Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Vairi Samhar

Dr. Shivraj Shastri · 2011/08

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पर raf
ककी अन्य पुस्तक
--
रत्नावली-नाटिका
भोज-प्रबन्ध
नंपघीय-चरित सगं १

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के पास amilgri गूगी (र २६२), गुजfuit का
गंपर (२९) Terr lrm ITR-family
(TSPEE) रे ।।
ग गरकरणको नेपाल में गदर के अत्री और
हिन्दी के सभी उपाय गाणों में बहाया भी है, नए कर उन गर
संसारणों के विद्या मागे नि त।
सारित प्रपरम पर भी मुदरा में कुछ अशुभ गई है। इस
लिये हमें भेद है। पाठको से ना प्रार्थना है frना प्रारम्भ करने से पूर्ण
अन्त में दिये गये शुद्धि-पत्र में देयकर पाट युद्ध कर वेन की परें।
यदि यह रास्थरए अपने पाठकों की मावश्यकताओं की पूर्ति कर मका तो
संपादक अपने प्रयत्न को मायंक समभंगा । मादक को विधान अध्याओं नया
छात्रों से अग्रिम सस्करण मे अभीष्ट सुधारों के लिए गुमाव पारर अत्यधिक
प्रसन्नता होगी।
-
10 सितम्बर १६६०
३०१, गिलासाची रोड, मेरठ।
शिवराज शास्त्री

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ArITE -
गान्धारो
न माना।
मामा-
LETTE
दुम्माया जापाप को पानी का भारी।
पसागन्या-
गी. Hinीनी ।
विङ्गिा कोरामी।
कुछ अन्य मफेनिन पाय
भीम, दोग, अभिमन्यु, यमगा, घटन, दुगामन, जयाय, विशु
पात्य आदि।
२-२६
विषय-सूची
भूमिका
मूल पाठ तथा हिन्दी अनुवाद
श्लोकों की वर्णानुक्रमसूची
वेणीसहारस्थ सुभापित
नाटक में प्रयुक्त छन्दों के लक्षण स्थल-निर्देश महिन
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
शुद्धिपत्र
d
२६८

.
रन नबयों में विश्व में विसनीय जानकारी अभार--सरात
नदियों के सम्बन्ध में प्रथा जंगण होता , वेणीमहार नारा रचिता
नारायण के विषय में भी य? यान है। भट्टनारायण ने जीएन, समय
परममिगत पस्चिनियो मान्ध में शनि या विस्त
बागवारी उरमही है। मगत ने प्रानोन पवियों ने अपने विषय में
मारमोन या है।
मनारायण रिपोपहार की प्राचिना से प्राप्त झारपारी--
Ta नाटा ही प्राय घर पनि सी है जिन्होने अपने नारी
समापना में पूर्वी थिए और याने इतना विना आरिपाया
रिया परम भनागण में आने २५ को पाना में भी अपना
गोबिल मिनी या है। पेणीमारी प्रस्तावना रो मारे
fawati मना भी है कि मामा
परि नारायण शनि र नारायन कान राम
माता पा, TRA मिल में जाम दिया पाम तो राम मी
सना 38 HRI
साराम नाम से परारको shranities) पम्प
जातगारो-पानुपर गोगा बिमाम मोरे
RATE INTERNATREAnthruits.)
SAnt.जिनमे
fair fav REnt
harनुगत Prfar to friend
1.मी.मी १९: Her FrantrAR
imentertaining

1 viii हरि भी मना है के frm में मात्र प्रमाणों? परिणाम र ५ मा प्रन्पों में गर्गम का है। इf नागरिमा ना कि मेका मनाया येगी रमपिता हो गरगा। मह स्मरणीय कमिलेपों में नारायण को कही भी पति भगवा किमी का पविता नई गया है। "मितीमयमारली परित' से अपना पहनारायन मन भर में । सुन का नियासी गिस्यगोत्रो मारम्बा ग्राम पर वह यम रोन-वंश के प्रवर्तक 'आदिगुर' के निमन्त्रणा अन्य मार मामलों के कन्नौज से जाकर बंगाल में बस गया था, जहा आदिमूर ने उगे कोई अनुष्ठान कराने के लिये दक्षिा में पान गांव दिन थे। धीरे-धीरे यह ग इतनी बड़ी हो गई थी कि भट्टनारापण को एक राजवंश का प्रयक जाने लगा था। परम्परा के अनुमार भट्टनारायण कलकता के वर्तमान 'टैगोर ः आदि पुरुप माना जाता है, परन्तु इसके लिये कोई प्रमाण संपलब्ध नहीं 'क्षितीशवंशावलीचरित', 'वराजघटक', 'राजावली' तथा 'दशिणारा घटककारिका, आदि वशानुवर्णन करने वाले अन्य इस बात मे तो एकः कि भट्टनारायण अन्य चार ब्राह्मणों के साथ कान्यकुब्ज से गोडदेश (बर आया था। लेकिन भट्टनारायण के कान्यकुन्ज से गौड जाने के कारण विषय में उनकी अपनी अपनी अलग कथा है । क्षितीशवंशावलीचरित के अनुसार आदिगूर शूद्र राजा था, इस चंगवासी वैदिक विद्वानों द्वारा उसके लिये मन करने से निषेध कर दें आदिसूर ने कान्यबुब्ज के राजा से योग्य वैदिक ब्राह्मण भेजने की प्रा की थी। दूसरी कथा के अनुसार कभी बगदेश में अनादृष्टि हुई या द्वारा वर्षा प्राप्त करने के लिये कान्यकुब्ज से पाच वापरा निमन्त्रित गये थे। वङ्गराजघटक' के अनुसार "आदिसूर' ऐसा यज्ञ करना चाहत जिससे भगवान प्रसन्न हो जाये । उसके राज्य में रहने वाले वाह्मण दिनकर गल नवता सचे तो के अनुसार धगदेश पर आने वाली विपत्तियों के लक्षण, सूर' ने उनके निवारण के लिये चयन से पांच बार भेजे । एक कथ के अनुसार इन ब्राह्म पो ने धार्मिक उत्पीड़न के कारण कान्यकुब्ज योग किया था। भट्टनारायण की जाति--कुछ विद्वानो ने भट्टनारायण की जाति के मे सन्दह दिया है। कुछ लोगो ने वैरणीसहार की प्रस्तावना में रायण द्वारा अपने लिये प्रयुक्त 'मृगराजलक्ष्मण' शब्द से निर्दिष्ट ज' उपाधि मिह' का सकेन देखकर उसे क्षत्रिय माना है। दूसरे उसके नाम के 'भट्ट' अस से उसे ब्राह्मण बतलाते हैं । कुछ विद्वानो ने सहारगन आन्तरिक प्रमाएो-जैसे, विदूषक पात्र का अभाव, कर्ण तथा शमा के कलह में अश्वत्थामा के प्रति कवि की सहानुभूति और तृतीय में राक्षस-राक्षपी के संवाद में 'बाह्मणशोणितं खल्वतद् । हरविशति' इस संदर्भ द्वारा ब्राह्मण जाति की श्रेष्ठता के प्रति कवि को घ. यादि-से देणीसहार के कवि को घाह्मण सिद्ध किया है। परन्तु नध्य यह है कि न तो 'मृगराज' उपाधि से भट्टनारायण को य मिद किया जा सकता है और ही अन्य दिये गये प्रमाणों में उसे Tण मिद्ध किया जा माना है। 'कवेमराजलक्ष्मणः' इत्रादि प्रमङ्ग से सष्ट प्रतीत होता है कि कवि स्वय को 'कविमिह' (कवियो मे सिंह के मन) बतलाना चाहता है। दूभरे यदि हम भट्टनारायण के समय में अथवा के पूर्व काल में क्षत्रियो के प्रचलित नामो पर दृष्टि डालें तो पता चलेग उस काल में धनिया के नाम के मन में 'सिंह' प्रायः नहीं आता पा पारायण के ब्राह्मण होने के पक्ष में श्रेणीसंहार से दिये गये आन्तरिक रसो मे भी बाई बल नहीं है, क्योकि उस काल में प्राह्मण की प्ठत र माता आदि के प्रति ब्राहाए-धर्मावलम्बी प्रत्येक मनुष्य का, चाहे यह को भी जाति या वर्ष का पा, समान विश्वास था। किसी विदोष प्रमाण के अभाव में जी, केवल क्षितीशवशावलीचरित -

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[i] - वैरणीसहार और रत्नावली मे ही दिये हैं। भट्टनारायण वैदिक से भली भाति परिचित था । प्रचलित परम्परा के अनुसार वह चार गणो के साथ यज्ञ कराने के लिये गौड देश गया था। इसकी पुष्टि इस होनी है कि उसने युद्ध को या वा रूपक दिया है।' छठे मन मे द्वारा गुप्तचरों को दिये गये निर्देशो से कवि का अर्थशास्त्र तथा राज. वन्धः शान परिलक्षित होता है । भट्टनारायण का कदाचित् भाषा पर कार नहीं स्वीकार किया जा सकता है। उसकी भाषा अनेक स्थलो नीय व्याकरण से असम्मत है । स्वयं काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति के रचयिता वेणीसंहार के तीन स्थलो पर भट्टनारायण के प्रयोगो को व्याकरण- द्ध करने का प्रयत्न किया है। यह निश्चय से नहीं कहा जा सकता गीसंहार मे व्याकरण सम्बन्धी अशुद्धियां भट्टनारायण के असाम> के ई हैं अथवा प्रचलित प्रयोग-पद्धति (Colloquialism) अपनाने के यत्रा महाभारत के प्रभाव से। (२) भट्टनारायण का समय रायण का समय निश्चित करने में आन्तरिक साक्ष्य का अभाव-जव क अपने समय के विषय मे कोई साक्षात् उल्लेख नहीं करता है तो मय नित्रित करने के लिये दो उपाय अपनाये जाते हैं-प्रथम यह । है कि क्या लेखक ने किसी पूर्ववर्ती लेखक अयवा घटना का नया है जिससे उसके काल की पूर्व-सीमा निर्धारित की जा सके । भट्टनारायण ने वेणीसहार में कोई ऐसा सकेत नहीं दिया है जिससे =प से यह जाना जा सके कि उसके समय को पूर्व मीमा क्या हा - महार २२५ - कि सभ्रमेण' २.१६ (इस संस्करण मे "भीक कि संभ्रमेण' पाठ वाया गया है); 'सयमयिनुमारब्धः' (इस सस्करण में 'सयन्तुमारब्धः' ३४); 'पनित वेत्स्यसि शितो' (इस संस्करण मे 'पतितं द्रक्ष्यमि ३४१)।

यालद्वारसूत्रवृतिका [ xii ] भट्टनारायण का समय निधि करने में आएगाय- दूसरा उपाय पह कि यह देखा जाय कि रा लेखक या गीति वा किन परवी लादलों उल्लेम किया है अथवा उगकी कृति में वणिन किमी घटना विशेष का किया है अथवा उसके किसी अंग को उद्धत किया है । इग प्रगार निती लेग. यां कृति का समय निर्धारित करने के उपाय का बाह्य माश्च वहने हैं। प्रकार के साक्ष्य से किसी लेखक अथवा कृति के समय की उनर सी निर्धारित हो जाती है। मौभाग्य से भट्टनारायण के समय की उत्तर मी निर्धारित करने के लिये पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। काव्याल वामन ने अपने अन्य में कितने ही उदाहरण वेणीमहार से लिये हैं * देणीसंहार के कुछ प्रयोगों को व्याकरणममत मिद्ध करने का प्रयल किया है ध्वन्यालोरकार आनन्दवर्धन, दशपक के टीकार घनिक, काव्यप्रकाश रचयिता मम्मट, सरस्वती-कण्ठाभरण के लेखक भाजदेव तथा दूमर अलङ्का शास्त्रियों ने अपने ग्रन्थों मे गुण दोष, अलवार तया सन्ध्यङ्ग आदि के अने उदाहरण वेणीसहार से लिये है। जिन लेखकों ने पपीनहार को है, उनसे सबसे प्राचीन काव्यसूयालदारवृत्ति र रचयिका दामन है। धाम फा समय ईसा की आठवी शताब्दी का मध्य भाग कहा जाता है पण्डितों में प्रचलित परम्परा के अनुसार यह वामन कश्मीर के राजा जयारी १७७९-८.३ ई.) का मन्त्री था। बामन ने अपने अन्त में भवभूति की को भी उदृत किया है। भवभूति कान्यकुब्ज के राजा यशोवर्मा का आधि या. जिसे ७४० ई. के लगभग कारमीर नरेदा मुनापोड ललितादित्य ने परास किया था। इसलिये काव्यालङ्कारमूत्रवृति या नमा बामन आठवी शताब्द के प्रथम भाग के पश्चात ही रहा होगा । ध्यानधारमुत्रवृत्ति और वाशिका वृत्ति के लेखक वामन एक नहीं हो सकरी, क्योकि काशिका का समय ६५० ई। से दाद नहीं हो गाता है। इसलिये भट्टनारायण का समय ईसा की आदर्य मतान्नी के मध्य भाग से पूर्व होगा। लेकिन वह वामन से कितने पहले हुआ है, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है। ति महोदय ने भट्टनारायण का गमय ईमा की छटी या मानवी शताब्दी १ दिये. मेवानल : बिस्टी मत लिira Yऔर ४३ उद्धृत बाश्मी - ..

[ xiii ] माना है। कुछ लोग प्राचीन परम्परा पर विश्वास करके भट्टनारायण को सेन- वदा के प्रवर्तक आदिसूर का समकालीन मानते है और आदिमूर का समय ईसा से पूर्व ३०० वर्ष मानते हैं। प्रो. विल्सन ने वेणीमहार का समय ईमा की वी या हवी शतानी माना है। उनके मत का आधार यह है कि अबुल जल के अनुसार आदिमूर ईसा की १३वीं शताब्दी में वर्तमान राजा बलालमन से पूर्व २३व राजा था, यदि मध्यवर्ती राजाओ के राज्यकाल की अवधि ३०० वर्ष मान ली जाय तो आदिमूर का समय ८वी या हवी पत्ताब्दी मानना उचित ही होगा। नियम महोदय ने सेनबा का शासन-काल ६५०- ११०८ ईम्बी माना है। एक अन्य स्रोत के अनुसार भी आदिमूर का समय, यदि आदिमूर और पूरसेन एक ही प्यक्ति हो नो, ६५० ई. के अस्सपास सिद्ध होता है। हान्नमांग के वएन के अनुसार मूरसेन नंगल के राजा असुवर्भव (६४४-६५२ ई.) की वहिन भोगवती का पति था । इसलिये आदिमूर और, परिणामस्वरूप, भट्टनारायण का समय ७वी शताब्दी का उत्तर भाग माना जा सकता है । भदनारायण सम्भवत भवभूति का समकालीन रहा हो। भट्टनारायण बाग का परवर्ती प्रतीत होता है। वाणभट्ट ने हर्षचरित को प्रस्तावना में पूर्वयनों कवियों के उल्लैग में भट्टनारायण और भवभूति का जयन नहीं किया है। हमलिये सम्भव है कि भट्टनारायण दाए के पश्चात हुआ हो। दूसरे, भट्टनारायण को भाषा और दोली में भी यही प्रतीत होता है कि वह बाए का परसी था। इस प्रसार भट्ट नारायण रा समय बही ६५०. और ७५० ई. के मम्प मानना बिल्कुल उचित और गम्भव प्रतीत होता है । (३) भट्टनारायण की रचनायें मनारायण म ममय रेषल एक प्रति देशीसहार उपलब्ध है। परत मुभादित-सम्हों मे महतारापण के नाम मे उन मे लोक मिलन है, जो वेणीमहार में नहीं पाये सारे । इसलिये यो सम्भव है कि भट्टनारायण जीरोई अन्य पनायें भी रही हो। प्रो. गजेन्द्रमार ने ग्मिीहरिशर्मा बारा प्रतिनिधि की गई पाबुभारपरित पी ए पानिषि के मापार पर

जापुnापीन
sar.great
महासागरमागायो-nitira
के गितगाउदा प्राRImamta
भिपात Tinutfraा। आगोष: मोति
प्रमाक्ति । महोयर भीम पीर मोर
पासिदाग भाति प्राचीन विमारी मुममे प्रमाका, मा
भट्टनारायण की प्रामा में किमी गुणन गुणा, प्रतुन मनाति
उससे प्रतीत होता है कि उसे अपने काश्य पर गर्व था। उमने स्परगे
गूचना नहीं दी है। रिन वेणीमहारपी भूमिका में जो सूचना मिलती है।
"कवेमृगराजलक्ष्मएः पहा है। यदि वेणीसहार के दुध सस्करणो में छठे अड़
के अन्त में पाया जाने वाला भोक, जिसमें कवि ने कालचक्र को उपालम्भ दिया
ए. बी. गजेन्द्रगडकर, दी वेणीसंहार: एक्रिटिकल स्टडी, पृ. २१.२२।
१
वही, पृ० २३ ।
(४) मग मा भनागमणगान
काव्यालोधों ने उमरीति निन्दा की है।
भट्टनारायण अपनी दृष्टि में-भटनागपण ने अपने विनर में कोई विशिष्ट
.

] [ XV है, भट्टनारायण की ही रचना हो तो प्रबट है कि उसे विपरीत परिस्थितियो में भी अपने इस 'महान् प्रबन्ध' की अमरता की कामना थी।' भट्टनारायण कवि के रूप में-मट्टनारायण ने अपने नाटक वेणीसहार मे किसी एम रीति का अनुसरण न करके भाव और परिस्थिनि के अनुमार गौड़ी और वैदर्भी दोनो रीतियो का उपयोग किया है। यद्यपि अनेक आलोचको ने कथावस्तु को शिथिलता और संवादो की नीरसता तथा उनकी भाषा की क्लिष्टता के कारण वेणीसंहार को कटु आलोचना की है, परन्तु उसके कवि-पक्ष की श्लाघ्यता के विषय मे सभी एक मत हैं । भट्टनारायण के काव्य में ओज, शनि, गति तथा प्रभावोत्पादकता है। उसकी भाषा मे बांकापन है जिससे वह भाव और रम के अनुरूप ढल जाती है। भट्टनारायण वीर, बीभत्ता करणा और शृङ्गार रस की अभिव्यक्ति में पूर्ण रूप से सफल रहा है । वोररस में उसकी पदयोजना ममामबहुल और ओजपूर्ण है। भट्टनारायण की एक अन्य विशेषता यह है कि वह ध्वनि और अर्थ वो पोजना की कला में निपुण था। उसकी अक्षरयोजना भाव के अनुरूप होती है । 'नश्चमुजभ्रमितचण्डगदाभिघात ' इत्यादि शोर मे सयुक्त अक्षरों की योजना भीम के क्रोध और उत्साह को प्रकट वरने में सर्वथा सफल रही है। इसी प्रकार 'मन्यायस्ताएंधाम्भः' इत्यादि श्लोक मे अक्षरो की योजना ऐसी है कि पाटर को दुन्दुभि के बजने की अनुभूति होने लगती है। भट्टनारायण ने छन्दो का भी समुचित प्रयोग किया है। कुरु धनोरु पदानि शनैः शन:' २।२० मे द्रुतविलम्बित, 'अथै बावा रणमुपगतो... इत्यादि ४११५ मे मन्दाक्रान्ता तथा 'मम हि वयसा दूरेणाल्प:' इत्यादि ६।२४ मे हरिणी छन्द का प्रयोग परिस्थिति और भावो की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति में अत्यधिक सहायक हुआ है। १ काव्यालापसुभाषितव्यसनिनते राजहसा गद्धा- स्ता गोडयः क्षयमागता गुगलनाध्यास्नु वाच. सताम् । सालंकाररसप्रसन्नमधुशारा; पवीना गिरः प्राता नाममयं तु भूमिवलये जीयारप्रवन्धो महान् ।। .

को [ xvi ] भट्टनारायण ने अनेकविध अलवारों का भी समुचित प्रयोग किया है। माभिप्राय पदो और काकु के प्रयोग के लिये भट्टनारायण विशेष रूप से उल्लेखनीय है । भट्टनारायण ने अर्थान्तरन्यास अलङ्कार का भी अच्छा प्रयोग किया है। उसके कुछ अर्थान्तरन्यास तो कालिदास के अनिरन्यासों के ममान सग्रहणीय हैं। उगने संस्कृत साहित्य को अनेक मूक्तियां भी दी हैं, जो अबसर पर उद्धृत किये जाने पर वक्ता के वचन को गौरव प्रदान कर सकती है। (देखिये, पृ० २६६) भट्टनारायण नाटककार के रूप में-नाटवकार के रूप में भट्टनारायण मफल नहीं कहा जा सकता है। भट्टनारायण का सब से बड़ा दोष यह है कि उमने अपने नाटक की कथावस्तु का आधार महाभारत की विस्तृत तथा प्रमिड कथा को बनाया। महाभारत की क्या को नाटक के कलेवर मे सीमित करने के लिये उसे वर्णनात्मक शैली का आश्रय लेना पड़ा। जिससे उसमें गतिहीनता सया शिथिलता आ गई। दूसरे अपने युग के प्रभाव के कारण उमने दोध- गमागयुक्त दोली का आश्रय लिया, विशषकर गद्यमय सवादात्मक भाग में, जिसके कारण उसरी भाषा नाटक के उपयुक्त नहीं रही। भट्टनारायण या एक अन्य दोष वर्णनो तया पात्रों के चित्रण मे अनुपात का अभाव है, जिससे नाटकीय प्रभाव नष्ट हो गया है। इन दोषों के रहते हुए भी वेणीमवार को एकदम असफल कृति नहीं कहा जा गरता है। भट्टनारायण चरित्र-चित्रण करने में, जो नाटक का एक थावश्या गुण माना जाता है, पूर्ण सफल रहा है। उसके पात्र महाभारत जनप्रिय क्या के लोर-विस्थान यनि है। इमलिये भट्टनारायण मी यह पी freह अपने पात्रों को अपने नाटक वो कथावस्तु के अनुरूप मधेच्य चितिनी माना था। फिर भी, उनके परित्रचित्रण में पिसदना या करीना वामीमहार के सीगरे न मे भट्टनारायण को नाटकीय व्यापार की दृष्टि में मधिल सालता मिली है। अवस्थामा औरणं का याकलह नाटकीय मार के गिरे पनि असमर प्रदान करता है। (आगे 'देणीसंहार की - . सीमायें भट्टनारायण पर पूर्ववतों कवियों का प्रभाव- भट्टनारायण अवश्य ही -पने पूर्ववर्ती कवियो के बायो से परिचित रहा होगा और उनका भट्ट रायण पर प्रभाव पड़ा होगा। लेकिन भट्टनारायण की ग्चना पर पूर्ववर्ती पो का बोई स्पष्ट प्रभाव लक्षित नहीं होता। भट्टनारायण को अन्य कवियों से तुलना-यह स्पष्ट है कि भट्टनारायण में शिरा जैसी स्वाभाविकता तथा सरमता, वाण जैसा परिकार और भवभून : उदातता नहीं है। मट्टनारायण कला की दृष्टि से हर्षवर्धन का समकक्ष नही कहा जा सकता । भट्टनारायण को द्वितीय धेणी का ही कवि तथा प्रकार कहा जा सकता है। भट्टनारायण की तुलना मुद्राराक्षस के रचयिता बदत्त से की जा सकती है। इन दोनो की भाषा में मोज तथा गति है। की दृष्टि से भट्टनारापण भवभूत्ते के समीप है। शैली की कृषिमना के पार गे भी पट्टनारायण और भवभूति मे ममानता है, लेकिन काश्य-कला दृष्टि से भट्टनारायण मी भवभूति से कोई तुलना नही हो सकती। प्राति भरता और मानव-हृदय के वित्रण मे भट्टनारायण में भवभूति जमी खाना नहीं पाई जाती ।

प्रयम अङ्क-मङ्गलाचरण के पधार मूत्रधार लिष्ट पचद्वारा इस
भाग २-वेणीनंदा
(१) गीगहारा नापतु
पूर्वमा-re और TROTAIT mari in
मार | irgu Tumn it. Tण
foनI RE भोना ती मग
विमानसी
रामे
और haini पी11 में PATR-TE # frमी
प्रवार पाय गममा को गमw m पा था ! Tv
इन्द्रप्रस्थ में अपना गया राम ग्याषितामिाा Afrन मन
भाने मामा पनि मी गहायका मे Mi में और सुमिरि को पूरा
पराजित गरये. अन्य पाण्डवों को और पानीप्रौदीको माना'
वमा पिया। भरी राजसमा में और बत्र तयारीपर
आमानित किया गया और पात्रो को १३ यायन में गया माया
में रहने के लिये विवश किया गया।
वनवास को जाते समय पाण्डयो मे कौरव राजकुमारों में प्रतियोर से
प्रतिज्ञा की। पाण्डव राजकुमारों में बनिय गवर-गुर भीम ने ;तिमा की
कि वह दु शासन के वक्षःस्थन से घिरमा पान नरेगा और दुर्योगन
जंघाओं को तोड़ कर उनके पित
गेली मेणीको यौधेगा।
नाटक, जमा कि इसके पीर ainterinutीपदों की सुनी।
के सहार (बांधने) पी पटगामा।
वनवास की पूरी करने के मा युधिहिरण को दून बन
माधि के लिये दुर्योधन के नाम समापार को मुनगर भीम
द्रोपदी दोनों ही रुट होते हैं, कि ये पोनी कारकों को पराजित करके।
अपमान का बदला लेना चाहते है । गही पाटकमा भारम्भ होता है।
।
-
नीम गधि कराने के लिये भगवान् ।

. [ xit ] दूत बनकर गये हैं। सूत्रधार के इस वपन को लेकर ही क्रुद्ध भीमसेन का कराया गया है, जो पाण्डयों को लाक्षागृह में लाने वाले, ग्पि देने तथा द्रौपदी के वस्त्र एव केशो को खीचने वाले कौरवो के साथ सन्धि परसा चाहना । भला उसके जीवित रहते अपकारी बौरव स्वस्थ कमे बते हैं ? प्रमावना के बाद नेपथ्य से इस उक्ति को दोहराता हुआ भीम महदेव के ओर की मुद्रा में मञ्च पर प्रविष्ट होता है। सहदेव मूत्रधार के वचन वा के अनुकूल अपं बतला कर उसे शान्त करना चाहते हैं, परन्तु भीम को थान पर विश्वास नही होता कि धर्मराज और उसके भाई कौरवों का नहेगे । उसे अपने बड़े भाई की सहनशीलता और निस्तेजस्विता पर होता है और वह बड़े भाई की आज्ञा के उल्ला वन का पाप स्वीकार करके कौरवो का विनाश करने के लिये एक दिन के लिये उन सब से पृथक् हो चाहता है। यह आयुध धारण करने के लिये शास्त्रागार की ओर जाना ला है, परन्तु क्रोध के आवेदों में दोपदी की चतु:शाला में पहुच जाता है। द्रौपदी को उसी दिन दुर्योधन की पत्नी भानुमती के हाथो नये अपमान चूंट पीना पडा था । द्रौपदी, सुभद्रा आदि सपलियो के साय माता गान्धारी पाद बन्दना करने के लिये गई थी। वहाँ भानुमती ने हैसकर द्रौपदी में था कि 'उसने सुना है पाण्डव लोग पांच गांव लेकर सन्धि कर रहे हैं लिये प्रौपदी को अपने केश बांध लेने चाहिये ।' द्रौपदी की सखी के मुख्य मे रदी के इस नये अपमान को जानकर भीमसेन का कोष और भी भड़क है। भीम और द्रौपदी दोनों ही सन्धि के प्रस्ताव से रुष्ट हैं। भीम 'दी को सान्त्वना देता है कि वह अवश्य ही अपनी फडकती हुई भुजाओं से भाई गई भारी गदा के आघात से दुर्योधन की जाधों को चूर्ण करके उसके ढ़ेि और चित्रने रुधिर से लाल हुए हाथों से उसके देशों को संवारेगा। इसी बीच नेपध्य मे नगाड़े की ध्वनि होती है और धवराया हुआ कञ्चुरी मसेन को सूचित करता है कि दुरात्मा दुर्योधन ने भगवान् वासुदेव को घने का प्रयल frया, परन्तु भगवान् अपने विश्वस्प से उसे पराभूत करके और सन्धि के प्रयत्न में असफल होकर शिविर में वापिस लौट आये हैं ।

इस घटना से असन्तुष्ट होकर युधिष्ठिर ने कौरवों के गिद्ध युद्ध की घी' कर दी है रणदुन्दुभि का दाउद गुनकर भीम प्रसन्न होता है । भीम सहदेव युद्धभूमि जाने के लिये द्रौपदी से विदा लेते है। द्रौपदी उनके । की कामना करती है और प्रार्थना करती है कि वह युद्धभूमि से लौटकर पुन मान्त्वना दें और क्रोधावेश के कारण युद्धभूमि में अपने शरीर की । न करे । इस पर भीमसेन पाण्डको की युद्ध-निपुणता से द्रौपदी को आ' करता है। द्वितीय अङ्क-युद्ध आरम्भ हो चुका है। भीष्म तथा अभिमन्यु : कुछ प्रमुख योद्धा मारे जा चुके हैं। भानुमती अपने पनि की विजय म कामना से व्रत करवा चाहती है। उसने रात्रि में दु स्वप्न देखा है, जिससे आशङ्कित है। सनी के आग्रह पर वह दुःस्वप्न को सुनाती है, जिससे देव प्रशंसन आदि उपायो द्वारा उसका शमन किया जा सके। स्वप्न में उसने दे कि नकुल ने सौ सौ को मार डाला है । इसके द्वारा गाटव कार ने भा घटना की सूचना दी है। राजा छिगपर भानुमती के स्वप्न के विषय में मुन है। पहले तो वह भी शक्ति होता है, पर बाद में गया हट जाती है । सूर्य पूजा करनी हुई भानुमती की दासी उपो ही किसी दूसरी परिचर्या में व्यस्त पर मायार मार रानी के सम्मुष्प उपस्थित हो जाता है। सूर्य-पूजा के ब हो मागत आता है, और दुर्योधन तथा भानुमती रागमहल में चले जा है। यहाँ उनमें प्रेमालाप होता है। इसी बीच जयद्रथ की माता आकर य गार देनी है कि अभिमन्यु के धध में दुःखी अर्जुन ने जयद्रथ का वध करने में प्रतिकारी है। मा को जयप की रक्षा का उपाय करना चाहिये । दुर्योध उमर भर को पूरपरले तपा मुख के लिये प्रस्थान पर है। नोव मरमबह के प्रवेगक में सक्षम-गक्षसी के द्वारा युद्ध भूमि कभीरता और द्रोण के वध पोषना दी जाती है। इसी अव में पिया र से ममता अवस्थामा बाग होता है। धार्य अश्वत्थामा ने माना हैं। पर दुर्योधन को यह मममा देना है कि द्रोण ने स्वयं गा, और एमी मिरे थे मारे गये। प्रोण यश्वरयामाको -- .. । +- - ! [ xxi l HER Tी का रामा नाना पाहां थे और अब अपामारे मारे जाने में १ भाग पास्महरना पंप लोकारही होग ने दुषी होरदार स्वागचा पारा मी भोप और मामा दुर्गन के पाग माने है और समामा पोधन ग उमे सेनापति यना देने को रक्षा है, जिग । में वह पिनी मृत्यु का माने हो । पर दुर्योधन ने पर्णको नानि ' बनने पर बचन दिया है। अभयामा और अधिरपुर होम, कणं और अवरपामा में वापर होता है। अभरयामा तव मा के सिरे पर न 3टाने निशरता है जब सररएं जीवित रहेगा। एमी बीम नेपथ्य से भीम बी मोति. मुनाई देती है कि मामन उसके मुडमा में भाबर हो गया है। थोरबह उमा मून पीने जा रहा है, यदि कोई औरत x पर गले तो करे। दुासन को मिसिगन थापाको गुनकर अवस्थामा पत्र प्रहरी परना पाहता है, पर बापासवाणो द्वारा अवरयामा को यह चेतावनी दी जानी से अपनी प्रतिज्ञापो मण्डित नहीं करना चाहिये। अवरपामा से हम बात का है कि वह दुशागन की रसा नहीं कर पाता और देवता भी पापदों के पक्षपाती है। अनुपं भर-दुर्योधन का मारपि युद्ध में प्राहा और भूच्छित दुर्योधन को युद्धस्थल से दूर ले जाकर उमरे रथ को. एक वर-वृक्ष की छाया मे खा कर देता है। क्षेत्रमा प्राप्त होने पर दुर्योधन को दु.सामन के वध का पता पाता है। वर्ष का सेवा सुन्दर दुर्योधन को खोजता हुआ वहाँ पहुँचता है और उमे पर्ष के पुत्र पसेन के वध की गूचना देता है और युट स्थल पी । गतिविधि से अवगम भगता है। सुन्दरक उसे पुत्र वन से निरामा और फुद्ध * होकर प्राणों का मोह त्याग कर पुद्धभूमि को जाते हुये पणं का सन्देश देता है । दुर्योधन भी अपने मित्र अबराम करणं की सहायता के लिये पुन. पुद्धभूमि के लिये प्रस्थान करना पाहता है, किन्नु इसी बीच पुनराष्ट्र और गान्धारी वहाँ जामा पहुँचते हैं। पचम बहु-पुत्रों के विनाश से व्याकुल हुए पुतराष्ट्र और गान्धारी एवं दुर्योधन को पाण्डवों से सन्धि कर लेने के लिये समझाते हैं, परन्तु दुर्योधन ने इसके लिये तैयार नहीं होता। वह गराइयों से अपने भाई दुशामन का प्रति. . .. 1 नयाँ न पोप मेना गाहा है | TTA TIMEmaint 1 गुमार देता है, m frमानीन मोहीमा दगी योन पनि मनानी, नम आने की संपारी या है। सभी श्रीग और अन ति में तो ग पार गने ए यह हम ना : श्री और हरते समय बदहियों का प्रयोगा। दुर्शन भाग नोटा और दोनों में पायुद्ध होता है। दुर्योधन भीम को हार के नियमन है, किन्तु अर्जुन भीम यो रोता मी धीर मोम और अ लिये युधिष्ठिर को बाहा गुनाई मी है कि अत्र पर ममाप्ति का ग गया है, इसलिये सेना यागि मोटा मी गायें। अनः युधिष्ठिरकी आ पालन करने के लिये वह वापिग सौट पहने हैं। भीम और अर्जुन में वापिस लौटते २ जम स्थान पर अभयामा मी जाता है । पुनराष्ट्र दुर्योधन को अवस्थामा का उठार स्वागत करने का देता है। अश्वत्थामा याने ही दुर्योधन के मित्र मरणं की निदा करने है, जिस पर दुर्योधन उससे रुष्ट होकर उपालम्मरता है कि अस्वस्थ एं के वध की ही प्रतीक्षा क्यो की; उसके वध की भी प्रतीक्षा कर लेवे, कि दुर्योधन और करणं मे कोई अन्तर नहीं है। इस पर अस्वस्यामा आमः होकर चला जाता है, परन्तु धृतराष्ट्र उसके प्रति अपने और गान्धा वात्सल्य की तथा उसके पिता के अपमान की याद दिलाकर भ्रातृय विक्षिप्त चित्त दुर्योधन की बात का बुरा न मानने का संजय द्वारा भेजता है। पष्ठ अङ्का के प्रारम्भ मे युधिष्ठिर को चिन्तित अवस्था में दिल गया है। भीम ने प्रतिज्ञा की है कि वह आज दुर्योधन का वध करके : प्रतिज्ञा पूर्ण करेंगा अन्यथा स्वयं आत्मघात कर लेगा। यह समाचार आ दुर्योधन सुपचाप एक जलाशय में जाकर छिप गया। बहुत खोजने पर भी न लगने से युधिष्ठिर अत्यधिक चिन्तित है। इसी समय एक पुरुष या देता है कि दुरात्मा दुर्योधन का पता लग गया है, दुर्योधन और . 2- - ( xviii ] से गदा युट हो रहा है। मपुर में भीम को विजय निभित है। इसलिये रण भगवान् ने सन्देश भेजा है कि युधितिर राम्याभिषेकापी संपारी परें और दौरदी अपने देगी-महारा उत्सव मनाये। राज्याभिषेक की तैयारी के लिये पुरोहितो तथा अन्य कर्मचारियो को बामा देशी जाती है, परन्तु इमी ममय पटना एक नया मोड मे लेती है । दुर्योधन । एक मित्र चार्वाr नाम का राक्षस मुनि का वेष धारण करफे. युधिहिर रे पाम आता है। यह इस बात का दोग रचता है कि वह भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध देखकर समन्ताधारी बारहा है, उसे इस बात का दुय है कि परद ऋतु की प्रचण्ड धूप के पारण यह अर्जुन और दुर्योधन के गदा युर को पूरा नहीं देख सका है । युधिष्ठिर अर्जुन और दुर्योधन के गदा युद्ध भी बात सुनकर चौता है। अधिक पूछने पर पता चला है कि कृष्ण के भाई बलराम द्वारा दुर्योधन को गुप्त संकेत कर देने पर गदायुद्ध मे भीम मारा गया है। युधिष्ठिर और टोपदी शोराभिभूत हो जाते हैं और मरने को तैयार होते है। चार्वाक पुपके से चिता तयार करके उसे प्रज्वलित करने के लिये यहाँ से चला जाता है। इसी बीच नेपथ्य में कोलाहल मुनाई पडता है । युधिष्ठिर इसे दुर्योधन का आगमन समझता है । द्रौपदी छिपने की चेष्टा करती है। रुधिर से लयपय शरीर वाला भीम मञ्च पर आता है और द्रौपदी के देशो को बांधने के लिये उमे पकड़ लेता है। युधिष्ठिर उमे दुर्योधन समझकर लडना चाहता है । अन्त मे बास्तविकता का पता चलता है । द्रौपदी प्रसन्नता से देणी वाचती है। वासुदेव और अर्जुन मञ्च पर आते हैं । चार्वाक नकुल द्वारा पकड लिया जाता है। युधिष्ठिर भीम और अर्जुन का आलिङ्गन करके हषित होते हैं और भगवान कृष्ण के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। अन्त में परतवाक्य के साथ नाटक समास हो जाता है। (२) कथावस्तु का स्रोत-महाभारत रामायण और महाभारत ये दोनों धीर गाया काव्य संस्कृत के अनेक । काव्यों तथा नाटकों के उपजीव्य रहे हैं । भट्टनारायण के वेणीमहार नाटक की -:

- Ixxit रगाव महामाय पी गई है। महताग में कवियों की मा महामारी भागानगर महामारी गुग या नावाने नाटकका माधार बनाया है। वेणीमहार का प्राराम भगवान श्री के राधि-प्रयत्न होता है, जो महामारी जोगार्य में आगा। नाटकी मासि युधिष्ठिर के राज्याभिक पर होती है, जो मानके मालिाई में पाया है। इस प्रकार वेणीमहार में महाभारत के उद्योगार्य मे लेकर पान्तिपर्व तक की घटनाओं को नाटक को आसानुगार प्राग-रयाग यूक संक्षिप्त परिवतिन तया सोधिन करके आनाया गया। (३) वेणीसंहार की कथावस्तु पर सोत का प्रभाव- परिवर्तन और उनका नाटकीय प्रभाव मूल स्रोत का प्रमाव-वेणीमहार के प्रायः सभी प्रधान पात्र, यम दुर्योधन की पत्नी भानुमती को छोड़कर, महाभारत में लिये गय है । मोटे तौर पर, घटनाओं के सूक्ष्म विस्तारो और छोटी घटनाओ को छोडकर वेणीसंहार की सब घटनायें महाभारत से ली गई है। महाभारत के मुख्य कथानक को चुनकर भट्टनारायण ने उसे अपनी कवित प्रतिभा द्वारा रोचक नाटक का रूप दे दिया है। परन्तु महाभारत की प्रसिद्ध कथा को नाटक का विषय बनाने में कुछ अमुविधायें भी थीं। महाभारत की क्था लोक-प्रसिद्ध घी, इसलिये भट्टनारायण इच्छानुमार नाटक की बावश्यक- तानुसार क्या में आमूल परिवर्तन नहीं कर साता था और न ही महाभारत के प्रसिद्ध पात्रो के चरित्र-चित्रण में कोई कान्तिकारी परिवर्तन पर साता १ साकृत के महाकाव्य और नाटक, जिनकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है, निम्नलिखित हैं:- -- कुमारसम्भव, किरातार्जुनीय, शिशुपालवध और नेपधीयचरित । .-मध्यमव्यायोग, पञ्चरात्र, दूतवाक्य, दूतघटोत्कच, कणंभार, वरुभन,' बालचरित (भास के ७ नाटक); अभिज्ञानशाकुन्तल और राजशेखर का. घालभारत। - xv] पानि पहाभारतरपा पुनने में नहा रारा'पारण मारक सिनेमामा कागती दो" हामी और पहचान भी है frritो उपक मारणों में परिषग मोर पानी पूरी होने में भने माया पो भी पान देना , निगगे पाटर पाणु-योजना में मारे घर में होगा। भादरान मेरि गए परिप-- वैरणीसह के पाना की महाभारत रिया से सुनना पने पा महनाराम द्वारा गुमरा में रिये गये रिमोहपारिनोवामानी रोपामगा है। महाभारतको सभा में गिरेप पर परिवार निम्ननिर्मागत है-- माग के प्रम में कार गाय को पर्व पर गधि का प्रग्नाव मेकर मायान् ए गये है। पर्योधन भगवान पामो पाने का प्रयत्न माता, रनुबह अपना INT प्ररर बरसे उसे अभिभूत कर देते हैं। महाभारत या पाच गोधों पर मधिरा प्रस्ताव प्रषम पायम लिया गया है। उसके ममपम होने पर स्वयं भगवान पा सन्धि पराने राप्रपान करते हैं । दुर्गापन श्रीरामोपडने गा पापन पता है. परन्तु मा जगने पर राष्ट्र उमें हारते हैं। महाभारत में भगवान् ने माने निश्चय कान दुर्योधन पर अपनी गति का प्रभाव जमाने के लिये किया है, न के उसमें उन्हें पहले के परन से विफल करने के लिये। सम्मम. भट्ट पाययण को यह परिवतन परलेपी प्रेयर मार के नवाकर से मिली है। महाभारत में अश्वथामा और कणं पा लह, को इस नाटक के सृवीय तुम दिलाया गया है, वर्ण और पके मध्य प्रारम्भ होता है, परन्तु विस्थामा उमे माने कार से लेता है। महाभारत मेणं और अपवरपामा कलह द्रोणाचार्य के वध से पूर्व होता है। नाटक में अश्वत्थामा और एं कसहाकारण पर्ण द्वारा द्रोणाचार्य श्री निन्दा है या यह घटना । सदर मविपरिषमानुरोपाता उदात्तकथावस्तुगौरबादा नवनाटकदमानकुतूह- सामदिरवधानं दीयमानमभ्यर्थये । वेणीसहार, पृ.८।

प्पन किया गया.मेरित उमरे धिरौपदी के मेग सवारने का न भी जिलानी नग्नी भानुमती, पायाला, गुल वाशिमगा उमीनी और री, पेटी पर गधी यादि बोरे पानी है। समावेगरमापूर्ण पर श्रीमति मग युधिर की पना [ xxvi ] दोगाचार्य की मृत्यु के पश्चात् दिखलाई गई है । नाटक में महाभारत के क्या क्रम में एक अन्य परिवर्तन यह किया गया है कि महाभारत में चाक रा: वा युधिष्ठिर की मभा में प्रवेश उसके हस्तिनापुर में प्रवेश करने के पश्र वर्णिन किया गया है और वह चार्वाक का उद्देश्य युधिष्ठि की निन्दा क है। परन्तु नाटक में मुनियेयमारी पार्वाक के माय युधिष्ठिर की भेंट प दिखलाई गई है। नाटक में चार्वाक वी अवतारणा नाटक के घटनाक्रम एक नया मोड़ देने के लिये की गई है। महाभारत में जलाशय मे छिरे हुये दुर्योधन का पता लग जाने पर युधि आदि मब वहां पहप गये हैं और दुर्योधन को युद्ध के लिये युधिष्ठिर । समारा गया है तथा युधिष्ठिर द्वारा दुर्योधन को यह दूर दी गई है कि में कोई मे भी पापडव से सह मरता है । नाटक मे दुर्योधन को के लिये मलारना तथा कोई मे भी पाउन से इन्दयुद्ध का प्रस्ताव भीम दिया गया, जबकि युधिष्ठिर अग्य स्पन पर है। स्प में मन उद्भावनायें-भट्टनागमण ने नाटक को आवश्यकर मनुमार मारयान के पटना-नमो में ही हेर फेर नही दिया गय पितु या भूनन उद्धायनायें भी की है। मवं प्रथम द्रौपदी के । महार पटना. गिग पर नारा नाम Trt, नविकी सबंधा मौ सदा है। महाभारत में भीष मा दुर्गापन के अहमीप्रनिता HERE भारती मारा रीमेग गया मायग्धी प्रश्नका रा.

Ixxiii ] पनि भारतीय प्रमा-मापिहो रहा गा पुरा है कि परतीमहार को पा महाभारत की गिर गया है। माटार सिता मारता म नि उसने महाभारत की गिरपा -कोमाराममात्र मानेर मे पतुएला गे मोमिन को में प्रभारी और रोकर बना है। महाभारतकोषाको रोलमाटर प्रारने में भट्टनारायण ने जो प्रतिमा दिपनाई है, वह सपा सामनीय है। मने महाभारलीरा पटनाको के क्रम बोर मयोग में जो परिरतन रिहै रुपानार को प्रभा बनाने के लिये जो मा उद्धापनायगी समगे नासीर मातरमन तपा पात्रों के पतिको अभिव्यमिता करमर मिला है। मंग्य और प्यायलों को एर में मिनारमय में पिकविता पी है, अपितु मगे मुताति' के मिये पृष्ठभूमि भी प्रदान की है पा इसमे युधिष्ठिर, भीम सपा दुर्योधन के परितों की अभिव्यक्ति के सिरे भी अवसर मिला है । भानुमती द्वारा दो से उरालम्मपूर्वक प्रान दिये जाने से घटना ने, जोक्किी अपनी पसना है. भीम प्रोध को और भी माता दया है, जो -गंहार द्वारा 'रेणीसंहार' का फल का बीज सिद हुआ है। दिसाय बर में भानुमती के साधन तपा वारया द्वारा रप-पत्र के मन से भावी पटनामों की गूपना मिलती है । इग अनु में पालोद्यान । पय पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती पदों में निवद्ध उतंजनापूर्ण परिस्थिनियो गे भन्न प्रकार की होमम परिस्थिति का सर्जन परके दर्शको के सामने मुपद रिवर्तन उपस्थित परता है। इस मद से दुर्योधन के चरित्र के दूसरे पक्ष पा को प्रभाव पड़ता है। इस यमपञ्चुकी की 'मग्न भगम्' आदि उक्ति द्वारा तारास्थानको योजना ने नाटकीय स्थिति उत्पन्न कर दी है। तृतीय अरू के प्रदेश में पिरप्रिप और उसकी परनो मी अवतारणा -रके रवि ने द्रोणाचार्य, भूरिश्वा और घटोत्कच आदि वीरो के वध की चना दे दी है बौर गाय ही दुःशासन के रधिर-पान के जघन्य प्रत्यको देखिये, वेणीसंहार पृ. २६ ।

( xxviii) अन्तःप्रविष्ट राक्षम द्वारा किया गया मूचित करके भीम के चरित्र की कर ली है। द्रोणाचार्य के वध को जानकर पाठक को यह जिजामा होती है अश्वत्थामा जैसे पराक्रमी वीर ने अपने पिता के अनुचित मरण या बदल न लिया? उसने भीम से दुःशामन की रक्षा क्यो नहीं की ? कवि ने अश्वर और करणं के कलह और दुर्योधन द्वारा करणं . पक्षपातपूर्ण व्यवहार के । कर्ण के जीवित रहते दास्त्र त्याग का चित्रण करके तथा आकाशसंचारिणी की योजना करके अश्वत्थामा के ब्रह्मतेज तथा स्वामिभक्ति की रक्षा की है चतुर्थ अङ्क लम्बे वर्णनात्मक सवादो तथा भाषा की लिएता के यद्यपि नीरम हो गया है; तथापि यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सुन्दर अवतारणा करके कवि ने महाभारत की लम्बी कथा को एक छोटे से म चतुरता से समेट दिया है। युद्धभूमि से भेजा गया कणं का सन्देश और पर दुर्योधन की प्रतिक्रिया दुर्योधन के चरित्र का उद्घाटन करती है। अ अन्त में घुतराष्ट्र और गान्धारी का मन पर प्रदेश दुर्योधन को कर्ण की सह करने से रोक देता है, जिससे पाण्डवो के लिये कर्ण के वध का मार्ग प्र हो जाता है। पांचया अद्ध, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, ववि को अपनी उद्भ है। इस असे न तो क्या आगे बढ़ती है और न ही नाटकीय व्यापार गति मिलती है, प्रत्युत इसमे नाटकीय व्यापार में गति-रोध उत्पन्न हो है । परन्तु इसे पुनराष्ट्र और गान्धारो की वास्मल्य-भावना, दुर्योधन के स्द मान तपा अपने दिवगन मित्र करणं के प्रति अनुपम प्रेम एव अश्वस्या मात्माभिमान की अभिव्यनि की दृष्टि से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है । पवि ने र अर में दुर्योधन वा सर्जन और द्वन्द्वयुद्ध का प्रस्ताव भीन मुव से करार सर्वथा उचित किया है, क्योंकि नाटक में व्यापार का मुस्य कप में भीम ही है । मीम की अनन्यदिनगामिनी दुर्योधन-वध की प्रा . पाकनी अवतारणा ने मुधिष्ठिर के भामृप्रेम पी अभिव्यक्ति का ... लिया है। पाक के हस्य भी यो... + - में [ xxx ] + नया मोड मिला है और ववि ने करुण रस की अभिव्यक्ति के लिये इसका अच्छा उपयोग किया है। (४) वेणीसंहार की घटनाओं का स्थान, समय तथा अवधि वेणीसंहार की घटनाओं का स्थान-वेणीसहार नाटक की घटनाओ का स्थान प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र है, जिसे नाटक में समन्तापञ्चक यहा गया है। लेकिन प्रत्येक के व्यापार का स्थल अलंग अलग है। कभी कभी एक अङ्क निबद्ध व्यापार के भी स्थलो मे परिवर्तन हुआ है। प्रथम अङ्क का व्यापार पाण्डवों के शिविर के किसी एक भाग में प्रारम्भ होता है, जो द्रौपदी पतुःशाला से बहुत दूर नही है। बाद में व्यापार का केन्द्र द्रौपदी की चतु शाल हो जाती है । द्वितीय अह के व्यापार का केन्द्र दुर्योधन के प्रासाद का अन्तःपुर उससे सलग्न बालोद्यान तथा दारप्रासाद है। तृतीय अह का व्यापार युद्धक्षेत्र के किसी भाग में प्रारम्भ हुआ है और बाद में एक वटवृक्ष के अधोभाग स्थानान्तरित हो गया है। चतुर्थ अह मे वस्तुतः पोई नाट्य-व्यापार नहीं है लेकिन प्रारम्भ मे अट्ठका हश्य स्थल युद्ध -क्षेत्र और बाद में दृश्य-स्थल वह से कुछ दूर स्थित कोई सधन छाया वाला वटवृक्ष हो गया है, जो सम्भवत तृतीय अङ्क में उल्लिखित वटवृक्ष ही है । पञ्चम अङ्क के व्यापार का स्थान भी यही वटवृक्ष है। छठे भर के व्यापार का केद्रस्थान युद्धभूमि से कुछ दूरी पर स्थित युधिष्ठिर का शिबिर है। इस प्रकार नाटक के व्यापार का दृश्य-स्थल युद्धभूमि, दुर्योधन का राजमहल और उनके ही समीपवर्ती अन्य स्थान हैं। नाटक के व्यापार के दृश्य-स्थलों में ऐसी दूरी अथवा विषमता नहीं है जिसके पारण नाटकीय व्यापार मे या उसके प्रभाव में व्याघात हो। वेणीसंहार नाटक की घटनाओं का समय और अवधि जैसा कि पहले कहा जा पुरा है, नाटक की पथावस्तु मे १८ दिन चलने वाले महाभारत-चुरा भी घटनाओ का समावेश हुआ है। नाटक के प्रारम्भ में कृष्ण द्वारा सन्धि कराने के प्रयत्न का उल्लेख हुआ है। सन्धि कराने के प्रयल की घटना वास्तविक युद्ध प्रारम्भ होने से एक या दो मास पूर्व हुई होगी। महाभारत के .

अनुगार यूज अनुपनि पापा TRICT EिANIIT माग दो मेमा मपटनाओंभारनी भाप में nिf| प्रपम मntil at तिने के बार हए कृष्ण के समाचार समापन भाग firm #r मनमा में शोधाविष्ट भीमगेन के रजम पर प्रोग मे प्रारम होना सामु बारामा गई पुल-पोषणा पर ममागहोगा। :ग प्रकार प्रपम मः महाभारस गुरु के प्रधानी पटना ओ ना। द्वितीय महमा म्यापार भीरम तथा अभिमन्यु की गुपवार भारत होता है। महाभारत के अनुगार भोरम और अभिमकाया क्रमशः मुर १०हैं और ३ दिन हुआ पा। मार हिमीप अ में महाभारत युन के:१४ दिन की घटनाओं का समावेश हुआ है। सृतीय मर का व्यापार घटोर की मृत्यु पम्पा उस दिन प्राराम हुआ है जिस दिन द्रोण का वध हुआ था। महाभारत के अनुसार यह पटना युद्ध के १५वें दिन हुई थी। इस प्रकार दिनीय और तृतीय अनु को पटना लगातार दिनों की घटनायें हैं। धनुषं और पशम अद्ध में भी उसी दिन की घटनामें हैं। षष्ठ अङ्क मे उल्लिसित चल्य, शनि और दुर्योधन के वध की घटना महाभारत युद्ध के १८ दिन हुई थी। इसलिये पाचवें और छटे अतु की घटनाओं में दो दिन का मध्यान्तर समझना चाहिये । इस प्रकार नाटक में महाभारत युद्ध को पहले, मौदहवे, पन्द्रहवें और अट्ठारहवें दिन की घटनाओं का समावेश किया गया है । प्रथम अङ्क की घटना का समय युद्ध के प्रथम दिन का पूर्वाल है और व्यापार की अवधि लगभग प्रातः ८बजे से ११ बजे तक रही होगी। द्वितीय अस को घटना का समय युद्ध के १४वें दिन का पूर्वाह है और अवधि लगभग प्रातः ८ बजे से ११ बजे तक । तृतीय अङ्क की घटना का समय युद्ध के १५वें दिन का मध्याह्न है। 4 अङ्क की घटना का समय उसी दिन का अपराह भाग है और पञ्चम

[ xxxi ]
का समय उसी दिन की सन्ध्या है। पष्ठ अङ्क की घटना का समय युः
१८ दिन का उत्तराध है।
कवि ने एक अङ्क मे एक दिन से अधिक की घटनाओं का समावेश :
के 'कालगत अन्विति' (Unity ot time) का पूरा पूरा पालन किया है ।
(५) वेणीसंहार का नाट्यशास्त्र की दृष्टि से विश्लेषण
संस्कृत नादयों के प्रशर-सस्कृत काव्यो का प्रयोग की रिसे दृश्य को
न्य दो धगि यो मे विभाजन किया गया है। दृश्य पाञ्चो को नाटय,
रूपक भी कहा गया है। दृश्य काव्यों के लिये वाजवल हिन्दी भाषा
टक सन्द प्रचलित है, परन्तु संस्कृत के नाटकशास्त्र सम्बन्धी अन्यों में नार
द दृश्य काव्य के एक विशेष प्रकार के लिये प्रयुक्त हुआ है। हाय-वार
फिर रूपक और उपरूपक दो भेद किये गये हैं। संस्कृत के नाट्यो ।
पय रस माना गया है और उनके वस्तु (कथानक), नेता (नायक) ओ
न के बाधार पर और आगे उप-भेद किये गये है । रूपा के १. और उ
रक के १८प्रकार होते हैं।'
सात मान्यों का रचना-विधान | Structure of Sanskrit
ramas)-संस्कृत नाटकों की बाह्य रचना लगभग एक ही प्रकार की है
दृश्यथव्यवभेदेन पुनः परार्य द्विधा मतम् । साहित्य पंण, ६१
अवस्थानुनिश्यि रूप दृश्यतयोग्यते।
पकं तत्ममारोवाद पाधव रसायम् ॥ शरूपक १७
नाटकमध प्रारणं भागण्यायोगसमवशरहिमाः।
ईहामृगानीयः प्रहगमिनि हपकागिस
नाटिका बोटकं गोही सट्टा नाट्यरामम् ।
प्रधानोलाप्यकाव्यानि प्रेहणं राम तपा
सला धीगदितं मिल्प पविलासिका।
दुलिस प्रकरणी लीयो भाणि ति॥
प्राहरूपाणि मनीषिणः ।
एपी लक्ष्म नाटवन्मतम् ॥ साहिदप .
.

1 frii मका प्राय गाती (TETAIT) है। मार रजम र प्रल 147 मर्ग को पो के लिये पूजा गया है। Tiraram दे पाना पता भाग Irrfan front और प्राय: माटको प्रयोग गम की मी मनामदनी में पारिवारिया मायामा काम मिmat व भपया रिपी प्रगृपना दे।' द्वापार के 4 साको मायगाना में भाग लाना है। वस्तुनः नाट्य-मार प्रागारना के नाम राम है। ध्यापार से गम्बर पटनाओं को दो प्रकार में प्रस्तुत निमा आया है। घटना सरम और मुख्य पान (माया) गे गगर और बिगावर रङ्गमञ्च पर अभिनय किया जाता है, समपा ममावेश अमेरिया जाना एक अङ्क मे प्रायः गायक रो सम्बन एक दिन की परना पसीवाली परन्तु जो घटना नीरस, आर में अदनीय आपा मधिक समय तक पनेर होती है अपवा जब दो अफ्री में निवदी गई पटनाओं के मम अधिक न अवधि का अन्तर होता है तो उनसरी देवनमात्र सूचना दे दी जाती है।' प्रकार घटनाओं की सूचना नाटक के जिस भाग में दी जाती है, 'अर्थोषक्षेपक' कहते हैं। यदि मूल से ही सरम कथा प्रारम्भ हो जाती है १ साहित्य दर्पण २२ दशरूपक ३२ २ केवल भास के नाटक और दक्षिणी भारत में प्राप्त कुछ अन्य नाटकों पाण्डुलिपिया इसके अपवाद है । ३ दशस्पक ३।३-८, साहित्य दर्पण ६२७, २८, ३१.३२ ४ दशरूपक ३१३६, २७ ५ साहित्य दर्पण ६५१, ५२ ६ अर्थोपक्षेपक ५ प्रकार के होते हैं- विष्कम्भक, प्रवेशक, धूलि अङ्कावतार और अङ्कमुग्व (अङ्कास्य)। अर्थोपक्षेपक के ये भेद पात्रों कोटि, नाट्यशाला मे स्थिति और अङ्क से सम्बन्ध के आधार पर f गये हैं । देखिये, साहित्यदर्पण ६१५४-६० -. .

[xxxiii ] स्वायना के तुरन्त बाद अरु रक्खा जाता है। लेकिन यदि अभिनेक घटना को परिस्थितियों को सुरोध बनाने के लिये कुछ पूर्ववर्ती घटनाओ मूचना ना अपेक्षित होता है तो प्रस्तावना और प्रथम भक्त के मध्य में विष्कम्भक योजना की जाती है। प्रथम अङ्क के आदि में आवश्यकतानुसार केवल किम्भक का ही प्रयोग किया जाता है। दो अद्दों के मध्य में विष्कम्भक , था अन्य अर्थोरक्षेपों-अधिकतर प्रदेशका प्रयोग किया जाता है। वेणीसंहार में प्रस्तावना के तुरन्त बाद प्रथम अङ्क प्रारम्भ हो जाता है । हा विष्कम्भक के प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती है। प्रथम और द्वितीय के मध्य में विष्कम्भक का प्रयोग किया गया है और द्वितीय तथा तृतीय के बीच मे मवेशक का । शेष अङ्खों के मध्य कोई अर्थोपक्षेपक नहीं रखवा म संस्कृत के कुछ नाटकों में अडू के मध्य मे मुख्य पात्र के चरित से सम्बद्ध घटनाओं को नाटक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है (उदा., उत्तरराम- रित सप्तम अडू, प्रियदर्शिका तृतीय अङ्क।। अद्ध में आये नाटक को र्भा' कहते हैं। । सस्कृत के प्रत्येक नाटक का अन्त भी, प्रारम्भ के समान, पद्यमय शीर्वचन से होता है, जिसमें लोक अथवा आश्रयदाता राजा या स्वयं कवि कल्याण की कामना प्रकट की जाती है। पारिभाषिक शब्दो में इस पद्य को रितवात्रय' कहते हैं। संस्कृत नाटकों में भाषाओं को दिविषता सस्कृत नाटकों की एक अन्य शेपता यह भी है कि उनमे संस्कृत के अतिरिक्त कई प्रकार की प्राकृतों का रोग किया जाता । नाट्य-शास्त्र के नियमो के अनुसार राजा, देव, मन्त्री, ह्मण आदि उत्तम पात्रों की भाषा संस्कृत होती है और अन्य पायो को भाषा कृत। उत्तम स्त्री पात्रों की भाषा प्रायः शौरसेनी होती है और नीच पात्रों ? मागधी । पद्य मे शौरसेनी-प्राकृत भाषी पात्रों को महाराष्ट्री प्राकृत के प्रयोग विधान है। जो नीच पात्र जिस देश का हो, उसे उस देश की भाषा बोलने विधान किया गया है।' । जानकारी के लिये साहित्यदर्पण, ६।१५८-१६६ देखिये ।

- । | rtirl भारताrtinnrxt-remi wir रिटी में rमा है। जो 1 R T Afrre in नाlfATमराने mrat art. संगों में गरम होता है। (Rd, ariaT. ३१) । जोrma fit को पामही होगा, उगे Amar ITI पा हो।" से पहले गमा" या मारमग Raffinfrren गवाद नियतधामपा है। निमारा होता है- (१) बनाना और (२) मारमा उस विषारर में अन्य पात्रों को हार को पार हो परस्पर मन्त्रणा करते है, उमे 'माता' कहा जाता है। ऐने पहले "जनान्डे' पा जनान्तिका निर्देश दिया होगा। कोई भोर को मुहार या दूसरे स्थान पर जागर किसी दूसरे पात्र कार करता है, उसे 'अपवारित कहते है और ऐसे सपन से पहले 'सा या 'अपवाय' निर्देश दिया रहता है।' कुछ संस्कृत नाटकों में ऐमा भी पाया जाता है कि कोई पात्र र १ सर्वश्राप प्रकाशं स्यात् । साहिरपदर्पण १३९ २ अधान्यं खलु यतस्तु सदिह स्वगतं मतम् । साहित्यदर्पण ६०:३७ ३ उदाहरणार्थ, वेणीसंहार पृ० २१६ १र अश्वपापा की उक्तिः । ४ उदाहरणार्थ, वेणीसहार पृ. २२ पर सहदेव की उक्ति । ५ त्रिपतारकरैणान्यानपवार्यान्तरा क्याम् । अन्योन्यामन्त्रणं यत्स्याजनान्ते जनान्तिकम् ॥ साहित्यदर्पण ६।१ ६ उदाहरणार्थ, वेणीसंहार पृ. २४ पर द्रौपदी की उक्ति। तद्भवेदरपारितम्।। रहस्यं तु यदन्यस्य परावृत्य प्रकाश्यते ॥ साहित्यदर्पण ६१३८ उदाहरणार्थ, वेणीसंहार पृ० ५२ पर । .

[ xxxv ] पत्र के बिना ही मागास वी ओर मुम उठाकर प्रश्नोसर करता है । इर के प्रश्नोत्तरात्मक सवार को 'आवासभापित' कहते है और पवार 'आकासमापितम्' या 'आपा नि लिगा रहता है।' bणीसंहार : नाटक, एक का एक भेद - घेणीसहार हपकों के एक भै की कोटि में आता है। कवि ने स्वयं वेणीस हार को नाटक कहा है। शास्त्रि के अनुसार नाटक का वृत्त त्यात होता है। नायक धीरोदार है और कोई एक रस अङ्गी होता है । यद्यपि कुछ नाट्यशास्त्रियों का सक्षण करते हुये यह कहा है कि नाटक में शृङ्गार अथवा पोर र अन्यतर मुस्म होना चाहिये, लेकिन सब नाट्यशास्त्री इस मत से सहम है, क्योकि यदि इस सिद्धान्त को अक्षरशः सत्य भान लिया जाय त ररामचरित' यादि नाटकों की श्रेणी में नहीं आ सकेंगे। यानन्दवर्धन स्वीकार किया है. किनाटक मे किसी एक रस की प्रधानता होने ये। नाटक पांचों सन्धिपों वे युक्त होता है। नाटक में कम से कम पा- भधिक से अधिक दस अद्र होते हैं। विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में नाट- लक्षण इस भरार दिया है- नाटकं स्यातवृत्तं स्यातच ग्धिसमन्वितम् । विलासदर्धादिगुणवद् युक्तं नानाविभूतिभिः ॥ भुव.वसमुदभूति नानारनिरन्तरम् । पञ्चादिका दशपरास्तत्राद्धाः परिकीर्तिताः ।। कि बीपीति यनाट्य विना पात्रं प्रयुज्यते । श्रुत्ववानुक्तमप्यर्थ तस्यादाकाशभाषितम् ॥ साहित्यपररा ६।१४. उदाहरणार्थ, वेणीसंहार पृ० ४६ और २३६ पर कञ्चुकी की उक्ति में तदिदं कवेगराजलक्ष्मणो भट्टनारायणस्य कृति वेणीसंहारं नाम नार प्रयोक्तमुद्यता वयम् । वेणीसंहार पृ०८ एक एव भवेदगी ङ्गारो बीर एव का । साहित्यदर्पए ६१० प्रसिद्धेऽपि प्रबन्धाना नानारसनिबन्धने । एको रसोऽङ्गीकर्तव्यस्तेषामुत्कर्षमिच्छता ॥ ध्वयालोक ३१२१

"
In
प्रतिका
Barrierfeat Mar ॥
पभोगmnRTI
भामा मा गmfirit
-IIT मलाणा ।
गागमा पानी ३10-11
वेणीमहारी मा महामार मे मी भगानी ग.
गुधिष्ठिर धीरोदारा नाम, वीरपान | Tोगत
रो युरत है और मन में गमाम हुमा । वेणीमहार में नीर ए
अतिरिक्त करण, शनार पोर बोमग गो) मी हि है।'
प्रसार वेणीगंहार में नाटा प्राय: गभी माए है।
येगोसंहार में अपंप्रति, अगरया और सन्धिका पिणार-पो कहा
चुका है कि साहत रूपों का आश्रय रग होता है। गपी अभिमान
लिये विसी सरस क्षा का मारा लिया जाना है।कोमया और म्याप
में गति तथा सहृदय की उरगुभसा बनाये रमने केमिये नाटककार गेर
वस्तु के क्रमिक विकाम और मुश्लिष्टता की भोर भी प्रदान रहना होता है
रस और क्या (वृत्त) दोनों के सम्यक् विकास के प्रयोजन से नाटकारों
भार्गप्रदर्शन के लिये अर्थप्रकृति, कार्यावस्था और मन्धि तथा मध्यो।
विचार किया गया है, जिससे कषि उन्हें जानकर रसाभिव्यक्ति के लिये उन
यथायथ संनिवेश कर सकें।
किसी नाटक की कमावस्तु की घटनायें दो प्रकार की होती है--
(१) आधिकारिक, (२) प्रासङ्गिक । मुख्य पटनाओं को, जो अधिक
1 धागे 'वेणीसहार का नायक दीपंक देखिये ।
२ 'वेणीस हार का मुख्य रस' शीर्षक देखिये।
३ रसयक्तिमपेक्ष्ययामङ्गाना संनिवेसनम् ।
न तु केवलया शास्वस्थितिसंपादनेच्छया ।। साहित्याए १२.

[ xxxvii] समाति) चा अपिारी में सावट होती है, winnरहने। गिरिरा वृत्तरे पुन. तीन भाग होते.- (१), (२) दु और "पा । प्राष्ट्रिात भी दो प्रकार होता है- (१) TATTI, जो नासमें पति रमता, (२) प्रकरी, चो वृत फेवन एक भाग परता है। पार्य (प्रयोगन) मधा मे बोर, चिन्तु, पसारा, प्रकरी पररान पांच अपं-मातिहा जाता है।' पसारा और रीमा कप में होना अनिवार्प नहीं है। पायं पाराम जी इस पोहा गा पद दिया जाता है. वह धीज के मान बने में विस्तार वाला होता है. अनिमे वीर' पहनाना है।" लोसंहार नाटक में होगटी के बेगसयमन र कार्य का है। प्रथम अमें पनिरर भीममन कोप से उपविर युधिष्टिर 41 उरमाह को अनु। क२४ मे मभिव्यक्त हमा. 'बीज' है। अवान्तर प्रयोजन की समाप्ति पर प्रश्न होती हुई कथा को जोड़ने वाले माग को चिन्द्र बहने हैं।' पेरणीसंहार दिलीप मधुमे दुर्योधन की हार-पेप्टाओं से चिन्छिन होता हा मुप- पारसला और जयाय की माता के प्रवेश से पुनः डा जाता है, क्योकि अधिकार फसस्वाम्य माधिकारी चतरप्रमुः। समिसमभिधारि वृत्तं स्यादाधिकारिकम् ।। दयारूपक १५१२ वीर, बिन्दु पौर कार्प को यपि पिसी नाट्यशास्त्र सम्बायो ग्रन्थ में स्पष्ट हर से आधिकारिक वृत्त नहीं कहा गया है, परन्तु ये वृत्त के भाग ही प्रतीत होते हैं। बोजविन्दुपताकास्यपकरीकार्य लक्षणाः । अर्थप्रातयः पञता एना: परिकीर्तिताः । दशरूपक ११० ? अल्पमात्र समृद्दिष्ट बहुधा यदिसति । फलस्थ प्रथमो हेतु: तदभिधीयते ॥ साहित्यदर्पण, ६५६५-६६ यथा प वैणीसहारे द्रौपदी शसयमनहेतु मक्रोधोपचितमुधिष्ठरोत्साही बीजम् । रूपक १३१७ पर धनिक की टीका। अवान्तरार्थविच्छेदे विदुरच्छेदकारणम् । दशरूपक, १।१७ -- ག ४ भवेदारम्भ औत्सुक्यं यन्मुख्यफल सिद्धये । साहित्यदर्पण, Urmila धानोपानी ना marr Imastara है पर जमरा सनी mea. परने पर 1 पान गुनी frna गनिय द्वितीय में 11 सौ भाग की mal गममता पा।ि' गाmrimar * पवार नगर में भीन का परिसरा पारा में भREAL Treatfr और उसका रे गा मद भी TITY' हा नाग मुम्म भ्यार की प्रालि में पह प्राङ्गा ही है। पार्ष अतुपुर के पुस्-वर्णन मोभीपापा में गम्मिनित franा गाना है। में गराष्ट्र द्वारा दुर्योधन को गन्धि के सिपे गमाना और चाका हरय 'प्रारी' कहा जा सकता है। देणीमहार में दुग्न तर 'कार्य' है, जिसकी गूचना पाउ मद के मो में दी गई है। पलाी द्वारा प्रारम्य मार्य की पाच आरपायें होती है-(१) प्रार (२) यस्न, (३) प्रारयावा, (४) नियतालि और (२) फलागम । कार्य। पहली अवस्था 'आरम्म' होती है, जिसमें फस-प्राप्ति की इस प्राट जाती है। धेणीसंहार में कार्य को 'आरम्भ अवस्था भीमगन की 'चञ्च भ्रमितपण्ड । ' इत्यादि उत्तियों में परिलक्षित होती है। मार्य को दूर अवस्था 'यल' है । फल की प्राप्ति न होने पर उसे प्राप्त रने के लिये मिलाइये, ए० बी० गजेन्द्रगडकर, दी वेणीसंहारः एक्रिटिकल स्ट पृ० ११६।- २ व्यापि प्रासङ्गिक वृत्तं पताकेत्यभिधीयते । यथा-रामचरिते सुग्रीवादेः, वेण्यां भीमादेः शाकुन्तले विदूषकस्य परिठन् साहित्यदर्पण ६।६७ ab और वृत्ति। ३ अवस्थाः पश्न कार्यम्य प्रारब्धस्य फलामिः । आरम्भयत्नप्राप्त्याशानियताप्तिफलागमः ॥ १ दशरूपक, ११९ ६७१ [ xxix) . पार रियाता, उगे 'पन' या "यरन पर है।' बेनीवहार में नीच भर में गाय को माता द्वारा निम पागौं, विशेषत मन, राम राम' अवाया है। "प्रापया' या 'पानिगमानी जीप बरपा है. जिममें फर-प्राप्ति के उपाय और मम माने बारे विनी frपार करने पर पमरी प्राप्ति गम्भा प्रोत होने समे' वेणीमहार पृ. १३४ पर भीममेन की मोम महसुपारे .निपतित: परस्यता कौरव.' हंसत. पृ. १२१ पर अरगापामारो सपा नीत दुनामनगोरिस भी मैन' नति और पतु भर में लोक २, ३, ४ ओर ए में दुर्योधन की पृयु को सभावना को प्रापयामा अबरपा है । जर माय के दूर हो जाने र पल-प्राप्ति निश्चित हो जाती है, तो वह पायं की नियताति' पदस्पा है। वेणीमहार में बनागय में घिरे हुए दुर्योधन का पता लग जाने पर गदाला पारा भेजा पपा का सन्देश और युधिष्ठिर समारम्भ की पारी बाबा (पृ. २३४, २१६) कार्य गरी नियतासि' अवस्थाको भूषित ररता है । जव ममा पल-प्राप्ति हो जाये, कार्य की उस अवस्था की प.नागम' या 'पलपोग पहने है। वेणीस हार में द्रौपदी काश-सयमन मी पलागम' अवस्था है, जिसका पृ. २८२-८३ पर लोक संख्या ४२ में उम्प हमा पांच मर्य-प्राति और पवि बाविस्याओं को मिलाकर उनके आधार पर नाट्य-शरीरमा एक तीसरे प्रकार मे विभागीरण किया गया है, जिसे सन्धि कहते हैं। एक सन्धि में एक प्रयोजन से अन्वित कांगों का एक अवान्तर १ प्रयत्नस्तु फलावातो व्यापारो तित्वरान्वितः । साहित्यदर्पण, ६७२ २ उपायापायाद्वाम्या प्राप्त्याचा प्रातिसमयः। सरूपक, ३ पायाभावतः प्रासिनियतात्तिः सुनिश्चिता। दरारूपक १२१ ४ सावस्था फलयोगः स्यात् यः समग्रफलोदयः । साहित्यदर्पण १७३ ५ अर्थातयः पञ्च पन्चावस्थासमन्विताः । ययामस्येन जायन्ते मुखाद्याः पञ्च सत्ययः ।। अन्तरंकायसम्बन्धः सन्धिरेशान्वये सति । दशरूपक १०२२-२३

II.
गेन ।' fuोती है
प, for writer, afterMrinite
में जमा प्रायन, armirent ATTn
Tr
येतोगहार के प्रपम में मुrammar
मात्र है। मोर ग ग पि।
परमर में दुर्योधन के zfee मे पेप गाने भीम प्रोन
विधि है।ग पानामा की गगागिन सिंग मारे
गार-शास्त्रिों में कामी गधियों के भी ग्राम विभाग frati
गायत महगे है और जिनकी गया (१२+१३+11+1+t
है । वेणीसंहार में न समतों को यहां गिनाना सम्मानित
पाटों को इसके लिये शम्पा या गाहिर देगना मादिरे
राध्यङ्गों के उदाहरण अधिपता रनावमी भोर देगीगहार से निक गरे ।
(६) वेणीसंहार की समीक्षा
वेणीसंहार की विशेषतायें-कार (z.xiv-xvii) 'मला माहि
में भट्टनारायण का स्थान' शीर्षक के अन्तर्गत भट्टनारापण के विमें
नाटककार रूप का विवेचन करते हुए वेणीसंहार के बाप-यातमा नाट्यम
की ओर सकेत किया गया था । वेणीसहार नाटक से नास्य-शास्त्र त'
अलङ्कार-शास्त्र के विद्वान् अस्यधिक प्रभावित रहे हैं। उन्होंने बाने मयों
भनेक उदाहरण वेणीसंहार से लिये हैं । इसी से संस्कृत साहित्य में वेणीसंह
की सैद्धान्तिक महत्ता प्रकट है।
यद्यपि वेणीसंहार नाटक अपने समग्र रूप में सफल नाट्य कृति नही पह
जा सकती है, क्योंकि उसमें वस्तु-ययन की शिथिलता का बड़ा दोष है, तपाई
उसके अङ्गों का यदि पृथक पृथक् मूल्याङ्कन किया जाय तो केवल चतु
अंक को छोड़कर उसका प्रत्येक अंक अपने आप में एक मुन्दर प्रमावपूर्ण
१ एकेन प्रयोजनेनान्वितानां कथाशानामवान्तरकप्रयोजनसम्बन्धः सन्यिः ।
दशरूपक २३ पर धनिक की टीका।
1

[Li ] जाति प्रतीत होगा। प्रम में भीष की एवं उत्साह मे पूर्ण और नुरूप पद-पोरना पार बलात् पमान पर देने वाली भट्टनारायण ने विरोधी पम्पिनियो के सपन की पोजना में नाटर में गृहणीयता मानी । म अब भीम को जोधपूर कियो और मान-पन्य दोराहा निराध में युधिष्ठिर को स्थिरता और शामित- ना पाठकको उम बनापूर्ण परिपनि में पान्ति-दायर सिद्ध होती है। सोधी परिस्पिनियों का यह मघष ही नाटर का प्राण है, जिसमे पाठक -म-विभोर हो जाता है । निीय अ भी प्रपम अके विरोध मे हो -ना गया है । तृतीय पद में बीभरम, पण और वीररस को एक दूसरे के प में सा गया है। मी प्रगर पदम भर में करण और वीरता पणा है। महनारायण ने प्रथम और दिनीय दोनो ही अशी में बड़ी पतुरता मे अमर पर दोहरे रक्ष्य की योजना की है। प्रथम अङ्क में द्रोपदी रङ्गमज्ञ प्रविष्ट भीम और सहदेव के वार्तालाप को मुनती है और भीम के पाविष्ट होने पर प्रपन्न होती है। द्वितीय अङ्क में दुर्योधन भानुमती और की गमी के वार्तालाप को सुनकर नाल के प्रमाको मात्री-पुत्र पाण्डव' सम्बद समझकर क्रोधावेश में बार भानुमती को दण्ड देने का निश्चय ता है. परन्तु मौभाग्य से उगे वस्तुस्थिति का पता चल जाता है और एक रो दुर्घटना होने से बाल-बाल बच जाती है। पाठक कदाचित दुर्योधन के स्वयं भी- दिप्ठ्यार्पश्रुतविप्रलम्भजनितकोपारहं नो गतो दिल्या नो पर साधकपने किश्चिन्मया प्याइतम् । मा प्रत्याययितं विमूदहृदयं विश्व्या कथान्तं गता मिप्यापितयानया विरहितं विष्ट्या न जातं जगत् ॥ वेणीसंहार २०१२ - .

