणम् | तर्कभाषा पृ. १। प्रमाकरण प्रमाणम् । न्यायमंजरी पृ. १२। अव्यभिचारिणीमसन्दिग्धामोपलब्धि विदधती बोघा- वोघस्वभावा सामग्री प्रमाणम् । इस परम्परा में उल्लेखनीय अपवाद उदयन का है, उन्होने यथार्थ अनुभव को प्रमाण कहा है (यथार्थानुभवो मानम्-न्यायकुसुमांनलि प्र.४श्लो.१)। ४. सूत्र १३१ से किंत पमाणे । पमाणे चउविहे पण्णत्ते, तं बहा दश्वपमाणे खेत्तपमाणे कालपमाणे भावपमाणे ।

तुलना और समीक्षा १२७. प्रत्यक्ष से भिन्न सभी प्रमाणो का परोक्ष इस संज्ञा में अन्तर्भाव करना यह जैन प्रमाणशास्त्र की विशेषता है । प्राय. सभी जैन आचार्यों ने इस का समर्थन किया है । अन्य दर्शनों में यह संज्ञा नही पाई जाती। अन्य दर्शनो मे प्रमाणों के प्रकारों की जो मान्यताएं हैं उन का सग्रहः निम्नलिखित श्लोक में मिलता है, चार्वाकोऽध्यक्षमेकं सुगतकणभुजौ सानुमानं सशाब्द तद्द्वैत पारमर्षः सहितमुपमया तत्त्रय चाक्षपादः । अर्थापत्त्या प्रभाकृद् वदति स निखिलं मन्यते भट्ट एतत् साभाव द्वे प्रमाणे जिनपतिसमये स्पष्टतोऽस्पष्टतश्च ।। अर्थात - चार्वाक एक प्रत्यक्ष ही प्रमाण मानते हैं, बौद्ध और वैशेपिक प्रत्यक्ष और अनुमान ये दो प्रमाण मानते है, साख्य प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण मानते हैं, नैयायिक इन तीनों में उपमान प्रमाण और जोडते हैं, प्राभाकर मीमांसक इन चारों के साथ अर्थापत्ति पाचवां प्रमाण मानते हैं और भाट्ट मीमांसक इन पाच मे अभाव यह छठा प्रमाण जोडते हैं, जैन मत में सब प्रमाण स्पष्ट ( प्रत्यक्ष ) और अस्पष्ट (परोक्ष) इन दो भेदों में समाविष्ट हो जाते हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण ( परि० ३) प्राचीन आगमों के अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण वह है जिस में केवल (इन्द्रियों की तथा मन की सहायता के विना ही) आत्मा को पदार्थों का ज्ञान होता है । इस लिए अवधि, मन पर्यय तथा केवल इन तीन ज्ञानों को ही वे प्रत्यक्ष कहते हैं तथा इन्द्रियों और मन से होनेवाले मति और श्रुत इन १. नन्दीसूत्र (स. २) तं समासो दुविह पण्णत्तं तं नहा पच्चक्खं च: परोक्खं च ॥ तत्त्वार्यस्त्र अ. १ ९ ११, १२ । आद्ये परोक्षम् ।. प्रत्यक्षमन्यत् । इत्यादि । २. यह श्लोक न्यायावतार टिप्पन (पृ ९-१०) में उद्धृत ३. प्रवचनसार गा. ५८ नं परदो विण्णाणं तं तु परोक्ख ति भणिदमद्वेसु ।' नदि केवलेण णाद वदि हि जीवेण पच्चक्ख ॥

१२८ प्रमाप्रमेयम् -दोनों ज्ञानों को परोक्ष कहते हैं । सिद्वसेन ने जो परोक्ष नही है उसे प्रत्यक्ष कहा है- प्रत्यक्ष की विधिरूप व्याख्या नहीं की है। आगमों की दूसरी परम्परा के अनुसार जब इन्द्रियों और मन से प्राम ज्ञान को व्यवहारतः प्रत्यक्ष माना गया तव प्रत्यक्ष के लक्षण में परिवर्तन जरूरी हुआ । अकलंकदेव ने विशद अथवा स्पष्ट ज्ञान को प्रत्यक्ष कहा तथा उसे साकार यह विशेषण भी दिया । विशद का स्पष्टीकरण करते हुए कहा गया कि जिस ज्ञान के लिए कोई दूसरा ज्ञान आधारभूत नहीं होता वह विशद अर्थात प्रत्यक्ष है"-स्मृति आदि ज्ञानो के लिए पूर्ववर्ती प्रत्यक्ष ज्ञान आधारभूत होता है इस लिए वे परोक्ष हैं । भावसेन का प्रत्यक्ष लक्षण भी इस व्याख्या के अनुरूप है । न्वायसूत्र मे प्रत्यक्ष उसे कहा गया है जो इन्द्रिय और पदार्थ के सम्बन्ध से उत्पन्न, शब्द योजना से पूर्ववर्ती, यथार्थ तथा निश्चयात्मक ज्ञान होता है । किन्तु इस में योगिप्रत्यक्ष तथा मानसप्रत्यक्ष का समावेश नहीं हो - सकता । इस लिए वात्स्यायन ने इस सूत्र के इन्द्रिय शब्द मे मन का अन्त- र्भाव करने का प्रयत्न किया है । भासर्वज्ञ ने सम्यक अपरोक्ष अनुभव साधन को प्रत्यक्ष कहा है। . के । १. तत्त्वार्थस्त्र अ. १ मू. ९-१२। मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि जानम् । तत्प्रमाणे । आधे परोनम् । प्रत्यक्षमन्यत् । २. न्यायावतार श्लो. ४ । अपरोक्षतवार्थस्य ग्राहकं ज्ञानमीदृशम् । प्रत्यक्ष- मितरग्नेयं परोक्षं ब्रहणेक्षया ।। ३. न्यायविनिश्चय श्लो. ३ । प्रत्यक्षलक्षणं प्राहुः स्पष्टं साकारमञ्जसा । ४. परीक्षामुख २-४ । प्रतीत्यन्तराव्यवधानेन विशेषवत्तया वा प्रतिभासनं वैशद्यम् । न्यायसूत्र १-१-४] इन्द्रियार्थसन्निकर्षीत्पन्न ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यमिचारि व्यवसायात्मक प्रत्यक्षम् । ६. न्यायमाष्य १-१-४ । आत्मादिषु सुखादिषु च प्रत्यक्षलक्षणं वक्तव्यम् ...मनसश्चेन्द्रियभावात् तन्न वाच्यं लक्षणान्तरमिति । "७, न्यायसार पृ. ७ सम्यगपरोक्षानुभवसाधन प्रत्यक्षम् !

तुलना और समीक्षा १२९ बौद्ध आचार्यों ने शब्दयोजना से पूर्ववर्ती निर्विकल्प ज्ञान को ही प्रत्यक्ष माना है। जैन आचार्यों का इस विषय मे यह मत है कि वस्तु के निर्जीवकल्प ग्रहण को दर्शन कहा जाय-ज्ञान नहीं। वह ज्ञान ही नही होता अतः प्रमाण भी नही हो सकता । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के खण्डन के लिए भावसेन ने विश्वतत्त्वप्रकाश में एक परिच्छेद (८९) लिखा है । प्रत्यक्ष प्रमाण के प्रकार (परि० ३-९) आगमों की प्राचीन परम्परा मे अवविज्ञान, मन.पर्यायज्ञान तथा केवलज्ञान इन तीन प्रकारों में प्रत्यक्षप्रमाण का विभाजन मिलता है। इस का अनुसरण कुन्दकुन्द और उमास्वाति ने किया है । ये तीनों ज्ञान अती- न्द्रिय हैं । इस परम्परा के अनुसार इन्द्रिय और मन द्वारा होनेवाले समस्त ज्ञान परोक्ष हैं । आगमों में मिलनेवाली दूसरी परम्परा के अनुसार उक्त तीन ज्ञानों को नोइन्द्रियप्रत्यक्ष कहा है तथा स्पर्शनादि पाच इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान को इन्द्रियप्रत्यक्ष कहा है। उक्त विरोध को दूर करने के लिए जिनभद्रगणी ने इन्द्रियप्रत्यक्ष को सव्यवहारप्रत्यक्ष कहते हुए अवधि आदि ज्ञानों को मुख्य प्रत्यक्ष कहा है | अकलकदेव ने प्रत्यक्ष के तीन प्रकार किये हैं - इन्द्रिय- प्रत्यक्ष, अनिन्द्रियप्रत्यक्ष (स्मृति, प्रत्यभिज्ञा, तर्क और अनुमान ये ज्ञान जब तक शब्दाश्रित नही होते तब तक मन द्वारा प्रत्यक्ष जाने जाते हैं) तथा अती- न्द्रिय प्रत्यक्ष (अवधि आदि तीन ज्ञान )५ । इन में प्रथम दो प्रकारों को १. प्रत्यक्ष कल्पनापोढमभ्रान्तम् (न्यायविन्दु ४) २. ये मूल उल्लेख ऊपर उद्धृत कर चुके हैं। ३. अनुयोगद्वारसूत्र (सू १४४)। पच्चवखे दुवि हे पण्णत्ते । त जहा इंदिय- पच्चक्खे अ गोइंदियपच्चक्खे अ। से कि त इंदियपच्चक्खे । इदियपच्चक्ख पंचविहे पण्णत्ते । त जहा-सोइंदियपच्चक्खे चवखु- रिदियपच्चक्खे धागिदियपच्चक्खे जिभिदियपच्चक्खे फार्सिदिय- पच्चरखे। .. गोइंदियपच्चक्खे तिविहे पण्णत्ते । त जहा-ओहिणाण पच्चक्खे मणपज्जवणाणपच्चरखे केवलण,णपच्चक्खे । ४. इदियमणोभवं ज त सववहारपच्चक्ख । विशेषावश्यक भाष्य गा, ९५ ५. प्रमाणसग्रह श्लो. १। प्रत्यक्ष विशद ज्ञान तत्वज्ञान विशदम् । इन्द्रिय- प्रत्यक्षमनिन्द्रियप्रत्यक्षमतीन्द्रियप्रत्यक्ष त्रिधा । प्र.प्र.९ १३० प्रमाप्रमेयम् उन्हों ने भी संव्यवहारप्रत्यक्ष कहा है | बाद के आचार्यों ने मुख्य तथा सव्यवहार प्रत्यक्ष का यह वर्गीकरण मान्य किया है किन्तु स्मृति आदि को उन्हों ने अनिन्द्रियप्रत्यक्ष नहीं माना है । भावसेन ने प्रत्यक्ष प्रमाण के जो चार प्रकार बतलाये हैं उन में योगिप्रत्यक्ष में अववि, मनःपर्यय तथा केवल. ज्ञान का समावेश है अर्थात प्राचीन यागमिक परम्परा का प्रत्यक्ष और अकटकदेव आदि की परम्परा का मुख्य प्रत्यक्ष ही यहां योगि प्रत्यक्ष कहा गया है। । इन्द्रियप्रत्यक्ष भी इन पूर्वाचायों द्वारा वर्णित मव्यवहारप्रत्यक्ष का एक भाग है । मानसप्रत्यक्ष का संव्यवहारप्रत्यक्ष में अन्तर्भाव किया जा सकता है - उमास्वाति ने मतिज्ञान को इन्द्रिय-अनिन्द्रियनिमित्तक माना है, जिनभद्र ने सव्यवहारप्रत्यक्ष को इन्द्रियमनोभव कहा हे तथा अकलंकदेव ने तो अनिन्द्रियप्रत्यक्ष का स्पष्ट ही वर्णन किय है। किन्तु भावसेन नं मानस- प्रत्यक्ष की जो विषयमर्यादा वतलाई है (आत्मा के मुख, दुःख, हर्ष, इच्छा आदि का ज्ञान ही मानसप्रत्यक्ष का विषय है) वह अकलंकवर्णित अनि- न्द्रिय प्रत्यक्ष के अनुकूल नहीं हैं। भावसेन के स्वसवेदनप्रत्यक्ष का भी स्वतन्त्र प्रकार के रूप में वर्णन अन्य जैन ग्रन्थों में नहीं पाया जाता, फिर भी ज्ञान अपने आप को जानता इस विषय में जैन आचार्य एकमत हैं, हैं १ लघीयत्रय श्लो. ४ । तत्र साव्यवहारिकमिन्द्रियानिन्द्रिय प्रत्यक्षम् ।। मुख्यमतीन्द्रिवज्ञानम् । २. लघीयस्त्रय श्लो. १०-११ पर प्रमाचन्द्र की व्याख्या इस दृष्टि से देखनेयोग्य है। ३. यहा द्रष्टव्य है कि मावसेन ने योगिप्रत्यक्ष में केवलज्ञान, मनःपर्यय- नान तथा अवधिज्ञान को समाविष्ट किया है, इन में पहले दो ज्ञान तो सिर्फ योगियों को (महाव्रतधारी मुनियों को ) होते है किन्तु अवधिज्ञान गृहस्थों को भी होता है । निनेश्वरमूरि ने प्रमालध्म (लो. ३ ) में इसी प्रकार योगिविज्ञान शब्द का प्रयोग किया है, यथा- प्रत्यक्षं योगिविज्ञानमवधिर्मनसो गम: । केवलं च त्रिधा प्रोक्तं योगिना त्रिविधत्वतः ।। ४, भावसेन ने विश्वतत्त्वप्रकाश (परि. ३८) में इस विषय की चर्चा विस्तार से की है।

