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कुण्डलियारामायण
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कुण्डलियारामायया।
कविकुलतिलक गोस्वामी
तुलसीदासजीकृत।
कलकत्ता
३८.२ भवानी वरणदत्तष्ट्रीटस्थित
वनवासी ष्टीममेशीन प्रेसने
नौतुटविहारीराय द्वारा
शुद्रित घ्यौर प्रकाशित।
लग १८०३ ई०।
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ত্মিা [ান্য-t . दहन अमङ्गल सकल दुख गजमुख सबसुखदानि । प्रतिग- तिरति रघुपतिचरणा विघ्नहरनको बानि ॥ विघ्नहरनकी बानि जानि सज्जन सब गावत। भक्ति मुक्ति वर देव शेण परसुर ध्यावत ॥ घर ध्यावत शेष सुर रिपुगण खलजन गहन । कह तुलसिदास शरसुवन सनत मक्त सवभयदहन ॥१॥ दीनदयाल दया करो दीन जानि शिव मोहिं। सौताराम सनेह उर सहज लन्त गुण होहिं॥ सहज सन्त गुण होहि यथाप्रद लाल दुःखसुख । कर्मविवश जहँ जाउँ तहा सियराम कपारुख ॥ रामपालख नित रहौं जगतजनित संशय हौ। कहा तुलसिदाल पर उमा दीनदयाल दया करो ॥२॥ रामचरित शतकोटि शेष शारद शिव माखे। नारद शुक सन- कादि वेद कहि बौनहि राखे ॥ बीचहि राखे चरित पार कहि पावत नाहिन। कहि कहि हार सकल रामया कहत सिरा- हिन ॥ नहिं लिराहिं रघुबीरगुण सो तुलसौ मनमैं डरत । भजन भाव बेदन कहा कहे चरित लवनिधि तरत ॥ ३ ॥ पुत्लयज्ञ छप कौन जोरि सुनिगण द्विजकलवर। कह वशिष्ठ भै सिद्ध दौल इवि लै प्रलाद कर ॥ लै प्रलाद कर दोन देहु माधिलिप जाई। सुनि दशरथसन हर्ष सकल प्रियनारि जुलाई ॥ नारि बुलाई कोयला कैकेयौ युग भाग कर। मन अनन्द रानी पति दोन्ह सुमितहि हाथ धर ॥ ४ ॥ .
कुण्डलिया रामायण । मङ्गलमयी विचित्ल बुति प्रकट भई गृह शानि। ब्रह्म- सचिदानन्द उर प्रकट भये सुखखानि । प्रकट सये सुखखानि हानि दारिद दुख नाघ्यो। देवन लखो अनन्द मही मन मोद अनाघ्यो॥ महौ मोद द्विज सकल सन्त लज्जन यश्व गावत । ब्रह्मादिक सब देव अवधपघर चलि आवत ॥ पावत वर्जत क्षुमन धन तुलसौ कहि जय जय जई । नाक नगर अहिएर भुवन प्रकट सई मजाल मई ॥५॥ सास भयो शुभवार योगवर नखत विराजत। तिथि नम जल सहि विमल दिशा विदिशा सब भाजत ॥ भाजत सरंय अवध देवगण जय उच्चारत । बर्मत सुमन प्रशंस हंस निजबल निहा रत। हारत खल गण मनभलिन प्रकट भये सुख दुल गयो। तुलसो रघुबर प्रकट मे भास एकको दिन भयो॥ ६ ॥ सुनि सूपनि बतजन्य 'अगन नहिं देह सँभारत । उठे भवन कह दौरि बोलि तब गुरुहि प्रचारत । गुरुहि प्रचारत चले बिश सँग ले मुनिनायक । भून भविश्य वर्तमान ज्ञान सब जानन लायक ॥ लायक सुन मुनि ससुमित के जातकर्म सब विधि कियो। हेम हौर नौरज सुपट महि हय मय सुपति दियो ॥ ७ ॥ याचक जो जेहिसाज ताहि प पूछि दिवावत । वृन्द वृन्द बर नारि विमल स्वर सोहिल गावत " गावल सोहिल सुनत सूप हँसि हरि बुलावत। पट भूषण मणिमाल लाख सुख नेहि पहिरावत! पहिरावत गज तुरग रथ सर्वल दैदै छाडि छल । पुनि तुलसी नहुँ तह भरो रामलपा सबं वाहि थल ॥८॥ पुरो मगन नर नारि वर्ण चारिउ प्रसन्न सबि। प्रति गृह गावत गीत कल मणिचौक भरी छनि भरी चौक गजमुक अंगर अमाम मृरामद धन। कुसुम सुगन्ध अवौर रहेउ अरि दिशा विदिशि तन ॥ दिशा विदिशि सुख भरि रखो भामिनि ॥
कुण्डलिया रामायण ३ । -- बहु प्रकटी दुरौ। अहिनाक भूमितल सुख भरनो जिमि सुख भो रघुपतिपुरौ ॥ ६॥ भूप सामिनी दोउ सुखद सुन्दर सुख जाये। कर्म किया सो करे तोनियाचक पहिराये । पहिराये मन मोद चारिसुत लखि सुख राजा। रानी परमहुलास दास दालो सब साजा ॥ साजा शहर अनन्द बड़ बाजा बहु बाजन लगे । सब कोउ कहतः सराहिकै भागमाल मुखके जगे ॥ १० ॥ भूसुर सुर गोधरनि सन्तः सज्जनके काजे। प्रसु धारमोसन मनुज दनुज. सुनि विकल सुलाजे ॥ लाजे खलगण मलिनन- लिनहिल उदय भानुकर। अघउलूक छपि गये तेज शहिपुर सुरपुरधर ॥ सुरपुरधुनि असुमावली जयति राम रघुवंश जय। जय दधर छकुल कलश अवधनरनारि कहत सय ॥ ११ ॥ गृह गृह बजत बधाव नारि नर अवध अनन्दित । चौक कलश प्रतिद्वार लसत सुरतियगण बन्दित ॥ बन्दत सुर- गण सुमुख बन्दिगण विप्रवेदधुनि। भरि भरि सुक्ताधार देखि सुत भाग अधिक गुनि ॥ अधिक गान सोहत भवन रामजन्हा सगल लजत। नरनारि वारि तन धन सबै सुरपुर जयदुन्दुम्मि वजल ॥ .१२.॥ नाम धरमो. मुनि हेरि राम पुनि भरत लषयावर । शन- घमन शुभनाम दौन मुनि लिखि भूपति कर ॥ सुपति शनि- नदौन मगन तनु लहेउ सान सुख। गान निशान समान धरणि आकाश एक रुख यकटक निरखत सुमनगण मन मलीन खलगण भये। चारि चारू सुन्दर सुवन सुरूत सुप तरुफल नये ॥ १३ ॥ सुन्दर सुतवर गोद मोद भरि मातु दुलारत । निरखि दनव विसिन्धु सकल तन मन धन वारत ॥ वारे तनमन देव भूपको -- तुण्डलिया रामायण मार्ग सराहत। शिव शनकादिक ब्रह्म क्षणहिक्षया मनसुख चाहत ॥ चाहतानित शावत अदद मङ्गलमय सूरति लखल। रामजन्मसुखरसरलिक तुललिवाल नयननि चखत ॥ १४ ॥ माई बालक छानरयो दूध पियत नहि भाजु। रोवत सोवत ने नहिं दृष्ट नजरिकी साजु ॥ दृष्ट नजरिकी साजु रहैं नहिं बैठे ठाढ़े। बड़ो शोच उर भयो नौर नयन- नते बाढ़े॥ बाढ़े करूणा कौशलहि हाथ दिवाबत धायकै। पालन गोद पिचाय पथ हाल लोवाक्त शायक ॥ १५ ॥ शान्य भारो अवध पग अङ्गहि अह्म लगाय। रामचन्दू- मुखसुधाकर चितचकोर ललचाय । चितचकोर ललचाय नाद भृशौकी कीन्हे। घर घर चागम काइत बोलि कौशल्या लीन्ह ॥ कौशल्या यह बोलिक शुभ बालन पादर कयो। सुत पायमलर लाय माय हाय हास्य धयो॥ १६ ॥ लाई भाले गुम कहो जो कछु याम होय । तब गति जानत लबहिको तुमहिं कहल सन कोय ॥ सब कोई परचौ कहत बड़े योगनिधि योगी। जो भंगिहौ देही लोइ तोको करौं सुधाको भोगी। करौ सुधाको भोग जन्न अरि राम लमणके पाछे। सुनि मुनि बचन हसत मन शङ्कर सातु बचन सुनि आछे ॥१७॥ साई बालक तोर यह बड़ो भागको मूल । याके दर्शन जात है सब अन्तरको शूल ॥ सब अन्तरको शूल हरी बाते सुख पैहौ। जानु दिन नौते सुनौ एक सुनि सँग करि देहौ॥ देहो मुनि सँग लाय व्याह पनि पाती आई । दशवरघ सुवन बिवाहि सहित घर ऐहै साई॥ १८॥ साहत कर्मन करी सकल खलगण संहारन। महि द्विज पालहि सन्त शोच सुर रहि निवारन॥ करहि निवारन दोष मातुषितु शाज्ञाकारी। तोहि शिवको धनुष सुयश तिहुँ पुर कुण्डलिया रामायग्छ। बिस्तारी ॥ विस्तारौ सुख सम्पदा सुतु कौशल्या तोर सुत । वचन सृषा बोलल नहीं मानु प्रतीति सनेहयुत ॥ १८ ॥ कसो केनयो सुवनको उक्षण सबकर देखि। कौशल्या- सुखसक्त यह सन शाम बचन विशोखि॥ मन क्रम बचन विशेषि समपद प्रोति सुहावन। सोक्त जागत ध्यान नाम रसना रसपावन ॥ पावन तिरहुति व्याहि है पाते सुखसम्पति लहौ। सुयशसिन्यु साँचौ सुवन समुझि देख आगम कहौ । २० ॥ सुलह लषणको मातु सुलक्षण सुवन तुम्हारे। निज आइ नसों प्रौति प्रबल रणके जितवारे ॥ जितवारे बल बाहु गुणनि पूरे सब भाई। राम सङ्ग शुभपुरौ तहाँ सब होहिं सगाई । होहिं सगाई जनकपुर जनककन्यका निकै। सत्य जानु रानी बचन माँ ठ न कहौं बखानिक ॥ २१ ॥ सुनती अन रानी मगन सुक्ता थार भराय। लेन करो हँसि कौशला रामहि दीन छुवाय ॥ रामहि दौन अवाथ हाथ धरि देउ अशौशा। वालक रहु कल्याण डोठि मुठि डारहु खौथा॥ खौस करहु प्रभु रोग लकल अन्वन पढ़ि बानी बोलो हार सुवन हाथ जोरे सब रानी ॥ २२ ॥ बोल्यो योगी योगनिधि सुनहु कौशलामाय। डोठि सूठि अनखानि अब देहौं सकल बहाय ॥ देहौं सकल बहाय बाल कबहू नहिं रोई। पलका गोद हिंडोर सुमुख सब थल शिशु सोई॥ सब थल शिशु सुख रही होय नहि कबहू रोगी ।। भृङ्गो शब्द सुनाय चल्यो मन हँसिकरि योगौ ॥ २३ ॥ भूपति रानौ मन मगन शिशु सब अतुल निहारि । गोद मोद मन गावत्तौ राम दुलारि दुलारि॥ राम दुलारि लारिवारि तन मन सन डा। चौरकर्मको सुदिन बैठि कुलगुरुहि हँकारें। .
aur तुण्डलिया रामायणा । गुरुहि हकारि विवेक सुफल करि मङ्गलवानी। गावहि गौत विचित्ल मोदमय सूपत्ति रानौ ॥ २४ ॥ सन्तोषे मागन सकल गुरू लिय द्विज पहिराय। बालक कोशलपालक चिरञ्जीव सब भाय ॥ चिरन्जीव सब माय देत आशिष अनुकूले। प रानौके सुकृत सुतरू कहे अरू फूले ॥ फूले अवध नारिनर ते अति शानद पोजे। नाक नगर सहि- नगर नारिनर अनवांछित सब तोगे ॥ २५ ॥ ऑगल रानी चलन सिलावत चामो सुत कर लाय। गिरत परत उठि चलत हँलत पुनि रोवत रहत रिलाय ॥ रोवत रहत रिसाय कायली टोपौ डारें। सुक्तनमाल विदारि नयन भरि नौर निहारे॥ नौर निहार हँसत सुनत अति तोतरि बानी। मजत अवनको पैठि धरल लै आँगन रानी ॥ २६ ॥ सूप हर्षि करवायो रूचिलों करणवेध उपनौत। छोटे धनुष बाण कर लौन्हे सलुकाल लागे नौत ॥ ससुझन लागे नौति वेद विद्या गुरू दीन्हौ। धर्म कर्म गति अगति क्षति ऋतिमग जेहि कौन्हौ ॥ श्रुतिमग जेहि कोल्हौ जगत जाहि सिखाये सब सिख्यो। धर्म प्रकट जग करनको परब्रह्म प घर वयो॥२७॥ जाके नामप्रभावते जन्म मरणदुख जाय। वैद शेण शारद शिवा शिवको अगम दिखाय ॥ शिवको अगम देखाय भेद ब्रह्म- हु नहिं पायो। भक्तनके हित सोय कौशला उरमहँ बायो॥ कौशल्या के उर बसे दशरथ सुत कहि गावते। काम क्रोध संद लोभ दुख नाशै नामनभावते ॥२८॥ विजामिन महावरणय विपिन बसें मुनि सङ्ग। योगयज्ञ होमादि ब्रत करत दनुजं खल भङ्ग॥ करत दनुज खल सङ्ग हृदय मुनि मन्ल विचारयो। हरि अवतरे सुअवध हरन महि- कुण्डलिया पामायगा। भारन भागो॥ भारग्रो सुख उपजायकै हरि होई नयननि विषय । सरयूसरि खान करि गे दरवार महायजय ॥ २८ ॥ सुनि राजा सहसा उठे मिले धाय परि पाय। लेझाये मौतर भवन शुभ वासन बैठाय॥ शुभ आसन वैठाय नारि युत मुनिवर पूजे। उदय भयो निज भाग मोहि लय सुकत न दूजे । दूजे आपुन जानिये पदरजको सेवक सदा। कहिय लपा करि काज निज करहुतुरत मङ्गलप्रदा ॥३०॥ सुनि सूपति द्विज मिल गाय महिशोच निवारण। मम पाश्रय खल दनुज करत उतपात अपारन पार न पावहिं मुनि विकल रयन दिवस सङ्कट परै। धर्मजात श्रतिसेतु सकल बल्ल खल हरै॥ हरै विपति दारूण जबै राम लषण जो देह मति। तुम कहँ यश इनको सुफल गुनहु न मन सुनि सुमि- पति ॥ ३१ ॥ बुनते राजा लूखि गो कमलबदन कुम्हिलान। नाहन भनि दाहरो हृदय सांगहि जीवन प्रान। साँगहि जीवन प्राण राम लक्ष्मण मिलि देऊ। जाहि निरखि रहे नयन पलक निरखत नहिं लेऊ ॥ लेउ अयश पातक सबै सुनि मुनिः मनमें गुणि कहै। नागडे तन धन धेनु यहि राम दिये किमि तनु रहे ॥ ३२ ॥ १ कह बशिष्ट राजा सुनहु सुत मुनिपतिकह देहु। इनको सपा कपालको कुशल प्राय हैं गेहु ॥ कुशल श्राय हैं गेहु दनुज सब करहिं सँहारन। सिद्ध शुद्ध करि होम सुयश जगमें विस्ता- रन ॥ बिस्तारन मङ्गल सुवन पान जाति नहिं मन गुनहु । सौंपहु विश्वामित्रको कह बशिष्ठ भूपति सुनहु ॥ ३३ ॥ गुरु बशिष्ठके बचनको कैसे तजें पाल। राम लषणको बोलिक सौंपे मुनिहि कपाल ॥ सौंपे मुनिहि कपाल शौश सब M कुण्डलिया रामायण समा नवायो। कौशिक दियो अशोज मनहु जप तपफल पायो॥ एय बहाय बारिजनघन उठे मौन धरि भवनको । उत्तर क न मुख कदमो गुरू बशिष्ठले बचनको ॥ ३४ ॥ वेदमन्त दै सकल अङ्ग शत्रु नके मारण। नोंद भूख अरु प्यास माल सब अशुभनिवारण ॥ सशुभनिवारण पन्य सुपध मङ्गलमय सुन्दर। बड़ो भाग निज समुकि करत शायसु प्रभु सादर ॥ सादर पूछत वेदगति सृग तरू अधर भूमितल। पाठ करावत गुण कहत वेदमन्त्र दैदै सकल ॥ ३५ ॥ : मारयो बीचहि ताड़का एक बाण औराम। मुनि चितवत चकत खड़े गई हर्षि सुरधाम ॥ गई हर्षि सुरधाम रामको मुनि मन चौन्हे। आश्रम निज प्रभु पूछि यच आरस्थित कौन्हे॥ कौन्ह यज्ञ अरम्म प्रभु धनु धरि बाण सुधारिक। खल, सुबाहु मारीच सँग धायो धूम निहारिके ॥ ३६ ॥ दल मारे लब लमण अनलशर जारि सुबाहै। प्रभुमारीच- हिं उदधि पारकरि बाण चलाहै ॥ बाण चलाहै अफल सुफल करि होमबिधाने। वर्षत सुर शुभ कुसुम जोशत कृपानि- धान ॥ कृपानिधानहि जानिक यज्ञमाग दै अमियफल । धनुषयज्ञबल जलकके चले राम ऋणि त्यागि थल ॥ ३० ॥ गौतम ऋषिको भामिनी तनपणाण जेहि ठौर । गये लपण रघुवंशमणि सुनि कौशिक शिरमौर ॥ मुनि कौशिक शिर- पौर पूछि बुको सब कारण। दारुण दाह बिचारि पाव धरि कौन्ह निवारण कौन निवारण पावकी जय कहि उठि ति दामिनी। तुलली बिनती मृद करत गौतम ऋषिको आमिनी ॥ ३८॥ जय जय जगदातार प्रभु हरण घोर महिभार। दीनबन्धु ज्ञानव दहन सब गुण रूप उदार । सन गुया रूप उदार भजत -- ॥
कुण्डलिया रामाया। शिम शुक सनकादी। पावत थाह न चरित मध्य अन्तह नहि पादो॥ आदि जन्म जड़ बारुतकरि भई प्राप पापलाई। पाजु परसि पदपद्मरज राम सुरुत मन्दिर भई ॥ ३८ ॥ शापपापको दुर्ग कठिन रचि कर्यन राख्यो। सन बुधिचिद हम टङ्गभरे अघवस्तुनि चाख्यो। बस्तु सकल मलराशि काम सद दम्य सुभटधन । सुक्त सत्यरण जोति को झारल सवै . तग॥ तन पग सुरगुण गाय प्रभु रजवत्तद रूख अनल गहि । रिपहि सहित मम कर्म प शाप पापको दुर्ग दक्षिा ४० ॥ असिमत फलदातार देवतरूवर लमकारल। कर्मचमतिमल लाग रूपाकार कौन निवारन । कौन निवारन पाप भई सुनि घरको आमिनि। अब वर दौनिय मोहिं चरणरति दिन भक यामिति । दिन ऋक्ष यामिनि रत रही चरण हरण बहि- भार हो। तुलसिदाल वर पाय काहि जय रघुपति दाता रहो॥४१॥ लखि गति सुर सुनि हर्षि नर्षि सुमसुमन सराइन । अश- रणशरण समर्थ घोर भवसिन्धु निबाहत । सिन्धु निदाहत अग- ससुगम बरदायक लाया। कुमति तल झारख कपट कलि- कलुमनशायक कलुषं नशायक राम प्रभु तुलसिहास मजि तजि करण। मन बच उर कर्मनि मजह लखि गति र नुनिसन हरण ४२ चले हर्षि मुनि सङ्ग रामलपण मगमाहौं। वर उएबम सृग बिहँग बिटप लखि पूछत जाहौं । पूछत मुनि सब कह- त ल्हाय सुरसरि रघुराई। कहत का इतिहास जनकपुर पहुंचे जाई॥ पहुंचे शपुर निकट खखि बाग तड़ागनि अति भले । मम मम मधुप समाजयुत जनकनगर देखन चले । ४३ ॥ बापी सुभग सरोजयुक्त. सरवर विविध भराल। मानौं ३ कुण्डखिया रामाया। गणित मानलर शोला देत विशाल ॥ शोभा देत विशाल विमल जलसुधा सपूरे । शनिगया पुरट बँधान नारिनर मज्जत ইমু । মন ভাল হ জ্বলি য় ল ল লাল অ ভাত । लाइस चारिफलराधि जलजापी बापो लर सुखग ॥ ४४ ॥ सुन्दर चहुँ दिशि बाग बन कुसुमित फलित अपार । जनु सुरधरको बाटिका बसी सहित परिवार । बसों सहित परि- वार कौरकोकिलधुनि राजै। पषिकन लेल बुलाय विविध विधि पचन समाजै॥ पवन समाजै सुरभि सुख जनु वसन्त कतु गृह सघन। छह तुललिदास प्रसुपर निरखि सुन्दर चहूं दिशि बाज बन ॥ ४५ ॥ परे पति सजिलैन मत गज रथ हय राजत। कृत्य गान ক্ষুন্ন স্থাল দু ভূৰি ৰং বলল । বলল জ্বী স্কুল মুদ্র यूथनि मट गाजें। वनितादिक शुभ गान करहि सुरतिय लखि खाजै॥ लाजै लखि समरावती सुरुपुरको शोमा हरे। विवि- धवृन्द इन्द्रादि क्षुर सेन लाजि जनएर पार ॥ ४ ॥ धवल धाम चिसनिखचित कलश मनहुँ रविज्योति ॥ ভাষাগান দ্বালি पुरट प्रकट · दामिनी होति प्रकट दामिनी होति मोति मणि मालक मारोखनि। भामिनि भूषण सजत मनहुं भरतियतन धोखनि। धोखनि सन सुर- बाल सब धाम धाम सब छल नचति। जनकनगर कनिमय चकत हाट बाट मणिमय खचति ॥ ४७ ॥ স্থালি স্বল ল লম্বা সম অাল স্থলনি। মুষ गुरु ज्ञाति साथ. मुनिपद थिर बन्दितः॥ बन्दित पहि विशोकि मिले कौशिक सुनिनायक । अये विदेह विदेह निरखि दोउ सुत सब बायक। . सब लायक रघुनाथ काहि नरपति ॥
कुपलिया रामाव। २१ निजि विशालको। देखि सानुअलसूमणहि तनमनबध नर- पालको॥४८॥ निवभराव सवे प्रेमवर्क निरखत तनशोभा। लोचन भये चकोर समसुखमशिरस लोभा॥ लोमा सकल समाज परस्पर चाहत राम। धीरज धरि छप कहत दूरिक मुनि सब गुणधारी। सब गुण तेज प्रतापमय काके सुस्ताफल नवे। कादिय रूपाकरि कृपानिधि ये बालक का भये ॥ ४ ॥ के सुनिअणि चपमणि शिधौं योग यज्ञफल माहिं। गण- पति पशुपति लोकपति सम संशय सनमाहि। मन लंघय নাহি জাপানি হিমি। নন মুনম দীন নজর सुखरस सविनाशौ ॥ अविनाशौ अवलोकिये युगलरूप निज लंगरयौ। कहिय प्रकट सन्देह मन के सुनिमणि रूपमणि विधा ॥५० जयतप तरतपय जगत जलगि शुभकर्मनि। दयाक्ष- मादकनेमनिाया जाचार चार गगि ॥ चार वेद सब भेदयोग लिधि साधत योगो। आतम अनुभवक्ष्प ब्रह्मख पावत भोगौ॥ पावस भोगी योगवश लो प्रकटत कबहुँक हिये। लो मन मुनिनायक निधौं जप सपवलने प्रकट किये ॥ ५१ ॥ अलल अगोचर रूप हरि जो वरणत श्रुति शेष। जा हित विधि देव मुनि ध्यावत गणप महेश ध्यावत गणप महण घोग बलन नहिं पावत। जपतपनल कतकर्म धर्ना धन हृदय वसावला हृदय बसल बहुरूप जव सकल सिद्धि सब सुख मरि । प्रकटौ कोन सोइ रुप मुनि शलन गोचर भूपहरि ॥ ५२ ॥ कोयौं भदन विशेष सँग मुधिनायक व कौन। ऋषि तपतेजप्रतापते तेवत पड़तालौन : सेवत पलवलौन शशुको वैह सँभायो। चाहत पाए सहाय मन्त मनमानी १२ "" कुण्डलिया रामायण! बिचायो॥ चामो विधि लेवासजे युगुलरूपछवि देखिये। बारनार खूपति कह शुनि मुनि मदन विशेणिये । ५३ सदा ज्ञान वैराग्यसो त्योरहत मन मोर। ब्रह्म सच्चिदा- नन्दघन चिलवत चन्द्र चशोर ॥ चितवस चर्म चकोररुप हरि सुपतथि रानो। निरखस बालक नयन तीन सुख पात न जानो ॥ जात न जानो ब्रह्मसुल छन्यो प्रेम अनुरागलो। सो मन इनके बशरलो लखो न ज्ञान विरागलो ॥ ५३ सुनत सुपके प्रिय वचन पुलकि कहे मुनिराण। जो कालु कही सुसत्य सब तुमहिं विदित सब काण ॥ तुमति विदित सब काज राज दशरथके जाये। मखहित पाने मागिपापुके नगर सिधाये ॥ नगर सिधाये पापुरी राम लषण धनुशार भरे। महिरक्षक सक्षक अनुर सुनत भूप मानद अरे ॥ ३५॥ भाग जानि अनुराग प चले लिवाय निकैत। सादर आश्रम मानिकै पूजे प्रेम समेत ॥ पूजे प्रेम समेत निरखि नर नारि सुखारी। रघुकावखुषण देखि सराहत सुक्षत सँभारी॥ सुकलपञ्च राजा जनक कहि पुर नर पद लागही। को भाले नाके सुकत याग माग शतुरागही ।। ५६ ॥ कमलनयन প্লীহাৰি কফি घनश्याम। सुभग गौर लक्ष्मण दहन दामिनि वरण ललाम । दामिनि वरण ललाम अङ्ग अगापित छबि लोहैं। जनकनगर नरनारि चशित अद्भुत छवि जोहैं ॥ जोहैं मन मोह सकल को है पाव पार कवि। तुलसिदास बैननि कहै कमलनयन श्रीराम- छबि ।। ५७॥ देने मुनिसँग शाज बालक युगुल अनूप। भ्यामगौर- सुन्दर बदन मना मदन युमरूप॥ मनहु मदन युगरूप विरचि कुण्डलिया रामायण विधि स्वकर बलाये । निज सूझतके पुच्च जनकपुर देखन पाये। देखन शाये र दोउ विधि रचि राख्योकाज रो। सियवस्योग्य संयोग यह समुलि देखु लाहि नाज रौ ॥ ५८ ॥ सपर कहत सखि सत्य है एक कठिन ठिक । प्रस विदेहको धनुष यह उठे न गिरिसमधर्म ॥ उठे न गिरिते गरू. बाल मृदु अतिसुकुमारे। सो असमञ्चस कठिन सेटि को योग सँवारे ॥ सावर कुवर प्रतापवल सुनिगण कहत सुसत्य हैं। शम्भ प्रताप विदेहको पुण्य सजि धनु सत्य हैं । ५६ आयसु पाय सुनौधको मोर लषण रधुराय। सुमनहेत उपवन गये श्यामगौर दोउ माय ॥ श्यामगौर दोउभाय जानकी जाय निहारे। गिरिजापूजन हेत मध्य उपबन पग धारे । पग धारे नयननि लखे राजकुमार निहारिक। सो सुख तुलसी कहै किमि कहि न जाय सुख चारिक ॥ ६ ॥ रामसियाको मिलनसुख वेद न पावहिं पार। प्रीति प्रेमपर- मिति सुमिति प्रीतमगति रतिसार ॥ गतिरतिसार विचार कहत थकि रहत विचारो। सो में कहौं विवेक कवन मति गति संसारी॥ मतिगति शङ्कर शारदा कहि न सकत सुखसरसको। तुलालिदास केहि बिधि बहै रामसिया सुखदरशको । ६१ ॥ पूजि विविध विधि पाय परि विनती सौय सुनाय । आदि शन्त लयलोक तू स्वबबिहारिणि माय । स्वबन्धबिहारिणि साय मनोरथ नानति होके । प्रकट प्रभाव प्रताप अगम बरदान घचौ॥ शचौ 'शारदा हरितिया सेय सेय सब सुखमरि। जय जय जय गिरिपतिसुता विविध विनय सियपाय परि॥ ३२ वचन प्रसाद सुपाय सिय हर्षि चली निजधाम । सो छवि हृदय निरूपकरि गुरुपह. गवने राम गुरुपहँ गवने राम जानको भवन सिधाई। सुमन दिये मुनि हाथ रोम कहि कथा १४ ভিবা অন্য । सुनाई। कथा सुहाई सुनत सुनि सतानन्द आवत भये । जनकविनय कहि मोह लहि रामलणण शामिण दये ॥ १३ ॥ पाजु खूप बनि बनि चले रङ्गभूमि चिरमौर । पावक पानी पवन महि सुर नर मुनि इकठौर । सुरनर मुनि इकठौर आएको जनक बुलायो। कौतुक देखन चलिय सतानद वचन सुनायो। वचन कहे सुनि रामसो चलहु तात अवसर मले काको यश दशदिशि विड़ित झाजु सूप बनि बनि चले ॥ ६४ ॥ राम लषण कौधिक सहित सतानन्द भगवान। चले रङ्ग- भूमिहि सकल मङ्गलबोदनिधान । मङ्गलमोदनिधान नारिनर गृह तजि धाये। नगर बगरमें बाल सूपसुत देखन आये। देखि जनक परि पगनि पूरि प्रेम मानद लहित । शासन आदर देयकरि रामलपण कौशिक सहित ॥ ६५ ॥ रामरूप प देखिकै धुति मुखको भा क्षौन। रवि- সাদ দিন অনী ভভুলীনি সীন। ভলক্ষ্মীলি मलौन दौन बलहीन बिराजत। जड़खलदल दतमलेउ साधु बुर लज्जन गाजत गाजत हुन्दुभि सुमन सुर मगन नारिनर पेखिके। चकित चकित पल नहिं लगत रामरूप न्टप. देखिके ॥ ६ ॥ जो जाके उर आवना देख्यो रामशरीर। कोउ शिशु कोउ प्रशु मित्त शरि स्वामि सखा बलबीर ॥ स्वाभि सखा वलवीर धौर धरि प्रभुहि निहारें। वर्षत सुर शुभासुम देव मुनि जयति उचा॥ जयति उचारि समाज लखि जनक बुलाई जानको। सतानन्द मानौ तुरत खानि सकल कल्यानको ॥ ६७ मिथिलापुरक नारिनर सिय रघुबीर निहारि। विनती करहि विरञ्चिसन अन्चल अञ्चलि धारि । अञ्चल अन्चालि धारि देहु बरदान विधाता। राम जानकी योग्य जोरि मिल १५ कुण्डलिया रामायण । वह यह नाता नात जुरे पप्रण टरै खुपति जाय लजाय घर । यह संयोग विचारि कहि मिथितापुरके नारिनर ॥ ६८ ॥ माल जलज युग हाध अतुल विलिय पग धारी। जगल- जननि मुखखानि निरखि मोहे नरनारी। नारि मध्य बर जानको रघुवर पद अनुराग हिय । देखत सुर नर मुनि मगन दौन्हे नयननिसेख सिय ॥ त्यागि लाच रामहि लखे नयन नदिवि हृदय भरि। रङ्गभूमि सिय पग धरे जलजमाल युग हाथ धरि ६ जनक बोलि बन्दी सकल कहझो कहौ प्रण जाय। देव दनुज नहिपति मनुज सबको देश सुनाथ ॥ सबको देह सुनाथ माटदश सहल सिधाये चह दिशि हाथ पसारि सुनहु सुपति चित लाये॥ चित लाये प्रण जनकको धनुष धरतो यह रगथल। कर उठाय अझै पति बरे जानकी वाहि पत॥२०॥ हरिगिरिते गरु जानिये कमठपछते खोर। महिलंग रच्यो विरचि जनु सकल बन तनतोर॥ सकस वतन तोरि योरि सुरि गये दयानन। वायासुरसे सुभट लये भज्जित बहु जानन ॥ जान न कोउ याको मरम शिवहिछाडि को तानिये। निनबल हृदय विचारिक हरगिरिते गरू जानिये ॥ १ ॥ पसमाज प्रण कहत हौं रेखा वचन खंचाय। रक राज शिरताज सोन ले है धनुष उठाय । लेहै धतुज उठाय जगत- मह कौति होई। जयमाला उर डारि जानकी व्याहै सोई॥ सोडू धनु धरि बल ससुकि निज मुखमैं कारिख नहिं लहों। बौर धौर धनु सो गहै स्पसमाजमैं प्रण कहौं ॥ ७२ ॥ नहिं छोवै कर धनुष ये संबको कहाँ बुझाय। जिन सूप- नं रण मण्डिकै रिपुबल देखि भगाय । रिपुबल देखि मंगाय ६६ कुण्डखिया बानायगा। ॥ - गाय दिन सन्त न मानहि। परतिय परधन देत देत शठ हठ- बश प्राणहि ॥ प्राणहि देत समर्पिकै ममतावश पातक बये। कारिख लागहि सुखनमें नहिं छोवै कर धनुष थे ॥ ७३ ॥ ऐसे रूप धनुका धरें सुनहु सकल महिपाल। प्रजादण्ड परचण्ड अघ दान न कवनेहु काल ॥ दान न कवनेहु काल देव सुरु पि न मानहि । श्रीमदते मदनन्ध वेदको पन्थ न जानहि। जानहिं मातु न पितु धरम कर्म वचन पातक करें। कारिख अालहि जगावहीं ऐसे प धनुका धरै ॥ ७ ॥ ऐसे प धतु ना गहौ यानहु बचन प्रतीति।, पर रहि लावहिं जनल राबहिं नहीं सभौति ॥ राखहि नहीं समौत औत मन्तौ हित तो। पातक बाकै सेतु पुल्धसरिसर वृति ओ ॥ मान मर्दि दिन धन हौतिय बालक बध जल दहौ। कहौं पुकारि पसारि कर ऐसे प धनु ना गहौ ॥ ५ ॥ समुकि सूप धनुषहि धरौ निजकुलबलदल देखि। मातु और पितु और है धर्महि तने विश जि ॥ धर्महि तजे विशेषि शूरको लोक न जाकौ। शल समर बलवन्त लेग लौक्षण नहिं बाकौ । बाकौ कोरति चन्द्रसौ जगत उजेरो नहि करौ। माट कहत प्रण खाँचिकै समुकि सूप धनुषहि " धरी ॥ ७६ ॥ - धनुष आँगुरी जनि कुयो बल कुल शाप निहारि। सत्य सुश्त त्यागे हृदय कहत असत्य विचारि॥ कहत अलत्या बिचारि नारिवध ब्राह्मण कौन्ह आगतको सङ्कलि ऐचि द्विज सुखते लीन्हो॥ द्विजनुख दरशन करि अरमो दानि- शिरोमणि यश लियो। बदन रदन अलि लागि है धनुष ऑपुरी जनि छुयो । ७७॥ शेष समान नरेश सो धर भूमिको भारं। जाको भानु PM ॥ MM । महाशि रानायगा। बमानको तेज प्रताप एपार तेज प्रताप पार बन्द सम तिलारी। पायक सम छु तिवन्न पकातलें जलपारी ॥ पराधिकारी पवनलो बुद्धि प्रकाश पोशलो। सोधनु सुबोधको शेष सुभान नरेच लो॥ ०८ ? यहि प्रकारके टप घर शिवपिनाक परचण्ड ॥ जाको , মার্জী লা ভীষ । ভাল। চীত্ব ল কথা सुप हरि चन्दतो होई। पृथु रघुबान दिलीप रूगर मामान सो कोई ॥ वइथ याति सुमाधिसे शिविधीचा व्हप उच्चरे। बार बार प्रण उसरी यहि प्रकारके धनु धरै ।। ७६ !! कोनारायण धनु धरै पाको इनल प्रताप। घरमो लेख मन्दर पहो सथेउ तिल्ख हरि दाप॥ सधे सिनु परिक्षाप प्रमनिरखाचाहि मासो। सुरमधुकैटम बधन सुयश जगम बिल्लायो॥ विविध मांतिवसुधा लकल वलली प्रतिपालन करें। दुलो होय व्यपक्षय धरि लो नारायला धनु ध। ८० ॥ विधि समान पर चण्ड लो प्रायोहोय समाज । यहि जगको स्त्रना करि नरिवर गिरि गजराष॥ हरि लर गिरिगजराज लखुज साराह जिन बांधे। ऊंच नीच जग मुष्टि प्रबल वलती उयहि साधे ॥ साधि वेद चारो सुखनि रचो लाल ब्रह्मा- शहलो। यह कोदण्ड लोई धरै विधि लमान परचण्डतो॥८॥ कोपनि शहर धनु धरै यहि निज कोलो पान। मिपुर दतुजवाहन जगत हतो एकाहीवान। इतो एकाही वान सदन लन रिलले जायो। चन्द गगन शिरु धरै यस सूरज व्यति मामो मारमो दुख सब जगतको जाल सलै पत्ती हदें। आयोजी रूप रूप धरि कौनिमाकर धनु धर ॥२॥ भवनायक सो होय जो लो धनु धरै नमान। जाको पूजे प्रथम सुर विघ्न हरणकोबान . विन हरणकोनान ध्यान हरि - ३ -- कुण्टखिंचा रामायण । हर बिधि साध । ज्यहि सुमिरणते सिद्ध सिद्धियोगहि अवराधै। प्रवरा| गिरिजा सुवन फल पावहि सुखजोहि जी। लोपिनाक यह कर धरै गणनाथकसो होयजो ॥ ८॥ शशि सूरज दिगपाल सब सुर सुरपति अहिपाल। यत सर्प गन्धर्व सनु भनुज दतुन यसकोल ॥ मनुज दनुज यक्ष काल पिल मुनि सिद्ध समाजै। गिरि लसुन बसु अरुत्त जहां लगि सकल बिराजै॥ सकल विराजे सब सुनत ज्यहि बलहोय लो उठडशन। धरि धनु अण पूरो करो शशि सूरज दिग्पाल सब।। ८४॥ बैठकले उठि उठि लगे सुलत साटकबैन । असिमानी भानीमहिप क्षियो हिये पतिचैन। कियोहिये अतिचैन देवबल इष्ट लभायो। कटिपट हल करि दण्ड सुजनि को जोर प्रचायो। जोर प्रचार निहारि अट अरूण नयन पालन सजे। कहाँ धतुज तृण प्रणवहां बैठकले उठि उठि सजे । ८५ ॥ धनु न नयो बर कटि नयो तमकि छुये धनु आनि। पांव न- वै शौशाह नभई प्रवल बलहानि ॥ भई अंबल बल हानि मान सुख कोसन खूख्यो। तनमैचल्यो पखेद अधर दल विद्रुम खस्यो। लख्यो विद्रुम वदनमो देह दमानिद्धल भयो। लोचन मन दूनो नये धनु न नयो कर कटिनयो । ८६ ॥ एकत एकै घरै करै शनेक उपाय। बैठे ठाड़े, मध्य परि धलुक हुँचाउनखाय.॥ धतुक हुँचाउनखाय विरध बन्दोगणा बोलें। बैठहिं शोश नवाय नयनपतकै नहि खोलें। नयन करेलाट कहि मातु जनेकहुंतरू तरे। कोदो की अहारकै एकतजै एकधर ॥ ८॥ धनु धनसबको हरि लयो मति गति नामसदाप । घश को- रति बल बोरता धीरज तेज प्रताप ॥ धीरज तेज प्रताप नियम- ॥ " मुण्डलिया रामाचंगा। प्रत्त धम सुकभनि। मन्त्र शस्त्रकोहारिप छु ति लाज काज गनि लाज काज परगाज धरि राजनि धतु कर सोझियो। रोते बीते लब भये धनु धन सबको इरिलियो॥८॥ गाजि गाजि धतुकर धरयो सानि ताजिगेसाजि । लाजिलाजि बलदल सवै राजा राज समाजि ॥ राजा राज समाज भये सुख जोवन लायज्ञ। सम्पति सवै गवाध करतो शार धनुधायक ॥ धायक आलन परगये जनुतनबला धनु रालि हो। लाजि लाजि बैठे सकल गाजि गाजि कर धनु धरयो । ८६ धनु सुसेरते गरु भयो उठेन कोटि उपाय। तिल न टरै भूपति लरै धरै घरै लपाय ॥ धरै शरै लपाय जायँगड़ि अधिक धाम। जयो शेषले शीश ईश जतु चढ़नो कलामें। कलाक्षप कैलासको धरणि रूप धतुको लयो। उदय अस्त- गिरि भार धर धनु सुसेरते गरु भयो ॥६॥ शोध बचन बोले जनक रूप बल पौरुन देखि। प्रण प्रमाण देखन सवै शाये भूप विशेखि ॥ शाये सुप विधेखि अनुज सुर मार सला। तिल भरि सके न टारि धनु घरमो धराम । धरा नछटो धनुमते बच न कालो सूपति तनक। बोर धीर धरणी नहीं शोध बचन बोले जनक ॥ ६१ ॥ प्रण हमार मिध्याभयो जाहु सकल प धान। निधि नर च्यो बैदेहि वरु परुण न कोऊ बाम ॥ पुरुष न कोऊजान तो तो प्रण यह धरतो कहा। कन्या रही कुमारी यह भई हास्य जगमहा ॥ हास्य भई बसुधा सकल घरहीन सब जगठयो। जनक सभामें कह वचन प्रण हमार मिथ्या भयो।२॥ लषण लालको लालमुख सुने जनकके बैन। फरक अधर प्रलापको अरुण भये द्वाउनैन । अरुण भये द्वउ नयन जोरि ন ৭ ৫ कुण्डलिया रामायण! কী ভয়া। এটা লিখিী শ্রী দুদ জী ফি মুর্থ। লাহ [ ৪ন্তু ভন বল লী? যম যন্তু। হই হ য় ন জ্বা । । কুন্তল ভীথ সহী হু হল শীল। স্নহ पायसु पायो तनक घरौं चौदहोशौन॥ धरौ चौदहीमौन হল ল শ হ াহী। সিল ভদলিত মুঘর অন দ্বীর্ঘ নখ নষ্ট জল ছাব্দে দী। এম বি ভিংলি ছ স জী জুই | 23 একদিন শুভ ল অম্ভ স শ্রান্ত হী। ঢিল শাহি দল জহীহ ভুলি লীলগুলি ভিন্ন স্থীবি মালী। লিজিবি হাজ্ব কাল ঘল নং বিহালী? শালী হল মৃনাল 0 শাড়ি ঙিনাহ । গা চুল ভাল লহী কাছির উত্তপ্ত নী গল শ॥ 3, B ভাল ছিল না অগ্নি পত্র প্রকা। কিন্তু খুব লুসি হঃ ছিন্নি অফা ( ইংৰ কিমি অঙ্গ জ্ঞা জাতী ভিত্ব দুলালী। ষ হয়ূথনি জল বীজ কী হচ্ছে জা বাণী। বিসি ঘৰ্ক জুহুল ফল মুক্ত গ্রী। বলা হয় সঁম্বা স্কুলি অলক মীম মুম্ভ জী। এe B कौधिक मुनि शायदयो सुनहु राम रघुबौर। धनुष ভাল ক ছু ভলক্ষী দ্বীহ ত্বীয় স্বাক্ষী হ্মী লিষ্ট। ফল স্কুঞ্জ, সুতি গুড় বাজিম জ্ঞাহী। স্কাৰ হৃঙ্খ অস্থিত্ব স্বত্ব ভি এ লিজ হ’লী স্ত্রিী। কী সুখী ত্ত = ীঘি লি গ্রাখিী। ২৩ । ভূছু কাকলী साथ- - कुएंडखिया रामायण कारि प्रणाम रघुबंश मणि उठे यथा मृगराज। जोर जोरि कर सुमना छवि शिरताज । तुममा कति शिरताज संचते चले गोसांई। पुर जन पुण्यसमारि लॅसारि देव दुन्दुलि बजाई। दुन्दुलि बाजों अलि धनी बन्दीजन धन्य धन्य सनि। सभ्य वेदिका पर गये करि प्रणाम रघुवंभ पनि ॥८॥ पटकात धनु लक्ष्मण बस्यो जान्यो प्रभु मन बात। क्या परणि धारी लबै सजगहूजिये गात ॥ सजगहूजिये गात तुण कौधशादरेरो। जो महि चलौली सृष्टि विकलता सबनो हेरो॥ हेरोले घुवंशामणि लेत धनुष सनमें लखो। लटकाल सही संभारियो पटकत धनु लक्ष्मण लख्यो ॥ ६ ॥ वाल अंगूठा पांथदवि वाम हाथ गहलिीन । दमक दामिनी ज्यों कर सबके नयन मलौन। सबके नयन सलौंन बैंचि कौंनो नमनाई। शब्द रखो ब्रह्मांड खण्ड वैधयो गोलाई ॥ धयो गोसाई शंभु धनु शब्द सुने योगी खराड खण्ड धनु तन भयो वाम अंगूठारे लगे।। १०० ॥ शिव शिव वृषभ पुकारई धनुष शब्द सुनि घोर दिग्गज दिग्पालन भयो हृदय कस्य अति जोर ॥ न्य शति जोर बन्य कैलाल ईशयल। মিৰ মিহ বুখ सरि धार उलि आकाश गयो जल ॥ गयो सुजल आंकाश- घल उमा गणेश विचारई। कहा सयो कोतो भयो शिव शिव वृक्ष पुकारई ॥ १० ॥ जय जय जय रघुवंश मणि सुर फूलन वर्षाय। वेद विप्र वन्दौ विरद नारी मङ्गल गाय ॥ नारौ मङ्गल गाय सिया जयमाल उठाई। शोभित प्रभु उर मध्य बिखूब कौरति जगे।
२२ कुण्डलिया रामावण । जनुहाई। कीरति गावहि सिद्ध मुनि बल प्रताप छवि रुप अनि । सतानन्द आनन्द कह जय जय जय रघुवंश अनि ॥ १०२ ॥ पगण भये मतीन सब सन्त भये आनन्द। जनक शोच संकट गयो सिया मातु सुख वृन्द॥ सिया सातु सुख वृन्द निछावरि मणिगणदेहौं। रामसियाछवि देखि प्रेम बशकौन न केहौं॥ कौन न केहौं दान सब समय शंभु धतु टूट जव। तुललिदास संकट गये कृप मन भये मलौन महा मोद मिथिला पुरी राम कियो धनुसङ्ग। मलीन सज्जन सुखद सुरसु सुमन शुभरङ्ग ॥ सुरसु सुमन शुभरङ्ग कपट सूपति मन पाखे। लक्ष्मण उठे सोध राम मारत बचि राखे ॥ बचि राखे रघुवीर पतिय प्रकटौं जुहुतौंदुरी। राम लिया जोरौ निरखि सहा मोद मिथिला- पुरी॥ १०४॥ कर कुठार परशु रामक आये सुनि धनु मङ्ग। गौर रुप अनुरूप शिवजटा अस्स संवंग ॥ जटा महा सर्व देखि सकुचे सब राजा। लागे करन प्रणोम काल निज समुलि समाजा॥ समुकि समाज पिनाक लखि को वचन अरि कासके। यहिं तोयो बोल्यो तुरत कर अठार परशु रामके।। १०५ ॥ तोग्रो धनु रघु बंश अडिजाको प्रबल प्रताप। हानि कहा भय रावरी कहिय प्रकट करि प्राप.. कहिय प्रकट ' करि आप देव द्विजवरको नाई। पूजिय मानीय तुम्हे मापनी वृद्ध बड़ाई:॥ बृद्धबड़ाई तवहिं जगगाय विप्र पद पूजि. अणि। देहु आशिषाप्रेमसों धनु तोरसे रघुबंश मणि ॥ १०६ २२ पुण्डलिया रामायण । काल श्य.वोबत कहा गुरुको धनुष विहंड। विप्रन ऐ- सोबोल सुनु टप हाल शिरको खंड ॥ टप अल शिरको खंड परशु करतो तीक्षण धात। धतु ज्यहितोमो आजुतासु सुजकाटन वारा॥ काटनवारा परशु यह ज्यहि काटे सूपति महा। लहि समेत रामहि हतौ काल वध्य बोलल कहा ॥ १०७॥ भूपति मिले नखेलमें तुम्ह बिन अल देव। हते तुम्हारे इति शयेते द्विज पद विन सेव॥ ते द्विज पद बिन लेव क्ष धर्भ नते होने। ते तुम काटे परशु र कपटी जड़ दौने ॥ जड़ दोने प तुम हृते पाप राशि नहि शेतमैं। ताते बाड़े भवनमै भूपति मिले नखेतमें ॥ १०८॥ चल विहीनी महिकरी परशु वार इकबील। सो न विदित लहि बाल जड़ तुरत जाइहै खौल ॥ तुरत जाइहै खौल बचन मुख बोलु सँभारे। गुरू गुनही सो मौन ताहि तू पोछे डारे । पाछे बचहुन कालकैबालक लखि करि वर टरौ। परशु धार ज्यहि काटिहौं क्षत्र बिहीनी महिकरी १०८॥ द्विज कुल के नाते डरौं सुनहु विप्र सत भाव। नत क्षली कुलको सकल लेहुँ तुरत अबदाव॥ लेहुँ तुरत अबदाव परशु धनु भूमि गिराऊँ। धर्मबड़ो रखवार मारि द्विजपात क पाऊँ । पातक पाऊँ शौशपर दूजे रघुपति कर डरों। यमघर तुमहिं बसावतो द्विजकल केनाते डरों ॥११०॥ ले अठार सन्म ख धनो राम लषणको और। कौशिक बर जो बालकहि मोहिं नहीं अबखोर ॥ मोहिं नहीं अब खोरि करौं अब काल हवाले। परशु बन्यो खद हाथ .
