Adarsh Library, Jaipur
Antim Chadai
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अन्तिम चढ़ाई
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अन्तिमचढ़ाई मेहरुन्निसा परवेज़
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अन्तिम चढ़ाई
अयोध्या से वापसी
बूंद का हक
गुरुमन्त्र
अपनी जमीन
पत्परवाली गली
जमाना बदल गया है
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अन्तिम चढ़ाई प्लेटफार्म पर खड़ी वह पसं से बार-बार रूपेश की तसवीर निकालकर ध्यान से देखती और मन-ही-मन प्रसन्न हो जाती, फिर झट-से तसवीर पर्स में रख देती । जवान रूपेश की तसवीर से वह बार-बार आठ साल के नन्हे रूपेश का चेहरा मिलाने की कोशिश करती, पर दोनों चेहरो मे कही कोई समानता नही दिखती। बार-बार वह तसवीर निकालकर अपने मन को तसल्ली दे लेती कि यही रूपेश है, पर मन जैसे मानने को तैयार ही नहीं होता. बार .."बार पाठ साल का नन्हा रूपेश आँखों के सामने आ खडा होता। रितेश बन्द गले का कोट पहने युकस्टाल के सामने खड़े थे। वह एक चार मुडकर रितेश को निहार लेती है। इन पन्द्रह बरसों में रितेश ज्यूं-के- त्यूं ही थे, बस कनपटी के पास बचे सारे बाल सफेद हो गये थे और चांद चिकने मैदान सी चमकने लगी थी। वाकी उनकी छवि वही थी। रितेश भी रूपेश को लेने आये थे। सुबह से ही रितेश ने स्टेशन जाने की तैयारियां की थी। नयी ब्लेड निकालकर शेव किया था। नये साबुन से नहाये थे। सबसे बढ़िया कपड़े निकालकर पहने थे। बार-बार आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर उसकी तरफ देखा पा-"क्यों, सज रहा हूँ न ?" उसने कोई उत्तर नहीं दिया और गोली माखों से रितेश को देखा था, मानो कह रही हो-आज अकेला ही रहने दो। मुबह से ही पुरानी स्मृतियों
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अन्तिम चढ़ाई प्लेटफार्म पर खड़ी वह पसं से बार-बार रूपेश की तसवीर निकालकर ध्यान से देखती और मन-ही-मन प्रसन्न हो जाती, फिर झट-से तसवीर पर्स में रख देती । जवान रूपेश की तसवीर से वह -यार आठ साल के नन्हे रूपेश क चेहरा मिलाने की कोशिश करती, पर दोनों चेहरों में कही कोई समानत नहीं दिखती। बार-बार वह तसवीर निकालकर अपने मन को तसल्ली। लेती कि यही रूपेश है, पर मन जैसे मानने को तैयार ही नहीं होता. "बा 'बार''आठ साल का नन्हा रूपेश आंखों के सामने आ खड़ा होता । रितेश बन्द गले का कोट पहने बुकस्टाल के सामने रहे थे। वह एन चार मुडकर रितेश को निहार लेती है। इन पन्द्रह बरसो मे रितेश ज्यू के रयू ही थे, बस कनपटी के पास बचे सारे वाल सफेद हो गये थे और चार चिकने मैदान-सी चमकने लगी थी। बाकी उनकी छवि वही थी। रितेश भी रूपेश को लेने आये थे। सुबह से ही रितेश ने स्टेशन जाने की तैयारियां की थी। नयी ब्लेर निकालकर शेव किया था। नये साबुन से नहाये थे। सबसे बढिया कपड़े निकालकर पहने थे। वार-बार आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर उसकं तरफ देखा था-"क्यों, सज रहा हूँन ?" उसने कोई उत्तर नहीं दिया और गीली आंखों से रितेश को देखा था मानो कह रही हो-माज अकेला ही रहने दो। सुबह से ही पुरानी स्मृतिय अन्तिम चढ़ाई:
। को याद कर-कर वह कई वार रो चुकी थी। रितेश उसकी मनःस्थिति समझ गये थे, इसलिए सुबह से उसे किसी-न-किसी काम के बहाने अपने निकट चाहते थे और वह चाहती थी आज 'वस आज उसे भरपूर एकान्त मिल जाये ताकि वह चुप एक कोने में बैठी पुरानी स्मृतियों को जी ले, उन्हें हल्के हायों से स्पर्श कर ले, धीमे-धीमे सहला ले और जो भरकर रो ले। रितेश उसके निकट आये और दोनों हथेलियों में उसका चेहरा भर- कर बोले, "सच कहो भला, रूपेश तुम्हारा अकेले का वेटा है ? क्या अभी भी कुछ ऐसा वचा है, जिस पर केवल तुम्हारा हक है, मेरा नहीं ?" "न, न, ऐसा मत बोलो," वह रितेश की छाती से लग गयी, "रूपेश हम दोनों का वेटा है !" उसकी गाल पर आँसू लुढ़क आये। "सच कहूँ माला," रितेश ने उसे गहरे से निहारा और गम्भीर शब्दों में कहा, "रूपेश न तो मेरा बेटा है, न तुम्हारा, वह सिर्फ जितेन का वेटा है। हम दोनों तो वस दोस्त की तरह उसे लिवाने जा रहे हैं। हम दोनों ही वरावर की श्रेणी में आते हैं। और देखो माला," रितेश थोड़ा ठहरकर बोले, "स्टेशन जाने के पहले ही एक बात अच्छे से समझ लो, ज्यादा बाशा वांव- कर मत जाना । अपने को हर वात के लिए तैयार करके चलना, अव रूपेश आठ साल का नन्हा बच्चा नहीं, अब वह जवान हो गया है। उम्र के साथ- साथ उसकी समझ के पैमाने भी बदल गये होंगे और और वह तुम्हारा' मेरा मतलब है, हम दोनों का अपमान भी कर सकता है। समझदारी इसी में है कि हमें पहले ही इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए। याद रखो माला, तुम अपने बेटे को लिवाने नहीं, अपने पिछले अतीत को निहारने जा रही हो, जो महज विन्दु बनकर शेष रह गया है। इससे आगे की न सोचना, नही अभिलाषा रखना।" "नहीं रसुंगी, नहीं रखूगी," वह जोर से रो पड़ी, "अपमान ही तो होगा न ! अपमान के सिवाय मुझे मिला भी क्या है ! "चलो, अब समय नहीं रहा, तीन मील का रास्ता है, जल्दी नहाकर माओ, मैं तुम्हारी मालमारी से तुम्हारी साड़ी चुनकर रख देता हूँ। आज तुम रितेश की पली नहीं, रूपेश की मां बनकर जामोगी।" रितेश की वातों ने उसे गुदगुदाकर जैसे निहाल कर दिया। रूपेश की 8/अन्तिम चढ़ाई ... - मा! कितना ममता के रस से भरा शब्द था। हाँ, बस इमी पड़ाव के लिए ही तो उमकी जिन्दगी टहरी थी। बस इसी दिन का ही तो दन्तजार था। इम दिन के लिए वह कब से वाट जोह रही थी, हमेशा दूयते मन में एक आम बंधी थी कि रूपेश बड़ा होगा तो जरूर-जरूर उसके पास आयेगा। दुनिया ने उसे तरह-तरह से बदनाम किया था, उसके नाम के आगे जितनी सस्ती बातें जोडी जा सकती थी, जोड़ी गयी। दुख उसे अपने अपमान का नहीं था, दुग तो उसे इस बात का रहा कि जितेन, जो हर बात का साझी- दार था, खुद मुकरकर भीड़ में शामिल हो गया था। और वह जीवन के उस पप पर अकेली रह गयी थी और आज उस लम्बी यात्रा की अन्तिम पढाई थी। अन्तिम चढाई ही तो कठिन होती है, क्योंकि सारा भेद जिसके छलावे के सहारे हम अपने को समेटे रहते हैं, मोह में बंधे रहते हैं, वह टूटनेवाला होता है और फूली हुई सांस पर काबू पाना कठिन-सा हो जाता । घायरूम से वह नहाकर लौटी। गोले बालों को तौलिये से झटककर उसने पीछे पीठ की ओर फेंका कि सहसा उसके हाथों को लकवा मार गया। रितेश ने पलंग पर उसकी वहीं साड़ी निकालकर रखी थी, जो एक बार उमने रूपेदा के पांचवे जन्मदिन पर पहनी थी। पीले रंग की, काली बनारसी बार्डरवाली साड़ी थी उसने पथराई और दुखती आंखो से रितेश को देखा । इस कप्ट को तो उसने कल्पना नहीं की थी। "माला,"रितेश उसकी मन.स्थिति को समझकर धैर्य बंधाने के अन्दाज में बोले, "तुम्हें पता है इन पन्द्रह वरसों मे तुम कितना बदल गयी हो? तुम्हारे बाल सफेद हो गये हैं, क्या रूपेश अपनी मां को पहवान पायेगा? हो मरता है उसकी बचपन की नन्ही स्मृति में यह साड़ी कही अटकी रह गयी हो, जब तुन गुन्बारों से सजे कमरे में उसका हाथ पकड़कर केक कटवाती थी।" वह सहम-सी गयी, जैसे सामने काला नाग देख रही हो। सबकुछ कितना कष्टकारक था। पोहा से उसका मुंह तमतमा गया, सांस लेना कठिन. सा हो गया। पुरानी यादों को जहां उसने सहेजकर रखा था, वहीं उसने पुरानी एक-दो चीजों को भी सहेजकर रख छोड़ा था। पता नहीं किस आशा में, यह खुद उसे पता नहीं था, परन्तु आज वही यादें, वही स्मृतियाँ कितनी दर्दनाक हो उठी थीं ! पर आज हर बात के लिए वह तैयार थी। वही बुजदिल मन, जो कभी पुरानी बातों को याद करने से भी घबराता था, आज हर बात का सामना करना चाहता था। उसने इसी तरह धवरा-घबराकर तो अपने-आपको कमजोर बना लिया था। वह पीले रंग की काली वनारसी बार्डरवाली साड़ी बाँधे, बाहर आयी, जहां पहले से ही तैयार हाथ की घड़ी घुमाते रितेश उसका इन्तजार करते टहल रहे थे। "माला!" उसकी हल्की पदचाप से रितेश ने सर उठाकर उसे प्रसन्नता से देखा, "तुम पन्द्रह वर्ष पहले की माला लग रही हो, सच, रूपेश