Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Rishidev Ak Prishilan
Front matter
ऋषभदेव : एक परिशीलन
लेखक
परम श्रद्धय प० श्री पुष्कर मुनि जी म.
के सुशिष्य
देवेन्द्र मुनि शास्त्री, 'साहित्यरत्न
सन्मति शान the.
समति ग्रन्थमाला फा ७ वा ग्रप रन
पुस्तक प्रकाशन मे प्रष-सहयोग
२
था जारावरमल जी मघराज भी कुवाट मतपुर जि पाली
श्री मुलतानमल भी भीखमचन्द जी माक्लसर मि वाहमर
श्रीमती सुनीला पारसमल बोहरा जयपुर
श्रीमती शान्ता सिद्ध श्वर नाथ मोदी जयपुर
पुस्तक
ऋषभदेव एक परिशोकम
मूमिका
उपाध्याय प्रमर मुनि
लखक
श्री देवेद्र मुनि
प्रकाशक
सम्मलितानपीठ
लोहामण्डी बागरा-
प्रथम सस्करण
प्रथम १९६७
मुद्रा
श्री विष्णप्रिटिनप्रस
राजामण्डी बागरा-२
।
ऋषभदेव : एक परिशीलन
--
प्रथम सड
.
अपभजीको
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र समृति में उस मल पुरुष को, उनके जीवन-माल की विभिन्न
भने दान कर गहराई में हमने परहने को नाज उत्पन्त गाव पाना
प्रकाशकीय आर्यमस्कृति / आदिपुरुप भगवानऋषभदव की जीवन-गाया कना और संस्कृति, शिक्षा और माहित्य, बम और राजनीति का आदि-प्रोत है । आय सस्कृति का वह महाप्राण व्यक्तित्व दो युगो का सन्धि-काल है, जब अरुम से जीवन मे जडता छा रही थी और भोगासक्ति ने जीवन को नि सत्व वना रखा था, तब ऋषमदेव कमन्युग के आदिसूत्रधार बने, अकर्म को कर्म की भार प्ररित किया, भोग को योग से परिष्कृत करन की कला सिखलाई। पुरुपार्थ जमा, कला का विकास हुआ, समाज की रचना हुई, राज्य शासन का निर्माण हुआ, और धर्म एव मस्कृति को पावन रेखाएं आकार पाने लगी। जन, बौद्ध और वैदिक-तीनो परम्पराओं म भगवान ऋषभदव की महिमा के स्वर प्रतिध्वनित होते सुनाई देते है और यह प्रतिध्वनि आय- मम्कृति की मौलिक एकता का समय चिन्ह है । भले ही ऋषभदेव के विराट मक्तित्व को विभिन्न परम्पराओं न विभिन्न दृष्टिपो से देखा हो किन्तु उसस उनका महानता और सर्वव्यापकता मे कोई अन्तर नहीं आता। विभिन्न दिगामा में बसने वाले यदि हिमालय या सुमेर के विभिन्न भागो को देखकर अपनी-अपनी दृष्टि से उसका वर्णन कर तो उमसे हिमालय या मुमेरु की महान सत्ता में कोई अन्तर नही पडता, बल्कि उसकी सार्वदेशिकता का ही प्रमाण मिलता है। आप सस्कृति के उस मूल पुरुष को, उनके जीवन-सात को विभिन्न धागयों में अवगाहन कर महराई से समझने-परखने को आज अत्यन्त आवश्यकता है । हम प्रसनता है कि परम श्रदय प० श्री पुष्कर मुनिजी महाराज के शिष्य उदीयमान साहित्यकार श्री देवन्द्र मुनित्री शास्त्री ने इस दिशा म यह एष महनीय प्रयल किया है। बहीने अनेक अन्धो का परिशीलन करके भगवान ऋषभदेव के महान कतृत्व को जिस सक्षेप किन्तु प्रामाणिक और तुलनात्मक शली से प्रस्तुत किया है वह वस्तुत अभिनन्दनीय ही नही किन्तु अनु करणीय भी है। साथ ही अस्वस्थ होते हुए भी श्रद्धय उपाध्याय श्री जी न भगवान मादिनाथ के महाप्राण व्यक्तित्व के विचार बिन्दु को मवीन दृष्टि परिवश में उपस्थित कर जो महत्वपूर्ण प्रस्तावना से अय की श्रीवृद्धि की है उसके लिए भी हम उनके प्रति हादिन तम है। सम्मति ज्ञानपीठ क महत्वपूर्ण प्रकाशन बाज साहित्य क्षत्र में अत्यधिक भादर एव गौरव प्राप्त कर रहे हैं । हमे विश्वास है कि यह प्रकाशन भी हमारी उसी गौरवमयी परम्परा की एक करी बनेगा। पाठक से अधिकाधिक अपनाकर हमारा उत्साह बढायेगे । इसी बाशा के साथ मन्त्री सन्मतिमानपीठ लेखक की कलम से भारतवर्ष के जिन महापुरुषों का मानव जाति के विचारो पर स्थायी प्रभाव पड़ा है उनमे भगवान् ऋषभदेव का प्रमुख स्थान है । उनके अनलोदत्त व्यक्तित्व और अमाधारण म अमृतपूर्व कृतित्व की छाप जन-जीवन पर बहुत ही गहरी है । आज भी अनेको व्यत्ति यो का जीवन उनके निर्मल विचारो से प्रभावित है। उनके हृदयाकाग मे चमकते हुए आकाशदीप की तरह वे गुणीमित है । जैन व जनतर माहित्य उनको गौग्य-गाथा से छलक रहा है । उनका विगट व्यक्तित्व मम्प्रदायवाद, पथवाद से उन्मुक्त है। वे वस्तुत मानवता के फीतिस्तम्भ है। भगवान् यापभदेव का समय भारतीय ज्ञात इतिहास म नहीं आता। उन अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए भागम आगमैतर प्राच्य साहित्य ही प्रबल प्रमाण है। जैन परम्परा की दृष्टि से भगवान् ऋषभदेव वर्तमान अवसर्पिणी काल के तृतीय आरे के उपसहार काल मे हुए है।' चौवोमवे तीथवर भगवान् महावीर और ऋषभदेव के बीच का समय अमख्यात वर्ष का है। वैदिक दृष्टि में भी ऋषभदेव प्रथम मतयुग के अन्त में हुए है और गम व कृष्ण के अवतारो से पूर्व हुए हैं । जैन साहित्य मे कुलकरो की परम्पग मे नाभि, और सुपभ का जैसा म्यान है, वैसा ही स्थान बौद्ध परम्परा में महासमन्त का है। सामयिक परिस्थिति भी दोनों में समान रूप से ही चित्रित हुई है। सम्भवत बौद्ध परम्परा मे ऋषभदेव का ही अपर नाम महासमन्त हो। १ जम्मूढीप प्रज्ञप्ति (प) कापसून कल्पसूत्र ३ जिनेन्द्र मत दर्पण भाग०१पृ०१० ४ रोपनिकाय अग्मन्त्रमुत्त भाग-३ (ख) जैन साहित्य का वृहद् इतिहास भाग० १ प्रस्तावना पृ. २२ २ ऋपमदद का परित्र जिस प्रकार जन और बदिक साहित्य म विस्तार से चित्रित किया गया है क्सा बौद्ध साहिम मे नही हुमा । केवल कही-कही पर नाम निर्देश किया गया है। जैसे धम्मपा की उसम पवर वीर गाथा म अस्पष्ट रीति से ऋषभनव और महावीर का उल्लेख हुआ है। बोदाचार्य श्रम कीति न सक्न आप्त-हरण में ऋषभ और बढमान महावीर का निर्देश दिया है और बचाय आप भी अपभदेव को भी जैन धर्मा आद्य प्रचारक मानत है। आधुनिक प्रतिमामम्पन्न मूर्धन्य विचारक मा य मत्य तय निमकाष स्पस स्वीकारन सग है कि भगवान कृषभन्ब मही जैन धमका प्रावि डाक्टर हमनकामा जिवन - वि इममा प्रभारी शिपाश्वनाम जन धर्म गरभाषा थे। नगरपग प्रथम नोकर अपमन्यान धर्म का सस्थापक मानने गाएक मन । । म मान्यता म एतिहासिक मत्य की अत्यधिक मम्भावना है। प्रस्तुत प्रश्न पर चिन्तन परल हुए साक्टर राधाकृष्णन लिखत है कि 'जैन परम्परा पभव म अपने गर्म की पत्ति का क्थन करती है जो बहुत ही पानादियो पूर्व हुए है । “म वात क प्रमाण पाय जाते हैं कि 'स्वी पूर्व प्रथम मताम्दी म प्रथम तीर्थकर उपभवव की आराधना होती थी। "समे को सन्देह नहीं कि जैन धर्म व मान महावीर और पाश्वनाथ मे भी बहुत पहले प्रचलित था। मजुव द माइपभन्य अजिवना बोर अग्निमि इन तीनाकगे नाम आत है। भागवत पुराण भी इस बात का ममपन परता है कि कपभन्य जैन धम के मस्थापक थे। ५ धम्मपद ४ पण्डियन हिस्टाविस क्याटलो भाग इण्डि एगि जिद पृ० १६३ (ख) जन साहित्य का इतिहास-पूर्वपीटिका पृ ५ भारतीय दशन का इतिहासकार राधाकृष्णन् विन्द १ पृ. २८७
वं देव जगता योति
स्व देव
जगतां गुरु ।
ल देव जगता धाता
त्व देव जगता पति ।।
-प्राचाय जिमसेन
प्रस्तावना अनन्त अमीम व्योममण्टल में भी विगट् । अगाध अपार महामागर गं भी विणात । एक अद्भुत, एक अद्वितीय ज्योतिधर व्यक्तित्व | जिपर ग भी इसिए, जहाँ भी दैथिए, और जब भी देग्गिए-महान महल, लक्ष-लक्ष, वाटि- कोटि, अमम्य अनन्त प्रकाम किग्गा विकीरणं हाती दीवगी। महासात इतिहास की गणना में परे हो गया, मग्यातीत दिन और गत गुजरत चने गा, परन्तु यह ज्योति न तुमी है, न बुझ मकेगी मीमा में नहीं, गगवान् ऋषभदेव के व्यक्तित्व और कृतित्व को गब्दा बांधा जा सकता । प्राकृत में, मगृत मे, अपभ्रश मे, नानाविध अन्यान्य लोक-भापाया में ऋषभदय रे अनकानेक जीवन चरित्र लिगे गार ह, निग जा रहे हैं, परन्तु उनके विगट पर गव्य जीवन की सम्पूर्ण रवि गोई भी अकित नही कर मका है। अनन्त आकाश म गगद-जैसे अगम्य विहग जीवन-भर उदान मग्ने रहे हैं, पर आकाग की इयत्ता का अता-पना न किसी को लगा है, न लगेगा। क्या लौकिक और क्या लोकोत्तर, क्या भौतिक और क्या बाज्यात्मिक, क्या मामाजिक और क्या राष्ट्रीय, क्या नैतिक और स्या यामिक-मभी दृष्टिया में उनका जीवन दिव्य है, महतामहीयान है। हम जीवन-निर्माण की दिशा मे जब भी और जो कुछ भी पाना चाह, उनके जीवन पर से पा सकते हैं । आवश्यकता है केवल देखने वाली टिपी और उम दृष्टि को मृष्टि के म्प में अवतरित करने की । भगवान् ऋपभन्दैव मानवसम्मति के आदि मरकर्ता है, आदि निर्माता हैं। पौराणिक गाथाषा के आधार पर, वह काल, आज भी हमारे मानम- चक्षुओं के समक्ष है, जत्र कि मानव मात्र आजाति मे ही मानव था । अपने क्षुद्र देह की मीमा मे या हम म मानवाकार पणु ही तो था, और क्या न उमे लोक का पता था, न पग्लोक पा। न उमे ममाज का पता था, न परिवार का । न उमे वर्म का पता था, न अवर्ग का । बिगुल कटा हुआ-मा अकेला शून्य जीवन । पिता पुन भाई बहिन पति-पली-जसा कुछ भी लोक-व्यवहार नही कोई भी मर्यादा नहीं। साथ रहने वाली नारी को हम भले ही माज की शिष्ट भाषा मे पली कह द परन्तु सचाई तो यह है कि वह उस युग मे एकमात्र नारी थी स्त्री थी और कुछ नही । स्त्री वस देह है और पत्नी इससे कुछ पर है । पनि-पत्नी दो शरीर नहा है जो वासना के माध्यम से एक दूसरे के माय नते है । व एक मामाजिक एव न तक भाव है ना बनध्य की म्वरेवाओ म मर्यादावा है। और यह सब उस आनि युग मे कहा था ? बन की पभ्यता । अवेहव्यक्तित्व भूप गीता घर उधर गया कन्द मूल फल खा वाया ।प्यास लगे तो भरमा का कहना पानी पी आया । अय विमो के लिए न माना और न जाना न भविष्य के wिो कुछ सग्रह । अनी बार अनागत स कट कर केवल बनमान मे आबद्ध। अपने ही पे वीसधा पिपासा से गि केवल व्यकिनिष्ठ जीवन । प्रकृति पर आथित वृदो से परिपोपित । मनुत्व नहीं वेवल भोरगुत्व थम नही परपाय नही । न अपने परो खग होना और न अपने हाथो कुछ करना । मनायन शरीर म नीचे क्षपातुर पेट और कार खाने वाला मुख । बीच मे हाथ परो का कोई खास काम मही उत्पादक स म । या चित्र है भगवान ऋषभदेव से पूर्व मानव मम्यता का। भगवान् पभदेव के युग म यह वन-सभ्यता बिखर रही थी। अनसख्या बढ़ने लगी। उपभोका अधिक होने जा रहे थे परन्तु उनकी तुलना मे उपभोगसामग्री अप। ऐसी स्थिति म मर्प अवश्यम्भावी था और वह हुमा भी। क्षपातुर बनता वृक्षो के चटवारे के लिए लगने लगी। सब ओर आपाधापी मर गई । भगवान ऋषभदेव ने उक्त विषम स्थिति में अभावप्रस्त जनता का योग्य नेतृत्व किया। उन्होने घोपण की-मर्म भूमि का युग समाप्त हो रहा है अब अनममाज को कमभूमि युग का स्वागत करना चाहिए । प्रकृति रिक्त मही है । अब भी उसक असर मे अक्षय भण्डार शिा पडा है। पुरुष हो पुरषार्थ परो । अपने मन मस्तिष्क से मोची-विचारो और उसे हायो मे मूर्तरूप दो थम म ही थी है अन्यत्र नहीं । एष मुख है माने वाला तो हाप दो है सिलान वाले। मूपा मरने का प्रश्न ही कहाँ है? अपने यम ने बल पर अभाव को भाव से भर दो। भगवान कृपगदेव ने कृषि का सूत्रपात किया । अनेकानेक गिल्मो की अबतारणा को । कृपि और उद्योग में वह अद्भुत सामगम्प स्थापित किया कि धरती पर स्वग उतर आयो । क्मयोग की वह रसधारा बही कि उजडते और वीरान हाते जन-जीवन म मन आर नव-यमात खिल उठा, महक उठा । हे मेरे देव, यदि उस समय तुम न हाते तो पता नहीं, इस मानव जाति का क्या हुआ होता ? होता क्या, मानव-मानव एक दूमर के लिए दानव हो गया होता, एक दूसरे को गगनी जानबगे की तरह पा गया होता । "बुभुक्षित कि न करोति पापम् ?" भौतिक वैभव एवं ऐश्वर्य के उत्वप में एक मतग है, वह यह कि मनुष्य स्वय को भूल जाता है, अन्धरे में भटक जाता है । भाग में भय छिपा है, "भोगे रोमभयम् ।" तन का गेग ही नहीं, मन का गेग भी । मन का गेग ताक गेग से भी अधिक भयावह है । यढती हुई मन की विकृनिया मानव को कहीं रा भी नहीं छोड़ती-न घर का न घाट का। भगवान् प्रपभदेव ने इग तथ्य का भी ध्यान में गया । उन गृहससार मे महाभिनिष्क्रमण अपनी अन्तगरमा का परिमार्जित व परिपत करने के लिए ता था ही, माथ ही मावजनीन हित का भाव भी उसके मूल में था । महापुग्पो को माधना म्ब-पग्कल्याण की दष्टि से दू पर्थक होती है-"एफा किया हु ययका प्रमिहा।" भगवान् ऋरभदेव ने पून्य निजन वनो मे, एकान्त गिरि-निकुज्जो मे, भयावह पयानो मे, गगन- नुम्बी परतो की मान्त नीग्य गुफाओ मे तप मापना की। यह तप जहाँ बाघम्प मे ऊँचा और बहुत ऊँचा था वहाँ आभ्यन्तर म्प मे गहरा और बहुत गहरा भी था । व शरीर मे परे, इन्द्रियो गे पर और मन म परे होते गए - होने गए, और अपने आपके निकट, अपने शुद्ध निरजन-निविकार स्वरूप के समीप पहुँचते गए-पहुंचने गए। और लम्बी साधना के बाद एक दिन वह मगल क्षण आया कि अन्तर म कैवल्य ज्योति का अनन्त अक्षय-अव्यानाय महाप्रकाय जगमगा उठा, स्वमगल के माथ ही विश्वमगल का द्वार खुल गया। भगवान ऋषभदेव तोयसर बन गए 1 मदेशना के प म उनकी अमृतवाणी का वह दिव्यनाद गुंजा कि जन-जीवन मे फैलता आ रहा अन्धकार छिन्न-भिन्न होगया, मब ओर आध्यात्मिक भावो का दिव्य आलोक आलोकित हो गया । भगवान् ऋषभदेव का जीवन समन्वय का जीवन है ! वह मानवजाति के ममक्ष इहलोक का बादश प्रस्तुत करता है, परलोक का आदन प्रस्तुत करता है, और प्रस्तुत करता है-इहलोक-परलोक स परे लोकोत्तरता का आदश । उनका जीवन-दर्शन उभयमुखी है । जहाँ वह वाह्यजीवन को परिष्कृत एवं विकसित करने से बात करता है, वहाँ अन्तर्जीवन को भी विशुद्ध व प्रबुद्ध रखने का परामर्श देता है । उनका अभ्यारम भी निष्क्रिय जड एष एकांगी नही है वह सचेतन है प्राणवान है और देश काल एव व्यक्ति की भूमिकाओ को यपाय के घरावल पर स्पर्श करता है। इस सन्दर्भ में उनके अपने ही जीवन के एक दो प्रसङ्ग हैं। साधना-काल मे जब भगवान जगलो एष पहाडो के सूने प्रचलो मे एकान्त साधनारत रह रहे थे तो प्रारम्भ मे एक वर्ष तर उहोने अन्न जल ग्रहण नहीं किया अनशनतर पी लम्बी सापना चलती रही। प्रभु के लिए तो यह सहजपा परतु साथ मे दीमित होने वाले चार सहन साधक विचलित हो गए। वे भूख को वेदना को अधिक काल तक सहन न कर मवे । भगवान् की देखादेखी कुछ दूर तक तो अनशन के पथ पर साय साप घले परन्तु गजराज की गति को कोई पकडे भी तो कहा तक पकडे ? सब के सब पिछडते चले गये कोई कही तो कोई कही। पिछडे ही नहीं पय भ्रष्ट भी हो गये। विवेकज्ञान के अभाव मे ऐसा ही कुछ हुआ करता है-देखा-देखी साध बोग छोणे कापा बाट रोग । भगवान् अपमदेव ने वर्ष समाप्त होते-होते जब यह देखा तो उनका चिन्तन मोड ले गया। उन्होने आहार ग्रहण करने का सकल्प किया अपने लिए उपना नही जितना कि भविष्य के साधको को साधना के मध्यम भाग की रष्टि प्रदान करने के लिए । भगवान् के तत्कालीन अनक्षर चिन्तन को अक्षरबद्ध किया है-जन दशन के सुप्रसिद्ध नत्त्वचिन्तक महामनीषी बाधार्य जिनसेन ने अपने महापुराण मे- न केवलमम काय कशनीयो मुमुक्षम । माऽप्युरफटरसै पोथ्यो मृष्ट रिष्ट श्व बल्भन ॥५॥ वशे यथा स्युरक्षाणि मोत पावन्स्पनूरपथम् । तथा प्रतितय्य स्याद् वृत्तिमाश्रित्य मध्यभाम् ॥६॥ बोपनिहरणायेष्टा उपवासाचपक्रमा। प्राणसन्धारणामायम् माहार सूत्रशित ॥७॥ कायरलेगो मतस्तावन् न सक्सेशोऽस्ति याषता । सम्लेश हासमाधान मार्गास् प्रच्युतिय पक्ष -पर्व २ मुमुन साधको को यह शरीर न सो क्वस कृश एव क्षीण ही करमा चाहिए और न रसीले एव मधुर मन चाहे भोजनो से इमे पुष्ट ही करना चाहिए।
-जिस तरह भी ये इन्द्रियां साधक के वशवर्ती रह, कुमाग की भार न दौडे , उसी तरह मध्यम वृत्ति का आश्रय लेकर प्रयत्ल करना चाहिए । ---दोपी को दूर करने के लिए उपवाम आदि का उपरम है, और प्राण धारणा के लिए आहार का ग्रहण है, यह जन मिद्धान्तमम्मत माधना मूत्र है । - साधक को कायक्लेग तप उतना ही करना चाहिए, जितन म अन्तर में मक्लेश न हो । क्योकि सक्लेस हो जाने पर चित्त समाधिस्थ नहीं रहता, उद्विग्न हो जाता है, जिसका किमी न किमी दिन यह परिणाम आता है कि मायक पथभ्रष्ट हो जाता है। भगवान् ऋषभ के द्वितीय पुन महावली बाहुवली, युद्ध मे अपन ग्यप्ठ यन्धु भरतचक्रवर्ती को पराजित करके भी, राज्यासन से विरक्त हो गए। कायोत्सर्ग मुद्रा मे अचल हिमाचल की तरह अविचल एकान्त वनप्रदेश म सटे हो गए । एक वप पूरा होने को बाया, न अन्न का एक दाना और न पानी की एफ वू'द । न हिलना, न दुलना । सचेतन भी अचेतन की तरह भवया निप्रकम्प । कथाकारों की भाषा मे मस्तक पर के केश पटते-बनने जटा हो गए और उनमे पक्षी नीड वनाकर रहने लगे। घुटनो तक ऊँचे मिट्टी के पुल्मीक चढ गए, और उनमे विषधर मपं निवास करने लगे । कभी-कभी सा वल्मीक से निकलते, सरसराते ऊपर चढ़ जाते और ममग्र शरीर पर लीला- विहार करते रहते । मूमि से अकुरित लताएं पदयुगल को परिवेष्टित करती हुई मुजयुगल तक लिपट गई । इतना होने पर भी कैवल्य नही मिला, नही मिला । तप का ताप चरमविन्दु पर पहुँच गया, फिर भी अन्तर का कल्मप गला नही, मन का मालिन्य धुला नही । इतनी अधिक उग्र, इतनी अधिक कठोर सावना प्रतिफल की दिशा मे शून्य क्यो, यह प्रश्न हर साधक के मन पर मडराने लगा। भगवान् ऋषभदेव ने ब्राह्मी और सुन्दरी को भेजा, इसलिए कि वह बाहर से अन्दर में प्रवेश करे, अन्दर के अह को तोड गिराए । पाही और सुन्दरी के माध्यम से भगवान ऋपभदेव का सन्देश मुखरित हुआ। "प्राज्ञापयति तातस्त्वा, ज्येष्ठाय । भगवानिदम् । हस्तिस्कन्वाधिरूवानाम् उत्पद्यत न केवलम् ॥" --त्रिपष्टि०२६७८८ -हे आर्य, पूज्य पिता भगवान् ऋषभदेव तुम्हे सूचित करते है कि हाथी पर चढ़े हुओ को केवल ज्ञान नहीं हो सकता।
कैसा हाथी | मैं बड़ा हू अपने से छोटे बन्धुओ को कैसे बन्दन कर -पह अहवार का आयी । इसी हापी पर से नीचे उतरना है । बाहुबली के निन्तन न अहं से निरह की ओर मोड लिया और ग्याही वदन के लिए कदम उठाया रिश्वल जान का महाप्रकाश जगमगा उठा । उक्त उनहरण स क्या ध्वनित होता है। यहा कि भगवान् ऋषभदेव साधना फेवल बाह्य परिवशतक प्रतिवर नही । उनकी साधनाविषयक प्रतिबद्धता बाहर को नहीं अन्दर की थी। उनका साधना का मुख्य भाषार तन नही भन पा । मन भी क्या अन्तश्चतन्य था। और भगवान का यह दिव्य दशन जनसाधना का बीज मात्र हो गया । आल्किाल सही जन दर्शन तन का नही मन का दर्शन है अन्तश्चतन्य का दान है । वह साधना के बाह्य पक्ष को स्वीकारता है अवश्य परन्तु अमुक सीमा तक हो । बाह्य सान्त है, अन्तर ही अनन्त है। मत अनन्त की उपलब्धि बाहर म नही अन्दर मे है । जब जब साधक बाहर भटकता है बाहर को ही सब कुछ मान मठता है तब-तब भगवान् ऋषभदव के जीवन प्रसङ्ग साधक को अन्दर की भोर उमुख करते है हठ योग से सहज योग की ओर अग्रसर करते है। भगवान ऋषभदेव को निमल धर्मचेतना आज की भाषा मे कहे जान बाल पमो-मतो-सम्प्रदायो से सवथा अतीत थी। उनका सत्य इन सब क्षा परिवेशो मे बद्ध नहीं था। जब कभी प्रसंग माया उन्होने सत्य में इस मम को स्पष्ट किया है--बिना किसी छिपान और दुराव के । राजकुमार परीषि भगवान के पास माईती दीक्षा ग्रहण कर लेता है पर समय पर ठीक तरह साव मही पाता है । तितिक्षा की कमी परीषहो के बाक्रमण से विचलित हो गया तो पथ-प्युत हो गया परिव्राजक हो गया। इस पर सम्भव है, और सबन धिक्कारा हो परन्तु भगवान सर्वतोमावन तटस्थ रहे । मरीषि जन धमग-परम्परा विपरीत परिखानक का बाना लिए समवसरण के द्वार पर बैठा रहता परन्तु इघर से कोई ननुनच नही। इतना ही मही एक बार भरत चक्रवर्ती के प्रश्न समाधान मे मोषणा की कि मरीचि वर्तमान कालचक का अन्तिम तीषहर होगा । बमण परम्परा से उत्प्रजित व्यक्ति के लिए भगवान को यह घोषणा एक गम्मीर अर्थ को बोर सकेत करती । वेप मार पन्म की सीमाएं सत्य को सीमा को काट नही सकती। सत्व क्षीरसागर के बस की भांति सदा निमल एवं मधुर होता है चाहे वह किसी भी पात्र मे हो और जब भी कभी हो । वेष और पन्थ को सीमायो को लांघ कर व्यक्ति म बाज नही तोक्ल अनिम्यक्त हाने वाले सत्य का इस प्रकार उदघाटन करना भगवान् h ऋभपदव की निमल मत्यनिष्ठा का एक अद्भुत उदाहरण है । म अनुभव करता हूँ, यदि कोई और होता तो ऐसी स्थिति में कुछ और ही कहता या मौन रहता । परन्तु भगवान् ऋषभदेव, देव स्या, देवाधिदेव ये । जिन्नान पथभ्राट मरीचि के धूमिल वर्तमान को नहीं, जिन्तु उज्ज्वल भविष्य को ' निया आर यह सत्य प्रमाणित किया कि पनित से पतित व्यक्ति भी घृणा नहीं है । क्या पता, वह कहा और कत्र जीवन को ऊँची-मे-ऊंची गला दया को ठून लगे, आध्यात्मिक पवित्रता को पूर्णरूपेण आत्मसात करने लगे । पया आज हम उक्त घटना पर मे अपने प्रतिपक्षी पैम के लोगो के प्रति मदभावना का भावावर्ग नही ले मकने ? भगवान् ऋषभदेव जीवन के हर काण पर उसी प्रकार दिव्य है, जिम प्रकार वैडूर्यरत्न ! उनका जीवन आज की विषम परिस्थितियों में भी अपन निमल चरित्र की आभा विदेर रहा है। सत्य की दोज में चल रहे हर यात्री के मन पर एक गहरी थाप डाल रहा है। उनका स्मरण होते ही तमयान्न जन मानस में एक दिव्य एव सुखद प्रकाश फैल जाता है । उनके जीवन चरिय मानव चरित्र के निर्माण के लिए हर युग मे प्रेरणा स्रोत रह है और रह गे । यही कारण है कि महाकाल के प्रवाह में कोटि-कोटि दिन और गत बह गये, परन्तु उनके जीवनलेसन को परम्परा अब भी गगा की धारा के समान प्रवहमान है । मुझे हार्दिक हपं है कि भगवान ऋषभदेव के जीवनचरित्रा के मुक्ताहार म एक और सुन्दर मुक्ता पिरोया गया है । हमारे तरुण साहित्यकार श्री दवा मुनि न भगवान ऋषभदेव के चरणकमलो मे अपनी भावभरी श्रद्धाजलि अपित की है,और इस रूप म भगवान आदिनाय का एक सुन्दर बनुनीलनात्मक जीवन परित्र लिखा है। श्वेताम्बर भौर दिगम्बर परम्परा के प्राचीन ग्रन्थो क आधार पर लिखा गया यह प्रमाणपुर सर जीवनचरित्र, चरित्रग्रन्थो के संदर्भ मे नवीन शैनी प्रस्तुत करता है । देवेन्द्र जी का बौद्धिक उन्मेप जो नवीन आलोक पा रहा है, उसका स्पष्ट संकेत उनको यह कृति है । मैं शुभाशा करता है, भविष्य उनका साथ द और वे अपने अध्ययन-अनु- शोलन एव चिन्तन को और अधिक व्यापक बनाते हुए, भविष्य मे और भी अधिक सुन्दर एव विचार पूर्ण कृतियों से जन साहित्य को श्रीवृद्धि कर यशस्वी हो । जन स्थानक बागरा १० अप्रैल, १९६७ -उपाध्याय श्रमर मुनि
मनुक्रम
.प्रथमसम्म
श्री ऋषभ पूर्वभव
. द्वितीय सड
५३
गृहस्थ जीवन
साधक जीवन
तीर्थकर जीवन
१०६
परिशिष्ट (१)
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श्री ऋषभपूर्वभव : एक विश्लेषण श्रमण संस्कृति श्रमण सरकृति आर्यावर्त की एक विगिप्ट और गहान मस्कृति है, जो अज्ञात काल से ही विश्व को प्राध्यात्मिक विचारो का पाथेय प्रदान करती रही है। वे विमल विचार काल्पनिक वायवीय न होकर जीवनप्रसूत है, अनुभवपरिचालित है । डाक्टर एल पी टेसीटरी के मन्दो मे-"इसके मुख्य नत्त्व विज्ञान-शाम्य के प्राचार पर रचे हुए है, यह मेरा अनुमान ही नहीं बल्कि अनुभवगूलक पूर्ग दृढविश्वाग है कि ज्यो-ज्यो पदार्यविज्ञान उन्नति करना जायेगा त्यो त्यो जैन धर्म के सिद्धान्त मत्य मिह होते जायेगे।" एक फुलवाडी श्रमण सस्कृति एक गद्भुत फुलवाडी है, जिसमे भक्तियोग की भव्यता, शानयोग का गौरव, कर्मयोग की बठिनता, अध्यात्म योग का पालोका, तत्त्वज्ञान की रालरपशिता, दर्शग की दिव्यता, कला की कमनीयता, भापा की प्राजलता, भावो की गम्भीरता परि चरित्र- चित्रग के फूल मिल रहे है, महक रहे है, जो अपनी राहज गलौनी सुवाम में जन-जन के मन को मुग्ध कर रहे है। आस्तिक्य श्रमरण-सम्वृत्ति की विचारधागका याचार प्रास्तिकता है। प्रान्तिक और नास्तिक गन्दो को सुधी चित्रो ने जिस प्रकार विभिन्न विधानो मे सजोया है, पिरोया है, उगमे वह चिरचिन्त्य पहेली वनगया है । प्रस्तुत पहेली को सस्कृति व्याकरण के समर्थ प्राचार्य पारिणनि के ऋषभदेव एक परिणीलन अस्तिनास्ति दिष्ट मति 'सूत्र के रहस्य का उन्घाटन करते हुए भट्टा जो दीभितो बडी खूबी के साथ सुलझाया है। उन्होंने पूर्वाग्रहरहित सूत्र का निष्कप निर्भीकता के माथ प्रकाशित करते हुए कहा- जो निश्चित रूप से परलोक व पुनज म को स्वीकारता है वह मास्तिक है और जा उसे स्वीकारता नही वह नास्तिक है। २ अधिक स्पष्ट शो में कहा जाए तो पुण्य पाप स्वग नरक पुनजम और इस प्रकार आत्मा के नित्यत्व मे निष्ठा रखना ही आस्तिक्य है । मास्तिक के अतर्मानस में ये विचार-लहर सता तरगित होती है कि मे कौन हूँ कहाँ से पाया हूँ प्रकृत चोले का परित्याग कर कहाँ जाऊगा और मेरी जीवन याना का अन्तिम पडाव कहाँ होगा।' वह आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारता हे और प्रात्मा की सस्थिति के स्थान लोक को भी स्वीका रता है लोक मे इतस्तत परिभ्रमण के कारण कम को भी स्वीकारता है और कर्मों से मुक्त हाने के साधनरूप त्रिया को भी। श्रमण सस्कृति का यह दूत मन्तव्य है कि अनादि अनन्त काल से प्रात्मा विराट् विश्व में परिभ्रमण कर रहा है । नरक तिर्यञ्च मनुष्य और देवगति मे इधर उधर घूम रहा है। गणधर गौतम की जिज्ञासा का १ २ ३ अष्टाध्यायी अन्याय • पा ४ म्। अस्ति परलोक इत्येनमतिर्यम्य म आस्तिक नास्तीतिमतिर्यस्य स नास्तिक । -सिद्धान्तकौमुदी (निर्णय सागर यम्बई) २७३ (क) अस्थि मे आया उववाए ? नस्थि म आया उववाग ने मह यामी १२ वा इको चुए ह पेच्या भविस्मामि' -आचाराग १११।३ (ब) कम्त्व कोह कुत आयात का मे जननी को मे तात , इति परिभाव सर्वमसार म त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ।। -चपटपरिका-आचार्य शकर से पायावादी सोगावादी कम्मावादी किरियावादी। -आवाराग यस १ अ ११ मू ४ श्री ऋषभ पूर्वभव समाधान करते हुए भगवान श्री महावीर ने कहा-"ऐसा कोई भी म्थल नही, जहाँ यह प्रात्मा न जन्मा हों, और ऐसा कोई भी जीव नही, जिमके माथ मातृ, पितृ, भ्रातृ, भगिनी, भार्या, पुत्र-पुत्री-रूप सम्बन्ध न रहा हो। गौतम को सम्बोधित कर भगवान श्री महावीर ने कहा-हे गौतम | तुम्हारा और हमारा सम्बन्ध भी आज का नही, चिरकाल पुराना है। चिरकाल से तू मेरे प्रति स्नेह सद्भावना रखता रहा है। मेरे गुणो का उत्कीर्तन करता रहा है। मेरी सेवा भक्ति करता रहा है, मेरा अनुसरण करता रहा है। देव व मानव भव मे एक बार नही, अपितु अनेक वार हम साथ रहे है। स्पष्ट है कि माधारण मासारिक आत्मा की तरह ही श्रमण सस्कृति के आराध्यदेव नीर्यकर व बुद्ध भी, तीर्थङ्कर व वुद्ध वनने के पूर्व, नाना गतियो मे भ्रमण करते रहे है । श्रमण सस्कृति ने ब्राह्मणसस्कृति की तरह उन्हे नित्यबुद्ध व नित्यमुक्त रूप ईश्वर नही कहा है और न उन्हे ईश्वर का अवतार या अग ही कहा है । उनका जीवन प्रारम्भ मे कालीमाई की नरह काला था, उन्होने साधना के साबुन से जीवन को मांजकर किस प्रकार निखारा, इसका विशद विश्लेषण आगम व प्रागमेतर साहित्य में किया गया है। AR ५ . ६ जाव कि मन्वपाणा उववण्णपुव्वा हता गोयमा । असति अदुवा अबतखुत्तो। -भगवती सूत्र श० २, उ०३ जीवे सन्मजीवाण माइताए, पियत्ताए, माइत्ताए, भगिणित्ताए, भज्जत्ताए, पुत्तत्ताए, धूयत्ताए, सुण्हत्ताए उववन्नपुव्वे ? हता गोयमा असइ अदुवा अपतनुत्ता । -~-भगवती शतक १२, उद्दे०७ ममणे भगव महावीरे भगव गोयम आमतेत्ता एव वयासी-चिरससिट्टोऽसि मे गोयमा | चिरसथुओऽसि मे गोयमा | चिरपरिचिओऽमि मे गोयमा । चिरजुसिओऽसि मे गोयमा विराणुगमोऽसि मे गोयमा । चिगरपुवत्तीसि में गोयमा । अपतर देवलोए अणतर माणुस्सए भवे किं पर --भगवती शत०१४, उ०७ - ऋषभदव एक परिशीलन सुनहरे चित्र श्रमण सस्कृति दो प्रधान धारामो म प्रवाहित है। एस जैन सस्कृति और दूसरी बौद्धसस्कृति । दोनो ही धारामो मे अपन-अपन आराध्यदेवो के पूवभवो का कथन है। जातककथा मे बुद्धघोप ने महात्मा बुद्ध के पाच सौ सैतालीस भवो का निरूपण किया है। होन बोधिसत्त्व के रूप मे तपस्वी राजा वृक्ष देवता गज सिंह तुरङ्ग शृगाल कुत्ता बन्दर मछली सूअर भसा चाण्डाल आनि अनेक जम ग्रहण किये । बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए उन्होने कसा और क्सि प्रकार जीवन जीया यह उनके जीवनप्रसगो के द्वारा बताया गया है। बुद्धत्व की उपलधिहेतु एक भव का प्रयल नही अपितु अनेक भवो का प्रयत्न अपेक्षित है। जन सस्कृति के समय प्राचार्यों ने भी तीथदूरो के पूवभवो के सुनहरे चित्र प्रस्तुत किये है। उन्हा प्रयो के माधार से अगली पक्तियो मे भगवान श्री ऋपभदेव के पूवभवो का चित्रण किया जा रहा है। किसी भी महान पुरुष के वतमान का सही मूल्याकन परने के के लिए उसकी पृष्ठभूमि को देखना अत्यन्त आवश्यक है । उससे हमे पता चलता है कि आज के महान पुरुप की महत्ता कोई आकस्मिक घटना नहीं वरन जन्म जमान्तरो में की गई उसकी साधना का ही परिणाम है । पूवभवो का वणन उसके नम विकास का सूचक है। इसी दृष्टिकोण को सामने रखकर जन इतिहास के लखको ने भगवान मी ऋपभनेव के पूर्व भवा का विवेचन किया है जिनसे प्रतीत होता हे कि किस प्रकार क्रमश उनकी आत्मा बलवत्तर होती गई और अन्त मे उसका भी ऋषभदेव के रूप में विकास सामने पाया । आवश्यकनियुक्ति प्रावश्यकचूणि पावश्यकमलयगिरिवृत्ति विपष्टिशलाकापुरुपचरित्र और कल्पसून की टीकामो में श्री ऋषभदेव के तेरह भवो का उल्लख हे' और दिगम्बराचार्ग जिनसेन ने बौद्ध धम क्या कहना है' -लेखक कृष्णदत्त भट्ट २७ घण मिहुण-मुर महब्बत-लपियग य बहरबष मिहणे य सोहम्म विज-अचुप चक्की सम्बट्ट उसमे या -आवश्यक मलय वृत्ति पृ १५७२ ८ .