२४ दाण्डलिया रामायगा। विएल सुपति घर पाले १ घर चाले शिर मालिका शंकरको पूजन करो। अब चाहत तव शिर इघो लैजठार सन्यु रक्षा भयो ११॥ राम कही कर जोरि सृगु बाल कमल दिनेश। बालक दौन बिचारि उर बोन कौजिय लेश ॥ क्रोध नकौजिय लेश बाल हापराध विहौनो। धनुकर समते टूट चकतों महौं अधौनो॥ महौं अधीनो कर्म व बांधिय दीजिय कोरिक। दास बिचारि प्रभाव मोहिं राम कहो कर जोरिक। ११२ ॥ शंभु दण्ड खण्डित करो सो सुज खण्ड हुआज। जो कर परशु प्रचण्ड लखि कटे सावनिक राज। कटे अनिके राज बजछु नहिं दीन उपायन। क्षलवंशतनपाय बचन मुख मृदुल सुभावन॥ मृदुल सुसायन क्योंबचौधनु तोरत नहि तब डयो। अतुज सहित मुंजकाटिहों शंभु दण्ड खण्डित करो ॥ ११३ ॥ क्षल बंश द्विज यानिये लषण कहीं हँसि बात। हमपे पापन होय 'द्विज जननी कोन्ही घात। जननी कीन्छौ धात ताहिते मन अति बाहो। बड़ बैरी रण इत्योबिरद पायो शिर गाढ़ो। गाढ़ो पाय पाप शिर तासों रिसनहि ठानिये। तुम्ह भारिको बाघल है क्षत्र बंश द्विज मानिये ॥ ११४ ।। र कुठार कुपिठत अयो गयो स्वभाव सोध। अरि प्रचण्ड दहि अवनि बुप कीन्हो हृदय प्रबोध ॥ कौन्हो हृदय प्रवोध शकत अरि देखत ठाढ़े। उत्तर सुनत सरोष मोर हृदि ज्वालन बाड़े। ज्वाल न बाड़े जरत उर घोर धारको ले गयो। 'काटि काटि कण्ठनिक तखरी काठार कुण्ठित भयो । १९५॥ .
शएटरिया रामायग! २५ .. जो ध्पति प्राशन करें तो द्विज देहुँ देखाय। रग- भयाली कठिनता तुनको बिमाधमको दिउँ का परशु धन लख्यों तुम्हारों। भूमिशेल ने पार भारि बारन उर फारों ॥ बारन उर फारों साक्षि विप्रघात पातक परें। समा समेत विचारिये जो रघुपति शायन करें ॥ ११६ ॥ लषण वचन कहि धन लियो नयन लयन वारि राम। बाजे तुम वालक निपट सृशुपति सब गुणशामा सृगुपति लब गुण धाम ताहिसों लमलरि कौजे। जाको पदरज सेव्य आपने शिर धरि लोजे। शिर धरि खोजे रिस सपा अनुज शिखावन प्रभु दयो। सुखरुख राम निहारि नत लषण बचन कादि ध लियो॥ ११७ ॥ अस समर्थ भृगुवंशमणि सुररक्षक द्विजपाल। महि- मण्डल इस गनि करो निक्षल विशाल को निक्षल मही तत्तल दई विप्रो हाथ। रुधिरराड तर्पन कियो तेई सुगुडालनाथ ॥ तेई भृगुकलनायके चरण शरण सेवा सुमति। अभय होय तिहुँ लोकमहँ अस समर्थ भृगुवंश- पति ॥ ११८॥ जाके पदरजके धरे सुद मङ्गल कल्याण। समयकरन सज्ञटवरन गावतवेद पुराण। गावत वेद पुराण कल्पतरू लम सुखदाता। हरिहर पूजत्त जाहि पर्न सुखदान्दि विधाता॥ दानि विधाता जानिकै निशि दिन सेवन जे करें। अर्थ धर्म कामाविको पद रज सुख जाके धरै ॥ ११६ ॥ काल व्यालता सो डरत के इन पद प्लेम। यहै लिया यह योग है यहै योग जप नेम । यहै योग जप नेक कपट तजि मन वच कायक। सोइ सुश्रुती सोइ शूर जाहि द्विज भक्ति अमायक ॥ मायक छल तजि पूजि पद तन मन ४
auy
॥
पुण्डलिया रामायण ।
धन लेवा करत। जीव जाल दुखमाल सन काल माल
का डरला १२० ।
सो शिलोका पावन परम जिनके द्विज पद जोति ।
विभ्रम प्राप्ताको नहीं दिशा विदिशि लम जौनि ।। दिशा
विदिशि सब जोति मोह रिपु कटक अगावै। घशदायक
गुण ग्राम राम अनुजहि समुक्तावै॥ राम बुझा अनुजको
चलबंश याही धरम। परन नित हित धिर अरे सो
लिलो पावन परम १२१ ॥
राम सिखावन दुहुँ सुन्यो लजस और भृगुबा । मति
गति सुरति सँसारि उर ब्रह्म सच्चिदानन्द।। नहा सच्चिदा-
नन्द भयो द्वप सुत सावतारी। शारंग करमै दियो विविध
विरती पानुसारी विविध सांति पातक लगै कटुक वचन
मनमें शुन्यो। परशुधरन पुनि लजण हराम लिखावन दुहुँ
सुत्यो॥ १२२
हए सभोत उठि उठि चले परशुराम गति देखि।
आशिल भृगुपति देय करि मानद लयो विशेखि मानद
लयो विशेषि जनकपुरजन सब रानी। बंदी मागध सूत
उच्चरहिं अङ्गाल बानी। मङ्गल बानी पुर भई बाजि उठे
हुन्दुभि अले। सन्त लुभा सुनगण मुदित टप सलील उठि
उठि चले ॥ १२३ ॥
समय पाय कौशिक कहेउ जनक महीप जुलाय। सजा
सकल मङ्गल सुभग दशरथ पति बुलाय ॥ दशरथ पति
बुलाय व्याह कुलरीति सँभारी। माड़ा रचहु विचित नगर
यह गलौ. सवारी॥ गलौ लँवारहु अगर मय सव' सतर्क
संशय दहेउ चार पठाइउ अवधपुर समय पाय कौशिक
कहेउ ॥ १२४॥
चाण्डलिया रामायण सत्तानन्द अवधहि चले जनपत्रिका हाथ। और भौयुत मणि पदिक सशस सङ्गाल लाच ॥ सकल मजन्म साध देखि रघुपति पुर पावन। सुपति लियो इंकारि दोह पलिका सुहावना दोन्ह पलिका प लखौ राम व्याह- महल मले। गृह यह बजे बधाव पर सतानन्द सबमहि चले ॥१२५॥ रामजानकी माह सुनि साजो सूप बरात। रघ तुरह सातङ्ग वनगजवण्टा बहरात ॥ गजघण्टा बहराल दुन्दुभी धुनि चहुंओरन। मझल भरिभरि थार भामिनी गान साकोरन. गान लाशोर प्रमोद पुर सुरतिय जय जय सुमन धुनि। दश- रघधी घरपति सख्यो रामजानकीव्याह सुनि ॥ १२६ ।। कुल विचार व्यवहार पारि गुरूआयसु नप पाय । निधिला. पुरको सालियो भूप निशान बनाय ॥ सूप निमाग भजाय सगुण सुन्दर शुस पाये। बीच बाल करि विविध जनकपुर सूपति माये ॥ सुपति शाये जनकपुर प्राति उछाह आनन्द सहि। दुहुँ समाज संगम सुभग बाल विचार व्योहार करि ॥ १२७॥ असा स्मा ब्रह्मायणी पतिन सहित पुर आँध । जानको रूपनि देखननो ललचाय ॥ देखनको ललचाय निरखि मायके बारे। भनवचक्रामवशप्रेम भये सब देखन- हारे ॥ देखनहारे से गगन अधित्तिधि मङ्गलदायनौ। लिय बिवाहतकसलन उमा रमा ब्रह्मायनी ॥ १२८ ।। सुघल सूप डैश दियो कौशिक लक्ष्ाण राम। पाय खबरि पितु आगमन चले हर्षि गुराधाम ॥ चले हर्षि गुणा- धाम मुदिस भेटे रघुराई। सुनिपदरज धरि झुप भरत भेटे दोलभाई ॥ भेटे पुरजन गुरुद्विजन राम देखि पूरण हियो। ..
२८ वाण्डलिया रामायण। धिसिधि सब मङ्गल लिये सुघलप डेरा दियो । १२६ ॥ सखि नुप सँग छै और क्षुत गौर सुभग सुठि प्रयास तषण महरले एक हैं एक सत्य जनु राम॥ एक सत्य जलु राम कहे जे नयन निहार। वैसहि वदन मयंक नयन वैसहि रतनारे ॥ वैलहि लक्ष्मण राम बि तैसे बल छवि देह दुत। नाम भरत रिपहन कहत सखि नृपलँग द्वै और सुत ॥ १३० ॥ सखि विदेह ससुक हिये तौनि रूप में कौन । चारहु कुवर विवाहिये यहि पुर छप परवीन ॥ यहि पुर नुप परवीन दौन विधि चारि सगाई। जस कन्या तस कुवर योग शिव दौन मिलाई॥दौन मिलाय महेश विधि बड़ो योग चपतप किये। तो सब पुर सुश्ती समुकि सखि विदेह ससुम हिये ॥ १३१ ॥ चारि कुवर तिरहुति चलें पाय सुभग ससुरारि। कहुँ दिन दश कहुँ मास भरि देखि टुप्त नरनारि॥ देखि तृप्त नरनारि जाहि पुनि दुलहिलि चारौ। कछु दिन वै उल रहैं जनक बोलि हैं अमारो॥ जनक कुमारी आय हैं अवध शंडि अपने थले। बनि बनि दिन दश वौसम चारि कार तिर- हुति च । १३२ ॥ ये बातें बडि पुण्यते सखि पुरवै विपुरारि। तौ विरचि हमहौं रच्यो सुकृत टूट दिन चारि ॥ सकल ट्ट दिन चारि चारिप कुवर विवाहौ। माड़व तर निहारि लेह जग जीवन लाहौ। जीवनलाौको अवधि यह सुख देखहि धन्य है। विधि कख प उर जो वले ये बातें बड़ि पुण्यते ॥ १३३ ॥ सखि सुरती ताही गर्ने रामलमण छवि देखि। ताते -'पुर सुल्तो बड़ो आये अवर विशेखि ॥ आये कुवर विशेखि नारिनर भे सुख भारे। दर्शनफल तत्काल भूप दशरथहि निहारे । दशरथ राम निहारि कै दूलह दुलहिनौ पनि बने। 4 क्षण्डखिया रामावण। यह विवाह देखहि सुनहि सखि सुक्रती ताही गने ॥ १३ ॥ व्याह घरो विधि लिखि दई वर्षि सुमन सुरु गाय। राम विवाह उछाह बड़ देखन चले बजाय॥ देखन चले बजाय सतानंद जनक बुलाये। दशरथ सहित दरात जनकमन्दिर चति माये॥ मन्दिर चलि आये सबै पाउड़ परि जय जय भई। कारि उत्साह समाज शुभ व्याघरी विधि लिरिक दई ॥ १३५ ॥ को वितान सुखमा कहै जिहि थल सुखमा आहि । नटत किंकरी लक्षमी रुख जगवत पल जाहि ॥ खख जुगवत पत्त जाहि जहाँ दुलहिनि वैदेही। विधि हरिहर यम इन्द्र होत चितवं हित तेही॥ चितर्फे हित तेही कृपा दूलह औरघुपति रहैं। समधी दशरथ जनक सम को वितान सुखमा कहैं ॥ १३६ ॥ इन्द्र ब्रह्म दूनो मिले बन्दी वर्णत माय । लब समाज सब साज सो हमें प्रत्यक्ष दिखाय॥ हमें प्रत्यक्ष दिखाय यहै उपमा जिय आवै। नारि सहित सुचमारि राम व्याहन मुख गावै॥ रामव्याङ्सुख देखही अमरावति संयुक्त चले। निज निज पर सुरगण लहित इन्द्र ब्रह्म दूनो मिले ॥१३७ ॥ राम सुभूषित जगमगे माड़व मध्य समाज। माथे सुक्ता औरझवि नखत सहित निशिराज ॥ नखत सहित निशिराज नारिनर देखत शोभा। रघुपतिमुख शशिशरद निरखि रवि दृप्त न को भा॥ रघुपति मुखबि शरदशधि नयन- चकोरनि लखि लगे। मदन कोटि शत वारिये राम सुभूषित जगमगे॥ १३८ ॥ मुनि वशिष्ठ अरु सतानँद भरद्वाज जाबालि। अनि भगस्ति सुगर्ग क्रषि कश्यप मुनि तपशालि । कश्यपमुनि तपशालि देव - - ॥
कुण्ड लिया रामायण । महषि सनक देते। लोरश या चिरजीव व्यास पाराशर जैत । पाराशर कोषिका सहित गौतम शुक उच्चरत पद। वेदमन्त करणो कर सुचि मिठ जि सतानंद ॥ १३ ॥ सूरजकुलालि सा कह पावन माहुति लेय। गणपति कर पूजा करें विधि विवाह कहि देय ॥ विधि विवाह कहि देय पवन पुनि शेष महेया। सुरपति सुरगणा सहिल अगन दिग लखत रनेशा॥ लखत रमेश सुदेश चबि राम सबहि जानत रहैं। विप्रवेष बेदन पढ़ें टूरज कुलगति लब कहैं ।। १४० जनक लगन रानौ सबै सुनि बशिष्ठ वहि दीन। सतानंद आनो सिया सूषण लजत नवीन ॥ सुषण लजल नवीन राम ढिग अख्यित कीन्हौ। मुनिवर अवसर समुकि शान्ति श्रति मग कहि दोन्झौ॥ दोन्ही दुन्दुभि अतिघनी सिय मण्डप आई जब। दस्थ समा समेत सुरु जनक मगन रानी सबै ॥ १४१ ॥ पूजन लगे शाखोचार उचारि। रानी नुप मन मोद भरि लैको परशु चिवारि॥ लैको परशु बिबारि नारि वरमङ्गल गाई। कन्यादान विचारि देव फलम बारि लाई ॥ फूले तस नप सुचतकै चरण प्रक्षाला सुख जगे। निरखि बदन दम्पति मगन जनक पार्यं पूजन लगे । १४२ ॥ जे पदपकज प धरे जे शिवमान सहस। जे पदपकज मृदुत रस सुनि संकुल अलिवंस ॥ मुनि संकुल अलि बंश प्रकट कौन्हौ जिन गङ्गा। वरात वेद पुराण प्रणतहित विरद अभङ्गा॥ विरद अभङ्ग प्रसङ्ग श्रुति मुनि लियन पातक हरे। अज सनकादिक ते भजे जे पद पङ्कन नृप ॥ १४३॥ ॥ जनक पाय AU झुण्डलिया जामायण। दिनकराव समको सुकत नदत देव मनमाहिं। निखि अगर कोतुक पराजय जय कहहिं लिहाहि !! जय जय बाहिं खिलाहि वचन कहि चार संबार। नानारिन हानि कप नेहवाश देह विला ॥ देह विलार रूपको व्याहताह लोयन रुकत। कोशलेश मिथिलानगर जनकराय समको सुकत ॥ १४ ॥ होन लगौं वर सावरी दुलहिनि ललित ललाम। दूलह सुन्दर लावो शशि नुखपङ्कज राम ॥ शशिमुख पाहाज रामनाम सखि सबल गावहिं। मुनिगण भावरित करहिं गनि जियनि बतावहिं जगन मोद भावरि परै रोनी तन मननावरी। सब अनचार विचार कार होन युगौं वर भावरौ ॥ १४५ ॥ হল লিকুলহি জী আল সুকা মদ্যি বস্তু নি। সঙ্গে धन पूरो भयो जनु जुवारि यव धान ॥ जनु जुवारि जव धान जनकनन्दिरते भावें। जुनि वशिष्ठ के वचन नेग गदि ताहि दिवावें॥ नेग साधि आहुति दई माह अयो लब कोउ भने। देव भूप रानौ जनक राम निछावरि को गने ॥ १४६ ॥ । जेहि विधि रामविवाह भो सो कहि सकहिं न श्रेण सम्पत्ति शोला सुख सुभग मङ्गल मोद सुदेष ॥ मङ्गल मोद सुवेन साजु शुभ सकल समाजें। कहि कहि थक गणेश व्याल जिन श्रुति पथ साजै ॥ श्रुतिपय साजै ले चकित सोढ़ विनोद उशाह भो॥ तुलसिदास सो किमि कहै जेहि विधि रामविवाह भो १४७ ॥ जनक कौन जो मुनि कहेउ सब कन्यका विवाह । भरत सखुसूदन लषण दूलह करे उछाह ॥ सुलह करे उछाह लपति दशरथ सुख पायो। रामव्याह विधि शोधि मुनिन देवनि करवायो ॥ देवनि करवायो सुकृति दूलह दुलही '.
कुण्डखिया रामायण। सुख लह्यो। जोरि चारि निहारि सुख जनक कौन जो सुनि करो ॥ १४८॥ मघा सेष दशरथ नये याचक दादुर मोर। सर सरिता द्विजगण भये बाढ़ि चले चहुँ ओर॥ बाढ़ि चले च शोर शालि जनकादिक रानौ। पुर परिजन से कणी सुखी सुख सुन्दर पानी ॥ सुन्दर पानी 'द मणि भूषण पट वर्षत नये। राम सिया पावस सुखद मघा मेघ दयरथ अये १४ ॥ वर कन्या राउन चले सुनि प्रायशु अल दोन । सुप समाज समेत लब जनवासे पग दौन ॥ जनवाले पग दोन बजे हुन्दुभि शति भारी। दुलहिन दुलह ल्याय भवन शासन देनारी । दूलह दुलहिनि लम निरखि रानी सुख सानो भले। रहसविवध लहकौर कृत बरकन्या राउल चले ॥ १५ ॥ रमा उमा गावन लगौं लै मातुनको नाम। धरि कपोल लह कौरकत करनि खवावत राम ॥ करनि खवावत राम अलाहल मङ्गल होई। नेक अनेक प्रकार सलचकहँ प्रकटत दोई १ प्रकटत तिय वचननि कहैं रामसौय प्रेमनि पगौं। कहत कैकयौ कौशिला रमा उमा गावन लगौं । १५१ ॥ सिय खूधी तुम चतुर हौ रमा कयो मुसुकाय। सुनि- तियको नाई कहूँ कौजिय नहिं रघुराय ॥ कौजिय नहिं श्धुराय सोय सिख सुनहु हमारी। पद कबहूँ जनि यो पर्वानको सुगतिनि नारी ॥ ॥ नारौ चारि विवाहिये एक धनुष दलि गथ लहौ। रमा कहत रघनाथसों सिय-सूधौ तुम चतुर हो॥ १५२ ॥ हासविलासविनोदमय नेग योग करवाय। राम उठाये भवनते शिविका रुचिर चढ़ाय ॥ शिविका रुचिर चढ़ाय कुण्डलिया रामायण। my गये। दुलहिनिन सहित सुहाये। दुन्दुभि देवन पुछुप राम जनवाते आये॥ जनवासे देखत मगन भूप दोन लखि द्विरद हय । पोषे याचक विविध सुख हासविलासविनोदमय ॥ १५३ ॥ पटरस चारि प्रकारके भोजन विविध बनाय। सतानन्द आपुदि जनक दशरथ चले लिवाय ॥ दशरथ चले लिवाय पावड़े अर्घ सुहाये। मणिसिंहासन रूचिर झरस भोजन परुसाये॥ ओजन परुसाये सुदित लिधगण गानविहारके। मुनि दशरथ भोजन कियो षटरल चारिप्रकारके ॥ १५४ ॥ पान मान प्रसुदित दये गये विदा जनवास। गहराई वाजी दुन्दुमौ मङ्गल सोद विलास ॥ मङ्गत मोद विलास बरातिन मन्दिर भूले। जनक प्रौति रज सट्टद् रामकृषि पावस फूले ॥ झूले गज याचकन गृह पहिरि पाय मन्दिर जान रायरघुपत्ति सर्बाह पान मान प्रमुदित दये ।। १५५ ॥ तौनि मास दशरथ रहे नित नव प्रादर होय। विदा- साज साजी जनक सवको सुखरुख जोय ॥ सबको सुख- रुख जोय सहल दश खंदन साजे। मुक्तामणि गणसुपट ऑड कछनके राजे॥ मणिगण लागे मत जे ते ते रथपूरे लहे। जनकराज दायज सजे तौनि मास दशरथ रहे ॥ १५६ ॥ दिग्गज सहसपचासलौ सजे जरकसौ साज। मणि- सुक्ताको मालरी झपे सोह गजराज ॥ झपे सोह गजराज जरोजरकसौ अमारी। तिमिर अरुण इकठौर मनौ पावस अँधियारो॥ पावस अंधियारी सघन घण्ट शब्द सुरबासलौ। जनक राय दायज सज्यो दिग्गज सहसपचासलौ ॥ १५७ ॥ तुरौ लाखदश बर सजे बरन बरनके जौन । रचतुरङ्गते अति भले चञ्चल सुभग नवौन ॥' चञ्चल सुभग नवौन अलंकत - mm. ॥ वाण्ड खिया रामायया। भूषण राजे। बरन निदरि अन्वेग रङ्ग रङ्गानि बनि साजे । वनिवादि साजे वाजिवर जिनहि देखि सुरक्ष्य तने। जनक- राय वावज सज्यो तुरौ लाखदश वर सजे ॥ १५८ ॥ हममवृन्द दशलाखलौ सुन्दर सब सृणधान। पूरा शन सण्डित पुरट सोहत ललित ललाम ॥ सोहत ललित बलाल सये लोजन पकवाने। लौरभ सृगमद सलय अगर अलामो थाने ॥ शगर कुमकामा रस भरे सापे जरकाली आखलौ। जनकराय दायज सज्यो वृषसवृन्द दशलाख- लो॥ १५ महिषी लाखलतानवै देश देशको खानि। मनौ श्याम- घनके सुबन महौ चरै सब शानि॥ मही चरै सब शानि दूध घरनी धसि धारे। दङ्ग कण्ठ मणिहार विशुन घ्यावत सुकमारे । प्यावत सुक्कामार थलनि दूध सुधार विधालवै। जनवराय दायज सन्यो महिषौ लाखलतानवै ॥ १६० ॥ धे लाखयुगमानने कामधेनुसौ रूप। शलवार मणि- गण वसन सोहत परम अनूप ॥ लोहत परम अनूप दूध दूधौ मुठि करो। संगशिशुनके वृन्द सकल शुभ लक्षण- पूरौं। पूरी छविको को कहे जेहि देख्यो सोइ जानबै। जनकराय दायज सज्यो धेनु लाखयुगवानबै ॥ १६ ॥ शिविका लाख बहत्तरी सियदासी असवार। मनहुँ काम- तिथ लिपट्टी करि षोड़श ङ्गार ॥ करि घोड़ा घटनार 'जानकीपिय अधिकारी। सन गति रति परवीन चतुरविद्या छवि भारो॥ निवा छबि लतलाब उर लिय सेवा उनमत्त रौ दालौवायजप लज्यो शिविता लाख बहत्तरी ॥ १६२ ॥ 'सवालाख पिञ्जर लग्यो कञ्चनखचित विचित्र। शुक शारिका मराज बहु जाहीबाज शुचिमित्र ॥ कुहीबाज शुचि- ॥ ॥ ।
वाएडलिया रामायण मिल लिया सचिले प्रतिपाले। ते लेवक सब लिये जानकी लेबलवाले ॥ सेवनवाले भाग बड़ जगतजननि जेहि जग इयो। तासुसन यह कौन बड़ तवालाल पिञ्जर ॥ सच्चो॥ १६३ ॥ -- जट सजा अरु पूजानको लेखा गनो सिराय। जे प्रिय लियक रूप लग्यो नगर बाहर जादा नपर बाहर जाय अमरावति घरी। दुल्दुलि दये सहन्न त अरू चमर घनेती॥ चार घनेरी भवन पट बायन विविध विधानको। दायज दियो नवे गई जट सजा पस बानको ॥ १६॥ रानिन सुला सवारिकै करुणा सौख सुनाय। पति- व्रतधर्महि हा धरेहु सेयह लहज तुलाथ ॥ लेयतु सहज मुलाय होहु नित स्वामिहि प्यारी। सदा सुहागिन होहु यहै शाशोश हमारी ॥ धहै भावीशा देहि इन सुता भक उर धारिके। सेंटि सेंटि पायन परें रानी सुता सँवारिकै ॥ १६५ ॥ जनकनयन धारा बहै सुता लिये उर लाय। लिय कण्ठा छोड़त नहीं जनक न त्यागी जाय ॥ जनक न त्यागौ जाय सचिव ससुकावत राने। धीरज धर्मपरान ज्ञान गुण ध्यान समाजै॥ ध्यानसमाज न लाज रह चुटल लगत रोवत है। आतु गरे पनि पितु गरे जनक नवन धारा बहै ॥ १६६ ॥ विदा हेत रघुबर गये जनकरायले धाम। रानिन लखि बासन दियो कीन्हे राम प्रसाद ॥ कौन्हे शम प्रणाम कहल मृदु वचन सुहाये। निक्षा दिजोये भातु पति चह नवध सिधाये॥ अवध सिधाये सुनल टप रानी सुख सूखत अये। बचन न सुख पङ्कज कादयो विदा हेतु रघुवर गये ।। १६७ - २६ चापडखिया रामायण - रानी रघुवर पाय धरि कहत वचन भरि नयन। तुम्ह सहत सुनि योगि जन घटघट तुम्हरो भयन । घटघट तुम्हरो झायन सकल गति जाननवारे । दौजिय प्रभु वर युगल प्यास यह हृदय हमारे ॥ हृदय हमारे तुम बसौ कहीं दूसरी विनय कारि। सुता किङ्गरी राखिये रानी रघुबर पाय धरि ॥ १६८ ।। करि प्रणाम रघुपति चले रामलहित सब भाय। सुता चढ़ाई पालको सुन्दर सौल लिखाय ॥ सुन्दर सौख लिखाय भूप पहुँचावन आये दुन्दुलि दौन बजाय सुनिन देवन शुरा गाये॥ गुण गाये पाये सबनि सगुन सुहावन अति अले समधी अँटि प्रणामकरि करि प्रणाम रघुपति चले ॥ १६६ ॥ अवध पांचये दिन गये बलि बसि सकल सुवास । पुरप्रमोद आवत सुने रहसविवश रनिवास ॥ रहस विवशर निवास पहिरि नारन रानी। भारति मङ्गल साजि गीत जावहि मृदुवानी॥ वानी मङ्गल सजि सबै कलश चौक चामर नये । अवधनाथ मुखको अवधि अवध पांचवें दिन गये ॥ १७ ॥ परिजन करि मौतर गई पुलबध सुत्त लाथ । मङ्गल मोद समाजयुत आये कोशलनाथ ॥ आये कोशलनाथ पुरी हर्षित नरलारी। पुत्रबधू सुल देखि मगन तनमन महतारौ ॥ मह- तारी वारहिं सुलग झूषण पट मणिगणमई। सुमग सिंहा- लन चारि धरि परिछन करि मौतर गई ॥ १७१॥ मुनिनायक जो जो कहेउ सो सो करि व्यबहार। दान दोन विश्न मुदित अरि भरि कञ्चनथार ॥ भरि अरि कञ्चन- धार मामिनी मङ्गल गावें। रानौ भूषण देहिं सकल आश्विना चुनावै॥ आशिष देहि सनेह भरि शम्भु उमा परसन रहेछ । राम भाय दशरथ सुखद रहैं सदा मुनि जो कहेउ ॥ १७२ ॥ रामबिवाह बखानई मोदसमुद्र उछाई। नारद शार.