तुलना और समीक्षा प्रमाण के लक्षण में भी उन्हों ने स्वपराभासि, स्वपरव्यवसायात्मक जैसे शब्दों द्वारा स्व का ज्ञान समाविष्ट किया है। भावसेन द्वारा वर्णित इन चार प्रकारों के नाम तो बौद्ध ग्रन्थों के अनुकूल हैं। किन्तु बौद्ध आचार्यों द्वारा उन का जो स्वरूप बताया गया है वह भावसेनवर्णित स्वरूप से भिन्न है । बौद्धों ने मानसप्रत्यक्ष को वह ज्ञान माना है जो इन्द्रियों द्वारा पदार्थ का ज्ञान होने के बाद के क्षण में उसी पदार्थ के उत्तरक्षणवर्ती सन्तान के बारे में मन को होता है-अर्थात वे बाह्य पदार्थों को ही मानस प्रत्यक्ष का विषय मानते है। योगिप्रत्यक्ष को बौद्ध आचार्य निर्विकल्प ही मानते हैं। स्वसंवेदनप्रत्यक्ष का स्वरूप भी बौद्ध मत के अनुसार निर्विकल्प है। न्यायमूत्र में प्रत्यक्ष का जो लक्षण है वह केवल इन्द्रियप्रत्यक्ष का ही है। किन्तु उद्योतकर तथा वाचस्पति ने मानसप्रत्यक्ष तथा योगिप्रत्यक्ष का अस्तित्व स्वीकार किया है । यह भी भावसेनवर्णित प्रत्यक्षप्रकारों से भिन्न हैं क्यों कि ये आचार्य वाह्य पदार्थों को भी मानसप्रत्यक्ष का विषय मानते हैं । ज्ञान का स्वसंवेदन न्यायदर्शन में मान्य नही है अतः इस प्रत्यक्ष प्रकार को वे नही मान सकते। सिद्धसेन ने अनुमान के समान प्रत्यक्ष के भी स्वार्थ और परार्थ ये दो भेद किये है किन्तु अन्य आचार्यों ने इस वर्गीकरण की ओर ध्यान नहीं दिया। १. न्यायविन्दु पृ.१२-१४ कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम् । तच्चतुर्विधम् । इन्द्रियज्ञानम् । स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियजानेन समनन्तरप्रत्ययेन ननितं तन्मनोविज्ञानम् । सर्वचित्तचैत्तानामात्मसवेदनम् । भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तनं योगिज्ञानं चेति । २. यह लक्षण ऊपर उद्धृत किया है । ३. न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका पृ. १८३ । इच्छादयः खलु धार्मणो भवन्ति मानसप्रत्यक्षदृष्टाः । पृ. २०३ । यौगिप्रत्यक्षं स्वर्गादिविषयम् । ४. न्यायावतार श्लो. ११ । प्रत्यक्षेणानुमानेन प्रसिद्धार्थप्रकाशनात् । परस्य तदुपायत्वात् परार्थत्व योरपि ।। - प्रमाप्रमेयम् - भातर्वज्ञ ने प्रत्यक्ष के योगिप्रत्यक्ष और अयोगिप्रत्यक्ष ये दो प्रकार किये हैं और इन को पुनः सविकल्पक तथा निर्विकल्पक इन प्रकारों में विभाजित किया है। इन्द्रिय प्रत्यक्ष (परि०४) इस परिच्छेद में इन्द्रियों के प्रकार, आकार तथा विपयों का जो वर्णन है वह मुख्यतः तत्त्वार्थसूत्र की परम्परा के अनुसार है।। इन्द्रियों का प्राप्यकारित्व (परि०५) न्यायसूत्र के प्रत्यक्षलक्षण अनुसार इन्द्रियों का पदार्थ से संबंध (सनिकर्ष) होने पर प्रत्यक्ष ज्ञान होता हैं । तदनुसार न्यायदर्शन में सभी इन्द्रियों के प्राप्यकारी (प्रात पदार्थ का ज्ञान करानेवाले) माना गया है। बौद्ध आचार्यों का मत है कि मन, कान तथा आखें - ये तीन इन्द्रिय अप्राप्यकारी हे?-पदार्थ से असंवद्ध रह कर ही ये पदार्थ का ज्ञान कराते हैं ! जैन आचार्यों ने कान को प्राप्यकारी तथा आंख को अप्राप्यकारी माना है । भावसेन ने मन का समावेश प्राप्यकारी तथा अप्राप्यकारी दोनों के । H १. न्यायसार पृ. ७-१३ । तद् द्विविधं योगिप्रत्यक्षमयोगिप्रत्यक्षं चेति । ... तच्च पुनर्द्विविधम् । सविकल्पकं निर्विकल्पक च । २, तत्त्वार्थस्त्र अ. २ सू. १५-२१ । पञ्चेन्द्रियाणि | द्विविधानि । निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् । लब्ध्युपयोगी. भाषेन्द्रियम् । स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुः- ओत्राणि | स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः तदर्थाः । सुतमनिन्द्रियस्य । ३. यह लक्षण ऊपर उद्धृत किया है। ४. अप्राप्तान्यचिमनःश्रोत्राणि । अभिधर्मकोश ११४३ । ५. वस्तुतः कान तथा आख दोनों समान रूप से प्राप्यकारी ई-ध्वनि- तरंग प्राप्त होने पर कान से- शब्द का ज्ञान होता है उसी प्रकार प्रकाशकिरण प्राप्त होने पर आंख से रंग का ज्ञान होता है। किन्तु रग के ज्ञान में प्रकाश के महत्त्व की ओर नैन.आचावों का ध्यान नहीं गया है । आंख के प्राप्यकारित्व की चर्चा भावसेन ने विश्वतत्त्वप्रकाश (परि. ६८) में की है । -- तुलना और समीक्षा में किया है - अपने आप के सुख, दु.ख आदि के ज्ञान में मन प्राप्यकारी होता है किन्तु स्मृति आदि परोक्ष ज्ञानों में वह अप्राप्यकारी होता है। यह बात अन्यत्र हमारे अवलोकन में नहीं आई। अवग्रह आदि ज्ञान (परि० ६) यह वर्णन मुख्यतः तत्त्वार्थसूत्र की परम्परा के अनुसार है। किन्तु अभ्यस्त विषयों में अवग्रह तथा ईहा नही होते यह भावसेन का कथन अन्यत्र प्राप्त नहीं होता। योगिप्रत्यक्ष (परि० ७) सर्वज्ञ के ज्ञान में आत्मा और अन्तःकरण के सयोग की जो बात भावसेन ने कही है वह जैन परम्परा के अनुकूल नही प्रतीत होती। संभवतः नैयायिक परम्परा के प्रभाव से ऐसी शब्दरचना हुई है। इन्द्रियप्रत्यक्ष के वर्णन में भी आचार्य ने इसी प्रकार आत्मा के अवधान तथा अव्यन मन के सहकार्य से युक्त निर्दोप इन्द्रिय से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है' जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। अवधिज्ञान का विवरण तत्त्वार्थसूत्र की परम्परा के अनुसार हैं। मनापर्यायज्ञान (परि० ८) मन.पर्याय का विवरण तत्वार्थसूत्र की परम्परा के अनुसार है । किन्तु यह ज्ञान मन द्वारा होता है यह कथन परम्परा के प्रतिकूल है । , १. तत्त्वार्थमूत्र अ. १ मू. १५ । अवग्रहे हावायधारणा । २. अवधि, मनःपर्यय तथा केवल ज्ञान में इन्द्रिय और मन की अपेक्षा नही होती- तत्त्वार्थरानवार्तिक अ. १ सू. १२ । इन्द्रियानिन्द्रियानपेक्षम् अतीत- व्यभिचारं साकारग्रहणं प्रत्यक्षम् | ३. तत्त्वार्थस्त्र अ. १ सू. २१-२२ | भवप्रत्ययोवधिदेवनारकाणाम् । क्षयोपशमनिमित्त. पड्विकल्प. शेषाणाम् | ४. तस्वार्थसूत्र अ. १ स्. २३ ऋजुर्विपुलमती मनःपर्ययः। + प्रमाप्रमेयम् स्वसंवेदनप्रत्यक्ष (परि० ९) इस का विवेचन ऊपर प्रत्यक्ष के प्रकारों में हो चुका है । प्रत्यक्ष के आभास (परि० १०) इस में अनध्यवसाय को आचार्य ने प्रत्यक्षाभास में नहीं गिनाया है तथा उसे ज्ञान का अभाव माना है । अनध्यवसाय का प्रमाणाभास में अन्त- वि वादिदेवसूरि ने किया है, उसी का यह खण्डन प्रतीत होता है । भासर्वज्ञ ने अनध्यवसाय का अन्तर्भाव संशय में किया है । परोक्ष प्रमाण के प्रकार (परि० ११) ऊपर कहा जा चुका है कि तत्त्वार्थसूत्र के अनुसार मति और श्रुत (अर्थात इन्द्रिय और मन से प्राप्त समस्त ज्ञान) ये ज्ञान परोक्ष हैं । इन में श्रुतज्ञान को परोक्ष मानने के विषय में सभी जैन आचार्य एकमत हैं। कुछ लेखको ने श्रुत की जगह प्रवचन अथवा आगम जैसे शब्दों का प्रयोग किया है इतनाही फर्क है । मतिज्ञान (इन्द्रिय और मन से प्राप्त ज्ञान) को जिनभद्र आदि आचार्यों ने व्यवहारत. प्रत्यक्ष माना है यह ऊपर बता चुके हैं। मतिज्ञान के ही नामान्तर के रूप में स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और अभिनिबोध इन चार शब्दों का उल्लेख तत्त्वार्थसूत्र में हैं। अकलंकदेव ने इन शब्दों को क्रमशः स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क तथा अनुमान इन चार भेदों का वाचक माना है। इस प्रकार परोक्षप्रमाण के पाच भेद होते हैं --स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, १. प्रमाणनयतत्वालोक ६-२५॥ यथा सन्निकर्षाद्यस्वसविदितपरानवमात- कज्ञानदर्शनविपर्ययसशयानध्यवसायाः । २, न्यायसार पृ. ४ । अनवधारणत्वाविशेषात् ऊहानध्यवसाययोर्न संशया- दर्यान्तरमावः। ३. तत्वार्थस्त्र १.१३ मतिः स्मृतिः सना चिन्तामिनियोध इत्यनर्थान्तरम् ४. वे इन शानों को शब्दयोजना के पहले प्रत्यक्ष मानते हैं तथा शन्द- योजना के बाद परोक्ष मानते हैं यह ऊपर बता चुके हैं। ।