श्री ऋषभ पूर्वभव महापुराण मे व प्राचार्य दामनन्दी ने पुराणसारसग्रह मे दस भवो का निरूपण किया है। अन्य दिगम्बर विज्ञो ने भी उन्ही का अनुकरण किया है । श्वेताम्बराचार्यों ने श्री धन्ना सार्थवाह के भव से भवो की परिगणना की है और दिगम्बराचार्यों ने महावल के भव से उल्लेख किया है । इनके अतिरिक्त अनेक जीवनप्रसगो मे भी अन्तर है। यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इन भवो की जो परिगणना की गई है वह सम्यक्त्व उपलब्धि के पश्चात् की है।" श्री ऋषभदेव के जीव को अनादि काल के मिथ्यात्व रूपी निविड अन्धकार में से सर्वप्रथम धन्ना (धन) सार्थवाह के भव मे मुक्तिं मिली थी और सम्यग्दर्शन के अमित पालोक के दर्शन हुए थे। [१ धन्ना सार्थवाह भगवान श्री ऋषभदेव का जीव एक वार अपर महाविदेह क्षेत्र के क्षितिप्रतिष्ठ नगर मे धन्ना सार्थवाह वनता है। उसके पास विपुल १० आद्यो महाबलो ज्ञेयो ललिताङ्गस्ततोऽपर । वनजङ्घस्तयाऽऽर्यश्च श्रीधर सुविविस्तथा ।। अच्युतो बज्रनाभोऽहमिन्द्रश्च वृषभस्तथा । दशैतानि पुराणानि पुरुदेवाऽश्रितानि वै ॥ -पुराणसार संग्रह सर्ग० ५, श्लो० ५-६ पृ०७४ सम्प्रति यथा भगवता सम्यक्त्वमवाप्त यावतो वा भवानवाप्तसम्यनत्व ससार पर्यटितवान् । -आवश्यक मल० वृत्ति १५७।२ १२ तेण कालेण तेण समएण अवरविदेहवासे धणो नाम सत्यवाहो होत्या । --आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति, पृ० ११५ (ख) आवश्यक मल० वृत्ति, पृ० १५८१ (ग) आवश्यक चूणि पृ० १३१ (घ) तत्र चाऽसीत् सार्थवाहो, धनो नाम यशोधन । आस्पद सम्पदामेक, सरिताभिव सागर ॥ --त्रिपष्टि० १३१॥३६पृ०२ क ऋपभदेव एक परिशीलन वभव था सुदूर विदेशो मे वह व्यापार भी करता था। एक बार उसने यह उद्घोषणा करवाई कि जिसे वसन्तपुर व्यापाराप चलना है वह मेरे साथ सहप चले । मैं सभी प्रकार की उसे सुविधाए दूगा । शनाधिक व्यक्ति व्यापाराथ उसके साथ प्रस्थित हुए।" घमघाप नामक एक जन प्राचार्य भी अपन शिष्यसमुदाय सहित वसन्तपुर धम प्रचाराथ जाना चाहते थे। पर पथ विकट सकटमय होन स बिना साथ क जाना सम्भव नही था। प्राचार्ग न जब उद्घोपग्णा सुनी तो थप्ठी के पास गय और षष्ठी के साथ चलन की भावना अभिव्यक्त की। धष्ठी ने अपने भाग्य की मराहना करते हुए (क) सो खितिपट्टियातो नगरातो वाणिग्जण बसन्तपुर पट्ठिता पासण करेइ बहा–को भए सद्धि जाइ तस्साहमुदन्त बहामि त जहा-खाणेण वा पारोण वा वत्षेण वा पतण घा ओसहेण वा भेस जेण वा अण्णण वा जाण विणा विसूरहतेण ति। आवश्यक मल पर १५८ार (ख) आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति पत्र ११५ (ग) सायवाहा घनस्वस्मिन् सकलऽपि पुरे तत । डिण्डिम वारयित्वोच्च पुरुषानित्यघोषयत ॥ असौ धन साथवाहो वसन्तपुरमेष्यति । य केऽप्यत्र यियासन्ति ते घसन्तु सहाऽमुना ।। भाण्ड दास्यत्यभाण्डायाऽवाहनाय १ वाहनम् । सहाय चाऽसहायायाऽसम्बलाय च सम्बलम् ॥ दस्युभ्यस्नास्यते मार्ग श्वपदोपद्रवादपि। पालपिप्यत्यसौ मन्दान् सहगान बाधवानिव ॥ -त्रिपष्टिक ११४५-४० ३०१ तच सोज्ण बह्म तडियकप्पडियातो ययट्ठा । बावश्यक मल १ १५८ आवश्यक पूणि पृ १३१ (e) आवश्यक हारिभरीया वृत्ति प ११५
श्री ऋषभ पूर्वभव
अनुचरो को श्रमणो के लिए भोजनादि की सुविधा का पूर्ण ध्यान रखने
का आदेश दिया। प्राचार्य श्री ने श्रमणाचार का विश्लेपण करते हुए
बताया कि श्रमण के लिए औद्दगिक, नैमित्तिक, प्रादि सभी प्रकार
का दूषित आहार निपिद्व है। उसी समय एक अनुचर आम का टोकरा
लेकर आया, धष्ठी ने आम ग्रहण करने के लिए विनीत विनती की ।
पर, आचार्य श्री ने बताया कि श्रमण के लिए सचित्त पदार्थ भी अग्राह्य
है। श्रमण के कठोर नियमो को सुनकर श्रेष्ठी अवाक् था।"
प्राचार्य श्री भी सार्थ के साथ पय को 'गर करते हुए वढे जा रहे
थे । वर्षा ऋतु पाई । आकाश में उमड-घुमड़ कर धनघोर घटाएं छाने
लगी एव गम्भीर गर्जना करती हुई हजार हजार धारामो के रूप मे
बरसने लगी। उस समय सार्थ भयानक अटवी मे से गुजर रहा था ।
'मार्ग कीचड से व्याप्त था । सार्थ उसी अटवी मे वर्षावास व्यतीत करने
हेतु रुक गया। प्राचार्य श्री भी निर्दोष स्थान मे स्थित हो गये ।
(ग) नवर इह तेण सम गच्छो साहूण सम्पट्टितो ।
-आवश्यक मल वृ० पृ० १५९१
(घ) अवान्तरे धर्मघोप आचार्य साधुचर्यया ।
वर्मण पावयन पृथ्वो सार्थवाहमुपाययो ।।
-त्रिपष्ठि ११५१।३।१
१६ धनेन पृष्टास्वाचार्या समागमनकारणम् ।
वसन्तपुरमेष्यामस् त्वत्सायनेत्यचीकथन् ।
सार्थवाहोऽप्युवाचव धन्योऽद्य भगवन्नहम् ।
अभिगम्या यदायाता मत्सायन अ यास्थय ।
---त्रिपष्ठि १३११५३-५४॥३॥१
१७. विषष्ठि २११५५ से ६१ पृ. ३२
१५ (क) धणसत्यवाह घोसण,
जगमग अडवि वासगरा ।
-आवश्यक नियुक्ति, गा०१६८
(ख) आवश्यक चूर्णि, जिन० पृ० १३१
(ग) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति ५० ११५
१ ऋषभदेव एक परिशीलन उस अटवी मे साथ को अपनी कल्पना से अधिक रुकना पडा प्रत साथ की खाद्य मामग्री ममाप्त हो गई । क्षुधा से पीडित साप अरण्य मकद मूलानि की अन्वेषग्गा दर जीवन व्यतीत करने लगा। वपावास के उपतहार काल म धन्ना साथवाह को अकस्मात् स्मृति आई कि मेरे साथ जो भाचार्ग आये थे उनको आज तक मैंने सुष नहीं ली। उनके माहार की क्या व्यवस्था है इसकी मैने जाँच नही की। कन्दमूलादि सचित्त पदार्थों का वे उपभोग नहीं करते। वह शीघ्र ही माचार्ग के पास गया और पाहार के लिए अभ्यर्थना की। - २ (घ) सोय सत्या जाहे अडविमझ सम्पत्तो वाहे वासारतो जातो ताहे सो सत्यवाहो अतिदुग्गया पति काऊण तत्येव सत्यनिवस काठ घासावास स्तिो तम्मि ठिए सब्बो सत्यो ठियो। -आवश्यक नियुक्ति मम० ५० १५१ (e) विपष्ठि १११ विप्ठि १०१२॥ (क) माहे य सेसि अप्रसत्ये लयाए निट्ठिय भायण ताहे कन्दमूलाई समुद्दिसन्ति। -~आवश्यक पूणि पृ ११५ (4) जाहे य तेसि तत्थट्ठियाण भोयण निष्ट्रिय ताहे ते बदमूलफलाणि समुद्दिसिंउमारता । -आवश्यक नियुक्ति मल व १५८६१ (ग) मूयस्त्वात् साथलोकस्य दीर्घत्वात प्रावषोऽपि च । यत्रस्य तर माया पाययवसादिकम् ।। ततश्चेतस्ततश्वेतु कुचेसास्तापमा दद। खादितु कन्दमूलादि क्षधार्ता सार्यवासिन । -निपछि ११ ३-१४ (प) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति ११५ यावश्यपनियुक्ति गा १६८ । () आवश्यक्यूणि प १२। २१ श्री ऋपभ पूर्वभव आचार्य श्री ने श्रेष्ठी को कल्प्य और अकल्प्य का परिज्ञान कराया । श्रेष्ठी ने भी कल्प्य अकल्प्य का परिज्ञान कर उत्कृष्ट भावना में प्रासुक विपुल घृत दान दिया । फलस्वरूप सम्यक्त्व की उपलब्धि हुई । २२ (ग) एव काले वच्चति योवावसेमे वासारत्ते धणस्म चिन्ता जाता- को एत्य सत्ये दुक्खितोत्ति ? ताहे सरिय जहा मए सम माहुणो बागया तेसि कदाई न कप्पतित्ति, ते दुक्खिया महातवस्तिणो, तो तेर्सि कल्ल देमि, ततो पभाए ते निमतिया। --आवश्यक मल० वृ० प० १५८।१ (घ) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प० ११५ । वहु बोलीणे वासे चिन्ता घयदाणभासि तया । ---आवश्यक नियुक्ति गा० १६८ (ख) आवश्यकचूणि पृ० १३२ । (ग) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति ११५ । (घ) ते भणन्ति–ज अम्ह कप्पिय होज्जा त गेण्हेज्जामो । तेण पुच्छिय भयव 1 कि पुण तुम्भ कप्पइ ? साहूहिं भणिय-ज अम्ह निमित्तमकयमकारियमसकप्पियमहापवत्तातो पाकातो भिक्खामित्त ततो तेण साहूण फासुय विउल घयदाण दिन्न । -आवश्यक मल. वृ०५० १५८०१ (ड) धन्योऽह कृतकृत्योऽह, पुण्योऽहमिति चिन्तयन् । रोमाञ्चितवपु सपि साधचे स स्वय ददौ ।। आनन्दा-अजलै पुण्यकन्द कन्दलयन्निव । धृतदानावसानेऽथ धनोऽवन्दत तो मुनी ॥ सर्वकल्याणससिद्धी सिद्धमन्त्रसम तत । वितीर्य धर्मलाभ तो जग्मतुनिजमाश्रयम् ।। -त्रिषष्ठि० १११४०-२४२ १०६ तदानी सार्थवाहेन दानस्याऽस्य प्रभावत । लेमें मोक्षतरोर्वीज वोथिवीज सुदुर्लभम् ॥ -त्रिपष्ठि १११४३०प०६ २३ ऋषभदेव एक परिशीलन १२] उत्तरकुरु में मनुष्य वहां से धन्ना साथवाह का जीव आयु पूण कर दान दि म उतरकुरुपत्र मे मनुष्य हुआ। [३] सौधमदेवलाक वहाँ से भी मायुपूण हान पर घना सायवाह का जीव र मन्व रूप मे उत्पन्न हुआ। २४ सो अहाउय पालइत्ता तेण दाणफलण उत्तरकुरुमणुतो -आवश्यक पूर्णि (ख) तेण दाणफलण उत्तरकुराए मणूसो जाओ। -आवश्यक हारिभद्रीमावत्ति (ग) सा य महाग्य पालित्ता कालमागे काल कि चा तेण उत्तरकुराए मणूसा जातो। -आवश्यक मल वृत्ति (घ) कालन सत्र पूर्णायु कालषममुपागत । मास्थितकान्तमुपमेपूत्तरेषु कुरुष्वसौ॥ सीतानबत्तरतटे जभूभानुपूवत । उत्पेदे युग्मधर्मेण मुनिदानप्रभावत ॥ -विपष्ठि १२१२२२६-- (क) ततो पाउपखएण उपट्टिएं सोहम्मेकप्पे तिपलिमी देवो जायो। -आवश्यक चूर्णि (ब) ततो बाउक्सए सोहम्मे फप्पे देवो उववनो। -आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति ५ (ग) आवश्यक मत दृ ५ १५०१ (१) मिधुमायुः पालयित्वा धनजीवस्ततश्च स । प्राग्जमवानफलत सौधर्मे विवशोमवत् ।। -विपष्ठि २५ श्री ऋषभ पूर्वभव १३ [४] महावल वहाँ से न्यवकर वन्ना मार्थवाह का जीव पश्चिम महाविदेह के गधिलावती विजय मे वैताच्य पर्वत की विद्याधर श्रेणी के अधिपति शतबल राजा का पुत्र महाबल हुआ।" प्राचार्य जिनमेनर व प्राचार्य दामनन्दी" ने रमे अतिवल का २७ आवश्यक पूणि मे आचार्य जिनदाम गणि महत्तर ने महावल, ललिताङ्ग, वचजङ्घ, युगल, मुधर्मदेवलोक इन पांच भवो का वर्णन नही किया है। -लेखक तत्तोऽवि पविऊण इहेव जम्बुद्दीवे अवरविदेहे गन्धिलावइविजए वेयड्दपना गन्धारजणवाए गन्धममिद्धे विज्जाहर नगरे मयब नगइयो पुत्तो महावलो नाम गया जातो। ---आवष्यक मल०० प० १५८२ (ग्य) आवश्यक हारिभद्रीया वृ० ५० ११६ (ग) च्युत्वा मौधर्मकरपाच्च, विदेहेप्वपरप्वय । विजये गन्धिनावत्या वैताब्यथिवीधरे ।। भान्यागम्ये जनपदे, पुरे गन्धसमृद्धके । गन गतबलाग्यस्य विद्यावरगिरोमणे ॥ भार्याया चन्द्रकान्ताया पुनत्वेनोदपादि म । नाम्ना महावल इति, बलेनाऽतिमहावल ॥ -त्रिपप्ठि ११०२३१-२४१ ५०१०११ (घ) उत्तरकुरु मोहम्मे महाविदेहे महब्बलो राया। --आव० नि० म० वृ० १५६।१ तस्या पतिरमूल्येन्द्रमुकुटारूढशामन । खगेन्द्रोऽतिवलो नाम्ना प्रतिपक्षवलक्षय ॥१२२॥ मनोहगङ्गी तस्याभूत प्रिया नाम्ना मनोहरा ॥१३१|| तयोर्महावलख्यातिरमूत्सूनुमहोदय ॥१३३॥ -महापुराण एवं ४। श्लो० १२२, १३१, १३३ पृ० १२-१३ २९ अलकाया मनोहस्तिनयोऽतिबलस्य च । महावल उतिख्यात बेन्द्रोऽभूद् दशमे भवे ।। पुराणसार संग्रह श१११ ऋषभदेव एक परिशीलन [२] उत्तरकुरु में मनुष्य वहाँ से धन्ना माथवाह का जीव प्रायु पूरण कर दान क दिव्य प्रभाव म उतरकुरुक्षेत्र मे मनुष्य हुआ । ' [३] सौधम देवलाक वहा से भी मायुपूण हान पर धन्ना सायवाह का जीव साधम कल्प म देव रूप मे उत्पन्न हुमा। - २४ सो अहाउय पालइत्ता तेण दाणफलण उत्तरकुरुमणुतो जाता । --आवश्यक पूणि प १३२ (ख) तेण दाणफलण उत्तरकुपए मणूसो जायो। -आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति पृ ११६ (ग) सा य महाव्य पालिसा कालमासे काल किन्धा तेण दाणफलण उत्तरफुराए मणूसो जातो। -आवश्यक मल वृत्ति प १५८१ (घ) कालन तत्र पूर्णायु कालधर्ममुपागत । थास्थितकान्तसुपपूतरेषु कुरुष्वसौ ॥ सीतानब तरतटे जम्बूवृक्षानुपूवत । उत्पेदे युग्मघमण मुनिदानप्रभावत ॥ -त्रिषष्ठि १४२२६-२२७५ २५ (क) ततो बाउपचएग उम्पट्टिऊण लोहम्मेकप्पे तिपसिओवमन्त्रिीको देवो जायो। -आवश्यक पूणि पृ १३२ (स) ततो भाउसए मोहम्मे कप्प देवो उववन्नो। -~-आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प १९६१ (ग) बावश्यक मल वृप १५८१ (घ) मिथुनायु पालयित्वा धनजीवस्ततश्च स । प्राग्जमदानफलत सौधर्म विदशोमवत । -त्रिपष्ठि ११३८ यो ऋषभ पूर्वभव [४] महावल वहाँ से च्यवकर बना माथवाह का जीव पश्चिम महाविदेह के गधिलायती विजय मे बंताध्य पर्वत की विद्याधर श्रेणी के अधिपति शतबल राजा का पुत्र महाबल हुमा ।" प्राचार्य जिनमेन व मात्रार्ग दामनन्दी ने उसे अतिबल का २६ आवश्यक चूणि मे याचार्य जिनदाम गणि महत्तर ने महावल, ललिताङ्ग, वनजल, युगल, मुधर्मदेवलोक इन---पांच भवी का वर्णन नही किया है। - लेखक तत्तोऽवि पविकण इहय जम्बुद्दीनै अवरविदेहे गन्धिलावइविजरा चंपड्पवास मन्धारणमा पन्धममिद्ध पिज्जाहर नगरे । मयबलगायो पुत्तो महाबली नाम गया जाती। -आवश्यक मल०१०प०१५चार (4) आपल्या हारिभद्रीया वृ० १० ११६ (ग) च्युत्वा गोधर्मकापाच्च, विदयपरवय । विजये गरिबलायत्या ताब्यथिवीधरे ।। गान्धागम्ये जनपदे, पुरे गन्यसमृद्धके । गध शतरलारपस्य विद्याधरगिगेमो ॥ भाया नन्द्रकान्ताया गुभत्वनोदपादि में । नाम्ना महावस दति, घलेनाऽतिमहारल ।। ---विपप्ठि १११२३६-२४१५० १०१ (घ) उत्तग्युक मोहम्मे महानिदेहे महव्यलो गया। --आर०नि० म० यु० १५६१ तल्या पतिरभूपेन्द्रमुपटास्तुशागन । खगेन्द्रोऽतिबलो नाम्मा प्रतिपक्षवलक्षय ॥१२२॥ मनोहगडी तस्यामून प्रिया नाम्ना मनोहरा ॥१३१॥ तयोर्गहावलस्यातिरमूरसूतुमहोदय ॥१३॥ -~महापुराण पयं ४। एलो० १२२, १३१, १३३ पृ० १२-८३ २१ अलकाया मनोहरितनयोऽतियलस्य च । महावल इतिश्यात घेन्द्रोऽभूद दशमे भवे ।। पुराणसार संग्रह ११ २८
ऋषभदेव एक परिपालन
पुर लिखा है। और प्राचार्य मलयगिरि" व प्राचार्य हेमचन्द्र ने
प्रतिबल का पौत्र लिखा है।
महाबल के पिता को एक बार ससार से विरक्ति हुई ३२ को
राज्य दे वह स्वय श्रमण बन गये।
एक बार सम्राट् महावल अपने प्रमुख अमात्यो" के साथ राज्य
३२
३३
महबलरण्णो णत्ता।
-आवश्यक नियुक्ति मल वृ १५८
विषष्ठिशला १२५
अथान्येद्य रसो राजा निर्वेद विपयेप्यगात् ।
वितृष्ण कामभोगपु प्रवज्याय कृतोद्यम ॥
-महापुराण जिन ४१४१४
(ख) त्रिपछि १०१।२५ मे २६५ ।
पुत्र राज्ये निवश्यव स्वय शतबलस्वत ।
बाद शमसाम्राज्यमाचायचरणान्तिके ॥
-त्रिषष्ठि १३१४२७४
(ख) इति निश्चित्य धीरोऽसावभिपेकपुरस्सरम् ।
मूनब राज्यसवस्वमरितातिबसस्तदा ॥
ततो गज इवापेतवन्धनो नि सृतो गृहात् ।
बहुमि खेचर साडं दीक्षा स समुपाददे ॥
-महापुराण जिन ४३१५१३१५२ पु ८५
ते स्वयम्मुख सम्मिन्नमति शतमतिस्तथा।
स्त्यावरष तपासाञ्चक्रिरे मन्विणोऽपि हि ।।
-त्रिषष्ठि ३१२८७११
(ख) महामतिश्च सम्मिन्नति शतमतिस्तथा ।
स्वयश्च राज्यस्य मूलस्तम्मा इव स्पिरा ।।
-महापुराण II
श्री ऋषभ पूर्वभव
सभा मे बैठे
मनोविनोद कर रहे थे। उनके प्रमुख चार अमात्यो
मे से स्वयबुद्ध अमात्य सम्यग्दृष्टि था, सभिन्नमति, शतमति, और
महामति ये मिथ्यादृष्टि थे।
स्वयबुद्ध ने देखा-सम्राट् भौतिक वैभव की चकाचौध मे जीवन
के लक्ष्य को विस्तृत कर चुके है। उसने सम्राट् को सम्बोध देने हेतु
धर्म के रहस्य पर प्रकाश डालते हुए कहा—दया धर्म का मूल है ।
प्राणों की अनुकम्पा ही दया है । दया की रक्षा के लिए ही शेष गुणो
का उत्कीर्तन किया गया है। दान, शील, तप, भावना, योग, वैराग्य
उस धर्म के लिंग है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ही
सनातन धर्म है ।
अन्य अमात्यो ने परिहास करते हुए कहा-मत्रिवर | जब आर
ही नही है तब धर्म-कर्म का प्रश्न ही नहीं रहता। जिस प्रकार महु
गुड, जल, यादि पदार्थों को मिला देने से उनमे मादक शक्ति और
जाती है, उसी प्रकार पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि के सयोग बन्ध
सभृत ।।
कदाचिदय तम्याऽऽसीद्वर्पवृद्विदिनोत्सव ।
मङ्गलैगीतवादिननृत्यारम्भश्च
मिहामने तमासीन तदानी खचराधिपम् ।
-महापुराण जिन० ५० ५, श्ल
स्वयम्बुद्वोऽभवत्तेपु सम्बग्दर्शनशुद्धधी ।
शेपा मिथ्याशस्तेऽमी सर्वे स्वामिहितोद्यता ॥
४८
(ख) पुराणमार दलो० ७, सर्ग वाध्य १११ ।
कायाला भवेद; दयानात्मक ।
मियो विरुद्धधर्मत्त्वात्तयोश्चिदचिदात्मनो ॥
-महापुराण पर्व ५,
२
.
ऋषभदेव एक परिशीलन ३ उत्पन्न हो जाती है। एतदथ ही लोक मे पृथ्वी आदि तत्वों से बने हुए हमारे शरीर से पृथक रहने वाला चेतना नामक कोई पदाथ नहीं है । क्योकि शरीर से पृथक उसकी उपलब्धि नहीं होती । ससार मे जो पदाथ प्रत्यक्ष रूप मे पृथक मिड नहीं होते उनका अस्तित्व भी माकाशकुसुमवत् माना जाता है। वर्तमान में सूखो को त्याग कर भविष्य के सुखो की कल्पना करना आधी छोड़ एक को धाव ऐसा डूबा थाह न पाव की लौकिक कहावत चरितार्थ करना है। नास्तिक मत का निरसन करते हुए स्वयबुद्ध अमात्य ने कहा- पदार्थों को जानने का साधन केवल इद्रिय और मन का प्रत्यक्ष ही ही अपितु अनुभव प्रत्यक्ष योगि प्रत्यक्ष अनुमान और मागम भी हैं । द्रय और मन की शक्ति अत्यन्त सीमित है। इनसे तो चार पाँच के पूर्वज भी नहीं जाने जा सकते तो क्या उनका अस्तित्व भी न भाग इद्रियों केवल शब्द रूप गध रस और स्पर्शात्मक मूत पुषाानती है और मन उन्ही पदार्थों का चिन्तन करता है। यदि आदपदार्थों को जानता भी है तो आगम दृष्टि से ही । स्पष्ट है सभी पदाथ सिफ इन्द्रिय और मन से नहीं जाने जा (स) ३ शब्द रूप रस गप और स्पश नहीं है। वह मरूपी भूनी तत्व इन्द्रियो से नहीं जाने जा सकते। शतो बहुभोरेम्प समुदभवति चेतना । निभ्यो मदशक्तिरिव म्दयम् ।। -त्रिपष्ठि १३३१ ते स्वयम्बुद सम्मिन स्वयश्च तासायतिर सहातादिह वेतना। जमान्मदशक्तिवत ॥ पापुराण पर्व (ब) महामतिश्च सम्मिन्नत शतमतिस्तथा। स्वयदुश्च राज्यस्य मूलस्तम्मा इव स्थिरा ॥ -महापुराण १९९५ ३३ १४ श्री ऋषभ पूर्वभव १७ प्रात्म-सिद्धि के प्रबल प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उसने कहा- स्वसवेदन मे भी श्रात्मा का अस्तित्व सिद्ध होता है । मे सुखी है, मैं दुखी हूँ. यह अनुभूति शरीर को नहीं होती, अतएव इस अनुभूति का कर्ता गरीर मे भिन्न ही होना चाहिए। सभी को यह विश्वास होता है कि मैं हूँ, पर किसी को भी यह अनुभव नहीं होता कि मैं नही हूँ । प्रत्येक इन्द्रिय को अपने विषय का ही परिज्ञान होता है, अन्य इन्द्रिय के विषय का नहीं। यदि श्रात्म-तत्त्व को न माना जाय तो गभी इन्द्रियो के विपयो का जोड रूप सवालनात्मक ज्ञान नहीं हो सकता, किन्तु पापड खाते समय स्पर्ग, रस, गव, रूप और गब्द-इन पाँचो का सकलित ज्ञान स्पष्ट होता है । एतदर्य इन्द्रियो के विषयो का मकलनात्मक परिज्ञान करने वाले को इन्द्रियो मे पृथक् मानना होगा और वही आत्मा है। पात्मा और शरीर एक नहीं है । जो चैतन्य है, यह शरीर रूप नही है और जो शरीर है, वह चैतन्य स्प नहीं है, क्योकि दोनो एक दूसरे से स्वभावत विसदृश है। चैतन्य चित्स्वरूप है-ज्ञान दर्शन रूप है और गरीर अचित्स्वरूप है--जड है। आत्मा और शरीर का सम्बन्ध ४२ स्वसवेदनवेद्योऽयमात्माऽरित सुप खवित् । निषेधित बाधाभाषाच्छक्यते न हि केचित् ।। सुपितोऽह दुग्वितोऽहमिति कस्याऽपि जातुचित् । जायते प्रत्ययो नैव विनाऽऽत्मानमवाचित || -ग्रिपष्ठि० १६११३४७-३४८ । पृ० १३ रार्वोह्यात्माऽस्तित्व प्रत्येति, न नामस्मीति । ब्रह्मभाष्य १११ । आचार्य शकर कायात्मक न चैतन्य, न कायश्चेतनात्मकः । मिथो विरुद्ध मत्त्वात्तयोश्चिचिदात्मनो ॥ -महापुराण पर्व ५, श्लो० ५१ पृ०६६ २
ऋषभदेव एमगिरन
वस्नुन नलवार और म्यान की तरह है। मामा नलवार है और गगर
म्यान है।
भूनचतुष्टय से आमा की उ पनि हाना संभव नग है। क्यापि
जा हे उममे बेतन का उपनि क्म हा माना है वस्तुत
मागाभाय और गुणगुरिणभाव भगीर पाय मी हाता है
मिया मे हो। पुष्प गुर और नल म म मा गति
पा उदाहरण देना भी अनुपयुम प्रतिभा
Tऔर नागे समत्पर मादक पति भी
जानापानाय
दागी गातीय द्रव्य जलनिहर न कि विनाय
41 ' पाग शरीर के साथ हा आनाग न मानन हैं
1 । ग म पान की और हम कहना है ।
सा मारणाम अात्मा। यह निय हे फ्लन पूवन्द नकारा
।
परत गो विरोपिगुणपाट
aur पनि सानामिकोगवन ॥
४५
गूिसराय मतग घने त गुणा-पि वा।
सो गारमन्तरीभावात्ता भागन मन्त्राल
-महान TRE
एतेनव प्रतिक्षिप्त मदिरागनिदानम् ।
मदिराङ्ग व्यविरोषिन्या मनाविमारनात् ।।
महायुग
(स) किन पिप्टोवकादिन्यो मन्मनिरचना।
अचेतनेभ्यो बातेति ष्टान्तश्चतन क्यम्
-विपदि॥१
विना हि पूर्वचतन्यानुत्ति जातमात्रा ।
अशिशित कम यालो मयमयति गमन
४७
यो ऋषभ पूर्वभव इस प्रकार स्वगबुद्ध के अकाट्य तर्को से नास्तिकवादी अमान्य परास्त हो गये । सभी ने प्रात्मा के पृथक् अस्तित्व को स्वीकार किया और महावल राजा भी अत्यन्त प्रालादित हुआ।" स्वयबुद्ध अमात्य ने अन्य अनेक उपनयों के द्वाग मनाद को यह बताया कि शुभ और अशुभ कृत्यो का फर भी मग मुभ और अशुभ ही होता है।" वार्ता का उपसहार करते हुए उसने कहा- राजन् । अाज प्रान मैं नन्दन वन में परिभ्रमणार्थ गया था, वहाँ दो विशिष्ट लन्चधारी मुनिवर पधारे। मैंने उनसे यापकी अवगेप ग्रायु के गम्बन्ध मे जिज्ञासा प्रस्तुत की तो उन्होने बताया कि वह एक माह की ही गेग है। . इति तद्वचनाजाता परिपत्मकलव सा । निराकारमसदभावे सम्प्रीतश्च सभापति ।। -महापुराण १८६१०१ (ख) त्रिषष्ठि ११ त्रिपप्ठि ११११४००1४४२ (ख) महापुराण पर्व ५ । ग्लोक ५६ मे २१२, पृ० १०१-११० सुचिण्णा कम्मा सुचिण्णफला हवन्ति । दुचिण्णा कम्मा दुचिण्णफला हवन्ति ।। ---औपपाति मून ताम्या तु भवतो माममात्रमायुनिवेदितम् । अतस्त्वा त्वरयाम्यद्य, धर्मायव महामते । -निपप्फि ११४४६ (ख) मासमात्रावशिष्टश्च जोवित तम्य निश्चिनु । सदस्य श्रेयसे भद्र। घटवास्त्वमशीतक ॥ -महापुराण श२२१११३ (ग) मासावसेसाळ -आव०नि० मल० वृ० पृ० १५० (घ) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प० ११६ - १ १८ ऋषभदेव एक परिशीलन वस्तुत तलवार और म्यान की तरह है। प्रात्मा तलवार है और शरीर म्यान है। भूतचतुष्टय स प्रात्मा की उत्पति होना मभव नहीं है। क्योकि जो जड है उममे चेतन की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? वस्तुत कार्यकारणभाव और गुणगुरिणभाव सजातीय पदार्थों में ही होता है विजातीय मे नही। पुष्प गुड और जल के सयोग से मादक शक्ति उत्पन होने का उदाहरण देना भी अनुपयुक्त है क्योकि गुड आदि भी जड है और उनसे समुपन मादक शक्ति भी जड है। यह तो सजानीय द्रव्य से ही सजातीय द्रव्य की उत्पत्ति हुई, न कि विजातीय द्रव्य की। यदि माप शरीर के साथ ही प्रात्मा की उत्पत्ति मानते है तो जन्मते ही शिशु मे दुग्धपान की इच्छा और प्रवृत्ति कैसे होती है ?" प्रत यह स्पष्ट है कि प्रात्मा है वह नित्य है फलत पूवभव के संस्कारों से ही ऐसा होता है। ४५ -- कायचैतन्ययोनक्य विरोधिगुणमोगव । वगारन्तबहोरुपनि साच्चामिकोगवत ॥ --महापुराण ११२।१६ म भूतकार्य चतन्य घटने सदगुणाऽपि वा। ततो जात्मन्तरीमावात्ताभागेन तद्ग्रनत् ।। महापुराण ५२५३ एतेनव प्रतिक्षिप्त मदिराङ्गनिदर्शनम् । मदिराङ्ग वविरोधिन्या मदराविभावनात् ।। -महापुराण श६५९ (ख) किञ्च पिष्टोदकादिभ्यो मदशतिरपेतना । अबेतनेम्यो बातेति दृष्टान्तश्चेतने कयम् ॥ -विधष्ठि ११३६१५१४१ विना हिं पूर्वचतन्यानुवृत्ति जातमात्रक । अशिक्षित कथ बालो मुसमर्पयति स्तने ? ॥ -त्रिषष्टि १११॥३५३ (स) बान्ती देहिना देही न दिना भवतस्तन । पूर्वोत्तरे सविषिष्ठानस्वान्मध्याहवत ॥ -महापुराण ९९ श्री ऋपम पूर्वभव इस प्रकार स्वयबुद्ध के अकाट्य तर्को से नास्तिकवादी अमात्य परास्त हो गये। सभी ने प्रात्मा के पृथक् अस्तित्व को स्वीकार किया और महावल राजा भी अत्यन्त प्राङ्गादित हुआ। स्वयबुद्ध अमात्य ने अन्य अनेक उपनयो के द्वाग सम्राट को यह बताया कि शुभ और अशुभ कृत्यो का फल भी क्रमग शुभ और अशुभ ही होता है।५० वार्ता का उपसहार करते हुए उसने कहा-राजन् । ग्राज प्रात मैं नन्दन वन मे परिभ्रमणार्थ गया था, वहाँ दो विशिष्ट लम्विधारी मुनिवर पधारे । मैने उनसे प्रापकी अवशेप आयु के सम्बन्ध मे जिजामा प्रस्तुत की तो उन्होने बताया कि वह एक माह की ही शेप है । "" ४८ ४६ ५० इति तद्वचनाज्जाता परिपत्सकलेव सा। निरारेषात्मसदभाव सम्प्रीतश्च सभापति ॥ -महापुराण ५८६११०१ (प) विपष्ठि ११ विषष्ठि ११११४००१४४२ (स) महापुराण पर्व " । श्लोक ८६ से २१२, पृ० १०१-११२ सुचिण्णा कम्मा सुचिण्णफला हवन्ति । दुविण्णा पम्मा दुचिण्णफला वन्ति ।। -औपपातिक सूत्र साम्या तु भवतो माममात्रमायुनिवेदितम् । अतस्त्वा त्वरयाम्यय, धमिव महामते । -विपष्ठि ११४४६ (ख) मासमात्रावशिष्टञ्च जीवित तस्य निश्चिनु । तदस्य थेयसे भद्र घटेथास्त्वमशीतक ॥ --महापुराण ५१२२१।११३ (ग) मासावसेसाऊ -आव०नि० मल० वृ० पृ० १५८ (घ) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प० ११६ न ५१ २ ऋषभदेव एक परिशीलन सम्राट् महाबल अमात्य के मुह से मुनि की भविष्यवाणी सुनकर सकपका गया। मृत्यु के भयानक पातङ्क से वह विह्वल हो गया। अमात्य ने निवेदन किया-राजन् । घबराइमें नहीं घबराने वाला योद्धा रणक्षेत्र मे जूझ नही सकता। अमात्य की प्रेरणा से पुन को राज्यभार संभलाकर महाबल मुनि बने । दुष्कृत्यो की आलोचना की और बावीस दिन का सथारा कर समाधि पूर्वक मायुष्य पूण किया । ॥ भामेत्युदित्वा स्वसुत स्वे प. प्रत्यतिष्ठिपत । महाबलस्तदाचार्य प्रासादे प्रतिमामि॥ -त्रिपष्ठि ११४५२ (ख) सुतायातिबलास्थाय दत्वा राय समृद्धिमन् । मानापृच्छय मन्त्र्यादीन पर स्वातत्र्यमाषित ॥ - महापुराण ५२२८११३ (क) बावीसदिवसे मत्तप चक्लाण काउ मरिळण । --आवश्यक मल वृप १५कार (ख) मावश्यक हाग्भिद्रीयावृत्ति प ११६ । (ग) समाहित स्मरन् पञ्चपरमेष्ठिनमस्त्रियाम् । वाविंशति दिनान् कृत्वानशन ए प्यपद्यत । --त्रिपष्ठिemely १७ (घ) यावज्जीव हताहारशरीरत्यागसगर। गुरुसाक्षि समास्क्षद वीरशम्माममूढपी । महापुराण श२३ ११३ देहाहारपरित्यागवतमास्थाम धीरथी । परमाराधनाशुदि स भेजे सुसमाहित । महा ५२३३११४ द्वाविंशतिदिनान्येप कृतसल्लेसना विधि । बीवितान्त समाधाय मन स्व परमेष्टिषु ॥ -महा पर्व ५। लोक २४८ । पृ ११५ श्री ऋपम पूर्वभव २१ इस प्रकार धन सार्थवाह का जीव, जो अब तक आध्यात्मिक विकास की प्रथम भूमिका-सम्यग् दर्शन–तक ही पहुँच पाया था, इस भव में अधिक अग्रसर हुआ। इस बार उसने चतुर्थ गुण- स्थान से ऊपर उठ कर छठे-मानवे गुणस्थान की भूमिका पर पांव राया। [५] ललिताङ्ग देव महाबल का जीव ऐशान कल्प में ललिताङ्ग देव हुआ और वह वहाँ स्वयप्रभा देवी में अत्यविक आसक्त बना । जब स्वयप्रभा देवी वहाँ से च्यच जाती है तब ललिताङ्ग देव उसके विरह मे पाकुल- व्याकुल बन जाता है ।५५ स्वय बुद्ध अमात्य, जो इसी कल्प मे देव बना था, आकर सान्त्वना देता है। स्वयंप्रभा देवी भी वहाँ से ईसाणे कम्पे सिरिप्पभविमाणे दलियगतो नाम देवो जातो। -आवश्यक नियुक्ति मल० वृ०प० १५० (ख) ईसाणे कप्पे मिरिप्पभेविमाणे ललिययो नाम देवो जाओ। -आवश्यक हरिभद्रीयावृत्ति प० ११६ (ग) त्रिषष्ठि० १६११४६०।४६४ (घ) देहभारमथोत्सृज्य लघूमूत इव क्षणात् । प्रापत् स कल्पमैशानम् अनल्पसुससन्निधिम् ।। तत्रोपपाददाय्यायाम् उदपादि महोदय । विमाने श्रीप्रमे रम्ये, ललिताङ्ग सुरोत्तम । -महापुराण ५२५३-२५४।११६ दल वृक्षादिव दिवस्ततोऽच्योष्ट स्वयम्प्रभा । वायु कर्मणि हि क्षीणे, नेन्द्रोऽपि स्थातुमीश्वर ।। थाक्रान्त पर्वतेनेव, कुलिशेनेव ताडित । प्रियाच्यवनदु खेन, ललिताङ्गोऽथ मूति ॥ -विपष्ठि ११२५१५-५१६ रवामिमरणोत्पन्नवैराग्यवासन | स्वयम्बुद्धोऽप्यात्तदीक्ष श्रीसिद्धाचार्यसन्निवौ ।। इतरच २२ ऋषभदेव एक परिशीलन च्यव कर मानवलोक में निर्नामिका नामक बालिका होती है मौर वहां केवली भगवान के उपदेश से श्राविका बन कर, आयु पूर्ण कर पुन उसी कल्प मे ललिताङ्ग देव को प्रिया स्वगप्रभा देवी बनती है।" ललिताङ्ग देव मोह की प्रबलता के कारण पुन उसमें भासक्त बनता है। अत मे ललिताङ्ग देव नमस्कार महामत्र का जाप करते हुए आयु पूरा करता है । [६] पनजई वहाँ से च्यवकर ललिताङ्ग देव का जीव जम्बूदीप की पुष्कलावती विजय में लोहार्गल नगर के अधिपति सुवराजध सम्राट की पत्नी लक्ष्मी की कुक्षि मे उत्पन्न हुआ। बजघ नाम दिया गया।" ५७ सुधिर निरतीधार पालयित्वा व्रत सुषी । ऐशाने हषर्माश्य इन्द्रसामानिकोऽभवत ॥ स पूर्वमवसम्बाद पपुवत् प्रेमबधुर । भावासयितुमित्यूचे ललिताङ्गमुदारधी ॥ त्रिषष्ठि ११४५२-५२२ पल्योपमपृथक्त्वावशिष्टमायुर्यदास्थ तदोपादि पुण्य स्व प्रेयस्यस्य स्वयप्रभा । -महापुरास श्लो २०६५ ५पृ ११० सपा स्वयप्रभाऽस्यासी परा सौहार्दभूमिका । चिर मधुकरस्यैव प्रत्खना चूतमम्जरी ॥ --महापुराण श्नो २८८ पर्व ५ ११५ नमस्कारपदाम्युन्ध अनुध्यायनसाध्यस' । सायसी मुकुलीकृत्य करी प्रायाद श्यताम् ।। -महापुराण मो. २५ पर्व पृ० १२२ (5) पुक्सवावर विजए मोहम्गतणपरसामी पारनको नाम राणा पायो। -बावश्यक हारिमनीयावृतिक पृ० ११६ -(e) ततो आलए पदळण इहेब अबुद्दीव दीव पुस्भनाइ विजए मोहग्गलनगरसामी वारजनो नाम राया जातो । -आवश्यक भन. १५८ ५६ ६ श्री ऋपम पूर्वभव महापुराणकार ने माता का नाम वसुन्धरा और पिता का नाम वज्रवाहुर और नगर का नाम उत्पलखेटक दिया है । स्वयंप्रभा देवी भी वहां से प्रायु पूर्ण कर प्राचार्य श्री हेमचन्द्र के अभिमतानुसार पुण्डरीकिणी नगरी के स्वामी वज्रसेन राजा की धर्मपली "गुणवतो" रानी की कुक्षि मे उत्पन्न हुई । जन्म के पश्चात् उसका नाम 'श्रीमती' रखा २६ प्राचार्य श्री जिनसेन व आचार्य (ग) जम्बूद्वीपे तत पूर्वविदेहेपूपसागरम् । महानद्यायच सीताभिधानाया उत्तरे तटे। विगये पुष्कलावत्या लोहार्गलमहापुरे । राज सुवर्णजनस्य लक्ष्म्या पल्या सुतोऽभवत् ।। ---विपष्ठि०१११६२४-६२५ अथ कन्दलिवानन्दावमुष्य दिवसे शुभे । धवजड्व इति प्रीती पितरी नाम पत्रातु ॥ -~-विपष्ठि०१।१।६२६ घबाहु पतिस्तस्य यचीवाशापरोऽभवत् । कान्ता वसुन्धरास्यासीद् द्वितीयेव वसुन्धरा ।। तयो सूनुरभूद्दवो ललितास्ततच्युत । पच्चजध इति स्पाति देघदव्यर्थतां गताम् ।। -महापुराण इलो० २८१२६५०६ पृ. १२२ ६३ जम्मूद्वीपे महामेरो विदेहे पूर्वदिग्गते । या पुष्कलावतीत्याशीत जानभूमिमनोरमा ।। स्वर्गमूनिर्विशेषा ता पुरमुत्पलखेटकम् । --महापुराण इलो० २६।२७ पर्व० ६ पृ० १२२ स्ययम्प्रभाऽपि दुखार्ता, बालेन कियताऽप्यथ । धर्मकर्मणि यलीना, ध्यच्योष्ट ललिताङ्गयत् ।। मगया पुण्डरी फिण्या विजयेऽव चक्रिण । पषपेनस्य भार्याया, गुमव यां सुताऽभवत् ।। रावलोभातिशामिन्या, धियाऽसो अयुता सत । श्रीमतीत्यमिधानेन पितृभ्यामप्यवीयत -त्रिपप्ठि० २११६२७-६२६ ॥