तुम्हें देखते ही पहचान लेगा।" "अच्छा," उसने मुसकराकर धड़कते दिल पर काबू किया। "डालिग, कितनी स्पीड से चलाऊँ?" रितेश ने उमंग में भरकर कार का दरवाजा उसके लिए खोलते हुए पूछा। "दस की स्पीड से।" वह हंस दी। पहले वहुत, पहले, रितेश बहुत तेज कार चलाया करते थे। वह हमेशा चिल्लाती थी। बाद में, जब उसने कार बन्द कर दिया तो हमेशा सतर्क रहते और पूछ लिया करते थे। वह जितना कहती, उतने पर ही गाड़ी चलती। अब कुछ वर्षों से तो वह चालीस से आगे बढ़े ही नहीं, आज जैसे वह भी पन्द्रह वर्ष पीछे चले गये थे। . । जितेन से उसके सम्बन्ध दिनों-दिन खराब होते जा रहे थे। दोनों ने एक- दूसरे से बोलना तक छोड़ रखा था। जब लड़ना होता तभी वह एक-दूसरे से बोलते थे या एक-दूसरे की ओर देखते थे। जितेन की आँखों में उसके लिए घृणा, नफरत का भाव दिनों-दिन गहरा होता जा रहा था। दोनों के बीच के रिश्ते कई वर्ष पहले समाप्त हो गये थे, दोनों को जोड़े थी एक कड़ी-रूपेश! 10/ अन्तिम चढ़ाई जहाँ दोनो एक-दूसरे से घृणा करते थे, वही एक बिन्दु पर याकर कोमल हो जाते थे। दोनों ही समान रूप से रूपेश को प्यार करते थे। एक चार जितेन ने अपने दोस्त से कहा भी था, 'मैं जानता हूँ, माला रूपेश को यहुत ज्यादा चाहती है।' तब उसे उसका यह विश्वास बुरी तरह खल गया था। जब दोनों के बीच अलग होने की बात उठी, तर जितेन ने साफ शब्दों में कहा था, रूपेश आठ वर्ष पूरे कर चुका है। तुम्हारा उस पर कोई हक नहीं बनता। यदि तुमने उसे चोरी से ले जाने की कोशिश भी की तो कानून कहीं-न-कही से सोजकर उसे मुझ तक पहुंचा जायेगा।' वह चाहती तो रूपेश को ला सकती थी। जितेन मुकदमा करता और रूपेश उससे छिन जाता। फिर वह यह भी नहीं चाहती थी कि रूपेश उसकी सरह दुनिया की ठोकरें खाये। उमै विश्वास था-जितेन चाहे जितना कटु हो, पर रूपेश को मां की तरह ही प्यार तथा सुरक्षा देगा । उसे यह भी उम्मीद थी कि जितेन उसके और रूपेश के बीच नहीं आयेगा। वह जब चाहेगी उससे मिल सकेगी। वह रूपेश-जैसे अनमोल रत्न को छोड़कर जा रही थी, फिर अपनी और चीजों को क्या समेटती? उसने सव जहाँ-का- तहाँ छोड़ दिया, बस यही सोचकर कि सब उसके रूपेश के काम आयेगा। दो-चार गहने और दो-चार कपड़े एक सूटकेस में रखकर वह आयी थी, वाकी सब जितेन की आंखों के सामने था। पर, बाद में, जहां-तहां उसे सुनने को मिला, जितेन सबसे कहता फिरा या-माला गहने लेकर भाग गयी! तब उसे अपने भाग्य पर तरस आया था, अपनी गैरत पर शर्म आयी यो । वही जितेन जो कभी उसका पति या, उसने इतना भी नहीं सोचा कि वह सब छोड़ गयी, सिर्फ अपने खुद के दो-चार गहने ही तो ले गयी, सिर्फ इसलिए कि यदि शुरू-शुरू में कही नौकरी नहीं मिलेगी, तो कम-से-कम उन्हें बेचकर दो समय को रोटी तो जुटा सकेगी, भीष तो नहीं मांगनी पड़ेगी! तब उसे अपने-आप पर शर्म आयी थी। कितना अच्छा होता, वह भीख ही मांग लेती। जहाँ सब छोड़ दिया, वहां"" चिड़िया की किस्मत में सारी उम्र घोंसला बनाना ही लिखा होता है। अन्तिम चढ़ाई/1 इससे अधिक वह कर भी क्या सकती है ! तूफान आता है और उसके आवाद घोंसले को तहस-नहस कर जाता है। वह हताश होती है। दुखी होकर अपने वरवाद, उजड़े घोंसले को निहारती है। सारी-सारी रात विजली और तूफान के भय से भयभीत किसी की छत के नीचे बैठी रात गुजार देती है। सोचती है-अब सारी उम्र घोंसला नहीं बनाऊंगी, हर वार तूफान आकर उसे नष्ट कर देता है। पर जब सुबह होती है, आसमान साफ होता है तो वह फिर किसी पेड़ का आसरा लेती है और लगन, मेहनत से जुट जाती है, तिनके चुनने। बस, इसी तरह मानव-मन है । हर तूफान के बाद सोचता है-जिन्दगी फिर नहीं वसायेगा। पर हालात मजबूर कर देते हैं और वह फिर अपनी नयी दुनिया आवाद कर लेता है। पर उसकी यातना, मानसिक द्वन्द्व को कोई नहीं जान पाता। चिड़िया की किस्मत और इन्सान की किस्मत में शायद ज्यादा फरक नहीं है। दोनों का मुकद्दर एक ही है, यानी किसी-न-किसी घोंसले में पनाह लेना। विना किसी सहारे के संसार में रहने का विचार करके उसका कलेजा कॉप जाता था । वह अकेली, असहाय नारी जीने का साहस कैसे करती? जहाँ कुशल खिलाड़ी मुंहकी खा चुके हों, वहाँ उस अकेली नारी की क्या गति होती? कौन रक्षा करेगा? कौन मरने के बाद कन्धा देगा? ये सारे प्रश्न थे, जिन्होंने उसे भयभीत किया। जीवन की डोर हमेशा उसके हाथ से छितर जाती और वह आँखों में आंसू लिये, छितरी डोर को फिर-फिर लपेटने की कोशिश करती। मन जिद्दी वच्चे-सा ऐंठकर बैठ जाता और पीछे दौड़ना चाहता और वह उसकी उंगली पकड़े आगे की राह दिखा देती। पर शायद कोई सोच भी नहीं सकता इन सारी क्रियाओं में वह कितना थक जाती, कितना टूट जाती थी ! रितेश के साथ व्याह करने के बाद कई साल बीत गये पर उसके यहाँ कोई बाल-बच्चा नहीं हुआ। यह दुख भी जब-तब उसकी आँखों में आकर ठहर जाता। कम-से-कम दूसरे वच्चे से तो वह अपने खाली मन को भर सकती थी। जितेन रूपेश को लेकर उसकी कमजोरी को जानता था। उसने उसके 12 / अन्तिम चढ़ाई W माध्यम ने अपनी सारी दुश्मनी निकाली। कभी उसे देश से मिलने नहीं दिया और नन्हे रूपेश के नन्हेसे दिमाग में उसके खिलाफ तरह-तरह की चात भरी, उमे बदचलन घोषित किया। यह दुय सजा के रूप में उसके लिए, एक औरत के लिए, बहुत बड़ा था। रितेग ने काफी प्रयत्न किये, पर जितेन ने उसे रूपेश से मिलने नहीं दिया। एक बार जब वह काफी दुखी थो,तो रितेश उमे लेकर स्पेरा के हॉस्टल गये। पर उसी दिन स्पेश अपने घर चला गया था अचानक । वह रूपेश के माथ पहनेवाले उमके साथियों से मिली और रूपेश के बारे में पूछती रही, जानकारी लेती रही। उन बच्चों ने उन दोनो को अपने मंस में डिनर पर इन्वाइट किया। वे लोग साफ-सुथरे, सलीके से सजे-संवरे हाल में चच्चों के माप वैठकर डिनर लेते रहे। रितेग बच्ची में घुलमिल गये थे। वह बच्चों को देस सोचती रही- ऐसे ही रूपेश भी डिनर के मूट मे, सलीके से हाल में आता होगा! जाते समय उन लोगो ने सब बच्चो को मिठाई और टाफी वाँटी थी। लौटते समय उसका मन बहुत भारी था। हॉस्टल को सौड़ियां उतरते उसके पर वंजान लारा की तरह हो गये थे। उसने मन-ही-मन सोच लिया पा-- अब स्पेस में उसकी मेंट उसके भाग्य में नहीं है। सारे रास्ते उसकी आँखो के आगे वही आठ साल का रूपेश दौडता आ गडा होता, क्रिकेट का वैट तिये-ममी, जरा वालिग करो तो! और उसके लिए अपने को सँभालना कठिन हो जाता। आंघों में मौत की-मो वोरानी ठहर जाती थी। इमी वीरानी को ढोते हुए उसने साल-दर- साल काट दिये। रितेश रिटायर हुए तो उन लोगों ने अपने फार्म पर बंगला बना लिया-- छोटा-सा काटेजनुमा बंगला। नौकरों के साथ दोनों अपने बगीचे को सजाते-संवारते रहते। एक-एक फूल को खबर रितेश को पी। उनका कोई मेहमान रात को भी घर आता तो वे टाचं से एक-एक फूल को दिखाते और प्रसन्न होते। वह खुद धीरे-धीरे अपना अतीत भूल गयो थो, अपनो पहचान भूल गयी थी। ।