गा। सिरापिधार, प्रेग्रीगहार मारतीय मिदारता को ध्यान -सिमाना र नानोको विशेष ध्यान में रखने यापनहो गया है। [ XLii ] इन शब्दों मे सन्तोष का अनुभव करेगा। द्वितीय अरु स्वयं मे यद्यपि महान् नाटकीय सभावनाओं से भरपूर परनु मुख्य नाटकीय व्यापार को गति और प्रभाव देने की दृष्टि में इन कुछ भी महत्त्व नहीं है, प्रत्युन युद्ध-व्यापार की पृष्ठभूमि में, जो कि न के ममन शरीर में ओत-प्रोत है, दुर्योधन की काम चेप्टायें मर्वथा अनु हैं । प्राचीन नाट्य-शास्त्रियों ने भी वेणीमहार के इस स्थल को 'अकाण्ड-प्रर नामक रस-दोष के उदाहरण के रूप में उद्धृन दिया है। रस की अभिव्यक्ति, सबादो की चुस्ती और चरित्र-चित्रण में उभार दृष्टि से यही वात वेग सहार के तृतीय तथा पञ्चम अड्डों के विषय में । जा सकती है। तृतीय और पञ्चम अङ्क स्वयं मे सुन्दर नाट्य कृति हैं, प मुख्य व्यापार की प्रगति के विचार से ये दोनों ही अद्ध निरर्थक हैं। चतुर्थ अक को किसी भी प्रकार इलाघनीय नहीं कहा जा सकता पो यह अब मुन्दरस के लम्बे २ नीरम सवादो के अतिरिक्त कुछ यह अ. नाटकीयता की सगावनाओ से सर्वधा मून्य है । पष्ट अक युधिष्ठिर वे भ्रातृप्रेम और काम-रम की अभिव्यक्ति दृष्टि में प्रगमनीय है । यह अंक नाटकीय व्यापार से भी भरपूर है । फिर घाति परस की तारणा से मुख्य व्यापार मी परिणति में अनार मास उपस्थिती गई है। • भीमहार में भायात्र के नियमों का पालन-सा कि पहो नि जा कि वेणीगंहार नासा नाय शास्त्र तथा अलमार मात्र के से निषिय यहागमे यह महर ही अनुमाम लिया जा मत fraiलहार में मान्य बनामों का डोरता से पालन fre । 11 Xi Arrhim PRE 0r crant wrst ront REnfanti aurt Ein- HOMET: trinar nare. म Ini | ratan Arrantire PARATION : ग भी समान main | Anant get Antilet x पापा मार मोगर सभागातीarina Timi पुगामाहापामास पनिारायण ने गिता अनुपम अगर सा । भट्ट गायक मी गो गान भूमिपमान है । महनारायण में भोर मुष्ट माउबाल गौरी, मारा गमाग हिल भी और भगाम पायापी तीनों प्रसंग पिया है। (आर.xv भी देगिये बीहार में परिवnि-प्रमाण देजीमहार में परिष- कीरनाम मिनहारिन गिा है। मी उगम पात्र महा

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[ XLV ] भीम के मुकाबले में दुर्योधन भी कोई कम गर्वित और रोषपूर्ण नहीं है । नारायण ने दुर्योधन का चरित्र-चित्रण करने में और उसके अनेक रूपोका दर्शन करने में अधिक प्रयल किया है। द्वितीय अद्ध मे जहाँ हमे दुर्योधन के नारी रूप का दर्शन होता है, वही उसके विपत्ति में भी अत्रस्त और अपने ल के गवित वीर रूप का भी दर्शन होता है। स्वप्न दर्शन एवं ध्वजमा के पशकुन से आशङ्कित पानुमती बरे अरश्वस्त करते हुये वह वहता है-- 'स्वं योधनकेसरीन्द्रगृहिणी शवास्पद कि त ।' दुर्योधन सचमुच ही वीर-सिंह है। ह अपने शत्रु का प्रत्यक्ष में ही अहित क ना चाहता है। भीम द्वारा यह स्ताव करने पर कि यह शस्त्र धारण करके कोई-मे भी पाण्डव से द्वन्द्व युद्ध कर रता है, वह प्रियसाहस भीमसेन से ही युद्ध की मांग करता है- 'कर्ण- शासनवघातुल्यावेव युवा मम । अप्रियोऽपि प्रियो यौद्ध त्वमेव प्रियग्राहमः ॥' देशीसहार ११)। दुर्योधन केवलमात्र गर्वित एव अभिमानी नामक ही ही है, उसके जीवन का एक अन्य कोमल रूप भी वेणीसहार में प्रस्पुटिन आ है। वह एक सच्चा और भावुक मित्र भी है। वह अङ्गराज का भिन्न मित्र है और मित्र की विपत्ति उसे अपनी विपत्ति अनुभव होती है। हि कर्ण की मृत्यु होने पर अपने प्रिय अनुज दुनामन के वध को भी भूलकर अपने मित्र के घातक के कुल को नष्ट करने का निश्चय करता है । देणीसंहार, २०१६ । प्रत्यक्ष हतबान्धवा मम परे हन्तु न योग्या रहः । किंवा तेन तेन तरिव कृतं पर प्रकाश रहो।। वेणीसंहार ५.६ । शोधामि सोच्यमपि पाहतं स वरस, दुशासनं तमघुना न घ वाघुवर्गम् । येनातिदु.प्रवमसाधु कृतं.तु पणे, वर्तरिम तस्य निधनं समरे कुलस्य ।। बेशीसंहार १६ [ XLvi ] युधिष्ठिर का वेणीगंहार के प्रथम पद में उल्लेप हुआ है और रङ्ग पर केवल पाठ अङ्क में ही कम होता है। इस प्रकार भट्टनारायण ने युधि के चरिम चित्रण क लिये, जो नाटक का मुम्प मापक है, बहुत ही कमर दिया है । युधिष्ठिर गान्त स्वभाव और ज्ञानि-अप-भीर है । वह अपने एक । के बिना भी जीवित रम्ना नहीं चाहता । पष्ठ अङ्क में भीम द्वारा अनन्याः गामिनी प्रतिज्ञा कर लेने पर उमी आगङ्गा तथा चार्वाक दृश्य में भ्रातृप्रेम कारण उपरी आतुरता में उसके चरित्र पर अच्छा प्रवास पड़ा है। कृष्ण को भट्टनारायण ने विष्णु के अवतार के रूप में चित्रित किया कृष्ण का उन्लेख प्रथम और षष्ठ अडु में हुआ है और मन पर प्रवेश में पष्ठ अस के अन्तिम भाग म हुआ है। परन्तु कवि ने, जैसा कि कृष्ण के रोकनाई गई - 'तत्कथय महाराज, किमस्मातर समोहितं सपादयामि' से प्रतीत होता है, कृष्ण को नाटक की घटनाओं के सचालक के खता है। अधरयामा नाटक के तृतीय और पञ्चम अङ्क में कुछ समय के लिये में है । भट्टनारायण न अब-यामा को पितृवत्सल और स्वाभिमानी वीर पुरु रूप में निविन है। यह स्वामी का हित करने के लिये अनुम स्वी करने के लिए भी पार हो जाता है, परन्तु देव उसे वैसा करने से देना है। उसे इस बारा पक्षाता है कि यह वर्ग के प्रति क्रोध में की प्रभिजागा ने स्वामी पाहिम नही कर गया। पण मी केयर में गमय पर आता है और द्वितीय, ६ और पट में गाया है। चतुथं अक गे गुन्दरक ने उ सपन ! और दुर्गे: मो रमना गदेश दिया है। एमएल वीर महीनरी, प्रत्युन सिजमीनीतिज्ञ [ XLvii] । वह द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात् दुर्योधन के मन को द्रोण और अश्वत्थामा के प्रति विषाक्त कर देता है। - घृतराष्ट्र एक पुत्र बत्मल पिता है। वह युद्ध में पराजय और पुत्र-विनाश को देखकर अपने एक मात्र असिस्ट व दुर्योधन को वचा लेने के लिये उसे धिष्ठिर से राधि कर लेने की मल ह दना है। अव दुर्योधन सन्धि के प्रस्ताव । सहमत नही होता है तो धृतराष्ट्र से शत्रु के प्रति पट का अवलम्बन करने का सुझाव देने में भी सोच न करना। - . द्रौपदी रोप'और प्रतिशोध को भावना में भरी हुई क्षत्राणी है, जिसे युधिष्ठिर के मधि प्रहाय और भी उत्तेजित कर देते है । उसे अपमान के सागर को पार करने में एक मात्र भीम का सहारा प्रतीत होता है । वेणीसहार में द्रौपदी का दूसरा रूप- पति की सुरक्षा के विषय में स्त्री-सुलभ सहज आशका और पति-प्रेम भी प्रस्ट हुआ है । भानुमती एक आदर्श हिन्दू स्त्री के रूप में चित्रित की गई है। वह केवल गुन्दरी ही नहीं है, अपितु सदगृहिणी भी है। पति की विजय मङ्गल की कामना के लिये यह व्रत और उपवास रखर र देवो का आराधन करना चाहती है। एक -धर्मभीर हिन्दू स्त्री के समान वह मकुनो और निमित्तो में विश्वास रखती है । गान्धारी पुत्र-वत्सल माता है । इसे इसी मे मन्नोप है कि उसका एक पुत्र तो बच जाय । पुत्र की रक्षा के सामने उसे राज्य या जय हेय है- 'स्वमपि सावदेकोऽरयान्ययुगलस्य मार्गोपदेशक । तचिर जीव । किमे राज्येन जयेन चा। (वेणीसहार पृ. १८२) । देणीसंहार का नायक-- वेणीमहार में महाभारत के कई प्रमुम पात्र नापक है और भगारायण उनमें से किसी एक के चरिध का इननी प्रमुखता से विकाम नही कर सरा है कि जो असदिग्ध रूप से नाटक का मुख्य नायक - माना जा सके। इसलिये यह प्रश्न विवादासद एवं जटिल हो गया है कि

-
Ext.viina
वेणीमा gr mr marriant gar
नगिन, भोग fufire
कमि rinak f fame sir होतो
दुर्योधन का नारा प्रथम प्र FTET ftir, gir, म
भोर पक्षा में पहर 3ITTI और IT.
उसका बार बार 7 मा है। नर को मिति,
भी है। इस मा नाटा में दोनो गान को दे
को मुख्य नायर का पर दिया जा सपना है। कुपों मे, जागीरहर
यो काण-रम प्रधान दुमाल नाटा (trngels। मानो, दुर्योधन को।
वेणीसंहार का मुख्य नायक मानने । परन्तु दुर्योधन को मुल नारा पान
मे भारतीय नाट्यशास्त्र के इस प्राचीन मिलान गे विरोष पाता है कि कम
भी अधिकारी का वध नहीं दिखलाना चाहिये, पयोंकि घर मर में दुर्यो
के वध को सूचना दी गई है।
।
भीमसेन भी नाटक के प्रथम, पक्षम तथा पठ अह मे रगमन प
उपस्थित रहता है। तृतीय और चतुर्थ अष्ट्र में भी नेपथ्य से कही गई उम
गर्वोक्तियो तया सुन्दरफ द्वारा वर्णन किये गये उसके पराक्रम से निरन्त
उसकी सत्ता का भान बना रहना है। द्वितीय अङ्क मे कञ्चुकी के भग्न भने
भीमेन' इस वचन से पाठक का ध्यान भीम की ओर आकृष्ट होता है। नाटक
रामचन्द्र राव : ट्रेजेडीज् इन् सस्कृत, प्रोसीढिाइ आफ एट्य ओरियण्टर
कान्फ्रेंस, १६३५ पृ० २९६ और मागे, पाण्डेय तया व्यास : सस्कर
साहित्य की रूपरेखा, द्वितीय सस्करण १६४८, पृ० २१३-१४ ।
नाधिकारिवध कापि । दशरूपक, २३ अधिकृतनापस्वधं प्रवेशकादिना
पन मूचयेत् । वही, घनिक की टीका।
१

(XLix ] पुख्य प्ररोजन द्रौपदी का केश-संयमन मीम द्वारा ही सम्पन्न किया गया है। प्रकार श्रीम, दुर्योधन के अनन्तर दूसरा पात्र है, जो सारे नाटक में छाया है। इस कारण प्रो. ए. वी. गजेन्दगडकर ने भीम को वेणीसहार रा । नायक माना है। लेकिन भीम को नाटक का मुख्य नायक स्वीकार करने मी प्राचीन नाट्य शास्त्रीय परम्परा आडे आती है । नाट्यशास्त्र के निधान्तों अनुमार नाटक के नायक को धीरोदात-महासत्त्व, प्रतिगम्भीर, क्षमावान्, (तस्पन, स्थिर, निगूढावार और हरवत होना चाहिये । लेकिन भीम रोद्धत प्रकार का नायक है । सारा नाटक उसरी गर्वोक्तियों से गूंज रहा है। घृतराष्ट्र और गान्धारी के सम्मुख भी वह वाणी पर रायम रखने का प्रयत्न करता है । अहवार, रोप एवं उच्छलता उसका स्वभाव है। इसलिये पीन परपरा के अनुसार भीमसेन को नाटा का मुख्य नायक स्वीकार नहीं या जा सकता। मन मुस्य नायक पर का अधिकारी केवल युधिष्ठिर रह जाता है । प्राचीन यशारत्र के सिदानों तथा प्राचीन असहारियो के मत के अनुसार युधिष्ठिर । वेणीसंहार का मुख्य नायक है। युधिष्ठिर धीर, प्रशाल तया अविसरपन पिक है। रवि को भी पदाचित् युधिष्ठिर को ही मुख्य मास मानना अभीर । संस्कृत भारको की यह परम्परा है कि मारक के उामहार में अभिमत सपीमामना को प्रायः भरतवार के रूप में होती है मुरूप नायकमुष कराई जाती है। वेणीसहार में यह कामना युधिष्ठिर में कराई गई है। नभ्र, पुरीसमाति पर भत्रु-वध सवार्य ग मुरूपयात 'राग्य की प्राप्ति दुधिहिर को होती है। मुधिडिरदेश के बिना पुरको प्रारम नहीं हो दीवेणीसंहार : एमिटिल स्टी.पृ.१२.१३। २ महासरसोनिगम्भीरः क्षमावानपिरन: । पिशनिमहारो पीरातो १ न. ५ [ XLx ] सकता था। इसलिमै नाटक का मुख्य व्यापार वस्तुत युधिष्ठिर को ३७ अधीन है। भीम और अर्जुन आदि पाण्डव युधिष्ठिर के आदेश में ही चर है। युधिष्ठिर को मुख्य नायक मानने में केवल एक बाधा है, और वह यह' कवि ने मुधिष्ठिर को नाटक में बहुत ही अला स्थान दिया है और युधिपुिर चरित्र के विकास की ओर कवि का ध्यान नहीं गमा है । युधिष्ठिर को उन्ने केवल प्रथम और पञ्चम अड्डु में हुआ है और रङ्गमञ्च पर प्रवेश तो कर छठे अङ्क में ही हुआ है। युधिष्ठिर के प्रति किये गये इस अन्याय के लिये । में अनुपात-हीनता की भावना हो उत्तरदायी है। येणीसंहार का रस-जमा कि पहले (पृष्ट xv) में कहा गया है, वेणीसंह म वीर, बीभत्स, करुणा और शृङ्गार रस की अच्छी अभिव्यक्ति हुई। रिन वेगोराहार के मुख्य नाय के समान, उसके मुख्य रस का प्रश्न । विवादासद बन गया है। प्रथम अङ्क में वीर रस की प्रधानता है तो द्वितः अदमे गार रस की। तृतीय अङ्क मे वीर और करुण रस समान रूप पाया जाता है। तृतीय अरू के प्रवेश में बीभत्स रस की भी म्यञ्जना। है। धनुषं बार में मुदरत के युद्ध-वरांन में पति वीरों के पराक्रम मा का हा है, मेशिन वृषसेन की मृतु और उस पर और दुर्योधन की प्रति के वर्णन में गएन रम की प्रधानता है। पशम अमेधून राष्ट्र और गाया पुत्र विमा तपा दुर्योपन के वर्ष की मृत्यु पर किये गोक प्रशासन Pा रम है, मेकित थाके भन्त में दुर्योधन और भीम को उक्ति-प्रत्युक्तिः में कराया जाता है। परमपण गोपानसा है। भीम गोत मम र पुराने के लिये जाल युधितिरकी उक्तियो वीरतापूर | HamRAT R में नीर और का निरातर यात! जनपर बलमदारकोप-रम प्रधान नाटक माना है।

{ XLxi) हार को पीरमा मार मामा । युट मानिस मालो पोपहाड़ी पर मानते है। थेगार में जाति-वर्णन-जीमहार में प्राति-बरन की बोर में पमान नहीं दिया गया है। परन्तु फिर भी मिीम अक में प्रभार परागत मुदा चित्र स्पिन frया गया है। सिर में वारपा प्रानि बटोर परागरम चित्र है। उपयुम पदों की योजना गरी उमा देने में पूर्ण 7 मे गरम रही है। गोसंहार में नामादिक अवस्था--वेणीसहार पोरावस्तु महाभारत त बास्थान पर आधारित है और वेणीसंहार मुरूप रूप मे घटना-प्रय है, गुलिय गोमहार में यह आशा नहीं की जा माती उससे क हमप के समाज की स्थानों पर अधिक प्रास पोगा परन्तु फिर का पन भागो (नवीय और पसर) से रवि के समय सामाजिक अपर सुख प्राय अस पहना है । भानुमती के स्वादन की घटना में प्रन है कि उस समय भी समाज में, विशेषतः थियो में शकुन और निमिः विचार किया जाना था और लोगों का यह विश्वास था कि देवाराधन त निपाट आरिद्वारा उनके बुरे प्रभाव को दूर किया जा सकता था। मर पन्दन से भी लोग भावी घटनाओं का अनुभव करते थे। वज-भङ्ग पान मममा जाता था। मृतकों को जलसर्पण किया जाता था। म यि मृनागौच की भी प्रथा प्रचलित थी। ब्राह्मण को अवध्य मममा जा । कभी २ स्त्रिया पति की मृत्यु के पश्चात सती भी हो जाती थी। बंगीसंहार में प्रयुक्त छन्द - भट्टनारायण ने वेणीसहार मै १८ प्रकार पा उपयोग किया है जिनमे प्रमुख श्लोक, वसन्ततिलका, पार्दूलविक्रीडि र सम्परा हैं । (वेणीमहार में प्रयुक्त एन्दों के लक्षण पृ. २६८

[XI.xii ]
येणीसंहार का रवनी माटी पर प्रभार-मगारा के शो
ने केवल नाटा A HA-TITfreों को ही आzlfr
है, प्रत्युन उग पर नया अन्य व्यापारी अपने प्रमाति
हैं । अपरकोप के प्रमिद टीकार शीर मामी ने देगीगहार मे अनेक र
पये है। वीं पनान्दी के प्रगिट कवि रानगर के नाटक यारामा
वेणीस हार का अनुकरण स्पष्ट का में देखा जा रहा है। राजनर
मुग से महलाई गई 'मरामममममणं भुवनमा निर्यानरम्' 17
(अंक ८, ५७) दर्पोक्ति में 'केशवमपाण्डवं भुवनमय नि.मामात्र
(वेणीसंहार ३, ३४) का स्पष्ट अनुकरण प्रतीत होता है। इसी प्रकार
कर्ता हरचापदण्डदलने यनानुमन्ता नन्। टा यध परीक्षिता पयह
च वत्ता च यः' इत्यादि परशुराम को उक्ति में वेणीसंहार में अश्वस्थामा
'कृतमनुमतं दृष्टं वा यरिदं गुणातरम्' (अंक ३, २४) म उक्ति की
ध्व न प्रतीत होती है।
रावण के
- शिवराज याची

नीमहनारायणामतिम
वेणीसंहारम्
जगद्धरकृतटिप्पण्या भापान्तरेण च समेतम

च सदस्यानामपि नेत्रानुराग विदधास्विनि माद रोजमिनहरिबर
कृष्णाददये प्रकोपः विस्तीएः । इदेरनापूजोपरणीभन इति भावः । अ
नद्वारा देवता प्रीता स्यात्तथा च निर्विघस्वयमाम इनि
अपालिपदेन लक्षणयाऽजलिस्थपुष्पारि सम्पन्न । पुन बोहराल
लुलितमारन्तः पुरोवतिभ्रमरैः पीतरमः । कीरचः । निषिद्धरपि निगरित
करादिचालनन निवारिता अपि पराभरसतोभासतन्तस्त इति भावः।
निपिदैः धर्मशास्तनिधिई। धिकाशिसोदजुष्टानि कुमुमानि विवर्जयेत् ।
प्रथमांड:
FFERT
mart: मभिमानः ।
FAmit tait नमनगुमनामनगम
प्राण. Tarfreer arria :
माfrieyini Trail
मायामाRTHRITE. I
माम निधि MARITER.
सोपूपानगामी पा"
गुपदेशमागाय विमा नि।
श्रीनगदी पिको पिगुमा ।।
रह तावतिदिन प्रारिणिगिरिमा !
नान्दीमुनाह-निपितति । पुणामति: : Hrur fnak
करोतु । पीडीम् । अस्य सवराः राभाया. मनमुभा नीनियननीन् ।
र

हली बारी मार गमिहार पाप Maurya प्रथम अकः (दार-बार) हटाये गये भी न भोरों द्वारा गिरे गये मधु पाली, चन्दना की किरणों द्वारा मध्य भाग में, मानो, ग्यात. (अतः) दिलीई कनिका, विराट के घरों में विसेरोपई, पह गुमनों को मनसि हमें इस सादे मेघों को मन्त्री साने वाली सफलता प्रदान रे || मनुवचनात् । पुन. श्रीहन । संभिप्रमुकुल. प्रफुल्लातिमा । अत्रोत्प्रेक्षित वारणमाह- मन्तः अभ्यन्तरे इन्दोः करः चन्द्रकिरण. दुरित इष। सपा प मुधाकरकरमपादिव प्रफुलतेति भाव । मारन्दः पृष्परमः इत्यमर । अत्र हिमरररस्पन्मुिकुलमभेदेन निशाचरप्रकाश्यानि कुमुमानि योग्यनया विवक्षि- तानीनि देचिन् । मामान्यत पुप्पामोह विवक्षितानि । प्रफुमताहेतृघोरप्रेशिनो. न्यत्रस्य इव । न्यया चोत्प्रेक्षाग अपराह्न । उत्प्रेक्षा प -अन्यथव म्धिना वृत्तिश्चेतनस्येतरस्य वा। अन्ययोत्रक्ष्यते या तु ताम्रप्रक्षा बिदुर्बुधा ।। इति लक्षिता । विशन्दाचारप्रेक्षाभिव्यञ्जकः । तथा च दण्डौं । मन गहू धुद प्रायो नूनमित्वमादिमिः । उत्प्रेक्षा व्यज्यते तान्दरिव शब्दोऽपि ताश. ॥ इत्यपरे ।। मरतो मधुकरो मधुनिइ इत्यमरः । भानुः करो मरीचि इति च । भिती दारितसंगती इति च । मत. समिति मयति इति शास्त.। [पाणिनिकुजः प्रमृतिः] ती युतावञ्जलिः पुमान् । इत्यमरः । इह नान्दी विभि इलोकेंदिश- पदा । तदुक्त संगीतसर्वस्व-प्रास्तपदविन्यामा चन्द्रकीतनान्दिता । आशीर्वा- परा नान्दी योग्य मजलान्विन ।। वाचिवादापदा नान्दी काचिदएपदा तथा। मूत्रधार पठेना मध्यम स्वरमाश्रितः । चन्द्रमकीर्तन पत्र तदधीनो रसो मतः। प्रीते चन्द्रमसि सोता रसारिति भातुतिः ॥ इति । तथापि पद केवन विभास्वन्तभूचिरे। चित्तु पद पद्यस्य चतुर्थ भागमाहुः । तदिह द्वितीय- - - रविमगदुपा तमाचार्य पुनर्मङ्गलमाचरनान्दीनिर्वाहायमाह-कालिन अपिच अपि च कालिन्द्याः पुलिनेगु केलिकुपितामुत्सृज्य रासे रसं गच्छन्तीमनुगच्छतोऽश्रुकलुपां कंसद्विषो राधिकाम् । सत्पादप्रतिमानिवेशितपदस्योदभूतरोमोद्गते- रक्षुण्णोऽनुनय. प्रसन्नदयितादृष्टस्य पुष्णातु वः ॥२॥ दृष्टः सप्रेम देव्या किमिदमिति भयात्संभ्रमाचासुरीभिः, शान्तान्तस्तत्त्वसारः सकरुणमृपिभिविप्णुना सस्मिते आकृप्यास्त्रं सगर्वैरुपशमितवधसंभ्रमर्दैत्यवीरैः सानन्दं देवताभिर्मयपुरदहने धूर्जटिः पातु युष्मान् ।। इह निषिद्धपदैन मित्रादि पक्षाश्रयणेन त्रिभिः श्लोकादशपदा नान्दी । निषिद्धा अपि सुयोधनादयो मिजददिगणिततनिषेधा युद्धायव लग्ना इ ध्वनितम् । सभिन्नमुकुलपदेन च युधिष्ठिरादीनां धनवासादिदुःवानन्तरं मुर प्रमाणो दर्शित इति केचित् । नान्यां वस्तुनिशस्यानङ्गतया तत्सूचनमः विनिरकरम् । सूचनं तु रास्पक्षा:-इत्यादिनाने कर्तव्यमेव । तरप्रतीकस्य तदर शादिस्याये ॥१॥ - इति । सदियः एणय मनुनयो यो युष्मान् दुष्णातु पुष्टान्करोतु । कोश गमः माहितः । पर हनुमाह प्रसन्नायितादृष्टस्य । सप्रसादराधावलोक्ति रसंस्थः । वीरस्य । लिपिता कौतुक एव लोधवती राधियों कासिता यमुनापाः पुषिने तोयोस्पितदेशेषु अनुगमत: अनुप्रयातस्य। कीदृशीम राम गोमयां पाए भनुरागम् उरग्म स्परया गच्छन्तीम् अत ए एदनीन् । पाप रामानुरागिणी मण्यपिता रदती चेति राधाचा : भूषितम् । समालोकर भगरतापि तयुगमः इन इरयाशयः । : हमाणु पनि निशितपवस्य दसपास्य | . ... गारोमोदनैः जानमारस्य । मत एष प्रसादो . २१ - MITE: शिव: धुष्मान् पातु रक्षतु । प्रथमोप भी- यमुना के वासु-सट पर (सिरप) और पुपित, राम-सीता मानद रोधोदर मातो धौर अपक्षों से मलिन पिता के पीछे-पीछे है , उसके (सपा) पदापिहों पर पर रखते थे, (लिपे) रोमा पर ये मोर प्रसाई प्रिया (राया) द्वारा देये गये ण (R के ए) सफल अनुनय माप लो (पामाजियों) की पुष्टि करे ॥२॥ मम्पुरबाह समय, देयी (पानी) प्रेमपूर्वक देखा गया, आतुर नयों द्वारा यह पया है' इस प्रसर भय और उठेगी (देखा गया), दिए रामबहात के साथ (देपा गा), वपुत्रों को पराट को शान्त र ने ले गषित योरों द्वारा अरबोधकर (देखा गया) और देवताओं द्वारा नन्दपूर्वक (रेण गमा) शिव हुम्हारी रक्षा करे ॥३॥ पपापि कृतःमलपबन्धादेवा भावाविर्भाववानितरो मागमादिति ममि मयमनुरक्त इति सप्रसार दुफ्तियापि कान्तया इष्ट इति भावः । तोयोत्थित "लनम् इत्यमरः । अत्र अपमान पधा. कोपरोदने भूचिते। उत्तरान छ धनवधानन्तरं भौमततदीयानुनपस्याशुपता तस्याश्च प्रमदिवत्व चतम् ॥२॥ मर विवशिलार्थस्यापयंत्रसानादशिष्टस्य कथन तर अपि च इति शब्दः इज्यत इति व्युत्पत्तिः। एवमन्यत्रापि । क्वेरिहरनिमानमानसत्वेन हरी स्तुतिमुक्त्या हरे तामाह -- दृष्ट इति । कोहाः । मयपुरवहने त्रिपुरदाहे प्रेम प्रीतिसहित यथा स्यादेव देव्या भवान्या या धन्याह यदली. समतिदलो महासुरो निपूदित इति प्रीतिमत्या पगवरया व:। तदेव असुरोभिः अमुरवभि: रिमिदम् आपतितम् इति कृत्वा भपात सात् संभ्रमाद् उद्वेगाच हप्टः। आ: कष्ट वयमोशम्याप्पसुरराजस्याय परिपाक इति मस्स्दामिनामध्येवं कदाचिस्मादिति भीतिरुणश्च तामिः वृत्त त मावः । ति वसिष्ठादिभिः सपरणं दयान्वितं यथा स्यादेवं दृष्टः । रह कथमयं वराको जगदीशेन हरेण समूलमुन्मूलित इति तेषा दया । अत्रोप- तमाह--भान्सेति। धान्तमुपशगवदभ्यन्तर तेन तत्त्वमनारोपितरूपं सारो n चितुपुस्तके नान्द्यन्ते त्यापनः इत्येव पाठः। फेचितु-नावश्यं न . - विनिगः। प्रविश्य तहदपरः काव्यमास्थापयेनट: । इति । अत एवं प्रचार-प्रसार श्रयणानिय निगाभारनामामृतं . महमागमा গণমন वन्दे ॥४॥ एमा। मान FATIOF T गुम कामना दिनु raar Afri:शुराको हो तमम या मरिमा पार पाडतु. m. मा वितं देरययो । मार-मनमाय मुम पनी यस भ्रमः Aarriixi । भा. मस्मर भपीराित निभूमिगानगा दुनिलिभाः। नाभि सानन मापं हरः । अत्र प्रामाRifaru एगनन्द । पर्वा मरण भरपन्योयो । अगुरीया योगादाण्यापाम् इति। मयो नाम दे तेन रचितं पुरं मयपरम् । भारतमामोति दम्या दौथा पूर्व रामप्रेम आयुरीभिरिवामुरीगियोधनादियभूमिमपागाम्यां काकिनारमा सरप दृष्टः। कृष्णेन हमना दृष्टः । दरपीरपंटोयादिभिः भगर्न । मानन्दागिन्द्रादिभिश्न हष्ट इत्यति फरिणा पटामिति वदन्ति | पत्रावलीरूपा गान्दीयम् । तदुक्त तत्रय-वास्यायंबीररचिता शक्त विता । सयुक्ता चन्द्रपधाग्या पत्रावल्यभिधीयते इति ॥३॥ नान्यन्ते इति । नहि नान्गाहानतर रजभूमि प्रविशनि । वितु प्रविश्य पठति । । पठनीया। मूत्रधारपठनीयत्वेन नस्या उक्तत्वात् । मूत्रधारः पठेदेना र स्वरमाश्रितः ।। इति वचनात् । उच्यते- नान्दी तावप्रवेगाना पठनीया । प्रयोगः । तदुक्तं तव- नान्दी प्रयुज्य निष्कामसूत्रधारः . स्थापः प्रविशेखश्यात्सूत्रधारगुणाकृति: 1 पूर्वरङ्ग पूर्वरङ्ग विधायादो सू. नन्विदमसगनमः । A R न चान्येन सूत्रधारेणेव नान्यन्ते मूत्रधार इनि . .

प्रथमोप (मारे पापा ) प्रचार-पस, विरार (पया प्रयोमन)' जिसने भोपाती लि.पुरो पीने पर भारत (महाभारत) नाम के नगेनामा गरागत घोर पार-प्रय रणांगपा (भगवान स) से मापार हूं11 पीपा । रिनु मङ्गला पेन पिपश्यने । मूत्रधारस्ष रजाई प्रविष्ट मएर पनि । सलम-नाम्य यदनुष्टान नगर पामबीजरम् । देवनामाणूत्रमार सोरिद • हयाः ॥ तन्न। गूत्रधार पटेदेना मध्यम माधिनः । इति भरदिपान ।। नर सूत्रधारस्यापलक्षणाचे प्रमाणा- बाद । आये-मान्यवसाने सूत्रधार प्रविशति वदति वा । तदन्ते मूत्रधार- वातापि तेनंब पटनीया । प्रथम प सूत्रधार रति नोक्तम् । मङ्गतार्य नानमस्तारादेत विधानादिम. । ननु प्रस्तावनाया पूर्व बहूनि नाट्याङ्गानि स सानि लिमिति नोनानि । सरु तव- रज प्रसाद मधुरैः श्लोक: यापंमूषकः । ऋतु कधिमादाय भारती वृतिमाथयेत् । भेद रोषनायुक्त- पोमहसनामुबं । पारो नहीं पूते मार्ष पाप विद्वपकम् । सायं प्रस्तुता- मित्रोक्रया पत्तागुणम् । अत पाह--पसमिति । अमाशय:-पूर्वोक्ता- द्वानि न भवन्ति । रितु परिषदोऽभिमुखीकरणानि । सा चेत्स्म्यमेव प्रताय. ना नवनारदांनोरमुख च सत्राम्यत्रयुग्यमानं रसमलाय भवेदिति एत प्रणयनेन । अन्यथा मस्या रराविच्छेदः स्यादिति । इदानी म्यारागभामाह-- भवति । संकृष्णपायगं यामम् अहं वन्दे रोमि । यत्तदोनियाभिसंबन्यादाह-या भारतनामयम् अमृसं विरचितवान रोन् । आप्यायनादिषत वनामृतस्य भारतस्थ । मोहशम् । ष षणं: व मलिपुटं तेन पेयं अव्यमय घ पानीयम् । अन्यदप्यमृतमञ्जलिपुरेन पते । तं फोरयम् । अराग राग मन्यम् । विषयासत्तिहीनमित्यर्थः । अत एव रणं निष्प लुपम् । तदिह प्रतिसयभारतक्याया आदिवा यमस्तत्त्वविच्चेति पनि गुमदेव भवतीति तदेव तमिति भावः ।। [तत्रभयन्तो मान्या. परिपरसरः रामापुरोगण्याः] विज्ञाप्य संबोध्यम् ।

नाधिकारिवषः कापि त्याज्यमावश्यकं न च । एकाहाचरितकामित्यमान
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राज्यदेशादिविनवम्। सरोष भोजन स्नान सुरत धानुलेपनम् । अम्बरबहर
दीनि प्रत्यक्षारिण न निद्विवेत् । अङ्गेनैव निवनीयान्नवान कदाचा
(नाrim) TrnimIriगन
मुगुमानगिपर 1 मी पाणयाएको
मधुनिह य मविपिनाना भजन गुगलगान।
Kirt कामगायो प्रगागा गोमहा नान ।
प्रपोगुणा म। गा धिमा मातम्यागौर
भवनादकासमानरमा दिवा गरमामय।
যাশিংসি। ৮ মশ: মা: মানিয়ে যা
विनायते । मात्र नाम्पन्थे। रिमान सम्मान गुमनेगान मुगा
भजत शहीन । हे सम्याः Trin; । [मनिह पपा माराः पुनः
मबिन विरतानपि गृहन्ति तपेयः । यन मोयनाटक सपा प्रार
गुणिमिर्माहा हापौटायपरिहारोपित प्रति पनितम् ।।
मृगराजसामणः सिंहर्षिहस्य । नारायणमाय । तिनाटकशोर
लिङ्गतया सामानाधिकरण्यम् । पेगोसंहारमित या चार
विशेषेण हेतुना संहारो विनाशो दु:गागनादीना यत्र तत्तथा ।
धेष्याः संहारो मोशण पत्र सत्तथा । भारतानन्तरमिह वेणीमोमणकपन
नारकमिति । अदुक्तं तव-प्रतिवादयान्येषा भूयो रसपरिप्रहात् । सः
लक्षणत्वाञ्च पूर्व नाटकमुच्यते ॥ नाटके सूच्यमषं तु पञ्चभिः प्रतिपादरे
विष्कम्भचूलिकावास्यांशावतारप्रपेशक. ।।
वृत्तवतिप्यमाणाना क्या
निदर्शकः । संदोपार्थस्तु विष्कम्भो मध्यपात्रप्रयोजितः ।। सदेवानुदात्तीव
नीचपात्रप्रयोजितः । प्रवेशोऽवृदयस्यान्त दशेपार्यस्योपसूनकः । अनुदयस्या
रिति प्रथमेड़े न कर्तव्य इत्यर्थः । अन्तर्जवनिकासस्थपलिकार्यस्य सूघर
अवान्तपात्ररखास्य दिनाङ्कार्थस्य सूचना ।। अकावतारस्त्वद्वान्ते पातोऽङ्कर
विभागतः । एभिः समूचमूच्य दृश्यम: प्रदर्शयेद । दूरावानं वर्ष
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प्रथमोप है - (पारो मोर देशर) माग्य सभा-स्में, हमे दुध निवदन करना है म्ह शाम्ररपना यही दूसरी पुरालि के समान किया जा रही है। , धनर मपु-बिन्दुओं को जैसे, 'पून भी गुण-कणों का मेरत करें। अब हम 'मृगराज उगवियारी कवि भट्टनारायण की रचना इस गोसंहार क नाटक का प्रयोग (भिय) करने के लिये उधत है। इसलिये कवि के भमरे विचार से अथवा उबात कधातु के प्रति आदर भाव से प्रमश नि नाटक देखने को उत्सुकता से आप लोगों द्वारा इस पर ध्यान दिये जाने मावना करता हूं। - सम्। पास्त्रिचनुपरहस्तेमन्ते च निर्गमः । एवमा प्रातंत्रा. शादिपुराता: । मामेताकर दशा नाटक परम् ॥ इति नाटक सारण तोक्तम् । तत्रैव प्रसङ्गानापानायिकयोलंधणम्-नेता विनीतो मधुरस्त्यागी 1. प्रियंवदः। रक्तकचिनी स्व. स्पिरो युवा। प्रत्युत्गाहस्मृति- लामानसा पूरी श्यपच तेजस्वी शास्त्रचक्षुश्च धामि । विनय लसंपत्तिमधुरः प्रियदर्शन. । स्याग: गवंस्वदान स्याक्ष क्षिप (भिय) करो । प्रियवदोऽनु बटनावमस्नेहो लोकरञ्जन । मितप्रशस्तवाम्याग्मी नित्यकर्म- शुधिः । रूपातबगी रूढवशः पोडशापिशवो युवा। बाइमन रमभिर्यश्च चलः स स्थिरा मत.। पुतिः सर्वेषु या प्रीतिमाहोऽशानिरेव च । स्मृतिः ग्लान्तरे शान प्रजा तोरणमनिमंता । पलाश्चात्र चनु पष्टिनिश्चितसमुन्नति. समामनिपुणो स्पवानश्य उच्यते । अतिप्रतापस्तेजस्वी यास्मचक्षुस्त्रयो- र:। आत्मवत्परभूतानि यः पश्यति स धार्मि:। प्रस्यानयको राजपिदिव्यो पत्र नायकः । तत्प्रत्यात विधातव्यं वृत्तमाधिकारिखम् ।। अयमयं.-नाटके रिनादिप्रसिद्धो राजपिदिभ्यो वा मायक. तंन्यः, नतु कविना स्वयमुखाद्य पा करिपती नायर: कर्तव्य इति । स्वान्या साधारण स्त्रीति तदाणा नायिका अधा। स्वकीया तत्र वक्तव्या मुग्धा मध्या प्रगस्मिता। शीलाजवादिसयुक्ता- रिता च पतित्रता । लजावती चापरुषा निपुणा च प्रियवदा । साधारण स्त्री ििणका प्रागल्भ्योत्यंयुक् । रूप पुच रक्तंब वर्तम्या प्रहरं विना ।

ARM मा | eh अगिपति: घात मा नागपत. 1 . नयोः कुरपाण्डवराजपुत्रयोराबकल्पान्तानलारामहेतुना स्वयं सन्धिान प्रोतावसलो नाट्यवेदिभिः । भारती कशिकी चैव सावस्यारभटो। भारती पदत्तिः स्यारो रो वयुमा मारेली धीरे सारस्पारमी पुन ॥ एवमहानि कार्यारिण प्रधान वस्तु ममार। श्राषिताः स्यादामुपाक्षेपसथपः।। प्रत्या मायाम्प पिना परिवारिधि दीवगुतं. पतंप्यमानःपरिपोषण प्रभाएको रमाला बीर.मनार एक या। अनगन्य रमा मारदारोवीरभयाना। बीभर वेणीसंहारे ( मेपथ्ये) भाष स्वयंना त्वयंताम् । एते खल्मायविदुरासया पुरवा बाहरन्ति--प्रवर्धन्तामपरिहीयमानमातोद्यविम्यासादिका विषयः । किल तत्रभवत. Trai भरतकुलहितकाम्यया स्वयं प्रतिपन्नदोवस्य देयसीमूनोश्चक्रपाणेमहाराजान शिविरं प्रति प्रस्थानुपामस्य इति । सूत्रधार:- (आकण्यं सानन्दम्) अहो नु खलु भो भगवता जग स्थितिनिरोपप्रभविष्णुना विष्णुनाद्यानुगृहीतमिवं भरतकुलं सफलं च राण कंसारिणा दूतेन । तत्किमिति पारिपाश्विक नारम्भयसि दुशीलः सह संगी। अन्यस्त्री द्विविधा प्रोतका वन्यकोढा तांपरा। रसे प्रधाने कर्तव्या नान माट्यवेदिभि.। कन्यानुरागमिच्यातः कुर्यादङ्गाङ्गिसंश्रयम् । इति ।। वृतयः सत्र शहारी कामलावधिको व्यापारः कैशिकी। विशोना सात्वती । गौरपागारय पुनः । पान्द्रजालसमामोधोद्धान्तादिपेष्टितः । भवेदार शिम: । मादी पिकाभक दिया था युक्तितः ॥ अपेक्षित परि नरम वरनुसरण । यश मयेदेष पुषिमतदा ॥ यदा तु परितो मितिमा । अहो नातायफाराविधानरसाधयः ॥ अनुम निरनिधितो नपे । रग या न दिल्यामला पुरम॥ .-1 प्रपोजर ( नेप) मार, सोरो, जो सरि यो मासे ये सोग सर कटों में रह रहे है-पाल-free frofपि बिना किसी वृद्धि के (भकामीमा भर परार पुत्र (प्यार), भारद, तुम्बा, परशुराम Eि भुनियों हारा यशारा पिपे जाते हुए, भरतपुरा के हित को मना रन-आशा करने वाले, महारादुर्योधन के माधावार ३) को मार करने वाले, देश के पुत्र, भारतीय भाषान दिए (पर षक पालने माने) प्रा समय हो गया है। मूत्रधार-(मुनकर आनन्द से) मा"हा। अरे, जगत् की उत्पति, If और संहार में समर्थ कंस-मात्र भगार मिटने या स्वयं इन दुर र पागय रामपुत्रों के धुरा यो प्रलयाग्नि के शमन का निमितत, सपि जाने वाला, दूत बनकर याज इस भरत हुस पर तथा सम्पूर्ण रागसमूह पर ग्रह किया है। लि, पारिवारिक, नरों साथ मिलकर संगीत आरम्भ नहीं करते? मो रम.' इत्यस्ति तथापि न रा मयंसमतीन माटयविषयश्चेनि न पृथगुप्तः । प्रिमायामावादस्य भास्यविषयना न भवतीति । [तदप्रति उदासं हृद्यम् । कथावस्तु कथाप्रधान नायकः रवादाक्षादात् । नेपथ्यं रङ्गभूमिः । नेपथ्य रङ्गभूमौ स्यान्नैपथ्य प्रमाउने। इति विश्व: ।। भावो मान्यः । मान्यो भावेति बनान्यः यमरः । पशब्दो वाक्यभूपायाम् । आयश्चासो विदुरश्चेनि मेषणममासः । बिदुरीपत्र नायक- तस्यामयादेशेन । शैलूपो नटः ) अपरिहीय. नमारित्यज्यमान पया स्यादेवम् । विषयः प्रकारा. प्रवत्र्यम्ता। कोहदाः । तोविन्यासो वीणादिवादनमादी येषा ते तथा । चतुर्विधमिद वाचं वादिना- गिनामकम् । इत्यमरः ।। किल निश्चये। तुम्बरमनिविशेषः । वृन्दारको पिनुको इत्यमरः । भरतकुर्स युधिष्ठिरादिवशः। काम्या इच्छा । प्रतिपान- स्पस्थानीनदूतकर्मणः । मनोः पुत्रस्य । सूनुः पुत्रकनिष्ठयोः । इति विश्वः ।। । तस्य .

प्रसिद्धः पशी। सप्तन्छदः तिमन इति प्रसिद्धो भः। रक्तोत्पर्य कोकना समुद्दिष्टं विसति । यत्रुलोदयपर्यन्त सनीजमिति कीर्तितम् ॥ इति मरत. च धार्तराष्ट्रीः धृतराष्ट्रपुत्रा दुर्योधनादयो भूमो पतन्तीत्यर्थ: । कोहर (fr) पारिपापि भग। REAtmufereरनगर Jair-Aya amerior Orgarinament ANE प्रपश्यंती समोरूपम् । तथापा गत्वक्षा मगर प्रमाधितामा मदासतारम्भाः । निपतन्नि पातंगठा कालवशात्मेदिनीप्टे ॥६॥ पाल्पावित-(मम) भार हा पण लिममतम् प्रथयार:-(परिमा) मारिप, सनर्णनाशंपदा पार्तराष्ट्रा नियरित कि शान्त पार्षAEममलम् । पारिपाधि:- न ल न जाने । विमलासपास्य को ' यत्सत्यं पितमिय मे हृदयम् । सूधार:-मारिप, नतु सर्वमवेशी प्रतिहनामङ्गलं स्वयं प्रतिपन्न सन्धिकारिणा कंसारिणा । तपाहि। शिविरसनिदेशः संन्यविन्यासः । तं प्रति प्रदेवाकालचकमाणेरिस्यन्वयः ।। खलु भोः इत्यव्ययसमुदायोऽत्याश्चर्यायिप्पारे । निशेषो विनासः । प्रति प्रभुणा। रागच क्षत्रियसंघः । आहयो युद्धम् । कल्पान्तानलः प्रलया स्वयं प्रतिपनदौत्येनेत्यन्वयः । कंसारिः कृष्णः । पारिपाश्विक निमूत्र पावं यः प्रकरोत्यमुना सह । काव्यायंसूचनालाप स भवेसारिपाश्विरः! भरतः॥ कुशीसघो मटः॥ भरतास्तु कुशोलबाः इत्यमरः । संगीतकमेल ऐक्यमिति यावत् । नक्षत्रमश्विन्यादि । ग्रहाः सूर्यादयः । कौन हंकूह तथा हि इत्पयं सब्द उक्त विमावनाथः । इलेपच्छायोप प्लेपेण बीगमाह-सत्पता इति । धार्तराष्ट्राः हसविशेषाः । फालय मेदिनीपृष्ठे निपतन्ति । मानस सरः परित्यायान्तीत्य इत्यमरः। 1 शरन्माहात्म्यात + प्रथमोऽद्ध , ( प्रवेस करके ) पारिपारिया--- अच्छा, आरम्भ फरता हू। क्सि ऋतु के विषय में मा जाय? सूत्रधार-इसी शारद ऋतु के विषय में संगीत मारम्भ कर दिया जाय, समें चन्द्रिका, नक्षत्र, काच पक्षी, हंस-समूह, सहपर्ण, फुमुद, पुण्डरीक और व-पुष्प के पाय से आकाश तथा दिशा-मण्डल पबल हो रहा है और जिसमे सय स्वादिष्ट जल वाले हैं। क्योंकि इस शरद् ऋतु मे- मुन्दर पड़ों वाले, मधुर वाणी वाले. दिशाओं को अलकृत करने वाले, के कारण उद्दाम क्रीडा करने वाले हंस (पार्तराष्ट्र) समय (पारद् ऋतु) के भाव से पृथ्वी-तल पर आ रहे हैं । (दूसरा सकेतित अर्थ) उत्तम सायन वाले, उरभाषी, दिशाओं को वश में करने वाले, अहद्धार से सृष्टतापूर्ण कार्य करने ले, एतराष्ट्र के पुत्र (दुर्योधन आदि) मृत्यु के वश में होने के कारण पृथ्वी = गिर रहे हैं ॥६॥ पारिपाश्विक-(घबराकर) भाव, पाप शान्त हो । अमनल का नाश हो। सूत्रधार-(लज्जा और मुस्कराहट के साथ) मारिष, शरद ऋतु के वर्णन १ इच्छा से हंसों को धार्तराष्ट्र कहा जा रहा है। तब 'पाप शान्त हो। मङ्गल का नाश हो' यह क्या ? पारिपाश्विक-मैं नहीं जानता हूं, ऐसी बात नहीं है। फिर भी, आपके स वचन से अमङ्गल की माशडा से मेरा हृदय सचमुच काप-सा गया है। सूत्रधार-मारिष, अव तो स्वयं दूत-कार्य स्वीकार करके सन्धि कराने लेि कंसारि ने सारे अमङ्गल का नाश कर दिया है । इस प्रकार- सन्तः पक्षा येषां ते] सरपक्षा: श्रेष्ठपक्षयुक्ताः श्रेष्ठसन्यवन्तश्च । मपुरगिरः धुरवाणीकाः। प्रताधित्ता आशा दिशो पस्ते तथा । मदोद्धता बारम्भा पेपा ।। 'मदो होम्हंकारश्च' 'धात राष्ट्राः सितेतरः' इत्यमरः । वर्तकरूपता प्रस्तावना । यदुत तत्रव-प्रवृत्तकालमाश्रित्य वर्णना या वधीयते । तदाश्रयस्य पात्रस्य प्रवेशेन प्रवर्तकम् ॥ इति ।। आर्याच्छन्दः । ॥६॥ या पटाक्षेपेण पात्रप्रदेशस्तत्र प्रविश्येति प्रयुज्यते । शान्तं पापमनाकाक्षे इह श्लोके वेणीसंहारे निर्वाणवरदहनाः प्रशमादरीणां नन्दन्तु पाण्डुतनयाः सह माधवेन । रक्तप्रसाधितभुवः क्षतविग्रहाश्च स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुताः सभृत्याः ॥७॥ ( नेपथ्ये माधिक्षेपम् ) याः दुरारमावृया मङ्गलपाठक शंतूपापसद , लाक्षागृहानल विपानसभाप्रवेशः प्रारणेपु वित्तनिचयेषु च नः प्रहृत्य । आकृष्टपाण्डववधूपरिधानकेशाः स्वस्था भवन्ति मयि जीवति धार्तराष्ट्राः । (गूत्रधारपारिपाश्विकावाकयनः) पारिपाधिका-भाय, त एतत् । सूत्रमार:- (पृष्ठतो विलोक्य) अये एष खशु वासुदेवाननादुरुसंह मृगपाणः पपुललाटतटपटितविष्टकोनाशतोरणत्रिशूलायमानभीषण पति भरतः । तपा न दम्पमिरपर्षः । स्वस सला निमिन मारिता एमः । मारिप एवं मरणान्माष इति । मारिरी निरः । 4. न जाने वितु जाना दो नि। अपनी प्रतिति कमायो युष्मावम् । परम मनाना पापम् मरमानीयमिमित्यर्थः । सनि औिरत [गान] परमेव रहनः यः । । रोमा प्रमाण सागमा । निाशादिति यात्र " प्रभागितारना | म रतन Mirrentifi गार वा। पापा मुरि प्रथमोऽङ्कः शत्रुओं के शान्त हो जाने के कारण पाण्डु के पुत्र, जिनको दर रूपी अनि स्त हो गई है, कृष्ण के साप सानाद करें और भृत्यों सहित कुछ-राज के , जिन्होंने अनुरक्त (पाण्डदों) को भूमि दे दी है तथा जिनका पुट समाप्त - गया है, स्वस्थ रहें। (दूसरा संकेतित अर्थ) त्रुओं का नाश हो जाने कारण माधव समेत पाण्डव लोग, जिनको वर पो अग्नि युग गई है, लाद करें और भृत्यों समेत पह-राज के पुत्र जिन्होंने दधिर से पृथ्वी को नात पिया है और जिनके शरीर क्षत-विक्षत है, स्वर्गस्थ होय ॥७॥ ( नेपथ्य मेगनासहित ) मो दुष्ट, ध्यर्थ ही स्तुति करने वाले, नौच नट, शाग्रह में भाग, विपात अन्न और सभा में प्रवेश द्वारा हमारे प्राण तपा र पर प्रहार करके और पाण्डयों को थपू के पात्र सभागों को पाचार । एतराष्ट्र के पुत्र मेरे जोदित रहले स्वस्थ रहें ।।८।। (मूत्रधार और पारिपाश्चिक दोनों मुनते है ) पारिपारि-भीमान, यह (ध्वनि) यहाँ से (मा एग है? प्रत्रधार--(पीछे की ओर देखवर) परे । भगवान के जाने से (होमे ती) पुओं के साय सन्धि को सहन न करता हा यह र भीम, जिसके शास मरता-तट पर, मगराज के विशाल तोरण पर बिल के समान प्रतीत ने पाली, भपहर पुटि सनी हुई है और जिसके पोरे पोधे महदेव मा वस्था पति वियः। मेशगोऽयम् । यदुक्ततच-पिता पर मापना दोमापि प्रतीयते । यः पादनिगमो मेशगण म उच्यते ॥ पापा को नरः पिmबागमधम. [प] लासाहेति । (साभारे मः अनल: अग्निरामपंरा स प नियमिभितमन्न पानं च समागम सं.] अनुहाग्निविरातिमि: म मान [प्राणेषु तिनिपरेपु.] - स। muyinी। नम् परिधानोपयरम् HIT पानामा परिधान शाब थे । पार भोलि रदस्था मुगिनो पति रिम मपि ।

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गृyषमाटेपाचायव विवरणम् राभि नि!
सूत्रधारगरियादियो। प्रस्तारित प्राधाना मामुकता
तव-मूत्रधारेल सहिताः संला पत्र पुर्वते । मटीरिपको वाnिka
पवमा [चित्र: स्वापोत्यैः प्रमनुताक्षेविभिनिष: आगुण नाम
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tr स्हर प्रथमोऽङ्कः हा है, हटिपात से, मानो, हम सबको पीता हुआ इयर की ओर ही आ रहा । इसलिये इसके सामने खड़ा होना उचित नहीं है। इसलिये हम दोनों यहाँ कहीं अन्यत्र चलें। (दोनो बाहर चले गये) । प्रस्तावना समाप्त - पश्चात् सहदेव द्वारा अनुसरण किया जाता हुआ क्रुद्ध भीम प्रवेश करता है) (1 भीमसेन- अरे ध्ययं स्तुति करने वाले, नोच मट। (लाक्षागृहानल श्यादि श्लोक १८ का फिर पाठ करता है)। 4 सहदेव---(अनुनय सहित) आर्य, क्षमा कोजिये, क्षमा कौजिये। इस नट वचन हमारे अनुकूत ही है। 'शान्त हो गई है घर रूपी अनि जिनकी' यारि वचन सच ही है। (क्योंकि) यह कह रहा है-- 'सेवकों सहित कुछ होग, जिन्होंने रुधिर से भूमि को अलकृत कर दिया है और जिनके शरीर गयुक्त हो गये हैं, स्वस्थ होवें ।' भीमसेन--(उलाहना देते हुये) नहींमहौं । आप कौरवों का अमङ्गल हीं सोच सकते। उनसे तो सन्धि करनी चाहिमे । तुम्हारे भाई हैं। सहदेव-(क्रोधपूर्वक) आर्य, यदि राजा रोकने धाता न हो तो तुम्हारा कौन-सा छोटा भाई पग-पग सत्ता करने पाले एतराष्ट्र के पुत्रों को सहन करे । व प्रस्तावना मता।। इति । इस प्रस्तावना वाश्यार्थकथोपातरूपा मूत्रधारस्य क्य वा पत्र वावधार्य मेव बा। गृहीत्वा प्रविदोत्सा क्योद्घातः स उच्यते ।। 'ति भरतः । प्रदिदातीति । सर्वत्र प्रवेशे पूर्वसूचितस्यान्वयः । मासूचित्तस्य त्रिस्य प्रवेशः इति भरतवचनात् । मय शमस्व । भरतपुत्रस्य नटस्य अन्यथा रणार्यतया। सोपालम्भं विसंवादसहितम् । बोप्सितो न खतुशब्दोऽत्पन्न- उषाचनः। तरात्येति । राजा निपेक्षा न स्यात् चेत् पदै पदे कृतवैरान राष्ट्रस्य नयान का शवानुजः सहेत । इत्पन्वयः] पदे पदे प्रतिस्थानमित्यर्थः । है मदिन ति जाम इह श्लोके यद्यपि वाक्ये गभिजन भीमः कुधा विघटयति पूर्य पटयत । यन्वयः] विरुद्धं जातं स्मृतं । संधिद संपटनके संधानेऽपि प कप्यते । इति विश्वः ॥१०॥ तथानुतामिति । नपसदसि तपाभूताम् ऋतुमतीमति आष्टकेशामाकृष्टाम्बर वेणीगंधारे भीमसेनः-(गगेम्) एमियम प्रग एमाहमति भित्रो भवनमः। प्रवृद्धं यहरं मम यलु गिगोरेव कुभि- नं तमार्यों हेतुर्न भवति किरीटी न च युवाम् । जरासंधस्योरः स्थलमिव विरुढं पुनरपि क्रुधा संधि भीमो विघटयति यूयं घटयत ।।१०॥ सहयेवा-(सानुनयम्) माय एमतिसंमृतीयेषु पुष्मागु कदादिन्ति: गुरुः। भीमसेनः-कि नाम विद्यते गुरः । गुरुः वेदमपि नानाति । पश्य । तथाभूतां दृष्ट्वा नृपरादसि पाञ्चालतनयां वने व्याधः साधं सुचिरमुषितं वल्कलधरैः । विराटस्यावासे स्थितमनुचितारम्भनिभृतं गुरुः खेदं खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुपु ॥११ तत्सहदेव निवर्तस्य । एवं धातिचिरप्रवृद्धामोद्दीपितस्य भीमरय व द्विसापय राजानम्। । सहदेवः-आर्य किमिति । भीमसेनः-एवं विज्ञापय । चेच्छब्दो यद्यर्थे । निपेक्षा निपंधकः । मालकारदोषस्तथापि रसान्तरद्योतनाय तद्वावयमिति न दोषवक्षामवाद इस्यवधेयम् । इह अहं मिनो भवन यः इत्यनेन भेदसधिः । इति । प्रभृदिशन्द बारम्भपर्यापः। प्रमिति । शिशोरेव मम कुरुभिः सद्वरं प्रवृद्धं सलु तत्र आयः हेतुः, भवति, न किरीटी, न युवा। जरासन्यस्य उरस्थलमिद पुनः विस्वमपि सनि । यदाह- भेदस्तु मिनः -- प्रथमोऽङ्कः गौमसेन-(शोध से) यह ऐसा ही है। इसीलिमे आज से हम आप लोगों गि हुये । देखो- बालक का ही सौरवों के साय जो और बढ़ा था, उसमे न आर्य हर) कारण हैं, न अर्जुन और न ही तुम दोनों। जरात के वक्षःस्थल सन्धिको भौम क्रोध से फिर तोड़ रहा है, तुम लोग जोड़ on दैव---(मनाते हुये) इस प्रकार आपके अत्यधिक क्रोध करने पर बड़े दुषी न होवें। रसेन-क्या बड़े भाई दुःखी होते हैं? क्या बड़े भाई दुःख को जानते सभा में उस प्रकार की हुई (दुर्दशा में पड़ी हुई) पाचाल की पुत्री को, वन में गायों के वाय पल्कतधारियों के चिरकाल वाय को टि के भवन में अनुचित कार्यों द्वारा छिपाये गए वास को देखकर भाई को कोरवों पर आज तक सेद नहीं हुआ। मेरे खिन्न होने पर ये, सहदेव, तुम लौट जाओ। चिरकात से पढ़े हुये बोध से उद्दीत रोर से राजा से इस प्रकार कहो। - मार्य, पया (फहूँ)? ति--इस प्रकार कहो- तनमा द्रौपदीम् । वन उपितमस्माभिप्तिः कृतः । सदष्ट स्यान्वय. 1 जनं कृतम् । तद्दृष्ट्वैत्यन्वयः। अनुचितारामा: कन्यालंकरणादिका- वं यथा स्यादेवम् । मयि खिन्ले सति गुरुः खेदं भजति , अद्यापि : बहतीत्यत्वयः ॥११॥ चरेति । अतिचिरादतिविरं वा प्रवृद्धी यः अमर्प. तेनोद्दीपितस्य), 1 [मया युष्मन्छासनलचनाहति मग्नेन स्थितं नाम, स्थितिमतामनु- विगहणा अपि प्राप्ता नाम, क्रोधोलासितोरिगतारुणगदस्य कौरवा- म अद्य एक दिवसं गुरुः न असि, अहं अब विधेयः न । इत्पन्वय.]

मतः। इति । चतु.सालक चउसार इति प्रसिद्ध ग्रहम[चतसादाला # F मंहसि पापे । नाम प्रापारये । माम प्राकारदगं माम्पोाग दुस्मन सपा कालाम्वनोरत्यत्तसंयोगे इति द्वितीया। अदानी सानीमम इति कम सूत्रम् । अस्मिन्नहनीत्यऽनन्वयः स्यादिस्यवधेयम् ॥१२॥ इह परिकररूपः सन्धिः। यदुक्तं सव-वार्याकार्यस्य हेतूनामुक्तिः परिस PRETRaftarit after It Hir fartrentral htantraitriratnet * मfat are at IITTER भावगेर:-HTTTTT) Mir Tri मामाgienigment writer t:-art, ARITrant Tamrriture! भीमा-Caritr) kram RITTI पिप। (infirrrrrr Hit (न गाव ) mWISTRI Engineerifts पौरपानतिरण, (Anant) गहोगः-आर्य मातानि । unfair free भीमसेनः-(उपविय) amrमाममियोपा समृम। भगवाहणः केन पणेम सन्धिक गुपोषनं प्रतिदिनः। विश्वः । विगहणा निन्दा । स्थितिमतां पयंवदाम् । कोनोलासिता समुनो सोरिणतेनारणा रक्ता प गदा यस्य । सन्दियो नाशयतः । विसं या .

प्रथमोऽ में तुम्हारी मामा के उबहन के पाप में दब गया हूं, मैंने मर्यादा का सन करने वाले छोटे भाइयों के भी मध्य में निन्दा प्राप्त कर ली है। आज दिन रेसिपे आप मेरे द्रोध से उठाई और रधिर से साल गदा वाले सया रको मनाक्षा करने वाले के पड़े (भाई) नहीं है और मैं आपका मामाकारी ही ॥१२॥ (यह बहकर मार के साथ पूमता है ) सहदेव-(उसी के पोरे-पादे पलते हुये, स्वगत) बरे कैसे ? भार्य पाश्चात राजकुमारी (ौपदी) को चौसाल में चले गये। यष्टा, तब तक मैं यहाँ । (खड़ा हो जाता है) भीमसेन--(लोटकर और टेमकर) सहदेव, तुम जाओ और बड़े भाई के नुस यावरण करो। मैं भी आपुषागार में जाकर शास्त्रों से सजित होता हूं। सहदेव-आर्थ, यह आयुधागार नहीं है। यह तो पाचाली की धौसाल है। भीमसेन-(सोचते हुये) क्या रहा। यह शस्त्रागार नहीं है, द्रौपदी को Inाल है। (कुछ हंसकर हपंपूर्वक) मुझे पाश्चालो से विदा ले लेनी चाहिये म से सहदेव का हाय पाई कर) प्रिय, पामो । कौरवों के साथ सन्धि करने छा करने वाले मार्य हमें जो पोरा दे रहे हैं, उसे आप भी देख लें। (दोनों अन्दर जाते हैं) महवेव आर्य, यह मासन दिया है। आर्य यहाँ बंटकर कृष्णा (ोपदी) थाने की प्रतीक्षा करें। भीमसेन--(बंटकर) वरस, 'कृष्णागमन' इस प्रसङ्ग से याद आ गया है : -गवान कृष्ण किस गतं पर सन्धि करने के लिये सुयोधन के पास भेजे हैं ? माहारः चतुःशालम् । आवन्तो वा इति क्लीवत्वम् । शालकमिति पाठे वार्थे कः। आगारो गृहम् । श्रायुधसहायोऽस्त्रद्वितीयः । आः स्वीकारे । हामन्वयितव्या संवदनीयां। कृष्णागमनं द्रौपद्यागमनमथ च हरेरागमनम् । पोधात उक्तिः । तदुक्तममरे-उपोद्घात उदाहारः इति । यद्वा प्रकृतानुलिनी चन्ता उपोषातः । भगवानैश्वर्यादिमान । इह श्रीकृष्णो निगूढार्थो दूतः । यदुक्तं द-उद्देश्यकार्यादोधेन विपक्षे नायक स्वयम् । वाग्युद्धनिरतो यस्तु स कुरुवरः कुमारो भीमसेनः । [समस्सस समस्मसदु भट्टिणी। अवगइर्मा २२ वेणीगंहारे सहदेवः-आय, पञ्चभिमः । भीमसेनः--(कर्णी पिधाय) महह हात पकर्ष इति यत्सत्यं कम्पितमिय मे हृदयम् । (परिवृत्य स्थिरवा) तात्म फथितं न मया श्रुतम् । यत्तदूजितमत्युग्रं क्षात्रं तेजोऽस्य भूपतेः । दीव्यतास्तदानेन नूनं तदपि हारितम् ॥१३॥ ( नेपध्ये) समाधिसितु समाश्विसितु भट्टिनी । [समस्ससदु समस्ससदु भट्टिणी । सहदेवः-(नेपथ्याभिमुखमवलोक्यारमगतम्) अये कथं याज्ञसेनी : चीयमानवाष्पपटतस्थगितनयना आर्यसमीपमुपसर्पति । तत्कष्टतरमापतितम्' यद्वैध तमिव ज्योतिरायें कुद्धेऽद्य संभृतम् । तत्प्रावृडिव कृष्णेयं नूनं संवर्धयिष्यति ॥१४॥ (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टा द्रौपदी चेटी घ) (द्रौपदी सात निश्वसिति ) चेटी-समाश्वसितु समाश्वसितु भट्टिनी । अपनेष्यति ते मन्यं : . मण्णं पिचाणुवर कुरुवेरो कुमालो भीमसेयो। निगूढार्य उच्यते ॥ इति । पश्चग्रामदानादानेन तस्तेन वरप्रकाशना अहहेत्यद्भुते पेदे इत्यमरः । यरमत्यं निश्चये। तदुक्त सवयत्रायाः भावार्थम् । पत्तरिति । [यत् अस्य भूपते: तव ऊजितम् अस्युर्य क्षात्रं तेगः तदपि भ तदा तगमये अक्षः दीप्यता भून हारितम् इत्पन्वयः । अजितं बलवत् । शारिगंवन्धि । दीपपातेन पीडमानेन । दिवः कर्म च इति पगारातृतीय निरपरे । र हारितम् । अन्यथा स्यमय तेजोमा ति भावः ।। । भारमातम् । अन् । पाध्य नमस्य स्वगतं तदिहोज्यते ।

मिसन--(पानों पर हाथ रखकर) ओह ! देव अजातशत्रु का भी यह हम का क्षय (हो गया}, इससे सचमुच मेरा दर कप-सा रहा है। र सो होकर) पास, (समा लो कि) वह न तुमने कहा और न मैंने स रामाका ओ बह जगप्रसिद्ध प्रवण क्षात्र तेज वृद्धि को प्राप्त था ही इसने तव पारों से खेलते हुए उसे भी गंवा दिया ॥१३॥ (नेपथ्य में) एमिनी, पर्य रखो, पंर्य रयो हृदेव-नेपथ्य की योर देमार) अरे। (मह) क्या? बार-बार बढ़ तुओं के समूह से आच्छादित नेत्रों धाली द्रौपदी आर्य के समीप ही आ तब तो बरे कष्ट की बात हुई। मार्य में मान जो विद्युत के जैसा तेज संचित हुआ है, उसे वर्षा के रह कृष्णा अवश्य ही और अधिक बढ़ा देगी ॥१॥ (तव यथावरियत द्रौपदी और चेटी प्रदेश करती है ) ( दोपदी आंसू बहाते हुए गहरा श्वास लेती है) --स्वामिनी थर्य रखें, घेर्य रखें। गर्यवा कौरवों से बंधे घर वाला मसेन मापके शोक को दूर करेगा। याज्ञसेनी द्रौपदी । [उपवीयमानः दृद्धि गच्छन् यः बाष्पस्तस्य पटलं ते नयने यस्याः सा I] अनुरणः पूर्वावस्था वापः । स्थगित पिहितम् । तिमिति [बद्ध कार्य अद्य यत् वैद्युतमिव ज्योतिः संभूतम् तदियं कृष्णा नूनं संवर्धयिष्यति इत्यन्वमः । वधुतं विद्युत्प्रभवम् । आर्य भीमे। म् । प्रावृद् वर्षाकालः । नून निश्चये ॥१४॥ मन्युदन्ये तो अधि । इत्यमरः । प्रौपदी। सास्र सनयनजलम् । पत्र । लाहाने मीचा चेटी सस्त्री प्रति । इत्यमरः। जयतु कुमारः । अत्र र यद्यपि जयवेरन भिधानादुरवं न भवतीति रूपावतारे दृश्यते तथापि त्वम् । प्राकृते जयदु जयस्वित्यस्याभिधानात् । प्राकृतस्प च तद्भव- गोत्यनेकः प्राकृतः क्रमः । इति नियमाद । संस्कृतं क्रमवत्वात् । । - अन्यथा तुह्मोस्तात आशिष्यन्यतरस्याम् । इति . भीमसेनः-(अशृण्वन्नेव, मनामि कौरवशतं इति पुनः पठति) सहदेवः-आर्य, कि महाराजस्य सन्देशोऽध्युत्पन्न व गृहीतः। अन्यथा महान्यापत्तः। कि च । जयतात्"भवानीपतिः इत्यादिदर्शनाडया Ant-mirath ort marriagm Irrrrrrram format h-fringilratri Talgupta मार्गte*T ITTE mmmitthafirmatiti टी-II) J HIT गो। भीमन--(मग muTET: Aft) मेरी-(ram) मा aftingमरमाने । [frm aftgirafमानो mitant - पनामा मामा. गोमि तापापाय पारिता। एसा माहीत भागारामदिसा एप उवि पनि गुणो माह बागि । (भे तपादनः) भीमसेनः-(मोगम, महदेवमधिप नाम पमिमिः सनि मथ्नामि कोरवशतं समरे न कोपाद् दुःशासनस्य रपिरं न पियाम्युरस्तः । संचूर्णयामि गदया न सुयोधनोरू सन्धि करोतु भवतां नृपतिः पणेन ॥१५॥ द्रौपदी-(सहपंद, जनान्तिकम्) नाप मतपूर्व चतुते गं तत्पुनरपि तापण। सिाह अस्सुदपूश्वं क्तु ६ एदिस वाणं । ता पुन दाब भयाहि । जयतीत्यत्रोकारस्याकरणादित्यवधेयम् । अत्र व्यवसितमध्यवसायः । 0

प्रथमोऽङ्कः
औग्दी--सखो बुद्धिमतिका, यह हो साता है. यदि वह (भीमसे)
ज के दिएट हो जायेंगे।
चेटी--(देवकर) यह कुमार स्थित है। इसलिये स्वामिनी इनके समीप
.
झोपदी-सखो, देसा (ही) करते हैं । (दोनों घूमती हैं)।
घेटी-(समीर जाकर) जय हो, कुमार को जय हो।
'भीमसेन--(न सुनते हुये, 'जो वह वृद्धि को प्राप्त या' इस्पादि लोक
३ का पुन: पाठ करता है)।
घेटो-घूमकर) स्वामिनी, कुमार कुन-से दीख रहे हैं ।
दोपदी--सखी, यदि ऐसा है तो यह मपमान भी मुझे सान्त्वना देने वाला
तय बंटकर नाथ के निरचय को सुनूंगी।
( दोनों वंसा करती हैं)
भीमसेन--(ोध से, राहदेव को लक्ष्य करणे) या पाच पामों में संधि ?
गया पुर में कोष से सौ कौरवों को नहीं मादंगा। ग ासन के
यल से सथिर नहीं पोगा? या पदा से सुयोधन से जा नहीं
En? भाप का राजा भले ही तं पर ग्धि करलें III
नो--(हपंपूर्वक एक ओरको होर तुरके मे) स्वामी, नारामा
पहले कभी न मुना था। इसलिये फिर से पहिये।
भीमसेन--(न मुनो ये हो 'मध्नामि गौरवगतम्' पपादियो ११५
पर पादरता है।
होव--आर्य, पपा मापने महाराज के सादेशको सारहीन-सा समन
नानामोनि। मानगामी मानव निरिसर मसार
रिचालने। मानामि रिमरियामि । [भत्र पास Rafarit
मनाम्यश्पों सम्यते । एवम पवार, उपद्रो बस रा
विदाई सानो पक्षम्यनम:] I सिमि, गारंगी
न। [पऐन पामपूरेन] ॥१॥

। 101 4. १६ प्रतिमुनापः मन्धिः । यदुक्तं सव-आनुपनिककायेंग क्रिपते पण अमानिाम-अन्योतामग्न मत्स्यासनान्ते सानान्तिकम्। इतिभा निष पापभूतार्स का मसरामा तारिशान्तिरा सहयसाति Cir--मानमा भाग मना। येणीसंहारे भीमसेनः--का पुनरन प्युरपत्तिः । सहदेवः-आर्य एवं गुरुणा सन्दिष्टम् । भीमसेनः-काया सहदेवः-- सुयोधनस्य । भीमसेनः-किमिति। सहदेवः - इन्द्रप्रस्थं वृकप्रस्थं जयन्तं वारणावतम् । प्रयच्छ चतुरो ग्रामान्कञ्चिदेकं तु पश्चमम ॥१६॥ भीमसेनः-सतः किम् । सहदेवः-तदेवमनया प्रनिनामग्रामप्रार्यनया पश्चमस्य जतगृहदाहधूतसभायपकारस्थानोद्धाटनमेदेदं मन्ये । भीमसेनः-(साटोपम्) वत्स, एवं कृते कि कृतं भवति । सहदेवः-आर्य, एवं कृते लोके तावस्थगोत्रक्षयाडि भवति कुरुराजस्यासन्धमता च दशिता भवति । भीमसेनः-सर्वमप्येतदनर्यकम् । कुरुराजस्य तायदसन्यता तव पर्दवास्माभिरितो मनं गद्धिा रद कुरुकुलस्य निधनं प्रतिज्ञातम् प धार्तरादिकुलक्षयः जिलजाकारो भवताम् । अपि च रे मूर्ख-- युप्मान्ह पयति क्रोधाल्लोके शकुलक्षयः । न लजयति दाराणां सभायां केशकर्पणम् ॥१७॥ तनम् । नष्टस्यैवेद पीजस्य तरि प्रतिमुगं मतम् । व्यवसायनामा वक्षनर्मा पम् । याह-प्रनिगाहेनुपयुक्त व्यवसायो नमो मतः । इति । मालपूर्वमहामो नाम : तन्नाय गुन.पुनस्ताव मरिमा : रामगाम । इद परस्पी नियंगन्धिः । । - । 4 - - २७ तथा प्रथमोड़ गीमसेन-लेकिन इसमें क्या पढ़ सार है ? नहदेव--आर्य, बड़े भाई ने यह सन्देश दिया है। मसेन--किसे? हदेव--सुयोधन को। मसेन--क्या? हदेव- द्याय, धृपाप्रस्थ, जपन्त और वारणावत मह चार प्राम कोई भी एक ग्राम दे दो ॥१६॥ मसेन--उससे क्या? हदेव-तो इस प्रकार प्रत्येक ग्राम का नाम लेकर याचना से और ग्राम के नाम का कथन न करने से विषाक्त भोजन, लाक्षागृहदार, मा आदि अपकार के स्थानों का उद्घाटन ही इसे समझाता हूँ। मसेन--(आवेश के साथ) दत्स. ऐसा करने पर क्या होगा? हिदेव---आमं, ऐसा करने पर लोक में (मार्य का) अपने कुल के नाश से वृत हृदय प्रकट हो जाता है और कुरु-राज के साथ सन्धि को अयोग्यता त हो जाती है। भीमसेन-यह सव व्पर्य है। कुरुराज के साथ सन्धि को अयोग्यता तो बतला दी पो जय हम सब ने यहाँ से बन जाते हुये फुरुकुल के नाश तिज्ञा की थी। क्या एतराष्ट्र के कुल का नाश भी आप लोगों के लिये में समा-जनक है। और, मूर्ख, पोष से शत्रु के वंश का नारा तो तुम्हें संसार में लक्षित करता है, लेकिन में के केश सोंचा माना (तुम्हें) लजित नहीं करता ॥१७॥ [इन्द्रप्रस्थमिति-] विपमोजनेत्यादी यथायोग कुशस्थलेत्यादिसंबन्धः । रोजनादेस्तत्तत्स्थानेवृत्तत्वात्तत्तस्मरणम् ॥१६॥ अन्यथा मन्यते प्रकारान्तरेण जानन्ति । त इति शेषः । [स्वगोरक्षपादा- ने विभेतीति तथा)। अमन्धेवताऽसन्धानविपरता। [अनयंकमुहिष्टामां- कम्। तिनं विनामः। युप्मानिति । [कोधारमाभिः करिष्यमाण: शत्रुकुलक्षयः युष्मान] हरयनि पप ,

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মমৗঙ্ক द्रौपदी--(जनान्तिक) नाथ, इन्हें लभा नहीं आती। तुम तो न भूतो भीमसेन--(याद करते हुये) वत्स, द्रौपदी कैसे देर कर रही है ? सहदेव--आर्य, आदरणीय को आये कितना ही समय हो गया। Eि य के आवेग के कारण आर्य ने आई हुई भी नहीं देखी । भीमसेन--(देखकर आदर से) देवी, बढ़े हुए कोय वाले हमने आप द भी नहीं देखीं । इससे कुपित न हो । द्रौपदी-माथ, आपके उदासीन होने पर (हमें) दुःख होता है, कु। ने पर नहीं। भीमसेन- यदि ऐसा है तो अपने अपमान को समाप्त हो समझो।( *ड कर, पास में बैठाकर, मुख देववर) लेकिन मैं आपको परेशान-सो ख रहा हूँ? द्रौपदी-नाप, आपके होते उद्वेग का कारण कैसे हो सकता है ? भीमसेन- यतलाती क्यों नहीं ? (देशों को देखकर) या बतलाने से कर नव पाण्डु-पुत्रों के जोधित रहते हुये और दूर परदेश न जाने पर चिाल की राजकुमारी इस अवस्था को धारण कर रही है ॥१८॥ द्रौपदी--सखो बुद्धिमतिका, नाथ को पतला दो । अन्य कौन मेरे अपम र दुःखी होगा। चेटी-सी देवी की आज्ञा हो। (सोम के समीप जाकर और हा ोडकर) कुमार, आज देवी के होप का कारण इससे भी अधिक था। ममाएकारमुपेक्षमाणेषु । अपगतः चरनितिनेनेति शेष: परिभवोऽवमानः शकपणादिरूपा यस्म । समर्थयस्व जानीहि । जीवरिस्वति । [यत् यस्मारकारणात् इमां दशां वहते तस्मात् किमावेदिते ति सम्बन्धः। यस्य च भावेन भावलक्षणम् इति सप्तमी। दूरमिति क्रिय प्रक्षेपणमतिशयार्थम् । अप्रोपितेष्वपरदेशवासिपु सन्निहितेप्रित्यर्थः । ॥१८॥ पपप नापस्य सर्व व्यवसितम्। इतोप्यधिक्सरमद्योद्वेगकारणं समासादित ध्या।

"TirtriHit Tन माdिimarमाया AY mATERTAI TR: D] HATHIRE HTTAR TI THदुन मास्मिनं वेणीसंहारे भीमसेनः--कि मामास्मादप्यधिकतरम् । तस्कयय थय । कौरव्यवंशदावेऽस्मिन्क एप शलभायते ।' मुक्तवेणी स्मृशन्नेनां कृष्णां धमशिखामिव ॥१६॥ चेटी-भृणोतु कुमारः। अद्य खलु देवी अम्बासहिता सपत्नीवर्गण परिघृतार्याया गान्धार्याः पादयन्दनं कर्तुं गतातोत् । [ कुमालो। अज्ज पतु देवी अम्बासहिदा सुभद्दाप्पमुहेण सवनिवग्गेण परि अजाए गन्धालीए पादवन्दरा करई गक्ष आसी।] भीमसेन-युक्तमेतत् । बन्धाः खलु गुरवः । ततस्ततः। - घेटी- ततः प्रतिनियतमाना भानुमत्या दृष्टा। [तदो पडिणियुत्तमाणा माणुमदीए दिट्ठा ।] भीमसेनः-(मक्रोधम्) आः शोर्भार्यया इप्टा । हन्त स्थानं क्रोय रेयाः। ततस्ततः। बेटी- ततस्तया देवी प्रेक्ष्य सखीवनस्तहल्या सगर्वमोद रिह भणितम् । तदो साए देवी पित्रा सहीवाणदिशादिटीए मगच ईसि विनि मणि । भीमसैग:-नरेगा या उताए । महो कि कुर्मः। ततस्ततः । बेटी-मधि पामेनि, पक्षधामाः प्रायंगत रति पूयते । तसरमाश्विान निशान पाया। [ो जमणलि. १७ गामा रोगन्ति ति सुन । नाग rift संजपीमति) भीमकोर, भाग। मह-मा, मोयो नाम हिना। परम । Hrithi (म मुगाम 1 rmt ram शिवामि -- प्रपद भीममेर-हुममे भी पिर पयारो सपना है ? मताओ, ताभो तो धूम-रिजा के समार मुली पोटोपलो इरा पाक कर यह पौन इस कौरव पुल को याग्नि में सभ (पतंग) पन रहा है ॥६॥ पेटो-मार, पुपिये। माग गुममा मारि सपनी-समुदाय से घिरी हुई यो समाहित पापारी को परण-पादना पाने के लिये गई यो । भौनसेन-यह उचित पा। पंजनों बन्दना करनी ही चाहिये। - उसकेमार- - चेटो-हाँ से लोartो भानुनती ने देख लिया। भीमरोन-(प्रोप से) मोह ! रात्री परनी मे देख लिया। माह । देवी पोप उचित होया । उस दार- चेटी-सब देवी सरसो के मुख पर दृष्टि डालते हुये उसने गवं के साप दुर हसार रहा। भोममेन-वेदन देणारी नहीं रहा भी । आह, क्या करें ? उसके याद-- घेटो-रो पानसेनी, सुना है कि पांच पांव मांगे हैं। तय अब भी तुम्हारे क्यों नहीं बंप रहे हैं ? भीमसेन--सहदेव, सुन लिया । सहदेव-आर्य, इस विषय में क्या कहा माय? क्योंकि यह तो दुर्योधन नोमी है । देखिये- ति धाश्वतः । वक्ष्येणीमित्यत्र भूनार्थक्तप्रत्ययस्यासाघुरवमय वेणीवन्धनादित्य- स्यम् । वेण्यास्तसावरवाद उन्मोरस्य कथनात् । अत एव वेण्याः संहार उन्मोकोऽति ग्रन्यनामापि घटते । शलमायते पतङ्गवदाचरति । वेणी केशवेषः वाहश्च । एनाम् इत्यपानन्यादेशाद एताम् इति युक्तः पाठः । तयोरनित्यत्वात् । पण द्रौपदी श्यामां च ॥१९॥ अत्र तनु वाक्याभूषायाम् । बम्बा माता कुन्ती । आ इत्याक्षेपे । न संयम्यन्ते यमिह बन्धनम् । पलत्रशब्दस्याजहल्लिङ्गतया यल सेति सामानाधिकरण- न। कल श्रोणिमार्ययोः इति विश्वः। . - । - । - जनोमितम् । (स्वाभरणानि बुद्धिमनिशा प्रयानि) समवति पानापरा स्त्रीणामिति । [स्त्रीणां चेतांसि भतः साहचर्यानित्यसमाजाद [सहवामा भर्तृसहशानि भवन्ति ।] मधुरा कोमला मधुररसा वा । [घल्ली विषविटापि समाश्रिता मुच्छयते हि। भूईयते मूच्छा करोति । यद्वा मूच्यते जनमा शेषः। विषविटपो विपशाखाविस्तारः। विस्तारो विटपोऽ स्त्रियाम् इत्यमा वचित् विषविटपिसमाधिता इति पाठः। मतु मनोहरा वलया वृक्षसाह रश्रीगो हि गाहनांजनि भेनागि भर्नु गमानि । मधुरापि हि मन्चंगने शिविटापिगमापिता बद्री ॥२ भीमगेन:-बुद्धिमानी हो या रिमभिनितम् । बेटी-मार पीरिममावेसी भनि। गुगाम, नई रिजाहीना भोसोतीमfer) भीमनः-रिपुनाभिहित मपा। घेटी-गपा एवं भगितम् । मपि भापनि.. स्माकं देव्याः सः संपम्यान (ए एमाई। प्रभार सुह्माणं प्रमुगु के गेमु य प्रमाण देवीए मेगा गंजमीअनि तिI] भीमसेनः-(मारितोगम) सापु, तिमति, सा । ताभिहित यास्मत तनपे धूयताम् । अधिरेणव कालेन । चञ्चद्भुजभ्रमितचण्डगदाभिघात- संचूरिणतोरुयुगगलस्य सुयोधनस्य । स्त्यानावनद्धधनशोरिगतशोणपाणि- रुत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीमः ॥२१॥ द्रौपदी-कि नाय दुष्करं स्वया परिकुपितेन । अनुगृहरवेतापसितं भ्रातरः। - [कि णाह दुकरं तुए परिकुविदेण । अणुगेनन्तु एदं वर्मिर भादरो। : यदि । बल्ली लता । आर्याच्छन्दः ॥२०॥ - प्रथमोऽ . बास के कारण निओं के चित्त भी पत्तियों के जैसे हो जाते हैं। विर्षले माश्रित लता मोठी होते हुए भी मूउिन र देती है ॥२०॥ रसेन-युधितिका, सब देवी ने क्या कहा ? -कुमार, यदि देषो सेधको से अन्म होती, तब कहती। सेन--तो फिर आपने बया बहा? -मैंने यह पहा- 'अये भातुमको, तुम्हारे केश जब तक नहीं खुन तरु मारी स्वामिनी के केश से बंधे ?' मसेन (सन्तोष से) ओक, बुद्धिमतिका, ठीक । तुमने नहीं कहा जो वक के लिये उचित या। (अपने आभूषण बुद्धिमतिका को देता है) पि पा माल को राजकुमारी, सुनिये । अल्प ही समय में- देवी, फड़कती हुई भुजाओं से घुमाई गई पहा के प्रहार से घूर-चूर हुई शाओं वाले सुमोधन के चिकने, चिपके हुये और गा घिर से लाल पला भीम सेरे केशों को अलहात करेगा ॥२१॥ पदो-नाय, अपित हुए आपके लिये क्या करना कठिन है ? आपके पिके इस निश्चय का समर्थन करें। राहस्ताः सयम्यन्त इति । अत्र केमाहस्ता: प्रशस्तकेशाः । साधु बुद्धिमतिके इत्यनेन हरूपशिल्पकमुक्तम् । यदुक्त तत्रैव-चित्तप्रसादो हर्षः स्यात्तति- पसङ्गमे इति । चदित्यादि । हे देवि, तव कचाकेदामीम उत्तम्मयिष्यति बाधयिष्यति । :: सन् । चिश्चन्तौ परिस्फुरन्तो यो भुजी ताभ्यां भ्रमिता या चण्डा गदा अभिधातेन प्रहारेण संचूणितं अस्युगलं यस्य तस्य] सुयोधनस्य स्थान तमपवि क्षिप्त अवनदं संसक्त धन निरन्तर मच्छोणितं तेन गोगो त: पाणियस्य स तथा । स्त्यानं स्तिमितसङ्घयोः इति विश्वः । विदक्षि- ताः समाः इत्यमरः । पण्ड: प्रचण्ड: ॥२१॥ ६ह स्त्यानेत्यादिक: प्रतीकाररूपो गण्डः । यदुक्तं तत्रैव-- प्रतिक्रियान्वित । प्रनीगर इति स्मृतः । इह परिन्यासरूपो मुखसधिः। यदुक्तं तव- पारस्तु कार्यस्य भाविनो निश्चयाचः । नाय अतिदुष्करं खया परिकुपितेन

-
वेणीसंहारे
सहदेषः-अनुगृहीतमेतदस्माभिः ।
( नेपथ्ये महाकलकलः । सर्वे सविस्मयमाणंयन्ति )
भीमसेनः--
मन्यायस्तार्णवाम्भःप्लुतकुहरवलन्मन्दरध्वानधीरः
कोणाघातेपु गर्जत्प्रलयपनघटान्योन्यसङ्घट्टचण्ड.।
कृप्याक्रोधानद्वतः कुरुकुलनिधनोत्पातनिर्धातवातः
केनास्मत्सिहनादप्रतिरसितसखो दुन्दुभिस्ताज्यतेऽयम् ।
( प्रविश्य संभ्रान्तः)
कञ्चुरी-कुमार, एष बसु भगवान्यासुदेयः ।
( सर्वे कृताञ्जलयः समुत्तिष्ठन्ति.)
भीमसेनः-(ससंभ्रमम) कासो भगवान् ।
कल्की-पापापातामषितेन सुयोधनेन संपन्तुमारयः ।
(सर्व संभ्रम नाटयन्ति)
भीमसेनः-संपतः
पुरो-माहि माहि संयमुगारग्यः ।
भीमसेनः-कितन।
मिनम्।
तरतुमायनामेतापसित देवताः ।
-
FAT: ।

प्रथमोऽङ्क ? परदेव-हम इसका समर्थन करते हैं। 'नेपथ्य मे तीन कलकल ध्वनि होती है । सब आश्चर्य से सुनते हैं। दिन से सुग्प समुद्र के जल से भरी हुई गुफा वाले और घूमते हुए अल को पनि के समान गम्भीर, वादन-दण्डका प्रहार होने पर परजती यिकारी घन-घटाओं को परस्पर कर के समान भवथर कृष्णा के रोय है, पुरु-वंश के नाश के अपशकुनभूत प्रचण्ड पवन (के समान) और सिंहनाद को प्रतिध्वनि के मित्र इस नगारे को कोन पोट रहा है ॥२२॥ ( प्रवेश करके पारामा हुआ) चुकी--कुमार, इन भगवान् वासुदेव को. (सब हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं) मसेन--(धवराहट के साथ) कहा है भगवान् तुली-पाण्डवों के प्रति प्रेमभाव को न सहन करने वाले सुपोधन ने प्रपरन किया। { सब घबरा जाते हैं। सैन--क्या प्रांप लिया। को-नहीं, नहीं । बांधने का प्रयत्न किया। सेन--भगवान से या किया? लयधनाना घटाः पतयस्तासामन्योन्यसङ्घट्टस्तवण्डः । घटा समूहः लनम् । [णायाः ब्रोधस्तस्य} अग्रदूतः प्रथमक्षकः । [कुंकुलस्य पारस्प बातनिर्धात्तातोऽशुभः प्रचण्डपवनः ।..अस्माकं] प्रतिरकः तस्य सखा तलाश: 1 [भत्र वीजगुणात्यानात् विलोभनं ध्यङ्गमुक्तम् इति केचित् । ॥२२॥ ती महलकः । तल्लक्षणम् अन्तःपुरचरी वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः । हुसला कञ्चकीत्यभिधीयते ॥ समुदेवस्य अपत्य पुमान् वासुदेवः । गिकुरुभ्यश्च इति अरण। संयतो वक्षः। बद्ध कीलितपत्ती यह वहणसन्धिः । यदाह---विरोधस्याख्यानं या दुषस्य समयो मतः । हम । हन्तं ह। [दशितं यद्विश्वरूपं तस्य तेजः तस्य सपातेन

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प्रयो कारब-हम इसका समर्थन मरते है। (मेरम्प मे तीच परम पनि होती है। रब आप से सुनते हैं) मापन से भुष शमा मत से भी पुका पाते और घूमते हए तकोपनि समान गम्भीर, बायन-सा महार होने पर गरजती प्रलपारी पन-प्रदानों को परस्पर कर के समान भमर णा के कोय वर, दुहत के नारा के अपरानुनभून प्रचण पवन (के समान) और परे सिहमार को प्रतिवनि के मिसनमा कोकोन पोरहा है ॥२२॥ (प्रवेश करके पाराय हमा) दुगो-मार, इन भगवान पागुदेव को (सव हाप जोड़कर पड़े हो जाते है) भीमसेन-(घबराहट के साथ) रहा है भगवान् । कम्ती-पाण्डवों के प्रति प्रेमभाव को न पहन करने वाले सुयोधन ने पनेरा प्रयत्न किया। ( सब पत्ररा जाते हैं। भीमसेन-या बांध लिया। को-नहीं, नहीं । बाँधने का प्रयत्न किया। भीमसेन--भगवान मे वा किया? हन्त्यः प्रलयपनानां घटाः पतयस्नासामन्योन्यसहस्वचण्डः । पटा समूहः छट्टी मिलनम् । ष्यायाः वोधस्तस्य अग्रवः प्रथमवर्षक: । [कुरुकुलस्य धनं नायनातनिर्यातयातोग्नुमः प्रचण्डपवन: ! [अस्माकं] मिरमितं प्रनिरवः [वस्य सम्बा तत्र:]: {मत्र वीजगुणाख्यानान विलोभन म मुवसन्ध्यङ्गमुक्तम् इति केचित् । ॥२२॥ । नुवरी महालकः । तल्लक्षणम्-अन्त.पुरचरो वृदो विप्रो गुरागंणान्वितः । रागिनः कम्युकीत्यभिधीयते । बमुदेवस्य अपत्यं पुमान वासुदेवः । प्यन्तरवृर्षिएपश्च इति अए । सयतो वहाः। बड़े कीलितसंयती इह रयरूपो निर्वदशमन्धिः । यदाह-विरोषस्यास्यानं यदा दुःदस्य समयो मतः । वेग मस्नेह । हन्त ह। दिशितं यद्विश्वरूपं तस्य सेनः सस्य सपातेन

गरन्दारिता मानुरागाः । यहा । धारमयारामो पनं
। (प्राशरी दतप्टि:) आ: दुरारनपुरुषुलपसिन, एवमनिशान्तम
सहदेवः-आर्य फिस्सी दुराका मुयोधनो यासुदेवमपि भगवन
तं मोहान्धः कथमयममु वेत्तु देवं.पुराणम् ॥
आरनेत्यादि। सत्यनिष्ठाः सात्विकभावापना मुनयः य भगवन्त:
चारमवनयोस्तुल्परवेनात्यन्तमौदामायिकृतम् । यद्वा । मारमन्यासमन्तार
आरमारामाः आस्मैवारामो बनं येषां ते।
निकलुषे निीत त्यतभेदे या [असप्रजातनमरण] समापी निर्मा
[विहितमतयः समाहितषिताः 1) विहिमरतयः कृतानुरागाः । विहिन
इत्यपि पाठः । तत्र विहिता पूनिधारणा यस्तै ।
भवनिशानीला--असंचयं महाबाहो मनो दुनिमहं घसम् ।
अनेराग्राहो नि। पता थारमारामे
देशीमहारे
कञ्चुशी-- ततः
रा महाना शितविश्वपतेज.संपातमूहि
हरपुलस्मरिछविरसनिदेशमनुप्रातः । पुमारमथिलम्मित बटुमिच्छति ।
भीमसेन - (सोपहामम्) कि नाम दुरारमा सुयोयनो भगवन्त
ममित्तमात्रेण पाण्डयक्रोधेन भवितव्यम् ।
देणगजानाति ।
भीमसेनः- वत्स, मूढः खल्वयं दुरामा कथं जानातु । पर।
आत्मारामा विहितमतयो निर्विकल्पे समाधी
ज्ञानोद्रेकाद्विघटिततमोग्नन्थयः सत्त्वनिष्ठाः ।
यं वीक्षन्ते कमपि तममां ज्योतिपां वा परस्तात
यार्य जयन्धर, किमिदानीमध्यवस्यति गुरुः ।
मूच्छित विश्वरूपं विश्वभरमूर्तिः । सपातो मैलकम् । हप्तको निन्यः ।।
पापकारिन् । मूढो मूर्सः । खलु वाक्यभूपाया निश्चये वा।
साक्षास्कुर्वन्ति । कीदृशाः
रमन्त हत्यारमारामाः । त्यक्ततरसना इत्ययः । पुनः कीदृशाः । नि
मिहिरराय । अस्मिन्नाय नितिन रामापी मान यं योre rः। .