ऋषभदेव एक परिशीलन श्री दामनन्दी के मतानुसार उनके पिता का नाम वजदत्त और माता का नाम लक्ष्मीमती था। एक बार श्रीमती महल की छत पर घूम रही थी कि उसी समय सन्निकटवर्ती उद्यान में एक मुनि को केवल ज्ञान उत्पन हुमा। केवल महोत्सव करने हेतु देवगण भाकाशमाग से आ-जा रहे थे। आकाश माग से जाते हुए देवसमूह को निहार कर श्रीमती को पूवभव की स्मृति उद्बुद्व हुई उसने उस स्मृति को एक पट्ट पर चित्रित ६५ (ब) नामत श्रीमती स्याता रूपविद्याकलागुण पुराणसार २६१ तस्या पतिरमूनाम्ना बदन्तो महीपति । महापुराण फ्लो ५८ पब ६ पृ १२४ लक्ष्मीरिवास्य कान्ताङ्गी लक्ष्मीमतिरभूप्रिया । वही फ्लो ५६४प ६१ १२४ खयो पुत्री बमूदासौ विषता श्रीमतीति या। -वही श्लो ६ पद ६ पृ० १२४ (स) पुराण सार साह २५१०६ (क) ततो मनोरमोद्याने सुस्थितस्य महामुने । उत्पन्ने देवलमाने ददर्शागच्चत सुरान् ।। --त्रिषष्ठि श६३ (ख) तदतवमवत्तस्या सविधानकमीत्शम् । यशोषरगुरोस्तस्मिन् पुरे कैवल्यसमवे ॥ मनोहरा समुराग्नम् मध्यासीन तमचितुम । देवा सम्प्रागुणस्तबिमाना सह सम्पदा ।। -महापुराग नो ८५-८६ पर्व पृ १२० हप्ट! मया कामिरयूशगेहकारिणी। जन्मान्ती पूजाणि निशास्वप्नमिवाऽस्मरत ॥ -विपप्फि १६३४ (6) देवाने समात्तस्या प्राग्जन्मस्मृतिराश्वमा । -महापुराण तो १ पर्व। १२० (ग) पुराणधार साह २६-२७-१६ श्री पभ पूर्वभव २५ किया और अपने प्रति स्नेहमूर्ति पण्डिता परिचारिका को प्रदान किया। पदिता परिचारिका प्रस्तुत चित्रपट को लेकर राजपथ पर, जहाँ चक्रवर्ती बज्रमेन की वर्षगाँठ मनाने हेतु अनेक देशो के गजकुमार प्रा-जा रहे थे, मडी होगई । वज्रजघ राजकुमार भी, जो पूर्वभव में ललिताङ्ग देव था, यहाँ पाया हुआ था । उसने ज्यो ही वह चित्र-पट्ट देग्वा त्योही उसे भी पूर्वभव की स्मृति जागृत हो गई। उमने चित्रपट का साग इतिवृत्त पण्डिता परिचारिका को बताया, और पण्डिता परिचारिका ने श्रीमती को निवेदन किया। श्रीमती की प्रेग्गा से परिचारिका ने चक्रवर्तीमम्राट् वज्रमेन को श्रीमती और बवजय के पूर्वभव का परिचय प्रदान किया। चक्रवर्ती वज्रमेन ने 'यीमनी' का वनजघ के साथ पाणिग्रहण कर दिया। ६८ मया विनिोग्यत पूर्वभवसम्वन्धिपट्टकम् । -गहापुराण फ्लो० १७० पर्व ६, पृ० १३२ पग्निष्णा वज्ररोनरय वर्षग्रन्धिरमूत् तदा । प्रतापदिाययुग्रात्र, गूयामो वमुधाधवा ।। पण्टिता राजमार्गेऽथ, तमालेल्यपट स्पुटम् । चिरतायं तस्थौ श्रीगत्या मनोरयमिवाऽलघुम् ।। -विपछि १११६४६-६५० अपारगाइयराम्बन्ध पूर्वाऽलेयि सविस्तरम् । श्रीप्रभाधिपता साक्षात् पश्यामोह मामिनाम् ।। अहो स्त्रीरपमवेद नितरामगिरोचते। स्वयम्प्रभावसयादि विचित्रागरणोज्ज्वलम् ।। -महापुराण पतो० १२१-१२२ पर्व ७, पृ० १४८ (स) आमेति पक्षिाऽयुक्ता श्रीमाया पाश्वमेत्य च । तत्सर्वमास्यत् हृदविशयकरणौषधम् ॥ --त्रिपप्ठि शश६८२ मितुष्पशपमा तच्च, श्रीमती पष्टितामुखा।। अस्वातन्त्र्य कुलस्त्रीणा, धर्मो नैरागिको यत । -त्रिपब्लि ११६८३ ७२ रागिरामुदित स्तनितेनेव यहिण । पपरोननुपो वनजनमाजूझ्यत् तत ॥ सध ऋपमदेव एक परिशीलन महापुराणकार ने भी प्रस्तुत प्रसंग को कुछ हेर फेर के साथ निरूपित किया है पर तथ्य यही है।" श्रीमती के साथ वजगंध पुन भोगो मे प्रासक्त हुमा। सम्राट सुवरणजघ ने वचजष को राज्य देकर स्वय दीक्षा ग्रहण की। और चक्रवर्ती बनसन ने भी अपने पुत्र पुष्कलपाल को राम देकर दीक्षा ली। वह तीथकर हुए।" चक्रवर्ती वज्रसेन के सयम ७४ कुमारसूचे भूपालोऽस्मत्पुत्री श्रीमतीत्यसौ । भवस्थिदाना भवतो हिणी पूर्वजन्मवत् ।। तयेति प्रतिपन्ने प कुमारेणोदवाया। श्रीमती भूपनि प्रीतो हरिणेबोदधि श्रियम् ॥ विषष्ठि १९६९५ से १८७ (स) तत पाणी महामाह बाजवोऽग्रहोन्मुदा। धीमती तमृदुस्पर्शसुखामीनितमोचन ॥ -महापुराण फ्लो० २४६ पव ७ पृ०१६ महापुराण पब ६-७ १ १२२५१६ । (क) विलमन् वजड्वोऽपि श्रीमपा सह कान्तया । बाह लीलया राज्यमम्भोजमिन पुअर' ।। --त्रिपष्ठि ११२६९५ (स) महापुराण फ्लो १-३२ पर्व पृ १६७-१६६ मोग्य शाखा बजगह स्वणजद्दोऽथ भूपति । राम्ये निवशयामास स्वय दौमामुपाददे ॥ -विषष्ठि पर () ममिषिम्य सुत राये पबहमतिष्ठिपत् ॥५६ सराग्यभोगनिर्विष्ण तुणं यमधरान्तिके । पूर्व साई सहला मितदक्षामुपाददे । -महापुराण श्लो. ५६-५७ पर्व कप १७१ सूनी पुषलपासस्य दत्वा पज्यथिय निजाम् । प्रादाबी पद्यसेनोऽपि बजे टीकरसव ॥ ७५ -त्रिपकि १५. विपष्ठि ९९ श्री ऋषभ पूर्वभव लेने के पश्चात् सीमाप्रान्तीय राजा पुष्करपाल की प्राज्ञा का उलधन करने लगे। वज्रजघ उसकी सहायतार्थ गया और शत्रुओ पर विजय वैजयन्ती फहराकर पुन अपनी राजधानी लौट रहा था कि उसे ज्ञात हुआ कि प्रस्तुत अरण्य मे दो मुनियों को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है और उनके दिव्य प्रभाव से दृष्टिविष सर्प भी निविष हो गया है। वज्रजध मुनियो के दर्शन हेतु गया। उपदेश सुन वैराग्य उत्पन्न हुआ।" पुत्र को राज्य देकर सयम ग्रहण करूँगा, इस भावना के साथ वह वहाँ से प्रस्थान कर राजधानी पहुँचा । इधर पुत्र ने सोचा कि पिताजी जीते जी मुझे राज्य देगे नही, तदर्थ उसने उसी रात्रि को वज्रजष के महल मे जहरीला धुओं फैलाया, जिसकी गध से वज्रजघ और 'श्रीमती' दोनो ही मृत्यु को प्राप्त हुए। महापुराणका आचार्य जिनसेन ने प्रस्तुत घटना का इस रूप मे चित्रण किया है-"वज्रदन्त चक्रवर्ती ने अपने लघुभ्राता अमिततेज ७६ उत्पेदे केवलज्ञान, दूयोरत्राऽनगारयो । तत्र देवागमोद्योताद् इग्विषो निर्विषोऽभवत् ॥ -~-विपष्ठि १११७०२ त्रिपष्ठि ११११७०८-७०६ । तदिदानी पुरी गत्वा, दत्त्वा राज्य च सूनवं । हसस्येव गति हस अयिष्येऽह पितुर्गतिम् ॥ सवादिन्या व्रतादानेऽनुस्यूतमनसेव सहित श्रीमतीदेव्या, प्राप लोहागलपुरम् ॥ -त्रिपष्ठि १७१०-७११ पुतण रज्जकक्षिणा वासघरे जोगधूवप्पयोगेण मारितो। --आव० मत वृ०५०१५८ विषधूप भ्यधातु पुषस्तयोस्तु सुखसुप्तयो । फस्त निरोद्ध मीश स्याद्, गृहादग्निमिदीस्थितम् । तर पधूमरधिकर्जीवाकडधुरैरिद । प्राणप्रविष्टस्तो सद्यो, दम्पती मृत्यूभापतु ॥ -त्रिषष्ठि १२१७१४-७१५ १ २० ऋषभदेव एक परिशीलन के पुत्र पुण्डरीक को राज्य देकर दीसा ली। पुण्डरीक मल्पवयस्क या प्रत चक्रवर्ती की पत्नी लक्ष्मी ने बचजप को सन्देश भेजा। उस सन्देश से वह सहायताय प्रस्थान करता है कि माग में दो चारण लब्धिधारी मुनिवरो के दशन होते है। वह उहे पाहार दान देता है। 'और मुनि वचजघ व श्रीमती के आगामी भावो का निरुपण चक्रवर्ती बन यात सुपुत्रपरिवारक । पुण्डरीकस्तु राज्यस्मिन् पुण्डरीकानन स्थित ॥ क्व पक्रवतिनो राप क्वाय बालोऽतिदुर्बन । तदय पुङ्गवार्य भरे दम्यो नियोजित । बालोऽयमबले चावा राग्मनेदमनायकम् । विधीप्रायमेतस्य पालन त्वयि तिष्ठते ॥ अकालहरण तस्मान मागन्तव्य महाधिया । त्वयि स्वत्सनिषानेन भूया. रायमविप्लवम् ।। - महापुराण क्लो १५-६८ पर्व ८१ १७५ (ख) भगा पुण्डरीका प्रतिष्ठाप्प स्वपुषजम् । प्रवनाम नरेद्रोन्दो बहुमि शनिबरसी।। -पुरापसार सग्रह दामनन्दी इलोक• ३२ स २३ २४ ६३ पस्मिन्नेवालि सोऽहाय प्रस्थानमकरोए कृती। -महापुराण पना ११८ पर्व ८ पृ १७७ (8) चिन्तागतिमनोगत्योस्तयो श्रत्वा तु वाचिकम् । निरणादा ससन्यौ तु पूरा मतिवरोदिती ॥ -पुराणसार श्लो ३६ खग २१२४ दो बमपरामिण्य 'श्रीमानम्बरषारण सागरसेनेन सग्निवेशमुपाययो॥ -महापुराण एलो १६७ पर्व ८१ १५१ पवादिगुणसम्पत्या गुणवन्यो विशुकिंमाक । दनवा विषिषाहार पन्धाश्पर्याव्यवापस ॥ -महापुराण श्लो १७३ पर्व १८२ सम श्री ऋषम पूर्वभव करते हुए बताते है कि सम्राट आप पाठवे भव मे तीर्थकर बनेंगे।" 'श्रीमती' का जीव प्रथम दानधर्म का प्रवर्तक श्रेयास होगा। मुनि की भविष्यवाणी को सुनकर दोनो अत्यन्त आह्लादित होते है। वहाँ से सम्राट् वज्रजंघ पुण्डरीकिणी नगरी जाकर महारानी को आश्वस्त करते है और उनके राज्य की सुव्यवस्था कर पुन अपने नगर लौटते हैं।" एक दिन सम्राट् का शयनागार अगर आदि सुगन्वित द्रव्यो की तीन गन्ध से महक रहा था । द्वारपाल उस दिन गवाक्ष खोलना भूल गया, जिसमे धूप के धुएं के कारण श्वास रुक जाने से दोनो की मृत्यु हो गई। ६५ -- (ख) दत्वा सागरसेनाय दान दभवराय च । आदाय नवपुण्यानि सम्प्राप्ती पुण्डरीकिणीम् ।। -पुराणसार श्लो० ३८ सर्ग २, पृ० २४ इतोष्टमे भचे भाविन्यपुनर्भवता भवान् । भवितामी च तत्रैव भवे सेत्स्यन्त्यसशयम् ।। ~~~महापुराण श्लो० २४४। पर्व ८, पृ० १८७ श्रीमती भवत्तीयें दानतीर्थप्रवर्तक । अंथान मूत्वा पर श्रेय श्रयिष्यति न सशय ।। -महापुराण श्लो० २४६ पर्व ८, पृ०१७ दृष्ट्वा देवी कुमारच्चाप्यनुशिप्य वचोऽमृत । किञ्चित्कालमुषित्वाय जग्मतु स्वपुर पुन ॥ -पुराणसार श्लोक ४० द्वि० स०पू०२४ कालागुरुकधूपान्य शयिती गर्भवेश्मनि । मृत्वोत्तरकुरुष्वास्तामाशु दानेन दम्पती ।। पुरागसार श्लो० ४१ पर्व० २, पृ० २४ (ख) अथ कालागुरूद्दामघूपधूमाधिवासिते । मणिप्रदीपकोद्योतदूरीकृततमस्तरे ॥ SE ऋषभदेव एक परिशीलन [७ युगल वहाँ से दोनो ही प्रायुपूण कर उत्तर कुरु में युगल-युगलिनी बने। इसके अतिरिक्त श्वेताम्बर ग्रन्थों में अन्य वणन नहीं है । महापुराण व पुराणसार के मन्तव्यानुसार उस समय उस युगल पुगलिनी को सूर्य प्रभदेव के गगनगामी विमान को निहारकर जाति स्मरण होता है ' और उसी समय वहाँ पर लधिधारी मुनि माते है।" नमन कर वे उनसे पूछते है कि हे प्रभो 'पाप कौन है और कहाँ से भाये है। - ८९ तत्र वातायनद्वारपिपानारधूमके कैशसस्तारपोध मेन क्षणमूच्छितो॥ निस्टोन्यवासदौ स्थित्याद बन्द किञ्चिदिवाकुलो । दम्पती तो निशामध्ये दोनिद्रामुपयतु ॥ --महापुराण श्लो० २१ २६ २७ २८ पनप १९२ अयोत्तरफुरुष्वतावसनी युग्मरूपिणी। एकचिन्ताविपक्षाना गतिरेका हिं जायते ।। -त्रिषष्ठि ११७१६ (ख) मरिऊण उत्तरकुराए समारियो मिहुणगो पाते। -बावश्यक मल पु. १५५ (ग) मरिऊण उत्तरकुराए समारियो मिहुणगो पायो । -आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प ११६१ सूयप्रभस्य देवस्य मभोयायि विमानकम् । एप्ट्वा वातिस्मरो मूत्वा प्रदुर प्रियया समम् ।। -महापुराण लो १५ प पू १९५ (ख) पदाचित्सूर्यदेवस्य दृष्ट्वा यान [यि विमानकम् । सस्मरतुतिमन्योन्यप्रियवतिनी ॥ -पुराणसार शाम इलो । प २१ २६ तावन्चारणयोयुग्म दूरावागन्यदक्षता प्रश्य सावनुगृहन्दी व्योम्न समपतेरतुः । -महापुराण लो०१९ पर्न १९८ अय २१ श्री कृपा पूर्वमन उत्तर ग ज्याठ मुनिग नगवाया कि ' पून गे जिग गगग तुम्हारा जीन गाना गणा था उरा रागग गुहाग रात गात्री गा। गार भागा कर गौवर्ग गर्ग ग रवयाग विमान में गगिरा भाग देन नगा। वहाँ से प्रागुराकर गे गरी किणी गगरी गगजा जिगगन सा गटगुन प्रीतिकार हुमागाणा या गाग शुन्दरी और गाभासा गर नाग प्रीमिदेव जो रामगि गैरे गा दोगी ही माता रवयंप्रग विनगल गगीय धीमा कर पानगगिजानता पारण क्षिप्रातमी * को यहाँ जानकर हम आपका रागस्त्य भागी रत्न देने में forman () भागती पारणी बीग गनिना शिगाती। गुर्गा पम्य पान . गूगगागवा धुता ? - गणगार ० ५, प २, ०२६ a fire मा रतांश गाता गत भी । गागमन न धर्म दागिनईणम् ।। -~~-(पुगण पो० १०५, पौ०९, T०१६ (१) पदाचा निर्गतरताकार्य सुगममा । गोपग गणनूगारमा न भाग ग्वमाप्र ।। -~-गणगार ४।२।२६ गहाग 10100-१०१ पर्व पृ०१० । (1) गत. पविण शुन्दरी-निगमगी। भाता तिगुनानागा प्रीतिमागगहा ।। -~-पुराणसार ७१२१२८ रममाजियोगान्त महिला नागारवाद। पावधिनानगानाधारणले समावगात् ।। महापुराण ११०१ce (ग) निगमगात पाने दीरिती गातानीको। -गणगार ४५१२।२६
ऋषभदेव एक परिशीलन
सम्यकत्व रूपी रन से बढकर विश्व मे न कोई वस्तु है न हुई
है मौर न होगी ही । इसी से भव्य प्राणियो ने मुक्ति प्राप्त की है तथा
आगे प्राप्त करगे। अतएव सम्यक्त्व सवसे धष्ठ है। जब
देशनालब्धि और काललब्धि प्रादि वहिरग कारण और करण लब्धि
रूप अन्तरग कारण मिलता है तभी भव्यप्राणी विशुद्ध सम्यग्दशन का
पात्र बन सकता है। जो पुरुष एक मतमु हूत के लिए भी सम्यग्दशन
प्राप्त कर लेता है वह इस ससार रूपी बेल को काट कर बहुत ही लघु
कर देता है। इस प्रकार सम्यग्दशन के महत्व को समझाकर और
दोनो को रत्नत्रय में आद्य रल सम्यक्त्व को देकर वै चारणमुनि
अपने स्थान चले गये।
इतोऽन्यदुत्तर नास्ति न मूत न भविष्यति ।
इह सेत्स्यन्ति सिद्धाश्च तस्मात्सम्यक्त्वमुत्तमम् ॥
पुराणसार ४२२६
देशनाकाललध्यादिवासकारणसम्पदि ।
अन्त करणसामग्र या भन्यात्मा स्यात् विभुखकृत् ।।
-महापुराण ११६४१५
लघसद्दर्शनो जीवो महतमपि पश्य य ।
ससारलतिका छित्वा कुरुने हासिनीमसो॥
--महापुराण १२शार १
दत्वा ताम्पा विरमान गताम्बरचारिणी ।
७
१८
-पुराणसार ५१२।२५
(ख) इति प्रीतिहराचार्यवधन स प्रमाणयन् ।
जानिराक्षे सम्यग्दर्शन
प्रीतमानस ॥
पुननिमस्वाम। सबम मा स्म विस्मर ।
इत्युक्त्वान्तहिती सद्य पारणी व्योमचारणी।।
-महापुराण १४|१५७।२२-२३
श्री ऋषभ पूर्वभव
३३
(सौधर्मकल्प
वहाँ से वे मायु पूर्ण कर सौधर्मकल्प में देव बने । महापुरार
तथा पुराणशार में उनका नाम श्रीधर देव लिखा है।
fe] जीवानन्द वैद्य
वहाँ रो च्यवकर धनासार्थवाह का जीव जम्बूद्वीप के क्षितिप्रतिष्ठ
नगर में सुविधि वैद्य का पुन जीवानन्द वैद्य बना। उस समय
वहाँ पांच अन्य जीव भी उत्पन्न होते है। प्रथम सम्राटपुर महीवर,
रातो सोहम्गे कप्पे देवो उपचन्नो ।
-आवश्यक नियुक्ति, मल०० १५०
(ख) तमो गोहम्मे करणे देयो जाओ।
-आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति, पृ० ११६३१
(ग) दोषानुरूपमायुएच पूरयित्वा तथा युती।
तो विपोहायता, सौधर्म स्नेहली सुरो॥
--निपष्ठि १३१७१७
(घ) अन्ते गृहीतसम्यक्त्वो मृत्या सौधर्ममीयतु ।
-पुराणराार ५१०२।२६
विमाने श्रीप्र तत्र नित्यासोने स्फुरत्प्रभ ।
रा श्रीमान वषणद्धार्य श्रीघरारय सुरोऽभवत् ।।
-महापुराण १८शक्षा२०६
(ग) श्रीप्रो श्रीधरो पर्श भार्यों देव स्वयम्प्रभे ।
गम्यमत्वालश्रेणगुग्मित्वा साऽऽर्या जात स्वयप्रभ ॥
पुराणसार ५२।२।२६
राता गाउपरात घाण महाविदेहवारो मितिमट्टिते नगरे विज्जपुत्तो
आयातो।
---आवश्यक गल० वृत्ति० पृ० १५८
(1) आवश्यक पूणि पृ० १३२ ।
३
•
पभव एक परिशीलन रितीय मत्रीपुत्र मुबुद्धि तृतीय साथवाहपुत्र पूर्णभद्र चतुर्थ श्रष्ठि पुत्र गुणाकर और पांचवां ईश्वरदत्तपुत्र केशव [श्रीमती का जीव] इन छहो मे पय-पानी सा प्रेम था।र अपने पिना की तरह जीवानन भी आयुर्वेदविद्या में प्रवीण पा। उसकी प्रतिभा की नेजस्विना से सभी प्रभावित थे। एक दिन सभी स्नेही साथी वा साप कर रहे थे कि वहाँ एक दीपतपस्वी भिक्षा के लिए आये । वे गृहस्थाश्रम मे पृथ्वीपाम राजा के पुत्र थे जिन्होंने राज्यथी को त्यागकर उग्रतपस्या प्रारम्भ की थी। असमय व अपप्प भोजन के सेवन से वे कृमि कुष्ठ को भगकर व्याधि से प्रसित हो गये थे। 'उन्ह निहारकर समाट पुत्र महीधर ने कहा-मित्रवर १२ (क) उत्तरकुरु सोहम्मे विरोह तेगिब्धियस्स तत्प सुतो। रायसुमसेडिमच्चामत्याहसुया वयसा यावस्यक नियुक्ति गा १६ (ख) दिवस तु बातो सदिवसभेगाहमाया से इमे पत्तारि वयसया अणुरता अविरता त बहा-रायपुत्तो सेट्टिपुत्तो अमन्नपुतो सत्यवाहपुत्तोत्ति। ते सहसवरिढता सह पसुपीलिया धणसत्ववाहजीवोऽवि महाविजो जावो । बावश्यक मल प १५५ (ग) आवश्यक पूणि पृ १३२ । (५) भावश्यक हारिभदायावृत्ति पृ ११६ (1) त्रिपष्ठि ११११ से ७२% (ब) कल्पसूत्रार्थ प्रबोधिनी-राजेन्द्रसूरि पृ २२१ १०३ विदाम्पकाराऽऽयुषद जीवानन्दोऽपि पतकम् । अष्टाङ्गमीपधीश्यापि रसवीर्यविपाक्त ॥ -मिपछि १९७२९ १४ एक्दा पुषस्य जावानन्दस्य एतेपा तिष्ठलामेक साधुभिक्षार्थमाययो॥ पृथ्वीपासस्य राज में सूनुर्नाम्ना गुणाकर । मभिषोत्सृज्य समसाम्राज्यमान्दे॥ मन्दिरे।
श्री ऋषभ पूर्वभव आप अन्य की चिकित्सा करते है, चिकित्सा करने मे कुशल भी हैं, पर मुझे अत्यन्त परिताप है कि प्रापके अन्तर्मानस मे दया की निर्मल स्रोतस्विनी प्रवाहित नही हो रही है। कृमिकुष्ठ रोग से ग्रसित मुनि को देखकर भी आप चिकित्साहेतु प्रवृत्त नहीं हो रहे है। प्रत्युत्तर मे जीवानन्द ने कहा-मित्र । तुम्हारा कथन सत्य है। १०५ . १०६ सरिदोष ग्रीष्मातपेन तपसा कृश । शामिकुष्ठाभिमूतस्य सोऽकालापथ्यभोजनात् ।। सर्वाङ्गीण कृमिकुष्ठाधिष्ठितोऽपि स भेषजम् । ययाचे न पवचित् कायानपेक्षा हि मुमुक्षव ॥ गोमूधिकाविधानेन, गेहाद् गेह परिभ्रमन् । षष्ठस्य पारणे दृष्ट , स तैनिजगृहागणे ।। -त्रिपण्ठि ११७३२ से ७३६ १०५ वैजसुयस्स य गेहे निमिवुट्टोवदुय जइ दर्छ। बेंति य ते विजसुय करेहि एयरस तेगिच्छ ।। ---आवश्यकनियुक्ति गा० १७० (स) आवश्यक चूणि पृ० १३२ (ग) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प० ११६ (घ) ते वयसया अन्नया कयाइ तस्स विज्जस्स घरे एगतो सहिया गन्निसन्ना अच्छन्ति, तत्य साहू महप्पा किमिबुट्ठण गहितो भिक्वानिमित्तमइगतो, तेहि सप्पणय सहास सो विज्जो भण्णइ-तुम्भेहिं नाम सव्वो लोगो खाइयब्यो, म तुभेहि तवस्सिस्म वा अणाहस्स वा किरिया कायच्या । -आवश्यक मल वृ० पृ० १५८ () महीधर कुमारेण, स किञ्चित् परिहासिना । जीवानन्दो निजगदे, जगदेकभिषक् तत । अस्ति व्याधे परिज्ञान ज्ञानमस्त्योपयस्य च । चिकित्साकौशल चाऽस्ति, नास्ति व केवल कृपा ।। -निषष्ठि श१७३७-७३० (च) फल्पार्थ प्रबोधिनी पृ० २२१ ॥
ऋषमदेष एक परिचालन पर इस रोग की चिकित्सा के लिए जिन औषधियों की आवश्यकता है वे मेरे पास नहीं हैं। मित्रों ने कहा-बताइये किन किन औषधियों की आवश्यकता है । वे कहाँ पर उपलब्ध हो सकेगी। हम मूल्य देंगे और जसे भी होगा लाने का प्रयास करेंगे। जीवान द ने कहा-रत्नकम्बल गोशीर्षचन्दन और लमपाक तल । पूर्व की दो औषधियों मेरे पास नहीं है।" उसी क्षण ये पांचो साधी औषध लाने के लिए प्रस्थित हुए। पौषधियो की अन्वेषणा करते हुए एक श्रप्टी की विपरिण पर षष्ठी से पौषषहेतु जिज्ञासा व्यक्त करने पर धष्ठी ने १४ सो मणइ-करेमि कि पुण मम ओसहाणि काइवि मस्थि । -आवश्यक मल ६५ १५८ (ख) आवश्यक पूणि प १३२ (ग) चिकित्सनीय एवाऽहो । महामुनिरय मया। मोषधानाभसामग्री कितु पात्यन्तरायताम् । 1 - स है भणन्ति अम्हे मोल देमो कि ओसह पार कम्बमस्यण गोसीसचन्दए तय पुण जसर ममवि अत्पिा -आवश्यक मल पृ० १५८ आवश्यकणि १ १३२। आवश्यक हारिभद्रीया वृति पृ ११६ । (१) तनक लक्षपाक मे लमस्तीह माऽस्ति तु । गोजीर्षचन्दन रलकम्बलश्चाऽऽनमन्तु तत ॥ -विपष्ठि १ti १. वाहे मग्गिर पवत्ता आमिय च हि पहा अमुगम्स पाणियगस्स अस्थि पोप एपाणि ते गया तस्स सगास दो सामाणि घेत । -आवश्यक मल वृत्ति १५८ EEE श्री ऋपभ पूर्वभव कहा-प्रत्येक वस्तु का मूल्य एका-एक लाख दीनार है । वे उम मूल्य को देने के लिए ज्योही प्रस्तुत हुए, त्योही श्रेष्ठी ने प्रश्न किया-ये अमूल्य वस्तुएँ किम लिए चाहिएँ । उन्होने बताया-मुनि की चियित्मा के लिए। मुनि का नाम सुनते ही श्रेष्ठी मोचने लगा कि "इन युवको की धार्मिक निष्ठा अपूर्व है ।"१०१ उमने बिना मूत्य लिये औपधिर--- देदी। वे उन वस्तुग्रो को लेकर वैद्य के पास गये। जीवानन्द वैद्य भी अपने स्नेही माथियो के साथ उन औषधियों को तथा मृत-गोचर्म को लेकर उद्यान में पहुंचा, जहाँ मुनि ध्यान मुद्रा मे अवस्थित थे। उन्होने मुनि को वन्दन किया और उनकी स्वीकृति (ख) आवश्यकचूणि पृ० १३२ । (ग) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति ११६ । (घ) आनेप्यामो वयमिति, प्रोच्य पञ्चाऽपि तत्क्षणम् । ते ययुविपणिश्रेणी स्वस्थान सोऽप्यगान्मुनि ।। रत्नकम्बल-गोशी, मूल्यमादाय यच्चन। इत्युत्तरतर्वाणग्वृद्धस्ते पदानोऽयोदिदम् ।। -त्रिपष्ठि ११७४७-७४८ १०१ ततो वाणियगो रासभन्ता भणतिय देमित भणन्ति-पाम्बल- रयण गोसोराचन्दण च । तेण भण्णा कि एह कज्ज ते भणन्ति साहुस्स किरिया कायव्वा । तेण भण्णइ-एव, तो अलाहि मम मोल्लेण, रहरहा पेच गेण्हह, बारह माहुणो किरिय । -आवश्यक मल० पृ० १५६ (ख) तेल्ल तेगिच्छिसुतो कम्बलग पन्दण च वाणियतो । -आवश्यक नियुक्ति गा० १७१ (ग) आवश्यक चणि, पृ० १३३ (घ) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति पृ०११६ । (3) त्रिपप्ठि १२११७५०-७५६ । ११०. (क) ते विग्जसुयणभिश्णो सका धेतूण ताणि राहाणि गया पाहुणो पास जत्य सो उज्जाणे पटिम टितो, पासन्ति पडिमागय साह । -आवश्यक मल०प०१५६ ३८ अषभदेव एक परिशीलन लिए बिना ही मारोग्य प्रान करने हेतु सवप्रथम लक्षपाक सैल से मदन किया। उष्णवोर्ग तल के प्रभाव से शरीरस्य कृमियों बाहर निकलने लगी तो उहोने शोतवीर्ग रलकम्बल स मुनि के शरीर को मान्छादित कर दिया जिससे वे शरीरस्थ कृमि रल-कम्बल मे आगई। इसके पश्चात् रल कम्बल की कृमियो को मृत-गोचम मे स्थापित कर या जिसमे उनका प्राणघात न हो। उसके पश्चात् पुन मदन किया और रलकम्बल से आच्छादित करने पर मासस्य कृमियों निकल आई । तृतीय बार पुन मदन किया और रलकम्बल भोला देने पर अस्थिगत कमियां निकल गई । जब शरीर कृमियो से मुक्त हो गया तो उस पर गोशीपचन्दन का लेप किया जिससे मुनि पूण स्वस्थ हो गये। मुनि की स्वस्थता देखकर छहो मित्र अत्यन्त प्रमुदित हुए । मुनि के तात्विक प्रवचन को सुन कर छहो को संसार से विरक्ति हुई, उन्होंने दीपा बृहण की और उत्कृष्ट सथम की साधना की । १११ ताहे तेल्लेण सो साहू पढम अम्भिगितो त पेद तेल्ल रामकूहि सन्न अागय सम्म य महगए किमिया सब सखुवा ताहे वे निग्गए, बग कवनरयणे सो साहू पाडतो त सोयल तेल्ल च उण्हवीरिय हे किमिया तस्य मग्गा साह पुवाणिय गोकडेवर पष्फोडिय ते सवे पडिया सतो सो साहू चन्दणेण लिसो जातो समासत्यो एव विभिवारे अम्मगिऊण सो साहू रोहि नीरोगा कतो। -बावश्यक मम प १५६ (8) विषष्ठि १७५० से ७७६ | ११२ (क) पन्या से सदा पापा पञ्छा समणा। -आवश्यक नि मन वृत्ति पू.१५८ (a) पन्या साह पाता। -आवस्यक हारिमदीयावृति ११५ (ग) है पायका बासगा साधुसभिषी। भीमन्तो बनहुदीक्षा मयंजन्मतो फलम् ॥ -निष्ठ ११ श्री ऋषभ पूर्वभव महापुराण और पुराणमार में जीवानन्द वैद्य का भव नहीं बताया है। उन्होंने लिखा है कि देवलोक से च्युत होकर जम्बूद्वीपस्य वत्सकावती देश की सुसीमा नगरी में वह मुदृष्टि राजा और सुन्दर नन्दा रानी की कुक्षि मे मुविधि पुत्र हुअा, और श्रीमती का जीव उसी का पुत्र केशव हुमा । केगव के प्रेम के कारग प्रारम्भ मे उसके पिता सुविधि ने सयम न लेकर श्रावक व्रत म्वीकार किया और अन्त मे दीक्षा लेकर मलेखनायुक्त ममाधि मग्ण प्राप्त किया।" [१०] अच्युत देवलोक आयु पूर्ण कर जीवानन्द का जीव तथा अन्य मायी बारहवे देवलोक में उत्पन्न हुए 16 ११३ श्रीधरोऽथ दिवश्च्युत्वा जम्बूद्वीपमुपाश्रिन । प्राग्विदेहे महावत्मविपये म्वगमनम ॥ सुसीमानगरे जज्ञे सुदृग्टिनृपते मुत । मातु सुन्दरनन्दाया सुविधिर्नाम गुण्यपी । -~-महापुराण श्लो० १२१-१२२ पव १०, पृ० २१५ (ख) स यमुद्रोपम भोग भुक्त्वाऽत श्रीधरस्च्युन । प्राग्विदेहेषु वत्साह मुमीमायामुभी पुरी ॥ देपा मुन्दरनन्दाया सुदृप्टे सुविधि सुत । तत्सूनु देशको नाम्ना सुन्दर्यामितरोऽभवत् ।। -पुराणमार ६१/६२।२।२८ ११४ नृपस्तु सुविधि पुरस्नेहाद् गाहस्थ्यमत्यजन् । उत्कृष्टोपासकस्थाने तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥ --महापुराण १५८।१०।२२२ (ख) सुधिषि केशवस्नेहादुकृष्ट श्रावकोऽभवत् । --पुराणसार ६श।३० ११५ अथावसाने नम्रन्थी प्रवज्यामुपसेदिवान् । सुविधिविधिनाराध्य, मुक्तिमार्गमनुत्तरम् ॥ -~-महापुराण १६६।१०।२२२ ११६ साहु तिगिच्छिऊण सामन्न देवलोगगमण च । -आवश्यक नियुक्ति गा० १७२ ऋषभदेव एक परिशीलन महापुराण और पुराणसार के अनुसार भी सुविधि का बीय बारहव देवलोक मे ही उत्पन्न हुमा।" [११] वचनाम जीवान' का जीव देवलोक की मायु समाप्त होने पर पुष्कलावती विजय की पुण्डरीकिणी नगरी के अधिपति वनसेन राजा की धारिणी रानी की कुभि मे उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते ११८ (ख) महाउप पालश्ता तम्मूलांग पद पणा उववण्णा। आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति ११७ (ग) सवा महाग्य पालदत्ता सामण्य भूलाग पनि जपा अग्नुए कप्पे देवा उववक्षा। -आवश्यक मल ५० १५२ पडपि शव कल्पेऽष्युतनामनि तेऽभवन् । सामानिकास्ताहग म सामान्यफल तप । ---त्रिषष्टि ११७८९ समाधिना तनुत्यागात् अच्युते द्रोऽभवद विभु । द्वाविंशत्यघिसस्यातपरमायुमहर्दिक महापुराण १७ १२१२ (स) समुत्पेदेऽच्युते कल्पे प्राप्य तम प्रतीदिताम् ॥ --पुराणसार ६६२३ ११८ पुनरिगिणिए य दुपा ततो सुया वयरसेणस्म । -आवश्यक नियुक्ति था १७२ (ख) आवश्यक पूर्णिपू १३॥ (ग) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति ५ ११७॥ (1) ततो विनोगातो बाउलए पाऊण इहेव बम्हौवे दीये पुग्दविदेहे पुषवनाबावित्रए पुरिगिणीए नयरीए बहरमेणरमो धारणीए देवीए उदरे पडमो बारनामो माम पुत्तो बाता वो पुख्यमव विग्जो बासि । -आवश्यक मलपृ१५८
श्री ऋपम पूर्वभव
ही माता ने चौदह महास्वप्न देखे । जन्म होने पर पुत्र का ना नाम
"वज्रनाभ" रखा । पूर्व के पांचो साथियों मे से चार क्रमग बाहु,
सुवाहु, पीठ और महापीठ, नामक उनके भ्राना हुए और एक उनका
सारथी हुा ।"
अपने ज्येष्ठ पुत्र वजनाभ को राज्य देकर मम्राट् बज्रमेन ने
मयम ग्रहण किया, उत्कृष्ट सयम की माधना कर कैवल्य प्राप्त किया
तथा तीर्थ की मस्थापना कर वे तीर्थकर बने । २०
सम्राट् बननाभ पूर्वभव में मुनि की सेवा शुध पा करने के
फलस्वरूप पट्खण्ड के अधिपनि चक्रवर्ती सम्राट् बने और गेप भ्राता
माण्डलिक राजा हुए ।२१ दीर्घकाल तक राज्य थी का उपभोग करने
के
पश्चात् अपने पूज्य पिता तीर्थङ्कर वज्रसेन के प्रभावपूर्ण प्रवचनो
को सुनकर उनके मानस मे, वैराग्य का उदधि उछाले मारले लगा।
११६ पढमोऽत्य वयरनाहो वाहु सुबाहु य पीढ महपीढे ।
-आवश्यक नियुक्ति गा० १७३
(ख) विपष्ठि० ११७६१ से ७६५ ।
(ग) आद्य पीठो महापीठ सुबाहुश्च तृतीयक ।
तूर्योऽथ महावाहु अतिर पूर्ववान्धवा || •.
-पुराणसार ७०२।३०
१२० तेसि पिया तित्ययरो निक्षता वाऽवि तत्येव ।
-आवश्यक नियुक्ति गा० १७३
(क) वइरो धक्को जानो, तैरण साहवैयावच्चेण चक्कवट्टीभोया
उदिण्णा, अवसेसा चतारि मडलिया रायागो ।
-आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति ११८१
(ख) वयरलाभो चक्कवट्टी जातो, इयरे चत्तारि मडलिया रायणो,
सो वयरनाभो साहुयावच्चप्पभावेण उद्दन्ने
चक्कवट्टिभोगे मुजइ।
-आवश्यफ मल० वृ०१५६
४२ ऋषमदेव एक परिशीलन अपने प्रिय लघु भ्रातामो तथा सारथी के माय वजनाभ चक्रवर्ती ने प्रव्रज्या ग्रहण की। मयम गहण करन के पश्चात् वनाम ने पागमों का गम्भीर मनुशीलन परिशीलन करते हुए चौदह पूर्व तर अध्ययन किया भोर अन्य शेष भ्राताओ ने एकादश अङ्गो का अध्ययन के साथ ही उन्होंने उत्कृष्ट तप तथा अनेक चामत्कारिक लब्धियां प्राप्त की तथा प्ररिहन्त सिद्ध प्रबचन प्रभूति बीस निमित्तो की भाराधना से तीथर नामकर्म का बन्ध किया। १२२ इतो य तित्ययरवयरसेणस्स समोषरण सो पिउपायभूम चाह बि सहोअहि सम्म पन्बाइतो। -आवश्यक ममप १५६ (स) दत्वश्य वनदन्ताय पीठाव भ्रातुभि सह । सयमे स्वपितुस्तीय तस्थो सपनदेवक । --पुराणधार ७४३ १२३ पामो परदसपुष्पी- -~आवश्यक नियुक्तिमा १७४ (म) तत्थ वदरनामेण चौइस पुवाणि अहिग्जिमाणि । -आवश्यक भूणि पृ १३३ (ग) नत्य पहरनामेग घोसपुमा महिरिजया सेसावि पटरी एक्कारसगविऊ जाया। -आवश्यक मल वृ १६१ (प) तसागरपारीगो पचनामोऽभवत् क्रमात । प्रत्यक्षा द्वादशाजीव बङ्गमकाजवा गता ।। एकादशाङ्ग या पायेगा माता बालादयोऽपि ते । क्षयोपशमविश्वाचित्रा हि यतसम्पद ॥ निष्फि ३७ १२४ वरनाग विमुदारिगमर्ण वीसह ठाणेहि तित्थयरनामगोत कम्म पर। मावश्यक मल प १६॥ (4) विष्ठि १२ थी ऋपभ पूवभव बीस स्थानको की और दिगम्बर ग्रन्यानुसार सोलह भावनायो" की आराधना कर तीर्थकर नाम गोत्र का अनुबन्धन किया । अन्त में मासिक मलेखनापूर्वक पादपोपगमसयारा करसमाविपूर्वक प्रायुप्य पूर्ण किया। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिए कि बज्रनाभ के शेप चारी लघु प्राताम्रो मे से वाहमुनि मुनियों की वैयावृत्य करता और मुवाहु मुनि परिवान्त मुनियो को विधामग्गा देता--1.7 अर्थात् यके हुए मुनियों के अवयवो का मर्दन आदि करके सेवा करता। दोनो की सेवा भक्ति को निहार कर नजनाभ अत्यधिक प्रसन्न हुए १२६ नत्य पढमेण बहरणामेण बीमार कारणेहि तित्थयरत्त निवद्ध । -आवश्यक चूणि पृ० १३४ (स) बहरणाभेण य विसुदपरिणामेण तित्थगरणामगोत्त कम्म बद ति। -आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति पृ० ११८ १३०. इत्यमूनि महायर्या मुनिपिचरमभावयन् । तीयकृत्त्वस्य सम्प्राप्ती कारणान्येप पादन। --महापुराण ७८।१११२३४ (ख) जगदम्र श्यपण्यानि त्रैलोक्यक्षोभणानि च । कारणानि च जैनम्य भावयामाम पोटदा ॥ -पुराणसार ७१।३२ १३१ (क) तत्थ वाहू यो तेसि ममि वेयावच्च करेति । जो सो मुवाह, सो भगवन्ताण फितिकम्म करेति । आवश्यक चूणि पृ० १३३ (ख'बाहु नमि वैयावच्चे करीत, जो मुवाहू यो साहुणो ति । आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प० २१८ यि बन्न स च माहूण पावच्च करेड, जो माहूणो विस्सामह। -~आवश्यक मल० वृत्ति - ऋषभदेव एक परिधीयन २ जैनसस्कृति की तरह ही बौद्ध सस्कृति ने भी बुद्धत्व की उपलब्धि के लिए दान शील नकार्य प्रज्ञा वीर्य शान्ति सत्य भषिष्ठान हि निश्चय] मत्री उपेक्षा [सुख दुख मे समस्थिति] दस पारमिताए {पाली रूप पारमी] अपनाना पावश्यक माना है। दस पारमितामा और बीसस्थानो मे भी अत्यधिक समानता है। तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन करने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि श्रमण संस्कृति की दोनो ही पाराभो ने तीथङ्कर व बुद्ध बनने के लिए दूरभवो म ही पात्म मन्थन चितर्गथन गुणो का उत्कीर्तन तथा गुणो का धारण करना आवश्यक ही नही अनिवार्ग माना है। बचनाभ मुनि ने भी विशुद्ध परिणाम से श्वेताम्बर अयानुसार स बयादृश्यमातेने व्रतस्पेष्वामयादिषु । अनारमतरको भूवा तपसो हृदय हिवत् ।। स वेने भक्तिमहत्सु पूजामहसु निश्चलाम् । आचार्यान प्रथयो भेजे मुनीनपि बहुध तान् ।। परा प्रवचने भक्ति आप्तोपो ततान स । म पारपति रागादीन् विजेतु सन्ततानस ॥ अवश्यमवशोड प्येष बशी स्वावश्यक षौ । पदभेद देशकानादिसव्यपेक्षमनूनयन् ॥ भाग प्रकाशयामास तपोगानादिदीषिती । धानोऽसी मुनीनेनो भन्याबाना प्रबोधक ॥ वात्सल्यमषिक चक्र स मुनिषमवत्सल' । विनेयान स्थापयन पर्ने जिनावचनाधितान ॥ -महापुराग लोक ६५ से ७७ पर्व ११ पृ. २३३-३४ (ख) पर्शनविशुद्धिविनयसपमता घोलवतेवनतिवारोऽभीषण पानोपयोगसवेगी शक्तिवस्थागतपसी सहसाघुसमाधि वयात्यारममहदावार्यबद्ध तप्रधनमक्तिरावश्यकापरिहा णिमांगनभावना प्रवधन बरसन्नत्वमिति सारवस्य । -सत्त्वार्थ मूत्र ६मू २३ १२८ बौदधम न ११-१२॥