- इतने वर्षों के बाद मचानक स्पेश की एक चिट्ठी मिली थी, साथ में उसका युवा रूप में एक फोटो था।चिट्ठी केवल दो लाइन की थी-मैं आपके शहर में अपनी टीम के साथ खेलने आ रहा हूँ। नापने मिलना चाहता हूँ। क्या बाप स्टेशन पर आ सकेंगी? पत्र पाकर वह खुशी ने पागल हो गयी थी। रितेश भी जैसे वीरा गये थे। वह सारा दिन धूप में तपते हुए बगीचे को चुस्त-दुरुस्त करते रहे, माली को ताकीद देते रहे, "देखो, नीम की सूखी पत्तियां लॉन पर नहीं पड़ी रहनी चाहिए। चिड़ियां गमलों में तिनके विलेर जाती हैं, ध्यान रखना।" सारा घर वह खुद अपने सामने ठीक करवाते रहे। रसोइये को कई- कई वार हिदायतें दी गयी थीं कि पुडिंग और आइसक्रीम बढ़िया दननी चाहिए। वह खुद भूल गयी थी कि पुडिंग और आइसक्रीम रूपेश की बचपन की पसन्द थी। अब, इतने वर्षों के बाद तो अन्तर आ गया होगा। पर जैसे वह अपने आप में भूली हुई थी। बस, इसी दिन के इन्तजार में तो वह नव तक जी रही थी। रूपेश को गुलाबी रंग बहुत पसन्द था । उसने रूपेश की खुनी के लिए कमरे की हर चीज को गुलाबी कर दिया था। परदे, बंडशीट, कुशन-कवर सव गुलावी। रितेश जब नौकरी में थे, तब आये-दिन हल्ला मचा रहता था-आज कलेक्टर का दौरा, तो कल कमिश्नर का। इस तरह भाग-दौड़ मची रहती थी। वह थक जाती थी। पर जब मेहमानों के जाने के बाद रितेश उसे बधाई देते, 'भई माला, तुमने तो गजब का इन्तजाम किया, सारे मेहमान खुश हो गये।' सुनकर उसकी सारी थकान उतर जाती थी। पर जब से रितेश रिटायर हुए, आराम-ही-आराम था। रितेश को नयी-नयी काकरी खरीदने का बहुत शौक था। सीजन के अनुसार हिनर- सैट के रंग निकाले जाते थे, पर नव तो सारे डिनर-सटशीशों की लालमारी में रखे रहते थे, मानो किसी दुकान में सजे हों। अब वह भागमभाग भी नहीं रहती थी। दोनों डायनिंग-हाल में खाना खाने के बजाय, अपने कमरे में ही खा लेते थे। और बाज, रूपेश का पत्र मिलते ही जैसे किसी ने जादू की छड़ी घुमा 14/अन्तिम चढ़ाई - दी हो । सारी हसचल फिर शुरू हो गयी थी। रितेश बार-बार नौकरी को हिदायत देते, "सुबह की चाय इस सैट में, शाम को इस संट में, लंच इस मंट मे, डिनर इस संट मे।" नौकर भी समझ गये थे कि कोई खास मेहमान आनेवाले हैं। रितेपा ने अपने कमरे में रखी तमाम अग्रेजी पुस्तकें रूपेश के कमरे में सजा दी थी। रूपेश के लिए ग्यासतौर पर वह कमरा चुना गया था, जिसकी विड़कियों गुलायों के बगीचे की ओर सुलती थी। रूपेश त्रिवेट का माना हुआ सिलाड़ी था। वह कई बार बाहर देशों में भी जाकर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर आया था। वह सबमे ज्यादा लोकप्रिय खिलाही माना जाने लगा था। बचपन से ही उसकी तेज बाल गेंद को पहचानने के लिए हमेशा सजग रहती थी। वल्ला पकड़ने और फोल्डिग फरते समय झक्कर खड़े होने का उसका अपना खास अन्दाज या, जिसे यह पहचानती थी। ट्रेन से उतरी वेसय भीड । शोर अब घोरे-धीरे पमने लगा पा। सब बंगे अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए, अपने प्रियजनों से मिलने के लिए, प्याकुल हों। । धीरे-धीरे भीड़ बाहर की ओर सरकने लगी थी। सोमचेवाले, जो बेहद वेसनी आवाज मे चिल्ला रहे थे, अब चुप हो गये थे। वैसे भी इस ट्रेन पर उनका सामान बिकनेवाला नहीं था, पयोकि यह ट्रेन का अन्तिम स्टेशन था। यहाँ आकर ट्रेन पूरी खाली हो जाती थी। भीड़ में खड़ी-सड़ी वह पहले जैसे खुद भीड़ बन गयी थी। पर अब दूर में ही उसे देखा जा सकता था। हल्के बादामी रग की उसकी साड़ी और पॉफी रंग के बार्डर के फूल । उसके गोरे पैरो मे फैमी काली चप्पल भी दूर से दिख रही थी । इपर-उधर उड़ते छोटे-छोटे बाल चोरी से स्वतन्त्र होकर उड रहे थे और उसके परेशान चेहरे को अधिक स्पष्ट कर रहे थे। उसने वैचनी में अपने शरीर का भार दा पर से बायें पर पर हाला और सतर्क पडी हो गयी।
इतने वर्षों के बाद अचानक रूपेश की एक चिट्ठी मिली थी, साथ में उसका युवा रूप में एक फोटो था। चिट्ठी केवल दो लाइन की थी--मैं आपके शहर में अपनी टीम के साथ खेलने आ रहा हूँ। मापसे मिलना चाहता हूँ। क्या आप स्टेशन पर आ सकेंगी? पत्र पाकर वह खुशी से पागल हो गयी थी। रितेश भी जैसे वीरा गये थे। वह सारा दिन धूप में तपते हुए बगीचे को चुस्त-दुरुस्त करते रहे, माली को ताकीद देते रहे, "देखो, नीम की सूखी पत्तियां लॉन पर नहीं पड़ी रहनी चाहिए। चिड़ियां गमलों में तिनके विखेर जाती हैं, ध्यान रखना।" सारा घर वह खुद अपने सामने ठीक करवाते रहे। रसोइये को कई- कई बार हिदायतें दी गयी थीं कि पुडिंग और आइसक्रीम बढ़िया बननी चाहिए। वह खुद भूल गयी थी कि पुडिंग और आइसक्रीम रूपेश की बचपन की पसन्द थी। अब, इतने वर्षों के बाद तो अन्तर आ गया होगा। पर जैसे वह अपने आप में भूली हुई थी। बस, इसी दिन के इन्तजार में तो वह अब तक जी रही थी। रूपेश को गुलाबी रंग बहुत पसन्द था। उसने रूपेश की खुशी के लिए कमरे की हर चीज को गुलावी कर दिया था। परदे, बैडशीट, कुशन-कवर सब गुलाबी। रितेश जव नौकरी में थे, तब आये-दिन हल्ला मचा रहता था-आज' कलेक्टर का दौरा, तो कल कमिश्नर का। इस तरह भाग-दौड़ मची रहती थी। वह थक जाती थी। पर जब मेहमानों के जाने के बाद रितेश उसे बधाई देते, 'भई माला, तुमने तो गजब का इन्तजाम किया, सारे मेहमान खुश हो गये।' सुनकर उसकी सारी थकान उतर जाती थी। पर जब से रितेश रिटायर हुए, आराम-ही-आराम था। रितेश को नयी-नयी भाकरी खरीदने का बहुत शौक था। सीजन के अनुसार डिनर- सैट के रंग निकाले जाते थे, पर अव तो सारे डिनर-सैट शीशों की आलमारी में रखे रहते थे, मानो किसी दुकान में सजे हों । अव वह भागमभाग भी नहीं रहती थी। दोनों डायनिंग-हाल में खाना खाने के बजाय, अपने कमरे में ही खा लेते थे। और आज, रूपेश का पत्र मिलते ही जैसे किसी ने जादू की छड़ी घुमा 14/अन्तिम चढ़ाई .
दो हो । सारी हलचल फिर शुरू हो गयी थी। रितेश बार-बार नौकरों को हिदायत देते, "सुबह की चाय इस सैट मे, शाम की इस संट में, लंच इस मंट में, डिनर इस संट में।" नौकर भी समझ गये थे कि कोई खास मेहमान आनेवाले हैं। रितेश ने अपने कमरे में रखी तमाम अग्रेजी पुस्तकें रूपेश के कमरे मे सजा दी थी। रूपेश के लिए खासतौर पर वह कमरा चुना गया था, जिसकी खिड़कियां गुलाबों के बगीचे की ओर खुलती थी। रूपेश क्रिकेट का माना हुआ खिलाडी या। यह कई बार बाहर देशों में भी जाकर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर आया था। वह सबसे ज्यादा लोकप्रिय पिलाडी माना जाने लगा था। बचपन से ही उसकी तेज आंखें गेंद को पहचानने के लिए हमेशा सजग रहती थी। बल्ला पकड़ने और फील्डिंग करते समय झुककर खड़े होने का उसका अपना खास अन्दाज था, जिसे यह पहचानती थी। ट्रेन से उतरी वेसन भीड । शोर अब धीरे-धीरे थमने लगा था। सब जमे अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए, अपने प्रियजनो से मिलने के लिए, व्याकुल हों। धीरे-धीरे भीड़ बाहर की ओर सरकने लगी थी। खोमचेवाले, जो बेहद वेसपी आवाज मे चिल्ला रहे थे, अब चुप हो गये थे। वैसे भी इस ट्रेन पर उनका सामान बिकनेवाला नही था, क्योंकि यह ट्रेन का अन्तिम स्टेशन था। यहां आकर ट्रेन पूरी खाली हो जाती थी। भीड़ मे पड़ी-सड़ी वह पहले जैसे खुद भीड़ बन गयी थी। पर अब दूर से ही उसे देखा जा सकता था। हल्के वादामी रंग की उसकी साडी और कॉफी रंग के बाहर के फूल । उसके गोरे परों में फंसी काली चप्पल भी दूर से दिख रही थी। इधर-उधर उड़ते छोटे-छोटे बाल चोरी से स्वतन्त्र होकर उड़ रहे पे और उसके परेशान चेहरे को अधिक स्पष्ट कर रहे थे। उसने देचैनी मे अपने शरीर का भार दायें पर से बायें पैर पर डाला और सतकं खड़ी हो 1 । गयी।
गये। तभी उसने देखा-कुछ लड़के एक-सी ड्रेस पहने, पीठ पर अपना सफरोवैग लिये, नीचे उतरे। नाराम और वेफिक्री से उतरता, सीटी बजाता, वह दल उसके निकट लाकर हर गया। चमड़े की दीवारों में वरसों से उन्न-कैद की सजा काटता दिल वाहर बाने को उछला' "एक्सक्यूज मी, आप ही माला भारद्वाज हैं ?" "हाँ बेटा, मैं ही माला भारद्वाज हूँ," रूपेश के बोलने के ढंग से उसे धमका-सा लगा, पर तभी ममता के उफान ने इस अपमान को ढक लिया, "तुम "तुम रूपेश हो न?" उसके ममतासे भरेहाथ रूपेश को गले लगाने को उतावले ने उसकी मोर बढ़ "जी, मैं रूपेश हूँ," पहाड़ की तरह ठोस और जवान शरीर उसके पैर नीचे झुक गया। जवान वेटे की मां होने का अभिमान उसके चेहरे पर बरसात की सहसा खिली धूप की तरह फैल गया। ममता से तरसी आँखें आशीप देने, वाँध तोड़कर वहने, पर उतावली हो उठी। "झाप रितेश भारद्वाज हैं ?" रूपेश, रितेश की ओर बढ़कर हाथ मिलाते हुए बोला। "तुन सही हो, माय यंग वॉय,” रितेना ने आगे बढ़कर उसे सीने से लगालिया। रितेश बड़ी प्रसन्नता ने रूपेश के मित्रों से हाथ मिला रहे थे। स्पेश लौर उसके साथियों को रिसीव करने वहाँ कई लोग याये थे। स्टेशन पर ही काफी स्वागत किया गया। कॉलेज की बहुत-सी लड़कियां भी अपने चहेते खिलाड़ियों से मिलने फूलों के गुलदस्ते लेकर आयी थीं। चारों तरफ से उत्तेजक भीड़ ने रूपेश और उसके साथियों को घेर लिया था। उन स्वागत की भीड़ में दोनों पीछे छूटे जा रहे थे। स्टेशन के बाहर उनी कार के पास एक मिनी बस खड़ी थी, जिसमें रूपेश और उसके साथियों का सामान रखा गया। सब लोग मिनी बस में बैठने लगे, तव रूपेश तेजी से उनकी ओर बढ़ता माया, "आप लोग कल मैच देखने आयेंगे न ! मैं पास भेज दूंगा।" कहता हुआ रूपेश तेजी से अपने साथियों के वीच गुम हो गया। मिनी वस धूल उड़ाती चली गयी, तो उसे होश आया। स्टेशन पर अभी 16/मन्तिम चढ़ाई