।
प्रथमोऽष्ट
- कञ्चुको-तत्पश्चात् वह महात्मा प्रकट किये विश्व-रूप के तेज के प्रहार
इच्छित हुए कुरु-कुल को तिरस्कृत करके हमारी छावनी मे आ गये हैं औ
विलम्ब कुमार को देखना चाहते हैं ।
भीमसेन-(उपहास के साथ) क्या दुष्ट दुर्योधन भगवान् को याँधन
बाहता है ? (आकार की ओर दृष्टि लगाकर) आह ! दुष्ट, कुरु-कुल क
लिङ्कित करने वाले, तेरे इस प्रकार मर्यादा का उल्लङ्घन करने व ला होने पर
ण्डवों का कोष तो केवल निमितमात्र ही रह जायेगा।
सहदेव-आर्य, क्या यह दुष्ट सुयोधन भगवान् घासुदेव का भी सत्य
वरूप नहीं जानता?
भीमसेन-वत्स, यह दुष्ट तो मूर्ख है, फिर भला क्या जाने ? देखो-
जिस प्रकाश और अन्धकार (ज्ञान-अज्ञान) से परवर्ती अनिर्वचनीय पुरातन
व को आत्मा में रमण करने वाले, निविकल्पक समाधि में चित्त को लगाये
ए, ज्ञान के उदेक से नष्ट हुई अज्ञान-ग्रन्थि वाले, ब्रह्मनिष्ठ योगी देखते हैं, उस
व) को मोह से अन्धा यह (दुर्योधन) कैसे देख सकता है ।.२३॥
आर्य जयन्धर, अब बड़े भाई ने क्या निशय किया है ?
‘दशाः । कानोत्सेकात्तत्वज्ञानमाहात्म्याविनाशितनामसगुणा विनाशितमिध्या-
ना वा । बनेन धृते: फलमुक्तम् । ज्ञानोद्रेकाव इत्यपि पाठः। उद्रे कः प्रौदिः ।
नि तत्रासङ्ग उक्तः । अत्र तु प्रथमं वनवासः ततः समाधिलाभ: ततस्तत्त्वज्ञा-
'मिथ्याज्ञानविनाशः ततः सत्त्वनिष्ठता सतः साक्षात्कार इति तत्त्वज्ञानोत्पादकः
गोपि बोद्धव्यः । यद्वा अन्यत्र सङ्गत्यागः, ततो पुतिः, ततः प्रज्ञाप्रीतिः,
विद्यालक्षणतमोग्रन्थिभेदः,, ततो राजसप्रवृत्युच्छेदो, मूलोन्वाद ततः
त्वको प्रवृत्तिः, तस्याः फलमीश्वरप्रपादः, तेन भगवान्समस्ततमःप्रकाशयोः
रो दृश्यते । तमेवं. सादृशपुरुषोऽपि न पश्यति । किं पुनर्मूडो दुर्योधन इति
FI कोशम् । कमप्यनिर्वचनीयम् । तमसा मिथ्याज्ञानानां ज्योतिषां
शानानां वा परस्तात्परम् । ताभ्यामप्यगम्यमित्यर्थः । अत एव कमपोत्युक्तम् -
त दवं क्यमय मोहान्धो जानातीति । पुनः कोहपाम् । पुराणमनादिसिद्धम् ।
वपा च यमनियमादिसिद्धपुरुषधौरेयगम्पमिति ध्वनितम् ॥२३॥

रसति शब्दायते । स्फोतं मनीश [सुमहानादं च मया स्यादेवम् । T . श्रीमोगः-1, एनेबपना गम(पारi युप्मा भाणु लाह, भगुरगयरामागहरो मनमर्श [अण्णं च पाह, पुग्णीदिनुपाहि गमरामापिस भई गमायापारम ऋविरघुग् इति किवन्तो निपात: 1 (पा० ३.२,। दिवादितच् ।'] नरपतियुधिष्ठिरः । परनी प्रौपदी गृहीतवता कृतनिषता वितमत्र कौरवनिधने केशान्सहरिष्यामीति नियमरूपम् I ] कोरव्याः कु जाताः । पशवो यज्ञापं घाननीयाः [राबन्योपनिमन्त्रणाय 'क्षत्रियाहानार वारी पनि L Trirfr गंपामारीत. पE रिया: A farahimनः पतं गजन्य रोदुन्दुभि " t-It Of RTET गाधामो समिती गगामा । tra- ) , भारतमानि होts: समी-प्रतिग्रहीन मामामाभिः। परी-अपचनाप, पुनरनि भीमसेनः-- ननु पावासरानतरये, foruraतीकाधामनया। भूयः परिभवनान्तिलजाविधुरिताननम ! अनिःशेपितकौरव्यं न पश्यसि वृकोदरम ॥२६॥ बीजप्ररोह उभेदो परिकपित्प्रभवामकः । इति भरलाइभेदरूपं मुखस माह-घरदार इति । चत्वारो भीमार्जुनसहदेवनामाः । ऋतुमृतौ वा यः ब्रह्मोदाहोत्रम्वरूपाः ] स भगवान् हरिः फोरदेष्टाचार्यः।। एवाधरो यज्ञस्तत्र] दीक्षितो दीक्षा प्रापितः। [यहा दीक्षा जातास्य . या:प्रधानो वाद्यविशेषः । यहा यशोदुन्दुभिः , अपमा म धारों पुरोहित हैं, यह भगवान विपतम्य) कर्म का उपदेश ३ आचार्य) है, राजा (युधिडिर) युद्ध-रूपो यज्ञ की दीक्षा लिये (यजमान को (i) नियम-धारिणी है, फौरव लोग (बलि होने वाले) पशु । प्रिया के अपमान से उत्पन्न क्लेश को शान्ति फल है। (यह) यो राज-समूह को निश्चित करने के लिये जोर से बज रही है ॥२४॥ हदेव-आर्य, अब म जनों से अनुमति पापे हम भी अपने पराम माधरण करने के लिये जाते हैं । मसेन--वरस, आर्म की आज्ञा का पालन करने के लिये हम संसार है उठकर) देवो, अब हम कौरवों के नाश के लिये जाते हैं। रदी-(आँसू भरकर नाथ, ससुरों के साथ पुट के लिये जाने वाले के समान आपका मङ्गल होवे । शेता-हमें (अएका मङ्गल-बदन स्वीकार है। द्रौपदी-और नाय, युद्ध से लौटकर मुझे फिर भी सान्त्वना दीजियेगा। भीमसैन-पानाल को राजकुमारी, अब भूठे थानासन से क्या (प्रयोजन) (अव) फिर वृकोदर को सब कौरवों का बिना नाश किये (और कार-जन्य ग्लानि तथा लमा से दीन-मुख न देखोगी ॥२६॥ मानकदुन्दुभिः । इत्यमरः ॥२५!! अनुगात इति पञ्चम्यास्तसिः । [अनुज्ञाताः कृतानुमतयः इह देवि गच्छाम नेन कारणरूपो मुवसन्धिः । यदाह-उद्यमः प्रस्तुतार्थस्य कारण परिकीनि । हरेर्यन्मङ्गलं वृत्तं वद्युष्माकं भवतु । यचाम्बा कुन्ती वदति तथुप्माव दुअली मिथ्या। मूर इति । भूम: परिभवः प्रचरपराभवः । [भूय इति पदन्छदो युक्ततरः भवेन यां पलान्तिलजा व ताभ्याम् । क्षान्तीति पाडे परिभवस्य क्षारया य तया बिदुरितं क्लिष्टं विच्छाय वा आननं यस्य तम् । अकृतकोरवनि- । पुनः न पश्यनि । शान्तिः शमा । विपुरितं मातम् । वृकोदरं भीमम् पति इति पारे भविष्पति लट् ॥२६॥ 7

व। मायादेवी भागी। अतिyिmnama
द्वितीयो
(mefaultry)
- furthira grahrai-traint at
थी। Urf from Afrieोभन्मेर
समरभूमि गरवा समापि TIME Tirs In
freeना गहारामा मग सामिाय मार
भयानित भरगुणासमेय पतः सांग:पुरियामरमेश भE
मटा
भातपादि।
नोच्चः सत्यपि चर्पीक्षितमलं श्रुत्वापि नाशित
शक्तेनाप्यधिकार इत्यधिकृता टिः समालम्विता।
सर्वत्र स्तलितेषु दत्तमनसा यातं मया नोडतं
सेवास्वीकृतजीवितस्य जरसा कि नाम यन्मे कृतम् ।'
भादिष्टोस्मोति । सभापयितव्याः इत्यनेनान्वयः । अविध्यतामनुमन
पिः प्रश्ने संभावनायां पा । अम्बा माताय जननी स्यमरः । [समय में
श्यमो था । समयः सपथे भाषासंपदोः कालसंविदोः सिद्धान्ताचारसंकेत
सरेपु च ।। इति हैम: } । रायः वर्णः । संभावयितयाः समिहितीक्तं
समाजपितस्याः सम्मानयितव्या: । भविष्यता प्रभावशालता ।
धिकेन । मादामात्र मर्यादापर्यवसनः । अयरोपण्यापारोऽन्तःपुरकम ।
रिको व्यवहारजन्यः । उक्तोपन्यासे तपाहि इति शब्दप्रयोगः ।
नौच्चरिति चक्षुषि सत्यपि उपरीक्षित नालमह न समयः। [इभिः
उः प्रक्रमभङ्गापेक्ष्यः । भुपि सत्यपि मपा उर: नेक्षितमुभिर
। तेनापि मया यष्टिः [स्मालम्बिता समान

द्वितीय अंक
m
( तत्पश्चाद कञ्चुको प्रवेश करता है)
कञ्को- महाराज दुर्योधन ने मुझे आशा दी है- विनयन्थर, जल्दी
जाओ। देवो भानुमतो का पता लगाओ। वह माता जी की चरण वन्दना के
आचार से निवृत्त हो चुकी अयवा नहीं। क्योंकि उसे देखने के पश्चात् मुझे
अभिमन्यु को मार मलने वाले, कर्ण, जयाय आदि अपने सेनापतियों को
-भूमि में जाकर संमानित करना है। इसलिये मुझे बहुत शीघ्र जाना
माहिये। मोह ! महाराज का प्रभाव भी कितना
मुन वृद्धावस्था से
नाकान्त का केवल मर्यादा-पालन हो अन्तःपुर में कर्तव्य रह गया है। अथवा
दावस्या को क्या उलाहना दूं? क्योंकि अन्तःपुर में नियुक्त सब लोगों का
हो आचारानुरूप वेष और चेष्टा है। क्योंकि--
आँखें होने पर भी ऊपर को नहीं देखा; पर्याप्त सुनकर भी नहीं सुना;
मयं होते हुये भी अधिकार के कारण धारण की जाने वाली छड़ी का सहारा
नया; हमेशा श्रुटियों का ध्यान रखते हुए मैं कभी अकड़कर नहीं चला। सेवा
= लिये प्राण धारण करने वाले मुश में क्या (नई बात है), जो वृद्धावस्था ने
अद्भुत है कि
-
त्पन्न को है ॥1॥
-
दशी । अधिकारोऽयं मम कञ्चक्निों यप्टिसमालम्बनमिति अधिकृता योग्या।
इलितं व्यापारपच्यवः। उदतं 'यया स्यादेवं मया न पातं नोद्धतेन मया
अमित्यर्थः। नामानबक्तृसौ। जरसा मम किं नाम कृतम् । अपि तु न किमपि ।
सस्य । सेवान्धीकृतजीवितस्य । सेवार्थमन्धीकृतं निष्फलाकृतं जीवितं येन
-पेत्यर्थः । विचित् सेवांस्वीकृतजीविसस्य इति पाठः । तत्र सेवार्थ स्वोकृतं
वितं जीवन येन । ' तथा 'च सेवानिमित्तमेव ममाम्यादिकं न तु
रातमिति भावः ॥१॥

विधा:म रिमायापरः॥निभानः। . . गुप्या साक्षान्महानल्पः स्ययमन्येन वा कृतः । करोनि महनी प्रीतिमपकारांसकारिणाम ॥३॥ वेणीगंहारे नो महाराजदुर्योधनस्य महिषी भूत्वं विलितपौरभावातिमात्रं संतप्यसे । भाणुमदि, कीस दाणी तुम मिविणअदसएमेतस किदे दुग्जोहणस्म महिगी भविन एवं विअलिअधीरमावा अदिमत्तं संतपसि । चेटी-भट्टिनि, शोमनं भगति मुवदना । स्वपनः किन धनु प्रता [भट्टिणी, सोहणं भणादि सुवमणा । सिविणअन्तो जणो कि ए क्यू पन भानुमती-हजे एवमेतत् । किरययं स्वप्नोऽतिमात्रमकुशलदर्शनो भाति । [हने एवं पणेदम् । किंदु एदं सिविण अदिमैतं अमवदन पडिभादि । सखी-प्रियसखि, यद्येवं तत्कयय स्वप्नं येनावामपि प्रतिष्ठापयन्त्यो प्रशंसया देवतासंकीर्तनेन दुर्वादिपरिग्रहेण च परिहरिष्यावः। पिअसहि एब्व ता कहेहि सिविण जेण अह्म वि पडिठ्ठावअन्तीओ धामप्प देवदासंकित्तऐण दुश्वादिपडिामहेश अडिहरिस्सामो]. बेटी-शोभनं खतु भणति सुववना । अपुरालदर्शनाः स्वप्ना प्रशंसया फुशतपरिणामा भवन्तीति भूयते। [सोहणं खु भणादि मुझ अकुसलदंसाणा सिविणा देवदाणं पसंसाए कुसलारिणामा होन्ति ति मुभीमा भानुमती-ययेवं तस्कपयिष्ये । अवहिता तापद्भव.। जिद एवं ता.कहइरस । अहिदा दाव हाहि । सलो-अवहितास्मि । रूपयतु प्रियसखी। [अवहिदम्हि । कहेदु पिशन भानुमती-हला भयेन विस्मृताश्मि । तति यावरसवं स्मृत्वा कपिच्या हिला गएण चिमुमरियहिता चिलु जाप सव्वं सुमरिसकहरम (हनि चिन्ता माटयति). • (ता. विराति दुर्योधनः कानुषीच) दुर्योधनः-सूरुमिर.कस्पषित। स्वादिमिनधारमा दया. । मा [मभिमानरमा द्वितीयोऽङ्कः ४६ स्वप्न के दर्शन मात्र से इस प्रकार धोरता खोकर तू अब यो अत्यधिक जो हो रही है ? चेटी-स्वामिनी, सुवदनाक कह रही है । सोते हुए मनुष्य क्या नहीं देता है। - भानुमती-हजे, ऐसा ही है। फिर भी मुझे पह स्वप्न अत्यधिक अशुभ- क प्रतीत हो रहा है। सखी-प्रिय सखी, यदि ऐसा है तो स्वप्न (हमें भी) घतला दो, जिससे हम में भी (उसे) मङ्गल-जनक बनाकर धर्म-कया, देवों के नामोचारण और i(दूब घास) के पारण से (अनिष्ट का) परिहार करें। दैटी-सुवदना ठीक कह रही है। सुना जाता है कि अशुभ स्वप्न भी को स्तुति से शुभ फल वाले हो जाते हैं । भानुमती-यदि ऐसा है, तो कहती हूं। सावधान हो जाओ। सखी-मैं सावधान हूँ। प्रियसखो कहे। भानुमती-सखी, भय के कारण मैं भूल रही हूं। तनिक ठहरो, सब पाद के बतलाती हूँ। (सोचती है) (तत्पश्चात् दुर्योधन और पञ्चकी प्रदेश करता है । दुर्योधर-किसी ने यह ठीक कहा है- शत्रु को हानि, छिपकर की गई हो पा प्रत्यक्ष, थोड़ो हो या अधिक, स्वयं हो या दूसरे ने, बहुत ही प्रसन्नता उत्पन्न करती है ॥३॥ । हिंसाया प्रणयेऽजाने । इति हैमः] । महिषी कृताभिषेकाचाम् इत्यमरः । न्खलु जनो यत्किमपि विप्रलपति । अत्र खलु प्रसिदौ । विप्रलपति विसंवादि वदति । कि वेष मे स्वप्नो प्रतिभासते । येन मया प्रतिष्ठापयत्वा नया देवतासंकीर्तनेन च परिहरिप्यते । अब प्रतिष्पयन्या स्वप्न सुमायक येत्ययः । [प्रतिष्ठापयन्त्यो शुभफलदत्वेन सम्पादयन्त्यो] । देवि एवमेतत् । शतना अपि स्वप्नाः प्रशसला...। सूरत शोभनोक्तिः । गुपयेति । अपकारिणां शत्रूणामपकारो गुप्त्या निभूत साक्षात्सर्ववेची नवल्पो वा स्वयं धान्येन था तो महती प्रीति करोतीत्यन्वयः ॥ ३॥ - . पुरस्मृत्य गिसण्डिनम् । लीग রায় ৪াসায়ামিলিগ শিগমিং " पानी-मानाप्रभाभणाण का मामाभापा रामा-विनयापर, frमार मार एशोभिगो दापमानापा जानामि पार। हते जरति गाये या श्लाघा पाण्ठपुमागां गंवास्माकं भविष्यति । कञ्चती-(सर्वलक्ष्यम्) रेख, म ममा सङ्कलः । स तु भवती पातोऽस्माभिर्वावलोरित दरपत एवं विज्ञापमामि । राजा-एपमिदम् । सहभृत्यगणं सवान्धवं सहमित्र ससुतं राहानुजम् । स्ववलेन निहन्ति संयुगे न चिरात्पाण्डुसुतः सुयोधनम् । कञ्चुकी-(कर्णी पिधाय समय) शान्तं पापा । प्रतिहतममङ्गलम् राजा-विनयग्घर, किमयोक्तम् । कञ्चुकी-सहभृत्यगणं "पाण्डुसुतं सुयोधनः ॥ (इति पठति)। रोतमभिहितं देवेन । राजा-विनयन्पर, अद्य खलु भानुमती ययापूर्व मामनामन्ध्य दास त्प्रातरेव निष्क्रान्तेति व्याक्षिप्तं मे मनः । सदादेशय तमुद्देशं यत्रस्था भानु कञ्चुकी-दत इतो देयः । [समुच्छ्वसितमिव विकसितमिवेत्युत्प्रेक्षा] । का नाम अपि तु न नामानवालूप्तो। जून शरासनश्छिन्नधनुः । हत इति । जरति वृद्ध । गाङ्ग ये गङ्गापुत्र भीष्मे । शिखण्डी क्ली: तं पुरस्कृत्या करवा गाङ्गेये हते सतीत्यन्वयः ॥४॥ इन्दा । वो युष्माकम् । । सहमृत्यगणमित्यादी समावो वैकल्पिकः । न चिरारिक ।

द्वितीयोऽङ्कः = इसीलिये आज द्रोण, कर्ण, जयद्रय आदि द्वारा मारे गये अभिमन्यु के जय में सुनकर हमारे चित्त ने सास-सा लिया है। कञ्चुको-महाराज, आचार्य के शस्त्रों के सामयं के लिये यह कोई तदुस्साध्य कार्य नहीं था, और न ही कर्ण या जयद्रय के लिये। सा को क्या बात है? राजा-विनयन्धर, कसा कहा आपने- 'कटे धनुष वाले अकेले बालक को नों ने मारा, इप्सलिये इसमे कुरुश्रेष्ठों को प्रशंसा को क्या बात है।' मूर्ख, इसमे शिखण्डी को आगे करके बूड़े गाङ्गय (गङ्गा-पुत्र, भीम) को मारने पर पाण्डु के पुत्रों को प्रशंसा हुई है, वही हमारी होगी ॥४॥ कञ्चुकी-(लज्जित होकर) महाराज, मेरा यह अभिप्राय नहीं था। परन्तु के पराक्रम को कुण्ठा हमने पहले कभी नहीं देखो, इसलिये ऐसा रहा है । राजा-ऐसा ही है- योघ्र ही पाण्डु का पुत्र अपने बल से युद्ध में भूस्य-वर्ग, बन्धु-बान्धव, मित्र, तथा अनुगों सहित मुपोषन को मार डालेगा ॥५॥ कञ्चुको- (वानों पर हाथ रखकर, भय के साय) पाप शान हो । हल का नाश हो। रामा-विनपधर, मैने क्या कहा है ? कम्धुको-'भृत्यवर्ग सहित पाण्डुपुत्र को मुपोवन ।' (इस्यादिपा परता है) महाराज ने इसका विपरीत रह दिया। राजा-विनयधर, आज भानुमती पहले के मान मुम से बिना कहे भवन से प्रातः ही बाहर चली गई। इससे मेरा चिप्त माल है । इसलिये पान बतलामो जहाँ भानुमती स्थित है। पञ्चुको-महाराज, पर से, घर से । दिरपयः । माद एवाय न तु नसमामः ॥ ५ ॥ पददि । न चिरालाटुसुतं मुयोधनः त्याचारेण । साक्षिप्त- [साएन], माइतो पम्पनामिति शेषः। ।

: . (ोमि) gh-shram rmrij TAHIHITS पेर, पारक एकाहि शिशिरगारमोनियाarjasfairfagarm sanोहिगपुग्नयोmermireTTAR तरगगुपगुरभिशीर्ष भारतीयोrep कपः । सपाहि--- प्रायमिक्षमकरन्दकगलकोशः पुप्पः सम निपतिता रजनीप्रयुद्धः । अकांशुभिन्नमुकुलोदरमान्द्रगन्म- संचितानि कमलान्यालयः पतन्ति ॥६॥ राशा-(रामन्तादवलोक्य) विनयधर, इसपरममिनुत्ति रमणी म्भारम्भप्रविततदलोपान्तजालप्रविष्ट- हंस्तैर्भानो पतय इव स्पृश्यमाना विधुद्धाः । मुहिनं हिमम् । शिशिरं शीतलम् । उल्लितं चपलीकृतम् । प्रसवबन्धनम् । बन्धुरं निम्नोग्नतम् । शेफालिका पुष्पभेदः । शेफालिका निर्गुण्डी नीलिकापि मा । श्यामलता सतुंल इति प्रसिद्धा । य: ममीरणस्तेनो लितानि यानि बन्धनानि तेभ्यः च्युता याः शेषा ताभिः विरचितः कुसुमप्रकरो यस्मिन् । ईपदालोहिता ये मुग्धवधूनां : ते इध पाटलानि पानि लोकुसुमानि तविजितं यामलतायाः सौभाग्य यस्मिन् । जन्मीलितविकसितः कुसुमैः सुरभि प तत् शीतलं च । प्रालेयेति । प्रालेयं हिमम् । (तेन मिश्रः) : भारदः पुपरसः • कोशा येषां तैः।) करालो दन्तुरे तुङ्ग इत्यमरः । कोशो म । मालपो भ्रमरा। [पुष्प: समं निपतिता अलयः ।। ग. मिन्ना ये मुकुलास्तेषां उदराणि तत्सम्बन्धिना सान्त इत्यमरः । प्रियड्गुः फलिनी (तुहिनाणः । इत्यमरः । ----- ५ द्वितीयोऽख ( दोनो घूमते हैं) । कम्नुको-(सामने देदकर, चारों ओर गन्ध सूंघकर) महाराज, देखिये खिपे । यह आपके सामने पालोद्यान रहा, जिसमे ओस के कणों से शोत कायु द्वारा हिसापे गये धून्तों से गिरे हुए शेफालिका-पुष्पों ने पुष्पों को रादि गा बी है, जिसमें कुछ लाल भोली बघू के पोल के समान लाल लोध्र पों ने श्याम लता के सौन्दर्य को जीत लिया है, जो खिले हुये धकुल और न्द के पुष्पों से सुगन्धित एवं शीतल है और जो प्रभात कास में सुन्दर प्रतीत हो रहा है । महाराज इसे देखें । क्योंकि-- रात्रि में खिले हुए, हिम-कण मिश्रित पुष्परस से विषम मध्य-भाग पाले पुस्नों के साय गिरे हुए भौरे सूर्य की किरणों से खिली हुई कलियों के अन्त• मांग को तीज गन्ध से सूचित किये गये कमलों पर पड़ रहे हैं ॥६॥ राजा-(चारों ओर देखकर) विनयन्धर, यहाँ प्रभात मे यह और भी सुन्दर है । देखो- खिलना प्रारम्भ होने पर फैली हुई पंखुड़ियों के छोर रूपो द्वारोखों में से होकर अन्दर प्रविष्ट सूर्य की किरणों से हुये जाफर जगे हुये ये भोरे, जिनका इङ्गराग तीन गन्य से कुछ-कुछ प्रकट हो रहा है, अपनी स्त्रियों के साथ खलो हुई कमलिनी के मध्य-भाग रूपी शय्या को राजाओं के समान- पुष्पों का) विकास प्रारम्भ होने पर फैली हुई पंखुड़ियों के छोरों के समान सूचितानि] कमलानि पतन्ति गच्छन्ति । पततेः गत्यर्थत्वात्सफर्मक्त्वम् ॥६॥ [अमुष्मिन्नुद्याने] । उपसि प्रभाते । जम्मेति । जुम्भारमो विकासोपक्रम इत्यर्थः। [ज़म्भारम्भेण प्रवितता । दलानामुपान्ताः है एंव जालानि पक्ष दलानामुपान्ते पानि जालानि वादास्तः प्रविष्टः भानोः किरणः स्पृश्यमाना नृपतय इव दिवुद्धाः । नारिमलश्वासी स्तोकं लक्ष्यचाङ्गरागो येषाम्, पझे धनपरिमलस्य चन्दन- न्यस्य स्तोक्नांशेन लक्ष्यः, यदा स्तोक लक्ष्यः सङ्गरागो येषाम् । एते द्विरेफाः किचनलिनीगर्भ एव शय्या ताम् । पक्षे दिकचनलिन्यो गर्म यस्यास्ताहशी प्पाम् । स्त्रीभिः सामं मुञ्चन्ति । दलोपान्तः पत्रसमीपम् । तदेव बाल- - ।

५४ , वेणीसंहारे स्त्रीभिः सार्ध घनपरिमलस्तोकलक्ष्याङ्गरागा मुञ्चन्त्येते विकचनलिनीगर्भशय्यां द्विरेफाः ॥७॥ कञ्चुकी-देव, नन्वेषा देवी भानुमती सुवदनया तरलिकया - माना तिष्ठति । तदुपसर्फतु देवः । राजा-(दृष्ट्वा) आर्य विनयन्धर, गच्छ त्वं साइनामिक मे., तुम् । अहमप्येष देवीं दृष्ट्वानुपदमागत एव । कञ्चुकी--एष कृतो देवादेशः । (इति निष्क्रान्तः) सयो - प्रियसखि, अपि स्मृतं त्वया । पिअसहि, अवि सुमरिदं तुए भानुमती-सखि, स्मृतम् । अद्य किल प्रमदवन आसीनाया । हेनाप्यतितायितदिव्यरूपिणा नकुलेनाहिशतं व्यापादित । [सहि. सुम अग्न विल पमडवणे आसीगाए मम अग्गो केणावि अविसइददिग्ध एउलेए अहिमदं वादादिदम् ।। उमे- (अपवायं । आत्मगतम्) शान्तं पापम् । प्रतिहतमम (प्रायम्) ततस्ततः । [मन्तं पावन । पडिहद अमङ्गलम् । तदो सदो। भानुमती- अतिसंतापोपगृहीतहदपया विस्मृतं भया । तत्पुनरपि अपदिथ्ये। [अदिगंवायोग्याहिदहिसाए मए विमुपरिद । ता पुर मुमरिन हमम् । रामा-होयो भानुमती, मुबरनातरतिकाम्या सह किमपि मात्र भिवतु । अनेो मकामालेनापतरित: गणोमि ताबा विभाया (तिसपा चित:). मात्री-विमर्म सम्मान समयतु प्रिपाली। [दि. असं महायेरण। बहेर भिमही। मानापोवार वा भापतिमा अग्यम्योति स्यने नि होम्यम् समादौराया भी। पर। भामिति को NEET प्रभावी पदमाग काम HTTER वामनानाज गंजयः Prastratrait wif: । मोमको ।

५५ द्वितीयोऽङ्कः -पक्षों में से होकर अन्दर प्रविष्ट सूर्य की किरणो से टूने पर जमे हुए, और दन के स्वल्पांश से दिखलाई देते हुए अङ्गराग वाले राजा अपनी नियों के प खिली हुई फनलिनियों को मध्य में धारण करने वाली शय्या को जैसे- दि रहे हैं ॥७॥ - - काञ्चुकी - महाराज, सुवदना और तरालका द्वारा सेवा की जाती हुई यह भानुमती बैठी है । इसलिए महाराज पास जायें। राजा-(देवर) आर्य विनयन्धर, तुम मेरा युद्ध का रथ तयार कराने प्रिो। मैं भी देवो से मिलकर बस यह पीछे-पौधे याया। कञ्चुत्री-महाराज का आदेश यह विया । (बाहर चला गया)। सखी-प्रियसखी, पया आपको पाद आया? भानुमती-सखी, याद आमा । आज मेरे प्रमदवन में बैठी हुई के सामने सो अत्यधिक दिव्यरूपधारी नफुल ने सौ सपं मार गले। दोनों-(एक बार दो शेरर स्वगत) पाप शान्त हो। अमङ्गत का नाम । (प्रकट में) उसके याद? भानुमती-अत्यधिक संताप से ध्यास हृदय वालो में (फिर) भूल गई। लिये फिर से पार करके कहूंगी। राजा-आहा ! देवो भानुमती, मुवदना और तरलिषा के साथ कुछ बातें रही है। माछा, तब इस लता-गुल्म से छिपकर इनके स्वर-आलाप रो पा। (वमा करके सड़ा होना है)। सखी-सषी, सन्ताप न रो। प्रियसो (आगे) हो। सपो.पि सर्व योग्यम् ॥ ७॥ जमिकं युरे साधु । ममापत एवं दिम्पपिणा । अत्र सि निश्पये । पिणा गुदरेण । नकुलो नेउर इति प्रसिलो अन्तुः पाडयभ । महिरात जिन् । ३५ प पनम् ।। अत्राएवार्य नितम् । प्रायति । यत्तु नपा प्रा तमिलते। पति भरतः । ततस्ततः । मन्त्ररमामा पत्र

निद्रायाश्छेदोवसानं तत्र विवर्तनं पाश्वपरिवर्तनम् । [बद्य गतायो रावाहित
संमानिता किम् । ] संभादिता संमुखीरता । [अन्यस्त्रीजनेन सह या संकर
आलापः [तया लघुः धुवृत्तिः अहं त्वया लक्षितः किम् !] उपालम्भ
पागमरमामि Tamir traft,
rrial -
fr गाटे मिगिनीनो भूगल प्रमादामा
निदानपिकांवभिमुगनायामि गमादिता ।
अन्यत्रोगनगागागपुग माने गया मशितो
को गिम प्रिये परिजनांनभयोग्य माप
(रिफिरर) मया-
इयमस्मताययंकचिता मनगा प्रेमगियदमनरेगा ।
नियतं गुपितातिवलमत्वात्म्ययमुरप्रेक्ष्य ममापरापलेश
तयारिमानातरिक पातीति ।
भानुमती-हता, अहं ततस्तस्पासिवितरिम्परिणो मनाय
जाता। [हला, अह तदो सरग अदिगदमियरूपिणो राउलम दम
जादा ।
राजा-(गलक्ष्यम्) कि नामातिशमितरिष्यापिणो नासस्य नितो
माता रिफमनया पाण्या मातीतानुसतया वयमेव विसापाः । (सोटोपन
इयमस्मद्-इति पठित्वा) मूढ दुर्योधन, कुलटाविप्रलम्मानमारमान महमन्धमाके
किं कण्ठ इति [अद्य मया प्रमादात तब कण्ठे मुज • शिथिलीकृतः किम
निद्राच्छेदविदर्तनेषु अभिमुखं अभिमुखो भूत्वा इत्पर्यः । मया त्वं न संभावित
विसंवादः । [परिजन इवोपालम्भयोग्ये मयि यता परिजनस्योपालम्भस्तद्योग्य
मतापमोड़ परिजनवनियों न स्वन्यथा मयि फोप: कार्य इत्यर्थः । ८
इमिति । [अस्माकमुपाधयः सानिध्यम् अस्मदु. स एव एकः प्रधानः ।

द्वितीयोऽङ्क - । इसके सन्ताप का क्या कारण हो सकता है ? अथवा यह मुझसे ही वास-भवन से निकल आई है, इस से मैं इसके कोप को समझ रो भानुमती, दुर्योधन आपके फोप का पात्र नहीं है। लापरवाही के कारण मैने कण्ठ मे भुजाल्पी लता के पाश को शिथिल ? क्या (मैने) निद्रा-भङ्ग में करवट बदलने पर तुम्हारी ओर मुख ज तुम्हारा आदर नहीं किया है ? क्या तुमने स्वप्र में मुझे अन्य को नालाप के कारण भुपृत्ति देख लिया है ? प्रिय, सेवक के समान मुन्न में वा दोष देख रही हो ॥८॥ ) अयवा- रात्र हम मे आषित चित्त पाली यह अवश्य ही अपने मन से, जिसमें र हो गया है, अतिप्रिय होने के कारण मेरे किसी तनिक से अपराध करके कष्ट हो गई है ॥६॥ नेगे कि यह क्या कहेगी। मती-सखी, तव में उस अतिशय दिव्य रूप वाले नकुल के दर्शन उत हो गई। 1-(खिसियाकर) क्या अतिशय दिव्य रूप पाले नकुल के दर्शन से हो गई ? तो श्या माद्री के पुत्र पर आसक्त हुई इस पापिनी ने हमे धोखा दिया है ? (मोचते हुए-'इयमस्मद्' इत्यादि ६ का फिर 5) मूखं दुर्योधन, पंधली द्वारा पश्चित स्वयं को बहुत मानने पासा तू या सा तथोक्ता । इय प्रेममिबद्धमत्सरेण मनसा मम अपराधलेश व्य अतिवल्लभस्वात् नियतं कुपिता इत्यन्वयः] । उपाश्रयः सथय । पावत् । [मम सानिध्यमेव वाग्छन्तीत्यर्थ. 1 ] मनसा कारणभूतेना- कचित्तत्यन्वयः । निक्दं निरस्तम् । प्रेम्णा निवद्धो मत्सरोऽन्यस्त्री- पस्मिन् । मत्सरोऽज्यशुभढेपः इत्यमरः] । स्वयमुत्प्रेक्ष्य असन्ताप . ॥६॥ या वेश्ययानया या प्रेमदर्शनेन प्रतायं मरणम् । मादीसुतो नकुल । . भम्या पश्चिताः । ] विप्रलम्भो दिसादः इत्यमरः । कुलटा बन्धकीलरी - मामनुसरन य लतामण्डपं प्रविष्टः । ततो उज्मि तं आसराहाणं लाप तीरारमिनिमम पुरतः तरसत्ता गितं भीपरवम् । पसे घेणीसंहारे इथुना कि यक्ष्यति । (कि कण्ट इत्यादि पठित्वा । दिशोऽवलोक्प) मेवास्याः प्रातरेव विविक्तस्थानाभिलापः सखोजनसंकयासु च दुर्योधनस्तु मोहादविनातयन्धकोहृदयसारः कापि परिभ्रांन्तः । मत्परिग्रहांसुले- तद्भीरुत्वं तव मम पुरः साहसानीदृशानि श्लाघा सास्मद्वपुपि विनयव्युत्क्रमेऽप्येप रागः । तच्चौदार्य मयि जडमती चापले कोऽपि पन्याः ख्याते तस्मिन्वितमसि कुले जन्म कोलीनमेतत् । सखी-ततस्ततः। [तदो तदो।) भानुमती-तत उन्नित्वा तदासनस्थानं सतामण्डपं प्रविष्टा । ततः। पविट्ठा । तदो सोवि में अणुसरन्तो एव्व लदामण्डवं पविद्यो । ] राजा-महो दुलटोचितमस्याः पापाया अशालीगवम् । यस्मिश्चिरप्रणयनिर्भरवद्धभाव- मावेदितो रहसि मत्सुरतोपभोगः । तव दुश्चरितमद्य निवेदयन्ती ह्रीगाऽसि पापहृदये न सखीजनेऽस्मिन् ॥११ दरपमरः । [विविक्षत विनम् । ] शिवितो मविजनी इत्यमरः || बार । मोहायपाशाना बन्यो मेश्या । सार: स्थयम् [यापायं परिहोलपम् । तत्र पासुसा भगती। १ . - मानि परमपाणि (सागानि । नियस्य पारिया मोतिकमा सान] पोनरामः । मयि मामती तनु तथा प्रति मोहम् I J बाप पाये । कतिपय मिरि गर्व समय: रिमा पाने मित Ma

द्वितीयोऽ
। कहेगा ? ('कि कण्ठे शिथिलीत' इत्यादि का पाठ करवं, चाग
म्हकर) ओह ! इसी लिये इसकी प्रातः ही एकान्त स्थान की अभिलाषा
खियों के साय स्वर-आलाप मे प्रेम हमा है । दुर्योधन तो मोह कारण
(ध्यभिचारिणो) के हृदय
को वास्तविकता को न जानने के कारण
धोने में ही रहा । ओ पापिनी, मेरे कलत्र को कलङ्कित करने पाती,
कहाँ) मेरे सामने सेरी यह भोक्ता, (और कहाँ तेरे) ऐसे साहसपूर्ण
कर्म ! (कहाँ) हमारे रूप (शीर) को दह) प्रशंसा, (और पहां)
के उन्नहन के प्रति (मह) मासक्ति ! (कहाँ ; मुन मन्दबुद्धि के प्रति
। वह उदारता, (और कह!) चञ्चलता का (पह) रिलक्षण मार्ग !
| उम दिएर प्रसिद्ध फुल में जन्म, (और कहां) यह निन्दनीय कर्म.१०
श्री-उसके बाद?
गनुमती-तय मैं उस चंठने के स्थान को छोड़कर लता-माप के सादर
गई । सय वह भी मेरे पोर-पोये माता हुआ मता-मप मे ही घुस गया।
दिा-ओह ! इस पापिनी को कंसो व्यभिचारिणियों जैसे निलगता है।
है पापपूर्ण हडए बालो, जिन पियों से तूने एकान्त मे भेरे मुरत के
पका सम्बे प्रेम के कारण बड़े चाव से वर्णन किया था, भाग उन्हीं
सदियों से अपने दुराधार ततातील ममित नहीं होती ॥1॥
जनाएसम्] कोलोनमपवादः । कोलीन पशुभियुकुलीन गावा।
विष: ।।१०॥
पा. मोऽपि मामनुध्यमानस्तमेव मामण्डप प्रविष्टः । ममामीनाव
स
यस्मिमिति ।। ९. पारहररे परिसम्मोहने चिर प्रयन हिरएन यः
एस् रिमा पपा तपा पदो भाषो पस्मिसमरित तपादपा
लोपभोगः एहमि भारेरितः सच अस्मिन् समीरने भय दुराग
ती न होणागि प्रणय: RO वितम्भ इनिविण । भागो.
गया। एकागे। होगा ममावती ॥ ११ ॥

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द्वितीयोग्य दोनों-उसके बाद? भानुमती-तब उसने एष्टता के साय हाय घड़ाकर मेरी चोली खोंच ली। राशा-(सोचते हुये) गर्व से हाथ बढ़ाकर मेरी पोली खींच ली ? (कोध अब आगे महीं सुना जाता। अच्छा तो मैं दूसरे को खो को दूषित करने रोड बने उस नीच भाद्रो के पुत्र के प्राण लिये लेता हूं। (कुछ दूर जाकर र सोचकर) या पहले इस पापिनी को हो दण्ड देना चाहिये । (लौट - दोनों-उसके बाद? भानुमती- इसके बाद आर्यपुत्र के (जगाने के लिये किये गये) प्रातः- 'मङ्गलमय वाद्यों को स्वनि से मिले ये धाराङ्गनाओं के संगीत के : ने मुझे जगा दिया। रामा-(अनिश्चय से) 'मुझे जगा दिया' इस कथन से प्रतीत होता है इसने स्थान-दर्शन का धर्णन किया हो। (सोधकर) जो भी हो, सखी के 1 से स्पष्ट हो जायेगा। ( दोनों खेदसहित एक दूसरी को देखती हैं) सुक्दना--इसमें जो भी अनिष्ट है, उसे भागीरथी आदि नदियों के जल से कर दिया जाय। भगवान् ब्राह्मणों के आशीर्वचन और आहुति दिये गये प्रज्वलित अग्निदेव द्वारा नष्ट हो जाय । राजा-अब सन्देह को आवश्यकता नहीं। इसने यह स्वप्न-दर्शन का ही क्यिा था, लेकिन मुन जरमति ने कुछ अन्य ही समझ लिया- सौभाग्य है कि मैं आधी सुनी बात से होने वाली धधना से उत्पन्न आदेश ला नहीं गया; सौभाग्य से मैंने बातचीत के बीच में ही प्रोध से कठोर । ] चारविलासिनी वेश्या । अत्याहितं महाभीतिदं । यत्याहितं महाभीतिः र: । आहुतिभिहुंतस्तेन । हुता आहुतयो यस्मिन् तेन इति वा ।] दिमुरभिगन्धिना ज्वलनेनापहियताम् । अत्र अत्याहितमप्रशस्तम् । ष्ट्येति । [अघंश्रुतेन यो विप्रलम्भो वचना तेन जनितः यः क्रोधस्तस्मात् । गित इति दिष्टया माग्येनेति हर्षहेतुः दिष्टया समुपजोपं चेत्यानन्दे - . 1 सखी घेटी घ-- (अन्योन्यमवलोक्य, अपवार्य) अत्र नास्ति सो [एत्य पत्थि त्यो दि सुहसूअयम् । जइ एत्थ अलीअं कहइस्सं ता पित्रमा वेगीगंहारे मां प्रत्याययितु बिमूहहृदयं दिष्टया कथान्तं गता मिथ्यादूपितयानया विरहितं दिष्टया न जातं जगत् ।। भानुमती--हला, कयय किमत्र शुममूदकम् । [हला, कहेहि किं एत्य मुहमूअयम् । शुभसूचकम् । यद्यबालीकं कथयिष्ये सत्प्रियसत्या अपराधिनी भविष्यामि।। एव स्निग्यो जनो यः पृष्टः परपमपि हितं भणति । (प्रकाशम्) मष्टि, सारे वंतवशुभनिवेदनम् । तद्देवतानां प्रणामेन द्विजातिजनप्रतिग्रहेण घान्तयंताम् । खनु दंष्ट्रिणो नफुलस्य वा दर्शनमहिशतवयं च स्वप्ने प्रशंसन्ति विवक्षणा अवराहिणी भविस्सम् । सो एव्व सिद्धिो जो जो पुच्छिदो परस विह भरणादि । मही सर्व एव एद अमुहणिवेदणम् । ता देवदाणं परमाणे दुनादिजनपडिग्गहेण न अन्तरीअदु । गहु दाहिणो णउलस्न वा सणं अहित दवह य सिविणए पसमन्ति विअक्खरणा ।] राजा--अघितथगाह सुवदना । नकुलेन पन्नगशतवधः स्तनांकापहरण नियतमरिष्टोद तर्फपामि । पर्यायेण हि दृश्यन्ते स्वप्नाः कामें शुभाशुभाः । शतसंख्या पुनरियं सानुज सृशतीव माम् ॥१३॥ (वामाशिस्पन्दनं गूषयित्वा) आः, मनापि नाम दुर्योधनस्यानिमित्तानि हर- हत्यमरः । ] दिया है । मो निषेधे । मानौना निधवपना योगात् । (दिव्या अपंक्यने पामध्ये मया या गोधेन पर शठिन में ग्साहनमुकम् ।। शिया विमूर पपाहणारामयं हृदयं यस्य त मां ] प्राचार्याक्न कोयितुम् । कपा यम्न गता रामापा जगत् पिता मनपा विहित म भाग ॥ १२ ॥ गाँव किम AIRE पागुभामिनि। मोइलीक मन्त्रालय TRI आपो भविष्यामः । सर्वस्य निवेदनम् । तथापन । किया सादकाः कदाचिदशुभपरिणामा इत्यर्थः । ] अकामानुमतो कामम् इत्यमरः। द्वितीयोऽष्टः नहीं रही। हर्ष है कि मुप्त मूर्ख को विश्वास दिलाने के लिए क्या रामाप्ति पहुँच गई सौभाग्य है कि मिया दोपारोपण की गई इस (भानुमतो) से न्य नहीं हुमा ॥१२॥ भानुमती-सखी, पतसाओ इसमें क्या शुभ-सूचक है ? सखी और चेटी- (परस्पर एक दूसरे को देखकर, एक ओर को) इसमें भी शुभ-सूचक नहीं है । यदि इस विषय में भूठ कहूँगो तो प्रियसखी की पिनी हो जाऊँगी। प्रेमी जन वही है जो पूछने पर फटोर होते हुए भी र बात कहे। (प्रकट में) सखी, यह तो सारा ही अशुभ-सूचक है। इस• देवों को प्रणाम करके और ब्राह्मणों को दान देकर अनिष्ट रोका जाय । स्वप्न में जंगली सूअर या नेवले के दर्शन और सौ सांपों के घध ज्या नहीं यतलाते। +, राजा-मुवदना सत्य कह रही है। नकुल द्वारा सौ साँपों का वप और योती का अपहरण निश्चित रूप से अशुभ फल वाला है, ऐसा मैं समझता हूँ। यधपि शुभ-अशुभ स्वप्न लोगों को समय-समय पर दोपते रहते हैं, लेकिन -सि सौ संख्या तो, मानो, छोटे भाइयों समेत मुन्न पर ही लग रही है ।।१३॥ (वाई आँख का फड़कना सूचित करके) ओह ! ये अपशकुन मुन्न दुर्योधन के भी हृदय को प्याकुल कर रहे हैं। (संभल कर) अथवा डरपोक लोगों के यत्तिमप्यरयाहितं तद्देवताना प्रणामेन द्विजातिजनप्रतिग्रहेण चान्तरीक्रियताम् । न पुनदंष्ट्रिको नकुलस्य वा दर्शनमहिरातव्यापादानं च स्वप्ने प्रशंसन्ति विचक्षणाः। -बत्र परपं निष्ठुरम् । अन्तरोक्रियतां शाम्यताम् । इहाशीरलंकारः । यदुक्तम् वत्रव-आशोरिया शासनम् इति । विचसणाः पण्डिताः । अदितयं सत्यम् । पभगः सर्पः । [अरिष्टमशुभमुदके उत्तरकाले यस्य I] उदकं उत्तरविशुद्धिः । पर्यायेणेति । {स्वप्नाः पर्यायेण शुभाशुभा: दृश्यन्ते । कदाचित् शुभफलो. इयं शतसंख्या पुनर्मा स्पृशतीत्यन्वयः ॥ १३ ॥ भावहन्तीत्या कढिच्युतरदोषो नास्ति । विशेषगुणेपूघृतत्वादित्यवधेयम् । प्रकम्पनेषु कम्पकारिषु । का गणना तुच्छान्येसानीत्यर्थः ।। ।

अलीका चासौ आशंका पताम् । विगसितो यः सन्ध्यारागस्तेन प्रम- होमगा। (ar) मा मौMITramme Twimmitrrigareranifer-- যান। নাম লিমিশামানিম। पालन्नि कारतानीय तेभ्यः प्रामानवियनि सामुपाषा: चीनमाणमामirmiमानयामि। भागमतीमा गुगरे, यशपाल বিধিমাত্রাগামীদ সা বাপিশায়। गुरभणे, पेग दार उदरनिहारिरिहरी निंगा हरपणदुरामोभमणको नाम पविगाहो।) समी--पति, रोपागिनानकपत्रमहोत मनावामागोहि पिरितोधानभूमिभागो :प्रेमीयो भगवानराहनाश्मिः संवृतः । लोहितधावनकुसुमगणाग पर्युपापातुम् । [महि, रोगामिदा লাবীবধিলিলিটল গিৰিমাগমুনিম ফুলখছি। भअयं महस्सरस्सी संवृतो। सा गमओ दे मोहिदणकुमुममग्राम पग्जुवादुम् । भानुमती--हने तरसिके, उपनय मेभाजनं मागवतः सहस्र सपा निर्वतयामि । [हजे तरलिए, उवणेहि मे अग्धमानणं आव भर सहस्सरस्सिगो सरिअं रिणध्वट्ठमि । चेटी--यद्देव्याज्ञापयति । (इति निष्क्रान्ता)। [ज देवी आएदेदि।] राजा--अयमेव साधुतरोध्यप्तरः प्रियासमीपमुपगन्तुम् । ( इत्युपमर्पति) पहाणामिति । सूर्यादिदशाः स्वप्नोनिमित्तमकस्मादौत्सातिर मुत्पातबा- दिकमेते काक्तालीयमतितोपनत यथा स्यादेवं फलन्ति । अतस्तेभ्यः प्रा पण्डिता न बिभ्यति । न भयं कुर्वन्तीत्यर्थः। तेम्प इति भीत्रार्थानां भग द्वितीयोऽङ्कः य को कम्पित करने वाले इस प्रकार के (अपशकुन आदि) के विषय दुर्योधन को क्या चिन्ता हो सकती है ? अङ्गिरा ने भी यही भाव छन्दोबद्ध ? ग्रहों की गति, स्वप्न, अपशकुन और मनौती (उपयाचित) संयोग-वश हो 'देती हैं (सधी होती है) । इसलिये बुद्धिमान लोग उनसे नहीं डरते ॥१४॥ सो अव भानुमती को नो-स्वभाय सुलभ मिथ्या आाडा को दूर करता हूँ। भानुमती-सखी सुवदना, देखो तो--भगवान सूर्य (दिन का पति), जिस उवयपर्वत के शिखर से छिपा हुमा उत्तम रथ बाहर निकल आया है, ग को लालिमा के नष्ट हो जाने से स्वच्छ एवं दुर्लक्ष्य बिम्द वाला हो - सखी-सखी, सपे हुए स्वर्ग के पत्र सदृश, लता-समूह के अन्तर्भाग मे पड़े किरण-जाल से उद्यान के भूमि-भाग को पीला कर देने वाला भगवान् र (सहन किरणों वाला) दुरालोक हो गया है। इसलिये आपका सात । और पुत्रों से मिश्रित पूजा-सामग्री से पूजा करने का समय हो गया है । भानुमो- अरोतरलिका, पूजा-सामग्री का पात्र मेरे पास ला, जिससे भगवान सूर्य की पूजा कर सर्फ । घेटो-जंसो देवी आज्ञा दें। (बाहर जाती है)। रामा-प्रिया के समीप जाने का यही अच्छा अवसर है। (यह कहकर जाता है) । रालोकं मण्डलं यस्य । ] ससि रोसानितानकपत्रस हदोन नतासालान्तर. किरणनिवहेन पिञ्जरितोद्यानभूमिमागः पूरितप्रतिश इव रिपु प्रेक्षणीयो भगवान्सहस्रकिरणः । तत्समयस्ने कुसुमचन्दनगर्भणाण पर्युपस्थातुम् । सानितं निर्मलीकृतम् । पिरितः पपिसीहतः । पर्युपरपात पूजयितुम् । सपर्या पूजा । देवि एतदघंभाजनम् । भगवनम्बरसरोवरंगसहसरत मुलमालाकुमविशेषक सालभुवनागनदीक यह स्वप्नदर्शने प्याराहितं तद्भगवतः प्रणामेन दुमतपरिणाम मम सगतभाहरणारं ३ " हा ( राजा पुष्पाण्युपनयति । स्पर्शमुममभिनीय प मुगुमानि भूमो पात भानुमती-(सरोषम्) अहो प्रमादः परिजनस्प। (परिदृश्य शre am-नि, आमा Infat-it HTTTTA [भpिirant AHETim निमीत्राको गापी-- HTTERT) ME TIME निपम महारादो माशो नाम ( रा प frifaगमगारmint Tr भागमती-- (दिराभिमुधोन) मगर भामरमार पूर्वरिगावमुमारामारा हा पार रियायाहित तमः प्रभामैन सागुवरय पुराणारिमाथि (आय arm) हाने तरतिर पनप में गुणानि IFE निर्वतयामि । (हको प्रसारमान)। [भ मारमहामोपमहागान साबहमुहमणलभूषविसम रामसमुषणेवर मनापीर एश्य मिति किवि अद्याहि तं भावदो परणाम समानुप्रस्न अउतरय सनाई हो। हने तरसिके, उवणेहि मे मुमा । अगावि देवा' रिणामि। कथमार्यपुत्रः । अहो पमादो परिअस । कथं अग्नउत्तो।] राजा--देवि, अनिपुणः परिजनोऽयमेवंविषे सेवावपाती। तत्प्रभा शासने देवी। भानुमती--(लजां नाटयति) राजा--अयि प्रिये, विकिर धवलदीर्घापाङ्गसंसर्पि चक्षुः परिजनपथवतिन्यत्र कि संभ्रमेण । पत्रम्य भवतु । अत्र सहस्रपत्र कमलम् । विशेषकस्तिलकः । अङ्गन चस्व- । अत्र नवविधायक सूत्राभावासकारान्तत्वमेवैस्यवधेयम् । अनि द्वितीयोऽङ्कः ६७ (प्रवेश करके ) वेटी--स्वामिनी, यह पूजा-पात्र रहा। अब भगवान सूर्य की पूजा कर खो-(देखकर स्वगत) या महाराज आ गये ! ओहो ! (बस अव) व्रत भङ्ग हो ही गया। [पास जाकर संकेत से सेवको को हटाकर घय ही पूजा-पात्र लेकर देना है) भानुमती-(सूर्य की ओर मुख करके) आकार रूपी विशाल जलाशय के यि सहस्र-दल (कमल), पूर्व दिशा रूपी दयू के मुखमण्डल के कुंकुम- , सम्पूर्ण जगत् के अद्वितीय मणि-दीपक, भग्यान, इस स्वप्र-दर्शन में जो निष्ट हो, वह भगवान् के अभिवादन से भाइयों सहित आईपुत्र के लिये ल वाला हो जाय । (मध्य देकर) अरी तरलिका, मुझे पुष्प हो, (जिससे सरे देवताओं को भी पूजा कर सकू। (दोनो हाथ फैलाती है)। राजा पुष्प देता है और स्पर्श मुख का नाट्य करके पुष्पों को पृथ्वी पर गिरा देता है) तुमती-नाराज होकर) ओह ! सेवकों का कैसा प्रमाद है ? (घमार चकर घबराहट के साथ) क्या ? आर्यपुत्र ! जा--देवी, यह सेवक इस प्रकार की सेवा के अवसर के लिये (महत) ही है। इसलिये देवो इसके लिये दण्ड देने में समय है। अनुमती--(लजा का नाट्य करती है)। जा-पारी, घबराहट सेक्या आवश्यकता है ? धवल और विशाल की ओर पलने वाली अपनी दृष्टि सेवा के मार्ग पर चलने किरोति । [ हे देवि सश्रमेण बलम् । परिजनस्य पन्थाः परिजनपथ । चतु पोलमस्य सस्मिन्परिजनपयतिनि अन मपि । धवलाधामोरोपं रास्तेन समपंतीति सन्यौल पधुविकिर विक्षिप। अपाङ्ग बन्नः संसरि गमनशीलम् । परिजनपनिनि सेगमार्गस्थित मपि । fr २८ - दिग्विालिम् Janभी सध्यामेर। [मनोहिण्याप्रमा रिमाया: सिमा मजिराय: मरमाणपाति: लागु सारस (१८)पानी परी.एमेत निधि वेणीसंहारे स्मितमधुरमुदारं देवि मामालपोच: प्रभवति मम पाण्योरञ्जलि: सेवितुं त्वाम् ॥१५॥ भानुमती-आर्यपुत्र, अयनुज्ञातायास्त्वयास्ति मे करिमन्नपि मिलापः । [अज्जउत्त, अम्मगुण्णादाए तुए अस्थि में करिस दि महिलासो] राजा-श्रुतविस्तार एवास्मि भवत्याः स्वप्नवृत्तान्तं प्रति । । प्रकृतिसुकुमारमात्मानं खेदयितुम् । भानुमती-आर्यपुत्र, अतिमानं मा शङ्का वायते । तदनुमन्य। पुत्रः । [अज्ज उत्त, अदिमत्तं मे सदा बाहेदि । ता प्रणुमर दु में इस राजा--(सगर्वम्) देवि, अलमनया भड्या । पश्य- "कि नो व्याप्तदिशां प्रकम्पित वामक्षौहिणीनां फलं कि द्रोरणेन किमङ्गराजविशिखरेवं यदि क्लारि भीरु भ्रातृशतस्य मे भुजवनच्छायां सुखोपस्थिता त्वं दुर्योधनकेसरीन्द्रगृहिणी शङ्कास्पदं किं तव ॥ भानुमती-आर्यपुर, म पतु किमपि मे शहामारणं युष्मासु कि स्वापुत्रायंच मनोरपसंपत्तिमभिनन्दामि। [अजउत्त, पाहु मंभ्रमेनोगेन । गितमपुरमदारं मनोहरं च यथा स्यादेवं हे देवि महि । मम पापोरलिः वितुं या प्रमवति । पाण्योरञतिरियता इसस्य २ देयम् । उत्तरायसारण तारा ॥१॥ रिमोम्पाप्लेनियर स्वमेव वाम्पगि नाशि हिम: पासा माभिताग, प्रणिता भूमिातागाम, मोहिणीना कि फलम् ।। नाराय: हि । मजाला रामा अजरामः- सनि . - मधमोड्न । इस (मुस दुर्योधन) पर डालो। देवी, मुझ से मन्द हास से मपुर और रितापूर्ण धचन जोर से कहो। मेरे हायों को अञ्जलि आपकी सेवा कर तो है ॥१५॥ भानुमतो- मार्यपुत्र, आपको अनुमति पाकर मुझे कोई व्रत लेने की उतारा है। राजा-आपके स्वप्न को घटना के विषय में मैंने विस्तार से सुन लिया इसलिये स्वभाव से कोमल अपने (शरीर) को इस प्रकार कष्ट देने से करो। ? भानुमती--आर्यपुत्र, मुझे बहुत अधिक भय सता रहा है। इसलिये आर्य- मुझे अनुमति प्रदान करें। राजा--(गवं से) देवो, इस आशङ्का से बस करो। देखो, यदि तुम इस र दुःखी होगी तो- दिशाओं को छा देने वाली और पृथ्वी को कम्पित कर देने वाली हमारी हिणी सेनाओं का क्या फल हुआ ? (आचार्य) दोण से क्या लाम हुआ देश के राजा (कर्ण) के बाणों का क्या लाभ हुआ? हे भयशील, तुम मेरे भाइयों की भुजा रूपी वृक्षों की छाया में सुखपूर्वक बैठी हुई, दुर्योधन हपो राज को परनी हो तुम्हें भय का कारण पपा हो सकता है ।।१६॥ भानुमती-आर्यपुत्र, भुम लोगों के रहते मेरे लिये कोई भी भय का कारण है। किन्तु में आर्यपुत्र को ही मनोरथ-सिदि की कामना कर रही हूं। शतसहस्र तु सहस्राणि नवैव तु । नराणामपि पञ्चाशम्छतानि श्रोणि पानषाः । पञ्चषष्टिसहस्राणि तयाश्वाना शतानि च । दशोतराणि षट् प्राहुर्य- पावदिह संस्थया । इति महाभारते आदिपर्वलि अ० २ दलो० २३.३६] कि होणेनेत्यादा फ्लमित्यनुपज्यते । अङ्गराजः करणंः । काम्यसि परियाम्यसि । हे मोह । म मातृशतस्य भुजा एवं वनं तस्य छायां मुसेनोपस्थिता । किस दुर्योधनः केसरीन्द्रः तस्य गृहिणी एव ।।१६॥ म घलु राम्दो निषेधे । रपिता कान्ता । - - fr TITTERTir Pari Termitty Uninthi) -- grilr. TAITE पाग श्वेगाधा हिसामोलिवार- এযাবলিগিননামানাম लागोगा विगदाग मन्दमन्दस्मितं या। चान्दते नियमगुपितालकानापरं वा पातु याम्छा परमगुलभ कि नु दुर्योधनस्य ॥ (मेरम्ब महामारः। गायन) भानुमती-(भप रागान परिर) परिवाना परिवानामाग [परिणाम परिता रामा-(गमन्तादयनोय) रि, मतं संप्रमेण । परप-- 'दिशु व्यूढाइघ्रिपागातृणजटिलचसत्पांमुदण्डोऽन्तरिक्ष झाङ्कारी शर्करालः पथिषु विटपिनां स्कन्धकापः सवन प्रासादानां निकुञ्जवभिनवजलदोद्गारगम्भीरचौर- वण्डारम्भः समीरो वहति परिदिशं भोर कि संभ्रमेण ।।? : सखी-महाराजः प्रविशत्विमं दादपर्वतप्रासारम् । गकारी व तपरपरजःकतुषीकृतनयन उम्मूलिततकवरशम्दवित्रस्तमग्दुरापरिभ्रष्टवनभनुन मपर्याकुलीकृतजनपद्धति पणः समीरणासारः । [महाराओ पविमदु । प्रेमेति । एतादृशं.वा तत्र वक्वन्दं पातुं दुर्योधनस्य कि वाया न । तु वाञ्छव । वीहशम् । प्रेम्णावढं संबद्धमत एव स्तिमितं निश्चल मन्नर तेनापीयमानं यदजं तद्वच्छौभा यस्य तम् । लजासंबन्धादस्वच्दारमत्यहा च। नियमान्मुषितः परवासीभूगः असक्तको यत्र । तामोसायरो त्र। परमतिशयेनामुलभं दुर्लभम् । अन्यतरुणानामिति.शेषः ॥११॥ । हे भीह कि संभ्रमेणं मर्यन।. एंनादृशः समीरो वायुः -- । बी परिशि

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रितीपोत
समा- मपि सुगी, मेरे तोरेवत रहो ममोरप है कि प्रिया के साथ
मरर पेश रिहा रेपो-
(पु) पुन्हारे पण सात मुरे, जो अपने प्रेम-पूर्ण और निधिस मेत्रों
समतों को टोमासो पो रहा है, कारण, जिससे अस्पष्ट पचन
रस रहे हैं तथा जिस पर मर पुरान है और जिसमें अपर अप्रभाग से
के कारण पावक पनि हो गया है, पान ने कोरडा है। दुर्योधन के
पे माय शेन (पातु) दुर्म है ॥१७॥
( नेरप में तीर पलपम पनि होती है । मद मुनते है )
भानुपती- (भप में राम बामिगन र) मार्यपुत्र, दघाइपे,
.
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है|100
राजा-(चारों बोर देगार) प्यारी, पदरासो नहीं। देखो-
(पह) चारों ओर तोर देग वासा पापु बह रहा है, जिसने विभिन्न
गों में वृक्षों के अङ्गो पर दिया है। भारत में जिससे तिनकों से
इल पूलि-तार उठ रहा है, जो मार्गों में साम-झाय करने वाला सपा
रियों (न्नों) से भरा है। को वृक्षों को साताओं को (परस्पर) रगड़ से
से युक्त है और महसों के तुओं में नूतन मसपर के गर्जन के समान
भौर और पोर (ध्वनि पासा) है।
(इसलिये) हे भोर, राने को क्या
सबो-महारान, इस पर्वत के प्रासाद के अन्दर पलिये। यह वायु
पान बड़ा हो भीषण और रहेंगजनक है, जिसने उठी हुई कश पूलि से
दिया वहति यतः । बोहरः । विधु पूर्व संबदमनिपस्य पादपस्याङ्ग
मादि] येन स तया । अन्तरिक्ष म्योम्नि पूर्णन जटिलो ग्यासबलपांधुदण्डो
कारवधूलिपस्मारस तथा माद्वारः अध्यक्तराब्दस्तद्युक्तः । पयिषु शकंरालः
रायुक्तः । सिघ्मादित्वात् मत्वीयो लच्प्रत्ययः । विटपिना वृक्षाणां स्काय.
पपर्णधूमसहितः । प्रासादानां धदलगृहाणा मध्येषु नवलपरोद्गमगम्भीररवः
प्रचण्टौपत्रमः । अनिचरणस्तेन पिवति जलादिकमित्यप्रियः । पदनिश्च-
गोऽस्त्रियाम् इत्यमरः । कपर्णशपः । भावे पञ् ॥१८॥

- । - तरसंपूर्णमनोरथस्य मे कामचारः संप्रति विहारेषु। तदितो दारपर्वतमाला- कुरु धनोरु पदानि शनैः शनरयि विमुञ्च गति परिवेपिनीम्। ૦૨ वेणीसंहारे दापव्वअप्पासादम् । उश्वेअकारी क्यू असं उत्यिदपस्मरअकलुमाकर उन्मूलिभतम्वरसवित्तत्थमन्दुरापरिष्मवल्लहतुलङ्गमपाउनीविदशर भीसगो समीरणासारो। राजा-(सहपंम्) उपकारि खल्विदं पात्याचक्रं सुयोधनस्य । पर दपत्नपरित्यक्तनियमया देव्या संपादितोऽस्मन्ननोरयः । कमिति-- न्यस्ता न भ्र कुटिन वाप्पसलिलंराच्छादिते लोचने नीतं नाननमन्यतः सशपथं नाहं स्पृशन्वारितः । तन्व्या मग्नपयोधर भयवशादाबद्धमालिङ्गितं भक्ताऽस्या नियमस्य भीपणमरुन्नायं वयस्यो मम ॥ ( सर्व वास्याबाधां रूायन्तो यत्नतः परिकामन्ति ) सुंतनु वाहुलतोपरिवन्धनं मम निपीडय गाढमुरःस्थलम् ॥२- (प्रो पयित्वा) प्रिये, मसण्यावकाशः समोरणः संवृतत्वावर्भगृहस्प। विला मुग्मोनय पशुरन्पृष्टोनिकरण । पत्र मानः कारचनाभेर: पर्वडाकारः । 'या दापर्यत इनिal पर्वतमाम । मनिन तरसतो घट । वाजिशाला तु मन्दुरा यमः । म । ममूहः। sarai भीषणमहरमम पायो मित्र म । मातु मित्रमेयो या नियमाप महता भाः। नियममजानेवाद-दिन याला रापन पत्रम। अपर मुम मम । परामहं न ममा बारितः परि मा पनि rid पापयति न कमित्यर्थः । त्यो ; रोयो । मानमोर मानन या रफार भनिशि गच्छामः। .

द्वितीयोग्य माल कर दिया है और जिसने उखड़े हुये बड़े बड़े वृक्षों के शब्द से अश्वशाला से छुटे हुए उत्तम छोड़ों से मनुष्यों के पातायात को अस्- कर दिया है। जा-(हर्ष के साथ) यह वायु का तूफान सुयोधन के लिये हितकर हो सको कृपा से विना प्रयत्न ही व्रत छोड़ देने वाली देवी ने हमारी इच्छा र दी है। क्योंकि- स कृशाङ्गो ने न ध्र कुटि टेदी की, न आंसुओ से दोनों नेत्र दके, न मुख ओर दिया, न स्पर्श परते हुए मुन्छे शपयपूर्वक रोका, (बल्कि) भर के (मेरा ऐसे) आलिङ्गन किया कि (इसके) स्तन डूब (दब) गये। इसके भङ्ग कर देने वाला यह भीषण यायु नहीं है, प्रत्युत मेरा सखा है ।।१६।। सलिये पूर्ण मनोरप वाला मैं अब इच्छानुसार विहार कर सकता हूँ। यहाँ से दारपर्वत के प्रासाद में ही चलें । ( सब बांधी के कैट का नाट्य करते हुए कठिनता से चलते हैं ) -- राजा- हे निविड जद्धाओं वाली, धीरे-धीरे पद रखो, लड़खड़ाती गति को हो । सुन्दरी, भुजा रूपी लता से ऊपर (कण्ठ में) बन्धन डाल कर मेरे स्थल को जोर से दबाओ ॥२०॥ नवेग करके) प्रिय, इस गर्भ-गृह के बन्द होने के कारण (यहाँ) आंधी को स्थान हो मिला है। (इसलिये) पूलि-समूह पोंछी गई आंखें निडर होकर खोलो। जनभारद्धं कृतम् । एतानि भयात्तया कृतानीति मरुत उपकारकतेति भाव । ना। अय भीषण्महन्न । कि तु मम वयस्य इति योजना । मंत्रं च तक्रियाभिश्लेयम् ॥ १६॥ कामचारः स्वेच्छाचरणम् ॥ दिति । हे घनोर निविडोहप्रदेशे । परिवेपिनी कम्पवतीम् । हे सुरनु मिनशरोरे। ममोरःस्थल गाउं दृढं निपीडय । बाहुलतयोपरिबन्धनं यथा 1 - नादेवम् ।। २०॥ [संवाघनत्वात्] । गर्भगृहहं गर्भहर इति प्रसिद्धम् । विषधं त . ..

पानी-(Aries fort trime Imami h-m, imurtirimary fmtar marti me, water frontre ATHARI IIT--(भीम) भगवा रेगुपिा निगरा गुणी मनी नयारापनाया- दुमपोलो गोनस्तनभरिरामुगः सिमहारं दुनों ऊर्योमन्दःपि पाते पृगुजगमगगगुर्गधीस्या यात्या गेदं गृगाध्याः गुचिरमयययंदाहस्ता करोति (ग पिगम्मि) रामा-तसिमिरममारतीम सिमानामधारते की। लोलांगुकस्य पवनाकुलितांगुकान्तं त्यटिहारि मम लोचनवान्यवस्य । अध्यासितुं तव चिरं जघनस्यतस्य पर्याप्तमेव करभोरु ममोरयुग्मम ॥२२॥ (प्रविश्य पटाक्षेपेण संप्रान्तः) विश्वासमिति क्रियाविशेषणम् । [ उन्मृष्टः अपसारितः रेणुनिकरः तच्चक्षुः ।] दिष्ट्येह तावदुपातमारुतो न वापते । सस्किनिमित्तं...न धूप [आरोहणस्य संभ्रमेण त्वरया निःसहमममर्थम् । रेगुरिति । नेत्रयोरायतत्याईत्तिनुरप्यल्पोऽपि र यो पीडा अल्पोऽप्येप कम्पः । [क्षितो हारो यस्मातद । उरो वक्षःस्थलं दुनोति पो भरितमिति तारकादित्वादितच् इति साधनीयम् । अन्यथा मृतमिति स्व बधेयम् । अाराधारभूतयोवैपयः कम्पः भन्देऽप्यल्पेऽपि पाते गमने सति इस्यन्वयः । अतो हेतो यु: मृगाक्ष्याः खेदं करोति । कीरशः। अवयवः शरी 1 . द्विनीयोऽङ्कः भानुमती-(हर्ष के साय) सौभाग्य से यहाँ उत्पात-वायु नहीं सता रही है। सती-महाराज, प्रियराखी को दोनों जवाएं (अपर) चड़ने की शोप्रता रण अशक्त हो गई हैं। तो अब महाराज आसन-वेदिका (चबूतरे) से नहीं अलकृत करते? राजा-(देवी को देखकर) भद्रे, आँधी ने तो बड़ा ही अपकार किया है । मल्प भी धूलि नेत्रों के विशाल होने से अधिक पीड़ा दे रही है। थोड़ा-मा म्पन स्यूल स्तनों के भार पाले तथा हार पर हए वक्षःस्थल को पारित रहा है। धीरे-धीरे चलने पर भी स्यूल जपन (फटि) के भार के कारण । जनाओं में कम्पन बढ़ रहा है। (इस प्रकार) अवयों का अवलम्बन इई वारया मृग-नयनी को बहुत देर तक कष्ट दे रही है ॥२१॥ (सब बैठते हैं) राजा--परन्तु महारानी नंगे ही कटोर शिलातल पर पयों बैठ रही है ? करम (हथेली का कलाई और छोटी अंगुली के बीच का भाग) के समान भों पाली, वायु से चश्वत पट के छोर वाला और तुम्हारी हष्टि को हरने 'मेरा यह उह-पुगस चन्चल दल वाले और मेरे नेत्रों को प्रिय तुम्हारे स्थल के चिरकाल तक आपय सेने के लिये पर्याप्त है ॥२२॥ (पर्दा हटाकर प्रवेश करके घवराया हुआ) नादिभिदंतहस्तः कृतसाहित्य इत्यपः । उभाम्यामेव पीडा देख्या इति नायः ॥२१॥ मनास्तीर्ण पस्त्रादिना अनाच्छादितम् । लोलेति । हे करभोर तब अपनस्थलस्याध्यासितुं अपनस्थलस्याप्रयाय समोरपुग्मं पर्याप्तमेव धक्तमेव। पौरस्य । [सोसांभुषारय पपसवानस्य । [पम सोचनायकाय मदीयनेत्रमित्रस्य । कीरशम् । वातालिबासुरान्तम् । रोपाटिहरणशोतं । अपनस्पलस्यस्पर शेपे पष्ठी इति भूए पष्ठी। रम्प मोहित यमरः ॥२२॥ ह सोनेरयादिभग्नमियतेन घनमन्धितः । शापमुक्त पदापर भाषण-

पर-Trafeterinlear:)।
३
हारी-गोगामार) नप गहामः । महास
मभीसि। वापयानरेश पासमभिधीयरे !
मामेति । नाम प्राये।
मिति प्रायः मारिसमायबर
भानमिति । भौभिन मला दायुना अथ प भीममेनेन । माता वायुपुर
महत्या आरमा जापने पुत्रः पभेदोपधारा स्तिोमा सारे
।

७३
द्वितीयोऽहू.
पञ्षी-महाराज, तोड़ दिया, तोड़ दिया।
(सव भय से देखते हैं)
राजा-क्या हुआ
?
कञ्चुकी-मीम मे तोड़ दिया।
रामा-अरे! क्या बक रहा है?
कञ्चुकी-(मयपूर्वक) निश्चित ही भीम ने आपका तोड़ दिया।
राजा-पिहार | वश्वारी, अपम वृट, आम तुझे यह बस बुद्धि-विभ्रम
पया है?
नुकी-महाराम, (मुझे) कोई युद्धि-विभ्रम नहीं हुआ है। रिस्तुत
पारपी।
मारवाणु से तोर दी गई मारके रप को बना, घरों के बाद से
दीवार तो हुई, मानो, प्यो पर गिर पो है ॥२६॥
पजा-तोत्र वायु
के बेगरो
जगत
के कंपजाने पर रपती प्वमा टूट गई
गोपरागरण है कि इस तरह जोर जोर से बह ऐ हो-तोड़ दिय, तोर
की-मराराम, मी नहीं। किन्तु इस अनिष्ट के दानन के लिये
हाराम को सचिन कर देना चाहिये, पर स्वामि-भक्ति हो मुझे एने के लिये
भानुमती-मार्यपुत्र, प्राए दाह्मण रे रसाः मोर जमेm
माना निवारण करा रोमिये ।
समा-(तिरस्पारपूर्वर) माटा भो । पुरोहित मुभित्र से यह रो।
पुरी-सी मशाराम की माता। (पहार पणा जाना है।
(प्रवेश पर)
मोहो-(antो सर) हो. मात्र हो।
पम् । रेगन रिसमा निमाणः पणिE [न पर
मोसोरिहम् । निमित्ता: रीय
योग hिat m Tara
दो देव ॥२॥

, राजा-(ससंभ्रममुत्थाप्य) अम्ब, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । सिर माता--(साश हुम्) अद्य खलु पुत्रवधामद्दीपितेन गाण्डीविना अना दिवसनाये सस्म वधः प्रतिज्ञातः । [अज्ज क्ख पुत्तवहामरिमुद्दीविदेश गण्डोकि ७८ बेणीगहारे जामातुः सिधुरामस्य माता दुःशला के प्रतीहारमूमो तिहति । [ महाराओ। महाराण, एमा पशु पामादुणो गिरामस्य मादा दुर पहिहारभूमीए चिदि। राजा--(किंचितिचिनयारमगतम्) कि जयापमाता दुःशला ति।' भिमन्युवपापितः पाण्डुपुत्र किपिदयाहितमायेति भवेत् । (r गच्छ । प्रवेशप शीघ्रम् । प्रतीहारी--यन्महाराज, याज्ञापयति । (इति निप्लाना)। [मद आएवेदि। (ततः प्रविशति संभ्राता जयद्रथमाता दुमला ब) ( उभे सास्र दुर्योधनस्य पादयोः पततः) माता--परित्रायता परिवायता कुमारः। परित्ताअदु परित्तामदुसुम (दुःशला रोदिति) हितम् । अपि कुशलं समराङ्गणेष्वप्रतिरयस्य अययस्य । माता-जात, कुतः कुशलम् । (जाद कुदो कुसलम् । राजा-कमिव । अगत्पमिधे दिवहगाहे तस्स बहो पडिण्णादो। राजा--(सस्मितम्) इवं साधुकारणमम्बाया दुःशलायाश्च । पुत्रशो दुन्मत्तस्य किरीटिनः प्रलापरेवमवस्या । महो मुग्धत्यमबलानाम् । मन दिपादेन । चारो दुराले अलमभपातेन । तरचायं तस्य धनजयस्य प्रभ दुर्योधनवाहपरियरक्षितस्य महारपजययस्य विपत्तिमुत्पादयितुम् । माता-जात, ते हि पुत्रवधुवपामर्षोद्दीपितकोपानला अनपेक्षितम पौरा: परिकामम्ति। [जार दे हि पुतबन्धुत्रहामरिसुद्दीविदकोवारणता यह पेखिदारीरा कीरा परिङ्गन्ति ।] ....। आशीर्वादरचोयुक्त एष रामपुरोहितः ॥ इति । अयं , ७६ जयद्रथ माता और दु.शला द्वितीयोऽय हाराज, जामाता सिम्पुराज को माता और दुबाला द्वार-भूमि पर उपस्थित हैं। राजा-(बुछ सोचकर, स्वगत) क्या ? ? हौं अभिमन्यु के वध से कुछ पाण्डु-पुत्रों ने कुछ अनर्य तो नहीं कर दिया ? प्रकट में) जामो, शीघ्र अन्दर से आओ। प्रतीहारी-सी महाराज माज्ञा । (यह कहकर वाहर जाती है)। (तसरचा पदराई हुई जयद्रय की माता और दुःशला प्रवेश करती हैं ) ( दोनों आँसू भरकर दुर्योधन के पैरो में पडती हैं ) माता-बचाइये, कुमार बचाइये। (दुःशला रोती है) राजा-(जल्दी से उठाकर) माता जी, धैर्य रखिये, धर्म रखिये। क्या नयं हा? अप्रतिम वीर जयद्रथ का पुद्ध-भूमि में कुशल तो है ? माता-पुत्र, कुशल कहाँ से? ? माता-(आशयापूर्वक) आज पुत्र के वध से उत्पन्न कोष से भड़के हुए ण्डीवधारी (अर्जुन) ने सूर्य के छिपने से पहले ही उसके यध को प्रतिज्ञा - राजा-पों, क्या हुआ राजा-(मुस्करा कर) तो माता जी और दुःशला के आंसुओं का कारण है । पुत्र के शोक से पागल हुए अर्जुन के प्रताप से यह अवस्था है । ओह ! यों में कितना भोलापन होता है ! माता जो, दुःख न कीजिये। प्रिय गला, आँसू म गिरामो। दुर्योधन की भुजा रूपी परिघ से रक्षा किये गये परयो नयद्य के लिये विपत्ति पंदा करने का सामयं अर्जुन में कहाँ है ? माता-पुत्र, पुत्र और यन्युओं के ६५ को न सहने से प्रज्ज्वलित क्रोधाग्नि ले वह (पाण्डय) और अपने शरीर को चिन्ता न करके धूम रहे हैं। विहितं कुर्याच्यान्तिकपौष्टिकम् । इत्यग्निपुराणम् । सिन्धुराजमाता । अत्र पुरानो जयद्रथः । [प्रतीहारभूमिरिम्] । [अमर्ष एषां संजातः इति पिता ः 1] अत्याहितमनः । अप्रतिरथस्य अविद्यमानः प्रतिरथः यस्य । पत्तस्य जातचित्तविभ्रमस्य । मुग्धत्वं विचारवक्लव्यम् । दुर्योधनस्य बाहू षो अर्गले इव ताभ्या रक्षितस्य ।

माता-गानिमामापौगानिमामा
नियाजम्प पिन कोयाम्पशन तम
राना--पपमगमानमातिपिशानामा बलायमुप
पारमितमहिम्नः पिगंगामापानारिपहारपरिणीतपिरागत
केशान घसनं च केशवसनं यस्याः सा हस्ताक्टविलोलकेदरावसना पाया
राजचनपुरतः गोः गौः इति ष्याइताः।] ध्याहतेति एिउपभम् । तेन याहा
तता विस्तृता ज्या पञ्चिका यत्र ताहश गपिडवं धनुर्यस्य सः। गाण्डीयन
गण्डिवम् इति शब्दभेदः । पृयानन्दनोऽर्जुनः। [नासोकिनु । अपि स्वासीर
+ तत्रापि यूनो यौवनशालिनः । न तु वार्धक्याद मलितोत्साह
ART--{गोप) : rianttire
हगारनिमोनमा गागनेनामा
पाभानी कम गमननपुग्नो गौमानि ।
सम्मिन्ना गादिगागे नागोमानदनो
गूनः
मरस्म प्रारपदो मे
पुहिर नि। मायर मान:, किरपायारा
मामापि बहोत से तनाय । मपि गुमानमित
धर्मात्मजं प्रति यमौ च कयैव नास्ति
मध्ये वृकोदरकिरीटमृतालिन ।
एकोऽपि विस्फुरितमण्डलचापचक्र
क: सिन्धुराजमभिपेरायितुं समर्थः ।।२।।
अमपिता बोघालिता।
हस्ताकृष्टेति । [भम आजमा दुःशासनेत हस्तेन मारमत एवं
तेत्यर्थः । राजवधूनां गौगोरित्यभिधानमतिहानिकरमिति समाचार
तस्मिन्ना
कृतिनः कृतहस्तस्य युद्धकलाप्रवीणस्येत्यर्थः । ] आस