श्री पग पूर्वमय बीस स्थानको की और दिगम्बर ग्रन्थानुसार सोलह भावनामो१३१ की नाराधना कार तीर्थकर नाम गोय का अनुबन्धन किया। अन्त मे मासिक रानपनापूर्वक पादपोपगमसथारा करसमाधिपूर्वक आयुष्य पूर्ण किया। यहां यह रमरण रखना चाहिए कि वज्रनाभ के गैप चारो लघु प्राताश्रो मे रो बाहुमुनि मुनियो की वैयावृत्य करता और मुवाइ गुनि परिश्रान्त मुनियो को विश्रामगा दता--137 अर्थात् थके हुए मुनियों के अवयवो का मर्दन प्रादि करके मेवा करता। दोनो की गेवा भक्ति को निहार कर नवनाभ अत्यधिक प्रसन्न हुए १२९ गत्य गगण वापरणागेण योग मारणेहि तित्ययरत निघद्ध । --आवश्यक चूणि पृ० १३४ (प) वारणागेण य विशुनपरिणामेण तित्यगरणामगोत्त कम्म म ति। --आवष्यक हारिभद्रीयावृत्ति पृ० ११८ १३०. इत्यगूनि महाधर्या गुनिश्चिरमभावयन् । तीर्थत्यरय गम्प्राप्ती पारणान्येप पोटश ।। महापुराण ७८।११।२१४ (ग) नगद प्यपण्यानि प्रैलोक्यक्षोभणानि च । कारणानि च जैनस्य भावयामाग पोडश ।। -पुराणसार ७।३२ १३१ (क) सत्य वाहू सो तैसि रा? वैयावच्च गरेति । जो मो गुनाह सो भगवन्तारण रितिफम्म करेति -आवश्यक पूणि पृ० १३३ (ग) तत्य वाहु सि यावच्च करेति, जो सुयाहू गो साहुणो धीसागेति। --आवश्यका हारिभद्रीयावृत्ति १० २१८ (ग) रास्य वार रोसि अन्नाश च शाहूण यायच्च फरेइ, जो सुवाह सो गाणो विररागेप । -- आवश्यक मल वृत्ति ऋषभदेव एक परिशीलन पौर उनकी प्रशंसा करते हुए बोले-तुमने सेवा और विश्रामणा के द्वारा अपने जीवन को सफल किया है।'' ज्येष्ठ भ्राता के द्वारा अपने मझले भ्राताओं की प्रशंसा सुनकर पीठ महामीठ मुनि के अन्तर्मानस मे ये विचार जागृत हए कि हम म्वाध्याय आदि मे निरन्तर तन्मय रहते है पर खेद है कि हमारी कोई प्रशसा नही करता जबकि बयावृत्य करने वालो की प्रशसा होती इस ईOबुद्धि की तीव्रता से मिथ्यात्व पाया और उन्होने १३३ एव से करेति वइलामो भगय अणुबहति--अही सुलर जन्मजीषियफल ज साधूण यावच्च कोरइत्ति परिसन्ता या माभुगो वौसाभिनन्ति एव पससति । -आवश्यक पूणि पु. १३७ (स) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प ११८ । (ग) एव ते करते भयष वयरनामो-अणुबहर अहो सुलस बम्म सहलीकय जीविय ज साहूण पेयावच कीरह परिस्सन्ते बा साहुणो विस्सामेइ। -आवश्यक मन वृत्ति प १६॥ () बढे । प्रमाविमो बथावृत्यविधामणकये। विवाहसुगहू तो बचनामस्ताऽसावीत् ॥ त्रिषष्ठि १६ एवं पससिन्वन्तेसु तेसु तेसि दोहमग्गिलाण अपतिय भवति अम्हे सम्मायन्ता पससिम्डामा को करे सो पससिज्जा । -आवश्यक पूणि पु. १३३-२३४ एवं पससिजतेसु सेतु तैसि पच्छिमाण दोण्हषि पौरमहापीठाण अप्पत्तिय भवद अम्हे सम्झामन्ता न पसमिजामो जो कर सो पसमिबह सच्चो लोगधवहारोति। आवश्यक मल ५ १६ १ तोहु पीठ महापौठो पचिन्तयतामिति । उपमारकरो यो हिस एवंह प्रशस्यते ।। का माध्यपनध्यामरतामनुपकारिणी को नौ प्रशसवयवा कार्यवाहको जन ॥ -विपकिtleu-t. (ब ) ४७ श्री पर पूर्वभव रमी वेद का बन्धन किया । पालोचन-प्रतिनमगा न करने पर स्वल्प दोप भी अनर्थ का कारण बन जाता है | सेवा के काग्गा वाहमुनि ने चरवर्ती के विराट् सुखो के योग्य कर्म उपाजित किये और सुबाहु मुनि ने विधामणा के द्वारा लोकोत्तर बाहुबल को प्राप्त करने योग्य कर्मबन्धन किया। प्रस्तुत प्रमग महापुराण मे नही है । [१२] सर्वार्थसिद्ध फल वृतम् ॥ आयु पूर्ण कर वचनाभ आदि पाँचो भाई सर्वार्थसिद्ध विमान मे उत्पन्न हुए। वहाँ वे तेतीस सागरोपम तक सुख के सागर मे तैरते रहे ।१३० 14 राज्यों मेयधीज "क्या तयाविधतीग्रामपचशान्मिथ्या- (ग) ततो नवसु मागेषु दिनेष्वपि दोषोऽनालोचिताप्रतिक्रान्तो गतेपु नेत्रबहुलाटम्यागों उपचस्थेषु ग्रहेष्विन्दायुत्तरा --आवश्यक मल० धृ० १६०१ सुगेन सुपुर्य देवी, पुष युगल नदुप्मृतम् । १४० बाहुणीवपीठणीयो, फ्युत्वा सर्वार्थ सिद्धत -त्रिपष्ठि ११६० कुक्षी सुमङ्गलादेव्या युग्मत्येनाऽवतेरतु ।। --वि (य) बाहुणा वेयावज्यमारणेण पक्किभोगा पिठ० १।१६०४ --आवश्यक मल (ग) बाहुणा चयापच्चारणेण चक्किभोगा णिव्वत्तिया, -आवश्यमा हारिभद्रीया वृत्ति, १२० (4) तत सर्वाधिरथो योऽसो व्यानतर सुर । सुवाहरहमिन्द्रोत जुत्वा तद्गर्भमाधरात् ॥ प्रमोदभरत प्रेमनिर्भर बन्धुता तदा । समाजदरत गावि समस्तभरताधिपम् ।। -महापुराण १२८।१५।१५३३६-३३६ ४ ५ अपमदेव एक परिशीलन विधामणा देने से श्रीऋषभ के पुत्र बाहुबली हुए जो विशिष्ट बाहुबल के अधिपति थे। पीठ और महापीठ मुनि के जीवों का ई करने से क्रमश श्री ऋपभदेव की पूत्री ब्राह्मी और सुन्दरी के रूप मे जम हुमाग भगवान् श्री अपभव के विपद व्यक्तित्व और कृतित्व की झांकी अगले खण्ड मे प्रस्तुत है। यही तो श्रीऋषभदेव के पूर्वभवो का संक्षिप्त रेखा चित्र उपस्थित किया गया है जो पतनोत्थान का जीवित भाष्य है। श्रमणसस्कृति का यह उपोष रहा है कि जब आत्मा पर-परिणति से हटकर म्व-परिणति को अपनाता है तब शन शन शुद्ध बुद्ध निमल होता हुमा एक दिन परमात्मा बन जाता है। कम पाश से सदा-सवदा के लिए मुक्त होने का नाम ही परमात्म अवस्था है। इस प्रकार श्रमण सम्कृति ने निजत्व मे ही जिनस्य की पावन प्रतिष्ठा कर जन-जन क अन्तमनिस में प्राशा और उल्लास का सचार दिया। प्रसुप्त देवत्त्व को जगाकर मात्मा से परमात्मा भक्त से भगवान मीर नर से नागमण बनने का पवित्र सदेश दिया। विषष्ठि -4001 (ख) मुवाहणा बाहुबल। --आवश्यक मल वृ १६२ (1) गुबाहुणा बीमामणाए बाहुबल निब्बतिम । -आवश्यक हारिषदीया ऐति १२ ॥ १४२ त्रिषष्टि शराम ELI (ख) पटिह माया इत्विनामगोत वित नि। -आवस्मक हारिभद्रीया वृत्ति १२ कर्मचदा भवेज्जीव रममुक्तस्तथा जिन। ताप प्रथम अध्याय गृहस्थ-जीवन महापुरुषो का देश भाग्नवर्प महापुरुषों का है, इस विषय में संसार का कोई भी देश या राष्ट्र भारतवर्ष की तुलना नहीं कर सकता। यह अवतारी की जन्मभूमि है, मन्ती की पुण्यभूमि है, वीरो की कर्मभूमि है, औ विचारको की प्रचार-भूमि है। यहाँ अनेक नररत्न, समाज- रल एवं राष्ट्रगल पैदा हुए है, जिन्होने मानव मन की सूखी धरणी पर ग्नेह की मरम मरिता प्रवाहित की। जन-जीवन में अभिनव जागृनि का मचार किया। जन-मन मे सयम और तप की ज्योति जगाई । अपने पवित्र चरित्र के द्वारा और तप पूत वाणी के द्वारा, कर्तव्य मार्ग मे जूझने की अमर प्रेरणा दी। युग-पुरुष गगन-मण्डल में विचरती हुई विद्युत तरगो को पकड कर जैसे वैतार का तार उन विद्युत्तरगो को भाषित रूप देता है, अव्यक्त वाणी को व्यक्त करता है, वैसे ही समाज मे या राष्ट्र मे जो बिचार- धाराएँ चलती है, उन्हे प्रत्येक विचारक अनुभव तो करता है किन्तु अनुभूति की तीव्रता के प्रभाव मे अभिव्यक्त नही कर सकता। अनुभूति तीव्र होती है और अभिव्यक्ति भी तीन होती T जनार्दन को अव्यक्त विचारधारामो को वेतार के प्रवरित ही नहीं करता बल्कि उसे नूतन स्वरूप उनकी विमल चारगी मे युग की समस्याओ का 11 है। उसके कम मे युग का कर्म क्रियाशील मे युग का चिन्तन चमकता है । युग-पुरुप जन-जन के मन का T- तिन परिचयरेखा . महापुरुषो का देश • साधना के पथ पर युग-पुरुष • दान भारतीय संस्कृति के प्राध निर्माता महाभिनिष्क्रमण जन्म से पूर्व बिवेक के अभाव मे शासनव्यवस्था • साधक जीवन कुलकरो की संख्या विशिष्ट लाम दण्डनीति • अक्षय तृतीया हाकारनीति अरिहन्त के पद पर • माकारनीति • सम्रा भरत का विवेक •धिक्कारनीति मां मरुदेवी की मुक्ति .स्वप्न-दशन धर्म चक्रवर्ती उत्तराधिकारी नाम भाध परिवाजक मरीचि मादिपुरुष सुन्दरी का सयम • वंश उत्पत्ति पठान भ्रातामो की दीक्षा • विवाह परम्परा • विधवाविवाह नहा भरत और बाहुबली का विवाह . समप्रथम राजा अनासक्तभरत • राज्यव्यवस्था का सूत्रपात भरत स भारतवपोमगोर साधसमस्या का समाधान भरत को वेवस ज्ञा .कला का अध्ययन भगवान् के संघ मे • वर्णव्यवस्था निर्वाणा भरत और वाहवर सफलता नहा मिनी बाहुबली को केवर तो प्रथम अध्याय -- गृहस्थ-जीवन महापुरुषो का देश भारतवर्ष महापुरुषो का है, इस विषय में ससार का कोई भी देश या राष्ट्र भारतवर्ष की तुलना नहीं कर सकता। यह अवतारो की जन्मभूमि है, सन्तो की पुण्यभूमि है, वीरो की कर्मभूमि है, जो विचारको को प्रचार-भूमि है। यहाँ अनेक नररत्ल, समाज- रल एव राष्ट्ररत्न पैदा हुए है, जिन्होंने मानव मन की सूखी धरणी पर स्नेह की सरस मरिता प्रवाहित की । जन-जीवन मे अभिनव जागृत्ति का संचार किया। जन-मन मे सयम और तप की ज्योति जगाई। अपने पवित्र चरित्र के द्वारा और तप पूत बाणी के द्वारा, कर्तव्य मार्ग मे जूझने की अमर प्रेरणा दी। युग-पुरुष गगन-मण्डल में विचरती हुई विद्युत तरंगो को पकड कर जैसे घेतार का तार उन विद्युत्तरगो को भाषित रूप देता है, अव्यक्त चाणी को व्यक्त करता है, वैसे ही समाज मे या राष्ट्र में जो विधार- धाराएं चलती है, उन्हे प्रत्येक विचारक अनुभव तो करता है किन्तु अनुभूति की तीव्रता के प्रभाव मे अभिव्यक्त नहीं कर सकता। युग-पुरुष की अनुभूति तोय होती है और अभिव्यक्ति भी तीव्र होती है। वह जनता जनार्दन को अव्यक्त विचारधारापो को बेतार के तार की भाँति मुखरित ही नहीं करता बल्कि उसे नूतन स्वरूप प्रदान करता है । उनकी विमल-वाणी मे युग की समस्यानो का समाधान निहित होता है। उसके कर्म मे युग का कर्म क्रियाशील होता है और उसके चिन्तन मे युग का चिन्तन चमकता है । युग-पुरुप अपने युग का सफल प्रतिनिधिल करता है। जन-जन के मन का
२
ऋषभदेव एक परिशीलन
साधिकार नेतृत्व करता है एव वह युग की जनता को सही दिशा-दशन
देता है। भूले भटके जीवन राहियों का पथप्रदान करता है । प्रत
वह समाज रूपी पारीर का मुख भी है और मस्तिष्क भी है।
भगवान् श्री ऋपभदेव ऐसे ही युगपुरुष थे जिन्होने अपने युग
की भोली भाली जनता को 'सत्य शिव सुन्दरम् का पाठ पढाया
जनजीवन को नया विचार नयी वाणी एव नया कम प्रदान
किया ।भोगमाग से हटाकर कममाग प्रवत्तिमार्ग और योगमाग पर
लगाया । प्रजानाधकार को हटाकर ज्ञान का विमल भालोक
प्रज्ज्वलित किया । मानव-सस्कृति का नव निर्माण किया । यही
कारण है कि अनन्त-अवीत की धुलि भी उनके जीवन की चमक
एष दमक को भाच्यादित नही कर मकी।
भारतीय सस्कृति के आधनिर्माता
भाष मानवसस्कृति के प्राधनिर्माता महामानव भगवान
श्री ऋषभदेव को कौन नही जानता' वे वतमान अवसर्पिणी
कालचक्र म सवप्रथम तीर्पर हुए है। होने ही सवप्रथम
पारिवारिक प्रथा समाजव्यवस्था शासनपद्धति समाजनीति और
राजनीति की स्थापना की और मानवजाति को एक नया प्रकाश
दिया जिसका उल्लख अगले पृष्ठो मे किया जाएगा।
जाम से पूर्व
भगवान श्री ऋषभदेव ऐसे युग मे इस भवनीवल पर माये जब
(1) एपणं वसईणाम बरहा कोसलिए पामराया पदमविणे
परमकेमली पदमतिमयो, पदम घामवर पाकवट्ठी समुग्लिाया
पपीपप्रापि
(ख) उसमे हवा पदमरारामा पढपिसापरे । पढमजिर
इवा पढमतिस्पकरेगा।
पसमूत्रः पुण्यविजयजी मू१९
४७
गृहस्थ-जीवन ५५ आर्यावर्त के मानवीय जीवन मे आमूलचूल परिवर्तन हो रहा था। जीवन का ढग पूरी तरह पलट रहा था। निष्क्रिय-यौगलिक-काल समाप्त होकर कर्मयुग का प्रारम्भ होने जा रहा था। प्रतिपल, प्रतिक्षण मानव की आवश्यकताएं तो बढ रही थी पर उस युग के जीवन निर्वाह के एक मात्र साधन कल्पवृक्षो की शक्ति क्षीण हो रही थी। साधनो की अल्पता से संघर्ष होने लगा, वाद-विवाद, लूट-खसोट और छीना-झपटी होने लगी। सग्रहबुद्धि पैदा होने लगी। स्नेह, सरलता, सौम्यता, निस्पृहता प्रभृति सद्गुणो मे परिस्थिति की विवशता से परिवर्तन आने लगा। अपराधी मनोभावना के बीज अकुरित होने लगे। शासन व्यवस्था विख्यात राजनैतिक विचारक टामस्पेन ने लिखा है, "मानव अपनी बुरी प्रवृत्तियो पर स्वय नियत्रण नही रख सका इसलिए शासन का जन्म हुआ । शासन का कार्य है व्यक्ति की बुरी प्रवृत्तियो पर नियन्त्रण रखना । अच्छी प्रवृत्ति फूल की लता है, फल का वृक्ष है, जिसे बुरी प्रवृत्ति की झाडियाँ घेरती है, पनपने नहीं देती। शासन का काम इन झाडियो को काटना है।" प्रस्तुत सन्दर्भ के प्रकाश मे हम जैन संस्कृति की दृष्टि से देखे तो भी शासन व्यवस्था का मूल अपराध और अव्यवस्था ही है । अपराध और अव्यवस्था पर नियंत्रण पाने के हेतु सामूहिक जीवन जीने के लिए मानव विवश हुया । मानव की अन्त प्रकृति ने उसे प्रेरणा प्रदान की । उस सामूहिक व्यवस्था को 'कुल' कहा गया । कुलो का मुखिया जो प्रकृष्ट प्रतिभा सम्पन्न होता था वह 'कुलकर' कहलाने लगा। वह उन कुलो को सुव्यवस्था करता। . ज्ञानादय, वर्ष १७ अझ२ अगस्त १६६५, सहचिन्तन, (कन्हैयालाल मिश्र) पृ० १४४ । स्थानाग सूत्रवृत्ति० सू० ०६७, पत्र ५१८-१।. ३ ऋषयदेव एक परिशीलन कुलकरों की संख्या कुलकरों की संख्या के सम्बन्ध मे विभिन्न मत है। स्थानाङ्ग' समवायागं भगवती पावश्यकचूणि आवश्यकनियुक्ति तथा विपष्ठिशलाकापुरुषचरित्र मे सात कुलकरी के माम उपलब्ध होते है। पज्मचरिम 'महापुराण और सिद्धान्त साह" मे चौदह के तथा ४ ५ ६ A . स्थानाग सूत्र वृत्ति सू ७६७ पत्र ५१८-। समवायाग १५७। (ख) जम्बुद्दीव ए मते । दीव मारहे वासे इमीसे ओमप्पिणीए समाग कहलगरा होत्या गोयमा । सत। -भगवती ग." उद्द ६३ आवश्यक चूणि पत्र १२६ पढमेत्यविमलवाहण पक्थुम जसम उत्यमभिचन्दे । तत्तो म पसेपइए मरदव व नामी य॥ -आवश्यक नि मल सू गा १५२ पृ १५४ विपप्ठि पर्व १स २ श्लो १४२-२६। पचमचरिय उद. ३ फ्लो ५-५५ (१) सुमति (२) प्रतिधति (३) बोपहर (1) सीमावर (५) मंकर (६) क्षेमपर (७) विमलवाहन (6) चक्षुष्मान (e) यशस्वी (१ ) अनिषा (११) बदाम (१२) प्रसेनजित, (१३) मरदेव (१४) मामि । माय प्रतिषति प्रोक्त स्त्रिीय सम्मतिर्मत । तृतीय क्षमन्नाम्ना चतुर्थ मन्मनु ॥ सोमपञ्चमो मेय पष्ट सीमभृतिष्यते। ततो विमलवाहाइ पक्षमागप्टमो मा। यवस्वामदमस्तस्मान् मामिष द्रोऽप्यनन्तर ॥ पदामोऽस्मात्पर यो मन्देवस्वत प्रसेनजित्पर वस्मा मामिराजरचतुर्दछ । --महापुराण मिनसेनापार्य प्रयन भाग दुतीय पर्व इलो २२१-२३२ १६६ मितान्त संग्रह पृष्ठ गृहस्थ-जीवन ५७ जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति मे पन्द्रह के नाम मिलते हैं । सम्भवत अपेक्षा भेद से इस प्रकार हुमा हो। कुलकरो को आदिपुराण मे 'मनु' भी कहा है । वैदिक साहित्य मे कुलकरो के स्थान मे 'मनु' शब्द ही व्यवहृत हुअा है। मनुस्मृति में स्थानाग की तरह सात मनुषो का उल्लेख है" तो अन्यन्त्र चौदह का भी। सक्षेप में चौदह था पन्द्रह कुलकरो को सात मे अन्तनिहित किया जा सकता है। चौदह या पन्द्रह कुलकरो का जहाँ उल्लेख है, उसमे प्रथम छ सर्वथा नये है और ग्यारहवें कुलकर चन्द्राभ का भी उल्लेख नहीं है। शेष सात वे ही है । १२ तीसे समाए पच्छिमेतिभाए पलिभोवमव- भागावसेसे, एत्थण, इमे पण्णरम कुलगरा ममुप्पज्जित्था त जहा--सुमई, पडिस्सुई, मीमकरे, सीमधरे, सेमकरे, खेमघरे, विमलवाहणे, चक्खुम, जसम अभिचन्दे चदाभे, पमेणई, मरुदेवे, णामी उपभोति । - जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति पत्र० १३२ १३. आदि पुराण ३।१५। (ख) महापुराण ३।२२९। पृ० ६६ । १४ स्वायम्भुवस्यास्य भनो, पड्वश्या मनबोऽपरे । सृष्टवन्त प्रजा स्वा स्वा, महात्मानो महौजस ।। स्वारोचिषश्चोत्तमश्च, तामसो रैवतस्तथा । चाक्षुपश्च महातेजा, विवस्वत्सुत एव च ॥ स्वायम्भुवाद्या सप्तते, मनवो मूरितेजस । स्वे स्वेऽन्तरे समिदमुत्पाद्यापुश्चराचरम् ॥ -मनुस्मृति, अ० ११ श्लो० ६१-६२-६३ (१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिप, (३) ओलमि, (४) सापस, (५) रवत, (६) चाक्षुप, (७) वैवस्वत, (८) साणि, (९) दक्षसायणि, (१०) ब्रह्मसावणि, (११) धर्मसावर्णि, (१२) रुद्रसावणि, (१३) रोच्य देव सावणि, (१४) इन्द्र सावणि । -मोन्योर-मोन्योर विलियम सस्कृत-इङ्गलिश डिक्शनरी पृ० ७८४ ५८ ऋषभदेव एक परिचालन दण्डनीति अपराधी मनोवृत्ति जव व्यवस्था का अतिक्रमण करने लगी तब अपराधो के निरोध के लिये कुलकरो ने सवप्रथम दण्डनीति का प्रचलन किया । वह दण्डनीति हाकार माकार और धिक्कार थी।" हाकार नीति सान कुलकरा की दृष्टि से प्रथम कुलकर विमल वाहन क समय हाकार' नीति का प्रचलन हुना। उस युग का मानव आज क मानव की तरह अमर्यादित व उच्छ खल नहा था। वह स्वभाव से ही सोची और लज्जागील था। अपराध करने पर अपराधी को इतना ही रहा जाना हा ' अर्थात् तुमने यह क्या किया?' यह शब प्रताडना उस युग का महार दण्ड था । अपराधी पानी-पानी हो जाता। प्रस्तुन नीति रितीय कुलकर चक्षष्मान' के समय तक सफलता के साथ चली। भाकार नीति जव हाकार नीति विफल हान लगी तव माकार नीति का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। तृतीय और चतुभ कुलकर यशस्वी और १७ बण्ड अपराविनामनुशासन तत्र तस्य वा स एव वा नीति नया हनीति । -स्थानाग वृत्ति १३६९-१ हक्कारे मरकारे धिक्कारे पेव दण्डनीतीओ। पौव ताति विसेस पहनाम बागुपुषोए । -बाव निगा १६४ ह इत्यपिपास्तस्य करण हकार । स्थानान सू० वृत्ति प ३९५ तेए अणुया हमाारण दरेण हया समाणा सिमा विशिया भोमा सुसिणीमा विणलोगया चिट्ठन्ति । -अबू मासाधिकार ७६ मा इरपस निपधार्यम्य करण अभियान मार। यामाह तिर १५ गृहस्थ-जीवन "अभिचन्द्र" के समय तक लघु अपराध के लिए "हाकार नीति" और गुरुतर अपराध के लिए "माकार नीति” प्रचलित रही। "मत करो" यह निषेधाज्ञा महान् दण्ड समझी जाने लगी। धिक्कारनौति मगर जन साधारण की धृष्ठता क्रमश बढती जा रही थी, अत माकारनीति के भी असफल हो जाने पर "धिक्कारनीति" का प्रादुर्भाव हुआ। और यह नीति पाँचवे प्रसेनजित्, छठे मरुदेव तथा सातवे कुलकर नाभि तक चलती रही। इस प्रकार खेद, निषेध और तिरस्कार मृत्युदण्ड में भी अधिक प्रभावशाली थे। क्योकि उस समय का मानव स्वभाव से सरल और मानस से कोमल था।२२ उम समय तक अपराधवृत्ति का विशेप विकास नही हुआ था। स्वप्न-दर्शन अन्तिम कुलकर नाभि के समय यौगलिक सभ्यता क्षीण होने लगी, और एक नयी सभ्यता मुस्कुराने लगी। उस सन्धिवेला में श्री ऋषभदेव सर्वार्थविमान से च्यवकर माता मरुदेवी पाये। उनके पिता नाभि थे ।२३ कुक्षि में २१ २२ घिधिक्षेपार्य एव तस्य करण उच्चारण धिक्कार । -स्थानाग वृत्ति ५० ३६६ तेण मणुआ पगईसवस-ता, पगई पयणुकोह-माण-माया-लोहा, मिउमद्दवसम्पग्णा, अल्लीणा, भद्दगा, विणीमा, अप्पिच्छा, असणिहिसचया, विडिमन्तरपरिवसणा जहिच्छिा कामकामिणो। -जम्बूद्वीप प्रशस्ति वक्षस्कार सू० १४ नाभिस्स कुलगरस्स मरुदेवीए भारियाए। -कल्पसूत्र पुण्य सू० १६१ पृ०५६ (ख) विपष्ठि पर्व १, सग २, श्लो०६४७ से ६५३ ॥ (ग) नाभिस्स्वजनयत्सुत्र, मरुदेव्या महायु ति । ऋषभ पार्थिवश्रेष्ठ, सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम् ॥ -बायुमहापुराण पूर्वार्घ ५० ३३ ६. ऋषभदेव एक परिशीलन जब बालक गम म पाता है तब गम का माता के मानस पर और माता के मानस का गम पर प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि किसी विशिष्ठ पुरुष के गम मे आने पर उसकी माता कोई थप स्वप्न देखती है। भारतीय साहित्य मे स्वप्न विज्ञान के सम्बध मे विस्तार से निरूपण मिलता है । मर्यादापुस्पोत्तम श्रीराम के गम मे माने पर माता कौशल्या ने चार स्वप्न देखे थे। कर्मयोगी श्रीकृष्ण के गम में पाने पर देवकी ने सात स्वप्न देखे थे। महात्मा बुद्ध के (घ) नामिस्त्वजनयन पत्र मरुदेन्या महाय तिम् ॥५॥ ऋषभ पार्थिव श्रा सवक्षत्रस्य पूरजम् । ऋषमार भरती जसे वीर पत्राताग्रज ॥ ब्रह्माण्ड पराण पूर्वाद्ध अनुपङ्गपाद श्लो० ५६-६ अध्याय १४ (४) नाभिमदेव्या पुनमजनयन ऋषभनामान । -वाराह पुराण अध्याय ७४ (च) नाम पुष ऋषभ । व पुराण मालश्वरखण्ड-कोमारखण्ड स्लो ५७ अध्याय ३७ () हिमालय तु पाप नाभेरामी महात्मन । वस्यपमोऽभवत्पुत्रो मेरदेन्या महाध ति ।। -कूर्मपुराण इला ३७ अध्याय ४१ (1) चतुरो बलदेवादाय -श्री काललोकप्रकार सग ३ बलोक ५६ पृ १९६ (6) दा मुखमुप्ता च मामिन्या पश्चिम क्षणे । पतुर सा महास्वप्नान सूधमान बलज मन । -विपष्ठि पर्व ४ | सगलो १६५ (ग) सेनप्रश्न पृ ३७ (१) पैन रामायण मेघराज पौ १९ वा हार र दाह । पामिन्या पश्चिमे मामे यूपरा विष्णुज मन । देण्या दधिरे स्वप्ना सुखमुप्पया। -विष्टि ४१७ (6) सनयन ३७६ । २४ २५ ६ ऋषभदेव एक परिशीलन जब बालक गम म पाता है सब गम का माता के मानस पर, और मांसा के मानस का गम पर प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि किसी विशिष्ठ पुरुष के गम मे आने पर उसकी माता कोई यष्ठ स्वप्न देखती है। भारतीय साहित्य म स्वप्न विज्ञान के सम्बधम विस्तार से निरूपण मिलता है। मयादापुरपोतम श्रीराम के गम में माने पर माता कौशल्पा ने चार स्वप्न देखे थे। कर्मयोगी श्रीकृष्ण के गम में आने पर देवकी ने सान स्वप्न देखे थे। महात्मा बुद्ध के (थ) नाभिस्त्वजनयन पत्र मरुदेव्या महाध विम् ॥५६॥ कृपम पापिय था सषक्षत्रस्य पूर्वजम् । अपमाद भरती जने वीर पणशताग्रज ॥ -ब्रह्माण्ड पुराण पूर्वाद अनुपङ्गपाद पला ५६-६ अध्याय १४ (1) नाभिमण्या पुत्रमजनयम ऋपमनामान । -चारह पुराण अध्याय ७४ (२) नागे पुत्रश्च ऋषभ । मन्य पुराण माहवरखण्ड-कोमारखण्ड श्लो७ अध्याय ३७ (घ) हिमाद्वय तु याप भामेयसी महात्मन । तस्यर्पभोऽभवसुत्रो मेरदेव्या महाच वि ॥ -कूर्मपुराण क्लो ३७ अध्याय ४१ (6) पतुरो बलदेवाम्बाम -भी काललोकप्रकाश सर्ग ३ श्लाक ५९ १९॥ (स) पदम सुक्षसुप्ता च मामिन्या' पश्चिम भए। अरसा महास्वप्नान सूचमान दलजमन' । -त्रिषष्ठि पर्वावर्गलो १६८ (ग) सेनप्रश्न ३७६ (1) जैन रामायण केशब जो १६वी डाल क दोहे । पामिन्या पश्चिमे यामे सूचका विष्णुजन्मन । देव्या शिरे स्वप्ना सप्तते सुखसुप्तया ॥ --विषष्ठि ४।१।२१७ (स) सेनप्रश्न पू ३७६।
गृहस्थ-जीवन
गर्भ मे आने पर उनकी माता मायादेवी ने एक पडदन्त गज का स्वप्न
देखा था। उसी प्रकार श्री ऋपभदेव के गर्भ मे आने पर माता
मरुदेवी ने भी (१) गज, (२) वृषभ, (३) सिंह, (४) लक्ष्मी, (५) पुष्प-
माला, (६) चन्द्र, (७) सूर्य (८) ध्वजा, (E) कुम्भ, (१०) पद्मसरोवर,
(११) क्षीर-समृद्र, (१२) विमान, (१३) रत्नराशि, (१४) निधूम अग्नि
ये चौदह महास्वप्न देखे । दिगम्वराचार्ग जिनसेन ने सोलह स्वप्न
देखने का उल्लेख किया है।" उपर्युक्त चौदह स्वप्नो मे से ध्वजा को
२६
२७
२८
सा
(क) बुद्धचर्या, राहुल साकृत्यायन पृ० २, प्रथम सस्क०
(स) ललित विस्तर, गर्भावक्रान्ति परिवर्तन ।
गय वसह सीह अभिमेय, दाम ससि दिणयर भय
पउममर मागर विमाण-भवण रयणुच्चय सिहि
-कल्पसूत्र प.
सापश्यत् पोडशस्वप्नान्, इमान् शुभफलोदयान ।
निगाया पश्चिमे यामे, जिनजन्मानुगमिन ॥१०३
गजेन्द्रमन्द्रमामन्द्रवृ हित त्रिमदव तम् ।
ध्वनन्तमिवसासार, ददर्श भरधनम् ॥१०४
गवेन्द्र दुन्दुभिम्कन्ध, कुमुदापाण्डुरा तिम् ।
पोनूपराशिनीकाश, सापश्यन
मन्द्रनि स्वनम् ।।१०५
मृगेन्द्रमिन्दुगच्छायवपुप
रक्तकन्धरम् ।
ज्योत्स्नया सन्ध्यया चैव, घटितामिवैक्षत ।।१०६
पमा पद्ममयोतुङ्गविप्टरे सुरवारण ।
स्या हिरण्मयै कुम्भ बदर्गत् स्वामिव श्रियम् ।।१०७
दामनी
कुसुमामोद, समालग्नमदालिनी।
तज्झकृतरिवारव्यगाने सानन्दमक्षत ॥१०॥
समग्रबिम्बयुज्ज्योत्स्न, ताराधीश सतारकम् ।
स्मेर स्वमिद वनान, समौक्तिकमलोकयत् ॥१०६
विधूतध्वान्तमुद्यन्त,
भास्वन्तभुदयाचलात् ।
शातकुम्ममय कुम्भ मिबाद्राक्षीत् स्वमङ्गले ॥११०
कुम्भी हिरण्मयी पपिहितास्यो व्यलोकत ।
म्तनकुम्भाविद्यात्मीयौ, समासक्तकराम्बुजो ॥११॥
ऋषभदेव एक परिशीलन उन्होने स्थान नहीं दिया है। शेप तेरह स्वप्न वे ही हैं। उनके अतिरिक्त (१) मत्स्ययुगल (२) सिंहासन (३) नागेन्द्र का भवन-ये तीन स्वप्न अधिक है। श्वेताम्बरमान्मतानुसार नरक से आने वाले तीथरो की माता स्वप्न मे भवन देखती है और स्वग से पाने वालों की माता विमान ।' उन्होंने विमान और भवन के स्वप्न को वकल्पिक माना है। । भयो सरसि सम्फुल्लकुमुदोत्पलपहजे। सापश्यन्नयनायाम दर्शयन्ताविवात्मन ॥१२॥ तरत्सरोजकिश्चकपिपरोक्कमक्षत मुवर्णद्रवसम्पूर्पमिष दिव्य सरोवरम् ॥११३॥ क्षम्यन्तमधिमुद्रम चमत्कस्लोलकाहलम् । सादशच्छीकरमोक्तुम् अट्टहासमियोद्यतम् ॥११॥ सहमासनमुत्तुन स्फर मणिहिरण्मयम् । सापश्य मेरुपृङ्गस्य वदग्धी दषपूजिताम् ॥११॥ नाकालय मलोकिष्ट पराध्यमणिमासुरम् । स्वसूनो प्रसषागार मिव देवसाहृतम् ॥११॥ फणीन्द्रभवन भूमिम्, उदियोद्गतमक्षत। प्रादृष्टस्वविमानेन स्पर्दा कमिवोवतम् ।।११॥ रत्लामा राशिमुत्सदगुपल्लवितामरम सा निवघ्यो धरादे या निधानमिव दशितम् ॥११८॥ ज्वलालासुरनिधूमवपुष विषमाधिपम् । प्रतापमिव पुत्रस्य मूर्तिरुप पचायत ॥११॥ न्यशाभयच्च तुङ्गाज पुरव समसच्छविम् । प्रविशन्त स्वक्त्राम्ब स्वप्नान्ते पीनकन्धरम् ॥१२॥ -महापुराण जिनसेनाचार्य प १२ को १०३ से १२ पृ २५६-२६ देवलोकाद्योऽवतरति तमासा विमान पश्यति यस्तु नरकात तम्माता अवनमिति ~भगवती शतक ११ र ११ अमयदेवदृति । २९ गृहाय-जीवन ६३ जन्म भगवान् श्री अपभदेव का जन्म जम्बूदीपप्राप्ति, कल्पसूत्र, आवश्यकनियुक्ति, श्रावश्यकर्गि, निपष्टिगानाकापुरुपचरित्र, प्रभृति श्वेताम्बरप्रन्यानुसार चैत्र कृष्णा अष्टमी को हुआ और दिगम्बराचार्य जिनमेन के अनुसार नवमी को । मभव है अष्टमी की मध्यरात्रि होने से ग्वेताम्बर परम्पग ने अष्टमी लिया हो और मात काल जन्म मानने में दिगम्बर परम्परा ने नवमी निग्या हो । दम ३० उगभे बगहा योगनिए जे में गिम्हारण पढम माग पदम परमै चित्तवहन कम्मरण चित्तवहगम्ग अट्टमीपवर्गगण नवग्ह मामाग्ण बहुपटिपुगणाण अट्ठमाण य गान्दियागण गान आगानि नापनेण जोगमुवागण आगेगा आरोग्ग पयाया ।। --पारपत्र, पुण्य० मृ० १९३ पृ. (4) उत्तमहानगीण जाना उगभो अमादनमा । --आवश्यक नियुक्ति गा० १८८ (ग) चतहमट्टमी उनगगाढाणपयनग्ग जाव अगेगा अगेग पयाता। -आवश्या पणि, जिनदाममहत्तर पृ० १३५ (घ) विपप्टि० मर्ग २, पय १ श्लो० पृ० २६४ । (e) करपलता-समय मुन्दर पृ० १६७ । (घ) फरपद म कतिका-लक्ष्मीवालभ पृ० १४२ । (घ) बरपात्र पाल्पामोधिनी, केशरगणी पृ० १४४। (ज) कल्पमूत्र, कल्पगुनाधिका, पृ० ४८५ । अथातो नयमामानाम, अत्यये सुपुर्व विभुम् । देवी देयौमिरवतामि, यथाम्प परिवारिता ।। प्राचीय गन्धुगन्जाना, गा लेगे भास्थर मुतम् । चैत्रे मारयसित पक्ष, नवम्यामुदय रये ॥ विश्वे ब्रह्ममहायागं, जगतामेवाबरलभम् । भागमान विभिबधि गिशुमप्यशिशु गुण ॥ -महापुराण जिनसेन स० १३, श्लो० १-३ पृ० २८३ ऋषभदेव एक परिशीलन भेद का प्रमुख कारण हमारी दृष्टि से उदय भोर प्रस्त तिथि की पृथक्-पृयक मान्यता हो सकती है। नाम मा मरुदेवी ने जो चौदह महास्वप्न देखे थे। उनमे सब प्रथम वृषभ का स्वप्न या और जन्म के पचान भी शिशु के उरु-स्थल पर पभ का लाछन था अत उनका नाम ऋपभ रखा गया। भागवत ३२ (क) सा उसहगयसीहमाईए चोट्स सुमिणे पासित्ता पडिबुखा। -आवश्यक नि० मल वृत्ति प० १६१ (ख) गवर परम उमम मुहे अतित पासति सेसाउ गय । - पसून पुण्य सू १९२१५५ (ग) स्ववित्तरण हुष म्वप्नेऽम्प वृपभो यत्त । जनन्या तत्य देव बाहूतो वृषभास्यया । -महापुराण जिनसन चतुर्देश पर्व श्लो०१२ (घ) त्रिपण्टि १।२।२१३ प ४१ पु ३१५ (क) तत्र भगवतो नाम निबधन चतुर्विशतिस्तव वक्ष्यति उत्सुउसमलक्षणमुसभ सुमिणमि सेण उसजणो। --आवश्यक मल वृ १९२।१ (ख) असु उसमलपण उसमो सुमिणमि तेण कारण उसमोति णाम कय। -बावश्यक चूणि जिनदास प् ११ (ग) ऊरप्रदेशे कपभो लाञ्छन यजगत्पते । ऋषम प्रथम यष स्वप्ने मात्रा निरीक्षित ॥ सदतस्य ऋषम इति मामोत्सवपुर. सरम् सौ मातापितरो इष्टी विश्षाते शुभे दिने । -त्रिषष्ठि १२२६४८-४९प ४ (4) पूर्व स्वप्नसममे वृषभस्य दर्शनात पुत्रस्पोनयोजनपो रोम्णाम थावतंभ्रमणावलोकाद् वृषमस्याकारस्यसञ्छना नाभिकुलकरण ऋषभ इतिनाम दत्तम् । -कल्पसूत्र व्या ७ पृ १४२ कल्पद मकलिका (1) कल्पसूत्र कल्पार्यबोधिनी १४ प्राय-जीवा ६७ प्रयम 'प्रजापति भी निया । उनके अतिग्नि, उनो काश्यप.' विधाता, विश्वकर्मा और भ्रष्टा' प्रादि अनेक नाम भी प्रसिद्ध है। आदिपुरुष भगवान् श्री ऋषभदेव जैनगपानि ती लट गं नीर्थडर है । श्रीमद्भागवत की दृष्टि में ये विगु म अवतार है। भगवान श्री विष्णु महागजा नाभि का प्रिय करने के निय उनी अन्त पुर की महागनी मन्देवी के गर्भ म प्राये। उन्होंने उग पवित्र शरीर का अवतार वानरगना श्रमग नापियो मर्मा 1 ट करने की इच्छा मे ग्रहण किया।" गिब महापुराण के अनुसार भगवान श्री नापभदव शिव र अट्ठाईग योगावतारो मे पाठवे योगावतार है।' उन्होंने न पादेव । ४६ ४७ काम- उच्छ, तम्य निसर्ग - पाग - 1 , गा नापगा कामवा-उगभरामी। - यावाति-जगरामद णि (य) वाम्गमित्युच्यते तंज साम्यपम्ता गाउना । महापुगण प० १६, ना० २१६ पृ. ३७० विधाता विश्वकर्मा च, बाटा चत्यादिनामभि 1 प्रजाम्न ब्याहरनि म्म, जगना पतिमशुनम् ॥ -~-महापुराण, आनाग जिनमेन ६२६१६७० प्रमादितो नाभ प्रियचिकीपया, तदवगेधायने मन्दव्या जमान् दायितुकामा, वातग्णनाना T ऋपीणाम उज्बमन्थिना नन्बावततार । -श्री मद्रागवन पन्नम मन्त्र वृत्तरगण्ड अ० ६, ग्लो०३,१०१३७६ करेश्वर प्रेम | गिव पुराण, L
ऋषभदेव एष परिगलन
में यही नाम पाया है। उनक नाम के साथ नाथ और देव
गब्द कब जुड़े यह कहना कठिन है तथापि यह स्पष्ट है कि ये शब्द
उनके प्रति भक्ति और श्रद्धा के सूचक है।
दिगम्बरपरम्परा म ऋषभदेव के स्थान पर वृपभदेव भी
प्रसिद्ध है। वृपभदेव जगन् भर मे ज्येष्ठ है और जगन् का हित करने
वाले धर्मरूपी अमृत की वर्षा करेगे एतदथ ही इद्र ने उनका नाम
वृषभदेव रखा। वृष कहते है अप्ठ को। भगवान् श्रष्ठ धम स
शोभायमान है इसलिए भी इन्द्र ने उह वृषभ स्वामी क नाम म
पुकारा।
श्री क्रपभदव घम और कम क आद्यनिमाना थ एतदथ जन
इतिहासकारो ने उनका एक नाम आन्निाथ भी लिखा है और यह
नाम अधिक जन मन प्रिय भी रहा है ।
श्री ऋपभदेव प्रजा के पालक थे एतदथ प्राचार्य जिनमेन'
व प्राचार्ग समन्तभद्र न उनका एक गुण निप्पन नाम
वृपभोऽय जगरम्येष्ठा वपिप्यति अगसितम् ।
धर्मामृतमिती द्रास्तम अवावृपभाह्वयम् ।।
-महापुराण जिनसेन पर्व १४ श्लो १६ प ३१६
वृपी हि भगवान्धम तेन यदाति तीयकृत् ।
ततोऽय कृपभस्वामीत्यालास्तैनं पुरन्दर ॥
-महापुराण जिनमेन पव १४ श्लो १६१ प ३१६
बापाढमासबहुलप्रतिपब्बिसे कृती।
कृत्वा कृतयुगारम्भ प्राजाप यमुपेयिवाम् ।।
-महापुराण १५ १६३६३
प्रजापतिर्य प्रथम जिजाविषु
शशास कृप्यादिपु मसु प्रजा ।
प्रबुद्धतत्त्व पुनरदभुतोदयो
ममत्वतो निविवि विदाम्बर ॥
वृहत्स्वयम्भू स्वार
४५
पमदव एक परिशीलन रूप मे भवतार ग्रहण किया। प्रभाम पुराग्ग मे भी ऐमा ही उल्लेख है। डाक्टर राजकुमार जन ने वृषभदेव तथा शिव सम्बधी प्राय मान्यताए गीपक लख म वद उपनिषद् भागवत प्रभृति ग्रन्थों के मताधिक प्रमाण देकर यह मिद्ध करन का प्रयास किया है कि ऋपभदव और गिव एक ही है पृथक्-पृथक नही । श्रमण और ब्राह्मण दोनो परम्परामो के वे मादि पुस्प है। घश-उत्पत्ति जब नपभदेव एक वप स घुछ कम के थे उस समय वे पिता की गोद मे वठ हुए क्रीडा कर रहे थे । शक्र न्द्र हाथ मे इक्षु लेकर पाया। ऋपभदेव ने उसे लने के लिए हाथ भाग वढाया। बालक का इक्षु के प्रति ग्राफपण देखकर एक ने इस बा को इक्ष्वाप वश' नाम से इत्यप्रभाव पभोऽवतार गवरस्यमा सता गतिर्दीनवनवम कथितम्तव ॥ ऋपभस्य चरिन पिरम पावन महन । स्वयं यशस्यमायुप्य थातव्य च प्रयनत ॥ -णिवपुराण ४७-४८ फला विमले रम्प वृपभोऽय जिनेश्वर । घकार स्वावतार व सर्वन मयंग शिव ॥ -प्रभासपुराण ४९ मुनि यो हजारीमल स्मृति ग्रन्थ १६।। (क) देसूणग व वरिस सक्कागभण घ वसठवणा य । -आवश्यक नि गा १८५ मल व पू १९२ (ख) तो म गाभिकुलारा उमभमामिणा अश्वगतेण एव च विहरति मा य महापमाणाओ सखुलट्ठोमा गहाय उवगनो याबई। -आवश्यक चणि यू १५२ ५२ गृहस्थ-जीवन अभिहित किया । प्राचार्यों ने व्युत्पत्ति करते हुए कहा है -इनु+याकु (भक्षणार्थ) इक्ष्वाकु । विवाह परम्परा मामाजिक रीतिरिवाज, जिसम विवाहप्रथा भी सम्मिलिन है, कोई पाश्वत सिद्धान्त नहीं, किन्तु उन मे युग के अनुसार परिवर्तन होता रहता है। भाई-बहिन का विवाह इस युग मे वडे से बडा पाप माना जाता है, किन्तु उस युग मे यह एक सामान्य प्रथा थी । यौगलिक परम्परा मे भाई और भगिनी ही पति और पत्नी के रूप में परिवर्तित हो जाया करते थे । सुनन्दा के भ्राता की अकाल में मृत्यु हो जाने से"" ५४ (क) मक्को वमट्ठवणे इयवु अगू तेण हुन्ति प्रयागा। --आवश्यक नियुक्ति गा० १८६ । (ख) भगवता लट्ठीमु दिट्ठी पाडिता, ताह सरेण भणिय~-कि भगव । उवखुमकु । अकु भवसगे, ताहे सामिणा पमत्या लपवणवरों जलमितविभूमिता दाहिणहत्या पमारिता, अतीव तम्मि हरिमा जातो भगवन्तग्ग, तएण मक्कम विदस्म अयभेयारवे अज्झत्यिते--जम्हा ण तित्थगगे इक्खु अभिलसति तम्हा इरखामुवमा भवतु, एव सवका बस ठवेऊण गतो, अन्नऽवि त काल खत्तिया इस भुजन्ति तेण इक्सागवसा जाता इति उरि आहारदारे निरुत्तमि “जासी य इस्नुभोती उपागा नेण बतिया होति" भन्निही । -आवश्यक चूणि, पृ० १५२ (ग) श्रियष्ठि शलाका० १।२।६५४ से ६५६ । (घ) कल्पसूत्र सुवोधिका टोका पृ० ४८७ । (८) कल्पमूत्र, कल्पलता, समयसुन्दर जी, पृ० १९८ । कल्पार्थबाधिनोवृत्तिः केयर० पृ० १४४ । (2) कल्पद्र मकलिका पृ० १४३ । (ज) मणिसागर पढमो अकालमच्न हि, तालफलेण दारको उ हता। कना य कुलगरेहि य, सिट्ठ गहिया उसभपत्ती 1! -आव नि० गा० १६०, म० ० १६३ " " " पृ०२६६ पभदव एक परिशीलन ऋषभदेव न सुनन्दा व सहजान सुमङ्गला के साथ पाणिग्रहण कर नई व्यवस्था का सूत्रपात किया। सुमङ्गला न भरत और बाही का. और सुनन्दा ने बाहुबली और सदरी का जन्म दिया। इसक पश्चात् सुमगला के क्रम अठानव पुन और हुए। दिगम्बर परम्परा निन्यानव पुत्र मानती है। (क) भोगसमत्य नाउ बरसम्म तस्स कासि दविन्दो । दो- बग्महिलाण बहुकम्म पासि दबोता । -आव नि मा १९१५ १९ (ख) विप रु १२१८८१ । देवी सुमङ्गमा भग्हो बम्नी य मिहुणग जाय । दबीए मुनन्दाए बाहुबनी सुदरा चेव ।। -आवश्यक मूलभाष्य (म) छणु बसयसहस्सा पुग्वि जायस्स जिणवारदस्स । ता भरभिमु दरि बाहुबली घेव जायाइ । -बाव नि गा १९२ म वृ १९४१ (ग) आवश्यक पूणि पृ १५३ । (घ) सुनन्दा मुन्दरी पुत्री पुन बाहुवलीशिनम् । लब्ध्वा हषि परा भज प्राचीवार्क सह विपा ।। -महा १९८४६ (e) तदा बाहुबीवो भरत पीठजीवो ब्राह्मी इति सुमङ्गलामा मियुतक बात । एव सुवाहषीवो बाहुनलो महामीठजीव सुदरी इति मिथुनक भुनन्दाया बात । -~-करपलवा-समय सुन्दर (च) कल्प पत्यार्थबोधिनी पृ १४-१४५। कल्पद्र म कलिका लक्ष्मी पृ १४३॥ अउणापन्न धुयले पुत्ताण सुमङ्गला पुणो पसत्र । -आप नि गा १९३ मल दृ१९४१ (स) आवश्यक पूणि १३॥ (ब) एव पुनरपि सुमङ्गलाया एकोनपञ्च शत् युगलानि पुत्ररूपाणि जातानि। -कल्पसता-समयसुन्दर इत्यकामयत पुना बभूपधिन । भरतम्यानुजमाना परमाता मगजम ॥
धृहस्थ-जीवन
विधवा विवाह नहीं
कितने ही आधुनिक विचारक कल्पना के गगन मे विहरण करते
हुए 'सुनन्दा' को विधवा मानकर श्री ऋपभदेव के उसके साथ किए
गए विवाह को विधवा विवाह कहते है। उन विचारको को यह
स्मरण रखना चाहिए कि प्राचार्य भद्रवाहु, प्राचार्य जिनदासगरिश
महत्तर, प्राचार्य मलयगिरि, प्राचार्य हेमचन्द्र, श्री समय
ततो ब्राह्मी यशस्वत्या, ब्रह्मा समुदपादयत् ।
कलामिवापराणाया, ज्योस्नपक्षोऽमला विधो ।।
-महापुराण जिन० १६१४-५ पृ० ३४६
आवश्यक नियुक्ति, आचार्य भद्रबाहु गा० १६० ।
ततो य तलरुक्खाओ तलफल पक्क समारण बातेण जाहत
तस्स दारगस्स उवरि पडित तेण सो काले चेव जीविताता
ववरोवितो।
-आवश्यक चूणि, जिनदास महत्तर पृ० १५२
भगवतो देशोनवर्पकाल एव किञ्चिमिथुनक सजातापत्य सत्
तदपत्यमिथुनक तालवृक्षस्याको विमुच्य रिरसया कदलीगृहादि क्रीडा
गृहमगमत्, तस्माच्च तालवृक्षात् पवनप्रेरित पक्व तालफलमपतत्,
तेन दारकाऽकाल एव जीविताद् व्यपरोपित ।
-आवश्यक मल० वृत्ति० पृ० १६३
६३ अन्येधु, क्रीडया क्रीडद् बालभावानुरूपया।
मिथो मिधुनक किञ्चित् , तते तालतरोरगात् ।।
तदेव देवदुपागात् । सन्मध्यान्नरमूद्ध नि ।
तडिदण्डे इवैरण्डेऽपतत् तालफल
प्रहत काकसालीयन्यायेन स तु मूर्द्धनि ।
चिपन्ना दारकस्तन, प्रथमेनाऽपमृत्युना ।।
-त्रिपष्ठि रा७३५ से ७३७
महत् ॥