भी हार और गुलदस्तों के झड़े हुए फूल विखरे पड़े थे।
वह उदास, ठगी-सी पड़ी थी कि रितेश ने उसे कार में बैठने को कहा।
वह चौकी।
कार मूनी, सपाट सड़क पर दौड़ रही थी, वह खिड़की पर हाथ रखे
पोछे भागते दृश्य को निहार रही थी।
"तुम पूछोगे नही, कार कितनी स्पीड से चलानी है ?" उसने मुडकर
रितेश को डबडबाई आंखों से देखा और मुसकरा दी।
योध्या से वापसी सान के लिए हाथ में कपड़े लिये वाथरूम की ओर वह जा रही थी कि चानक ऊपर की सीढ़ियों पर ठिठक गयी । सामने भीड़ लगी थी। हॉस्टल गे कुछ लड़कियां एक घोंसले को वाहर फेंकने में लगी थीं। घोंसला काफी बड़ा-सा था, जिसमें नन्हे-नन्हे कई अण्डे रखे थे, जो घोंसले के नीचे गिर जाने के कारण फूट गये थे। लड़कियों के लिए अच्छा-खासा मनोरंजन हो गया था। एक परेशान चिड़िया बड़ी ही वेचैनी से दीवार पर भटकती उड़ रही थी। कभी एक दरवाजे पर बैठ जाती, कभी वह खिड़की पर बैठ जाती, कभी यूं ही दीवारों के चक्कर लगाती, फिर बैठकर गिरे हुए घोंसले, फूटे हुए अण्डों को निहारने लगती। घोंसला शायद तसवीर के पीछे था जो थोड़ी-सी असावधानी के कारण नीचे गिर गया था। सीढ़ियों के हत्थे को पकड़े उसका मन इन्हीं फूटे अण्डों की तरह तड़क गया था। हॉस्टल का नौकर आया, वह घोंसले को बेदर्दी से उठाकर वाहर कचरे में फेंक आया। लड़कियां हंसती-खिलखिलाती अपने-अपने कमरे में चली गयीं। चिड़िया अव भी व्याकुलता से तड़पकर अपने घोंसले के लिए, अण्डों के लिए विलाप कर चीख रही थी। वह पोर्च में आ गयी। शाम की ठण्डी वयार वह रही थी। दिल्ली की - 18 / अन्तिम चढ़ाई इस भीड़ के सलाव में, चमक-दमक में उसे बस शाम की यह ठण्डी वयार ही भली लगती थी। इस अजनबियों के शहर में, अजनबी लोगों की भीड़ में, जब से वह आपी थी, उसने अपनी पहचान भी खो दी थी। वह कौन है ? कहाँ से आयी है ? सारे प्रश्न धुंधले हो गये थे, पर अचानक इस बेघर हुई चिड़िया ने अपने पंजो से उसके जख्मो को और और कुरेद दिया था ! मोहल्ले के सूनेपन में रिक्शे के धुंघरुओ के बोल दूर-दूर तक गूंज रहे थे। लम्बे अरसे के बाद उसी पहचाने मोहल्ले मे अपने को पा उसे विचित्र लग रहा था। उसने मन-ही-मन सोचा--अच्छा हुआ रात का अंधेरा था, वरना अभी सारा मौहल्ला इकट्ठा हो जाता। सोचते ही घबराहट मे उसके माथे पर पसीना झलक आया। उसने दो-तीन मरतबा मुड-मुड़कर जाने-पहचाने पड़ोसियों के दरवाजो को देखा। इस आशका से कि कही वे खुले न हो! बावूजी ने आगे बढकर घण्टी बजायी। जानी-पहचानी घण्टी की आवाज कमरे में टनटना उठी। किसी के उठने, फिर चप्पल घसीटकर इधर आने की आहट मिली। झटके से दरवाजा खुला और सामने राजेन्द्र खडे राजेन्द्र अचकचाकर एक तरफ हो गये। वह अपनी अटैची उठाकर तेजी से अन्दर हो गयी। उसने एक बार भी आँख उठाकर राजेन्द्र को नहीं देखा। उसने कमरे में अटैची रख दी और घूम-घूमकर सारे घर को देखने लगी। सारा घर वेतरतीव-सा विखरा, धूल में सना पड़ा था। दीवार पर अपनी तसवीर उलटी टॅगी देख उसका मन दुखी हो गया। अपनी उलटी तसवीर देस उसे धक्का-मा लगा। तो राजेन्द्र ने उसे मरा हुआ समझ लिया था! उसने झट स्टूल पर चढकर तसवीर सीधी की और अपने आंचल से घूल साफ कर दी। बाहर बरामदे में राजेन्द्र बहुत ही सन्तुलित शब्दों में बाबूजी से बात कर रहा था। पुरानी बातों की जरा भी कड़वाहट नही थी शब्दो मे । मां ने टिफिन में खाने का काफी सामान रख दिया था। रास्ते में भूख ही नहीं लगी थी, इसलिए सारा खाना वैसा ही रखा था। उसे तुरन्त कुछ नहीं बनाना पड़ा, उसने उसी खाने को गरम कर टेवल पर लगा दिया और वावूजी को खवर दे दी। वावूजी मुंह-हाथ धोकर राजेन्द्र के साथ खाने बैठ गये। "तुम भी खा लो, नीरा।" वाबूजी ने दो-तीन बार कहा, पर उसने वात को टाल दिया। बाबूजी और राजेन्द्र खाकर उठ गये तो उसने टिफिन बन्द कर रख दिया। उसे भूख थी नहीं। रान काफी हो गयी थी। बाबूजी ड्राइंगरूमवाले तख्त पर ही लेट गये। वह अपने कमरे में चली गयी। राजेन्द्र ऊपर अपने कमरे में चले गये। सुबह उठकर उसने बाहर का दरवाजा खोला और खिड़कियों के परदे खींच दिये। ढेर सारा उजाला कमरे में विखर गया। "नीरा!" वह पलटी ही थी कि बाबूजी ने आवाज दी। शायद बाबूजी काफी पहले से जाग गये थे। "जी," वह उनके पास जाकर बैठ गयी। "वेटा, रात तुम लोगों में कोई बात नहीं हुई?" बावूजी ने उसके चेहरे को निहारते हुए पूछा। उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने कोई उत्तर नहीं दिया और सर झुकाये पैर के नाखूनों को देखती रही। "आदमी क्या पढ़-लिखकर अपने-अपने दायरे में इतना बँध जाता है कि दायरे को तोड़ नहीं पाता? हम ही लोग ठीक हैं, कैसा भी वातावरण हो, पत्नी से बोल लेते हैं।" बाबूजी की बातों से उसे बड़ी परेशानी-सी हुई । तभी परदा हटाकर राजेन्द्र आ गये। बाबूजी और वह दोनों सकपका-से गये, कहीं राजेन्द्र ने बातें सुन तो नहीं ली ? राजेन्द्र ने भी दोनों को शक से देखा, जैसे कह रहे हों, 'जानता हूँ, वाप-वेटी में क्या बातें हो रही थीं।' राजेन्द्र सोफे पर बैठ गये, वह उठकर पीछे बरामदे में आ गयी। - - - 20/अन्तिम चढाई किचन में पारो आ गयी थी और अपना काम कर रही थी। पारो ने मुस्करा- कर उसे नमस्ते की। उत्तर में वह हम दो। पारो ने उसे ऊपर में नीचे तक देखा और वोली, "अब मत जाना आप, विना औरत के घर मसान लगता उसने उत्तरनहीं दिया। वस, मुस्कराकर रह गयो । नांगन में लगा मैले का पेड़, जो उमने लगाया था, अब काफी बड़ा हो गया था। उने देष उसने अन्दाजा लगाया वाकई वह काफी दिन वाहर रही। "चाय में बनाऊँ या आप बनायेंगी?" पारो उसके निकट आती बोली, क्योकि उमै पता था उसे किसी के हाथ की चाय पसन्द नहीं थी। "क्यों, इतने दिन तू बनाती नहीं थी, मुझे देखते ही जी चुरा रही है। मुझे भी तो बनाकर पिला। देखू, कैसी वनाती थी।" "नहीं, आप ही बनाइये,मेरे हाथ की चाय आप पसन्द नहीं करेंगी।" पारो मेंपती हुई बोली। "अच्छा," कहती वह किचन मे गयी। किचन में जाते ही उसे विचित्र- सा लगा। चाय-नाश्ता बनाकर उसने ट्रे में लगा दिया और पारो को पकड़ा दिया। "आपकी चाय ?"ट्रे उठाकर भीतर जाते पारो आश्चर्य से बोली। "यही ले लूंगी, पूले जा।" पारो के भीतर जाते ही बाबूजी को यावाज मायी, "नीरा, चाय लो याकर।" "याबूजी, अभी प्रश नही किया है।" वह झूठ बोल गयी। वह अपनीचाय लेकर बैठी ही थी कि ऊपरवालो की खिडकी खुली और भाभीजी ने नीचे झांका। "नीरा आ गयी।" "नमस्ते भाभीजी, आप अच्छी हैं न?" उसने अपने चेहरे की घबराहट फो छुपाते हुए पूछा। "हम तो ठीक ही हैं, अपनी कहो, अब मत जाना, हमसे झूठ कहकर गयी कि दो दिन में लौट आऊंगी और इतने दिन लगा दिये। मुझे तो रात को ही आवाज मिल गयी थी। इच्छा तो रात ही हो रही थी तुमसे वात - करने की, पर तुम्हारे भाई साहब ने मना कर दिया । बोले, 'सुवह मिल लेना।' उसने कोई उत्तर नहीं दिया, वस मुस्कराकर रह गयी। "साड़ी तो वढ़िया पहन रखी है, माँ ने दी होगी।" भाभीजी ने आँख घुमाकर ऊपर से नीचे तक उसका मुआयना किया। घबराहट से उसे पसीना आने लगा, तभी बाबूजी ने उसे आवाज दी और उसने चैन की सांस खींची और भीतर चली गयी। "तुमने चाय ली?" वावूजी ने पूछा। "अभी ले लूंगी।" "अभी कब?" वावूजी ने पारो को आवाज देकर उसकी चाय वहीं मंगवा ली। वह चाय पीते सामने दीवार को देखती रही। वाहर कोई माया था शायद । राजेन्द्र उठकर वाहर चले गये। "सोचता हूँ शाम की गाड़ी से चला जाऊं।" वाबूजी ने पैर के एक्जीमें के घाव पर मलहम लगाते हुए कहा। बाबूजी की बात से उसका चेहरा सफेद पड़ गया। उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि क्या बोले । "इतनी जल्दी?" "हाँ, उधर भी तो देखना है न, तुम्हें पहुंचा दिया, मेरी ड्यूटी "नहीं, अभी आप रहिए आठ-दस दिन । आपने तो कहा था कि आप रहेंगे थोड़े दिन मेरे साथ, फिर यहां आकर इतनी जल्दी जाने का प्रस्ताव ।" "अब जाऊँगा बेटा, तुम दोनों समझदार हो, पढ़े-लिखे हो, अपने हालात खुद ठीक करो। मैंने राजेन्द्र को समझा दिया है, वह पुरानी बातों की चर्चा नहीं करेगा और तुम्हें भी पति जो कहे, मान लेना चाहिए। औरत पति के घर ही अच्छी लगती है। अपने स्वाभिमान को लेकर कव तक जिन्दा रहोगी? स्वाभिमान को कुचल दो, यह डंक जब तक रहेगा, तुम्हें इसता रहेगा। पत्नी का दरजा छोटा होता है । पति का वड़ा।" बाबूजी वोले जा रहे थे और वह आश्चर्य में भरी उनके चेहरे को देख रही थी। बाबूजी का - 22 / अन्तिम चढ़ाई । 