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८२ पाली... मन्तिदं । खतु शङ्कायाः। [अउजउत्त जइवि एव्यं तहदि गुरुक्दिपरिणामरी पर कीदप्डज्याकिरणाङ्करगणितरिपुभिः कवटोन्मुक्तदेहै: कोत्र भोः । जंत्रं मे स्यमुपकल्पय तावदायावदहमपि तस्य प्रपहरा जयापपरिक्षक मिप्याप्रतिमासक्यसंपादितमशमपूतं मरणमुपदिशानि अहो देवा . । गणिता प्रविन्तिता रिपवः यः । कडूदेन संनाहेन TS शिष्टमम्पोम्यम्य यापन पत्र । तैः पापभूनः श्वतकममवनमं- मिधानभिः मापता: रेगुना परतापस्य भाप: पाम् । प्रधान वेणीसंहारे भानुमती-आर्यपुत्र, प्येवं तथापि गुरुकृतप्रतिमामरो ट्टाण पखु संकाए। माता--जाते, साधु कालोदितं त्वया मन्त्रितम् । [जादे साह राजा--आः, ममापि नाम दुर्योधनस्य शङ्कास्थानं पाण्डवाः । श्लिष्टान्योन्यातपत्रः सितकमलवनभ्रान्तिमुत्पादद्भिः । रेणुग्रस्तार्कभासां प्रचलसिलतादन्तुराणां वलाना- माक्रान्ता भ्रातृभिर्मे दिशि दिशि समरे कोटयः संपतन्ति ।। अपि च भानुमति विज्ञातपाण्डवप्रभावे, कि त्वमप्येवमासे । पाय- दुःशासनस्य हृदयक्षतजाम्बुपाने दुर्योधनस्य च यथा गदयोरुभने। तेजस्विनां समरसूर्धनि पाण्डवानां जेया जयद्रथवधेऽपि तथा प्रतिज्ञा ॥२७॥ कोरपति कोरपो धनुः । [सस्य ज्यायाः किलो घपएजन्य विह नाभिशे हो यो से: ] स्या चारमगौरवारमनाहमाणिरिक कामुगरिति पारे कोटा भामुक्ता; गिना यदु तथा देहा या भाननाम्माभिः] नुराना निम्नोपनाना बमानांबोटयः संख्याभेद, पति मनिरपे प्रा संख्यामाप्रदेशयोः इति द्वितीयोऽङ्कः ८ - भानुमती-आर्यपुत्र, यद्यपि यह ठीक है। फिर भी की गई प्रतिज्ञा 'री भार वाला अर्जुन शङ्का का कारण हो सकता है । माता-पुत्री, दूने ठीक समयोचित बात कही है। राजा-ओह ! क्या मुझे दुर्योधन के लिये भी पाण्डय भय का कारण ह हते हैं ? देखो- धनुष को मेरी के घाव के चिह्न बाले, शत्रुओं को चिन्ता न करने वाले सलिये) शरीर पर से कवच खोल देने वाले और परस्पर सटे हुए छत्रों से त कमलों के बन की भ्रान्ति उत्पन्न करने वाले मेरे भाइयो से अधिहित, ओं को कोटि-कोटि संख्यायें, जिन्होने यूलि से सूर्य को कान्ति अस तो है र जो घुमाई गई तलबार रूपी लताओ से विकराल हैं, दिशा दिशा मे युर- म में मिलकर जा रही हैं ॥२६॥ और, पाण्डवों के प्रभाव को जानने वाली भानुमती, तू भी ऐसी आशङ्का कर रही है ? देख- दु.शासन के हृदय से रुधिर रूपी जल के पीने और गदा से दुर्योधन को को तोड़ डालने के विषय में तेजस्वी पाण्डवों को जैसी प्रतिमा यी, तो पुर-भूमि में जयद्रय के वध के विषय में भी समझनी चाहिये ॥२७॥ अरे, यहाँ कोई है ? मेरे जय-शील रथ को संपार करो। तो अब मैं भी लि जयद्रय को रक्षामात्र से उस पृष्ट पाण्डव को झूठी प्रतिज्ञा से उत्पन्न पा से किये गये और शव से पवित्र न किये गए मरण का उपदेश देता हूँ। श्वदः कछुटको जगरः कवचोऽस्त्रियाम् । इत्यमरः ।। २६॥ दुःशासनेति । यथा दुःशासनस्य हृदयरक्तमेवाम्बु जलं तस्य पाने । ८८ च पिनस्य अरुभने ऊर्वो: भङ्गविषये । तया समरमूर्धनि रणशिरसि जयद्रय- ऽपि तेजस्विना पराक्रमिणा पाण्डावानां प्रतिज्ञा झेया । रक्तक्षतजसोरिगतम् मिरः ॥ २७॥ [डंत्रमिति जेतृशन्दात् प्रज्ञादित्वादण् । तय । प्रगल्भस्प धृष्टस्य पाण्डवस्यार्जुनस्य । मिम्याप्रतिज्ञा तया यद् थैलक्ष्य ॥ तेन संगदितं विहितम् । शास्त्रेण दास्त्रव्यापारेण पूतं शस्त्रपूनम् । युद्ध । उरकल्पच मज्ज शस्त्रप्रहारेण मृतस्य वीरस्य स्वर्गप्रासिहेतुत्वात्तन्मरणास्य पूतत्वम् । हेमघण्टा यस्य ।] या स्थादभ्यादानमुदात आरम्भः इत्यमरः। तेनो 'इति पाठे नियमित वस्गु चार वस्गित पेषा तपा- का उत्पामिविलोलगपष्ट. प्रालयद्विगुणितनामरमहागः । गमोऽयं नियमितपल्गितालायः ग्गा हापितमनोरयो रयस्ते ॥२८॥ रामा--रेवि, प्रषिरा थमायस्तरमेव । ( यात प्रामा इत्यादि पठन परिकामति)। (इति निशाना म) * इति द्वितीयोऽवः * भवतीति अशस्त्रपूतम् ।] जं जयशालिनम् । अशस्त्रपूतमरास्त्रकृतम् ।। उद्घातेति । उद्घात आपात: तेन करिणताः शब्दिता दिलोनाः प्र उपक्रम इत्यर्थः । प्रासम्बो लम्बितो हारः। तिन द्विगुणितः चामरस्य - धनिमा यत्र । प्रालम्बं द्विगुणितं द्विपार्षे द्विधावद्ध यच्चामरं सस्य प्रह यत्र इति केचित् । ] महास: प्रकाशः । [नियमिता अतएव वल्गितेनाकुसा नियमितं वल्लितं येषा. तयाभूना अतएव आकुला अश्वा यस्येति । ka Sa- द्वितीयोऽङ्कः ८५ (प्रवेश परके) ञ्चुिको-महाराज, प्रतिघात से बजती हुई चञ्चल मुवर्ण को घण्टियों वाला, लटकती मालाओं ने किये गये चामर के हास (पवलता) वाला, गति के नियन्त्रित होने से । घोड़ों वाला और शत्रुओं के मनोरथों को नष्ट कर देने वाला आपका प तैयार है ॥२॥ राजा-देवी, सुम भी अन्दर जाओ। ('तो अब मैं उस पृष्ट पाण्डव ..." दे कहता हुआ घूमता है). ( सब निकल जाते हैं) * द्वितीय अङ्क समाप्त * या यस्य 1] नियमितो देहितेत गतिविशेषेणाकुलितोरवो यत्र स तथा । रावा क्षपिता नाशिता मनोरथा येन स तथोक्तः । अत्र शत्रूणामिति पाठपा नीरयेत सम्बन्धः । सापेक्षत्वात्समासः । तदुक्तम् -- सम्बन्धिशब्दः सापेक्षो तत्यं सर्वः समस्यते । वाक्यवत्सा व्यपेक्षापि वृत्तावपि न हीयते ॥ इति । ॥२८॥ यत्राई, नायिकाचेट्योर्मापा शौरसेनी । तदुक्तं तत्रंव-नायिकायां च व्यां च तथा व विपके । शौरसेनी समाश्रित्य भाषा योज्या तु नाटके । -- इति । एवमन्यत्रापि ।। असूत यं रत्नधरो गुणीशी नानागुणान्या दमयन्तिकापि । जगरं तस्य कृतौ गतोऽयमङ्को द्वितीयो वरटिप्पनेऽत्र ।। • द्वितीयोडा - . प्रतिपद्यतेऽर्जुनातरा पर्याप्तभूतोहागार मारायोगितौ गृहं प्रविमति लुहिलप्पिए हुवीअदि । ता जाव इमश्श दामले पिजभत्ताले मुहिलगि शामि । हो। पदाइशं दाव । अले सुहिलप्पिसा सुहिलप्पिया इदो सा एदो मह पलिश्शमे वखएमेत्तं एन्च लह पश] तृतीयोऽ (m.aira मरामी) रामगी-( विहिस्य सारितोगम) हतमानुपमांगभार कुम्भमहयवसाभिः संचित । अनिशं च पियामि शोणितं वर्षगतं रामरो भवन। (नुत्यन्ती सारितोगम) परि सिग्युराजपरिवमय दिशोऽवलोप) अय क मुथतु दपिरप्रियो भविष्यति । प्रियभरि कपिरप्रियमग्वेपयामि । (परिक्रम्य) भवतु । अरे रुधिरप्रिय, रुधिरप्रिय, इस एहि त एहि । [हदमाणुरामंशभालए कुम्भग्रहावशाहिं शंचिए । अणिशं अपिवामि पोगिलिशशदं धमले हुवीज ॥ जइ शिन्दुलाअवहदिअहे वित्र दिअहे-दिनहे शमलाम्म पडिया तदो पजत्तलिदकोठागाले मशयोणिएहि मे गेहे हुवीप्रदि । बह एहि । (ततः प्रविशति तयाविघो राक्षसः) राक्षस:-(श्रमं नाटयन्) प्रत्यग्रहतानां मांसं यद्युष्णं रुधिरं च लभ्येत । तदेप मम परिश्रमः क्षणमात्रमेव लघु नश्येत् ।।२।। [पचग्गहदारणं मंशए जह उन्हे लुहिले असम्भइ । शमारि - ( राक्षसी पुनहिरति ) [विकृतः वीभरस: वेपो यस्याः । विकृतं विकटम्] 1. yambe n AL T: तृतीय श्रङ्क BOD- . ( तत्पश्चाद बीभत्स वेप वाली राक्षमी प्रवेश करती है ) पक्षसो-(भयङ्कर हंसी हैसकर सन्तोप के साथ) मरे हुए मनुष्यों को मास-राशि के हजारों घड़े चर्बी सहित सश्चित कर र में दिन-रात पिर पो रही हूँ। यह युद्ध सौ वर्ष तक चलता रहे ॥१॥ (नाचती हुई सन्तोष के साथ) यदि सिन्धु देश के राजा (जयद्रय) के वध न के समान प्रतिदिन अर्जुन युद्ध-पराक्रम करता रहे, तो मेरा घर मांस रुपिर से पूरे भरे हुए.कोठे वाला हो जायेगा। (घूमकर और चारों ओर र) न जाने पिरप्रिय कहाँ है ? तो इस पुर-क्षेत्र में अपने प्रिय पति प्रिय का पता लगाऊँ। (घूमकर) अच्छा, पुकारती हूँ। ओ, पिरप्रिय, प्रिय, इघर मा, इधर आ। ( तद उपी प्रकार का राक्षस प्रवेश करता है) राक्षस-(थकान का नाट्य करता हुआ) पदि ताजे मरे हुए लोगों का मांस और गर्म रुधिर मिल जाये तो मेरी कान क्षण-भर में हो तुरन्त मिट जाय ॥२॥ ( राक्षसी फिर पुकारती है ) [हतेति । हताना मानुषाणो मासस्य भार एव भारकः तस्मिन् । कुम्भाना तेन परिच्छिन्नाभिः वसाभिः सह संचिते सति अनिशमहोरात्रं शोणितं पिचामि । समरो युदं वर्षशतं शतवर्षपर्यन्तं भवतु ॥१॥ अमरकर्मातिप्रतंयत्यर्जुनस्तदा पर्यन्तं मृतकोठागारं मम मांसशोणिताह पति । भवतु । वादयिष्ये । अरे रुधिरप्रिय रुधिरप्रिय एहि तावत् । [पदि प्रत्यय सद्यः हतानां मांसम् उष्णं कोणं दधिरं प सम्येत, सतदा म परिथमः खेदः क्षणमात्रमेव लघु द्राक् नरपेत क्षयमियात् ॥२॥] पारं कोठाखण्डम् । अरे को मां वादयते । कथं प्रिया में वसागन्या । । ।

गावईनामुपममा वमागन्धे किनिमित्त ---
एदिशे हदणलगअतुलङ्गममोरिणअवधाशमुद्ददुश्शंचले समलेङ्गणे पडिा-
राणसी-इपिरप्रिय, अद्यापि स्वामिग्या हिरिम्बादेय्या घटोत्-
' 'नोपशाम्यति। विहिलप्पिया अमदि शामिणीए हिडिम्बादेवीए पर
वेगाना
राम:-(माय) मामी गमागे। लोर)
भगाया। (प) गागा, मामा सामे। ।
पदावेहि मिा मे वागाये की मंगोगि
रुधिरासयपानमनिके रणहिण्डनस्सलद्वात्रिके।
शब्दायरो कम्मान्मां प्रिये पुरुषसहयौं हतं श्रूयते ।
मुहिलामयागमसिए सदिसमलनलिए।
सहाशि की मए पुसिराहा हर गुणोदि।
राक्षणी-मरे सपिरप्रिय, वसु मया तब कारणामस्याहर
राजः प्रभूतवसास्नेहचिपूर्ण कोष्णं नहरुपिरमप्रमसिं चानौतम् ।
[अले मुहिलप्पिा एवं बयु मए सुह कालणादो पचागरम
शिणो पहूदवसाशिणेइचिकण कोण्हं मावहिलं अगमयं आद
पिवाहि एम् ।
राक्षसः-(सपरितोपम्) साधु, वसागन्ये, साधु । शोभन र
बलवदस्मि पिपासितः । तदुपनय । शाहु वशागन्धे शाह । शोहणं तु
बलिअझि पिवाभिए । सा उवणेहि ।।
राक्षसी-अरे रुधिरप्रिय, ईदृशे हतनरगजतुरङ्गमशोणितवसात
समराङ्गणे परिभ्रमंस्त्वं पिपासितोऽसीत्याश्चयंमारचर्यम् । [अने हु
- पिवाशिएशि ति अञ्चलिअं अञ्चलिअम्।
रामस:-अयि मुस्थिते, मनु पुत्रशोकसंतमहृदयां स्वामिनी ही
प्रेक्षितुं गतोऽस्मि । [अइ पुस्थिदे.ण पुत्तशोप्रान्तत्तहिम शामिणी
देवीं पेरिखदु गदाह्मि।
+
-
-
उपशमा ।

तृतीयोऽङ्कः राक्षस - (सुनकर) अरे! यह कौन मुझे पुकार रही है ? (देखकर) 'मेरो प्यारी वसागन्धा ! (समीर जाकर) वसागन्धा, मुझे क्यों पुकार । धिर रूपी आसव के पीने से मत हुई, युद्ध-क्षेत्र में भ्रमण से शिथिल- वाली, हे प्यारो, तू मुझे क्यों पुकार रही है ? हजारों पुरुष मरे हुए सुने ॥३॥ क्षिसी-अरे रुधिरप्रिय, मैं यह तेरे लिये ताजे मरे हुए किसी राजषि यधिक चर्चा को दियानाई से चिकना, कुछ गर्म ताजा रविर और हृदय मति (कलेजो) लाई हूँ। इसे पी ले। 'राक्षस-(सन्तोष के साथ) शाबास ! धसागन्या, शाबास ! सूने बड़ा डा किया । मैं बहुत ही प्यासा हूँ। तो मेरे पास साओ । राक्षसो-अरे रुपिरप्रिय, बड़ा आश्चर्य है कि तुम ऐसी पुट-भूमि में, जो गये पुरुषों, हाथियों और घोड़ों के रुथिर और घों के समुद्र से दुर्गम है, ते हुए भी प्यासे हो! रासस - अरो, निश्चिन्त बैठी हुई, मैं पुत्र-शोक से व्यास हृदय वाली मिनी हिडिम्या देवी को देखने गया था। रामसी-रुधिरप्रिय, तो अभी स्वामिनी हिडिम्या देवी का घटोत्कच की से उत्पन्न शोक पान्त नहीं हुआ अधिरासवधानमत्ते रणभ्रमणस्खलगात्रि । पादयमे किमिति सुन्दरि मा शतं हतमिति धूपते ॥३॥ प्रभूतवसायोरिणत मस्तिष्कचिकणमप्रमांसं चानीतम् । तत्वादय । पित्र तासयम् । अत्र प्रस्व नवम् । प्रभूतमुपचितम् । मस्तिष्कं गोदीवि दम् । अर्ग प्रयमभागमुत्तमं वा । [बलवत् अत्यन्तं] पिपासितः [पिपासा संगाता स तथा । अत्र सुष्टु मनोहरम् । बलितोऽतियितः । ननु पुर- असता देवीमन्चेष्टु' गतोऽस्मि । हे सुस्थिते । ननु भणामि । अरे पिरप्रिय मद्यायपाः सामिना हिडिम्बादेव्याः पुत्रस्य घटोस चस्प योगी हृदया. ? शाम्पनि।

terrof. Trritt rint * at karne #r rooto wTerman rrrrritters krt.itAttr rasi girreg m-krrfre. Taffaigarikrama [pefrur.Trti-tan #mar (Hrm. aftermirmani rgirneafette ifentiramin TRAITITTEm' wnlfa जमि) A-ATRI IT. Aft ma giri murgat: गुfer : (HRITTET: THEAT) Tri-गमम) मेरे nिfe, मुसार मान भूपते । (मसे पुहिमालमातुमने कम रासः-(१) बमागणे, एTeritam म्यापाद्यते । बिगामधे, एम पिया दोणे केमेगु मात्र वसेण वावादीदि । रासी-(सहर्षम) रपिरतिप, एहि ! गरम पिर विदा मुहिलपिमा, एहि । गमिधा दोगा मुहिक वि राक्षस:-(समयम्) वागणं, बाहानमोनित पावेतपतं हार- दाति । तस्किमेतेन । [पशागन्धे, बह्मणोणि मनुए। गमनं दहने ६ पविशदि । ता कि एदिया।] - ( नेपथ्ये पुनः कलामः) पुनरप्येष महान्कलकमः भूपते । [हिलप्पिा पुगोवि एशे महन्त कलले शुशीयदि । -(नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) वसापये, एप पवश्वयामा आti ..- तृतीयोऽ ६३ राक्षसो-दविरप्रिय, कुमार भीमसेन के पीछे-पीछे किस कारण घूमते हो' पक्षस-सामन्या, स्वामी वृकोदर (भीमसेन) ने दुशासन का रबिर प्रतिता कर रखी है। वह (कुमार भीमसेन के शरीर मे) प्रविष्ट हम राक्षसों को ही पीना होगा। रासी-(हर्ष के साथ) पाय हो, स्वामिनी, धन्य हो। आपने मेरे पति ये अच्छी व्यवस्था कर दी है। ( नेपथ्य मे तीन कलकल ध्वनि होती है । दोनो मुनने है ) सिसी-(सुनकर घबराहट के माध) अरे रुधिरप्रिय, यह कैसा तीन न राज सुनाई दे रहा है ? सिस-(देखकर) वसागन्धा, यह दोण एष्टान्न द्वारा केश खींच कर से मारा जा रहा है। सिसी-(हपं मे) पिरप्रिय, आओ । चलकर द्रोण का रुधिर पीयेंगे। क्षस-(भय से) वसागन्धा, यह ब्राह्मण का रुधिर है । गले को जलाता ग्दर जाता है । इसलिये इससे क्या (लाभ)? ( नेपथ्य में फिर क्लक्ल ध्वनि होती है ) ससी-पिरप्रिय, यह पुन तोत्र क्लक्ल शब्द सुनाई दे रहा है । क्षस-(नेपथ्य की ओर देखकर) बसागन्धा, यह अश्वत्थामा तलवार तनकेन । एतत्कालीनेनेत्यर्थः। अरे रुधिरप्रिय कीदृश स्वामिन्या हिडिम्बा- जा सविभागः कृतः । पुत्र रुधिरप्रिय अद्यप्रभृति त्वया नाथभीमसेनस्य उत्समर बाहिण्डितव्यमिति । ततस्तस्य मार्गानुगामिनो हतमानुषशोरिणतनदी- नेन प्रणष्टा मे वुमुक्षा पिपासा च । त्वमपि विश्वस्ता भूत्वा रुधिर कसा च संचेष्यसीतीहैव सुरलोको भविष्यतीति अत्र । बुभुक्षा मोक्तुमिच्छा । बस्ता विश्वासकती। सुमंविभागो मम भर्ता कृत । अरे रुधिरप्रिय रुधिर- उत्तिष्ठोत्तिष्ठ। कुतः खल्वेष महान्चलकल धूयते । तदल ममतेन । अरे प्रिय रुधिरप्रिय उत्तिष्ठोत्तिष्ठ । पुनरप्येप महान्कलक्लः श्रूयते । वसागन्धे बल्वश्वत्थामाकृष्टसिपत्र इतः समरभूमिमवतरति । कदाचिद् द्रुपदसुतरोपेणा- राक्षसान्प्रेक्ष्य व्यापादयिष्यति । तदेहि । पलायावहे । अत्रासिपत्रः खड्ग. ।

[सुहिलप्पिा, एहि । गच्छिा दोरगरा सुहिल कि भाति । तस्किमेतेन । [वशागन्धे, वह्मणशोरिए पतु एवं। गल दहन राक्षसी-रुधिरप्रिय, किनिमित्तं कुमारप्रीमसेनस्म पृष्ठतोनुमाहि [सुहिलप्पिा, किणिमित्त मुमालमोमशेण पिट्ठोगुपिटु अहिन्दी राक्षसः-वसागन्ये, तेन हि स्वामिना यूकोदरेण दुसाधि प्रतिमातम् । सञ्चास्माभी राक्षसरतुप्रविश्य पातव्यमिति। वाम शामिणा विओदलेण दुरशासगरा लुहिलं पादु पडिग्णादम्। तं राक्षसी-(सहपम्) साधु, स्वामिनि, साघु। सुसंविधानो में - राक्षसी-(आकृयं ससंभ्रमम्) अरे रधिरप्रिय, किदुखत्वेष महालन भूयते । [अले लुहिलप्पिया, कि णु खु एशे महन्ते क्लबले शुरंगीअदि।) राक्षस:-(हवा) वसागन्धे, एष खलु सृष्टद्युम्नेन द्रोणः केशेग्वाम्मानित राससी-(सहपंम्) रुधिरप्रिय, एहि । गत्वा द्रोणस्य दधिर पिडा घेणीमहारे हिडिम्बादेयोए पायहुमाएवं शहायिन आणले ह मुहिमणिया : अजउत्तरा भीमदोरणमा पिट्ठदशेणुपिट्ठ गमो आहिन्डिसावं नि। अनुमग्गगामिणो हप्रमाणुशोणि असईदंगणापाणबुभुपापिदागम्य - मे गग्गलोओ हुवीअदि । तुम वि वीसना भविष मुहिलदमा हिं . दांचेहि । लक्शेहि अणुप्पविशिश पादन्वंति ।) कृतः । [शाहु शामिणीए शाहु । शुशंदिहाणे मे भत्ता तुए विदे।। ( नेपध्ये महान्कलकल: उमावास्यतः) विशागन्धे, एशे वषु पिट्टन्जुणेण दोणे केशेषु आदि ध्यापाद्यते। वतेण वावादीअदि । . राक्षस:-(सभयम्) पसागन्य, ब्राह्मणशोणितं खल्वेतद् । गए। . पविशति।सा कि एदिणा] (नेपथ्ये पुनः कलकलः) राक्षसी-पिरप्रिय, पुनरप्येव महात्वसकलः धूपते । [हिलप्पिा पुगोवि एको महन्त कलपले गुणोदि । --निरप्याभिमुनमवलोप) वसागग्ये, एप पवश्वस्यामा तृतीयोऽङ्कः । राक्षसो-पिरप्रिय, कुमार भीमसेन के पीछे-पीछे किस कारण घूमते हो? । राक्षस-वसागन्या, स्वामी पृकोदर (भीमसेन) ने दुःशासन का यिर ने की प्रतिज्ञा कर रखी है। वह (कुमार भीमसेन के शरीर में) प्रविष्ट कर हम राक्षसों को ही पोना होगा। राक्षसी-(हपं के साथ) धन्य हो, स्वामिनी, धन्य हो। आपने मेरे पति सिये अच्छी व्यवस्था कर दी है। ( नेपथ्य में तीव्र कलकल ध्वनि होती है । दोनो सुनते हैं ) राक्षसी-(सुनकर घबराहट के साथ) अरे रधिरप्रिय, यह कंसा तीव्र किस राम सुनाई दे रहा है ? राक्षस-(देखकर) वसागन्या, यह द्रोण एटन द्वारा पेश खींच कर पार से मारा जा रहा है। राक्षसो-(हपं से) एपिरप्रिय, आओ। घलकर द्रोण का पिर पीपंगे । राक्षस-(भय से) वसागन्धा, यह ब्राह्मण का रुधिर है। गले को जलाता 'अन्दर जाता है। इसलिये इससे श्या (साभ)? ( नेपथ्य में फिर कलकल ध्वनि होती है) राक्षसो-पिरप्रिय, यह पुन: तीन कलक्स सम्म सुनाई दे रहा है। राधास-(नेपथ्य की ओर देखकर) वसागधा, यह अवस्थामा तलवार नोन । एतरकालीनेनेत्यपः। अरे रधिरप्रिय की स्वामिन्या हिडिम्बा- व्या सविभाग: गवः । पुत्र रपिरप्रिय अपमृति स्वया नायभीममेनस्य नारसमर आहितिव्यमिति । ततस्तस्य मार्गानुगामिनो हसमानुपयोगितनदी. भनेन प्रणष्टा मे बुभुक्षा पिपासा प । समपि विश्वस्ता भूला धिरं यसो सच सचेप्यसोतीहैव सुरलोरो भविष्यतीति अत्र । बुभुक्षा मोक्तुमिच्छा। नभाता विश्वासक्ती । मुमविभागो मम भर्ता कृतः । मरे पधिरविय रधिर. दर उत्तिहोत्तिष्ठ । दुतः मस्वेष महावीरसः धूयते । सरल ममंजेन । अरे धिरप्रिय धिरप्रिय उतिष्ठोतिह। पुनरप्येप महान्द लामः श्रूयो। बसगन्धे मायामारशमिपत्र समरभूमिमदतरतिपदाचित पदमुखरोगा- समावर पापिम्पति। तदेहि । पलापाबहे । अत्रासिएका सहमः । . ।

لازالة إدانة أنملل
الرتم ازطعن ردزند بيه لوحدي. د پمیشان را تمدی
مناهل - المهيمن عزام هني: ما لها
و فیلم 8 ليرة ، او ره مه د هه + مره معيار
غ ته ندرت دید عموم به همه و همه با هم دوسش
ها مناخ تر بوده و به همه ده من بود و در رد
مش ليهم دمر + * م له گه شتويه جمهور =
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بانيتا
زه
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زلط

कर - तृतीयोऽङ्कः अनुरूप है, शत्रुओं के भक्षक पिता ने निश्चित रूप से (आम) वही कर्म प्रारम्भ कर दिया है ।। (पीछे की ओर देखकर) यहाँ कौन है ? रथ लाओ। अथवा अब मुझे यह रथ को प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिये । जल से भरे मेघ की कान्ति के समान चमकने वाले और अच्छी प्रकार पकड़ने योग्य तथा निर्मल सुवर्ण निर्मित मूठ वाले इस खड्ग से शप-सञ्चित हूँ हो । तब युद्ध क्षेत्र में उतरता हूँ। (घूमकर और बायें नेत्र को पड़ान को सूचित करके) ओह ! मुझ अश्वत्थामा के लिये भी, जिसे पुरको महोत्सव का अत्यधिक हर्ष है और जिसे पिता के पराक्रम से देखने को तो अभिलाया है, ये अपशकुन युद्ध में जाने में विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं । अच्छा, जाता हूँ। (अकड के साथ घूमकर और देखकर) साश्रयम को पेका करने वाली, सजनोचित लजा के आवरण को त्याग देने वाली, स्वामी द्वारा किये गए सत्कार को भुला देने के कारण धुर चित्त बाली, कुल एवं याति के अनुरूप पराक्रम-व्रत की चिन्ता न करने पाली, युद्ध-क्षेत्र से चारो ओर भाग खड़ो होने वाली और हायो, घोड़ों तथा पदातियों को सेनाओं का यह महान कोलाहल क्यों है ? (देवकर) ओह ! धिक्कार है ! ये कर्ण आदि महारपी भी युर से क्यों भाग रहे हैं ? पिता से संचालित होने पर भी सेनाओं को यह दशा कैसे हो सकती है ? अच्छा, मैं (इन्हें) रोकता हूँ। हे कौरव-सेना -पो समुद्र के तट को रक्षा के कार्य में विशाल पर्वतों के समान, राजा लोगों, र से पलायन के इस दुष्कृत्य से बस करो। देवः तुरंगमेश्वरणश्च चरन्तीति तच्छीलानान् । चारोति ताच्छीलिको गिनिः । -अगणितं कुलस्य यशः तस्य सदृशं पराक्रम एव व्रतं यः तेषाम् । अपवामा लायमानानाम् । अरक्रमोऽपयान स्यात् इत्यमरः । हा हा शोकेऽपि निन्दायाम् नि । कौरवसेना एव समुद्रस्मस्य घेला मर्यादास्थिस्तस्याः परिपालने महामहो- 1बेला तत्तीरनीरयोः इत्यमरः । महीपरो गिरिः । कृतं निष्फलम् । वृतं लौ तु निष्कले इनि विश्वः । [कृतमलं मा कुरुतेत्यर्थः।] ।

शिष्यः। तद्विपये दयालुदयापुक्तः । [उनिमतस्यक्तान
पोरगुप्पोषिता विपनि
कि भीमाद्गुरुदक्षिणां गुरुगदाद्भीमप्रियः प्रासवान
[जमदानेरपत्यं पुमान् जामदान्यः परशुरामस्तस्यास्त्राण्येव सर्वस्वं वर
भीमादिति । शिष्यादीमात् । गुरुगदामेव गुरुदक्षिणाम् [गुरुगदादिदि
भीषणा महती वा गदा यस्य तस्मात् ।] मोमः प्रियो मित्रं यस्य
मायापा-frim)
warrrrianter
पोAmeriminar raffirman
:-(TAIT TAIT) Tafter:
मावरयामा-(पागम्) frmation
गूग:-मग ति।
मायामा- I (तिमोगुरागा)।
अतः-पुमार, मारविधि समारतमिहि।
भरथरयामा-(सागत. मागम) arm, हा गुया, हा
पर, हा नामग्यारसयहि प्रति
पूरा-कुमार, मासमरसतोगायेगेन।
पितरि स्वमपि तमनुप्पेगंव पौर्यग शोकमागरमुशोर्य गुती भव ।
भरवायामा--(मभूणि विमुप्प) माप, रुपय पर तान
सागरस्तातोऽपि नामास्तमुनगतः ।
सूत:-सान्तं पापम् । शान्तं पापम् ।
अश्वत्थामा-
अन्तेवासिदयालुरुज्झितनयेनासादितो जिप्गुना ।
सूतः--फयमेवं भविष्यति ।
अश्वत्थामा-
गोविन्देन सुदर्शनस्य नियतं धारापथं प्रापितः
प्रतिग्रहे स्त्रीकारे प्रणयो विद्यते अस्य तत्संबुद्धिः । विपत्ति मरणम् ।
रूपेण सहशेन । प्रतिग्रहो ग्रहणम् ।
।

. तृतीयोऽद्धः अश्वत्थामा-(देखकर) अरे ! कैसे ? पिता का सारथि अश्वसेन ? आर्य, लोकों की रक्षा करने में समर्थ (मेरे पिता) के सारथि हो। क्या मुझसे ।चाहते हो? मृत-(उठकर करुणापूर्वक) अब तुम्हारे पिता कहाँ ? अश्वत्यामा-(आवेग के साथ) क्या पिता ही नहीं रहे ? सूत-और क्या? अश्वत्यामा-हाय ! तात ! (यह कहकर मूछित हो जाता है) । सूत-कुमार, धैर्य रखिये, यं रखिये। अश्वत्थामा- (चेतना प्राप्त करके आसू भरकर) हाय तात ! हाय पुत्र- -ल ! हाय तीनों लोकों में अद्वितीय धनुर्घर ! हाय परशुराम के अस्त्र-रूपी के लेने में प्रेम रखने वाले ! तुम कहाँ हो ? मुझे प्रत्युत्तर दौजिये । सूत-कुमार, अत्यन्त शोक के आवेग से बस करो। पिता के वीर पुरुष मृत्यु पाने पर सुम भी उनके अनुरूप ही पराक्रम से शोक-सागर को अश्वत्यामा-(आँसू बहाकर) आर्य, बतलाओ, बतलाओ-वैसे (अधिक) चत का सागर, पिता भी कैसे मृत्यु को प्राप्त हो गया ? क्या भीम से प्रेम करने वाले (पिता) ने भारी गदा वाले भीम से गुरु- जा पा ली है? सून-पाप शान्त हो, पाप शान्त हो। (at) उचित आचार का परित्याग करके जिष्णु (अर्जुन) मे शिष्य पर (पिता) को अभिभूत कर दिया है ? सूत-ऐसा कैसे होगा? (तो) निश्चय हो गोविन्द (कृष्ण) ने सुदर्शन को धारा के पथ को प्राप्त कर सुखी होओ। अश्वस्यामा- मावत्यामा- 1 दिया? मार्गों गुरी भक्तिरेवोचिता न तु नृशंसत्वमित्येतद्रूपः येन ।] जिप्ना १०२ वेणीसंहारे सूत:--एतदपि नास्ति । शङ्क नापदमन्यतः खलु गुरोरेभ्यश्चतुर्थादहन । सूतः- कुमार, एतेऽपि तस्य कुपितस्य महास्त्रपारगः किं धूर्जटेरिव तुलामुपयान्ति संख्ये। . शोकोपरुद्धहृदयेन यदा तु शस्त्रं त्यक्त तदास्य विहितं रिपुरणाऽतिघोरम ॥१०॥ अश्वत्यामा--कि पुनः कारणं शोकस्यास्परित्यागस्य वा। सूतः-- ननु कुमार एवं कारणम् । अश्यत्यामा--कयमहमेव नाम । मूनः-धूयताम् । (अधूणि विमुच्य)। अश्वत्यामा हत इति पृथासूनुना स्पष्टमुक्त्वा स्वरं शेषे गज इति किल व्याहृतं सत्यवाचा। तच्छुत्वाऽसौ दयिततनयः प्रत्ययात्तस्य राज्ञः सारखाण्याजी नयनसलिलं चापि तुल्यं मुमोच ॥११॥ भादयामा- हा तान, हा मुबरसल, हा यामार्थपरित्याहजीवित, " छोरो, शिष्यप्रिय, हा युधिधिरपक्षपातिन् । (इति रोदिति) पून:-जुगार, असमस्यरतपरिदेवनकापंम्पेन । अनेन : मामादित: मारिल इत्यर्थः । नियतं निधितम् । गुगनी हरिया मुगन: स्पपरः । मायनोज्यस्मात् । खलु निभये एनीति। एते भीमामाभणाः । संख्ये संग्रामे पूर्णदेईरस्य च पिता र नुमामुग्णाति हिम्। मोय: हरपेने त्याचार्यविशेषएं। [मा' मोरार म्यासमिति यादव यापन भाषायेंग शात्र यस्ता पुना माल मनिपोरं हितमा । मायापाल। मतिमोर पिताम: । प्राय ran भार । नयोगितः । अमु दोषणे। गहिणायाम् । पर.mm

घः। यदाह-उक्तं युक्ततु यहाक्यमभूताहरणं तु तत् । इति । अश्वत्थामा
यन्त हृदय वाले (आपके पिता) ने शस्त्र त्याग दिया, तब राव ने इसके
अरबत्यामेति । पृथासूनुना युधिष्ठिरेण | स्वरमल्प [अस्पष्टमित्यर्थः]। शेष
तृतीयोऽ
1०३
।
-
सून-पह भी नहीं है।
अश्वत्थामा-
इनसे अतिरिक्त किसी चौय से में पिता को विपत्ति की आशङ्का नहीं
रता॥६॥
सूत्र-कुमार,
क्या ये सब लोग भी, शिव के समान हाय में महान अस्त्र धारण करने
ले, फुपित हुए उसका पुट में सामना कर सकते हैं ? लेकिन जय शोक से
नि अतिदारण कर्म किया ॥१०॥
अश्वत्यामा-लेकिन शोक अथवा शास्त्र-त्याग का क्या कारण था?
सूत-बस, jमार ही कारण थे।
अश्वत्यामा-मैं ही कसे?
मूत-सुनिये। (आंसू बहाकर)
सत्यवादी पृया के पुत्र (युधिष्ठिर) ने 'अश्वत्थामा मारा गया' यह स्पष्ट
कर (वाश्य के) शेष (भाग) में 'गज' यह पद धीरे से कहा। उसे सुनकर
न राजा (युधिष्ठिर) के विश्वास से पुत्र को प्रेम करने वाले इसने युद्ध भूमि
रास्त्र गिरा दिये और साथ ही आंसू भी गिराये ॥१॥
अश्वत्थामा--हाय तात ! हाय पुत्रवत्सल, हाय ! प्यर्थ हो मेरे कारण
- त्यागने वाले, हाय पोय-राशि! हाय युधिष्ठिर का पक्षपात करने वाले !
प्रकार विलाप करके रोता है)।
सूत-कुमार, अत्यधिक विलाप और कातरता से बस करो।
।
स्येति शेषः । किल निश्चये । ध्याहृतमुक्तम् । असावाचायः । दयितः प्रियः-
= पुत्रो यस्य स तया । प्रत्ययात्प्रतीतः। आजो संग्रामे । शस्त्राणि मुमोच
तुल्यं धनु समकालं नयनसलिलं च मुमोचेत्यन्वयः । इहाभूताहरणरूपः
3॥११॥

M अश्वत्थामा- 1 ज्ञातलोकस्थितौ तस्मिन्न खलु शोकावेगमहमाशङ्क। कितु पितुः परिमा युधिष्रेि पक्षपातो विद्यते अस्य । कार्पथ्येन वैकलव्येन । प्रायतनाचा ततः प्रविशनिपइति । अत्र सूचनामतिरेकेणंच प्रदेश इनिशे १०४ वेणीमहारे श्रुत्वा वधं मम मृपा मुतवत्सलेन तात त्वया सह शरैरसवो विमुक्ताः । जीवाम्यहं पुनरयं भवता वियुक्तः क्रूरेऽपि तन्मयि मुधा तव पक्षपातः ॥१२॥ (इति मोहमुपगतः) सूतः-समारवसितु समाश्वसितु कुमारः। (ततः प्रविशति कृपः) कृपः-(सोद्वेगं निःश्वस्य) धिक् सानुजं कुरुपति धिगजातशत्रु धिग् भूपतीविफलशस्त्रभृतो धिगस्मान । केशनहः खलु तदा द्रुपदात्मजाया द्रोणस्य चाद्य लिखितैरिव वीक्षितो यः ॥१३॥ तत्कयं नु खलु वत्स द्रष्याम्यश्वत्यामानम् । अयवा हामुपश्रुत्य न जाने कि व्यवस्यतीति । अयवा-- एकस्य तावत्पाकोऽयं दारुणो भुवि वर्तते। केशग्रहे द्वितीयेऽस्मिन्नूनं निःशेपिताः प्रजाः ॥ यसो मा भूरिश्पर्यः।] परवेति । [मृषा मिया मम वर्ष शुरमा । असवः प्राणाः ॥१२॥ हिमवत्सारगुण - N पभिचरतीरपवधेयम् । मिशतामिनि । सानुमिति धिम्योगे जिनीया मनात १०५ पारोह मरवाया- हे तार, पुष होमसो मारने मेरे कपको भूठो बात सुनार को मार (0) प्राय (1) rainr मेरित यह मामे नियुक्त हो- भी प्रोशित ललिये मुमति पर भाप सात पपं हो पा ॥२ हारदित हो गया है। मुल-मार पिये, पंई पिये। ( माया) 7-(गाव मारा मांग पर) अनुशे गाल पर है; मगाता (पिहिर)रो पिधार = रागाओं को निर; निशा पारकरने वाले हो पियार -जिन्होंने वितिके समान सर पर की पुत्री के और भाम द्रोण के पहल हो रेखा तो पुत्र मायामा रो रंगे है सर? भयबा हिमालय के समान गाली मोर ग तिने तपा मोर-मर्यादा से जानने वाले उस पाया) में मुझे दोक के बागरी मारामही करनी चाहिये। किन्तु नहीं कि रिका के अनुचित मरमान से मुनकर यह बया कर गले ? एक (हम) तो दी पर पह (महाभारत हप) भयङ्कर काम है। इस लिीप रेश महण होने पर निश्चय ही समस्त प्रमा नष्ट जायेगी ।।१४॥ कमानि रामाणि बिभ्रतीति तान् । पतु प्रशिमो निधये वा । द्रौपद्याः हस्तरात द्रोणाय च यः [लिपिनधिषगरिव वीक्षित इयत्वयः ॥१३॥ हिमवत: मा:] हिमदासारो हिमालयवसम् । [द गुरु स्थिर घेतो '] स्थितिः स्वयम् । [मर्यादा व्यवस्था वा । तस्मिन्नवस्यामनि । एकस्यति । एकस्य दौरा: गग्रहस्य । तावच्या उपक्रमे । निगेपिता हाशियो गर्ममंधिः । यदाह-बीजस्योच्छेदन यत्तु तदाक्षिसमुदा- न्यनिकरोनि (iitart trime ITE am, Reftwitte Arm-ent Trirat ar (a) glorist. आजम्मनो गति friiम: नदेखि गजमनागग । साने गुरो जियो मम भाषा- गर्ग सदसदनियम || प्रसार एक वा मा पाr fatti भरपामा--(पाnिimम) मान, भा', गतो पेनाप त्वं गह रगमुवं गन्मातिना य एगः भूराणा गुग्गमरमनिरपणः । परीहासाश्रियाः सततममवन्यन भयतः स्वसुः श्लाघ्यो भर्ता क नु गलु स ते मातुन गतः ।। कृपः परिगतारिगरतम्य एव पवाद । तालमपतयोगेन। अवस्यामा-मातुस, परिपाटमेव मया परिषरम : पोटे तातमेवानुगच्छामि। हपः-वत्स, अनुपपग्नं भवधियानामियम् । मतः-कुमार, बालमतिसाहसेन । अश्वरयामा--आर्य भारत, आगन्मन इति । आजम्मनो जननादारभ्य। विसयमसत्यम् प्रसिद्धौ। यस्वं जनं मोक्ष पविषयं करोपि, सत्सर्वं मम भाष्य । स्वयेति शेपः । कयं निरस्त दूरीकृतम्। ॥१॥ शिरततः पुत्रः] शारदतः कृपः।

सौरोतः (पार) तो यह नाम मापारामा गा है। पोप जाता है। (समीप पाराहट के माप) बस, रायो, पं सपो। मायाया-(पवना पार मागू भरे हुए) हाय तात। हाप सम्पूर्ण के रान पुच! (माता की भोर देगार) पिडिर! पुहिर, जन्म से लेकर मारने (भी) भूठ नहीं बोला, पोहि तुम लोगों से हंप रते हो, इसलिये तुम मतपत्र (हसाते हो); मेरिन मेरे भाग्य के । (दुमने मारा और पोह्मण (मेरे पिता के विषय में यह सब एपदम से रहिये ? ॥1॥ ल-कुमार, यह तुम्हारे मामा शात मोप में है। रखत्यामा-(पावं में देगाराओं के माप) मामा, मामा ? स मेनापति के साप मार मात्र पुरा भूमि में गये थे; भो भो ना ही पुर को मामलो को मिटाने वाला पा; जिसके साथ हमेशा मनोखे हंसी-मजाक हुमा करते थे; मापको गहन का प्रशंसनीय पनि यह, मामा, हाँ बसा गा ? ॥1॥ Pr--आप सब मातम्य मानते ही है। इसलिये गात शोक के आवेग से बौगिये। पायापा-मानुल, मने विलाप ही दिया। अब में भी पुत्र-प्रेमी हो अनुगमन करता हूँ। पस, मार सों के लिये यह उचित नहीं है। मृत दुमार, साहस मकरो। भगवत्पामा-आशाएत, गत इति । पेन संन्यपतिना सह मद्य त्वं रणभुवं गतः । यः एकः शूराणां। पा समरस्य युदस्य का मुजयो: कण्ट्रतिस्तस्याः निकषणः। कनिक- कडूनिवारणः । [येन सह भवतः चिनाः । परीहासा नमंभाषणानि सनतम् न् । हे मानुस सः ते स्वमुगिन्याः लाग्यो भर्ता । क मु कुत्र नु खलु पितु प्ररने ॥१६॥ परिणतं भानं परिगन्तव्यं ज्ञानम्यं येन स तथा । परिदेवितं विसापः ।

। - वेणीसंहारे मद्वियोगभयात्तात: परलोकमितो गतः । करोमि विरहं तस्य वत्सलस्य कथं पितुः ।।१७ कृपः-वत्स, यावदयं संसारस्तावत्प्रमिवेयं लोकयात्रा यत्पुर्ण लोकद्वयेऽप्यनुवर्तनीया इति । पश्य- निवापाञ्जलिदानेन केतनः श्राद्धकर्मभिः । तस्योपकारे शक्तस्त्वं किं जीवन्किमुतान्यथा ligil सूतः-वायुष्मन्, यथय मातुलस्ते शारद्वतः कथयति तत्तथा। अश्वत्थामा-आर्य, सत्यमेयेदम् । कि त्यतिदुर्वहत्वाच्छोकभारस्य न या ताविरहितः क्षणमपि प्राणान्धारयितुम् । तद्गच्छामि तमेवोहेशं यत्र तथा मपि पितरं द्रक्ष्यामि । (उत्तिष्ठन् बलमालोक्य विचिन्त्य) कृतमयादि । ग्रहणविडम्बनया ! भगवन शस्त्र, गृहीतं येनासी: परिभवभयानोचितमपि प्रभावाद्यस्याभून्न खलु तव कश्चिन्न विषयः । परित्यक्त तेन त्वमसि सुतशोकान तु भया- द्विमोक्ष्ये शस्त्र त्वामहमपि यतः स्वस्ति भदते ॥१६॥ ( इति उत्सृजति) ( नेपये) भो भो राजानः, पथमिह भवन्तः सर्वे गुरो रसाजरय परिभरमा नृशंसेन प्रयुक्तमुपेक्षन्ते । मदिति । अविरहं रामाचं [गामिष्यमित्यर्थः । ॥१७॥ लोकाये हलोके परलोके प [अनुवर्तनीया आनुरूस्येनानुमपाः । मोरियो तिरि माशाचरणेन परलोकगते पाहाकिमणेत्यर्थः ।) निवारेति । निगा. पितृदान स्यात् इत्यमरः । निवापानिजला [नस्य माणा गनेन स्ना है। तनः ब्रह्ममोरिरपयः , साधीन अर कंडनं इये। इरपमरः । भारमिः न तस्योपकारे (वं featt पतः। हिमवान्यपानोरवा यतः. आणि जीता जयाशिवाला Mhs/

तृतीयोऽ
मेरे विरह में भय पारण पिसा यहाँ से परलोक चले गये। (तब) में
प्रमपी पिता का वियोग कैसे उत्पन्न कर सकता हूँton
कृप--वत्स, अब तक यह संसार है तब तक यह लोक-पपहार भी रहेगा
-पुत्र दोनों लोकों में ही पितरों के अतुल माचरण करें। देखो-
तुम जलालि-दान, ब्राह्मण भोज और बाल-पर्म द्वारा उसके उपकार में
वित रहते एए समय हो सकते हो अथवा अन्यया (अनुगमन करके) men
सूत-आयुष्मन, तुम्हारे मामा भारत जैसा कह रहे हैं, यह ठीक है।
अश्वस्यामा-आर्य, यह सच ही है। परन्तु दुःख-मार के अत्यधिक असह्य
ोने के कारण पिता से विपुक्त मैं क्षण भर मी प्राण-धारण नहीं कर सकता।
वि उस ही जगह जाता हूँ जहाँ उस दशा में वर्तमान (मृत) भी पिता को
ख सकू। (उठते हुए तलवार को देखकर और सोचार) अब शस्त्र धारण
करने के उपहास से बस करना चाहिये । भगवान् शस्त्र,
जिसने उचित न होते हुए मो अपमान के भय से तुम्हें धारण किया था
और जिसके प्रभाव से कोई तुम्हारा विषय नहीं हुभा, यह बात नहीं थी,
क्योंकि उसने पुत्र के शोक के कारण, न कि अप के कारण, तुम्हें छोड़ दिया है,
इसलिये हे शस्त्र, में भी तुम्हें छोड़ रहा हूँ। आपका कल्याण हो ॥१६॥
( यह कहकर छोड़ देता है)
( नेपथ्य में
है राजा लोगों, यहाँ खड़े आप लोग इस वर द्वारा किये गये आचार्य
भारद्वाज (ोण) के अपमान को कैसे उपेक्षा कर रहे हैं ।
वियन इति भावः ॥१८॥
होतामिति । येनाचाए । [परिभवो विमानना तस्य भपाद । नोचितमपि
गृहीतकातीः । यर: दाम्त्र दिजातिभिह्य धर्मों यावरुध्यते इति स्मरणात् ।।
पापाचार्यस्य प्रभावात् । तब टिपयः कथिप्नाभूदेव न खलु । सर्व एव विषयो.
भूदित्यर्थः । तेन त्वं, सुनशोकापरित्यक्तमसि न तु भवात् । हे शन यतः
अनपि] विमोपे यक्ष्यामि । अत्तो भवते स्वपस्तु: स्वस्तियोगे नमः-
स्वस्ति-इत्यादिना पतृयीं ॥१॥

अश्वरयामा-आप पासपेरम् । रिहिरवाग्छोकभार साविरहितः क्षणमप्रिागाग्पारमितुम। तमाम तमेगोरो यत्रत मनियोगभयानान परलोमिता गतः । कगगरि तम्य यमनस्य वयं पितुः ॥१३॥ .-, म मा म सोमनुस्मोगा - नियापाअभिदानेन वन: यादकमिः । नम्योपकार गत्तरन्यं कि जीवनिमुतान्यया ॥१८॥ ग्रत-शायुप्मन, पब मानुपाते शार: पपति तत्तया। मपि पितरं श्यामि । (गिन् माय दिचिन्न) इतनद्या - न तृतीयोऽङ्कः १०६ मेरे बिरह के मय देवारण पिता यहाँ से परलोक चले गये। (तब) में प्रभावी पिता का विशेष के उत्पन्न कर सकता हूँ कृप-वत्स, जब तक यह संसार है तब तक यह लोक-व्यवहार भी रहेगा i~-पुत्र दोनों लोकों में ही पितरों के अनुकूल आचरण करें। देखो- तुम जलालि-दान, ब्राह्मण भोज और श्राद्ध कर्म द्वारा उसके उपकार मैं वित रहते हुए समर्थ हो सकते हो अथवा अन्यया (अनुगमन करके) ॥१८॥ सूत--आयुष्मन, सुम्हारे मामा शारद्वत जसा कह रहे हैं, वह ही है। अश्वत्थामा-आर्य, यह सच ही है। परन्तु दुःख-भार के अत्यधिक असहा ने के कारण पिता से वियुक्त मैं क्षण पर भी प्राण-धारण नहीं कर सकता। व उस ही जगह जाता हूँ जहाँ उस दशा में वर्तमान (मृत) भी पिता को उसकू। (उदते हुए सलवार को देखकर और मोचार} अब शस्त्र धारण ले के उपहास से यस करना चाहिये । भगवन शस्त्र, जिसने उचित न होते हुए भी अपमान के भय से तुम्हें धारण किया था और जिसके प्रभाव से कोई तुम्हारा विषय नहीं हुआ, यह बात नहीं थी, पोकि उसने पुत्र । के शौक के कारण, न कि भय के कारण, तुम्हें छोड़ दिया है, सलिये हे शस्त्र, मैं भी तुम्हें छोड़ रहा है। आपका कल्याण हो । ( यह कहकर छोड देता है) ( नेपथ्य में है राजा लोगों, महाँ बाई आप लोग इस कर द्वारा किये गपे आचार्य भारद्वाज (होण) अपमान को कैसे उपेक्षा कर रहे हैं ? कियन इति भावः ॥१८॥ गृहीत मिति । येनाबायें। परिपको विमानना तस्य भयाद । नोक्ति होतमातोः । यतः शम् द्विगातिभिरि घमो यत्राबध्यते इति स्मरणात् । पस्यायस्य प्रभावात् । तर विषयः कश्चिमामूदेवं न खस । सर्व एव विषयों दियः । तेन त्वं सुनयोकारित्य तमसि नतु मया । हे शस्त्र पत अपि ] विमोक्ये स्पश्यामि । भक्ते स्वस्थस्तु । स्वस्तियोगे नम स्वस्ति-इत्यादिना पतुर्थी ॥१६॥ ) बाहुशालिवकोबर मायक, युपनं नाम मत्रां मुरासुरमवरनो दिजन्मत: परिणतश्यतः सर्वाचार्यय विशेषतो मम पितुरमुना बालकता 11२ रहिभागोषविरामदमतम्यन गिी. मंगवाय TTE Fri निहिनम्नम्मान करः ॥२२॥ या राममायामा, तातं गाग्रहणविमुत्रं निश्चयेनोलिभ्य त्यात्या गवां गनु विदधन पागिमरोतमाड़गे । अधन्यामा करनधनुः पाण्डपाजालगना- तूलोस्टोपप्रलयावन. किन यान म्मृत्ति ते ॥२३॥ युपिहिर, युधिडिर, अनावरात्रो, अमिप्याति, धर्मगुर, सानुमत किमनेनापकृतम् । अय वा मिनेनालोकप्रतिनिपचेतसा । मन, मारक मनुजपशुना स्पृश्यमानमुत्तमानमुपेभितुन । अव या सर्व एवंते पारित किमेतः। कृतमनुमत दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातक मनुजपशुभिनिमर्यादर्भवद्भिदायुधः । नरकरिपुरणा साधं तेषां सभीमकिरीटिना- मयमहमसृङ्भेदोमांसः करोमि दिशां वलिम ॥२४॥ दो गर्वस्तेन मत्तस्य । अप गितुः शिरसि करो न निहितः । रितु ममेव टिरवि दिौ निहित इत्यन्वयः ॥२२॥ तातमिति । उपलाय ज्ञात्वा । शा शत्रुतमारणादिशङ्करम् । सद्धी। उत्तमाइगं शिरः शोपंम् इत्यमरः [विदधतो व्यापारयतः । बालानां च सेना एव तूलः तस्य उत्क्षेपे प्रलयपनः पलान्तमारुतः । मोरया छेदकारी पर्यः । अश्वत्थामा सब स्मृति किं न पातः ॥२३॥ अजातशत्रुणा किम, अपि तु न किमपि। कोदोन, अलोकनामान 1

SHIK
तृतीयोऽ
११३
व्य शस्त्र-समूह रूपी धन के मद से मत्त हुए शत्रु का पैर हो मेरे सिर पर
स्खा गया, उसके (पिता के) सिर पर हाथ नहीं ॥२२॥
भोह दुष्ट, अधम पाञ्चाल,
पिता को निश्चित रूप से शास्त्र-ग्रहण से पराङ्मुख जानकर, (इसतिये)
रय छोड़कर इसके सिर पर हाय डालते हुए तुझे क्या हाथ मे धनुष धारण
करने वाला और पाण्डु तथा पाचाल सेना रूपी रुई को उड़ा देने में प्रलय-
हाल का.पवन, अश्वत्थामा याद नहीं आया ॥२३॥
पुधिष्ठिर | युधिष्ठिर ! अजातशत्रु ! सत्यवायो ! धर्मपुत्र ! अनुज सहित
हेरा इसने क्या बिगाड़ा था ? अथवा इस भूठे और स्वभाव से कुटिल चित्त
वाले से क्या (अपेक्षा की जा सकती थी) ? अर्जुन ! सात्यकि ! बाहशाली
भौम ! माधव ! क्या, आप लोगों को इस द्रुपद कुल के कलङ्क, मनुष्य-पशु
द्वारा हुए जाते, सुर, असुर और मनुष्य लोक में अद्वितीय धनुर्धर, ब्राह्मय,
गुरु और विशेषकर मेरे पिता के सिर की उपेक्षा करना उचित
पा ? या पे सब के सब पातको है । इनसे क्या (अपेक्षा) ?
जिन मर्यादाहीन, शस्त्र धारण करने वाले मनुष्य रूप में वर्तमान पशु,
पाप लोगों ने यह महान पातक किया है, प्रथया उसकी अनुमति दी है, अपवा
उसे होते देखा है, नरक-रिपु (कृष्ण) के साथ साथ भौम और अर्जुन सहित
इन सब के रुधिर, चर्बी और मांस से मैं दिशाओं को पति दिये देता हूँ॥२४
शातिबन्] इनरजनबस्कुटिल चेतो यस्य तेन । अलीका या प्रकृतिस्तफा
जा चेनो यस्येति वा । सुरासुरमनुज्ञानां लोकास्तेयु एवधनुर्धरस्तस्य ।
मिति । [यः निर्गता मर्यादा येभ्यस्तः निर्भयदिः उगतानि आयुधानि
शत: उपायुधः । प्रतिवर्तुं समरपीति यावत् । मनुजपशुभिः भवद्धि. इद
मानक तमनुमतं ६ष्ट पा। नरकरिपुणा सा भीमकिरीटिना तेषा
गरेकोमास: अपमहं दिशा ति करोमि इत्यन्वयः । गुरु महा सत्पातकं च ।
परिपुः करणः । अमृषक्त । मेरो मना लिमुपहारम् । वलिः पूजोपहारयोः
साधतः॥२४॥

-
.
कृपः-बारा, अपरयादिनामिवारी परिभवानी मन
कृपः-सनापत्ये ऽभिपितं भवसमिछामि समरभुवमवतारमिला।
पितुरिति । [पितुर्जमदग्नेधिन कातंवीर्यस्य पुत्रः स्पृष्ट सति।
[ज्वलन् योऽनसस्तबद्भास्वान परशुर्यस्य तेन] रामेण परशुरामेण हा
जनघातादिकं तदभवता कि धुनिपर्य न गतम् । पितुग्नि दुपदेन मृटे।
एव विधसो भोजनविशेयः [यस्मिन् तत् । अत
rr. om. for furt wrift
तरि पनि
मामा-मोकाममोगामायामा
पितुग्नि रपाटे ज्यादनमामास्वत्परशुना
गृतं यदामंग श्रुतिमुरागत वन भवनाम ।
किगवान्यामा सरिमधिरागारविषम
न कर्म गोधान्य प्रभवति विधार्नु रणमुगे ॥२६
मन. गावं सोशरणः सादयामिक गापुर म
नामामारयापनमुपनय ।
नसः-पदासापति कुमारः। (इति नियन)।
कोरवामन्तरेण शक्त: प्रतिफलम् । किन-
अश्वरयामा-किमतः परम् ।
अश्वत्थामा-मातुल, परतन्त्रमिदाचितरं च ।
कृपः- वत्स, न तु परतन्त्रं नाकिचिरकरं च । पश्य:
भवेदभीप्ममद्रोणं धार्तराष्ट्रवलं कथम् ।
यदि तत्तुल्यकर्मात्र भवान्धुरि न युज्यते ॥२६॥
ग्रामः संघः । कोविदः पण्डितः।
अश्वत्थामा तिमद्यापि तलम विधातुं न प्रभवति अपितु
1 इत्यमरः ॥२५॥

हती
*र-बास, भारRATI, गहतानी, रिम्प मात्र समूह मे पर
में पा सामानही है?
। मरवरयामाहे पादर, मार, सोनस शोर माप आदि मपम तिमी,
तिा के सिर के पूरे आने पर असतो भग्नि के समान कमाते हो
पुथारे राम (rgum) मे भोपं ला पा, पपा बह मार लोगो के
में नहीं पहुंचा है। या यार दो अन्यामा मरवरयामा पुटके
पर उप शर्म को, जिसमें गानों के विरको वर्षा हो विधम (पितरों
दिया जाने वाला मन्त्र) है, करने में समर्थ नहीं है ॥२५॥
र, गुम जाओ और सपाधों सपा पुट के मात्रों से युक्त हमारे
एलर'
मारपोसामो।
मूर-मार को मामा । (बहरहार बाहर जाता है)।
प-वत्स, इस अमान ने मग्नि पा, बिसरा भवाय हो प्रतिकार
रह, एक रूप में तुम्हारे मिति और कौन प्रतिकार कर सकता
मररपामा-तो इससे अधिक गया?
Fr-सेनानि के पद पर अभिषिक्त मेरी आयो युटभूमि में उतारना
भरारपाना-मानुन, यह दूसरे के मधीन है और महत्वपूर्ण भी नहीं है।
-पस, (पह) म परापीन है और न ही ममहत्वपूर्ण । देखो,
यरि रन (मोम और द्रोप) के समान कर्म करने वाले आपको यहाँ पुरी
सिमासन के पर) पर न लगाया जायेगा तो भीम और होण से रहित
? के पुत्र की सेना कैसे रह सकेगी ॥२६॥
शानिरः [संग्रामा प्रभवन्ति सांग्रामिवाणि। तस्मै प्रभवति सन्तापा-
इति टन् । निकारेशि पारे) निकारस्य परिमवस्य । निकारः स्यासरिभवः
वेश्व. । सेनापतीयः सनापरपम् ।
भवेदिति । भातराष्ट्रपलं कर्ष भरिक भवैदित्यर्थः । [तयोः तुल्य कर्म यस्य।
क्ष इति पाठ कक्षा पराक्रमाया: पस्य । अत्र धुरि धुरापाम् ॥२६॥

-- जसावगाहनाय । तदहं गत्वा सातयविषयमानसं कुरुपति नारत्यर: वेणीसंहारे कृतपरिकरस्य भयाशस्य प्रैलोक्यमपि न क्षमं परिपन्योभविता हिरवलम् । तदेवं मन्ये परिकल्पिताभिकोपकरणः कौरवराजो । दाम्यपेक्षमाणस्तिष्यतीति । अश्वत्यामा-यद्येयं स्यरते मे परिभपानलदह्यमानमिदं वेतस्त:- प्रणयसमाश्वासनया मन्दसंसापं करोमि । कृपः-वत्स, एवमिदम् । अतस्तमेवोद्देशं गच्छावः । ( इति १रिकामतः) ( ततः प्रविशत. कणंदुर्योधनो) दुर्योधनः-अङ्गराज, तेजस्वी रिपुहतबन्धुदुःखपारं वाहुभ्यां प्रति घृतायुधप्लवाभ्याम् । प्राचार्यः सुतनिधनं निशम्य संख्ये कि शस्त्रग्रहसमये विशव आसीत् ॥२७॥ अपना मुक्तमिरमभिपुक्तः प्रतिस्पति। यतः शोक पिपुष्य साधर्मकार्कश्य दिनातियां मुखभो मादपरिग्रहः कृतः r:-रामन् कौरवेश्वर, न अस्विरमेवम् । दुर्योधनः-- सहि। कग:-एवं किरपाभित्रायो पया अवस्यामा मा ममितव्य इति । तरपामावासस्य मे प्राह्मणस्य पुपा रात्र m पोन:- (गरिम) एवमिदम् । नरक गुहार परिणीभविए । प्रगियोअमिपः। अमिine मरना गायी [म माया पहनता बाधादेश समान वाया। गोय. पुए पार पगार नीरइत: भाषा - SIMHनिश्चय कियेए आप असे का तीनों लोक भी सामना नहीं कर सकते, युधिष्टिरको सेना तो क्या ? इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि अभिषेक na 21ARIRL तृतीयोऽङ्कः ? सामग्री तैयार करके कौरव-राज अब तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा है । अश्वत्थामा-यदि ऐसा है, तो अपमान के अनल से जलता हुआ, यह मेरा त भी प्रतिशोध के जल में प्रदेश करने के लिये उतावला हो रहा है । इसलिये चलकर पिता के वध से दुःखित चित्त बाले कुरुप को स्वयं सेनापति पद कार करने की प्रार्थना से सान्त्वना देकर उसके सन्ताप को दूर करूं। कृप-वत्स, ऐसा ही होना चाहिये । इसलिये उस ही स्थान पर चलें । ( दोनो घूमते है ) (तत्पश्चात् करणं और दुर्योधन प्रवेश करते है ) -- न दुर्योधन-अङ्गराज, - सेजस्वी (पुरुष) आयुध रूपी नौका पारण को हुई भुजाओं से मात्र द्वारा 'मारे गये प्रिय जन के शोक को पार किया करता है । आचार्य पुत्र को मृत्यु को सुनकर युद्ध में शस्त्र-ग्रहण के समय शस्त्र होन क्यो हो गये ॥२७॥ अथवा सयाने लोगों ने ठीक कहा है- -स्यमाव नहीं छोड़ा जा सकता।' क्योकि शोक से आशन्त हृदय वाले उस (आचार्ग) ने क्षात्रधर्म की कठोरता को छोड़ कर ब्राह्मण-धर्म सुलभ मृदुलता अपना ली। कर्ण-राजन्, फौरवाधिपति, यह बात नहीं थी। दुर्योधन-तब फिर क्यों ? कर्ण-उसका आशय यह था- 'मैं पृथ्वी के राज्य पर अश्वत्थामा को अभिषित करूंगा।' उसके न रहने पर 'मुझ वृद्ध दाह्मण का शस्त्र धारण करना व्यर्थ है, यह विचार कर उसने वैसा किया है। दुर्योधन-(सिर हिलाते हुए) ऐसा ही है। याभ्यां ताम्या बाहुभ्यां बजतीत्यन्वय: । लवः कोलः। उप तु प्लयः इत्यमरः । निशम्य श्रुत्वा । संख्ये संग्रामे ।।२।। मुक्त शोभनमुक्तमभियुक्त नीतिज्ञः । [शोकेनान्धं युक्तायुक्तविकासमर्थ ममो यस्य तेन । सत्रस्याय क्षात्रो धर्मस्तस्य तत्सम्बन्धि जाकर कठिन-

दुर्योधनः--(हवा) बये कथं कृपोरश्वत्यामा च। (आवनावनो -
शस्त्रत्यागम् । परस्परेण क्षयमपेक्षमाणेन । उपेक्षा कृता उदासीनेन स्थित।
।
कृपः-(विलोक्य) वत्स, एष दुर्योधनः सूतपुत्रग सहारांसोझर-
शोकेपि यो महति निर्वृतिमादधाति ॥२६॥
हृदयताम्] नखल्विति। इदमेव न याच्यमित्यर्थः । किरा प्रसिजी
गहरे
:- सार्म में ramमान:
RiramITTETाना
परामर्यभमान रोपाला र
दुलारन:-- उसनभिग।
क- मान, राजा, पनामाप बामप्रभूत्यानापोडिग
राष्ट्र यागो बरा.
दुर्योधनः-- II, मगराम, साधु । गिमिहितम् ।
कर्ण:--- न पा मया । प्रनिता अपि नदेव
मन्यन्ते।
दुर्योधनः - एयमेतत् । कः सन्देहः ।
दत्त्याभय सोऽतिरथो वध्यमान किरीटिना।
सिन्धुराजमुपेक्षेत नवं चेत्कथमन्यया ॥२८॥
---
मुपविष्टस्तिष्ठति । सदुपसावः ।
( तथा कुत्ता)
उभौ-विजयतां कौरवश्वर।
प्रति) पुरी अभिवादये । (अश्वत्थामानमुद्दिश्य) आचार्यपुत्र,
एह्यस्मदर्थहततात परिप्वजस्व
क्लान्तैरिद मम निरन्तरमङ्गमङ्गः ।
स्पर्शस्तवैय भुजयोः सदृशः पितुस्ते
।
.
दाल्पारप्रभृति धेशवादारभ्य ।
बस्वेति । सोऽतिरपः महारयः द्रोणोऽभयं दत्त्या फयमन्यमार्जुनेन !
.। धेर नस्यन्वयः ॥२८॥

११०
दुपद ने
है
तृतीयोऽड्स
कर्ण-चौर इसी कारण कौरवों तथा पाण्उदों के प्रति पक्षपात होने के
रण महायुद्ध में प्रवृत्त हुए राज-समूह के परस्पर नाश को अपेक्षा करते हुए
सने प्रधान पुरुषों के वध की उपेक्षा की।
दुर्योवन-यह ठीक है।
फर्ण-और राजन्, बचपन से ही इसके अभिप्राय को जानने वाले
से राज्य में वासस्थान नहीं दिया था।
दुर्योधन-ठोस, अङ्गराज, ठोक । (थापने) बुद्धि की दात कही है।
कर्ण-और यह एक मेरा ही विचार नहीं है। दूसरे चतुर लोग भी इसे
पया नहीं समझते हैं।
दुर्योधन-ऐसा ही है । (रमें) क्या सन्देह है ?
यदि ऐसा न होता तो वह महारथी अभय देकर अर्जुन द्वारा वध किये
हए सिन्धराज की अन्य किस कारण उपेक्षा करता ॥२॥
कप--(देखकर) वास, यह दुर्योधन मत-पुत्र (कर्ण) के साथ यट-वृक्ष की
ा में बैठा हुआ है । तो पास चलें।
(वंसा परके)
दोनों-कोरयों के अधिपति को जय हो।
दुर्जेयन - (देणार) परे ! कैसे ! हप और अश्वत्थामा। (आमन में
कप से) भाचार्य, मैं प्रणाम करता हूं। (असिस्थामा को लक्ष्य करके)
गर्यपुत्र,
हमारे प्रयोगन से मारे गये पिता बाले, आओ; (अपने) थान्त अगों से
इस शरीरमा गाउ आलिङ्गन करो। तुम्हारी भुजाओं या यह स्पा
रे पिता (के स्पर्श) के समान है, जो महान् शोक में भी (हम) शान्ति
है ॥२६॥
तपुत्रेण मारपिमुतेन वर्णन । मूनः भत्ता ५ मारयि: ।। इत्यमर ।
पो
बहारः इस्यमरः । दिनयतारिपन रिपराभ्यां जे. इनि ता ।।
रहीदि । एमागन्छ । [लान्त विपनदरहामपाङ्गम् । निर्गरमागर
पणि तमासा गामित्यर्थः । [तस्विमस्वालिङ्गी तर हेतु
माम्। [तब भुयो एप स्पर्शः ते पितुः । सो मति सोरेपि
नितिगानिमाधान रोतीत्वपः ॥२६॥

- जानीहि तद् गुरुशुचा मनसा त्वमेव ॥३०॥ कथमन्ये करिष्यन्ति पुत्रेभ्यः पुषिणः स्पृहाम ॥३॥ कन:-ौणापन किमत्र क्रियते यदा तेनंव मपरिमानना भावरपामा-महाराज, किमाह मवान् किमत्र डियन इति नारनवतातो मे पिनु माया मित्रमियन्वयः नायपियर सनीयोदेशसनियम्ममयियामिमा परिनी गा। यह धिनाय:-farma (प) ft मारयनिगमः । दलि] तत्वमेव गुTEM १२० वेणीसंहारे (आलिङ्गम पावं उपवेशयति)। ( अश्वत्थामा याप्पमुस्मृजति ) कर्ण:-द्रौपायन, अलमत्यर्थमात्मानं दोकानले प्रक्षिप्य । दुर्योधनः-आचार्यपुत्र, को विशेष आवयोरस्मिन्व्यसनमहार्णवे। तातस्तव प्रणयवान्स पितुः सखा मे शस्त्रे यथा तव गुरुः स तथा ममापि । कि तस्य देहनिधने कथयामि दुःखं कृष:-~वरस, ययाह कुरुतिस्तयंवैतत् । अश्वत्याना-राजन्, एवं पक्षपातिनि त्वयि युक्तमेव शोरभार सपू किन्तु मयि जीवति मत्तातः केशग्रहमवाप्तवान् । मुमता ताशीमवरपामात्मा नीतः। यम्पिने यो यः गात्र विति स्वभुजगुरुमदः पाण्डवीनां चहनां यो यः पाशातगोडे गिरधिकयया गर्भशय्यां गतो या ! Ter मा माtrrite: [पाना पनो गुरुयो" पप गुमा मोईन l - क- १२१ । { अश्वत्थामा सामू बहाता है) ---प्रोण के पुत्र, अपने को अमयिक योग पो अग्नि में गलने से यस . सुयोधन-आचार्यपुत्र, इस विपत्ति के महासागर में हम रोनों में समा मेव देखो- वह तुम्हारे प्रणमो पिता मेरे पिता के मित्र थे। शस्त्र विद्या में यह मंसे रे पे, ही मेरे भी। उसके शरीर का अन्त हो जाने पर (होने पु.ख को पया बतलाऊँ ? महान दुःख बाले (अपने मन से तुम हो समान तो ॥३०॥ -वस, दुरापति सा कह रहे हैं, यह ठीक ही है। मस्यामा-(हमारे प्रति) प्रेम रखने वाले मापा इस प्रकार रा) शोक-भार हवा करना ठीक ही है। पितु- तो शोषित एते मेरे पिता ने केश-ग्रहण मास किमा, तब अन्य पुत्र बाते मना से करेंगे। -ौणायन, इसपे या दिया जाय, जसको अपमान से बचाने में उसने ही साधना करते हुए अपनी ऐसी कराई है। रवरयामा अराब, स्पा करा आपने इसमें क्या दियाय ।' यो पारेया, सुनिये- । को सेनाओं में से अपने भुवबल के मतिर बाला जो भी शाय ran है, पापास पुल में जो भी मषिक पदापाता मापी भोपित शिशु है; को भी उस कर्म का साक्षी है और को को मेरे पुर: दापत्र स्पृहेगेजितानि पर्या ॥३॥ । पापपीना पावसबम्धिनीनो पनी मेनानाम । म गे। सीरपः । गुरमको परय रुपान. या काय MARATHI TRN amart ानवमास्टर मार पनि मामी arti I बिपि रा रा -- यद्रामेगा कृत नदेव कुन्त द्रौगायनः क्रोधनः ॥३॥ मन्ये भवता कृतपरिकरोऽयमुच्येत लोकत्रयपि समर्थः किनजिरि दुर्योधनः-मुष्ठ युज्यमानमनिहितं पुष्माभिः। कि प्रतियोse नवोपेक्षितुं युक्तम् । अस्यापि तदेवारिफुलननुशासनीयए। अतः किमय य: य.] प्रतीपो विपरीतकारी [स्यात् । प्रतापमिति पाठे यश्च या रो देश इति । [सोयं कुरुक्षेत्रम् ।] शोषितं रक्त[सदेव जसा । पूति दोषः] । क्षत्रात क्षत्रियतापरिमनः सत्र जान इति १२२ से गम्नवामगाशी नीति मयि यन यन्न तीर क्रोधान्धग्नम्य नग्य स्वयमपि जगतामनाल्यानरो॥ अपि च, भो मामापनिय. देगः सोऽयमगतिगोणितजलयस्मिन्दाः पूरिता क्षपादेव नथाविध परिभवस्तातम्य मनहः । नान्येवाहितगत्रयम्मग्गुरुण्यस्वाणि भास्वन्ति मै दुर्योधन: - आचार्यपुत्र, सस्प तयाविषस्यानायगाधारणस्य ते शोर किमन्यत्सहनाम् । कृपः - राजन्, सुमहान्खलु द्रोणपुत्रेण पोतुमध्यमितः समरभार । अतोऽभिषिच्यता सेनापरये। अराजस्य। कृपः-राजन, यसदृशापरिमवशोक सारे न भविष्यति । अश्वत्यामा-राजन कौरवरवर, किमद्यापि युतायुक्तविचारणया। निमअन्तमेनमगाराज '- -- प्रनीप चरति इति योज्यम् । तस्य जगतागन्तकस्य विनाशरस्य विनाशको वा ॥३२॥ जामदान्यः परशुरामः।

. तृतीयोऽङ्कः १२३ भूमि में संवरण करने पर विरुद्ध होगा, क्रोध से अन्धा हुना मैं उन मार 1-स्वपं जगत के संहारक (यमराज) का भी ना करने वाला होऊंगा ॥३२ और भी, हे जमदग्नि-पुत्र के शिष्य कर्ण, यह वही देश है, जिसमें शत्रुओं के हपिर ही जल से तालाब भर गये, ना का केदा-ग्रहण क्षत्रिय से हो होने वाला वसा हो अपमान है, मेरे वे हो पुओं के शस्त्रों के भक्षक और बलवान् चमकते हुए अस्त्र हैं, जो (पहले) शुराम ने किया था, कुपित होण-पुत्र (मी आज) वही परगा ॥३३॥ दुर्योधन-भावार्यपुत्र, तेरे ऐसे प्रसिद्ध असाधारण पराक्रम के अनुरूप रिया हो सकता है ? रूप-रामन, द्रोण-पुत्र ने पुरका महान भार वहन करने का निधन या है। इससे मैं समझता हूँ कि आप से पुरस्कृत होर यह तीनों लोपो । विष्वंस कर असने में समर्थ है, फिर युधिष्ठिर को रातो का है ' पे से मेनापति-पद पर अभिषिक्तर दिया जाप । दुर्योधन-मापने ठीक घुक्तियुक्त पहा है। परन्तु यह धीम तो पहले। राम (कर्ण) के लिये स्वीकृत कर ली है। r-रामन, अङ्गाराज के गरण अाधारण अपनान से जनित शोक र से हुए इसकी उपेक्षा करना उचित नहीं है। इसे भी उमहोत्र मेरणा देना है। क्या इससे इसे पीस नहीं होगी? मायामा-राज होरदाधिपति, भर उचित-अनुचित विचार करने ग (म्योजन ? का उपस्थिता ये (पहा महिताः) पत्र वस्नेषा (पानि नामा) पि पक्षाणि । अत एव पुरणि । भारदन्ति दोरमानानि । रामेश राएर पिनासनम् ॥३३॥ मुपहार तापित.। सोई धम् । [मायसिन नामङ्गी । भाप । [समरसोनिनुस। मामा योग्य परशुरामेणेति शेषः सत्रात क्षतिपत्ताल्परिभवः मत्रय जात हो यद्रामेण कृत तदेव कुरते दौरगायनः होधनः ॥3॥ दुर्योधनः - आचापंपुत्र, मस्य तपाविषम्पानन्यसाधारणस्य से मन्ये भयता कतपरिकरोऽयमुन्धेत्तं लोकत्रयनरममयः किनविहित कृपः-राजन, मुमहाग्लुटोणपुत्रेण दोडमध्यवसितः समरभार। दुर्योधनः--मुष्ठ युग्यमानममिहितं युष्माभिः । किमु प्रारतिरोड नवोपेक्षितुं पुक्तम् । अस्यापि तदेवारिकुलमनुशासनीयम् । अत: किमस्प अश्वत्थामा-राजन् पोरवरचर, किमद्यापि मुक्तायुक्तविचारगया। 'यः यः] प्रतीशे विपरीतकारी [स्यात् । प्रतीपमिनि पाठे या यो वेश इति । [सोयं कुरक्षेत्रम् । शोलितं रक्त निदेव जलापूति गेगमतमंगासीना ममियन या प्रतीत क्रोधाभग्नम्य तयRIT जगनामनामानशेजना मपि भीजामinfrast देगः गोऽयमगनिमोणितजयस्मिन्दाः परिता गादेव नथाविध परिभवस्तातस्य केगरहः । नान्येवाहितास्वयम्मरगुरुण्यसारिण भाम्यन्ति में शराजस्य। असहापरिभवशोकसारे निमअन्तमेनमङ्गरान न भविष्यति। प्रतीपं चरति इति योज्यम् । तस्य जातामन्तकस्य विनाशकस्य विनाशको वा ॥३२॥ जामदग्न्यः परशुरामः। किमयस्सहाए । अतोऽभिषिच्यता मैनापत्ये । कप:--राजन, * -- अन्तो तृतीयोऽङ्कः १२३ भूमि मे संचरण करने पर विरुद्ध होगा, क्रोय से अन्धा हुमा मै उन सब -स्वयं जगत् के सहारक (यमराज) का भी नाश करने वाला होऊंगा ॥३२ और भी, हे जमदग्नि-पुत्र के शिष्य कर्ण, यह वहीं देश है, जिसमें शत्रुओं के रुधिर रूपी जल से तालाब भर गये थे; " का केश-प्रहण क्षत्रिय से हो होने वाला वैसा ही अपमान है। मेरे वे ही [ओं के शस्त्रों के भक्षक और बलवान चमकते हुए अस्त्र है, जो (पहले) पुराम ने किया था, कुपित द्रोण-पुत्र (मो आज) वही करेगा ॥३३॥ दुर्योधन-आचार्यपुत्र, तेरे ऐसे प्रसिद्ध असाधारण पराक्रम के अनुरूप क्या हो सकता है ? कृप-राजन, द्रोण-पुत्र ने युद्ध का महान भार वहन करने का निश्चय : है। इससे में समानता हूँ कि आप से पुरस्कृत होकर यह तीनों लोको का विध्वंस कर मलने में समर्थ है, फिर युधिष्ठिर को सेना तो क्या है ? इसे सेनापति-पद पर अभिषिक्त कर दिया जाय । दुर्योधन-आपने ठोक युक्तियुक्त वहा है। परन्तु यह चीज तो पहले। राज (कर्ण) के लिये स्वीकृत कर ली है। कृप-राजन्, अङ्गराज के कारण असाधारण अपनान से जनित शोक हमे हुने हुए इसकी उपेक्षा करना उचित नहीं है। इसे भी उस ही भाषा को दण्ड देना है । क्या इससे इसे पीडा नहीं होगी ? अवस्यामा--राजन कौरवाधिपति, अब उचित-अनुचित का विचार कर्मनः शताः मायामामा-मनाराम, एवमिामाहाःगैरवानेत्रहात। कर्ण:-मूर, धितायाभूपातः पितस्य चापुरहितोपय अश्वरपामा-(मत्रोषम्) अरेरे राषागर्भमारभूत मनास नामाश्वरपाम्नो दुःवितस्याधुभिः प्रतिक्रियामुपदिमसिनावरा। एक- संप्रत्येव भयाद्विहाय समरं प्राप्तोऽस्मि कि त्वं यया। क्षुद्रारातिकृताप्रियं प्रतिकरोम्योग नास्त्रेण यत् प्रयत्नेत्यादि । हे राजन, अद्य त्वं निशा शेषेशयिप्पसे । मानव स्तुतिनिर्मागधादिकृतस्तवैरा प्रयत्नेत परिबोधितः प्रबोधितः तपा) लट् । केयभूतः। निःशेपोन्छिन्नसत्वादाढनिद्रामानः सन्] । कोहग/ स्तबादिनापि परिहृतमगिनीपतिशोकः समस्ता नियां व्याप्य चयन भावः। चेपे इति शी स्वप्ने लटि मध्यमपुरुषववचने साघु। निशाना केशवन्यं पाण्डवशून्यं सोमवशशून्यं च । दोशालिना वाहबलशालिना बोरा/ पुनर्भुवनमेताहपमस्तु । कोही | मपि रणकपा युद्धवाधि [पाठान्तरे दो.मालिना] गया परिसमाप्यते। भुवो मारोऽपंतु दूर यातु। कोहनाः। भूपरा एव काननानि वनानि सनिपुर उपचित इत्पर्यः। दोपा भुजा भुजः स्यमरः [भत्र ठोटकं नाम पसल प्रयनपरियोषित. स्तुतिभिरा पे निगा- मगमगाण्ड भुवनमा निम्मान । इयं परिममाप्यते रणागार दो.मालिना व्यातु नृपकाननानिगुरुरय भारो सुव ।। :-(विहाय) वा गुरमिां दुष्करमप्रमातुम् । हर दुःखोपहतः गोजावेगवशार मोमिन पुन:रगनाषिक्षेपेण ! निर्वीर्य गुरुशापभाषितवशाकि मे तवेवायुधं जातोऽहं स्तुतिवंशकीर्तनविदां कि सारथीनां कुले तरणमुचितं मवंविधाः प्रसापाः । कालावनोरश्यन्तसयोगे इति द्वितीया । अद्य बहत से तृतीयोऽङ्कः १२८ आज रात्रि में (ऐसे सुप से) सोओगे कि (प्रातः) मङ्गतस्तुतियों से पल से जागोगे। आज संसार केशव, पाण्डवों तया सोमान्वंशियों से रहित । जायेगा। आज मुन भुजशाली द्वारा यह युद्ध की चर्चा समाप्त पर से एगी। माज राजाओं एपी धर्मों के कारण अन्यधिर भारी पृथ्वी का भार हो जायेगा ॥३॥ गणं-जोर से हंसकर) यह पहना सरत है, लेकिन पूरा करना पड़ा टन है। कौरव-सेना में इस कार्य मे समपं बहुत हैं। भावस्थामा-अङ्गाराज, यह सच है । कौरव सेना पे इस पायं में है। शिन्तु दुःख से अभिभूत हुआ में शोक के आवेग के पारण हो ऐसा हान कि घोर पुरुषों को निन्दा करने के लिये। कर्ण-मूख, दु.खो पुरष को आंसू बहाना और दुपित को शस्त्र सेकर मि-भूमि मे उतर जाना उचित होता है। इस तरह की पवाद नहीं। मरस्त्यामा--(प्रोध से) अरे रे ! राधा के गर्भ के भारभूत ! मपम सन! भरवश्यामा से भी दुखित ए को आंसुओं द्वारा प्रतिकार उपदेश है.मकिपात्र से देख- पया मेरे भारत तेरे समान गुप के शाप के प्रभाव से बलहीन है। क्या मैं तेरे समान के पारण पुर-भूमि छोड़कर आया हूँ, या मैं स्तुति और वंश- पारने वाले पूतों के पुल में उत्पन्न हा हूँ? ओ मीप पत्र द्वारा रिये दिया मुओं से प्रतिकार न मिस्त्रों से ॥३५॥ संराध तोटकं पति तल्लागाद] ॥३४॥ वीरगनाधिशेपेण [वारजननिन्दनेच्छया । नतु रे स्पर्धापामवर पदम नि 1 गर्मस्य गर्ने वा भारभूतः । रा नाम मूगरनी तस्याः । नामिति । {पुरोः परशुरामस्य शापभाषितस्य दगा३ संः पिन सोपविमान सगोमात्र रियाशिक्षा परसुरामाचान " 'विटा तस्म दमा। दतः राज्य शत्रिय नि तेन शतम् । भय .. विटा वती न मरतु मम एरनादिति परशुरामस्त समसदेव एका वेत्यर्ष । स्तुति च पीर [बिस्तीति । सिपापोतनम् । [पर पेन शुम्भासी बलि देन अितिक्रोमि प्रयोगविपरोमि। मम नेमन ॥३॥ - r ... .