कुण्डलिना रानाव वर शुक गणपतिको अवगाह ॥ गणपतिको शवगाह व्यास विधि कहि कहि हाले। अनिशानुरूप बखानि भजनको भाव विचारे ॥ मतिअनुक्षय बलानिकै गिरा सफल निजु मानई ? बुलसिदालके कोन मति रामविवाह वखानई ॥ १७३ ॥ । इति बालकारायः समाप्तः ॥ अयोधयाकाण्ड। अण्डलिया॥ अवध अनन्द प्रबन्ध सुख दिन दिन शति अधिकाय! जबले राम विवाह करि आये कोशलराय ॥ नाये कोशल राय सुवन सब आनंद करे। ऋधिसिधिसम्पतिनदो अवधसागर भरिपूरे ॥ सागरलप्त समानली गयो शोक मारू दोन दुख। अमरपुरी महिपुर धरधि आवधि अनन्द प्रवन्ध सुख ॥ १ ॥ दशरथभाग सराहई सुर मुनिवर नरनारि। धर्म- धुरोण प्रतापनिधि जिन पाये सुतचारि ॥ जिन पाये सुतचारि जासु यश वरणि न जाई। श्रीरघुपतिमुख देखि हर्ष अति लोग लुगाई ॥ लोग लुगाई गुण गनत शाद सो सुन चाहई। पुरो माग अनुराग सुर दशरथ माग सराहई ॥ २ ॥ पसों विनय सुनायकै केकय वन सप्रौति। भरत- हेतु विनती करो कहि. मृदुवचन विनौत । कहि मृदुवचन विनौत दिवस दश रहैं गुसांई। मुनिहु कहे छप पाहि भूप - - ॥ दाण्डलिया रामायण पठये दोउ माई। सुनि रुखते आयसु दियो भरत उठे चिर नायकै। वोकयत ले भरत सँग पलों वितय सुनायकै ॥ ३ ॥ बिदा रामके चरण धरि भरत शहन भाय। सातु गुरु माता पहि चले लबहि शिर नाथ ॥ चले लबहि शिर नाय सुसट सेना सँग लीन्हे। श्रीरघुपतिपकमल हृदय मन मधुकर कीन्हे ॥ अनमधुकर पदकमलरति सुमिरतनाम सनेह भरि । धन्य भरत भूतल भये बिदा रामके चरण धरि ॥ ४ ॥ नारद आये अवधपुर रामचरित हित जाहि॥ प्रेम नेम जाके अवधि रामरूप उरमादि। समरूप उरमाहिं राम देखत उठि धाये। पूजल विविध प्रकार जोरि कर प्रसु घिर नाये ॥ प्रभु शिर नाये बूलियो सुनि प्रकटो विधि हृदय जुर । कहन बिरञ्चि संदेश सब नारद आये अवधपुर ॥ ५ ॥ रामबचन सुषि मुनि गये पाय बचन बिश्वाश । राम प्रकट माया करो सबके हृदय प्रकाश ॥ सबके हृदय प्रकाश गुरुहि छप जाय सुनायो। रामतिलक करि देहुं नाथ सबके मन भायो॥ सबके मन भायो सुखद सुनि वशिष्ठ मानद भये। तिलकलाज लाजी सुदित रामभवन युनि मुनि गये ॥६॥ टप बातें प्रकटौं सबै सुनि रघुवर समुदाय। नेम क्रिया व्रत धर्म टप तिलक भेद विधि गाय तिलक भेद विधि- गाय कहेउ भूपतिहि बुलाई। मङ्गल वस्तु अँगाय तिलकको घरी सुदाई । घरौ सुहाई कालि है राम राज्य बैठहिं जब। बाजे विपुल धधाम पुर पनाते प्रकटौं सबै ॥ ७ ॥ राम हेतु मङ्गल रचौ आनौ तौरथ नौर। पान फूल फल झूल तृण हय गय मणिधन चौरः॥ हय गय मणि धन चौर पुरौ सुन्दर रचि राखौ। बन्दनवार पताक कला चौकै - दाण्डलिया रामायण। अलिलाखौअमिलामो समझम अगर बौथो केरनिसों लची। मणिस्य दीप प्रकाशिये रामहेतु मङ्गल रचौ ॥ ८ ॥ देखि देव शोचत भये अवध रामको राज। दुष्ट कष्टको नाशि है निश्चय यो प्रकोज ॥ निश्चय भयो अकाज समिरि शारदा बुलाई। राम विपिन कह जायं मातु सो करहु उपाई राम विपिन कह जायँ जब उपाय अधि बलमये। चरण गहैं पातन करो देनि देव शोचत लये ॥ ॥ -- धिक धिक देवन कहि चली आगे हेतु विचरि । अवध गई रानी नहीं देखी सुमति सँभारि॥ देखी सुमति संसारि तहां परवेशन पायो। कण्ठ मन्थरा बेठि तासु चित हित भरमायो॥ हित भरमायो तेहि सबै प्रिया कयौको अली। एर दुखदायिनि सौ सई धिक धिक्ष देवन कहि चलौ ॥ १० ॥ नगर देखि बातें कही हित तोरनको पाल। मोहिं शोच एक उर भयो जो फर मानहु बात ॥ जो फुरु मानहु वात हिलू हेतो दुख जाने। काज नशात विचारि विना पूछेहु बखान बिनपूछे प्रभुके वचन इन वातै पातक नहीं। उत्तर देत नहिं दोष है नगर देखि बातें कही ॥ ११ ॥ इन ठौरनि पूछे बिना कहै. स्वामिसों दास। सर्प अब बरि विष अनल अनिल बाट दुवात ॥ अनिल कण्ट दुर्वाल अशन पप अपच जनावै। लामहानि दुखदानि कहत पातक नहि शावै। लामहानि नहिं बोलई प्रभु जायसु रूख निशि दिना। स्वामि सुहागिलि देहि - सिख इन ठौरन पूछे विना ॥ १२॥ मोहिं भामिनी दुख भयो समुकि एक उत्पात। सब पुरको नौको लगे तुम्हें भरतको घात ॥ तुम्हें भरतको धात
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मुफलिया रामायए।
बान टपरानि विचारौ। कालहि राम प होहिं भई शोभा
पर भारी॥ भारि विपति विचारिकै हृदय मोर दुखयुत तयो
भरत विदेश नरेश पर मोहिं भामिनी टूख अयो ॥ १३ ॥
विपति बौन साङ्क र सयो बयो कौशला शनि। पावस
न्टप उर देखि शुभ आया सुन्दर पानि: भाया सुन्दर पानि
अवधथलसुत बल पाई। गुरु पुरजन ले वारि तुम्ही नित
कौन्छ उपाई॥ कौन्ह उपाय सहाय सब भरत तेज तप सो
गयो। चारि दिवस गत देखियो बिपति बौज अङ्कर
भयो ॥ १४ ॥
सल्य मानि रानी कहै कहु सखि मोहिं उपाव । भरत
गये असगुन भये सो सब यहै प्रभाव ॥ सो सब यहै प्रभाव
सुहदसम में सब जानौं। सवति ईरषा छाडि पुत्व पति
आपन मानौं । धापन मानि न कछु कहिय, छप मलौन
उमरन चहै। हिलू जगत मेरी तुही सत्य मानि रानी
कहै ॥ १५॥
कहि सुखाय रानौ बदन जनि मन करसि मलीन। द्वैवर
तेरे छप चहैं लेहि मांगि परवौन ॥ लेहि मांगि परबीन
देखि हा वचन न डोले। राम विपिन सुत राज्य सत्य कारि
पसन बोलै ॥ राम विपिन जब जाय हैं भरत भूप होई
सदन। सरति हृदय यहि भाति दहि कहि सुखाय रानी
बदन-॥ १६ ॥
मन प्रतौति रानी भई लई सौख उमानि। जो कछु
सन रघुपति चहैं सोई सत्य उर आनि ॥ सोई सत्य जर
मानि कोपके भवन सिधाई। दुर्गति करि तन दशा मनई
यमधुरते आई॥ दशा पनहुँ प मरणको धरणि कुलक्षणको
गई। देवि कारौति सुनौति सिख मन प्रतीति रानौ भई ॥१७॥
दण्डिखिया नाचायण। ४१ -- हान कहि वह कमेबल केहि जग बम नहिं लीन। पवन उमायो काहि नहिं को हम इसी न दोन ॥ को दुल मुखौ न दोन मोहमद केहि नहि वाघ्यो। मान्वर नहिं जयो कामघर जाहि न साध्यो । काहि न साध्यो भोपदल केहि न चल्यो तस्वीलरल। चितचिन्ताश्यालिनि बचा कान करहि यह कर्मबन्द ॥ १८॥ अवधपुरी अमरावती वाले विद्युत वभाव । सबके उर मानन्द अति रामतिलक सतिसाव !! रामतिलक सतिसाव लाक समया रूप पायो। सरल सुहृद प हृदय केलयो ग्रह बलि बायो । बायो मुनि रिलो लइन बदन पौल भय झावतो। नधनाथ स्तुत्पति लरिल अवधपुरी अमरावती ॥ १६ ॥ सो दशरथ कस्यहि हिये काम प्रताप वलीन! जानी वश वंय लोकमह केहि अनर्थ नहिं कौन॥ कोहि अनर्थ नहिं कोन चन्द्र सुरपति गति देखो। टप दिलीए सुनि शा, ययातिहि चित अवरेखो॥ चित भवरेखहु कामवल तीनिलोक मेदित किये। ताको घर प उर गड़को सो देशरंथ कन्यत हिये ॥ २० ॥ देखि जाय रानी विकलं भूमि प्रायन लन दौन। पट घुरान लूखे अधर नयन अरुणरंगं पीना नयन अरुण पौन मनहूँ दुईशा अनैसौ। विपति नारिक रूप असति जसि प्रकटति तैसो॥ प्रकटति वचन बदनमहँ कुमतिलाज धरि छल कुथल। सूप सभय पैठे भवन देखि जाय रानी विकलं ॥ २१ ॥ क्रोध कौन कारण कियौ गजगामिनि वरनारि। जो मांगलि सोडू देउँ तोहि कामादिक फलचारि॥ कामादिक फल वारि तोहिं परतौति सदाई। तेरे सुखको हेतु तिलको aur .
an
४२
शुण्डलिया कामायण।
घरी शोधाई॥ घरी शोधाई तिलकको अवध लोग सुनि
सुनि जियो। करि प्रवोध प पाणि गहि शोध कौन कारण
कियो॥ २२ ॥
उवि बैठी बोलत भई झरि कटाक्ष सुसुलाय। सूप न
जानै सुहृद हदि नारि चरितको भाय ॥ नारि चरितके माय
विधिहु नहिं जाननहार। है वर थाती देख चौर हल तजे
तुम्हारे॥ तजे तुम्हारे दानिता कहाँ थपछ खाँचौ नई।
फिरि न टरे कहि उच्चरी उठि वैठो बोलत मई ॥ २३ ॥
शपथ सत्य लखि काह चलि वचन बमङ्गलसूल। देह
एक बर प्रथम यह मरतराज्य अनुकूल ॥ भरतराज्य अनुकूल
दूसरो मागहुँ सांई। चौदहवर्षविशेषि राम बन मुनि की
नौई ॥ मुनिको नाई जाहिं बन कालहि राम तौं अति
अली। मोर मरण अपनो अयश शपथ सत्य लखि कहि
॥
चली ॥ २४॥
अनि भूपति उर अति दल्यो बन हृदय जतु लाग।
सुख सुखान लोचन सजल प्राण विकल भय माग ॥ प्राण
विकल अथ भाग सूदि राखे दोउ लोचन। शोक दाह उर
ढहत कहत कछु बनत न शोचन ॥ बनत न शोचन सुख
वचन बनहु प्रेत कर्मनि छल्यो। धुनत शोश व्याकुल शिथिल
सुनि भूपति उर अति दल्यो ॥ २५ ॥
भये बिकल सुनि टप कहो बचन लगे जिमि बान। सत्य-
संधता मन किये को देन बरदान॥ कयो देन बरदान
बचन किन खो सँभारे। कौशल्यात सुवन भरत नहि
सुवन तुम्हारे॥ सरत सुवन पठये कुथल रामतिलकमानंद
महा। साधेउ छल तंस फल सहौ भये बिकलसुनि प
कहा॥ २६॥
दाणलिया रामायणा । ४२ नधन उघारे रूप कहत ससुकि प्रिया वर सागु। सरत सूपको तिलक पुर तामें लगे न दागु ॥ तामें लगै न दागु राम बन पठति काहे। कौन लाग सपराध राम सब साधु सराहे ॥ साधु सराहे नारिनर अब पचर्य छाती दहत । ताते समुनि विचार करू नयन उघारे सप कहत ॥ २० ॥ ये न वचन टरि हैं न,पति भरहु उजारि पुर जाय। अयश प्रमधि विधना करहि अघ रविबंश नशाय ॥ अध रविवंश नयाय होय पुर काल हवाले। कलह कपटको लागि अवनि लागि जाय पत्ताले ॥ अगि पताल अवनी घटै रवि शशि रेंगाह उलटिगांत । विधि हरिहर नापहि कहैं ये न वचन टरि है नुपति ॥ २८॥ अनल चन्द वर कबहुं शीतल सूरज होय । शेष तजे धनी धरन ससुद विना जल जोय ॥ समुद विना जल जोय शशिर चन्द्र प्रना। तिमिर दहै रवि रूप वृद्धकर दण्डहि डारै ॥ दगडहि विधि नग सृष्टि सब नारायण मिटि जाहिं कह। ये न वचन नरपति टरे अनल चन्द ब कबहु ॥ २६ ॥ राज्य न पाहै भरत पुर लागो तोहिं पिशाच। मोरि मृत्यु बोलत बचन तंव सुख चढ़ि शिर साँच॥ तव शिर चढ़ि करि साँच राम नृप होवहिं भारौ। तुहि कलङ्क दुख भोर मिटहि कबहुँक नहिं नारी॥ नारी करि चित चाहिके वचन मोर जिय जानि फुर। राम सूप सेवक अतुज राज्य न चाई भरत पुर ॥३०॥ बसौ अवध नृप राम हैं यह जानत सब कोय। मोर मरण भो भामिनी यह सुख लख्यों न सोय ॥ यह सुख संख्यों न सोय सत्य जिय जानेसु आमिनि। मौन जिये बिनु बारि रामबिनु नियों ने भामिनो ॥ नियों न चामिनि ॥ ।
- 88 कुण्ड खिया रामायण दिन वृथा जानि मरण परिणाम । लू प्रसागिनी तन्तु लियो बली अवध नुप राम है ॥ ३१ ॥ राम राम कहि नृप गियो अमति न मानी बाल। अवध वधान अनन्द बड़ नौंद न लागो रात ॥ नौंद न लागौ रात कालहि शुभ घरी सुहाई। देख्यो जाय सुमन्त भूप गति मति विकला। सति विकलाई देखि लखि कुचाल आतुर फिरो। साये राम लिवायकी राम राम कहि नप गियौ ॥ ३२ ॥ पितु उठाय बोले बचन नृपति लौन उर लाय। नयन नौर धारा धसै वचन बोलि नहि जाय ॥ वचन बोलि नहि जाय राम पूछो महतारौ । कहति कठोर कुबैन कथा करणौ कटु मारी। कटु सारी सो हेतु सुनि तन प्रसन्न कह मृद्ध वचन। लघु उपदेशत दुख महा पितु उठाय बोले वचन ॥३३॥ राउर चरण प्रतापले बन जुन्न भङ्गल मोहि। सुनि तौरण क्षेवन दरश और पर्महित होहि ॥ मोर पर्महित होहि जाल दिन बिलम न लागे। भातुर ऐहौं नवधि धरन पनि बरन लागे॥ धरन चरन पुनि शाय हौं आया देवय कापते। अगल क्षेम घर नायही राउर चरण प्रतापते । ३४ ॥ उत्तर कढ़ेउ न सूपमुख राम धरे नूपपाय। कुमति कठोर अवचन कटु मातु कहत सुलक्याय ॥ मातु कहत सुलक्याय हृदय कोडत नहिं राजा। करि प्रवोध शिर नाय विपिनकी साजि समाजा! साजि समाज प्रसन्नमुख महे मातुपद प्रेम सुख । हाल चलत व्याकुल गिरयो उत्तर कदमो न सूपमुख ॥ २५ ॥ मातु गोद मोदति भरी कहति वचन अानन्द । काहि लिखक नुप सुख सन्चो कितिक बार सुख वृन्द॥ कितिक वार सुख वृन्द लाम लोचलून सब टौ। सिंहासन सिर पुलिया रामायण सहित निरखि रविशतद्युति छूटो॥ रविथतधुति जुटी अवधि मधुर लाल भोजन धरे। न्हाय खाउ बड़ बार सो भातु गोद सोदति मरे ।। ३६ राज विपिनको मोहिं यो जहां मोर बड़ काज। राउर" चरगाप्रतापते अशज आइ हौ साज॥ कुशल आइ हौं साज सातु आशिष सोहि दोजै। जान दिवस नहि बार हर्षि मन आयसु कौजे ॥आयच कौजे हर्षिके मातुचरण प्रभु शिर नयो। कह भृद्ध दुहु कर जोरिक राज विपिनको मोहिं दयो । ३७ ॥ सहमि सुखानी मुनि वचन सिया धरे यग आय। राम बुझाई जानको विपिन विपति सब गाय : विपिन विपति सक गाय सुनत लक्ष्मण उठि धाये। कहि कहि विविध प्रकार लपण सिय प्रभु समुझाये॥ समुझाये प्रथमहि सिया करि विवेक बन प्रिय सदन। उत्तर ककुक न सिय दयो सहामि सुखानी सुचि वचन ॥३८॥ धरि धीरज कह जानको सन समुकिय रघुराय। कण्टक- बन दावा अनल अनिल ब्याल दुखदाय ॥ अनिल व्याज दुस दाय व्याघ्र वृज अहि गज घेरे। सूकर भालु पिशाच विषम बन भय बहुतेरे ॥ . बहुतेरे उत्पात जे उरन दहे भय प्रानको । प्रभु वियोग छातौ दह धरि धीरज कह जानकौ ॥ १८ ॥ विपिन आपु सँग अति सुखौ डासि पात तरू छाह। गिरिगण सरि सरवर सुदित धा जित नहिं दाह॥ क्षुधा तृषित नहिं दाह निरखि पदकमल तुम्हारे। श्रमपथ तन- क न लेश सकल विधि प्रभु रख्वारे ॥ प्रभु रखवार बिचारिये तजे जीव जानिय दुखौ। त्यागिय मोहिं विवेक कारि विपिन बापु सँग अति सुखो। ४० ॥ प्रभु. सुखपर नहिं प्रण करौं उत्तर दीन्हे पाप। तजौ तौ ॥
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चाण्डलिया रामायण
कहा बसाय पिय समुकि बिचारिय माप ! समुकि विचा-
रिय आप प्राण तन त्यागि निवारौं। प्रभु सँग जाइय धाय
देह घर राखिय डारों: राखिय डारौं देह घर बहुत कहत
पातक डरौं। सत्य मन्त्र मन दृढ़ धरों प्रभु मुख पर नहिं
प्रण करौं ४१॥
तुम लक्ष्मण मानौ कही राम सिखावन देत। मात.
पिता पुर शोच सब नाशहु वसौ निकेत नाशाहु विघ्न
शानेक अवधपुर भरतहु नाहौं। सुप बुद्ध नरनारि दुखित
मम दुख मनमाहौं । दुञ्ज मनको दूषण तजौ मानि मन्त्र
राख्यो सही। दूषण देइहि मोहिं नर तुम लक्ष्मण मानो
कहो ॥ ४२ ॥
प्रसु वनमें हौं घर रहौं प्रायसु तज्यो न जाय। प्राण
बायु ममबश नहीं देह कहौ तहँ जाय॥ देह कहौ तहँ जाय
आर यह कापर डारौ। मैं सेवक शिशु कुमति चरणरज
सेवनवारौ। सेवनबारौ रज चरण धर्म नीति मग किमि
लहौं। अवध काम मेरो कहा प्रभु बनमें हौं घर रहौं ॥ ४३ ॥
मातुचरण रघुवर नये बिदा मागि कर जोरि। पश्न धार
धाई धरणि माता कहति बहोरि ॥ माता कहति बहोरि
कठिन उर फाटत. नाहौं। ठाढ़ी देखत नयन राम सुत कानन
जाहौं। कानन जाहि बिशेषिकै सबके सुख सुरुति गये।
भेटि लाय उर यह को आतुचरण रघुबर नये ॥ ४ ॥
गुरुपायन पुर सौंपिकै लोन लषण लिय साथ। · चले
भूप संदिर जहां विदाहेतु रघुनाथ ॥ विदाहेतु रघुनाथ राय
उठि हृदय लगाये। नयनधार अन्हवाय राम बहुबिधि
समुझाये॥ समुझाये टप राम बहु सिया प्रेम उर तोपिक।
लषण भोट सुपति गियो राम चले गुरु सौंपिके ॥ ४५ ॥
कुण्डलिया रामायण । ४७ तन्तको करि प्रणाम रघुपति चले त्यागि अवध सुखमूल। सब- को सार सँभार करि सेटि मोहमय शूल। सेटि मोहमय शुल लोग सब व्याअल भागे। रामविरक्षको आगि नारिनर उडि सँग लागे। सँग उठि लागे नारिनर कालम गुण दल दले। शिर धरि रानि बखानि कटु करि प्रणाम रघुपति चले ॥ ४६॥ भूप चलाय सुमन्तको सिखदै यो पठाय । सुनत सचिव आतुर चल्यो त्यन्दन तुरत बनाय ॥ त्यन्दन तुरत बनाय बिनय करि राम चढ़ाये। तमसातौर निवास प्रथम दिन रघुपति बाये॥ प्रथम लोग तजि प्रभु उठे सचिव साधि रक्ष गये राम जिय जानि सब सङ्ग बुलाय सुमन्तको ॥ ४७ रामबिरह दावाअनल भयो अवध वन घोर। पुरवासी रुग सृग लये हैं सुखौ सब ठौर ॥ रहैं सुखौ सब ठौर- कैयौ भई किरातो। ज्वाल बड़े चहुँ भोर जरति निशि दिन तन छाती॥ अवधि मेघको आश उर रहि न सकत तप कठिन थल। सो उपाय ब्रत जप सुहृद रामविरह दावा- जनल 8८॥ राम गये सुरसरि निकट क्षेवट परम हुलास। वचन सुमन्त बुलायले बोले राम प्रकाश ॥ बोले राम प्रकाश तात भब सवध सिमावे। पितुपद गहि मम ओर होशल सब विधि ससुमावे। ससुमाये कहि कोटि विधि तदपि परयो लहट विट। चले कर्मवश सचिव पुर राम गये सुरसरि निकट ॥ ४ ॥ मागी नाउ.निहारिक राम कहे मृदु बैन। सुनत बात केवट कहै सुनिये राजिवनैन.॥ : सुनिये राजिवनैन रावरी ७८ एक खिया रामायण पदरज खोटौ। मानुष उड़ि उडि जाल काठको गति है छोटी॥ गति है छोटो मोरि प्रभु बात कहौं डर डारिके। रज मानुष कर भूरि का भागहु नाउ निहारिक। ५० ॥ तरनि होय मुनिको घरनि मरे लाल परिवार। कोटि रौ बानन को कहो बचन सातबार ॥ कहो बचन शतबार नाउ नहिं तुम्ह कुमाऊ। पापने कुलगी हानि होय जो तुम्हें चढ़ाऊं । तुइ चढ़ाऊं नाय जन चरण प्रछालों निज करनि । बिन धोये न चढ़ाय हौं तरनि होय मुनिको घरनि । ५१ ॥ चरण प्रशाल बिलम्ब कह राम को सुसञ्चाय। पानी आन्यो दुहु करनि धयो कठोता माय । धनो कठोता आय गाय पुनि धोक्न लाग्यो। देवन बर्षे फ्ल कहत यहि समको माग्यो। यहि सम बड़भागी कहा चित्रविरचि पदकमल चह। अन्य धन्य कहि सकल सुर चरण प्रहाल अाटुम्ब सह । ५२ ॥ कौन पार परिवारको चरण सुधाजल . प्याय। पौके पार उतारियो निज कर कोशलराय ॥.. निज कर कोयल- राय उतरि लिय सहित बहोरौ। केवट लोन बुलाय लेह उत्तराई थोरौ॥ उतराई थोरी लहो तोहिं भयो श्रम पारको। दौन देखि मोहि दोन बहु पार कौन परिवारको ॥ ५३॥ ते पद धोये झाजु मैं शिव विधि योग कमाहि। जिन चरण नको थेन श्रुति बरणत निधिदिन जाहिं ॥ बरणत निशिदिन जाहिं प्रकट कौन्हौ जिन गङ्गा। अशरण शरण चुनौत पगनिको बिरद अमगा। मिरद अभंग, प्रमाणको धोये जनक समाजौं । सकल सिद्ध सिद्धन दई ते पद धोये प्राजौं ॥ ५४॥ बिमल भक्ति बर दे चले राम लषण सिय सङ्ग। बन गिरि सारिसर ग्राम पुर देखत मृगजु विहङ्ग। देखतः भृगजुबिहङ्ग ४६ । कुण्डविया रामायण । ग्रामपुर निकसहिं जाई। देखि कहिं नरनारि रामसिय शुन्दरताई ॥ रामलिया सह अनुज युक्त देखि भाग तिनके मले। प्रम नेम जप योगफल बिमल सक्ति बर दे चले ॥५॥ एक कहत सुख चन्दसों भामिनि भाव त मोहि। कला कोश शशि शीतकर सौता कलित सजोहि ॥ सोता कलित सजोहि च्याम रेखा शशिमाहौं। लिय मुखपर लट श्याम शुभग बरणत कवि ताहो ! वरणत कवि मृगअङ्क कहि यह सृगनयन अनन्दसो। ताप हरत यह शशिमुखौ एक कहत सुख चन्दसों ॥५६॥ एक कहति सुख कमलसो और न पटतर ताहि। अरुण सुवासित अति मृदुल सो सियमुख अवगाहि ॥ सो सिय- सुख अवगाहि शौत सुत वह यह सौता। कवि वरणत हैं वाहि याहि मुख सुयश पुनौता ॥ सुयश पुनौता हुनको अमर मित युग सुयललो। और कहाँ उपमा लगै एक कहति मुख कम- लतो॥ ५७७ सौतामुख सो मुल कहौ कमल चन्द्र सो नाहिं। कमल मन्द है रजनि चुति चन्द मन्द दिनमाहि ॥ चन्द मन्द दिन- माहि राहु हिमिथच सदाई। सौतामुख अरि नाहि लोक- तिहु खोजहु जाई॥ लोकति महँ विदित है घट बढ़े निशिदिन लहौ। कमल चन्द पटतर कहाँ लोता सुख सो मुख कहौ ॥ ८॥ एक कहैं पुर धन्य है मातु पिता पुनि धन्य। जिन देखे ते धन्य हैं जहाँ जात धन धन्य ॥ जहाँ जात धन धन्य बिटप गिरि सरि सर जेते। खग सृग निरखत धन्य बसत थल बैठत तेते ॥ बैठत तेते सङ्ग हँसि बोलत चितवत धन्य हैं। धन्य पथ वन धन्य हैं हम देखत अति धन्य हैं ॥ ५६ ॥ ७ कुण्डलिया रामायगा। । . राम लषा सोता सहित देखि प्रभाव प्रयाग। न्याय दान दोन्छे द्विजन प्रौति लहित अनुराग ॥ प्रोति सहित धनुराग दर्थ सुख समदिन पाये। दुख सुख सबको देत पाठ पिआश्रम आये आश्रम आये सुनत ऋनि अरद्वाज शानद लहित। शासन आदर मुनि करो राम लषण सौता सहित ॥ ६० ॥ राम तुम्हारे दर्शते यह फल प्रकट दिखात। नेम प्रेम जप योग तप तोरथ व्रत दुख गात ॥ तौरथ व्रत दुख गात आजु लब सुफल हमारे । राउर शागम लहत नयन मुख सुखद निहारे ॥ सुखद निहारे सुख अयो तौरय राउर परमते । भयो सो सङ्गल परम राम तुम्हारे दरशते ॥ ६१ ॥ सार,प्रयाग नहायके राम ललण सिय साथ। चले सनो- हर मनहरन वन्दि चरण मुनिनाथ ॥ वन्दि चरण मुनिनाघ सइन रति पनि मानौ। ब्रह्म जीवके मध्य लसत माथा इनि जानौ॥ माया छबि लय देखिधौं उमाशंभु गण नायक। चले किधों सुरपति शचौं भोर जयन्त लिवा- घक ॥ २ ॥ पम्य चरित सिघ राम को सबसुख मङ्गलदाय । लण सियदर्थ ते खग मृग मुखौ सुभाय । खग मृग सुखो. सुभाय परमपदके अधिकारौ। को न लहै सुख सहल सुखद वर बदल तिहारौ । वइन निहारि सप्रेममय भरयो पर्म सुख धामको। गिरि तल खग सृग नारिनर देखि चरित सिय रामको।। ६२ ॥ बालमौकिपाश्रम गये सिया लषण रघुराय। श्राये सुनिवर मिलनको भेटे हृदय लगाय॥ भेटे हृदय लगाय पूजि परिपूरण कोन्हे । आप्तन अादर देय फूल फन श र दोन्हे ॥
वालिया पलाया। ५२ । पर बोन्हें अमिय लग सुति आनंद मन भये । सकल लिव माधन सुफल वाललौकियात्रम गये ॥ ६४ जाके हित मन गोम सित साधत साधन भार। मोह- महाडिक गया तजे अनिभि जागत याम । सहनिणि जागल जाम जापनप योग बिरागे। मानस ब्रह्मणि रूप रहन निशिदिन तुरागे॥ निशिदिन अनुरागे रह ज्ञान ध्यान मन्दिर लहित। नो प्रत्यक्ष सूरति लखौ जाके हित मन गोन लिन ॥ ६५ ॥ गम को कर जोरिकै सुनिनायक सुनि बैन। सात्रल पावन दोजिये जहा करौं शुचि अयन॥ जहाँ करौ सुचि जबन दिवम का तहाँ बिनाऊ। जानत कारण साल का कदि प्रकट जनाऊँ । प्रकट जनाऊँ मात्रम न देहु सुनो निहोरिक। चलिय कृपा करि देहु सुनि राम कहेउ कर- जोरिक ॥ ६ ॥ ज कहत सुन्दर गिरिगया सरित बन दोख जाय मुनि सङ्ग। महातम पर्म थल देखि होय दुख भङ्ग ॥ देखि होय दुःख सङ्ग मुखौ खगसृग बनचारी। तरूवर फलित विभाग सुधालन सुन्दर वारी॥ सुन्दर जल थल निरखि यह चित्रकूट मङ्गल सरित। पावन करिय विहारथल सुन्दर बन गिलिगमा सरित ॥१७॥ राम लषण मात्रम करयो चित्रकूट सिय सङ्ग। मनह विपिन बसि तप करत रति ऋतुराज अनङ्ग ॥ रति ऋतुराज अनङ्ग राम लखि सुख बनचारी। भरि भरि दोना सफल सेट धरि बदन निहारी ॥ बदन निहारि निहारि सब. सगन लदन मङ्गल सरो। विपिन भयो कामद सुखद रामलषण सश्रम करो। ६८ अब सुमन्त अवधहि चले राम बिदा जब कौन। हय न - પૂર, कुण्डलिया रामायगा । चहि रघुबरविरह सचिव अयो दुख दोन ॥ सचिव भयो दुख दोन शिथिल रथ हाकि न आयो। विकल बिषाद निहारि अवध केवट पहुँचायो। केवट गृह आयो बहुरि साक पाय अवतर मले। हानि गलानि बिहाल उर अब सुमन्त अवधहि चले ॥६॥ कहू सुमन्त कहँ रामसिय उठे विकल नरनाह। सचिव हृदय भेटे उ पति नयनन नौरप्रबाह। नयनन नौरप्रवाह सचिवसन बोलि न आयो। रामसिया सन्देश सरल मुख कहन न पायो। कहन न आयो सुखबचन ब्रझरन्धपथ कढ़यो जिय। लखण रामसिय रामसिय कहु सुमन्त कहँ राम- सिय ॥ ७० ॥ सूपभवन रोदन परो रानौ पुर नरनारि। सरधनाथ अधयो मन रविनिशि अवध निहारि॥ निशि सम अवध निहारि गारि सब कुमतिहि देई। विपति वियोग कुयोग कलह दृढ़ दौन्हेसि नेई॥ दौन्हसि सबसहं दुसह दुख जेहिके करतब रूप सरयो। हाय हाय लायो नगर भूप- भवन रोदन परो ॥ ७१ ॥ राखि भूप तन करि यतन कह वशिष्ठ समुझाय। दूत पठाये भरत पहँ आतुर चार बुलाय ॥ आतुर चार बुलाय अप गति प्रकटेहु नाही। गुरू बुलाये सरस बेगि ले गमनहु ताही॥ गवन कौन शिर नाय तब हयगति मारग सुनि वचन । मुनि बुझाय रानौ सकल राखि भूपतन करि यतन ॥ ७२ ॥ गुरुसंदेश आये भरत अशकुन नगर नगौच। पूवान टगाल उलूक खर बोलत अशुभ कुनौच ॥ अशुभ कुनौच भरत मति गति थिति नाहौं। भरत देखि नरनारि बाम दाहिन चलि जाहौं । बाम अधिपुर देखिकै दुखज्वरसों कुण्डलिया रामायण । माग्यो। है हाती जरति। धरत पा डगमग . परत गुगलदेश भाये भरत ॥ ७३७ भषण साजन लाजिकै सुन शागमन विचारि। लै माई केकयसुता सत आरती उतारि॥ सुत भारती उतारि भाय दोउ भ्रमते सूले। पियो न जल थल बैठि शुलकै प्याकुर टते । शहद शूल विचारिक कुशल पूलि निजराजिके। नोलो सुत्तदाहक वचन सूषण साजन साजिकै ॥ ७ ॥ कुशल राज्य सब काजलै राख्यों पुन सुधारि। मई मन्थरा परमहित दुख दूषण सब जारि दुख दृषण सब जारि राजा सब तुम्हते जाग्यो। कण्टक से सब दूरि अगम बर पलन अगम मुधारौ बात मैं प सुरपुर सुखसाजमैं। कछुक बिगारयो विधि यह कुशल राज्य सब काजमैं ॥ ७५ ॥ रामलषण सिय बन गये मरे भूप तेहि शोच। तुमकह रायविलास अब कौजे छाडि सकोच । कोजे छाडि सकोच होत सब विधिको कोनो। मरन जियन जग रीति लेडु पुर राज्य नवौनो। राज्य सुनत व्याकुल गियो रोदनः करि सुछित स। तात तात हा तात कहि रामलमा सिय बन गये॥६॥ पर न कौरा मुहँ जग्रो वर माँगत जड़ तोहिं। कुमति कठोर न प लखौ मिथ्या जन्मे मोहिं ॥ मिथा जन्म मोहि वाम तू भई न काहे। ऐसौ कुमति कठोर कर्म करि मो उर. दाहे.. दाहे उर खल बचन मुस्ख राम विपिन- कह मन धरयो। को तू काके रूप धर परं न कौरा मुख जयो। ०७॥ पौतम मारत नहिं डरी बन पठये सियराम। प्रेत पिशाचिनि रूप तू भई कहांको वाम ॥ भई कहाँको बाम -- '५४ वाण्ड लिचा रामायगा । राम तोहि अनहित लागे। जोहसि सो उठि बैठु बोट तजि ऑखिन आगे। आखिन आगेते टरै धिक मैं जन्मत्रों जोहि घरी। रामसुवन पठयै बनहिं पौतम भारत नहिं डरी ॥'७८ ॥ झाई दुखदायिनि तिया नाम मन्यारा जाहि। भूषण- भार सूट गारि तन रिपहन लखि चण चाहि ॥ रिपहन लखि चष चाहि दौरि पग कूबर मायो। परी धरणि धरि केश घसौटत जनक न हाम्रो । तनक नहायो बीर तब भरत जाय रक्षण किया। उठे त्यागि कुल वाहिनी आई दुख दायिनि तिया ॥ ७६ ॥ उठत कौशला गिरि परौं भरत देखि उठि दौरि। बीन्ह हृदय उठायके आँगन गिरौं बहोरि॥ आँगन गिरौं बहोरि रोय दीन्हों दृहुं आई। मातु लगाई कण्ठ अनधारा नह- वाई ॥ नह वाये चपनौरते बौर भरत धीरज धरी। विकल मरत समुझावतो उठत कौशला गिरिपरी ॥ ८॥ अञ्चल नयन लगायके आँसू पोछति मात। तोहि बिना सुत यह दशा उठन न पैयत गात ॥ उठन न पैयत गात रामसिय बनहि सिधाये। पुर परिजन मे बिकल लषण सिय बहु समुलाये॥ बहु समुझाये नहिं रहे राम चले सँग लायकै। सुनत भरत जलसों भरे अञ्चल पोंछति धायक ॥ ८९ ॥ मातु जगत जन्मत्रों बृथा सई न केकयि बाक। राम सियां अप्रिय भयो अयशमूल जगमाला ॥ अयथमूल जगमामा जानु हित यह शति तारी। जन्मत इत्यो न मोहिं देति विषमाहुर घोरौ॥ माहुर दै माग्री जगत कुल कुठारि उपज्यो यथा। पगति यह रघुपंति विपिन मातु जगत जन्मयो बृधा । ८२ ॥
५५ दाखिया नानायगा। लुर गुरु द्विज पातक परें जो जानत यह बात। बाल दालावध घ अयश गाय गोठ पुर घात ॥ गाय गोठ पुर घात मौत प माहुर दौन्हे। परधन परतियहानि परै अध गोवध कोन्ह ॥ गोवध निदावेदको पर अपकारी अघ नरें। जो जननी जानहुँ तनक सुर गुरु द्विज पातक पां८३॥ परघर अभि लगावहौं कुपथ पन्ध पग देय। वल करि यि परधन हरे रण भगि अपयश लेय ॥ रण भगि अपयश लेय मातु पितु विप्र न मानें। हरिहर पदते विमुख सूत प्रेतन उर झाने। उर मानें तौरव कुकृत निज कुटुम्ब तण लाव हों। जो जानों तौ अघ परै परघर आगि लगा- वहौं । ८॥ लोर मोह फासे रहैं साधु सङ्ग नहिं लेय। मौत बिप्र कुल इट लखि अशन नौर नहि देय ॥ अशन नौर नहि दय रूप सर बाग विध्वंसें। तन पोषक बिन तोष यहत विष धन पर अंसें। पर अं0 जे नित धरै कुवचन बोलि छाती दह। तिनको गति विधि देहु जग लोभ मोह फासे रहैं ॥ ८५ ॥ ते नर जग हो ते मरै करें जन्म भरि पाप। रणमण्डल अपयश लहैं देहि विप्र गुरु ताप॥ देहि बिप्र गुरू ताप बसत वर लाय उजाएँ। सन्तसभा नहिं बेठि सृषा मुख वचन उचारें॥ मृषा साखि जग उच्च नित्व रारि उठि गृह करें। रामलिया जेहि प्रिय नहौं ते नर जग होते मरें ॥८६॥ तुम सुत शपथ न खाँचियो राम प्राण प्रिय तोहि। तुम रामहि अति प्रिय सदा विधि गति बाकी होहि ॥ विधि गति बाकी होहि देह दूषण जनि काढू । कर्म प्रधान किसान ब-
खुण्डखिया रामायण।
बै लुनियत सोइ लाहू । बयो नियत जगतमें - भूप मरे
इम बाचिये। पास चले प्राण न चले तुम सुत मापन
न खाचिये ॥८७ ॥
बड़े ओर मुनि पायगे बैठेहि रैनि बिहानि। भरत बुझाय
वशिष्ठ सुनि अपक्रिया निधि पानि ॥ सुपक्रिया विधि
पानि दाह सरयूतट दीन्हो। रानिन केर प्रबोध भरत
पायन परि कौन्हो॥ पायन परि करि कर्म सब तिल बञ्जलि
छत रायके। भरत लिखाये मृत करम बड़े मोर सुनि
प्रायकै॥८॥
हय गय मणि भूषण दये सिंहासन पहिसाज। धेनु
बलन प्रायुध चवरत्व पात शिरताज ॥ इन पाल शिरताज
स्वमति गति मुनि जल भाषौ। शत शत कौन विधान भरत
करणो पभिलामो करि करतूति प्रमाण जल सब प्रकार
बिधिवत अये। शुद्ध सिद्ध करि काज सब हय गय मणि
भूषण दये ॥ ८॥
शुद्ध भये मुनिवर गये जहां राजदरबार। नगर महाजन
विप्रजन सचिव सुलट सरदार ॥ सचिव सुभट सरदार
वोलि पठः सन शनौ। भरत शत्रुहन साथ बोलि लीन्ह
अनि ज्ञानो। अनि ज्ञानी बैठारि ढिग मधुर बचन बोलत
अये। राजसमा दरबार सच शुद्ध भये मुनि वर गये ॥ १० ॥
स्टपति नेष पूरा कियो तेहिको शोचिय नाहि। जाको
यह शशि थर्दको को नहिं देखि सिहाहि ॥ को नहिं देखि
लिहाहि भोग सुरपति सम कौन्हो। राम बियोग कृशानु
प्राण हि वृण धरि दौन्हे। राम लषण तुप शत्रुहन चारि
सुवन लाख भगजियो। बिकुरि गयो सुरलोक बर पति
प्रेम पूरण कियो ॥ २१ ॥
सब पुरजन Pam- बागवत्तिया लाचगा। शम ल्याव सनेहको कहिय कोन विधि गाय। पितु हाय राह उठे लन पुरजन समुशाय ॥ लमुताय लिया सजणहि ससुकायो। प्राण तजौं यह जानि सर करि शोचन भायो। शोचर आयो भूपको सूपति वचन शाहको। धर्मशील गुणको कहै रामखाव लनेहको । ६२॥ बठिन क्यो का कहीं कहलहु कही न जाय। बामति अलागि बाय दीन्हो नवध लगाय ॥ दोन्ही अवध लगोय रामसिय काहि सिधाये। पुर परिजन मन शोच भुप हठि प्राह पताये॥ गाण गाये सुपवर भावी गतिको नहि वहीं। मिधि विधता अति कठिन है कठिन कियो का नहीं । १३ ॥ भूप वचन प्रिय प्राण नहिं सरत सुनौ सतिभाव। सो फुरको जिय शिर धरिम धर्म हा ति ति गाव ॥ धर्म स्मति ऋतिमा तजे रघुबर जेहि लागौ। मातु सचिव पुर लोग जस्त ज्वर नाश भागी॥ नाशहु आगो अवधको अवधि लग प रा लहि। दोजल का मानस करी सूपवचन प्रिय प्रास नहि बहत कौशला पाय परि पूत सुनहु गुरु बात। सूप भरे रघुपति गी तुम यहि विधि कदरात । तुम यहि विधि सदरात शवा उत्पात विचारो। कालकमं गति वाम दिन सुख हौजिय कारौ ! कौजिय गुरु आयसु सुदित पुर परि- जन शिर मार धरि। पालि शोच सबको हरौ कहत कौशला पाय परि॥६५॥ भरत नयन धारा चली सुनि शुरुजननी वैन। हाथ जोरि नोले मधुर जल उमड़े दो नैन ॥ जल उमड़े दो नैन ।
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कुण्टलिया रामायन ।
सौख. मलि दोन्ह गोसांई। मातु कहेउ उपदेश मोहिंपर
दया सदाई॥ दया सदाईते कहत सचिव मातु गुरु हित
'मले। उतर देत पातक लहौं भरत नयन धारा चले ॥ ६ ॥
पायन पनहीं नहिं धरी राम विपिन किय गौन। भूप
मरे प्रण पूर करि ताको शोचब कौन ॥ ताको शोचब कौन घाव
यह तौक्षण लाग्यो। यहै पौर नित दहत रयन भरि शोचन
जाग्यो। शोचन जाग्यों निशि सबै जाति सबै छाती जरौ।
राम लषण कटिपट तजे पायन पनहीं नहिं धरी॥ ७ ॥
प्रातकाल करि हौं यह सुनहु सत्य सब बात। धर्म जाय
जग अयश लहि नरकह दुख सहिगात ॥ नर कहुदुख सहि
गात जन्म अरि सङ्कट होई। सब दुख दावा दहौं अनल
बरू डारह कोई ॥ डारहु कोय जुबाल ज्वर सकल दोष दुख
भरि रहै। जाई अनुजयुत बिपिन कह प्रातकाल करि
हौं यहै॥८॥
धारण सासुहे देखिकै रघुपति करि है छोह। शोल
स्वभाव सुस्वोमिको समुहे जनपर मोह ॥ समहे जनपर
मोह रामलिय बाम न काहू। मैं शिशु सेवक नौच कुमति
उर प्रकटेउँ ताहू ॥ प्रकटेउ विधि अघ अयश लै नीच दास
शिश लेखिकै। रामलिया करि हैं. कृपा. शरण सामुहे
देखिकै ॥६६॥
भरत वचन लखि रबि जगे रामबिरह निशि पाय। भूप-
सरण कैकय कुमति तिमिर . रहेउ पुर छाय। तिमिर रहेउ
पुर छाय मुळि सोवत नरनारी। लषण सियाको विरह
व्याघ्र वृक गर्जत भारौ ॥ गर्जत भारी भय बिका तारागण
मुनि द्विज लगे । दुखद सेज़ सोवत बिकल भरत बचन
लखि रबि जरो ॥ १०० ॥
फूट कुण्डलिया रामायण। सबके मन लब सुख भयो भरत सलो मत कौल। दुख समुन्द्र बूड़त सकल जेहि अवलम्बन दोन ॥ जेहि अबलम्बन दौन सभा सब उठि भे ठाढ़े। रामचन्द्र सिय दर्श मन्त नर वारिधि वाढ़े। बारिधि बाढ़े लोग सब भरत मन्त लबही लयो। साजि साजि वाहन चले सबो मन सब सुख भयो । १.०१॥ भरत साज साजत भये मातु सकल पुरलोग। चले चित्रकूटहि भरत कश तन रामवियोग ॥ श तन रामवियोग चले सजि साज समाजे। पायन पनहीं त्यागि शोश नहिं भूपण राजे॥ सूषण साजे त्यागि भाय मातु सँग सब लये। रामप्रेम पूरण भरे भरत साज साजत भये ॥ १.२ ॥ तमसातौर निवास करि प्रात समाज समेत। सुरसरि देखो जाय तब केवट कहत सचेत॥ केवट कहत सचेत भरत सेना सँग लौन्हे। समुकि निषाद विचारि कपट प्रन्तरमहँ दोन्ह ॥ अन्तर कपट विचारिकै सजग होउ सब घाट धरि। राम जानि वन सरत सजि तमसातौर निवास करि । १०३ ॥ रामकाज जमाइ सुभट भरत रामके भाय। मैं सेवक रघुवीरको लोहे देहुँ अघाय ॥ लोहे देहुँ अघाय सुभट विन कटक निहारौ। हय गय रथ जल बोरि पाउँ पौछे जनि धारी पाउँ न पोछे कोउ धरह राम काज अरु गङ्गतट । मोर निहोर विचारिक स्वामि काज जसाहु सुभट ॥ १०४॥ पहिरत अगरी धनु धरत भई छौंक गति बाम। सगुन सगुनिया कहि चल्यो सगुन सुपङ्गलधाम ॥ सगुन सुमङ्गल- धाम भरत नहिं कपट कुचाली। राम मनावन जाहिं संग ले मातु सुचोलो॥ सङ्ग मातु गुरु सचिव सब लोग राम .