1 बात करने का ढंग कितना बदल गया है ? क्या यह वही बाबूजी हैं, जो सबके मामने जोर से बोले थे, 'वह मेरी लड़की है, वह पति के पैर की जूती बनकर नहीं रह सकती। नीरा को रखना है तो राजेन्द्र को उसे बरावरी का दरजा देना होगा। और आज अचानक वाबूजी का बदला हुआ नहजा सुनकर वह दंग थी। तो धावूजी ने भी हालात के आगे घुटने टेक दिये? लड़की का बोझ उन्हें भी महसूस होने लगा? वह चुप रही और चाय पीती रही। रोप से उसका मन भर गया था, पर वह कुछ नहीं बोली। "तो मैं शाम को चला जाऊँ ?" बाबूजी ने आहिस्ता-से फिर पूछा। "हो, चले जाइये।" उसने एकदम सपाट शब्दों में कहा और याली मग को वापस ट्रे में रख दिया। वह समझ गयी थी-वाबूजी का सहारा वह कब तक लेती रहेगी? "नही, तू कहेगी तो रुक जाऊंगा।" बाबूजी उसके बोलने के ढंग पर चौंक गये और सकपकाये-से उसे निहारते रहे, फिर थोड़ा नरम पड़कर प्यार से बोले, "ती रुक जाऊं?" "रुककर क्या करेंगे। नहीं, अब मैं खुद देख लूंगी, आप जाइये, आखिर उधर भी तो देखना है न।" उसने रोप मे भरकर बाबूजी के पाब्दों को हो दोहरा दिया। "ठीक है, जैसा तू कहै ।" बाबूजी सहमे-से ऐसे बोले जैसे सुद अपने जाल में फंस गये हों। शाम की गाड़ी से बाबूजी लौट रहे थे। रिक्शो पर सामान रसा गया। सब पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गये उत्सुकतासे । वह भी वस-स्टैण्ड तक जाने को तैयार हो गयी थी। "आप भी जा रही हैं ?" जब वह वाबूजी के साथ रिक्शे पर बैठी, तो पड़ोस की भाभीजी बोली। "नहीं, बस-स्टैण्ड तक छोड़ने जा रही हूँ।" उसने खोजे शन्दों में कहा। वह जब से यहाँ आयी थी, सब उसे विचित्र ढंग से देयते थे, जसे किसी होनेवाली घटना की वाट जोह रहे हों। सबको शायद इन्तजार थाः कि उसके आते ही घर में झगड़ा होगा, चटपटे दृश्य देखने को मिलेंगे। इसके विपरीत वातावरण देखकर सव क्षण-क्षण प्रतीक्षा में थे कि अब कुछ. होगा, अव कुछ होगा! पर सपाट चेहरे देखकर सब आश्चर्य में थे। बस छूटने में समय था। बाबूजी उन दोनों के सामने खड़े थे। वह दूर होटल में जलते चूल्हे को देख रही थी। "देखो, दोनों पुरानी बातों को भूलकर फिर से नया जीवन शुरू करो।" बाबूजी ने उपदेश देने के लहजे में कहा । "मैं तो अपनी जगह सही हूँ, नीरा को ही समझा दीजिए। पति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह उसे आना चाहिए न।" राजेन्द्र ने कहा तो नीरा ने चमककर राजेन्द्र को देखा। वह तो आयी ही थी सारी स्थितियों से समझौता करने, पर इस तरह बोल-बोलकर तो उसे उकसाया जा रहा था। लड़ने के लिए तैयार किया जा रहा था। राजेन्द्र की आंखों में अभी भी उसके लिए परायापन था, यह उसकी आँखों और शब्दों से स्पष्ट था। बाबूजी के बस में बैठते ही बस छुट गयी। बस के पीछे उड़ती धूल को क्षणभर को ताकती वह अकेली रह गयी। दोनों रिक्शा-स्टैण्ड की ओर बढ़े। दोनों ने अलग-अलग रिक्शा किया और घर लौट आये। घर पर जव भाभीजी ने झाँककर दोनों को रिक्शे के पैसे देते देखा, तव उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। दोनों अलग रिक्शे पर आये, अब इस पर टीका-टिप्पणी होगी। 1 उसने महसूस किया, जीवन अब पहले से अधिक यातनापूर्ण हो गया था। पहले तो वह लोग लड़कर, एक-दूसरे पर व्यंग्य कर ही मन का रोप निकाल लेते थे, पर अब वह दोनों एक-दूसरे को कुछ नहीं कहते थे। इस तरह वातावरण ज्यादा गम्भीर लगने लगा था। परायापन अधिक नंगा होकर दिखने लगा था। क्या कभी-कभी ऐसा नहीं होता हम सोचते हैं, हम जो जगह छोड़ 24 / अन्तिम चढ़ाई आये हैं, वह सुरक्षित होगी। लौटने पर फिर हमें अपना सुरक्षित स्थान मिल जायेगा। इमो भ्रम मे आदमी जानबूझकर मौत के अंधेरे की ओर विचता चला जाता है। हठ की छाया को पामे बैठने को जी चाहता है, सौपी हुई मान-मर्यादा क्या फिर मिल सकती है? वह अपनी आलमारी मे सूटकेस से कपड़े निकाल रही थी। उनके पुराने कपडे मुड़े-तुडे से आलमारी में पडे थे। उसने देखा--आलमारी में उसकी नीले रंग की साड़ी गायव है। उसने महमूस कर लिया, साडी पारो ने गायब की होगी । बस, यही सोचकर कि अब तो वह लौटेगी नहीं। वह आलमारी में कपड़े तह कर रख रही थी, इस बीच राजेन्द्र दो बार कमरे में झाक गये। उसे घरेलू काम में व्यस्त देख काफी आश्वस्त से बाहर चले गये। धीरे-धीरे उसने घर का कोना-कोना देसना, झटकना-पोछना गुरू पर दिया। वह पहले की तरह ही अपने काम मे व्यस्त हो गयी थी। मनीप्लाण्ट को वेल, जो पूरी तरह सूखने चली थी, उसे भी उसने ठीक किया। पके-सहे पत्तों को बाहर फेंका और बैल को काटकर नये सिरे से रोप दिया बोतल । . बाथरूम से वह नहाकर लौटो और गीले बालों को तौलिये से सटकनी बाहर आयो तो देसा--पारो कपरवालों के यहां से तेजी से उतर रही थी, यकायक उसे देख वह हड़बडाकर चौक गयी। "क्या बात है? ऊपर क्यों गयी थी?" "ऊपरवाली माताजी ने बुलाया था।" वह सहमी-सी बोली। "क्यों ?" उसने आश्चर्य से पूछा। "जी, वह पूछ रही थी कि तेरी बाई साहब से बोलती हैं या नहीं और साहय बाई से बोलते हैं या नहीं।" "अच्छा।" उसका चेहरा सफेद पडने लगा। गले में कुछ मता-मा लगा। ऐसा भी प्रश्न लोग कर सकते हैं, यह उसके लिए नाश्चर्य की बात थी। फिर भी उसने अपने को संयत किया और बोली, "फिर तूने नया रहा।" "मैंने तो साफ गप्प लगा दी, "मियां-बीवी हैं, मोलेंगे नहीं?".पारो ने अपने शब्दों में ढेर सारा एहसान, उदारता लादते हुए आगे कहा, "मैंने तो कहा, 'हमारी वाई साहब से नहीं बोलेंगी तो क्या आपके साहव से बोलेंगी?" अन्तवाली बात झूठ थी। इतनी हिम्मत इसकी थोड़े हो सकती है। फिर भी वह चुप रही। चुप रह जाना ही बेहतर था। वह अपने कमरे में लौटने लगी तो नौकरानी मागे बोली, "वह यह भी बोल रही थी, 'तेरी वाई तो जवान है, दूसरा आदमी बना लेती। पर साहब वेचारे क्या करते ?" "वस, वहुत हुआ पारो, अपना काम कर।" उसने उसकी वेतुकी बातों से ऊबकर कहा और भीतर चली गयी। रोप से उसकी आँखें जलने लगीं। लोग कितने विचित्र हैं। नहीं आयी थी तो चिन्ता थी, आ गयी तो चिन्ता है। लोगों को कहीं भी चैन नहीं। इन दिनों उसने अजीव वदलाव का एहसास अपने अन्दर महसूस किया है। पहले मन क्रोध या उदासी में बोलने को होता था, पर अब चुप रहने को मन करता है। अजव-सी निष्क्रियता घेरे रहती है। लगता है उसकी जगह कोई पत्यर चल-फिर रहा है। इस पर कितनी चोटें.. कितनी ही आवाज दी जाये यह वही पत्थर का पत्थर ! इन्सान पत्थर सिर्फ बाहर से नहीं होता, भीतर से भी होता है."अन्दर का वजन और-और दबाता है। राजेन्द्र के व्यवहार में उसने एक विचित्र-सा परायापन देखा । अब वह हर बात में उसकी जांच-पड़ताल करता। बार-बार आकर देख जाता कि वह क्या कर रही है । याने उसकी सव गतिविधियों का वह बारीकी से निरीक्षण करता । वह घर पर आये किसी परिचित से बात करती तो वह उसे विचित्र ढंग से तकता, जिससे अन्दर-ही-अन्दर उसे घबराहट होने लगती। राजेन्द्र के पहले और बाद के नेचर में साफ अन्तर आ गया था। पहले वह मुंह से बोलकर गुस्सा निकाल लेता था, पर अब वह बोलता नहीं, बस पारखी, ताड़ती, तौलती नजर से उसका पीछा करता था, जिसके कारण वह अस्त-व्यस्त हो उठती थी। मन दुख से भारी हो उठता था। गुस्से से शब्द मुंह तक आते थे, पर वह कह नहीं पाती थी। दोनों को लगने लगा था कि दोनों एक-दूसरे के लिए अजनबी, जनजान व्यक्ति हैं, जिनका एक-दूसरे पर बोलने का हक नहीं बनता। 26/ अन्तिम चढ़ाई ..