पृयानुनु गाक्षी न्यममि रणभीरो छ नु तदा ॥३॥ TH.पूर मार्ग 041731 प्रमोरी । म १२६ वेणीसहारे कर्णः - (सशोधन) अरे रे याबाट पाशस्त्रग्रहणविराध बसे । निवीर्य वा सवीर्य वा मया नोत्सृटमायुधम् । यथा पाञ्चालभीतेन पित्रा ते बाहुशालिना ॥३६॥ अपिच सूतो वा मूतपुत्रो वा यो वा को वा भवाम्यहम् । दैवायत्तं कुले जन्म मदायत्तं तु पौरुपम ॥३७॥ अश्वत्थामा--(सनोधम्) अरे रे रयकारकुलाला रागागर्भमा आयुधानभिज, सातमप्यधिक्षिपसि । अथवा स भीरुः शूरो वा प्रथितभुजसारखिभुवने कृत यत्तेनाजी प्रतिदिनमिय वेत्ति बमुथा । परित्यक्त दास्त्र कथमिति स सत्यप्रतधरः मणः - (विदम्य) एष भोररहम् । स्वं पुनविपमंकर तिरमपुष । तिमी महामे सरायो जार' । अपि घरे मूर, परि दारामुग्मितमसपागयो न निधारयन्ति किमरोनुदायुधान् । पानेन मोनिदलनेऽप्युदामिनं मुधिर शिर्षय नापक्रम निधो ॥३६॥ finit! र एनम ॥१॥ FATERIrr: l minार । मंग।) भो Frent afrigh Rist Aru 4, ... : नीरस, १ am" IN - yout

के लड़के,
भुज शाली
रपकार के
कुल
फलफू, राधा के
तृतीयोऽद
१२७
कर्ण-(ब्रोध से) अरे रे यवादी, यर्थ ही शस्त्र धारण करने के
मिमानो, ब्राह्मण
चाहे दलहीन हो, या बलयान हो, मैंने पाहात में डरे हुए तेरे
ग्रा के समान शस्त्र-त्याग नहीं किया ॥३६॥
और भी,
मैं चाहे सारयि होऊ, चाहे सारथि-पुत्र होऊ या चाहे अन्य कोई होऊँ ।
सो कुल मे जन्म तो माग्य के अधीन है, मेरे अधीन तो पुरुषकार है ॥३७॥
अश्वत्यामा--(क्रोध से) अरे रे !
के
के भारमूत, अरे शास्त्रों के प्रयोग से अपरिचित, तू मेरे पिता पर भी
क्षेप कर रहा है । अयदा
वह डरपोक या या शूर था, लेकिन तीनों लोको मे प्रसिद्ध भुजबल वाता
। जो उसने प्रतिदिन युद्ध में किया है, उसे यह पृथ्वी जानती है; उसने
व क्यों छोड़ा, इसमें यह सत्यवादी पृथा का पुत्र साक्षी है। लेकिन, हे युद्ध
रिने वाले, तू उस समय कहाँ था ॥३॥
कर्ण-(जार से हंसकर) हो, मै ऐसा हो डरपोक हूँ। लेकिन तू एकमात्र
कम मे आनन्द लेने वाले अपने पिता को याद करके पया कर डालेगा,
। मुझे बड़ा सन्देह है । और भी, अरे मूर्य,
यदि शस्त्र छोड़ भी दिया था, तो क्या शस्त्र से रहित (खाली) हाय दाले
शस्त्र उठाये शत्रुओं को रोकते नहीं हैं, जो वह राज-समूह के समीप मे
हाल तक स्त्री के समान मौलि-दलन के प्रति उदास बैठा रहा ॥३॥
उक्त तत्र स [सत्यमेव व्रत सत्यत्रत तस्य धर पृथामूनु ] युधितिर
-
पक्षी ३०
यदोति [शस्त्रपाणयो न भवन्ति इति] अशपाणयस्त्यत्तास्त्रा । उदायुधातु-
शास्त्रान् । किन निवारयन्ति । किंतु निवारयन्त्येव । अदेन द्रोणेन । दलने
हने । उदासितमुदासीनीभूतम् । प्रियेदेति यथा स्त्रियोदास्यते इत्यर्थ । चक्र
परथाङ्गयोः इति विश्वः ॥३६॥

कषमपोति । तव शिरस्येप वामरचरणो वामपादो मया न्यस्यते इत्यन्वयः। १२८ नागरारे मनापामा -(rathi 111) रमन राजाम, प्राम्भ । मायामागि करामपि न निषियो दुःसिना भीरुणा या द्रपदतनयपाग्गिस्तेन पिपा ममाद्य । तव भुजबलदर्पाध्मायमानस्य वाम. गिरमि चरण एग न्यम्यते वारयनम् ।।४०) (इनि सपा पमृतिपुति) । अपर्पोयना - गुरुपुत्र, मय। (इति निवारयतः)। ( अश्वस्यामा परराबहार नाटयति ) कर्ण:- (मोधमुत्याप गड़गमात्य) अरे दुरात्मन्, वाचाल ब्रह्मा त्मश्लाय, जात्या काममवध्योऽसि चरणं त्विममुद्धृतम् । अनेन लूनं सड्गेन पतित द्रक्ष्यसि क्षितौ ।।४।। अश्वत्यामा - अरे मूड, कि नाम जात्या काममवध्योऽहम् । इयं सा जा क्ता। (इति यज्ञोपवीतं दिनत्ति । पुनश्च सक्रोधम्)। अद्य मिथ्याप्रतिज्ञोऽसौ किरीटी क्रियते मया । शस्त्रं गृहारण वा त्यक्त्वा मौलौ वा रचयाञ्जलिम ।।४५ योर्वतं तस्य दर्पस्तेन । आत्मायमानस्यामातस्य [न दक्षिण. पाणिन्द्रि पादः दीयते ॥४०॥ वाचाल बहुभाषक । महामन्यो अग्राह्यनामन् । बाह्मणाधम] ब्रह्मा निदेश्येऽपि निगद्यले इत्यमरः । ". । [भकामानुमतौ कामम इत्यमरः । आत्या ब्राह्मणस्पावध्यत्वाव ।। एष हि ब्रह्मवन्धूना दरच उठा से या फिर (शास्त्र) छोड़कर हाथ जोड़कर सिर पर रख ॥४२॥ - नाग्यास्ति दैहिकः॥ धरण लूनं सक्षिती। पतित ट्रायमीत्यन्वय । भारणोऽस्त्रियाम् इत्यमरः ॥४१॥ अति। अमूविद्यारं देष्टारं प्रवत्तार विकस्थनम् । भीमसेन नियोगात नाह परांमाहवे ॥ अर्जुनः प्रदिजानीते भीमस्य प्रियकाम्बया । पर मनु- करणे हन्तास्मि पत्रिभिः ।। इति सभापर्वणि मजनन पावधः प्रतिगाल:। रोपाह बर मयासो किरीटी] मिध्याप्रतिज्ञो [मिया असत्या प्रतिमा पब मरा दबातेन च तदरपारिति भावः। [स्परपा शस्त्रमिति तृतीयोऽङ्कः मिर अश्वत्थाना-(शोध कांपते हुए) दुष्ट, राजा के मुंह लगे, उच्छतल, घर सारयि, उटपटांग बकने वाले, आज मेरे पिता ने, दुषी ने या डरपोक ने, चाहे किसी भी कारण द्रुपद चा पुत्र के हाय को नहीं रोश। भुनाओं के बल के अभिमान से फूले हुए तेरे पर पह मेरा बाया चरण रक्खा जा रहा है, इसे रोक ले ॥४०॥ ( यह कहकर वैसा करने के लिए उठना है ) प और दुर्योधन-आचार्यपुत्र, क्षमा करो। (दोनो रोकते हैं)। ( अश्वत्थामा पाद से प्रहार का नाट्य करता है ) कर्ण-(कोष से उठकर और तलवार खीचकर) अरे दुष्ट, यस्वादो, नोच ह्मण, अपनी शेषी मारने वाले, कई यपि तू (ब्राह्मण) जाति के कारण वष्य नहीं है लेकिन तू उठे हुए इस पर को (मेरी) इस तलवार से कटने पर पृथ्वी पर पड़ा हुमा (अपने) -वेगा 1880 बरवस्थामा-मूखं, क्या कहा- 'मैं जाति के कारण अयध्य हूँ। ले, पनि योर दो।' (यह कहकर पज्ञोपवीत चाटता है और फिर क्रोध मे), आज मैं (तुझे मारकर) अर्जुन को असत्य-सन्म किये देता हूँ। या तो पह v.in उपेक्षिानामिति । अवजया (प्रलपत्वयं शुद्रो नास्माक कापि मातिरिवार लया।) चौरसत्यः सुभटपेक्षितानामित्यन्वयः। क्रोधान्यः कोपमूरिवार तानामगासिताना मरदानामेषा विश्त्यना भवति । अतोऽत्र मया नोपेक्षा निष्पेषो यन्त्रणं [तेन सुसभ सुप्रापम् । अवसानं विनाशम् । आमा artrint ( उपायोन्यं righो कम दुर्यो:-गणे, मावार, शाहनामम। rr:-ग. प्र. शासनापप। मान, मान, irroraf गतिमान प्रमालगो नर पण. - राजा, मपाई निशानियः । उपेक्षितानां मन्दानां धीग्मत्वंरवाया। प्रवासिताना क्रोधान्धर्भवत्येपा विरुत्थना ।।४३ अरवरयामा-रामन, पुग्ध पुञ्चनम् । माताप मनात गुलभमननामशान । मामा, रामम्, नेहेन कार्येण वा त्वमेनं ठान पकारिणं दुरारमान मत्तः परिवभिनुमिसि तदुमयमपि परम पापप्रियस्तव कथं गुणिनः सहायः सूतान्वयः शराघरान्वयसंभवस्य । हन्ता किरीटिनमहं नृप मुन्न कुर्या क्रोधादकर्णमपृथात्मजमद्य लोकम ।।४।। (इति प्रहर्तुमिच्छति) कर्ण:-(खड्गमुद्यम्य) अरे वाचाट मायणायम, अयं न भवति । मुच मुन्न । न खल्वहं वारयितव्यः। (हन्तुमिच्छति)। ( दुर्योधनकृषी निवारयतः) [तातस्य निन्दायां प्रगल्भः । भावः । अत्रासितानां गेहवासिनाम् ॥४॥ मत्सकाशादा . तृतीयोऽङ्कः ( दोनों तलवार खींचकर एक दूसरे पर प्रहार करने को उद्यन होते हैं । कृप और दुर्योधन रोकते हैं ) दुर्योधन-मित्र, आचार्यपुत्र, शस्त्र-ग्रहण रहने दीजिये। प-पुत्र, सूतपुत्र, शस्त्र-ग्रहण रहने दीजिये। अश्वत्यामा-मातुल, मातुल, आप क्यों रोकते हैं ? पिता को निन्दा करने यह अधम सूत भी पृष्टद्युम्न का पक्षपाती हो है। F-राजन्, मुझे न रोकिये। विचालो हृदय वाले पुरुषों द्वारा तिरस्कार-भाव से उपेक्षा किये गये को कोष से अभिभूत हुए पुरुषों द्वारा भयभीत न किये जाने पर ऐसी हो लाधा (शेंग) हा करती है ॥४३॥ श्वत्यामा-राजन्, छोड़ दीजिये, इसे छोड़ दीजिये। यह मेरी भुजाओं [ में कुचले जाने से सुलभ प्राण-नाश प्राप्त करले। और राजन, स्नेह के प्रयदा प्रयोजन के कारण जो आप पिता के निन्दक इस दुष्ट को मुझसे रना चाहते हैं, यह दोनों ही व्यर्थ हैं। को और चन्द्र वंश में उत्पन्न हुए आपका पाप से प्रेम करने वाला और कुल में उत्पन्न यह कैसे सहायक हो सकता है ? अर्जुन को मैं मार । हे राजा, छोड़ दो। कोय के कारण मैं याज संसार को कर्ण और पुत्र (अर्जुन) से रहित कर दूंगा ॥४४॥ ( यह कहकर प्रहार करना चाहता है ) i-(तलवार उठाता है) अरे यकवादी, नौच ब्राह्मण, (अब) यह तू । राजन, छोड़ो, छोड़ो। मुझे न रोको । (मारना चाहता है)। (दुर्योधन और कृप रोकते हैं) प्रिय इति । अयं पापम्तव कयं सखेत्यन्वयः। कोशः । प्रियः प्रिया : । अन्वयो वंशः । अहं किरीटिनं हन्ता हनिप्यामि । ततो हे नृप मा अहं लोकं कपरहितमर्जुनरहितं च कुर्या करिष्ये ॥४४॥ । . T - 4 मा.मानिया मियमय मागे दपं. शातयितुम् । । ? अरवरयामा-ननु रे, अपरिरयत्तमपि भवाइसरायु चिरपश्यितो सावि मामा स्वालपान गेनपतिः कः। अग्य नामि। अपमिनिपार (मिम ममा विवाहानग्य लग पार anfam: गगम मुमति बारे सम्म) Art वेणीसंहारे दुर्योधनः-कर्ण, गुरुपुत्र, कोऽयमद्य युवयो-मोहः । कृपः-वत्स, अन्यदेव प्रस्तुतमन्यावेग इति कोऽयं ध्यामोहः । स्वर चेदमस्मिन्काले राजकुलस्यास्य युग्मत्त एव भवतीति वामः पन्याः । अश्वत्थामा-मातुल, न सम्यतेऽस्य यदुपलापिनो स्यकारहतार कृपः-वत्स, अकालः खलु स्वबलप्रधानविरोधस्य । अश्वत्थामा-मातुल, यद्येवम्, अयं पापो यावन्न निधनमुपेयादरिदारः परित्यक्त तावत्प्रियमपि मयास्त्रं रणमुखे चलानां नाथेस्मिन्परिकुपितभीमार्जुनभये समुत्पन्ने राजा प्रियसखवलं वेत्तु समरे ॥४५॥ (इति सद्गमुरमृजति)। कर्ण:-(विहाय) कुमक्रमागतमेवैतद्भपायो यमपरित्यागो नाम ।। निफ्लावात् । कर्ण:-भरे मूर घृतायुधो यायदहं तावदन्यः किमायुधः । पहा न सिद्धमस्प्रेण मम तत्केन सेत्स्यति ।।४६।। भामोहो मनिधिमः । यतध्यापनश्यवित्रशून्यतेत्ययः । अण्ण परिमारिणम् । यताविनागमोद भागः साग्रहा माता भान पामा अनीतिमार्गावक्षणम् । अगमोडकारितपः । पारः सार । । साम्मे निगरमटी मना न भ. fro । मार) हो गया है। (प्रयोजन)? भयवा, जो (कार्य) मेरे शस्त्र से सिद्ध नहीं हुमा, वह और किस तृतीयोऽङ्क दुर्योधन-वर्ण, आचार्यपुत्र, तुम दोनों को आज यह क्या पागलपन ६. कृप-पुत्र, प्रस्तुत कुछ अन्य था, और यह आवेश किसी अन्य पर है। बियह कंसा मति-विभ्रम है। और ऐसे समय पर इस राजवंश की अपनी शक्ति माक्षप तुम से ही हो रहा है, यह कैसा उल्टा मार्ग है । अश्वत्थामा-मातुल, तो इस फटु प्रलाप करने वाले सारथि-कुल के लिडू के अभिमान को शिथिल करने का अवसर नहीं मिलेगा। कृप---वत्स, अब अपनी सेना के प्रधान का विरोध करने का अवसर जब तक यह पापी (कर्ण) राय के बाणों से मृत्यु को प्राप्त न हो जायेगा, । तब तक मैंने युद्ध मूमि में प्रिय होते हुए भी शस्त्र का परित्याग कर दिया। इसके सेनापति हो जाने पर क्रुद्ध हुए भीम और अर्जुन से भय उत्पन्न होने पर राजा अपने प्रिय मित्र के बल को जान लेगा ॥४॥ ( यह कहकर तलवार छोड देता है ) कर्ण-जोर से हंसकर) शस्त्र त्याग तो आप जैसों के लिये कुल को अश्वत्यामा-अरे, आप जैसों द्वारा न छोड़ने पर भी निष्फल होने के नब तक मैंने आयुष धारण किया हुआ है, तब तक अन्य आयुधों से श्या नहीं है। अश्वत्यामा-यदि ऐसा है तो- । M परम्परा से प्राप्त है। गरण अत्र छोड़ा हमा ही है। कर्ण-अरे मूर्ख से सिद्ध होगा ॥४॥ त्पादिना तायुध...इत्यन्तेनान्योन्य वर्णाश्वत्थाम्नोः सरन्धवचसा सेनाभेद परिणा पाण्डवविजयप्राप्त्याशान्वितं तोटकमिति दशरूपकम् । संरब्धं सोटक चइति तल्लभम् ॥४६॥ पणमेव महापातकमस्य विद्यते वर्षणेन वा महापातकी। सौपती भेदः (शकुनिः)।

मावरयामा--(सोयामम्) मगरात, रोकारने, सामान्यमिय हासिन, भुजबसपरिरक्षितसतसोका (धनायुधः इति पटिया) Ka कर्ण:-आ: हात्तिवृकोदरस्य मपि जीवतिमासनस्य सागर अश्वत्यामा-राजन्कौरवनाय, अभीष्मद्रोणं संप्रनि कौरववतमालोनी भीमार्जुनो राषेयेन विनान्येन वा नराश्येते निवारयितुम् । अतःसले दुर्योधनः-आः शक्तिरस्ति दुरात्मनः पवनतनयस्यान्यस्य वामपि जीबी शस्त्रपाणी वत्सस्य छायामप्यामितुम् ।विस, न तव्यं ममेनव्यमा स्पृष्टेति । यासवो मद्यम् । भुजपअरे वाहमध्ये। क्यं करवाया कच्यादिपाठान्मनुष्यतत्स्थयोरिति धुप्रसक्तः । अत्रामनुष्यत्वेन विवक्षला समनास्मितम् इत्यमरः । वाई निश्चितम् । मालोर, (ो) मा TaimuriTHAmfer for कागारमपुरमा शुrnो, कोरोनमने। अपि । भो रापंपरीवनमौजगभर गाiिfTRAITI मारा, स्पृष्टा येन गिरोह नूपगुना पामालराजात्मजा येनास्याः परिधानमप्यपहत रोमां गुरूणां पुरः । यस्यार स्थलगोगितामवमहं पातुं प्रतिभातवा- मोज्यं मदमुजपम्नो निपनितः संरक्ष्यतां कौरवः ॥: (गवं प्राकयन्ति) तरमेव संवृत्तम् । रक्षनं सांप्रतं भीमाद दुशासनम् । अमितुम् । युवराव, न नैतप्यं न भेतव्यम् । अपमहमागतोऽस्मि । निष्क्रान्तः)। भ्रातुःप्रतीकारपरो भव। कोत्र मोः। रयमुपनय । (इति नितान्तः) । तस्पेदम् इत्यम् । जनपदविवक्षायां वाण ॥४७॥ , तृतीयोग्य (नेपथ्य में) ओ दुष्ट, द्रौपदी के केश और वस्त्र खींचने का महापातक करने वाले, भयम एतराष्ट्र के पुत्र, आज बहुत समय बाद मेरे सामने आया है। ऐ नीच पशु, अब कहाँ जायेगा? और भी, हे राघापुत्र (कणं). दुर्योधन और सौबत शनि) आदि मानी, धनुर्धारी, पाण्डवों के शवओं, आप सब लोग सुनें- जिस नरपशु ने पा-चाल के राजा की पुत्री के केश छुए थे; जिसने गाओं और बड़े जनों के सामने इसके वस्त्रों को खोंचा था; मैने जिसके स्पिल के हषिर रूपी आसव के पान की प्रतिमा की थी, मेरी भुजाओं के एंजरे में पाइए उस इस कौरव की रक्षा करो ॥४७॥ ( सब सुनते हैं) अश्वत्थामा-(व्यङ्ग्य के साथ) अङ्गराज, सेनापति, परशुराम के शिष्य, ण का उपहास करने वाले, अपने वाहदल मे सकस संसार की रक्षा करने वाले, नायुधः इत्यादि ३।४६ श्लोक का पाठ करके) यह तो बहुत जल्दी हो हो या । अब भीम से इस दुःशासन की रक्षा करो। रुण-आह ! मेरे जीवित रहते भीम को क्या शक्ति है कि वह दुःशासन छाया भी इसके । युवराज, हरो नहीं, डरो महीं। में पह माया। (यह हार निषन जाता है)। भरपरपामा-रान, कौरवनाप, अब भीम औरण से होन गैरव. नाको मयते हुए मोम और अर्जुन को कणं अथवा ऐसा हो कोई अन्य महो किसका है। इसलिये माप स्वयं ही भाई के (मप) निवारण उपाय पुर्पोधन-माह हाप में पत्र लिये मेरे जोषित एवं भीम पाfreी यकीया तिकिपरस को डाया का भी मतिक्रमण सके। परम, सेमही, महो। मरे, यहाँ कौन है? र सानो। (यह बहार निकम मनन । मापापम् । समार मई पिपरे गोर पारामि ।

स्नपितः स एव बोभरमो वेपो यस्य तप्य वृकोदरस्य दांनाच
एपष्टिकाममूरस्ताव मात्रा वितस्य न बाल धोर
चतुर्थोऽङ्कः
(ततः प्रविशति प्रहारमूच्छितं रथस्थं दुर्योधनमाहरन् मृद)
(सूतः ससंभ्रमं परिकामति)
( नेपथ्ये)
मो मोः बाहुबलावलेपप्रवतितमहासमरदोहदाः, कौरवपक्षमता
द्रविणसंचया नरपतयः, संस्तभ्यता संस्तभ्यन्ता निहतदुःशासनपीतार्थ
स्तपितबोमरसवेषवृकोदरदर्शनमयपरिस्खलत्प्रहरणानि रणावन्ति
सतः-(विलोक्य) कथमेष धवलचपरलामरचुम्बितकनकम्माइलुन
वववंजयन्तीमूचितेन हतगजवाजिनरकलेवरसहस्रसमदंविषमोदयात!
किमोनालमालिना रथेन शरवर्षस्तम्मितपरबलपराक्रमप्रसरः प्रचुर
भावासयकृपः किरीटिनाभियुक्तमगरागमनुसरति । हात जातमरम
बलम्बनम्।
(नेपथ्ये कसरलानन्तरम्)
भो भोः अस्मदर्शनमयस्वलितकार्मुककृपाणतोमरशक्तपः कौरव
पागापापानिनरव योषाः, म मैतम्य में भेतव्यम् । अपमहं निहा
मानेपः स्मृतो गर्ने इति विश्वः । बोहदो दोहर इति प्रसिदः,
मागमरमेप बोहतो पेवाम ।] प्राणा द्रविणमिति कासम् !!
प्रारमिंचयो यः । सस्तम्यरतो स्थिक्रियन्ताम् । [पीनावशेष
परिएपनि प्रहरणानि येतानि । दोमरसो भयानकः । प्रहरण
पर्व पर । नुम्बितः संसः । शिवरमपम् । बंजयन्ती पनाग
शरीरमशाना सामान तामाः निविधान संपट्टी
पः गोभिचालयः भोभान : कसलो याम ।
हलहानपणः । तोमरः । निता
।
+

चतुर्थ अङ्क (नाश्चात् प्रहार से मूच्छिन और रय मे स्थित दुर्योधन क । डाता हुआ सारपि प्रवेश करता है) ( मारपि घबराहट के साथ घूमता है ) (नेपथ्य मे) (जाल के वर्ष से महासमर की अभिलाषा करने वाले, कोर के कारण प्राणरूपी धनराशि को दांव पर लगाने वाले रण-क्षेत्र से भागती हुई सेनाओं को, जिनके शस्त्र मारे गये से बचे रघिर में स्नान करने से बीभत्स देष वाले मीम- गरण गिर रहे हैं, रोको, रोको। भूत-(देखकर) कसे ! स्वेत घञ्चल धामर से चुम्बित स्वर्ण-कर पर लगी प्वमा से पहचाने गये और मरे हुए सहनों हायि [ मनुष्यों के शरीरों को भौड़ से ऊंची नौची भूमि पर प्रतियात स्वनि करने वाले छोटे २ धानों के समूह को माला वा प, बाणों को वर्षा से राध-सेना के पराक्रम को गति को रोक । माती हुई सेना को सान्त्वना देते हुए कृपाचार्य अर्जुन द्वारा गये कर्ण की ओर जा रहे हैं । आहा ! (अब) हमारी सेनाओं के या। . (नेपथ्य मे कलकल पनि के पश्चात् ) में देशभर मय से गिरेहए धनुष, तलवार तोमर और शक्ति सेना के पौरों और पाणयों के पक्षपाती पोशाओं, रो नहीं, रेडमासन के पौन पदापस का पिर स्पो आसव पौने वरपुर,स्वसं नस्य यत्सत रक्तं तदेवा स बस्तस्य पानेन यो पोरं मागलम् । [भतः बेगान गन्तं सील पस्प म जो शिनिस्तापछील्ये पनि यिनिः । स्तोकमरिः ।

गः- मभयम) भये प्रागन एदुरामा कोबरागमा करजानि नपानि तैः क्षुषणात्। वक्षसो हृदयात् । अमृद मया पीनमिस्बा [वायु.] तेन संवाहितापचालिताः सान्द्राः किसलया परयो si Tranh tĩnfr} it in a hot पहरामिपिन्दनमामि दुशमन वाग्मिनयमनापानामा (चन्तित परिसदार) अये अमममो सरसोरोदिप पन्त शीतलमारिएषमंवाहितसादपिमरायो । पोपरापः। सविता विधा समरस्यारारधिनस्य धीरजनस्म। अत्र स्थितरदायाधिरताडनेर हरिवन मागीलेनाप्रयत्नमुरभिमा दशातरिणामयोग्येन सरमौतनोरनामुना न भविष्यति महाराजः । सूननुभायं त्यो.निवारित एवं प्रदेशमति (इति प्रवेश गयित्वा) : कोन मोः। (ममलादवलोक्य) ar परिजनः।- वनं नचायिधस्य वृकोदरस्य दर्शनादेवंविषस्य च स्वासिता राज इति। [मिषतः पश्यतः। मृयतः महिशोः। कोशमीक्षा कोष्णं कबोष्ण मन्दोषणम् इत्यमर.। तस्य दुःशासनस्य । कराटे मारुतः प्रभजन: 1 मारतिर्भामः । सरसी सरः तस्याः सरोमानांगमन बिलोलनं विलोडनं परिमलनमित्यर्थः । तेन सुरभिश्चासौ बीस 100 aasant rur interes गगनो मानधनाग कामगा दुर्योधनम्यारा. प्रत्यक्ष वामनग मिन: कांस्य शल्पा । पीन नम्य मगाय पाययोगाम्बराापितः कोण जीयन एव नोकराणादगृग्वासः ॥१॥ सातगातो मा ITRADITATE IN महाराः। प्राय यस्य । पृथायाः पुत्रा: पायास्तेषु मध्यमः । । करजो नमः ॥१॥ (कौरवराजस्य पुत्राः कौरवाश्च ते राजपुत्रा वा त एव नहावन स्तु १४१ सा, रेगपूर्ण गति वाला, थोड़ी ही दोष यो प्रतिज्ञा रूपी मोरव पाला, औरयों के राजा का जुए में सोना हुना दास, पृथा के पुत्रों में मसला, मैं भीमसेन आर सब लोगों को साक्षी करता हूँ। सुनिये- मान को ही धन समतने वाले, धनुरी रामा दुर्योधन के गामने, कुरुओं के मित्रों की उपस्थिति में और कर्ण तथा शरप के देखते देखने, आज मैने पाण्डवों को ययू के केश एवं वस्त्रों को खींचने याने, उस जीवित ही - (दुःशान1) के पंने नलों से विदीर्ण दक्षःस्थल से गर, रविर या पान किया - - सूत-(सुनार भय से) अरे । कौरव राजनारो रूपी महान् धन के -निये उत्पात-वापु दुष्ट भीम (मरत् का पुत्र) समीप ही है और यहाँ अभी - महाराज को चेतना नहीं लौटी है। अच्छा, रथ को बढ़त दूर में जाता हूँ। - कमी वह दुष्ट दुशासन के समान इनके साथ मी दुष्काय करे । (और तेजी से = धूमकर और देवकर) करे ! यहाँ (सामने) यह जलाशय के कमलों को छूने से सुगन्धित और शीतल वायु द्वारा हिताये जाते हुए घने पाहदों पाला पट. पृक्ष है। यह युद्ध-कर्म से श्रान्त दीर पुरुष के योग्य विश्राम स्थान है । इस जलाशय के यात्रु से, जो बिना मांगे (भाप्त) पंखे के समान है, तो लाल चन्दन से राशि के समान शीतल है, जो बिना प्रसार के ही गुगन्धित है और नो वर्तमान दशा मे उचित है, यहां स्थित महाराज श्रम-विहीर हो जायेंगे। पटी हुई ध्वजा वाला यह रथ बाधा के बिना ही छाया में चला जायेगा। (प्रवेश का नाट्य करके) भरे ! यहां कोई है ? (चारो ओर देवकर) यहाँ सोई सेवक क्यों नहीं है ? अवरस हो, उस प्रकार (रधिर में लिपटे) भीम को और इस प्रकार (मूछित) महाराज को देखकर भय के कारण पड़ाव में हो बहुपदरः इत्यमरः । अयाचिततालवन्तं स्वयमुपस्थितव्यजनम् । हरिचन्दनं चन्दनभेदः । [तस्य ,छटावच्छोतलेन । दशा मूर्छावस्था तस्याः परिणामः नरिवनः । निवर्तनमिति यावत् । तस्य योग्येन । परिणामो विपाकः । अनि- आरितः । अनिबद्धः । प्रवेश्यति प्रवेशं करिष्यति। छमियादानीयतामिति ------ - नेपः।

पिजीवति दुर्योधने प्रतिक्षा पूरपितुम् । यस दुशासन, ग भेलयन कारण उपमहमागतोऽस्मि । ननु भूत, प्रापय र समेवोहरा पर वरसोमेशामा। ममेनेन प्रतिमा पूपिरका कर्म कृतमित्यन्वयः। समरे भरीण सागर रातिापार्याध्य दशगि दोगन सिग्घुरानो न रशित इस्पनर । पाम् [ी प्रतिमा मधुमित्र पूरपिस्या कृपलविमुख र सा Bापितम् । वप्पुमो गुमति लापीमिवेत्यर्थः । एमावrti प्रमुग मादरम्यं । पिसारमति गरियनीति भारःनिए १४२ वेणीसंहारे शिबिरसंन्देिशमेव प्रविष्टः । कष्टं मोः कष्टम् । दत्त्वा द्रोणेन पार्थादभयमपि न संरक्षितः सिन्धुराज. क्रूरं दुःशासनेऽस्मिन्हरिण इव कृतं भीमसेनेन कर्म । दुःसाध्यामप्यरीणां लघुमिव समरे पूरयित्वा प्रतिज्ञां नाहं मन्ये सकामं कुरुकुलविमुखं देवमेतावतापि ॥२॥ (राजानवमलोक्य) कयमद्यापि न चेतना लमते महाराजः । भोः । (नि.श्वस्य)। मदकलितकरेणुभज्यमाने विपिन इव प्रकटकशालशेषे । हतसकलकुमारके कुलेऽस्मिस्त्वमपि विधेरवलोकितः पटाक्षे ननु भो हतविषे, भरतकुलविमुख । अक्षतस्य गदापाणेरनारूढस्य संशयम । एपापि भीमसेनस्य प्रतिज्ञा पूर्यते त्वया ॥४॥ दुर्योधनः-शन रुपलब्धसशः) आः शक्तिररित दुरात्मनो कोहन मृतः- आपुष्मन् मझगाः संप्रति बाहारते रयमुडोम । (गर गार मन्ये पनपः।) नापिय कमांनिशी कृतमित्यर्थः । लाम - कामना गकाम पूर्ण मनोरयं देव नाई मग्य इस्पर्व. ॥२॥ गोवि। मांग मनमा निता मरः बरेली निभाया। जोरा

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१४३
चतुर्थो
बले गये है । ओह ! बड़े दल की बात है ।
अर्जुन से अभय देकर द्रोण सिन्धु-राज (जयद्रप) को रक्षा न कर सका;
भीमसेन ने इस दुःशासन के प्रति हरिण के समान कर कर्म किया। मैं समझता
कि कुछ-कुल का प्रतिकूल दुर्दैव युद्ध में शत्रुओं को असाध्य प्रतिज्ञा को भी
शुद्र के समान पूरी करा कर अभी इतने से सन्तुष्ट नहीं हुआ है ॥२॥
7 (राजा को देखकर) कैसे अब भो महाराज होरा में नहीं पा रहे हैं ?
शोह ! दुःख है । (गहरा सांस लेकर)
उस वन के समान, जो मदयुक्त हायो से तोड़ा जा रहा है और जिसमें
केवल एक बचा हुआ साल का पेड़ ही दीख पड़ रहा है, इस कुल मे, जिसके
सब कुमार मार दिये गये हैं, तुझे भी देव की तिरछी हष्टि ने देख लिया
है।॥३॥
हे मरत कुल से पराङ्मुख, अधम भाग्य,
विना घायल हुए और विना संशय में पड़े हुए हो, गदाधारी भीममेन को
यह प्रतिज्ञा मी तुम्हारे द्वारा पूरी की जा रही है ॥४॥
दुर्योधन-(धोरे धीरे चेतना प्राप्त करके) आह ! मुझ दुर्योधन के जोषित
हो दुष्ट मोगसेन में पया शक्ति है ? यस दुःशासन, न पुरो, नरो। मैं
हमा पहुँचा। सारपि, मेरे रथ को उस ही जगह ले चलो, नहाँ मेरा बरस
-
शासन है।
सूत-आयुष्मन्, अब घोड़े आपके रप का दहन करने में असमर्थ है।
एक ओर पो होकर) और मनोरथ का भी।
स्फुटः एकः शालः शतमात्रं वा शेषोऽवशेषो या तस्मिन् ।
लः घाइतमतः इति विश्व । अनोहः दुरः शाल. त्यमरः । हे
अक्षतस्येति । [सरायं दुर्योधनस्य गदायुस्न पुण्यालदारिदात्मनः परायः
दिति पानाम्] अनाहदाय अगतस्य ।।४।।
स्वरं मन्द पपा स्यादेवं । बाहोवः । वाप्रिवाहाजगन्धर्व इस्पाटमः ।
सलमपि ॥३॥

सूतः-(सकरुण पादयोनिपत्य) एतद्विज्ञापयामि। आयुष्मन् संनि पाण्डव, हा विक्रमकरस, हा मद्धललित, हा अरातिलगजानु दुर्योचनः-(सहसा भूमी पतत्) हा वत्स दुःशासन, हा मानाशिोधि- मनोरथ च। मनोरथमप्युद्वोदुमामा इति शेषः । [सातं माभिधाम । भरातीनां विपदों नरन्तयगावस्थान तेन संघट्टो यस्य तथा संचरित बोनसम्म). भावनायाम् । क्रोधस्ते नास्ति। फरणापि न । लजामिनायवर वालस्वेति [प्रकृतिदुललितस्य स्वभावचपलस्प] पाप नाशरूपम् । मार करणापि नेत्यत्र नकारस्वावृत्तिः । यता क्रोधो न नापि कहा इति पाउ: 10 148 थेशीमहारे दुर्योधनः- (रयायती गगवं गार्न दामनमानानगर परः-(गगst गणप) मपंपामपायुमा । वोधनः-यिक गत हि रन । अयामरानिधिमई संपरांवारी दुर्योग- प्रत्यय । तामात्रमहायः समरभुश्मयतामि। सूत -मायुधमा एयमेन । का संदेहः ? दुर्योधनः-पोषं रिमेवं भाषने । पश्य- वालस्य मे प्रकृतिदुर्ललितस्य पापः पाप व्यवस्यति ममक्षमुदायुधोऽनी । अस्मिन्निवारयसि कि व्यवसायिनं मां क्रोधो न नाम करणा न च तेऽस्ति लज्जा ॥५॥ निवृत्तेन भारतमिदानी दुरात्मना वृतोदरहतकेन । अत एवं प्रवीति । हा युवराज कासि । प्रयच्छ मे प्रतिवचनम (इति नि.श्वस्य मोहमुपगन } सूतः-राजन, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । दुर्योयनः-(सज्ञा लब्ध्दा निःश्वस्य) मुक्तो यथेष्टमुपभोगसुखेपु नैव त्वं लालितोऽपि हि मया न वृथाग्रजेन । , सरातीनां कुतं समूह एव गमघटा तस्याः सिंहः । - - "-Km चतुर्थोऽङ्कः १४५ दुर्योधन--(रथ से उतरकर गर्व और व्यङ्ग्य के साथ) रय में चल कर मय नष्ट करने की आवश्यकता नहीं है । सून-(लज्जा और करुणा से) क्षमा कीजिये, आयुष्मान्, क्षमा कीजिये । दुर्योधन- ओह ! सूत, रय से क्या होगा? मैं केवल दवाओं की भीड़ से किराकर चलने वाला दुर्योधन हूँ। इसलिये केवलमात्र गदा साय लेकर युद्ध- भूमि में उतरता हूँ। सत-आयुष्मन्, ऐसा ही है । इसमें क्या सन्देह है ? दुर्योधन-यदि ऐसा है तो फिर इस तरह क्यों कह रहे हो ? देखो- - आयुष उठाये वह पापी (भीमसेन) सामने स्वभाव से हठो मेरे वत्स पर कर्म करने का प्रयत्न पर रहा है, (तब) इस विषय में व्यबसाप (प्रयत्न) करने वाले मुझे तुम क्यों रोक रहे हो? तुम्हें व्रोध, करुणा और लजा नहीं आती? ॥५॥ मूत-(करुणापूर्वक पैरों मे पड़कर) आयुष्मन्, मेरा यह निवेदन है कि ह दुष्ट, नोच भीमसेन प्रतिज्ञा पूर्ण करके निवृत्त हो चुका होगा। इसीलिये दुर्गायन - वेिग से भूमि पर गिरते हुए) हाय, वत्स दुःशासन ! हाय, मेरी जा से पाण्डयों को विरुद्ध करने वाले ! हाय, पराक्रम में एकमात्र आनन्द ने याले ! हाय, मेरे अड के आम्ही 1 हाय, शत्रु-समूह रूप हायियों के मुंड लिये सिंह समान ! हाय, पुवराज ! तुम कहाँ हो ? मुझे प्रत्युत्तर दो हरहार लम्बा सास लेकर मूच्छित हो जाता है) । मृत-राजन, पंर्य रखिये, पर्य रखिये। दुर्योधन--(चेतना पाकर और गहरा सास लेकर)। प्पर्य हो बड़े भाई (बने हुए) मैने न तो ( तुम्हें ) ययेर। भोग के सुखों मे छोड़ा, और न ही ( तुम्हें एग्छ ) परन्तु, हे वत्स, मैं तुम्हारी इस विपति शरण मुक्त इति । मुक्तो योजितः। हिरवधारणे । मया नव स्वं न सानितो मि नीतः । कोहदोन मया । वृथा [निप्पल लालनादिकाररसाद किया।

रक्षणोपेनेति । रक्षणोयेन रक्षपाहेण । दुःशासनेनोरहारेण [.सामना हेनुरहं विपत्ते- । [महारथानां महारथकृतः। मर्मारिए भेत्तु शीलं येषां तः मर्ममेरिधि सस्पंदेति [मद यस्मात् में अनुज देप्टीति अनुजदि ताय । पा गीमंडारे अस्यास्तु यन्म तय यंन्यारितोस्यविनयं न च रक्षितोमि ॥६॥ (इति पनगि) मतः-जापुमा, समायतिहि समागिहि । दुर्योधनः- विमल, पिमाधिन भवता । रक्षरणीयेन मततं वालेनानानुवतिना । दुःशासनेन भ्रात्राहमुपहारेण रक्षितः ॥७॥ सूतः-महाराज, मर्मभेदिभिरिपुतोमरशक्तिपासवर्षर्महारपानामा स्वाग्निरचेष्टः कृतो महाराज इत्यपहृतो मया रयः । दुर्योधनः-सूत, विरूपं तवानसि । तस्यैव पाण्डवपशोरनुजद्विषो मे क्षोदैर्गदाशनिकृतनं वियोधितोऽस्मि । तामेव नाधिशयितो रुधिराशय्यां दौःशासनी यदहमाशु वृकोदरो वा ||८|| (निःश्वस्य नभो विलोक्य) ननु भो हतविधं कृपानिरहित भरतकुनि अपि नाम भवेन्मृत्युनं च हन्ता वृकोदरः । सूतः-शान्तं पापं शान्तं पापम् । महाराज, किमिदम् । दुर्योधनः- जायतेऽसौ तेन] पृषानजेन निष्फलज्येष्ठेन । [पद्यस्मारकारणाद] ॥६॥ पदादानेनेत्यर्थः ।। रक्षितस्त्वयेति शेपः ॥७॥ पपुतोमराविनः । निरचेष्टः प्रतीकारक्षम इत्यर्थः । विरूपमयोग्यम् ।

१४७ रतुपर्णाः नया, मैंने तुमरी मर्याय-हीन माधरण तो कराया, पर तुम्हारो धानों को ॥६॥ (यह रहार पिर गिर पर)। 5-मायुप्मन, पं रपिये, पं रखिये। योधन - मून, मिहार है। आपने बरा कर दिया। रमा रिभाने योग्य, हमेशा भाना-पासक बालरू, भाई शासन को लि देर (में) घाया II -महाराज, महारथियों की मर्म-भेदी याण, तोमर, दशक्ति और मातों ही वर्षा ने माराम को घेतना अपहरण करके निरयेट कर दिया पा, इसलिये . रिपो दर से भाया। पुर्बोधन-सूत, तुमने अनुचित रिया- कि मैं मेरे छोटे भाई के उस पशु-तुल्य पाण्डव की गदा ती यश रा किये गये महारों से म अगाया गया; अयथा, जो मै या भीम -फानन की उस हो पिर से गौसीताम्या पर नहीं सोपा ॥ (लम्बा सांस लेकर आकाश की ओर देमार) मो निदंय, भरत-कुल- मुख, दुर्भाग्य, क्या यह सम्भव है कि (अय) मेरो मृत्यु हो जाय, परन्तु मारने वाला दर (भीम) न हो। सन-पाप शान्त हो, पाप शान्त हो । महाराज, यह क्या ? दुर्गापन- चनकमवासारिख पाण्डवपशुः तस्य गदा एव अशनिः वचं गदाशनिस्तेन - शोपेपणं: प्रहाररिति यावत् । वियोपितोऽस्मि प्रत्याहृतचेतनोऽस्मि । बासनी दुगासनमवन्धिनीम् । तामेव शम्या नापिशयितोऽहं तत्रव न शयित.। चोइस्यामा कर्म इत्यापारे वमं । वृकोदरो वा नाधिशायितस्तामेव शय्याम् । माविरूप कृतवानसौति पूर्वेण सम्बन्धः] 11८! अपि नामेति । नाम संभावनायाम् । मृत्युरपि मे भवेन च तृकोदरो हन्ना पुरमा रागोपनो मति (निमय) म सोषि मन्त्रयते। प्रश्तु। पदपरिकराणा पुष्पाणा समूहो रयते । अत्र गरवा प्रश्यामि (परिजन । तन्न सल्वेते जानन्ति । भवतु विचेप्यामि । (अप्रतोऽवलोक्य विचित्परितम्य) इमे खात्यपरे प्रवक्ता वीरमनुप्या हस्यन्ते । तवा गदवा प्रक्ष्यामि । (उपगम्य) हो जाम कस्मिन्नुद्देशे कुरुनायो वर्तत इति । (हशा) कय मैतेपि मा प्रचारिण] रुदन्ति । सप्त खल्येतेऽपि जानन्ति । हा अतिकणं खल्वत्र वर्तते । एषामोरे) माता समरविनिहतं पुत्रक धुरवा रक्तांशुकमिवसनया समप्रभूपया। सहानुनियते । (समाधम्) साधु, वीरमाता, सायु। अन्यस्मिन्नति माना अनिहतपुत्रका भविष्यसि । भवतु । अग्यतो विदेष्यामि।। (अन्यतो दिनोग अयमपरो बहप्रहारनिहतकारोऽकृतवणवन्ध एव योधसमूह इमं न्यासनं तुम अग्यतो गत्वा प्रक्ष्यामि। (सर्वतो विलोक्य - भवेदिति प्रार्थनाया लिइ । [मरणं ममेष्टं किंतु न वृकोदरहता अणेषु क्षनेपु बद्धा या पट्टिका पाटो इति प्रसिद्धा तयालंकृतकाय. अपि नामेति प्रश्ने । अस्मिन्नुद्देशे प्रदेश दृष्टो न हि था। कथं वाप्रपाधि सदन्ति । तन्नबल्वेतेऽपि जानन्ति । भवतु । अन्यतो गत्वा प्रण्याशिएक बपरिमण्डलानां पुष्पाणां समूहो दृश्यते भवतु । अत्र गत्वा पूरक्षारित कयमेते मनु स्वामिनो गाउपहारहतस्य घनसमाहमालदुर्गाघमुखः [१ संनाहः कवपस्तस्य जालं तेन दुभ मुषं येषां तैः करवानः पास्वविदो ते बहुतराः संमिलिता धीरमनुध्या दृश्यन्ते । हाहा अतिकरणं खन्या वपमेषा वीरमाता समरविनिहतं पुत्रं प्रेक्ष्य रक्तांगुरयुगनेपथ्यया सर्वाना १५८ देवीमहारे पातितापबन्धो कि राज्येन जयेन वा (ततः प्रविशति परप्रहारप्रणवपट्टिानानायः सुन्दरकः) गुग्दरकः - भार्या, अपि मामास्मिनुरी सारपिद्वितीयो दृष्टो विलोपय घ) कथमेते धनु स्वस्यामि प्रहारहतस्य घनसनाहान्यूमना- मुपालम्प रोदिति। नूनमेतेषामनव स्वामी ध्यागादितः । जानन्ति भवतु। भावः] l 1 सान पारे विसारेरहा है। यहाँ धसका पूरगा। (पूर और देपकर) से? ये नमा भविष्यसि । [अन्यन् जन्म जन्मान्तरं तस्मिन् । प्रस्तुतजन्मान्तरादप पों १४६ (पयोति अग) मुम, जिस RT सम बापु मार ले गये हैं। राय से सिर से पण (सामt) ॥६॥ (सामान धागो रे प्रहार गे हुए पायों पा दधी पट्टियो गे मुशोभित पीर बागा मुन्दर पा रहा है ) मुनाए-आर्य सोगों, पपा मार लोगों ने इस जगह कारपि-सहित महाराज दुर्योधन (ना) पाहै पागो ? (ध्यान में दगार) कसे ? कोई भी नहीं बोल एप है ? अरहा, यह कमर से हुये लोगों का समूह सद पद प्रहारों से हत पे अपने २ रवानी यशस्पल से विटियों द्वारा, मुख वक्ष के जात से भी नहीं टूट सकते हैं. बाटे निकाल रहे हैं। तब यह नहीं बानते होंगे। प्राधा, अन्यत्र योजना है। (आगे देखकर और कुद पलार) पे और दूसरे और भी अधिक एकत्र हुये थोर पुरष दीख रहे हैं । तो पहाँ चलकर पूछता हूँ। (समीप जार) क्यों, आप लोग जानते हैं कि गौरव रात्र किस खगह है ? (देखकर) कैसे ? यह भी मुझे देखकर और मा शेने मगे ! तम यह भी नहीं जानते। ओह ! यहाँ तो बड़ा ही परणाज (हरय) है। यह और पुरुष को माता पुर में मारे गये पुत्र को बात सुन लाल रेशमी वस्त्रों से कोई और सम्पूर्ण सामूपण पारण किये वधू अनुमरण पर ही है। (प्रयंमा के साथ) धन्य हो वोर-माता, धन्य हो । अ जन्म में न मारे गये पुत्र पासी होगी । यच्छाअन्यत्र खोचूंगा। (दूसरी में कार) यह योदामों दूसरा समूह है, जो अनेक प्रकारों से शरीर के घार होने पर घावों को या विना हो इस खाली पाटी वाले घोड़े को उपाला कर रो रहा है । अवश्य इनका स्वामी यहीं मार दिया गया है। तब यह । हो जानते हैं । अन्टा, दूसरी जगह घसकर पूछता हूँ। (चारो ओर देवकर प्वा सममनुम्रियते । ययि वीरमातः मा समन्यस्मिन्नपि जन्मान्तरे विनिहत न स्मन्नित्यर्थः । अयमपरो बहुमहारप्रणितवायोऽकृतवणबन्ध एव यौघसमूह इम १५० वेणीसंहारे एवायस्यानुरूपं व्यसनमनुभवन्भागधेयविमुखतया पर्याहुलो जनः । प्रक्ष्यामि । कं धोपालप्स्ये । भवतु । स्ययमेवात्र विवेष्यामि ! (परियो देवमिदानीमुपालप्स्ये । हहो देव, एकादशानामक्षौहिणीनां नायो गतस्य भर्ना गाङ्ग यद्रोणाङ्गराजशल्पकृपकृतवर्माश्वत्यामप्रमुषस्य सातवीमण्डतंकनायो महाराजदुर्योधनोऽप्यन्दिष्यते । दिपा जायते कस्मिन्नुद्देशे वर्तत इति । (विचिन्त्य नि.श्वस्य प) अब दंयमुपालभे । तस्य खल्विदं निर्भत्सितविदरवचनबोजस्यावारिसति पदेशाइकुरस्र शकुनिप्रोत्साहनादियिरूडमूतस्य जतुरहानदिपशानि विरमालसंबद्धवरालवालस्य पाशालीकेदारहणकुसुमस्य फलं पर (अन्यतो विलोकर) पयाष विविधरत्नप्रमासंवसितसूर्यकिरणप्रसून सह्यसंपूरितदशदिशामुखो सूनकेतुत्रंशो रथो दृश्यते समाहं तकंगम्बर महाराजार्जेपास्य विभामोहगेन भवितव्यमिति । यानिकपमामि ।। मानि पम्य ग) कयमेकाशानामशाहिणीनां नाएको मूर महाराभो। मारप इालापनीयापी भूमायुविधस्तिष्ठति । पोरेशम गुमस्य फलं परिणमनि । ( अम्बा लाम इगि तो मारहिदुईमो दिलो तुम्हे अमोहयो ग येति । कह ग को निमन्तेदि। हो । एमाणं पारि परिमाग सो रोग: । यदुन निमम । वह एरे 4 सहारण पापगणा हजामौत्रमुहेहि नहि हिप्रायो । पनि । ना मागनि । हो। अपिण नारामा वीमायुग्मा दोगन्ति । एप ग पुगि रहो यि गाति । यह एyिmes करा framfuin लिया। PrafE TRagn Afगणाए गमागभूषागाएर +१+११ Hritainmमो मनिदा" Tre. AAI) गोवा में हम त्रका १५ । मामाभाग अय वाताप - का घुमुम है। दूसरी ओर देवार) जैसे कि यहाँ एक कटे हुए धन- की किरणों से उत्पन्न गहनों इन्द्र-पतुषों द्वारा दसों दिशाओं के भागों बाम-क्यतोगा। तब ध्यान से देखता है। (समीप जाकर देखकर और अपदा यह दोपदी के केश-ग्रहण रुपा कुसुम का फल पक रहा है। नदिति नित्सितं तिरस्कृत यदिदुरयाक्यं तत् । विदुरवाश्यनिर्भमनमित्यर्थः H - १५१ + चतुर्थोऽध जति सब ही लोग भाग के विपरीत होने के कारण अपनी अवस्था के अनुरूप यति भोगने हुरे पाकुर हो रहे हैं। इसलिये यहाँ सितमे पूडूं या किसे सतम्भ ई ? माछा, यहाँ मैं हो पा लगाऊं। (घूमरर) अच्छा अब ने भाग्य को सो उपागम्म देना चाहिये। बाह रे भाय, गरह अक्षौहिणी नाओं के रिवर, सो भाइयों में सबसे , मोन, होण, कर्ण शल्य, कृप, तिया और अश्वरयामा प्रमुख राज-समूह के दामी, सम्पूर्ण एवो मण्डल के र अधिपति महाराज दुर्योधन को नी पोजा जा रहा है ! और खोजने पानी पता नहीं लग रहा कि frm जगह है। (मोचकर और लम्बा मॉम -किर) अयथा इसके लिये भाग्य को भी क्या दोष दूं? क्योंकि यह तो उस पक्षागृह-चूत-विष रूप वृक्ष स फल है, निरस्कृत विदुर का वचन जिसका जोर है, अबहेलना दिया गया पितामह का हितारी उपदेश निएका अंकुर शनि के प्रोत्साहन आदि से जिसको जड़ मजबूत हुई है, उत्पन्न हुआ और दशल से पा एमावर जिसमा पाला है और द्रौपदी का केा-पहरण . वाला रय दीख रहा है, जो अनेक प्रकार के रस्नों को कान्ति से मिश्रित मर रहा है, इससे अनुमान करता हूं कि पही महाराज दुर्योधन का बा मौस लेकर) कसे ग्यारह हजार अक्षौहिणी सेनाओ का स्वामी होकर राम दुर्गाग्न सामान्य पुरुष के समान यहाँ अप्रशस्त भूमि पर बंटा हुआ नया बाप्पपर्यादुलो जनो दृश्यते। अवस्थानुरुप स्वम्वावस्थासशम । मिदानीमा पृच्छामि । क वोपालभे । भवतु । देवमुपालभे । यतस्तस्य - यस्य तयो क्तस्य । अवधीरितः पितामहस्य हितः उपदेश एवाइकुरो यस्य । जनुनः गृह जतुगृहं च द्यूतं च विप भीमाय विपदान चैव शाखा विद्यन्ते वस्य । सभूतं च तचिरकात संबद्धं यर तदेवालवालं जलावापप्रदेशो यस्य] अण्णदो गदुअ पुच्छिस्सम् । कह सम्यो एव अवत्थागुम्वं ब्वमण अनुमान हिस्सम । होदु । सअ एब्व एत्थ विचिणइस्सम् । हो । देब्वंदाणी उबालाहिनना हहो देव्व एआदमाण अक्तोहिणीणं पाहो जेठो भादुमदस्म भत्ता ग अहोरी रामसल्लकिवविदवम्मअस्सस्थामप्पमुहस्म रामचक्करस सअलप्पुहवीमण्डलहराई महाराजदुज्जोहणो वि अण्णेसीअदि। अयोमीअन्तो वि स जाणोदिन उसे वट्टइत्ति । अह दा कि एत्य देव उवालहामि । तस्स क्षु एवं शिक: छिअविउरषअगवीअम अवहरिदपिदामहहिदोवदेमड्युरस्स सउरिलोड हणादिविरूदमूलस्स जदुगेहदविरासाहिलो सभूचिरआलमंदसवेरालया। पनालीवेराग्गहराकुमुमस्ग फल परिणामदि। जहा एत्य एसो दिविहरजहार लिदगुरकिरणप्पमूदमकचावसहस्ससपूरिददसदिसामुही लगवे दुवंसोरहो होगा। निमि। य एआदमाग अत्रम्मोहिणीरा रणाको भविष महाराजोदुगोहत अहं तरमि अवस्म एदिणा महाराअदुजोहणस्म विस्सामुईसेरा होदयम् । पर पारपुरिमो वित्र अमलाहणीए भूमिए उवविट्ठी चिदि। अब वाम दुर्गापन:--(fat) अये गुणरक । मुबारक, पचिपलमहराज मुम्बरा-भाना रपः। माय ममोरयोपित मानो हो। I • आमा पा 41 प्रिनामसाममिति"INT १५२ वेणीसंहारे हुविस्मसि । होदु । अण्णदो विचिणइस्सम् । अअं अवरो बहुप्पहारविहार, अकिदवरणप्पडिआरो एज जोहसमूहो इम सुण्णासणं तुलङ्गमं उवालहिज रति गुण एदाण एत्य एव मामी बावादिदो। ताण ह एदेवि आणन्दि ।। भाअधेअविमुखदाए पज्जाउलो जणो । ता क एत्य पुच्चिस्तम् । कं वा उस एर पधागो के माहामुमग फल परिणामरि।] | गृत्य मून मगया पृथति ) प्र:-(या) भये कप राइनामारमुन्दरकः प्राप्तः । गुगरक:-(उपगम्य) जयतु जयतु महारामः । [सभा ग नुपात:- देर, एन शरीरमाग। देव दुगल मरमेतण।] दुर्योधनः-(समभयम्) मुग्दरक, frienटिमास्य निहता धोशा । माविमो गापः। पायोनि महाप .

धतुर्थोऽङ्कः समीप जाकर सारथि से संकेत द्वारा पूछता है) सूत्र--(देशकर) अरे क्या ? पुट-भूमि से मुन्दरक आया है ? पुग्दरक-समीप जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । योधनः- (देवकर) अरे सुन्दरक है ! सुन्दरक, अङ्गराज कुशल से हैं ? केवल देह मात्र से कुशल है। पोपन-(पपराहद से) सुन्दरक, क्या अर्मन ने इसके घोड़े मार गले, 1 मार दिया या रथ तोड़ दिया? बाप-देव, रप ही नहीं तोड़ दिया, प्रत्युर इसका मनोरथ भी। लामा प्रभा, विविधा रमप्रमा: साभिः सवलिता मिथिता ये सूर्य- सात: प्रमूख शापसहस्र लेन सपूरितानि दशाना दिशा मुखानि येन Firmat...या तयामि... पोहेशेन भवितव्यम् । भवतु । उपसपामि मेर, देव एकादयानामोहिणीना नायो महाराजदुर्योधनो लामनीय. गप्प व भूमाविष्टस्तिष्ठति । मून तस्य खल्वेवसाशालीशाह- तपयन परिणमति पत्र परिमाप माली । करवरनं सदशिरा। उपन्यः दिपा राध: समामानुबन्ध । मेपथ्य प्रसाधनम् । वघ्या पुरवारा भाग तमामयो पेय इति धेरययः । शोलतया कालावस्थानुरूपमित्यन्दय । को यो । पितामहो भीमः । मासपाल पलम प्रति प्रमियम् । मम्मो यो माया हषिों बा । भारः पराकः । संगमितः मो. या तर आरिपते. उत्तमरानटोमिरिन्द्रनुपरम्पत इति पा प्रदेश प्रात: पामरः । गत पुसमम् । सारणे पुतः यि ममापन ताप । अतिरेक सामने की देन परेपः । देव श ामिनः शरीरमाणे । बारेमा रायपुरोति कि पारेर डि सारसह नक प्रयाधनम् इत्यमरः ।

- मुबारक:-पोर आमापयति। मये देवरय मुकुटमभित्रमारेशन रणप्रहारवेदना । (इनि माटो परिक्रम्य) गणोतु देवः। अरतौनी दुःशासनवथ-(इत्यों मुषमान्याचा नादानित/बोका भए देवरस मउहमणिप्पहायेण अधणीसा मे रणपहारवेत्रगा। नाङ्गराजेन कुटिलभ्र कुटोभनमीषणनिटिलपट्टनाविज्ञातसंधानमोहिनी भिउडीमङ्गभीसनिडलवट्टा अविण्यादसंधारणमोक्खसिलीमुहसवादनि निकरेण पर्यस्तगजपटासंघातेन च विस्तीर्यमाणेनान्धकारेणान्यौतमुभरकर सुन्दरकः--ततो देव, उभयबलमिलद्दीप्यमानकरितुरगपदातिसमुश्मन न खलु गगनतलं लक्ष्यते। [ तदो देव उहअवलमिलतदीपन्तकरितुरमा समुभूदधूलिरिणअरेण पल्लत्यगअघडासघादेश व वित्थरन्तरण, अन्या रपो भग्नोऽस्यास्माकं स्वामिनो मनोरयः । [कथितः क्यनः नसके भाडा मुखमाच्छाद्य अप्रियषयनजातलज्जाशादिति भावः।] यहेर आमालया। अपनीय दूरीवृत्य । दिपा महाराजस्य मुकुटमहामणिप्रभावपापगता में । गलतु देवः शृणोतु सारपिश्च । शुतः स्वामिना दुधासना। देशीम हारे दुर्गापन.-(सरोगम) शिकपिरानी पर्यावर्ग' हरयम् । सबशेषतो विश्पष्ट कम्पना। देवो । परिष दाणी दुमालदुस्मामगह- सूतः-सुन्दरक, कथय । कथितमेव वेन । दुर्योधनः-कथ्यताम् । धुतमस्मामिः । मुन्दरक:-शृणोतु देवः। अद्य सायबुमारदुःशासनदधामस्नेित संघातयषिणा अभियुक्तः स दुराचारो मध्यमपाण्डवो भीमसेनहतकः । [१] देवो । अञ्ज दाव कुमारदुस्सासणवहामरिमिदेण सामिणा अङ्गराए। अभिजुत्तो सो दुराआरो मझमपण्डवो भीमसेणहतो । ] उभौ-ततस्ततः अन्धीकिदै उहअवलम् । गा हु गगणतलं लक्डोअदि।] उमौ-ततस्ततः चतुर्थोऽङ्कः १५५ शेषन-(कोच से) असष्ट वचनों से मेरे पहले ही माकुल हरय को अधिक ध्यात पयों करते हो? इसलिये सब स्पष्ट कह शसो। मन्दरक-सी देव माज्ञा । अरे! देव को मुकुट-मणि के प्रभाव ने युद्ध में हुए महारों को पोस दूर कर दी! यह कहकद गर्व से चलकर) राज सुनिये । 'आव कुमार पुःशासन के घ...' (यह आधा कहकर मुत्र र भय सेनाध्य करता है)। भूत--सुन्दरक, कह गलो । भाग्य ने कह ही दिया। दुर्योधन-कहिये । हमने भुन लिया है। सुन्दरक-महाराज मुनिये । माज कुमार दुःशासन के वध से कट हुए, ब्रिटिघाने से भयानक मस्तक-पटल वाले स्वामी अङ्गराज ने, जिनके और छोड़ने का पता नहीं लग रहा था, ऐसे बागों के समूह की वर्षा हुये उस दुरावारी मध्यम पाण्डव, अधम भीम पर आक्रमण किया। । . * नों इसके बाद? रकमेव, इसके बाद दोनों सेनाओं के परस्पर संघर्ष करते हुये और हुपे हाथी, घोड़े और पैदल सिपाहियों द्वारा उठे हुए धूति-समूह तथा - पे हाथियों के झुण्ड से बढ़ते हुये अन्धकार ने दोनों सेनाओं को अन्ध- से मच्छिन्न कर दिया। आकाश-तल दिखलाई न देता था। रोनों इसके बाद? कि स्वीक्रियार्थमिति भरतः । कृतकुटिलभ्र कुटीमङ्गभीषणेन ललाटपट्टेना- सावसंधानतीक्ष्णमोक्षनिक्षिसशरसंपातर्पिणाभियुक्तोऽसौ दुराचार. दुःशासन अत्र संपात आसारः । दुराधारेत्यत्र द्वन्द्वसमासः । [दुःशासनवधेन पिता सेन । बर्षः क्रोधः अस्य संजातः असी अपितः । तारकादिस्वादितच । या दुटिल प्रकुट्या: भङ्गस्तेन भीषणः निटिलपट्टः यस्य तेन । न विज्ञासो जातो. स थानमोक्षी येषा ते ,तथोक्ताः शिलीमुखा बाणास्तेषा सपात बलबूलि. ०तेनोत्थितेन० घनायकारे- जोति तेन । पदातिपदसम धारासंपात आसारः। मेषच्छन्नेहि दुरिनम् । इति पामर।। - गुपर- गायगारमोटरहारेण - सुन्दरम:-सतो दैत्र, योरपि तपोरग्योगिहनागजितरिएन किया परिमुसहरणारतश्यवरांगलितावसनवियुष्टामामुरं गम्भीरस्तनिकाला [सदो देव दोहिरा वि तारण अण्णोपसिहरादग्जिदपिपुर विजय परिमुक्कप्पहरणाहदकय असंगलिद जलराविम्जुच्छडामागुरं गम्भीरस्थस्बिर धनंजयेन वचनिर्यातनिर्योपविषमरसितध्वजापस्थितमहावानरः तुरङ्गमसंE प्यारतवासुदेवासचक्रासिगदालायितचतुर्याष्ट्रवादुदर्शन आपूरितयाचा [सदो म देव, एरिस अतरे जेस्स भादुरगो परामवसतिला पांग वजणिग्यादरिणग्योसविसमरसिदधअअगट्टिदमहावारगरो तुरङ्गममाहासन दवासुदेवसङ्खचक्कासिंगदालञ्छिदचउब्बाहुदण्डदुईसणो आपूरिअपञ्चजन्य गान्धी० । प्रनष्टं गगनाङ्गनम् । कुत्रापि किमपि न दृश्यते। रापन यदान्छोटनं तेन यः टंकारस्तेन 1] गभीरभीपणेन अन्योन्यस्य हिहनाद गजित ततिधुनं यस्य । पिशुनो खलसूचको इत्यमरः। विविधानि पानि पनि मुक्तानि प्रहरणानि तैराहतं यस्कवचं तस्मात्संगलितः स्फुरितो यो ससा एक विछटा तया भासुरम् । गम्भीरं स्तनितं गजितं यस्यासोबार जलपर यस्मिन् । प्रसरन्तः चारा एवं धारास्तासां सहस्राणि वपिन शीर मेगीमदारे गायत गति प्रसपनसपरेनति देतरामप्र दहारेण गामीरमीगणेग जाणी प्रतिमा मजालहीण ति। दुर्योधन-रातः प्रसरच्छरपारासहसपि जातं समाग्निम्। हरं पसरन्तसरघारामहस्सवरिश जादं समरदुदिणम् । ] दुर्योधनः-सतस्ततः। सुन्दरका- ततश्च देव, एतस्मिन्नन्तरे ज्येष्ठस्य धातुः दत्तताररसितप्रतिरवरितदशदिशामुखहरो पावितस्तमुद्देशं रपवारः ताररसिदप्पडिरवमरिददसदिसामुहळुहरो धाविदो तं उद्देसं रहवरो।] पराम दुर्योधनः-ततस्ततः।

चतुर्थोऽङ्कः मुन्दरप--देय, तत्पश्चात् गम्भीर और भयर, दूर तक खींची हुई के छोड़ने को रंकार से प्रतीत होता था कि, मानो, प्रलय कार- गरज रहा था। दुर्योधन इसके बाद क्या हुमा ? सुन्दरक-देव, इसके पश्चात उन दोनों का युद्ध रूपी दुर्दिन हा, पर रहनाद स्पो पर्जन जिसका सूचक था, जो अनेक प्रकार के छोड़े हुये अ टकराये कवचों से निकली हुई ज्वाला रूपी विद्युत् को चमक से चनक 1, जिसमें गम्भीर गर्जन वाली धनुष ही मेघ था और जो तीव्र गति से ये सहस्रों और स्पो (जल) धाराणों को घरसा रहा था। दुर्योधन-इसके बाद? सुन्दरक-देव, इसके बाद इसी बीच बड़े भाई के पराजय की अ. करने वाले धनजय (अर्जुन) ने अपना उत्तम रथ, जिसके ध्वज फे अभ पर पथ कोर के शम के समान भीषण पनि करने वाला मह भा) स्पित पा, सो घोड़ों को हांकने में लगे हुये वसुदेव-पुत्र (कृष्ण पहा , मसि और गदा से लाञ्छित चारों भुजाओ से बुनिरोश्य जिसने गाये गये (पृष्ण है) पाञ्चजन्य और अर्जुन के) देवदत नामक सीत राम्रो प्रतिवनि से दसों दिशाभों में मुख रूपी गुहाओं को दिया था, उसी त्यसरी ओर दौड़ापा। दुर्योधन-इसके बार? परिवाहिता प्वजहिस्थित.. प्रतिरवोद्भरितदादिमुखकुहरः प्राकि মীম ঘনব সেগ: গণনির অতীত = दिश रसिहं यस्य स तपा। [बजारस्थितः महावानरो यस्य । सुर- भने ग्यारसवासुदेवः तस्य शंखन व पशि गा ताभि ला हातरीन: दुस्प्रेयः । मापूरित्तो यो पाचजन्य सोलारसितार : प्रतिरक्षा भरितानि दशदिशामुपएहराणि ये

मुपरसः ततोग, तोरणदिक्षितनिशिसभाषिणा पतंग
भणितम्-अरे रेपमेन, पितुर तावते न पुतं मम दुरिता
प्रणय निमंत्सितो गाण्डीवी बाणन पुनर्पटपचनः। [सद देव तिकवविस्थिर
यद्विपट्टनं तेन त्वरित: सारथियंस्य तपाभूतः । ममभ्रमामुक्तविगलितपुर
अनामुक्तः परिहितः। शीर्षक टोप्पर इति स्यातम् । शोषकमीषण्यं वसिर
स्यमरः । जीवा पतश्चिका। [विदलिता विपाटिता या असिलता तश्यामा
पुंखा येपा तैः । कठिनानि कंरस्य कंस्पेव वा पत्राणि पुखा पातं.
निकपरापाणे निशिना: श्यामलाः शल्यवधा पातः। शिन
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मामगिनिमा पानिमामा
यन्यहि इमियो गम्भुराग मिनाहादियोधयंत्रसम्म रहन
उभी - (मरांम) ततस्ततः ।
स्थागुम् । कि पु-भंतो वालम्य । तछ । अपरः माः महायुध्यन्वेति ।
वाचं निशम्य गुरुगनायिक्षपेणोशोपितकोपोपरामुखमंगलगिमित टी
भोषणेन चापपारिणा कुमारपसेनेनापि मर्मभेदकः पश्यविषमः भूतियच
भरितेति तारकादित्वादितन् । [रत्नशोषक रत्नमशिरस्त्राणम् । आकर्ममा
कठिनस्य कोदण्डस्य जीवा येन । दक्षिणहस्तेन उरिक्षप्ता ये शरास्था ।
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1५६ ? चतुर्थोऽङ्कः सुन्दरक- तब भीमसेन और अर्जुन द्वारा मानान्त पिता को देखकर जल्दी गिरे हुये रत्नजटित मुकुट की उपेक्षा करके कठोर धनुष को डोरो को कान सोचता हुआ और दाहिने हाय से निकाले गये वाण के पिछले भाग से चिको उकसाता हुआ कुमार वृषसेन उस जगह पहुंच गया। दुर्योधन-(संभलकर) तब क्या हुआ सन्दरक-देव, तब कुमार वृषसेन ने आते ही टूटी हुई तलवार के समान र और स्निग्ध पूंछ वाले, कठोर फद्ध-पक्ष वाले, काले वर्ण वाले और पर पैने किये हुये श्यामल फलक वाले बाणों से मुहूर्त भर मे अर्जुन के । रय को (ऐसे) दक दिया, मानो पुष्पो से लदा हुआ वृक्ष हो । दोनो--(हपंपूर्वक) इसके बाद? सुन्दरक- देव, इसके पश्चात् तीव फेके गये पैने भल्ल नामक माणो की करने वाले अर्जुन ने मुस्कराते हुपे कहा-'अरे पृषसेन, मुन मुर के । तुम्हारे पिता को भी खड़ा होना उचित नहीं है, फिर सुन पालक का ग? इसलिये जाओ, अन्य कुमारों के साय पुद्ध करो। इस प्रकार के सुनकर पिता को निन्दा से भड़के ये कोप से सात मुख-मण्डल पर ये भूटि-मङ्ग से भोषण, धनुर्धारी, कुमार पृषसेन ने भी मममेतो. तपा भीषण एवं अति-मय से प्रेम करने वाले (भन कान तक बोच गये) बागों से अर्जुन को साइना को, म कि पुरे भवनों से। बाणः प्रमरंध।। ततो देव स्वागतेनैव कुमारपसेनेन महाभयं तम् । लारमामलमुस्निग्धास्यबन्धः गासयंधा कुमुमितस्तस्वर शिलीमुगातपा प्रवादितो धनमाय पर पूशिला मरिणविशेष । शस्यायो वागमती सिदः पक्षो। शिलाया अनिशित निपपल तेन मांसप्त स्निग्धरण इनितः। शिलीमुह वाणी पर | तोरण स्थानानिनिमा ना भन्नमा बाणास्रान पित पोल रयतेन मोटानिक्षित परसंपालाभिधानमातमन्युना एनंदन.. परिणम्य पुरस्कार ६ रे गाया अपरः कुमार: सहगला मोर तमा नुररमा पठिनकसूपक्षाशाननं शिनानिशिन- चण्डगाण्डीवजीवाशब्दनिजितवननिर्यातघोषण वाणनिपतनप्रतिविद्वानप्रतात प्रस्तुतं शिक्षाबलानुरूपं किनप्याश्चर्यम् । तो देव णिसिदसरामियाजा जादमण्गुणा किरीटिगा चण्डगण्डीवजीआमदाराजिणिग्यादपोसेण बाराति सुन्दरकः-ततश्च देव, तत्ताहशं प्रेक्ष्य शत्रोः समरम्यापारधरस्वमा स्तितमोरमुग्णधनुर्गणामनागमनशरसंधानमोक्षचटुलकरतलेन - कुमारसुगनेनेना गमरनावारच. मग अविभाविधतूणीरमुधरपुरगुरणगमपागमरामरसार मुन्दरक-ततो देय, अत्रान्तरे दिमुक्तसमरण्यापासे मुतांविधितरा बन्धो योरपि दराणपाण्डयदसपोः 'सापु, मारवृषसेन, मात समालो वीरलोकोनोकपिनु अतः । [दो देव एस्वन्तरे विसरममerry मुहलरिस्मादिपराणुसन्धी दात नि कुरामाइयबलारण पाहमापनि पत्रिमणमुममामाटीविम्भिवनपम्पधारिणा मारने मुपयागिरिमरः । अत्र निम्मितम् । सतपय मुलायम -सा निमितो ति: गुमनाय पितुः अपि पेग निम्नया गादी १६० वणीमहारे सिदमल्लवाणवरिगिणा घणजएण ईसि विमिन भगिदम्-- अरे रे दिन पिदुणो वि दाब दे ण जुत्तं मह कुविदस्म अभिमुहं ठादुम् । कि उग भी वालस्स । ता गच्छ । अवरेहि कुमारेहि सह आधेिहित्ति । एव वा कि गुरुअणाहिलेदेश उद्दीविकोवोपरत्तमुहमण्डलबिअम्मिअभिवडीभङ्गमौतर- चावधारिणा कुमालविमयेण वि मम्मभेदएहि पम्सविमर्महि मुदिवहिदप रिणभग्दिो गण्डीवी बाणेहि ण उरण अहिं।] दुर्योयन:--साधु, वृपसेन, साधु । सुन्दरक, ततस्ततः ।, सुन्दरकः- ततो देव, निशितशराभिधातवेदनोपज्ञातमन्युना णपडिसिद्धदमणप्पसरण पत्युद सिक्खाबलाणुरूव कि दि अञ्चरीम् । दुर्योधनः-(माकूतम्, ततस्तत. । सविशेष प्रस्तुम समरकर्म। कपचापकर अमः' कुमालविससेणंण विसनिमेस परधुदं समताम्म । योधनः- ततस्तर। मानि तिरमणो योलोओ अपलोइन उसो ।] - [तदो अ देव त तारिम विवाह - - + गोगशावास, कुमार वृषसेन, शावास' इस प्रकार तुमुल ध्वनि करते पयागामिभिश्च वचनरिति भावः । निशितशराभिघातर्या वेरना पीडा उपजातो मन्युर्यस्य । चण्डं च तद्राण्डीवं च तस्य जीषायाः शब्देन निजितः राभिधातजातमन्युना विज्ञातवारणनिपतनप्रतिषिद्धदर्शनप्रसरेण , आदितोऽधकाशितः । सूणीरं तोन इति स्यातम् । घटुसं मनोशं कुशलं वा। मावितान्यलक्षितानि यानि तूणीरमुखधनुर्गुणयोः गमनागमनानि च धार- 11 ? । प्रस्तुत । तीक्ष्ण मोक्ष...प्रस्तुतः समरफारम्भः । अत्रा- चतुर्षोतः दुर्योधन-शाबास, पुषसेन, शावास । सुन्दरक, इसके बाद? सुन्दरक- देव, तब तोरण बाणों के प्रहार से हुई पोग से पगाण्डी थनुष को प्रयचा की ध्वनि से बिजली की कड़क के शब्द को ने शाले, राणों को वर्षा से हष्टि को रुख कर देने वाले अर्जुन ने शिक्षा पराकम के अनुरूप अद्भुत (कर्म) प्रस्तुत किया। दुर्योधन-(जोर देते हुए) उसके बाद क्या हुआ मुन्दरक-देव, और उसके बाद शव के पुद्ध-कर्म में ऐसे चातुर्य को देखकर र वृषसेन ने मी, जिनका हाथ सरश के मुख और धनुष की प्रत्यक्षा पर जाने, माण पदाने और छोड़ने में इतना फुर्तीला था कि (ये क्रियायें) पपई नहीं पड़ती थी और अधिक (अद्भुत) पराक्रम दिखलाया। पुग्दरक-देव, तब इसी बीच पुट-कर्म छोड़कर, मुहूर्त भर के लिये सिलसिले को शान्त करके, कौरव और पाण्डव सेनों ही सेनाओं के सके पुट-कौशल को) देखने लगे। नोपरक्त यन्मुखमण्डलं तत्र विज़म्भितो य. भकुटीमङ्गस्तेन भीषणस्तेन वर्णमार्ग कृतः प्रणयः अनुरागः यः । आवर्णमाकृष्य मुच्यमानः वाणः योधन--सके बाद? . . - वस्य निर्घोषस्य च ध्वनिः येन तथाभूतेन । शिक्षाया बलस्य च अनुरूपम् । म। शिक्षास्त्राभ्यामः नं मोक्षाच तेषु घटुले मनोशतया संचारि करतलं यस्य । प्रस्तुत आरम्यः । -मः उपक्रमः। 'समरकर्मान्त इति पाठे समर एवं कर्मा: कीमत इति को [मुहूर्त विमितः परस्यानुबन्धः रानुमन्या विरोधानुवृत्तियेन स । योरपि तयोः कुरुपाण्डवराजबलयोः । अत्र विमित उपधान्त. । रे 'उमरि मिलीमुहारो। दुमाली रिपरिधागोवीन बार ...पाहा व नाम परामद - हरिसरोसकरुणासंकडे वट्टमारपस्स सामिणो अङ्गराअस्स विडिर अवहीरिदसअलधाणुकचक्कपराकमसालिको मुदस्स सहाविहेण समलकम्मारक गाडीविना तुरगेषु सारयावपि रथवरे यनुध्यपि जीवायामपि मरेनषा सुन्दरक;-ततश्च देव, उभपयलप्रवत्तसाघुकारामषितेन शरवर्षा' सितातपत्रेऽपि च ध्यापारितः समं शिलीमुखासारः। तदोपदेश रभाव विसरातो मविपरित प्रवृत्त कुमारः। तदो देव विरहो सगुगत मुम्बरक:-ततो देव, मुतापविष्यसनामोंटीरितेन स्वामिनाया परिमोशनीमा रममा पुनरपि प्रवृत्तो परंशयन सहायोग (ma गुदामनामरिमुवी मिग गामिणा माराएग अगणिअभीयोगात वेणीसंहारे दुर्योधनः- (सविस्मयम्) सतस्ततः। सुन्दर:-ततश्च देव, अवधीरितप्सकलपानुष्कपक्रपराक्रमशालिन तथाविधेन समरकारम्मेण हर्षरोपकरणासंकटे वर्तमानस्य स्वामिनोज निपतिता शरपद्धतिभीमसेने यापककुता दृष्टिः कुमार वृषसेने । तदो , भीमसेणे सुप्फपजाउला दिट्ठी कुमालविससेणे।] दुर्योधनः - (समयम्) ततस्ततः । "41 उत्तसाहुकारामारसिदेण सरवरिसपजलिदेन गण्डोविणा तुरगेसु सारहि पिता धणे पिजीभाई पि णलिन्दलणे सिदादवत, मुहामारी। दुर्योधनः-(समयम्) ततस्ततः । सुन्दरक- ततो देव, विरयो सूनगुणकोदणः परिभ्रमणग्यापारमा की परिभमणगायारमतवादसिद्धसरसंपादो मण्डसेहिं विधि पुमालो। 'दुपिन:-(भाशम) ततः । गनिधीमोनाभियोगेन परिमुक्ती पनजपरयोपरि मिलोमुखासार। *- विध्यावारिदो सहि । Fan पउनो घर जाएगा गह भाप्रीधेयम् ।

- सम्बरकुल देव, तब पुत्र के एप के नाश से उत्पन्न कोष से उत्तेजित हुये विलेन युदाकरणमिति रसत्रयमत्र । पद्धतिः पंक्तिः। उमयाभ्यां बताया प्रज्वलितेन दोप्तेन । 'जीवायां ज्यायाम् । 'मोवी जीवा गुणो गम्या' हमः । बर साञ्छने चिन्हे । सितातपत्रे वतन्छो । सममेकदेव । ततो वृषसेनः [विनष्टोरयो यस्य स विष: सूनः पुणः कोपयस्य म चतुर्थोक १६३ आपन--(आश्चर्य से) इसके बाद? सुन्दर देव और त सब पनुर्धारियों के मण्डल को तिरस्कृत करने राकम से सम्पन्न पुर के ऐसे युद्ध-पराक्रम से एक साय आनन्द, क्रोध हमा को अवस्था में पड़े हुए. स्वामी अङ्गराज (कर्ण) की बाण-परम्परा उन पर और मासुओं से भरी दृष्टि कुमार वृषसेन पर पड़ी। योवन--(भयपूर्वक), इसके बाद?, सुन्दरक-देव, सब दोनों सेनाओं द्वारा किये गये सायुधाव से कुछ और हिसे उत्तरित हुए.अर्जुनले घोड़ों, सारथि, उत्तम रप, धनुष, डोरी और ह्न षवल-छात्र पर एक साथ बाणों को वृष्टि की। योपन--(भप के साथ), इसके बाद? परमादेव, तब उप-हीन और फटी हुई, मेरी, तथा धनुष वाला और पटने मात्र से बाण-वृष्टि को रोकता हआ कुमार वृषसेन माल बनाकर 17 -मो. महराज ने भीमसेन के आक्रमण की चिन्ता न करके घनाय (अर्जुन) पर बाणों को वर्षा की। कुमार भी सेवक द्वारा लाये हुये दूसरे रथ पर कर फिर अर्जुन के साथ युद्ध करने लगा। भवें बसो तस्य । तथाविधः समरकर्मण भारम्भस्तैन । संकटे मिश्रीभावे । संकटे । भने धानुको धनुधर । धन प्रहरणमुत्यस्य उक् विस्य इमुसुका- ति सुतविक्रमदर्शनेन हर्षः । पत्रुपराक्रमदर्शनेन रोः। दालस्य यः साधुकार साधुवादः तेन मषितः जातकोधः तेन । वृषसेनकरार परिभमणमभ्यापार एवं मात्र तेन प्रतिषिय निवारितः पारसंपातो पिन-(भाशापूर्वक) तत्पश्चात् । - :..।ौशेयो मण्डलामः परवानःपाण्यद इरयममुगरपति 1 कुमालेण रे रे तादाहियमेवमुहल मग्नमपण्डन मह मरा तुह सर अंदर ति मणि सरसहस्सेहिं पण्डवमरं पर हस्तात्सरारं धनुई दयावीरसुलम उत्साहो नयनाद्वाप्पसलिल बदनाप्रति हसितं घ धनंजयेन, सिंहनाद विनादितं वृकोदरेण, दुरकर दुटकरमिरया हरयादो ससरं घणु हिमाझे वीरमुलहो उच्छाही पणादोबा पेन।] परिभ्रमणमारण्यापारो मण्डला विचरितुं प्रवृत्तः। बामगा पेणीसंहारे उमौ -शायू, परमे, साततस्ततः। गुग्गरक:-ततो देर, भगिनं चकमारेण-रे तातापिर्शग्मुता पागल, मम शरारतब दारिमुग्भिवायरिमा निपति' इति का शरसहस्त्रः पाण्डवशरीरं wrsia THहनादेन गजित प्रवृत्तः । [स] अपरामिण विरन्ति । सिंहणादेग गमिदं पउत्तो। दुर्योधनः-- (सविस्मयम्) महो वालस्य पराक्रमो मुग्यस्वभा ततस्ततः। सुन्दरक:--रातश्च देव तं शरसंपातं समययूब निमितरामिशाटन ना किरीटिना गृहीता रथोत्सङ्गाकणकनकिहिमोजालमद्वारवि मेघोपरोधविमुक्तनभस्तलनिर्मला निशितश्यामलस्निग्यमुखी विविधरना सुरमीपणरमण यदर्शना शक्तिः सोपहासं विमुक्ता घ कुमाराभिमुखौ ! देव सरसपादं समवधूणी णिसिदसराभिघादजादमध्णुणा कि गहिदा रहुच्छङ्गदो कणन्तकणदिङ्किणीजालमारविराइणी महोवरोह णहत्थलणिम्मला णिसिदमामलसिणिद्धमुही विविहरमणप्पहाभासुर रमणिग्जदमणा सत्ती सोवहासं विमुका अ कुमालाहिमुही। दुर्योधनः-(सविपादम्) अहह । ततस्ततः । मुन्दरक:-- ततश देव, प्रज्वलन्ती शक्ति प्रेक्ष्य विसितम दुरबलेन । ततो अ देव जलन्ती संति सि विलियं अलग वरणादो रमिदं । हमिद अधणंजएण मिहणादं विणादिन दिनोरमेश दुल ति आइन्दिदं पुरवलेण ।)

विविधानाना प्रभाषिः भासुरा पासो मौषणं रमणीयंप दर्शनं यस्याः . नाद करने लगा। चर्यकारी है। इसके बाद? साम्यस्मिनिपतन्ति इति भरिस्वा तरशतमहस: पाण्डपशरीरं प्रच्छाच दोनों-वाह, वृषसेन, पाह । इसके बाद? सुन्दरक- देव, तब कुमार ने कहा-'अरे (मेरे) पिता को निन्दा में वाल, मध्यम पाण्डव, मेरे वाण तेरे शरीर को छोड़कर अन्य पर नहीं पड़ते यह रहकर (कुमार) सहलों बाणों से पाण्डव के शरीर को बाच्छन्न करके दुर्योधन-(आश्चर्य से) पालक का पराक्रम और मुग्ध स्वभाव बड़ा सन्दरक- देव, तब उस माण-प्रहार को रोककर तीक्ष्ण वाणों के लगने से हुपे अर्जुन ने त्य के मध्य भाग से बजती हुई सुवर्णमयो घण्टियों के समूह प्रकार के शब्द वाली, मेघों के घेरे से छुटे हुये आकाशतल के समान तोकण, श्याम, एवं स्निग्ध मुख वाली, अनेक प्रकार के रनों की त से चमकती हुई और भयङ्कर तपा सुन्दर दिखलाई पड़ने वाली एक उठाई और हंसकर कुमार की ओर छोड़ दी। दुर्योधन-(दुख के साथ) आह ! इसके बाद? सुन्दरक-और, देव, इसके बाद जलती हुई शक्ति को देखकर अङ्गराज य से दाण-सहित धनुष, हृदय से वोर-सुलभ उत्साह आँखों से आंसू और से चौकार निकल पड़ा। अर्जुन हंसा, भौम मे सिंहनाद किया और अनेन । अगणितः भीमसेनस्य अभियोगः येन 1] भणित प कुमारपसेनेन- १६ र ताताधिक्षेपकारक मुखरमध्यमपाण्डव न मम पारासारास्तव शरीरमुग्झि- सिंहनादं विचरितुं प्रवृत्तम् । अत्र प्रच्छाच व्याप्य । विचरितं कर्तुम् । वृत्तं पसेनेनेनि दोषः । निशिताश्च ते शराच तेपामभिघातस्तेन ति मायुः क्रोधो पस्य सेन] यो या निविण्यः धुपण्टिकास्तामा लानि तेषां शङ्कारविरीतीति विराविणी।] जालहुंजारराविणी महामेघो। 1] विविधरलप्रभापटिसशीभीषणरमणीयदर्शना महाशक्तिविमुत्ता सुयी। या कामाम् । भीषणता विचित्रालया। रमणीरता 1.