७२ पभगव एक परिशीलन सुन्दर उपाध्याय विनय विजय केशरमुनि श्री लक्ष्मीवल्लभ७ श्री मणिसागर प्रभृति विज्ञोने प्रस्तुत घटना का उद्दन करते हुए उम युगल को बालक और बालिका बताया हे न कि युवा-युवती। और जब वे बालक यतो उनवा पारस्परिख मम्व प भी भारी भगिनी रूप में ही था पति-पत्नी के रूप मे नही प्रत स्पष्ट है कि श्री ऋपभदेव ने मुनन्दा के साथ विवाह किया वह विधवा विवाह नहा था । जब उनका पति-पत्नीरूप सम्बध ही नहीं हुआ तो वह विधवा से कही जा सकती है? प्राचार्ग जिनसन न महापुगण म प्रस्तुत घटना का उलख नहीं किया हे मोर न अपभसहजान मुमगला में ही पाणिग्रहण करवाया है। श्री ऋषभ की अनुमति लकर नाभि न पभ 7 विवाह हेतु दा सुयोग्य सुशील पन्यानो की याचना की । फ्नस्वरूप इच्छ महाकच्छ की दो यहिन जा सुदर और यौवनवता था जिनका नाम यास्वी और युवदा था उनके साथ नाभि न ऋयम का विवाह किया। भागवत क अनुमार गृहस्थ धम की शिक्षा दन के लिए देवराज इंद्र की दी हुई उनकी रन्या-जयन्नी से शायद म विवाह कल्पसूत्र कल्पलता व्या ७ समयसुन्दर प १६८ । कल्पसुमोधिका विनय प ४६७ सारा न । कल्पसूत्र कल्पार्थबाधिनी प १४। कल्पसूत्र कल्पद्र म कलिका लक्ष्मी प १४२॥ कल्पसूत्र २९७ ॥ सुरेद्रानुभवात्कन्ये सुधीले पाला। सयौ सुरुचिराकारे वरयामास नाभिराट ॥ - महा पर्व० १५ श्लो० ६९ १६ हव्यो काधमाहाकन्छजाम्यो होम्मे पतिवरे । अपस्वतीसुनन्दास्ये स एव पर्यणानयत् ॥ -महा १५७ प ३३१ ७ गृहस्व-जीवन ७३ किया । 'समव है मुनन्दा काही भागवतकार ने जयन्ती नाम दिया हो । क्योकि श्वेताम्बर ग्रन्थानुसार वह अरण्य मे एकाको प्राप्त हुई थी। उसकी सोन्दर्ग-सुपमा अत्यधिक होने के कारण वह वनदेवी के महश प्रतीत हो रही थी। उसके मोन्दर्य तथा मद्गुग्गो के कारण ही भागवतकार ने उसे इन्द्र की पुनी समझा है । और पुत्री समझकर वणन किया है । श्वेताम्बर ग्रन्यो की तरह भागवतकार ने भी उसके सौ सन्तान बताई है। भरत ओर बाहुबली का विवाह श्रीपभदेव ने यौगलिक धर्म को मिटाने के लिये जब भरत और बाहुबली युवा हुए तब भरतसहजान ब्राह्मी का पागि- ग्रहण बाहुबली स करवाया और बाहुवली सहजान सुन्दरी का पाणिग्रहण भरत से करवाया। इन विवाहाँ का अनुकरण करके मत ७२ गृहमधिना वर्माननुशिक्षमाणो जयन्त्यामिन्द्रदत्तायामुभय लक्षण कर्म ममाम्नायाम्नातमातमभियुजन्नात्मजानामात्मममानाना जनयामास। ---भागवत ५/४/८/५५७ सा य अतीव उक्किटुसरीग देवकण्णाविव तेसु ण वणतरेसु जह वण- देवता तहा विहरति, तच एक्कलिय दछु केति पुरिसा साहन्ति, ताहे नाभी त दारिय गहाय भगति-उसमस्स भारिया भविस्सति त्ति । ~आवश्यकचूणि जिनदास पृ० १५२- ५३ तए ण सुमङ्गलाए वाहू य पीढो अ अमुत्तहितो चइऊरण मिहणय जात, ततेण सा सुनङ्गलादेवी अन्नागि एणपन्न पुत्तजुयल- गाणि पसवति। --प्रावश्यक चूणि, जिनदास १५३ भागवत ५।४/८१५५७ । युग्मिधर्मनिषेधाय भरताय ददी प्रभु । सोदाँ बाहुबलिन सुन्दरी गुणसुन्दरीम् ।। भरतस्य च सोदर्या ददौ ब्राह्मी जगत्प्रभु । मूपाय वाहुबलिने तदादि जनताप्यथ ।। -~श्री काललोक प्रकाग सर्ग० ३२, श्लो० ४७-४८
ऋषभदेव एक परिशीलन
जनता ने भी भिन्न गोत्र म समुत्पन्न कन्यामा को उनके माता पिता
मारि अभिभावको द्वारा दान म प्राप्त कर पाणिग्रहण करना शुरु
किया। इस प्रकार एक नवीन परम्परा प्रारम्भ हुई।
पाचाग जिनसन ने ब्राह्मी सुन्दरी के विवाह का घणन नहा
किया है। प्रज्ञाचन प० सुखलाल जी भी उह अविवाहित मानते
है+ पर उन्हान प्राचीन श्वेताम्बर अथो के कोई भी प्रमाण प्रस्तुत
नही क्येि।
पभदव का काल भारी उथलपुथल का काल था। उस समय
प्राकृतिक परिवतना के साथ मानवीय व्यवस्था म भी मामूल
परिवर्तन हो रहा था। परिस्थितियां पलट रही थी। परिवार प्रथा
(ब) "ता व दाणमुमभ दित
दठ जणमिति पवन ।
चार नियु गा २९४
(ग) भगवता युगलधम्मव्यवच्छदाय भरतन सह जाता ब्राह्मी
बाहुबलिने दत्ता बाहुवलिना महजाता मुदरी भरताय ।
-आव मल वृत्ति पृ २
(घ) भरतस्य सायप्रसूता ब्राह्मी सा बाहुवलाय परिणायिता
माहुबलसाणे जाता सुन्दरी सा भरतस्यार्पिता । भरतन
स्त्रीरलार्थ रक्षिता एव युगलषों निवारित श्री ऋषभदेवन ।
--कस्पद म कलिका लग्मी पृ १४४१
७६ (क) मिन्नगोदिका कन्या दत्ता पित्रादिभिमुधा।
विपिनोपायत प्राय प्रावतस तथा सत ॥
-श्री काललाक प्रकाश स ३२ ला ४९
(ख) इति दृष्टवा सत आरम्य प्रायो लोरे-पि कन्या पिनादिना दशा
सती परिणीयते इति प्रवृत्तम् ।
--बाव मू मल वृत्ति पर
+ दशन अन चिन्तन भा १ भगवान् ऋपभब भने तेमना परिवार
प २३६
जन पकाण : फरवरी १९६६ जन परम्परा के मादल
गृहस्व-जीवन
का प्रारम्भ हो रहा था और सग्रह वृत्ति का सूत्रपात हो चला था।
ऐसी स्थिति में अपराधवृत्ति का विकास होना भी स्वाभाविक था
और वह हो रहा था।
सर्वप्रथम राजा
पूर्व में यह बताया जा चुका है कि श्री ऋपभदेव के पिता 'नामि'
अन्तिम कुलकर थे। जव उनके नेतृत्व मे ही धिक्कारनीति का
उल्लघन होने लगा, प्राचीन मर्यादाएँ विच्छिन्न होने लगी, तब उम
अव्यवस्था मे योगलिक घबराकर श्री ऋषभदेव के पास पहुंचे और उन्हे
मारी स्थिति का परिज्ञान कराया। ऋपभदेव ने कहा-"जो
मर्यादानो का अतिक्रमण कर रहे है उन्हे दण्ड मिलना चाहिए और
यह व्यवस्था राजा ही कर सकता है, क्योकि शक्ति के सारे स्रोत
उममे केन्द्रित होते हे ।" समय को परखने वाले नाभि ने यौगलिको
की बिनम्र प्रार्थना पर ऋपमदेव का राज्याभिषेक कर "राजा"
घोषित किया। ऋपभदेव राजा बने और शेप जनता प्रजा । इस
प्रकार पूर्ण चली आ रही "कुलकर" व्यवस्था का अन्त हुआ और एक
नवीन अध्याय का प्रारम्भ हुमा ।
राज्याभिषेक के ममय युगलसमूह कमलपत्रो में पानी लाकर
ऋषभदेव के पद-पयो का सिंचन करने लगे। उनके विनीत स्वभाव
৩9
नीतीण भइक्कमणे निवेयरण उसभसामिस्स
-आव०नि० गा० १६३ म० वृ० ५० १६४
(ख) आवश्यक चूणि-पृ० १५३
राया करेइ ८ड सिट्टे से बॅति अम्हवि स होउ ।
मगह य कुलगर, सो य वैइ उसभी य में राया ।
-आव०नि० गा० १६४ म० वृ० १६४
(ख) बावश्यक चूणि पृ० १५३-१५४
(ग) विदितानुरागमापौरप्रकृतिजनपदो राजा1
नाभिरात्मज समयमेतु रक्षायामभिषिच्य
-श्री मद्भागवत ५४५ पृ० ५५६
ऋषभदेव एक परिचालन
को लक्ष्य म रखकर नगरी का नाम विनीता रखा उसका अपर
नाम भयोध्या भी है।
उम प्रान्त का नाम विनीत भूमि' पोर इक्खाग भूमि पड़ा।
कुछ समय के पश्चात् प्रस्तुन प्रान्त मध्यदेश के नाम से प्रख्यात
हुआ।
राज्य-व्यवस्था का सूत्रपात
इसी प्रकार श्री ऋषभदेव ने मानव जाति को विनाग के गत से
बचाने के लिए और राय की सुव्यवस्था हेतु आरक्षक दल की
स्थापना की जिमके अधिकारी म' कहलाये । मत्रिमडल बनाया
जिसके अधिकार भोग नाम से प्रसिद्ध हुए । सम्राट के समीपस्थ
जन जो परामश प्रदाता थे वे राजन्य के नाम से विख्यात हुए मौर
भय राजकमचारी सत्रिय नाम से पहचाने गये।
७९
मिसिणापताहियरे उदय घेन छुहन्ति पाएमु
साहु विणीया पुरिमा विणीयनयरी अह निविट्ठा ।।
~आव नि गा १९६म १६१
(स) आवश्यक पूणि प १५४ ।
मध्येऽधमरतस्माशु बने वरवण पुरम् ।
साकेत नामत स्थात विनीतजनतावृतम् ॥
पुराणसार १८॥२३६
भावश्यक सूत्र मल वृत्ति प १५७-२।
(क) बावश्यक सूत्र म धृत्ति ५ १९३ ।
(R) आन नि हारिभद्रीय टीका प १२ -२।
भावश्यक नियुक्ति हारि टी० गा १५१५ १६-२।
(6) उग्गा भोगा रायण्ण सत्तिया सगहो भव पाहा ।
भारक्तगुरुवयसा सेसा मे अत्तिया से ॥
-बाब नि गा १६८ म प०१९५१
() एव तस्स अभिसित्तास पचन्विहो रायसंगहो भवति त महा-
उग्गा भोगा राइना खतिया । जग्गा पारमित्यपुरिया
गृहस्य-जीवन मलय गिरी के अभितानुसार बन्ध (वेडी का प्रयोग) और घात (डण्डे का प्रयोग) ऋषभनाथ के समय प्रारम्भ हो गये थे । और मृत्यु दण्ड का आरम्भ भरत के समय हुआ।" जिनसेनाचार्य के अनुसार वघवन्धन ग्रादि शारीरिक दण्ड भरत के समय चले ।२ खाद्यसमस्या का समाधान कन्द, मूल, पत्र, पुष्प और फल ये ऋषभदेव के पूर्ववर्ती मानवो का आहार था। किन्तु जनसंख्या की अभिवृद्धि होने पर कन्द मूल (ख) परिहासणा उ पटमा, मडलिवधो उ होइ वीया उ । चारगविण्याई भग्हम्म चश्विहा नीती ।। -आवश्यक भाप्य गा०३ निगडाजमो बन्धो, धातो द डादितालणया । -आवश्यक नियुक्ति० गा० २१७ (ख) वन्या निगडादिभिर्यम मयमन, पातो दण्डादिभिस्ताडना, एतेऽपि अर्थशास्त्रबन्धधातास्तरकाले यथायोग प्रवृत्ता। - आव० नि० मल० वृत्ति प० १६६-२ ११ मारणया जीवत्रहो जन्ना नागाइयाण पूयातो । ---आव०नि० गा० (ख) मारण जीववधो-जीवस्य जीविताद् व्यपरोपण १३ भरतेश्वरकाले समुत्पन्न । नक्खरण -आव० नि० म० वृत्त । शरीरदण्डनञ्चंब वधवन्धादिलक्षणम् । • पृ० १५६ नृणा प्रबलदोपाणा भरतेन नियोजितम् ।। -~-महापुराण-तृतीय पवा ६३ आमी पुस जइया किर कुलगर न मूलाहारा य पत्तहालका ।। न्यनेकश । नामजिजपत् ।। प गा० ५-त्रिपष्ठि ३।२।६६० मे ६६२ जिनदास (ख) (ग)
अपमन्व एक परिशीलन
नीति का प्रचलन किया।' चार प्रकार की दण्ड-व्यवस्था निर्मित
की। (१) परिभाष, (२) मण्डलबध (३) चारक () छविच्छेद ।"
परिभाष
कुछ समय के लिय अपराधी व्यक्ति को प्रात्रौशपूण शब्दों मे
नजरब रहने प्रानि का पन लेना।
मण्डलब
सीमिन पत्र में रहने का दण्ड देना।
बतीगृह म बन्द करन वा दनदना ।
छविच्छेद
करादि अगापाङ्गो के छन्न का दण्ड देना।
य चार नीनियाँ कब चली इमम विद्वाना के विभिन्न मत है । कुछ
विशो का मन्तव्य है कि प्रथम दो नीतियां ऋषभ के समय चली
और दो भरत के समय । प्राचार्ग अभयदेव के मन्तव्यानुसार मे चारों
नीतियां भरत के समय चली। ' पाचार्य भद्रबाहु और प्राचार्ग
६
८७
स्वामी समादामभेददण्डोपायचतुष्टयम् ।
जगदव्यवस्थानगरीचतुष्पयमकल्पया
-त्रिपछि
(ख) गोतीओ उसमसामिम्मि भेव उप्पनायो ।
-आवश्यक पूणि प १५६
स्थानाङ्ग वृत्ति २५५७ ।
आद्यवयमृपभकाले अन्ये तु भरतकाल इत्यन्य ।
-स्थानाङ्ग वृत्ति ३५५७
परिभासणा उ पडमा मण्डल धम्मि होई वीया तु।
चारप विछेदावि भरहस्म पबिहा नीई
--स्थानाङ्ग वृत्ति २५५७
दद
गृहस्य-जीवन ७९ मलय गिरी के अभितानुसार बन्ध (वेडी का प्रयोग) और घात (डण्डे का प्रयोग) ऋषभनाथ के समय प्रारम्भ हो गये थे। और मृत्यु दण्ड का प्रारम्भ भरत के समय हुआ।" जिनसेनाचार्य के अनुसार वधवन्धन आदि शारीरिक दण्ड भरत के समय चले। खाद्यसमस्या का समाधान कन्द, मूल, पत्र, पुष्प और फल ये ऋषभदेव के पूर्ववर्ती मानवो का पाहार था। किन्तु जनसंख्या की अभिवृद्धि होने पर कन्द मूल (ख) परिहासणा उ पढमा, मडलिव यो उ होड वीया उ । चारगछविन्द्रयाई मरम्म चबिहा नीती ॥ --आवष्यक भाप्य गा०३ ९० निगडाइजमा बन्या, धातो ददादिनालणया । --आवश्यक नियुक्ति गा० २१७ (स) बन्धा निगडादिभिर्यम मयमन, घातो दण्डादिभिस्ताटना, एनेऽपि अर्थशास्त्रवन्धघातास्तत्काले यथायोग प्रवृत्ता । - आव० नि० मल• वृत्ति प० १६६-२ मारणया जीवबहो जन्ना नागाश्याण पूयातो । -आव०नि० गा० (ख) मारण जीववयो-जीवम्य जीविताद् व्यपरोपण १३ भरतेश्वरकाले समुत्पन्न । सक्खण -आव० नि०म० वृतत्त । १२ शरीरदण्डनञ्चव वधव-धादिलक्षणम् । • पृ० १५६ नृणा प्रबलदोपाणा भरतेन नियोजितम् ।। -~-महापुराण-तृतीय पवः १३ आमी य कदहारा मूलाहाग य पत्तहालका ॥ पुष्फफलभोडणोऽवि य जडया किर कुलगर न्यनेका । नामजिज्ञपत् ।। (प) आव० मूलभाय गा०५ --त्रिपप्ठि १।२।६६० से ६६२ (ग) आवश्यक चूणि-जिनदाम ६२ ऋपभब एक परिशासन कराया और सुन्दरीको गणित विद्या का परिज्ञान कराया। व्यवहारसाधन हेतु मान [माप] उ मान [नाला मामा मादि वजन १० (घ) जम्बूटीप प्रशप्ति वृत्ति । (४) पल्पमूत्र सुबोधिनी टोरा १ ४६६ सारा नयाव ग लियाविहाण जिग्गेण बभीए दाहिणारेण । -आव नि गा २१२ (ग) आवश्यक हारिभद्रायावृत्ति भाष्य गा ६५ १३२ । (ग) विरोपावश्या भाप्य वृत्ति १३२ । (घ) अण्णा लिगाई म्या अपसम्येन पाणिना । -विपछि रा () अभीए दाहिणहत्येण लहो दारता । -आवश्यक पूणि पृ १५६ (च) कल्पसूत्र मुनाधिका टापा मारामाई पृ ४१६ | () ऋपमन्व न ही सम्भवत लिपि विद्या के लिए लिपिकांशल का उत्भावन किया। अपभदेव ने ही सम्भवत ब्रह्मरिया की शिक्षा क लिए उपयागी ब्राह्मी लिपि का प्रचार किया था। -~-हिन्दी विश्व-कोप श्री नगे माथ वसु प्र मा प ६४ गणिप सखाण सुदरीए बामेण उबद्ध । -आवश्यक नियुक्ति गा २१२ (स) सुपय वामहत्येण गणित । ---आवश्यकणि १५६ (ग) विशेषावश्यक भाष्य वृत्ति १३२ । (घ) आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति प १३२। (1) दर्शयामास सय्येन मुन्दर्या गणित -त्रिषष्टि १२६३ विभु करदमनाम्या लिखवारमालिकाम् । उपाविलिय मण्याम्थान बाईलुकमान् ।। महापुराण १९४१ १९५५ गृहस्थ-जीवन ५३ अयमान [गज, फुट, इच] व प्रनिमान छटाक, मेर, मन, प्रादि] गियाये । गिग यादि पिरोने की कला मी बताई। उग प्रकार गम्राट् श्री ऋपभदेव ने प्रजा के हित के लिए, अभ्युदय के लिए पुम्पो को वहनर कला, स्त्रियो को चीमठ कलाए और मी गिल्ली का परिज्ञान कराया ।' श्रमि, मपि, और कृपि [सुरक्षा, व्यापार, उत्पादन की व्यवस्था की।" अश्व, हस्ती, गाय, प्रादि गागुम्माणयमागापमाणगणिमात्र वत्यूगा । आवश्यक नियुक्ति गा० २१३ र्माणयाई दाराशु पाता तह गागर्गग बहणाइ । मग लहयगा वाजपरिच्छेयणस्य वा ॥ --आवश्यक नियुक्ति गा० २१४ (ग) जावश्यक गूम हारिभद्रीयागृत्ति मूल भाग्य गा० ११५० १३२ याराम रामागो नहाध्याओ गणियपहाणाओ गण- रायपज्जावराणाबा पाहत्तार कलाआ चाट्ठि महिनागुग्गे मितपय पकम्माण तिन्नि वि पयाह्यिाए उपदिराम। -~-कल्पमूत्र , गू० १६५। पृ. ५७, पुण्यविजय स० (ब) जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, गू० ३६, पृ० ७७ अमो० म० । (ग) एतच्च गर्व सावद्यमपि लाकानुकम्पया । ग्यामी प्रानंयामास, जानन् कर्तव्यमात्मम ।। -विपष्ठि १२९७१ १०५ असिमपि पिपिया घाणिज्य शिरपमेध च । कर्माणीमानि पाला रयु प्रजाजीयनहेराय ॥ सत्र वृत्ति प्रगाना ग भगवान् मतिकोशलान् । उपाधिक्षस् मरागा हि ग सदासीज्जगद्गुर । नासिकर्म वाया मलिपिविधा स्मृता । फपिकपण प्रीता घिया मारनापजीधन ।। पाणिज्य वणिजा कम, शिरप ग्यात् फरकोपलम् । सध चित्रकलापमच्छदादि पवा ग्मृतम् ।। --महापुराण १७६ से १०२, पव १६१० ३६२ FY ऋषभदेव एक परिशीलन पशुओं का उपयोग प्रारम्भ किया।जीवनापयोगी प्रवृत्तियो का विकास कर जीवन को सरस लिष्ट और व्यवहार याग्य बनाया।" बरपब्यवस्था यौगलिका के समय म वण-व्यवस्था नही थी। सम्राट श्री ऋपभदेव ने क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इन तीन वर्षों की स्थापना की। यह वर्णन पावश्यक नियुक्ति आवश्यफ चणि पावग्यक मलयगिरि वृत्ति पावश्यक हारिभद्रीया वृत्ति त्रिपष्ठिशलाका पुरुषचरित्र-प्रभृति श्वेताम्बर अन्थो म स्पष्ट रूप स नहीं है। परवर्ती विशो ने उस पर (ख) पजापतिय प्रथम जिजीविषु । पशाम कृप्यादिपु कमसु प्रया ॥ -हरस्वयम्मू स्तोत्र समन्तभद्राचार्य बासा हत्थी गावो गहिभाइ रजसगहनिमित्त । पित्तण एवमा पउम्विह सगह कुणइ ॥ -आवश्यक हारिभद्राया वृत्ति गा.२१ १२८ कलाय पायन प्राप्तसूसवृत्तिकस्य चौर्यादिष्यसमासतिरपि न स्यात, कर्माणि च कृषिवाणिज्यादोनि जघन्यमध्यमोत्कृष्टमेदभिन्नानि वीण्यतानि प्रजाया हितकराणि निर्वाहाभ्युषयहेतुलात जम्बूदीप प्रज्ञप्ति-वृत्ति २ वक्षस्कार (स) पहुणा उ देसियाइ सम्धकमा सिप्पकम्माइ -आवश्यक नियुक्ति गा २२६ (ग) अक्षा मुलमासीन पुरु नामिप्रचोदिता ॥ उपतस्यु प्रमा सर्वा पीविकोपायमीप्सव ।। कि नाथ करवामति स्थिता वाक्यानुकम्पया ।। प्रजाभ्यो दयाभारा कौशल्पकलागुणान् ।। -पुराणसार १५-१६॥३॥३६ १८ उत्पादितास्नयो वर्षा नादिवषसा । क्षरिया वगिने शूद्रा क्षत्राणाविभिगु ॥ महापुराण १८३४१६३६२ गृहस्थ-जीवन अवश्य कुछ लिखा है, पर दिगम्बराचार्य जिनसेन की तरह विगद रूप से नहीं । यहाँ यह स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है कि वर्ण- व्यवस्था की सस्थापना वृत्ति और आजीविका को व्यवस्थित रूप देने के लिए थी, न कि ऊँचता व नीचता की दृष्टि से । मनुष्य जाति एक है। केवल आजीविका के भेद से वह चार प्रकार की हो गई है--वृनसम्कार से ब्राह्मण, शस्त्रधारण से क्षत्रिय, न्यायपूर्ण धनार्जन से वैश्य और सेवावृत्ति से शूद्र ।” कार्य से ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र होते है ।११ आचार्य जिनसेन के मन्तव्यानुसार सम्राट् श्री ऋषभदेव ने स्वय अपनी भुजाओ मे शस्त्र धारण कर मानवो को यह शिक्षा प्रदान की कि अतताइयो से निर्वल मानवो की रक्षा करना शक्तिसम्पन्न व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य है। श्री ऋषभदेव के प्रस्तुत आह्वान से कितने ही व्यक्तियो ने यह कार्य स्वीकार किया। वे क्षत्रिय नाम से पहचाने गये। १२ । ॥ १०६ अथवा ब्राह्मण-भत्रिय-वैश्य-शूद्रभेदान् तत्र-'ब्राह्मणा ब्रह्मचर्येण, क्षत्रिया गस्त्रपाणय, कृषिकर्मकरा वैश्या शूद्रा प्रेक्षणकारका ।' -कल्पलता-समयसुन्दर गणी पृ० १६६ (ख) पउमचरिय-विमलसूरि उ० ३ गा० १११-११६ (ग) पश्चाच्चतुर्वर्ण-यापन कृतम् -कल्पद्रुम कलिका० लक्ष्मी० पृ० १४४ ११. मनुष्यजातिरेकैव जातिनामोदयोद्भवा वृत्तिभेदाहिताभेदाच्चातुर्विध्यमिहाग्नुते ब्राह्मणा वतमम्कारात् क्षत्रिया शम्बधारणात् । वणिजोर्यार्जनान्याग्यान्द्रा न्यग्वृत्तिमश्रयान् ।। - महापुराण श्लोक० ४५-४६ पर्व० ३८ पृ० २४३ दि० भा० कम्मुणा बभणो होइ, कम्मुणा होइ खत्तिओ। वडमो कम्मुणा होइ मुट्टो हवइ कम्मुणा ।। ---उत्तराध्ययन २५४३ ११२ स्वदोर्ध्या धाग्यन् शस्त्र क्षत्रियानसृजद् विभु । श्रतत्रागनियुक्ता हि क्षत्रिया शस्त्रपाणय ।। -महापुराण २४ ३३१६५३६८ -
ऋषभदेव एक परिशीलन
श्री ऋषभदेव ने दूर दूर तक क प्रदेशा की पपा बल से पदयात्रा कर
जन-जन के मन मे यह विधारज्योति प्रज्वलित की कि मनुष्य को सतत
गतिमान् रहना चाहिए एक स्थान से द्वितीय स्थान पर वस्तुओं का
आयात निर्यात कर प्रजा के जीवन मे सुख का सबार करना चाहिए।
जो व्यक्ति प्रस्तुत कार्म के लिए सन्नद्ध हुए वे वश्य को संज्ञा से
मभिहित किये गये।
श्री ऋषभदेव ने मानवा को यह प्रेरणा प्रदान की कि कम युग मे
एक दूसरे के सहयोग के बिना कार्य नहीं हो सकता। प्रत ऐसे सेवा
निष्ट व्यक्तियों की मावश्यकता है जो बिना किसी भेदभाव के सेवा
कर सक।को व्यक्ति मेवा के लिए तैयार हुए उनको श्री ऋपभदेव ने
शूद रहा।"
इस प्रकर शस्न धारण कर माजीविका करने वाल क्षत्रिय हुए
खेती और पशु पालन के द्वारा जीविका करने वाले वैश्य कहलाये और
सेवा शुश्र पा करने वाले शूद्र कहलाये।
ब्राह्मण वरण की स्थापना सम्राट भरत न की स्थापना का
ऊपन्या दर्शयन् भानाम अबानी वणिज प्रभु ।
जलस्थतादियानामि सदवृत्तिवारीया यत ॥
-महापुराण ५४४।६।३६८
११४ वृत्तिनियतान् शूदार पाण्यापासृजन सुषी ।
वर्णोतमेषु शुभषा तवृत्तिकमा स्मृता ।
महापुराण २४५॥१६॥३६८
११५ क्षत्रिया शबजीवित अनुभूय तक्षामवन् ।
वश्याश्च कृषिवाणिज्यपाशुपान्योपनीविता ॥
महापुराण १८४१६३६२
वाह मरहा रश्न आयवत्ता है य भाउए पवइए जाऊन
अषितीए मणति-कि मम इयागि भोगह अद्धिति करति कि
पाए पोनराएवि सिरीए' ना सम्मणा ग पैति (गाचा) अदि
मातरो मे इन्ति वो भोग देमि । भगव व आगतो वाहे भाउए
भोहि निमन्तेति है । इश्वन्ति क्त अमित । साई पितति एरोसि
गृहस्थ-जीवन ८७ इनिवृत्त बताते हुए प्रावश्यक नियुविन, अावश्यक चूगि, अावश्यक मन्नयगिरि वृत्ति, पावश्यक हारिभद्रीया बनि, नियष्टि गलाका पुरुप चरित्र, और कल्पसूत्र की टीकामो मे लिया है कि मम्राट् भरत के के ममी अनुज गम्राट भरल की अधीनता स्वीकार न कर भगवान् श्री अपभदेव के पास सयम ग्रहण कर लेते है गब सम्राट् भग्न उनके नव व्याणि पग्निनगगाग आगदिदाणानि र पम्मागणद्वारा करमीति पचगयाणि गगराण भाऊग अमण नाह निगगना, पन्दिरग निमन्त, ना' गामी भी इग आगसम्म पुणा य आरटण पनि गाण । नार गा गणति - मना मम पुगानाणि गाहन्नु, नपि ण पनि गपिटोति नाह गा मन्दापण अभिमूना मन मायभावण 17 परिचतानाहरगा आल्यमणममता अति तार गान मत्तपाग जाणीत नि fr नायव्य । ताह माझा भणनि जनर गुप्ता न पूह ताह भरहो गापा मारत्ता भगति--"मा कम्ग पेगणादि पा करह, अह तुम पगि समि, नुहि पनगरि गुणगरि गिणमा पुगु मूमण गुणन्ताद अभिव्य 1 17 न मिदयामय भुजति, न य भणन्ति-कहा तुम जिता हा भवान् वर्द्धन भय मा हणाहित्ति पर भणितो गन्तो आगुरना चिन्नेति- Tण मि जिता ' ताहे म अपणो मती उत्पनि काहादिर्गाह जिता मिनि, र भोगपगरा ममाति पय त आपला माणा णाम । --आरश्या नूणि जिनः २१०-१० (ग) भरताऽपि भातृप्रतज्यानान मन्जातमनरतापोऽति चन्न, कदाचिद्रगोगादीन् दीयमानान् पुनरपि गृहन्तीत्यालाच्य भगवत्समीप चागम्प निमन्त्रयच्चता! भोगनिगमनश्चिन्तया- माग नेपामे वदानी परित्यक्तमनाना आहारदानेऽपि तावद्धर्मा- नुष्ठान गेमोति पञ्चभि गरुटगन विचित्रमाहाग्गानाम्या- पनिमन्त्र्याधाकर्माहन च न सपने मनीनामिति प्रतिपिद्ध उनकाग्नेिगान्येन निन्धिनवान् देशगवार-गुगोनरान पूजयप। मोऽचिन्तयत् के माम गाव्यनिगेण जात्यादिभिरतग। पर्यालोचयता ज्ञान-बारका विग्नाविग्नत्याद गुणोतग तेभ्यो रत्तमिति भरतश्च प्रावकानाल्योनवान् भवद्भि ऋषभदेव एक परिशीवन पास बाते है और पुन राज्य ग्रहण करने के लिए अभ्यथना करते है किन्तु त्यक्त राज्य कावे वमन के समान जानकर पुन ग्रहए नहीं करते । तब सम्राट भरत ने भ्राताओ को भोजन कराने हेतु पांच सौ शकट भोजन मंगवाया और उहे भोजन ग्रहण करने के लिए निमशित किया। पर भगवान् श्री ऋपभदेव ने कहा-पाषाकर्मी राज्यपिण्ड आदि आहार श्रमणो के लिए त्याज्य है । शक्र द्र के निर्देशानुसार यह प्रतिदिन मदीय मोक्नय्य कृप्यादि वन काम र स्वाध्याय पररामितव्य ३ भुक्ने च मदीयहढारीमतव्ययितवंतव्यम जितो भवान् बढने भय तस्मामा हन मा हनि' ते तवैव --आवश्यर मर वृत्ति प (ग) बन्धना गृङ्गता रायमेतेपा हि कृत मया अनारतमतृप्तेन भस्मयाममिनेव अन्येभ्योऽपि ददानोऽस्मि लक्ष्मी भोगफलामिमाम् । तन्ध मे भस्मनि हुतमिव मूत्स्य निप्पलम् ।। काकोऽप्याटूय कारभ्यो दत्त्वाऽनाय पजीवति । ततोऽपि हीनस्तदह भोगान् मुज्जे विना घमून् । दीयमानान् यदि पुनर्भोग भूयोऽपि मन्नुभ भाददीरममी भिक्षा मासक्षपणिका इव ।। एवमालोध्य भरत पारमूल जगद्गुगे । भ्रातून निगत्रयामास भोगाय रचिताम्मलि ।। प्रभुरप्यादिवेषवमृग्याशय । विशाम्पते । भ्रातरस्त महासत्वा प्रतिज्ञातमहायता ।। ससागसारता शास्वा परितम्यक्सपूविण । न खलु प्रतिगृहति भोगान भूयोऽपि वान्तवत ।। x x x एवं विचिन्त्य गक्टशत पञ्चभिरस्चर। अनाग्याऽऽहारमनुजान् त्यम श्ययत् स पूर्ववत् ।। स्वामी भूपाऽप्युवाचवमन्नादि भरतेश्वर । जापानर्माऽऽहत जानु यतीना न हि पल्पते ।। X
6
ऋषभदेव एक परिशीलन
21
महापुराण कासार सम्रार भरत पटखण्ड पर दिविजय प्राप्त
कर मौर अपार धन लेकर जब अयोध्या लौटे तो उनके मानस मे यह
सकल्प उत्पन्न हुमा कि इस विराट धन का त्याग कहां करना
चाहिए इसका पात्र कोन व्यक्नि हो सकता है ? प्रतिभामूति
भरत ने शीघ्र हा निणय किया कि ऐसे विलक्षण व्यक्तियो को
चुनना चाहिए जो तीनो वर्गों का चिन्तन मनन का पालाक प्रदान
करमर।
गम्राट भग्न न गक विराट उत्मव का मायाजन किया। उसमे
नागरिको को निपत्रित किया। विशो की परीक्षा के लिए महल के
' माग म हरी घाम फल फूल लगा लिये। जो वृतरहित थे वे उस
पर होकर महल में पहुँच गये और जो बनी थे वे वही पर स्थित हो
गये।' 'सम्राट ने महन म न पान का कारण पूछा तो उन्होने
बनाया कि देव हमने सुना है कि हरे अकुर आदि में अनन्त
निगोनिया जीच रहन है जो नेत्रो से भी निहारे नही जा सकते । पदि
हम आपरे पाम प्रस्तुत माग से मात है नो जो गोमा के लिए नाना
प्रकार के सचित्त फल-फूल और प्रबुर बिछाये गये है उन्ह हमे रोदना
११८ भरतो भारत वप निमित्य मह पाथिय ।
पण्या वर्षमहस्र स्तु विणा निववृने अयात ।।
कृतकृत्यस्य तस्थान्तश्चिन्तयमुवपद्यत ।
पराय सम्पदास्माकी सोपयोगा क्य भवत ।।
-मापुराण ४-५॥३८।२४ छि मा
१२ हरितैराकुर पुप्प फलधाकोणमङ्गलम् ।
सम्म्राडचीकरसपा परौशाय बरमनि ।।
-महापराण १११३०२४ भा
सप्वाला विना मङ्गान् प्राविक्षन् भुपमन्दिरम् ।
तानेक्त ममुलाय पानातपयत् प्रभु ॥
महापुराण ११३८२४ दिमा
गृहस्थ-जीवन पडता है तथा बहुत मे हरितकाय जीवों की हत्या होती है । राम्रा ने अन्य मार्ग से उनको अन्दर बुलवाया 3 और उनकी दया वृत्ति से प्रभावित होकर उन्हे ब्राह्मण की मन्ना दी और दान, मान आदि सत्कार से मम्मानित किया ।२८ वर्गोत्पति के सम्बन्ध में ईश्वकर्तृत्व की मान्यता के कारण वैदिक साहित्य में खासी अच्छी चर्चा है। उस पर विस्तार में विश्लेपण करना, यहाँ अपेक्षित नहीं है । सक्षेप म- पुम्प सूक्त मे एक सवाद है और वह सवाद कृष्ण, शुक्लयजु, ऋक् और अथवं इन चागे वेदो की सहितायो मे प्राप्त होता है। प्रश्न है-ऋपियो ने जिम पुरप का विधान किया -मे कितने प्रकारो से कल्पित किया ? उमका मुग्व क्या हुआ ? उसके वाहु कौन बताये गये ? उसके (जाघ) उरु कौन हुए । प्रौर उसके कौन पैर कहे जाते है उत्तर है - ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्यक्षत्रिय उमका बाहु, वैश्य उसका उरु, और शूद्र उसके पैर हुए १२२ सन्त्येवानन्तशो जीवा हग्नेिबड्कुरादिषु । निगोता इति मार्वज्ञ देवाम्माभि अत वच ।। तस्मानास्माभिराक्रान्तम् अद्यत्वे त्वद्गृहाङ्गणम् । कृतोपहारमा फलपुष्पाकुगदिभि ॥ १२३. कृतानुबन्धना भूयश्चयक्रिण किल तेऽन्तिकम् । प्रासुकेन पथाऽन्येन भेजु प्रान्त्वा नृपाङ्गणम् ।। -महापुराण ११३८१२४१ इति तवचनात सर्वान् मोऽभिनन्द दृढव्रतान् । पूजयामास लक्ष्मीवान, दानमानादिसकृतं ।। --महापुराण २०१३।२४१ १२५ यत्पुरुप व्यदधु कतिघा व्यकरपयन् । मुग्व किमम्प, की वाहू, का चू] अझ, पादा [चु, उच्यते । नाग्वेद महिता १०६०, ११-१२ ब्राह्मणोऽस्य मुसमासीद् बाहू राजन्य रत । ऊरु तदस्य यद श्य पझ्या शूद्रो अजायत ।। -~ऋग्वेद सहिता-१०६०।१२ ।
पभनय एक परिशीलन
यह एक लाक्षणिक वणन है। पर पीछ के आचार्य लाक्षणिकता
को विस्मृत कर शब्दो मे चिपट गय और उन्होने कहा- ब्रह्मा के मुख
स ब्राह्मण भुजामो स क्षत्रिय उरुग्रो से वश्य और परोसे शूद्र उत्पन्न
हुए । एतदथ ब्राह्मण का मुखज क्षत्रिय को वाहुन वश्य को उरुण और
परिचारकका पादज लिखा है।'
बदिक साहित्य म भनेक स्थलो पर भगवान् श्री ऋषभदेव को
ब्रह्मा कहा है। मभवत प्रस्तुत सूक्त का सम्बध भगवान् श्री
ऋपमदेव से ही हो।
जैन सस्कृति की तरह वदिक संस्कृति भी वर्णोत्पत्ति के
सम्बध में विभिन्न मत रखती है। माप ही जैन सस्कृति की तरह
वह भी प्रारम्भ म वरण-व्यवस्था जम से न मानकर कम से
मानती थी।
S
१२७
(a) शुक्ल यजुर्वेद सहिवा । ३१४१ -११
(ग) किमाह किमुरु
-अथर्ववेद सहिता १९६०
(५) विप्रक्षत्रियविटशूद्रा मुसवाहरुपादणा
पराजा पुस्पाजाता म आरमाचारलक्षणा ॥
~~भागवत ११३१७॥१३॥दि मा पृ ५८
पत्रान् भुजाभ्यासूरुभ्या पदम्या बवाय झिरे।
मजन प्रजापतेोकानिति धर्मविदो विदु ॥
मुखजा ब्राह्मणास्तात बाहुजा क्षत्रिया स्मृता ।
रुमा पनिनो राजन् पादजा परिवारका ॥
-महाभारत श्लो ४-६ अध्याय २९६
न विशपाऽस्ति बणाना सर्ववाहामिद गन् ।
ब्रह्मणा पूर्वमृष्ट हि कर्मभिवता गतम् ॥
महामारत
१२६
द्वितीय अध्याय
साधक-जीवन
साधना के पथ पर
मम्राट् श्री ऋपभदेव ने दीर्घकाल ना राज्य का गचालन रिया,
प्रजा का पुनवत् पालन किया, प्रजा म फैनी हुई अव्यवर या का
उन्मूलन किया, अन्याय ग्रीर अत्याचार का प्रतिसत किया. नीति
मर्यादामा को कायम किया । व प्रजा हमीपर नहीं, पापक थे, गामक
ही नही मेवक भी थे। श्रीमद्भागवत क अनुमा• उन कशागन कान
में प्रजा की एका ही चाह यी कि प्रतिपल निक्षगा हमाग प्रेम प्रभु म
(प) प्रति कृतयुग रमणा गुभपापयो ।
वर्णाश्रमव्यवम्यास तदामन मयर ।।
घेतायुगे त्यधिषल पारम्भ प्रमिभ्यति ।
वर्णाना पविभागादच प्रेताया तु प्रांतता ।।
पान्ताश्च पुष्मिणश्चय कमिणो दु सिनग्तथा ।
सत प्रयतमानास्त ताया जशिरे पुन ॥
-यायपुराण ८।३३१८६।५७ आदि अध्याय
(ग) तस्मात्र गोऽवयस् फिचिजातिभेदोस्ति दहिनाम् ।
कायभेदनिमित्तेन गयेत मचिम
कृत ।
--भविष्य
पुराण, अध्याय
पिप्टानुग्रहाय, दुष्टनिग्रहाय, मयितिसग्रहाय च, ते च
राज्यरितिक्रिया सम्यक् प्रवर्तमाना प्रमेण परेपा महापुम्पमापि-
देशकतया चौर्यादिष्यसननिवतनतो नारकातिर्यानिवारकतया ऐहिका-
ममदद एक परिशीलन ही नगा रहे। वे किसी भी वस्तु की चाह नहीं करत या मतम अपना उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुरा भरत को बनाकर और नेप निन्यानव पुगो को पृथक्-पृथक राय देकर स्वय साधना के पथ पर बढने के लिए प्रस्तुत हुए। १२६ मुष्मिकसुम्बसाधकतया च प्रशस्ता एवति । महापुरपप्रवृत्तिरपि सपन परास्वव्याप्ता बहुगुणाल्प-दीपायकारणविधारणापूविश्वति । स्थानागपञ्चमाध्ययनेऽपि-धम्म प ण चरमाणस्स पच निम्सा गणा पण्णता त जहा--छक्काया (१) गण (२) राया (१) गाहावई (४) सरीर (२) मित्याद्यालापकवृत्ती राजो निधामाबिम राजा नरपतिस्तस्य धर्मसहायकत्व दुष्टभ्य साधुरक्ष णादित्युक्तमस्तीति परम करणापरीतचेतस परमधर्मप्रवर्तकस्य ज्ञानत्रितययुक्तस्य भगवतो राजधमप्रवर्तकत्व न वापि अनौपिनी चेतसि चिन्तनीया । -जम्यूद्वीप प्राप्ति टाका-दूसरा वक्षस्कार भगवतपमेण परिरममाण एतस्मिन् वर्षे पश्चन पुरुषो वाम्छात्यदिशमानमिवस्मनोऽयस्मालयन्दन किमपि कहिनिदलाते भर्तयनुसेवन विम्भितस्नेहातिशयमन्तरेण । -श्री मदभागवत ४१८ प ५५८-५५६ (क) उदिसिता पुतसय रजसए अमिसिवइ । -जम्बू सू ३६५ ७७ अमोल (स) उपसिइत्ता पुत्तसय रसए अभिपिचर। कल्पसूत्र मू १९५५ ५७ पुण्य (ग) विष्टि । ११ से १७ प ६५ स्वतनयवतजष्ठ परममागवत भगव जनपरायण भरत परणिपालनायाभिपिण्य भवन एवोर्वरित घरीरमावपरिग्रह ब्रह्मावत्प्रिवद्वाज । -श्री मदभागवत ।।२।२६३
गाधक-जीयन
दान
नगिनिष्कगण के पूर्व श्री नपभदेव ने प्रभान के पुण्य-पन्ना म
एक वर्ष तक एक करोड पाठ लाय ग्या मुद्रा प्रतिदिन दान
दी। इस प्रकार एक वर्ष में नीन अग्च अट्ठागी करोड और अम्मी
लाग्य स्वर्ण मुद्रानो का दान दिया। दान देकर, जन-जन क
अन्तर्मानम में दान की भव्य-भावना उद्घह की !
महाभिनिष्क्रमण
भारतीय इतिहास म चैत्र कृष्णा अष्टमी का पिन' मदा
रमणीय रहेगा, जिस दिन रानाट् श्री ऋपम राज्य-वैभव को
ठकरार, भोग-विलाम को तिलाञ्जलि देकर, परमात्मत्व को जागृत
करने के लिए "राध मावन जोग पच्चक्वामि" सभी पाप प्रवृत्तियो
का परित्याग करता हूं, उग भव्य-भावना के माथ विनीता नगरी में
निकलकर सिद्वाय उद्यान म, अशोक वृक्ष के नीचे, पाठ भक्त क तप
एगा हिरण्णकाडी अट्ठव अणूणगा सपसहरसा ।
भूगेदरमाईप दिज्जर जा पायरामाआ ॥
~ नाव. निय० गा० २३६
(ख) त्रिपाठ० १२३३२३
१३२, तिपणेव य कोटिसया बट्ठासीईज हाति कालीमा ।
असिय च मयराहस्सा एय मयच्छरे दिपण ॥
-आव०नि०मा० २४२
(स) त्रिपटि० १३३.२४।५० ६८
१३३ जे से गिम्हाण पढमे मासे पढमे पक्ये चत्तबहुल तस्म ण चेत्तबहुलस्स
अट्ठमीपवरोण।
-कल्पसूत्र मू० १९५ पुण्य० पू० ५७
(य) चेत्तमहलमीए चहि गहस्यहि गो उ अवरणहे ।
सीया गुद राणाग सिद्धत्यवम्मि घवरण ॥
--आव०नि० गा० ३३६
ऋषभदेव एक परिशीलन युक्त होकर सवप्रथम परिझाट बने । भगवान् क प्रेम से प्रेरित होकर उग्रवा भोगवश राजन्य वा भौर क्षत्रिय वंश के चार सहन माथियो ने भी उनके साथ ही सयम ग्रहण किया। यद्यपि उन चार (ग) तदा प पत्रबहुलाप्टम्या चद्रमसि श्रिते । नभत्रमुत्तराषाढामलो भागेऽप पश्चिम ॥ भव जयजयारावकोलाहलमिपाद भृशम् । उगिदिमु दमिव वीक्ष्यमाणो नगमर ।। उच्चखान चतमृभिमु टिभि शिरस वघान् । चतमृभ्यो दिग्भ्य पामिव दातुमना प्रभु ॥ -विषष्ठि ११३॥ ६५ से १५ जाब विणीय रायहाणि मममम्झेण निगच्छद निगच्छइत्ता जरोष सिदत्यवणे उम्जाणे बेरोव असोगवरपायवे तणेव उवागवा उवाग छहत्ता अमोगवरपायवस्म अहे जाव सयमेव घउमुट्ठिय लाय करेइरत्ता छ?ण भत्तण अप्पाणएण- -कल्पसून सू १९५१ ५७ (ख) जम्बूद्वीपप्राप्ति मू० ३६ प ८-१ अमाल उग्गाए भोगाण राइनाण च सत्तियाण च । बहि सहस्सेहसभो सेसाउ सहस्सपरिवारा।। --आष नि गा २४७ (ब) उग्गाण भोगाण राइनाण च सत्तियाण प चहि सहस्साह सडि एग देवदूसमादाय मुरे भवित्ता आगाराको अणगारिय पब्वइए। कल्पसूत्र सू१९५५ ५७ (ग) उग्गाण भागाण रायण्णाण पत्तियाण प। पहि सहस्सहिं सहो सेसा उ सहस्त्रपरिवारा॥ -समवायाग १५ (घ) उम्गाण भागाण राइनारण सत्तियाण चहि सहस्सेहि १३५ -चम्बूद्वीप मू ३६८ -१ अमोल माधक-जीवन ६७ सहस्र साथियो को भगवान ने प्रवृज्या प्रदान नहीं की, किन्तु उन्होंने भगवान् का अनुसरण कर स्वम ही लू चन आदि क्रियाएं की। विवेक के अभाव में भगवान् श्री ऋषभदेव यमश बनने के पश्चान् अखण्ट मौनबूती बनकर एकान्त-शान्त स्थान में ध्यानम्य होकर रहने लगे। जिनमेन के अनुसार उन्होंने छह महीने का अनशन बन अगीकार निया । श्वेताम्बर साहित्य में ऐमा स्पष्ट उलय उपलब्ध नहीं होता। वहा भिक्षा के सम्बन्ध में जो विवरण मिलना है, वह इस प्रकार है--घोर (ट) चतु महनगणना नृपा प्रामाजिपुग्तदा । गुगमतमजानाना स्वामिभायवीयम ।। यदम्म चित न तदम्मभ्य विषपन । इति प्रसनदीक्षारने पेवन द्रश्यलिनिन । --महापुराण पर १० इला०२१२-०३०१ (च) विपष्ठि १५२१७८ मे ८० ५० ५० । १३६ चउरो साहसीओ, लोम काऊण अणणा चव । ज एस जहा काही त तह अघि माहामा ।। ~~-आवश्यक नियुक्ति मा० ३६७ १३७ (क) णयि ए तस्स भगवतस्स करथइ पडिररे । जम्बू० प्र० २ वक्षस्कार मू० ३६ (स) अप काय समुत्सृज्य तपोयोगे समाहित । याचयमत्वमास्थाय तस्थो विश्वंड विमुक्तये ।। परमासानशन धौर प्रतिज्ञाय महाभृति । मोगकाम्यनिरुद्धास्तवहिष्करणविक्रिय ~महापुराण १८०१-२०३९७ (ग) जडान्धमूकबधिरपिशाचोन्मादवदवघृत वेपोऽभिभायमाणाऽपि जनाना गृहीतभीनमतस्तूप्यो बभूव । --भागवत २६ पृ० ५६३ ॥ .