तुलना और समीक्षा १३५ तर्क, अनुमान तथा आगम' । भावसेन ने इन भेदों में एक और प्रकार उहापोह जोडा है। तर्क के अर्थ में ऊह शब्द का प्रयोग पहले होता था। मावसेन ने तर्क और उहापोह में भिन्नता बतलाई है जिस का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि जिस अविनाभावसबन्ध का ज्ञान अनुमान में प्रयुक्त होता हो उसे तर्क कहना चाहिये तथा ऐसा जो ज्ञान अनुमान में प्रयुक्त न होता हो उसे ऊहापोह कहना चाहिये। यह भेद अन्यत्र देखने में नहीं आता। यह भी देखनेयोग्य है कि सिद्धसेन तथा उन के टीकाकारो ने परोक्ष प्रमाण के दो ही प्रकारों का - अनुमान तथा आगम का वर्णन किया है३ | इस मत का आधार नन्दीसूत्र में मिलता है जहा परोक्ष ज्ञान को आभि- निवोधिक तथा श्रुत इन दो भेदो मे विभक्त किया है । स्मृति (परि० १२) अन्य दर्शनो में स्मृति को प्रमाण में अन्तर्भूत नहीं किया जाता क्यो 'कि स्मृति में किसी नये पदार्थ का ज्ञान नही होता- वह पुराने प्रत्यक्ष ज्ञान 'पर आधारित होती है। किन्तु अकलकदेव का कथन है कि स्मृति को प्रमाण मानना चाहिए क्यों कि प्रत्यक्ष पर आधारित होते हुए भी वह पदार्थ के • स्वरूप से विसवादी नहीं होती और जो भी ज्ञान अविसंवादी हो वह प्रमाण होता है | उत्तरवर्ती जैन आचार्यों ने इसी का अनुसरण किया है । भावसेन का स्मृति-वर्णन प्रायः परीक्षामुख के शब्दों पर आधारित है। १. परीक्षामुख ३-१,२। परोक्षमितरत् । प्रत्यक्षादिनिमित्त स्मृतिप्रत्यभिज्ञान- तर्कानुमानागमभेदम् ! २. परीक्षामुख ३-७ । उपलम्भानुपलम्भनिमित्तं व्याप्तिशानसहः । ३. न्यायावतारटीका पृ. ३३ । (परोक्षम् ) सामान्यलक्षण सद्भावादेका- कारमपि विप्रविपत्तिनिराकरणार्थ द्विधा भिद्यते तद् यथा अनुमान शाब्दं चेति । ४. सूत्र २४ । परोक्खनाण दुविह पण्णत्त त जहा आभिमिमोहियनाणपरो- वखं च सुयनाणपरोक्ख च । ५. न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका पृ. २१ । प्रमासाधनं हि प्रमाणम् | न च एमृतिः प्रमा। ६. प्रमाणमग्रह श्लो. १० प्रमाणमर्थसंवादात् प्रत्यक्षान्वयिनी स्मृतिः । ७. परीक्षामुख ३-३॥ सस्कारोद्योधनियन्धना तदित्याकारा स्मृतिः । . ।

१३८ प्रमाप्रमेयम् अनुयोगद्वारसूत्र ( सू. १४४ ) में अनुमान के पूर्ववत् , शेषवत् तथा - दृष्टसाधर्म्यवत् ये तीन प्रकार बतलाये हैं तथा शेषवन् के पाच प्रकार किये हैं - कार्य से, कारण से, गुण से, अवयव से, आश्रय से। वैशेषिक दर्शन में अनुमान के जो पाच प्रकार बतलाये हैं वे इन से मिलते जुलते हैं । अनुमान के अवयव ( परि० १६-२१ ) न्यायसूत्र में अनुमान के पाच अवयव बतलाये हैं-प्रतिज्ञा, हेनु, उदाहरण, उपनय तथा निगमन । वात्स्यायन ने इस प्रसग मे अनुमान के दस अवयवों की एक परम्परा का उल्लेख किया है जिस में पूर्वोक्त पार अवयवों के साथ जिज्ञासा, संशय, शक्यप्राति, प्रयोजन तथा संशयविच्छेद ये अवयव अधिक जोडे जाते थे । दशवैकालिक नियुक्ति में भद्रबाहु ने भी दस अवयवों की गणना वतलाई है, वह इस प्रकार है-प्रतिज्ञा, प्रतिज्ञाविभक्ति, -हेतु, हेतुविभक्ति, विपक्ष, विपक्षप्रतिषेध, दृष्टान्त, आशका, आशंकाप्रतिषेध आर निगमन । प्रशस्तपाद ने अनुमान के पाचही अवयव बताये हैं किन्तु उन के नाम और क्रम न्यायसूत्र से भिन्न हैं, ये अवयव हैं -अपदेश (व्याति का कयन), साधर्म्य-निदर्शन (समानता बतानेवाला दृष्टान्त ), चैवयं निदर्शन निदर्शन (भिन्नता ( भिन्नता बतानेवाला दृष्टान्त ), (पक्ष में हेतु का अस्तित्व जानना) तथा प्रत्याम्नाय ( पक्ष में साध्य की सिद्धि ) । प्रस्तुत प्रसंग में भावसेन ने न्यायसूत्र आदि में वर्णित प्रतिज्ञा के दो भाग किये हैं-पक्ष और साध्य । इन दोनों का वर्णन तो पहले के लेखकों --- अनुसन्धान . १. अस्येदं कारणं कार्य सबन्धि एकाठमवायि विरोधि चेति लैनिकम् । २. न्यायसूत्र १-१-३२ । प्रतिज्ञाहेन्दाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः । ३. न्यायभाष्य १-१-३२ । दशावयवानेके यायिकाः वाक्ये संचरते जिज्ञासा संशयः शक्यप्राप्तिः प्रयोजन सशयव्युदास इति । ४. गाथा १४२ ते उ पडिन्नविभत्ती हेउ विभत्ती विपख पडिसेहो । दिहतो आसंका तप्पडिसेहो निगमण च ॥ यहां पहले दो अवयवों में विभक्ति शब्द स्पष्टीकरण के अर्थ में आया है।

तुलना और समीक्षा १३९ ने किया है किन्तु अवयवों के रूप में पृथक् गणना नहीं की गई है। माणिक्यनन्दि के कथनानुसार वाद में जो अनुमान प्रयुक्त होते हैं उन में प्रतिज्ञा और हेतु ये दो ही अवयव होने चाहिएं | उदाहरण, उपनय 'तथा निगमन इन का प्रयोग तो केवल शिष्यों को समझाने के लिए किया जा सकता है, बाद में इन का उपयोग नहीं ऐसा उन का कथन है। इस की चर्चा भावसेन ने नहीं की है। पत्र के अगों की चर्चा में (परि. १००) इस का उल्लेख जरूर हुआ है । सिद्धसेन ने अनुमानवाक्य को पक्षादिवच- नात्मक कहा है | उन के टीकाकारों ने इस का अर्थ यह किया है कि अनुमान-वाक्य में एक (केवल हेतु), दो (पक्ष, हेतु), तीन (पक्ष, दृष्टान्त) पाच (उपर्युक्त) या दस अवयवों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है। सिद्धर्षि ने दस अवयवों में पक्ष इत्यादि पाच अवयवों के साथ उन पाच अवयवों की निर्दोषता को शामिल किया है | जिनेश्वर ने उन का समर्थन किया है | १. किंबहुना पक्ष और साध्य में विशिष्ट रूप में एकत्व भी बताया गया है-यथा-साध्याभ्युपगमः पक्षः ( न्यायावतार श्लो. १४), साध्य धर्म, क्वचित् विशिष्टो वा धर्मी, पक्ष इति यावत् ( परीक्षामुख ३-२०, २१)। २. परीक्षामुख ३-३२, ४१। एतद् द्वयमेवानुमानाङ्ग नोदाइरणम् । वाल- व्युप्तत्यर्थ तत्त्रयोपगमे शास्त्र एवासौ न वादे तदनुपयोगात् । ३. न्यायावतार श्लो. १३। परार्थमनुमानं तत् पक्षादिवचनात्मकम् । ४. प्रमालक्ष्म श्लो.५६| क्वचिद् हेतुः क्वचिद्ज्ञातं कचित् पक्षोपि सम्मतः। पञ्चावयवयुक्तोऽपि दशधा वा क्वचिन्मतः ।। ५. न्यायावतारटीका (श्लो. १३ )। दशावयवं साधनं प्रतिपादनोपायः तद्यया पक्षादयः पञ्च तच्छुदयश्च । ६. प्रमालक्ष्म (श्लो, ५६)। प्रत्यक्षादिनिगकृतपक्षदोषपरिहारः असिद्ध- विरुदानकान्तिकदोषपरिहारो ज्ञाते साध्यसाधनोभयविकलतादिपरिहारः दुरुपनी- ततापरिहारो दुर्निगमितपरिहारो वक्तव्य इति । -- । १४० प्रमाप्रमेयम् हेतु का स्वरूप (परि० १९ तथा २२-२५) न्यायसूत्र के अनुसार हेतु वह होता है जो उदाहरण की समानता से या भिन्नता से साध्य को सिद्ध करे। दिग्नाग ने उदाहरण की समानता और भिन्नता को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा कि जो पक्ष में है, सपक्ष मे है तथा विपक्ष में नही है वह हेतु होता है । इस पर कुमारिल का कथन था कि हेतु का पक्ष में अस्तित्व सर्वदा होता ही है ऐसा नहीं है- बाढ से भारी वर्षा का जहां अनुमान होता है वहां वाढ यह हेतु वर्षा के स्थान से बहुत दूर होता है । इसी बात को देखते हुए आचार्यों ने भी माना कि पक्ष - सपक्ष - विपक्ष की चर्चा न करते हुए हेतु उसे माना जाय जिस के विना साध्य की उपपत्ति न लगती हो ! यदि हेतु में अन्यथा- नुपपत्ति है तो अन्य गुण हों या न हों - इस से कोई फरक नहीं पड़ता। इस अन्यथानुपपत्ति लक्षण के प्रतिपादन का श्रेय आचार्य पात्रकेसरी को दिया जाता है । तथा सिद्धसेन, अकलंकदेव आदि ने इसी लक्षण को माना है। किन्तु इस प्रसंग में भावसेन ने च्यातिमान् पक्षधर्म यह हेतु का लक्षण वतला कर पूर्वपरम्पग की उपेक्षा की है, यहां वे बौद्ध-परम्परा से प्रभावित प्रतीत होते हैं। साथ ही हेतु के छह गुण बतला कर उन्हों ने नैयायिक- १. न्यायसूत्र १-१-३४, ३५ । उदाहरणसाधात् साध्यसाधनं हेतुः ।। तथा वैधात् । २. तत्र यः सन् सनातीये दे॒धा चासंस्खद यये ! स हेतुः विपरीतोऽस्मादसिद्धोन्यस्त्वनिश्चितः ।। उद्धृत-न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका पृ. २८९ ३. परि. २४ में उद्धृत श्लोक देखिए । हेमचन्द्र तथा देवसरि ने इन्हें भट्ट (कुमारिल ) के नाम से उद्धृत किया है किन्तु कुमारिल के उपलब्ध ग्रन्यो में ये नहीं मिलते। ४. न्यायावतार श्लो, २२। अन्यायनुपपन्नत्वं हेतोर्लक्षणमीरितम् । न्याय- विनिश्चय ठलो. ३२३ अन्यथानुपपन्नत्व यत्र तत्र त्रयेण विम् । नान्यथानु- पपन्नाव यत्र तत्र त्रयेण किम् ॥ ( यह इलोक पात्रकेसरी का है तथा अक्लकदेवने उद्धृत किया है)। ..