तिनो देव विरताप्राणवावारणिबन्धादो मुहुत पसमिरवरा से । मारेगारापूरितनिधिरप्रयाग निपयााय एel -- सावदरसस्य तव भ्रातुरच धनुर्वेदशिक्षानिपुणत्वम् । तवाप्येतस्प्रेसशीयम्'-ति [तदोभ देव भरिपदं सामिणा अङ्गराएण भो विकोइल असपनो मह वि समलव्यायारो। ता अणुमायण में मुहुप्तअम् । पेक्वामहे दाय परसम्म ! सुम्बरक:- ततो देव, पिरतो रणव्यापारनिर्वग्धान्महतं प्रशतिm मायादेवताही प्रम्बसन्ती... रसितं प सिंहना वृदोषाग पुपरमिनियावन्दित गुरुवलेन । अत्र त्रसित गरिनवम । सिंहस्पेशल घेणीसंहारे दुर्योधनः-(मविषादम्) ततस्ततः । सुन्दरक:-ततो वेय, कुमारयुपमेनेनाककष्टनिशितक्षुरप्रविरं निया यंपथ,एवं मापीरपीव भगवता विषमलोचनेन त्रिधा कृता शक्तिः। [सदो देव कुमालविमसेणेण आकण्णाकिछुणिसिदयुरप्पैहि चिरं कि अद्धप हे एव्व भाईरही विस भवनदा विसमलोमणेण तिया किंदा सत्ती । दुर्योधनः--साधु, पृषसेन, साधु । ततस्ततः । सुन्दरकः--ततश्च देव, एतस्मिनन्तरे कृतकलकलमुखरेण वारसोय वादेनान्तरितः समरसूर्यरवः । सिद्धचारगगणविमुक्तकुसुमप्रकरण प्रशारित समराङ्गणम् । [तदो अ देव एदस्मि अन्तरे किदक्लकलमुहरेण बोरलोभसा अन्तरिदो समरतूररवो । सिद्धचालणगणविमुक्कुपुमम्पअरेण पर समलाङ्गणम् । दुर्योधनः--अहो बालस्य पराक्रमः । ततस्ततः ।। सुन्दरकः--ततश्च देव, भणितं स्वामिनागराजेन असमासस्तयः ममापि समरध्यापारः सदनुमन्यावमा मुहूर्तम् । म भादुणो अ घणुष्वेदमिक्वानिउणतणम् । तुह विद पणिज्जति । दुर्योधनः--ततस्ततः। -'भो पर प्रेक्षको जालो भीमसेनागराजो। पक्षमा वादा भीम सेवारामा ।]

चतुर्थोऽङ्कः १६७ रिद-सेना ने बुरा हुआ, बुरा हुआ' यह कहकर करुण-क्रन्दन किया। दुर्योधन-(विषादपूर्वक) इसके बाद? सन्दरक-देव, सब कुमार धूपसेन ने देर तक लक्ष्य साधकर कान तक ने गये तोक्षण शुरप्र नामक बाणों से बीच रास्ते में ही शक्ति के, भगवान् मोचन ने गंगा के जैसे, तीन टुकड़े कर दिये। दुर्योधन - शाबास, वृषसेन, शाबास । इसके बाद ? सन्दरक-महाराज, और तब इसी बीच कल-कल ध्वनि से बढ़े हुये बोरों घुवाद ने युद्ध के बाजे के बाद को छिपा दिया और सिद्ध तथा चारणों (आकाश से) बरसाये गये पुष्पों को राशि ने युद्ध भूमि को ढक दिया। दुर्योधन-मोह । बालक का पराक्रम, बड़ा अद्भुत था। इसके बाद? सम्बरक-महाराज, तर स्वामी अंगराज ने कहा-'हे वृकोदर, मेरा और इस अभी समाप्त नहीं हुआ है, इसलिये मुझे मुहूर्त-भर के लिये अनुमति सद तक पुत्र और तेरे भाई के चतुर्वेद की शिक्षा के चातुर्य को देख रे लिये भी यह दर्शनीय है। पोषन इसके बाद दरक-महाराज, तब वे दोनों पुरा-कर्म के आग्रह से विरत हो र मुहूर्त भर के लिये वर को शान्त करके मौमसेन और अंगराज दर्शक पी...। शुरः शरविशेषः । अधः पन्थाः अपिथस्तस्मिन् । निध्याय विषमलोचनेनेत्या भारतम्-सा दधार हरो गजन् गङ्गा गगन [.. सा बभूव, विसर्पन्ती विधा राजन् समुद्रगा। वन म. १०६.! यिविचिन्त्य भागौरयो,गङ्गा विषमलोचन हरेण । गङ्गापि हरेण. देति भावः । कसमुखरेण पाठान्तरे कृतः यः कसालस्तेन मुवरी अमुक्तकुमुमप्रकरण संदादित समराहणंम् ।। प्रणितं च तदनु रामानमेव । प्रेमावस्तावत्तव धात्रा समं मम पुत्रस्य अनुवैतपिशा- वाप्येतस्प्रेक्षणीयम् इति । विधमित उपशाम्तः । प्रेक्षको प्रया। . , -- 100 दमो बनाइ मगरहोगसूरममादिगाओ गीरोजसकता सुन्दरकः-ततो देव, प्रेक्षे बुमारं हतसारयितुरङ्ग सनातनधारका [तदो देव पेक्यामि कुमालं हतसाहितुलड्ग लूगादवत्तवावर मर । सग्गटभट्ट विअ सुलकुमाल एक्केण जेव हिअअमम्मभेदिणा दिली दुर्योधनः-(सासम्) अहह, कुमार वृषसेन । अलमतः परंपा।। घरत, हा मददुललित, हा मदानाकर, हा गदायुद्धप्रियशिध्य, हा मोर्यापा हा राधेयकुलप्ररोह, हा प्रियदर्शन, हा दुशासननिविदोर, हा सवंगुष्यसन [तारं रसिता निनादिता या जीवा गुरगः तस्या निर्घोष एवं निघोरा विज्ञातो बाणवर्षो यस्म तेन] । गाण्डीवताररसितमांसल निरिविज्ञान- दुप-TI गुमरक: -भरे गानासोनिया पण पारित पप्रिमियम रोम पर म केशो म ममानि म मागिन दुग्णमान friो मोरमोशन IT देव गाता मणिपोगाणारा मह आnिizaz TEAM रही गाणी कुमारे हरेक दुयोधनः-(मविस्मयम्) सतानमः । मुग्दरफ:--सनश्र देव मतिमागे पारवर्ष दाणमारमेर महान पाणयसंन्ये सविधारमुसाको पौरपग्रने समुस्यितो महाकालः । मारवृषसेनः' इति । तिदो अ देव अधिने गरवरिसे काणमैत्तं एव महरिनिहगादे या सेणे सविसादमुक्कावन्द बोरवयले समुस्पिदी महतो बतानी है। कुमालविसमेणोति । दुर्योधनः-(सवापरोयम्) ततस्ततः । केतुवंशं स्वर्गभ्रष्टमिव सुरकुमारमैनध हदपभमभेदिता शिलोमुतेन कि रथमध्ये पर्यस्तम् । वंसं भिण्णदेहं रहमाझे पल्लस्थ । प्रयच्छ मे प्रतिवचनम् । : .... न तेषा रया.. न मलु विमपि लक्ष्यते । पाण्डदवले विमुतमिलाई घिन--इसके बाद? होनाल-ध्वनि हुई-'हाय कुमार वृषसेन मारा गया ! हाय मारा -दुर्गापन-(ओमुमो के साय) याह ! कुमार वृषसेन ! इससे आगे सुनने से रना चाहिये। हाय, वत्स ! हाय, मेरी गोरके हठो! हाय, मेरी आमा पुल के संकुर ! हाय, प्रियदर्शन ! हाय, दुशासन से अभिन्न हाय, देकौरवरले हा हतः बुमारो वृषसेनोहाहन इति महालाल उस्पिन:। देव महत्या देल गई प्रेक्ष्य हतसारथितुरजम सूनातपत्रके नुक्श स्वगंपरि- चतुर्थोऽङ्कः ૧૭૧ एक-देव, तब अर्जुन ने जिसका बाणो का बरसाना केवल प्रचण्ड बालो मेरो के घोष मात्र से जाना जा रहा था, बाणों से ऐसा म) किया कि न आकाश दिखलाई देता था, न स्वामी, न रथ, न कुमार, न ध्वज-दण्ड, न सेनायें, न सारथि, न घोड़े, न दिशायें र योद्धा ही। नि-(आश्चर्य से) इसके बाद? एक-देव, इसके बाद क्षण-मर में याणों को वृष्टि के शान्त होने पर ओं के हर्ष से सिंह-नाद और कौरव सेनाओं के कहण-क्रन्दन करने 1-(आँसुओं को रोककर) इसके बाद? -देव, तब मैंने हृदय के मर्मस्थल को बींधने वाले एकमात्र बाण शरीर वाले कुमार को, जिसका सारथि और घोड़े मार दिये गये एक, यनुष, चामर और ध्वज-दण्ड काट दिया गया था, और जो हए देर बालक के समान प्रनीत हो रहा था, रथ में पड़ा हुआ दाने ! हाय, दापुर में प्रिय शिष्य ! हाय, वीर्य के सागर ! हाय, शुओं के प्रेगी ! मुझे प्रत्युत्तर दो । । ना मुरकुमारकमेकेनैव मर्मभेदिना बाणेन भिनदेह रथम परिस्थित मागतः । भत्र तुभिह्नम् । कुमार प्रेयाहमागन इस्यन्वयः । एव दुष्टं ललितं पस्य । राधेवस्य कुन तस्य प्ररोही राधेमस्त्र 4 स्थय । प्ररोहोर। ।

, . प्रतः-समाश्वसितु समाश्वसितु महाराजः । (इति पटान्तेन योजना दुर्योधनः-(लब्धसंशः) भद्र सुन्दरक, ततो षयस्येन कि प्रतिपनमा सुग्दरक:-ततश्च देव, तयाविषस्य पुत्रस्य शंनेन शंगलितमा सनदेशितपरप्रहरणाभियोगेन स्वामिगाइगराजेनाभियुक्तो धनंजयः । मुतवधामर्थोद्दीपितपराक्रम विमुक्तमोवितासं तया पराकामना र मोसा [तो अ देव तहाविधारा पुत्तरस दंगणेष, संगलिद बराल सलवेषिनदारणहरणामिजोएण सामिणा अङ्गराए अभिनोry ह भ मुहबहामरिगुड़ी विपरकम विमुकजीविदास तह पगमन । पर्याप्ततिा पर्याप्तं तृप्त यथेष्ट या नेमायतं वा) या तमा 1 सो पत्तिनिवारणे। इनि विभ:। यति रम्पम् । उड़ियमानमूद्रादा। एतासमयानन र मागाह (मापार तपाई निर्गमे परिवतिमा हयित्र धागृतं nिtent १७२ वेणीसंहारे पर्याप्तनेत्रमचिरोदितचन्द्रकान्त- मुद्भिद्यमाननवयौवनरम्यशोभम् । प्राणापहारपरिवर्तितदृष्टि दृष्टं कर्णेन तत्कथमिवाननपङ्कजं ते ॥१०॥ मूतः-आयुष्मन्, अलमस्यन्तःपावेगेन । दुर्योधनः-सत, पुण्यवन्तो हि दुःखभाजो भवन्ति । अस्माकं पुनः प्रत्यक्षं हतबन्धूनामेतत्परिभवाग्निना। हृदयं दह्यतेऽत्यर्थं कुतो दुःखं कुतो व्यथा ॥११॥ (इति मोहमुपगतः)। सरोवपाञ्चालरमुखंरन्तरितो धनंजयस्य रथवरः । भीमााउममहदेवाशासपमुहि अन्तरिदने घणास रहकरो। दुर्योधन:- ततस्ततः । - नरम् । मोनामो : १७३. चतुर्थोऽङ्कः ने तुम्हारे उस विशाल नेत्रों वाले, नव उदित चन्द्रमा के समान दर, नई प्रकट होती हुई यौवनावस्था से रमणीय शोमा वाले, कमल-सदृश रको प्राणों के निकल जाने के कारण पलटी हुई दृष्टि वाला हो जाने पर से देखा होगा ? 100 इत-आयुष्मन, शोक के अधिक आवेग से बस कीजिये। दुर्गेधन-सूत, पुण्यशाली लोग ही दुःख का अनुभव करते हैं। लेकिन ? सामने हो मिसके बन्धु मारे गये हैं, यह हृदय अपमान की अग्नि से यधिक बल रहा है। (इसलिये हमें) शोक कहाँ ? पोडा कहाँ ? uttu यह पहकर मूञ्छित हो जाता है)। भा-धर्य थिये, महाराम पंर्य रखिये। (आचल से हवा करता है)। शुओंधन-(पेतना पाकर) भद्र सुन्दरक, तब मित्र भंगराज ने क्या किया ? सुगरक- देव, इसके भार इस प्रकार (दुरदायाप्रस्त) पुत्र को देखकर हते हुये भामुमों को त्यागकर शत्र के मापुओं के प्रहार को चिन्ता न करते बामो भगराज मे अर्जुन पर माक्रमण किया । पुत्र-चप के प्रोष से प्रोत्सा- अपराधम बासे मोर प्राणों की माला डकर मत्यधिक पराक्रम रिपलाते से (को) देखकर भौम, मदुल, सहरे और पाप मारि बोरों में मरपको मोट में कर लिया। पाँचन-सके पार अपमिति। [मणोः समीप ति प्रत्यक्ष हतनामागाई] एलाय पिनमः । पिरिम एव अग्मिातेन । भरपर्व भूगरते । गुन ति हरसम्य स्यानागारित भव्यथयोरतमासकारात भाव ॥११॥ प्रतिवनमजोरतम वापिस परिसर । बगानमुः । सममित अणित: परेश हरपालाममियोप बाय । iii । पुराधारमोनोरोपिर: पामो बाम तम् । लिपुत्र MAN देर । जोगिनियमावलि । र मेर महापुररितोय AREA free 4. पर . [40 m fr-1ो पाप १७२ सुपर: - multip-ATI, हा Ram R. Tीमा Anari रिया मोfre; मामी मनाहा मामिनः । रहो कानुन भीमrgrlz Ax rafratiनगिम कि हो होगामी गमगायो बार म गमामा.मो। पोंगतः - aAI गुपएक:~ne refमना gfat rae परिनोनीतमन्यं Kit दो मित्राय मयि हििनिशिता पुरक एहोति माग छ । तार गतः स्यामिरामोरम् । ततोपनीय शोयानापट्टिको शरीरमनिमः यो मिमिनिममुवं मागं यातिपविती देवस्य सोशः। (इनि पटक यति)। [तो अ गामिणा गुर विपिन परिणोणीदं अम्मा रहे पछि दोह निस्समिस मा दिट्टी विरिणबिनविदा । गु-दरअ एहि ति मरिणदा वह उयगदो सामिसकीयम् । तदो अवणी मीमहागादो पटुिंअं सरीरमंदिदै वाणिबिंदुहि लित्तमुह वाण पदुम अभिलिहिन पंमिदो देवरस सदेमा ।) (दुर्योधनी गृहीत्वा वाचति यथा) स्वस्ति । महाराजदुर्योधनं रामराइगणाकणं एतदन्तं कष्ठे गाढमालिक जापयति । अस्त्रग्रामविधौ कृती न समरेष्वस्यास्ति तुल्यः पुमान् भ्रातृभ्योऽपि ममाधिकोऽयममुना जेया: पृथासूनवः । वत्संभावित इत्यहं न च हतो दुःशासनारिर्मया त्वं दुःखप्रतिकारमेहि भुजयोरिग वाप्पेरण वा ॥१२॥ राधेय स्खलिततुरङ्गमो भग्नबूवरस्ते रयां न योग्यो बोढुं भीमार्जुनाम्मा सांप्रतमायोधितुम् । ततः परिवर्तितो रथो बहुप्रकार च समाश्वामितः । मिना सुचिरं विलप्य परिजनोपनीतमन्यं रथमारुल्ल दाणेन दीर्घ निःश्वस्य हट्रिनिहिता । सुन्दरक आगच्छेति भरिएतं च । तत उपगतोऽहं स्वामिय

ो देखकर और लम्बा सांस लेकर मुझ पर दृष्टि डाली और कहा-
र शरीर से निकले ये घिर के बिन्दुओं से बाण को भीगा मुख करके
१७५
चतुर्थोग्वः
सन्दरक-- देव, तद शल्य ने कहा - 'अंगराज, तेरे रथ के घोड़े मर गये हैं
पूवर (फड़, बांस) टूट गया है। इसलिये भीम और अर्जुन के साथ युद्ध
ठीक नहीं है । यह कहकर उसने रथ तौटा लिया; स्वामी को रथ से
रा और अनेक प्रकार से सात्वना दी।
दुर्योधन - इसके बाद?
सरक - तब स्वामी ने बहुत देर तक विलाप करके, सेवक द्वारा लाये
एक आभी। तब मैं स्वामी के समीप गया। इसके पश्चात् सिर से पट्टी
। (यह) सन्देश भेजा है । (यह कहकर पट्टी देता है) ।
(दुर्योधन लेकर पढ़ता है)
वस्ति । कर्ण युद्ध-भूमि से महाराज दुर्योधन का यह अतिम कण्ठालिङ्गन
-
निवेदन करता है-
--
ह शस्त्र-समूह के प्रयोग में चतुर है। कोई भी पुरुष युद्ध में इसके सुल्य
यह मुझे भाइयों से भी अधिक है। यह पाण्डु के पुत्रों को जीत लेगा,
वार से मापने मेरा सम्मान किया, लेकिन मै दुःशासन के शत्रु को न
।, (इसलिये अब) भाप स्वयं (अपने) भुजाओं के बल से अथवा
से (अपने) शोक का प्रतिकार करो' ॥१२॥
। ततः शीर्षस्थानातराट्टिकामपनीय स्वशारीरसगलितं. पाणितविन्दुभि
अत्र यरस्तु युगंधरः इत्यमरः । शो मस्तकम्।
1
यमुख
सनीय [दूरीकृश्य] ।
।
मस्त्रति । अयं गणं. [श्चमामस्यागमूहस्य थियो प्रयोगे ती कुगल. ।
नेनागरेणाहं यत्समाति भवता प्रसिदः सः । प्रतियारः प्रतीराराति
भेदः । त्वं प्रतिसारमेहि गन्छ । तथा ५ युरप्पा पा । दिशा श । राजन
सामं स्पति भावः । अहं तु सर्वया न समों मपि सन्ति मार्यभार
मिनि निः । तदुक्त माहित्यदर्पणे तापमानापोयानि रवाप-
नन् इनि। ॥१२॥

पुनः-( दरवा) रेश, पामंधपितो मैमिावलिः परते। पर शिबान पुरा । मन कि भग सरमा हानि । महिला बेणीमहारे दुर्योधनः- वयस्य कर्ण, मिमिदं भ्रातृशतयथःखितं मामपरेण बारका पट्टयसि । भद्र सुन्दरक, अयानी किमारम्भोगराजः । सन्दरक:--देय, अपनीतशरीरावरण आत्मवयकृतनिश्चयः पुनरपि पा- सह समरं मार्गयते । [देव अवोदसरीरावरणो अप्पवहरिदनिधो पुरो पत्थेण नह समलं मग्गदि। बुर्योधनः--(आयेगादासनादुतिष्ठन्) सूत, रथमुपनय । सुन्दरका र मचनात्वरिततरं गत्वा ययस्यमङ्गराज प्रतियोषय । अलमलिताहसेन । एवायमाघयोः संकल्प । न पतु भवानेको जोषितपरित्यागाशी। हत्या पार्थान्सलिलमशिवं बन्धुवर्गाय दत्त्वा । मुक्त्वा वाप्पं सह कतिपयमंन्निभिश्चारिभिश्व । कृत्वान्योन्यं सुचिरमपुनर्भावि गाढोपगूढं संत्यक्ष्यावो हततनुमिमां दुःसितो निती च ॥१३॥ अय पशोर मया नहिचिरांदेश्यम् । वृषसेनो न ते पुनो न मे दुःशारानोऽनुजः । त्वा योधयामि किमह स्वं मा संस्थापयिष्यसि ॥१४॥ मारक:-पोर आमरति । (हनि निशान्तः) । जो आगो इपमार्गमेष रपमुराधालय। सामिपरिमोतीगोपः। रोपन-mar समोस । सामः पाने । शरीरान मनाह । Sarraft JRATसम मानगम् पसरः । .! am I HIT giri न ४-.

१७७ चतुर्थोऽङ्कः दुर्योधन--मित्र कर्ण, सो भाइयों के पप से दुःखी मुझको यह दूसरे वाणी बाण से क्यों बौंध रहे हो ? भद्र सुन्दरक, तो अब अंपराज क्या काम कर सुन्दरक-महाराज, अपने शरीर से कवच उतारकर और आत्मघात का चिय करके वह फिर अर्जुन के साय युद्ध को प्रतीक्षा कर रहे हैं । दुर्योपन-(जल्दी से आसन से उठकर) सूत, रय साओ। सुन्दरक, तुम 'बहुत जल्दी जाकर मेरी ओर से मित्र अंगराज को सचेत करो आपयिक आहत से दस करो। हम दोनों का निश्चय एक ही है। केवल एक भाप हो पछोड़ने की इच्छा नहीं कर रहे, प्रत्युत- "पृथा (कुन्सी) के पुत्रों को मारकर, बन्धु लोगों को भमंगल जल देकर रंण करके), (शेष बचे हुए) कुछ और शत्रुओं के साय औसू बहार परस्पर मारा न होने वाला (अर्थात् अंतिम) गाढ आलिंगन करके इसी रणत हये हम दोनों इस अधम शरीर को स्याग देंगे। ॥१३॥ "पुत्र के) शोक के विषय में मुझे कुछ नहीं कहना है, क्योंकि-- 'वृषसेन तुम्हारा (ही) पुत्र नहीं था. दुशासन मेरा हो) छोटा माई नहीं । मैं तुम्हें या सामना? तुम ही मुझे धर्य बंधानोगे ॥१४॥ सावरक-जो महाराज आज्ञा । (यह पहकर निकल जाता है)। दुर्योधन--शीन हो रथ लाओ। सूत्र--(कान लगाकर) देव, हिनहिनाहट से मिश्रित पहिये को मि रिपि, घरे) की आवाज सुनाई पड़ रही है। इससे सोवता (4) सिपाही सेवक द्वारा लाया हुआ है। दुर्योधन-पूत, जाओ, तुम संचार करो। ती मुमुक्षू ॥१३॥ पृषसेन इति । (एपले से तवा पुशेन । पारयोरभिनयाममात दुशासनः से अनुरः बनीयान् भरना । यानि रोपः । मोर किबोधयामि समरिमा कि तापापविमसिन परिप्पा विभिन्नरवारमाननासिमनभितामविमानः || हषा अश्वशब्दः । संवलितो मिश्रः । नेमिचनमान्तःवो मोति । आवामहं दुःशासनश्च । [प्रसभं हठात् । तागापा मारा १७८ येगी राहारे नस:--पदामापयति देवः । (मिनिम्य पुनः प्रविशनि) दुर्योधनः--(विलोय) किमिति माटोति । गतः - एप पतु सातोम्बा च संजयाधिष्ठितं रथमारा मुपगती। दुर्योधनः-कि नाम सातो:म्या संप्राप्ती। पहमतिबीमा देवेन । मत, गच्छ स्वं स्यन्दनं पूर्णमुपहर। अहमपि तातदर्शनं परिक्ष तिष्ठामि । सूतः-देव, स्वदेशेषमान्धवावेतो कथमिव न समाशससि । दुर्योधनः--सूत, कथमिव समाधासयामि विमुखमागर्थेयः । पर- अर्धवावां रणमुपगतो तातमम्वां च दृष्ट्वा घातस्ताभ्यां शिरसि विनतोऽहं च दुःशासना तस्मिन्बाले प्रसभमरिणा प्रापिते तामवस्था पार्श्व पित्रोरपगतघृणः किं नु वक्ष्यामि गत्वा ॥१ तयाप्यवश्यं वन्दनीयौ गुरू । ( इति निष्क्रान्ती) * इति चतुर्थोऽङ्कः * - त्वमेको यात्यको योरिति समासः ।

चतुर्थोऽङ्कः मृत-जी महाराज हैं। (पह कहकर बाहर जाकर फिर प्रवेश । दुर्योधन-(देवकर) तुम (रय पर) बड़े क्यों नहीं हो ? मत-यह पिता जी और माता जी संजप द्वारा अधिष्ठित रप पर बैठकर राज के समीप आये हैं। सुर्योयन-या ? पिता जी और माता जी आये हैं ? बड़ा दुःख है, व अनर्य किया। सूत, जाओ, तुम जल्दी से रथ लाभो। मैं मी पिता की बचाकर एकान्त में खड़ा होता हूं। मन-महाराज, आप इन्हें, जिनके आप हो एकमात्र सम्बन्धी अवशिष्ट हैं, इला क्यों नहीं देते। दुर्योधन-पूत, विपरीत भाध घाला में किस प्रकार सान्त्वना दूं? देखो- आज ही हम दोनों पिता जी भोर माता जी का दर्शन करके पुर में आये दोनों ने प्रणाम करते हुये मेरा और दुशासन का सिर सूंघा था। बालक के शत्र द्वारा बलपूर्वक उस अवस्था (मृत्यु) को प्रास करा देने पर देय माता-पिता के पास जाकर क्या कहूँगा? ॥१५॥ तो भी माता-पिता को अवश्य वन्दना करनी चाहिये । (दोनो बाहर निकल जाते हैं) * चतुर्थ अङ्क समाप्त * रिवत्र पिता मात्रा इरयेक्शेप. । घृणा करुणा जुगुप्सा वा । जुगुप्माण । इत्यमरः । पित्रोः पारवं गत्वा किनु वक्ष्यामीत्यन्वयः ॥१५॥ असून पं रत्नधरो गुणात्यो नानागुणान्या दमयन्तिकापि । जगढरं तस्य कृतौ व्यरसीदतुरचनुर्थो दरटिप्पनेत्र । • इति चतुर्षोः

T सांप्रतं भ्रातृशतमस्य...। अत्र जात पुवा स्वरं शनैः मुवक्षित
पापारी-जात, परिसदयं जीदति मे बरसरतरत्यय रमिदेोबने।
जाद जाग, जीवतिमेच्छौ ता बहेदिकस्मि देसे दमुनि।
संजयः-मन्वेष महारान एक एव ग्यग्रोयछायायानुपविष्टतिहति ।
धाक्षतमस्य पारवें भविष्यनिजाद एआइति भणासि । किसुक्नुस
संजयः--(उपमृत्य) विजयतां महाराजः । नन्देष सातः अम्बराह
एकोपोऽवशिष्टः । प्रवालोऽङ्कुरः । प्रवालमड्कुरेऽप्यस्त्री इत्यमर ।
कचित् कामप्रवेदने इति चामरः ।]...मे पुनकस्तरकषय कस्मिन्नु बतते।
पगमोड
(म. प्रणिनि रपयाने गाया गया पूराष्ट्रप)
धाराष्ट्र:-दाम प, पिपरपर करिमनने पुलकान
परसो मे बोपनतिहति । चिनीति वाम वा।
गान्धारी-(राकरणम्) जात, एकाकोनि भति । किनु
भादुसदं से पास्से मविस्रादि ।
संजयः-तात, अम्ब, अवतरतं वरं स्यात् ।
( उभाववतररणं नाटयतः)
( सतः प्रविशति सव्रीडमुपविष्टो दुर्योधनः )
सांत
प्रातः । किं न पश्यति महाराजः ।
दुर्योधनः-विलक्ष्यं नाटयति)
एतराष्ट्रः-
शल्यानि व्यपनीय ककवदनैरुन्मोचिते कङ्कटे
बद्धेपु प्रणपट्टकेषु शनकः कर्णे कृतापाश्रयः ।
1] सवोर्ड सलज्जं यथा स्यादेवम् ।
--
1

पञ्चम अङ्क -- त्पश्चात् रथ पर सवार होकर गान्धारी. सजय और धृतराष्ट्र प्रवेश करते है) एतराष्ट्र--दरस संज्य, बतलाओ, बतलाओ कुरु-कुल रूपी कानन का एक- अवशिष्ट अंकुर, मेरा पुत्र दुर्योधन किरा जगह है ? वह जीवित है अथवा '? गान्धारी-पुत्र, पदि मेरा यत्स सचमुच जोषित है तो बतलाओ वह किस पर है? संजय-यह महाराज अकेले ही वट वृक्ष की छाया में बैठे हैं। गान्धारी-(करुणापूर्वक) पुत्र, 'अकेला है' यह क्यों कहते हो ? इस समय पास तो सौ माई होंगे। संजय-तात, अम्बा, पीरे २ रथ से उतरिये (दोनों उतरने का नाट्य करते हैं) (तब लज्जित अवस्था मे बैठा हुआ दुर्योधन प्रवेश करता है) संजय-(पास जाकर) महाराज की जय हो। यह पिता जो माता जो के साथ आये हैं । महाराज क्यों नहीं देख रहे? दुर्योधन-(लज्जा का नाट्य करता है)। तराष्ट्र- कवच उतारने पर चिमटी के मुख से बाणों के अग्रभाग निकालकर घावों नर पट्टियों के बांध देने पर धोरे से कर्ण का सहारा लिये हुए और (पहले) शल्यानोति । [कस्य पक्षिविशेषस्य बदमिय बदनं येषा तैः कवदनः स्त्रविशेषः । शल्यानि बाणानारिण [ध्यपनीय] उद्धृत्य कटे सनाहे उन्मोचित] अपनीते । कर्ण कृतः अपाश्रयः आश्रयो येन तास । आदौ भवता नजिताः पश्चाञ्च सान्वितास्तान् शत्रुपक्ष्यान् नरपतीन लीलया आलोक्यन् वान् । एप क्षत्रियाणां धर्मः यन्निजिता अपि शत्रवः सान्त्वनीया एवेति । हे कक्षवजा पोरा सह ति पापेन पुत्रविनासान्मन्दभाग्येन मया न पटः ।।१।। .

नारोशरतविरं जीव । दिमेराग्येन नयेत वाजाद मल परिसर १८२ वेणीसंहारे दूरानिजितसान्त्वितान्नरपतीनालोकयंलीलया सह्या पुत्रक वेदनेति न मया पापेन पृष्टो भवान् ॥१॥ (घृतराष्ट्रो गान्धारी च स्पर्शनोपेत्यालिङ्गतः । गान्धारी-वत्स, अतिगाढप्रहारवेदनापर्याफुलस्यास्मासु संनिहितार । प्रसरति ते वाणी । [वच्छ अदिगाढप्पहारवेअणायजाउलस्स अह्म हि सम्मिदिनु वि गप्प.रदि दे दाणी । एतराष्ट्रः - वत्स दुर्योधन, किमकृतपूर्वः संप्रति मग्यप्ययमध्याहारः। गान्धारी-वत्स, यदि स्वमप्यमानालपति सक्कि सांप्रतं वत्सो । आलपतु दुर्मर्षणो वाथान्यो वा। [वच्छ जइ तुमं वि अह्म पानपि संपदं वच्छो दुस्सासणो आलवदु दुम्मरिसणो वा अध अण्णो वा । रोदिति। दुर्योधनः- पापोऽहमप्रतिकृतानुजनाशदर्शी तातस्य बाप्पपयसां तव चाम्ब हेतुः । दुर्जातमय विमले भरतान्ववाये कि मां मुतक्षयकर गुत इत्यर्वपि ॥२॥ गाग्वारी-जात, असं परिवितेन । स्वमपि तानकोरयायपुषण हरिद्वार को माम अधिभरण मागोवदेमी तानि नी । औल गएण पा। दुर्गेधन:- ফৰ পাৰ নাম নীল। অত্যাব ? ** mar fort गोपिन । र सय प्रधान राष्ट्रमा मा पट्टा ।

+ ? - पञ्चमोऽङ्कः १८३ जोते गये और (पश्चात) सात्वना दिये गये राजाओं को दूर से ही शान से देखने ले पाप से मुन्न पापो ने यह न पूछा (पूछने का सु-अवसर न पाया)-'हे , तुम्हारी वेदना सहा तो है ?' (धृतराष्ट्र और गाधारी टटोलते हुए पाम आकर आलिङ्गन करते हैं ) गान्धारी--परस, हमारे समीप आने पर भी अत्यधिक गम्भीर प्रहारों को ग से व्याकुल हए तुम्हारी क्षणी भी नहीं चल रही है। एतराष्ट्र-वत्स दुर्योपन, मेरे प्रति भी अब तुम्हारा यह पहले कभी न गान्धारी-वरस, यदि तुम हमसे नहीं बोलोगे, तो क्या अब पुत्र दुशासन सिंगा ? या दुर्मषण अथवा कोई अन्य (बोनेगा)? (रोती है) सुर्योधन- हे माता, विना प्रतिशोध लिये अनुज का नारा देखने वाला में दो तिा की और आपके मांसुओं का निमित्त है। इस निर्मल भरत-कुल में नुचित रूप से उत्पन्न और (माके) पुषों का नाश करने वाले मुझे पार अकयों समााती है ॥२॥ गाधारी-पुत्र, विलाप मरो। अब तुम अकेले इस अन्धे पुगलको गपं बतलाने वाले हो। चिरगीवी एो। मुझे राम से अपना गप से या प्रपोजन)? दुर्योधन--- गोता। ध ने स्व राजन पतिकारायणा } तयार नि:। पति मोनामगि दा fr.. । पाप इति । हे अम्ब [अहं पापः परः स तातापपया है: रण जातोऽस्मि । पीराः । अप्रतितोलीमाविषयी योगुनासः (तपस्यनीति] नदी । गुरु रवि रिमपि जानामि । बागम् । मामिह भरताले एमां दुरपुरम् । पुन.बीहाम् । मुगिनायरम । राक्षिगोएबमभयान्वयि । भारदा उमया लाइ । ' स्वोर F - . यान्धष्ठः पुष्कलः स्यात् इत्यमरः। न मर्वव्यापीपर्य . - संजय:-महाराज, रिचार्य सौरवो बिनप-1 पटारले दुर्योधनः- अपुष्कसमिरम्। उपियमानामा हिमुरहरमन। एतराष्टः (दुयोधन परिषग्य) परम, समारमिहि । हमारा गान्धारी-जात, एतदेय सांप्रतं प्रभूतं यस्वनपि तावदेशो औपनि ।। तज्जात, अकालस्ते समरस्य। प्रसीर । एप ते शोर्याञ्जलिः। निवत्यता समा। सकालो दे समरस्सा पतीद । एसो दे सौसञ्जली। णिचट्टोअदु समरब्यापारादी [जाद एद एव सपदं प्पभूद ज तुम वि दाव एको जीवति । ता IT मातरिति । किमप्यनिर्वचनीयम् । कृपणं दीनम् । सुभत्रिया शोभनरि नातिः । वदेति । अत्यन्तासम्भवेऽर्थ दो को प्रयुज्यते इति कोपः। हेनियमो कि वितयोऽसस्पः कितु सत्य एवेत्यर्थः । रग्सु रचनादिधरहः। 1ay मान: किमयमा परम्ने मुक्षनिया भवती क चदाननं ।। नियंगले गुनगतम्स बिपनिमेशा स्वं नानुनिलयशि रक्षगि मामयोग्यन ॥३॥ भूमं विपरितगिर गुमशाप । राहरपिता प्रहम्यान रोदिति)। चास्मानिमामतिबीना मातरं च । दुर्योधनः-तात, दुतंभः समाश्वास इदानी युप्माम् । किंतु कुन्त्या सह युवामद्य मया निहतपुप्रया । विराजमानौ शोकेऽपि तनयाननुशोचतम ॥४॥ व्यापारात् । अपश्चिमं कुरु मे वचनम् । अवास्मल्यवति चात्सल्यहीने वा ॥३॥ . अपच्छिमं करेहि पअणम् ।।

पञ्चमोऽङ्कः १६५ - माता, धुम्हारा यह कैसा अनुचित और बोलतापूर्ण बचत है । कहाँ आप त्रिप धौरानना? और कहाँ यह दोनता ? हे अवत्सले, माप सौ पुत्रों वित्ति का विवार नहीं कर रहीं; मा अयोग्य की रक्षा कर ॥३॥ रवप ही यह पुत्र-शोक को करामत है। देव महाराज, क्या यह सोकोक्ति झूठी है कि पड़ा पुणे में गिर जाने में भी वहां नहीं फेंक दी जाती। वन--यह पूर्ण रूप से सत्य नहीं है। उपकार्य के अभाव में उपकार- से पया (लाभ) ? (यह कहकर रोने लगता है)। राष्ट्र--(दुर्योधन का आलिङ्गन करके) वत्स, धर्य रखो। हमें और सि अतिःखित माता को भी सान्त्वना दो। पिन--तात, अब आप लोगों को साधना मिलनी कठिन है। न तुम " मेरे द्वारा मार डाले गये पुत्रों वाली कुन्ती के साथ शोक मे श्री दोनों पुत्रों को चिन्ता करना 100m ग्यारी-पुत्र, मेरे लिये अब यही बहुत है कि एक तुम ही जीवित रहो। : हे पुत्र, अब तुम्हारे पुट का समय नहीं है। प्रसन्न होओ। मैं तेरे ड़िती हूँ । युद्ध करना बन्द कर दो और अपने पिता के वचन का पालन माणानां रक्षणीयाना भ्रातृणामभावे उपकरणेन मम प्राणरक्षणेन किम् । माये कि साधनेनेत्यर्थः।] अन्त्येति । अघ [मया निहतपुत्रया] पुन्या सह युवा [शोकेपि विराजमानी [स्याः पुत्रान् हत्या कृतवरनिर्यातनादिति भावः । तनयाननुरोचतमित्य- ४] हम्मेव...यत्वामप्येक नानुशोचयिष्ये ! तजात प्रसीद । एष ते शीर्ष । निवर्पतामेतस्मात्समरच्यापारात् । अपश्चिम कुरु पितुर्वचनम् । अत्र युक्तम् । शीर्षअतिः प्रणामः । अपश्चिममलइभ्यम् । सपत्नः त्रु:

मायः। पापा इत्यर्थ: निनामावेनापजाना। या कामपनः हावाप.कारमानामा सपागोr. यु मोरयसपक्षिा 2 प्रतिशत कानुन बमा मेमानो प्रिय रिपुःfrom गाय १८६ वेणीसंहार तराष्ट्र:-- यास, शृणु वचनं तवाम्याया मम च निताशेषपुर- दायादा न ययोर्वलेन गणितास्तो द्रोणभीष्मौ हतो कर्णस्यात्मजमग्रतः शमयतो भीतं जगत्फाल्गुनात् । वत्सानां निधनेन मे त्वयि रिपुः शेषप्रतिज्ञोऽघुना मानं वैरिषु मुञ्च तात पितरावधाविमौ पाल दुर्योधनः- समरात्प्रतिनिवृत्य कि मया पतंव्यम् । गान्धारी-जात, परिपता से विदुरो वा भणति । [जाद ज पिदा दे विउरो वा भएादि। संजयः - देव, एवमिवम् । दुर्योधनः, संजय, अद्याप्युपदेष्टव्यमस्ति । संजयः-रेव, पावरप्राणिति तावदुपदेण्यभूमिविजिगीषुः प्रभाव दुर्योधनः--(मक्रोधम) समस्कायद्भयत एवं प्रशावतः संत्रस्य मुरवशम्। VALE:-परस, युक्तवाहिनि संजये दिमत्र भोगेन । rani तरमेव भवन्त मोमिा भूपताम् । दुर्योधनः नयनतातः । ए:-परम, किमितरेण । संघता मशनिवानीमपिyfair ধর্ষন तिपयोबसेन दाय त्रिदिनामावदानीति का। - -- - पान र पागुन । तष्ठिाप गुग्यनुराधा इत्यादित

पञ्चमोऽङ्कः
१८७
गर-पुत्र, अपनी माता के और मेरे जिसके सब धन्यु मर गये हैं।
मुनी । देखो--
नके बल पर दायानों (हिस्सेदारों) को चिन्ता नहीं की, ये भीष्म और
रेपये कर्ण के सामने ही उसके पुत्र को मारने वाले अर्जन से संसार
मेरे पुत्रों को मार देने के कारण इस समय सानु (केवस) तुम्हारे
ही शेष प्रतिज्ञा पाला है। (इसलिये) हे पुत्र, श के प्रति अभिमान
। और इन अन्धे माता-पिता का पालन रो॥
पर-पुर से पराङ्मुख होकर मैं क्या कहेंगा?
पारी-पुर, तुम्हारे पिता अमया विदुर जो पुष्पहें।
प-महाराज, यह ठीक है।
पिन-जप, पया अब भी उपदेश रा अवसर है
पि-महाराज, विजिगीषु (विसपार्थों ) सक जीवित एता है, तब
मानों के परेशापार होता है।
पिन-(ोध से) माझा तो, हम भाप हो बुद्धिमान अपने लिये
रदेश गुनते हैं।
NEER, उचित रात एने वाले संजय पर हम विषय में बोय
से हो । यदि माप दास्त हो जाये तो मैं ही मार से गंगा।
पिन-पितरोन्हें।
-पुत्र, दिरतार से मया (लाम) ? भारी मशीर पर
?
पाहा पाए ।सार मारित्यय । म |
स तामेति गाम्ना पो वा मुशिप्पोमा ..
र प. IN.बर। पामगरव्या
कि रिपुदपि न । रnteerfect
माय fमा rmmm
नाते पुिणे मार हिलोला
र । मरमा प्राभिनहोसry frri.

स्वासया यदि परे दाता भवन्ति तदा सं. सम संवा कमी 4 100 प्राणान्धारयामीति । बहुच्छलत्यात्मनामश्यानुजनारामाराङ्कमानो का पुरिति स्मृतः ॥' इति विजिगोपुलक्षणम् । वलच्याविहुलवाद । अम्दा बढी दोपः । वालिशत्वेन मूर्खतया सजयो बदतीति शेषः । नाम 'निश्चये। ज्वरस्तातस्येति शेषः । तातेत्यादि हे तात दुर्योधनः कथं सधि करिष्यनीत्यन्दर अस्खलितमविनष्टं । साम संघानम् । [दृष्टा] पितामहो मीमः । आचार्य द्रोणः । अनुजा दुःशासनादयः] राजमर्क क्षत्रियसंघः । इत्येवा विपति। सः । ] [स्वशरीरमेव स्वशरीरमा तस्मिन् स्नेहस्तम्मान । ] मि। [उदात्ताच ते पुरुषारच तेषां वीडामावहतीति चोदावहम् 1] उदातायात होयमाना इति। किलागौ। रिपोरहितात् । हीयमाना हीनाः भूपाः पश- वेणीमहारे दुर्योधन- 1- सास, तनयाहत्यारम्बा गानिमारमंडया भावीतु । गुम्मासमय व्यामोहः । अप या प्रमनि पुरताशजन्मा हर भापथ ताल, मावतितभ्रातृशतोहं पा तापीरितदामुदेवमामो संप्रति हि दृष्टपितामहापार्यानुगराजयाविपत्तिः स्वशरीरमात्रस्नेहा प्रोगवहममुखावसानं कमिव करिष्यति दुर्योधनः सह पाइदै हो अन्यथ । नयवेदिसंजय, हीयमानाः किल रिपोनृपाः संदघते परान् । दुःशासने हतेऽहीनाः सानुजाः पाण्डवाः कयम ॥६॥ एतराष्ट्र:-वत्स, एव गतेऽपि मनाईनया न किदिन्न करोति युधिर्धा अन्यश्च । सर्वदेवाप्रटमारमानं मन्यते युधिष्टिरः। दुर्योधनः- कमिव । धृतराष्ट्रः--वत्स धूयतां प्रतिज्ञा युधिष्ठिरस्य । नाहमैवस्वारि भाभि रोचते तदेवासो सनः संधातुम् । संजयः- एवमिदम् । गान्धारी-जात, उपपत्तियुक्तं प्रतिपद्यस्व पितुर्वचनम् । [जाद उन्वत्तिज्जुत्त पडिवज्जस्स पिदुणो वाणम् । करमुत्तमकपालजाकरम् । दुःखान्तं च ।

१६॥ - - -- l, पुनम जय [बकलता कारण माता जी तश मूर्खता के कारण संजय इस प्रकार भले ही हैं, लेकिन आपको भी यह बुद्धि-विभ्रम ? अपका पुत्रों की मृत्यु से उत्पन्न शोक का ही यह प्रमाय है। और दूसरे, पिता जो, जब मेरे सौ माई नष्ट नहीं हुए थे, तब मैंने कृष्ण के शान्ति प्रस्तावना की अवहेलना कर दी थी। अब दुर्योधन, जिसने पितामह, आचार्य, छोटे भाइयों या राज-समूह को विपत्ति (मृत्यु) देख लो है, केवल अपने शरीर के प्रति मोह के कारण पाण्डवों के साथ उदात्त पुरुषों के लिये RR-जनक और इखमात्र परिणाम वाली सन्धि कैसे करेगा? और भी, हे नोतिविन संजय, र से निर्बल रामा तोग ही शत्रु से सन्धि किया करते हैं। (त) शासन के पाने पर अनुज-समेत प्रवल पाण्डय क्यों (सब्धि करेंगे) ॥६॥ एतराष्ट्र-वत्स, ऐसा होने पर भी मेरी प्रार्थना पर युधिष्ठिर स्वरय हो कुछ भी कर लेगा। दूसरे, युधिष्ठिर हमेशा ही स्वयं कोहीन समाता है । दुर्गापन-कसे? तराष्ट्र-वरस, सुनिये, पुहिर की प्रतिमा है कि.--'मैं एक भी माई के मर जाने पर प्राण धारण नहीं करूंगा।' पुरके अनेक रपटों से पूर्ण होने के पारण भाइयों के ना रने वाला वह (युटिर) अब भी आपको माला मगे, सब हो सन्धि करने को संसार है। संजय-यह बिल्कुल ऐसा ही है। गान्धारी-पुत्र, पिता के पुतियुक्त प्रचन को स्वोnो। भार: । दुःशासने हते सति सानुमाः पाणया महीनाः सन्त पंप मन सरपं:॥६॥ एवं गतेऽपि भवदुतनोनयंपायरवेजोरप । मम मात्रया पुरिनि सत्येवं म । रितु सिरोस्येव । नतु हे राजन मुधिष्टिर सम्मेवार नेशनुमन्यते । तस्य दक्षिणा घारापालाम्मति भावः । पयिक मिस्यः । यानि [पनि यस्मिनमो पदमरतस्य मायः पंतप्मात् । ] भरते ते तुम्यं रदिविषयीभनि । पानी रवि पनुपी । उतियुक्तं प्रतिदिनम् । रिस ?

इति । तसंख्याया एक्वचनान्तेनव दाशब्देनोक्तवादात्मजपदेन बहुवचनान्दन , गान्धारी- (आवयं गमयम् जात, तत् हाहाकारविषं कि संजय:-अम्ब, भूमिरियमेवंविधाना भीषजनासताना महानिनादातराम । दुषिन:-तात, प्रसीद । पराङ्मुख खलुवमस्माकम् । पावरपरम- हतास्तथा तदापीति भाव. । कोहशा: । अभिमुखं कुद्धायातमन्तो नाशमन्द्रः। इदं विशेषए मगरसुतेष्वपि । एव कलितभुवना इत्यापि, माला (विपर्यये भवान् धुर न बहेतु चेत् क्षात्रवृत्तिः दात्रियधर्मः। अनौत 'हाहाकारविमिथं तूयंरमिन धूयने। अस्याहितमनिष्टम् । मुहर्तमी १६२ पेणीमंडारे अभिमुपमरीन्नन्त संग्ये हताः शतमात्मजा वहतु सगरगाढा तातो धुरं महितोऽम्वया ॥८॥ विपर्यये त्यस्याधिपतेरखितः क्षात्रधर्मः स्यात् । ( नेपये महाललासः) धूयते। [जाद कहिं एवं हाहाकारमिस्म तूररमिद सुरणीअदि।] एतराष्ट्र:- यत्स संजय, भायतामतिभैरवः खलु विस्तारो हाहारदः । कारणेनास्य महता भवितव्यम् । किचिदत्याहितं न श्रावयति तावदेवाज्ञापय मां सनामावतरणाय । गान्धारी-जात, मुहूर्त तावमा मन्दभाग्यां समाश्वारुय । [जाद, मुहुत्तरं दाव में मन्दभाइणी समस्ससेहि।] एतराष्ट्रः-वत्स, पद्यपि भवान्समराय कृतनिश्चयस्तथापि रह परप्रतीया पायश्चित्यताम् । दुर्योधनः- प्रत्यक्षं हतवान्धवा मम परे हन्तुं न योग्या रहः कि वा तेन कृतेन तैरिव कृतं यन्न प्रकाशं रणे । अभिमुखं यथा तथा अरीन् नन्तः] तवात्मजाः शतं शतसंख्याका हता अतोऽम्बया सह सगरेणो धुरं तातो वहतु । यथा सगरस्य शतं पुत्राः मधुष । च तदभिधानादन्वयः । ऊढां धूनाम् ।।८।। ममाश्वामम । अत्र मुहर्तकमित्या स्वार्थ कः । प्रतीशतो पञ्चमोऽङ्कः गये (सुम्हारे) सौ पुत्र युद्ध में सामने होकर शत्रुओं पर प्रहार करते ये हैं। इसलिए अब) माता-सहित पिता सगर द्वारा बहन की गई ) पुरा को धारण करें ॥५॥ विपरीत होने पर तो अधिपति के क्षात्रधर्म का उतन होगा। ( नेपच्य में प्रचण्ड कोलाहल होता है) --(सुनकर भय से) पुत्र, यह हाहाकार से मिश्रित पाय-ध्वनि दे रही है। --अम्ब, यह तो भोर लोगों को हराने वाली इसी प्रकार की प्रचण्ड भूमि है। --वारस संजय, मालूम करो। यह हाहाकार का शब्द तो बड़ा प्रवण है । अवश्य ही इसका कोई महान कारण होगा। |--तात, कृपा कौजिये। हमारा ही भाग्य विपरीत है। जब तक अन्य अनिष्ट नहीं सुनाता, तब तक ही मुझे पुट-भूमि में उतरने जिये। -पुत्र, मुहूर्त-मर मुश अभागी को घर्य बंधामो। -वरस, मधपि मापने पुर के लिए निरषय लिया हमा है, फिर से केवघका उपाय सोचो। भने सायों को मारने पात पिकर मारने पोग्य नहीं है। करने से श्या (लाम) जो उनके समान पुर में प्रकट रूप से रति । [प्रश्पक्ष यस्मा लोपानां वा समक्ष हताः बामा शारा को रहः गुप्त हन्तं न पोग्याः। प्रायसाकारित प्रापक्षमेव हनने मित्यर्थः । पाठान्तरे] मम रपः पराहन न हम इस्पन्नमः । हेन येन तेन वा किम् । तु न for पि. मप्रकाग] प्रान मोयनोयम् । यदिरा गाभिमायमे वितरति पाटे पपा : पभिः निल रामरामना- यतः कालानुरूपं प्रतिविधानमिदानी भो भो योधाः, निवेदयन्तु मवन्तः पोरवेश्वराय हवं मातदनं प्रन शन्येनैव रथेन याति शिबिरं शल्यः कुरूशल्ययन ।। 'दुर्योधनः- (श्रुत्वा साराङ्कम) आः केनेदमविस्पष्टमानिपातदारा- पुत्रनासकरः । भवतीत्यत्र पुंवद्भावाभावः प्रियादिपाठाइ । स्त्रियापन योगविभागाहा। कियन्तोऽल्पा: । केवलं देवमेव श्लाघ्यमस्तु। पादन साम्यं समता निष्पक्षपातित्वमिति यावत् । मेदिनी निष्पाडवा माता " शल्यः अन्येनंव समेत गिगि मातोश्यन्वयःR १६५ वैतीगहारे गाधारी--जात, एकागवार गाहाम्य करिष्यति । [नाद एमा तुमम् । को दे महापतसं करिस्माद), दुधनः-- एकोऽहं भवतोमुतक्षयकरो मातः कियन्तोरयः साम्यं केवलमेतु देवमधुना निप्पाण्डवा मेदिनी ॥ (नेपथ्य लालानन्तरम) भसमप्रियथयणपरामुपतया। तथा हि। त्यिक्तप्राजनरश्मिरविततनुः पार्शङ्कितर्गिण- वाहैः स्यन्दनवम॑नां परिचयादाकृष्यमाणः शनैः । वार्तामङ्गपतेविलोचनजलरावेदयन्पृच्छतां' पितम् । कः कोऽत्र भोः । (प्रविश्य संभ्रान्तः ) सूतः - हा हताः स्मः । (इत्यात्मानं पातयति) दुर्योधनः- अयि कथय कथय । दित्यर्थः। हे मातरेकोऽहमद्वितीयः श्रेठो वास्मि । कोश ! क्रिया नास्ति तत्र कृम्बस्तयो ग्राहा इति व्युत्पत्तिः ॥६॥ करनं पापं भीषणं वा । कदनं भीपणे पारे इति विश्वः। - ? पञ्चमोऽङ्कः १६५ गाधारी-पुत्र, तू अकेला है। फोन तेरी सहायता करेगा? दुर्योधन- मैंने अकेले ही आपके पुत्रों को नष्ट कर दिया है, (फिर) हे माता, शत्र ने हैं ? अब केवल माग्य ही समान (निष्पक्ष) हो जाय तो पृथ्वी पाण्डवों हित (हो जायेगी) ॥६॥ ( नेपथ्य में कलकल ध्वनि के पश्चात् ) हे धोर लोगों, आप कौरवों के अधिपति से इस वर्तमान महान अनयं को ना दें। अप्रिय सुनने के विषय में मुंह मोड़ने से बस करो। पोंकि जो मोचित है, अब उसका प्रतिविधान सो करना ही होगा । क्योंकि--- चाबुक और लगाम छोड़े हुए, अर्जुन के नाम से अद्धित बाणों से चिह्नित र वाता, रथ के मार्ग से परिचित होने के कारण घोड़ों द्वारा धीरे-धीरे ले जा जाता हुआ, पूछने वालों को औखों के आसुओं से अङ्गराज का वृत्तान्त त करता हुआ और कुरु लोगों को शल्प के समान वधता हुआ (पह राजा) न खाली रथ से अपने पड़ाव की ओर जा रहा है ।॥१०॥ दुर्योधन-(सुनकर आशङ्कापूर्वक) आह यह अस्पष्ट और वन-पात के न कठोर घोषणा किसने की है ? यहाँ कोई है ? ( प्रवेश करके घबराया हुआ) सूत-हाप, हम मारे गये । (यह कहकर स्वयं को गिराना है)। दुर्योधन - अरे ! बताओ, बताओ। कुरुबलानि शल्पयन्दुःखितानि कुर्वन् । पीडश । (स्पसमाभनरश्मिः को प्राजनरमी येन स तथा । प्राउन पएना इति स्यातम् । प्राजन सोदन नम् इत्यमरः । रश्मिर्वल्पा । [पार्थस्य अङ्कः चिह्न म संजात एपामिति नाहितः मागंणर्वाणः । कलम्बमार्गणाराः इत्यमर । अदितत: दलदरमना परिचयायमार्गानुसधानाद । बाहः पानमन्दमाकृष्यमाणः । छता अनाना पृष्टभ्यो जनेभ्य इत्यर्थः । अङ्गपतेदाता : पयन् । तपा च कर्णो मृत इति रोदनेनैव सूचिन मिति भावः ॥१०॥ भनि सम् । उभयं रियाविशेषणम् । उपोषितमुमचः पादः 7: Anil । .

मत्स दुर्योधन, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । समाधासय तपस्विनी या वृपसेनवत्सल विहाय यासि माम ॥१४॥ - शल्येन यथा पाल्येन मूच्छितः प्रविगता जनायोज्यन । -दुर्योधनेऽपि हि कृतो भवता निराशः ॥१३॥ सत्येनेति । हे देव अयं जनीयः शल्येन राशा हेतुभून तिर कीधेन । प्रविशता । भजनौयमेव । कर्णस्य रयमपिस्डेन चाया मूधितो जनोयो भवति । वह रपम् । मनोरपमिव । पूरि गीगहारे एतराहमयी-म्यता कायनाम । मन:-मायुष्मन, हिमग्यत । शून्यं कर्गस्य रथं मनोरयमिवाधिरूढेन ॥११॥ दुर्योधनः-हा वयस्य कर्ण । (इति मोहमुपगतः) गान्धारी-जात, समापतिहि समासहि । [जाद समरसम इन संनया-रामागितु समायसितु देवः एतराष्ट्रः-मोकप्टं कष्टम् । 'भीष्मे द्रोणे च निहते य पासीदवलम्बनम् । वत्सस्य मे सुहृच्छूरो राधेयः सोऽप्ययं हतः ।।१२।। वरस, समारवसिहि समारवसिहि । ननु भो हतविधे, अन्धोऽनुभूतशतपुत्रविपत्तिदुःखः शोच्यां दशामुपगतः सह भार्ययाहम् । अस्मिन्नशेपितसुहृद्गुरुबन्धुवर्गे - - दुर्योधनः- (लब्धसंशः) अयि कर्ण कर्णसुखदां प्रयच्छ मे गिरमुद्गिरन्निव मुदं मयि स्थिराम । सततावियुक्तमकृताप्रियं प्रियं स्मो भवामः। याच्छिन्दः॥११॥ ।

पशमोऽङ्कः एतराष्ट्र और संमय-कही, कहो। सूत--आयुष्मन्, और क्या ? राग्य (अपूर्ण) मनोरथ के समान कणं के मने रप पर बैठे हुए (राजा मे शिदिर में प्रदेश करते हुए शल्प नामक धात्र के समान इस जन-समू सित कर दिया है ॥१॥ दुर्योधन-शय सक्षा कर्ण (यह कहार मूस्छित हो जाता है)। पापारी-पुत्र, धर्म रखो, धर्य सयो। पंजप- रखिये, महाराम पंर्य रखिये। एतराष्ट्र-ओहाल है! नीम और द्रोण के मामाने पर (हमारा) मो अवसम्बन पा, मेरे पुः वह यह बोर राधा-पुत्र (कर्ण) भी चला गया ॥२॥ सधैर्य रख, रष । मरे भषम माग्य, पुओं की मृत्यु के पो भोग का मा मैं मन्या पली महिला (पि भवराप्रास हो गया है। (भब) तुमने इस दुर्योधन के विषय सवित्र, गुरु मोरगं में से कोई भी शेष नही रहा है. मुझे कररिया हैman दुर्योधन को और मनी र मालागेर पानी। पोपन-(पतला प्राम)। र, मुग, मानो, स्थायी हर्ष औसत एएम मुमो गानों को पोगाणी गेलो।सेन मेयरोगाले, yिs कर पाये मुमप्रिय पोसाको माहे हो व इति। (माभून लपुर पितालमा मह पोच्यो समुः। भोपिरो निर पुराणों का रिमोरातापितरातो Itu निमिनि Infrant... सपनी में कम पyet the Lice,Hire. Trir | उपमेमोर . ममेति । तस्मिन्ननानामधिपे ते सत्युच्छ्वसनप्यहं लग्जे । स्वासधारणी लजा करोमि । आश्वासे का कथा। [सुदरापेतं तु समाश्वासनमिति माhary शोचामोति । अघुना शत्रुहतं शोध्यं शोचनामपि वासन शोचामि । बन्धुवर्ग घन सोचामि । तु किंतु येन कर्णे अतिदुःभर अनित श्रोत दाक्यम् असाधुतम् । क्यों हत इत्यर्थः। तस्य कुलस्य समरे निल नारा कर्तास्मि ।] येन कर्णेन मम मसाध्वयोग्यमतिदुःयवमत्पर्य वान। 160 नहारे (TRAIXTTrm.) (स गमागमति) दुर्गापन:- ममं प्राग्गाधियः सम्मिन्नानामधिप हो । उच्छ्वगामपि सज्जेजमाश्याम तात का कया ॥१५॥ अपि शोचामि गोच्यमपि शत्रुहतं न वत्सं दुःगामनं तमधुना न च वन्धुवर्गम् । येनातिदुःश्रवमसाधु कृतं तु कर्ण कास्मि तस्य निधनं समरे कुलस्य ॥१६॥ शान्धारी-जात, शिपिलय तावत्क्षणमा बापमोक्षम् । जाद सिढिलेहि दार खपमेत्तं पापमोक्तम् । धृतराष्ट्रः-वत्स, क्षणमा परिमार्जयाणि । दुर्योधनः- मामुद्दिश्य त्यजन्प्राणान्केनचिन्न निवारितः । तत्कृते त्यजतो बाप्पं कि मे दीनस्य वार्यते ॥१७॥ सूत, फेनैतवसंभावनीयमस्मरकुलान्तकरं कर्म कृतं स्यात् । सूतः-आयुष्मान, एवं फिल जनः कथयति । -4 . .

१६ पञ्चमोऽङ्कः (फिर मूच्छित हो जाता है)। ( सब सान्त्वना देते है ) दुर्योधन- है तात, मुझे प्राणों से अधिक (प्रिय) अङ्गदेश के अधिपति उस (कर्ण) के रे जाने पर सांस लेते हुए भी सना आती है। धैर्य-धारण की तो बात ही It im॥ और मी, अब मैं शत्रु द्वारा मारे गये तथा शोक के योग्य होते हुए भी, वत्स शासन और बन्धु-समूह के लिए शोक नहीं करता, लेकिन जिसने कर्ण के ते (यह) प्रत्यन्त अथवणीय पाप कर्म किया है, मैं पुर मे उसके कुल का श कर दूंगा ॥१६॥ गान्धारी-पुत्र, अब क्षण-मर आंसू बहाना बन्द करो। एतराष्ट्र--वत्स, क्षण-भर के लिए आंसू पोंछ लो। दुर्योधन मेरे लिए प्राणों सत्याग करते हए (कर्ण) को रिसी ने नहीं रोका। के लिये आँसू बहाते हुए मुन दोन को क्यों रोका जा रहा है ? ॥१७॥ सूत, हमारे कुल का नाश करने वाला यह असम्भव कार्य सिने किया मृत-आयुष्मन्, लोग ऐसा कह रहे थे- कोनात तस्य कस्य निधने सति पम दुसरण निधन विनाश इस्य । पान्योऽयं अगइरसमनः पार दुभामिति विपणद्वारा विशेष्यामः । दिसुषु इत्यादिमा मल ॥१६॥ मात्र मोक्षस्यागः । मामिति । म निवारितो यति ऐपः । ते संभापोटापारि।। रिवार्यते । न वारयितुमहामीति भावः ।।१।। । असंभावना परम् ।

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च्छलबहुलमरीणां सङ्गरं हा हतोऽस्मि ॥२१॥
गान्धारी-जात, तेनैव सुतशतकृतान्तेन वृकोदरेण समं समरं मागयो।
[जाद तेण एव्व सुदसदकदन्तेण विमोदलेए सम समतं मग्मसि ।।
भूमाविति। किल प्रसिढौ। [चक्रायुधः सारथिःपस्य तस्य अस्मसेना-
कृतान्तस्य] तस्येन्द्रसूनोरर्जुनस्य शरः स करणों निहतः । कोदशा पूर्ण
[निमग्नचक्रः] निमग्नरथाङ्गः । चक्रं सैन्यरथाङ्गयोः इति विश्वः । पार
वहवाजातेन शिखिनाग्निना औवरण इव मे कोधनातेन तो,
भूमी निमग्ननारमायुधगारयः गम्नम्य ।
निहन: गिलेन्द्रग्नोरस्मानातान्तस्य ॥१८॥
दुर्गापन:-
पनिनेन्दुस्मरणायुभितः गोकमागरः ।
चाडवेनेव मिसिना पीयते कोधन में 1180
तात, माय, प्रसीरत।
ज्वलनः शोकजन्मा मामयं दहति दुःसहः
समानायां विपत्तौ मे परं संशयितो रगः ॥२०॥
एतराष्ट्र-(दुर्योधन परिप्यग्य पात्र)
भवति तनय सत्यं संशयः साहसेपु
द्रवति हृदयमेतद्भीममुत्प्रेक्ष्य भीमम ।
अनिकृतिनिपुणं ते चेष्टितं मानशौण्ड
दुर्योधनः-लिष्टतु तावद् वृकोदरः ।
:। कृतान्तो यमः ॥१८॥
" । [फर्गाननमेव इन्दुः सस्य स्मरणाखुमितः मम .
प
.
४
..
शोकसागर
.
॥१६॥

परमापापुरमन malani refer पारा गया ॥१॥ . -- . . व समान पत्र (अर्जुन) के, जिसका चक्रायुथ (कृष्ण) सारथि है, वाणो क्षेत्र में) मृत्यु के समान (एप से सम्मव) होने पर मुझे संताप-पूर्ण पुटरी नियामासनि. বৗদ্ধ २०१ बहरण), पृथ्वी में जिसका पहिया धंत गया था, हमारी सेना के लिये हुपर्योयन- वर्ग के मुख-पो चन्द्रमा के हमरण से सशु-ध मेरा शोक-हमे सागर गालि के समान मेरीोषाग्नि से पिया जा रहा है tan पिनाकी, माता जी, पा कीजिये । शोक से उत्पन्न यह असा अग्नि मुझे जसाये राम रही है। (घर भोर सराए-दुर्योधन रा आलिङ्गन परके रोते हुए) । ३. पह सच है कि साहसपूर्ण कार्यों में संशय होता है। मगर भीम पार करते (मेरा) पह य इरित हो रहा है। हे स्वाभिमानिए, पुस्मना-निपुण नहीं है और शोर पुरम मनेक uni है। ! मारा गया | पारी-पुत्र, तुम सोपोर पुरता रहे हो, को मी पुणे के लिए यम के समान है? पोरन शररोबार गो- समामाया तुमाला frat Insी afrist को कर rst tr हमप र trey matter-men- को भाति पनि । राणा है ।२०॥ tirinetm Team बैं . - .. - । नो - गाग्धारी-जात, तेनैव सुतशतकतान्तेन वृकोदरेण समं समरंमाणपसे । [जाद तेण एव मुदसदकदन्तेण विनोदलेए समं समलं मपनि । कृतान्तस्य तस्येन्द्रसूनोरर्जुनस्य शरैः स कों निहतः । कोहयो [निमानपक: निमग्नरथाङ्गः । चकं सैन्यरषाङ्गयोः इति विवः । कर्णेति । किनिनमेव इन्दुः तस्य स्मरणरक्षुभितः मम सोकसागर वाइवेन वहाजातेन शिखिनाग्निना औवरण व मे क्रोधावेन शिक्षा 25AANTamanaron- भूमो निमानमारमायुधगारयः गरंस्तस्य । निहल: मिन्टनोरस्मीनारतानस्य IItil करणाननेन्दुस्मरणाशुमिता गोकगागरः । पाइनेन मिसिना पीयते क्रोधजेन में ॥१६॥ ताल, मम्म, प्रगौरत ज्वतनः शोकजन्मा मामयं दहति दुःसहः समानायां विपत्ती में वरं संशयितो रणः ॥२०॥ एतराष्ट्र:-दुर्योधन परिप्यम्य पन) भवति तनय सत्यं संशयः साहसेषु द्रवति हृदयमेतद्भीममुत्प्रेक्ष्य भीमम । अनिकृतिनिपुणं ते चेष्टितं मानशौण्ड च्छलबहुलमरीणां सङ्गरं हा हतोऽस्मि ॥२१॥ दुर्योधनः-तिष्ठतु सावन वृकोदरः। भूमाविति । किल प्रसिद्धौ। [चक्रायुषः सारथिः यस्य तस्य कृष्णः । कृतान्तो यमः ॥१८॥ पीयते ॥१६॥ - मामा -समान वयुष (अर्जुन) के, जिसका चक्रायुध (कृष्ण) सारथि है, बाणों नके समान मेरीपोषाग्नि से पिया जा रहा है ॥१६॥ होफ से उत्सर यह असम माग्न मुझे बलाये गाल रही है। (पर और मोतिपुरtriyमामीला-गया- पाधि पाविति' रिलि. बवानार. निसियामापागाभागिता रममावरा furnistrafe. पञ्चमोऽङ्कः २०१ पृप्यो में जिसका पहिया घुस गया था, हमारी सेना के लिये पाया रोवन- एप के मुख-रूपी चन्द्रमा के स्मरण से संशुध मेरा शोक-रूको सागर रिताकी, माता भी पा कीजिये । में मृत्यु के समान (रुप से सम्भव) होने पर मुझे संशय-पूर्ण पुट हो गया है ॥२०॥ सरार--(दुर्योधन का मासिङ्गन करके रोते हुए) । पुर, यह सच है कि साहसपूर्ण बायों में संशय होता है। मर भीम पर करके (मेरा) यह हाप प्रवित हो रहा है। हे स्वाभिमानिन्, परमपना-निपुन नहीं है मोर रामों का पुरक भनेक पनों है। हाय ! मारा गया ॥२१॥ भाग-TN, तुम उसी तोर से पुरवठा कर रहे हो, दो जोशलिए परे समान है। वन - पोरोमात गो-- मतमामाया तुल्मापा राहायचोरिपरिपाम पनि लिमोपिलो र पर्व मनावर -- .

---. भीमा-मो भोः गुपोषणानुनीतिः, किमिति संभ्रमात मिथ: । प्रौनावमा वेणीसंहारे ( सर्वे ससंभ्रममावर्णयन्ति) (प्रविश्य संभ्रान्तः) सूतः-आयुष्मन प्राप्तावेकरथारूढी पृच्छन्ती त्वामितस्ततः । सर्व-कश्च कक्ष । सूत:- स करिः स च क्रूरो वृककर्मा वृकोदरः ॥२५॥ गान्धारी-(समयम्) जात, किमत्र प्रतिपतम्यम् । [जार कि एस्थ पडिपज्जिदयम् । दुर्योधनः--ननु संनिहितवेयं गा। गाधारी-हा हतास्मि मबभागिनी। [हा हाह्य भन्दभारणी। उपर्योधनः-पाय, अलमिरानी कायेन । संजय, reमारोप शिविर प्रविष्टस्य । प्राममोरापनोवी जनः । पुराए-वस, सागमे प्रतीशाय यावरनयोविमुपलभे । एपणेपन:--सात, रिमने नोपलाधन । (नन यिनो रपारा भीमार्जुनी) मनः । मनापोः गया। पर्वा पुनसाना जतुमयागरणोद्दीपनः सोनिमानी मागोमरीयम्यानपनमरपाण्डया यम्म दासाः । rater tree Teen Re Treat दरारा हाना •rame wat - Ahi.

एतराष्ट्र-पुत्र, एक क्षण प्रतीक्षा करो, जब तक में इनका अभिप्राय पभ्रमोऽङ्कः (सद घबराहट के साथ मुनने है ) (प्रवेश करके भवराया हुआ) मू-आयुष्मन, एकस्य पर बठहए और इधर-उधर आपके विषय में पूछते हुए दो गान्धारी-भयपूर्व) पुत्र, अद इस स्थिति में क्या करना चाहिये? गान्धारी-हाय में मन्दभाग्य मारी गई। में बैठाकर शिविर की ओर प्रस्थान करो। हमारे दशोक को दूर करने वाला २०५ वह कर्ण का शत्रु (अर्जन) और यह भेड़िये जैसे कर्म करने वाला क्रूर माता जी, अब दोनता से बस करो। संजय, माता-पिता को पाये हैं। सर-कौन कौन? दर ॥२५॥ दुर्योधन - यह गदा तो पास में है ही। दुर्योधन- । आ गया है। दुर्योधन - तान, इसके जानने से क्या होगा? ( तत्पश्चात् रथ पर बैठे भीम और अर्जुन प्रवेश करते हैं ) भीम-अरे सुयोधन के भृत्यों, घबराकर इधर-उधर क्यों भाग रहे हो ? नों से डरने की आवश्यकता नहीं है । भूत-कपट करने वाला, लाला-गृह को जलाने वाला, अत्यधिक अभिमानी, के केश और वस्त्रों के हरण में वायु के समान, पाण्डव जिसके दास हैं, तेति । असौ स दुर्योधनः पवारते तत्कथयत । [कीदृशः यूनमम्बन्धिना 1 कर्ता । अतुमयं लाक्षानिर्मित या शरणं गृह तम्य उद्दोग्नः दाहरः । ग: देशाच उत्तरीयं च तेषा ध्यपनयने मस्त वायुरिव ।) या तं j । . . अन्यथ मूत्र दुर्योधनः दुरात्मन, भरतालापसद, पूतास, पारस्पयो, नाई भवानिय अप्रियाणोति । एष वाचाऽप्रियारिप बरोति । कर्मणा नसतोसम) इत्यन्वयः। यहा । अशक्त एप वाचा अप्रियाणि करोति न वमोत्यन्बम। अवेति । अहं भवन्तं किम न विससेयं न विनाशयामि। पहिले । र गुरू विघ्नं न कुरत इत्यन्वयः। विज्ञासेयमिति पासु हिसायाम् मिडि रूपम् । हे कटुपलापिन् । कीदृशे शरीरे। मस्करामिभिध- एव रणितानि शब्दितान्यस्यीनि यत्र ताशे। वसं कुल्यमस्थिर प्रप्रियाणि मारोगा याना तो न कमंगा। हात्मनो दुगी प्रनागमय का व्यया ॥३॥ भीमः-मरे है भरलामका प्रय किन विमगेयमहं भवन्तं दु.नागनानुगमनाय गटुपलापिन् । विघ्नं गुरु न फुरतो यदि मगदान- निमिग्रमानरणितास्यनि ते शरीरे ॥३२॥ शोकः स्त्रीयन्नयनमलिलं यत्परित्याजितोऽसि भ्रातुर्वक्षःस्थलविघटने यश साक्षीकृतोऽसि । आसीदेतत्तव कुनृपतेः कारणं जीवितस्य क्रुद्ध युप्मत्कुलकमलिनीकुञ्जरे भीमसेने ॥३३॥ विकरपनाप्रगल्भः। किंतु द्रक्ष्यन्ति न चिरात्सुप्त बान्धवास्त्वां रगाङ्गणे । मद्गदाभिन्नवक्षोऽस्थिवेरिएकाभीमभूपरणम ॥३४॥ चलापोऽनर्थक वचः इत्यमरः ॥३१॥ .. । [मगदान० इति पाटे मम गदाया अप्रैः कोटिभिः ॥३२॥ ।

বৗদ্ভু: कार्य द्वारा (अप्रिय करने में) अशक्त, दुःखी हुआ यह, जिसके सौ भा है वाणो से अप्रिय कर रहा है। इसके प्रलाप (निरर्थक वचन) से TH मोम-अरे, ओ भरत कुल के कलङ्क हे पटु-मापिन्, यदि मेरी गदा की कोष्टि से विदीर्ण होते हुए, (मतः) रती हुई हीिपों वाले तेरे शरीर के बीच में माता पिता विघ्न न दारू एप में शासन का अनुसरण करने के लिए आपको यहीं न म (३२॥ और भी, मूर्ख, पुम्हारे पुल-रूपी कमलिनी के लिये हायी के समान (मुस) भीमसे होने पर भी तुम दुष्ट राजा के जीवित रहने का कारण यह था कि के कारण दुमसे स्त्रियों के समान मामू बहवाये और (सेरे) भाई के पक्ष के विवीणं करने में सुझे साक्षी बनाया ॥३३॥ दुर्योधन-दुधागा, भरत-मुस में नौच, (मेरे) भए में (जीते गये) -तुल्य पाव, मैं मापके समान मात्म-श्लाघा करने में एष्ट मह पितु- (तेरे) धान्धव तुझे, मेरो गदा से टूटी हुई पक्षस्यसको धेणी-तुल्य हो जिसके भयदुर भाभूपण हैं पुर-क्षेत्र में काम हो लोया मा देखेगे । गोकरिति शोकपा स्त्री रोदिति तथा पनपनगलिस स्यापितो और इति पाई नेपाल पा सो घोकं मारमते तण व िरय त्यर्थः । यथा स्त्री दिवा गोर स्पति तथा समापि मिति भीमसेने को सतितव पुनस्य बीवितस्यैतत्कारणमासीरोदन भाष नाम । उभर घेद वृत्तं तव मया स्वमपि पापितम्मलिभाषः - भयानोति । चिराचिरम् । धेणिय परपरा। येगिरा *गिता प्रवाहः । वेणी तु रेसवेरे स्माहेष निगराने पर एपरिवेणीति पिता रवि पाटस्तु मुगम सभागार्म सास । गुणा पुर निशेषः।

भो भो भीमसेनार्जुनो, एप खलु निहताशेषारातिचा आगन्तपाराम भोदितत्र पनि मरवं प्याय: पी तिन पीभावः। गाभुनाया। गुरुःगता सस्य मायालेन गिो र यस्य साय करायनागिरी २१२ वेणीसंहारे भीमः-(विहस्य) यद्ययं नाश्रद्धेयो भवान् । तथापि प्रत्यासनमेव क्या पीनाभ्यां मद्भुजाभ्यां भ्रमितगुरुगदाघातसंचूरिणतोरोः क्रूरस्याधाय पादं तव शिरसि नृणां पश्यतां यः प्रभाते । त्वन्मुख्यभ्रातृचक्रोद्दलनगलदसृक्चन्दनेनानखाग्रं स्त्यानेनाद्रेण चाक्तः स्वयमनुभविता भूपणं भीममस्मि । (नेपध्ये) भिरामयशाः प्रतापतापितदिङमण्डलस्यापितस्वजनःश्रीमानजातशत्रुर्देवो युनिट समाज्ञापयति । उमी-किमाज्ञापयत्यायः । (पुनर्नेपध्ये ) कुर्वन्त्वामा हताना रणशिरसि जना वह्निसाद्दे हमार नथून्मित्रं कथंचिद्ददतु जलममी बान्धवा वान्धवेभ्य मार्गन्तां जातिदेहान्हतनरगहने सण्डितान्गृध्रकङ्घ- रस्तं भास्वान्प्रयातः सहरिपुभिरयं संहियन्तां बला उौ-पदासारपस्पापः। (इति निष्क्रान्ती) पीनाम्यामिति । यः । यो गतेऽनागतेहि वः इसमन परसों पीनाम्या पृष्टाभ्याम् । मोत्यापी वृक्ष यती माया धाप । रयानेन पनीभूनेन । र तृपं पदमंचातयोः इत्ययो निष्ठा देरातोपगोपनिनिष्टानाय नः । भाग 1) मुली या । भाषा स्पोरमनेत शनेन गारपरक देर बादन है। पाति: भूषितः । द्वथा प समाधान भाव ।। मदारमतय भीम भागवितास्मि ॥३५॥ .

पञ्चमोऽङ्कः भौमसेन-(भोर से हंसकर) यदि ऐसा है तो आप पर अविश्वास नहीं कि- । सकता है। फिर, मोजो बिल्कुल समीप में होने वाला है, उसे कहता हूँ, रेलः प्रातः समय राजाओं के देखते-देखते अपनो) स्यूल भुजाओ से घुम् गई भारी गदा के प्रहारों से पूर्ण किये गये वक्षः-स्यल वाले तुझ क्रूर के fe पर पैर रखकर, गाढ़े और ताजे, तेरे भाइयों के-तू जिनमें मुट्य है-स कुचलने से बहते हुए रुपिर-स्पी चन्दन से नख के अग्र-भाग तक लिप्त हो- विध भयङ्कर आभूषण (प्रसाधन) का उपभोग करूंगा ॥३५॥ (नेपथ्य मे) हे हे भीम और अर्जुन, यह श्रीमान् महाराज युधिष्ठिर, जिसने सम- मा समूह को नष्ट कर दिया है, जिसने परशुराम के मनोश यश को अमि र दिया है, और जिसने अपने प्रताप से तपाये (वा में किये) दिशा-भागों रिजनों को स्थापित कर दिया है, आज्ञा देते हैं । दोनों-आर्य क्या याज्ञा दे रहे है ? (फिर नेपथ्य में) सम्बन्धी लोग युद्ध के मोर्चे पर मारे गये (बोरों) के शवों के समूह नि-शहर, पह सम्बन्धी जन अपने सम्बन्धियों को रिसी प्रकार मा मित जस देवें; (लोग) मरे ए मनुस्मों से मरे पे (पुर-रयल) में (अप पुओं के शरीर को पोम लेवें। मह पूर्य शत्रुओं के साथ मस्त को प्रात सा है (इसलिये) सेनायें वापिस लौटालीबाचें ॥१६॥ दोनों-आर्य ती माझा। (यह पहार दोनों निसामे है)। सुन्विति । माता बायवादय । हिसारसायन पतिदेपा । If रन्त देवा गातिरपय. ! भारागपान् । उन्मिय पुटम् । मार मन्ताम् । नामिषः। पशिस गहने साप्त । मगो मूर्गम पुभिः महान गत । पया गोरतं मनारनयना रीति भाटा पिगोरगमन विनास गायव भारि मायारपोर. ran उभपाप्यागमनमरममा विम्। परमानाTTE मिनेनेस्सर । संहिमतामुहिपदाम् ।। ..v4 मूरशून्ये । [मधुना सुन अवजित: अनवजितः चासो ग्यता हेत न्यस्तहेतिश्च तस्यानवजितन्यस्तहेतेः पितुः उत्तमा स्पर्श स्मृत्वा उपेटः २१४ देतानहारे ( नेपये) मरे रे गालीवारगवाहमालिन अर्जुन, मन, वैवानी गम्यते । कर्णक्रोधेन युप्मद्विजयि धनुरिदं त्यक्तमेतान्यहानि प्रौढं विक्रान्तमासीद्वन इव भवतां यूरशून्य रणेऽस्मिन् । स्पर्श स्मृत्वोत्तमाङ्ग पितुरनवजितन्यस्तहेतेरपेतः कल्पाग्निः पाण्डवानां द्रुपदमुतचमूघस्मरो द्रौरिगरस्मि ।।३० एतराष्ट्रः-(आप्यं सहर्षम) बरस दुर्योधन, द्रोणवपरिभवोद्दीपितमेव- पायक. पितुरपि समधिकवल: शिक्षाबानमरोपमचायमवस्यामा प्रातः । पगमनेन सावदयं संभाव्यता वीरः । गान्धारी- जात, प्रत्युद्गच्छनं महामागम् । [जाद पच्चग्गच्छ एद महाभाअम् । दुर्योधनः-तात, अम्ब, किमनेनाङ्गराजयघाशसिना पृथायौवनशमवत' एतराष्ट्रः-वत्स, न खल्वस्मिन्काले पराक्रमवतामेवंविधानां वाइमा' विरागमुत्पादयितुमर्हसि । (प्रविश्य ) अश्वत्थामा-विजयतां कौरवाधिपतिः । दुर्योधनः-(उत्याय) गुरुपुत्र, इत आस्यताम् । (इत्युपदेशपति) अश्वत्यामा-राजन्दुर्योधन, कर्णति । [युष्मान् विजेतुं शीलमस्य तद् युप्मद्वियि इदं धनुः एतानि महानि त्यक्तम् ।] अहानीत्या कालावनोरत्यन्तसंयोमे इति विकी तेनाहानि व्यापयेत्यर्थः । अस्मिन् रणे भवता [ौर स्फीतमिति परिहासोति विक्रान्तं पराक्रम आसीत् । विक्रान्तमिति भावे क्तः । कोहो । इन अल्लाग्निः द्रुपदमुतस्य पुष्टएम्नस्य घस्मरः नागरः । भूधर पत्र .