६० कुण्डलिया रामायया । शोचनि जस्त। सहसा कसै न कीजिये पहित गरी धनु धरत ॥ १०५॥ समुकि भेट कप ले चले खग मृग धन्न पट मोल। मिलन साज सन सङ्ग लिय पुरजन परम प्रवीन। पुरजन परम प्रवीन मिल्यो भुमिबरकहँ भागे। रामलखा सुनि जरत चले मिलन रघ योगे। रथ त्याग केवट को नाम जाति पुर जन मले। सरल चल्यो उनात नयन लपति भेटि रूप ले चले । १०६ ॥ भरत कुशल पूछौ सबै केवट बिनसो कोह। शव पद एज लखि कुशल लब प्रसुदर्शन जब दोन्ह । प्रभुदशनकै लईत सकत दुख दूरि पराने। चलिये अपने पुरवि राम जल लेवक जाने। सेवक कहेउ पुकारि मैं मातुनि लखि सादर नबै। है शौष जनु लषण सम हेतु कुशल पूछी लबै ॥ १०७ ॥ सब सुपास सनको भयो सुरसरि भरत अन्हाय। सखा सेवा करौ सबको बास दिवाय। सबको बास दिवाय स्यनि सब तहाँ गवाई। एकहि खेवा पार किये केवट उत्तराई॥ उतराई सन सेनथुत चले प्राग माग लियो। रासदर्श लालच हृदय सब सुपाल सबको अथो ॥ १०८ ॥ हाय प्रयाग प्रणाम झरि दानदौन सुख पाय । भरद्वाज प्राश्रम गये मिले पूजि बैठाय ॥ मिले पूजि बैठाय कल्लो हम सब सुधि पाई। , कसन करहु यह भरत प्राणलम प्रिय रघुराई॥ प्राण समान सनेह पद तजि शतानि जनि हृदय धरि। निशि ऋषि कौन सुपाल सब प्रात नहाय प्रणाम करि ॥ १०॥ रामनाम रसना ललित ध्यान . राम लियरूप। नवा कथा रघुपति सगुण हृदय चरित्र अनूप ॥ हृत्य चरित शप- 00 ६२ Pha वाहलिया रामाया। स्नूप परत पाना हा डोलें। शिधित सनेह गलौर राम लिय मुख भरि बोलें। सुख भरि बोलें रामसिय पन्थ भपया निलित। वर्षत सुरु जय जय कहत. रामनाम रसना ललित १२० एन्दर बन गिरि गण सुदित मृग विहन कपि भाल। प्रमु- दिल प्रजा समाज र राजा सुखद सुकाल॥ राजा सुखद हुकाल लकल तह फल सुखदायक। सुधा सरिस सरि- बारि कर्म अब सौगुणखायक ॥ श्रीगुणखायक ॥ मोगुण छल दल दपट दुरि कपट द्विरद केहरि विदित। लेक्ट भरत बताइयो सुन्दर बन गिरिगण भुदित ॥ १११ ॥ नाप विटप वट तक लवे कौन छावनी राम। लिया बनाई वैदिक्षा निज कर ललित ललाम। निज कर ललित ललाम राम शुभ आश्रम नौको। मुनिगण कहत पुराण हुनत दिनबारवालटोको दिनकरअलमण्डन मही दुख खण्डव कहि जय हरे। रामसिया लक्ष्मण लखौ नाथ विटप तक बदलने ॥ ११२ ॥ जाय भरत पायन परे नाहि वाहि सगवन्त। अशरण- मस्या प्रताप जग आदि मध्य नहिं अन्त ॥ आदि मध्य नहि अन्त प्रणत जनरक्षक स्वामी। धौल स्वभाव विचारि शरण पद रज अनुगामौ॥ अनुगामी शिशु औरणी धाय जानि प्रभु पद धरे । बाहि वाहि रक्षक प्रमो जाय सरत पायन परे । ११३ ॥ सरत प्रेम रघुबर शिधिल उठे और बिसारि। धतुम तौर पट शिर मुकाट जटा दये झिटकारि ॥ जटा मुकुट छिट- कारि नयन उसँगे जल धारा। दुहुँ कर लियों उठाय सगन लहिं देह सँभारा॥ देह समार विचार तजि माय लाय । ..
६२ वाण्ड लिया रामायथा । उरमै बिकल। देखि दशासुरगण बसित भरत प्रेम रघुबर शिथिल ॥ ११४॥ छोड़ि न मावत शिथिल दोउ माय प्रेम परिपूरि। मन बुधि चित हित लायकै करि कुतर्क सब दूरि ॥ करि कुतर्क सन दुरि राम पुनि केवट भेटे। लषण भरत पनि मिले शव- हन उर दुख सेटे ॥ . सेटि दुसह उर दाइ दुख भरत शोश पद धरे दोउ। सकल सभा सुनिगण मगन छोड़ि न भावत मगन दोउ ॥ ११५ ॥ केवट गुरू आगमन कहि राम उठे सब सङ्ग। धरे जाच मुनिपदकमल भेंट मुनि धरि अङ्ग॥ ॐटे मुनि धरि अङ्ग चले आश्रमहि लिवाई। मातन भेंट आय मनहु शिशुधेनु तुराई ॥ धेतु तुराई गति मिली लिय सासुनके चरण गहि। रोदन करत बिलाप करि केवट गुरू पमरण कहि ॥ ११६ ॥ भये शुद्ध मुनि वचन कहि भरत राम सब भाय। सब समाज करूणा हरणं मातु सचिव ऋषिराय॥ मोतु सचिव ऋषिराय भरत विनती उठि कौन्हो। श्रीरघवर लवत सकल गति मति रति चौन्हो॥ मति गति चौन्हि सनेह सब अवश करिय सोइ आजु नहि। चलिय अवध टपता करिय अये शुद्ध मुनि बचन कहि ॥ ११७ ॥ आधसुप बनको दयो सोई धरि थिर भाज। तुमको पितु पुरको यो पूरण राज समाज । पूरण राज समाज हमहुँ तुम आयसु कीजै। पालिय पितुको बैन जन्म अभिमत फल लीजै ॥ अभिमत फलति न जग लदो पितुआयसु जिन शिर लयो। बचन न खहित सो करौं आधा कप बनको दयो॥ ११८ ॥ जो श्रुति कहत सुत्सत्य है भरत कहत कर जोरि। पितु पायसु शिर राखिये परमधर्म शत कोरि॥ परमधर्म शत
कुण्डलिया रामायण।
ay
शम्भु
कोरि तदपि पितु तियवश होई। सन्निपात अतिवात वारू-
पो सेवत सोई । सेबत सोई रोगवश वचन कुयोग अपत्य
है। समुकि नाथ नौजे उचित जो श्रुति कहै सो सत्य
है ॥ ११॥
प्रभुरुख लखि मन प्रण कियो गये गङ्गो तौर। जल
उठाय सङ्कल्प कार जो न चलें रघुबौर ॥ जो न चलें रघुवीर
देह तृणसम तजि डारौ। तन मन अर्पित देखि गङ्गतिय
वेष सुधारो॥ वेष सुधारौ एक मुख ढिग उपदेश सुधारियो।
सुनु विवेक रामानुजे प्रसुरुख लखि प्रणमन कियो॥ १२० ॥
सत्य सच्चिदानन्द हरि राम सकल सुर ईश। ताहि न
सुत माता गनौ सर्वोपरि जगदीश ॥ सर्वोपरि जगदीश
बिधि हरिकारण कर। पद पताल शिर गगन लोक कर
उर गिरि सरवर ॥ गिरि सरवर धर अङ्ग सब भरण हरण
घिति प्रि अरि। हठन करो आयसु धरौ ब्रह्म सच्चिदानन्द
हरि ॥ १२१ ॥
जन पालन खलगण दहन चले विपिन सुरकाज।
महौदेव श्रुति दिन बिकले मुनिपालन तपसाज ॥ मुनि-
पालन तपलाज जात दश कण्ठहि मारे। करि प्रमाण निज
कर्म अवधपुर तिलक सुधारें ॥
॥ तिलक राज लोला करहि
मही मोद सुख निर्बहन। उठहु राम आयसु करौ सुरपालन
खलगण दहन ॥ १२२ ॥
शुभ आनन सुनिकै भरत मगन भये सुख बन्द। भई
अष्टि अशीश दै श्रवण सुधा शुभ छन्द॥ श्रवण सुधा शुभ
छन्द भरत आनन्द सिधाये। औरघुवरपदकमल प्रेम धरि
शीश नवाये ॥ शौश नाय बिनती करो देहु पादुका शिर धरत।
करत अटन तीरथ बिपिन शुभ आनन सुनि सिख भरत ॥ १२३ ॥
६ कुण्डलिया रामायण । मगन समाज समेत सो चित्रकूट बन देखि। सुखद राम बर बदन लखि जीवन लफल विशेषि ! जीवन सफल विशेषि भरत श्रीराम बुलाये। बिदाहेतु गुरू वचन कहे सबकह ससु- माये ॥ सब प्रबोध भेंट मिले चल समाज सनेहलों। अव- धि आश पुर बास करि भगन समाज सनेहलों ॥१२४ ॥ राम भरतके प्रेसको को कविवरणत पार। नेम क्रिया दृढ़ धर्यव्रत कH परम आचोर ॥ कर्म परम आचार वणि सहसानन हारे। मलि जड़ वरणहिं काह असक नभ अन्त विचार ॥ सशक अन्त किमि पावई गगन उड़े करि नेमको तुलसिदास शठ क्यों कहै राम भरतके प्रेमको । १२५ ॥ बसे अवधपुर लोग सब भरल बसे पुर त्यागि। नन्दि- याम खनि सवनि थल ब्रत मुनि निशि दिन जागि॥ निधि दिन मुनि ब्रत साधि पादुका नप करि सेवै। राज- काज शुम साज करत पूजत द्विज देवे॥ देव मनावस शवधिहित राम समागम होय कब। तुलसिदाल मुनि व्रत धरे बसे अवधपुर लोग सब ॥ १२६ ।" इति अयोध्याकाण्ड समाप्तम् २॥
अथारगयकारा प्रारमः॥ फटिशिला सुन्दर सुखद बैठे सिय रघबीर। सुमन जषण प्रानहिं सुभग सुरभित सुमुख समोर ॥ सुरभित मुस्खा समोर राम सिय सुषण साजे। अङ्ग आङ्ग प्रति चिर काररतिभाखि झवि लाजे ॥ लखि लाजे रति काम तन इन्द्र- सवन भरमें दुखद। परब्रह्म श्रीराम सिय फटिकशिला सुन्दर सुखद।॥ १ ॥ समुकि मनुज शवगुण कस्यो हत्यो चोंच तन काग। रूधिर देखि घर सुमनको कौन्ह बोध करि त्याग | कोन्ह क्रोधकर त्याग लोक लोकन अमि आयो। मति गति विह्वल विकल मोह माया भरमायो । मोहन्ध नारद लख्यो पाय सोख पायेंन पस्यो। बाहि त्राहि रक्षा करो समुभि मनुज अवगुण फत्यो ॥ २ ॥ एक ऑखि करि प्रभु तज्यो कर्म कौन बड़ा होर। कृपा- निधान समानको प्रगतपाल बरजोर ॥ प्रणतपाल बर- जोर चरित सुर नर मुनि गावें। चित्रकूट बस सुखद जानि सब आश्रम शावै॥ आश्रम विदित विचारिक विपिनसाज सब तन सज्यो। आति जहाँ श्याश्रम गये चिनकूटथल प्रभु तच्यो ॥३॥ अनि अनन्द भेटत भये देखि लषय सिय राम। शासन बैठार मुदित पूजे अभिमतकाम॥ पूजे अभिमतकाम जानको खेन लाई। अनसूया पट दौन नित्य नूतन सुख-
६
तुण्डलिया रामाया।
-
दाई सुखदायन उपदेश दें पतिव्रत धनि सब दये। अादर
प्रस्तुति बुनि करोषि अनन्द अटल भये ॥४॥
विक्षा अमिलो प्रभु सय लिया लणय रघुराय। चले
विपिन भागे सुखद महामुदित मन पाय॥ सामुदित मन
पाय लकल मुलि सये नुस्खारी। निसंघ जप तप करहिं योग
मखहोम विचारी॥ होम बिचारि सँसारि हरि शामिन
शादरलों दयों। बङ्गलमध कानन भयो बिना अनिसों
प्रभु भयो ॥५॥
बधि विराध मग सुख सये देखि जाय तस्मङ्ग। परि-
ভূহ বা বল তুদ্ধি সজ্জ্বিল হয়। সস সন্ধির ক্ষুদ্র
जोरि हर विनय बड़ाई। करि निहोर रचि चिता शापि
चदिदौन लगाई॥ दोन अधि तन अर्पि राय लषण लिय
उप स्टो। भयो धाम औराम ललि बधि विराध जग सुख
सये ॥६
मिले सुतीक्षण धायकै पुखमयन जलधार। जेहि
विधि शिव योगौश मुनि ध्यावत हृदि आगार ! हृदि मन्दिर
ध्यापल सदा शाये लेबन शाजु हैं। देखों नयन सनेह भरि
सूरति सुख रघुराज हैं ॥ अन्तर्यामो धारि मन सूरति नेह
लगायक। राम नगाये प्रेन परि मिले सुत्तौक्षण धायक ॥ ७ ॥
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सङ्ग गयो सगरमै चल्यो जाल लखत प्रक्षु रूपः। कृषि
झागन्ति शाश्रम गये हर्षि सकल सुरु सुप ॥ हर्षि देखि सुर
सूप मिले अनि मात्र बजान्यो। शासन बादर पूजि वेद
जति मति प्रभु जान्यो । जान ठानि. सुख मानि प्रभु अधुर
बस बोल्यो मल्यो। शुभ अयान बताइये सङ्ग गयो मगमें
चल्यो॥८॥
कुण्डलिया रामायण ॥ श्वमङ्गल सुखबई। खरदूषण पहँ गय विकल हास समुकि धावत मई १३ ॥ कारि प्रयोष लेना सजी खरदूमस मन मोध। राम बुझाये लपणाको लिय गिरि राखिय शोध। सिय गिरि राखौ शोधि दलुजसेना यह आई। मानुयान छपि गये धूरि नमाडल छाई ॥ शय धरि नभसे रहो दुन्दुभि दौरघ अति बजौ। सौलहिं राखौ कन्दरा करि प्रवोध सेना सजौ ॥१४॥ धरहु धाय बोले वचन लखि छबि दूत पठाय। नारि माग्र करि मिलह चप कहे दूत मह ाय॥ कहे दूत यह आय राम तेहि उत्तर दीन्हो। सुनि खरदूषण क्रोध सुभट ले दर्षित कीन्हो ॥ दर्पित डारहिं शाल बहु धरि सटल अलि शक्ति धन। मन मेघ बर्षत अचल धरह धाय बोले वचन । १५ । राम साजि शारज शर चले विशिल जनु काल। कटे विकट उल्लल उर बरणं सज महि गिरहि कपाल ॥ भुज सहि गिरहिं कपाल विकल आजहिं लखि शायक। खलदल समय लशोक निरखि खरदूषया धायक।। धाय क्रोधि शायक लजे रहे पूरि दिधि गगन धर। सजि पावशर जारि तम राम साजिशारङ्ग घर । १६ ॥ खलदल वृन्द निहारिकै सन कोल विचार । रामरूप कोनो कटक लब परिमलो अपार ॥ सब लरि भयो अपार एक एकन धरि मारें। कौतुक तखि सुरु मगन रामको. चरित निहारे । चरित निहारि पुकारि सुर वर्षि प्रसून सुधारिक। जय जय जय महिलाहर खलदल मरन निहारिक ।। १७ ॥ खदूषया लिशिरा परे शूर्पणखा लखि नैन। रोवत रावणको समा कहि कहि भारत वैन । कहि कहि भारत वैन देशको सुरति विसारी। शिर भरि डेरा करतो खबर
कुण्डखिया रामायण।
६
नहिं तोहिं सुरारी॥ खबरि न तोहिं निहास मोहि अङ्ग
सकल शोगित सरे जुरै जाय माता लमर खरदूषण
निशिरा परे ॥ १८॥
ताहि सङ्ग बरसानिनी रतिरम्याझवि
रतिरम्शावि छीन। रमा
भारती शिवतिया लागहिं सकल मलौन लागहि सकल
सलौन कोटि शशिसम छु ति शोभा। खग मृग पशु जड़
जीव वाहि लखि विकल न को भा । विकल नारि नर मुनि
मगन तजत योग जप यामिनौ। दामिनि बरणत द्युति कहां
ताहि लङ्ग बरभामिनी ॥ १३ ॥
अवनि असुर खण्डित करें प्रबल शत्रु बरिबण्ड। देखत
बालक काल सम अति विशाल सुजदण्ड ॥ शति विशाल
सुजदण्ड मदन जनु वैष संवारें। मुनि मन अये अनन्द
विपिन विचरत भय डारे ॥ भय डारे मुनि जय करहिं खल-
दल दलि सुर दुख हरै। सुपजमार अपार छवि अवनि असुर
खण्डित करें ।। २० ॥
करि प्रबोध रछ चढ़ि चल्यो रावण मन अनुमानि। जह
मारीचस्थान शुभ मन्त तन्त मन ठानि॥ मन्त तन्त मन
ठानि गयो उठि आदर कौन्हो। माशेच हु मन लख्यो कछु
स्वारथ मन दोन्हौ ॥ स्वारथ घाले बिचारि जिमि भङ्गश
धनु अहि छल छल्यो। नवै बिलारि विचारि छल करि प्रबोध
रथ चढ़ि चल्यो ॥ २१॥
तात हेतु. स्वारथ करौ कथा समस्त सुनाय। हरहुँ बाम
सप तनयको बैर सकल बुकि जाय। बैर सकल बुकि जाय
होउ मृगकपट बनाई। भगिनी लखि दुख मोहि करहु बन
मोरि सहाई ॥ मोरि सहाय बिचारिक निज कुल मङ्गल मन
धरौ। बात जात घातक भयो तात हेतु. स्वारथ करी ॥ २२ ॥
- ७० कुण्डलियारासायगा। सुनु सुत याहि न न र गनौ में जानत बल ताहि। निन- फरशर मोहिं मारियो भयों समुद निरवाहि ॥ गयों सखुद निरवाहि मारि ताड़का सुबाहौ। भो शिवको दण्ड जनक- कन्यका विवाहो॥ जनकलमाज पाल बहुमान मंदि सृगु- पत्ति हनौ। ताहि निशेध न कुशखा सुबु सुत ताहि न नर । भनौ ॥ २३ ॥ .. ज्ञान सिखावल मोहिकह से सुर नर वश कौन। उत्तर देहि न उठि चले डरडरात पुरतीन॥ डरडरात पुरतौन • समुकि मन देखि बिचारौ। यहि मारे थल नरक राम कर सुरपद सारौ॥ सुरपद मारौ पाय हौं चल्यो नाय शिर रास तह। रावण भातुर चढ़ि चल्यो ज्ञान लिखावत मोहि- कहं ॥ २४ ॥ मायामय छाया करो सिय बायसु उर मानि। सृग देख्यो शुचि हेममय खचित रतन मणिखानि ॥ खचित स्तन मणि- खानि लखत जानकी सुखारी। यहि इति सुन्दर छाल करिय प्रभु धनुधरधारो॥ धनुशारधारौ मन समुकि जानत भागमको घो। चले लषण लिय सापिकै मायामय छाया करी॥ २५ ॥ मृग भारयो दूरी निकरि राल कठिन शर ताने। हा लक्ष्मण प्रथम को पीछे राम बखानि पीछे राम बखानि कइत जानको बिचारी। कही लषणसों बात माय तव लकट भारौ॥ सङ्कटबन्ध सुमिरत तुरई जाहु तुरत धनुवाण धरि। असुश्सैन्य अरिदल ग्रले भृग मारो दूरौ नि- 4 करि॥ २६ ॥ राम न सकट कहुँ पर काल जुरै रणमाहि। सकल सुरा- सुर लरि मरै लमर जोति, हैं नाहिं। समर जीति है नाहि दाग खिया रामारगा। ७१ Primar सोच बनमाल निवाते। राम दोनता बचन बदन कबहूँ र उचारो।। कबहुं न संशय शानिये लत्य बबन मेरे धरौ। काली वेज निधिचर विपिन राम कबहुं सङ्गट परौ ॥ २७ ॥ कसो वचन सहि नहि नायो उठमो रेख धनु खाचि। यती- वेप माझठ पाठ शायो लियढिग याचि॥ आयो सिब- दिन याचि जानको ताहि बुलायो । दन लागि फल खुल दृष्ट तब वचन सुनायो। बचन सुनाय सुखद कहि धो सौख नहि कई लयो। साबीवश सिय देख तजि वचन लो नहिं सहि गयो । २८॥ रेख त्यागि सिय जब गई रघपर लई चढ़ाय। गल्यो गगन मयते मगन इत उत देखत जाय ॥ इत उत देखत जाय लिया रावण जब जान्यो। कहत पुकारि कपाल नाथ कहुँ दूरि • परात्यो॥ दृरि परान्यो लमण कह लोहिं दयानन हरि लई। परो विवश दशकण्ट के रख त्यागि जन लिय गई ॥ २६ ॥ राम राम कहि खग चल्यो गृध्र जटायू देखि। रोक्यो स्य रघुबरतिया दशशिर हरौ विशाख । बिर हरी बिपि मारि रथ सूतल डायो। लौतहि लई छुड़ाय विकल दशशिर महि पाखा॥ दशशिर पायो भूमितल झव चूर उर थल हल्यो। मुकुट अस्त्र शस्त्रहि दुपट राम राम सुनि खग चल्यो॥३०॥ शति रिस रावण रण रच्यो लौक्षण काढ़ि रूपान। दल्यो पक्षमहि खग गियो कहि सुख कृपानिधान ॥ कहि सुख कृपानिधान साजि स्यन्दन लिय लोन्हीं। ले नसपथ फिरि चल्यो गौध विह्वल गति कौन्हो॥ बिह्वल गति. कपि, सिय कर सच्यो कुण्डलिया रामायण । लखे লুই कपि । तर अशोकतर राखिक अति रिस रावण फिरि रच्यो । ३१ ॥ लगण बाल नौकों नहीं बन लिय आये त्यागि। सगुन मम सन होत अति सिब बिन उर बिरहागि ५ लिय बिन उर बिरहागि लजण पद गहि समुझाये। शोचत आश्रम देखि नयन उमड़े जल छाये ॥ उमड़े जल छाये बिझल खोजत गिरि वन सर महो। धिर धनुष भागे एग्रो लषण बात नौको नहीं ॥ ३२ ॥ राम राम रखना स्टे लख्यो गोधपत्ति जाय। कही कथा सिय हेतु गति रामनयन जल शाय ॥ रामनयन जल छाय गोद धरि बचन उचाई। परमारथ तुम तात प्राणधन तृण करि डारे ॥ तृण समान प्राणनि दयो कोपरहित रण- महँ टे। जियो भोग भोगा जगत राम राम रलना स्टै॥ ३३ ॥ दर्शलागि जीवन रहेउ भाग उदय रघुराय। जेहि बिरचि शिव सेवहौं लियो गोदमोहि आय ॥ लियो गोद मोहि आय राम कहि प्राण गंवाये। भयो तुरत हरिरूप चारि भुज अस्त्र सुहाये। अस्त सबै शिर मुझट वर पोताम्बर भूषण गह। जोरि पाणि अस्तुति करत दर्शलागि जीवन रहेड ॥ ३४ ॥ परमधाम गो गोधपति क्रिया कोन्ह ौराम। चले बिरहाङ्कर अये विपिन शाबरोधाम ॥ बिपिन शावरोधाम अर्घ आसन सब साजे। धूप दीप फल सुजल धरे रघुपति- के काजे॥ सब सप्नेष पायन परी दर्श पाय पावै न गति। रास तुम्हारे रूप, लखि परमधाम गो गोधपति ॥ ३५ ॥ काठ साजि रचिकै चिता सिय सुधि कही बहोरि । - कुण्डलिया रामायण। ७३ शवरी जरि सरगति गई क्रिया करी प्रसु कोरि ॥ प्रिया करौ प्रभु कोरि चले बन दनौ भाई। सुनिगण मिलत अनेक दर्थ, अभिमतफल : पाई॥ पावहि अभिमत जीव जड़ करहिं योग जेहि. प्रभु निता। साजि साजि सुरगति लही काठ शावरौ रचि चिता ॥ २६ ॥ रामसिया खोजत गये पस्पा सुभग तड़ाग। सुन्दर जल तरु बिहँग मृग सुनिगण सदन सुवाग । मुनिगण सदन सुवाग करत जप तप मन लाई। देखि सरोवर सुदित कौन मज्जन रघुराई॥ रघुराई मजन करयो नारद मुनि श्रावत भये। तुलसिदास सुर सुभग सर रामसिया खोजत गये॥ ३७॥ इति अरण्यकाण्ड समाप्तः । अथ किष्किन्धाकाण्ड प्रारम्मा चले बिपिन लक्ष्मण सहित मिले पवनसुत आय। बिप्र रूप पूछत भयो को तुम कहो बुझाय ॥ को तुम कहौ बुझाय विपिन सुकुमार सलोने। बप दशरथको सुवन तासु प्रायसु . तजि भौने॥ तजेउ भवन आये बिपिन नारि गई शोध न लहत। खोजत हम द्विज कवन तुम चले बिपिन लक्ष्मण सहित ॥ १॥ १० कुण्डलिया रामायण । लै सुग्रीव मिशाइयो प्रभु गुण मन अनुमानि। कही कथा लज परस्पर नूपुर दये बखानि ॥ नूपुर दये बखानि राम लोचन भरि आये। विरह बिकल प्रभु देखि कोश बहु विधि ससुझाये। ससुझाये सुग्रोव अति राम लषय सुख पाइयो। प्रभु अँटे हनुमन्त उर ले सुग्रोव मिलाइयो॥ २ ॥ प्रभु बोले कारण कवन बसत विपिन कपिराज। कथा कही सब बालिको कोपि कहा रघुराज॥ कोपि कहा रघुराज बालि एकदि शर मारों सम्पति ऋधि तिय सहित तोहिं कपि तिलक संवारौं। तिलक संवारों कालहि नहि किष्किन्धा पता भवन । तौ न धनुष शर कर धरौं मित करिय कारण कवन ॥३॥ तब सुग्रीव दिखाइयो बालि महा बल बौर। गर्जि नगर जान्यो सहि चल्यो क्राधि रणधीर ॥ चल्यो क्रोधि रणधीर लर पनि दूनो भाई। शरणागत प्रण समुकि बाण मोस्यो रघराई ॥ मात्रौ बाण प्रमाण करि गियो अवनि मुरमा- दूयो। रामरूप लोचन पुलकि तव सुगौवं दिखाइयो॥४॥ ध्याम रामबि उर धरी बाणी कहत कठोर। नर गति हरि गति तजि दई सम प्रकाश सब ठार ॥ सम प्रकाश सब ठौर जगत अप्रिय कळु लाहौं। जो अप्रिय तव होय सकल इक ला बिलाहौं। सङ्ग रङ्ग नहिं चाहिये विधि पिपौल रचना करौ। जयति हरे श्रीराम कहि श्याम रामबि उर धरी॥५॥ प्राण गये श्रीराम कहि नारि विकल पुरलोग। संपौवहि पायसु दयो करहु मृतककर योग। करहु मृतककर योग लषण सबको समुझायो। राज हेतु सुगौव अनुज सँग नगर पठायो॥ नगर बुलाये द्विज सकल अङ्गदादिकपि बोध २५ धाई॥ कुण्डलिया रामायण। लहि। बालिशोच दूषण हगे प्राण गये श्रीराम कहि ॥ ६ ॥ रामनाम कहि हप करौ तिलक सारि शिरतान। राम कृपानिधि जगतमें बिरद गरीबनिवाज॥ बिरद गरौब- निबाज कियो सुग्रीव सुखारौ। गिरिवन विकल बिहाल बानि डर कम्पित भारी॥ कम्पित डर निरभय नहीं जात दुसह ज्वर उर जत्रो। धाम बाम प ग्रामको रामनाम कहि टप करो ॥ ७॥ राजनीति कहि प्रभु रहे शैलप्रवर्षण छाय। अतुन सहित सुन्दर सदन राखे देव बनाय ॥ राखे देव बनाय निरखि वर्षाऋतु आई। घनघमण्ड नभ घोरं मनहु रविपर निशि निशि धाई रवि मजि गये नौरबुन्द बाणन गहे। तड़ित कृपाण सुइन्द्रधनु राजनीति कहि प्रभु रहे ॥ ८ ॥ करि मनोज डेरा जगत सजि आयो करि सैन । असित पौत सित घन अरुण तनि बितान सुखचैन ॥ तनि बितान सुख चैन तड़ित ध्वज सुन्दर राजै। निधि दिन धन घह रात मनहु बर दुन्दुमि बाजे। दुन्दुभि बाजे मोर पिक बक दादुर बन्दी लगत। बिरहवन्त कारण सन्यो करि मनोज डेरा जगत ॥६॥ सुरपतिकै गिरिगण ग्रस्ते बुन्दबाण करिलाय। कहुँ कहुँ मारत बज्रशर घनगज शोश चढ़ाय ॥ घनगज शोश चढ़ाय मोर हर बल पुर आये। बाज नौबति जोति कोकिला सुयश सुनाये। सुयश जनाव. बितान तनि बेलि बिटप गृह गिरि बसे। मुद्रित करि पाषाण जड़ सुरपतिकै गिरिगण. ग्रसे । १० ॥ के समुद्र महिपर चढ़नो महि मुद्रित को ५ न। सर सरिता जलदल परे शरपञ्चर महि कौन ॥ शरपञ्चर महि -