तुलना और समीक्षा १४१ में परम्परा का भी संग्रह किया है। नैयायिक परम्परा में हेतु के पांच गुण माने गये हैं - पक्षधर्मत्व, सपक्ष सत्त्व, विपक्ष में असत्र, अबाधित विषय होना तथा प्रतिपक्ष सत् न होना । भावसेन ने इस के साथ असिद्धसाधकत्व यह गुण भी जोडा है । हेतु के छह गुणों की एक दूसरी परम्परा भी रही है। इस में पूर्वोक्त पाच गुणों के साथ ज्ञातत्व यह गुण जोडा गया है। इस का उल्लेख अर्चटकृत हेतुविन्दुटीका में मिलता है। हेतु पक्ष का धर्म नही भी होता इस विषय में भावसेन ने जिस पूर्व- 'पक्ष का खण्डन किया है वह वादीभसिंह की स्याद्वादसिद्धि में विस्तृत रूप से मिलता है। दृष्टान्त (परि० २०) भावसेन के वर्णनानुसार दृष्टान्त वह होता है जो वादी और प्रतिवादी दोनों को मान्य हो। उन्हों ने इस के दो प्रकार बतलाये है - अन्वय तथा व्यतिरेक । न्यायसूत्र में कहा है कि दृष्टान्त लौकिक तथा परीक्षक दोनों को मान्य होना चाहिए। वहा इस के प्रकारों को साधर्थ तथा वैधर्म्य ये नाम दिये हैं । सिद्धसेन ने वादी-प्रतिवादी या लौकिक-परीक्षक का उल्लेख नहीं किया है - साध्य और साधन का निश्चित सम्बन्ध जिस में दिखाई दे उसे १. न्यायसार पृ. २० । तत्र पञ्चरूपः अन्वयव्यतिरेकी । रूपाणि तु प्रद- यन्ते । पक्षधर्मत्व सपक्षे सत्त्वं विपक्षाद् व्यावृत्तिः अवाधितविषयत्वमसत्- प्रतिपक्षत्व चेति । २. अकलंकग्रन्यत्रय प्रस्तावना पृ. ६३ । ३. प्र. ४ श्लो, ८२-८३ हेतुप्रयोगकाले तु तद्विशिष्टस्य धर्मिणः । किं च पक्षादिधर्मत्वेऽप्यन्ताप्रभावतः । तत्पुत्रत्वादिहेतूना गमकत्वं न दृश्यते । पक्षधर्मत्वहीनोऽपि गमक. कृत्तिकोदयः ॥ ४, न्यायसूत्र १.१-२५ । लौकिकपरीक्षकाणा यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः ।

१४२ प्रमाप्रमेयम् - दृष्टान्त कहा है । देवसूरि ने इसी बात को प्रकारान्तर से कहा है। अनुमान में अन्वय और व्यतिरेक (परि० २६-२८) यहा हेतु के अनुसार अनुमान के तीन प्रकार बतलाये हैं - केवला- न्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वयव्यतिरेकी । इन के प्रतिपादन का श्रेय उद्योतकर को दिया जाता है । इन में अन्वयव्यतिरेको अनुमान तो सर्व- मान्य है। किन्तु केवलान्वयी और केवलव्यतिरेकी के बारे में मतभेद है। आचार्य ने यहा इस विषय की जो चर्चा की है वह प्रायः शब्दशः विश्व- तत्त्वप्रकाश (परि. १६-१७) में भी प्राप्त होती है। जयन्त ने केवलान्वयी हेतु को प्रमाण नहीं माना है। केवलव्यतिरेकी के बारे में केशवमिश्र का कहना है कि इस से कोई नई बात मालूम नहीं होती, यह तो किसी वस्तु- समूह का लक्षण बतलाने का एक प्रकार है। हेत्वाभास (परि० ३०-३९) न्यायसूत्र में हेत्वाभास के पाच प्रकार- बतलाये हैं - सव्यभिचार (जो समान तथा विरुद्ध दोनो पक्षो में मिलता हो), विरुद्ध (जो विरुद्ध पक्ष मे ही हो), प्रकरणसम (जिस का प्रतिपक्ष समान रूप से संभव हो), साध्यसम (जिसे सिद्ध करना जरूरी हो) तथा कालातीत (जिस के । १. न्यायावतार श्लो.१८-१९ । साध्यसाधनयोर्याप्तिर्यत्र निश्चीयतेतराम्। साधम्यण स दृष्टान्त. संवन्धस्मरणान्मतः || साध्ये निवर्तमाने तु साधनस्याप्य-- संभवः । ख्याप्यते यत्र दृष्टान्ते वैधम्र्येणेति स स्मृतः ।। २. प्रमाणनयतत्त्वालोक १-४३ । प्रतिबन्धप्रतिपत्तेरास्पदं दृष्टान्तः । ३. न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका पृ. १७१, ४. न्यायमंजरी मा. २ पृ. १३८ । केवलान्वयी हेतुर्नास्त्येव, सामान्य-- लक्षणं तु अनुमानलक्षणात् साध्यसाधनपदात् वा अवगन्तव्यम्, भाष्याक्षराणि तुः कथमप्युपेक्षिष्यामहे । ५. तर्कभाषा पृ. ११ लक्षणमपि केवलव्यतिरेकी हेतुः-अत्र च व्यवहार: साध्यः।

तुलनों और समीक्षा उदाहरण का काल साध्य के काल से भिन्न हो)। उत्तरकालीन नैयायिक. आचार्यों ने साध्यसम के लिए असिद्ध इस संज्ञा का प्रयोग किया, कालातीत के लिए कालात्ययापदिष्ट शब्द का तथा सव्यभिचार के लिए अनेकान्तिक . शब्द का प्रयोग किया। कालात्ययापदिष्ट के अर्थ में भी भेद हुआ - जिस का साध्य बाधित हो उसे यह नाम दिया गया। उद्योतकर तथा जयन्त ने इस पद्धति का वर्णन किया है । भासर्वज्ञ ने इन पाच के साथ अनध्य- वसित यह छठवां प्रकार जोडा । जो केवल पक्ष में हो (सपक्ष या विपक्ष में न हो) किन्तु साध्य को सिद्ध न कर सके वह अनच्यवसित हेत्वाभास होता है। भावसेन ने इन छह प्रकारो के साथ अकिंचित्कर यह प्रकार जोडा है - जो सिद्ध साध्य के बारे में हो वह अकिंचित्कर हेत्वाभास होता : है। किन्तु प्रकरणसम हेत्वाभास के वर्णन में वे स्पष्ट करते हैं कि यह अनेकान्तिक से भिन्न नहीं है। वौद्ध आचार्य हेत्वाभास के तीन ही प्रकार मानते हैं - असिद्ध, विरुद्ध तथा संदिग्ध (इसे अनैकान्तिक या अनिश्चित भी कहा है )५ । सिद्धसेन, देवसूरि आदि ने इसी प्रकार वर्णन किया है । -अकलकदेव ने असिद्ध आदि प्रकारों को एक ही अकिंचित्कर हेत्वा- भास के प्रकार माना है। जो भी हेतु अन्यथा उपपन्न हो सकता है ( साध्य , १. न्यायसूत्र १-२-४ । सव्य मिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता देवाभासाः । २. न्यायमनरी भा. २ पृ. १५३-६८. ३. न्यायसार पृ.२५-३५. ४, माणिक्य नन्दि ने अकिंचिकर मे इस प्रकार के साथ कालात्ययापदिष्ट : को भी अन्तर्भूत किया है (परीक्षामुख ६-३५)। ५. इस विषय में दिमाग का श्लोक ऊपर उद्धृत किया है । ६. न्यायावतार श्लो. २३। असिद्धस्त्वप्रतीतो यो योऽन्यथैवोपपद्यते । विरुद्धो योऽन्यथाप्यत्र युक्तोऽनैकान्तिकः स तु॥ प्रमाणनयतत्त्वालोक ६-४७ ।

“१४४ प्रमाप्रमेयम् के विना भी जिस की उपपत्ति लगती है अर्थात साध्य से जिस का अविना- भाव संवन्ध नही है ) वह अकिंचित्कर हेत्वाभास है- असिद्ध आदि उसी के प्रकार हैं। । किन्तु माणिक्यनन्दि ने हेतु के लक्षण में परिवर्तन न करते हुए भी हेत्वाभास के चार प्रकार किये हैं। वे असिद्ध आदि तीन प्रकारों के साथ अकिंचित्कर यह चौथा प्रकार मानते हैं (जो सिद्ध या वाधित साध्य में प्रयुक्त हो उसे वे अकिंचित्कर कहते हैं)२ । भावसेन ने असिद्ध आदि हेत्वाभासों के. कई उपभेदों का जो वर्णन किया है वह प्रायः शब्दशः भासर्व ज्ञके अनुसार है३ । अन्य जैन आचार्यों ने इन उपभेदों के वर्णन में रुचि नही दिखाई है। भावसेन ने स्वयं भी विश्वतत्त्वप्रकाश (पृ. ४१) में असिद्ध के दो ही प्रकार वतलाये हैं - अविद्यमानसत्ताक और अविद्यमाननिश्चय । प्रभाचन्द्र ने विशेष्यासिद्ध आदि प्रकारों का अविद्यमानसत्ताक असिद्ध में समावेश किया है। दृष्टान्ताभास ( परि० ४०-४२) भावसेन ने अन्वयदृष्टान्त के छह तथा व्यतिरेकदृष्टान्त के छह आभास बताये हैं । इन का वर्णन भासर्वन के अनुसार है५ जयन्त ने अन्चय और व्यतिरेक दोनों दृष्टान्तों के पाच-पांच आभास बतलाये हैं - उन्होंने आश्रय- विकल का वर्णन नहीं किया है तथा अप्रदर्शितव्याप्ति के स्थान पर अनन्वय का वर्णन किया है। सिद्धर्षि ने इन आभासों की संख्या तो वारह ही मानी है किन्तु स्वरूप भिन्न प्रकार से बताया है - साध्यविकल, साधनविकल, व उमयविकल के साथ संदिग्धसाध्य, संदिग्धसाधन व संदिग्धोभय ये प्रकार १. न्यायविनिश्चय श्लो, २६९ । साधनं प्रकृताभावेऽनुपपन्नं ततोऽपरे । विरुद्धासिद्धसंदिग्धा अकिंचित्करविस्तराः ।। २, परीक्षामुख ६-२१ हेत्वाभासा असिद्धविरुद्धानकान्तिकाकिंचित्कराः। ३. न्यायसार पृ. २५-३५॥ ४. प्रमेयकमलमार्तण्ड ६.२२, ५. न्यायसार पृ.३६-३८. ६. न्यायमजरी भा. २ पृ. १४० । तत्र साध्य विकल: साधनविकल उमयविकल इति वन्तुदोषकृतास्त्रयः साधर्म्यदृष्टान्ताभासाः अनन्वयो विपरीतान्वय इति द्वौ वचनदोपकृती वैधर्म्यदृष्टान्तामासा अपि पञ्चैव, साध्यान्यावृत्तः साधनाव्यावृत्त उमयाव्यावृत्त इति वस्तुदोषास्त्रयः अव्य तिरेको विपरीतन्यतिरेक इति वचनदोषी हो।