पान तुम्हारा महान् पराम होता रहा। (अब) कभी पगजित नए तथा पचमोगः २१५ (नेपा मे) अरे गाव को खाँचने वाली भुजाओं वाले अर्जुन, श्री अर्जुन, अद रही रहा है? कों के प्रति ग्रोध के कारण मैंने अपना यह तुमको जीतने वाला धनुष इन नों होर दिया था, इसलिये इन दिनों) बोरों से अन्य इस रण मे वन के नया रिपे हुए पिता के सिर पर किये गये स्पर्श को याद करके पाण्डवों लिपे प्रतयाग्नि के समान और हुपद के पुत्र की सेनाओं स भक्षक में द्रोण पुत्र (अश्वत्याना) आ पहुंचा हूँ ॥३०॥ एतराष्ट्र--(सुनकर हप के साथ) वत्स दुर्योधन, द्रोण के पथ के अपमान प्रदार कोषल्पो अग्नि वाला, पिता से भी अधिक मलवान, मुशिक्षित और तुल्य यह अश्वत्थामा माया है। इसलिए आए अव उठकर कर इसका र करें। . गान्धारी-पुत्र, इस महानुभाष का उठकर सत्कार करो। दुर्योधन-पिता जो, माता भी, अङ्गगज () के वध की कामना है दाले तथा पर्प हो पौवन, शस्त्र और इस के मार को धारण करने वाले (अरवत्यामा) से क्या लाभ ? तराष्ट्र-पुत्र, इस समय ऐसे पराक्रमी धीरों को पाणी-मात्र से भी नि करना उचित नहीं है। { प्रवेश करके) अश्वत्थामा--कौरवों के अधीरवर की जय हो। दुर्योधन-(उठकर) आचार्य-पुत्र, इधर बैठिये (यह कहकर बैठाता है)। अश्वत्थामा राजा दुर्योधन, च इति घसेः अमरच् । दौरिणः अस्मि ।] बौणिोणस्यापत्यम् । अत इञ् पः। किं कृत्वा । पितुरुतमाङ्ग सशं स्मृत्वा । अह कीदृशः । अनवजितो नापि जितः । हेतिरस्त्रम् । कल्पः प्रलयः । घस्मरो नायक ॥१७॥ [समान्यता संमान्यताम् । इत मास्यतामिहोपविशतु ॥

कर्णेनेति । [कर्णने यत् कणंयोः मुभग तद् बहु उपत्वा सगरेषु पनि
तत्त्वया विदितम् । है नुप एप द्रौणिः । अधिढा ज्या यस्य तदधि धनुर्व
स: अधिज्यधनुः । समासान्तविधेरनिवत्वान्न अन। अधुना अभ्यमित्रं अमित्र
गामभिमुखम् । लक्षणेनाभिप्रती इत्यव्ययीभावः।] अराति लक्ष्य प्रता
आगतः। अतो हे मृत प्रतिकारचिन्ता पन। मयव सर्वत्र प्रनी
art
मन गुभगं बढ़ गत्ता
परामरे विहितं विदितं तया सत् ।
द्रोगिम्भ्यधिज्यधनुगाशितोपमित्र-
गोगुना गज 7 प्रतिकारचिन्ताम् ॥३॥
दुर्योधनः (म) मष,
अवसानेहराजग्य योदव्यं भवता किल ।
ममाप्यन्तं प्रतीक्षस्य कः वर्ग: क: मुयोधनः ॥३६॥
अवस्थामा- म) कपमा एवं गंगा, ममा .
परिभयः । (प्रभातम्) रागौरवपाएवं भवतु। (इति निमाल.)
Vतरायः-पास, क एप ते म्यामोहो यास्मिन्नति काने एवंविषय
भागस्याधरयानो वापारयेणापरागमुपास्यसि ।
दुर्योयन:-किमस्यात्रियमतृतं च मयोक्तम्। कक्षा ने प्रोप्राया
अकलितमहिमानं क्षत्रियरात्तचापः
समरशिरसि युप्मद्भाग्यदोपाद्विपन्नम ।
परिवदति समक्षं मित्रमङ्गाधिराज
मम खलु कथयास्मिन्को विशेपोऽर्जुने वा ॥४०॥
एतराष्ट्र:-वत्स, तवापि को दोपः । अवसानमिदानी भरतकुलस्य । सं
किमिदानी करोमि मन्दभाग्यः (विचिन्त्य) भवस्वैवं तावत् । संगम, मध
पश्य-
.
। इति भावः ॥३८॥

२१७ पञ्चमोऽङ्कः पर्ण ने कानों को अच्छी लगने धानी बहुत-सी (धत्तत्) बातें कहकर युद्ध दुध किया है, वह आपको विदित है । शेरी बढ़ी हुई पनुप बाला, यह पुत्र (अश्वत्थामा) शत्रु के सम्मुख आ गया है । है राना, अब प्रतिकार लाहोर दो॥३॥ योधन-(चिढ़कर) माचार्य-पुत्र, पो तो कर्ण के समाप्त हो जाने पर ही युद्ध करना है, (अव) मेरी भी ो प्रतीक्षा कर लो। कर्ण क्या ? सुमोधन धया ? ॥३६॥ वित्थामा-(मन में) क्या ? आज भी वही कर्ण के प्रति पक्षपात और नितिरस्कार । (प्रकट मे) कौरवों के अधिपति राजा, ऐसा ही सही। कर बाहर चला जाता है)। राष्ट्र-पुत्र, यह तेरा सा मति-विभ्रम है कि इस समय भी ऐसे अश्वत्थामा में वाणी की कठोरता से विराग उत्पन्न कर रहे हो? धन-मैंने इससे कटु योर असरय पपा कहा है ? अथवा पया यह पोष निहीं है ? देखिये- सित्रिय मो जिसकी महिमा न मान सके ओ तुम्हारे भाग्य के । में मर गया, अङ्गदेश के अधिपति (उस) मित्र को (मेरे) सामने प है। तब बतलाइये, मेरे लिए इसमें पा अर्जुन में क्या मेर ए-वत्स, इसमें सेरापी ग्या दोष है? भव भरत-कुल का मन । संजय, इस समय मैं अभागा गया कर ! (मोचार) अस्टा, र इति । कित निश्चये । कःकर्ण इति । तथा च रणंमुयोधनयोन भावः॥३॥ तेति । [आत्तः पारः यस्ते पातपातास्तः शत्रियः मलितः न गत महिमा यस्य तं युष्मद्भाग्यदोषात् न तु असामा रशिरमि विपन्न नष्ट 'मृमि: । मम मित्रमजाधिरा वर्ग 'परिवरति निन्दति । अतः] अस्मिन्नवापामन्यने वा मम पत्र हे ताल सं विशेष कषय । पनु निकोन रोपा भेट इमरतीनि भिवानमुना दुर्योधनेन सह विभम पालना। माग्या स्तनापः । परीरावयवाथ नियन्। तपास जित: साङ्गशिर्त रसाछरीपरिवानः । मृति मुशित हामस्मरति किम् । यदाय गुयोधनम्य [मनुजाना बनोगत घनीतारमोनियापारविश्रयानापनविनिमaughs २१८ वेणीसंहारे यूहि भारद्वाजमश्वत्यामानम् । स्मरति न भवान्पीतं स्तन्यं विभज्य सहामुना मम च मृदितं क्षौमं बाल्ये त्वदङ्गविवर्तनः । अनुजनिधनस्फीताच्छोकादतिप्रणयाच य- द्वचनविकृतिष्वस्य क्रोधो मुधा क्रियते त्वया ॥४॥ संजयः-पदाज्ञापयति तातः । (इत्युत्तिष्ठति) धृतराष्ट्र:-अपि चेदमन्यत्वया वक्तव्यम् । यन्मोचितस्तव पिता वितथेन शस्त्रं यत्तादृशः परिभवः स तथाविधोऽभूत् । एतद्विचिन्त्य बलमात्मनि पोरूपं च दुर्योधनोक्तमपहाय विधास्यसीति ॥४२॥ संजयः-पवाज्ञापयति सातः। (इति निष्क्रान्तः) दुर्योधनः-सूत, सामामिदं मे रपमुपकल्पप । मृतः न्याशापयत्यायुष्मान् । (इति निष्धान्तः) पृतराष्ट्र:-गाग्धारि, इतो वयं महाधिपतेः शल्यय शिशिरमेव गर परस, स्वमप्येवं कुछ। (इति परिक्रम्य निष्क्रान्ता: रा) * इति पञ्चमोऽ: * सारासायी तो पत: सायसी निष्ठायामिलीभाष ye को रितुंमई माग्य:

पचमोतः । संगर, मेरो भोर से भरद्वाज-सौपन्न मरवापामा से हो- समारोम (दुर्योधन) के साप बाट कर पिया गपा (इसकी माता और बात्यावरया में अपने मङ्गों से लोट-पोट से चलाएमा मेरा रे मात्र पार रही है, जो दुम छोटे मार्यों की मृत्यु शोक और ra) बायविक प्रेम के सारण कहे गये इसके अनुचित पचनों पर व कर रहे हो tretu संजय-तात, जो मामा । (यह महार उता है)। तराष्ट्र-और तुम यह भोर महमा- विसत्य द्वारा तुम्हारे पिता से शात्र पुरवा दिया था और जो तुम्हारे यह उस प्रकार कामना बड़ा अपमान हुआ था, इसका पा अपने र पराकम विधारकरके आप बुर्योधन के कहे की उपेक्षा करके अवश्य । - ३) करेंगे। बय-पिता की सी माशा हो । (यह कहकर बाहर जाता है । विन-मूत, हमारा युर का रथ तयार करो। -आयुष्मान जो आशा है। (यह कहकर निकल जाता है)। राष्ट्र-नान्धारी, हम यहाँ से मात्र देश के स्वामी पाल्य के शिविर में हैं। पुत्र, तुम भी ऐसा ही करो। ( इस प्रकार घूमकर सब निकल जाते हैं ) * पञ्चम अङ्क समाप्त * ति। [यत् तब पिता पाण्डवः वितथेन असत्येन । गजे मृते व मृत पणेन शस्त्र मोचितामाजितः । मत् च ताहरा: तपास्थितस्प तथाविधः अभूत् एतद् विचिन्प आत्मनि बल पौरुषं च विचिन्त्य । यहा। प्रसिद्धः। तथाविधस्तत्प्रकारकः । एतद्विचिन्यात्मनि मल सामथ्र्य विधास्यसीति वक्तव्यमित्यत्वयः । कि कृत्वा । दुर्योधनोक्तं त्यक्त्वा । वेधास्यसीस्त्र प्रतीकारमिति दोष इत्यूचुः ॥४२॥ - असून यं रलधरो गुणीशी नानागुणाब्धा दमयन्तिकापि । जगदरं तस्य कृती प्रयातो ग्रन्थे मनोहारिणि पञ्चमोत।। A - स्थानेषु परमार्थाभिज्ञाश्चराः सुसचिवाश्च भक्तिमन्तः पटुपटहरवश्यक्तघोष यद्यप्यत्रकपदे वापरं गतार्थ तथापि विषोल्बरएविषधरशासनापं तदुतम् । आश्यां विष यत्र भोगे शरीरे सोस्यास्तीत्याशीनिपभोगी विषधर if व्युत्पत्तिः । न चावापि गतायंता। विशिष्टनानो विवक्षाया अपर्यनुयोज्यमामि देक् । दिवं स्वर्गम् । स्वल्पावशेषेऽपि ये सति [प्रियं साहसं यस्य सप्रियः वाहसस्तेन] भीमेनामी सर्व वयं रमसात् वाचा प्रतिनारूपया जीवित पष्ठोऽङ्कः (ततः प्रविवारयागनम्गो युधिष्ठिरो टोपी घेटी पुष्परच ) पुधिरि: -(विभिनय निःश्वस्य च) तीर्णे भीष्ममहोदधौ कथमपि द्रोणानले निवृत्त कर्णाशीविपभोगिनि प्रशमिते गल्ये च याते दिवम् । भीमेन प्रियसाहसेन रमसात्स्वल्पावशेपे जये सर्वे जीवितसंशयं वयममी वाचा समारोपिताः ।।१। द्रौपदो--(मराप्पम्) महाराज, पाचाल्देति किन भणितम् । [महाराज पश्चालिए ति किल मरिणद ।। पुष्टिर-~-कृष्णे, ननु मया ! (पुरुषमवलोक्य) दुधक, पुरुषः--देव, माज्ञापया युधिष्ठिरः--उच्यता सहदेवः--ऋद्धस्य धृकोदरस्यापर्युषितदारुणा प्रति मुपलम्य प्रनष्टस्य मानिनः कौरवराजस्य पदवीमन्वेष्टुमतिनिपुणमतयस्तेषु तीर्ण इति । [भीष्म एव महोदधिस्तस्मिन कदापि महता तीर्णेऽतिप्रान्ते । द्रोण एव अनलस्तस्मिन् निवृते उपशान्ते । वर्ण एव . सर्पदंष्टा तत्र विषं यस्य तादृशो यो भोगी सर्पस्तमिन् । आशीराश्यन्दिा इति शब्दभेदः । भोगः मुसे स्यादिभृतावहेश्च फणकाययोः । इति विश्व प्रयामे १४ अङ्क ANAGE030- ( तत्पश्चात् आसन पर बैठा हुआ युधिष्ठिर, द्रौपदी, चेटी ओर पुस्प प्रवेश करता है।) धुधिष्टिर--(मोचकर और लम्बा सांस लेकर)। किसी प्रकार भीष्म-रूपी महामार को पार कर रोने पर, द्रोणरूपी अग्नि शान्त हो जाने पर, पोषिले सांप के दमन कर दिये जाने पर और अल्प के स्वर्ग चले जाने पर विजय के स्वल्प ही शेष रह जाने पर साहस-प्रिय गोम ने मादेश के कारण अपने वचन से यह हम सबके प्राण संशय में डाल ये हैं ॥१॥ हक्यों नहीं कहा। दोपरी--(आँसुओ के साथ) महाराज, पाञ्चाली ने (संशय में डाला है), पुधिष्ठिर-कृष्णा, निश्चय से मैने ही (संशय में डाला है)। (पुरुष को भार) एक। पुरुष-महाराज, आशा कीजिये। पुति-सहदेव से रहो--कुछ हुए मौन से भाग ही पूर्ण होने वाली पर प्रतिज्ञा जो जानकर रिपे ४ए मभिमानी गौरवापिपत्ति के मार्ग । लगाने के लिए की बुद्धि वाले तथा भिन्न-भिन्न स्थानों को बस्तुस्थिति । बामने वाले, (हमारे प्रति भक्ति रखने वाले तीन मि के शा से 'ला करने वाले, सुपोषन को गतिविधि को जानने वाले और धन एवं रोपिना इरपन्वया ॥१॥ बार्युषिता नान्यदिनमामिनीम् । प्रहरम गुप्तम्य । पटुपटरपोपमाः निपूर्ण रसादतः। पटुः यः पहप मुभिषिरस्य रपरलेन सना पोषण गने तोताः। प्रतिभुता देयत्वेन प्रतिगाना धनेन पूरा न मातुभिया पाते। यहा पर पूजा पट्टमानास पनि ग तयोग। पतामह रोगासप्रवी देश।

अपि च । । परति परमे [पमरो सापः । कते वायुकाम पोसे afमा पापराभर यामादप्यमाना। । प्रविधिमा भूमिनिका प्रतिनिनिय पण मागमा : TREAMITMaiन. माना। २२२ वेणीसंहारे सुयोधनसंचारवेदिनः प्रतिश्रुतधनपूजाप्रत्युपग्रियाश्चरन्तु समन्तारसमन्ताम् । पङ्क वा सकने वा सुनिभृतपदवीवेदिनो यान्तु दाशाः कुज्ञेषु क्षुप्णवीरुनिचयपरिचया बल्लवाः संचरन्तु । व्याधा व्याघ्राटवीपु स्वपरपदविदो ये च रन्ध्रप्वभिज्ञा ये सिद्धव्यञ्जना वा प्रतिमुनिनिलयं ते च चाराश्चरन्तु ॥२॥ पुरुषः--ययाज्ञापपति देवः। युधिहिर:--तिष्ठ । एवं च वक्तभ्यः सहदेवः । बोया रहः शङ्कितमालपन्तः सुप्ता रुगार्ता मदिराविधेयाः । नामो मृगारणां वयसां विरावो नृपापादप्रतिमान या पुष्पः - पगमापयति देवः । (इति निस्क्रम्य पुन. युधिति:-रवरित प्रवेशप । पुल:- (निकाय आचालन मह प्रविश्य) एप देवः । उपम । किसामरपण माय । गुनिभूतामति पर भी दग्नी बहिन : रा. मान दुर्योधनान्वेषणानि । पोको RE ए ममापि ग्यारेनु गुणः शाम नधिको माग परिसपोमानं ये से। गोमाल' परेता पनि नपाए गया । परन्तु मा : MEAt योगिना 4 में HTOTTERTAIमा ! EMA , rj afra!' प्रविश्य सहर्षम) । सकःप्राप्त:।

पष्ठोऽङ्कः २२३ सम्मान द्वारा प्रत्युषार का बचन दिये गये गुप्तचर और योग्य मन्त्री समन्त- पल में चारों ओर घूमें। और भी- - कीचड़ में पा चालू के तट पर छिपे हुए मार्ग को जानने वाले धोवर जायें; चारोह मताओं के समूह से परिचित वाले कुजों में जायें; अपने और परापे पद-विहों को जानने वाले प्याथ (शिकारी), जो कन्दराओं को भी यो मति मानते हों, व्यानों से ध्यात अरण्यों में घूम और मिन गुप्तचरों में मिओं का देव बनाया हुआ हो, थे प्रत्येक तपोवन मे जायें ॥२॥ पुष-महाराज जप्तो माज्ञा है। पुहिर--ठहो । और सहदेव से यह रहना-- एमारत में शङ्कासहित बात-चीत करते हुए, सोये हुए, रोग से पीडित और भर के परा में एए (मोगों) को पान-बान करनी चाहिये । महानु भयभीत होए हों, जहाँ मषियों की पोलाहल हो और कहाँ रामा के लक्षणों से पुक्त करिहों हो. (न पानों को भी) हार-पौत करनी चाहिये ॥३॥ पुप-महाराम को माना। (यह रहार बाहर बार पिर प्रदेश रोह के साथ) महाराम, पारपासक माया है। पुतिरी मगर लामो। पुरुष-(गदर मार पासवासाप प्रवेश )ह महाराम। सवाला समजाय। FARMERTr निरा एष पारा Here पालाला निर्माण भार. यामाहो नि मानो माया; IT सुमाया [nal किया गरिन । परिमापाने माना। सारि । सानुमा unfurire,rit. पिणे हि wefter Enter सलमान Ararterfer नाruth T विव्याधा: स्वेतापरेपो पदानि विनितिकापाnि गुहादिविषये अभिज्ञाः । म्याघ्रप्रवरा बरम्पः पानाfrien शिवस्ममामः। परन्तु। मेवाये चमारामिद्यानापोगिन Hir: तथा । मुनिनिलये मुनिनिल प्रतिमुनिनिस HERE ' २२२ वेणीसंहारे सुयोधनसंचारवेविन: प्रतिश्रुतधनपूजाप्रत्युपनियाभरन्तु समन्तासमन्तपमान अपि च। - -- पङ्क वा संकने वा मुनिभृतपदवीवेदिनो यान्तु दाशाः कुछुपु क्षुण्णवीरग्निचयपरिचया बल्लवाः संचरन्तु । व्याधा व्याघ्राटवीपु स्वपरपदविदो ये च रन्ध्र प्वभिशा ये सिद्धव्यञ्जना वा प्रतिमुनिनिलयं ते च चाराधरन्तु ॥३॥ पुरुषः-ययाजापयति देवः युधिष्ठिर:--तिष्ठ । एवं च वक्तव्यः सहदेवः । मैया रहः शङ्कितमालपन्तः सुप्ता रुगार्ता मदिराविधेयाः श्रामो मृगारणां वयसां विरावो नृपाङ्कपादप्रतिमाच मत्र पुरुषः - यदाज्ञापयति देवः । (इति निष्क्रम्य पुन. प्ररिपन सम) पाञ्चालकःप्राप्तः। युधिष्ठिर:-त्वरितं प्रवेशप। पुरुषः-- (निष्क्रम्य पाचालकेन सह प्रविश्य) एप कः । सा पाञ्चालकः। पर इति । पर कर्दमे [पडूमयदेशे इमर्यः । संरते कारागार वा । पिकनाशक राम्यामित्यम् मरतर्थ । गुनिभूतानिगडी पागे व विदन्तीति वेदिनः दाणः घोदरा: यान्नु दुर्योधनान्वेषणा दाराधीवरी इत्यमरः । भेषु लनादिपिहित स्थान पर चौरमियो सनासपातस्य परियोजानते। ममा - -- - - गी अय्यो वनानि । वाम भापपुर- निवापामा २२३ पटोग्ङ्कः म्मान द्वारा प्रत्युपकार का वचन दिये गये गुप्तचर और योग्य मन्त्री समन्त- चक में चारों ओर पूर्म। और भी- कीचड़ में या दालू के तट पर छिपे हुए मार्ग को जानने वाले धीवर जायें। चलो हुई लताओं के समूह से परिचित ग्वाले कुञ्जों में आयें; अपने और रिये पद-चिलों को जानने वाले व्याध (शिकारी), जो कन्दराओं को भी गो-भांति जानते हों, ध्यानों से व्याप्त अरण्यों में घूम और जिन गुप्तचरों ने का वेष बनाया हुआ हो, वे प्रत्येक तपोवन मे जायें ॥२॥ पुरुष-महाराज जैसी आज्ञा दें। युधिष्ठिर--ठहो। और सहदेव से यह कहना-- एकान्त में शङ्कासहित सात चीत करते हुए, सोये हुए, रोग से पीडित और के वश में हुए लोगों) की छानबीन करनी चाहिये । जहाँ पशु भमभौत रहे हो, जहाँ पक्षियों का कोलाहल हो और जहां राजा के लक्षणों से युक्त कि चिह्नों हों, (उन स्थानों को भी) छान-चीन करनी चाहिये ।।३।। पुरुष-महाराज जी आजा हैं। (यह कहकर बाहर जाकर फिर प्रवेश के हर्ष के साथ) महाराज, पाश्चालक आया है। युधिहिरीन अन्दर लाओ। पुरुष--(बाहर जाकर पाञ्चालक के साप प्रवेश करके) यह महाराज हैं। चालक समीप जायें। दग्यअनाः सिद्धपुरुषचिह्नवन्तः । चरा एव चाराः । प्रमादित्वात्स्वान् च या ये निपुरणास्तव ते गच्छन्रिवति भावः ॥२॥ या इति । रह एकान्ते रातिं कास्परमालपन्तो जना याः । एव राजया [रुजा आता गेयाः मदिराया विषया दासाः) महिरिषेया मताः । मेयाः । [यत्र मस्मिन् स्थाने मृगाणां प्रासः प्रीति । तदा: चेष्टा पर्पः । । वयसा विपः। मानुषप्रवेशान् । स प मानुप. कदाचिर दुर्थोऽनः स्यादि. हेतोस्तदपि शेयम्। भूपाको रारचिह्न मत्स्यादि या पारतिमाया ताप तानि स्थानानि शेयानीरपम्वयः । बयः पशिणि सस्पे पनि तमा प्रतितिः ।।

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-- मातारा प्रत्युपकारका वचन दिये गये गुरुचर और योग्य मन्त्री समन्त. षष्ठोऽङ्कः २२३ वा में चारों ओर घूमें। और भी- गोवा में या बालू के तट पर-छिपे हुए मार्ग को जानने वाले धीवर जायें; भी हुई सताओं के समूह से परिचित ग्वाले कुञ्जों में जायें; अपने भौर ये पव-चिह्नों को जानने वाले व्याध (शिकारी), जो कन्दराओं को भी माति बानते हों, व्यानों से ध्यात अरण्यों मे घूम और जिन गुप्तचरों ने पाव बनाया हुआ हो, वे प्रत्येक तपोवन मे जायें ।।२।। पुष-महाराज जैसी आज्ञा दें। पुहिर--ठहो। और सहदेव से यह बहना एकान्त में राडासहित वात-धीत करते हुए, सोये हुए, रोग से पीडित और केरा में हुए लोगों) को धानबीन करनी चाहिये । जहाँ पशु भयभीत हे हो, जहाँ पक्षियों का रोलाहल हो और जहां राजा के लक्षणों से युक्त के बिलों हो, (उन स्थानों को भी छात्र-जोर करनी चाहिपे ॥३॥ पुरुष--महाराम जो माना । (पहबहार बाहर जाकर फिर प्रवेश हर्ष के साथ) महाराम, पाम्बालक भाषा है। पुरि-कौन भर लामो। पुरप--(बाहर बार पाम्बालक के साथ प्रदेश का पह महाराब है। पालक समीरबायें। यना मिपुरविहारतः । चरा ए रास: । प्रमादियाला पर मेरिणाम परिवति मा. ॥२॥ माहिए, जानि मामलो मा एक या [सामासा: परिचार्षिया तिरिया मनाः । पर यसिन्धाने मारा: कोश परि मामा म.nl mit लि. मायाला

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पाठोऽङ्कः प्रय समाचार सुनाता हूँ । हल गया है? लिाई भी दिया? पाञ्चालक-जय हो, महाराज की जय हो। महाराज और महारानी को पाञ्चालक--महाराज, कवल उसका पद-मार्ग ही नहीं, प्रत्युत महारानी मी। धातुविनापि विजयादरविक्रमस्य इति पाठे मम तो विपरिमन्थर. २२५ -युधिष्टिर-भद्र पाञ्चालक, क्या उस दुष्टात्मा नोय कौरव का पद-मार्ग केय और वस्त्रों के हरणरूपी महापातक का मुख्य हेतु वह दुष्टात्मा ही मिल युधिष्ठिर-शाबास ! भर, तुमने प्रिय समाचार यतसाया। तो क्या पाञ्चालक-महाराज, युद्ध में आये हुये को पूछिये । -(भयपूर्वक) क्यों ? मेरे स्वामी युर में उतरे हुए हैं ? युधिष्ठिर--(भाशङ्का के साथ) क्या सचमुच मेरा वत्स पुर कर रहा है ? पाञ्चालक-सचमुच । क्या महाराज से असत्य निवेदन किया जायेगा ? पुहिर-- महान पराक्रम वाले (पुरुष) का मी विना कारण ही भयभीत चित्त देक-मान्य को प्राप्त हो जाता है। मैं युद्ध में उठी हुई गदा पाले भीम की वाओं के बस को जानता हूँ (लेकिन फिर भी) माहित हूँ ॥४॥ . (दोपदी को देखकर) अरीबोर क्षत्रिया, हे प्रिया, पहले राज-सभा में गुरुजनों, बम्युओं मोर सहनों राजाओं के मने हमारा यह अपमान हुआ था, सम्भवतः बार या तो हमारे प्राणों मारा या पशु-तुल्प कौरव-प्रति के प्राणों का नारा दोनों हो रस (अपमान) पार पहचागे ॥५॥ द्रौपदी- स्नेहान्मम । राणा पचपि मम माता , arm शिलपमेर पर्म पार पमपति। 'प्रारिता पुरपियो पाए। . गा।

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पष्ठोऽङ्कः माग्य को स्वेच्छाचारिता को दोष देने पर कुमार मोमसेन का परिचित कोई | गरे हुये हरिण (के रघिर) से साल ये, जल्दी करता हुआ समीप आकर कठोर वान में देव जाने के कारण अष-सुने वर्गों से जाने गपे पदों वाली यारणी से सप, जिसने मांस-राशि एक ओर रख दी और जिसके चरण तथा वस्त्र ताजे हा-'महाराज कुमार, इस महान् जलाशय के किनारे पर दो पद-पक्तियों के लिह पड़े हुए है। उनमें से एक भूमि पर वापिस लौट कर आई है, दूसरी इस महान् जलाशय में लेटा हुआ होगा। बलराम के छोटे भाई (कृष्ण) के भरहर गर्जन करके कि (जल ने) सब दिशाओं के गहरों को भर दिया और २२६ इस वचन को सुनकर, जलाशय के जल का (इस प्रकार) आलोडन करके और नहीं। आगे कुमार का अधिकार है। इसके पश्चात् हम सब उसे ही आगे [ करके चल पड़े। तालाब के किनारे जाकर मुयोधन के पद-चिह्न (के रूप मे) जानो गई पद-पक्ति को पाकर भगवान वासुदेव ने कहा-'हे वीर वृकोदर, मुयोधन जल-स्तम्भनी विद्या जाता है । इसलिए अवश्य ही यह तेरे भय से फिर भी अधिक था; जल-जन्तुओं और पक्षियों के समूह घबरा गये और भय के कारण घड़ियाल और मगरमच्छ भागने लगे, कुमार वृकोदर मे कहा-अरे ओ, प्ययं प्रकट किये गये भूठे पौरुष पर अभिमान करने वाले, पाञ्चाल राजकुमारी के केश और वस्त्र को खींचने का महापातक करने वाले, एतराष्ट्र कमीच पुत्रा हे नरपशु, तू चन्द्र के निर्मस कुल में अपना जन्म बतलाता है, तू अब भी पदा धारण कर रहा है। तू दुणसन के गरम हघिर रूपी मय से मत्त हए मुस भीम) को अपना शत्रु समानता है। वर्ष से मन्या मधु और कंटम के सत्र माण के प्रति भी उग्छुइखल पेश करता है। लेकिन अब मेरेर से युर-क्षेत्र को छोड़कर कोष में छिपा है ॥७॥ जन्मेति [ध्यपदिशासि स्थसि । दुःशासनस्य कोण निमिष्ण गोरिलतमेव घु तेन तापानेन क्षीरं मतम् । कोणमित्या ईपदः इति शेरादेशः।) व मतम् । (दगान्धो विवेमून्यः । मधुटपि तनामदया। उतमविनयेन भाषसे । नृपशो बनाधम । इह निनामादमसंपिः । पाह- धिक्षेपोक्तिः क्षतिमता इति ।।

• । गोगहरे मतिचा मो माना, पामाल्या मन्युवह्निः फुटमुपगमितप्राय एव प्रमह व्यागर्म पाहतपशिशु मया कौरवान्तःपुरेषु । भातुर्दु गागनस्य सवदगुरस: पीयमानं निरीक्ष्य कोधान्कि भीमगने विहितमममये यत्वयास्तोऽभिमानः । पो- माप, मपनीतो मे भारि पुनरपि मुप्तभं दर्शन भविष्यति । [गाह आणी में मजा पुगो वि मुना दमरा भनिदि। पुििहरण, नामसानि प्याहतमहत्यस्मिन्काले । भा, ततस्ततः । पावासकः - देव, सताय भावमाणेन वृकोदरेणावीयं श्रेयोपनि भीषणगदापागिना सहसंपोखतितीरमुत्सननलिनीवनमरवितरित धान्तमत्स्यशन्तमतिरवारयमितवारिसंघयमायतमपि तमासा डितम् । युधिडिर:-भा, तथापि कि नोत्थितः । पाञ्चालक:--देव, कनोस्पितः । त्यक्त्वोत्थितः सरभसं सरसः स मूल- मुद्भूतकोपदहनोग्रविपस्फुलिङ्गः। पाञ्चाल्या इति । कौरवान्तःपुरेपु मया [प्रसह्य बलाद हताः तेपु] हसपतिषु सत्सु तदीयकेशपायर्यासक्तः संबद्धः [व्यत्यस्तः] मन्युवह्निरसपामितप्राय एवेत्यन्वयः । दुःशासनबक्षसः सद्रक्त ममा मालोक्य स्वया मयि मौमसेने कि विहितं यदसमयेकाले प्रतिकारोचि सस्यपीत्यर्थः । एव मानोऽस्तस्त्यक्तस्त्वया । इदानी स नर्तुमहंतीति भाव अपनीतो नाथेन मम मन्युयदि पुनरपि सुलभदर्शनः स भवि [प्रोधेनोडतमुद्भट यथा तया अमिता या भीपणा गदा सा पाणो यस्य । 'नलिनीवनं यस्मिन् । अपविधा विक्षिप्ता अत एव मूर्षित . ६ .

*
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पष्ठोऽङ्कः
मी, बरे वर्ष के अन्धे,
हरा कौरवों के अन्तःपुर के पतियों के बलपूर्वक मार दिये जाने पर
एशों ने द्रौपदी के गोपाली अनल को लगभग शान्त कर दिया है,
Par (है); अपने भाई दुःशासन के पक्ष स्थल से बहते हुए पिर को
रे माता रेलकर कोष के कारण तूने भीमसेन के प्रति क्या कर दिया है कि
तूने असमय में ही अभिमान रमाग दिया है ment
गौपदी-नाप, मेरा शोक दूर हो जाय परि फिर (तुम्हारा) दर्शन गुलभ
हाये।
युधिष्टिर-रणा, इस समय अशुभ दहन रहना उचित नहीं है। भा,
m?
सालक-महाराज, तब इस प्रकार कहते हुए भीमसेन ने, जिसके साप
और के कारण योर से घुमाई गई भयर गए पी, उतर उम विशाल
सरको भी चारों और इस प्रकार डोर से मय गला उस तर (पानी
1) ला frया गया; बसिनियों का समूह हो गया; पाहाहर फेंक
गये ताधित हो गये, मछली और पक्षी पारा गये और कप-समूह
भयर के साथ रामता।
सुधिडिर-भारपा (पह) दिर भीमरी रसा?
कमारामरामहौ।
भूय मधे एक-सागर गरमान, भीम को भी
भगराधमाने (givr), जिसमें vifema भार
पपरिभाषा irr freer Ret: Prime
रिमा शाहिना ferreirail
मारोबार
In tोन गाणे (
art
सार- गोhifterrerent

कमुरसन्नगोषमस्मदोरमुक्तसिंहनावमपमित्रवान्धवमशेरवं रणस्यानमतोमर तमुष्णं च निःश्वसितवान् । ततश्र वृकोदरेणानिहितम- अविभोः औरणार तिं बघुनामदर्शनमन्पुना । म विवाद कृपाः पर्याहाः पाणवाः समाया पर प्रसिपनो मानः [अङ्गीकनः)। [करयुगन] उत्तसिनो एनोरणमासी ना गता येन ग गया। [विशीर्णानि भग्नानि विर्य २३२ देणीसंहारे आयस्तभीमभुजमन्दरवेल्लनाभिः क्षीरोदधेः सुमथितादिव कालकूटः ॥९॥ युधिष्ठिरः-साघु, सुक्षत्रिय, साधु । द्रौपदी-प्रतिपन्नः समरो न वा। [पडिवण्णो समरो ण वा ।] पाञ्चालक:-उत्याय च तस्मात्सलिलाशयारकरयुगलोत्तम्भिततोरणी भीमगदः कथयति स्म-'अरे रे मारते, कि भयेन प्रलीन दुर्योधनं मन्यते भार मूढ, अनिहतपाण्डुपुत्रः प्रकाशं सममानो विमितुमध्यवसितवानरिम पागल एवं चोक्ते वासुदेवकिरीटिम्या दावयन्तःसलिलं निषिद्धसमरसमारम्भीर मुतारितो भीमसुयोधनौ । आसीनश्च कौरवराजः सितितले पा लिक्षिर विशीर्णरपसहर निहतकुरुशतगजवाजिनरसहस्रकलेवरसमसप्तद्गप्रकरणम् सहाय इति। पकानां मन्यसेऽस्माकं यं सुयोधं सुयोधन । दंगितस्यात्तरास्वस्य तेन तेऽस्तु रणोत्सवः ॥१०॥ इयं च पुरधामपापित ष्टि मारपोनिशियोक्तवाग्धाराः। म तथा । मायरत. क्षिप्तः [आयस्तो विक्षिप्ती भोमस्म भुगावेर म बेल्लाभि.] वेखना चालनम् ॥६॥ या पाना मयाणि पग्मिन् । निहतं पशु तस्य पारिनरम HTTA MAINE. मिन) arम बकः गणामः। आगना मिशनि बान्धवारच परमाना' भागना मम मायामिति । अम्माक म । (भुयो मुमेन योधनीयम् । - पठो भाई रनिङ्ग (चिनगारी, कन) निकल रहे थे, सासाव की तलहटी छोड़कर से र पुििहर-धन्य, और क्षत्रिय, पन्य । औरदो-(उसने) पुर (भी) किया अपना नहीं । वाता-और उस तालाब से उठकर (निकलकर) दोनों हाथों से नया हुई और तोरण बनाई हुई भयङ्कर गदा वाला यह कहने लगा-भरे ओ वन-पु, या आप दुर्योधन को भय के कारण छिपा हुआ समझते हैं ? मूर्ष, के पुत्रों को बिना मारे प्रकट में सभित होते हुए मैंने पाताल में विश्राम नेगा निश्चय किया था। इस प्रकार कहने पर बातदेव और अर्जुन, भीन और मुयोधन दोनों को हो, नल के अन्दर जिनके युद्ध कर्म को रोक दिया था, यो पर ले आये । तब गा को भूमि पर फेंककर बैठते हुए कौरव-राज ने परयों से अन्य रण-भूमि को देखकर, जिसमें सहलों रप टूटे पड़े थे, जिसमें परे गये सैकड़ों कारयों और हजारों हायो घोड़ों के शरीरों के ढेरों पर गिड, और सियारों के झु एक साय मिलकर झापट रहे थे, जिसमे वीर योदा हो गये थे, जिसमें हमारे सैनिक सहनाद कर रहे थे और जहाँ से (उसके) देर और मान्यत्र जा चुके थे, लम्बा और गरम सास लिया। इसके पश्चात कोरर ने कहा-'अरे हे कौरव-राज, वन्धुओं के नाश का दुःख न कर। इस कार ग्लानि न करो कि पाण्डव तो बहुत-से हैं और मैं युद्ध में सहाय- हे सुयोधन, हम पांचों में से जिसको पुर के लिये आसान समझो, कवच और शस्त्र-धारण किये हुए तेरा उसके साय (हो) युद्धरूपी उत्सव नाय॥१०॥ ऐसा सुनकर दोनों कुमारों पर रोष-भरी हष्टि डालकर एतराष्ट्र के पुत्र - तमवाहस्य । तेन सह तब रणोत्सवोऽस्त्विति संवन्धः । तेनेति सहा तृतीया ॥१०॥ कुमारयोभीमार्जुनयोः।

[परस्परस्य यः क्रोधेनाधिक्षेपो निन्दा तत्र या परुषवाकव्या महा करणविशेषः । [अपयुपिता प्रतिज्ञा यस्य ताहो। प्रतिमाया अनिय पूर्वन्तामिति । हरनखचिमा: बलशा रनकलशाः। मसिमेनौर तस्यद वीरयोगिरवाकवरी शवेशः । क्षणो मुह स्वयोनिमा वरीवन्ध इति निमित्तरातमी। राम परसुराम । णतःतेजितःORT २३४ वेणीसंहारे कर्णदुःशासनवधात्तुल्यावेव युवां मम । अप्रियोऽपि प्रियो योद्धं त्वमेव प्रियसाहसः ॥११॥ इत्युत्थाय परस्परक्रोधाषिक्षेपपरुषवाकलहप्रस्तावितघोरसइमामो विधि विभ्रमभ्रमितगदापरिमासुरभुजदण्डौ मण्डलविचरितुमारन्धो मौमदुर्योधनौ। च देवेन चक्रपाणिना देवसम्माशमनुषितः। आह च देवो देवकीनन्दन अपर्युषितप्रतिज्ञे च मारतो प्रनष्टे कौरवराने महानासीनो विषादः। संगी पुनर्भीमसेनेनासादिते सुयोधने निष्कण्टकोमूतं भुवनतलं परिकलयतु भरान अभ्युदयोचिताश्चानवरतं प्रवत्यंन्ता मङ्गलसमारम्भाः। कृतं संदेहेन । पूर्यन्तां सलिलेन रत्नकलशा राज्याभिषेकाय ते कृष्णात्यन्तचिरोज्झिते च कवरीबन्धे करोतु क्षरणम् । रामे शताकुठारभासुरकरे क्षत्रद्रुमोच्छेदिनि क्रोधान्धे च वृकोदरे परिपतत्याजो कुतः संशयः ॥१२॥ दौपदी--(सदाप्पम्) यद्देवस्त्रिभुवननायो भणति तत्कथमन्यया भविष्य (जं देवो तिहुमणाहो भणादि तं वह भण्णहा भविरा पाञ्चालक:-न केवलमियमाशीः । असुरनियूदनस्यादेशोऽपि । युधिष्ठिरः-को हि नाम भगवता संदिष्टं विकल्पयति । कोज भो कर्णेति । है भीम स्वमेव योद्धं प्रियः कीदृशः अमित्रं साहसी पर प्रस्तावितो पोरसंग्रामो याभ्याम् । विचित्र विवियो यो विभमस्तेन भनि गदा तया परिमागुरी भुजदण्ही ययोस्तो।) विभ्रमो दिसामः ! " दिरपयंः। प्रनष्टेडहाटे । समारम्भा मङ्गलादिक्रियाः । । ।

२३५ पष्ठोऽङ्कः नणं और दुःशासन के वध के कारण तुम दोनों मेरे लिये समान ही हो। था मौ) अप्रिय होने पर भी साहस-प्रिय होने से तुम हो मुझे युद्ध में इष्ट यह कहकर (और) उठकर भीम और दुर्योधन, जिन्होंने परस्पर क्रोध के रण निन्दा के कठोर वचनों के कलह से भयङ्कर युद्ध प्रारम्भ कर दिया था और जिनको दण्ड-सदृश्य भुनायें अनेकविध सुन्दर चेष्टाओं के साथ घुमाई गई दमों से धमक रही थी, मण्डल बनाकर घूमने सगे; और मुझे भगवान कृष्ण राप में चक्र घाले) ने महाराज के पास भेज दिया। भगवान् देवको-पुत्र ने हा है-भीमसेन के अगले दिन न जाने वाली प्रतिज्ञा कर लेने पर और रव-राज के भाग जाने पर हमें बड़ा दुःख पा । सेकिन अय भीम के सुयोधन ो पा लेने पर आप पृथ्वीतल को कटक-हीन हुआ तभने । और अन्दर के जुरुप मङ्गल-कर्म का अखण्ड प्रवर्तन कर दें। (अव) संदेह न करें। तुम्हारे राज्याभिषेक के लिये रन-अटित कलश जल से भरे जायें; द्रौपदी मिनीयं काल से छोड़े गधे केश-पाश के बन्धन का उत्सव मनापे। सत्रिप- ति-स्पी वृक्षों को काटने वाले तथा तीक्ष्ण कुटार से चमकते हुए हाथों वाले शुराम और शोध से मन्धे हुए वृकोदर के पुट भूमि में जाने पर संशय कहाँ (हो सकता है) ॥१२॥ गौरी-(आँगुओं के साथ) त्रिलोकीनाप भगवान् ओ कहेंगे. वह मसस्य मे होगा? पाञ्चालक-यह केवल आशीर्वाद नहीं है । असुररिपु का मादेश भी है। पुधिष्ठिर-भगवान के संदेश में कोन तर्क-वितर्क कर सकता है? मरे यहाँ कोई है? मोदणधार कृत इत्यर्पः । निशितापमानानि तेजिते। समरः पुरस्नेन पामुर: करः यस्य तस्मिन् । शातं नितिनम् । परिपतति मावि सविता आमा निदेशविल्पयति अनुप्र मवानुयमिति विसरतान मोत्यपः । सविधाता समारंभाविधायी] पुरोहितादि। मनमनमर पाप्रधान प्रधानपुरषानुक्रमेण । मन्तरिमरामन्त पुरारिरा[धता - । - [हताः सकलाः सुहृदन्घुवीराः अनुजा राजन्याः क्षत्रियान यानुसयाभूना शरीरमेव शरीरमात्र विमदो पस्य स तया । सकलान् रिसून जेयान । प्रतिज्ञाया भारः सुदरमत्यन्तमतिक्रान्तो निर्वाहयितुमसक्यो प्रदेश एक क्रोति । क्रोधेन उद्गुण उद्यमिता गदा येन स तथा तस्य । -कृतःशस्त्रविक्षेपणे अभ्यस्तः हस्तः यस्य सतहमारा मतदस्तता।] सोरिणि वलभद्रे । [तदुक्तः भारते-आदेशोऽनयोस्तुल्यो भीमर माडीगुपोशारण गह गहगामातेन प्रापितो भयेरातोरवाहित मात्र । [महाराय लिगिमिग माहीम मेमे मो दुराबारी मशिदी पर वि मह्माण मग जेग दे गंगि सहदे मंगामो होईन । जई महीना एकरेगा गह गंगामो से परिषदो मतको भागाहिर भो। पुधिष्ठिर:-नाने, एवं मन्यते नरासंययाती तसारमुइनबोरानु राजायागु पहताधापामशेषाराशरवाहिनीवडायवः शरीरमा भवः कराविदुरमृष्टनिमामिमानी पातंगष्टः परियापुष तपोवनं वा बोन्सार वा पितृमुतेन यावेत । एवं सति मुरमतिकान्तः प्रतिमामारो भवेत्सकता अयस्येति । समर प्रतिपत्तं पञ्चानामपि पागवानामेणापि नंब हम सुयोधनः । शाई चाहं गदापुर वृकोदरस्पंवानेन । मयि सुक्षत्रिये, परम- क्रोधोद्गुणंगदस्य नास्ति सदृशः सत्यं रणे मास्तेः कौरव्ये कृतहस्तता पुनरियं देवे यथा सीरिणि । स्वस्त्यस्तूततधार्तराष्ट्रनलिनीनागाय वत्साय मे. शङ्क तस्य सुयोधनेन समरं नवेतरेपामहम् ।।१३॥ (नेपथ्ये) नृपितोऽस्मि भोस्तृषितोऽस्मि । समावय कश्चित्सलिलच्छायासंप्रशनेन मार युधिष्ठिरः-(आकये) कः कोऽत्र भोः । पाण्डवस्य एकेनापि पाण्डवेनेत्यर्थः । समरं प्रतिपत्तुं मुयोधनः न क्षमोन वृकोदरस्य पाण्डवेषु वलिमस्य [एव अनेन मुयोधनेन गदायुर गई। . . स 1 at २३६ पने अभिमान को त्यागकर आयुध का परित्याग कर दे, (और) तपोवन को पठोऽङ्कः होगा ।' यदि उसने माती के दोनों पुत्रों में से किसी एक के साथ युद्ध की नाही होती, तो अनर्थ हो जाता।' पुषिष्टिर-ौपदी, जरासन्ध के शन (भीमसेन) का ऐसा विचार होगा- ग्यारह असोहिणी सेनाओं में, जिनमें सब मित्र, बन्धु, धोर, अनुज और क्षत्रिय र गये हैं, केवल मात्र कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा के शेष रह जाने पर पिन-हीन धृतरार-पुत्र, जिसका केवल शरीर ही धन शेष रह गया है, कमी ती माय अथवा पिता के मुख से सन्धि को प्रार्थना करने लगे। ऐसा होने पर (शों को जानने की प्रतिज्ञा का निर्वाह बहुत दूर चला जायेगा।' सुयोधन गो पाण्डवों में से किसी के भी साथ युद्ध करने में समय नहीं है । और मुझे के सापं भीमसेन के हो गदा को आशा है । भरी बोर क्षत्रिया, सदमुच क्रोध से गदा उठाये हुए वायु-पुत्र (भीम) का पुट में कोई मोड़ है। लेकिन कौरव (दुर्योधन) में भगवान बलराम जैसी प्रवीणता है। शेरब-रूपी कमलिनियों के लिये ग समान, मेरे बरस (मीम) का धाण हो। मैं सुयोधन के साथ उसके ही संग्राम की आराडा करता है. गों के (संग्राम) को नहीं ॥१३॥ ( नेपध्य में) में प्यासा हूँ, अरे, मैं प्यासा हूँ। कोई जल भोर या देकर मुझे मनु. पुलिर-(गुनरर) मरे, यहाँ है? बत्तराती सरोष पात राष्ट्रो मोदरान ॥ महा. १९...। रखता IT पातंराध पर मलिग्यः रमसिम्परनामा विसने मागोएली। या 'ना धार्तरावर एक नलिन्यो येस पामो नाम: तस्य मर्म बस्याल पत् । यत तरय भीमाय मुशेग्नेन समर गायु शबीमः तेन मह पुरी सियो भवनतिषः परेषा तुमरापुरीति गएर हे मुयोधनं ने नुमिति तेग मरंग पाm । दुम्मान नि । महाभारत व राधमः पुरमा हार राजधानी परिवाषन प्रारी माग ary -इमा - ओपनमनामार्ग २४० वेणीसंहारे (प्रविश्य) कञ्चुकी-माज्ञापयतु देवः । युधिष्ठिरः - गायतां किमेतत् । कञ्चुकी-यदाज्ञापयति देवः । (इति निष्क्रम्य पुनः प्रविश्य) देव शुन्य नतिथिपस्थितः । युधिष्ठिरः-शीघ्र प्रवेशय। कञ्चुकीयदाज्ञापयति देवः । (इति निष्कान्तः) (ततः प्रविशति मुनिवेषधारी चार्वाको नाम राक्षमः) राक्षस:-(आरमगतम्) एषोऽस्मि चार्वाको नाम राक्षसः मुपोषनार दि पाण्डवान्वश्वयित भ्रमामि । (प्रकाशम्) तृषितोऽस्मि । संभावमतु मा कति लछायाप्रसनेन । (इति राशः समीपमुपमर्पति) ( सर्व उत्तिन्ति) पुधिडिर-मुने, अभिवादये। राक्षरा:--अकालोऽयं शमुवाचारस्य । जलप्रदानेन संभारपतु मात्र । पुधिष्ठिर:-मुने, इरमासनम् । उपविश्यताम् । राक्षस:-(उपविश्य) नतु भवतापि त्रिपतानासनपरिप्रहः । पुधिष्ठिर:-(उपविश्य)कोल मोः । सलिलमुपनप । (प्रविश्य गृहीतमुहारः) को-(उपगृत्य) महाराज, शशिरगुरभिमनिलांपूणोऽयंस पानमा देशम दुरि मुने, निनादम्याप्रतिकारः। पक्षम: - (पा प्रशालयोपस्पृशविविस्य) भो, पिरमित भो । पुर्शि:-मायासी भवामा क्षत्रिय एवारिम। - । Part I Raf MENT पठो तर (प्रवेश करके) करचुकी-महारान आशा दीजिये। पुधिष्ठिर-मालूम करो यह क्मा है ? कम्युको महाराज की जो आशा हो। (यह कहकर वाहर जाकर पुन प्रवेश करके) महाराज, (कोई) भूषा अतिथि आया है। युधिष्ठिर-शीत अन्दर लिया लाओ। कञ्चुकी-महाराज को जो आज्ञा । (यह कहकर वाहर चला गया। ( तत्पश्चाद मुनि का वेष धारण किये चार्वाक नाम का राक्षम प्रवेश करता है।) राक्षस-(मन मे) यह मैं सुयोधन का मित्र बाकि नाम का राक्षस पाण्डवों को धोखा देने के लिये घूम रहा हूँ। (प्रकट में) मैं प्यासा हूँ। ई मुझे जल और छाया देकर अनुगृहीत करे। (यह कहकर राजा के समीप रता है)। (सब उठ खड़े होते हैं।" युधिष्ठिर--मुनि, मैं अभिवादन करता हूं। राक्षस --यह शिष्टाचार का समय नहीं है। मुझे जल देकर अनुगृहीत -- जिये। युधिष्ठिर-मुनि, यह आसन (है) । बैंटिये। राक्षस-(बैटकर) अब भाप भी तो आसन ग्रहण कीजिये। युधिष्ठिर--(वंटकर) यहाँ कोई है ? जस लाओ। ( सुराही लिये हुए प्रवेश करके ) कन्चुको-(समीप जाकर) महाराज, यह शीतल और सुगन्धित जल मे भुराही है और यह पीने के लिये पात्र है। युधिष्ठिर-मुनि, मास का प्रतिकार कीजिये। राक्षस-पैर धोकर आचमन करते हुए सोचकर) अरे, 4 सममता तुम क्षत्रिय हो। युधिष्ठिर- -आप ठीक समझ रहे हैं। मैं क्षत्रिय होहूँ। लः । समुदाचारस्य शिष्टाचारस्य ! भङ्गारः पनामा इत्यमर ..

हिन्दयुतमिति जाहावेकवचनम् । परवातपस्य चरस्मर्यानपत्य । अपर्यातरम
राक्षस:-मुनिजनसुलमेन कौतूहलेन तत्रभवता महाभत्रिगना द्वन्दपुर
मवलोकयितुं पर्यटामि समन्तपन्तकम्। अद्य तु बलवत्तया शरदासपस्यापति
मविके वीजयनं महर्षि मेदेन तालवृन्तकेन । पजनं तालवृन्तरमपम
२४२
देणीसंहारे
रास:-गुलमा स्वजनविनाशः समामेषु प्रतिदिनमतो नादेयं मदद
जलादिकम् । भवतु । छाययानमा सरावतीशिशिरतरङ्गरणा मरता का
विगतमो भविष्यामि।
द्रौपली-बुद्धिमतिके, वीजय महषिमनेन तालवृन्तेन ।
धुद्धिमदिए वीएहि महमि इमिणा तालवितण।]
( चेटी तथा करोति)
राक्षस:-भवति, अनुचितोऽयमस्मासु समुदावाल
युधिष्ठिरः मुने, कय कयमेवं भवान्परिधान्तः ।
धावलोक्य गदायुद्धमर्जुनसुयोधनयोरागतोऽस्मि ।
( सर्वे विपादं नाटयन्ति)
कञ्चुको-मुने, न खल्वेवम् । भोमसुयोधनयोरिति कथय ।
राक्षसः-आः अविदितवृत्तान्त एव फयं मामाक्षिपसि ।
युधिष्ठिर:-महर्षे, कथय कथय ।
राक्षस:-क्षणमात्र विश्रम्य सर्व कययामि भवतो न पुनरस्थ वृद्धस्य
पुधिष्ठिरः-कयय किमर्जुनसुयोधनयोरिति ।
राक्षस:--मनु पूर्वमेव कपितं मया प्रवृत्तं गदायुद्धमिति ।
युधिहिर:-न भीमसुयोधनयोरिति ।
राक्षस:--वृत्तं तत् ।
(युधिष्ठिरो द्रौपदी च मोहमुपगतो)
कञ्चको-(सलिलेनासिच्य) समास्तुि देवो देवी छ ।
चेटी - समायसितु समाश्वसितु देखो। [समस्ससा समस्सस
तु पिपासा तृट् इत्यमरः । [स्वननविनाशः अतोऽशौचसम्भावना
सरस्वत्याः शिशिरांस्तरङ्गास्मृतीति तेन । सरस्वती नदीभेदः । हज्जे
देवी

षष्ठोऽङ्कः
२४३
नस-प्रतिदिन में बन्धु-मरण मुलम है, इसलिये आप से
ग्रहण नहीं करना चाहिये। अच्छा। इस छाया से भौर सरस
तो शीतल तरङ्गों को छूने वाले इस वायु से ही थकान दूर
1-बुद्धिमतिका, इस पंखे से महर्षि की हवा करो।
(पेटी सा ही करती है )
--आवरणीय, हमारे प्रति यह शिष्टाचार उचित नहीं है।
ठर-मुनि महाराज, पतलाइये, आप इस प्रकार से पक गये ?
-मुनि जन मुलभ उत्सुकता के कारण मैं आवरणीय महान क्षत्रिय
- देखने के लिये समन्तपश्चक मे घूम रहा हूं। माग तो गए
व होने के कारण अर्जुन और मुपोषन के गा-युर को अपूरा है
( मव दुःख का अभिनय करते हैं)
--मुनि, ऐसा नहीं है । 'भीम और मुपोषन । (गरा-यर) ऐमा'
-आह । विना बात जाने ही मुम पर माक्षेपसे पर ऐहो।
महपि, कहिये, रहिये।
अण-मर विभाम करके सब कुछ आपसेरा,
-पहिये, मर्जुन और सुयोधन का क्या (एमा)
ने पहले ही बतला तो रिया हि पदापरामा'।
-मोम और गुपोषनाही?
उमा दा।
(युधिष्ठिर और रीमूनियर हो गते)
(अल शिर) महाराज मोरगारामीच
वि, महारानी पत्तदो।

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पठो २९५ (दोनों पेतना प्राप्त करते है ) युधिष्ठिर-मुनि, या एते हो कि भीम और मुयोधन का गदा-पुर द्वौपदी-गपन बलताइये, बतलाइये क्या हुआ राक्षस-बी में दोनों है कौन? कञ्चुकी-बहन, यह भगवान् युधिष्ठिर है, और यह पाञ्चाल की रामकुमारी। राक्षस-आह ! मुझ निदेय ने बटुवात भारम्भ कर दी। द्रोपदो-हाय ! नाय भीमसेन । (मूञ्छित हो जाती है)। कश्की-आपने क्या कहा? चेटी-~र्य रखिये, महारानी धर्य रखिये। युधिष्ठिर-(मामू भरकर) ब्रह्मन, (वृत्तम्) इस संदिग्य पद के कारण ही युधिष्ठिर दु:खी है। यत्स के विषय में ययाय के मिश्रित हो जाने पर पह प्राण त्याग देने से सुखी (ही जायेगा) men रामप्त--(आनन्द के साथ मन में) इसके लिये ही मेरा प्रयत्न है। (प्रकट मे) आदि तो अवश्य कहना ही पड़ेगा सब संक्षेप से कह देता हूँ। (क्योंकि) बन्यु को विपत्ति को विस्तार से कहना ठीक नहीं है। पुधिष्ठिर-(भासू बहाते हुए) । है बाह्मण, संक्षेप से या विस्तार से किसी भी प्रकार कह अलिये। मैंने बरस के सम्बन्ध में कोई भी (अमङ्गल) सुनने के लिये यह सण दे दिया है ॥१५॥ राक्षस--सुनिये-- दुर्योधन और भीम का वह भारी गवाओं को भयङ्कर ध्वनि वाला युद्ध सर्वति । किमपीत्यनेनामङ्गल्ये निवारयति । क्षणोऽवसरः । सर्वदा योप्यामीरयर्थः ॥१५॥ तस्मिमिति । घोरं भयानक [गुब्योंगंदयो. गदाप्रहारणामिति 4

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- पठोडूः २४ पदो--(वेग से उठकर) इसके बाद ? इसके बाद? राक्षस-(मन मे फिर इन दोनों को चेतना से हाँ? तब हलधारी (बलराम) जल्दी से वहाँ मा गया; उसके सामने देर त युध होता रहा लेकिन हलधारी ने शिष्य (दुर्योधन) के प्रति पक्षपात : मापय लेकर धुपके-से संकेत कर दिया, जिस (सकेत) को पाकर कुरुओं श्रेष्ठ ने दुःशासन के शत्रु से प्रतिशोध पा लिया ॥tu युधिष्ठिर--हाथ, वरस भीम। (यह कहकर मूञ्छित हो जाता है)। औपदी-हाय, नाय भीमसेन । हाय मेरे अपमान का बदला लेने में प्रार- लाग करने वाले ! जटासुर, बक, हिडिम्य किौर, कोचक और जरासन्ध + मारने वाले, कमल लाकर प्रसन्न करने वाले, मुझे उत्तर दीजिये। (यह कहक भूच्छित हो जाती है)। कञ्चुकी--(ओमू भरकर) हाय, कुमार भीमसेन, कौरव-दुस-रूपी कम लिली के लिये हिम-वर्षा-सहर । (घबराहट के साय) महाराज, पई पार नौजिये। , स्वामिनी को धर्य बंधादये। महषि, आप मी महाराज के शास्वना देखें। राक्षस--(मन मे) प्राण त्याग कराने के लिये धैर्य धाता हूँ। (प्रर में हे भीम के वो भाई, क्षण-भर धेय रखिये। (अभी कुछ) महानी शेष है। युधिडिर-(संभलकर) महर्षि, या बहानी शेष है ? औपी--(होश मे आर) भगवन्, कहिये या रहना होप है ? कञ्चुकीकहिये, कहिले। राक्षस--सब उस भोर क्षत्रिय के मारे जाने और कीर-गुलभ पति का लेने र भाई के बम के शोक से उत्पम, पूर्णरूप से बहते ए बांसुओं पोहा हा नाप मदीयपरिभक-हा अरामुरा हा सौगन्धिाहरगारमपादुगार काम ! म अटासुरो देवः । सो टेस्यभेद । सौगन्धि रमन । मायाः मुवरांकमलाहाणाधर दौरदा आराधन त पाटुकार: प्रेम साप। या सेन पाटुकार । धाराष्ट्राणां कुल तदेव कमलिनी सदा प्रायवर्ष হিমষ। মান্না। হিমঘা নানি বিলীবি মণিতি।} पाम् । सम एका तपा संगतिमम् । य भूगा पर फञ्चुकी-(सास्रम्) हा कुमार भीमसेन, धार्तराष्ट्रकुलकमलिनी। २४६ वेणीसंहारे द्रौपदी- (सहसोरथाय) ततस्ततः । [तदो उदो। रामसः- (स्वगतम्) कयं पुनरनयोलग्घसंजतामपनयामि । सीरी सत्वरमागतश्चिरमभूत्तस्याग्रतः सङ्गरः । आलम्व्य प्रियशिप्यतां तु हलिना संज्ञा रहस्याहिता यामासाद्य कुरूत्तमः प्रतिकृति दुःशासनारी गतः ॥१६ युधिष्ठिरः- हा यरस वृकोदर। (इति मोहमुपगतः) द्रौपदी-हा नाय भीमसेन, हा मम परिभवप्रतीकारपरित्यक्तजीविता सुरयकहिडिम्बकिर्मारकीचकजरासंधनिषूदन, सौगन्धिाहरणपाटुकार, हि प्रतिवचनम् । (इति मोहमुपगता) हा शाह भीमसेण हा मह परिमारि परिचत्तजीविअ जडासुरबाहिडिम्बकिम्मोरकीचअमरासंघणिमूदण सोशिश- हरणचाडुआर देहि मे पडिवअणम् । । (ससंभ्रमम्) समाश्वसितु महाराजः । भदे, समाश्वासय स्वामिनीम् । महा त्वमपि तावदाधासय महाराजम् । राक्षसः-(स्वगतम्) आधासयामि प्राणान्परित्याजमितुम् । (धान) भो भीमाग्रज, क्षणमेकमाघीयता समाधासः । कथाशेषोऽस्ति । युधिष्ठिरः-(समाश्वस्य) महर्षे, किमस्ति कथाशेषः । द्रौपदरी-(प्रतिवुध्य) भगवन, कथय कोहयः कयारोप इति । [भगवं पहेहि वोदिसो कहासेमो ति । कञ्चुकी-कथय कथय । रामासः-ततश हते तस्मिन्सुक्षत्रिय वीरगुसमा गतिमुपगते सपा भ्रातृवधशोरजं बाप्पं प्रमृग्य भावपयोकाइपहाय गाणी NITY पोर: ध्वनियंस्मिन् । सौरी वम प्रियः शिष्यो यस्येति प्रिमियः । भावः रियशिष्यता ताम् । [संजा हलचासनेन प्रहारस्थानमूलम् ।। प्रतीकारम् । अर्थात दुःशासनवधस्य । दुःशासनारी भीमे । समीर हत इति भावः ॥१६॥ - पठोड: २४ गौपदी-(वेग से उठार) इसके बाद ? इसके माद ? राक्षस-(मन में। फिर इन दोनों की चेतना कैसे हो ? सब हलधारी (अलराम) जल्दी से वहाँ आ गया, उसके सामने देर त द होता रहा, लेकिन हलधारी ने शिष्य (दुर्योधन) के प्रति पक्षपात श्रिय लेकर पुपके से संकेत कर दिश, जिस {सकेत) को पाकर कुरुओं ष्ठ ने दुःशासन के शत्रु से प्रतिशोध पा लिया ॥६॥ युधिष्ठिर हाय, वत्स मोम । (यह कहकर मूचित हो जाता है)। द्रौपदी-हाय, नाय भोमसेन ! हाय मेरे अपमान का बदला लेने में प्राण ग करने वाले ! जटासुर, बक, हिडिव किरि, कोचक और जरासन्ध - परने वाले, कमल लाकर प्रसार करने वाले, मुझे उत्तर दीजिये। (यह कहक च्छित हो जाती है। कञ्चुकी--(आँसू भरकर) हाय, कुमार भीगसैन, कौरव-कुल-रुपी कम मो के लिये हिम-वर्षा-सहा ! (घबराहट के साथ) महाराज, पर्य धार जिये। भदे, स्वामिनी को धर्य बंधाइये। महर्षि, आप भी महाराज नित्वना देखें। राक्षस-(मन में) प्राण त्याग कराने के लिये धैर्य धाता । (प्रार में भीम के बड़े भाई, क्षण-मर धैर्य रखिये। (अमी कुछ) पहानी शेष है। पुहिर-संभलकर) महषि, क्या कहानी शेष है ? प्रौपदी-(होश में आकर) भगवन, कहिये क्या रहना शेष है ? कधुकी-कहिपे, कहिये। रासस-तब उस पौर विप के मारे जाने और बीर-मुलभाति पा लेने र भाई के वय के शोक से उत्पन, पूर्णरूप से बहते हुए मासुत्रों को पोंहार हा नाप भदीपपरिभव हा जटासुर-हर मोगन्धिपहरगामघाटमा riff ) अत्र मटासुरो दैत्यभेद । बको दपभेद । मौलिक मनम् । जापा: सुवर्णकमलाहरणादर औग्दा आराधन ता पादुका प्रेम पत्र । मा सेन पाटार । पात राहाणो पुल तदेव मनिनो ताया शास्वयं रेमवरे । तासकर । हिमवृष्टया मनानि नितीति प्रसिदि. रस्पा । [सम पपा सपा संगतिनम् । रात पक्षनरत :

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२४६ है पठोऽङ्कः माई के वध के शोक के कारण गाण्डीव को छोड़कर, और ताजे रुधिर के समूह ने लिए उस ही गदा को भाई के हाथ से लेकर, सन्धि की इच्छा वाले वासुदेव द्वारा रोके जाने पर भी, घुमाई गई गदा को शद्वार से बड़ी हुई गम्भीर पचनों की ध्वनि वाले कौरव-राज द्वारा हंसी के साथ 'आओ, आओ इस कार ललकार गया तीसरा (पाण्डव), आपका छोटा भाई, किरीट (मुकुट) धारण करने वाला (अर्जुन) युद्ध करने लगा। (गदा में) अनन्यस्त उत अर्जुन) को गदा के प्रहार से मृत्यु की संभावना करता हुआ बलराम अर्जुन के पक्षपाती देवकी-पुत्र को बड़े प्रयत्न से अपने रप में बैठाकर द्वारका ते गया। युधिष्ठिर - ठीक, अर्जुन, तूने गाण्डीव को त्यागकर तुरन्त भीम का मार्ग अपना लिया। लेकिन मैं किस आय द्वारा प्राण-स्पाग के महोत्सव को अभि- नापा करू? द्रौपदी--हाय, नाय नीमसेन, अब तुम्हें गदा (-युट) में अनभ्या कर के संमुख जाते हुए छोटे भाई की उपेक्षा करनी उचित नहीं थी। (मन्दिन जाती है)। राक्षस-और इसके बाद मैं- पुधिष्ठिर--मुनि, रहने दीजिये, इसके आगे मुनकर पा (होगा) हा ! भीमसेन, बनवासहपो विपत्ति के बाधिक हाय ! मेरे शरीर की स्थिति मनसे कातर, लाक्षागृह को विपत्ति रूपी समुद्र को पार करने में मौत. - हाय ! किर्लोर, हिडिम्ब, जटासुर और जरासन्ध को जीतने में अदितीर राय ! कीदक और सुयोधन के छोटे भाइयों रुपी समलिनियों के लिये कामान; हाय! भूए मे (मेरी) जातं को स्वीकार कर लेने वारे; हाय। भाजा के पालन करने वाले हाय ! औरव-रूपी वन के वनाग्नि, के व्यसनी निर्तनी भक्ति के पारण रत राहय मन. हाथियों के यल वाले तुमने तब वह रासता स्वीकारसपी; मैंने उससे स्पितिजीवनम् । तस्य विच्छेदासातर । पानपातु पोत. इमर । मोदयभेदः ।। नुजा एव कमलिन्यस्तामा भर उन्मूलपितः । संस्मेति । हे वस्त । पुरोदरं चूतम् । परो दुवे दुराधरम् २ ५५ सनिन: आसक्तिमतः मे बरसा। रामदाता निभानामतं तर है वरस, पूत वीरस्रा खत्तिअस्म पद्धिष्णाद मिलिदुग। ता पहिवाले हि म जान सभा पुधिहिर:-(आकाशे) अम्ब पूये, श्रुतोऽयं तब पुत्रस्य मुगवार मामेकमनायं विलपन्तमुत्सृज्य कापि गतः। तात जरासंधागो, किनारकर स्यमेतावता कालेनाल्पायुषि त्यपि समालोकितं जनेन । अपदा मन हपलव्या यस्य तेन । दशसहस्रसगदहस्तिमाणसारेणेत्यर्थः।] स्वया तदा सा पनि दासताङ्गीकृतासीत् । [सीदतेति पाठे क्लेशमनूभवता त्वया किमामेरि स इति । मगधाधिपो जरासंधः । [मदान्धो दर्पोतो मगधाधिप एपनि अशनिवज इव । गदा परिघ इव तेन शोमने वाहन। गदापरिषः पाणी यत्र ताहोन । पाणिः परः सुवति नि नामा ममाधिसमात्यय पदम्यने स्पात्याग्नापमवात्ययं गादिमा प्रीतिःकते माना mm-मोरया ) हाम, frमेनानी। (महाराम, Frtai भूमिnि:--Tri, free म कोचानिपदनो बाहिटिम्यकिीरहा मदान्धमगधाधिपहिरदमधिभेदागनिः । गदापरिपशोभिना मुजयुगेन तेनान्यितः प्रियस्तव ममानुजोऽर्जुनगुरुगंतोतं किल ॥१८॥ द्रौपदी-नाय भीमसेन, यति में शाः संपमितमाम! पौरस्य क्षत्रियस्य प्रतिज्ञातं शिपिसषितुम् । तरपनिपालय मा यानुपम (पुनर्मोहमुरगता) [गाह भीममेण, तुए दत्त्वा मे करदीकृताखिलनृपां यन्मेदिनी लजसे द्यूते यच्च पणीकृतोऽपि हि मया न क्रुध्यसि प्रीयसे । अतोऽधिकं त्वयि मयाद्य किमपकृतं तत्प्रकाशयेत्यर्थः॥१७॥ कि नामैतद्वतंते। फिल मे केमा संजमिदमारण " + মস্তি पष्ठोऽङ्कः ग्राज क्या अपकार कर दिया कि जो मुझ भनाय और बान्धव- न को छोड़कर जल्दी से चले जा रहे हो ? अब तुम्हारा वह प्रेम कहाँ (चला तुम्हारा पा) ॥१७ दौरदी-(चेतना प्रास करके और उठकर) महाराज, यह क्या है ? युधिष्ठिर-द्रौपदी, और क्या- कोवक को मारने वाला, बक, हिडिम्ब और किर्मोर का हनन करने वाला, मद से अन्धे मगय-देश के राजा (जरासन्ध) रूपी हाथो को सन्धि छिन्न करने ये बच के समान, परिघ सहरा गवा से शोमित भुज-युगल से युक्त, तेरा प्रिय, मेरा छोटा भाई और अर्जुन का बड़ा (भाई) वह अस्त को प्राप्त हो गया दोपदी-नाय भीमसेन, आपको तो मेरे केश बांधने थे। और क्षत्रियको -तिजा किये हुये कार्य को छोड़ना उचित नहीं है। इसलिये मेरी प्रतीक्षा जिये, मैं अभी माती हूँ। (फिर मूच्छित हो जाती है)। युधिष्ठिर--(आकार की ओर देखकर) माता पृषा, आपने अपने पुत्रा शिष्टाचार सुना -मुझ अकेले, अनाय, विलार करते हुपे को धोकरी ना गया। प्रिय जरासन्ध-रिपु, अब तक लोगों ने तुम मल्प आयु वाले के अप में क्या विरुद्ध (आयु-विरोधी) बात देखो थो ? अथवा मैने हो गत देख लिया था। जो द्र मुझे पृवी, जिसके समस्त राजा (मुझे) कर देने वाले बना दिये थे, -लमित होता रहा, जो मेरे द्वारा भूए में बाजी पर रखा जाने पर तृतीया। किल प्रसिद्धी हां नाथ न युक्तमिदानी भवतो वीरस्य न तु निर्वलस्य मा हाणमात्र... बामनुगच्छामि । पृये पृथानामधेोय । तात मान्य । जरासंधानो की । ल्पायुःभूकम् । देवाह--दरवेति । करदो रामभागाता। [न पर असरदाः सर: समयमाना: Fता: मरदीता अनिला नपा पस्था तो। मागे पनि विनश्वरस्य ते चितमित्यर्षः । पहुगुणस्य पीनं दिनभरणारा ९.