।
वाण्ड खिया हामायण।
कौन तड़ित बड़वामिनि मानो। बर्षत नस चढ़िवारि नलिन
गिरि दिग्गज जानो। दिग्गज कम्पाहि घन सदल नाद
बाद दशदिशि बढ़यो। कम्पमान महि गहि धरी के समुद्र
अहिपर चमो॥ १२ ॥
शरदभूप. शायो मिलन धवल रूप बुति साजि। कमल
लोक खच्चन चतुर दूत उठे जग बाजि ॥ "दूत उठे जग बाजि
चन्द्र जनु छत्न सुहायो। सरि सर निर्मल बारि पबिड़े पावल
नायो॥ पावत दीन्हो तिलक जग शरदराज राजत घलन ।
पावस गयो प्रणाम करि शरदभूप आयो मिलन ॥ १२ ॥
सौय शोध अब लीजिये जाहु जहा कपिराज। खबरि
विसारी सुख सुपुर पाय नारि धन राज ॥ पाय नारि धन
राज बालि थल तुम्ह पठाऊं। कर धरि कौनो सखा ज्ञान दे
मन समुझाऊँ ॥ मन समुकाय समेत कपि आप गमन
पुर कीजिये। बानर साल पठाय करि सिधाशोध शान
लीजिये ॥ १३॥
लल्माण चले लिबायकै प्रौति प्रबोध रिसाय। बानर
भालु बुलायक गये जहां रघुराय ॥ गये जहां रघुराय मिले
पायन कपि नाये। रघुपति हसिं सृद् प्रकृति पुलकि गहि
मराठ लगाये ॥ कण्ठ लगाय बुझाय कपि विनय करौ चित
लायके। बानर भालु विशाल भट लक्ष्मण चले निधायकै ॥ १४
कपि लक्ष्मण सबसों कहेउ सिय सुधि खोज्हु जाय ।
पाख दिवस बिन सुधि लिये हहिं मिल्यो नि माय ।।
हमहि मिल्यो जनि माय बहुरि अङ्गदहि बुलाये। तुम मारुत-
सुत साध जाहु दक्षिण शिरनाये । .. दक्षिण सिय शोधहु
सुलट भाल नौल नल सुख लखो। मुंदरौ दै हनुमन्तको
प्रभु कपि लक्ष्मण सब करो ॥ १५ ॥
वाण्ट लिया रामायगा। चले सुभट व्यङ्गट बिकट खोजत गिरि सर खोह। राम- काज लवलौन मन बिसयो तनकर छोह ॥ बिसरमो तनकर छोह सघन बन जाय भुलाने। तृषावन्त भेबिकल बिना जल सब अकुलाने अकुलाने हनुमन्त लखि चल्यो ववर पैठनो सुभट। कथा सुनाई शशि प्रभा चले सुभट व्यकट बिकट ॥ १६॥ जल फल खाय प्रणाम करि तेहि पठये जलतौर। सोस प्रेम पहुंची तहाँ लक्ष्मण श्री रघुबीर ॥ श्रीरघुकुलमणि बोर पठे बदरौबन दौन्हो। कपि सव सागरतौर सौय हित चिन्ता कौन्ही॥ चिन्ता कीन्ही कपिन सब सम्पाती लखि कहत डरि। धन्य जटायू सुभटको जल फल खाय प्रणामकरि ॥ १७ सुनि सब कथा प्रणाम करि गये मुदित सम्पाति। भये पक्ष. जल दोन शुचि कही पक्ष गति भांति ॥ कही पक्ष गति भांति धरहु धौरज सब भाई । पैहौ सौतहि तबहिं पार सागर जो जाई॥ सागर शत योजन उलघि प्रबल बौर जादू हि जो परि। सो सिय पावहि सत्य मुनि कपि सब कथा प्रणाम करि ॥१८॥ गयो कहत यह गौधपति कपि सब करत बिचार । बहु रत संशय जिय कहैं अगद जातो पार । अङ्गद जातो पार कहत ऋक्षेश बुढ़ाई। नल औ नौल सकोच जानकी. कौन दिखाई। कौन दिखाई जानको पनि प्रचारि कह पक्ष- पति। कहा समुद हनुमन्त तोहिं गयो कहत यह गोध पति ॥ १९॥ . इति श्रौकिष्किन्धाकाण्ड समाप्तः।
अथ सुन्दरकाण्ड प्रारम्भ। भयो हेमगिरिको शिखर सुनत ऋक्षपति बयन । चदयो तमकि भूधर अधर फाकि अरूण करि नयन | अरुण नयन सुजदण्ड मसकि भूधर जब चंप्यो। जल पतालको कढ़यो शेषरुपपर कम्पयो। कम्पि शेष शिरनमि गयो कूदि चल्यो बलवन्त फिरि। मारि दुष्ठ गिरि परसि पग भयो हेमगिरिको शिखरि॥ १॥ पटकि लझिली बासको पैठयो सिय हित बौर। लखो न पुर सिय घर घरन खोजि श्रमित रणधीर । खोजि श्रषित रमाधौर बिभौषण भेद बतायो। गयो बाटिका सिय तहाँ पनि . रावण आयो॥ रावण आयो देखि कपि तक ठो विश्रामको। कहे बचन रावण सुने पटकि बहिनी बामको॥२॥ सिय उत्तर ताको दयो गयो सदन मतिभन्द। सिय दुख लखि है मुद्रिका देखी मारूननन्द ॥ देखो मारुत नन्द जानकी कथा सुनाई। मातु धरिय मन धौर कयो मिज मुख रघाई ॥ श्धुराई सावन चहत कोशकटक दलबल भयो। सुत लमान तेरो कटक सिय उत्तर ताको दयो॥३॥ राम प्रताप संभारिकै भयो हेमगिरि रूप। रघुबर कृपा बिचारु तृण होय बज अनुरूप होय बज्र अनुरूप सर्पशिशु गरुड़हि पारे। तिमिर खाय शशि रविहि मशक गिरि हेम उखारै। मशक सुमेरु उखारही समुद पिपौल निवारिकै। जरो जगत खद्योत तव रामप्रताप सँभारिकै ॥ ४ ॥ - कुण्डलिया रामायण। बूड़ि जायँ खर बामनौ शेष डारि महिमार। बारि खाय बड़वाअनल शम्भुचन्द्र शिर डार ॥ शचन्द्र शिर डारि चारि- मुख सृष्टि नशावै। गिरि सर सागर डारि धरणि तजि धीरज धावो धीरज धरणी उर तजै जलहि मिले गिलिई भजौ । राम- बाण खल ना बचे बूड़ि जायें खुर कुम्भ गौ ॥५॥ मातु देह पायसु मुदित लखौं बाटिका जाय। सुन्दर फल लागे बिटप भोजन करौं अघाय॥ भोजन करौं अघाय जानको उत्तर दौन्हो। सुत रखवारे प्रबल पवन परवेश न कोन्हो ॥ पवन शूर परवेश नहिं लखि न सकहिं रवि शशि उदित। कह कपि यह भय तनक नहिं मातु देह सायसु मुदित ॥६॥ करि प्रणाम कुद्यो सुभट लग्यो फूल फल खाय। मूल चलावै समुदपहँ रक्षक पहुँचे जाय ॥ रक्षक पहुँचे जाय मदि महि गर्द मिलाये। पुरी परतो अतिशोर अक्ष रावण पढवाये। अक्ष वृक्ष लै कपि हन्यो मेघनाद आयो बिकट। भिरे प्रबल रघुपति सुमिरि करि प्रणाम कूद्यो सुभट ॥ ७ ॥ ब्रह्मबाण कपि साधिके धरि लै गयो बहोरि । रावण भागे करि दियो कहि कटु बचन करोरि ॥ कहि कटु बचना करोरि कहौ रावण तब बानौ। को मर्कट इत कहां काहि बल फलकर हानी । फल दल मूल विध्वंसि करि एण कौन्हो अवराधिक। कहि कपि तव सुत छल करो ब्रह्मबाण कर साधिकै॥८॥ विधि हरि हर दिगपाल सब व्यालं यक्ष गन्धर्व। पिट प्रेत पशु मनुज जग सचराचर सुर सर्व सचराचर सुर सर्व गगन धरणौ गिरि घेरे। मैं तें पर परिवार धाम धन तिय सुत तेरे ॥ तिय सुत तेरे लोक सब भये रहे पनि होहिं -- ८० रिक। कुण्डलिया रामायन । अब। तासु दूत जेहि जग मृज्यो विधि हरि हर दिगपाल सब॥६॥ प्रति रिस पावक बोरिक तेल बस्त्र घत. बोरि। चढ़यो अटारीकनकको विधिशर करते तोरि॥ विधिशर करते तोरि सकल पुर दीन्हो भागौ। क्षण महँ सब पुर बारि बिभीषण भवन न लागौः॥ भवन भन्म भूषण लये समुद्र सुदर्प निवा- लिय मणि ले कूदत भयो अति रिस पावक बारिकै॥१०॥ करि प्रबोध साथी सकल मधुबनके फल खाय। हर्षि गहे प्रभुपदकमल उर मेंटे रघुराय ॥ उर भेटे रघुराय दोन्ह मणि प्रभु हँलि लौन्हौ। सियदुर्दशा निहारि पवनसुत प्रकटित कीन्ही॥ प्रकटित कीन्हो सियदशा सुनत हाल रघुपति बिशल। बिजय करिय लिय अनिकै करि प्रवोध साथी सकल ११ ॥ रामबचन कपिदल चल्यो दिग्गज अहि सचन्त । आलु बलौ अर्कट शुभट यूथ यूथ बलवन्त ॥ यूथ यूथ बलवन्त अन्त को पावहिं लेखा। राम कटकको विभव रूप जानहिं जिन देखा। जिन देखा जानहौं नभ अहि पुर भूतल हल्यो। समुद तौर डेरा परे रामबचन सुनि दल चल्यो. ॥ १२ ॥ बचन सुनत रावण कयो मन्तौ मिन बुलाय। मन्त्र कहो पूछत सबहि कडो विभौषण प्राय ॥ कयो विभौषण आय अन्त मणि मानिध मेरो। लौतहि सौंपहु जाय मिलहु रघुनाथ सवेशे ॥ सुनि गुनि उठि लातन हत्यो मिलहि शव को उर दयो। चल्यो हृदय अनुमान करि बचन सुनत रावण करो ॥ १३ ॥ मन गलानि हरिहै कवन चल्यो ताकि प्रभु पाय। दौन कुण्डलिया रामायण। घर बन्धु दाया हृदय लौन्हे तुरत बुलाय ॥ लौन्हे तुरत बुलाय तिलक पुनि निज कर सायो। रावण पुर सब दियो मिल्यो जव शौश उतारो॥ शोश उतारे शिव दयो तब पाये लक्षा अवन। सो पुर धन पाँधन परत मन गलानि हरि है कवन ॥१४॥ सखा निकट बैठारिके पूछौ सागर पाय। केहि विधि उतर कपिकटक तेहि बिधि करिय उपाय ॥ तेहि बिधि करिय उपाय मन्त्र करि व्रत तट कोन्हो। क्षुद्र न द्रवहिं विशेषि तबहिं प्रभु धतु शर लौन्हो॥ धनु शर उर मायो बिकल मिल्यो रत्न लै आयकै। पन्य देहि कपिकटककहूँ सखा निकट बैठायकै ॥ १५ ॥ नाथ सुगम मारग रच्यो जल महि पावक पौन। विटप शैलसर जड़ रचे इनको लिखवत कौन ॥ इनको सिखवत कौन करहु प्रसु एक उपाई। गिरिगण बोधहि सेतु नौल नलं दूनहुँ भाई ॥ दूनहु भाई बांधि हैं शैल सकल मर्कट सच्यो। आए प्रताप सहाय सम नाथ सुगम मारग रच्यो॥ १६ ॥ सुनि साँचे सागर बचन कपिपति कौश बुलाय। धाबहु गिरि तरु आनिकै नलहि देहु सुख पाय ॥ नलहि देह सुख पाय धरहिं गिरि सागरमाहौं। सुनि आयसु कपिवृन्द चले चहुँ दिशि भ्रम नाहौं ॥ भ्रम नहिं शिर वङ्ग ल करहिं कोटि कोटि गिरि धरि रचन। देहिं आनि नल नौलकहँ सुनि साचे सागर बचन ॥१७॥ इति सुन्दरकाण्ड समाप्तः॥
८३ कुण्डखिया रामावण । हारि गये दस बल असुर चल्यो बालित बोर। मुकाट धरे प्रभु पयितर मिले हर्षि रघ बऔर ॥ पिले हर्षि रघु बौर बालिसुत कारण भाख्यो। गढ़ घरो करि अन्त जहां लायक तेहि राख्यो राखि वीर पुर भयो दयो लक अति प्रबल जुर। अयो युद्ध द्धिल समर हारि गरे दल बला असुर ॥ ५॥ भवनाद योधा सुलट लक्ष्मण न्यो विचारि। भई खूछा प्रभु बखे हनुमत लीन प्रचारि ॥ हनुपम लोन प्रचारि॥ हनुमत लोन प्रचारि औषधी लेन पायो। दुहायो पि बोबा शव शिर राखि सिधायो॥ पाल शोश देखा सरल तागि मरि शाय विस्ट। राम कहत मंट: सलो साल बाष पौड़ा सुभट ६ शति सह मो अरस हो कोख बडुबाय। विस- अ होहि मारण आमा पठौं तोहि प्रमाण । पठवहुँ सोहि प्रमाण समुजि पुतिकात कपोशा। सब प्रतापते नाथ जाउँ जह प्रभु जगदौचा॥ प्रभु जगौशा विचारिलो पण परि पायन परत । धन्य धन्य हनुमन्तु जग हालि सनेह मेंटयो भरत ॥७॥ लक्ष्मण उठि ठाढ़े भयो कोन्हो वैद्य उपाय। सुनि रावसा संशय भयो प्राता जाय जगाय ! आता जाम जगाय कहे कारण सब जेले। तेहिं तव कहो न मानुन ब्रहा प्रभु कपि सुर कपि सुर रघुबर ब्रहा है तेहि विरोध को नहिं गया। यह कहि स्ण भण्डल गयो लमज उठि ठाड़े भयो । ८ ॥ मारि दुष्ट रण दलिमले सुर दुन्दुभी गजाय। लक्ष्मणको अायसु दियो तात तक पर जाय ॥, तास लक्षपुर साहि. रावण सुत जाई। आयतु शिर धरि लषण हत्यो देवन दुख- तेते माहि. हतहु
वाण्डलिया रामायण ।
दाई। दुखदाई भारे सकल रावण बन शोचत चले। जय
जय रघुवंशमणि मारि दुष्ट रण दलमले ॥ ८ ॥
रण रावण आतुर चल्यो असुरसेनदल साथ। करत
युद्ध देवन डरत घरत शरासन हाय ॥ धरत शरासन हाय
चलत महि दिग्गज डोलैं। क्षुभित उदधि जल शूटङ्ग शैल
खलि महिधर बोलें । अहिधर बोलें अति समय रवि सुद्रित
सन घल हल्यो। सुज प्रचण्ड र सडियो रावणा रहा प्रादुर
चल्यो ॥ १०॥
श्रीरामरावणयुद्धको को कबि पावहि पार । आज
शारदा निगम बिधि शङ्कार सुनि अवतार ॥ प्रयकर मुनि अव-
तार कल्प कोटिन कहि हारें। बल दल समर प्रचण्ड मन्द जे
कहन बिचारे॥ कहन बिचारै मति कवन सब कहि हारे
बुद्धको। तुलसिदास सो किम कहै रामरावणयुद्धको॥ ११ ॥
प्रभु मायो प्रभु कै गयो ताको बरण कौन। बल पौरुण
अरू बौरता जानत रवि शशि पौन जानत रबि शशि पौन
बड़ो रण रावण कौन्हो। निज दल लम गति ताहि पर्मपद
पावन दौन्हों॥ पावन पद लखि देव सब पुष्प वृष्टि
दुन्दुभि दयो। करहिं विनय सादर लकल प्रभु आयो प्रस
है गयो ॥ १२ ॥
सियसङ्कट दूरी कयो राज विभीषण दौन। सत्य सुयश
कपिको कह्यो थपथ लौय शुचि कोन ॥ शपथ लीय शुचि
कौन चढ़े पुष्पक रघुराई। कपि लिय लषण समेत - चले सुर
जयति. सुनाई॥ जय जय प्रभु खलदल दल्यो सुर मुनि दिन
महि दुख हो। अमर नाग भूतल सुखौ सियसकट दूरी
करयो
॥ १३॥
कुण्डलिया रामायगा। पूजा शङ्करको करौ सेतु सिया दरशाय। पञ्चबटौ कुम्थ- जहि मिलि अलि आदि ऋषिराय ॥ अखि आदि ऋघिराय मिले अनसूयहि जाई। आशिष आयसु पाय चले आगे रघाई॥ रघुराई आये तही चित्रकूट मङ्गल घरी। पै- अन्हाय मुनिगण मिले पूजा शङ्करको करौ ॥ १४ ॥ आयसु पायो मुनि दयो चले हर्षि श्रीराम। यमुनहि पूजि सप्रेममय प्रभुदित कौन्ह प्रणाम । कौन्ह प्रयाग प्रणाम मिले मुनिगण प्रभु जाई। करि मज्जन सिय सहित विप्रं मान्यता बड़ाई॥ मान बढ़ाई पूजिकै पुनि बिमान धातुर गयो मिले निषादहि गङ्गातट आयसु पायो मुनि दयो ।॥ १५ ॥ कपि हनुमन्त पठाइयो भरत कुशलता देखि । आवत सिय लक्ष्मण सहित यह तुम कहो विशेषि यह तुम कही विशेषि प्रातउठि भरत निहारौं। पुरवासि न पनि मिलौं मातुको शोच निवारौं। शोच निवारौं अवधको सब प्रकार समुभाइयो। भरत प्रवोधन हेत प्रभु कपि हनुमन्त पठाइयो ॥ १६ ॥ पनि निषाद उर लाइयो रघुपति करुणापुच। लै आयो मन्दिर परम सुजलं धोय पदकन्न ॥ सुजल धोय पदकच्छ रुचिर आसन बैठायो। धूप दीप नैवेद्य फूल फल अङ्क र धारयो। अङ्कर खाये प्रेम युत राम बहुत सुख पाइयो। प्रात समाज विमान चढ़ि युनि निषाद उर लाइयो ॥ १७ ॥ भरत देखि हनुमन्त जब कृश शरीर दुख दौन। जटा शौश मुनिव्रत धरम प्रेम पावरौ लौन ॥ प्रेम पावरौ लौन राम सिय वदन उचारो। कुश आसन आसौन बसन भूषणं तजि डारो॥ भूषण तजि भजि नाम प्रभु अवधि अन्त दिन आदि रव। अहह मोहिं धिक धिक कहत भरत देखि हनुमन्त - जबर १८॥
८६ রেছি !(। कुण्डलिया रामायगा। तुनहु मरत हनुम कहो बाय लझा लिय राम समेत मङ्गल कुशल जोति अतुर संग्राम । जाति ससुर संग्राम देव सब स्तबल बसाये। राज विभीषण दौड सुयश नारद शिव गाये॥ बाद शारद पशु शुक प्रभु कोरलि पान लहौ । सा प्रभु आवत अवधपुर सुना सरत हनुमत कहो ॥ १६ ॥ सुनत सरत आनँद लयो पर्म भावतो वाल। चकित घकित सुख सपनों कहत कोई साक्षात कहल कोई सानात भरत पुनि नयन उधार। पुनि तुलस का रास प्रावध शाये सुखमारे॥ सुखलारे उठि सरतकर हिट मैटि जानन गलो। हापाल पासन पुलकि खलल सस्त शनिब लया ॥ २० ॥ जाये यह सन्देश ले कक्षा यहि पटतर तयलोक्य नहिं कही अमृत लन वाल॥ कही सात लस बात रामसिय हागत विजेंसी। तन्वय सहित लक्षेम अवध आवत तुम देशी ॥ शावर देखि बिशेजि तुम कह हनुमन्त प्रदेश खे! मिले वहुरि कति कष्ट न जाये वह तन्हे- श लें ॥ २१॥ प्रावध प्राय प्रकटी सबै गुरु पुरजन लसुझाय। भातु हाज पाये लपण सोय सहित रघुराय। सीय सहित रघुराय सजहु गङ्गल पुरनारी।. वन्दनवार पत्ताक चर्म चामर गज सारो गज मोरो रथ दुरण सँग साजि भरत गङ्गल तवे। चले नगर वाहिर मिलन पुरमोमा प्रकटी सं॥ २२ ॥ सरस का हनुमन्त ले देखत गणन विभाग। नगर नारि नर देखि के उतरे पानिधान उतरे पानिधान मिले गुरु प्रथम गोताई। नागिप देश सनेह लागना पूछो सुनि-
कुण्डलिया रामायया।
राई॥ सुनिराई प्रभु भेटिकै भरत हृदय भगवन्त ले। अति
सनेह पूरे मगन भरत सङ्ग हनुमन्त ॥ २३ ॥
मिले सकल, पुर जन मुदित राम चरित यह कौन। सब
जानत प्रथमाहि मिले हमकहं राम प्रवीन। हमनहँ राम
प्रवीन ऊँच मध्यम नर नारी। यथा योग्य मिलि सबहि
बहुरि भेटौ महतारो॥ भेंटो महतारौ सबै प्रथम कैकयो
पर्म हित। बिरहनिया नाशी सकल मिले सकल पुरजन
मुदित ॥ २४ ॥
इति लकाकाण्डसमाप्तः ॥
.
अथ उपहार कारागारमा
राम अवशाय अमल घर घर मजा लाम। पुरी भई
शामरावती रामराज्यशे काज़ ॥ रामराज्छके काज भरत
लव लाज लजाई। तुर गन्धर्व मुनीश सकल साये सुरलाई ॥
तुरलाई मजाल सजे वजे अवध दुन्दुभि विनल। बर्षि सुमन
এ জ ব হ ল া মল २॥
शुभ सिंहासन शुचिबन्यो रघुपति बैठे आप। भूषण मणि-
गंग जगमगर कोटिन भानुप्रताप ॥ कोटिल सानुप्रताप
बेध्वनि बिन उचारें। बचवर धनुदाय दण्ड सरतादिक
धारें॥ भरतादिक सुखमय समलियाई सूषण बन्यो।
रामसिया योमित भये मसिहासन सुधि बन्यो ॥ २ ॥
कुण्डलिया रामायण प्रथम तिलक गुरु उच्चगो विप्र न आयसु दीन। देव सुनिन जय उच्चरौ दुन्दुभि हुने नवोन । दुन्दुभिहने नदौन सबहि बर अस्तुति ठानी। मातन आरति साजि गीत गावहिं मृदबानौ॥ मृदबानो सुर मुनि सबै जयति राम जय जय करो। बन्दि वेद बिरदावली प्रथम तिलक गुरु उच्चरो॥ ३ ॥ कहि बशिष्ठ प्रधमै वचन सब प्रकार सामर्थ। सुर पाले खलदल दले द्विज महि सज्जन अर्थ ॥ द्विज महि सज्जन अर्थ अये दशरथके बारे। निगम सेतु प्रतिपालि सुयश जगमहँ विस्तार ॥ विस्तारे प्रदूत चरित पालय लय कृत पनि घरन- जय जय नर अवधेशमुत कह बशिष्ठ प्रचम वचन ॥8॥ कहि विधि सहि सुनायकै रामचरित अपार। निगम शेष शङ्कर सकल को जग जाननहार ॥ को जग जाननहार अमित अवतार विहारौ। सुर सज्जनके हेत करत लौला बपुधारी॥ लौला तन मङ्गलभवन खल दलि भुवन बसायकै । जगमङ्गलकारणकरण कह विधि सबहि सुनायकै ॥ ५ ॥ उठि शङ्कार जय जय कहत राम .स्वरूप तुम्हार। मङ्गल- मय सूरति मधुर सुमिरत सब दातार ॥ सुमिरत सब दातार लहत सुख सुन्दर ध्याये। गुणगण पावन गाय तरत अव- निधि सुख पाये। सुख पाये मुनिगण मनहिं ज्ञान ध्यान सो ज्यहि चहत। रविकुलकसलदिनेश प्रभु उठि शङ्कर जय जय कहत॥६॥ सुरपंति कहत प्रणाम करि सुनहु राम सुरंभूप। प्रति अवतार अपार शुण बर्णत वेद अनूप ॥ बर्णत वेद अनूप दुष्टजन खण्डनहारे। मन ..गोसनको वसित राम तुमताहि पियारे॥ ताहि पियारे तुम लगत बचे मोह ॥
८८ कुण्डलिया रामायण मद नाम। . हम निशिदिन विषयाविवश सुरपति कहत प्रणामकै रविनञ्जलि जोरे कहत राम सुनहु बम बैन। छपा करिय निज चरण रति निशि दिन राजिवलन ॥ दौजिय राजिवनयन लोग बड़ हृदय हमारे। जबले मम अल जन्म रावरे नरतन धारे॥ नरतन धरि यश विस्तयो चिरसौष जोरी रहत। जय जय रविकुलरविविमल रविनचलि जोरे कहत॥८॥ शनिल अनल धर विनय करि खलखण्डन तुस राल। राज आज बयपुर विशद राजहि जग अभिराम राजहि जग चलिराम लल्त लज्जन सुखकारी। नरतन धनु धरि हाय हरयो धरणी अघभारी॥ धरणीमण्डन खण्डि खल राज विराजत भुवन भरि। जय जय श्रीसीतारमन अनिल अनल. धर विनय करि ॥६॥ निगम विजतन करि कहत राम सुन सुरईश । कोटि कोटि यत्नन करत नहिं पावत योगौशनहिं पावत यो- गौश हृदय शङ्कर पचिहारे। विधि सनकादिक नेम धर्म करि तुम्हें निहारी ॥ तुम्ह निहारत्त सुख लहैं तेनपि मालुहि कार गहैं। जयति राम लोला अगम निगम विपतन करि कहैं ॥१०॥ शारद नारद जोरि कर विनय करत चित लाय। अद्भुत चरित तुम्हार प्रभु सुनिये चोरघुराय ॥ सुनिये औरघुराय पिता दशरथ सम नाहौं। तृण लम तन तजि दोन सुयश जाको जगमाहौं । सुयश कियो जेहि जन्म भरि गयो बिरह ব্দ সমুহ। মীলিয়া লিল মাং লা সাহি कर ॥११॥ ૧૨ ० कुण्डलिया रामायण । प्रस्तुति करि मुनि पुर गये राम भरत बुलवाय। इपि- पति क्ष बिभीषणे नल नौकहि अवाय ॥ नल नीलहि अन्वाय भरत सूमा पहिराये। अङ्गद सहित समाज राम सब निकट बुलाये ॥ राम निकट बैठारिक मधुर वचन बोलत पिकीरति नक्षु उच्चरत्त शतुति करि मुनि सुर भये। गये।॥ १२ ॥ ॥ सुलिनायक ये नौल नल कौन्हे शदुत की। शत योजन सागर बँध्यो सेतु उपल गुरु धर्म॥ सेतु उपल गुल धर्म सोश सवणके फाले । मन्दिर सुवरण सत्य कलश सहिधर बहुडाले। महिधर डारि सँघारि भरि रण मण्डल इति असुरदया। महा- बौर बानत बल मुनि नायक ये नील नल ॥ १३ ॥ मुनिनायक कपिराज ये कारे हमारे काज। बानर कोटि पठाइयो सिघ शोधन शिरतोज । सिय घोधन शिरताज करयो रखामाडल मारी। मन्त सन्त सब सुद्ध लेन बल नवल बिचारी। शनल बिचारी ठौर जहँ तहँ बल दिये समाज थे। महाबलौ बुधिवन्त अति सुनिनायक कपि- राज ये ॥ १४॥ सुनहु बिमोषण बहु कियो मिल्यो मोहिं तजि साथ। रावर अरू घननादको दई मोचु दर्शाय ॥ द सोचु दांय गदा पुषिरावा सायो। लाश घायल भये बैद्यको नाम उचायो। नाम उचारयो शाल दल करि उपाय लहान जियो राम कहत सुनिराजसों सुनहु विभीषण बहु कियो ॥ १५ ॥ नवनाश बल दल महा रावण हत्यो प्रचारि। मेघनादको पाउ भरि लङ्ग गयो फटकारि॥ लक गयो फटकारि अक्षुर ত্ব ভূক্ত লাল। ঊন্ত ঘি বি যুদ্ধ ছাগু ফ্লিন্থ বি गिरि राजन ॥ शिर धरि गिरि रावण दले लक्ष्य शलु रणा .