तुलना और समीक्षा - उन्हों ने जोडे हैं तथा अनन्वय आदि प्रकारों को अयोग्य, बताया है। सदिग्धसाध्य आदि प्रकारों का उल्लेख भासर्वज्ञ ने भी किया है तथा उन में संदिग्धाश्रय को जोड कर (अन्वयदृष्टान्त के चार तथा व्यतिरेकदृष्टान्त के चार इस प्रकार) आठ प्रकारों की मान्यता का उल्लेख किया है। देवससि ने इन दोनों प्रकारों को जोड़ कर अठारह दृष्टान्तामास बताये हैं - साध्य- विकल आदि तीन, संदिग्धसाध्य आदि तीन, तथा अनन्वय; विपरीतान्वय व भप्रदर्शितान्वय ये अन्वय दृष्टान्त के आभात हैं। इसी प्रकार व्यतिरेक दृष्टान्त के भी नौ आभास है। माणिक्यनन्दि सिर्फ आठ दृष्टान्ताभास मानते हैं- साध्यविफल आदि तीन तथा विपरीतान्वय, एवं साध्याव्यावृत्त आदि तीन एवं विपरीतन्यतिरेक'। तर्क (परि० ४३-४४) इस विषय का संक्षित उल्लेख ऊपर परि. १५ के टिप्पण में किया है | आत्माश्रय इत्यादि तर्क के प्रकार तथा उन के दोषों का संक्षिप्त उल्लेख आचार्य ने विश्वतत्त्वप्रकाश (परि. ३९ ) में भी किया है। अन्यत्र इस विपय का वर्णन देखने में नही आया । छल (परि० ४५-४८) यह वर्णन प्रायः शब्दशः न्यायसूत्र तथा उस की टीका-परम्परा पर आधारित है। -१. न्यायावतारटीका पृ. ५६-६०. २. न्यायसार पृ. ३८-३९। अन्ये तु सन्देहद्वारेण अपरान् अष्टौ उदाहर- णाभासान् वर्णयन्ति । इत्यादि. ३. प्रमाणनयतत्वालोक अ. ६ सू, ५८-७९. ४. परीक्षामुख अ. ६ स. ४०-४५. ५. न्यायसूत्र, अ. १,आ: २ स. १०.१४ वचन विघातः- अर्थविकल्पो- पपत्या उलमा इत्यादि । -- । A -- प्र.प्र.१० १४६ प्रमाप्रमेयम् जातियां (परि० ४५-६९) यहां जातियों का समुचित लक्षण नैयायिक परम्परा के अनुसार है। जातियों के चौबीस प्रकारों के नाम तथा लक्षण न्यायसूत्र में मिलते हैं। उस में साध्यसम के स्थान पर आचार्य ने असिद्धादिसम का वर्णन किया है। अकलंकदेव ने जातियों का सामान्य लक्षण ही बताया है - भेदों का वर्णन नही किया क्यों कि ये भेद अनन्त हो सकते हैं तथा शास्त्र में उन का विस्तार से वर्णन हो चुका है। यहां शास्त्र शब्द से उन का अभिप्राय न्यायसूत्र से हो सकता है । जातियों की संख्या का नियम नही है यह बात नैयायिक विद्वानों ने भी मानी है। । न्यायसार में सोलह जातियों का ही वर्णन है। किन्तु न्यायसूत्र में वार्णत जातियों के अतिरिक्त अनन्यसमा आदि जातियां हो सकती हैं इस की सूचना भी वहा मिलती है५ । भावसेन ने जातियों की संख्या वास मानी है। वे अर्थापत्तिसम तथा उपपत्तिसम को प्रकरणसम से अभिन्न मानते हैं । जयन्त ने प्रकरणसम तथा उपपत्तिसम को साधर्म्यसम से अभिन्न मानने के मत का उल्लेख कर उस का खण्डन किया है, उन का कथन है कि साधर्म्यसम में प्रतिपक्ष का १. न्यायसूत्र १-२-१८| साधर्म्यवैधाभ्या प्रत्यवस्थानं जातिः न्यायसार पृ. ४६ प्रयुक्ते हेतो समीकरणाभिप्रायेण प्रसगो नातिः । २. न्यायविनिश्चय श्लो. ३७६ मिथ्योचराणामानन्यात् शाने वा विस्तरो- तितः । साधादिसमत्वेन नातिनह प्रतन्यते ।। विद्यानन्द तथा प्रभाचन्द्र ने इसी दृष्टिकोण को मान्य किया है किन्तु वे पूर्ववर्णित जातियों का वर्णन भी करते हैं. (तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ. २९८-३१० प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ. १९६-२,००)। ३. न्यायमंजरी भा. २ पृ. १७६। सत्यप्यानन्त्ये नातीनामसकीर्णोदाहरण- विवक्षया चतुर्विशतिप्रकारत्वमुपवर्णितम् न तु तत्संख्यानियमः कृत इति । ४. न्यायसार पृ. ४७-५५ इस में प्रसगसम, प्रतिदृष्टान्तसम, संशयसम, प्रकरणसम, अर्थापत्तिसम, अनित्यसम तथा कार्यसम का वर्णन नही है । ५. न्यायसार पृ. ५५-५६ । एतेनान्यत्वस्य आत्मनोऽनन्यत्वात् अन्यत्वं नास्तीत्यसदुत्तराणि (टीका-इयमनन्यसमा जातिः) प्रत्युक्तानि ।... आनन्न्यात् न सर्वाणि नात्युत्तराणि उदाहर्तुं शक्यन्ते सूत्राणामपि उदाहरणार्थत्वात् । १ तुलना और समीक्षा १४७ -खण्डन मुख्य अभिप्राय होना है, प्रकरणसम में दूसरा पक्ष उपस्थित करने "का अभिप्राय होता है तथा उपपत्तिसम में निर्णय का अभाव बतलाने का "अभिप्राय होता है। अविशेषसम तथा अनित्यसम को अभिन्न मानने का भी जयन्त ने खण्डन किया है। उन का कथन है कि अविशेषसम में अस्तित्व के कारण सब पदार्थों में समानता बतलाई गई है तथा अनित्यसम में घट “की समानता से सब पदार्थों में अनित्यत्व की समानता कल्पित की गई है, “इस प्रकार इन दोनों में वर्णन के प्रकार का भेद है। -निग्रहस्थान (परि० ७०-८४) वाद में पराजय होने के कारणों का - वाईस निग्रहस्थानों का-जो वर्णन भावसेन ने किया है वह प्रायः शब्दश न्यायसूत्र तथा उस की टीकाओं पर आधारित है। वौद्ध आचार्यों ने निग्रहस्थान के दो ही प्रकार माने हैं - ऐसा वाक्य- प्रयोग करना जो अपने पक्ष को सिद्ध न कर सके तथा ऐसी बातें उठाना जिन से प्रतिपक्ष दृपित सिद्ध न हो । अनुमान के अवयवों के बारे में उन के विचार न्यायदर्शन की परम्परा से भिन्न हैं अतः वे न्यून, अधिक आदि निग्रहस्थानों को अनावश्यक मानते हैं। निग्रहस्थानों को दो प्रकारो में संगृहीत करने का सकेन न्यायसूत्र में भी मिलता है। १. न्यायमजरी भा २ पृ. १८३। ननु सैवेयं साधादिसमा प्रकरणसमा वा जातिन भेदान्तरम् १ मैवम् । उद्भावनप्रकारेण भेदात् । परपक्षोपमर्दबुद्ध्या -साधादिसमा नाति. प्रयुज्यते, पक्षान्तरोत्थापनास्थया प्रकरणसमा, अप्रतिपत्ति- पर्यवसायित्वाशयेन इयमुपपत्तिसमा इति । २. उपर्युक्त पृ. १८५ । अविशेषसमा एव इय जातिरितिचेत् तत्र हि सत्तायोगात् सर्वभावानामविशेष आपादितः इह तु घटसाधादेव अनित्यत्वमापा- दितम् इति उद्भावनाभङ्गिभेदाच्च जातिनानात्वमिति असकृदुक्तम् । ३. न्यायमूत्र अ, ५ आ २. . ४. वादन्याय पृ. २ । असाधनाङ्गवचनमदोषोद्भावनं द्वयोः । निग्रहस्थानमन्यत्तु-ने युक्तमिति नेष्यते ॥ ५. न्यायसूत्र १-२-१९ । विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् ।