- पढता, डायरियां लिखने की उसकी वचपन की आदत थी। वचपन से ही वाबूजी को लिखते देख उसने भी उनको यह आदत चुपचाप अपना ली थी। गुरू में यह बडो की नकल की तरह उसने अपनाया था, पर बाद में धीरे-धीरे यह उसकी आदत में शुमार हो गया था। उसकी इस आदत को राजेन्द्र जानते.' थे, इसीलिए जब वह रसोई में या और किसी काम में व्यस्त होती, तो वह देसती उसकी डायरियो को पहा गया है, जांच-पड़ताल की गयी है। राजेन्द्र के दिमाग मे यह शक किसी ने बैठा दिया था कि जब वह मायके चली गयी थी, उसके पीछे कोई था जिससे वह बाद में शादी करती। इसी शक से भरकर उसकी सब गतिविधियो पर नजर रखी जा रही थी। यहाँ तक कि जो उसके दोस्तो की चिट्टियां आती थीं, उन्हें भी राजेन्द्र चुप से जैसे उन पत्रो मे कोई सुराग ढूंढ रहा हो, किसी सजाने की खोज के लिए। राजेन्द्र की इन हरकतों से उसे हंसी आती थी। आदमी कभी-कभी अपने सम्बन्धों को बचाने के लिए, बनाये रखने के लिए. ऐसी हरकतें, ऐसी पहरेदारी करता है कि सम्बन्ध और टूटने लगते हैं। वह किसी से बात करती, मिलती, तो वह बहुत ध्यान उस पर नजर रखता। राजेन्द्र, जो पहले निरन्तर अपने काम में व्यस्त रहता था, अब निरन्तर उसकी चौकी. दारी में अपना समय नष्ट करने लगा था, वह घर के किसी काम में व्यस्त रहती तो बार-बार झांक जाता कि वह क्या कर रही है। वह किसी दोस्त को पत्र तिखती तो वह वेचनी से भरा कई-कई चक्कर लगाता, यदि वह अधूरा पत्र छोड़ किसी काम से बाहर चली जाती तो वह तुरन्त पढ़ने लगता। अब वह भी राजेन्द्र की इस हरकत से परिचित हो गयी थी, इसलिए वह भी पत्र लिखते-लिखते जानबूझकर उठकर चली जाती और काफी देर मे लोटती ताकि वह आराम से पत्र पढ ले। लौटकर देखती, राजेन्द्र का परे. शान चेहरा निश्चिन्त हो गया है और वह आराम से अपने कमरे मे बैठा पेपर पढ़ रहा है । पर तब वह खुद वेचन हो उठती, उसका मन फिर पत्र लिखने में या डायरी लिखने में न लगता। वह दोनों हाथों को टेबल पर रसे, सर को उस पर टेके बैठी रहती। न जाने कब तक वह ऐसे ही बैठी रहती. कभी-कभी तो घण्टों गुजर जाते, तब वह चौककर उठती और - थकी, कटी डाल-सी अपने पलंग पर ढह जाती। राजेन्द्र को पता चल गया था कि मायके में जब वह थी तो उन लोगों ने उसे कैसा तंग किया था, कितना अपमान किया था। उसे रहने नहीं दिया । अन्त में तंग आकर राजेन्द्र के घर लौटना उसने स्वीकार लिया था। अब तक राजेन्द्र को यह भय था कि वह मायके जा सकती है, पर अब उसके मन से यह भय भी मिट गया था। अब वह पूरी तरह समझ गया था कि इस घर में रहने के अलावा उसके पास दूसरा दरवाजा नहीं, जो उसे दो इंच जगह भी रहने के लिए दे सके। इसलिए अब वह दिलेर हो उठा था। अब उसे परेशान करने, दुख देने, अपमान करने में मजा आने लगा था। राजेन्द्र की आँखों में उसके लिए इतनी हिकारत, घृणा-सी भर गयी थी कि वह परेशान हो उठती थी। राजेन्द्र की दिन-प्रति दिन जहर उगलती नजरें, उसके व्यक्तित्व को और खोखला कर देती थीं। घर में पड़े-पड़े वह घुट-सी गयी थी। शाम को उसने सोचा-थोड़ा धूम आये और जरूरी सामान भी ले आये । जव से वह पिता के घर से आयी, बाजार भी नहीं जा पायी है। वह टहलते हुए बाजार की तरफ चली गयी। दुकान पर कुछ परिचित महिलाएँ मिल गयीं और वह उनसे बात करने लगी । सामान खरीदने में समय हो गया। घर लौटी तो अंधेरा हो गया था। वह समझ गयी-राजेन्द्र लौट आया होगा। घर पहुंचते ही उसने देखा, राजेन्द्र गुस्से से भरा बैठा था। "कहाँ चली गयी थीं तुम ?" "सामान लेना था, दुकान में समय लग गया।" उसने धीरे-से सफाई दी। "कौन-सी दुकान गयी थीं, जहाँ इतना समय लग गया ?" "तो अब मुझे यह भी बताना होगा ?" राजेन्द्र का बोलने का ढंग उसे अच्छा नहीं लगा। "हाँ।" "और यदि मैं न बताऊँ तो?" उसने दिलेरी से तनकर कहा । राजेन्द्र गुस्से से भन्नाते हुए अपने कमरे में लौट गये। वह चुपचाप अपने कमरे में जाकर पलंग पर लेट गयी, अपमान से. 28/ अन्तिम चढ़ाई उममा मह साल हो गया। तो राजेन्द्र को सम है कि मग मी महपरमही और गपी पी! इस नारादायक पातावरण में यह भागे और मयत जी पायेगी ? जिन्दगी में यिप्यारा ही पुष जमा पूंजी होती है और जब पही नहीं, मो कय तक लिया जा सकता है ? अब ऐगे वातावरण मोराहा बनाना फटिन था। दोपहर को यह पारफनी मे गरी थी कि उसने देखा-पी रहवासी पापाबाई जो अपसास भदाई का काम करती थी, उरामी यही गीले रंग की साड़ी पहनकर जा रही है। आरपपं गे उसका मुंह गुला-का-गुला रह गया। उससे रहा नही गया, उसने आवाज देफर पम्पाबाई मोरोक लिया। पापा. याई मिसककर उराफे सामने आगही हुई। "यह साड़ी तुम्हें कही मिली? यह तो मेरी है।" "आपयी है ? मगर मुझे क्या मासूम ? आपपी मौकरानी इंगे अंग गपी है।" पम्गायाई ने पयराहट में अपना जुर्म स्थीकार लिया "at, तो तुग पोरी का माल सरीदनी हो। तुम्हारी तो पुलिस में रिपोर्ट होनी चाहिए।" उसे गुस्सा आ गया। "ह, पारो पुलिस में रिपोर्ट।" चम्पापाई हाथ नपात हुए पोली, "पुग्निग मेरा यया परेगी? यही मापी पुलिग का हरदियाने पाती। ऐगही अपने घर के सामान थी पिता करयाली पीसो घर छोड़कर गपी पों धी! बरे. राय कारगारीफ दिगती, भीतर पोल है । और देगो, रास्ता रोकार कमा टोका-टोपी कर रही है।" "देगी, महममानकर योलो, यहग मुंह पत्री ना रही हो!" "हाँ-हा, क्या कर लोगी? यही गाड़ीवाली आ गयी।" पम्पावाभोर. जोर बोलने लगी। आरापाग पो दरबारात लगे । उगमा गुरुगाया जा रहा था, पर वह अपने गुस्से को पी गयी। नीप यह फोन लगे। उगे तो अय अपने आप पर गुस्गा भा रहा था, यह क्या ऐगी औरतकमहमगी। यह भीतर या गया। उगने दरवाजा बन्द कर लिया था, पर पाबाई गयको गुना-गुनाफर बक रही थी। उगने अपने कानों पर हाय पहिये । गामा आगों के राने पिपलकर रहने लगा। पपायाईने बीप यागार में ठग मंगाकर .. ।'
। यह पीड़ा उसे चीर रही थी। पीड़ा से उसकी छाती दुखने लगी। वह दरवाजे- खिड़कियां बन्द कर सारी दोपहर मुरदे की तरह पड़ी रही। जिन्दगी वास्तव में कितनी विचित्र है, पता ही नहीं चलता। चलते- चलते जिन्दगी किसी ओने-कोने में कैसी-कैसी गलियों से मुड़ जाती है। कभी लगता है सारे अधिकार हमारे हैं, और कभी अनायास यह एहसास होता है, नहीं हम एक झूठे भ्रम को पाले हुए थे। हमें सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया है । तिनके पर भी हमारा हक नहीं बनता। अचानक लगता है कि समय के दावेदार ने हमें दिवालिया घोपित कर दिया है। और मन के कोने-कोने से निकलकर एकाएक सुख की बोली बोल दी है। सबकुछ कितना अनिश्चित-सा। उसने अपने-आपको सहज बनाने में कोई कसर नहीं रखी। पुरानी बातों को दफन करना ही ठीक समझा। उन लड़ाइयों को लेकर जिन्दा रहना भी तो मुश्किल हो जाता न। अब राजेन्द्र को चाय देने से लेकर उसका विस्तर लगाने का काम भी वह खुद करने लगी थी। राजेन्द्र भी जैसे समझ गया था कि स्थिति सामान्य है, सारा तूफान उतर चुका है शाम को वह लाल रंग की जोधपुरी साड़ी में वाहर लॉन में आ बैठी। घास पर नन्हा खरगोश दौड़ रहा था। वह उसे दिन-भर पिंजड़े में बन्द रखती थी और शाम को थोड़ी देर के लिए खोलती थी, वरना वह कहीं भी जा छुपता था और उसे वापस बन्द करने में दिक्कत होती। राजेन्द्र भी अपनी चाय लेकर स्टडी से इधर ही आ गये। उसने सर उठाकर राजेन्द्र को देखा । फिर वह खरगोश को देखने लगी। खरगोश नर्म- उण्डी दूव में अपना सर छुपाये खेल रहा था, लोट रहा था। "नीरा, पिक्चर अच्छी लगी है, चलोगी?" राजेन्द्र ने पूछा। "कौन-सी है ?" "घर।" "यह तो मेरी देखी हुई है । वावूजी के घर थी तव देख आयी थी।" "और क्या-क्या करती थीं तुम वहाँ ?" राजेन्द्र ने तेज जहर-बुझे लहजे में अचानक पूछा। "क्या मतलव ?" राजेन्द्र का इस तरह वोलना उसे खल गया, उसकी 30/ मन्तिम चढ़ाई भवे तन गयी। "मतलब क्या ! मतलब साफ है कि इतने दिन छुम यह रही, रिगी मे दोस्ती तो हुई होगी। सुना है वहाँ माफी जोर-शोर से तुम्हारी पायी। बातें चल रही थी। तुम्हारे इतने आशिक होंगे, यह तो हमें भी पा गरी था।" । "देखो, जो