कुण्डलियारामायगा। ८२ नहिं रहा। सुनिनायक लायक सबै ऋक्षनाथ बल दलः महा ॥ १६॥ ये अगद सुनि अतिबली जिन रावणपुर जाय। मान ज्ञान अरिदल दल्यो रोपि समा धरि पाय ॥ रोपि सभा धरि पाय केश धरि रावण रानौ। महि कठोरि पुनि हत्यो वीश दश चरण डरानौ॥ चरण धरे कल्पत असुर सैन समर अति दलमली। रणविजयो शुभ सुयशदा ये शहद मुनि अतिबली ॥ १७ ॥ ये हनुमन्त बिचारि मुनि प्रघम मिलाये मोहि । कपिपति पुनि दल जोरिक ले मुद्रिक कर जोहि ॥ लै मुद्रिक कर जोहि बौर लै सुभट सिधायो। मित लगे अब मरण जाय तेहि सुजल पिआयो॥ सुजल पिलायो सबहिको समुद- तौर रचि अन्त पुनि। पक्ष तच्च सम्पाति दै ये हनुमन्त बिचारि मुनि ॥ १८ ॥ गयो उदधि पारै सुभट सायौ तट बैठाय। देखि सोय मणि हाथ लै बन उजारि फल खाय ॥ बन उजारि फल खाय आसुर मोरे भट भारो। करि उपाय पुर लङ्क कूदि घर घर पुर जारी जारि बारि पनि वारिनिधि कूदि चल्यो व्यंकट निकट। गर्जत घोर कठोर अति गयो उदधि पारे सुसट ॥१६॥ लिय मणि द दल लै चल्यो दिग्गज दरकत अ। पार जाय घेयो रिहि दुर्गकियो पुर अङ्ग। दुर्गकियो पुर सङ्ग समर लक्ष्मण दुख पायो। द्रोणागिरि धरि शोश रयन नभ- सारंग धायो॥ मारग धावत धार लग्यो भरत कोपि उर थल दल्यो। लजय शोच उरमानिकै लिय हित गिरि शिर लै चलो । २० ॥
ए. कुण्डलियारामायण कह लौं गुण सुनि* कहौं कपि समाजकै काज। भरत त्ल जयते प्रिय लदा कपिनायक धिरताज॥ कपि नायक शिरताज मिले उठि सबहि बहोरौ। बिदा किये लन्मानि परस्यर प्रीति न थोरी॥ प्रौति न थोरी प्रभु करो सब प्रणाम करि सुख लहौ। बार बार यश प्रभु कहैं कह लौ गुण मुनिमें कहौं ॥ २१॥ . राम राज राजत अयो गयों सकल दुख आणि । रोग शोक अपगति मरण काल कर्म गुण त्यागि ! काल की गुरुः त्यागि भई सतयुगको करणौ। बारि दमन गति बारिआई सुरमी सुर धरणौ ॥ सुरभी सुर धरणौ मई कपट दला पाखंड गयो। धर्म विबेक विचार नर राम राज राजत अथो ॥ २२ ॥ काम क्रोध अघ रोग सब मान मोह मद गर्व। दोष दुल ज्वर पौर खल दारिददाहन सर्व ॥ दारिददाहन सर्व बैर पर.. धन परनारी। सुभाष लब कृटि गई मति पश्चपकारी। परउपकारी लोग सुख भोग योग महि प्रकट अब। गरी अमङ्गल छत जगत काम क्रोध अध रोग लब ॥ २३ ॥ नेम प्रेम प्रकटे जगत दया क्षमा सन्तोष। योग धज्ञ जप तप सुपछ वेद सुमङ्गल पोष ॥ बेद सुमङ्गल पोज रही परमा- रच पूरी। पर अब लिज छत दुकृत्त झाकत दुस्तर मय दूरी। दुस्तर भय दूरी करे राम तेज रवि जगभगत । कमल कोक लब धर्म बर नेम प्रेम प्रकटे जगत ॥२४॥ एक राम गुण गायबो यह कलिकर्म न और। लात तुजलौक्षासो मन्त्र बहै शिरमौर मन्त बहै शिरसौर राम शुचि कौति गाऊँ। साधन उत्तम जानि सुमति लिज मनहि बढ़ाऊँ । अनहि घड़ाऊँ मन्तः यह जिहि प्रसाद - सुख पायो। ॥२५॥ कुण्डलिया रामायण ६६ शु नारदको सौख यह एक रोमण गायबो एक रास मुख नाम त ध्यान रामको रूप। राम चरित 'गावत परम धर्म पवित्र अनूप ॥ धर्म पविल अनूप करिय जब जौं जग जोजे। रसना रस करि चरिल लरित निशि बासर पोजे॥ निशि वासर श्रम तजि भजे तुलसिदास यह शुभ सुकत। कामधेनु कलि कल्पतरु एक राम मुख नाम टतरी ॥ इति श्री उत्तरकाण्ड समाप्तम ॥
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স্মথ ছালাখা বাৰী।
॥
दशकदर घटकर्ण अघ भारधरा दुख होइ । गई गगन गोदेह
वरि कहि सुरपतिसौं रोइ १॥ छन्दचौपथ्या॥ सुरपतिगुरू
चूका सुरमति सूका में विधिलोक तुरन्ता। विधि सुर समुकाये
सङ्ग सिधाये जह सोवत श्रीकन्ता॥ दशमुखको करणी बहुवि-
धि बरणों धरयो जेहि बिधि रोई। सुनि शारंगपाणी सइ नभवा-
यो विधि जाना नहिं कोई॥ निधि बचन सुनाये सुर ससुकाये
जहु शोच मन देवा। जो जनहितकारी प्रसु असुरारी
1) करहिं पार सोइ खेवा । वानर गोपूझा मन धरि रौछा बसहु
जाय बनमाहौं। अवधेशनिकेला व्यूहसमेता प्रभु सावत
तुमपाहौं २ ॥ दोहा ॥ यहि बिधि निबुध बिबोधि गे गे
सुर निज निज धाम। कछ काल कोहे अवध प्रकट भये
शशिवंदनछन्द ॥ जनहितकारी
सुरारौं। नरतनधारी छबिसुखकारो॥ मृदु वकारी भरि-
दलहारी। सुमुख निहारी बलि महतारी॥ अवधविहारी
भवभयहारौ। जयतपुरारी लज अघहारौ ॥ अवधउधारी यह
अगमारौ। तुलसिहि तारौ शरण सम्हारी ४॥ हरि-
गीतिकाछन्द ॥ . सम्हारि शरण बिचारि तुलसी रामयश
बयतापशमन कलेशहरको , और नहिं
जग मग वियो ॥ जेहि गाइ यमन किरातखल हरिपुर गये
करि सुधि हियो। रघुवीरयश मुनि हिय न हरष्यो बुरो ति-
न अपनो कियो ५॥ सुन्दरीछन्द । राजत मेचक अङ्ग
महाछवि। बोल मनोहर कहहिं महाकबि ॥ जो सुनिक
श्रीराम ३॥
प्रकट
7
।
गावत लियो।
२ सामायण छन्दावली। अग। जरि जाय महामल । लादर गावहिं पावहिं लम्बल ॥ तूण कसे कटि चाप थिलोमुख। मातु बिलोचि चपार लहे सुख। बालचरिख करे रघुनन्दन। लोग निहारि हरे दुखबन्दन ॥ ध्यारह वर्ष के राम भये जब। बोलि वशिष्ठ उपनयन दये तब ॥ आइ तपोधन याचि लये सुत। बोलि वशिष्ठहि राउ दये युत ॥ ताड़क तारि सुरारि दई गति । बालविनोदक देव किये मति । रामहिं मन्त्र दये तन श्रीमति । राम लपण सुनि काज किये अति । मारि सुबाहु करौ अखको जब। देत सुनौथ अशीश महा तब ॥ गौतमतापसतीष तरी राम धरे मिथिलापुरको पग ! आइ विलोकि विदेह महाछवि। देखि नरेश समाज गयो दबि॥ आयसु.. दौन्ह विदेह नरेशनु । चाप चाढ़ वत पूज महेशनु ॥ डिगै न खण्डेउ राम प्रयासनु। सूमके बोजसमान शरासनु मेलि सिया जयमाल मनोहर । बाजि बधाव धरा अरु अबर॥ व्याहि चले न्टप चारि सहोदर। मारग वौच मिले फर- साधर ॥ चापहि सौंपि अये तपसौवर। राउ विवाहि साइ अपने धर ॥ बालचरिब विवाह यथामति । जो सुनिकै नरनारि बहै गति ६॥ दोहा॥ चरित चारू रघुवोरके सुनि मन कीन्ह विचार। निज मनसों तुलसी कहै कल न हो भव पार ७॥ इति श्रीबालकाण्डसमाप्तम् ॥ चामरछन्द ॥ आय कौशलेशने मुहाय आरसी गही। कानने समीप केश लेखि पूर्वत है सही। रायकान में मनोज- राय आर्यों कही। राज देव रामको बने सिधाव तो सहौ।
रामायण छन्दावली। । कैकयौ सुनी सुवात शोकमाल ते गहौ। राज माग पूतको श्रीरामको वने कही। रानते सुनौ सी बात तात ताप यों तये। रामसौय सङ्गले सवन्ध काननै गये ! रायरामचन्द्र साथ प्राण काढ़ि के दये। गङ्गमाग होईकै सुचित्रकूट में गये ॥ राजका- जकै सरत्य शोकसिन्धु में भले । साथ लै वशिष्ठ वन्धु पायप्याद हो चले ॥ केवटै सवन्धु भैटि राम प्राग जाइकै। राम दोन पावरौ हिये सुलौन लाइकै १॥ दोहा ॥ पाकै गवन गेहको कौन। गणक बोलि तब भरथने नेमध- रमब्रत लौन २॥ इति श्रीअयोध्याकाण्डसमाप्तम् । राम पावरी । सुन्दरीछन्द ॥ विदेहजातको कहैं सुरेशतातने बुवो। औरामवाया लागते विहीननैन सो हुवो॥ श्रौदेवदक्ष तातको श्रीराम बन्दना कियो। तिन्होंकि तीय लीयको सचैलभूषणो दियो॥ विराध वद्धि रामचन्द्र शासन के गयो। लहाँ सुरेश देखिकै सवन्धु सुखसो अयो॥ वहोरि चौसर्वन्धुसङ्ग पञ्चवाटिका गये। तहानखानकाननाकं सूप- नेखो हये। बिकाश आदिदै सुरारि एक वाणसों हये। सुनौ सो बात रावणा मरौचपास सो गये ॥ कही कथा सुनी तिनो सो नेकरा सो भयो। लेखो औराम मारि ताहि धाम आपनो दयो । सुन्यो सो शब्द सौय शेष राम पास पाठयो कयो विक्षप रावणा ले लीय जातयो भयो । सवन्धुशाल देखिकै रुपाल दुःख पगे। तहां ललामशालते तिन्होंतो वूमाते लगे। कही सुसुद्धि गौधने कवन्धवन्धकै चले। करी सनाध शेवरी ल- वन्धु वेरले भले ॥ बहोरि पन्यताल त्रीरूपालराम जायकै। तहां -
४
१
रामायण छन्दावली।
मुनीश नारद कियो प्रणाम आइकै १ ॥ दोहा॥ लखि सुकराट
श्रीरामकह मनमह कौन्ह विवार। पुसमलिंब ये करन हैं
देख पवनकुमार २ ॥
इति नौमारल्यकालुसमाप्तम ॥
चचरीछन्द॥ रामरामको लेवाइकै तन शैल पर
जाइक। जान बदहि बौच देशारि कीन्ह प्रौति दृढाइकै।
क्यों रहो तुम भलऊपर . राम बूक कपोयसो त्यों करो
ब्योहार सगरो बातिको डर रामसों बालिको बधि बागलों
कपिनाथ तोहिं का सही। जानको तुमको मिलावों
विहँसिके कपिने कही। बालि मारि कृपालराम सुराज
दोन्ह सुकराट को। भास चारि सुवासकै तह शासना करि
काठको । जानकी सुधि लेनको कपिईश कौध पढाइकै।
भासमें सुधि वैगि ल्यावह खोजि देखहु जाइकै १॥ दोहा ।
कीन्यो दिवर प्रवेश निल अशन कियो फलफूल। पूँछि
नियहि मदे नयन ठाढ़े जलनिधिकूल २ ॥
इति श्रीकिम्किन्धाकाण्डसमाप्तम् ॥
॥
तोटकन्द॥ हनुमान गयो तरि सागरको। उलथ्यो
जनु खोइ अजाखुरको ॥ गिरि ऊपरपै चड़ि लङ्का लखौ। हनि
लशिनिको विधिबात सखो॥ लघुरूप धरयो हनुमान बलौ
निशि लङ्क किलोकि नाइ मलौ । रघुनौर प्रिया कितहून
मिली। तहँ देखि निऔषण औरि छली॥ रघुबीर सुआजहि
चित्त कयो। लखिकै हुलसान हियो सुभयो। तेहिको
हामायण छन्दावखी। ॥ मिलि सुद्धि लई सगरी। हर हरिको मिलि ज्यों नगरी तह जाय लखौ रघुवीरप्रिया। कृश अङ्ग मली सुखडीन लिया । पुनि रावण नानि कलेश कियो। सुनि झोध भयो हनुमान डियो। सुंदरी दडू डाशिनिहारि प्रिया । सुखदुःख भयो हनुमन्त हिया ॥ रघुबौरको दूत प्रसन्नकिया। फलखानको आयसु सांगि लिया! लखि बाग लग्यो फल खान हन । उतपात महा अतिवाग बनू ॥ मनुजानि भाय पुकार करो। हनुमान हनी सेना लगरी॥ घननाद गज्यो पवनातमजा। दक्षकन्य सभामहँ जादू गजा चलिगो रिपु ज्यों न डयो सनमें । मद- मत्त गयन्दनके घनमें ॥ धनतेल लँगूर लपेट सहो। जललो निजपेकरि ला दही॥ हतुमानके हांकते गर्भ गिरयो । मनुजाद पिया नहिं धौर धरो॥ सियाघसु लेकर सिन्धु तरमी। हनुमान सदेह कयो लिगम्रो ॥ सुनिक हियलिन्छु अनन्द नमो सजि सेन समूह पयान करो॥ बल देखि पयोनिधि पांच- पयो। नल देखिने सेतु लसुन्द्र तरो॥ सुनि मयतनया पिय- पांच परी। प्रा व्यापकविम्ब विराटहरी ॥ तव जाय सलाह विचार करी। तपसौन धरो हमरो नगरौ ॥ तिन मन्त्रिन सन्त कुमन्त्र कियो। लघु बन्धुहि मारीसि लाल हियो। रघुवीरके तौर गयो अजिकै। पक्षो अविवेक कन्यो सनिकै ॥ प्रभु लड़ हि नगदको पठयो। पद रोपि सनापण जाइ ठयो॥ दशकन्ध समा महँ बौरबचा। नटयो पक्षज्यों महिलङ्ग रचा। बरबोर सभा मद सारि फिरयो । रघुनौर पदाव न पाद परयो । ॥ दोहा सुनि रूपालु अङ्गदवचन बूझो मन्तीयूह । शनी चारि करि द्वारचहुँ लागे कौशलमूह २ ॥ : इति श्रीसुन्दरकाण्ड समाप्तम ॥ ॥
1 2 ॥ - रामायण छन्दावली। सुजङ्गप्रयातचन्द॥ लगौ सेन सम्म ह चायो दुआरे। भयो शोर देवारि नादे पुकारे॥ तबै बौर बांले दयानन बुलाये। सबै जाय खाहु रोक वानर जो आये॥ महारोष- मातेहि देवारि गाजै। महामत्त मातङ्गराजी विराजै। बनी बाइनौ ब्य हकै बाजि साजै। ध्वना वाण नौशान घनघोर गाजै॥ करै युद्ध नानादि योधा प्रचारै। लरै बौर कपि भालु चारयो दुआरे ॥ फिरें रुण्ड बेमुण्ड जै जै पुकार। तहां राम सौमिल रणमध्य मारे। सबै वीर रणधीरवन्ध जगाये। कही जो कया सोय जेहि भांति लाये॥ लयो जाइ रघुवीर जो युद्ध मद्ध। गयो त्यागि तन जादू योगी न लद्ध ॥ सुनौ निचर ईसने बन्धु भायो। तबै तातसों वौद्ध धननाद कायो । यो प्रान पौरुष पिता जो हमारयो। को क्रोध शक्रारि सेना बिडायो। तबै ताहि ऋक्षेश गहिक प्रभायो। गयो सूचिके तुरत लड़ा पठायो। हत्यो ताहि लौमिलना युद्ध सध्य। करै देव जै जै लानन्द वध्ये। सुत्यो तोयने पौयको बौर सांचो। भई लो सतौ लत्य तिहुँलोक पांचो॥ शुन्यो तातको बद्ध दशकन्ध शोचा। मौ बाण नहिं हाथ है- पूत पोचा॥ हनों आजु रणमध्य राम प्रचारौ। कहा वा- पुरो बानरा बौर चारी॥ चले लाजि सेना सबै बौर गाजें। करें राग माल पहाव-भेरि बाजै ॥ तबै रासके सामुहे रथ जो आयो। दिये हष्टि श्रीराम तौलिल लायो॥ तबै रामशरको सकटि बँचि बाँध्यो। लियो चाप कर साधि वर ताहि साध्यो। छुटे बास दशकौशक शीश होने। तलै शौज अतिशय भये ते नवीने ॥ तबै राम लवको मन्त्र बूको। हमारे शरोसो नदशन्ध जस्को। सुनौ नाथ यहि ईशको धौश दौन्छ । महौ होहि भोगे जिन्हें पुण्य कीन्हे ॥ हिये ॥ रामायश बन्दावली। मध्य पाके सुधा शोश पोषै। छुटे बाण यकतोस हियमें सो भोमरे नाथ दशशीश सुर लाधु तोपे। इत्यो धूमि रघबीर लश बीजै । बने दुन्दु भी व्योमचर सावु गावें। नचे सुर वधू दृष्टि सुमनोंकि लार्दै ॥ दियो तासुकै बन्धुको राम टोका। तिस हेतु कपि भालु ल्यायो असीका ॥ तवे राम श्रीजानकी बोलि लौन्हो। धरै देह द्विजको अनल घागि दौन्हो॥ लिये सङ्ग कपि भालु सौता समेता। चले राम चढ़ि यान उत्तर निता चल्यो यान उत्ताल तिरथे सो आयो। तहां राम हनुमान अवधै पठायो॥ दोहा॥ सीक आल सिय सङ्गाले तिरबेणी को न्हाय । भरद्वाजको बन्दि प्रभु केवट सेंटयो आय ॥ इति लक्षाकाण्ड समाप्तम् ॥ छन्द ॥ शुभ सगुण अवध जनाइ तेहि क्षण होत सुद मङ्गल महा। शीतल सुगन्ध सुमन्द मारुत अमल जल सुर- सरि वहा ॥ शुभ प्रङ्ग फरकत भरतके हिय हुलसि अहि आनँद लहा। तेहि समय श्रीहनुमान प्रभुको भाइ सन्देश्यो कहा ॥ मन हरष भरत सुनाइ गुरुहँ मातु सकल बुला- इके। कहि खबरि श्रीरघुवीरको तिन सजे मङ्गल जाइकै॥ शुरु बन्धु संयुत चले प्रभुपर रिखि पदपराज गहे। धरि भरत सुज उर ल्याइ प्रभु राजीवलोचन जल बहे। पुनि प्रेम- युत सब मातु भेटौं निरखि प्रभु हुलयो थियो। तिन कनक मणिगण बसन भूषण भांनि महिदेवन दियो॥ शभ समय जानि वशिष्ठ वेगि लिवाइ लियो सुमन्तको। सब राजसाज सम्हारि तेहि क्षण राज दियं भगवन्तको । सिय सहित रघु- कुलमणि बिराजत सुभग सिंहासन परें। सुर सुमन बरषहिं - SH - रामायण छन्दावलो। हिये हरहि ब्रह्मादि लब जे जे करें॥ गहि क्षत चामर चमर अति धनु वौर तरकसके लये। भरतादि अनुज विभौषशानद हनुमान चित चरणन दये। सुनु सिया श्रीरघुबारको अवि- वेक सुनि उर धरे। कह दास तुलली जन्मशुख लहि जलधि जग बिन नम तरे ॥ दोहा। नित नव मशाल अवध- पुर करहिं सकल नरनारि ।। लहहि चारिफल अछत तनु रघुबरक्षप.निहारि॥ छन्द ॥ नित प्रौति सरित अन्हाइ बन्धु- न सहित प्रभु भोजन करें। गज बाजि राजसमाज लखि सब देखि बन उपबन फिरें। बैठे सभामहँ जाइ औरघुबौर दुःख सबके हरे। इरिन्याव खान उलूकको लखि लोग सब विलय करे। माण्डवी श्रुतिकिरति उरमिलासो सबनि सुत केंद्र जने। जानकी सुत युगल जाये सब निगम आनंद घने । सनकादि नारद आदि सुनिवर सकल अवधहि झावहौं। लखि जाहि रघुवरके चरित सब विधिहि जाय सुनावहौं। यक बारको महिदेवको सुत सभामई यायो भयो। गुरु बूझि तपते मारि पदहि तबहिसे उठि जिय परयो । यहि ऑति रामचरित्र परमपवित्र नित नूतन करें। कहि दास- तुलसी सुनत सबके बचन मन पातक टरै ३॥ दोहा। सुनि सौताके युगल सुत्त राम कौन्ह अनुमान ॥ लोन लिखावन दोन्ह हित बोले श्रीभगवान ४ ॥ इति चौउत्तरकाण्ड समाप्तम । Dan- तुलसी खतलाई॥ नमो नमो नोत्तन प्रभु परमातन परधाम । जेहि सुमिरत लिव होत है तुललो जन जन जान ॥ राम बाम विधि जानकी लमण माहिती पोर ॥ ध्यान लन्डन कल्याणकर तुलली सुलक तोर॥ परमपुरुष परधाम वर जापर अपर न जाल। तुलसी तो लाभुकात हुनत रच सोई निर्वान ॥ लाल सुखद गुण जास्तु लो राम कामनाहौन। लकण काम- प्रद सहित तुमसौ कहहिं प्रवीन । जाके रोल प्रति समित अभित हाराहा तो देखत तुलसी प्रकट नमल सु- सान्चल प्रचन्ड जातजानि नोजागको जनक राम शुभ रूप। जातु रूपा अतिभवहरकिरणि विवेक अप । तात না ল ব ল ভ স । ন ননী নলি লাৰ सिमि लजि घर तर परदेश ॥ पिता विवेकनिधान वर मातु दमा युत नेह। तासु सुवन किनि पाइ है अनत अटन तजि गेह । बुद्धि विनय गतिहीन शिशु सुपथ अपच गत जान। जननि जनक तबिकिनि तजे तुललौ सरिस अजान ॥ मात तास सियरामरूल बुधि विवेक परमान। हरत अखिल अघ सलग तर लव बुसती का जान॥ जिन्हते उद्धा वर विभव ब्रह्मादिश संसार। गति तासु तिनकी कृपा तुलसी बदहि विचार॥ शशि रवि सौताराम नल तुलली उरलि प्रमाण ॥ उहित सदा चायवल न सो कुबलिल ललकर हान॥ तुलसी कहत विशार शुरु राम सरिल नहिं आन। जासु कृपा शुचि होलि लचि विवाद विवेश प्रमान॥ सरसरूप अनूप भल तुलसीसताई। हस्त संकल्ल मलमूल। तुलसी मर्म हियो गलहि उपजस सुख शनुभूल ॥ रेफरभित परमातमा सह क्षार लिय रूप। दीरध मिलि विधि जीवन तुलसौ जामा अनूप ॥ अनुसार कारणा লৰ জীং স্কুল স্য। জি স্মাহ লক্ষ্য হল ৱর্মী हरि दातार ॥ ज्ञान विरागै अक्ति सह अति तुलसौ पेषि। নুষ নি সা সুলুল্লহুদা ভিলা দ্বিগ্ন ঘিঙ্গি। জ্বাল मनोहर जानि जिय तुललौ करि परमान॥ वरण विपर्यय भेदते कहो सकख शुभ जान ॥ तुलसी शुभ कारण समुकि गढ़त रामरस नाम। सशुभहण शुचि शुमार अक्ति ভাল আঙ্গ। লক্ষ্মী হঙ্গি লাশ ব ল য় ল হল। तासु अजन लिहीन अति चाहति गति परमान शहि रस- ना थन धेनु रस गणपति विन गुरुवार । माधव सिलसिय- जनम तिथि सतलैया अवतार । भरण हरण अलि अमिति विधि तत्त्व अर्थ कविरीति। सबैतिक सिद्धान्त मत लुलसी वदन विनीति ॥ विमल बोध कारण सुमति सरसैया सुखधाम । गुरुमुख पढ़ि गति पाद हैं विरति भक्ति भिराम ॥ मन भय जरसत लाग युत प्रकट छन्द युत होइ । सो घटना शुअक्षा सदा. कहल सुकवि सब कोइ ॥ जल समान तल बान लघु अपर वेद गुरु मान संयोगादि विकल्प पुनि पद न अन्त कहं जान ॥ दौरच लघ करि तहँ पठव जई मुख वहि विनाम।. प्रास्त प्रकट ভুল ভুল গণি নৃ ৰা ৷ যুৱ নীল স্বত্বা ন যা- मसोजुललधु होइ । लघु गुरु रमा प्रलक्षगन युगलहु हम सोचा सहसनास मुनि भनिय शुनि तुलसौ बलम लाम। सङ्घचति यह हलि निरख लिय घरमधुरन्धर राम । दम्पति रस रसना दशन परिजन बदन सुमेह : तुलसौ हर हित वरण शिशु सन्यति सरल सनेह ॥ हिय निर्गुण नेरल सशुख रसना राम - ३ तुलसीसतसई ! सुनाम। सनहुँ पुरट सम्पुट लसत तुलप्तौ ललित ललाम । प्रभु गुण गण गण वलन वचन विशेष सुदेश। रामसुकौरति कामिनी तुलसी करसब केश ॥ रघुबरको रलि लियबदन इव कह तुलसौहास। शरदप्रकाश शाशछवि चारु चिबुक तिल जाल ॥ तुलसौ शोभत नखलगण शरदसुधाकर साथ। मुक्ता सालर सालक जतु रामसुयश शिशु हाथ ॥ बातम सध्य विवेक बिनु राम सजत मलसात। लोक सहित पर- लोकको अवश विनायी बाल ॥ बरू मराल मानस तजे चन्द्र शौत रवि घाम ॥ सोर सदादिक जो तजै तुलसी तजैन राम॥ आसन दृढ़ माहार हद सुमति ज्ञान हद होय । तुलली विना उपासना बिनु दुलहेको जोध ॥ रामचरण बावलम्ब बिनु परमारयको शाश। चाहत वारिदबुन्द गहि तुलौ चढ़न प्रकाश ॥ रामनाम तरुलूल रल प्रष्ट पत्न फल एका युगल सन्त शुस चारि जग वरणात निगम अनेक । राम कामता परिहरल सेवत कलितरु , ठ। स्वास्थ परमारथ चहत सकल मनोरथ रंठ ॥ तुलसी केवल कामना राम- चरित माराम। निशिचर कलि कारि निहत तरु मोहि कहत विधि बास स्वारघ परमारथ सकल सुलभ एकही शोर । द्वार दूसरे दौलला उचित न तुलसौ तोर ॥ हितसम हिल रति रामसन रिएसन वैर विहाव ॥ उदालीन संसारमन तुलसी लहज सुभाव ॥ तिलपर राखै सकल जग विदित विलोक्त लोग ॥ तुलसी महिमा ससमको को जा जानन योग ॥ जहाँ राम तह काम नहिं जहां काम नहिं राम। तुलसौ कनहीं होत नहि रवि रजनी दुक : ठाम ॥ राम दूर साधा प्रबल घटति जानि अलमाहिं। बदलि भूरि रवि दूरि लखि शिरपर पंगुलर छाहि ॥ सम्पति सकल জন্য কী - ४ तुलसीसतराई। ॥ पूलाला लल नहिं होय। बाल सोइ शनि रामपद तुलती अलग न लोय ॥ तुली तो सी चला राजनरल लव- तोन। पालन परधान हरखका जिका परन पोन चतुराई चूलहे पर या पाहि ज्ञान हि खाय॥ तुलसी प्रेम न रामपद सब जर झूल नशाय ! प्रेम शरोर मच राम उपजी बड़ी उपाधि ॥ तुलसी अलौ लो वैवई वैणि बांधई व्याधि॥ राम विटष तर विजद वर पहिला सधन अपार । जाकहूँ जहलगि पहुँच है ताका ततगि डारहुललो कोशलराज सजु जनि बितवे चोर । पूरण राल ल सुख का निज नवन चकोर ॥ ॐ चे नोचे लिख हरि- पद परम पियूज। तुलसी काम स्यूगो लागे कोनेउ रकम ॥ स्वामी होलो लहज है दुर्लभ होको दाल। गाउर लाये जनको लागौं चरै कपाल॥ बलव नोति पर रामपाल निवाड- बनी। तुलसौ पहिरिय लोवसन जो नथ वारत फोका।। तुलसी रामकृपालुते काहि सुनाव गुण योग। होउ नरों दौलता परम पौल सन्तोष शुभिरन सेवन रामपा रान- चरा पहिचान । ऐलेहुँ लास नसतक रन तो तुललौ दिन- हाल ॥ सब लड़ी बाधक लये लायक भये न कोय । तुबलीराम- कपालुतें सलो होघ सो होय ॥ तुलसी मिट नवलमा भये कल्पतरूलाह। जबलम बैन हीर छमा जनकलताको नाइ॥ विमल विलग सुख निकट दुख जीवल सस्य सुरोलि। रहिल राखिये रामको तजेरो उचित राजौलि॥ जाय जब करति बिनु जाय योग बिन लेन। तुसली जाय उपाय लब बिना रामपदा॥ तुला माहिं परिहरी निष्ट हानि सुतु. मोद। जिमि सुरसरिगल खिल वर सुरा सरिल गगोद ॥ हरे चहि तापहि बरे फरे पसारहिं हाथ। ।
५. - तुल्सीसताई। तुलसी खारय मोल जग परमारक रघुनाथ। हुबली खोटे दासकर राख वर मान । ज्यों रखउ पहिहिदिल क्षान बजलान॥ च्यों जग बी सोगको मा लहित परिवार। यो तुलसी रघुनाथ दिन झापनि दमा विचार तुलसी राम सरोल शिर लिये पाप धरि मोट। ज्यों व्यभिचारी नाशिकहूँ बड़ी खसमको कोटा लागी सोतानाथकी तुमलगिरी दौर। तुलसी बाग जहाजको जूसात ओर न और ॥ तुन्तली सब छल झाड़िो कीजै राम सनेह। अन्तर पालियों है कहा जिन देखी सब देह सबही कोप रखे लो नहुन कहे का होय। तुलसी तेरो राम तलिहित जग और न कोय ॥ तुलसी हम- सों राममो भलो निलो है दून। छाड़े बने न सँग रहे ज्यों घर- माह कपूत ॥ कोटि विश्न सकट विकट कोटि मन जो साथ। तुजली बल नहिं करि लमें जो सुखष्ट रघुनाथ ॥ लगन मुहूर- त योगनल तुलली जनरा न काहि। राण सवे जेहि दाहिने सबै दाहिने ताहि॥ शशु प्रभुना जाहँदई बोल सहित गहि बांह। तुलसोते गाजत किरहिं रामसको हात. साधन सासति सब सहत सुमन सुखद फल लाहु ।। तुलली चालक जलद को रोजि शि बुध काहु। चालक জীবন ভ ল ম মুহীয়ি। বৰ ভাল ব্যাক্সি परत है तुलनौ प्रेमप्रलौति-॥ जीव चराचर जहलगे है लब- को प्रिय मेह। तुलसी चातक सन बसो बनसों सहज सनेह ॥ डोलत विषुस बिइङ्ग बन पियत पोखरोबारि। सुयश धवल चातक नवल तोर भुवन दंशबारि, सुख मोठे मानल मलिन कोशिल मोर चोर। सुयश ललित चालक बखित रहौ भुवन सरि लोर.॥ सांगत डोलत है नहीं तजि घर अनत न जाल। तुलसी चालक सतकी उपमा देत लजात ।। ॥
तुलसीसंतगई। तुलसौ तीनों लोकमहँ चालक होको लाथ। सुनियत जा- सुन दोनता किये दूसरे नाथ ॥ प्रौति पपोहा पयदकौ प्रकट नई पहिचान। याचक जगत साधीन इन किये कनौड़ो दान॥ ऊचौ जान पपोइरा नौचो पियत न नौर। के गांचे घनध्यामलों के दुख सहै शरीर ॥ कै बरबै घन समय शिर कै भरि जनम निराश ॥ तुलसी चातक याचकहिं त- ऊ लिहारौ आश॥ चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयो- दके दोष। याते प्रेमपयोधि बर तुललो योग न दोष ॥ तुलसौ चातक मागनो एक एक घन यानि ॥ देत सो सूसाज- न भरत लेल धूट भरि पानि । छै अधीन याचत नहीं शोश नाय नहि लेय। ऐसे मानी मांगनहिं को वारिद बिन देय ॥ पवि पाइन दामिनि गरज अति भाकौर खर खौकि। दोष न प्रौतमरोष लखि तुलसी रागहि रोक॥ कोन जियाये जगतमहँ जीवनदायक पानि। भयो कनौडो चातकाहिं पयद प्रेम पहिचानि। मान राखिनो मांगिबो पियलों लहज लनेह। तुलसौ सोनों तब फ. जब चातक मन लेह! तुलसी चातकही फबैं यान राखियो प्रम। वक्तुबूद लखि खालिको निदरि निबाहत नेम ॥ उपल बरषि गरजल हरजि डारत इलिश कठोर। चितव कि चालक जलद तजि कबहुँ धानको ओर ॥ बरणि परुन पाहन जलद पक्ष करै टुक टक। तुलसौ तदपि न चाहिये चतुर चालकाहि चूक ॥ रटत रटत रसना लटौ तृणा सूखिगो भाङ्ग। तुलसौ चालककै हिये नित नतनहि तरज॥ गङ्गा यमुना सरखती सातसिन्धु भरिपूर। तुलसौ चासकके मते बिन स्वाती सब धूर ५ तुलसौ चालकके मते खाती पिघत न पानि। प्रमषा बढ़तौ भली घटे घटेगी कानि ॥ सर सरिता चातक तजे स्वाती सुधि नहिं लेइ।
FUCmu तुलसी सेवक वश कहा जो साहब नहि देव । शाश पपौहा पयदको सुनु हो तुलसीदास। जो अंचदै जल स्वासिको परिहरि बारहमास॥ चातक घन तजि दूसरे जियत न नाई नारि। मरत न मागे अर्द्ध जल सुरसरिहूको वारि॥ व्याधा बधो पपीहा परो गङ्ग जल जाय। चोंच मंदि पौवे नहीं धिम पिय मों प्रण जाय। बधिक बधो परि पुण्यजल उपर उठाई चोंच। तुलसौ चातक प्रसपट मरत न लायो खोंच ॥ चातक नुतहि सिखाव नित आन नौर जनि लेहु। ये हमरे हालको धरम एक स्वात्तिसों नेहु ॥ दरशन परशन आन जल बिनु स्वाती सुजु तात। सुनत चेचुवा चित चमो समुकि नौति पर बात तुलसी सुतमे कहत हैं चातक बारस्वार । तात न तरपन कौजियो बिना बारिधरबार ॥ बाज चङ्ग गत चातकहि भई प्रमकी पौर। तुलसौ परबश हाड़ मम परि. है पहुमौ नौर ॥ अण्ड फोरि किय चेचुवा तुषा परी नौहार । गहि चङ्ग ल चातक चतुर डालो बारहि बार ॥ होय न चातक पातको जीवनदानि न मूढ़। तुलसी गति प्रहलादको समुझि प्रेमपद गृढ़ ॥ तुलसीके मत चातकहि केवल प्रम- पियाल। पियत स्वातिजल जान जग तावत बारहमास ॥ एक भरोसो एक बल एक आश विश्वास। स्वातिसलिल रघुनाथ वर चातक तुलसीदास ॥ आलवाल मुक्ताहलनि हिय सनेह तरूमूल। हे हेरू चित चातकाहिं स्वातिसलिल. 'हातुमाल ॥ रामपुम बिन टूबरे रामपम सह पौन। विशद सलिल सरवर वरन जन तुलसौ मन मौन ॥ आप बधिक वर वेष धरि कहै बारङ्गमराग। तुलसी ज्यों मृगमन सुरें परै प्रेमपट दाग इति प्रभ भक्ति निदेशः धमः सर्गः १ ॥ । : १ ! तुलसीपलाई। ॥ । खेलत बाईक चाल सँग पावक लेखत हाथ। तुलसी मिपितु मातु इन राखत लिव रखनाथ तुलसी केवल सपन लागे सरल सहतो घर घट बन वाटलह कतहुँ रहे किन त के भारत का रामपाल कै मनता का हेल । सुलती दोन एक जान खेल कॉड़िछल खेल॥ दो तोहि लागाहे राम पिप के तु राज विष होछि। हुन उचित सुमल लमुलि तुलतो करतब लोग रावारिको दाल लंग सयर मालहिं अदाल। जसूजन भारीच ला खूढ़ भये कश . काल तुलसीपति दमारमहँ का बल कछु नाहि । हो कलपत किरल चूक चालौनाहि । राम गरीव- नया है राजदल जन जानि। तुती सन परिहल नहिं शुचिनियाको कानि॥ घर को घर होत हैं घर छोड़े घर जाय। तुलसी घर बन बौचाही रही अपराय ।। टिना लको तुलती खता न बाय। तरिकाईते परिमो धोखे पूलिग काय खुजली बिलम न कीगिये अजि सौजे रघुनौर। लनतरवासी बात है बस खारिजे तौर ॥ सामनाम सुमिरत हुयश साजन भये कानाति। बालस डासुन सुराजवन खम्त सुवन सुवन शिल्यति॥ कामवासन लाखि अनु नरकीतिक वात। लवरपर गिरिवर तर यों तलवर- के पास ज्ञान जरीको गुण धरल नरम बचन निरमोन तुकलो हुँ न झाड़िये शोल सत्य सन्तोष ॥ शन वसन तुलनारि बुल पाठिी घर हो। लन्त समागम रालधन तुसलो दुर्लभ दो तुललो तौलियो बसे अधि पाइये वाह। देशहि साधन पाये सर सरिता शवगाह । डग ত্ব হল এর গ ল ল ৰা। বলী জিই कर्मवश्व बहल तत्त ने बार ॥ तुलसी हरि सापमानते होत - तुलसोसतसई । है। मकाज समान। राज करत रज मिलि गयो सदल लाल कुरुराज ॥ तुलसौ मोठे वचनते सुख उपजत चहुँ ओर। वशी- करण यक मन्त्र है परिहरु वचन कठोर ॥ रामरूपाते होत सुख रामकृपा बिन जात ॥ जानत रघुबर मजनते तुलसी शठ अललात ॥ सन मुख हे रघुनाथके देहु सकल जग पौठि। तजे केचुरी उरगाह होत अधिक अति डोठि॥ मरयोदा दूर- हि रहे तुलसो किये विचार ॥ निकट निरादर होत है जिमि सुरसरिवरवार ॥ राम कृपानिधि स्वामि मम सब विधि पूरणकाम। परमारण परधाम वर सन्त सुखद बलधाम।। रामहि जानहि राम रट भजु रामहि तजु काम। तुलसी राम अजान नर किमि पावहिं परधाम तुलसौ पति रति शल सम सकल साधना सून। अङ्क रहित का हाथ नहिं सहित अङ्क दश गून ॥ तुलसौ अपने रामकहँ भजन करहु इक अङ्क। आदि अन्त निरबाहिबो जैसे नवको अङ्क ॥ दुगुणे ति- गुणे चोगुणे पच पष्ठी सात। आठौते पुनि नव गुणे नवके नव रहि जात ॥ नवके नव रहि जात है तुलसौ किये बिचार। रमो राम इमि जगत में नहीं देत विस्तार ॥ तुलसी राम सनेह करू त्यागु सकल उपचारू। जैसे घटत न अङ्क नव नवके लिखत पहारू ॥ अङ्क अगुण आखर सगुण समुभाड उभय प्रकार। पोये राखे आप अल तुलसौ चारू विचार ॥ यहि विधिते सव राममय समुसहु सुमतिनिधान। याते सकल विरोध तजु भजु सब समुझुन आन ॥ राम कामनाही. न पनि सकलकामकरतार। याहौते परमातमा अव्यय अमल उदार ॥ जो कछु चाहत सो करत हरत भरत गत भेद। काहु सुखद काहू दुखद जानत हैं बुध वेद ॥ सन्त कमल मधु- मास कर तुलसौं बरण विचार। जग सरवर तर भरण कर - २ r । १० तुलसीपतसई। जानहु जलक्षातार ॥ एक सृष्टिमह जाहि विधि प्रकट तौनि तर खेद। सात्विक राजस तम सहित जानत है बुक्ष वेद । ताविधि रघुवर नाम कहँ वर्तमान शुख तौल। चन्द्र सान अणि सलल विधि हरि हर कहहिं प्रबौन । अनल स्कार प्रकार रवि जानु सकार भयक। हरी सकार रकार विधि सन महेश निःशक बनन ज्ञानकह दहन कर अनल प्रचण्ड श्यार। हरि चकार हर मोह लय तुलली जहहि विचार । লিবিদ্ধ না হ ম ভ লাল মাংস লঙ্কা। নিধি হি हर गुण लीनिको तुलसी मास धार । भानु कृशानु भयकाको कारण रघुबर नाम। विधि हरि शशु शिरोमणी प्रणत सकल सुखधाम ॥ अगुण अनूपम सगुणनिधि तुलसौ जानत राम। करता सकल जगत्तको अरता सब मन काम । इल मुकाट सम विद्धिप्रल तुलसी युगल हलन्त । सकल वरण शिरपर रहल पहिमा असल सनन्त ॥ रामानुज सदगुण विमल घ्याम राम अनुहार। सरता भरत सो जगतको तुललो ललत कार ! राजत राजलतानु जब वर धरणो धर धीर। विधि विहरत प्रति झाशु करि तुलसौ जनगण पोर ॥ हरण कारण सङ्कट लतर समर धौर बलधाम। मा महेश अरिदेवनदर लणण अनुज गरि काम ॥ राम लदा लाशोल घर सुखसागर पर- थाल। अज कारण अद्वरत मित लसतर पद अभिराम ॥ होन- हार सहजान लब विभव बीच नहि होत। गगन गिरह करि- वो कौ तुलसी पढ़स कपोल॥ तुलसी होत लिखेन हिल तन्न शुख दूषणधाम। अनरण लिखिन करने को भट विलोम কিন্তু অ স গ জল বৃহু লা ? अतल वन उपदेश कैहि जात सुउलटि शकाल. विविध चित. जल पल बिच अधिक जून सह कब कौने तुलसी तुलसीसतसई। रचे वैहि विधि पक्ष मयूर ६ काकता गृह ना करे यह अचरजु दड़बाय। तुलसी कहि उपदेश सुनि जनिल पित्ता घर जाय ॥ सुपथ अपथ लीन्हे जानेल ख स्वभाव पदु- लार। तुजलो सिखवत नाहिं शिशु लूपबहन न मजार ॥ तुलसी जानत है सबल चेतन मिलल सचेत। कौट जात उड़ि तिय निकट विनहिं पढ़े रति देत ॥ होनहार सब बापुले वृधा घोच कर जौन। बस स्टङ्ग तुजली सुगन कहहु उमेठत कौन । सुख चाहत सुलमें बसत है सुखरूप विशाल। सन्त- त जा विधि मानसर कहुं न तजत मालानौति प्रोति यश अयश मति लवकहँ शुभ पहिचान। बस्ती हस्ती हस्तिनी देत न पति रति दान ॥ तुलसी सपने दुखदते को कह रहत बजान। कौश कुन्त अकर बनहिं उपजत करत निदान । यथा धाथि सब बीज नखल मनाथ निवाल। तथा राम सब धर्ममय जानत तुलसीदास ॥ पुहमी पानी पावकह पंवन माह समात । ता कह जानत राम अपि बिलु गुरु कि- मि लखि जात ॥ अगुण ब्रह्म तुलसो सोई सगुण विलोकत सोइ। दुख सुख नाना मालिको तेहि विरोधते होइ॥ शूर यथा गण जौति सरि पलटि भाव चलि गेह। तिमि गति जोनहि रामको तुलली सन्त सनेह ॥ परमातमपद राम पुनि लोजे लन्त सुजान। जे जगमहँ विरचहि घरे देह विगत अभिमान ॥ चौधो संज्ञा जीवको सदा रहल रत काम। ब्रह्मणोलन रामपक्ष निशि वालर बमबाल मुल्ल पाये हणत हँसल खोकल लहे विषाद। प्रकटत दुरत लिस्य पर- ব উন হল নিল । লালা নিঘিজী না লালা নিধি- को लोग। सूक्षम अस्यूल लन कबहुँ तजत नहि रोग ॥ जै- से अष्ठीको लदा गलिल रहत दोउ देह। विन्दहुली गति तै- -1 ॥ १२ तुखसोसतसई । लिये अन्तरहू गति एह॥ त्रिधा देह गति एक विधि कबहूँ मागति आन। विविध कष्ट पावत सदा निरखहिं सन्त सुजान ॥ रामहिं जाने सन्तवर लन्तहि राम प्रमान। सन्त- न केवल राम प्रसु रामहिं सन्त न आन ॥ ताते सन्त दयाल वर देहि राम धन रोति। तुलसौ यह जिय जानिके करियत हठि अति प्रीति ॥ तुलसी सन्त सुअम्बतरू फूलि फरहिं पर- हेतु। दूतते वै पाहन हनें उत्तते वै फल देतु ॥ दुख सुख दोनों एकलम सन्तनके मनमाहिं। मेक उदधि गति लकर जिमि भार सौजियो नाहि ॥ तुलसी राम सुजानकी राम जनावै लो। रामहिं जानै रामजन आन कबहुँ ना होइ ॥ सो सुरू राम सुजासुस्लम नहीं विषमता लेथ । ताकी कृपा कटाक्ष- ते रहे न कठिन कलेश॥ गुरुकहूँ तब समयो सुनै निज कर- लवकर भोग। कह तब शुरू कर लब को सिट सकल भव- लोग ॥ शरणागत तेहि रामके जिन्ह हियधी सियक्षप। जा पद पाये पाइये मानद पद उपदेश। संशय शमन नशाय सब पावै पनि न कलेश ॥ मेधा सौता सम समुक गुरु विवेक लम राम । तुलसी सिय लम सो सदा भयो विगत मग वान सादि मध्य अवसान गति तुलसौ एक समान। तेई सन्त लक्षप शुभ जे डानीत गति आन ॥ एई शुद्ध उपासना परा- भक्तिकी रोति । तुलसौ यहि मगु पगु धरे रहे रामपद प्रोति । 'तुलसौ बिन गुरुदेवकै किमि जान कहु कोय। जहँते जो आयो सो है जाय जहाँ है लोय ॥ अपगत ये सोई अवनि लो पुनि प्रकट पताल । कहाँ जनम अपि मरणमपि तमुकाहि सुख-.. तिरसाल ॥ सङ्ग दोषतते भेद अस मधु मंदिरा मकरन्द । गुरु जलते देखहिं प्रकट पूरण परमानन्द ॥ डावर सागर कूपगत भेद दिखाई देत। है एक दूजे नहीं द्वत आनके हेत ॥ गुण- - ॥ तुलसीसतसई । गत नाना भांति तेहि प्रकटत कालहि पाय। जान जाय गुरु ज्ञानते बिन जाने सरमाय ॥ तुलसौ तरु फलत फलत जा विधि कालहि पाय। तैसेही गुण दोषते प्रकटत समय सुभाय ॥ दोषहु गुणको रौति यह जानु अनल गति देखि। तुलसी जानत सो सदा जेहि विवेक सुविशेरिन ॥ गुरुते आवत ज्ञान उर नापत सकल विकार। यथा निलय गति दीपक मिटत सकल अधियार ॥ यवपि अवनि अनेक सुख तोय ता- सु रस ताल । सन्तत तुलसी मानसर तदपि न तजहि मराल ॥ तुलसी तोरत तौर तरू मानस जहँ सविहार। विगत नलिनि अलि मलिन जल सर सरिहू बडि आर ॥ जो जल जीवन जगत को परसत पावन जौन। तुलसौ सो नीचे ढरत ताहि निवारत कोन । जो करता है करम को सो भोगत नहिं आन। बबनहार लेनि है सोई देनी लहै निदान। रावण रावणको इन्यो दोष रामकहँ नाहिं। निज हित अनहि देखु किन तुलसी आपहिमाहिं । सुमिरु राम भजु रामपद देखु राम सुनु राम। तुलसी समुकहु रामकह अहनिशि इह तब काम॥ रज अप अनल शनिल नभ जड़ जानत सब कोइ। इह चैतन्य सदा समुक कारजरत दुख होइ ॥ निजकृत बिल- सत सो सदा बिन पाये उपदेश। गुरुपगु पाय सुमग धरै तुलसौ हरै कलेश सलिल शुक्र शोणित समुक पल अरू अल्यि समेत। बाल कुमार युवा जरा है सुसमुक कर चेत ॥ ऐसिहि गति अवसानको तुलसी जानत हैत। ताते यह गति जानि जिय अबिरल हरि चित चेत ॥ जाने रामस्वरूप जब तब पावै पद सन्त ।. जन्म मरण पदते रहित सुखमा असल अनन्त ॥ दुखदायक जाने भले सुखदायक भजि राम । अब हमको संसारको सब विधि पूरणकाम ॥ श्रापहि मदको ॥