१४८ प्रमाप्रमेयम् - इस संबन्ध में जैन आचार्यों का दृष्टिकोण यह है कि बाद में जिला पक्ष को उचित सिद्ध किया जा सके वह विजयी होता है तथा जिस पक्ष का खण्डन किया जाता है वह पराजित होता है। अतः पक्ष को सिद्ध करना यह विजय का स्वरूप है । वाढी यदि अपने पक्ष को सिद्ध नही कर सकता तो केवल प्रतिवादी की गलती के कारण प्रतिवादी को पराजित और वादी को विजयी नही मानना चाहिए । इसी प्रकार वादी यदि अपना पक्ष सिद्ध कर' सकता है तो वाक्य रचना की गलती जैसे कारण से उसे पराजित नहीं मानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि बाद मे तत्त्वनिर्णय की मुख्यता होनी चाहिए - व्यक्ति के विजय या पराजय की मुख्यता नहीं होनी चाहिए | इस विषय का वर्णन अकलकदेव ने संक्षेप से किया है। विद्यानन्द ने दृष्टिकोणा यही रखा है किन्तु निग्रहस्थानों के पूर्ववर्णित प्रकारों की विस्तृत चर्चा की है', प्रभाचन्द्र ने इन दोनों आचार्यों के कथनों का तात्पर्य संगृहीत किया है। वाचस्पति के कथनानुसार समस्त जातिया भी पराजय का कारण, होती हैं-उन का समावेश निरनुयोज्यानुयोग निग्रहस्थान में करना चाहिए। बाद के प्रकार (परि० ८६-८९ तथा ९५-९८) यहां आचार्य ने वाट के तीन प्रकार किये हैं - व्याख्या, गोष्ठी तथा विवाद । तथा चार प्रकारों में विवाद का वर्गीकरण किया है - तात्त्विक, प्रातिभ, नियतार्थ तथा परार्थन । इन में से केवल तात्त्विक और प्रातिभ इन प्रकारों का उल्लेख श्रीदत्त आचार्य के जल्पनिर्णय में था ऐसा विद्यानन्द १. न्यायविनिश्चय का, ३७८-७९ । असाधनाङ्गवचनमदोघोद्भावनं द्वयोः । न युक्तं निग्रहस्थानमर्थापरिसमाप्तितः । वादी पराजितोऽयुक्तो वस्तुतत्वे व्यवस्थितः । तत्र दोष ब्रुवाणो वा विपर्यस्तः कथं जयेत् ॥ इस का विस्तार सिद्धि विनिश्चय प्र. ५ की टीका में प्राप्त होता हैं। २. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक पृ. २८३-२९४ यहां विद्यानन्द ने पूर्वोक्त- याईस निग्रहस्थानों के साथ छल और जाति की भी गणना की है। ३. प्रमेयकमलमार्तण्ड पृ. २००-२०४. ४. न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका पृ. ७२३, -- तुलना और समीक्षा १४९ का कथन है। व्याख्या और गोष्ठी मे जय-पराजय का उद्देश नहीं होता, विवाद में यही मुख्य उद्देश होता है । इस भेद को न्यायदर्शन की परम्पर में बाट (तत्त्वनिर्णय के लिए) तथा जल्प (जय-पराजय के सिए) इन शब्दों द्वारा व्यक्त किया है। किन्तु जल्प में छल, जाति आदि के प्रयोग की उन्हों ने छट दी है। अत जैन आचार्यों ने इस भेद को अस्वीकार कर के जल्प और वाद को एकार्थक शब्द माना है । इस की विस्तृत चर्ची भावसेन ने आगे की है (परि. १०३-१२२) । परि. ८९ के पहले श्लोक का रूपान्तर पंचतत्र (त. २ श्लो. ३०) में मिलता है । वहां इस का रूप यह हैं - ययोरेव सम वित्तं ययोरेव समं कुलम् । तयोरेव विवाह' स्यान्न तु पुष्टविपुष्टयोः॥ यही रूप इस ग्रंथ के त. १ श्लो. ३०४ में भी मिलता है। वाद के चार अंग (परि० ९०-९४ ) इस विषय का संक्षिन वर्णन सिद्धिविनिश्चय प्र. ५, तत्त्वार्थश्लोक- वार्तिक पृ २७७-२८०, प्रमाणनयतत्त्वालोक अ. ८ आदि में मिलता है। इन चार अंगों में सभापति के लिए परिषद्वल तथा सभ्य के लिए प्राश्निक इन शब्दों का प्रयोग भी मिलता है । कुमारनन्दि आचार्य के वादन्याय ग्रन्थ में इस का विस्तृत वर्णन या ऐसा विद्यानन्द के कयन से प्रतीत होता है । परि. ९३ के अप्पूया यत्र इत्यादि श्लोक का रूपान्तर पंचतन्त्र (तं. ३ श्लो. २०१) में मिलता है । वहा इस की दूसरी पक्ति इस प्रकार है - त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् । -पत्रविचार (परि० ९९-१०२) इस विषय का वर्णन विद्यानन्दकृत पत्रपरीक्षा पर आधारित है। इस ग्रन्थ से आचार्य ने तीन श्लोक उद्धृत किये हैं। विद्यानन्द ने भी किसी पूर्ववर्ती ग्रन्थ से कई श्लोक उद्धृत किये हैं किन्तु वह ग्रन्थ उपलब्ध नही है। प्रभाचन्द्र ने संक्षेप से इस विषय का वर्णन किया है (प्रमेयकमल- मार्तण्ड पृ. २०७-२१०) १. तत्त्वार्यश्लोकवार्तिक पृ. २८० । द्विप्रकार जगौ जल्पं तत्त्वप्रातिभगो- चरम् । त्रिषष्टेवादिना जेता श्रीदत्तो जल्पनिर्णये ।।

१५० प्रमाप्रमेयम् तीन या चार कथाएं (परि० १०३-१०५) दार्शनिक चर्चा के लिए यहां कथा शब्द का प्रयोग किया है। न्यायसूत्र में इस के तीन प्रकार किये हैं - वाट, जल्प तथा वितण्डा' । वहाँ इन के जो लक्षण दिये हैं उन का आचार्य ने शब्दशः खण्टन किया है । न्यायसार में वितण्डा के दो प्रकार किये है - वाद की वितण्डा तथा जल्य की वितण्डा (प्रतिवादी के पक्ष का खण्डन ही जिस में हो - स्वपक्ष का स्थापन न हो उस वाट को वाढवितण्डा कहेंगे तथा ऐने ही जत्प को जस्य- वितण्डा कहेंगे)। वाद-वितण्डा के अस्तित्व का समर्थन करने के लिए वहा न्यायसूत्र का एक वाक्य भी उद्धृत किया है । इस प्रकार कथा के चारः प्रकार होते हैं। वाद और जल्प में अभिन्नता (परि० १०६-१२२) न्यायसूत्र तथा भाष्य में वाद और जल्प का जो वर्णन है उस से प्रतीत होता है कि इन दोनों में छल आदि के प्रयोग का ही भेद है, वाद मे छल आदि प्रयुक्त नहीं होते किन्तु जल्प मे होते हैं। जैन आचार्यों ने नैतिकता की दृष्टि स छल आदि के प्रयोग का निषेध किया है और इस भेद के अभाव में वाद और जल्प को समानार्थक माना है३१ छल आदि को- अनुचित मानते हुए भी नैयायिक विद्वान जत्प में उन के प्रयोग की छूट देते हैं क्यो कि जल्प में विजय प्राप्त होने पर जो सामाजिक लाभ होता - १. न्यायसूत्र १-२-१, २, ३। प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ. सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्न पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वाद । यथोक्तोपपन्न. छलनातिनिग्रहस्थान-- साधनोपालम्भो जल्प । स एव प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा । २. न्यायसार पृ. ४२.४४ टीका-एवं च वीतरागवितण्डा विजिगीषु- वितण्डा इति द्विविधा वितण्डा, एतच्च त प्रतिपक्षहीनमपि वा कुर्यात् (न्यावस्त्र, ४-२-४९ ) इति सूत्रेणापि सूचितम् । ३. सिद्धिविनिश्चयटीका पृ.३११-१३।समर्थवचनं जल्प चतुरङ्ग विदुर्बुधाः । इत्यादि, प्रमाणसग्रह पृ. १११ समर्थवचन वाद. इत्यादि, तत्वार्थश्लोकवार्तिक पृ. २७८.

तुलना और समीक्षा १५१ उस की उन्हें अधिक चिन्ता है । इस बात को ले कर बाद के नैयायिक विद्वानों ने वाद के लिए वीतरागकथा तथा जल्प के लिए विजिगीषुकथा इन शब्दों का प्रयोग किया है। इस प्रकार जहा सूत्रकार और भाष्यकार वाद और जल्प में केवल साधन का भेद बतलाते हैं वहां उत्तरवर्ती लेखक उन में रदेश का भेद भी मानते हैं - वाद तत्त्वनिर्णय के लिए किया जाता है, तथा जल्प स्वपक्ष के विजय के लिए किया जाता है। भावसेन ने वाद और जल्प में रद्देश भेद तथा साधनभेद की इन दोनो वातों को एकत्रित कर के उन की आलोचना की है अत. वे इन दोनों में भेद स्वीकार नहीं करते । किन्तु वाद में तत्त्वनिणंय तथा स्वपक्षविजय ये पृथक् उद्देश होते है यह उन्हें मान्य है, तदनुसार उन्होंने व्याख्यावाद, गोष्टीवाद तथा विवाद का पृथक वर्णन पहले किया भी है (परि. ८७-८९)३ | वाद और जल्प को अभिन्न मानने की जैन आचायो की परम्परा में उल्लेखनीय अपवाद जिनेश्वरमूरि का है। इन दोनों में रद्देश भेद और साधन- भेद को स्वीकार करते हुए उन्हो ने इन मे बाह्य भेद को स्पष्ट किया है - १. न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका पृ. ६६८ । यस्तु स्वदर्शनविलसितमिथ्या- शानावलेपदुर्विदधतया सद्विद्यावैराग्याट् वा लाभ पूजास्यात्यार्थितया कुहेतुमिरीश्व- राणां जनाधाराणा पुरतो वेदव्राह्मणपरलोकादिदृषणप्रवृत्तः त प्रतिवादी समीचीन- दूरणम् अप्रतिभया अपश्यन् नल्पवितण्डे अवतार्य विगृह्य जल्पवितण्डाभ्यां तत्त्व- कथनं करोति विद्यापरिपालनाय मा भूदीश्वराणा मतिविभ्रमेण तच्चरितमनुवर्तिनीना प्रनाना धर्मविप्लव इति । २. न्यायसार पृ. ४१-४२। वादिप्रतिवादिनो: पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह. कथा सा द्विविधा वीतरागकथा विजिगीघु कथा चेति | न्यायमनरी भा. २ पृ. १५१ । वादं च निर्णयफलार्थिभिरेव शिष्यसब्रह्मचारिगुरुभि. सह वीतरागः। न ख्याति- लाभरभसप्रतिवर्धमानस्पर्धानुबन्धविधुगत्मभिरारमेत ॥ ३. इसी प्रकार देवसरि ने वाद के दो उद्देश मानते हुए भी पृथक प्रकारों के रूप में उनका वर्णन नहीं किया है । (प्रमाणनयतत्त्वालोक अ.८ म.२ प्रारम्भकश्चात्र निगीघुः तत्वनिर्णिनीपुश्च । ) "प्रमाप्रमेयम् बाद में सभापति, सभासद आदि नहीं होते जब कि जल्प में,इन की व्यवस्था होती है। ग्रन्थों में वाट और जल्प की परिभाषाओं के बारे में यह मतभेद है, किन्तु व्यवहार में संभवतः वाट यह एक ही संज्ञा सुद्ध थी- मांख्य और चौद्धों में वाद हुआ, बाद में विजयी हुए इस प्रकार के वर्णन तो मिलते हैं किन्तु उन में जल्प हुआ ऐसा वर्णन नहीं मिलता। बाद में भाग लेनेगले चादी और प्रतिवादी कहलाते थे, किन्तु जल्पी या प्रतिजल्पी ये शब्द प्रयोग में नहीं आते थे। इस से यह सूचित होता है कि व्यवहार में जल्प शब्द का प्रयोग बहुत कम होता था। आचार्य ने इस विषय की लम्बी चर्चा की है जो कुछ हद तक शब्द- चहुल कही जा सकती है। वाद के लक्षण में पंचावयवोपपन्न इस विशेषण की उन की आलोचना (प्रतिज्ञा आदि वाक्य शब्द है अतः वे अवयव नही हो सकते, अवयव तो भौतिक होते हैं) को गम्भीर मानना कठिन है (परि. ११२)। यह आक्षेप उन के पूर्ववर्ती किसी अन्य से लिया गया है क्यों कि वाचस्पति ने इस का उल्लेख किया है। दूसरे प्रकार से पांच अवयवों की जो गणना भावसेन ने उद्धृत की है (परि. (परि. ११४ ११४) वह न्यायसारटीका में प्रात होती है | १. प्रमालक्ष्म इलो, ५९ । समानलिङ्गिना कापि मुमुक्षणामविद्विषास् । सन्देहापोहद्वादो नल्पत्त्यन्यत्र समतः ।। श्लो. ६२ मत एवात्र नो युत्ताः स्येया दण्डधरादयः । छलनात्यादयो दुरं निग्रहोऽपि न कश्चन ।। श्लो. ६३ वाद एव भवेज्जल्पः छलनात्यादयः परम् । अनुषज्यन्ते यथायोग स्थेयदण्डधरादयः ॥ २. न्यायवार्तिकतात्पर्य टीका पृ ५४ ननु यथा तन्तवः पटस्य समवायि- कारण किं तथैवैते प्रतिज्ञादयो वाक्यस्य । नो खलु गगनगुणा वर्णाः समवायिकारणतां प्रतिपद्यन्त इत्यत आह । वाक्यैकदेशा इति अवयवा इति अवयवा. न पुनः समवायिकारणम् । ३. पृष्ठ ४२ तथा-वपक्षसाधनं परपक्षदूषणं.. साधनसमर्थन -षणसमर्थन शब्ददोषवर्जनमित्येतः पंचभिरवयवैस्पपन्न. कार्यों येनाभिमतसिद्धिः स्यात् । - तुलना-और-समीक्षा आगम (परि० १२३) यहां आचार्य ने आगम के प्रणेता आत का जो लक्षण बतलाया है वह सर्वज्ञ और असर्वज्ञ दोनों में संभव है। यह बात परम्परा-संमत भी है। सिद्धसेन ने शाब्द प्रमाण का वर्णन करते हुए दो श्लोक लिख कर इस प्रमाण में असर्वज्ञ के वाक्य और सर्वज्ञ के वाक्य दोनों का अन्तर्भाव सूचित किया है ! वात्स्यायन ने आप्त शब्द के अर्थ में ऋषि, आर्य, म्लेच्छ तीनों का अन्तर्भाव किया है। देवसूरि ने आप्त के दो प्रकार बतलाये हैं- लौकिक तथा लोकोत्तर | पिता इत्यादि लौकिक आप्त हैं तथा तीर्थक्कर लोकोत्ता आप्त हैं। ऐसा होने पर भी आगम प्रमाण के वर्णन में सर्वज्ञगीत आगम'की मुख्यता रहती है। इस के लिए प्रयुक्त दूसरा शब्द श्रुत है। यह शब्द भी दो अर्थों में प्रयुक्त होता है । सर्वसाधारण व्यक्तियों का मतिज्ञान पर आधारित ज्ञान श्रुत कहलाता है । तथा सर्वज्ञों के केवलज्ञान पर आधारित उपदेश को भी श्रुत कहते हैं । उमास्वाति ने श्रुतज्ञान के वर्णन में इन दोनों प्रकारों को एकत्रित किया है - वे श्रुत को मतिपूर्व कहते हैं किन्तु उस के भेदों के वर्णन में सर्वज्ञप्रणीत ज्ञान के प्रतिपादक ग्रन्यों की गणना करते है।। यहा आचार्य ने आगम ग्रन्यों की नामावली में बारह अगतयों के अतिरिक्त अंगवाह्य ग्रन्थों के नाम भी गिनाये हैं। इन में से अधिकांश ग्रन्थों के संस्करण श्वेताम्बर परम्परा में प्रसिद्ध हैं। दिगम्बा परम्परा में इन के अध्ययन की परम्परा टूट गई है । १. न्यायावतार टीका पृ. ४२। शादं च द्विषा भवति लौकिक शात्रज चेति तत्रेद द्वयोरपि साधारण लक्षणं प्रतिपादितस् (श्लोक.८). २. न्यायभाष्य १-१-७॥ साक्षात्करणमर्थस्य आप्ति तया प्रवर्तत इत्यातः। ऋष्यार्यम्लेच्छाना समानं लक्षणम् । ३. प्रमाणनयतत्वालोक अ. ४ . ६-७। स च द्वेधा लोकिको लोकोचरश्र। लौकिको जनकादिः लोकोचरस्तु तीर्थकरादिः । ४. नन्दीसूत्र (म. २४ )। मइपुत्वं जेण सुयं, न मई सुयपुब्धिया । ५. तत्त्वार्यस्त्र १-२०। श्रुतं मतिपूर्व द्वयनेकद्वादशभेदम् ।