ऋषभदेव एक परिधीलन
अभिमहो का ग्रहण कर अनासक्त बन भिक्षाहेतु प्रामानुग्राम विवरण
करते थपर भिक्षा और उसकी विधि से जनता अनभिज्ञ थी मत
भिक्षा उपलब्ध नही होती थी। वे चार सहस्र धमण चिरकाल तक
यह प्रतीक्षा करते रहे कि भगवान् मोन छोडकर पूर्ववत् हमारी सुष
बुध लगे सुख सुविधा का प्रयल करगे पर भगवान् मात्मस्य रहे
कुछ नहीं बोल । वे द्रव्यलिगधारी श्रमण भूख-प्यास से सत्रस्त हो
सम्राट भरत के भय से पुन गृहस्थ न बनकर वल्कलधारी तापस
पादि हो गये। ' वस्तुत विवेक के अभाव में साधक साधना से
पथभ्रष्ट हो जाता है।
साधक जीवन
भगवान् श्री ऋपमदेव अम्लान चित्त से, अव्यथित मन से मिक्षा
के लिए नगरी व ग्रामो मे परिभ्रमण करते । भावुक मानव
१३८ उसमो वरवसभगई घेत्तूण अभिग्गह परमघोर ।
बोसट्टचत्तदेहो विहरइ गामाणुगाम तु ॥
-आवश्यक नियुक्ति गा ३३८
म वि तार चणा बाणइ का भिक्खा करिसा व मिक्सयरा।
-आवश्यक नि गा ३३६
(ख) अनि भिक्सस्स अतीति तो सामितो णे भागतोत्ति बहि
आसेहि य हत्याहि आभरणेहि कनाहि म निमन्तेति ।
-आवश्यक भूणि पृ १६२
भरतमरजया गृहगमनमयुक्तम्, आहारमन्तरेण पासितु न शक्यते-
-आवश्यक नि० मत प २९६
(ब) जेण पणो भित्र ण पाणति दाउ तो जे ते अत्तारि सहस्सा
भिक्ख मलभता तेण माण्ण परपि ण दपत्रान्ति भरहस्य,
य भए।
-आवश्यक पूणि १६२
१४१ ते भिक्खमतभमाण धणमझे तावसा जाता।
-आवश्यक नि गा ३६
मायकजीयन
रिमित किया है । भागवत का प्रग्तुत वर्णन श्रमग भगवान्
महावीर का अनार्य देशो मे विहरण के समान है।'४९
विशिष्ट लाभ
एक वा पूर्ण हुआ। जनपदीय गनपुर के अधिपनि बाहुबली के
और एग गोगप्रभ राजा के पुन श्रेयाग ने स्वान देया कि गुमेर पवन
ध्याम वर्ण का हो गया है। मैंने अमृत कला गे अभिषिक्त कर
पुन चमकाया ।" नगरोष्टी मृबुद्धि ने उमी गधि मे स्वप्न देखा कि
सूर्ग की हजार किरण गपने ‘यान ग वलिन हो रही थी कि याम न
उन रश्मियो पो पुन मूर्य में गम्थापित कर दिया ।“ गजा
१४ तुलना जिय--आचागग प्रथम यता अध्या० ६ उद.27
रउमत्यो य परिग कालीमाताह यिग्गि गजपुर गना,
तरच भरमग पुत्ता गजगा, अन भत्ति वाहविग्ग गुती
गोमणभो गेयगो ग, ते य ापि जगा णगग्मट्टी य गुमिगा पागन्नि
रा राण, गमागना य विनिषि गामग्ग नगीने वरनि, गयमा-गुणा
अज्ज गया ज गुमिग्मे दिव-मेर लि चलिना, म्हागता
मिनायमाणणभा मगा ग अमया नगेण अभिगत्ता गाभाषितो जाता
पडिएको यऽम्ति।
-आपयाणि जिन० पृ० १६२-१६३
(५) परजणया गयपुर नाम नगर, सत्य पायलिगुत्ता गोगणभी
गया, तरग पुतो गाजमा जुवगया, या सुमिरखे गदर पस्य
मामवण्णय पासड. ततो अणेग अमयकलगेण अभिगिती
पभनव एक परिशीलन करने के लिए अभ्यथना करते पर कोई भी विधिवत् भिक्षा न देता। भगवान उन वस्तुओ को बिना ग्रहण किये जव उलटे परो लौट जाते तो वे नहीं समझ पाते कि भगवान् को फिस वस्तु की मावश्यकता है? श्रीमद्भागवतकार ने भगवान् श्री ऋपभदेव को थमण वनने के पश्चात् अज्ञ व्यक्तियो न जो दारुण कपट प्रदान क्यि उसका शब्द चित्र उपस्थित किया है 13 पर वसा वणन जन साहित्य मे नही है । जन साहित्य के परिशीलन से यह भी ज्ञात होता है कि उस युग का मानब इतना र प्रवृति का नही था जितना भागवतकार ने कोऽप्यवादीग्दि सज्ज स्नानीय वसन जलम् । तैल पिप्टातकश्चेति स्नाहि स्वामिन् प्रसोद न । कोऽप्यूचे स्वोपयोगन स्वामिन् । मम कृतार्थय । आत्यनन्दनकपू रकस्तुरीयक्षकदमान् ॥ कोऽप्युवाच पगाल । रत्नालङ्करणानि न । स्वाङ्गाधिरोपणात् स्वामिनलकुरु दया कुछ। एव यशपयन् कोऽपि गृहे समुपविश्य मे। स्वामिनङ्गानुकूलानि दुकूलानि पवित्रय ॥ करिबरप्याडवीदेव देवाङ्गनोपभाम् । प्रभो । गृहाण न कन्या पन्या स्मस्वत्समागमात ॥ कोऽप्यूचे पादचारेण नीच्याऽपि कृतेन किम् ।। इममारोह शलाम कुटनर राजकुम्जर ॥ -त्रिपष्ठिश२५१-२५८ तत्र तत्र पुरखामाकरखेटवाटसर्वट शिविर-अजधोवसायगिरिखना श्रमादिप्यनुपथमरनिपसः परिमूयमानो मक्षिकाभिरिव पनवजस्वजन ताडनावमेहनष्टीवनावशाल प्रक्षपतिवाददुस्मतस्तविगणयन्नेवा सत्सस्थान एतस्मिन् देहोपलक्षणे सवपदेश उभयानुभवस्वरूपेण में महिमावस्थानेनासमारोपिताहममाभिमानत्वादविखण्डितमना पृथिवी मेरपर परिवनाम। -भागवत ।।३।५६४ माधक जीवन १०१ विरित किया है । भागवन का प्रस्तुत वर्णन श्रमण भगवान महावीर के अनार्य देशो मे विहरगा के ममान है। विशिष्ट लाभ एक या पूर्ण हुा । कुम्जनपदीय गजपुर के प्रविन बाहुबली के पोय एम गोमप्रभ राजा के पुत्र अं याग न रवान दया कि गुमेर परत श्याम वर्ण का हा गया है। उम मैने प्रमृन कलग गे अभिषिक्त कर पुन चमकाया" नगर)ोष्टी सुबुद्धि न उगी गति म म्बान देया कि सूर्य की हजार किरण अपने यान म चलित हो रही थी कि अं याम न उन रश्मियो को पुन मूर्य में मम्थापित कर दिया ।८ गजा सागता १४४ तुलना कीजिय-आचागग प्रथम यत० अध्या० ६ उद्द० • ग। "ठउमस्या य पग्मि हीनयाना: परिऊगा गजपुर गना, सत्य भग्हाग पुत्ता गम्जमा, जन्न भनि वादलिग्ग मुना गामपभा गयमा य, न य रात्रि जगा गग्गेट्टी य गुणिण पाईन त रणि, गमागनाय तिन्निपि गामग्ग गोरे रति, गयमा-गुणा गण मया ज गांगणे दिट्ठ -TF frल चरिता, मिनायगाणपमा मया यजमयागेण गित्ता गाभापिता जाना पडिखो याम्हिा जारश्यक चणि जिन०१० १६२-१६३ (प) रनणया गयपुर नाग नगर, तत्य राहुयलिपुत्ता गोगप्पा गया, तम गुतो गनमा जुनगया, गा मुमिणे मदर गव्यय गामरणय पागह, नता अरोग अभयफलगेण अमिमित्ता अभहिय गाभिनुमाउना। -आवश्यक नियुक्ति मल०३० १०.१७ (ग) विपण्ठि १३१२४४-०४५। १४६ नगरसेट्टी सुबुद्धिनामा, सो सूरम्स रगीमहाम टागाला चाय पाराति, नयर गिज्जगण हावृत्त सो म अहिअयर तैयमम्युष्णा r जामो। -आवश्यक हारिभायावृत्ति प०१८ ऋषमदेव एक परिशीलन सोमप्रभ ने स्वप्न देखा कि एक महान पुरुष शत्रुमा से युद्ध कर रहा है अ यास न उमे सहायता प्रदान की जिससे शत्रु का बल नष्ट हा गया। प्रान होने पर मभी स्वप्न के सम्बध में चिन्तन मनन करने लगे। चिन्तन का नवनीत निकला कि अवश्य ही श्रेयाम का विशिष्ट लाभ होने वाला है। (ब) नगरसेट्टी मुर्ती नाम सो मृमिण पासइ मूगरस स्मिमहम्म गणातो चलित नपरि सेग्जसेण हुक्षुत्त ततो सो सूरी अहिययरनेयमम्पनो पाती। --आवश्यक मल बृ प० २१७-२१५ (ग) त्रिषष्ठि १६३०२४६-२४७ । नोट-आवश्यक भूमि मे जो स्वप्न नगरपाठी का दिया है वह आवश्यक हारिभद्रीयावृत्ति आवश्यक मलयगिरि वृत्ति और विषप्टिशलाका पुरप परिष मे राजा सोमप्रभ का दिया है और मोमप्रभ का स्वप्न नगर थप्ठी का दिया है। -लेखक (ष) मेट्ठी भणनी-सुणह 7 मया दिट्ठ- -अग्ज किल कोऽपि पुरिसा महम्पमाणो महत्ता रिववरण सह जुझन्तो विट्ठी तो सेग्जम सामा य स सहामो पातो तता अणे पराजित परवलं एयण म्हि पडिखो। -आवश्यक पूणि १३३ १४४ () राणा एक्को पुरिसो महापमाणा महया रिज्वलण सह जुझिम्तो दिवो। आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति प १४५ (स) राणा सुमिणे एक्को पुरिसो महप्पमाणो महया रिउबलेण शुभतो दिट्ठो मरमेण माहरन लिण ततो तेण तब्बल भग्ग ति। -~आवश्यक मल वृति प २१०१ (ग) पिष्ठि १४० कुमारस्स महतो कोऽदि लामो भविस्सदसि । ---आवश्यक मल ६ प २१८१ साधक जीवन अक्षय तृतीया भगवान् श्री अपभदेव उसी दिन विचरण करते हुए गजपुर पधारे । चिरकाल के पश्चात् भगवान् को निहार कर पौरजन प्रमुदित हुए। धेयास भी अत्यधिक प्राङ्गादित हुआ । भगवान् परिभ्रमण करते हुए श्रेयाम के यहाँ पवार । भगवान के दशन और भगवदरूप यो चिन्तन ग श्रेयाम को पूर्वभव की रगृत्ति उद्बुद हुई ।'" स्वग्न का मही तथ्य पग्निात हया । उमने प्रेमपरिपूरित करो से ताजा माये हुए इस ग्ग के कालगो को ग्रहण कर भगवान् के कर कमलो ग रम प्रदान निाया।" उग प्रसार भगवान् श्री ऋपभदेव को १४६. भगवपि अणाउलो गरमग्यमांग अगाणो गेयसभयणमश्गत।। -आव०म०१०२१८ १५० जाहरगग्गा जाय - -जान०म०४०२१८ (ग्य) गम्प्रेक्ष्य भगवद्रप ययान्मातिस्मगेऽभवत् । ---महापुराण जिन० ७५।२०।४५२ १५१ (क) गयपुर गम योयरमदाग गुहार पीट गुरुसूया । -आव० नियुक्ति गा० ३४५ (प) उगभग्ग उ पारण उनयुग्गा आगि लागनाहाग । -जान०नि० गा० ३४॥ (ग) उमभग्ग पदभिशापा, गोयग्मा आगि लोगणाहम्म । रागवायांग (घ) नतो विजातनिर्दापभिक्षादानावर ग तु। गृत्यता कल्पनीयोऽय ग इत्याद विशुम् 1, प्रमुग्प्यन्जनकल्य पाणिपात्रम वाग्यन् । उलिप्याशिय मागोवरस गुम्गानलोठयत् ।। गुयानगि म माणिपाने भगवता ममौ । प्रयागरय तु हृदये ममुनं हि मुदस्तदा ।।
श्यमन्व एक परिशीलन एक सम्वत्सर के पश्चात् भिमा प्राप्त हुई और सव प्रथम इमरस का पान करने के कारण वे काश्यप के नाम से भी विश्रुत हुए। - स्त्यानो नु स्तम्भितोन्यासीद् व्योम्नि लग्नशिखो रस । अजली स्वामिनोऽचिन्त्यप्रभावा प्रभव सखु॥ ततो भगवता तेन रसैनाकारि पारणम् । सुरासुरनुणा पुनस्तद्दर्शनामृत ॥ पिपप्ठि. RE१-२६५ () अयान सोमप्रमेणामा लदमीमत्या च सादरम् । रसमिझोरक्षात प्रासुभुत्तानीवृतपाणय ॥ -महापुराण जिन०१ २०४५४ (च) एपसि ए चरव्वीसाए तित्थगराण चवीस पढममिक्सा दायारो होत्या त पहा सिजस -~समवायाज १५२ सबष्वरेण भिक्खा उपमेण लोगनाहेण । सेसेहि धीयदिवस लतामा पढममिक्ताओ॥ --आवश्यक नियुक्ति गा० १४२ (ब) सय वरेण मिला लखा उसमेण लोयणाहेण । समवायाग १५३ कास-उब्यू वस्स विकारो कास्य रस सो जस पारण सो कासवो उसम स्वामी। -दशवकालिक-अगस्त्यांसह पूषि (ख) कायो माम इसनु भण्णा आम्हा त इ पिबति तेन काश्यपा अभिधीयन्ते कालिक-जिनदास पूणि पृ० १३२ (ग) पुष्वगा य भगवतो साधुरस पिविताइता तेण गोल करसवल। --आवश्यर चूणि मिमवास १ १५२
माधक जीवन
१०५
आचार्य जिनसेन के अब्दो मे काश्य तेज को कहते है। भगवान्
श्री ऋपभदेव उस तेज के रक्षक थे अत काश्यप कहलाये ।"
प्रस्तुत अवपिणी काल मे मर्व प्रथम वैशाख शुक्ला तृतीया को
श्रेयास ने इक्षु रस का दान दिया अत वह तृतीया इक्षु-तृतीया या
अक्षय तृतीया पर्व के रूप मे प्रसिद्ध हुई । ७० दान से वह तिथि भी
अक्षय हो गई।
(घ) वर्षीर्यान् वृपभो ज्यायान,
पुरुराध प्रजापति ।
ऐश्चाफु [क] काश्यपो ब्रह्मा,
गौतमो नाभिजोऽग्रज ॥
----धनजय नाममाला ११४ पृ०५७
१५४ काश्यमित्युच्यते तेज काश्यपस्तस्य पालनात् ।
-~महापुराण २६६।१६।३७०
१५५ राघशुक्लतृतीयाया दानमासीत् तदक्षयम् ।
पक्षियतृतीयेति, ततोऽद्यापि प्रवर्तते ।।
श्रेयासोपजमवनी दानधर्म प्रवृत्तवान् ।
स्वाम्युपशमिवाऽशेषव्यवहारनयक्रम 11
-त्रिपष्ठि०१३।३०१-३०२
(ख) वंशाख सुदि तृतीयारूप पर्वत्वेन मान्य जात ।
-कल्पलता सम० पृ. २०६१
(ग) तददिन लोके अक्षयतृतीया जाता।
- कल्पद्रुम फलिका पृ० १४६
(घ) वैशाखमासे राजेन्द्र शुक्लपक्षे तृतीयका ।
अक्षया सा तिथि प्रोक्ता, कृत्तिका रोहिणीयुता ।।
तृतीय अध्याय
तीर्थकर जीवन
अरिहन्त के पद पर
एक हजार वप तक श्री ऋषभदेव शरीर से ममत्व रहित होकर
वासनामो का परित्याग कर, मात्म-माराधना संयम साधना और
मनोमथन करते रहे। जब भगवान् अष्टम तप की साधना करते
हुए पुरिमताल नगर के बाहर शकटमुस उद्यान मे वटवृक्ष के नीचे
उसमेण अरहा कोसलिए एग बासमहत्स
निच बोसहकाये वियत्त हे जाम अप्पारण
भावमाणस्य एक्क वामसहस्म विइक्क्त ।
-कल्पसूत्र सू० १९६प ५५ पुण्य
(प) सेण भगव वासापासम्म हेमन्तगिम्हासु गामे एगराईए
नगरे पचराईए ववगयहास-सोग-अब रह भय-परिसास
जिम्ममे जिरहकारे सहुए गये वासी सत्यण अद्ध पदणाणू
लेवेण परत सेटु मि स्वमि मममे इहलोए परलोए
अपहिवस जीवित्र मरणे निरपको ससारसारगामी
कम्मसपणिग्धायणटार अहिए विहरइ । तस्स ए
भगवनग एएण विहारेण विहरमाणम्स एगे वाससहस्स
चम्बूदाय सू४-४१५ ४ ममो
तो रा ज स हेमन्ताण परत्वे मासे सतमे पक्ले फागुणबहुसे
तस्स प फग्गुणबहुलस्त एक्कारसीपसरा पुखहकाससममसि
तीर्थङ्कर जीवन १०७ ध्यान-मुद्रा में अवस्थित थे। फाल्गुन कृष्णा ग्यारस का दिन था, पूर्वाह्न का समय था, आत्म-मथन चरम सीमा पर पहुँचा । आत्मा पर से धन-धाति कर्मों का प्रावरण हटा, भगवान् को केवल ज्ञान और केवल दर्शन का अपूर्व आलोक प्राप्त हुप्रा । जैनागमो मे जिसे केवल पुरिमतालस्स नयरस्स बह्यिा सगडमुहसि उज्जागसि नगोबरपायवस्स अहे अट्ठमेण भत्तण अपाणएण आमाटाहि नक्खत्तण जोगमुवागएण भारतरियाए वट्टमाणस्स अणते जाव जाणमाणे पासमाणे विहरइ । -कल्पसूत्र० सू० १६६ पृ०५८ पुण्य० (ख) तित्थयराण पढमो उसभसिरी विहरिओ निरुवसग्ग । अट्ठावओ नगवरो अग्गा भूमी जिणवरस्स ।। छउमत्थप्परिआओ वाससहस्स तओ पुरिमताले निग्गोहस्स य हिट्ठा उप्पन्न केवल नाण ।। फग्गुणबहुले इक्कारसोइ अह अट्ठमेण भत्तेण । उप्पन्नम्मि अणन्ते महन्दया पष पन्नवए। -आवश्यक नियुक्ति गा० ३३८ से ३४० (ग) फग्गुणवहुलेककारसि उत्तग्माढाहि नाणमुसभस्स । -आवश्यक नि० गा०२६३ (घ) अथ व्रतात् सहस्राब्द्या, फाल्गुनकादशीदिने । कृपणे तथोत्तरापाढास्थिते चन्द्र दिवामुसे ॥ उत्पेदे केवलज्ञान त्रिकालविपय विभो । 1३१५१४ हस्तस्थितमिवाऽशेप, दर्शयद् भुवनत्रयम् ।। -त्रिषष्ठि (3) जम्बूद्वीप प्रशप्ति० पृ० ८५ अमो० -महापुराण २४।६।५७३ (च) समवायाङ्ग १५७ गा० ३३-'चक्र प्राणिघातकम् ? (छ) लोक प्रकाश ३२,५सो स्वानादिदेश स । (ज) फाल्गुने मासि ता -निपष्ठि १२३३५१५ न्य श्रेयोनुवन्धि यत् । ६ वमेवा प्राथमकल्पिकी ॥ -महापुराण जिन० २४।८।५७३ ऋषभदेव एक परिशीलन चरल या पुरा रल तो इस लोक व जीवा का ही सुख प्रदान करने वाल है किन्तु इस लोक और परलाव दोना म ही जीवन को सुखी वनान वाला भगवान का दशन ही है ९ अत मुझे मवप्रथम भगवान श्री ऋपमदय के दर्शन व चरण स्पश करना चाहिए । मां मरदेवी को मक्ति सम्राट् भरत भगवान के दर्शन हेतु सपरिजन प्रस्थित हुए। मां मरुदेवी भी अपने लाडले पुत्र के दर्शन हेतु चिरकाल से छटपटा रही थी प्यारे पुश के वियोग से वह व्यथित थी। उसके दारुण कप्ट की कल्पना करके वह कलप रही थी। प्रतिपल-प्रतिक्षण लाडले लाल की स्मृति से उसके नेत्रो म आँसू बरस रहे थे । जब उसने सुना कि उसका प्यारा लाल विनीता के बाग म भाया है तो वह भी भरत के साथ हस्ती पर मारूड होकर चल पडी । भरत के विराट वभव को देखकर उसने कहा-बेटा भरत ! एक दिन मेरा प्यारा ऋषभ भी इसी प्रकार राज्यश्री का उपभोग करता था पर इस समय वह क्षुधा पिपासा से पीड़ित होकर कप्टो को सहन करता हुआ विचरता है। पुत्र प्रेम से मॉख छलछला आई । भरत के द्वारा तीषङ्करो की दिव्य विभूति का गब्दचित्र प्रस्तुत करने पर भी उसे सन्तोप नही हो रहा था। किन्तु समवसरण के सन्निकट ताम्मि पूइए चक्क पूश्य पूअणारिहो वाओ। रहलाइभ तु वाक परलोअसूहावही ताओ। -आवश्यक नियुक्ति गा २४२ १६६ मिश्चिचायति राजेन्द्रो गुरुपजनमादित । -महापुराण ४४।५७३ विपष्ठि पर्व १४ पृ १२४।२५ भगवतोय माता भगति मरहस्स रविवि दटू एं-अम पुता एम वेव गगसी हिदति । साहे माहो भगवसो विमूहि बम ति साण पत्तियति ताहे गटनेण भणिता-एहि पा से भगवतो विमूति तीमंदर जीवन पहुंचते ही थी ग्राषभदेव को ज्यो हो ममवमग्गा म इन्द्रो द्वारा प्रचित देवा त्या ही निन्तन का प्रवाह बदला । पार्न ध्यान मे गुक्ल व्यान में लीन हुई । ध्यान का उत्कर्ष बदा, मोह का बन्धन भर्वा शन टूटा । यह मानावरा, दर्शनावरण पार अन्नगय का नाट कर केवल ज्ञान, स्वल दर्शन की धारिया बन गई और उसी क्षण गेप मां को भी नष्ट कर हस्ती पर प्रारूट ही मिद वुद्ध और मुक्त हो गई ।" . दरिगेमि, जदि निगिया मम महम्ग भागेर्णाय अस्थि लि, ताह स्यिग्मधेण णीति। --आवश्यया धूणि-जिन ० १० १८१ (प) मम पुत्तस्रा परिसी रज्जसिरी आमि रापय गा गृहापिकायापार- गओ नेम्गओ, हिरति उपय करियाझ्या भग्हम्म तिर अगायिपूर बन्न तग्मवि न पत्तित्रियाश्या, पुत्तगोगण य से पिाल मामान चया जाय स्यवोए आवश्यमा मलय० वृत्तिः पृ० २२६ भगयता य तादिच्छत्त पेच्छती पर केवलनारण जापान, -~~-आव० म्यूणि००११ (4) ततो तो भगवा छताइनरत पागतीए व ने बसमुप्पण-- -आव० मलवृ०२२६ (ग) साऽपश्यत् तीथल्लक्ष्मी मुनारतिश्यान्विताम, तस्यास्तद्दानानन्दात् तन्मयरवमजायत ॥ साऽऽयए क्षपकणिमपूर्वकरणकमात् । क्षीणाष्टकर्मा मुगपद, केवलज्ञानमारादत् ॥ --त्रिषष्ठि- १३३५२६-५२६ १७०, त रामय प ण आयु तु सिद्धा, देवहि य से पूया मता। -~आवश्यक पूणि जिन पृ.१५१ (स) करिस्कन्धाधिएतय स्वामिनी मादेव्यथ । अन्तपेयसित्वेग, प्रपेदे पदमव्ययम् ॥ -निपष्टि० ११३५३०
ऋषभदेव एक परिशीलन
कितने ही प्राचार्यों का यह अभिमत है कि भगवान् के शद
कएकुहरो मे गिरने से उन्हे पात्मज्ञान हुआ और वे मुक्त हो गई।"
प्रस्तुत प्रवसर्पिणी में सर्वप्रथम केवलज्ञान श्री ऋषभदेव को-मा-
और मोक्ष मरुदेवी माता को।
प्राचार्ग जिनसेन ने खीमुक्ति न मानने के कारण ही प्रस्तुत
घन्ना का उल्लख नहीं किया है।
धमवावती
जिन बनन के पश्चात् भगवान् श्री ऋषभदेव स्वग कृतकृत्य
हो चुके थे। वे चाहते तो एकान्त शान्त स्थान में अपना शेप
जीवन व्यतीत करते पर वे महापुरुष थे। उन्होने समस्त प्राणियो
की रक्षारूप दया के पवित्र उद्देश्य से प्रवचन किया । एतदथ ही
भगवान् श्री महावीर ने अपने अन्तिम प्रवचन मे थी ऋषभदेव का
धम का मुख कहा है । और ब्रह्माण्ड पुराण में भी श्री ऋषभदेव
अन्न भएति--भगवनी धम्मकहासदर सुरपतीए तकाल च तीए
खुट्टमाग्य वो सिद्धा।
-आवश्यक मलय दू २२९
माय मयस्स देहोस
मह बीए पढमसितोति।
-~आवश्यक नियुक्ति
(स) पढमसिटौति काऊए बोरोदे खुदा ।
-आवश्यक पूणि ५ १८१
(ग) एतस्यामवसपिण्या सिद्धोऽसी प्रथमस्वत ।
सस्कृत्य तद्वपुः श्रीरनीरषौ निषेऽमरे ।
-विपष्ठि ११३५३१
सबजग बीवत्खणदयट्टयाए पावपण भगवया सुकहिय ।
-प्रश्नध्याकरण सम्बरवार।
१७४ पम्माण कासबो मुह ।
-उराराध्ययन गा०१६ ।
तोर्यशर जोन को दस प्रकार के धर्म का प्रवर्तक माना है। भागतकार ने उनका प्रसार ही मोक्षधर्म का उपदेश देने के लिए माता है।" . १७ भगवान् ने भारतीय साहित्य म फागुन कृष्णा एकादशी का दिन स्वर्णाक्षरो में उतित है जिंग दिन मर्व प्रथम गगवान् का पाव्यात्मिक प्रवचन भावुक भक्तो को अवगण करने को प्राप्त हुना। अहिंगा, गत्य, अस्तेय, नाचर्य और अपरिग्रह की गरमीर मीमामा करते हुए मानवजीवन के लक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए कहा--- जीवन का लक्ष्य भोग नही, त्याग है, राग नहीं. वैराग्य है, वासना नही साधना है। इस प्रकार गगवान् के अन्यान्म रग से छलछलाने हुए प्रबलन को श्रवण कर राम्रा भरत के पाँचसी पुरा न रातिमी पी ने तथा 'ब्राह्मी श्रादि ने प्ररज्या ग्रहण की। मह हि इपायुकुलपयोगवन नाभिगुनेन मरुच्या गन्दान मासा पण दश प्रमागे धर्ग स्वयमेव चोणं । यहाागरपुरण तगाहासुदेवाश गोक्षधगविवक्ष या । - भागवत ११।२।१६।१० ७११ फगुणबहल सारसीद अह अट्ठमण भत्तेण । उपम मि अगले महब्वया पच पनवरा ।। -आवश्यक नियुक्ति गा० ३४० (म) तय समोगरणे भगा राक्कादीग्ण बम्म परिकहति । -आवश्यक चूणि, पृ०१८२ १७८ सह मरदेवीद निग्गओ, पाहण पव्वज्ज उराभसेणग्ग । यभीमरीइदिगा गुन्दरिओरोह गुअदिवाया ।। पर य पुत्तरागाद भरस य रात नतुअसयाद । रायरा पप्पा तम्मि कुमारा रामारा रणे ।। -~~आवश्यक नि० गा० २४४-२४५ 5 ऋषभदव एक परिशीलन सम्राट भरत आदि ने धावक व्रत ग्रहण किये और सुदरी ने भी। महापुराणकार ने भरत के स्थान पर श्रावक का नाम श्रुतकीर्ति दिया है और सुन्दरी के स्थान पर श्राविका का नाम प्रियवता दिया है। पर श्वेताम्बर ग्रयो म ये नाम कही पर भी नहीं आये है। इस प्रकार धमण श्रमणी थावक श्राविका रूप चतुर्विध तीथ की संस्थापना कर वे सवप्रथम तीथङ्कर बने । श्रमणो के लिए पाच महावतो का और गृहस्थी के लिए (ख) तत्व उसमसेणो णाम भरहस्स रक्षा पुता सा धम्म सारण प बातो तेण विहि पुच्चाहि चाहसपुष्वाइ गहिताइ--- --उमन विगते धुन तत्य वम्भीवि पब्वइया । -आवश्यक चूणि पृ (ग) महापुराण पब २० लोक १७५ पृ ५६१ १७६ (क) भरहो सावको सुन्दरीए दिन पव्याउ मम इत्थिारयण एसप्ति सा साविगा एस चरब्बिहो समणसषो । -आवश्यक पूणि १५२ (स) भरही सावगो चामो सुन्दरी पब्बयन्ती मरहेण इस्थी भविस्सइति निष्ठा सामिया पापा एस बउनिहो समणस । बावश्यक मस वृ प २RE १० परकीतिमहापाको गृहोतापासकात । देशसमिनामासीद्धौरेयो गृहमेपिनाम् ।। उपात्ताणुवता धीरा प्रयतात्मा प्रियव्रता । स्त्रीणा विशुववृत्तीना अभूवा सरी सती॥ -महापुराण जिनसेन २४।१७७-१७८ पृ ५९२ १८१ हिससच्च ध अटेणग व तसो बम्भ व अपरिग्गव च। परिवज्जिया पब महत्वयाई परिग्ज धम्म जिणदेसिय विऊ॥ --उत्तराध्ययन २०२२
तीर्थङ्कर जीवन
.
के मोक्षमार्ग के प्रवर्तक अवतार है।९१ जन भाहित्य में जिस
ऋपभसेन को ज्येष्ठ गणधर कहा है, सम्भव है, वैदिक साहित्य मे
उमे ही मानमपुत्र और ज्येष्ठपुत्र अर्बन कहा हो । उन्हे ही भगवान् ने
समस्त विद्यालो मे प्रधान ब्रह्मविद्या देकर लोक मे अपना उत्तराधिकारी
। बनाया है। १९०
आद्य परिव्राजक मरीचि
भगवान् के केबल ज्ञान की तथा तीर्थ-प्रवर्तन की सूचना प्राप्त
होते ही, भगवान् के साथ जिन चार सहस्र व्यक्तियो ने प्रवज्या
ग्रहण की थी और जो क्षुधा पिपासा से पीडित होकर तापस आदि
हो गये थे, उन तापसो में से कच्छ महाकच्छ को छोडकर सभी
भगवान् के पास पाते है और आहती प्रवज्या ग्रहण करते है ।१९३
" तमाहुर्वासुदेवाश मोक्षधमविवक्षया ।
अवतीर्ण सुतशत तस्यासीद् ब्रह्मपारगम् ।।
-~-थीमद्भागवत ११।२।१६ गीता प्रेस० गो० प्र० सस्करण
ब्रह्मा देवाना प्रथम सम्बभूव विश्वस्य कर्ता मुवनस्य गोप्ता ।
म ब्रह्मविद्या सबविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येप्ठपुत्राय प्राह ।
-मुण्डकोपनिषद् १११
(ख) स्वर्तितनयाय गात विदद।
१८
-ऋग्वेद १, ६६,४
ते य तापसा भगवनी नाणमुप्पण ति कच्छसुकच्छवज्जा भगवओ
सगासमागतूण भवणवतिवाणमतरजोइसियवेमाणियदेवागिण परिस
दट्ठण भगवो सगामे पव्वइया ।
-आव०नि० मल० वृ० पृ० २३०१
ते च कच्छमहाकन्छवर्ज राजन्यतापसा ।
आगत्य स्वामिन पावें, दीक्षामाददिरे मुदा ।।
त्रिपष्टि १।३१६५४ पृ ५६
अपमदेव एक परिशीलन वति ५५ चरित्र आवश्यक नियुक्ति प्रावश्यक चरिण आवश्यक मलयगिरीय आवश्यक हारिभद्रीया वत्ति । भिपष्ठिशलाका पुरुष कल्पलता कल्पद्रुम कलिका "महावीरचरिग प्रभृति श्वेताम्बर ग्रन्थो के नुसार भगवान् के प्रथम प्रवचन को श्रवण कर सम्राट भरत का पुत्र मरीचि भगवान ऋषभदेव के पास दीक्षित होता - १६४ (ग) iऽपि च तापमा कच्छ- महाकच्छविजिता तेऽपि प्रपनिर बीमा समय रामिनोऽन्निक ॥ -रल्पार्थ बोधिनी पृ० १५१ ट्ठाण कीरमा ण महिम वहि खतिमा मरिई । मम्मतलबुद्धी धम्म सोण पब्बइओ ।। -आम नि गा. एत्य समासरगे मरिचिमाइया वध कुमाग परया -आवश्यक मल वृ पृर ११ जावर हारिमनीया वृत्ति पाथ समवसरऐ रूपभम्बामिन प्रभा । पितुधानादिमि साप मरीचि क्षत्रियो ययौ ।। महिमान प्रभो प्रेय त्रियमाण स नारिभि । धम चारप्य सम्प वनमादरे/ ४७ 4 १६७ १६८ तन भरतस्य मरीचित्र सप्तातपौनाश्च प्रति १६१ . तत्र प्रथमदेशनाया धर्म पौवा रेख मरीचि तीर्थकर जीवन ११६ है, तप सयम की विशुद्ध आराधना साधना करता हुआ एकादा अङ्गी का अध्ययन करता है ।२०२ पर एक वार वह भीप्म-ग्रीष्म के आतप से प्रताडित होकर साधना के कठोर कटकाकीर्ण महामार्ग से विचलित हो जाता है ।२०3 उसके अन्तर्मानस मे ये विचार-लहरियाँ तरगित होती है कि मेरुपर्वत सदृश यह सयम का महान् भार में एक मुहूर्त भी सहन करने में असमर्थ हूँ। १४ क्या मुझे पुन गृहस्थाश्रम स्वीकार करना चाहिए ? नहीं, कदापि नही । और मै सयम का भी विशुद्धता से पालन नहीं कर पाता, अत मुझे नवीन वेपभूपा का निर्माण करना चाहिए। श्रमणमस्कृति के श्रमण त्रिदण्ड-मन वचन काय के अशुभ व्यापारो से रहित होते हैं, इन्द्रियविजेता होते है, पर तो मै त्रिदण्ड से युक्त हूँ, और अजितेन्द्रिय हूँ, अत इसके प्रतीक रूप त्रिदण्ड को धारण करूंगा। २०६ ~ 16 २०१ मरिईवि सामिपासे विहगड तवसजमममग्गो । -आवश्यक भाप्य, गा०३६ २०२ सामाइसमाई इक्कारममा उ जाव अगाओ। उज्जुत्तो भत्तिगओ अहिज्जिो सो गुरुसगासे ।। -आवश्यक भाप्य० गा०३७ २०३ अह अन्नया कयाइ गिम्हे उण्हेण परिंगयसरीरो। अण्हाणएण चइओ इम कुलिंग विचितेइ ॥ -आव० नि०या० ३५० मल० वृ०५०२३३२१ मेलगिरीसमभारे न हुवि ममत्थो मुहनमवि वोढु । मामन्नए गुणे गुणरहिओ ससारमणुकली ॥ - आव०नि० गा० ३५१ म० वृ० २३३।१ ०५ एवमणुचितयतस्स तस्स निगा मई समुप्पन्ना। लद्यो मए उदाओ जाया मे सासया बुद्धी । --आव०नि० गा० ३५२ समणा तिदडविरया भगवतो निहुअसकुडअप्रगा। अजिड दियदडस्स उ होउ तिदड मह चिव ।। -आव०नि० गा०३५३ मल०प०२३३ रुपमदेव एक परिचालन श्रमण द्रव्य और भाव से मुण्डित होते है सब प्राणातिपात विरमण महायत के धारक होते है पर मे शिखासहित क्षुरमुण्डन कराम गा और रथूलपाणातिपात का विरमरण करुगा।" धमग यकिचन नथा गील की सौरभ से सुरस्ति हाते है पर म परिग्रहधारी रहूँगा और भील की मौरभ के अभाव में चन्दनादि को सुगध से मुर्गा धन रहूंगा। श्रमण निर्मोह होते है पर मै मोह ममता के मरस्थल में घूम रहा है उनके प्रतीक के रूप म छत्र धारण करूगा। श्रमण नंगे पर होते है पर में उपानद् पग्नूगा। श्रमण जा स्थविर क्ल्पी है वे श्वेतवस्त्र के धारक है और जिन कपी निवस्त्र होते है पर मैं कषाय से कलुपित हूँ अत काषाय वस्त्र धारण करुगा। १ (ब) नि४ि १६४१५५ १५ लोइ दियमुछा सजया उ अहय खुरेण ससिहा म । थूलगपाणिवहाओ रमण मे समा होउ ।। --आप नि गा ३५४ मा २३३॥ (स) अमी मुण्डा शिर केगलुन्बनेद्रियनिर्जय । अह पुनर्भाग्यामि भुरमुण्डशियाधर ॥ विपष्ठि १६१ १५ २८ निस्किपणा य समणा अक्षिणा मम किचरण होउ । सोलसुगया समणा मा सीलण दुग्गयो । -आवं नियुक्ति गा ३५५ (स) विपष्टि १५६४१६४१५१ २६ वगयमोहा रामणा मोहा धनस्स उत्तय होउ । अणुवाणहा य समणा मकतु उवाहणे हतु ॥ -आव नियुक्ति गा. ३५६ (ख) विष्टि १२ १५१ मुक्कदरा प समणा निरबरा मम पाउरसाइ । हाइमे पत्या परिहा मि कमायरलुसम -आरयर नियुक्ति गा १७ नीथर जीयम १२१ श्रमगा पापनीम और जीवों की पात करने वाले पारमादि गे गुक्त होते है । वे गचित्त जन्न का प्रयोग नहीं करते है । पर मै मा नहीं हैं, अन ग्नान नथा पीने के लिए परिगिन जल ग्रहण कम् गा।" इस प्रकार उमने अपनी कापना में परियास्पिन परिवाजना- परिधान या निर्माण किया और भगवान् कगाय ही ग्राम नगर श्रादि में विचग्ने लगा। भगवान् के यमर्गी में मरीचि की गृथप वेग- भूषा को निहारकर जन-जन के अन्तर्मानग मे कुतूहल उत्पन्न हाता । लोग जिज्ञागु बनार उगर पाग पहचत ।। मरीचि नगनी प्रकृष्ट प्रतिमा की नेजरिवना गे प्रतिबाध देकर उन्हे भगवान् के गिण्य बनाना " एक समय सम्राट् गरत ने भगवान् श्री ऋपभदेव के समक्ष (ग) त्रिपप्ठि० १५६४२११५०११ २११ रजतजयभी, যীশ্যাল जलारन। उगम पगिमिष्ण, जण दागा च पिजण च ।। -~-आवष्यक नि० गा०३१८ (ग) विपटि. ११५011 २१२ गय गा गटयमई जिगमरिगणियटम गि। -आर०नि० गा० ५६ (ग्य) पदमा पापयिन्त्र गर्गचिणि जगात्मन । -त्रिपण्ठि १।६।०३११११११ गागनगगगगई, बिहर गो गागिणा माद। -आवश्या नियुक्ति ३६०५० २३८ २१४ अहत पागधार दठ्ठ पुच्छर घहजणा पग्म । गद गर्दा तो गो निभान तररा परिवहणा ।। आवश्यक नियुक्ति गा० ३५९ २१५. धम्मपाहाबरियत उचट्ठिए देश भगभी मीम । ~आवश्यक नियुक्ति ३६० १२२ ऋषमन्व एक परिगोलन जिज्ञामा प्रस्तुत की कि प्रभो। क्या इस परिषद में ऐसा कोई व्यक्ति है जो आपके सहश ही भरत क्षन म तीर्थ कर बनेगा २॥ जिज्ञासा का समाधान करत हुए भगवान् न कहा-स्वाध्याय ध्यान से मात्मा को ध्याना हुआ तुम्हारा पुन मरीचि परिव्राजक वीर नामक अन्तिम तीयङ्कर वनगा। उससे पूर्व वह पातनपुरका अधिपति प्रिपृष्ठ वापुदेव होगा तथा विदेह सत्र की का नगरी में प्रियमित्र नामक चरवी होगा। इस प्रकार तीन विशिष्ट उपाधियो को वह अकेला ही प्राप्त करेगा।" २१६ पुणरवि अ समोपरणे पुन्छो जिण तु विकणो भर। अप्युदो अ दमारे नित्ययगे को इह भरहे ?॥ -आवश्यक नियुक्ति गा ३६७ (स) अ भणड नरवरिदो ताय । इमोसित्तिाइ परिसाए । अनोऽवि कावि होही भरहे वासम्मि तित्ययरो' -आवश्यक मूलमाष्य गा.॥ मल पृ० २४३ (ग) भगव । किमेत्य कोऽवि पाविस्सइ तित्यपरलाम । - महावीर परिय गुणयन्त्र गा १२४ २५ १८ तन्य मरीई नामा आपरिवायगो उमममत्ता। मन्मायकाणजुओ एगते मायद महप्पा ॥ व दाएह निणिन्दो एव नारदेण पुच्छिो सतो। पम्मवरपक्वही अपच्छिमी वीरनामुत्ति ॥ तभा-माइगर हमाराम सिविटछु नामेण पोषणाहिपई। पियमित्तचापट्टी मूआई विन्हवासम्मि॥ आवश्यक नि गा ४२२ से ४४ प २॥ (ख) ताहे कलियलिग मिरिह एगतसठिय भयव । दावा जह एस जिणो चरिमो होही गुह सुनोति ॥ एमोन्षिय गामागरनगरसमिस्स भारहस्स। सामी तिविठुनामो पडमो तह वासुदेवाण ।। एसो महाविदेहे पियमितो माम पकवट्टीवि । भूपाए नयरीए भविस्सई परमरिदिशुओ। ~महावीर रिय गा १९६ १९८५०१८॥
तीवर जीवा भगवान् श्री कृपददेव की भविष्य वागी को थवग्म कर मम्राट भरत भगवान् को वन्दन कर मरीचि परिवाजक के पाम पहुंचे, और भगवान की भविष्यवाणी को मुनाते हुए उससे कहा--ग्रयि मरीचि परित्राजक ' तुम अन्तिम तीयइर बनोग, ग्रन मैं तुम्हाग अभिनन्दन करता हूँ। तुम वासुदेव व चक्रवर्ती भी बनोगे।" यह सुनकर मरीचि के हृन त्री के तार भनझना उठे-~-मैं वासुदेव, चक्रवर्ती और तीर्थङ्कर बनूंगा। मेरे पिना चक्रवर्ती है, मेरे पितामह तोर्यङ्कर है और में अकेला ही नीन पदवियो को धारण करूगा १२२° मेरा कुल कितना उत्तम है । एक दिन मरीचि का स्वास्थ्य बिगड गया । मेवा करने वाले के प्रभाव मे मरीचि के मानस मे ये विचार उद्बुद्ध हुए कि मैने अनेको को उपदेश देकर भगवान् के शिष्य बनाये, पर आज मै स्वरा सेवा करने वाले मे वचित हूँ । अवम्बग्य होने पर मैं स्वयं अपना शिष्य (ग) त्रिपन्ठि ११६।३७२ स ३७८ पृ० १६० । २१८ नाविते पारिवज्ज वदामि अह उमन ने जम्म । ज होलिमि वित्थयगे उपच्छिमो तेण वदामि ।। ---आव०नि० गा० ४२८ प०२४४ (ख) महावीर चरिय गा० १२६ से १३६ ५० १६ । २१४ जइ बासुदेव पटमो मूआइ विदेह चक्कदृित्त । चरिमो तित्ययगरम होउ अल त्तिय मज्म ।। -आव०नि० गा०४३१ प०२४५ २२० अहह्य च दसाराण पिया मे चक्कवट्टिक्सस्स । अज्जो तित्ययराण अहो कुल उत्तम माझ॥ -आव.नि. गा०४३२।२४५ (प) यद्याद्यो वासुदेवाना विदेहेषु च चनाभृत् । अन्त्योऽहंन् भविताम्मीति पूणमेतावता मम ।। पितामहोऽहंतामाद्यश्चक्रिणा च पिता मम । दशाहर्हाणामह चेति श्रेछ कुलमहो मम ॥ -त्रिपष्ट्रि० १।६।२८६-३८७ १२४ ऋषभदेव एक परिशीलन वनाऊँगा ।२१ वह स्वस्थ हुआ। कपिल राजकुमार धम की जिज्ञासा से उसके पाम आया। उसने पाहती दीक्षा की प्रेरणा दी। कपिल ने प्रश्न क्यिा माप स्वय ग्राहत एम का पालन क्यो नही करते" उत्तर मे मरीचि ने कहा- मै उसे पालन करने मे ममर्थ नहीं हूँ। कपिल ने पुन प्रश्न किया-क्या आप जिस माग का अनुसरण कर रहे है उसम धम नहा है इस प्रश्न ने मरीचि के मानस मे तूफान पदा कर दिया और उसने कहा- यहां पर भी वही है जो जिन धर्म में है। २२२ कपिल उसी का गिाय वना । २२० अन्पदा म ग्लान सवृत्त सायदोऽप्यसयतत्त्वान्न प्रतिजाप्रति । स चिन्तयति-निष्टितार्या खल्वेने नासयतस्य कुन्ति नापि ममनान कारयितु युयते तस्मात्कचन प्रतिजागरक दीक्षयामीति । --भाव मल वृप २४७१ (प) विपष्ठि १।६।२९-३२ पृ १५ । (ग) महावीर चरिय गुण ६।२९-३२ अपगतरोगस्य च कपिलो नाम राजपुनो धम्मशुम पमा सदन्तिकमागत इति कथिते साधुधम्म स आह-बद्यय मार्ग किमिति भवततबङ्गीकृत ? मगैचिरा-पापोऽह लोए इदिये त्यादि विभाषा पूषवत् कपिलाऽपि कर्मादयान साधुधानभिमुख खस्वाह- तयापि कि भवद्दर्शने नास्त्येव धर्म इति । मरीपिरपि प्रजुरका सवय न तीर्थकरोक्त प्रतिपद्मने बर मे सहाय सवृत्त इति सञ्चिन्याह-कपिला एत्य पि ति -आवश्यक नियुक्ति मलप धृ ५०२४७१ (ब) मरीचिमाययो मूय स इयूच च कितव' पोऽपि सोऽपि न धर्मोऽस्ति निधर्म किंवत भवेद' -त्रिषष्ठि ११६४५ (ग) रविलण बत्त-मयय तुम्ह सतिए एत्य बहावि अस्थि कि पि गिजराठाए न वा मिरिहणा मणिय-भद्द । समणषम्मे बाव अस्थि इहावि भणाग ति । महावीर परिय गुण प २२ तीबंपर जीवन १२५ दिगम्बगचार्ग जिनगेन और प्राचार्य मकल कीनि के मन्नव्या- नुसार जिन चार महन राजानो ने भगवान् से गाय दीक्षा ग्रहगा की थी, उन गाथ ही मरीचि ने भी दीक्षा ली थी। और वह भी उन गणाग्रो के समान ही क्षधा-पिपामा ग व्याकुल हाकर पग्विाजक हा गया था ।५८ गरीचि के अतिरिक्त मी परिवाजका के प्रागध्यदेव श्री अपमदेव ही थे ।" भगवान् को कवल ज्ञान हाने पर मरीचि का का छोटकर अन्य गभी भ्रष्ट बने हुए गावक नयी का यथार्थ म्वाप गमभार पुन दीक्षित बने । ६ जेन गाहित्य की दृष्टि गे मर्गति 'ग्रादि पग्विाजक' था।' -- (1) गेनोपटियरमा पिता । यति सपि । -जावश्यनि. गा०८५० २२३ (पा) पितागहमन्त्यागे गया गुणमनिन । गर्जाभ गह पच्छाय परित्यक्तपरिग्रह ।। --उत्तरगण, श्ला० ७२ ग०५४, पृ०८६ (ग) महावीर पुगणनाधाय गकल कीनि । २२४ मरीचिपच गुगेनप्ता, पग्विाड्भूयगायित । मिथ्या ववृद्धिमयागर अपगिद्धान्तमापित ॥ -गसपुगण जिन० ५० १८, ला० ६१ पृ. ४०३ २२५ न देयतान्तर तेषाम् आसीन्मुयत्या स्वयभुवम् । -मा० जिन १८१६०४०२ २२६. गरीचिवा राबपि तापसारतपशि ग्यिता । भट्टारकान्ते सम्युय य महाप्राप्राज्यमारिधता ॥ -महापुगण जिन० २४१८२१५६२ २२७. पाशस भगवानव, य एप तय नन्दन । गरीचिनांमधयन परिग्राजा आदिम ॥ ---निष्ठि० श६।३७३ (ल) अदीक्षयम् ग कपिल, रगलाय पकार च । परियाजकमावण्ड, सत प्रभृति पाउगवत् ।। -त्रिपटि० १६५२ - १२६ ऋषभरेव एक परिचालन कपिल जसे गिप्य को प्राप्तकर उसका उत्साह बढ गया । उमने तथा उसके शिष्य कपिल ने योगशास्त्र और साख्य शास्त्र का प्रवतन किया। मराचि और कपिल का वणन जैसा जन साहित्य में उसित है बमा भागवत आदि वदिक साहित्य म नहीं। जहाँ जन साहित्य में मरीचि को भारत का पुन माना है वहा भागवत्तकार ने भरत की वा परम्परा का वणन करते हुए उसे अनक पीढियो क पश्चान सम्रार का पुत्र बताया है नथा उसकी मां का नाम उत्कला दिया है। जन माहिन्य म कपिल को राजपुत्र बनाया है और वदिक साहित्य में उसे कदम ऋपि का पुत्र बताया है। साथ ही उहे विष्णु का पांचवा प्रवनार भी माना ह। जर कपिल क्दम ऋषि के यहाँ जम ग्रहण करता है तव ब्रह्मा जी मरीचि आदि मुनियो के साथ कदम के प्राथम म २२८ (क) स प्राग्जमावधवा मोहादम्पेत्य भूतल । स्वय सास्यमतमामूर्यादीनबोषयत् ॥ सदाम्नायवित्र सास्य प्रावर्तत व दशनम्। सुखसाध्ये हनुष्ठाने प्रायो लोक प्रवत्तते ।। त्रिपष्ठि ११७३-७४ (ख) तदुपाममूर मागशास्त्र तर कापिलम् । येनाय मोहितो लोक सम्यग्ज्ञानपराइमुख ।। --महापुराण १९।२।४ ३ २२६ वत उस्कलाया मरीचिमरोचविट -भागवत ॥१५॥१५॥६६ २३ पचम कपिला नाम सिश कानविप्नम् । प्रोवाचासुरय साक्ष्य तत्वप्रामविनिणयम् ॥ भागवत स्कन्ध १ प्र में श्ला १५६ ।