। २४ तुलसीसतसई। पान करि आपूर्ति होत अचेत। तुललो विविध प्रकारको दुख उतपति यहि हेत ॥ जालों करत विरोध हठि बहु तुलसी को आन। सोत शमन न शान लव नाहक होलि मलान । चाहसि सुख जेहि मारिके सो तो मारि न जाय । लौन लाभ विमते बदल ते तुलली विष खाय ॥ कोह द्रोह अघस्नुल है जानल को कहु नाहि। दया धर्य कारण समुकि को दुख पावत तोहि॥ बनो बनायो है सदा लमुल रहित नहिं शुल्द । अरुण बरण केहि कामको बास बिनाको फल ॥ इलि द्वितीयः सर्गः जनकसुता दशयानसुत उरग ईश समजौरि। तुललि- दास दशपद परखि अवसागर गयो पौरि॥ तुलसी तेरो रोग खर तात मात गुरुदेव । तात जितोहौं उचित राब रुचित आन पद सेव। तर्क विशेणि निषेध पति उर मानतु सुपुनीत। बसत सशतल रहित करि तेहि अजु' पलट विनील ॥ शुक्लादिहि कल देहु इक अन्त लहित सुखधाम । दे काला कल अन्तको मध्य सकल सुखदान। बौज धन- जय रवि सहित तुलसी तथा भयङ्क। प्रकट तहाँ नहिं तम तमो समचिल रहात सशक॥ रचन कानन कोसनद बंश बिमल अवलंत। गजन पुरहुत परि लदल जगहित मानस हंस॥ जगते रह छत्तौल है रामचरण छत्तौन। तुलसी देखु बिचारि हिथ है यह मतो भवौन ॥ बन्दिन दून नक्षल हनि गनी शनुज तेहि कौन्ह। जेहि हरि कर मनिसान हनि तुलसौ तेहि पद लौन्ह ॥ शिला शायु मोचक वरण हरण सकल जञ्जाल। अरण करण सुख सिद्धितर तुलसी परमा कृपाल। सरण बिपति हर घर धरम धराधरणा बलधास। शरण तासु तुलसौ चहत बरण अखिल अभिराम ॥ विहा - ॥
१५ तुलसीरताई। बौयित लितय पति पति तुलसी बोर। तासु निमुख रुख प्रति विजम सपनेहु होत न सोर। द्वितिय कोल राजिव प्रथम बाहुन निचय साहि। नादि एक कल दे मजहु वैद विदित गुण नाहि ॥ बसत जहाँ रावव जलज तेहि मिति गोलक्षिलग। भजु तुललौ तेहि अपि सुपद करि उर प्रेम अमङ्ग॥ अजहु तरणिभरि आदिकह तुलसी शात्मज अन्त पचानन हि पदम अघि गहे विमल मन सन्त । बनिता शैल सुतालको तातु जनमको ठाम। तेहि भजु तुलसौदाल हित प्रसत सकल सुखधाम॥ सजु पतङ्गसुत आदिकहूँ मृत्युञ्जय अरि अन्तु। तुललो पुहकर यज्ञकर वरण पातु- पिच्छन्तु ॥ उल्टे लासी तासु पति सौ हजार मन सत्य ॥ द्वितिय दृतिय हर कास नहिं सज तेहि तुलसौदास। काका- सन आसन विये सासन लहे उपास ॥ भादि द्वितिय अव- तारकह सजु तुलसी कप अन्त। कमल प्रथम बरु मध्य सह वेद विदित मत सन्त ॥ जेहि न गन्बो कसु मानसहु सुरपति चरि मौ आस। तेहि पद शुचिता अवधि भव तेहि. सजु तुलसीदास । नैनकरण गुणधरण वर तावर वरण विचार। चरण सलर तुलसौ चहसि उबरन शरणमधार । रुजु हरि शादिहि वाटिका सरिता राजिव. अन्तः। करिता पद विश्वास भव सरिता तरसि तुरन्त ॥ जड़ मोहन वरणादि- कह सह चञ्चल चित चेत। अजु तुलसी संसार अहि नहि गहि करत अचेत ॥ मरण अधिप वारण वरण दूसर अन्त अगार। तुलसौ इषु सह रागधर तारण लरण अधार॥ ज्यों उरविज चाहसि कटित तौ करि घटिल उपाय। सुमन सवर वर अरि- चरण सेवन सरल तुमाय॥ द्वितिय पयोधर परमधन बाग अन्त युल सोय। मजु तुलसी संसार हित याते अधिक न
तुलसीसतसई।
कोय ॥ पति पयोधि पावत पवन तुलसौ करहु विचार ।
शादि द्वितिय अरू अन्तयुत तामत तव निरधार ॥ हंस कपट
रस सहित गुण अन्त आदि प्रथमन्त। अजु तुलसी तजि बाम:
गति जेहि पद रत भगवन्त ॥ कना समुकि कवरण हरह
अन्त आदि युत तार। श्रीमर तमहर वरण वर तुलसी सरत
उबार॥ अकादशारस आदि युत पाण्डुलूलु सह अन्त।
जानि सुवन सेवक सतर करि है छपा परन्त ॥ झटिति
सखाहि विचारि हिय आदि वरण हर एक। अन्त प्रथम
स्वर दे भनहु जा उर तत्त्व विवेक ॥ आदि चन्द्र चञ्चल सहित
मज तुलसौ तजु काम। अघगञ्जन रचनसुजन भवभञ्जन
सुखधाम ॥ विगति देह तनु जासु पति पद रति सहित
सनेह। यदि सति मति चाइसि सुगति तदि तुलसौ करू प्रेस ॥
करता शुचि सुरसरिसुता शशि सारंग महि जान। आदि
अन्तसह प्रथम युत तुलसी लमु न आन ॥ गिरिजागति
कल आदि दूक हरि नक्षत्र युधि जान । आदि अन्त भजु अन्त
पुनि तुलसौ शुचि मन मान ॥ ऋतुपतिपद पुनि पदि-
क युत प्रथम शादि पुर लेहु। अन्त हरण पद द्वितियमहँ
मध्य वरण नह नेहु ॥ बाहन शेष झुमधु परव भरत नगर युत
जान । हरि भरि सरित विपर्य करि आदि मध्य अवसान ।।
तुलसौ उडुगणको वरण बनज सहित दोउ अन्त । ताकह
भज संशयशमन रहित एक कल अन्त ॥ वारिन वारिज वरण वर
वरणत तुलसीदास। आदि आदि भजु आदि पद पाये परम
प्रकाश ॥ भजु तुलसौ कुलिशान्तकहँ सह अगार तजि काम।
सुखसागर नागर ललित बली अली परधाम ॥ चञ्चल सहि-
तरु चञ्चला अन्त अन्त युत ज्ञान । सन्त शास्त्र सम्मत समुझि
तुजसी करू परमान॥ आदि बसन्त दूकार देबाशय ता-
तुलसी सतसई। १० तु विचार। तुलसी तासु शरण पर कातुन भयो उबार ॥ धरा धराधर बरण युग शरण हरण भवभार। करन सतर तर परम पद तुलसी परमाधार ॥ वरन धनञ्जय सूतपति चरण शरगा रति नाहि। तुलसी जगवञ्चक विठि किये विधाता ताहि । तुलसी रजनी पूर्णिमा हार सहित तखि लेहु। आदि अन्त युत जानि कहि तुलतरसनलसनेहु॥ भानु गोत तिमि तासु पति कारण अति हित जाहि। ज्ञान सुगति युत सुखसदन तुलसी मानत ताहि ॥ भजु तुलसो औषादिकहँ सहित तत्त्व युत अन्त। भव आयुर्जय जासुबल मन चल अचल करन्त । देत कहा प काजपर लेत कहा इत राज। अन्त आदि युक्त सहित भजु जो चाहसि शुभ काज॥ चन्द्रवलि सजु गुण सहित लसुकि अन्त अनुराग। तुलसौ जो यह बन परै तौ तब पूरण भाग ॥ जिनके हरि वाहन नहीं दधिलुत सुत्त जेहि नाहिं। तुलसौते नर तुच्छ हैं विना समोर उड़ाहि ।। रवि चञ्चल अरू ब्रह्म द्रव बौच सुबास विचारि। तुललि- दाल आसन करे अवनिसुता उर धारिः बन बनितागको- पमा युत करू सहित विवेक। अन्त आदि तुलसी मजहु परि- हरि मत कर टेक ॥ उौं अन्तहु आदि युत कुल शोसो कम- लादि। कै विपश्यं ऐसेहिं भजहु तुलसी शमन विषाद॥ तो तोहिकह सब कोर सुखद करहि कहा तव पाँच । हरब टतिय वारिज वरण तजव लौन सुतु साँच ॥ तजहु सदाशुभ आशभरि भजु सुमनस अारिकाल]। सजु मतईश अवन्तिका तुलसी बिमल विशाल ॥ एतवन्त वरवरणयुग सेत जगत सब जान। चेत सहित सुमिरण करत हरत सकल अघखान ॥. मैत्रीबरणय- कारको सहसर आदि विचारि। पञ्चवर्ग गहियुत सहित तुलसी ताहि संभारि॥ हलचम मध्य समानयुत याते अधिक न मान ।। my - तुलसी सतसई । तुलसी ताहि विलारि शठ भरमत फिरत सुलान कौन जालि सीतासंती को दुखदायक बाम। को कहिये शशिकर दुखद सुखदायक को राम ॥ को अक्षर शुरुवागवर शिवहरको अभिमान करलाको अजजगतको अरताको हरिजान । सरलेय सरजीव- गुण करु तेहि हदपहिचान। पञ्चवर्ग गहि युतसहित तुलसी लाहि लमान । होत हरण का पाय धन विपति तजे का धाम ॥ दुखदा कुमति कुनारि तर अति सुखदायक राम ॥ बौर कवन सह मदनशर धौर कान रतराम। कवन · कूर हरिपदविमुख को कामी वशबाम ॥ कारण को कंजीव को खंगुया कह सब कोय। जानतको तुलसी कहत सो पनि आवन होय ॥ तुलसी वरण बिकल्पको औचप वितिय समेत ॥ अब लमुके जड़ सरि- त नर समुक साधु सचेत ॥ जामु आसु सरदेवको अरू असार हरू वाम । सकल दुखद तुलसी तजहु मध्य तासु सुखधाम । चञ्चल तियभजु प्रथम हरि जो चाहसि परधाम। तुलसी कहहि सुजन सुनहु यही सयानप काम ॥ अलिशधर्म युग अन्तयुत अज तुलसी तजु काम ॥ अशुभहरण संयधमन सकल कला गुणधाम ॥ श्रोकरको रघुनाघहर अनयश कह सब कोय । सुख- दाको जानत झुमति तुलसी समतादोय ॥ वैरमूलहित हरवचन प्रेमसूल उपकार । दोहा सरल सनेहमें तुलसौ कर विचार ॥ प्राग कवन गुरु लघु जगत तुलसौ और न आन । श्रेष्ठाको हरि- अक्तिसम को लघु लोभ समान ॥ चरण द्वितिय नाशक नित्य तुलसी अन्तरसार। भजहु सकल नौकरसदन जनपालक खल- सार ॥ चपत्रेय सस्वर सहित यमयुत दुखद न आन। तुलसी हलयुतते कुशल अन्तिकार सहजान । तुलसौ यमगण बोध बिन कहु किमि मिटै कलेव । ताते सदगुरुशरण गह जाते पद- उपदेश । भगणं जगण कासों करसि रामनयन नहिं कोय । ।
तुलसी सतसई। १४ ॥ तुलसौ पतिपहिचान बिन कोउ तुलकबहुँलहोय॥ तुलसी लगण- बिहीन नर सदा नगणकै बौच । तिनहिं जगण कैसे लहै पर सगणके बीच ॥ इन्द्रमणि सुरदेव ऋषि रुक्मिणिपति शुभ जान। भोजनदुहिता काक अलि आनँद अशुभ समान ॥ को हित सन्त अहित कुटिल नाशकको हित लोम। पोषक तोषक दुखद अरि शोषक तुखसौ क्षोभ ॥ सदा नगा पद प्रीति यहि जानु नगण सम ताहि । जगण ताहि जययुत रहत तुलसौ संशय नाहि ॥ भगण अक्ति करू अरम तजि तगण लगण विधि होय। सगण सुभाय समुकि तजो सजे न दूषण कोय ॥ श्रीगज भासनजतजू बिहरत तौर सुधौर । यज्ञ पाय मैत्राणपद राजस औरघुवीर॥ बाणबुतज तट निकट विहरत रामसुजान। तुलसौ करकमलन ललित लसत शसलन वान ॥ मृदुसेचक शिरसह रूचिर शौशतिलक ध्र बङ्क । धनुशर गहि जतु तहितयुत तुलसी लसत मयत॥ हंस कमल विच वरणयुक्त तुललौ अतिप्रिय जाहि। तीनलोकमहँ जो भजे लहै तासु फल ताहि ॥ आदि महै अन्तहु महै मध्य रहै तेहिजान। अनजाने जड़जीव सब ससुर सन्तसुजान । आदि रहै मध्ये रहै अन्त दहै लो बात। रामबिमुखके होत है रामबिमुखते जात ॥ ललित चरण काट कर ललित लसत ललित बनमाल । ललित- चित्रुकहिन अधरलह लोचन ललित विशाल ॥ भरणहरणअध्य- अमल सहित विकल्यविचार। कह तुलसौ मति अतुहरत दोहा मार्य अपार ॥ वशिष्ठादिलङ्कारमह सङ्कतादि सुरौति ॥ कहे बहुरि आगे कहब ससुझाब सुमतिविनौति ॥ कोष अलङ्ग त सन्धि गति मैत्रीवरण विचार। हरण भरण सुविभक्ति मल कविहि अर्थ निरधार । देशकाल करताकरम बुधि विद्यागतिहीन। ते सुरतरू तर दारदो सुरसरितौर सलोन ॥ देशकाल गतिहीन ॥
तुलसी सतसई। करताकर मनज्ञान । तेपिमर्थ मगु पगुधरहिं तुलसी पूवान समान प्राधिकारी सब वोसरी भलोजानिबो मन्द । सुधालदन बसुबारहो चौथो अधवाचन्द ॥ नरवर लस सरवर सलिल विनय बनज विज्ञान। सुपति शुक्तिका धारदा स्वातौ कहहिं सुजान। शम इस समता दौलता दानदयादिक गैति । दोषदुरित हरदर दरउ स्वरबिविमल विनौति ॥ धरमधुरोण सुधीरधर धारनवरपर- पौर । धराधरा धैरसम अचल बचन न बिचल सुधीर । चौंतिल. के प्रस्तारमैं अर्थभेद परमान। कहहु सुजन तुलसी कहहिं या निधिते पहिचान ॥ बेद विषय कवरण सतर सुतर रामको रौति। तुलसी भरत न अरिहरत भूलि हरहु जनि प्रौति ॥ बनले गुदा- कह जानिये ताते दिग लौन। तुलसी यह जिय समुकिकारि जगजित सत्त प्रबीन ॥ चन्द्रमानल नहि है कहूँ कठो बिना विवेकातलसोते नर लमुकि हैं जिनहिं ज्ञानरल एक ॥ सतसया तुलसौ सतर तमहर परपर देत। तरित अविद्या जनदुरिल वर- तुलबम करि लेल ॥ इति तृतीयः सर्गः३॥ निविध मौलिको शव्द वर विखटन लट परसान। कारण अधिरल अल पियत तुलसौ अविध सुलान। दिगभ्रम जा विध होत है कौन सुलावत लाहि। जानि परत गुरू ज्ञानते सब जज संशय माहि॥ कारण चारि विचाक वर वरणन अपर नमान। सदा सोउ गुण दोष लखिन परत गुण ज्ञान॥ इह करतब. सब ताहिको यहिते यह परमान। तुलसी मर- मन पाइ हो बिन सदगुरु वरदान॥ दिगंभ्रम कारण चार ते जानहिं सन्त सुजान। ते कैसे लखि पाद हैं जे वहि विषम गुलाल सुख दुख कारणसा भयो रसनाको सुत वीर। M ॥ ॥ तुबली सतसई। कुलली तो तब लखि परै कर रूपा वरधीर॥ अपने खोदे रुपमहँ गिरे यया दुख होइ तुलसी सुखद समुकि हिये रचत जगत सब कोय । ता विधिते अपनो विभव दुख सुख दे करतार। तुलली कोउ कोउ सन्त बर कीन्ह विरचि बिचार । रसनाहौके सुत उपर करत करनतर प्रौति। तेहि पाछे जग सब लगे लनुल नरोति अरोति ॥ माया मन जिव ईश आणि ब्रह्मा विष्णु महेश। सुर देवी श्री ब्रह्मलौं रसना सुत उपदेश ॥ करणवार वारिधि अगम को गस करै अपार। जन तुलसी सतसङ्गबल पाये विशद विचार ॥ गहि सुवेल विरले सझुकि वहि गथ अपर हजार। कोटिन बूड़े खबरि नहिं तुलसी कह- हिं विचार अब न सुनत देखत नयन तुलत न विविध विरोध। कहहु कही केहि मानिये केहि विधि करिय प्रवोध ॥ श्रवणात्मक ध्वन्यात्मक वरयात्मक विधि तीन। विविध शब्द अनुभव अमन तुलसी कहहिं प्रवीन॥ महत सुनत आदिहि वरण देखत वरणविहीन। दृष्टिमान चर अचरण एकाहि एकन लोन पञ्च भेद चरगण विपुल तुलसी कहहिं विचारि। नर पशु खेदज खगज खग कृमि बुध मत निरधारि ॥ अति विरोध तिनमहँ प्रचत प्रकट परत पहिचान। अस्या- वर गति अपर नहिं तुलसी कहहिं प्रमान ॥ रोम रोम ब्रह्माण्ड बहु देखत तुलसीदास। चिन देखे कैसे कोऊ सुनि माने विश्वास । वेद कहत जहँलगि जगत तेहिते अलग न आन। तेहि अधार व्यवहरत लखु तुललौ परम प्रमान ॥ सरषप सूकत जासुकहँ ताहि सुमेत असूक। कहेउ न समुकत सो अबुंध दुललो विगत विसूक। कहत अवर समुसत अवर गहत तजत कनु और। कहेउ सुन सकत नहीं तुलली अति मतिबौर । देखो कर अदेख इब अनदेखो विम्बास। कठिन प्रबलता २२ तुलसो सतसई। मोहकी जलकहँ परम पियास । लोई सेमर सोडू सुवा सेवत पाइ बसन्त। तुलसौ सहिमा मोहको विदित बखानत सन्त ॥ सुन्यो सबन देख्यो नयन संशय शासन समान। तुलसी समता असमसब कहत अानकहँ बान । बसहा भव अरि हित अहित सोपि न ससुभात होन। तुलसी दौन मलीनमति मानत परम प्रवीन ॥ अटकत पर नतता अटकत ज्ञान गुमान। लटकत वितरनते विहटि फटकत तिषु अभिमान ॥ जो चाहत तेहि बितु दुखित सुखित रहित तेहि होइ। तुलसी सो अतिशय अगम भुगम रामते सोई॥ मात पिला निज बालकहि करहिं इष्ट उपदेश । सुनि माने विधि आप जेहि निज शिर लहे कलेश ॥ सबसों भलो मनाइबो भलो होनको आस। करत गगनके गेडुआ सो शठ तुलसीदास ॥ बिलि- मिस देखत देवता करणी समता देव । सुये मार अविचार- रत स्वारथ सावक एव ॥ विनहि बौज तरू एक भव शाखा दलं. फल फूल। को वरण अतिशय अमित सब बिधि अकल अतूल॥ शुक्र पिक मुनिगण बुध विबुध फल श्राश्रित अति दीन । तुललो ते सब विरदहित सो तरु तासु अधीन ॥ को न- हिं सेवत आय भव को न सेय पछताय। तुलसौ बादहि पचत है आपहि आप नशाय॥ कहत विविध फल विमल तेहि वहत न एक प्रसान । भरम प्रतिष्ठा मानि मन तुलसी कथत सुलान ॥ मृगजल घट भरि विविध विधि सोंचत नल- तरूमूल । तुलसौ मन हरजित रहत बिनहिं लहे फल फूल ॥ सोपि कहहिं हमनहूँ लबो नभतरुको फल फल। ते तुलसी तिनते वियत सुनि मानहिं मुद मूल ॥ तेपि तिन्हैं याचर्हि विनय करि करि बार हजार। तुलसौ गाडरको ढरन जाने जगत विचार ॥ शशि कर सग रचना किये कत शोभा सर- .
तुलसी सताई। . सात। स्वर्ग सुमन अवलन्त खलु चाहत अचरज बात । तुललो बोल न वूलाई देखत देखन जोय । तिन शठके उपदेश- का करब लयाने कोय | जो न सुन लेह का कहिय कहा सुनाइय ताहि। तुलसौ तेहि उपदेशही तासु सरिल मति जाहि ॥ कहत सकल घट राममय तो खोजत कोहि काज। तुलसौ कह इह अमति सुनि उर आवत अति लान । अंलख कहहिं देखन चहहि ऐसे परम प्रवीन । तुलसौ जग उपदेशही बनि बुध अबुध मलौन ॥ हहरत हारत रहित विद रहत धरे अभिमान। ते तुलसौ गुरू आव नहिं कहि इतिहास पुरान। निज नैनन दौसत नहीं गही आधरे बाह। कहत मोहबश तेहि अंधम परम हमारे नाह॥ गगनवाटिका . सौंचही भरि भरि सिन्धुत्तरङ्ग। तुलसौ मानहिं मोद मन ऐसे अधम अमङ्ग। दृषद करत रचना बिहारि रङ्ग रूप सम- तूल। विहग वदन विष्ठा करे ताले अयो न तल ॥ चाह ति- हारो आपते मानन आनन आन। तुलसौ करू पहिचान पति याते अधिक न मान ॥ आतमबोध विचार इह तुलसौ करू उपकार। कोउ कोउ रामप्रसादते पावत परमतपार ॥ जहां तोष तहँ राम हैं राम तोष नहिं भेद। तुलसौ देखि गहत नहीं सहत विविध विधि खेद ॥ गोधन गजधन बाजिधन और रतनधनखान। जब आवै सन्तोषधन सब धन धूरि समान ॥ कुथि रति अटत विमढ़ लट घट उदघटत न ज्ञान। तुलसी रटत हटत नहीं अतिशय गति अभिमान । सुनुवङ्ग गत दाम भुव काम न विविध विधान। लो तन वर्तमान यत तत तुलसौ परमान॥ भो उर सुक्ति विभव पढ़ि मनगत प्रकट लेखात। मन मो उर अति सुतिते बिलग बिजानब तात ॥ रामचरण पहिचान बिनु मिटौ न मनको दौर ।
जान तुलसी सतसई। जन्य गवाये बादही रटत पराये पौर ॥ सुनै वरण मानै वरण वरण' पिलग नहिं ज्ञान। तुलसी सुगुरुप्रसाद बल परै वरण पहिचान, विटप बेलिगण बागके सानाकार न तुललौ ता विधि विद बिना करता राम सुलान ॥ करतन हो सो कर्म है कहें तुलसौ परमान। करणहार करतारलो भोगे कर्म निदान ॥ तुलली लट पदते मटक अटक अपित्त नहि ज्ञान। ताते गुरु उपदेश बिनु मरमत फिरत सुलान ! ब्यों बरदा बनिजारके फिरत घनेरे देश। खाड़ भरे सुख सात है बिन गुरुके उपदेश बुध्वा वैरन अनय पद पूवपिन पदारछ लौन। तुलसी तेहि रासभ सरिस निज मन गणहि प्रवौन ॥ कहत विविध देखे बिना गहत अनेक न एक। ते तुलसी लोनहि सरिस बाणो बदहिं अनेक ॥ बिन पाये परतीत अति करत यधारय हेत। तुलसौ अबुध सकाश दूत्र अरि भरि सूठौ लेत ॥ बसन बारि बाँधत बिहठि तुलसौ कौन विचार । हानि लास विधि वाध बिनु होत नहीं निरधार ॥ काम नोध सद लोभको जबलगि मनमें खान। का पण्डित का सूरख दोनों एक समान ॥ इत कुलकौ करणी तजे उत न भजे अग- वान। तुलसौ अधवरके भये ज्यों बधरको पान! कौर सरिप्त बाणो पढ़त चाखन चाहत खाड़। मन राखत वैराग- महँ घरमों राखत राड़॥ रामचरण पर नहीं बिन साधन पद नेह । मड़ मुड़ाये बादहौं आँड़ अये लजि गेह ॥ काह भयो बन बन फिर जो बनि झायो नाहिं। बनते बनते बनि गयो तुलसौ घरहौमाहि॥ जो गति जाने वरणको लन गति सो भनुमान। बरण बिन्दु कारण यथा तथा जानु नहिं भान ॥ वरण योग सत्र नाम जग जानु भरमको मूल। तुलसौ करता है तुही जानु मोतु जनि भूल ॥ नाम जगत सम समुझ जग २५ तुझी सतसई। वस्तु न करिचित बैन। विन्द गये जिमि गैनते रहत ऐनको ऐन ॥ आपुहि ऐन विचारु विधि सिद्धि विमल गतिमान। आन बासना बिंदुसम तुलसौ परम प्रमान ॥ धन धन कहे न होत कोउ ससुमि देखु धनमान। होत धनिक तुलसी कहत दुखित न रहत जहान हिमको मूरतिके हिये लगत नौरको प्यास। लगत शब्द गुरु तरनिकर सोमें रही न पास पाके उरवर वासना भई भाष का आन। तुलसी ताहि विड- स्वना काहि विधि कथहि प्रमान: रुजत न मन परचे विना भेषज करि किमि कोय। जान पर भेषज कर सहज नाश रुज होय॥ मानस व्याध कुचाह तब सदगुरु वैद समान। जासु वचन अलबल अवल होत सफल रूज हान ॥ रूचि बाढ़े सत- सङ्गमहँ नौति क्षुधा अधिकाय । होत ज्ञानबल पौन भल वृजिन विपति मिटि जाय ॥ शुक्लपक्ष शशि स्वच्छमी कृष्णा- पक्ष तिहौन। बल्ब घटन विधि भांति बिचि तुलसौ कह- हिं प्रवीन॥ सतसङ्गति सितपक्ष सम असित असन्त प्रसङ्ग । जानु आपकहँ चन्द्र सम तुलप्ती बदन अभङ्ग तीरथपति सतसङ्ग सन सक्ति देवसरि जान । विधि उलटी गति रामकी तरणि सुता अनुमान ॥ बर मेधा मानहु गिरा धीर धर्म न- योध। मिलन त्रिबेणी मनहरणि तुलसौ तजहु विरोध । समसाब सब मञ्चन विशद मल अनीत गड धोय। अवश मिलन संशय नहीं सहज रामपद होय ॥ क्षेम विमल बारा- णलो सुरअपगा सम भक्ति। ज्ञानबिखवर अति विशद लसत दया सह शक्ति । बसत क्षेम गृह जासु मन बाराणसी न दूरि। बिलसित सुरसरि भक्ति जहँ तुलसौ नय कृत भूरि । तित काशी मगहर अमित लोभ मोह मद काम। हानि लाभ तुलसी समुझि बास करहु वसुयाम ॥ गये पलदि आवे ४ २६ ॥ तुलसी सताई। नहीं है सो करू पहिचान । आजु जे सो काल है तुलसौ सर- मन मान ॥ बर्तमान साधोन दोउ भावी सूत विचार । तुजसो संशय मनन का जो है सो निरूपार । मानस उर बर सम अधुर रामसुयश शुचिनौर। उठेउ वृजिन बुधि मल भई बुधि नहिं अगर अधौर॥ अलङ्कार कवि रोति युत भूषण दूषण रोति। वारिजात वरणत विविध तुललो विमल बिनौति ॥ विने विचार सुहिता सो पराग रस गन्ध । कामादिक तेहि सरल सत तुलसौ घाट प्रबन्ध ॥ प्रेम उमा कवितावली चली सरित शुचिधार। राम बराबर मिलन हित तुजसी इरन अपार ॥ तरल तरङ्ग सुकन्द वर हरल द्वैत तक मूल। वैदिक लौशिक विधि विमल लसल बिशदवर मूल । सन्त समा विमला नगरि सिगरि सुमङ्गलबानि। तुलसी उर सुरसरिसुता लसत सुथल अनुमःनि ॥ सुक्त छुसु जू भर विषद श्रोता विविध प्रकार। श्राम नगर पुरयुग सुतट तुलसी कहाहि विचार ॥ बाराणतो- विराग नहि थैलसुता मन होय। तिमि प्रावधहि सरयु न तजे कहत सुकवि सब कोय ॥ कदम सुनब समुभाब पुनः सुनि लसु- मायब शान। श्रमहर घाट प्रबन्धबर तुलसी परम प्रमाल । इति चतुर्थःसर्गः॥ ४॥ थतन अनुपम जानु वर सकल कला शुद्याधाम ॥ अविनाशी अब यह असल मौ यह तनु धरि राम ॥ सदा प्रकाश सरूपवर अल न अपर न मान। अप्रमेय अद्भुत अजयाते दुरत न ज्ञान । जानहिं हंसा रसमकहँ तुलसी सन्त न आन। जाकी कृपा कटालते पाये पदनिर्वान ॥ तंजत.सलिल अपि पुनि.गहत घटत बढ़त नहिं शैति । तुलसौ यह गति उर निरखि करिय रामपद- ॥
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तुंभमसतराई।
नोति । चुम्बक इरहन सेति मिम सन्तन हरि सुखधाम । जान
तिरीक्षर सम लफरि तुलसी जानत राम ॥ भरत हरत दरशत
तबहिं पनि प्रदरच लवज्ञाहु ॥ तुलसौ सुशुरु प्रसादवर होत
परमपद लाहु. यया प्रत्यक्ष सरूप बहु जानत है सब कोय ॥
तथाहि लै गतिको लखब असमलप अति सोय ॥ बघा सकल
अपि जात अप रविमण्डलको माहिं। मिलत तथा जिव रामपद
होत तहांले नाहिं। कर्म कोष सँग ले गयो तुलसी अपनी वानि ।
जहां जाय बिलसै तहाँ परे क पहिचानि ॥ ज्यों धरणीमहँ
हेतु सब रहत यथा धरि देह। त्यों तुलसी ले राममहँ मिलत
कबहुँ नहिं एह ॥ शोषक पोषक ससुरू शुचि राम प्रकाशप्तक्षप ।
यथा तथा विन देखिये जिमि आदरश अनूप ॥ कर्म मिटाये
मिटत नहिं तुलसी किये विचार । करतब होके फेर है या विधि
सार अधार ॥ एज किये हो दूसरो बहुरि तौसरो अङ्ग । तुलनो
कैसेहु ना नशै अतिशय कर्म तरङ्ग ॥ इन दोउनते रहत भी कोउ न
सम तजिबान । तुल तो यह गति जानिहै कोउकोउ सन्तसु
जान । सन्ततको लै अमिसदन समुकाहि मुगति प्रवीना कर्मविप
र्यय कबहुँ नहिं सदा रामरसलौन : सदा एकरस सन्त लिय निश्च
यनिशिकर जान ॥ रामदिवाकर दुखहरण तुलसी शौलनिधान ॥
सन्तनको गति उन विजा जानहु शशि परनाम। रमित रहत रसमें
सदा तुलसी रति नहिं आना जातरूप जिमि अनल मिलि
लालित होत लन आना सन्तशील कर सौय तिमि लसहि रामपद
पाय ॥ त्रापहि बाधितं आए हठि कौन छुड़ावत ताहि ॥ सुखदा-
यक देखत्त सुनत तदपि सो मानत नाहि ॥ जौन तारते अधम
गति उर्द्ध लौन गति जात । तुलसी मकरौतन्त इव कर्म न कत्रह
नभात ॥ जहाँ रहत तहँ सह सदा तुलसौ तेशै बानि। सुधरै
विधिवश होय जन सतसङ्गति पहिचानि रवि रजनीत घरातथा
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२८ तुलसीसतसई। इह अखिर अस्थूल। लूक्षम गुणको जीवकर तुलसो सो तन- मूल " आवत अपर विते यथा जात तथा रविमाहि॥ जहते प्रकटत ही दुरत तुलसौ जानत ताहि । प्रकट भये देखत सकल दुरत लखत कोइ कोय। तुलसौ यह अतिशय अगम बिन गुरु सुगम न होय। या जग जे नथहीन नरबरबल दुखमग- जाहि। प्रकटत दुरत महादुखी कहलगि कहियत ताहि ॥ सुखदुख मग अपने गहे मगकेहु गहत न धाय। तुलसी राम- प्रसाद बिनु सो किमि जानो जाय। महिते रवि रविते अवनि सपनेहुँ दुख कहुँ नाहिं। तुलसौ तबलगि दुखित अति शशिम- शु लहत न ताहि ॥ सन्तनको गति शौतकर लेश कलेश न होय। सो सियपद सुखदा सदा जानु परमपद सोय ॥ तजत अमिय शशि जानि जग तुलसौ देखत रूप । गहत नहौं सब कह विदित अतिशय अमल अनप ॥ शशिकर सुखद सकल जगत को तेहि जानत नाहिं । कोक कमलकर दुखदकर तदपि दुखद नहि ताहि ॥ बिन देखे समुन्ने सुने सोउ भौ मिथ्यावाद। तुलसी गुरु गमकै लखै सहजहि मिटे विषाद॥ वरणि विपून हरषित करत हरत ताप अघप्यास। तुलसौ दोष न जलदकर त्यों जड़ करत जबास । चन्द्र देत अमि लेत विष देखहु मनहि बिचार । तुलसी तिमि सिय सन्तवर महिमा विशद अपार ॥ रसम बिदित रवि रूप लखु शौत शोतकर जान । लसत योगयशकार भव तुललौ समक समान ॥ लेति अवनि रबिअंशकहँ देति अमिय 'अपसार । तुलसौ र॒क्षमको सदा रवि रजनीश अधार ॥ भूमि मातु अन्य लअप सकल चराचर रूप । तुलसौ बिन गुरु ना लहै यह मत असल अनप ॥ तुलसी जे लयलौन नर ते निशिकर तन- लौन। अपर सकल रविगत भये महाकष्ट अतिदीन ॥ तुलसी कवनेहुँ योगते सतसङ्गति जब होयं । राम मिलन संशय नहीं २६ 'तुलसीसताई। कहहिं सुमति सब कोय ॥ सेवक पद सुखकर सदा दुखद सेव्य- पढ़ जान। यथा विभीषण रावणहि तुलसौ ससुस प्रमान ॥ चौत उशा कर रूपयुग निशिदिन कर करतार । तुलसी तिन- कह एक नहिं निरखहु करि निरधार ॥ नहिं नैनन काहू लख्यो धरत नाम सब कोय। ताते साँचो है समुक मठ कब हुँ नहिं होय ॥ वेद कहत सब कोउ विदित तुलसौ अमिय स्वभाव । करत पान अंपि रुज हरत अविरल अमल प्रसाव ॥ गन्ध शीत अपि उप्माता सवहि विदित जग जान। महिबन अनल सुनानि लग बिन देखे परमान ॥ इनमह चेतन अमलाल बिलखत तुलसीदास। सो पद गुरुउपदेश सुनि सहन होत परकास ॥ यहि विधिते वर बोध इह गुरु प्रसाद कोउ पाव । हैं ते अल तिहुँ कालमहँ तुलसौ सहज प्रभाव । काकसुतासुत- वासुता मिलत जननि पितु धाय । आदि मध्य अवसान गत चेतन सहज सुभाय ॥ समता स्वारथहौनते होत न विशद वि- वेक ॥ तुलसौ यह तिनहीं फबै जिनहिं भनेक न एक । सब स्वा- रथ स्वारथ रटत तुलसी घटत न एक। ज्ञानरहित अज्ञानरत कठिन कुमनकर टेक ॥ स्वारथ सो जानहु सदा जासों विपति नशाय। तुलसौ गुरुउपदेश बिन सो किमि जानी जाय ॥ कारज स्वास्थ हित कर कारण करे न होय । मनवा ऊषविशेषते तुलसौ समकहु सोय ५० कारण कारज जानता सबकाहू पर- मान । तुलसौ कारजकारजो सो तें अपर न आन ॥ विन करता कारज नहीं जानत हैं सब कोय। गुरुमुख श्रवण सुनत नहिं प्राप्ति कवन विधि होय ॥ करता कारण कारजहु तुलसी गुरु पर- मान। लोपत करता मोहबश ऐसो अबुध मलान । अनिल सलिल विधियोगते यथा बौचि बहु होय । करत करावत नहि ककुक करता कारण सोय ॥ क्षेम धरण करतार कर तुलसी तुलसीसतसई। पति परधाम। सो वरतरता समन कोउ सब विधि पूरण- काम।। करता कारण सारपद आवै अमल अभेद। कर्मा घटत अपि बढ़त हैं तुलसौ जानत वेद । स्वेदज जवन प्रका- रते आए करै कोउ नाहि । अये प्रकट तेहिके सुनौ कौन विलोकत ताहि ॥ अयो विषमता कर्म मह समता किये न होय। तुललो समता सञ्जमा कर सकल मान मद धोय ॥ समहित सहित समस्त जग सुहृद जान सबकाहु। तुलसौ यह मत धारू उर दिन प्रति अति सुख लाहु ॥ यह मनमहँ निश्चय धरहु है कोउ नपर न मान। कासन. करत विरोध हठि तुलसौ लमुझ प्रमा॥ महि जल अनल · सुननिल नम तहां प्रकट तव रूप। जानि.जाय वर बोधते पति शुभ असल अनूप॥ जोपै आकलमालते. उपजे बुद्धि विशाल । नातो अधि छलहीन है गुरुसेवन कछु काल॥ कारज युग जानहु हिये नित्य अनित्य समान। गुरु गमते देखहि सुजन कह तुलसी परमान॥ महि भयक अहिनाएको आदि ज्ञान भौ भेद। ता विधि तेई जौवकहँ होल ससुक विन खेद ॥ परो फेर निज कर्म मह प्रम भवका यह हेत॥ तुलसी कहत सुजन सुनहु चेतन ससुक अचेत ॥ नामकार दूषण नहीं तुजली किये विचार। कर्सनको घटना समुकि ऐसे वरण उचार । सुजन छाजन महि गत बंथा तथा भानु शशिमाहिं। तुलसी जानत हो सुखौ होत समुमा विन नाहि ॥ मातु लात भवरीति निमि तिमि तुजसो गति तोरि। मात न तात न जानु तब है तेहि ससुक बहोरि । सर्व सकल तें है सदा विश्लोषित सब ठौर। तुलसी जानहिं सुहृद जे ते अति मति शिरमौर । अलङ्कार घटना कनक रूप. नाम गा लोन तुलसी रामप्रताइते परसुहिं परमनवीन ॥ एक पदार ॥
तुलसीरताई। विविध गुण संज्ञा अगम अपार। तुलसी सुगुरुप्रसादते पाये पद निरधार ॥ गन्ध न सूल उपाधि बहू भूपया तन गण जान। शोमा गण तुलसी कहहि समुसहि सुमतिनिधान ॥ जैसो जहां उपाधि तह घटित पदारथ रूप। तैसो तहां प्रमा समन गुणगण सुमति अनूप ॥ जानु बस्तु अस्थिर सदा मिटत मिटाये नाहिं। रूपु नाम प्रकटत दृत्त समुक्षिा विलोकहु ताहि ॥ पेष रूप संज्ञा कहब गुगा सुविवेक विचार। इतनो- ई उपदेश वर तुलसौ किये बिचार ॥ सदा सगुण सौता रमण सुखसागर बलधाम। जन तुलसौ परखे परम पाये पद विश्राम सगण पदाग्य एक नित निर्गुण अमित उपाधि । तुलसौ कहहिं विशेषते समुल सुगति सुठि साधि ॥ यथा एक- महँ वेद गुण तामहको कहु नाहि । तुलसौ वर्तत सकल हैं समुझात कोउ कोउ ताहि ॥ तुलसौ जानत साधुजन उदय अक्षगत भेद। विन जाने कैसे मिटे विविध जनन जन खेद । संशय शोक समूल रुज देत अपित दुख ताहि। अहि अनुगत सपने विविध चाहि परायण जाहि । तुतली सांचो शाप है जब लगि खुलें न नैन। सो तबलगि जबलगि नहीं सुने सुगुरुवर बैन ॥ पूरण परमारथ दरश परशत जौलगि आश । तौलगि खन उत्यान नद जबलगि जल न प्रकाश ॥ तबलगि हमते सब बड़ो जबलगि है का चाह। चाहरहित कह को अधिक पाय परमपद वाह ! कारण करता है अचल अपि अ-- नादि अजरूपाताते कारज विपुलतर तुलसौ अमल अनूप । करता जानि न परत है बिन गुरुवरपरसाद। तुलसी निज सुख विधि रहित केहि विधि मिटै विषाद ॥ मृण्मय घट जानत जगत बिन अलाल नहिं होय। तिमि तुलसी करता रहित कर्म कर कहुँ कोय ॥ ताते.करता ज्ञान कर जाते .