१५४ प्रमाप्रमेयम् अंगवाह्य ग्रन्थों का वर्गीकरण नन्दीसूत्र (सू. ४३) में इस प्रकार, मिलता है - अगवाह्य के दो भाग है - आवश्यक तथा आवश्यकव्यतिरिक्त । आवश्यक के छह भाग हैं -सामायिक, चतुर्विशतिस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग, प्रत्याख्यान | आवश्यकव्यतिरिक्त के दो भाग हैं- कालिक और उत्कालिक । रत्कालिक के बहुतसे भाग हैं - दशवैकालिक, कल्पाकल्प, चुल्लकल्प, महाकल्प, औपपातिक, राजप्रश्नीय, नीवाभिगम, प्रज्ञापना, नन्दी, अनुयोगद्वार इत्यादि । कालिक के भी बहुतसे भाग हैं - उत्तराध्ययन, व्यवहार, निशीथ, ऋपिभापित, जम्बूद्वीपप्रजाति, चन्द्रप्रज्ञप्ति, द्वीपसागरप्राप्ति, निरयावली, इत्यादि । उपर्युक्त ग्रन्थो में से अधिकांश इस समय श्वेताम्बर - परम्परा में प्रसिद्ध हैं। द्रव्यप्रमाण (परि० १२५) यहां द्रव्यप्रमाण के छह प्रकार बतलाय हैं । इस विषय का विस्तृत वर्णन अनुयोगद्वार सूत्र (सूत्र १३२) में प्राप्त होता है । वहा दी हुई कुछ तालिकाएं इस प्रकार हैं - धान्यमान की तालिकाः-२ असई = १ पसई; २ पसई = १ सेइया, '४ सेझ्या = १ कुलक, ४ कुलक= १ प्रस्थ, ४ प्रस्थ १ आटक, ४ आठक = १ द्रोण, ६० आटक = १ जघन्यकुंभ ८० आटक = १ मध्यम कुभ; १०० आढक = १ उत्तम कुम; ८०० आढक = १ वाह । रस (तरल पदार्थ) मान की तालिकाः-१ मानी-२५६ पल = २ अर्धमानी; १ अर्धमानी = २ चतुर्भागिका; १ चतुर्भागिका = २ अष्टभागिका, १ अष्टभागिका-२ पोडशिका । उन्मान ( तौटने के बाटों) की तालिकाः- २ अर्धकर्ष = १ कप, २ कप = १ अर्धपल; २ अर्घपल = १ पल; ५०० पल = १ तुला; १० तुला = १ अर्वभार; २० तुला- १ भार । प्रतिमान (छोटे वाटों) की तालिकाः- - न १. विभागनिम्फणे ( दवपमाणे ) पंचविहे पप्णत्ते, त जहा, माणे. उम्माणे, अवमाणे, गणिमे, पडिमाणे ! इत्यादि.

तुलना और समीक्षा १५५ ५ गुंजा = ४ काकिणी = ३ निष्पाव = १ कर्ममाष; १२ कर्ममाप = १ मंडल; १६ कर्ममाप = १ सुवर्ण। गणिमाप्रमाण की तालिका.-एक, दस, सौ, हजार, दसहजार, सौ. हजार, दस सौ हजार, कोटि । अवमान के उदाहरणः-हाथ, दण्ड, धनुप, युग, नालिका, अक्ष, मृसला क्षेत्रग्रमाण तथा कालप्रमाण (परि० १२६-१२७) क्षेत्रप्रमाण का यहां जो वर्णन दिया है वह कुछ विस्तार से अनुयोग- द्वारसूत्र (सू. १३३) में पाया जाता है । वह तालिका इस प्रकार है ८ ऊर्ध्वरेणु = १ त्रसरेणु, ८ त्रसरेणु = १ रथरेणु, ८ रथरेणु = १ उत्तममोग- भूमिजकेश, ८ उत्तमभोगभूमिजकेश = १ मध्यमभोगभूमिजकेश, ८ मध्यम- भोगभूमिजकेश = १ जघन्यभोगभूमिजकेश, ८ जघन्यभोगभूमिजकेश = १ विदेहक्षेत्रजकेश, ८ विदेहक्षेत्रजकेश = १ भरत ऐरावत क्षेत्रजकेश, ८ भरत- ऐरावत क्षेत्रजकेश = १ लिक्षा; ८ लिक्षा= २ यूका, ८ यका= १ यव, ८ यव १ अंगुल, ६ अंगुल = १ पाद, २ पाट - १ वितस्ति, २ वितस्ति = १ रत्नि, २ रनि = १ कुक्षि, २ कुक्षि = १ दण्ड (अथवा. धनुप, युग, नालिका, मुसल या अक्ष), २००० दण्ड = १ गव्यूति,. ४ गव्यूति = १ योजन । गणितसारसंग्रह (अ. १, श्लो २५-३१ ) मे प्राय यही तालिका है, अन्तर यह है कि उर्ध्वरेणु के लिए अणु, यूका के लिए तिल या सर्षप, रत्नि के लिए हस्त तथा गव्यूति के लिए क्रोश शब्द का प्रयोग किया है । वहा विदेहक्षेत्रज केशमाप का उल्लेख नहीं है तथा कुक्षि का उल्लेख भी, नही है। तिलोयपण्णत्ती (अ १, गा. ९३-१३२) में भी यह तालिका प्राप्त होती है। कालप्रमाण का वर्णन अनुयोगद्वारसूत्र (सू. १३४ ) में विस्तार से मिलता है। वहां की तालिका इस प्रकार है - असख्यात समय = १ आवलि, संख्यात आवलि = १ उच्छ्वास, (इसी को निश्वास या प्राण कहते हैं ) १५६ प्रमाप्रमेयम् ७ प्राण = १ स्तोक, ७-स्तोकः-१ लव ७७ लव = १ मुहूर्त, ३० मुहूर्त १ अहोरात्र, १५ अहोरात्र = १ पक्ष, २ पक्ष = १ मास, २ मास= १ ऋतु, ३ ऋतु = १ अयन, २ अयन = १ संवत्सर, ५ संवत्सर % १ युग, २० युग = १ वर्षशत, १० वर्षशत = १ वर्षसहस्त्र, ५०० वर्षसहस्र - १ वर्ष- शतसहन, ८४ वर्षशतसहस्र = १ पूर्वांग (यहां से ऊपर प्रत्येक माप पूर्वमाप के ८४ लक्ष गुणित बतलाया है, जिन के नाम हैं - पूर्व, त्रुटिनाग, त्रुटित, अटटांग, अटट, अवांग, अक्व, हुहुअग, हुहुअ, उत्पलांग, उत्पल, पद्मांग, पद्म, नलिनाग, नलिन, अच्छनिटरंग, अच्छनिउर, अयुतांग, अयुत, प्रयुतांग, प्रयुत, नमिताग, नमित, चूलिकांग, चूलिका, शीर्षप्रहेलिकाग, शीर्षप्रहेलिका)। गणितसारसग्रह (अ. १, श्लो. ३२-३५) मे कालप्रमाण की गणना एक वर्ष की अवस्था तक वतलाई है। वह यहां आचार्य द्वारा दी गई तालिका से मिलती है। तिलोयपण्णत्ती (अ. ४, गा २८५-२८६ ) में भी कालगगना की रीति वतलाई है। उपमान प्रमाण (परि० १२८) अतिविस्तृत क्षेत्र और काल की गणना के लिए उपमाओं के द्वारा पल्योपम, सागरोपम आदि संज्ञाओं का प्रयोग करना जैन ग्रन्थों की विशेषता - है । इन्हीं संज्ञाओं को वहां उपमान प्रमाण कहा है (न्यायदर्शन में वर्णित उपमान का इस से कोई संबन्ध नही है, उस उपमान का समावेश पूर्वोक्त प्रत्यभिज्ञान परोक्ष प्रमाण में होता है यह ऊपर बताया है)। इस विषय का वर्णन कई अन्यों में मिलता है जिन में प्रमुख हैं-अनुयोगद्वारसूत्र (स. १३८) तिलोयपण्णत्ति (प्रथम अधिकार, इस का विवेचन जंबूदीवपण्णतीसग्रह की -प्रस्तावना में उपलब्ध है) तथा गोम्मटसार (कर्मकाण्ड) की हिन्दी भूमिका ।