कहना हो ढंग से कहो, इस सरह रास्ते मत यनो।" उगा चेहरा अपमान से लाल हो उठा, "शादी की पास पल रही थी, 2 गय तुम्हारे मन का शक है।" "वह तो मेरा कानूनी डण्डा मजा, तो तुम्हारा गुमट येयफर पाप एमः ही नोटिस में तुम्हें पहुंचा गया, वरना तुम तो शादी कर चुकी होगी । गुना है बड़े कद्रदान तुम्हारे पैदा हो गये थे यहाँ।" "देखो, तमीज से बोलो।" यह तमककर खड़ी हो गयी । "गरे पापमो बुरा-भला कहा तो ठीक नहीं होगा। तुम्हारे मन में इतना दर गारा मेरे लिए एक है, यह आज पता चला। मुझे पहले ही पता था, महो लौटने पर मुझे क्षण-क्षण अपमान मिलेगा। पर यापूजी के. मा के आगे महार गयी। किसी भी युग में झगड़े के बाद पति के घर लौटने पर नारी को सम्मान नहीं मिला। इससे पहले कि अधे होकर तुम मुझे निकालो, गुरजा गाई, अब कभी न लौटने के लिए।" राजेन्द्र सहमे-मे उसे देखने लगे। यह तेज-तेग यागे यह गयी। "नीरा, सुनो तो..." राजेन्द्र ने उसे थायाज दी, पर या भीग गरी सड़क पर उतर चुकी थी। हॉस्टल की सारी लाइट जल गयी थी। वतहागा मयमों में जगमगाना दिल्ली शहर रात के अंधेरे में बेहद हमीन हो गया था। उसने पांचं पर पादर कचरे के टीन को देखना चाहा, जहां चिड़िया का पांगमा फेंका गया था, पर वहाँ ढेर सारा अंधेग होने के कारण उम मुछ नजर नहीं थापा । पिश्यिा अभी भी अंधेरे में छटपटा रही थी। जहां इतनी रोगनी थी, परागीभी जगह थी, जिमे बंधेरा निगल गया था! ।
बूंद का हक वह वेहद उत्सुक होकर विछी पटरियों को सूनी आँखों से निहार रही थी, जिन पर से होकर ट्रेन जानेवाली थी। धूप का चश्मा उसके चेहरे की उत्सुकता को काफी हद तक ढांक हुआ था। तभी ट्रेन आने का संकेत हुआ और धड़धड़ाती ट्रेन आ पहुंची। वह तुरन्त माँ और वावूजी के पीछे होकर खड़ी हो गयी। प्लेटफार्म पर पीछे खड़ी भीड़ आगे आ गयी थी । कुली, खोमचेवालों की दौड़-धूप, आसपास के शोर से वातावरण में काफी हलचल पैदा हो गयी थी। "वह है रेनू,” मां ने आखिर इतनी भीड़ में भी रेन को देख लिया था। उसने भी अव खिड़की से झाँकती नन्हीं रेनू को देख लिया था। रेनू वही पीले रंग का स्मोकिंग किया हुआ फ्रॉक पहने हुई थी, जो उसने पिछली गर्मियों में बनाया था । रेनू ने भी उन लोगों को देख लिया था । उसके भूरे वाल लम्बे सफर के कारण छितर-से गये थे।सफर से उसका नन्हा-सा भोला चेहरा कुम्हला गया था। उसने पहली नजर में अन्दाजा लगा लिया कि वह काफी दुबली हो गयी है। उसने जैसा सोचा था, वैसा नहीं हुआ। उसने सोचा था, उसे देखते ही रेन चिल्लाकर झपटेगी, 'मम्मी, मम्मी !' पर ऐसा नहीं हुआ और पहली बार विश्वास का टुकड़ा, जो अब तक कहीं साँस की किसी झाड़ी में फंसा रह गया था, वह भी तार-तार होकर . 32/ अन्तिम चढ़ाई तेज तूफान को नजर हो गया। मन किसी खाली वीराने में छूटे घोंसले की तरह होकर रह गया, जिसे कभी रिसी परिद के जोड़े ने आवाद किया था। और फिर जैसे वसा-वसामा घर ज्यों-का-त्यो छोड़कर दूसरे देश को उड़ गये "यटकर रेनू को आवाज दे," मां ने कहा तो उसने आगे बढ़कर सिड़की पर रेनू के हाथ पर अपना हाय रस दिया । बस, उसकी मां नम हो चली यो, बहुत कोशिश के बाद भी उसके मुंह से शाम नहीं निकल पाये । रेन झपी. -सी पीवी हँसी हंस दी और शट दूसरी तरफ देखने लगी। उसने बचानक महमूम किया कि इन छह महीनों में रेन वही हो गयी है "हाँ, उससे भी बड़ी! हिव्वे में काफी भीड थी। भीड़ धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी। रेनू राहुल की उँगली पकडे, अपनी नन्ही गुड़िया को लिये नीचे उतरने लगी, जो राहुल के एक दोस्त ने रेनू के लिए कलकत्ता में भेजी थी। रेनू के ठीक पीछे उसके पापा यानी राहुल थे। बहुत ही औपचारिक ढंग से सबने एक-दूसरे का स्वागत किया। बाबूजी इस वातावरण से अपने को काटे हुए थे और कुली,रिशा आदि की व्यवस्था मे ध्वस्त हो उठे थे। मां ने रेनू को गोद में उठा लिया और एक खिलौनेवाले ठेले की तरफ जान-बूझकर बढ़ गयी। उस भीड़ में एकाएक यह और राहुल अकेले रह गये । फिर भी दोनों में से किसी ने इस अकेलेपन का लाभ नही उठाया, यहाँ तक कि कनखियों से भी एक-दूसरे को नहीं देखा। उसके माथे पर पसीना छलक माया । मां का इस तरह चला जाना, जमे दोनो को खलने लगा हो । उममे महसूस किया, तनाव को वह चादर दोनों के बीच अभी भी है, हट्टी रेनू मां की गोद से उतरकर राहुल को ओर दौड़ पड़ी। रेनू अभी भी सहज नहीं हो पायी थी। और वह दद भी आगे बटर राहुल के सामने रेनू को गोद में लेना नहीं चाहती थी, वह ऐसा कोई काम करना नहीं पाहती थी, जिसमे उसकी मन की कमजोरीझलके । और इन्ही स्थितियों को नकारनेवी गरज में वह स्टेदान भी नहीं जाना चाहती थी, पर मां की जिद के आगे ग ।
चुप हो गयी। माँ ने बार-बार उसे उपदेश देने के-से शब्दों में कहा था,, "जब वह झुक गया पहले तो उसे लेने जाने में क्या आपत्ति है ? औरत को कहीं-न-कहीं से नरम होना ही पड़ता है." "जाओ वेटा, नानी के पास जाओ।" राहुल ने दो-तीन बार रेनू को माँ की तरफ किया, पर वह ज़रा देर माँ के पास टिकती, फिर तुरन्त दौड़- कर राहुल की उँगली पकड़ लेती, जैसे राहुल ही उसके सबकुछ हैं, बाकी लोग सब अनजाने हैं। वह खुद सवसे कटी-कटी पीछे चलने लगी। कोई भी उसे देखता, तो यही सोचता, वह अकेली है। उसका अपना सारा ध्यान रेनू की ओर ही था। रेन भी चोर-आँख से बार-बार मुड़कर उसे देख लेती थी, फिर अपनी ओर उसे ताकता पा तुरन्त सामने मुंह कर लेती। उन नन्हीं आँखों में उसके अपने लिए इतनी दूरियां थीं कि चलते-चलते उसके पैर जमने-से लगे इस वातावरण की सबको कल्पना थी, यानी मिलने पर दोनों तरफ से बातें शुरू होंगी, पर आश्चर्य की बात थी, वातावरण एकदम शान्त था। कोई भी अपनी तरफ से कोई वात छेड़ना नहीं चाहता था। जैसे पुरानी बातों पर मिट्टी डाल दी गयी हो। यह वातावरण उसे अच्छा लगा। उसके अपने मन का वह घुटा-घुटापन काफी हद तक छंट गया था। पीछे आंगन में सब वैठे नाश्ता ले रहे थे। रसोई में उसका अपना काम समाप्त हो गया था, इसलिए वह झट अन्दर कमरे में चली गयी। माँ ने दो- तीन वार उसे आवाज दी कि वह भी साथ बैठकर नाश्ता कर ले, पर उसने सुना नहीं । राहुल ने शायद एक बार उसे देखा था, फिर वह पकौड़े खाने में व्यस्त हो गया। कमर में खुंसा आँचल खोलकर ठीक करती वह बाहर आयी, तो देखा -बरामदे की सीढ़ियों के किनारेवाली नन्हीं दीवार पर रेनू लाल चमकीले सितारोंवाला फ्रॉक पहने, लाल वूट, लाल रिवन लगाये एकदम नन्हीं परी 34 / अन्तिम चढ़ाई । बनी औंधी पड़ी सो रही थी। उसके दोनों पैर दीवार के दोनों तरफ लटक रहे थे। बहुत मासूम, बहुत ही प्यारी लग रही थी। बाहर आते ही उसके पर ठिठक-से गये। ढेर सारा प्यार, ढेर सारी ममता एकाएक उमड़ आयो। उसने झुककर उसे गोद में ले लिया। रेनू जाग गयी और आंख खोलकर उसे देखने लगी। इस बार उसकी आँखों में पहले-सा परायापन नहीं रह गया था। यह उसकी गोद मैं पडी-पड़ी अपनी भोली आँखो से उसे देखती रही,फिर उसकी आंखों से झिझक समाप्त होने लगी थी। "मम्मी, क्या तुम बहुत बुरी हो?" "क्यों ?" उसका दिल धक्-सा रह गया। "दादी, पापा, बुआ मव कहते है, तुम बहुत बुरी हो, इसलिए तुम चली गयी।" रेनू ने अपनी नाक खुजायी, "दादी बोलती है, तुमसे नहीं बोलना चाहिए।" "नहीं, वे लोग झूठ बोलते है ।" उसने फंसे हुए गले से कहा और रेनू को गोद में उठाकर पतंग पर लिटा दिया । वह बाहर आ गयी और बरामदे मे रखी आरामकुसी पर बैठ गयी। आदमी सबको अपनी बात समझा सकता है, पर बच्चों को नहीं न! दिल पर ठहरा भारीपन जैसे और भारी हो उठा था। होंठों पर दर्द के पहरे इतने सख्त लगे कि हंसी और नन्ही. नन्ही सुशियो की घुसपैठ की नाकाम कोशिश कारसिद्ध हो रही पी। नन्हे- भोले बच्चों के मन में इस तरह जहर भरने से फायदा ? पिछली बात मुई की तरह उसकी आँखो मे चुभने लगी। सुबह से बदली छायी थी। ठण्डी हवा के साथ बरसाती यारीक-बारीक छोटें पड़ रहे थे, जिससे वातावरण मै और ठण्डक और गीलापन उतर आया था। खिड़की से सामने घर की खपरैल की छत का कोना दिख रहा था। छत के पीछे बिजली के खम्भे का सिरा था, जिस पर एक वेतबारा कोआ बैठा इधर-उधर देख रहा था, जिसे देखकर ही सोचा जा सकता था कि वह अपने शिकार की तलाश में है।