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१२
तुलसीसतसई ।
कर्म प्रधान। तुलसी ना लखि पाइ हौ किये अमित अनु-
मान ॥ अनमान साक्षी रहित होत नहीं परमान। कह तुलसौ
प्रत्यक्ष जो सो कहु अपरको आन ॥ मिति कारण करता सहित
कारज किये अनेक। जौ करता जाने नहीं तो कहु कवन
विवेक ॥ स्वाकार करता कनक कारण प्रकट लखाय। अल-
झार कारज सुखद गुण शोभा सरसाय ॥ चामौकर भूषण
अमित करता कह तब भेद। तुलसौ जे गुरु गमरहित ताहि
रमित अति खेद ॥ तन निमित्त जहँ जो भयो तहां सो पर-
मान। जिन जाने माने तहां तुलसौ कहहि सुजान ॥ मृण्मय
भाजन विविध बिधि करता मन भव रूप । तुलसौ जानेते सुख-
द गुरु गम ज्ञान अनूप ॥ सब देखत सृण भाज नहिं कोई कोई
लखत कुलाल । जाके मनके रूप वह भाजन विलखु बिशाल ।
एक सूप कुलालको माटौ एक अनूप। भाजन अमित
विशाल लघु सो करता मन रूप ॥ जहां रहत वरतत तहाँ
तुलसौ नित्य स्वरूप। भूत न भावी ताहि कह अतिशय अमल
अनूप ॥ प्रवास समोर प्रत्यक्ष अप स्वच्छा दरश लखात । तुलसी
रामप्रसाद बिन अबिगति जानि न जात ॥ तुलसौ तल रहि
जात है युग तन अचल उपाधि। यह गति तेहि लखि परत
जेहि भई सुमति शुठि साधि ॥ करता कारण कालके योग
करम सत जान। पुनःकाल करता दुरत कारण रहत प्रमान ।
इति पञ्चमः सर्गः ॥५॥
तुलसीसतसई । ३३ जल थल तन गत है सदा ते तुलली तिहुँ काल। मरण समुले विना भाषत समन विशाल ॥ तें तुललो करता सदा कारण शब्द न आन । कारण संज्ञा सुख दुम्बन बिन गुरु तेहि किमि जान॥ कारजरत करता ससुम दुख सुख भोगत सोय। तुलसी श्री गुरुदेव बिन दुखप्रद दूर न होय कारण शब्द स्वक्षपमें संज्ञा गुण भव जान। करता सुरुगरते सुखद तुलसी अपर न मान ॥ गन्ध विभावरि नौर रस सलिल अनल गत ज्ञान। वायुवेगकहँ बिन लखे बुध जन कहहि प्रमान ॥ अनुसार अक्षर रहित जानत हैं सब कोय। कह तुलसी नहलगि वरण तासु रहित नहिं होय ॥ आदिहु अन्त- हु है सोई तुलसी और न आन। बिन देखे समुसो बिना किमि कोइ करै प्रमान । रहित बिन्दु सब वरणते रेफ सहित सब जान। तुलसौ स्वर संयोगते होत वरण पद मान॥ अतु- स्वार-सूक्षम यथा तथा वरण अलस्था जो सूक्षम अस्थूल सो तुलसी कबहुं न सूल ॥ अनिल अनल पनि सलिल रज तनगत तनवत होय। बहुरि सो रजगत जल अनल सस्त सहित रवि सोय ॥ और भेद सिद्धान्त यह निरखु सुमति का लोय । तुलसी सुत भव योग विन पितु संज्ञा नहिं होय ॥ संज्ञा कह तब गण समुस सुनव शब्द परमान । देखब रूप विशेष है तुलसौ बेप बखान ॥ होत पिताते पुत्र जिमि जानत को कहु नाहि। जमलनि सुत परसो नहीं पितु पद लहै न ताहि ॥ तिमि बरणन संज्ञा करे वरण वरण संयोग। तुललो होय न वरण कर जबलगि वरण वियोग ॥ तुलसी देखहु सफल कह यहि विधि सुत आधीन। 'पितु पद परखि सुदृढ़ अयो कोउ कोउ परम प्रवीन ॥ जहँ देखो सुत पद सकल भयो पिता पद लोप ! तलली सो जानै सुई जासु अमोलिक चोप ॥ स्यात सुबन ५ ३४ तुलसतसई। तिलोकमहँ महाप्रवल अति सोई। जो कोइ तेहि पात कर लो पर धागे होइ। तुलसौ होत नहीं कछुक रहित सुवन ब्यवहार । तोहोंते अमन भयो सब विधि तेहि परचार ॥ सुवन देखि भूले सकल भय अति परम अधीन। तुलसौ जेहिं समु- भाईये सो मन करत मलौन॥ मानत सो साँचो. हिये सुनत सुनावत वादि तुलसौते समुमत नहीं जो पद अमल अनादि । जाहि कहत हैं सकल सो जेहि कह तव सो ऐन ।। तुलसौ ताहि समुझि हिये अजहुँ करह चित बैन । तुलसौ जो है लो नहीं कहत आन सब कोय। यहि विधि परम विड- रखना कहहुन काकहँ होयं ॥ गुरु करिबो सिद्धान्त यह होय यथारध बोध। अनुचित उचित लखाय उर तुलसौ मिटे विरोध ॥ सतसङ्गतिको फल यही संशय लहै न लेशा है अस्थिर शुचि सरल चित पावै पुनि न कलेश ।. जो सरखो पद सबन को यह लगि साध असाध। कवन हेतु उपदेश गुरु सतसङ्गति भव बाध ॥ जो भावो कछु है नहीं माठो गुरु सत- सङ्ग। ऐसि कुमति ते झंठ गुरु सन्तनको परसङ्ग । जौले लखि नाही परत तुलसी परपद शाप। तौलगि सोहि विवश सकल कहत पुनको बाप॥ जहलगि संज्ञा वरण भौ जासु कहते होय। तो तुलसौसे है सबल आन कहा कडू होय ॥ अपने नैनन देखि जे चलहि सुमतिवर लोग। तिनहि न विपति विषाद रुज तुलसौ सुमति सुयोग। मृगा गगनचर ज्ञान विन करत नहीं पहिचान । परवश शठ हठ तजत : मुख तुलसौ फिरत भुलानं ॥ काह कहो तेहि तोहिके जेहि उप- देशोउ तात। तुलसौं कहत्त सो दुख सहत समुझ रहित हिल बात ॥ बिन काटे तरुवर यथा मिटै कवन विधि छाह त्यों तुलसौ उपदेश विन. निःसंशय कोउ नाह। अपनो कर- । .
तुलाखीसराई। तब भाप लखि सुनि गुनि शाप विचार। तो ताहिकह दुख- दामहा सुखदा सुमति अधार ॥ ब्राह्मण वर विद्या विनय सुरति विवेकनिधान। पथ रति अनथ अतीत मति सहित दया श्रुति मान ॥ विनयचा शिर जासुके प्रतिपद पर- उपकार। तुलसी सोचतो. सही रहित सकल व्यभिचार । वैश विनय मग पग धरै हरे कटुक घर वैन। सदय पदा शुचि सरलता होय अचल सुख ऐन ॥ शूद्र क्षुद्र पघपरि हरे हृदय विप्रपद मान। तुलसौ मन समता सुमति सकल जीव लम जान ॥ हेतु वरण वर शुचि रहनि रसनि रास सुखसार । वाइन काम सुरा न रस तुलसौ सुदृढ़ विचार॥ यथालाभ लन्तोषरत गृह मगबन सगरीत। सो तुलसी सुखमें सदा जिन तनु विभव विनीत ॥ रहै जहां विचरै तहाँ कमो कहूँ का नाहिं। तुलसौ तह आनन्द सँग जात यथा सँग छाहिं ।। करत कर्म जेहिको सदा सो मन दुखदातार। तुलसी जो ससुके मनहिं तो तेहि तजै विचार॥ कहत सुनत समुझतः लखत तेहिते विपति न जाय। तुलसी सबते बिलग हैं जबते. नहिं ठहराय । सुनत कोटि कोटिन कहत कौड़ी हाथ न एक। देखत सकल पुराण श्रति तापर रहित विवेक, ससु- मात है सन्तोष धन याते अधिक न आन। गहत नहीं तुलसी कहत ताते अबुध मलान ॥ कहां होत देखे कहे सुनि समुझे सब रोति। तुलसी जबलगि होत नहिं सुखद रामपद प्रौति । कोटिन साधनके किये अन्तरमल नहिं जाय। तुलसी जी. लगि सकल गुण सहित न कर्म नशाय ॥ चाह बनी 'जबलगि सकल तबलगि साधन सार। तामहँ अमित • कलेशकर तुलसौ देख बिचार । चाह किये दुखिया सकल ब्रह्मादिक सब कोय। निश्चलता तुलसी कठिन राम कृपावश होय । 20 तुलसौउतमई। अपनो कमन आपकहँ अलो मन्द जेहि काल। तब जानब तुलसी सर्व अतिपय बुद्धि विशाल ॥ तुलसी जबलगि लखि परत देह पायको भेद। तबलगि कैसेकै मिटै करम जनित बहु खेद ॥ जोडू देह सोइ प्राण है प्राण देह नहिं दोय। तुलती जो लखि पाय है सो निरय नहि होय ॥ तुललौते झूठो भयो करि झूठे सँग प्रौति। है साचो हो साँच जब गहै रामको तेति ॥ कंठौ रचना साँच है रचत नहीं अलसात । बरजतहू कामरत बिहठि नेक न बूझात बाल ॥ करन खरी कर मोह. घल सक चराचर जाल। हरत भरत भर हर गनत जगत जोलखो । काल ॥ फहन काल किल सकल बुध ताकर यह व्य- वहार। उतपति घिति लय होत है सकल तासु अनुहार ॥ प्रखर कियालय दल विपुल शाखायुत वर मूल। फूति फरत ऋतु अनुहरत तुलसी सकल सकूल कहतब करतब सकला तेहि ताहि रहत नहि आन। जानन मानन आन विधि अनू- मान अभिमान । हानि लाभ जय विधि विजय ज्ञान दान सनमाल। खान पान शुचि रूचि अशुचि तुलसी विदित विधान, शाल पालक सम विषम रम भम गम गति ज्ञान। घट घट लट नट नादि जट तुलसौ रहित न जान ॥ कठिन करम करतो कछन करता कारक काम॥ काय कष्ट कारण करम होत काल सम शाम ॥ खबर आलमा वोध वर खर जिन कब न हो। तुललो खसम बिहीन जे ते खरंतर नहि लोय ॥ चित रति वित्र व्यवहारित विधि अगम सुगम जय नौच। धौर परम धारण हरणं तुलसौ परत न बौच । अब्द खूप विवरन विशद तासु योग भव नाम। करता च्छप बहु जाति तेहि संज्ञा सब गुणधामः॥ नाम जाति गुण देखि के भयो सबल उर भर्म। तुलसौं गुरुउपदेश बिन जानि सके -- प्रबौन। तुखीसतसई। को मर्म अपन कर्म वर मानिकै आप बँधो सब कोय। कार- जरत करता सयो आपन ससुरूत सोय ॥ को करता कारण लखै कारज अगम प्रभाव। जो जई सो तह तर हरष तुलसी सहज सुभाव ॥ तुलसौ बिन गुरुको लखै वर्तमान विधिरौत। कहु केहि कारणते सयो सूर उमा शशि शौत ॥ करता कारण कर्मते पर पर आतमज्ञान॥ होत न बिन उपदेश गुरु जो षट वेद पुरान॥ प्रथम ज्ञान लसुके नहीं विधि निषेध व्यवहार उचितानुचित्तहि हेरि धरि करतब करिय सँसार॥ जब मन- महँ ठहाय विधि श्रीगुरुवरपरसाद। इहि विधि परमातम लखै तुलसी मिटै विषाद॥ बरबस करत विरोध हठि होन चहत कहीन। गहि गति बक वृक्ष पूनान इव तुलसौ परम पाक कर्म भेषज विदित लखत नहीं मतिहीन । तुललो घठ अवश विहठि दिन दिन दौन मलौन करता- होते कर्म युग सो गुण दोष सरूप । करत मोग करतब यथा होय रङ्क किन भूप॥ वेद पुराणकशास्त्र युत निज बुधिवल अनु- मान। निज निज करि करि है बहुरि कहु तुलसी परमान । विविध प्रकार कथन कर जाहि यथा भवमान । तुलसी सु- गुरुप्रसादबल कोउ कोउ कहत प्रमान ॥ उर डर अतिलघु होनको भव लघु सुरति भुलान। स्वर्गलाह लखि परत नहि लखत लोहको हान ॥ नैनदोष निज कहत नहि विविध वनावत बात । लहत जानि तुलसो विपति तदपि न नेक लजात करत चातुरी मोहवश लखत न निज हित हान। शुक मरकट इव गहत हठ तुलसौ परम सुजान ॥ दुखिया सकल प्रकार शठ सखु- मि परतही नाहिं। लखत न कण्टक मौन जिमि अशन भषत भ्रम नाहिं॥ तुलसौ. निज मनकामना चहत सुन्यकहँ सेय। वचन गाय सबके विविध कहहु पयस केहि देय ॥ बातहि बात ॥ ॥
तुलसीसतसई।
हिननि पर बातहि बात नशाय। बातहि आदिहि दीप भव
बातहि पन्त बताया बातहिते बनि श्रावई बातहिते बनि
जात। बातहिते बर बर मिलत बातहिते बौरात ॥ बात बिना
अतिशय बिकल बातहि ते हरषात। बनत बात वर बातते
करत बात बरवात ॥ तुलसी जानु बात विन बिगरत हर इक
बात। अनजाने दुख बातके जानिपरत कुशलात ॥ प्रेस वैर
औ पुण्य अघ यश अपयश जय हान। बाल बीज इन सबनको
तुलसी कहहिं सुजान । सदा भजन गुरु साधु द्विज जीव दया
सम जान । सुखद सुनै रत सत्यव्रत स्वर्ग लप्तलोपान वञ्चक
विधिरत नरतनय विधिहिंसा अतिलीन। तुलसी जगमहँ
बिदित वर नरकनिशेनौ तीन ॥ जे नर जग गुण दोषयुत तुलसी
वदत बिचार। कबहुँ सुखो कबहूँ दुखित उदय अस्त व्यवहार
कारज जगले युगलतम काल अचल बलवान। निविध विकल
तेते हटहिं तुलसी कहहिं प्रमान । भानुभव अंमल अनूप गुरु
कछुक शास्त्रगति होय ॥ बचै काख क्रम दोपते कहहिं सुबुध
सब कोय ॥ सब विधि पूरण धामबर रामं अपर नहिं भान ।
लाको रुपाकटाक्षते होत हिये दृढ़ज्ञान॥ सो स्वामौ लो तर
लखा लो वर सुखदातार । लात मात मापदहरण लो बासमय
पधार॥ सुखद दुखद कारज कठिन जानत को तेहि नाहिं।
जानेछुपर बिन शुरुकृपा करतब बनत न काहिं । तुलसी सकल
अधान है वेद विदित सुखधाम। तामहँ समुभव कठिन अति
युगलभेद गुणनाम नाम कहत सुख्ख होत है नाम कहत दुख
जात। नाम कहत सुख जात दुरि नाम कहत दुख खात ॥
नाम कहत वैकुण्ठसुख नाम कहत अघखान। तुलसौ तोते
उर समुकि करहु नाम पहिचान। चारों चौदह अष्टदश रस
समुकाब भरिपूर। नामभेद समुझे बिना सकल समुझमहँ धूर
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तुलसीपतसई। वार दिवस निशि माससित असित वरण परमान। उत्तर दक्षिण भाग रवि भेद सकलमहँ जान ॥ कर्म शुभाशुभ मिन नरि रोदन हसन बखान ॥ और भेद अति अमित है कह लगि कहिय प्रमान। जहलगि जन देखब सुनब समुमाब- कहब सुरीत। भेदरहित कछु है नहीं तुलसौ वहि विनीत ॥ भेद याहि विधि नाममहँ वितु गुरू जान न कोय॥ तुलसी कहहिं विनौत वर क्यों विरब्धि शिवहोय । इति षष्ठःसर्गः ६॥ तिनहिं पढ़े तिनहीं सुने तिनहिं सुमति परगास। जिन भाशा पाछे करे गहे अलख नौसास ॥ तबलगि योगी जगतगुरु जबलगि रहै निरास । जब आशा मनमें जगी जग गुरु योगी दासहित पुनौत स्वारथ सवहि अहित अशुचि बिन- चाउ । निजमुख माणिक सम दशन भूमि परत भौहाउ॥ निज गुणवटत न नागनग हर्षि न पहिरत कोल। गुन्ना प्रभुभूषण करे ताते बढ़े न मोल ॥ देव सुमन करि वास तिल परिहरि खरि रस- लेत स्वारघहित भूतल भरे मनमैचक तन सेत ॥ अँसुवन पधिक निराशते तटभुइ सजल सरूप। तुलसौ किन वच्च नहीं इन सबध ल केकूप । तुलसौ मिल महासुखद सबहि मित्रको चाउ। निकट भये विलसत सुखप एक छपाकर छाउ ॥ मित्र कोप वरतर सुखद मनहित मृदुल कराल॥द्मदल शिशिर मुखात सब सह निदाए. अति लाल ॥ खल नेरे गुण मान नहिं मेटहि दाता वोप॥ जिमि- जल तुलसौ देत रवि जलद करत तेहि लोप ॥ बरमत हरषत लोगसब करषत लखत न कोय। तुलसौ भूपति भानुलम प्रजा भागवश होय ॥ मालौ भानु कशातुः सम नौतिनिपुण महिपाल। प्रजा भागवश होहिंगे कहिं कबहिं कलिकाल.. ॥
A ॥ तुलसीसतसई। समयपर सुपुरुष नरन लघुकरि गनिय न कोय। नायक पीपर बौजसम बचैतो तरुवर होय ॥ बड़े राम रत जगतमें के परहित चित जाहि॥ प्रेमपैज निवहीं जिन्हे बड़ो सो सबही चाहि । तुलसी सन्तनते सुनै सन्तत इहै विचार ॥ तनधन चञ्चल अदल जग युगयुग परउपकार ॥ ऊँचहि आपद विभव वर नौचहि दत्त न होत ॥ हानिवृद्धि द्विजराजकहँ नहिं तारागण कोय ॥ बड़े रतहिं लघुके गुणहिं तुलसौ लघुहि न हेत । गुचाते मुक्ताअरूण गुञ्जा होत न पूर्वत । होहिं बड़े लघु समय सह तो लघु सकहिं न कादि । चन्द्र दूबरो कूवरो तऊ नखतते बाढ़ि । उरग तुरग नारी पति नरनौचो हथियार । तुलसी परखत रहब नित इनहिं न पलटत बार ॥ दुरजन आप समान करि को राखै हितलागि। तपततोय सह जाहि पुनि पलटि बतावत आगि ॥ अन्ततन्त्र- तन्तौलिया पुरुष अभूव धन पाठ। पुनि गुण योगवियोगले तुरत जाहिं ये आठ॥ लौच निचाई नहिं तजै जो पावहि सतसङ्ग। तुलसौ चन्दनविटप बलि विनविष भय न भुजङ्ग ॥ दूरजन दरपणसम सदा करि देखो यि दौर ॥ सनमुखकी गति चौर है विमुख भये कनु और ॥ मित्रक अवगुण मिलको परपहँ भाषत नाहिं । कूपछाह मिमि आपनौ राखत आपहि माहिं । तुलसी सो समरथ सुमति सुरुतौ साधु सुजान । जो बिचारि व्यवहरता जंग खरचलाभ अनुमान ॥ सौख सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच॥ सुनि करिये पनि परिहरिय परमनरच्चन पाँच॥ पुष्टिहि निज कचि काज करि रुष्टहिं काज बिगारि। लिया तनय सेवक सखा मनकेकण्टक चारिश नारि नगर भोजन सचिव सेवक लखा अगार ॥ सरस परिहरे रगरत निरस विषा- दबिकार ॥ दौरघ रोगो दारिदौ कटुबच लोलुपलोग। तुलसौं प्राय समानज्यों तुरित त्यागिबे,योगधाय लगे लोहा ललकि .
। सुखवीसत खचि लेयनीच । समारच पापोलोवर तीन वेलाही सोच॥ तुलसी स्वारथ लासुहे परमारथ तन पौत्रि॥ अन्ध कहे दुख पावबाहिहिठियारे हियडोठि। अनलनक्षोंने शोचवर अवशि समुलिये आप ॥ तुलली आपन लकिदिन पल पल पर परि- ताप ॥ रूप सनहिं मन्दिर जरत लावहिं धारिवबर । बोये ला- चह समय बिन जामतिशिरोमणि र निडर अनय करि कान- कुशल बोसबाहु सम होय। गयो गयो कह सुमतिजन ज्यो अमति कह कोय ॥ बहुमुत बहुरूचि बहुवचन बहु अचारव्यवहार इनको सलो मनाइवो इह अज्ञान अपार ॥ अपयश योग कि जानकी मणिचोरी कि कान्ह । तुलसौलोग रिकाडूनो करसि कातिको नान्ह ॥ मागि मधुकरी खात जे सोबत पाव पप्तारि। पापप्रतिष्ठ बढ़ि परौ तुलसी बाढ़ोरारि ॥ लही ओखिकवआध- रहिं बॉल पूत कब जाय । कत्र कोढ़ौ काया लहौ जगबहराइच- जाय॥ या जगको विपरीति गति काहि कहो समुझाय। जल जलिगो लन बाधिगौ जनतुल लो मुमुकाइ ॥ के जमित्रो कि बूकिवो दान कि कायकलेश। चारिचारू परलोकपथ यथा योगउपदेश ॥ बुध कि मान , सरवेदबन सले खेत सब सौंच ।। तुलसी कृषिगति जानिबो उत्तम मध्यम नौच ॥. सहि बोल सासति असम पाय अनट अपमान ! तुलसी धर्म न परिहरहि ते वर सन्त सुजान ॥ अनहित ज्यों परहित किये आपनहित तमनान । तुलसी चारुबिचारमति करिय काज सममान ! मिथ्यामाहुर सजनकहँ खलहिं गरलसम साच। तुलसी परसि परात जिमि पारद पावक आँच ॥ तुलसो खलबाणी विमल, सुनि समुसब हिय हेरि'। रामराज बाधक भई मन्दमत्यराजेरि दान दयादिक युद्धकै बौधौर नहिं भान । तुलसौ कहहिं बिनी- त इति ते नरवर परमान ॥ तुलसी साधौ विपतिके विद्याविनय ।
છેર तुलसीसससई विवेक। लाहस सुरूत सत्यव्रत रामभरोसो एक ॥ तुलसी शसमयके सखा.साहस धर्मविचार । सुकृतशील स्वभावरिज रामशरण आधार ॥ विद्याविनय विवेकरतिरोति जासु उरहोय! रामपरायश लो लदा आपदताहिनकोय ॥ बिनप्रपञ्च खल भौख- अलि नहिं फल किये कलेश । वामनबलिसों लौन्हिति दीन्ह सबहि उपदेश.॥ विबुध काज बामन बलिहि छलो भलो जिय- जानि । प्रभुता तनि वयमेतदपि मनते गइनगलानि ॥ बढ़े बढ़े तेकलकर जनम कनौड़ेहोहिं । तुलसो श्रीपति शिर तलें बलि- वामन गतिलोहिं ॥ खल उपकार विकारफलतुललीजानजहान मेखट मस्कट बणिक बक कथा सत्य उपखान ॥ ज्यों सूरखा उपदेश के होते योग जहान । दुरयोधन कहबोधकिन आयेश्याम सुजान॥हितपर बढ़त विरोध जब अनहितपर अपमान। राम- विमुख विधि बामगति लगुन मत्राय अमान प्र लाइसही सिख कोपबश किये कठिन परिपारू। छठ सकटभाजन सये हठि अन तो कपिकाक ॥ मारि सौह करि खोजलें करिमतलब बिन- लाल । झुटो नोच निमोचते जे इनके विश्वास ॥ ौक आफ्नो बना पर खौला विचारविहीन। तेउपदेशन मानहीं मोह महोद हि मौन । समुक्षिा सुनौत कुनौतरत जागतहींरहसय । उपदे- शिजोजगानो तुलसो उचित न होय ॥ परमारथ पथमल समु- मिलसात विशय लापटान। उतरि चिताते अधजरी मानहुँ স্বয়ী অবল । বলল জালিয় অঘ্য ২লন বিনয় নিন। चकित्सा धोखे पयस चाटत जिमि शठवान ॥ सुरसदतन तौरवपरित निपट उचालि असाज । मनभवाले भारि कलि राजत सहित लमान ॥ चोर चतुर बटमार भट प्रभु प्रिय मनाभण्ड। सन . सशौ परमारयो कालि सुपन्य पाखण्ड । गोल गवार पाल कलि जमनः महामहिपाल। साम न ।
तुलसौमतसई। ३ दाम न भेद कलि केवल दण्ड कराल ॥ पान पलीता कठिन गुरू गोला पुहमपाल ॥ राग रोष गण दोषको साक्षो वृदय- सरोज। तुलसौ विकसत ति लखि सकुचत देखि मनोज वयर सनेह भयानपहि. तुलसी जो नहिं जान । ते कि प्रेपर मग धरत पशु दिन पूछ बखान॥ रामदास यह जायके जो नर कहि सयान। तुलसौ अपने खाड़ हं खाक मिलावत बान । विविध एक विधि प्रभु अगण प्रहि सँवारहि राउ। करते होत. रुपाणको कठिन घोर घन घाउ ॥ काल विलोकत ईशरुख भानु काल अनुहार। रवि हि राह राजहिं प्रजा बुध व्यवहाहि विचार ॥ यथा अमल पावन पवन पाप सुसङ्ग कुसङ्ग। कहिय सुवास छवास तिमि काल महौश प्रसङ्ग। अत: चलन पथ शोच भय नृप नियोग नय नेम। कुतिय सु- भूषण भूषियत लोह निवारित हेम । सुधा अनाज सुनाज पल आम अशनसम जान। सुप्रसु प्रजाहित लेहि कर सामादिक अनुमान ॥ पाके पकए विटप दल उत्तम मध्यम नीच। फल नर लहहिं नरेश तिमि करि विवार मन बीच ॥ धरणि धेनु चरि धरम तन प्रजा सुवत्म पन्हाय। हाथ कल नहिं लागि है किये गोष्ठकी गाय। टक टक है परत गिरि शाखा सहस खजूरि। गरहि कुचप.. करि करि अनय सो कुचाल भुवि सूरि ॥ भूमि रूचिर रावणसभा अगदपद महिपाल। धर्म राम नय सोनबन अचन होतं तिहुँ, काल ॥ प्रौति रामद नौतिरत धर्म प्रतोय स्वभाव प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ वचन मन काय ॥ करके कर मनके मनहिं बचन बचन जिय जानि। भूपति अलहि न परिहहिं विनय विभूति सघानि गोगो बाण सुनत्त सुर समुमि उलटि गति देखु। उत्तम मध्यम नीच तुल्सीसतंलई। प्रभु बचन विचारू विशेखु ॥ शन सयाने सलिच दूत्र राख शोश अनाव। कूड़त लखि डगमगत अति चपरि चहूँ- दिशि धाव ॥ रव्यत राज समाज घर तन धन धसे सुबाहु । सत्य सुमचिवहि सौपि सुख बिलसहि निज नरनाहु । रसना मन्त्री दशन जन तोज पोन सब काज। प्रभु कैसे टप दानवृक बालक राज समाज ॥ लकरौ डौवा करकुलौ सरस काज पनुहारि। सुप्रभुजु गहहिं न परिहरहिं सेवक सखा विचारि॥ प्रभु समोप छोटे बड़े अचलं होहिं बलवान । तुलसी विदित विजोकहौं कर अंगुली अनुमान ॥ तुलसी सल वरणत बढ़तं निज संलहि अनुकूल। सकल साँति सबकह सुखद दलन सहित बिन फूल ॥ सधन संगण लधरम सगण सजन सुसबल महीप। तुलसी जे अभिमान बिन ते विभुवन- को दोप॥ साधन लमय सुद्धि लहि उभयं सूल अतुल । तुलसौ लौनों समय लम ते महि मङ्गलमूल ॥ रामायण अनु- हरत शिप जग भो भारत रोति । तुलसी शठको को सुनै कलि अबालिपर पौति ॥ सुहित सुखद गुणयुल सदा काल योग दुख होय । घर धन जारत अनल जिमि त्यागे सुख नहिं कोय ॥ • तुलसो नरवर गरम्य जिमि तिमि चेतन पट माहि। नहि सूक्त पनहुतन सो समुझा सुबुध जन ताहि ॥ तुलसो आगरा बड़ेनकै बीच परहु जनि धाय । लहै लोह पाहन दोऊं वीच रूई जरि जाय॥ अथ आदिहन परिहरहु तुलसी सहित विचार। भान्त गहन सबकई सुने सन्त नमत सुखसार । महु उपकार वि बार पद माफल हानि बिमूल। अहो जालु तुल लौ यतन बिन जाने इव शूल ॥ नौच निराजहिं निरस तरू टुजसौ सौंचहि जख। पोषत पाद समान जल विषय ऊख- को हज ॥ तोक वेदर लौ दगौ नाम सुलको पोच। धरम- तुरानीसतसई। राज यमराज यम कहत सकोच न शोच ॥ तुलसी देवल रामके लागे लाख करोर। काक समागे हगि भरे महिमा स्य- उन छोर॥ भलो कहहि जाने बिना कि अथवा अपवाद । तुलसौ गाड़र जानि जिय करहु न हरण विमाद । तन धन महिमा धर्म जेहि जाकहँ सह अभिमान। तुललो जियल बिडम्बना परिणामहुगति जान ॥ वदो विबुभ दरवारते भूमि भूप दरबार। जापक पूजक देखियत सहत निरादर मार ।। खग. मृग मौन पुनीत किय बनहु सम नेपाल। बानइ बाला रावण धरहि सुखद बन्छु किय काल। रामलपण विजयी भये सुनहु गरौवनिवाज। मुखर बालि रावण गये घरही लहित समाज द्वारे टाट न दे सकहिं तुलसौ जे नर नौच्च ।। निदरहि वलि हरिचन्द्र कहूँ किहुका करन दधौच ॥ तुलसी निज कोरति चहहि परकीरतिकह खोय। तिनके मुंह मलि लागि है मिटहि न मरिहैं धोय ॥ नौच चहलम जानि-. बो सुनि लखि तुलसीदास। ढौल देत महिं गिरि परत्व बचत चढ़त अकास॥ सहवासी काचौ भलै पुरजन पाक अवौन। कालक्षेप किहि विधि करे तुलसी खग सृग मौन बड़े पाप वाढ़े किये छोटे करतल जात। तुजसो तापर सुख चहत विधिपर. बहुत रिसात ॥ सुमति निवारहि परिहरहि दल सुमनहु संग्राम। सकल गये तनबिन सये साखौ यादव काम।। कलह न जानवि छोट करि कठिन परम परिणाम। लगत अनल अति नौच घर जरत धनिक धनधाम जो ते मल बूभिबो भलो जोतते हारि। जहां जाइ जई डाइबो भलो जो करिय विचारि॥ तुजसौ तीन प्रकारते हित मनाहित पहिचान। बरबस पर परोसवश परे मामला जान दूर- जन बदन कमान सम बचन विमुञ्चत तौर। सम्मत उर ॥
१४.३ तुलसी सतसई। बेधत नहीं क्षमा लमाह शरीर ॥ कौरव पाण्डव जानिबो क्रोध क्षमाके सौम। पाँचहि मारि नभै सके लयो निपाते भीम ॥ जो मधु दोन्छे ते भरे माहुर देउ न ताउ । जग जिलि हारे परशुधर हारि जिते रघराउ ॥ क्रोध न सना खोलिये बड़. खोलब तरबारि। सुनत मधुरं परिणाम हित बोलब बचन विचारि ॥ तुलप्ती मौठो समयते मांगी मिलेजु मीच। सुधा सुधाकर समय बिन कालकूटते नौच । पाही खेती लगन बड़ि ऋण कुव्याज सग खेतु। बैर भापते बड़नले कियो पाँच दुख हेतु ॥ रोका खोक गुरू देत शिठ शिषहि सुसाहब साध । तोरि खाय फल होय मल तरू काटे अपराध चढ़ो नवरहि चङ्ग जिमि ज्ञानते शोक समाज। करम धरम सुख सम्पदा तिमि जानिको कुराज ॥ पेट न फूटत बिन कहे कहे न लागत ढेर। बोलब वचन विचारयत समुझि सफेर कुफेर ॥ प्रौति सगाई सकल विधि बनिज उपाय अनेक । कल बल छल कॉल- :: अल अलिन डहकत एकदि एक ॥ दश्यसहित क्षलि धर्म सब इल समेत व्यवहार । स्वारथ सहित सनेह सब रुचि अनुहरत प्रचार ॥ धातु बधौ निरुपाधिवर सदगुरू लाभ सुनौत। दम दरश कलिकालमहँ पोधिन सुनब सुनीता कायर कर कपूत कलि घरघर सरिल उधार ॥ ज्यों जगदीशतो अति सलो ज्यों महीशतो भार। जन्म जन्म तुलसौ चहत राम- चरण अनुराग ॥ का आषाका संसकत विभव चाहिये साँच कामतो आवे कामरी का ले करिय कमाच। बरा विशद मुक्तासरिस अर्थ सूत्र सम तूल । सतसया जग बरविधद गुण : शोमा सुखसूल वर माला बाला समति उर धारै यत नेह । सुख शोभा सरलाय नित लहै रामपतिगेह॥ भूप काहि लघु गुशिनहँ गुणो कहहि लघु भूपः। महि गिरि गत. दोउ. .
तुलसीसतपाई।
लखत जिमि तुलसी खरवस रूप ॥ दोहा चारू विचारु चलु
परिहरि वाद विवाद। सुकृत सौम स्वारथ अवधि परमारथ
सरयाद॥
इति सप्तमः सर्गः॥
इति ॥
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विजया-बक्षिका। १नं. " JU " अनेक प्रसिद्ध डाक्तार कविराज वैद्य वाहते ह वनादि रोगोंकी ऐसी महौषध अभीतर और कभी ईजाद नहीं हुई। ज्वर होनेका रावण या गया है शरीर हाथ पैरोंमें हड़फूटन होने लगी है जम्हाई प्राने लगी है आंखोंसें गर्मी आ गई है-ऐसे मौकेपर तीन तीन घण्टे पीछे एक एक करको दो विजया-बटिका मात्र खालेनेसे ज्वर आनेका सय नहीं रहेगा। जिया-बटिका तन्दुरुस्तीकी हालतले खानेरी और गोगोंसे जकड़ जानेका भय नहीं रहता। विजया बटिज्ञाका मूल्यादि। बटिका संख्या मूल्य डाकमहसूल पेकिङ्ग वी० पी० १८ गोली ॥ U २नं. २६ ३नं: ५४ गोली १॥ बहुत बड़ी-गृहस्थीके कामको उदिया अर्थात् नं. १४४ गोली ) M विजया बटिकाका अलौकिकल। रोगीको नाडीपर दिन रात ज्वर है, प्लीहाको ऐंचातानी और यहा- तसे तड़पड़ाता हुआ कष्ट पाता है, उसका हाथ, पांव, मुह सूज गया हैं, आंखें पीली हो गई है, नाकसे नकसीर फटती है-~-ऐसे विविध व्याधि प्रस्थ रोगी भी विजया-ब्रटिकासे . अच्छे हुए हैं और जब आद- सोको प्लीहा, यकृत बाल नहीं है, ज्वर भी नहीं है, अच्छा शरीर है,- उन्न समय सी विजया-बटिका सेवनसे भूख बढ़ेगी, शरीरका लावण्य बढ़ेगा। इससे विजया-वटिका विचित्र है। मिलनेका सता,-बौं बमुएण्ड कं०-७९लं. हेरिसन रोड, कलकत्ता رم " a).
वी० बसु एशतु कम्पनीका हाथीमाकी सालसा सहन्ध युक्त और सुखाद है। हिन्दुस्थानी लोग यौवन होसे वृद्ध हो जाते हैं। बत्तीस वर्षकी उमरसे पहले ही कितनोंका अङ्ग शिथिल हो जाता है। बयालिस वर्षे वी उमरमें कितने ही सचमुच बूढ़े हो जाते हैं।(बी: बसं० एण्ड कल्पनीका सालसा पीनेसे आदमी बहजसे बूढ़ा न होगा। शरीर चल रहेगा। जो साठ वर्षको बूढ़े हैं, कलर भूक गई है और सांस लटक गया है, तीन महीने यह वी० बस एण्ड वास्पनीका साबसा पीवो देखें शरीरसें नई जवानीका उभार होगा, बलवीर्य बढ़ेगा, नवे बादमी बन जावेंगे। लड़कों बच्चे, पुरुष स्त्री, सब. वी. वस एण्ड अस्पनीका सालसा हेवन करें। नाना प्रकारको पारेका घाव, नाना प्रकारको चल- रोग, सूखी खाज, गर्मी के घाव, बातरोग, जोड़ों का दर्द, अझोंका नई. दवासोर, भगन्दर, अनादि नाना रोग आराम होते हैं हाथोमाको लालसाका मूल्यादि। मूल्य डाः सः पेकिन १२. आध पावकी शीशी 11) " २२. पावसरको शोशी ३ नं. डेढ़ पावकी मौसी १), लिखनेका पता,नौनस एण्ड कम्पनी, ७५नं० हेरिसन रोड, कलकत्ता १०
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