1- । + - पृष्ठाक, , ४८ ८७- ८९ ८५ ८४ ८९ ८१ ७८ ७७ ७८ ८१ श्लोकसूची पृष्ठाक ततेस्तेपि निरूप्यन्ते तत्तन्मतप्रसिद्धान ८१ तथा चेदमिति प्रोक्ते ८३ तद्हेतौ दोषमुद्भाव्य ७६ तस्मात् सम जनै. ४८ तात्त्विकः प्रातिभः ८० त्रायन्ते वा पदानि ८२ दृष्टवादैः श्रुतज्येष्ठै. ६५ द्रुत विलम्वितं ९० नदीपूरोप्यधोदेशे न रात्री नापि ७६ नार्थसम्बन्धिन: ८१ नैवारोहेत् तुला ७९ पक्षपाताद् वदेद् पञ्चावयवान् योग. ६५ पत्राथै न विजानाति ५१ परप्रधर्षप्रहितेन ५० परार्थे तात्विकस्येव ७५ पित्रोश्च ब्राह्मणत्वेन ८४ प्रकृतेर्महास्ततोहकारः ७६ प्रतिज्ञा तु न कर्तव्य। ८८ प्रतिवाद्यानुलोम्येन ४८ प्रसिद्धावयव गूढ ७३ प्रसिद्धावयवं वाक्यं ८० प्राकृतसंस्कृतमागध ९० प्रातिमे नियतार्थे वा १५७ अद्भानि चत्वारि अङ्गीकृत वस्तु अज्ञाततत्त्वचेतोभिः अज्ञानोपास्तिरज्ञानं अनुग्राह्यस्य शिष्यस्य अनेकवाचके शव्दे अपक्षपातिन: प्राजाः अपूज्या यत्र पूज्यन्ते अर्थापत्त्युपपत्ती असंकेताप्रसिद्धादि असमेनापि दृप्तेन अस्यकत्वं शठता आजागाम्भीर्य आज्ञावान् धार्मिकः आदिशन् वादयेद् इति पञ्चापसारेण उक्त हेतौ विपक्षण उपचारेण वक्त्रा कुर्यात् सदावह क्षमी स्वपरपक्षज्ञः गोष्ठया सत्साधनैरेक चित्राद्यदन्तराणीचं छलादयस्तदाभासाः छलायुद्भावने जानन्नुभय सिद्धान्तो ज्ञातपत्रार्थकः ७७ ८२ ८८ ९० ८७ ११९ - . ८६ ८७ ८७. ७४ ८६. SALAMITTET- rrrrr-mmm mantra------- - HAM LA -------- 11 ܚ f ܀ ܐ 1 .ܝ ܨ ܝܐ ܕ ܝܺ ܞ ܕ ' F g ܪ ܪ ܀ ܕܕ ܕ ܢܐ ܬ f 1 ܝܕ 4 ܐ f ܪ ܐܐ £ ܪܨ ܂ 3 < * } ܬܐ ; ܬܐ ܀ fܙ -܀ ܟܐ ܝܪ ܐ h ܪ y ܙ ; ܚ 1 ܐ܀ ܟ ܀ ܨܵ܀ : ܕ 31 ; ܕ ܟ ܀ ܃ ܂ ܀܀ J ܐ # ܬܕ ܠܕ ܙ H R 1 ܢ ܕ Q M ܪ ܝܝ ܕ 4 ܬܶ * ܛ F ' 4 ܐܐ ܀ ܪ . , ܀ ..

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Jīvarāja Jaina Granthamālā General Editors • 2. Dr A N. UPADHYE & Dr H L JAIN 9017 1 'Tiloyapannattı of Yativrsabha (Part I, chapters 1-4): An Ancient Prābrit Text d'éaling with Jaina Cosmography, Dogmatics etc Prākrit Text authentically edited for the first time with the Various Readings, Preface & Hindi Paraphrase of Pt. BALACHANDRA by Drs A N UPADHYE & H L JAIN Published by Jaida Samskrti Samraksaka Samgha, Sholapur (India) Crown 8vo Ďp 16–38–532 Sholapur 1943. Price Rs 1200 Second Edition, Sholapur 1956 Price Rs 16.CO 1 Tzlóyabannattı of Yatıvrsabha (Part II, Chapters 5-9): As above, with Introductions in English and Hindi, with an alphabetical index of Gāthās, with other indices (of Names of works mentioned, of Geographical Terms, of Proper Names, of Technical Terms, of Differences in Tradition of Karanasūtras, and of Technical Terms compared) and Tables of Nāraka-jīva, Bhavana-vāsi Deva, Kulakaras, Bhāvana - Indras, Sıx Kulaparvatas, Seven Ksetras, Twentyfour Tırtl akaras, Age of the Salikāpurusis, Twelve Cakravartins, Nine Nārāyanas, Nine Pratiśatrus, Nine Baladevas, Eleven Rudras, Twentyeight Nahsatras, Eleven Kalpātīta, I welve Indras, Twelve Kalpas and Twenty Prarüpanās) Crown Octavo Pp 6-1 -108-5 9 to 1032, Sholapur 1951 Price Rs 16 00 2 Yaśastılaka -and Indian Culiiite, vor Somadeva's Yaśastilaka and Aspecis of Jainism and India'n Thought and Culture in the Tenth Century, by Professor K K HANDIQUI, Vice-Chancellor, Gauhati University, Assam, with Four Appendices, Index of Geographical Names and General Index Published by J., S S Sangha, Sholapur. Crown Octavo pp 8-540 Sholapur 1979 Price Rs 16 00 ' 3. Pandavapiltānam of Subhacandra A Sanskrit Text dealing with the Pāndava Tale Authentically iedited with Various Readings, Hindi Paraphrace, Introduction vin Hindi etc by Pt JINADAS' Published by J S. S. Sangha, Sholapur Crown Octavo pp 4-40-8-520 Sholapur 1954 Price Rs 12 00 4 Prnkrta-śabdānusāsanam of Trivikrama with his own commentary Critically Edited with Various Readings, an · Introduction and Seven Appendices (1 Trivilsama's Sūtras so Alphabetical index of the Sütras, 3 Metrical Version pf (2) . the Sūtrapātha ; 4 Index of Apabbramsa Stanzas, 5. Index of Deśya words, 6. Index of Dhātvādesas, Sanskrit to Prākrit and vice versa, 7. Bharata's Verses on Prākrit), by Dr PL VAIDYA, Director, Mithilā Institute, Darbhanga Published by the J. S S. Sangha, Sholapur. Demy Svo. pp. 44-178. Sholapur 1954. Price Rs. 10.00. Siddhānta-sārasamgraha of Narendrasena : A Sanskrit Text dealing with Seven Tattvas of Jainism Authentically Edited for the first time with Various Readings and Hindi Translation by Pt. JINADAS P PHADKULE Published by the J S. S. Sangha, Sholapus Crown Octavo pp about 300 Sholapur 1957 Price Rs 10 00 6. Jainism in South India and Hyderabad Epigraphs : A learned and well-documented Dissertation on the career of Jainism in the South, especially in the areas in which Kannada, Tamil and Telugu Languages are spohen, by PB Desai, M A , Assistant Superintendent for Epigraphy, Ootacamund, Some Kannada Inscriptions froin the areas of the former Hyderabad State and round about are edited here for the first time both in Roman and Devanāgari characters, along with their critical study in English and Sārānuvāda in Hindi Equipped with a List of Inscriptions edited, a General Index and a number of Illustrations Fullis} ed by the J S. S Sangha, Sholapur 1 57 Crown Octavo pp. 16–456. Price Rs 16.00 7 Jambūdivapannattı-Samgaha of Padmanandi Airākrit Text dealing with Jaina Geography Authentically edited for the first time by Drs. A N. UPADAYE and H. L. JAINA, with the Hindi Anuvāda of Pt BALACHANDRA The introduction institutes a careful study of the Text and its allied works. There is an Essay in Hindi on the Mathematics of the Tiloyapannattı by Pro'. LAKSHMICHANDA JAIN, Jabalpur- Equipped with an Index of Gāthās, of Geographical Terms and of Technical Terms, and with additional Variants of Amera Ms Published by the JS S Sangha, Sholapur Crown Octavo pp. about 500 Sholapur 1957 Price Rs 16 8. Bhattāraka-saṁpradāya A History of tbe Bhattāraha Pithas especially of Western India, Gujarat, Rajasthan and (3) 9 . Madhya Pradesh, based on Epigraphical, Literary and Traditional sources, extensively reproduced and suitably interpreted, by Prof. V JOHRAPURKAR, MA Nagpur. Published by the J. S. S. Sangha, Sholapur, Demy Octavo pp 14-29-326, Sholapur 1960. 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Atmānušāsana of Gunabhadra (middle of the 9th century A.D) This is a religio-did actic anthology in elegant Sanskrit verses composed by Gunabhadra, the pupil of Jinasena, the teacher of Rästrakūta Amoghavarsa The text is critically edited along with the Sanskrit commentary of Prabhācandra and a new Hindi Anuvāda by Dr A N UPADHYE, Dr H. L JAIN and Pt BALACHANDRA SHASTRI The edition is equipped with introduction in English and Hindi and some useful Indices Demy 8vo pp 8-112-260, Sholapur 1961 Price Rs al- 12 Ganita sārasamgraha of Mahāvírācārya (c 9th century AD) This is an important treatise in Sanskrit on early Indian mathematics composed in an elegant style with a practical approach Edited with Hindi Translation by Prof. LC JAIN, MSC , Jabalpur. Crown Octavo pp. 16 + 34 + 282 + SP, Sholapur 1963 Price Rs. 121- (4) 13 Lokavibhāga of Simhasűri A Sanskrit digest' of a missing ancient Prākrit text dealing with Jaina cosmography! Edited for the first time with Hindi, Translation by Pt. 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Tirtha-vandana-samgraha A compilation and study of Extracts in Sanskrit, Prākrit and Modern Indian Languages from Ancient and Medieval Worhs of Forty Authors about (Digambara) Jaina Holy Places, by Dry P JOHRAPUR- KAR, Jaora Demy Octavo pp 208, Sholapur, 165 Price Rs 5/7. 18 Pramāprameya A treatise, on Logical Topics by Bhāvasena Traividya. Authenticallv., Edited 11th Hindi Translation, Noths etc by Dr. V PJOHRAPURKAR, Mandla, Demi Octavo pp 158 Sholapur 1966. Price Rs, 5/7., } T 1 WORKS IN PREPARATION Subhāsıta-samdoba Dharmą-parilsā, Jřānārnava, Dharmaratnākara, etc, For copies write to Jaina Samskrti Samrakshaka Sangha, SANTOSH BHAVAN, Phaltan Galli, Sholapur (C, Rly ), India 1 *

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Pramaprameya No.-18

Author
Dr.v.p.johrapurkar
Title
Pramaprameya No.-18
File name
Pramaprameya No.-18
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2010/08
Publisher
Sholapur, Gulabchand Hirachand Doshi Jain Samskrti Samraksaka Samgha
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327608
Barcode
99999990002298.00
Scanning centre
Banasthali University
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