२५४ महराय पोभिमुखों मर । (तपरियमी वराकी । शनि वेणीसंहारे महाराज, आदीमय मे चिताम् । त्वमपि क्षत्रयममनुवर्तमान एव नाथस्य जोकि हरस्याभिमुखो भव । अयवा यत्ते रोचते। वन्येदु पाहो दुजोहणरुधिलाद्देण हत्येण दुस्सासणविमुक्कं में हत्या हजे बुद्धिमदिए तव पञ्चवम्बं एव्व जाहेण पडिण्णादम् । अज, कि सहित में देवेण देवकीनन्दणेण पुणो वि केसरअणा आरम्भीअदु ति । ता उवणेहि पुष्फदामाई । विरएहि दाव क्वरीम् । करेहि मअवदो पारामणस्स वापस ण क्खु सो अलीअं सदिसति । अहवा कि मए संतत्ताए भणिदम् । अधिरग= अजउत्तं अणुगमिस्सम् । महाराअ, आदीव मे विदाम् । तुमं वि खना अणुवट्टन्तो एब्द णाहस्म जीविदहरस्स अहिमुहो होहि । महवा जं दे शैदि।) युधिष्ठिरः-युक्तमाह पाञ्चाली । कम्नुकिन, क्रियतामियं तपस्विनी विरा- संविभागेन समवेदना । ममापि सज्ज धनुरुपनय । अलमवा धनुषा। तस्यैव देहरुधिरोक्षितपाटलाङ्गी- मादाय संयति गदामपविध्य चापम । भ्रातृप्रियेण कृतमद्य यदर्जुनेन थेयो ममापि हि तदेव कृतं जयेन ॥२१॥ रामस:-रामन, रिपुजयविमुखं ते यति चेतत्तदा यत्र तत्र या प्राणाया उद । वृया तर गमनम्। पधुको- घिद मुने, राक्षससग हदयं भवतः । राभरा:-(यभयं स्वगतम) कि तहमनेन । (प्रकाशम्। भोः कालि योगदया ज्यु पुर्व प्रवृत्तमनदुर्योधनयोः । नानामि च तयोगंगपा भुगतारम् । दिनाय पुनस्य रामपरपरमनिष्टपणं परिहरले पीमि । पुधिष्ठिरः- विमृगन) गापु, महर्षे, साधु । मुस्लिायमभिहितम् । पुणे-महाराज,माम शोधयान रहनापि प्राय पाने साधर्मः। - । . नासिनेतिया । सायमिति पाया माया महिमा) पठोऽङ्कः अनुगमन पहेंगी। (युर्धािष्टर के समीप जाकर) महाराज, मेरे पिता जिये । आप भी क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए स्वामी के प्रा हाण करने वाले का सामना कीजिये। अथवा जो आपको अच्छा लगे । युर्धािरि-पाञ्चाल को राजकुमारी ने (बिल्कुल) टोक कह को, इस बेचारी को चिता देकर वेदना सहने योग्य कर दो । मेरे । धनुष तैयार करके लामो । अपया धनुष रहने दो-- माई से प्रेम करने वाले अर्जुन ने धनुष को छोड़कर उसके होश रुधिर से सिक्त और (इसलिये) लाल अङ्गों वाली गदा को लेकर जो अ में किया है, मेरे लिए भी वही श्रेयस्कर है । जय से बस करना चाहिये राक्षस-राजन्, यदि आपका वित्त शत्रु को जीतने से परामुख म्ही मी प्राण त्याग दीजिये। वहाँ जाना व्यर्थ है। कस्को-मुनि, आपको धिक्कार है। आपका हृदय , तो राक्ष समान है। राक्षस- (भयपूर्वक आत्मगत) क्या इसने मुझे पहचान लिया है ? मे) हे करचुको, अर्जुन और दुर्योधन मे गदा युद्ध प्रारम्भ हुआ था। मैं उन दोनों के भुज-कल को जानता हूँ। इस दुःखी राजषि को अन्य अनिष्ट से बचाते हुए ही मैने ऐसा कहा है । युधिष्ठिर-(म मू बहाते हुए) ठीक है, महावि, ठोक है। आपने । बात कही है। कञ्चुकी-महाराज, शोक से अन्धा होने के कारण आप देव-तुल्य भो सामान्य पुरुषों की मांति क्षात्र-धर्म का परित्याग क्यों कर रहे हैं ? तस्येति । तस्यैव भीमस्येव । [देहरुधिरेण उशित सिक्तमत्त एव भार गार्जुननाद्य संयति युद्ध। पाटलं रक्तमङ्ग यस्या साताम् । अपविष्य स्या यत् कृत तद् गदामादाय युवा जीवितत्या. इत्ययं । तन्ममापि श्रे स्पेन कृतमलम् ॥२१॥ मुनमारमित्यन्त नुकिने क्धनम् [गदायां गायुद्ध इति यावद । भु पानामि । तथाहि अर्जुनस्य होनश्ललात्तधो निश्रित इत्पर्ष हितम् । देवरस्पेन देवतुल्यन । ।

२ नाम देश्यान् हनवतार्जुनेन च ।] [क्षितितने प्रश्चिश्मा युधिष्ठिरः-महर्षे, न कश्चिच्छणोति ताशवयोवंचनम् । तदिन्यनप्रदान शक्ष्यामोति । [परिघवदर्गला हब पौवरी दाहू दण्डाविद शहदण्डो अयोस्ती । विसश: कुबेरः शक्रश्च तयोः पुरयोः दर्शितं वीर्यसारं याम्या तो। वेरपुरे सोगन्तिकाहरणकाले भीमेन, अस्त्राधिगमार्थ साकारों गतेन नपा तीनहारे मुनितिर:-मार. पश्यामि नो गरियपीवरचाहुदण्डौ विनेगगापुग्दगितवीयंगारी । भीमार्जुगो शितितले प्रविष्टमानी द्रप्टु तयोश्च निधनेन रिपुं कृतार्थम ॥२२॥ अपि पालासरामतनये, मानपत्रात गोमा, ममा संीप्यते पावरता सहितापेव यापुमनं संभाषयाः । प्रौपदी-साय, कुर दापसंचय । प्रायना पिता वरते मे हद ना प्रेशिनुम् । (मर्यनोऽक्लोय) फयं न कोऽपि महारानस्य वचनं करोति। हा नाम भीमसेन, सदेयेदं रानकुलं स्वया विरहितं परिजनोपि सोचनं परिहरति । [अन, करेहि दारमचयम् । पालोमा विदा । तुवरदि मे हिमश्रणा पेविवदुम् । यह ए को वि महाराअस्म वाणं करेदि । हा साह भीनमरा, त एव एवं राअउल तुए विरहिदं पहिअणो वि संपदं परिहादि। प्रसादः प्रियताम् । राक्षस: - मुनिजनविरुद्धमिदम् । (स्वगतम्) पूर्णो मे मनोरथः । यावदनु लक्षितः समिधयामि वह्निम् । (प्रकाशम) राजन्, न शक्नुनो धमिह स्पानुन (इति निष्क्रान्तः) युधिष्ठिरः-कृष्णे, न कश्चिदस्मद्वचनं करोति । भवतु । स्वयमेवाहं दा संचयं कृत्वा चितामादीपयामि । द्रौपदी-त्वरतां त्वरता महाराजः । [दुवरदु तुदग्दु महाराणी ! ( नेपध्ये क्लक्लः) पष्ठो २५७ पुहिर-आप जयघर, मैं अगला के समान स्थूल भुज-दण्डों वाले और कुबेर तया इन्द्र के नगरों पल-पराक्रम विखला चुके हुए भीम और अर्जुन को भूतल पर एटपटाते और को उनकी मृत्यु से चरितार्थ हुआ नहीं देख सकूँगा ॥२२॥ अरी मेरी दुर्नीति से शोचनीय अवस्था से प्राप्त पाश्चास रामकुमारी, ही यह अग्नि प्रज्वलित हो, तर एम दोनों एक साथ ही पन्नों से अनुगमन द्वारा सम्मान करेंगे। द्रौपदी-आर्य सहियां एकत्र कीजिये। पिता प्रज्वलित जाय, मेरा पप स्वामी को देखने के लिये उतावला है। (पारों और देखार) कैसे? जी महाराजको भाशा का पालन नहीं है। आप स्वामी भीमसेन, मसे विहीन उस हो इस रामलको अब सेवक भी छोरहे हैं। युधिष्ठिर-महपि, पोई भी हम रोनों की बात महीं सुन रहा है। इसलिए आप ही धन देकर मनुरीत करें। राक्षस-यह मुनि लोगों के प्रतिकूल है। (आरमगय) मेरी गमना पूर्ण अब छिपकर अग्नि प्रज्वलित काँगा। (रट में) रामन, हम यहाँ २ सकेंगे। (यह हार बाहर पला पया)। युधिष्ठिर-प्रौपदी, कोई हमारी बात को मान ए है। माना। # ही सहारा करके चिता प्रवलित करता हूँ औरती-जल्दी कीजिये, महाराज बीमिरे। ( नेपप्प मे पसरत पनि होती है) -पपाली भूम्या सुटतो।) भीमागी रिपERS मि। पयामि तो ति पाडे तो रद हामि (निामा) औरषः॥१२॥ पर दुर: मनपस्तेन भासा सोया या माता महिला पर महाराज महाराज माता बाप | RITES प्रदेश रायमिरानी बिदिल । परिषदमी पारं. समिधामि दौरामि . बर मार गोष L आर्य जयंघर, स्वयापि सहदेवसका गन्तव्यम् । वत्तम्या तवभवान्पायु- दपित: बलपितस्तस्य । विषमः एकठोरः । निर्घोषः पादः। मित्र आग्रहः । हृढामिलाप इत्यर्थः । ततो विलम्च्यते इति प्रश्नकाकु:।वि। येनेति । तत्र वारणावते । तथा च भारतम्-भीमसेनस्तु राजेन्द्र मीमः बेनीगहारे trai- (गमपमा) महाराज, भरपार बनारिता कि पनि भूयते । मपरमपत्रियं धोनुमति निघालोनिमयने । (महाराभ, परगनिएगो पनानिग विममीमदलियोनी मुगि मपर विमति नदि ममि farsो तसे विलम्बीमादि । युधिष्ठिरः-म अनु घिसम्यते । रतिष्ठा (रिय गरिधामन्ति) युधिहिर:--मविपाशाति, मायापा: पानीजनाय पनि निवतंय परिजनम् । टोपी - महाराज, अम्बार्य एवं संदेश्यामि-यः सबाहिरिम्बरिौरन गुरगरासंपयिगमनस्ते मध्यमपुत्रः स मम हताशापाः पापातेन पालो इति । [महाराज, अदाए एवं संदिसिस्म-जो सो वहिडिम्वकिनीरजा जरासयित्रअमाली दे मममपुत्तो सो मम हदासाए पायवादेरा पलो गदो ति ।] युधिष्ठिरः-भरे बुद्धिमतिवे, उभ्यतामस्मद्वचनादम्बा। येनासि तत्र जतुवेश्मनि दीप्यमाने निर्वाहिता सह सुतर्भुजयोर्बलेन । तस्य प्रियस्य वलिनस्तनयस्य पाप- माख्यामि तेऽम्ब कथयेत्कथमीहमन्यः ॥२३॥ कुलवृहस्पतिर्माद्रेयः कनीयानस्माकं सकल कुरुकुलकमलाकरदावानतो मुषित परेलोकमभिप्रस्थितः प्रियानुजमप्रतिकूसं सततमाशंसनीयमसंमूढ व्यसनेऽम्युन एतिमन्तं भवन्तमविरलमालिङ्गय शिरसि धामायेवं प्रार्थयते - विजयमलः । एतत्संदेष्टव्यम्-योऽसौ मल्लो मध्यमपुनस्ते स मम...। - २५६ पाठोऽङ्कः द्रौपदो--(सुनकर भयपूर्वक) महाराज, यह किसी मल के गर्वोले की भय- 'रासवनि सुनाई दे रही है। (आपको) अग्य भी अप्रिय सुनने को अभि- है, इसलिए (यह) विलम्ब किया जा रहा है। युधिष्ठिर-नहीं, (अब कोई) विलम्ब नहीं है। उठो। ( सब जाते हैं) पुधिष्ठिर-अरी पाश्चाती, अम्मा भौर सपत्नियों को कुछ संदेश देकर देवकों को लौटा दो। द्रौपदी-महाराज, अम्मा को इस प्रकार संदेश दूंगी--जो बक, हिडिम्ब, कर्मोर, जटासुर और जरासन्ध को जीतने वाला मह, (आपका) माला पुत्र 1, वह मुझ मूर्ख के प्रति प्रेम के कारण परलोक चला गया। युधिष्ठिर--भद्र बुद्धिमतिका, मेरी ओर से अम्मा से कहना-- है अम्ज, जिसने वहाँ (वारणावत में) साक्षा-गृह के जलने पर तुम्हें पुत्रों हित अपने भुजबल से निकाला था, (तुम्हारे) उस बलवान प्रिय पुत्र के नगल के विषय में कह रहा हूँ। अन्य ऐसा कैसे कह सकता है ॥२॥ आर्य जपन्धर, आप भी सहदेव के पास जायें और पाण्डु-वंश के गृहस्पति, डीके पुत्र, हमारे छोटे भाई से पहें कि-सम्पूर्ण कुरफुलस्पी कमलाकर में वह्नि सहमा, परलोक को प्रस्थान करने वाला पुधिष्ठिर सर्वदा अनुकूल रहने , प्रत्याशा के योग्य, विपत्ति में विमूर न होने वाले और भयुदय में क्षमा. - आप प्रिय अनुज का गाढ आलिङ्गन करके और सिर सूंघकर यह मापना -मः । जगाम भातनादाय सर्वान्मातरमेव च ॥ आ. १. १४८ श्लो. २०) हता रक्षिताः। ते आख्यामि तुभ्यं कथयामि । अन्यो मत्त इति रोषः । कई दुःख कषये। कि तु न कोपीत्यपं. ॥२३॥ सालं पुस्कुलमेर कमलाकरस्तस्य दावानलः । अनेन प्रारमनोसमोदय. करता पोक्ता । न हमूरचेता. वमलानि दावानले प्रतिदिति भावः। बावनुजश्चेति विग्रहः । बह्वयनियमः इति रिपस्यय पूर्वनिपात.। हदेदम् । अप्रतिकूलमायत्तम् । आयंसनीयं अरपासाहम् । विपत्ताया. व। [अम्युश्ये प्रतिमन्तं क्षमावतम् । आधार परिम्य । Tra धीरो मनीषी शः प्राजः इत्यमरः । अत: मुकुलो पाणी वाजलि ददा [हला युदिमदिए, भगाहि मह वाण पिअसहीं सुभद्दाम् -बन बना स्वाभाविकी कृता संस्कारेण वधिता। कृपयेति पाठ कृपा दया यस्यां तब T गम हि गपगारेगागा गुमेन गमो भगा. गाजपा गुममा जी मनीलिमा गुरुः । गि मुनी पानी या भगनामनोये मगि भिग्नगा नेगः म्नेट निर्भय वारिदः ॥२४॥ aft बान्पे प्रतिनिभिमातिम्मामापामगारापा मामा प्रमाला भने पातापातायता मामः मानुगावाम रखमा हिमाल, विस्मृत्यास्मान्युतिविगल्या प्रमया सानुजेन पिण्डान्पाण्टोरदापतानश्रुगर्मान्प्रदातुम् । दायादानामपि तु भवने यादवानां युले वा कान्तारे वा गतवसविना रक्षणीयं शरीरम ॥२५॥ TO जयंघर, अस्मारस्पष्टिमा तिन पानाकासहीनमिरमर मावदेनीयम् । द्रौपदी-हला टिमतिके, पण मम बचनेन प्रियसी मुभनाम- बरसाया उत्तरायाचदुर्यों मासः प्रतिपय मस्य। स्वमेवंत तिप्रतिष्ठापर सावधानं रक्ष । कदापीतः परलोकगताप भरसस्पास्माकमपि सलिलबिन्दुवं भविष्यति' इति। उत्तराए घउत्यो मासो पडिवाणरस गभरस ! तुम एप कुलपडिट्टा सावहाणं ररूप । कदा दि इदो परलोअगदस्स समुरउलस्स ब्रह्माणं विसरि बिन्दुदो भविस्सदि त्ति] पुधिष्ठिरः-(सासम्) भोः कष्टम् । ममैति । रेणाधिकेन [अल्पः कनिष्ठः ।] श्रुतैनाध्ययनेन । सह -- -- पठोऽङ्कः आप मुझसे अवस्था में बहुत छोटे, मान में बराबर, सहज और अजित 'दि में बड़े और विद्वता में गुरु हैं। इसलिये मैं सिर पर दोनों हापों को मुकुल नाकर (-दोनों हाय मोड़कर) आपसे याचना करता हूँ कि आप मेरे प्रति रेह क्म कर दें और पिता को जल देने वाले होयें ॥२४॥ और भी, मेरी आज्ञा से, बाल्यावस्था में पाले गये, सर्वदा अपिमान करने पाले और हमारे समान हृदय के सार वाले भी नकुल के बचन का पालन करना । इसलिये नकुल से कहना-वह हमारे पय का अनुगमन न करे। हे वत्स आपको-- अनुज सहित ज्ञान से निर्मल बुद्धि द्वारा हमें भुलाकर पाण्डु को पिण्ड और अध-मिश्रित जल-बिन्दु देने के लिये सम्बन्धियों के भवन में अथवा भादवों के कुल में अथया वन में वास करके (अपने) शरीर की रक्षा करनी है ॥२५॥ जयन्धर, जाओ। हमारे शरीर को कर सौगन्ध लिये हुए आप अविलम्ब अवश्य ही कह देखें। द्रौपदी--सखी बुद्धिमतिका, मेरी ओर से प्रिय सखी सुमद्रा से कहो-- 'आज बेटी उत्तरा को गर्भ धारण किये चौपा मास है। तू ही इस कुल के प्रतिष्ठापक को सावधानी से रक्षा करना । शायद (यही) यहाँ से परलोक गये २वशुर-कुल को और हमे जलाञ्जलि देने वाला होगा।' युधिहिर--(आंसुओ के साथ) ओह ! (बड़ा) कष्ट है। भवन्तमयंय इद याचे । मयि स्नेहो विरलतां कृशत्वं नेयः । अस्मदर्षे प्राणान्मा व्यजेत्यर्थः । वारिदः निवापोदकस्य दाता ॥२४॥ विस्मृत्येति । सानुजेन त्वयाऽस्मान्प्रज्ञया विस्मृत्य पाण्डोरुदर पृषतान्प्रदात रोरं रक्षणीयमित्यन्वयः । पृषन्ति विदुषताः पुमास । इत्यमरः । श्रुतिर- ग्यनम् । वसतिर्वासः ॥२५॥ [स्पृष्टिका स्पर्शः। शापितेन मदगशपथवता । अकालहीनं कालः योग्य- नयस्तेन हीनं यथा न भवेत्तथा। कदाप्यतेनापि परलोकगतस्यारमा नस्योदर बिन्दुभविष्यति । अत्रापनसत्वा गर्भवती। नामिकुल । नक्षिपति निधापयिष्यसि । अत्रस्यस्य विनाशसम्भवाद। . 7 १२६२ । दाये मतस्य मूश्मापुरे अस्मिन् । छायया भी छायामिनिस्पषः । नया मटारो । इति शिप: । जापापी पायाग्रा वेणीसंहारे शाखारोधस्थगितवसुधामण्डले मण्डिताशे पीनस्कन्धे सुसदृशमहामूलपर्यन्तवन्धे । दग्धे देवात्सुमहति तरौ तस्य सूक्ष्माकुरेऽस्मि-.. नाशाबन्धं कमपि कुरुते छाययार्थी जनोऽयम् ॥२६॥ साधु । इदानीमध्यवसितं करणीयम् । (कञ्चविनमवलोक्य) माय जयन्धर, स्वशरीरेण शापितोऽसि तयापि न गम्यते । कञ्चुकी-(सानन्दम्) हा देव पाण्डो, तव सुतानामजातशत्रुभीमार्जुन नफुलसहदेवानामय दारुणः परिणामः। हा देवि कुन्ति, भोजराजभवनपताके, भ्रातुस्ते तनयेन शौरिगुरुणा श्यालेन गाण्डीविन- स्तस्यैवाखिलधार्तराष्ट्रनलिनीव्यालोलने दन्तिनः ! आचार्येण वृकोदरस्य हलिनोन्मत्तेन मत्तेन वा दग्धं त्वत्सुतकाननं ननु मही यस्याश्रयाच्छीतला ॥२७॥ ( इति रुदनितान्तः) युधिष्ठिरः - जयन्धर, जयन्धर । (प्रविश्य) कम्युकी आज्ञापयतु देयः । पुषिष्ठिरः-पातमिति ब्रवीमि । न पुनरेतावन्ति भागधेयानि मः । कदाचिजियो स्यादरसोऽर्जनस्तदातव्योमहवनाझवता, गावेति । रोधोऽबरोधः । आधिक्यमिति यावत शाखारोन निरन्तर प्रहदशामाविस्तारेण स्थगितमाच्छादित यमुघामण्डलं येन तस्मिन् । ति अलंकृता भाग दियो येन । पौन: समाय: प्रकाश पस्य हस्मिन् । मनाश नरोरतुरूपः महामूलाय पर्यन्तः परितो बायो यस्य तस्मिन् ।रिधि मुमा जनः कमरि दुपुररियर्थः । आशावध देशार हुने । आशावाय ।

पष्ठोऽङ्कः छाया की कामना करने वाला यह जन (द्रौपदी) शाखाओं के कि रवी-मण्डल को माच्छादित करने वाले, दिशाओं को भूपित करने या ने वाले और सुपोप बड़ी जड़ के चारों ओर बंधान (चबूतरे) बाले, स के भाग्य से जल जाने पर उसके इस नक्षम अाकुर पर विचित्रमा हा है ॥२६॥ ठीक है ! अब निश्चित कत्तय करना चाहिये (क्नुको को देखक यिन्धर, अपने शरीर को सौप दिलाई है, फिर भी नहीं जा रहे हो। कम्नुको--(विलाप करते हुए) हाप महाराज पाण्ड, तुम्हारे पुत्र सीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव का यह कर अम्त ! हाय मोजराज के तो पताका देवी कुन्ती, सेरे भाई के पुत्र, कृष्ण के बड़े, गाण्डीवधारी के साले, और सम्पूर्ण पुत्र रुपी कमलिनी के दलन में मज-रूप उस वृकोदर के ही आचार्य,E (बलराम) ने पापल अथवा प्रद-पस होकर तेरे पुत्ररूपी वन को, यह जिसके अवलम्बन से शीतल थी, जला दिया है ॥२७॥ (इस प्रकार रोता हुआ बाहर चला गया ) युधिष्ठिर-अपाघर, जयपर । (प्रवेश करके कम्की-महाराज आता है। युधिष्ठिर-कहना चाहिये, इसलिये बह रहा हूं। सारे ऐसे माग्य है। यदि कही परत प्रनि विश्यी हो जाय तो आप हमारी भोर से (र है LENTण्डुवंशाइकुरेऽस्मिन् मलिलबिन्दादिलाभारोस्पर्थ । ॥२६॥ धासुरिति इसे धातु मुदेवस्म । शौरिगुरुमा सोरेः पृष्णस्य ग्यायसा धारा।नस्य पालेन मुमहापा प्रातृस्वाद । अखिला प: एष मलिग्यः कमलिन्यः साग्र] प्यालोलनं यापट्टना । तर निमः भीमस्य आचार्यग गुरणा । हसिना बलेनाप र लगाहोन ।। मारवता अपना मतेन क्षोए । ननु यस्याभाराभय प्राप्त मही शान्तिमती बामोत्ता स्वरगुताननं दानम् । 101

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पष्टोऽङ्कः (पह) सच (है) कि मेरे पास (भीम) को मृत्यु का कारण हलधारी राम) है, फिर भी यह तुम्हारे सहज मित्र मधु-सूदन (कृष्ण) का भाई है। लिये (उस पर) क्रोध नहीं करना चाहिये । पदि जीवित रह जाओ तो धन चले जाना, लेकिन कोर क्षात्र-यम पर न चलना ॥२८॥ करचुकी-महाराज जैसी माना । (भाहर चला गया)। युधिष्टिर--(अग्नि को देखकर हर्ष के साथ) ऊपर उठी हुई शिला पी 1 से हम जैसे विपत्ति में पाए जनों से निमन्त्रित करने वाला भगवान निदेव प्रमालित हो गया है । (मन) इसमें स्वयं को इंधन बनाता हूँ। द्रौपनी--कृपा कीजिये, महाराज मेरी यह अन्तिम प्रार्थना स्वीनार कर शोशिये। मैं पहले प्रवेश पलंगी। पुधिष्टिर-यदि ऐसा है, तो फिर हम दोनों साप-साप हो मम्युदय । भोग करेंये। धेटी-हाय मगवान लोकपालो, रक्षा करो, रक्षारो। यह के दि, गरम यश से अग्नि को सृप्त करने वाले, जान से मनल " करने वाले मन के बड़े भाई, हातस्मरणीय माम बारे, महाराज 'पल्टिर है। और यह पाञ्चाल को रामासी, परेसी मोष में पत्र, हामी सोपी है। दोनों ही कर अग्नि में प्रदेश से (1) न होणे इसलिये, हे मार्य लोगों, अचाभी, मचा कोई भी पाए । (उन दोनों के आगे पार) महारानी और महार मे या गोष , - [fver पर्य [हमनरूपम । पुनर्माता न पियाम । पाालि मारोगे पास मुह । म मारयोगे स्पो निषेध ॥२८॥ एक हाता: सिमाहरता । रदका ये रिवाहासार. मारः पि सनिजत: मेन सोत पनि सर परिरमो यस्मासन परमेरोष । परम् ।। TT सोमः भूपते भा. हैन म हमार र ही : मृर्व भामर २२२ सपोरः । न-नाचा लोगो, सामुगम। स्पोकियो । . . पुधिष्ठिरः--पाश्चालि, स्वमपिताशावापानिनो पारस्पति युधिष्ठिरः-(पादो प्रक्षाल्योपस्पृश्य च) एष तावत्सलिलामनि वीर्याय। (सालम्) तातस्याधुनावसरः। अयमपि तत्रभवते सुमहीवनामे भीमाय गुरवे । मयं प्रपितामहाय शान्तनवे। अयमपि पितामहाय शिविर तात माद्यम्बया साधं मया दत्तं निपीयताम ॥२ स्याद्यः प्रातः स्मर्यते बुधः। साण्डववनादीपनजननस्य किरीटिनो..काय हेतात मया दसमेतजलं माद्यम्बया सह निपीयदाम ॥३॥ शीमगर युधिष्ठिरः- -मपि मदिर, मागन गिन निामर्श - मानnि (निप्रय पुनः प्रविश्य च) जादु महारामः। (देवी माणसाने महाराओ।) पी-महाराज एव रोनु । मह पुनायलनं प्रवेश्यामि । [महारापो एप गरे । अहे उरण जल पविमिस्वम् ।। पुधिष्ठिरः-अनतिप्रमणीयं सोमवृतम् । भो, उसमुपनय । (पेटी तया करोति) पाण्डवे, अद्यप्रभृति वारोदमस्मत्तो दुर्लभ एतजलं जलजनीलविलोचनाय भीमाय तस्य मम चाप्यविभक्तमस्तु । एक क्षणं विरम वत्स पिपासितोऽपि पातुं त्वया सह जवादयमागतोऽस्मि ॥३०॥ अथवा मुक्षत्रियाणां गतिमुपगतं वत्समहमुपगतोऽप्यस्तो प्रष्टुप । भीमसेन, । गाङ्ग पाय भीष्माय । शान्तनवे शान्तनुनाम्ने । पुनः । .

पोस्ः विष्ठिर-बरी बुद्धिमतिका, जो प्रेम करने वाले, प्रिय अनुज के दिना वित है, वही (सोचा हुआ है) । हे कल्याणी उठो, उठो, जल से लाओ। बेटी-जो महाराज आज्ञा दें। (यह कहकर बाहर जाकर और फिर प्रवेश परके जप हो, महाराज की जय हो । युधिष्ठिर-पाञ्चाल-पुत्री, अब तुम भी अपने पक्ष-पातो भीम और प्रिय दर्जुन को जलाञ्जलि दे लो। द्रौपदी-महाराज हो (जलाञ्जति) दे लें। मैं तो अग्नि में प्रदेश युधिष्ठिर-सोकाचार का उडवन नहीं किया जा सकता है। हे भरें, ललाओ। ( घेटी वैसा ही करती है) युधिष्ठिर - (पैर प्रोकर और आचमन करके) यह जलाम्नलि गङ्गा-पुत्र ह भीष्म के लिये है। यह प्रपितामह शान्तनु के लिये है और यह पितामह वचित्रवीर्य के लिये है। (आसुअरे के साथ अव पिता का वार है। यह जिलाअलि) आदरणीय प्रातःस्मरणीय पिता पाण्डु के लिये है। आज के बाद फिर यह जल हमसे मिलना कठिन है, इसलिपे, हे सात, मेरे नारा दिये गपे (जल) को माता माद्री के साथ मिलकर) पीरिये ॥२६॥ कमल के समान नेत्र वाले भीम के लिये (विधा हुआ) पह जल उसका और मेरा सम्मिलित रहे। हे वत्स, प्यासे होते हुए भी तुम क्षण-भर ठहरे हो। (से) तुम्हारे साय पीने के लिये मैं यह वेगपूर्वक आ रहा हूँ॥३०॥ अथवा समीप जाने पर भी मैं बोर क्षत्रियों की गति को प्राप्त हुए पसको ने में असमर्थ रहूँगा। वत्स भीमसेन, एतदिलि । जलज कुचलपमिद नीले बिलोचने यस्य तस्मै अलजस्य गेला विलासो यत्र तत् । भीमप्रियस्य प्रीतिविषयभीमस्प । अविरतं धारणम् । हे वत्स भीम । पिपातितः संभातृशोऽपि एकं स विष का प्रतिपालय । अयमहे एतलं स्वया छह पात मारमापोप्ये भविष्यति लट] १३al पति स्वर्गम् । [भकृती असमर्पः।

मोमाय गुरवे । अयं प्रपितामहाय शान्तनवे। अयमपि पितामहार Ars वीर्याय । (सासम्) तातस्यायुनावसरः । अयमपि तत्रभवो मुनाने सरायःप्रातः स्मरे बुधः। सायनानाननगर दि.1 उपारपाम्यामायाव भीनारसवालमा मननादान मया दनौरमाचावयासहनिmat: २६६ वेणीसंहारे युधिष्ठिरः-अयि युद्धिमतिके, पद्वत्सलेन प्रियानुजेन विना यं उत्तिष्ठोत्तिष्ठ, मद्रे, उदकमुपनय । चेटी-यद्देव आज्ञापयति (इति निष्णम्य पुनः प्रविश्य च) अपतु महाराजः। [जं देवो आणवेदि । जेदु जेदु महाराओ।] युधिष्ठिरः-पाश्चालि, त्वमपि तावस्वपक्षपातिनो वृकोदरस्य प्रियस्था- स्योदकक्रियां कुरु । द्रौपदी-महाराज एव करोतु । अहं पुनज्वलनं प्रवेश्यामि । [महारानो एव्व करेदु । अहं उण जल परिसिस्सम् ।। युधिष्ठिरः-अनतिक्रमणोपं लोकवृत्तम् । भो, उसमुपनय । (चेटी तथा करोति) युधिष्ठिरः--(पादौ प्रक्षास्योपस्पृश्य घ) एष तावत्सलिसा लिया। पाण्डये, अद्यप्रभृति वारीदमस्मत्तो दुर्लभं पुनः । तात माद्रधम्बया सार्घ मया दत्तं निपीयताम २ एतलं जलजनीलविलोचनाय भीमाय तस्य मम चाप्यविभक्तमस्तु । एक क्षणं विरम यत्स पिपासितोपि पातुं त्वया सह जवादयमागतोऽस्मि ॥३०॥ भयका नुत्रियाणा गरिमुष बासमा मुरगतोपानी दुर' भीममेव, . .

पहोगः २१ युधिष्ठिर-अरी बुद्धिमतिका, जो प्रेम करने वाले, प्रिय अनुज के दि. उचित है, वही (सोचा हुआ है) । हे कल्याणी उठो, उठो, जल ले लामो। चेरी--जो महाराज आना । (यह कहकर बाहर जाकर और फिर प्रवेः के) जय हो, महाराज को जप हो । युधिदिर- पाञ्चाल-पुत्री, अब तुम भी अपने पक्ष-पाती भीम और प्रिय न को जलान्जलि दे लो। दौपदी-महाराज ही (जलाञ्जलि) दे लें। मैं तो अग्नि में प्रवेश युधिष्ठिर-लोकाचार का उबधन नहीं किया जा सकता है। है मटे, ल लाओ। (चेटी वैसा ही करती है ) युधिष्ठिर - (पैर धोकर और माचमन करके) यह जलाञ्जलि पला-पुत्र भीष्म के लिये है। यह प्रपितामह शान्तनु के लिये है और यह पितामह चित्रवीर्ष के लि है। (आसुओ के साथ अब पिता का वार है। यह अलाजलि) आदरणीय प्रातःस्मरणीय पिता पाण्डु के लिये है। आज के बाद फिर यह जत हमसे मिलना कठिन है, इसलिये, हे सात, मेरे नारा दिये गये (जल) को माता मादी के साथ (मिलकर) पीजिये ॥२६॥ कमल के समान नेत्र वाले भीम के लिये (दिया हुआ) यह अल उसका और मेरा सम्मिलित रहे । हे वत्स, प्यासे होते हुए मो सुम क्षण-र व्हरे हो । (इसे) तुम्हारे साय पीने के लिये मैं यह बेगपूर्वक आ रहा हूँ॥३०॥ अपका समीप जाने पर भी मैं दौर क्षत्रियों की गति को प्रासहए पता को देने में असमर्थ रहूँगा। वत्स भीमसेन, एतदिति । जलज कुवलयमिव नीले शिलोचने यस्य तस्मै] अलरस्य गौला दिलासो पत्र तद । भीमप्रियस्प प्रीतिविषयभीमस्य । अविभक्त नाधारणम् । है वास भीम । [पिपासितः साततृष्योऽपि एक क्षण विरम या प्रतिपालय । अयमहं एतजल त्वया सहा जगादेगादापतास्मि मानमामीप्ये भविष्यति लट] 1300 पति स्वर्गम् । [अकृती असमर्पः।।

वृत्ति वर्तनम् । ऋतुविस्तारयोरस्त्री वितानम् । इत्यमरः । साम्यो विधि द्रोपदी-(उपमृस्य जलाअलि पूरपिरवा) महाराज, परम सलितं ददामि पीतम् । वत्सलतया मयि स्नेहाद मच्छिष्ट रसः रसद्भिःभोग्यविशे अधुना तु त्वं निवापाम्म: एवं पूर्व क्षं पियसि । तनु तत्पश्चादासः येतीगहारे मया पीतं पीतं तदनु भवताम्यास्तनयुगं मच्छित्ति जनयसि रसर्वत्सलतया। वितानेप्वप्येवं तव मम च सोमे विधिरभू- निवापाम्भः पूर्व पिवसि कयमेवं त्वमधुना ॥३१॥ कृष्णे, त्यमपि वेहि रासिलाअसिम् । द्रौपदी-हजे बुद्धिमतिके, उपनप मे सलिलम् । हिम्जे बुद्धिदिए उवणेहि में सलिलम् ।] ( चेटी तथा करोति ) युधिष्टिर:- तस्मै देहि जलं कृपणे सहसा गच्छते दिवम् । अम्बापि येन गान्धार्या रुदितेन सखी कृता ।।३।। द्रौपदी-नाय भीमसेन, परिजनोपनौतमुदकं स्वर्गगतस्य ते पादोदक । [गाह भीमसेण, परिगणोवणीदं उदनं सगगदप्स दे पादोदों में युधिष्ठिरः फाल्गुनाग्रज, असमाप्तप्रतिज्ञेऽस्तं याते त्वयि महाभुजे । मुक्तकेश्यव दत्तस्ते प्रियया सलिलाञ्जलिः ॥३३॥ द्रौपदी-उत्तिष्ठ महाराज, दूरं गच्छति ते भ्राता । [उठेहि महाराज दूरं गच्छदि दे भादा।] मयेति । [मया अम्बास्तनयुगं लक्षणया स्तनयुगज पयः पीत रहनु भएन जनयसि । वितानेषु यज्ञेष्वपि सोमे सोमपाने एवं तव मम विधिरता [महाराज करस सलिलं देशि .

m.
पाठोड
२
आग्ने माता के दोनों स्तनों को मेरे पी चुकने के बाद पिया था। तुम
के कारण मेरे बचे हुए रसोले भोजन से याहार करते थे। पहों में भी सोन
विषय में मेरा और तुम्हारा यही ढंग था। (फिर तू अब तर्पण के जल कोइ
प्रकार पहले क्यों पी रहा है? ॥३॥
कृष्णा, तुम भो जलाञ्जलि दो।
द्रौपदी-सखी बुद्धिमतिका, मेरे पास जल लाओ।
(चेटी बंसा करती है)
द्रौपदी-(समीर जाकर और जलाञ्जलि भरकर) महाराज, किसे
जल ?
युधिष्ठिर-
हे कृष्णा, अकस्मात स्वर्ग को चले जाने वाले उस (भीम) को जल दो,
जिसने रोदन द्वारा माता जी को भी गान्धारी को सखी बना दिया है १३२॥
द्रौपदो-नाथ भीमसेन, सेवक द्वारा लाया हुआ (पह) जल स्वर्ग में अपे
ए आपके लिये चरणोदक होवे ।
युधिष्ठिर-हे अर्जुन के बड़े भाई,
प्रतिजा बिना पूर्ण किये (ही) तुम महावाह के निधन को प्राप्त हो जाने
चुने हुए केशों वाली ही तेरी प्रिया ने (तुम्हे) जलालि दी है ॥३३॥
दौपदी-महाराज, उठिये । आपके भाई दूर चले जा रहे हैं।
परः । साम्य इति चातुर्वण्र्यादित्वात्स्वा प्यञ् । साम्ये विधिः इति पाटे
साम्ये तुल्यत्वे विधिरित्यर्थः । सोमे विधिः इति पाळे सोमलताइवानेऽयं प्रकार
इत्यर्थः । निवापः पितृदेयम् ॥३१॥
.तरमा इति । सहसा सीन जलं देहीत्यन्वयः । येन [रुदितेन हेतुना
इम्बारि गान्ध्रायः सखी कृता । पाठान्तरे] गान्धारीहदितनाम्वापि सखीता
दिनदती कृठेत्पर्षः ॥३२॥
फाल्गुनोऽर्जुनः।
.असमातेति । प्रतिज्ञेऽपि पाते इति पाठे याते दिवमिति शेषः
बदाः केशा पायास्तथा ॥३३॥

मएलमिर पस्य । मनिषदेण्यात साप सपने मायालेर बाणानुसार २७० वेणीसंहारे युधिष्ठिर:- (दक्षिणाभिस्पन्दनं सूयिस्खा) पाञ्चालि, निमितानि कथयन्ति समादयिष्यसि वृकोदरमिति । द्रौपदी--महाराज, सुनिमित्त भवतु । [महाराअ सुणिमित्तं भो। (नेपथ्ये कलकला) (प्रविश्य संभ्रान्तः) कञ्चुकी-परित्रायता परित्रायता महाराभः । एष बतु दुरारमा कोरया पसदः क्षतजाभिषेकपाटलिताम्बरशरोरः समुच्छितदिग्धभीषणगदापाविष्ट कालदण्ड इव पृतान्तोऽत्रमवती पाञ्चालराजतनयामितस्ततः परिमापमाना एवामिवर्तते। युधिहिर:-हाय, ते निर्णयो जातः । हा गाणीवपवन, (इति मुहति) ओपी-हा आर्यपुत्र, हा मम स्वयंवरस्वर्मपाहातलित, प्रिय भातरम सोसि, मपुन महारामिमं वासननं च। (इति मोहमुपगता) (हा अत्रत्त हा मम मवरसगाहाललिद पि भानुभं भगको ग उरण महारा इमं दामजएं।] पुधितिर:-हा परस सम्मादिन, हा विलोपनातिवमा हानि स्वोटरनिटादकीरतामरलोक, पार्याप्रमभूमिलापतापत, हासो पारिपरिष्य, ए मात्रतिमापरितोपितमाप, हा पालकांना मार तिष्ठतिष्ठा में भी समाविष्य प्रापनि कार भार राम | आप इति मत पादलित ली! सदामरे यग्य] समर काम. । [ममुभिता या पिया पिता भीषमा नामा मागो मताःem पहात भारि परमोरभनुमोमा परे । मोभित नितम ..! mufeng frierra freatmire पछोरत २७ - पुधिष्ठिर--(दाहिनी आँख का फड़कना मूचित करके) पाचाल-पुत्री, मेरे कुन बतला रहे हैं कि तुम वृकोदर को प्राप्त करोगी। द्रौपदी -~ महाराज, (आपका) शकुन सत्य होवे । (नेपथ्य में कलकल ध्वनि होती है) ( प्रवेश करके घबराया हुआ) कञ्चुको-बचाइये, महाराज बचाइये। यह दुष्ट मधम कौरव, रुधिर में नान से लाल वस्त्र और शरीर वाला, हाय मे उठाई हुई और रूधिर से) तस भीषण गदा वाला, मानो कालदण्ड उठाये पमराज, आदरणीय पाञ्चाल राजकुमारी को इधर-उधर खोजता हमा, इधर हो आ रहा है। पुपिष्ठिर-हाय देव, तेरा निर्णय हो गया हाल, गाण्डीव-धनुर्धारित (यह कहकर मूच्छित हो जाता है) द्रौपदी- हाय, आर्यपुत्र ! मेरे स्वयंवर में स्वयं ग्रहण करने के दुराग्रही अर्जन), आपने (भी) प्रिय माई का अनुगमन किया, लेकिन महाराज और सदासजन का (विचार) नहीं किया)। (यह कहकर मूच्छित हो जाती है)। युधिष्ठिर-हाय वत्स अर्जुन, हाय त्रिनेत्र शङ्कर के अङ्गोमा मर्दन करने लेि मत, हाय निवातावच नामक दैत्यों का नाश करके देवतोकको कटक करने वाले, हाय बदरिकायम के मुनियों (नर-नारायण) में से दूसरे पस्वी, हाय द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य, हाम अस्त्र शिक्षा के बल से गङ्गापुत्र तामह भीष्म को सन्तुष्ट कर देने वाले, हाय रथा-पुत्र (कर्ण) के कुतरूपी पे मर्दने मला निवातेति । निवासकवचनामदत्यहननेन निवृत- रलोक इत्यर्थः । निवाचकवचा नाम दानवा मम शत्रवः | समुदक्षिमाप्रित्य प्रतिवसन्त्युत। तिस्रः कोट समास्यातास्तुल्परूपबलप्रभा. । स्यादि पया रते वनपर्वणि द्रष्टन्या । अ. ६८-७१, ७३] । बर्याधमो वरिलायम। वेत्रको मुनी नरनारायणी तयोः द्वितीयः तापस. नारायणस्य मुन्योरिति निर्धारणे सहमी । (तदुक्तं महाभारतेनरस्त्वं पूर्वदेहे व हापवान् । बदयो तप्तवानुमं सपो घायुतान् बहूर ।। इति । मलिनी तस्याः प्रालेपवर्ष हिमपात । तस्य विनायवेत्यर्थः ।

[तेन सहायुध्यते इति तं वत्समर्जुनम् । प्राणितुं जोक्तुिम् । वमिवेतिमतिरे प्रियमिति 1 कुपितः हर एव किरातः हरकिरातः। किरातरूपीहर पर्य वेशीहारे दुःशासनेन कचकपणमिनमौलिः सा द्रौपदी कययत क पुनः प्रदेगे ॥३५।। कम्युकी-हा देवि यशवेदिसमवे, परिभूयमे संप्ररयनाया कुरकुलकलाई पुपिष्ठिरः-(सहसोत्थाय सावटम्मम) पाश्चाति, न मेरयम् । (समंभ्रम कः कोऽय भोः । सपिङ्ग मे धनुरूपनय । दुरात्मन्दुर्योधनहतक, मागा अपनयामि से गदागौशससंभृतं भुजदपं शिलीमुगसारेण । अन्यच रे कुरकुत प्रियमनुजमपश्यंस्तं जरासंधशg कुपितहरकिरातायोधिनं तं च वत्सम । त्वमिव कठिनचेताः प्रारिणतुं नास्मि शक्तो ननु पुनरपहर्तु वारणवस्तवासून् ॥३६॥ (ततः प्रविशति गदापाणिः क्षतजसिक्तसङ्गिो भीमसेनः) भीमसेनः-(उद्धतं परिनामन्) भो भोः समन्तपकसंचारिणः सह कोऽयमावेगः। नाहं रक्षो न भूतो रिपुरुधिरजलप्लाविताङ्गः प्रकामं निस्तीर्णोरुप्रतिज्ञाजलनिधिगहनः क्रोधनः क्षत्रियोऽस्मि । कचाना कर्षणमापरणं । कचः केशः शिरोरुहः । इत्यमरः । तेन ।) भिन्न विदारितम्मिल्ला । मौलिः किरीटे धम्मिल्ले इति विश्नः । [सा द्रौपदी पुन कस्मिन् । प्रदेशेऽस्तीति शेषः । क्षयत समिति शेषः ।।३।। हा देवि अयंसूचनरूपा घृतिकेयम् । अन्तः पटीप्रविष्ट यत्कियतेऽयंस्य सूचन धृतिकार्थप्रकाशनम् । इति भरतः । इह सानिनामाबमसधिः । यदाह बीजकार्योपगमनं सादनं समुदीरितम् । सिनिषा सतूणीरम् । संभृतमुपचित - पाठोडूः २७५ यह द्रोपदी अब किस स्थान पर है ? (मुझे) बतलाओ ॥३॥ चुरी-हाय यज्ञवेवी से उत्पन्न देवी, अब तू अनाय होकर कुरु-कुल के -भूत (दुर्योधन) द्वारा अपमानित हो रही है। -धिष्ठिरः- (एकदम उटकर सभलते हुए) पाश्चाल-पुत्री, रो मत, रो जल्दी से) परे ! यहाँ कोई है ? पूणीर-सहित मेरा धनुष लाओ। दुध, बोधन, आ, आ। मैं वाणों की वृष्टि से तेरे गदा-नपुण्य से उत्पन्न बार- अमिमान को दूर किये देता हूँ। और भी, मरे पुषुप्त के लिये अङ्गार- सन्य के शत्रु उस प्रिय अनुज को और कुपित किरातहपधारो सहर नने वाले उस वत्स को न देखताहमा मैं तुम कठोर वित पाले के वित रहने में समर्थ नहीं है, लेकिन गाण-वर्षा से तेरे प्राण अपहरण समर्ष हो ॥३६॥ सब हाथ में गदा लिये और रधिर से गय महों में लिप्त भीममेन प्रवेश करता है।) 7- (असर इधर-उधर घूमते हुए) हे ममतपस्या में पूमने पहसी घबराहट है? दोई) राक्षस और न (पोई) भूत । मेरा पिर पीज मापे हुए बाहों वाला और विशाल प्रतिमा को गहन मागरी मा पोधो क्षत्रिय हूँ। पुटपी निरोग्यालाओं में करने स जीवित शकस्तया माहमिरर । मिनाय. पुनरप. रिमाम घेति पाठेन प नारिम पनतम योग्यम्। - (बह रक्षो न । भूतो नाम रिपो. धिमेब मर सिकमा यार तो निम्ती सणे मा बाहनं दुसरो भायो मैन । निरा: से पा] पनिश्पिहन का Tifrndent शेषा भयसिष्टा: राजन्यवीराः वः अनेनासेनाता - - जनः । मवतु । बाहयुद्ध व दुरात्मानं गाढमालिइश्य ज्वलनमभिपातयामि युधिष्ठिरः-कः कोऽत्र भोः। सनिपन्न धनुरूपनय । कयं न चित्य युधिष्ठिरः-कृष्यो, न खल्वनिहते तस्मिन्दुरात्मनि दुर्योधने संहदिया के मीमसेनः-पाश्चालि, न खलु मयि जीवति संहतंच्या दुःशासनवितुरि पुधिष्ठिरः-(वेगादीममालिङ्गय) दुरात्मन, भीमार्जुनरात्रो, सुयोधनात कोपनः कोपशील: क्षत्रिय: अस्मि । भो भो समरमेश शिवी। बेशीमहारे भो भो राजन्यवीराः समरशिसिमिखादग्धगेपाः वृतं व- खासेनानेन लीनहंतकरितुरगान्तहितरास्यते यत् ॥३७॥ कपमस्तु भवन्तः कस्मिन्नुहंगे पाञ्चाली तिति । द्रौपदी-(लब्धसंगा) परिवायती परिवायना महाराजः । [परित्ताअदु परिताप्रदु महागो।] कञ्चुकी - देवि पास्तुपे, उत्तिष्टोत्तिष्ठ। संप्रति सर्टिति चित्ताप्रये एव घेयान् । प्रौपदी-(सहसोत्याय) कयं न समाययाम्यापि वितासमीपम् । [कह ण संभावमि अत्रवि चिदासमीवम् । (परिकर बनाति) कञ्चुकी-देवि पाण्डुस्नुषे, संयम्यन्तामिदानी नयनोपरोधिनो दुः कृष्टा मूर्घजाः। अस्तमिता संप्रति प्रतीकाराशा। चितासमीपमेष संभावय। येगिरात्मपाणिग्याम् । तिष्ठतु तिष्ठतु । स्वयमेवाहं संहरामि । (द्रौपदी भयादपर्सति ) भीमसेनः- तिष्ठ, तिष्ठ । भोर, कापुना गम्यते । (इति वेशेषु भई मिच्छनि) आशंगवादनुदिनं जनितापराधो मत्तो वलेन भुजयोहतराजपुत्रः । 1 -~- -- . पष्ठोऽङ्कः २७७ बचे हुए हे क्षत्रिय वीरों, आप लोगों को यह भय नहीं चाहिये, जो (आ 7) मरे हुए हाथियों और घोड़ों की ओट लिये हुये हिपे बैठे हैं ॥३७ । आप लोग बतलायें पाञ्चाल-पुत्री किस जगह है ? द्रौपदी-(चेतना प्राप्त करके) रक्षा कीजिये, महाराज रक्षा कीजिये। कञ्चुकी-देवी, पाण्डु को पुत्रवधू, उठिये, उठिये। अब झट से चिता मे र हो जाना ही अच्छा है। द्रौपदी-(एक्दम उठकर) अभी भी चिता के समीप कैसे नहीं जाऊँगी ? युधिष्ठिर- अरे ! यहाँ कोई है ? तूणीर-साहित धनुष सानो । कसे ? कोई नेवक नहीं है ! अच्छा, बाहु-युद्ध द्वारा हो (इस) दृष्ट का गाढ आलिंगन = आग में गिरा देता हूँ। (यह कहकर कमर कसता है) कञ्चुको-देवी पाण्डु को पुत्रवधू, आंखों को ढकने वाले, दुःशासन द्वारा गये, अपने केशों को अब बांध लो। अब प्रतिशोध की आशा नष्ट हो गई मल्दी से चिता के समीप ही चलो। विहिर-हे कृष्णा, उस दुष्ट दुर्योधन के बिना मरे केदा न बायो। भीमसेन-हे पाञ्चाल-पुत्री मेरे जीवित रते दु शासन द्वारा खोली गई को अपने हाथों से नहीं बांधोगी। ( दोपदी भय म दर भागती है) नीमसेन-ठहर, ठहर । हे कातर, तू अब कहाँ जा रही है ? (यह कहकर कहना चाहता है। विहिर-(वेगपूर्वक भीम से लिपटकर) दुष्ट, भीम और अर्जुन के राय, योधन, पापी, बाल्यावस्था से ही प्रतिदिन अपराध करने वाला, बल से मस । ये करितुरगास्त. अन्तहितः तिरोहिन अत. सोनय गरिव युप्माभिः स्थीयते । न सपा स्थातव्यमिति भावः । वारफलमेनन ॥३७॥ दिति सत्वरम् । विसुलिता विस्वलिना । निषङ्गन नूगौरेण सहितम् पर्यएपरिवारयोः इत्यमरः । न खलु नैवेश्रयं । शिवादिति । [ए आशंरावाद्वाल्यारभूति अनुहिन दिने दिन रिताश्च अपराधा येन स तया। भुयोर्बलेन मत्त ..

२७: वेगोनहारे प्रामाद्य मेऽन्तरमिदं भुजपञ्जरस्य जीवन्प्रयासि न पदारपदमद्य पाप ॥३८॥ भीमसेनः-अपे कयमार्पः मुपोधनशया क्रीयात्रिय मामातिङ्गति । कस्को-निरूप्य महर्षम) महाराज, वापसे । अखत्यायुप्माभीमसेनः सुयोधनसतजारणीतसकलसेराम्बरो दुलंशयक्तिः । प्रलमधुना संदेहेन । बेटी-(द्रौपदीमालिशप) देवि, सिरयता निवृत्यताम् । एष धनु पूरित- तिजाभारो नायस्ते येण संहारं कर्तुं स्वामेवान्विध्यति । [देवी मिट्टीअदु पिट्ठीअदु । एमो खु पूरिदपडिण्णाभारो गाहो दे 'गोसंहारं कादु तुव एष मणेरोदि। द्रौपदी-हजे, कि मामलोकवधनराधाससि । हिज्जे कि म अलीश्वमणेहि आसासेसि ।। पुधिष्ठिर:-जयंघर, कि कथयसि नायमनुजद्वेषो दुर्योधनहतकः । भीमसेनः--देव अजातशत्रो, भीमार्जुनगुरो, कुतोऽद्यापि दुर्योधनहतः । पा हि तस्य दुरात्मनः पाण्डुकुलपरिभाविनः- (मो क्षिप्तं शरीरं निहितमिदमसृक्चन्दनाभं निजाङ्ग लक्ष्मीरायें निषण्णा चतुरुदधिपयःसीमया सार्घमुा । त्या मित्राणि योधाः कुरुकुलमखिलं दग्धमेतद्रणाग्नौ नामकं यद्ब्रवीपि क्षितिप तदधुना धार्तराष्ट्रस्य शेषम् ॥३६॥ गार्जुनी येन स तथा । त्वमद्य मै भुजौ एव परं तस्य अन्तरमासादा जीवन सदमपि न प्रयासि ।, (पाठान्तरे] संकटं मध्यम् । स्व जीवन्स पदात्पदमाय- इन प्रयास्यसि । वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवता इति भविष्यति मट् । यहा। कालीनक्रियाया वर्तमानस्वादतमाने लट् ॥३॥ [सुयोग्नस्य क्षतजेन अरणीकृतं रक्तीकृतं सकलं शरीरं अम्बर प यस्य म क्तः। संक्षा दुज्ञेया व्यक्तिः स्पष्टाकारो यस्य स तथा । वेणीसंहार विन्धनम् । अलीकवचन: [मिप्याभाषणः 1) पाण्डकुल परिभवतीति पापु परिभावी तस्य । भूमाविति । [मया तस्य शरीरं भूमौ क्षितम् । इदं तस्य अमृत पादनेन पहोऽङ्कः २७६ हाल जिसने राजकुमारों (मीम और भर्जुन) को मारा है, आज मेटे बाहुरूपी पञ्जर के मध्य में आकर एक पग से (दूसरा) पा जोषित न जा सकेगा ॥३॥ - भीमसेन-अरे कैसे ? आप दुर्योधन के भ्रम से क्रोष के कारण निर्दयतः से मेरा आलिगन कर रहे हैं । कञ्चुकी-(ध्यान से देखकर हर्ष के साथ) महाराज, आप धोखा खा रहे है। यह तो मायुष्मान् भीमसेन हैं, जिनका सम्पूर्ण शरीर और पात्र सुयोधन के इधिर से साल हो गये हैं। (और इसलिये) जिनको पहचानना कठिन हो रहा है। (अब कोई) राडा नहीं करनी चाहिये । चेटी-(दौपदो का आलिङ्गन करके) हे देवी, लौट आओ, लौट आओ। यह आपका स्वामी, जिसने प्रतिमा के भार को पूरा कर लिया है, आपकी वेणी बापने के लिये आपको ही दूर रहा है। द्रौपदी-सखो, क्यों झूठे बचनों से मुझे आश्वासन दे रही हो? युधिष्ठिर--जयन्धर, क्या कह रहे हो कि यह मेरे छोटे भाइयों का त्रु नोव दुर्योधन नहीं है। भीमसेन - महाराज अजातशत्र, भौम तथा अर्जुन के बड़े भाई, अब नौष दुर्योधन कहाँ से (माया) ? मैने पाण्डु के कुल का अपमान करने वाले उत्त दुधात्मा के- शरीर को पृथ्वी पर फेंक दिया है और अपने शरीर पर (उसका यह वरदन-सदृश पिर लगाया है। आर्य में पृथ्वी के साय, घारों समुद्रों जल जिसको सोमायें है, लक्ष्मी स्थित हो गयी है। सेवक, मित्र और घोडा-- यह सम्पूर्ण कुरकुल युग्नि में जल गया है। हे पृथ्वीपति, एतराए के पुत्र का वह एक नाम ही शेष रह गया है, जिसे आप कह रहे हैं ॥३६१ महमा यथा तथा चन्दनाभं निजाङ्ग निहितम् । चनुर्णामुदधीनो पयारव सोमानो यस्याः सा तथोक्तपा। उ भूम्या सह श्री भायें स्वरि निषण्णा पिछा । भृत्याः कुरूणामिति शेषः। मित्राणि योधा अहिलं कुरपुल ए स्पेतरणाग्नी दग्धम् । है क्षितिष यह नाम प्रापि तदेरमधुना धाराष्ट्रस्य दुर्योधनस्य । शेषमशिष्टम् । रोपशमोऽस प्रमण्यनन्तो वायलिङ्ग हस्य. वधेयम् ॥३६) कात्तिMITRagn भाग * परवाश्यामिरनि धारियाणामतिरातो २८० वेणीसंहारे युधिष्ठिर:-(स्वर मुक्त्वा भीममवलोक्यमभूणि प्रमाजंयक्षि) भीमसेनः-(पादयोः पतित्वा) जयत्वार्यः । युधिष्ठिरः- वत्स, वाष्पजलान्तरितनयनत्वान परयानि ते मुश्चय तत्कयय कयिनीति भवान्सम किरीटिना। नौनसेनः-निहतसकलरिपुरक्षे त्वयि नराधिपे जोति मोमोऽर्जुन । पुधिष्ठिरः - (पुनर्गाहमालिङ्गय) रिपोरास्तां तावन्निधनमिदमाख्याहि शतशः प्रियो भ्राता सत्यं त्वमसि मम योऽसौ बकरिपुः । भीमसेनः-आ, सोऽहम् । पुधिष्ठिरः- जरामंधस्योरःसरसि रधिरासारसलिले तटाघातकीडाललितमकरः संयति भवान् ॥४०॥ भीमसेनः-भायं, स एषाहम । मुनु मामाआगमेकम् । धिष्ठिरः-हिमपरगशिरम् । भीमसेनः- मा मुमहाशिम । मायामि तानेन गुपोषन मोगिन अन पागि पावास्या कुशासनाग माहातम् । पुतिर:-Hat गाउनु भगन् । अनुभवतु मारिनी गौतहा। पम् । भीमसेनः- (मुस्मृत्य) देवि पाण्याल रामननये, freat at गुरुपक्षण : असमतमेक्मिार नागेन । या पंगागि गमा सदगि गुगुना १५१ करे। READ arम कारग, Ifat ri ! न मान1ि १६.५५ urt rti x** दुशागनेग A.

पठोऽङ्कः २८ युधिष्ठिर-धीरे से छोड़कर भौम को देखता हुआ आंसू पोछना है)। भीमसेन--(पैरों पर गिरकर) आर्य की जय हो। पुधिष्ठिर-वत्स, आंसुओं से नेत्रों के आच्छन्न होने के कारण मैं तुम्हारे रूपी चन्द्र को देख नहीं पा रहा हूँ। इसलिए बतलाओ, आप अर्जुन सहित वित तो हैं? भीमसेन --आप राजा के सम्पूर्ण रात्रपक्ष को नष्ट कर देने पर मोम और न जीवित हैं। युधिष्ठिर--(फिर गाढ आलिङ्गन करके)। रात्र के नाम को वात रहने दो। मुझे संकड़ों गर (मार-बार) यह लाओ कि क्या तुम सचमुच हो मेरे यह प्रिय भाई हो, जो वक का शव है ? भीमसेन आर्य, मै यही हूँ। युर्शिहर--- (षया) आप युद्ध में हथिर-वर्षा रूपी जल बाले, जरासाप के वक्षःस्थस तालाब में तापात की क्रीडा करने में मुन्धर (प्रतीत होने वाले) मकर ? ॥४॥ भीमसेन-आर्य, मैं वही हूँ। इसलिये आर्य मुझे क्षण भर के लिये युधिष्ठिर-और पा शेष रह गया है ? भोमसेन - मार्य, बहुत बड़ा (कार्य) शेष रह गया है। अब मुयोधन के घर से भागे हए इस हाप से पाञ्चाली के दुःशासन द्वारा खोचे गये उसप गों को बांधूंगा। युधिष्ठिर-आप जल्दी से जायें। (वह) वैचारी वेणी बांधने के पानन्दा मोगकरे। भीमसेन- (दौपदी के समीप जाकर) हे पाञ्चाल को रामकुमारी देवी, त्ति के नाश के लिधे आपको बपाई है। इस प्रकार के मुझे देखकर भय बस करो, बस करो। राजाओं को समा में जिस नर-रूप में पशु, हुगसन मे तुझे प्रसारापा, समस्तीपाणि मम करयोः स्थितानि सपानानि अलि रहे पानं २८२ वेणीसंहारे स्त्यानान्येतानि तस्य स्पृश मम परयोः पीतशेषाप्यसृद्धि । कान्ते राजः कुरूणामपि सरसमिदं महदाचूर्णितोरो- रङ्गभङ्ग हनिपिक्तं तव परिभवजस्यानलस्योपशान्य। बुद्धिमतिके, क सा संप्रति भानुमती योपहराति पाण्डवदारान् । भव यज्ञवेदिसंभवे याज्ञसेनि । द्रौपदी-आजापयतु नायः। [मागणवेदु गाहो ।) भीमसेनः-स्मरति भवती यन्मयोक्तम् । (चञ्चगुजेत्यादि १-०१ पूर्वो- पठति)। द्रौपदी-नाय, न केवलं स्मरामि । अनुभवामि च नायस्य प्रसादेन । [गाह ण केवलं सुमरामि । अणुहवामि अरणाहस्स पसादेश । भीमसेनः-(वेणीमवधूय) भवति, संयम्यतामिदानी धाराष्ट्रकुलालराति दुःशासनधितुलितेयं वेणी। द्रौपदी-नाय, विस्मृताऽस्म्येतं व्यापारम् । शिक्षिष्ये। [गाह विसुमरिदह्मि एद वावारम् । शाहस्स पसादेण पुणो कि सिविखस्सम । मीम:- (वेणी वध्नाति) (नेप) - महासमरानलदायशेषाय स्वस्ति भवतु राजन्यकुलाय । क्रोधान्धर्यस्य मोक्षात्क्षतनरपतिभिः पाण्डुपुत्रः कृतानि प्रत्याशं मुक्तकेशान्यतुलभुजवलः पार्थिवान्तःपुराणि । मद्दया चूरिणतो करू यस्म तस्य कुहगां रामोऽनि सरसं मम अब निषितम् अमुक रक्तं तब परिमवाय अनलस्य उपशान्य भवेत् । निहामिह दलो । यदुक्तं तत्रय-पूर्व प्रमारिवाना तु बीजादोनो समापनम् । निमरत्वेन क्रियते सनिर्वहरणमीरितम् ॥४॥ नापस्य प्रसादेन पुनरनुभवामि । (अवयूय आलास्य । vifa. प्रलया रो। बिलुलिता पवटा ध्यरयरवा पाएत प्यापार है। नायरम प्रसादेन पुन र -- २८३ पष्ठोऽङ्कः मेरे दोनों हाथों में पीने से यचे हुए इस गाढ़े रधिर का स्पर्श करो। हे तेरी अपमान से उत्पन्न वह्नि को शान्ति के लिए मेरी पदा से पूर्ण हुई वाले, कुरुओं के राजा का भी यह तामा पिर (मेरे) अङ्ग-अङ्ग पर हुआ है ॥४॥ बुद्धिमतिका, अब वह भानुमती कहाँ है, जो पाण्डवों की पत्नी का करती थी। हे श्रीमती यज्ञवेदी से उत्पन्न याज्ञसेनी, दी-स्वामी आज्ञा कीजिये। नसेन--जो मैंने कहा था, वह आपको याद है । (चशगुज...इत्यादि नोक २१ का पाठ करता है) दी-नाथ, केवल याद ही नहीं है, अपितु नाथ की कृपा से (उसका) कर रही हूँ। नैन- (वेणी को हिलाकर) श्रीमती जी, अब तराष्ट्र के कुल के लिए स्वरूप, दुशासन द्वारा खोली गई, इस वेणी को बाँध लीजिये। ----नाय, मैं यह काम भूल गई हूं। स्वामी की कृपा से फिर -(देखी बांधता है). ( नेपथ्य मे) की अग्नि मे जलने से बचे हुए क्षत्रिय कुल का कल्याण हो । जुलने के कारण श्रोध से अन्धे हुए, अतुल बाहुबल वाले, पाण्डु के त्रों को नष्ट करके प्रत्येक दिशा मे राजाओं के अन्तःपुरों को सुने का कर दिया है, क्रुद्ध हुए यमराज के सहा और कुरुओं के लिये य विस्मृतोऽयं ब्यापारो मया। साप्रत नाथस्य । इति । (यस्य केशपाशस्य मोक्षान्मोचनात् क्रोधेनान्ध' क्रोधान्धः यस्तैः क्षतनरपतिभिः अतुल भुजयो. बल येषा ते. अनुलमुजवल: मायामाशायामिति प्रत्याशं प्रतिदिश पार्थिवान्त पुराणि पृथिव्या 7 नृपास्तेपामन्तःपुराणि लक्षणया तत्रस्याः स्त्रियः । मुक्ताः मुक्तकेयानि कृतानि । भर्तृ विनावावधव्यप्रापणादिति भावः । ८ ,

२८२
वेणीसंहारे
स्त्यानान्येतानि तस्य स्मृश मम करयोः पीतशेपाप्यसृद्धि।
कान्ते राज्ञः कुरूणामपि सरसमिदं मद्गदाचूर्णितोरो-
रङ्ग ऽङ्गसृनिषिक्तं तव परिभवजस्यानलस्योपशान्त्य ।।।
बुद्धिमतिके, कसा संप्रति भानुमती योपहाति पाण्डवकारान् । भवति
यजवेदिसंभवे याजसेनि।
द्रौपदी-आमापयतु नायः । [आणवेदु माहो।]
भीमसेनः-स्मरति भवती यन्मयोक्तम् । (पञ्च नेत्यादि १-१ पूर्ण
पठति)।
औरती-नाय, नरेवनं स्मरामि । भनिननाय रे ।
(गाह ग येवरा गुमरामि । अगुवामि प्रणाम पगारेण ।।
भीममेन - (वेणीमाय) मत, संगम्यताभितो पारामा
मामलिमित देती।
डोनार, विस्मृतासाये। प्याभारम।
शिष्ये। जिगुमाल ए बारम | माहाम जमादे गुणो।
गाविसामान ।
भीमः-- (तीन)
मापाय प्रगान पुन

पटोल रके मेरे दोनों हाथों में पीने से बचे हुए इस गावे रुधिर का स्पर्श करो। है पा, तेरी अपमान से उत्पन्न वह्नि को शान्ति के लिए मेरो गदा से पूर्ण हुई 'ग्याओं पाले, कुरओं के राजा का भी यह ताजा रघिर (मेरे) अङ्ग अङ्ग पर चाहा है ॥४॥ हे बुद्धिमतिका, अब वह भानुमती कहाँ है, जो पाण्डवों की पत्नी का पहास करती थी। हे श्रीमती यज्ञवेदी से उत्पन्न पानसेनी, द्रौपदी-स्वामी आज्ञा दीजिये। भौमसेन---जो मैंने कहा था, वह आपको याद है। (चनगुन...इत्यादि क्ति श्लोक १२१ का पाठ करता है)। द्रौपदी-नाय, केवल याद हो नहीं है, अपितु नाय की कृपा से (उसका) भव भी कर रही हूं। भीमसेन- (वेणी को हिलाकर) श्रीमती जी, अव एतराष्ट्र के कुल के लिए आलरात्रि-स्वरूप, दुःशासन द्वारा खोली गई, इस वेणी को बांध लीजिये। औदी-माय, मैं यह काम मूल गई हूँ। स्वामी की कृपा से फिर जोगी। भीम-(वेणी बांधता है)। ( नेपथ्य मे ) महायुद्ध की अग्नि मे जलने से बचे हुए भत्रिय कुल का कल्याण हो। जिसके खुलने के कारण शोध से अन्धे हुए, अतुल बाहुबल वाले, पाण्डु के * ने राजाओं को नष्ट करके प्रत्येक दिशा में राजाओं के अन्तःपुरों को खुले केशों वाला कर दिया है, ऋद्ध हुए यमराज के सदृश और कुरुओं के लिये नम् । नाय विस्मृतोऽय व्यापारो मया । साप्रत नाथस्य । शोधान्धरिति । यस्य केशपाशस्य मोक्षान्मोचनाद क्रोधेनान्धः क्रोधान्धः नरसनयो यस्तः क्षतनरपतिभि अतुल भुजयो बल येषा तं अतुलभुजबलः सुत्र. । आशायामाशायामिति प्रत्याशं प्रतिदिश पार्थिवान्त पुराणि पृथिव्या -: पार्थिवा नृपास्तेपामन्तःपुराणि लक्षणया तरस्याः स्त्रियः । मुक्ताः मेवा तानि मुक्तकेशानि कृतानि । भतृ विनाशादधमप्रापणादिति भावः । ३ जनेन । २ नाषिशेत्र दुर्योधनः। तथा च दुर्योधने हवे सदन्तःपुरमा: अनिता । पुगारीकाशः कृष्णः।भाशारले स्वीडोनि देव गतिमा चिन्तयित्वाऽपि जनो दुःसीम/ar अरि तुम भवतीति भावः। परमा, दिला ग तम् । यहा। गुरु: पावन २८४ वेणीसंहारे कृष्णायाः केशपाश: कुपितयमसखो धूमकेतुः कुरूणां सोऽयं बढः प्रजानां विरमतु नियनं स्वस्ति राज्ञांकुलेभ्यः । युधिडिर:-देवि, एष ते वेगीसंहारोभिनन्द्यते नमस्सलसंचारिणा नि- (ततः प्रविशतः कृष्णार्जुनौ) कृष्णः-(युधिष्ठिरमुपगम्य) विजय: निहतसकसारातिमण्डतः सानु पाण्डवकुलचन्द्रमा महाराजो युधिष्ठिरः । अर्जुन:-जयत्वार्यः। युधिष्ठिरः-(विलोक्य) अये भगवान्पुण्डरीकाक्षो वत्स किरीटी । मायन- अभिवादये (किरीटिनं प्रति) एो हि वत्स । ( अर्जुनः प्रणमति ) युधिष्ठिरः-(वासुदेवं प्रति) देव, कुतस्तस्य विजयादन्यस्य भगवान्पुराण- पुरपो नारायणः स्वयं महगलान्याशास्ते । कृतगुरुमहदादिक्षोभसंभूतसति गुणिनमुदयनाशस्थानहेतुं प्रजानाम । अजममरमचिन्त्यं चिन्तयित्वाऽपि न त्यां भवति जगति दुःखी किं पुनर्देय दृष्ट्वा ॥४३॥ सः अयं कुषितस्य यमस्य रामा कुपितयमसस्यः । राजाहासविण्यटन् । पु" धूमकेतुः नामहेतुत्वात् । कृष्णाया: केशपाशः केराकलापः । वः । प्राना निघनं संग्रामे इति दोषः । विरमतु । राज्ञां दुलेग्यः स्वस्ति भूरा वर्षे काम्पलिजमलंगाः । उत्तरा उमा बसेनयो: संगृष्टिः । जवा इति भावः । [पाटान्तरे] विष्ट्येति आनन्दहेतुः ॥४२॥ ..पर्वबादेर्वा शोभन परिणामेन #yar ।

पाठोड्दा
२८
सूचक) धूमकेतु स्वरूप, कृष्णा का वह यह केशपात बंध गया
का नाश बन्द हो जाये । राजाओं के कुलों का कल्याण हो ॥४२॥
रष्ठिर-हे देवी, माकाश-तल में विचरण करने वाले सिद्ध लोग तुम्हारे
बन्धन का अभिनन्दन कर रहे हैं।
(तस्पधात् कृष्ण और अर्जुन प्रवेश करते हैं)
1-(युधिष्ठिर के समीप जाकर) सम्पूर्ण त्र-समूह को नष्ट कर देने
उप-कुल में धन्द्रतुल्य, महाराज पुधिष्ठिर अनुमों सहित विजय पायें।
T-आर्य की जय हो।
'हर-अरे ! भगवान् विष्णु (-मल तुल्य नेत्रों वाला) और वत्स
गवन्, मैं प्रणाम करता हूँ (अर्जुन को लक्ष्य करके) घरस, माओ, भाभो।
( अर्जुन प्रणाम करता है)
हर--(वासुदेव को लक्ष्य करके) भगवन, मिसके लिये स्वयं पुरातन-
न नारायण मङ्गल की कामना करें, उसकी जम से अतिरिक्त अन्य
ती है?
९ ५, किये गये महत्तत्व आदि के महान् क्षोभ से उत्पन्न मुक्ति पाते,
प्रजाओं की उत्पत्ति, विनाश और स्थिति के कारणभूत, सगुण, अममा, अमर
और अचिन्त्य आप (देव) का चिन्तन करके भी संसार मे (गेई प्राणी) दु:खी
नहीं रहता है, फिर देखकर तो क्या ? ॥४॥
या । महदादेरावाचा क्षोभेन मिलनेन महाभूतसमाधिना सभूतानामबाई.
नि: शरीरं येन स तथा । पश्चाहिशेषगममाम । यता गुरुलार्य व्य
न सादृशेन महादिना कासाचशादिना मभूता मिलिता मूलियस्य तम् ।
मावकारणेन सह भगवान्वेदादिति भाव । अत एव गुणिन वेतदिष्टि
ग्य पानादिमन्तम् । यहा। गुणा सस्वरजस्तमांपास्तचोगिन मोरगृष्टिना.
नयंपारणं च । तथा ए मत्वरजस्तमोम्प गुणत्रय महारि समापाच
रहरहिरण्यगर्भरपसार भगवानारत्रयानि मात्र । पानं पि.)
मजन्यम् । अमरमनास्यम् । [अमरमिनि पाठे जरारहितविशारमिर।।
वस्य वामनमागोचरम् । तदुतम्-पतो बायो नियन्ये बार मनपा :
अपर विरोधाभामः । यो हि मभूमिपमा रोपिर.
र पिनेति । अविरोषस्तु दसिंत एक ॥४॥

२८६ वेणीसंहारे (अर्जुनमालिङ्गय) परा, परिष्यजस्य माम् । कृष्णः-महाराज युधिष्ठिर, व्यासोऽयं भगवानमी च मुनयो वाल्मीकिरामादयो धृष्टद्युम्नमुखाश्च सैन्यपतयो माद्रीसुताधिष्ठिताः । प्राप्ता मागधमत्स्ययादवकुलराजाविधेयः समं स्कन्धोत्तम्भिततीर्थवारिकलशा राज्याभिषेकाय ते ॥४४॥ अहं पुनर्दुरात्मना चाकिण विप्रकृतं भवन्तमुपलभ्यार्जुनेन सह त्वरित रमायातः। युधिष्ठिरः-कथं चाकण रक्षसा वयमेवं विप्रतव्याः । भीमसेनः- (सरोपम्) कासो धार्तराष्ट्रसखा पुण्यजनापसदो येना महांवित्तविभ्रमः कृतः। कृष्णः-निगृहीतः स दुरात्मा नकुलेन । तत्कथ महाराज, मिस्मात समोहितं संपादयामि। युधिडिर:- एवं पुण्डरीकाक्ष, न किचिन्न ददाति भगवान्प्रसन्नः। अहं पुरुषसाधारण्या धुरापा संतुष्यामि । न खल्वतः परममार्ययित क्षमा परपतु वः- क्रोधान्धः सकलं हतं रिपुकुलं पञ्चाक्षतास्ते वयं पाञ्चाल्या मम दुर्नयोपजनितस्तीर्णो निकारार्णवः । त्वं देवः पुरुषोत्तमः मुकृतिनं मामादृतो भापसे ध्यासोप्यविति। [अय भगवान ज्यामः । अमी च वाल्मीकि रामादयः मुनयः । रामः परसुराम । माद्रीगुताभ्यामधिष्ठिनाः पृश्यम्नमुमा पुग्नो मुममाद्यो येतो ते तया । गाशाविधेय. मागधमत्स्यपादनकुलः समं सह! स्कन्धेन उत्तम्भिता उमौलिता। तीर्यवारि आयो प्रतिजन तस्य कला से होका: वे तब रापाकाय परिमा: शनीति ar पादातर] जानापिनामा मुनिः ।।४।। । राशमेषु अरमयो नीयः । ता पियरियन भाषा २०७ 4 (अर्जुन का आलिङ्गन पसे) वत्स, मेरा आलिङ्गन करो। कृष्ण-महाराज युधिष्ठिर, यह भगवान् व्यास, मे बाल्मीकि तया परशुराम यादि मुनि और माद्री के से अपिडित एटयान आदि सेनापति आज्ञाकारी मागध, मत्स्य और यादव के साथ तेरे राज्यामियक के लिये करधों पर तोपों के जलो से भरे कलश हुए आ रहे हैं 181 लेकिन मैं आपको दुष्ट चार्वाक द्वारा व्यापुलित किया हुआ जानकर अर्जुन साथ जल्बी चला आया हूँ। युधिष्ठिर-कसे ? बाक रासस ने हमे इस प्रकार धोखा दिया। भीमसेन --(गेपपूर्वक) कहा है वह दुर्योधा का मित्र नीच राक्षस, जिसने यं को महान बुद्धि-धामोह उत्पन्न कर दिया था। कृष्ण-~-उस दुष्ट को भकुन्त ने पाड लिया है। महाराज, इससे मागे का) और क्या अमीट कर ? पुधिष्ठिर-पुण्डरीकाक्ष, भगवान प्रसन्न होकर या कुछ नहीं देते हैं ? मैं सामान्य पुरषों की बुद्धि से ही सन्तुष्ट हूँ। इससे अधिक मांगने का हामध्ये में नहीं है। भगवान् देखिये क्रोध से अन्धे हुए (हम पाण्डवों) ने सम्पूर्ण शत्र-कुल को मार मला, रन वह हम पाचों अक्षत रहे। पाचाल को राजपुत्रो ने मेरी दुनीति से नि अपमान के सागर को पार कर लिया। आप भगवान पुष्योत्तम मुश शाती से मादरयुक्त होकर बातें कर रहे हैं। इससे अधिक और पया है, परस्पनिहासधि. । यदाह -वरप्रदान-सप्राप्ति बायस हार उच्यते । त्रिन न ददासि तु ददाम्यवादी निधी प्रानमर्थ गमरत । पुरुषेषु औरणी पुरुषसाधारणी तया । बोधावरिति । कोवाधरात्पश्चरापवरेर । [ते वय] पत्र पाण्डया यन्वयः । पाश्चात्या निकाति: { परिभासागर } यम दुनयन रिपणनादिना] विहितस्तीर्ण. । पुरुषोत्तम इति । पुरुषभ्य उत्तम इति न तु पुरुपूतम इति न निर्धारणे इति निषेधात् । न चानेन मासनिषेधो न तु सामोसमासनिषेध इति वाच्यम् । तथा सति पटो- २८ अपिच . [जनः] लोकः पुरुषायुषं जोयात्रीवतु । पुरुषायुपमिति अचतुर हत्या तीनहारे मिनामान्यदतः परं भगवतो याचे प्रसन्नादहम् ।।४५ तथापि प्रीतमरर वेगवास्तरिरमस्तु । अकृपणमस्थान्तं जीव्यजानः पुरुषायुपं भवतु भगवन्भक्तिद्वतं विना पुरुषोत्तमे । दयितभुवनो विद्वद्वन्धुर्गुणेषु विशेषवि- त्सततसुकृती भूयाद् भूपः प्रसाधितमण्डलः ॥४६॥ अवनिमवनिपालाः पान्तु वृष्टिं विधत्तां जगति जलधराली शस्यपूर्णाऽस्तु भूमिः । त्वयि मुरनरकारी भक्तिरद्वतयोगा- द्भवतु मम सुदीर्घ हव्यमश्नन्तु देवाः ॥४७॥ कृष्ण:-एपमस्तु ( इति निष्क्रान्ताः सर्वे) * इति पष्ठोऽङ्कः * समाप्तमिदं वेणीसंहारं नाम नाटकम् । समासस्याप्राप्तेरेद निषेधात्सर्वत्र सप्तमीसमासेनव प्रयोगसिदेः । तस्मात्पधी समास एवायमित्यदोप: । सुकृतिनं पुण्यवन्तम् ॥४॥ अकृपणमिति अकृपणं कापण्यरहितमयान्तं न रोगेण परिश्रान्तं च यथा - । हे भगवन् देतं विनातक्रमेण पुरुषोतमे भक्तिभवतु । म - पठो २८९ जसे मैं प्रसन्न हुए भगवान् से मानू ॥४॥ फिर भी, यदि भगवान बहुत ही प्रसन्न हैं, तो यह हो जाये- है भगवन् प्रजायें कार्पण रहित तया नीरोग होकर पुरुष की आयु पर्यन्त न। पुरुषोत्तम में हुँत रहित भक्ति होवे। राजा प्रजा का अनुरागी, विद्वानों याधु, गुणों का विशेष ज्ञाता, सदा पुण्य कार्य करने वाला और अधीन उपों को घश में रखने वाला होवे ॥४६॥ और मो- राजा लोग पृथ्वी का पालन करें; भवति भुवन में वृष्टि करे; पृथ्वी न्य से पूर्ण हो, मेरी मुर और नरक के शत्रु आप में अद्वैत सम्बन्ध से भक्ति और दोधकाल पर्यन्त देव लोग हषि का भोग करते रहें ॥३॥ कृष्ण - ऐसा ही होगा। ( सब निकल जाते हैं) * पष्ठ अङ्क समाप्त * वेणीसंहार नाम का नाटक समाप्त हुआ। नाना चेति शेपः । पण्डितगुणेषु पत्तिजनो विहितहृदयो दत्तचितः सानुरागो भिवतु । भूपः दियितं भुवन यस्य तथा प्रियनोकः । विदुपा दाघुः । वशेषविद्धिशिष्टयुज मदा पुण्यवान्प्रसाधितराजचकरच भूयात् ॥४६॥ [जलपराली मेघपक्तिः जगति वृष्टि विधत्ताम् । भूमिः वास्यैः पूर्णा धान्या- समृद्धिमती अस्तु । मुरनरकयोस्तनामदत्ययोः रात्रौ । अतयोगादनन्य- नसा भक्तिः भवतु । देवाः हस्ये होमेपु हुनमाज्यादि सुवोध बहाल- इनन्तु ॥४॥ इति षोड: ० २६० वेणीसंहारे टिप्पणकृतो जगद्धरस्य वंशादिकीर्तनम कतीह नाटकाम्वुधौ स्फुरन्ति नोज्ज्वला रमाः। मदीयबुद्धिरल्पिका क वेद तानशेपतः ॥१॥ नानादरं मम कृती नियतं तनुध्व- मत्राघुनातनतया गुणदोषविज्ञाः । ग्राह्य शिशोरपि सुभाषितमित्यमात्य यूयं ततोऽपि मम टिंपनमाद्रियध्वम् ।।२।। सम्धं दुर्लभशासनं सुरगणनामोऽभिरामो गुणं. विद्यावंशविभूपणे अपि शुभे छर्ने उभे पारित । येनायं समभूद द्विजातितिलकवण्डेयरः पण्डितो मीमांसकरहस्पवश्यहृदयो दातायदाताशयः ॥३॥ मागूतासावहितनगरीनागरीगोतीति विप्रंक्षि गुणामधिकं वेदपूर्व धरं तम् । कांनामसमत नृपान्छासन सोऽयमुच्च. रापगुचं गुण्मपगनु रामपूर्व धरानम् ॥१॥ सोय युवामनगरे पदमा गुडे मीमामको विमोसिवित्रमूतिः । पुत्र दायरमा गुणेरगाथ सत्तानि गुरिणगणनधिताभिमानम् ॥५॥ अमृत निपायरमेन धीरं गुणेरनून गुटलापिचासम् । सरला थरमा पुर मोरपिट गुलिना मुणेन ॥६॥ पानगर भागे से गुतमरितमम् । धीमगरापानमनगुणमानिनम् ॥ मटा पारि मधीमा, मत मागविधि - शादिकतिनम् २६१ " . नाठि कठोरगीतममतं वैशेपिकं सण्डनं येनाशावि सकोपशव्यनिवहं तत्सारिएनीय मतम् । लंकरणं च शुद्धभरतं येनाध्यगायि स्थिर तेनानेन जगद्धरेण कविना टोरा कृतेयं मुदा ।।। उकृतिमुन्दरो रमवती नानागुणाना निधि. नानाभावविभावनकचतुरा नानार्थसाधिका । विमलाङ्गनेव रहिता दोषरशंपैरत- स्नामेतामधिभूषयन्तु कृतिनस्तेभ्यो नमः सर्वदा ॥१०॥ वति मदीयग्रन्थमध्ये प्रमाद: कचिदपि स महिम्ना शोधनीयो महद्भिः। गमनकारी प्रायशो नात्र चित्रं अवति च गुरुहस्तालम्बनोऽपि प्रकार: ॥११॥ रलधरो गुणीशो नानागुणान्या दमयन्तिकापि । नस्य कृती व्यरंसीत्वष्ठोऽयमको वरटिप्पनेऽत्र ॥१२॥ . कार प . पाक महामहोपाध्यायधर्माधिकारिकश्रीजगद्धरकृतौ वेणीसंहारटीकायां पठोऽङ्कः समाप्तः । ।। शुभमस्तु ।

बेणीसंहारे येणीसंहारस्थश्लोकानां वर्णानुक्रममूची अइः दलो.क. बङ्कलो ५ ४० २ २ ४ الله ६ ६ ५ १ ४ ३ श्लोकारम्भः बकलितमहिमानं अकृपरामरकथान्तं अक्षतस्य गदापाणेः अव किन विधासेयं अद्यप्रभृति वारीद अद्य मिथ्याप्रतिज्ञो- अर्धवावा रणमुपगती अन्योऽनुभूतशत- अन्योन्यास्फालभिन्न- अपि नाम भवेन्मृत्युः मप्रियाणि करोत्येप अयि कर्ण वर्णसुखदा अयं पापो यावन्न अवनिमवनिपाला: अवसानेऽङ्गराजस्य अश्वत्थामा हत इति बरामाप्तप्रतिनेऽस्तं अस्त्रग्रामविधौती अस्त्रज्वालावली. आचार्यस्य त्रिभुवन आजन्मनोन वितयं आरमारामा विहित । स्त्रप्रहपादकुण्ठ. श्लोबारम्भः इन्द्रप्रस्थ वृतप्रस्थ ४६ | इयमस्मदुपाययंत्र- उद्घातक गितविलोल- ३२ / उपेक्षिताना मन्दाना २६ ऊरू करेण परिघट्टयतः ४२/ एकस्य तावत्याकोऽयं १५ | एकेनापि विनानजेन १३ | एतजलं जलजनील २७ एवेऽपि तस्य कुपितस्य ६ एह्यस्मदर्थहततात कथमपिन निषिद्धः १. कर्णक्रोधेन युष्मद्विजयी ४५ | कर्णदुःशासनवप्राद ४० वर्णाननेन्दुस्मरणात् ३६] वालिङ्गनदायी वा ११ | वर्णन करणंसुभग कर्ता धूतच्छलानां १२ | यलितमुवना मुक्त कालिन्द्याः पुलिनेषु २० कि कण्ठे शिथिली किनो व्याप्तदिशा कि भीमाद्गुरुदक्षिण २ ३८|कुन्दया सह युवामच ५ ६ ३ ५ कर 9 १ २ २ १ २ पुरु पनोरु पदानि २ ५ ६ AM ५ १ ३ ६ ३ १ देवीमंहारस्थश्लोकानां वर्णानुक्रमसूची श्लोकारम्भः अतः श्लो.क्र. श्लोकारम्भः हर्वन्त्वाता हताना अङ्कः श्लोक ५ तथाभूता दृष्ट्वा सुमाञ्जलिरपर इव १ ५ तद्भीरत्वं तब मम पुरः २ सतगुरुमहदादि- ६ ४३ / तस्मिन्कौरवभीमयो. ६ रतमनुमत हष्ट वा २८ | तस्मं देहि जल कृष्ण रष्टा केशेषु कृष्णा २६ तस्य॑व देहरुधिरोक्षित शिष्टा वेशेषु भायां तस्वंद पाण्डवपशोः ६ ८ कोदाउज्याक्णिाई २ २६ तातस्तव प्रग्यवान् ३ कौरव्यवंशदावेऽस्मिन् तात शस्त्रग्रहणविमुव बोधात्तत्सकल हत ता वत्सलामन भिवाद्य कोषान्धर्यस्य मोक्षात् ४२ | तीरों भीष्ममहोदयो जोधोद्गुणंगदस्य नास्ति तेजस्वी रिपुतबन्धु- ३ २७ गते भीष्मे हते द्रोणे ५ २३ / त्यक्तप्राजनरश्मि- तो येनाद्य त्व १६ / त्यक्त्वास्थित सरभस गुप्त्या साक्षान्महानल्प' ३ अस्त विनापि विषयात् गुरुणा बन्धूना दाधु ग्रहीतं येनासीः २ दत्त्वा द्रोणेन पार्याद- हाणा चरित स्वप्नो २ १४ दत्त्वाभय सोतिरको ३ २८ बदमुजभ्रमितचण्ड- २१ दत्त्वा मे करदीकृता १६ त्वारो वयमृविज २५ दायादान योर्बनेन ५ ५ णिताशेषकौरव्यः ५ २८ दिक्षु ध्यूढाधिपाङ्ग २ न्मेन्दोरमले कुले ७ दिष्टधातविप्रलम्भ २ १२ त्या काममवध्यो- 국 ४१ । दुःसामनम्य रघिरे ४६ वत्सु पाण्डुपुत्रेषु १ दुशासनस्य हृदय- भारम्भावितत- २ दृष्टः सप्रेम देव्या तिप्रीतिमनसि न ६ २० देशः सोऽयमराति- रहः शङ्कितं . ३ द्रक्ष्यन्ति न निरास्मनं जनः शोकजन्मा ५ २० धर्मात्म प्रति यमी २ २१ ३ ३ ६ विश्व दहन- ३ १ Arv- ३ ३ . MAN २६8 देशीसंहारे श्लोकारम्भः धिक्मानुजं कुरुपति धुतराष्ट्रस्य तनयान घुनायुधो यावरहं नाहं रक्षो न भूतो निलंब्रस्य दुरोदर. निर्वाणवरदहनाः अतः लोक. श्लोकारम्भः १३ / प्रत्यक्षमातधनुषा ६ प्रत्यक्ष हतबन्धूना ३ ४६ प्रत्यदां हनबान्धवस्य ३७ प्रत्पाहताना मारा १७] प्रयत्नारिगेधित: ६ or ७ १ प्रट यारं मम निवार्य गुरुशार - ३ ३ ३ निर्विरामवीर्य वा दिगम्जनिमानेन निरिपेभिनित मून तेनाधरण नयम परामरहिनं पदबाने पनामन्यापार समरित्र एवामिन १६ . ३ ३५ | प्राप्ताकरथारती ३ ३१ प्रायमिश्रमकरम १८ | त्रियमनुगमपश्यस्त पारस्तिमिल. ६ बालस्य मे प्रानि भयभीमेन भयो भवति तय २ | भवेभीमममोरा भीमेोणे निहो १. भूमो firi गरीर २२ भूमो विमान भूगः परिकमालि. १३ प्रातले मनोन मम्नामि कौरवशन wafa पिपाना मम्मा. पराग गरमा बामा ३ पnि. ४ २ पाया Tr ६ ३ । . frgIT: PAS २ M . + १ ५ १४ २२ १ ५ १ १ ६ ५ ५ १ ४ २ or २७ देणीसंहारपालोरानो वर्णानुक्रमाची श्लोकारभः श्लोमाराम: अधि जीवति मसातः ३ ३१ | वृषसेनो न ते पुणे महापसयमात- ३ पाक्ष्यामि नो परिष. मातः विमप्यमहरा ५ ३ शल्यानि व्यपणीय मामुद्दिश्य स्यजन् १७ शल्येन यथा सत्येन मत्तजितमत्युप्र शाखारोधस्थगित मस्सत्यवतमङ्गभीड़- २४ शोक: स्त्रीवन्नयन यदि शस्त्रमुग्मितं ३ शोचामि गोच्यमपि पदि समरमपात्य ,६] श्रवणालिपुटपैय यदुर्योधनपान ५ श्रुत्वा वध मम मृषा यद्वैतमिव ज्योतिः १४ सालरिपुजयादा घिन्मोचितस्तव पिता स वीचकनिषूदनो यस्मिनिरपराय सत्पक्षा मधुरगिर सुनो पेष्टमुपभोग- सत्यादप्यन्त धेयो युप्मच्यासनलड्धनासि १२ सः भीरु शूरो वा पुप्यान्हे पति सर्वथा क्षय ब्रह्मन् पेनामि तत्र जतु ६ सहभृत्यगरा सबान्धर्व पो यः शरवं विमति a ३२ सूत्तो वा मूतपुत्रो का क्षिणीयेन सततं ७ स्पृष्टा येन शिरोरुहे (राज्ञो मानधनस्य स्त्रोणा हि साहचर्यात् सोरास्तां तावद स्मरति न भवान्पीत रिपुर्वाधा विधत्ते २ २१ । हतमानुप रक्षागृहानलविषान- हत जरति गाने ये हिलारावपाएमत्तिए 콜 बोलावस्य पवना २ २२ हली हेतुः सत्यं पर पवलदीर्घा २ १५ हस्ताकृष्टविलोल विस्मृत्यास्मान्थुक्ति होयमानाः क्लि वासोऽयं भगवानमी ४ १ ३ ६ ४८ ३ ३८ १ १ १५ R ३ ३ १ १ २० ३ 5 ४ २ ४ ३ हत्या पार्यान्सलिलं २८८ ५ A+ ६ . . -

७
.
1 अकुशलदर्शनाः स्वमा देवताना प्रशंसया कुशलपरिणामा भवन्ति ।
२ अनुक्तहितकारिता हि प्रकाशति मनोगत स्वामिभक्तिम् ।
३ अनुबड्डनीयः समुराचारः।
४ अप्रमत्तसंचरणीयानि रिपुबलानि धूपन्ले ।
वान्याः पतु गुरवः।।
६ अहो मुग्घत्वमवलानां ।
आमा बलवती राजन शल्यो जेष्यति पाण्डवान् ।
उपक्रियमाणामाये किमुपकरणेन ।
है उपेक्षिताना मन्दाना धोरसत्त्वरवज्ञया।
अवासिताना शोधान्धर्भवस्येपा विकरयना ।
१. कालानुरूपं प्रतिषिथातम्यम् ।
१ कुतस्तस्य विजयादग्य पर भगवान् पुराणम्पो नारायणावर
मङ्गलान्याशास्ते।
१२ कोहि नाम भावता संदिष्ट विकल्पयति ।
1३ गुपया सामान्महानल्पः स्पषमन्येन वा कृतः ।
करोति महती प्रोतिमपकाकारिणाम् ।।
१४ पहाणां धम्ति स्वनो निमित्तान्युपपाधितम् ।
फसन्ति पाकतालीयं तपः प्राज्ञान विभ्यति ।।
१५ तेवावी रहतमयुबरार शाहमा पनि प्रतायुषप्तमाया।
१६ वातं विना विभाकिमस्य तो शिवकारमग्दरता ।
10 शपत हुले गुम्म मामतं पौरुषम् ।
१% मसिरानि पदाद प्रसरः ।
१६ न घरापासपुरपि तत्र प्रहा।
म पुलममिमा पुन गायुम् ।
.

ka =' - बE. दूकान वा वेणीसंहारस्थानि सुभाषितानि पतं पराजमवतां वाइमात्रेणायि विरागमुत्पादयितुम् । पतं बन्धुष्पस विस्तरेणावेदयितुम् । तिं वीरस्य क्षत्रियस्य प्रतिजातं शियिलयितुम् । २५० तो हि दुःषभाजो भवन्ति । १७२ सपजा। ोणितं खत्वेतद । गतं दहहहत्प्रविशति । ६२ सनय सत्यं संशयः साह सेषु । TPS: कपममम, वेत्तु देयं पुराणम् । मरमपास्य नास्ति मृत्योभयमिति पुमितोऽन्यतः प्रयातुम् । रणमवश्यमेव जन्तोः किमिति मुथा मलिनं या कुरुक्ष्वे ।। ६८ अमुवननाथो मति तत्कयमग्यथा भविष्यति । २३४ तावत्समरविपिनो जिता हताश धोराः। २०० णिति तावदुपदेष्टव्यमूििवजिगीषुः प्रशावताम् । संसारस्तावत्प्रसिद्धवेयं लोकयात्रा यत्पुत्रः पितरो लोकदये. नौया इति । मिदं दुष्करमध्यवसितुम् । १२४ नामकर्मणी बन्दनीया गुरव. । २०६ नग्यो जनोयः पृष्टः परुषमपि हितं भवति । ६२ 'साहचर्याद भवन्ति चेतांसि मामशानि। हि मूर्छयते विषविटपिसमाश्रिता पनी ॥ किन बलु प्रलपति । किल रिपोनपाः संपते परान् । १८८ मा एक १०८. ४८

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Vairi Samhar

Author
Dr. Shivraj Shastri
Title
Vairi Samhar
File name
Vairi Samhar
Text
OCR done
Citation
1860
Published
2011/08
Publisher
Merath, Ratiram Shastri
Language
Sanskrit
Pages
336
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310963
Barcode
99999990314399.00
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