तीर्थङ्कर जीवन १२९ पहुंचते है २3 और यह प्रेरणा देते है कि वे अपनी कन्याएँ मरीचि आदि मुनियो को समर्पित करे ।२३२ ब्रह्मा की प्रेरणा से कर्दम ऋषि ने 'कला' नामक कन्या का मरीचि के साथ पाणिग्रहण करवाया।93 इस प्रकार स्पष्ट है कि मरीचि कपिल के बहनोई ये। पर प्रश्न है कि भागवतकार ने एक ओर ऋषभ को पाठवाँ अवतार माना है और कपिल को पाँचवाँ और कपिल तथा मरीचि का समय एक ही बताया गया है। श्रीमद्भागवत की दृष्टि से मरीचि भरत की अनेक पीढियो के वाद आते हैं तो पूर्व में होने वाले को पाठवाँ अवतार और पश्चान् होने वाले को पाँचवाँ अवतार कैसे माना गया। हमारी दृष्टि से भागवत में अवतारी का जो निरूपण किया गया है, वह न क्रमबद्ध है और न सगत ही है । जैन-साहित्य मे मरीचि परिवाणीक के प्राचारशैथिल्य का वर्णन तो है, पर भागवत की तरह उनके विवाह का उल्लेख नहीं है। वैदिक साहित्य के परिशीलन से यह भी ज्ञात होता है कि मरीचि श्री ऋषभ के अनुयायी थे- ऋग्वेद में काश्यपगोत्री ति २३१ तत्कर्दमाश्रमपद सरस्वत्या भधितम् । स्वयम्भू साकमृपिभिर्मरीच्यादि रभ्ययात् ।। श्रीमद्भागवत ३/०२४, श्लो० ६ पृ. ३१५ २३२ अतस्त्वमृषिमुख्येभ्यो यथाशील यात्रि। आत्मजा परिदेवध विस्तृणीहि शो मुधि ।। -भागवत ३।२४।१५।३१६ २३३ गते शतधृती क्षत्त कर्दमस्तेन चोदित । ययोदित स्वहित प्रादाद्विश्वसतत ।। प्रादादन मियालये। थवाङ्गिरसेऽयच्छत्पुलस्त्याय स्वभुवम् ।। +भागवत ३।२४।२१-२२२३१७ २३४ मरीचये कला १२१८ अपमदेव एक परिचालन मरीचिपुत्र ने अग्निदेव के प्रतीक के रूप मे जो ऋषभदेव की स्तुति की है वह हमारे मन्तत्यानुसार वही मरीचि है जिनका प्रस्तुत इतिवृत्त से सम्बध है। सुन्दरी का सयम भगवान् थी ऋपभ के प्रथम प्रवचन को श्रवण कर ही सुदरी सयम ग्रहण करना चाहती थी। उसने यह भव्य भावना अभिव्यक्त भी की थी किन्तु सम्राट मरत के द्वारा माज्ञा प्राप्त न होने से वह श्राविका बनी। परन्तु उसके अन्तर्मानस मे वैराग्य का पयोधि उछाले मार रहा था वह तन से गृहस्थाथम म थी किन्तु उसका मन सयम म रम रहा था। पट् खण्ड पर विजय वजयन्ती फहराकर और सम्पूर्ण भारतवप को एक प्रखण्ड शासन प्रदान कर जब सम्राट भरत दीर्घकाल के पश्चात् विनीता लौटे तब सुदरी के कृश तनु को देखकर वे चकित रह गये। २३५ सुन्दरी पब्बयती भरहेण इत्थीरमण भविस्सइत्ति निरुद्धा साविया जाया। -आवश्यक मलयगिराय वृत्ति पू ५२६ (ख) विमुक्ता बाहाता जिक्ष सुन्दरी व्रतम् । भरतेन निषिता बाविका प्रपमाऽभवत ॥ -त्रिषष्ठि प १.स १६५१ (ग) कल्प सुबोधिका टो पृ ५१२ सारा न । (प) कमलतासमयसार पृ २७। (3) क्सन म कलिका पूरे १५ ॥ एव जाहे वारस बरिमाणि महारायामिसेगो बतो रामाणो विसजिता वाहे णियगवगे। सारिउमारखो वाहे वारजति सब्वे पिंपलगा एव परिवाहिद सुपरी दाइता सा पडल्सुइत' सा य जदिवस स्दा पेय हो(वसमारसा व आयविलागि व पासित्ता रद्दो वे कोड बि भात --आवश्यक ड्रॉण ।
१ अपमय एक परिशीलन सम्राट् मरत ने मुरी से पूछा-सुन्दरी तुम सयम लना चाहती हो या गृहस्थाश्रम में रहना चाहती हो । सुन्दरी ने सयम की भावना अभिव्यक्त की। सम्राट भरत की माता से सुदरी ने श्री रुपमदेव की प्रानानुयतिनी ब्राह्मी के पास दीक्षा ली।' प्रस्तुत प्रसग पर सहज ही ऋग्वेद के यमी सूक्त की स्मृति हो पाती है। भाई यम स भगिनी यमी ने वरण करने की अभ्यथना की पर प्राता यम भगिनी की बात को स्वीकारता नही है । जबकि यहाँ भ्राता की अभ्यथना बहन ठुकराती है। आचार्य जिनसेन के अभिमतानुसार सुदरी ने प्रथम प्रवचन को श्रवण कर ब्राह्मी के साथ ही दीक्षा ग्रहण की थी। अठानवे भ्राताओं को दीक्षा) यह बताया जा चुका है कि श्री ऋषभदेव अपने सौ पुत्रो को पृपक् पृथक राज्य देकर श्रमण बने था सन्नाट भरत चक्रवर्ती बनना चाहते तथा यदेव देवन प्रजन्ती न्यपिध्यत । तत प्रभृत्यमो तस्यौ त सयनव हि ॥ १ -त्रिषष्ठि १४/७४५-७४६ (ख) तेहि सिद्ध बहा गाविण पारेनि ताह तस्स पयगुरागो जाओ। -आवरमा पूणि पृ २६ भणति-बदितात भजसित पव्ययतु अह भोगट्ठी वा अच्छतु साहे पासु परिता विविश्या । -आवश्यकणि पृ २६ (ख) साय भगिया पहचनि, तो भए सम भोग मुजाहि वि तो पब्वयाहित्ति । ताहे पाएमु पडिया वि िनया पन्वइया । +आवश्यक सूत्र मल वृत्ति पृ २५१ देन भने चिन्तन म ऋषभरेष अने तेमना परिवार -पृ.१६२७५ सुबलालजी मुन्दरी चाननिदरा ता ब्राह्मीमन्यदीक्षित । - महापुराणे पव को १७ ५६९ तीगंबर जीयर थे, अत पटयण को तो उन्होने जीत लिया था, पर अभी तक अपने धातायो को अपना प्राज्ञानुवर्ती नहीं बना पाय ये , एतदर्थ अपने लघु भ्रातागो को अपने अधीन करने के लिए उन्होने दूत प्रेपित किया। पठानवे भ्रातायो ने मिलकर इस विषय में परपर परामग किया, परन्तु वे निर्णय पर नहीं पहुंच सके।" उग गगय भगवान् श्री अपभदेव अष्टापद पर्वत पर विचर रहे थे। वे गभी भगवान् पहुँचे । रियनि का परिचय कराते हुए नम्र निवेदन किया-प्रभो । पाग २४१ २४२ अनया भरडा गि भातृगाण पत्थवनि, जहा गम रज आयाणह, -बापण्यकर्माण, पृ० २०९ (ग) जनगा भरही तगि भाउयाण य पट्ठवेर, जहा-मम रज्ज गायाणा, -आयपया गल०, २३१११ (ग) प्राहिणात्य निगृष्टार्थान् दूनाननुजमनिधिम् । - मापुगण जिन० ३८1८९१५६ ते भरणनि-अम्हायि रण तापण दिएण, तुम्भति, तु ताय ताओ गुचिन्जिहिति, ज गिरिति न गेलागो, - बावश्या गन० वृत्तिः पृ० २३१११ (प) ते भगति-अरवि रज ताहि दिन तुभाषि, तु ता तातो तार पुछिजिहित्ति, ज णिहीत्ति त हामी। -~-आवश्यपाणि, पृ० २०६ (ग) प्रत्यक्षो गुगरगान प्रतपस्या विपदक | गन प्रमाणपपर्य सद्वितीमिद हिन । राधा गुस्मानामा तामा न परिणो क्यम् । न देय भररोगेन नादेयगित जिन || --महागुगण, जिन ३४।६३-६४१५९ आवश्यक पूणि पृ.२०६। (ख) तेण रामएण भयव अढाक्यमागओ चिरमाणो तस्थ राख्ने रागोमग्यिा -आवश्यक मन वृत्ति, पृ० २३१।१ युगारा।
१३२ ऋपभदब एक परिशीलन आपके द्वारा प्रदत्त राज्य पर भाई भरत ललचा रहा है। वह हम से राज्य छीनना चाहता है। क्या बिना युद्ध किये हम उसे राज्य दे देवें। यदि हम देते हैं तो उसकी साम्राज्य लिप्सा बढ जायेगी भोर हम पगधीनता के पक मे डूब जायेगे । भगवन् । श्या निवेदन कर भरतेश्वर को स्वय के राज्य से सन्तोप नही हुमा तो उसने अन्य राज्यो को अपने अधीन किया किन्तु उसकी तृष्णा वडवाग्नि की तरह शान्त नहीं हो रही है । वह हमे आह्वान करता है कि या तो तुम मेरी अधीनता स्वीकार करो या युद्ध के लिए सन्नड हो जायो। भापती के द्वारा दिये गये राज्य को हम क्लीब की तरह उसे से अर्पित कर ८ जिसे स्वाभिमान प्रिय नही है वही दूसरो की गुलामी करता है। और यदि हम राज्य के लिए अपने ज्येष्ठ भ्राता से युद्ध करते हैं तो भ्रातृ-युद्ध की एक अनुचित परम्परा का थीए।श हो जाता है मत आप ही बताए हमे क्या करना चाहिए २५ (ग) ते दूतानभिधायब त वाऽप्टापदाचल । स्थित समवसरणे वृषभस्वामिन ययु ॥ -त्रिपफि १४८८ m साहे भएति-तु भेहि दिणाति रजाइ हरति भाया। -भाव मल २१॥ (ब) तदानि तातगर्न सविमा य पृथक-पृथक । देशराज्यानि दत्तानि यथाह भरतस्य च ।। तरेव राज्य सन्तुष्टास्तिष्ठामो विष्टपेश्वर । विनीतानाममा या हि मर्यादा स्वामिदर्शिता ॥ -त्रिपष्ठि ११-८२ २४५. (क) तो कि रेमो कि जुमामो उदाह धामाणामो' -आवश्यक मल २३१ (ख) आवश्यपणि प २६॥ (ग) स्दरायेनाऽन्यराग्याचाऽपहतर्भरतश्वर नसतुष्यसि भगवन् । पटवाग्निरिवाऽम्बुभि ।। आचिन्दै प्रयाऽ थपा रा यानि पृथिवीभुजाम् । अस्मानमपि मरतस्तादाच्छतुमिच्छति ॥
१३४ ऋषभदेव एक परिशीलन सुखों से प्राध्यात्मिक सुख विशेष है। इसे ग्रहण करो, इसमे न कायरता की आवश्यकता है और न युद्ध का ही प्रसग है। मूख लकडहारे का रूपक देते हुए भगवान् ने कहा--एक लकडहारा था वह भाग्यहीन और अज्ञ था। प्रतिदिन कोयले बनाने के लिए वह जगल मे जाता और जो कुछ भी प्राप्त होता उससे अपना भरण पोपण करता। एक बार वह भीष्म-ग्रीष्म की चिल चिलाती धूप मे थोडा-सा पानी लकर जगल मे गया। सूखी लकडियां एकत्रित की। कोयल बनाने के लिए न लकडियो मे भाग लगादी। चिलचिलाती धूप प्रचण्ड ज्वाला तथा गम लू के कारण उसे अत्यधिक प्यास लगी। साथ म जो पानी लाया था वह पी गया पर प्यास शान्त न हुई। इधर उधर जगर मे पानी की प्रवेषणा की पर कही भी पानी उपलब्ध नहीं हुमा । सन्निकट कोई गाँव भी नहीं था प्यास से गला सूख रहा था घवराहट बह रही थी। वह एक वृक्ष २७ भगवती १४ उद.१। २४८ साहे वगालदाहगविट्ठत कहति जहा एगो गालदाहगा सो एग भायण पाणियस्स भरेऊण गतो त तण उदग णिवित उरि आदिच्चो पासे भग्गी पुणो परिस्समो दारगाणि को१तस्स पर गतो तत्य पाणित पीतो एव बस भावपट्टवणाए पूषतलागणविदहसमुद्दा य सब पाता ण य सहा छिमति ताहे एगमि तच्छकुहितविरस पाणिए जुन्नपूवनिरिहे तणपूसित गहाय उस्सिपति ज परितसैसस पोहाए तिहति से फेस ए एव तन्भेहिवि अपतर सम्बट्ट अत्तरा सब्वेऽवि सम्पलोए सहफरिसा अणुभूतपुर्ववा तहमि तिति ग गता घोण इमे माणुस्सए मसुइए तुम्चे अप्पकालिए विरसे कामभोगे अभिलसह एव क्यालीय पाम अग्मायणं भासति सबुझ किन्न मह" -यावश्यकणि गिनदास पू२१-२१ (ख) आवश्यक मलयगिरि वृत्ति । 1) नायक रिमनीया वृति।
नीयट्वर जीवन के नीचे लेट गया, नीद आगई। उसने स्वप्न देखा कि वह घर पहुँच गया है। घर पर जितना भी पानी है, पी गया है, नथापि प्यास शान्त नहीं हुई । कुए पर गया और वहाँ का माग पानी पी गया। पर प्यास नही बुझी। नदी, नाले और ब्रहो का पानी पीता हुआ ममुद्र पर पहुँचा, ममुद्र का सारा पानी पी लेने पर भी उमकी प्याम कम नही हुई । तब वह एक पानी मे रहिन जीणं कूप के पास पहुँचा । वहा पानी तो नही या, किन्तु भीगे हुए तिनको को देखकर मन ललचाया और उन निनको को निचोड कर प्यास बुझाने का प्रयास कर रहा था कि नीद खुल रई। स्पक का उपमहार करते हुए भगवान् ने कहा- क्या पुत्रो । उन भीगे हुए तिनको मे उम लकडहारे की प्यास शान्त हो सकती है। जबकि कुए, नदी, द्रह, तालाब और समुद्र के पानी से नहीं हुई थी। पुत्रो ने एक स्वर से कहा--नही भगवन् । कदापि नहीं । भगवान ने उन्हे अपने अभिमत की ओर आकृष्ट करते हुए कहा-~~ पुत्रो राज्यश्री से तृष्णा को गात करने का प्रयाम भी भीगे हुए तिनको को निचोडकर पीने से प्यास बुझाने के प्रयास के समान है । दीर्घकालीन अपार स्वर्गीय सुखो से भी जव तृष्णा शान्त नहीं हुई तो इस तुच्छ और अल्पकालीन राज्य से कैसे हो सकती है। अत सम्बोधि को प्राप्त करो। वस्तुन जब तक स्वराज्य नही मिलता तब तक परराज्य की कामना रहती है। स्वराज्य मिलने पर परराज्य का मोह नही रह जाता। भगवान् ने उम ममय अपने पुत्रो को वैराग्यवर्द्धक एवं प्रभाव- जनक जो उपदेश दिया था, वह सूत्रकृताग सूत्र के प्रथम यु तस्कध के द्वितीय 'वैतालीय' नामक अध्ययन में उल्लिखित है । जिनदास महत्तर के उल्लेख से स्पष्ट है कि यह अध्ययन भगवान् के उसी उपदेश के आधार पर प्रवृत्त हुआ है। उस उपदेश मे बतलाया गया है कि - 'मानव को शीघ्र-से-शीघ्र प्रतिबोध लाभ करना चाहिए, क्योकि व्यतीत समय लौटकर नहीं पाता और पुन मनुष्यभव सुलभ नहीं है। प्राप्त जीवन का भी कोई ठिकाना नही । बालक, वृद्ध यहाँ तक कि गर्भस्य मनुष्य भी मृत्यु के शिकार हो ऋषभदेव एक परिशीलन जाते है । जगत् का उत्कृष्ट से उत्कृष्ट वभव भी मृत्यु का निवारण करने में समय नही है। यही कारण है कि देव दानव गंधव भूमिचर सरीसप राजा और बडे-बडे सेठ साहूकार भी दुख के साथ अपने स्थान से च्युत होते देखे जाते है । बधन से च्युत ताल फल के समान मायु के टूटने पर जीव मृत्यु को प्राप्त होते है इत्यादि । वस्तुत यह सम्पूण अध्ययन अतीव मार्मिक और विस्तृत है। मुमुक्षजनो के लिए मननीय है। भागवतकार ने भी भगवान् के पुत्रोपदेश का वणन दिया है जिसका सार इस प्रकार है-पुत्रो । मानवशरीर दुखमय विषयभोग प्राप्त करने के लिए नहीं है। ये भोग तो विष्टाभोजी कूकरपूवरादि को भी प्राप्त होते है अत इस शरीर से दिव्य तप करना चाहिए क्योकि इसी से परमात्मनत्व की प्राप्ति होती है। प्रमाद के वश मानव कुकम करने को प्रवृत होता है। वह इन्द्रियो को तृप्त करने के लिए प्रवृत्ति करता है पर मैं उसे बछ नही समझता क्योकि उसी से दुख प्राप्त होता है। जब तक आत्मतत्त्व की जिज्ञासा नही होती तव तक स्वस्वरूप के दशन नही होते वह विकार और वासना के दलदल में फंसा रहता है और उसी से बन्धन की प्राप्ति होती है । २४९ २५ नाय देहो देहभाना मुलोक कप्टान् कामामहंत विभुजा थे। तपो दिव्य पुत्रका येन सत्व शुद्ध येवस्मात् ब्रह्मसोम त्वनन्तम् ॥ -श्रीमद् भागवत ॥५॥१२५५९ प्रमत्त कुरते विकर्म यदिन्द्रियप्रीतय पृणोति । न साधु मन्ये यत मारमनोऽम- मसन्नपि लेगद भास देह ॥ -थोमद भागवत AM|५५६ पराभवातावबोष-बातो पावन विकासत भामतत्वम् । २५१ तीयंदर जीवन इस प्रकार अविद्या के द्वारा प्रात्म-स्वरूप नाच्छन्न होने से कर्मवामनायो से वशीभूत बना हुअा चित्त मानव को फिर कर्म मे प्रवृत्त करता है । अत जब तक मुझ परमात्मा मे प्रीति नहीं होती तब तक देहबन्धन से मुक्ति नहीं मिलती।" स्वार्य में उन्मत्त बना जीव जब तक विवेकदृष्टि का पाश्रय लेकर इन्द्रियो की चेप्टाम्रो को अयथार्थ रूप मे नही देखता है, तब तक आत्मस्वरूप विस्मृत होने में बह गृह आदि में ही ग्रामक्त रहता है और विविध प्रकार के क्लेश उठाता है। इस प्रकार भगवान् की दिव्य देशना मे राज्य-त्याग की वात को सुनकर वे सभी अवाक रह गये, पर शीघ्र ही उन्होंने भगवान् के प्रशस्त पथप्रदर्शन का स्वागत किया। अठानवे ही भ्रातानो ने राज्य त्यागकर सयम ग्रहण किया।२१८ - यावलिकयास्तावदिद मनो , कर्मात्मक येन शरीरवन्ध । -भागवत ५॥५॥५॥५६० २५२ एव मन कर्मघा प्रयुडक्ते, अविद्ययाऽऽत्मन्युपधीयमाने प्रीतिनं यावन्मयि वासुदेवे, न मुध्यते देहयोगेन तावत् ।। -भागवत ५।५।६५६० २५३. यदा न पश्यत्ययया गुणेहा, स्वार्थे प्रमत्त सहसा विपश्चित् । गतस्मृतिविन्दति तत्र तापा- नासाथ मथुन्यमगारमज्ञ ॥ -भागवत ५।५७५६० २५४. (फ) एव अट्ठाणउईए वित्तेहि अट्ठाणउई कुमारा पन्चइता । --आवश्यक चूणि (ख) एव अट्टाणउईवित्तहि अट्ठाणउई कुमाग पव्वइयत्ति । -आवश्यक मल० वृ०प० २३१ ऋषभदेव एक परिचालन सम्राट् भरत को यह सूचना मिली तो वह दौडा-दौडा पाया। भ्रातृ प्रेम से उसकी मॉख गोली हो गई। पर उसकी गीली मोखे अठानव भ्रातामो को पथ से विचलित नहीं कर सकी। भरत निराश होकर पुन पर लौट गया।२५५ २ ॥ भरत और बाहुबली भरत समग्र भारत मे यद्यपि एक शासनत के द्वारा एक प्रखण्ड भारतीय संस्कृति की स्थापना करन क लिए प्रयत्नशील थे मगर दूसरो को स्वत शता को सीमित किये बिना उनका उद्दश्य पूरा नहीं हो सकना था। ६८ भाइयो के दीक्षित होने से यद्यपि उनका पथ निष्कण्टक बन गया था तथापि एक बड़ी बाधा अब भी उनके सामने थी। वह थी बाहुबलो को अपना माज्ञानुवर्ती बनाना। इसके लिए उसने अब अपने लघु भ्राता बाहुबली को यह स देश पहुंचाया (ग) अमदानानि स्य-वनिर्वाणप्राप्तिकारणम् । वत्सा 1 सयमराज्य तद युज्यते वो विकिनाम् ।। तत्कालोपन्नसवेगवेगा भगवदन्तिके। तेऽप्टानवतिरप्याशु प्रद्रज्या जगृहुस्तत ॥ -त्रिपष्ठि १४ix-४५ १० ११० (घ) इत्याकण्य विमोक्मि पर निवदमागवा । महाप्रावाज्यमास्थाय निष्क्रान्तास्ते गृहाहनम् ॥ -महापुराण ३४।१२।१६२ २५५-२५६ भाणवण भाउआण समुसरणे पुर दिद्वन्तो। -आव निगा ३४८ (स) जति भातरो म इच्छति तो भोग देमि भगव च मागसो ताहे भाइए भोहि निमतेति ते गति बत असितु । -आवश्यक पूणि पृ २१२ (ग) भरसोऽपि भानुप्रत्र यावरणनात् सन्जातमनस्तापोऽति पत्र पदाविद्रोगादीन् दीयमानान् पुनरपि प्रहन्तीत्यालोच्च भगव समीप चागम्म निमत्रयश्च तान् । -आवश्यक मम दृ ५ २३५ (घ) त्रिषष्ठि १६१६ -10 तोयङ्कर जीवन कि वह अधीनता स्वीकार करले। ज्योही भरत का यह सन्देश सुना, त्योही बाहुबली की भृकुटि तन गई। उपशान्त क्रोध उभर याया। दाँतो को पीमते हुए उसने कहा-"क्या भाई भग्त की भूप अभी तक शान्न नहीं हुई है ? अपने लघु भ्रानायो के गज्य को छीन करके भी उमे मनोप नहीं हुआ है। क्या वह मेरे गज्य को भी हड़पना चाहता है। यदि वह यह समझता है कि में शक्तिशाली हूँ और शक्ति में सभी को चट कर जाऊंगा तो यह शक्ति का सदुपयोग नही, दुरपयोग है । मानवता का भयङ्कर अपमान है और व्यवस्था का अतिक्रमण है। हमारे पूज्य पिता व्यवस्था के निर्माना है और हम उनके पुत्र होकर व्यवस्था को मग करते है । यह हमारे लिए उचित नहीं है। वाहु-बल की दृष्टि से मैं भरत से किमी प्रकार कम नही हूँ 1 यदि वह अपने वडप्पन को विस्मृत कर अनुचित व्यवहार करता है में चुप्पी नही साध सकता। मै दिखा दूंगा भरत को कि आक्रमण करना कितना अनुचित है । जब तक वह मुझे नही जीनता तव तक विजेता नही है ।२५७ भरत विराट् सेना लेकर वाहुवली से युद्ध करने के लिए "बहली देश" की सीमा पर पहुँच गये। वाहुवली भी अपनी छोटी सेना सजा- कर युद्ध के मैदान मे आगया। वाहुवली के वीर सैनिको ने भरत की २५७ जाहे ते सव्वे पब्वइता ताहे भरहेण बाहुबलिस्म पत्थवित, ताहे सो ते पब्बइते सोऊण आसुरत्तो भणति--ते वाला तुमे पब्वाविता, अह पुण जुद्धसमत्यो। कि वा मममि अजिने तुमे जित तिता एहि अह वा राया तुम वा । -आवश्यक चूणि, पृ० २१० (ख) कुमारसु पब्वइएसु भरहेण याहुबलिगो दूओ पेसिओ, सो ते पन्चइए सोर आसुरुत्तो, ते बाला तुमए पव्वालिया। -आवश्यक मल० वृ०प० २३१ हृत्वाऽनुजामा राज्यानि, नूनमेप न लज्जित । जितकासी राज्यकृत, मामप्याह्वयते यत ।। -निपष्ठि०११५२४६७ ऋषभदेव एक परिशीलन विराट् सेना के छक्के छुड़ा दिये । लम्बे समय तक युद्ध चलता रहा, पर न भरत ही जीते और न बाहुबली ही। अन्त मे बाहुबली के कहने र निणय किया कि व्यय ही मानवो का रक्तपात करना अनुचित है क्यो न हम दोनो मिलकर युद्ध करल २५० दिगम्बराचार्ग जिनसेन ने दोनो भाइयो के जलयुद्ध दृष्टियुद्ध और वाहयुद्ध इन तीन युद्धो का निरूपण किया है ।२५१ भाचार्ग जिनदास गणिमहत्तर ने दृष्टि युद्ध वाग युद्ध बाहु युद्ध और मुष्टि युद्ध का प्ररूपण किया है। उपाध्याय श्री विनय विजय जी ने दृष्टि युद्ध वाग् युद्ध, मुष्टि युद्ध दण्ड युद्ध इन चार युखो का निर्देश किया है।" आवश्यक भाष्यकार, तथा भाचार्ग हेमचन्द्र ५७ २ थ २५ वाहे से सम्बबलेण दावि देसते मिलिया वाहे बाहुबलिणा भणित- कि अणवराहिणा लोगण मारिएण 'तुम अह च दुपगा जुझामो एव होउति। -आवश्यक चूणि पृ २१ २५६ जनप्टिनियुद्ध पु योऽनयोजयमाप्स्यति । स जयधीविलासिन्या पतिरस्तु स्वयवृत ॥ -महापराण ३३४।२द्वि भा तेसि पढम दिद्विजुट जात सत्य भरहो पराजितो । पन्छा बायाए, तहिपि भरहो पराजितो एवं बाहजुर ऽवि पराजितो साहे मुद्विजुद्ध जात तत्पवि पराजितो । -आवश्यक णि पृ २१ २९१ कल्पमूत्र सुबोधिका टीका पृ ५१३ सारा न २६२ परम विट्ठीबुड बायाजुद्ध तहेव वाहाहि । मुद्रीहि य दोहि व सम्वत्यवि निप्पए भरहो । -बावश्यक माप्य गा ३२ विष्टि पर्व १ सर्ग ५ गोदर जीवन समयसुन्दर ४ प्रभृति ने दृष्टि युद्ध, वायुद्ध, वायुद्ध, मुष्टि युद्ध और दण्डयुद्ध इन पांच का वर्णन किया है। सभी में सम्राट भरत पराजित हुए और वाहुक्ली विजयी हुए। भरत को अपने लघु भ्रातासे पराजित होना अत्यधिया अवग। पावेश मे पाकर और मर्यादा को विस्मृत कर बाहुवली के शिरच्छेदन करने हेतु भरन ने चक्र का प्रयोग किया । यह देख बाहुबली का खून उबल गया । वाहुबली ने उछलकर चक्र को पकडना चाहा, पर चक्र बाहुबली की प्रदक्षिणा कर पुन भरत के पास लौट गया । वाहुवली का वाल भी वॉका न हुमा।" यह देख सभी सन्न २६४ पचयुद्धानि स्थापितानि (१) टियुद्ध, (२) वाग्युद्ध, (३) बाहुयुद्ध, (४) मुष्टियुद्ध, (५) दण्ड युद्धानि । एतै पञ्चयुद्ध योजित स जितो ज्ञेय । -रल्पलता- समयसुन्दर पृ० २१० (ख) कल्पार्थ बोधिनी पृ० १५१ । () पल्प म पलिका पृ० १५० । २६५. सो एव जिप्पमाणो बिहुरो अह नरवई विचितेद । कि भन्ने एस चक्की ? जह दणि दुब्बलो अहय ।। -आवश्यक भाप्य गा०३३ (स) ताह सो एष जिब्वगाणो विधुरी अह गरवती विचितेति कि मन्ने एस चक्की जह दाणि दुचलो अहय, तम्सेव सफप्पे देवता आउह देति डडग्यण, ताहे मा नेण गहितेण धावति । -~~-आवश्यक चूणि० २१० (ग) धान्धेन तदा द ये, पतु मम्य पराजयम् । चनामुत्कृतनिशेपद्विपच्चन निगीशिना ॥ आध्यानमात्रमेत्याराद् अद कृत्वा प्रदक्षिणाम् । अवध्यरयास्य पर्यन्त तस्थौ मन्दीकृतातपम् ।। -महापुराण, पर्व ३६, श्लो० ६५-६६ भा० २ पृ० २०५ विमृशतस्तक्षशिलाभतु रुपेत्य तत् । चमा प्रदक्षिणा चक्रमन्तेवासी गुरोरिव ।। न चया चक्रिण शक्त, सामान्येऽपि स्वगोत्र । वियोपस्तु चरमशरीरे नरि तादृशे ॥ -निपष्ठि० ११५७२२१७२३ २६६. एव ऋपमन्व एक परिशीलन रह गये । बाहुबली को विरुदावली से भू-नभ गूंज उठा। भरत अपने दुष्कृत्य पर लज्जित हो गये। इस घटना से त्रद्ध हो बाहुबली ने भरत पर प्रहार करने के लिए अपनी प्रवर मुटठी उठाई। उस देख लाखो कण्ठो से ये स्वर लहरियां फूट पड़ा-सम्रा भरल ने भूल की है पर आप भूल न कर । लघु भाई के द्वारा बडे भाई की हत्या भनुचित ही नही अत्यन्त अनुचित है।" महान् पिता के पुत्र भी महान होते है । क्षमा कीजिये क्षमा करने वाला कभी छोटा नहीं होता। बाहुबली का गेप कम हुआ। उठा हुआ हाथ भगत पर न पडकर स्वय के सिर पर गिरा । वे सुचन कर श्रमण बन गये। राज्य को ठुकराकर पिता के चरण चिह्नो पर चल पडे ॥२॥ सफलता नही मिली बाहुबली के पर चलते-चलते रुक गये । वे पिता श्री के शरण में पहुंचने पर भी चरण मे नही पहुँच सके । पूव दीक्षित लघु भावामो को २६७ भरतस्त तथा दृष्ट्वा विचार्य स्व कुकर्म च । बभूव न्ययितीवो विविक्षरिव मेदिनीम् ॥ -त्रिषष्ठि १४७४६ २६८ अमर्याम्चिन्तयित्वद सुनन्दानन्दना रखाम् । मुष्टिमुषम्य यमवद् भीषण समधावत ॥ करीवो मुद्गरकर तमुष्टिकरो इसम् । जगाम भरताधीशान्तिक तक्षशिलापति ॥ -त्रिपष्ठि १७२७-७२० २६६ इस्युदिला महासत्व सोऽप्रणो शीघ्रकारिताम् । तेनव मुष्टिना मूज़ उद्दल तुणवत् कचान् ।। -निषष्ठि २७४ २७ सोऽप्येव चिन्तयामास प्रतिपन्नमहावत । किवातपात्पप्रान्तमह बन्यामि सम्प्रति ।।। --विष्ठि १५७४२ नोयार जीरा नमन करने की बात स्मृति मे पाते ही उनके चरण एकान्त गान्न कानन मे ही स्तब्ध हो गये, असन्तोप पर विजय पाने वाले वाहवानी अस्मिता से पराजित हो गये । एक वर्ष तक हिमालय की तरह अदाल ध्यान-मुद्रा मे अवग्यिन रहने पर भी येवल ज्ञान का दिव्य आलोक । प्राप्त नहीं हो सका । शरीर पर लताएँ चढ गई , पक्षियों ने घोसले बना लिये, पैर वल्मीको (बाँबियो ) गे वेष्टिन हो गए, तथापि सफलता नहीं मिली।" बाहुबली को केवलज्ञान एक वर्ष के पश्चात् भगवान् श्री ऋपभदेव ने बाहुबली में अन्तर्योति जगाने के लिए ब्राह्मी और सुन्दरी को प्रेपित किया । २७१ पच्छा बाहुबली चित्तेति-यह कि तायारण पाम बच्चामि । इह चेव अच्छामि बाव केवलणारण उप्पज्जति । एव सो पडिम हितो पव्ययसिहरी । सामी जाणति तहवि ण पत्थवेति, अमूढलयग्वा तित्यगरा । ताहे सवच्छर अच्छति वाउस्मग्गेण बल्लीवितारण वेदितो पादा य चम्मिएण। -आवश्यक चूणि-पृ. २१० (प) गावसी विचितेद-तायममोवे भाउणा में लघुतरा समुप्पण्णणाणातिसया ते किह निरतिसा पेच्छामि । एत्यैव ताव अच्छामि जाच वेवलनाण गमुणज्जति, एव सो पडिम ठिओ, ठिओ माणपव्ययमिहर, जाणइ सामी तहदि न पट्टवेड, अमूढलयमा तित्ययरा, ताहे गवच्छर अच्छा कारसग्गण, वलनीवितागण वेदिओ पाया य यम्मीयनिग्गाह भुयहि । --आवश्यक मानयगिरि वृत्ति० प० २३२२१ (ग) शरीरमधिरूढस्तलबमान जगमै बभी वाहवनिर्बाहमहमिय पारयन् ।। पादपप तवरमीकविनिर्यातमहोरगे । पादयोर्वेष्टयाचक्र म पादकटपरिव ।। इत्थ स्थितस्य ध्यानेन तस्यैको वत्सरो ययौ। विनाऽऽहार विहरतो वृपभस्वामिनो यथा ।। -त्रिपष्ठि० १५१७७६ से ७७६ ।
ऋषभदेव एक परिशीलन भगिनीद्वय ने बाहुवली को नमन किया और कहा- 'हस्ती पर माल्ट व्यक्ति को कभी केवल ज्ञान की उपलब्धि नही होती प्रत नीचे उतरो २२-ये शब्द बाहुबली के कण कुहरों में गिरे, चिन्तन का प्रवाह वदला - कहाँ है यहाँ हाथी क्या अभिप्राय है इनका ? हाँ समझा मान हाथी है और मैं उस पर प्राप्त है। मैं व्यथ ही अवस्था के भेद मे उलझ गया। वे भाई वय मे भले ही मुझ से छोटे है पर चारित्रिक दृष्टि से बडे है । मुझे नमन करना चाहिए। नमन करने के लिए ज्यो ही पर उठे कि बधन टूट गये । विनय ने महकार को पराजित किया। केवली बन गये। भगवान् के चरणो मे पहुंच २७२ पुन्ने सवत्सरे भगव बभी सुदरीमो पत्यवेति । पुयि ण पत्थिताको जेण तदा सम्म ण पडिजिहिति साह सो मग्गतीहिं वल्लीहि य वणेहि य वेद्वितेण य महल्लेण कुच्चेण त दृढ ण वदितो ताहि इम च मणितो-ण रि हत्यि विलगस्स देवतनाण उप्पजइ एव मणिऊण पतायो। -आवश्यक पूणि-प २१०-२११ (ख) पुणे य सवच्छरे भगव बमिसु दरीओ पटुवेइ पुब्धि मेव पट्टविया बेण तया सम्म न पडिवज्जइत्ति ताहि सो मग्गतीहि बलौतमवेडिओ विट्ठो पल्टेण महल्लण ग वेण ति । त दृढण पदियो इम व मणिओ-न किर हत्थीविलनस्स केवल नाण समुप्पनइ ति भगिऊए गयायो । --आवश्यक नि मस वृत्ति प २३२ (ग) निपुण लक्षविरदा त कृत्वा निश्च प्रदक्षिणाम् । महामुनि बाहुबलि ते बन्दित्ववमूचतु ॥ आज्ञापयति तातस्त्वा ज्येष्ठाय ! मगवानिदम् । हस्तिस्क धाषिरदानामुपद्यत न देषलम् -त्रिषष्ठि १७५७-७८ (घ) कल्पलता समय सुन्दर २१११ (1) कल्पद म कलिका लामो प १५२ (घ) कल्पा मोधिनी पृ १४-१४५ ॥
ऋषभदेव एक परिशीलन
से करते हुए बताया है कि बाहुबली श्रमण बनकर एक वप तक
ध्यानस्थ रहे। भरत के अकृत्य का विचार उनके अन्तर्मानस में
बना रहा। जब एक वप के पश्चात् भरत भाकर उनकी अचना
करते है तब उनका हृदय निशस्य बनता है और केवल ज्ञान
उत्पन्न होता है ।२४
अनासक्त भरत
भरत ने अपने माताओ के साथ जो व्यवहार किया था उससे
वे स्वय लज्जित थे। भ्राताओ को गंवाकर राज्य प्राप्त कर लने
पर भी उनके प्रतर्मानस मे शान्ति नहीं थी। विराट राज्य का
उपभोग करते हुए भी वे उसम प्रासक्त नहा थे। ममान होने पर भी
वे साम्राज्यवादी नहीं थे।
एक बार भगवान् श्री ऋषभदेव अपने शिष्यवगसहित विनीता
के बाग मे पधारे। जनसमूह धनदेशना थवरण करने को पाया।
प्रवचन परिषद् म ही एक सज्जन ने भगवान से प्रश्न किया-
भगवन् | क्या भरत मोक्षगामी है। वीतराग भगवान् ने कहा-
हा । प्रश्नकर्ता ने कहा-आश्चर्ग है भगवान् हाकर भी पुत्र का
पक्ष लेते है।
भरत ने सुना और सोचा-भगवान् पर यह पाराप लगा रहा
है। इसे मुझे शिक्षा देनी चाहिए। दूसरे ही दिन उस व्यक्ति को
फाँसी की सजा सुना दी गई। फांसी की सजा सुन वह घबराया
भरत के चरणो म गिरा गिडगिहाया अपराध के लिए क्षमा
मांगने लगा।
भरत ने कहा-तल से परिपूरित कटोरे को लकर विनीता के
वाजारो मे धूमो। स्मरण रखना एक बूंद भी नीचे न गिरने पाये।
नीचे गिरते ही फांसी के तख्त पर लटका दिये जानोगे। यदि एक
बूद भी नीचे न गिरेगी तो तुम्हे मुक्त कर दिया जायेगा।
संक्लिप्टा भरताधीश सोऽस्मत इति यत्किल ।
हृद्यस्य हाई वेनामीन नामानि वेवमम् ।।
-महापुराण जिन ३११८६०२१७४ मा
तीयंदुर जीस अभियुक्त मम्राट् के प्रादेशानुगार घूमकर लोट पाया। मम्राट् ने प्रश्न किया-क्या तुम नगर मे घूमकर आये हो अभियुक्त ने विनीन मुद्रा म कहा-हां महागज | मम्राट ने पुन प्रश्न किया-नगर में तुमने क्या क्या देखा? अभियुक्त ने निवेदन किया- कुछ भी नहीं दया भगवन् ' सम्राट् ने पुन पूछा- क्या नगर म जो नाटक हो रहे ये वे तुमने नहीं देगे ? क्या नगर में जो मगीन मालिया यत्रतत्र गगीत रही थो उन्हू तुमने नहीं सुना। अभियुक्त ने कहा -राजन् । जय मौन नेनो क मागन नाच रही हो तब नाटक कैम देने जा सकते है ' पोर जब मौत की गुनगुनाह कर्णहरी में चल रही हो नव गीत कैसे सुन जा माते है। सम्राट् ने मुम्कगते हुए कहा-क्या मृत्यु का उतना अधिक भय है? अभियुक्त ने कहा-~-सम्राट् को इसका क्या पता · यह नो मृत्यु- दण्ड पाने वाला ही अनुभव कर सकता है । सम्राट ने कहा- तो क्या मम्राट् अमर है ? उम मृत्यु का साक्षात्कार नहीं करना पडेगा ? तुम तो एक जीवन की मृत्यु से ही इतने अधिक भयाक्रान्त हो गए कि आँखो के सामने नाटक होने पर भी नाटक नहीं देख सके और कानो के पास सगीत की सुमधुर स्वर लहरियों झनझनाने पर भी मगीत नहीं सुन सके । परन्तु बन्ध, तुम्ह यह ज्ञान होना चाहिये कि में तो मृत्यु की दीर्घपरम्परा से परिचित हूं अत मुझे अव साम्राज्य का विराट् सुख भी नहीं लुभा पा रहा है । मे तन से गृहस्थाश्रम मे है, पर मन से उपरत हूँ। अभियुक्त को अब भगवान् के सत्य कथन पर शका नहीं रही। उसे अपना अपराच समझ मे या गया । उसे मुक्त कर दिया गया ।७५ भरत से भारतवर्ष यहाँ यह ग्मरण रखना चाहिए कि प्रतापपूर्ण प्रतिभासम्पन्न २७५ (ख) जैन धम और दर्गन-मुनि नथमल पृ० १४ (ग) जैन दर्शन के मौलिक तत्व पृ० १४ ऋषभदेव एक परिशीलन भरत एक प्रतिजात पुत्र थ। पिता के द्वारा प्राप्त राज्यश्री को उन्होने अत्यधिक विस्तृत किया और छ खण्ड के अधिपति चक्रवर्ती सम्राट् वने। केवल तन पर ही नहीं अपितु प्रजा के मन पर शासन किया। उनकी पुण्य सस्मृति मे ही प्रकृत देश का नाम भारतवर्ष हुमा। वसुदेव हिंडी जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति४ श्रीमद्भागवत वायुपुराण प्रग्निपुराण' महापुराण नारदपुराण . २७६ जम्बूदीप प्रज्ञप्ति भरवाधिकार २७७ तत्य भरहो भरहवासचूडामणी । तस्सव नामेण इह भारहवास ति पचति ।। -सुदेवहिण्डी प्र ख पृ १८६ २७८ भरतनाम्नश्चविणो देवा च भारतनाम प्रवृत्त भरतवर्षाच्च तयो म । -जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति वृति २७६ यषा खनु महायोगी ज्येष्ठ थप्ठगुण आसीच नेद वप भारतमिति व्यपदिशन्ति । -थो मदभागवत पुराण स्वष ५ अ VIE (ख) अजनाम नामतद्वप भारतमिति यत आरम्य व्यपदिन्ति । --श्री मद्भागवत ॥७॥ ५६९ (ग) तेपा व भरतो येष्ठो नारायणपरायण । विख्यात वर्षमेत यन्नाम्ना भारतमदतम् ।। --भागवत ११।१७ हिमालय दक्षिण वर्ष भरताय न्यवेदयत् । तस्माद भारत वर्ष तस्य नाम्ना विदुघा ॥ -वायुपुराण बघ्या २६ लो ५२ भरसाद भारत वर्ष भरतात सुमतिस्त्वमूत् ।। -अग्निपुराण ब १ पलो०१२ २८२ तमामा भारत वमिति हासोलनास्पदम् । हिमा रासमुद्राच क्षत्र चाभूतामिदम् ।। -महापुराण १११५३३९ २८३ आसीत पुरा मुनिया को भरतो नाम भूपतिः । आर्यभो मस्य माम्नद भारत खण्डमुच्यते ॥ नारदपुराण अध्या ४८श्मा ५ तीर्थकर जीवन १४६ विष्णु पुराण८४, गरुडपुराण, ब्रह्मपुराण, मार्कण्डेय पुराण, चाराह पुराण, स्कन्ध पुराण, लिङ्ग पुराण, शिवपुराण, विश्वकोपर प्रभृत्ति ग्रन्थो के उद्धरणो के प्रकाश मे भी यह ॥ २८४ ऋपभाद भरतो जज्ञे ज्येष्ठ पुनशताग्रज । ततश्च भारत वर्षमैतल्लोकेषु गीयते ॥ --विष्णुपुराण अश २, अध्या० १ श्लो० ३२ २८५ गरुडपुराण, अध्याय १, श्लो० १३ २९६ सोऽभिपिच्यर्पभ पुन महाप्रावाज्यमास्थित । हिमाह्वय दक्षिण वर्ष तस्य नाम्ना विदुद्धा ।। -ब्रह्माण्ड० अ०१४, श्लो०६१ २८७ अग्निन्नसूनो भेस्तु ऋपभोऽभूत् सुतो द्विज । ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीर पुत्रराताद् वर ॥ सोऽभिपिच्यर्पभ पुत्र महाप्रावाज्यमास्थित । तपस्तेपे महाभाग पुलहाश्रमसंशय हिमाह्वय दक्षिण वर्ष भरताय पिता ददौ । तस्मात भारत वर्ष तस्य नाम्ना महात्मन ॥ -मार्कण्डेय पुराण ६३१३८-४० २८८ हेमाद्र दक्षिण वर्ष महद् भारत नाम शशास । -बाराह पुराण अध्याय०७४ २८६ तस्य नाम्ना घिद वप भारत चेति कीत्यते । -स्कन्ध पुराण अध्या० ३७, श्लो० ५७ २६० तस्मात्त भारत वप तस्य नाम्ना विदुर्बुधा । -लिग पुराण, अध्याय ४७, श्लो० २४ २६१ तत्रापि भरते ज्येष्ठे खण्डेऽस्मिन् स्मृहलीयके । तनामा चव विख्यात खण्ड च भारत तदा । -शिव पुराण, अध्या० ५२ २६२ नाभि के पुत्र ऋषभ और उनके पुत्र भरत थे। भरत ने धर्मानुसार जिम वर्ष का शासन किया उनके नामानुसार वही भारतवप कहलाया। -हिन्दी विश्वकोप ऋषभदेव एव परिशीलन २१४ - स्पष्ट है कि ऋपभपुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम से ही प्रस्तुत देश का नाम भारतवप पड़ा। पाश्चात्य विद्वान श्री जे० स्टीवेन्सन " का भी यही अभिमन है और प्रसिद्ध इतिहासज्ञ गंगाप्रसा' एम ए रामधारीसिंह दिनकर ५ का भी यही मन्तव्य है। बुछ लोग दुप्य त पुत्र भरत से भारतवप का नाम सस्थापित करना चाहते है पर प्रबल प्रमाणों के प्रभाव म उनकी बात किस प्रकार मान्य की गसकती है। उन्द अपने मताह को छोमर यह सत्य नथ्य स्वीकार करना ही चाहिए कि श्री ऋपम पुन भरत के नाम में ही भाग्नवप प्रसिद्ध हमा। भरत को केवल ज्ञान दीघवाल तक राज्यश्री का उपभाग करन के पश्चात् [भगवान् श्री ऋषभदेव के मोक्ष पधारने के वाद] एकबार सम्राट भरत वस्त्राभूपणा से सुसज्जित होकर प्रादश (काँच ) के भव्य भवन मे गये। भगुली मे अगूठी गिर गई जिसम अगुली असुदर प्रतीत हुई। भरत के मन म एम विचार माया। मयमाभूषण भी उतार दिए । चिन्तन के पालोक म सोचा-पर-द्रव्यो से ही यह शरीर सुन्दर प्रतीत होता है । कृतिम मौदर्ग वस्तुत सही सौदर्ग नहीं है। प्रात्म २६३ २६४ Brahmanical Pranas prove Rishabh to be the father of that Dharat from hom Ind a took to name Bharaty sha -halpasutra Introu P XVI ऋषिया न हमार देश का नाम प्राचीन पत्रवती सम्राट भरत के नामपर भारतवष रखा था। -पाचीन भारत पृ ५। भरत ऋषभन्य रे ही पुत्र थे जिनके नाम पर मारेगा नाम भारत पडा। सम्वृतिक बार अध्याय १२६ २१५
तीर्थकर जीवन
गौन्दर्य ही सच्चा सौन्दर्य है। भावना का वेग बढा, कां-मल को
घोकर वे केवल ज्ञानी बन गये।
श्रीमद् भागवतकार ने सम्राट् भरत का जीवन कुछ अन्य रूप
गे चित्रित किया है। राजपि भरत मारी पृथ्वी का राज भोगकर
बन में चले गये और वहाँ तपस्या के द्वारा भगवान् वी उपासना की
और तीन जन्मो में भगवत्स्यिति को प्राप्त हुए ।
जैन दृष्टि गे भगवान् के मी ही पुनो ने तथा ब्राह्मी मुन्दरी दानो
पुत्रियो ने श्रमग्णत्व ग्वीकार किया और उत्कृष्ट माधना कर कैवत्य
२९६ मायगपग्पवेगो भग्हे पण च अगुलीबग्ग ।
गगागा उम्मगुपण गगी नाण दिस्या य ।।
-लावश्यक नियुक्ति गा० ८३६
(4) जह अग्नया कयानि गयालकारविभूगिता आयमघर अतीति,
तत्य य गम्बगिमा पुरिमा दीति, नग्ग एव पेन्छमाणग्य
अगुणाजग पटिय, त च तण ण णाय पटिय, एव तस्रा
पला तरग जाहे त अलि पलोएति जाच सा अगुली न
रोहति तेण अगुलीज्जएण विणा, ताहे पेच्छति पडिय,
ताह पाउगपि अवणेति, एव एवषया बाभग्ण अवर्णनेण
माणि भवणीतागि, ताई अपाग पेच्छति उच्चियपउम
य पउमगर अमोगमाण पेच्छ । पच्छा माणति--आगतु हि
दवान विभूगित इम गरीग्गति, पथ संगमावप्नो । इम
च गत गर्गर, "] चितेमाणम हावहा गग्गणगवेसण
कारगाणग्ग अपुजारा मारण अगुपचिट्टो केवलगाया
उपामिति ।
--आरश्यक चूर्णि, पृ० २२७
(ग) आपल्या मनयगिग्वृित्ति पृ० २४६ ।
२९७ ग भुतभागा त्यगत्वमा निर्गतरतपमा हरिम् ।
सपागीनरतत्पदनी लभ जन्मभिग्निभि ।।
--भागवत ११।२।१८ पृ० ७११
ऋषभदेव एक परिशीलन प्राप्त किया। श्रीमद्भागवत के अभिमतानुसार सौ पुत्रों में से कवि हरि मारित प्रबुद्ध पिप्पलायन प्राविहाँत्र मिल, चमस, और करभाजन-ये नौ प्रात्म विद्याविशारद पुत्र वातरशन श्रमण बने । भगवान के संघ में भगवान् के आध्यात्मिक पावन प्रवचनो को श्रवण करके भगवान् के संघ में चारासी हजार श्रमण बने। तीन लाख श्रमणियों बनी, 300 ३ २९८ आवश्यक नियुक्ति गा ४८-३४६ मल वृ० प २३१-३२ 1 २९६ नगाभवन महाभागा मुनयोहार्यशसिन । श्रमणा वानरशना मारमविद्याविशारदा ॥ कविहरिदन्तरिक्ष पिप्पलायन । आविर्होत्रोऽय मिलश्चमस करभाजन ॥ -भागवतशर -२१ (क) समवायाङ्ग ४ (ख) बावश्यक नि गा २७८ मल वृप (ग) जम्बूद्वीप प्राप्ति (५) रामसेणपामोश्वामा चउरामीइ समणमाहस्सीमा उक्कोसिया समणमपया हाया। -कल्पमूत्र मू १९७ पृ ५५ (5) विपष्ठि १०६ ३१ बभीसुन्दरिपामोक्ताण अजियाए तिनि सयसाहस्सोमा उक्कोसिया चिपासपया होया। +पमूत्र सू १६७ पृ ५५ (स) आवश्मक मल दृ प २८गा २८२ (ग) जम्बूदीपप्रज्ञप्ति पृ ८७ अमोल (घ) त्रिपष्ठि १६ तीर्थङ्कर जीवन तीन लास पांच हजार श्रावक बने और पांच लाख चोपन हजार थाविकाएँ हुई 133 भगवान् ऋपभदेव के श्रमण चौरामी भागो मे विभक्त थे। वे विभाग गण के नाम से पहचाने जाते थे। इन गणो का नेतृत्व करने वाले गणवर कहलाते थे, जिनकी संख्या चौरासी थी। श्रमण- थमणियो की मम्पूर्ण व्यवस्था इनके अधीन थी। धार्मिक प्रवचन करना, अन्य तीयिक या अपने गिग्यो के प्रश्नो का समाधान करना और धार्मिक नियमोपनियम का परिज्ञान कगना~~ये कार्य भ० अपभदेव के अधीन थे और शेप कार्य गग्गधरो के। गुण की दृष्टि से श्री ऋपभदेव के श्रमणो को सात विभागो मे विभक्त कर सकते है । (१) केवलज्ञानी, (२) मन पर्यवज्ञानी (३) अवधिज्ञानी (४) वैक्रियद्धिक, (५) चतुर्दशपूर्वी (६) वादी (७) सामान्य साधु । केवल ज्ञानी अथवा पूर्ण ज्ञानियो की सख्या वीस हजार थी। ये प्रथम श्रेणी के ज्ञानी यमरण ये। श्री ऋपभदेव के ३०२ (क) उसभम्स ण सेज्जमपामोक्वाण समणोवासगाण तिन्नि सयमाहस्सीओ पच सहम्मा उक्कोमिया समणोवामयसपया होत्था । --कल्पसूत्र० १९७1 पृ०५८ (ख) जम्बूद्वीप प्रज्ञप्तिः पृ०८७ अमो० २०३ उमभस्स ए सुभद्दापामोक्खाण ममणोवासियारण पच सयसाहस्सीओ चउप्पन च सहस्सा उक्कोसिया समणोवासिया - कल्पमूत्र, सू० १६७ पृ० ५८, पुण्यवि. स. (ख) समवायाङ्ग। (ग) लोकप्रकाश। (घ) आवश्यक नियुक्ति गा० २८८ उमभसरण वीरासहस्मा केवलणाणीण उक्कोसिया । -कल्पसूत्र मू० १९७ पृ० ५८
ऋषभदेव एक परिशीलन
ममान ही इनको भी पूण ज्ञान था। ये धर्मोपदेश भी प्रदान
करते थे।
दूसरी श्रणी के श्रमण मन पर्यवज्ञानी अर्थात् मनोवज्ञानिक
थ। ये समनस्क प्राणियो के मानमिक भावो के परिज्ञाता थ। इनकी
मस्या बारह हजार छह सौ पचाम थी ।य
तृतीय श्रणी के थमण अवधिज्ञानी याअवधि का अथ-सीमा है।
अधिज्ञान का विषय केवल रूपी पदाथ है। जो रूप रस गध और
स्पश युक्त ममस्त रूपी पदार्थों (पुद्गलो) के परिज्ञाता थ। इनकी संख्या
नौ हजार थी।
चतुथ श्रणी र साधक वत्रियदिक थ। अर्थात् योगसिद्धि प्राप्त
श्रमण थे ।जा प्राय तप जप व ध्यान म तल्लीन रहते थ । इन श्रमणो
को सख्या वीम हजार छह सौ थी।
पचम श्रणी के श्रमण चतुदश पूर्वी थे। ये सम्पूण अक्षर शान मे
(स) समवायाङ्ग
(ग) लाकप्रकाश
उमभम्स ए बारससहस्सा छन्च सया
पन्नासा विउलमई
अडवाइजेसु दीवममुद्द सु सनीए पपिदियाण पजसगाण भगोगए
भावे जाणमाकाण पासमाणारा उकोमिया विपुलमइसपया होत्या ।
कल्पमूत्र सू १९७ पृ ५५-५६
(स) समवायाङ्ग
उमभस्म ण नव सहस्सा ओहिनाणीण उस्को ।
(ब) समवाया।
(ग) लोक्प्रकाश।
उमभस्सण बीमसहम्सा छञ्च सया वेब्दियाए उक्कोसिया ।
तीर्थकर जीवन पारगत थे। इनका कार्य था शिष्यो को शास्त्राभ्यास कराना । इनकी सख्या सैतालीस सौ पचास थी।३०८ छछी श्रेणी के श्रपण वादी थे। ये तई और दार्शनिक सिद्वान्तो की चर्चा करने में प्रवीण थे। अन्य तीथियो के साथ शास्त्रार्थ कर उन्हे आहेत वर्म के अनुकूल बनाना, इनका प्रमुख कार्य था । इनकी सख्या वारह हजार छह मौ पचास थी। मातवीश्रीगी मे वे मामान्य श्रमगा ये जो अव्ययन, तप, ध्यान तथा मेवा-गुय पा किया करते थे। दम प्रकार श्री ऋषभदेव की सघ-व्यवस्था सुगठित और वैज्ञानिक थी । धार्मिक राज्य की सुव्यवस्था करने मे वे सर्वतत्र-स्वतत्र थे। लक्षाविक व्यक्ति उनके अनुयायी ये और उनका उन पर अखण्ड प्रभुत्व था। भगवान् श्री ऋपभदेव सर्वन होने के पश्चात् जीवन के सान्ध्य तक आर्यावर्त मे पैदल घूम-घूमकर प्रात्म-विद्या की अखण्ड ज्योति जगाते रहे । देशना रूपी जल मे जगन् की दु ग्याग्नि को गमन करते रहे ।३१० जन-जन के अन्तर्मानस मे त्याग-निष्ठा व सयम-प्रतिष्ठा उत्पन्न करते रहे। निर्वाण तृतीय पारे तीन वर्ष और साढे आठ मास अवशेप रहने पर भगवान् दम सहस्र श्रमणो के साथ अष्टापद पर्वत पर आरूढ हुए। ३०८ ३०६ उसभम्स ण चत्तारि महम्मा मत्त सया पन्नासा चोद्दस पुवीण अजिणाण जिणगफामाण उक्कोसिया चोद्दसपुब्बिसपया होत्था । -करससून सू० १६७ पृ० ५८ उसभस्म ण वाग्स सहम्मा च सया पन्नामा वाईण. - कल्पमून १६५,५६ वर्पति मिचति देशनाजनन, दुसाग्निना दग्ध जगदिति ।
अपमदेव एक परिशीलन चतुदश भक्त से प्रात्मा को तापित करते हुए अभिजित नपत्र के योग मे पर्यशासन म स्थित शुक्ल घ्यान के द्वारा वेदनीय कम मायुष्य कम नाम कर्म और गोत्र-कम को नष्ट कर सदा-सर्वदा के लिए अक्षर अजर अमर पद को प्राप्त हुए।" जन परिभाषा मे इसे निर्वाण या । बउरासीइ पुषसयसहस्साइ सवात्तय पालाइत्ता खोणे यणिजाउयनामगोन इमीम आमप्पिणीए सुममदूसमाए समाए बहुविकताए तिहि वाहि अद्धनवमेहि य माहि ससेहि उप्पि भट्ठावयमेलसिहरसि दहि अणगारसहसहि द्धि चोइसमेण भत्तए अपाणएण अभिइणा नसतण जोगमुवागएण पुग्वण्हकालसमयसि सपलियर निमन्ने शलगा विइक्कने जाव सव्वदुक्खप्पहाणे । - पसूत्र सू १६६ पु ५६ (ब) निवाणमतरिरिया सा चोद्दममण पमनाहस्म । ससाण मामिण वीरजिणिदस्स टुण ॥ अट्ठावय-धपु-उस-पावा-सम्मेयसेलमिहरेस उसभ वसुपुरज नेमी धोरो सेसा य मिडिगया । -आवश्यक नियुक्ति गा ३२८-३२६ दसहि महस्मेहुसभे ससा उ सहस्सपरिवुढा सिद्धा। आवश्यक नि गा० ३३३ (ग) एव च सामी विहरमाणो थोवणग पुष्वमयसहस्स वलपरियाय पाउणित्ता पुणरवि अट्ठावए पव्वए समोसढो तत्य चोइसमेण भतेण पाओवगतो तस्य माहबहुलदेरसीपक्वेस दसहि अणगारसहम्सेहि साद मपरिवहे मपलियकणिसम्रो पुवाहकाल समयमि अभिइणा पसराण मुममदूममाए एगणणतीहि पक्षेहि सहि खीणे भाग णामे गोत्त वयणिज्येपालगते जाव मन्यदक्सपरीणे। पुलमीतीए जिणवरो ममणमहामहि परिवगे भगव । दहि महम्महि मम निबाणमणुत्तर आवश्यक चणि पृ २२१ ॥
तीयंकर जीवन १५७ परिनिर्वाण कहा है। शिव पुराण ने अष्टा पद पर्वत के स्थान पर कैलाश पर्वत का उल्लख किया है। भगवान् श्री ऋपभदेव की निर्वाणतिथि जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति,18 करपसूत्र,३१४ त्रिपष्ठि गलाका पुरुप चरित्र के अनुसार माघ कृष्णा 11 (घ) दीक्षाकालात् पूर्वलक्ष, क्षपयित्वा तत प्रभु । ज्ञात्वा स्वमोक्षकाल च, प्रतस्थेऽप्टापद प्रति ।। शैलमण्टापद प्राप, क्रमेण सपरिच्छद । निर्धाणमाघसोपानमिवाऽऽरोहच्च त प्रभु ॥ सम मुनीना दशभि सहम प्रत्यपद्यत । चतुदशेन तपसा, पादपोपगम प्रभु -त्रिपष्ठि०१६।४५६ से ४६१ (ड) दहि अणगारसहस्सेहि सद्धि सपरिखुडे अट्ठावयसेलसिहरसि चोइसमेण भत्तण अप्पाएएण सपलियासणे निसणे पुवाह कालसमयसि अभिइणा णखत्रोण जोगमुवागएण सुसमदुस्स- माए एगूणणबइए पक्रोहिं सेमेहि कालगए वीइक्कते जाव मध्वदुक्खप्पहीणे। -जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, सू० ४८ पृ० ६१ ३१२ कैलाशे पर्वते रम्ये, वृपभोऽय जिनेश्वर । चकार स्वावतारच सर्वज्ञ सर्वग शिव ॥ -शिवपुराण ५६ ३१३ जे से हेमताण तच्चे मासे पत्रमे पक्खे माहबहुले तस्स ण माहबहुलस्स तेरसीपक्सेरण। -जम्बूद्वीप प्राप्ति, सू०४८, पृ. ६१ जै स हेमताण तच्चेमामे पचमे पक्से माहबहुले तस्स ए माहबहुलस्स तेरसीपसेरा। --करपसून, सू० १६६, पृ० ५६ ३१५. त्रिपप्टि० १६
ऋषभदेव
एक परिशीलन
अयोगी है और निलोय पण्पत्ति महापुराग" के अनुसार
माघवृष्णा चतुदशी है।
विशा का मन्तव्य है कि उस दिन धमणा न शिवगति प्राप्त
भगवान् की सम्मृति म दिन म उपवास रखा और राति भर धम
जागरण किया। प्रत वह तिथि शिवराशि क नाम से प्रसिद्ध हुई।
शिव मोग निवारण-ये सभी पर्यायवाची शब्द है।
ईशान सहिता म लिखा है कि माघ कृष्णा चतुदशी की महानिका
म कोटिसूर्मप्रभोपम भगवान् प्रादिदेव शिवगति प्राप्त हो जाने से
शिव -इम लिंग से प्रकट हुए। जो निर्वाण के पूर्व आदिदेव रहे गाते थ
वे अव शिवपद प्राप्त हो जान से शिव कहलाने लग।'
उत्तर प्रान्त म शिव रात्रि पव फाल्गुन कृष्णा चतुदशी को
मनाया जाता है तो दक्षिण प्रान्त में माघकृष्णा चतुदशी का । इस
भेद का कारण यह है कि उत्तर प्रान्त म मास का प्रारम्भ कृष्ण पक्ष
स मानते है और दक्षिण प्रान्त मे शुक्ल पक्ष स । इस दृष्टि स दक्षिण
प्रान्तीय माघ कृष्णा चतुदशी उत्तर प्रान्त में फाल्गुन वृष्या चतुदशी
हो जाती है। कालमाधवीय नागर खण्ड मे प्रस्तुत मासवपम्य का
समन्वय करते हुए स्पष्ट लिखा है कि दाक्षिणात्य मानव के माघ मास
माघस्स किहि चोद्दसि पुषण्हे णिययजम्मणक्सत्ते अट्ठावम्मि
उसहो अजुदेण सम गोजामि ।
-विलायपण्णत्ति
पणतुहिणाणालि माहमामि सूरम्गमिक्सणपउरसीहि
णिन्वाह तित्यकरि पुरिससोहि ।
-महापुराण ३७३
माधे कृष्णवसुदपयामादियो महानिगि ।
शिर्वालगतयारमून कोटिसूर्यसमप्रभ ॥
तलालव्यापिनी माझा शिवरात्रिवते तिषि ।
-चान सहिता
तीर्थकर जीवन १५६ के शेप अथवा अन्तिम पक्ष की, और उत्तर प्रान्तीय मानव के फार गुन के प्रथम मास की कृष्णा चतुर्दशी गिवगत्रि कही गई है।३१० पूर्व बताया जा चुका है कि ऋपभदेव का महत्त्व केवल श्रमण परम्परा मे ही नहीं अपितु ब्राह्मणपरम्परा में भी रहा है। वहां उन्हें आराध्यदेव मानकर मुक्त कठ से गुणानुवाद किया गया है । सुप्रसिद्ध वैदिक साहित्य के विद्वान् प्रो० विरुपाक्ष एम ए वेदतीर्थ और आचार्य विनोबा भावे जमे बहुध न विचारक ऋग्वेद आदि मे ऋषभदेव की स्तुनि के स्वर सुनते हे I+ श्री रामधारी सिंह दिनकर भ० श्री ऋपभदेव के सम्बन्ध में लिखते है--"मोहन जोदडो" की खुदाई मे योग के प्रमाण मिले है । और जैनमार्ग के मादि तीर्थ कर श्री ऋपभदेव ये, जिनके साथ योग और वैराग्य की परम्परा उसी प्रकार लिपटी हुई हे जैसे कालान्तर में शिव के साथ ममन्वित हो गई। इस दृष्टि से कई जैन विद्वानो का यह मानना अयुक्तियुक्त नहीं दिखता कि ऋपभदेव वेदोल्लिखित होने पर भी वेद पूर्व है। डाक्टर जिम्मर लिखते है--"अाज प्राग् ऐतिहासिक काल के महापुरुषो के अस्तित्व को सिद्ध करने के साधन उपलब्ध नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं कि वे महापुरप हुए ही नहीं। इस अवसपिणी काल में भोग-भूमि के अन्त मे अर्थात् पापारणकाल के अवसान पर कृपिकाल के प्रारम्भ मे पहले तीर्थंकर ऋपभ हुए। जिन्होने मानव को सभ्यता का पाठ पढाया, उनके पश्चात् और भी तीर्थकर हुए, ३१६ माघमासस्य शेपे या प्रथमे फाल्गुणस्य च । कृष्णा चतुर्दशी सा तु शिवरात्रि प्रफीतिता ॥ -कालमाधवीय नागर खण्ड + पूर्व इतिवृत्त-उपाध्याय अमरमुनिजी महाराज, गुरदेव श्री रत्नमुनि । आजकल, मार्च १९६२ पृ०८ ।
अपभदेव
एक परिगोलन
जिनम से कई का उलम्ब वेदादि ग्रथो म भी मिलता है। मन
जन धम भगवान् ऋषभदेव के काल से चला आ रहा है।
ऋग्वेद में भगवान् श्री ऋषभ को पूवज्ञान का प्रतिपादक और
दुखा का नाश करने वाला बतलाते हुए कहा है- जसे जल से
भरा मेघ वर्षा का मुख्य स्रोत है जो पृथ्वी की प्यास को वुझा देता
है उसी प्रकार पूर्वी ज्ञान के प्रतिपादक यूपभ [रुपम] महान् है
उनका शामन वर दे। उनके शासन मे ऋषि परम्परा से प्राप्त पूष
का ज्ञान प्रारमा के शत्रमो-क्रोधादि का विध्वसक हो । दोनों
[ससारी और मुक्त] आत्माएँ अपने ही प्रात्मगुणो से चमकती है।
प्रत व राजा है-वे पूण ज्ञान के प्रागार है और आत्म-पतन नही
होन देते।
वदिक ऋपि भक्ति भावना से विभोर होकर उस महाप्रभु की
स्तुति करता हुमा कहता है-हे मात्मद्रष्टा प्रभो । परम सुख पान
के लिए मैं तेरी शरण में आना चाहता हूँ। क्योकि तेरा उपदेश और
तेरी वाणी शक्तिशाली ह-उनको मैं अवधारण करता हूँ। ह प्रभो ।
सभी मनुष्या और देवो मे तुम्ही पहले पूर्वयाया [पूर्वगत ज्ञान के
प्रतिपादक हो।
x
१२
दी फिलॉसफीन याव इण्डिया पृ २१७ ग जिम्भर ।
(स) अहिसावाणी वप १२ कर पृ ३७६ मकर कामताप्रसाद
के लेख म भी उत्त।
असूतपूर्ण वृपभो ज्यायनिमा बरम शुरष सन्ति पूर्वी ।
दिवोन पाता विदयस्य धीभि क्षत्र राजाना प्रदिवोदपाये।
पुग्दर ५२-१८
मखस्य से तोक्यस्य प्रतिमिम वाचमृताय मूषन् ।
नितीमामास मानुपीणा विधा देवी मामुत पूर्वयाया ॥
-कुम्वेद २।३४२
तीर्थकर जीवन "आत्मा ही परमात्मा है"३२०– यह जैन दर्शन का मूल सिद्धान्त है । इस सिद्धान्त को ऋग्वेद के शब्दो मे भगवान् श्री ऋषभदेव ने इस रूप में प्रतिपादित किया-"मन, वचन, काय तीनो योगो से बद्ध [सयत] वृषभ ने घोषणा की कि महादेव अर्थात् परमात्मा मयों मे निवास करता है ।"३५१ उन्होने स्वय कठोर तपश्चरणरूप साधना कर वह आदर्श जन-नयन के समक्ष प्रस्तुत किया। एतदर्थ ही ऋग्वेद के मेधावी महर्षि ने लिखा कि-"ऋषभ स्वय आदिपुरुप थे जिन्होने सब से प्रयम महँदगा मे देवत्त्व की प्राप्ति की थी।"३५८ अथर्ववेद का ऋषि मानवो को ऋषभदेव का आह्वान करने के लिए यह प्रेरणा करता है कि "पापो से मुक्त पूजनीय देवताओ मे सर्व प्रथम तथा भवसागर के पोत को मै हृदय से आह्वान करता हूँ। हे सहचर बन्धुनो। तुम आत्मीय श्रद्वा द्वारा उसके आत्मबल और तेज को धारण करो ।३२" क्योकि वे प्रेम के राजा है उन्होने ३२२ जे अप्पा से परमप्पा। (ख) मगण-गुणठाणेहि य, चउदहि वह असुद्धणया। विण्या ससारी, सव्वे सुद्धा हु सुद्धनया ।। -द्रव्यसग्रह ११३ (ग) सदामुक्त कारणपरमात्मान जानाति । -नियमसार, तात्पयवृत्ति गा०६६ विधा बद्धो वृषभो रोरवीती। महादेवो मा आविवेश ॥ -ऋग्वेद ४/५८१३ ३२४ तन्मत्यस्य देवत्वसजातमन । -ऋग्वेद ३११७ अहा मुच वृपभ यज्ञियान विराजन्त प्रयममध्वराणाम् । अपा न पातमश्विना हुवे प्रिय इन्द्रियेण तमिन्द्रिय दत्तभोज । -अश्ववेद कारिका १९४२१४ १६२ ऋपमदद एक परिशीलन । उस सघ की स्थापना की है जिसमे पशु भी मानव के समान माने जाते थे और उनको कोई भी मार नहीं सकता था। श्रीमद्भागवत के अनुसार श्री ऋषभ का जम रजोगुणी जनों को कवल्य की शिक्षा देने के लिए हुआ था। जिहोन विषयभोगा की अभिलाषा करने के कारण अपने वास्तविक थ य से भूल बिसरे मानवो का करुणावा निभप प्रात्म-लोष का उपदेश दिया और जो स्वग निरन्तर अनुभव करने वाल मात्म-स्वरूप की प्राप्ति के द्वारा सब प्रकार की तृष्णा से मुक्त थ उन भगवान् श्री कृपभदेव को नमस्कार है। इस प्रकार हम देखते है कि भागवत म ही हिा किन्तु वूम पुराण माकण्डेय पुराण अग्नि पुराण प्रादि यदिक ग्रथो म उनक जीवन की महत्त्वपूण गाथाएँ उदित है। बौद्ध ग्रन्थ भार्ग मजुश्री मूलकल्प म भारत के प्रादि सम्राटगे मे नाभिपुत्र ऋषभ और कपम पुत्र भरत की गणना की गई है। उन्होने हिमालय से सिद्धि प्राप्त की" वे वतो को पालन म दृढ ३२६ मास्य पशून समानान् हिनस्ति । -अपर्ववेद अयमवतारा रणसापप्मुतकवल्योपरिक्षणार्थम् । -श्रीमदमागवत पचम स्कष अध्या ६ १२८ नित्यानुभूतनिजनामनिवृत्ततृष्ण थपस्यवचनया चिरसुप्तबुद्ध । लोकस्य करणयाभयमात्मलीक- मास्यासमो भगवते अपमाय तस्मै ॥ -श्रीमद् भागवत श६१ ३२९ अन दृष्टि से सिद्धि-स्थल अष्टापच है हिमालय नहीं ।
तीर्थकर जीवन
थे। वे ही निर्ग्रन्थ तीर्थकर ऋषभ जैनो के प्राप्तदेव थे। धम्म पद
मे ऋषभ को सर्वश्रेष्ठ वीर कहा है।३३१
भारत के अतिरिक्त बाह्य देशों मे भी भगवान् ऋषभदेव का
विराट् व्यक्तित्व विविध रूपो मे चमका है। प्रथम उन्होने कृषिकला
का परिज्ञान कराया, अत वे "कृषि देवता" है । आधुनिक विद्वान्
उन्ह "एग्रीकल्चरएज" मानते है ।३२ देशनारूपी वर्षा करने से वे
"वर्षा के देवता' कहे गये हैं। केवल ज्ञानी होने से सूर्यदेव के रूप म
मान्य है।
इस प्रकार भगवान् श्री ऋषभदेव का जीवन, व्यक्तित्व और
कृतित्व विश्व के कोटि-कोटि मानवो के लिए कल्याणरूप, मगलरूप
और वरदानरूप रहा है। वे श्रमण संस्कृति और ब्राह्मण सस्कृति के
प्रादि पुरुष है। भारतीय संस्कृति के ही नहीं, मानव संस्कृति के
श्राद्य निर्माता है। उनके हिमालयसदृश विराट जीवन पर दृष्टि
डालते-डालते मानव का सिर ऊँचा हो जाता है और अन्तर भाव
श्रद्धा से झुक जाता है।
1
॥
प्रजापते सुतो नाभि तस्यापि आगमुच्यति ।
नामिनो ऋषभपुत्रो 4 सिद्धकर्म हठवत
तस्यापि मणिचरो यक्ष सिद्धी हेमवेत गिरो ।
यभस्य भरत पुत्र सोऽपि मजतान तदा जपेत ।।
मिन्य तीर्थपुर ऋषभ निर्गन्य रूपि
आर्यमजु श्री मूलकल्प श्लो० ३६०-३६१-३६२
उसभ पवर वीर।
--चम्मपद ४२२
३३२ व्हायस ऑब अहिसा-भ० ऋषभ विदोपाङ्ग, ले० डा० साकलिया
आपाय भिक्षु स्मृति ग्रन्थ, द्वितीय सण्ड पृ० ।
आदिम पृथ्वीनाथम्,
बादिम निष्परिग्रहम् ।
आदिमतीपनापच
सुषमस्वामिन स्तुम ॥
-प्राचाय हेमका
बादिपुरुष बावीश जिम
आदि सुद्धि करतार ।
धर्मधुरधर परम
ममो
आदि अवतार ॥
-पाव हेमराज
परिशिष्ट |
१
बहत्तर कलाओं के नाम
७
८
लह-लख लिखने की कला ।
२ गरिएग-गणित ।
रूव-स्प सजाने की कला ।
४ नट-नाच करने की कला ।
५ गीग-गीत गाने की कला।
बाइग-वाद्य बजाने की कला।
सरगम-स्वर जानने की क्ला।
पुक्खरम-ढोल आदि बार बजाने की क्सा।
समताल-ताल देना।
जूग-पूआ खेलने की कला ।
जगवाम-वार्तालाप की क्ला।
१२ पोक्खच्च-नगर के सरक्षण की कला।
१३ अट्ठावग-पागालने की कला ।
१४ दगमट्टिय-पानी और मिट्टी सामश्रण म वस्तु बनान की कला
१५ अन्नविहि-अन्न उत्पन्न कान की पला ।
१६ पाराविहि-पानी उत्पन्न करना और उस पुट करने की कला ।
१७ वयविहि -बस्त्र बनाने की क्ला।
१८ सयपविहि-गय्या निर्माण करने की कमा।
१९ प्रज्ज-स कृत भाषा म कविता निर्माणको कला।
२ पहेलिय-प्रहेलिका निर्माण की कला ।
२१ माहिा -छन्द विषय बनानीला।
गाह-प्राकृत भाषा म गाथा निर्माण की कमा।
२३ सिलोर्ग-लोर बनाने की कला ।
गध जुति-मुगन्धित पार्य बनाने की सा।
२५ मधुमित्व- मधुगा म बमान की पना।
परिशिष्ट १ १६७ २० २६ अाभरणविहि -अलकार निर्माण को तथा धारण को कला । २७ तरुणीपडिकम्म-स्त्री को शिक्षा देने की कला। २८ इत्थीलकण-स्त्री के लक्षण जानने की कला । २६ पुरियलक्खण-पुरुप के लक्षण जानने को कना । ह्यलक्खरण-घोडे के लक्षण जानने की कला । गयलक्खरग-हस्ती के लक्षण जानने की कला । ३२ गोलक्खरण-गाय के लक्षण जानने को कला । ३३ कुक्कुडलक्खरण-कुक्कुट के लक्षण जानने की कला । ३४ मिढयलक्खण-मेढे के लक्षण जानने की कला । ३५ चक्कलक्खरण-चक्र-लक्षण जानने की कला । ३ छत्तलक्खरण-छा-लक्षण जानने की कला । दण्डलक्खरण- दण्ड लक्षण जानने की कला । ३५ असिलक्खण-तलवार के लक्षण जानने की कला । ३६ मरिगलक्खण-मणि-लक्षण जानने की कला । ४० कागरिगलक्खरण-काकिणी-चक्रवर्ती के रत्नविशेष के लक्षण को जानने की कला । ४१ चम्मलक्खण-धर्म-लक्षण जानने की कला । ४२ चदलक्खर-चन्द्र लक्षण जानने की कला । ४३ सूरचरिय-सूर्य आदि को गति जानने की कला । ४४ राहुचरिय-राहु आदि को गति जानने की कला । ४५ गहचरिय-ग्रहो की गति जानने की कला । ४६ सोभागकर-सौभाग्य का ज्ञान 1 दोभागकर-दुर्भाग्य का ज्ञान । ४८ विज्जागय-गेहिणी, प्राप्ति आदि विद्या सम्बन्धी ज्ञान । मतगय-मन्त्र साधना आदि का ज्ञान । रहस्मगय-गुप्त वस्तु को जानने का ज्ञान । सभास-प्रत्येक वस्तु के वृत्त का ज्ञान ! ५२ चार-सैन्य का प्रमाण आदि जानना। ५३ पडिचार-मेना को रणक्षेत्र में उतारने की कला 1 ५४ वह-व्यूह रचने की कला । ” पडिवूह-प्रतिय्यूह रचने की कला (व्यूह के सामने उमे पराजित करने वाले व्यूह की रचना) ऋपमदेव एक परिशीलन ५६ खधावारमाणे-बैना के पनाव का प्रमाण जानना। नगरमाएं- नगर का प्रमाण जानने की कला। ५८ वत्थमाए-वस्तु का प्रमाण जानने की क्ला। ५६ खघावारनिवेस-सेना का पडाव मादि कहाँ डालना इत्यादि का परिजान। ६ वत्यनिवे-प्रत्येक वस्तु क स्थापन कराने की कला । ६१ नगरनिवेस-नगर निर्माण का ज्ञान । ६. ईसत्य -ईयत को महत करने की कला । ६३ छरुप्पबाग तलवार आदि की मूठ आदि बनाने की कला । ६४ मामसिक्स ~अश्व शिपा। ६५ हत्यिसिक्व-हस्ती मिला। ६६ घणुवेग- धनुर्वेद । ६७ हिरण्णपागं सुवण्यपाग मणिपाग धातुपाग-हिरण्यपाक सुवणपाद मणिपाक धातुपाक बनाने की कला । ir बाहुजुद्ध दहजुद्ध मुटिम्जुद्ध अद्विजुद जुद्ध निजुद्ध जुदाइजुद्ध - वाह पुट दाह युद्ध मुष्टि यु यष्टि युद्ध युद्ध नियुट युवतियुध परने कोला। सुत्ताखड नालियाड वाटखेड धम्मखड चम्मखर्ड-सूत्र बनान की नली बनान की गद खेलने की वस्तु के स्वभाव जानने की चमहा बनाने आदि को कलाए । पत्तच्छेज्ज-बडगन्छेज्जा -पत्र छन्न वृक्षाङ्गविक्षेप घेदने की ७ कला। ७२ सजीव निग्जीव सजीवन निर्जीवन । सउपरय-पक्षी के पास शुभाशुभ जानने की फ्ला । (क) ममदामाङ्ग सूत्र समवाय ७२ (4) ायाधम्मकहा (ग) राजप्रानीय मूत्र (प) भोपपातिक सूत्र ४ पत्र १०५ (1) + पमूत्र मुधोधिका टीका परिशिष्ट २ चौसठ कलायो के नाम १ नृत्य २ औचित्य ३ बादिन " मत्र तन्त्र . ७. भान विज्ञान ६ दम्भ १० जलम्तम्भ ११ गीतमान १२ तालमान १३ मेपष्टि १४ फलाकृष्टि आरामगेपण १६ आकाग्गोपन धमविचार १८ शकुनसार १६ नियाकरण २० सम्कृत जल्प प्रासाद नीति २२ धर्मरीति २३ यणिकावृद्धि २४ सुवर्णसिद्धि २५ सुरभितलकरण २६ सोनामचरण २७ हयगज परीक्षण पुरुष ग्त्रीलमण २६ हेमरत्न भेद अण्टादश लिपि-परिच्छेद ३१ तत्वालबुद्धि ३२ वस्तुमिद्धि ३३ कामविक्रिया ३४ वैद्यक क्रिया ३५ कुम्भभ्रम मारियम ३७ अजनयोग ३८ चूपयोग हरनलाघव ४० बचनपाटव भोज्यविधि ४२ वाणिज्यविधि ४३ मुखमण्डन ४४ शालिसण्डन ४५ कथाकथन पुष्पग्रन्थन ४७ वक्रोक्ति ४८ काव्य पक्ति ४६ स्फारबिधिवेप ५० मर्वभापाविशेष अभिवाननान ५२ भूपणपरिधान
ऋषमदेव एक परिशीलन
मस्योपचार
वीणानाद
ग्रहाचार
६ वितण्डावाद
व्याकरण
१ अविचार
परनिराकरण
६२ लोकव्यवहार
रम्धन
अन्याक्षरिका
५८ केशवन्धन
६४ प्रश्नप्रहेलिका
-अम्बूद्वीप प्राप्ति वक्षस्कार २ टीका पत्र १३९-२ १४०-१
कल्पसूत्र सुवोषिका टोका।
परिशिष्ट ३ श्री ऋषभदेव के पुत्र और पुत्रियो के नाम मागध गगम दगाए गम्भीर ३२ भरत २ बाहुबली ३ बार विश्वकर्मा ५ विमल ६ सुलक्षण, अमल चियाङ्ग ६ म्त्यातकोति बग्दत्त ८ १२ सागर १३. यशोधर अवर १५. थार १६ कामदेव धव यत्स गुरमा ३८ मुवर्मा ३५ गाद मुगाट ३. उद्धिकर गिनिधपर 28 मुयण या कीति यणम्कर पोतिकार मुपेण प्रागण विक्रान्त नरोत्तम ४७ पन्द्रीन महमेन ४६ मुसेण भानु कान्त पुष्पयुत ५३ श्रीधर दृदप ( २० सुनन्द/ २३ कोसल यग २५ धीर/ २७, कलिंग १७२ ऋषभदेव एक परिशीलन ५५ सुसुमार ५६ दुर्जप अजयमान कपिल ५८ सुधर्मा ५१ शमविचारी धर्मसिन २ अरिचय आनन्दन ६३ कुवरवल आनन् जयदेव नन्द नागदत्त ६३ अपराजित ६ काश्यप ७ बल ६४ विश्वसेन बोर ६५ हरिपेष द६ शुभमति ६७ विजय । सुमति विजयन्त पमनाभ प्रभाकर १२ सिंह ७ अरिदमन सुजाति EY संजय ७२ महाबाहु १५ सुनाम ७३ दीर्थबाहु मरदेव ७४ मेष १७ चित्तहर ७५ मुघोष १८ सुखर विश्व वरच प्रभजन+ दिगम्बर परम्परा के भावार्य विनसेन ने ११ पुत्र माने है और उसका माम वृषभमेन दिया है। पुनियो के नाम- १-माझी। २--मुन्दरी। + (क) वस्पभूध किरणावती पत्र १५१-५२ (स) स्पनून पुषिका टोपाध्याभ्यान ७ महापुराण १९३४६ oc परिशिष्ट ग्रन्थ के टिप्पण में प्रयुक्त ग्रन्थो के नाम १ ૨ ३ आचागन मून आवश्यक नियुक्ति-आवाय भद्रबाहु आवश्यक चूर्णि-जिनदासगणी महत्तर आवश्यक निनि मलयगिरि वृत्ति आवश्यक भाप्य आवश्यक हारिभद्रीया वृत्ति ४ " ६ आदि पुराण अथर्ववेद ३ जयब मदिता उत्तराध्ययन सूत्र उत्तर पुगण १२ ऋग्वेद १३ आर्य मजुधी मूलकल्प १४ अग्निपुराण औपपातिक मून आचाय भिक्षु स्मृति ग्रन्य अष्टाध्यायी पाणिनि १८ ईशान सहिता १६ कल्पसूत्र-आचार्य भद्रबाह, प० प्र. पुण्यविज २० कल्पमूत्र-कल्पार्थबोधिनी २१ कल्पमूष-कल्पसुबोधिका टीका-उपान्याय विनय विजय २२ कल्पसूत्र कल्पलता टीका- समय सुन्दर जी कल्पमूत्र-कल्पद्रुम कलिका-लक्ष्मीवल्लभ २४ कल्पमूत्र- कल्पसूत्राय प्रबोधिनी-राजेन्द्र मूरि कल्पमूत्र-मणिसागर कूमपुराण काललोर प्रकाश २८ फानमाधवीय नागर सण्ड परिशिष्ट ६१ शिवपुगण प्रभाम पुराण ६३ मुनि श्री हजारीमल स्मृतिग्रन्थ-व्यावर ६४ पुराणमार मग्रह-आर ६. विजेपाबश्यय भाप्या हिन्दा विश्वकाप--श्री ग्वद महिता शुक्न यजुब द महिना महाभारत भविष्य पुराण लाक प्रकाश प्रयन व्याकरण तत्वाव सूत्र वायु महापुराण ७५ मुण्डकापनिपद् महावीर चरिय---गुणर ७७ महावीर पुराण-आच उत्तर पुराण-गुगभद्रा “७६ वसुदेव हिण्डी श्री ऋषभदेव भ० का. नारद पुराण १२ विगु पुगण गरुड पुराण ८० मार्कण्डेय पुगण लिग पुराण VED प्राचीन भारतनागा सम्कृति चार अध्या तिलोय पण ऋपमन्य एक परिशीलन ८ २८ चतुर्विशतिस्तव ३ जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति २१ समूटीप प्रशस्ति-टोका जन राभाषण-केशराज जी ३ तत्त्वायभाष्य ४ व्यसन चपट परिका-आचाय शकर दशवकालिक पूर्णि-अगस्त्यमिह पणि कालिक पूर्णि-जिनकासगणी महत्तर उनञ्जय नाममाला नारद पुराण निपप्ठिशलाका पुरुष परिष-आचार्य हमचद्र निष्ठिरालाका पुरुप चरित्र (गुजराती भाषान्तर) ४२ वायु पुराण ४३ ब्रह्माण्ड पुराण वाराह पुराण स्कन्ध पुराण स्थानाङ्ग ४४ स्थानानवृत्ति YA समवायाङ्ग पउमचरिद-विमल भूरि महापुराण-श्राचार्य जिनसन भारतीम नामपोट पानी सिवान्त सह ५२ मनुस्मृति सेमप्रश्न A दुरुप ५५ सलिद बिस्तर ५६ भगवती सूब ५७ श्रीमदभागवत ५८ नन्दीसूत्र १. गृहस्वयम्भू तार-पापाय समन्वय
ऋपरव एक परिगलन
१२ बौद्ध धर्मान
१३ बौद्ध धर्म क्या कहता है-कृष्णदत्त भट्ट
औपपातिक सूत्र
१७
१
णमा अम्मकहानो
मोन्पोर मान्योर विलियम सस्कत इङ्गलिश डिवानरी
धम्मपद
अथर्ववेद कारिका
8 दान अने चिन्तन-4 सुखलाल जी
जनप्रकाश-दिल्ली
जनपम और गन-4 मुनि नथमल जी
जन दर्शन के मौलिक तस्व- मुनि नथमल पी
निक्षीय सूत्र भाष्य (पूणि सहित)-उपाध्याय अमर मुनि जी
१४ अष्टाह्निका कल्प-सुबोधिका-(गुजराती सारा भा नवाब)
१५ गुरुदेव श्री रलमुनि स्मृति अन्य भागरा
बाबफल
अणुवत (पाक्षिक) दिल्ली