वह देर से सोफे में धंसी वैठी थी। सामने टेवुल पर रेन कोरे पन्ने पर रंगीन लाइनें खींच रही थी। वह अपने काम में इतनी तल्लीन थी कि उसे कुछ याद नहीं था। वह दो बार उसे पुकार चुकी थी, पर उसने सुना नहीं - 'था। परेनू, जाओ, पापा से खर्च के लिए पैसे मांग लाओ।" उसने थोड़ा जोर से कहा। . । "लिस्ट बना दो ना, मम्मी!" रेनू ने आदत के अनुसार कहा, क्योंकि घर का सामान जब खत्म हो जाता, तब वह या तो कागज पर लिखकर दे देती या फिर कह देती थी। सामान कभी आ जाता, कभी नहीं भी आता। वह राहुल की इस आदत को जानती थी, इसलिए सामान जव दो-तीन दिन के लायक रह जाता, तभी से वह अपनी कोशिश शुरू कर देती, तव कहीं जाकर घर की जरूरत का सामान आ पाता। रुपये तो कभी उसे दिये ही नहीं जाते। पैसों को राहुल अपने ही हाथ में रखते थे। पैसों को लेकर कई बार संझट हो चुका था। कई बार तो इस बात को लेकर उसका अप- मान हो चुका था । आखिर उसने पैसों के लिए कहना ही छोड़ दिया । बस, जो सामान खत्म हो जाता, वह लाने को कह देती। इसी तरह गृहस्थी चल रही थी। कभी पति ने यह नहीं सोचा कि उसकी अपनी भी कोई इच्छा हो सकती है। औरतों को भी ढेर चीजों की आवश्यकताएँ होती होंगी। रोज की घरेलू चीजों को लेकर जव इतना झंझट होता था, तो दीगर चीजों के 'लिए वह खर्च क्यों करता? मन को उसने धमका-धमकाकर वेजान पत्थर- सा बना दिया था, जिसमें अब कोई इच्छा पैदा नहीं होती थी। उसने जान 'लिया था कि उसकी हद बस इतनी ही है, इससे आगे नहीं। रोज अपनी आवश्यकताओं को लेकर पति के आगे जाना, उसे भीख मांगने-सा लगता 'था। "जाओ, कहो, घर के लिए पैसे दें।" उसने रेनू से कहा। रेनू दौड़कर बाहर चली गयी। परन्तु लौटकर बताने की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि राहुल का झल्लाया जोरदार स्वर वह सुन चुकी थी, "पैसा · पैसा नहीं है पैसा, जाकर कह दो।" इतना सुनते ही वह तड़प उठी और बाहर आ गयी। पर्दे को पकड़कर 36/ अन्तिम चढ़ाई सहा हा "घर में कुछ सामान मंगाना है।" उसने पदों पकड़े-पकड़े ही कहा । "मुझे नहीं मालूम।" राहुल ने गुस्से से कहा। "आपको नहीं मालूम, तो किमे मालूम है ?" उसने उतने ही तीये शब्दो मे उत्तर दिया। "ज्यादा वक्रवक मेरे सामने मत कर, समझी?" कहकर राहुल ने टेबुल पर रखा हुआ एक रजिस्टर उमकी ओर फेंका। रजिस्टर उसकी नाक के पास चोट करता नीचे गिर गया। वह तिल- मिलाकर नाक पकडकर वही देहरी पर बैठ गयी। ओख में ढेर सारा पानी छलछला आया, पर गुस्से की गर्मी ने आंख के पानी को वही सुखा दिया। उसने गुस्से से राहुल की ओर देखा, अच्छा हुआ, उस समय रेनू बाहर खेलने चली गयी थी। "संभालो अपना घर, मैं जा रही हूँ।" उसने गुस्से से उठते हुए कहा, "शर्म नहीं आती औरत पर हाथ उठाते हुए ? मैं भी कमाकर दिखा सकती "जब कमा सकती हो तो दूसरो का भेजा क्यो.खाती हो?" राहुल ने नफरत से शब्दों को चबा-चबाकर कहा। "ठीक है, अब यही करके दिखाऊंगी।" कहती वह उठी और भीतर चली गयी। थोड़ी देर मे वह कमरे से बाहर आयी तो उसके हाथ में एक छोटा-सा अंग था। उसने एक बार भी राहुल और रेनू को नहीं देखा और निकल गयी। जब उसे कमाना ही है तो कही भी रहकर कमा सकती है, दूसरो के टुकडों पर क्यो पड़ी रहे, सोचती वह रिक्शे पर बैठ रेलवे स्टेशन आ गयी। ट्रेन के आने में अभी काफी समय था। वह सीमेण्ट की बेंच पर बैठी सामने बिछी सूनी पटरी को निहारती रही। उसे लग रहा था--पीछे राहुल उसे लेने जरूर आयेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ, उसे बुलाने कोई नहीं आया। एक बड़ा झंझट, एक बड़ा जाल, एक बड़ा मोह, एक बड़ी लोक-लाज वह पीछे ढकेल आयी थी। उसकी आंख में एक भी आंसू नहीं था। उसे खुद आश्चर्य हो रहा था। बंद का हक137 आँखें जो वार-वार रो पड़ती थीं, उनमें इतना बड़ा हादसा होने पर भी एक आँसू नहीं था। छोटी थी और परिवार में किसी से झगड़ा हो जाता, तव वह शिकायत करने मां के पास जाती, तो एक शब्द वोलती और देर तक रोती, जिससे मां के पल्ले कुछ नहीं पड़ता और वह खीजकर बोलती, "या तो तु पहले रो ले, या बोल ले, रोयेगी ज्यादा, बोलेगी कम।" . . - मां के घर आकर उसकी स्थिति विचित्र हो गयी थी। एक निर्णय, जो वह ले चुकी थी, उसे पलटना नहीं चाहती थी। वावूजी, जो उसके कप्टों को समझ रहे थे, वे उसके साथ थे, क्योंकि इस स्थिति को वे भी अपनी जिन्दगी में झेल चुके थे। पर माँ और भैया उसे अपनी समूची ताकत से पीछे टकेलना चाहते थे। माँ ने उससे वोलना छोड़ दिया था, जैसे उनके पास बोलने के लिए कुछ नहीं था और था तो बस कटु जहरवुझें शब्दों के अलावा एक शब्द नहीं। नैया के लिए वह एक समस्या बन गयी थी। उनके कहे अनुसार उसके कारण, उनके दोस्तों में, समाज में, उनकी बदनामी हो रही थी। "स्थिति समझने की कोशिश करो, लड़की यहाँ न आती तो कहाँ जाती? क्यों उसके जख्मों पर दिन-रात नमक छिड़कती रहती हो?" बाबूजी ने एक दिन तंग आकर मां से कह ही दिया। "नहीं, उससे कह दो-वह वापस राहुल के घर लौट जाये। शादी- शुदा लड़की का घर बैठना क्या अच्छी बात है ?" माँ ने गुस्से से तनतनाते हुए कलाई में पड़ी चूड़ियों को कसते हुए कहा, "कैसे बाप हो तुम, लड़की को घर पर बैठाकर नाक नीची करवाओगे ? दुनिया क्या कहेगी?" "वह तो खुद अपना कमा लेगी, नौकरी कर लेगी, कौन तुम्हारा खायेगी! पढ़ी-लिखी समझदार लड़की है, कौन गांव की अनपढ़ जाहिल है !" बाबूजी ने सफाई दी। "हां, और तुम उसके समझदार वाप हो।" माँ ने गुस्से से कहा, "लड़की कमायेगी और तुम देखोगे? अरे, सोचा था, बुढ़ापे में सारे काम निपट गये हैं, तो घूमेंगे-फिरेंगे, तीर्थ करेंगे, अव ऊपर से यह जिम्मेदारी आ 38/मन्तिम चढ़ाई पडो । जवान लड़की को घर में बैठाना क्या ठीक है ? वह घर में इज्जत से रहेगी, तो भी दुनिया नाम धरेगी। मैं साफ कहे देती हूं, उसे पहुंचा आओ।" "पहुंचा आओ, पहुंचा आओ!" बाबूजी भड़कते हुए बोले, "क्या वह कोई होलडाल है, जो उसे जाकर पटक आऊँ। वह जाना नही चाहती, तो कमे पहुँचा आऊँ ?" बाबूजी गुस्से से उठे और सीधे बाहर आ गये। वह अपने पलंग पर लेटी दम साघे सब सुन रही थी। बाबूजी वाजू- वाले कमरे मे आकर पलंग पर आंखें बन्द कर चित लेट गये। पर वे सोये नही थे, जैसे आंख बन्द किये अपने-आपको घर के वातावरण से काटकर पड़े हो । घर मे एकदम सन्नाटा-सा खिंच गया था। ऐसा ही होता था रोज, जब भी घर मे झगडा होता, झगड़े के वाद वातावरण मे तनाव, निस्तब्धता 'छा जाती। अप्रैल का महीना था। नीम का पेड़ फूलो से लद गया था। नन्हे-नन्हें सितारो के आकारवाले फूल बडे भले-से लगते थे। उसका विस्तर खिड़की के पास था। खिड़की से लगी दो हाय चौड़ी गली थी। उसके बाद ऊंची दीवार थी और दीवार से लगे जामुन और नीम के ऊंचे-से पेड़ थे। दीवार की मुंडेर नीम के वासी फूलों से ढक-सी गयी थी। हदा जब भी चलती, नीम के फूल हवा के साथ वहककर आते और विस्तर, तकिये और कमरे के फर्श पर विखर जाते। वे देखने से बड़े भले लगते थे। नीम के फूलों की कडवी, तीखो गन्ध हवा मे घुल-मिल जाती थी। इतने दिनों में जैसे वह कड़वे नीम के इन फूलों से ही अपने को जोड़ पायी थी। यही वे फूल थे, जो उसके परेशान, थके दिमाग को अपनी तमाम कड़वाहट के बाद भी शान्ति दे जाते थे। वरना उसे तो लगता, बहुत-बहुत सहजे हुए विश्वास, आपसी रिश्ते लहूलुहान हो गये हैं । झटके की तकलीफ, जिवह हुए बकरे की तड़प और सारी नसों से निचुड़ा बूंद-बूंद खून" वावूजी की तबीयत हमेशा खराव रहती थी। सारी उम्र सच को बूंद का हक /39 राह चलते रहे और सताये जाते रहे। यह तो उन्होंने अव समझा था कि जीने के लिए थोड़ी-बहुत मक्कारी की भी जरूरत पड़ती है। वरना आदमी हर जगह जीतकर भी जिन्दगी की लड़ाई हार जाता है। वावूजी, जो जिन्दगी-भर मुस्तैद सिपाही की तरह डटे रहे थे, और अव बुढ़ापे में सारे हथियार रखकर जव अलग होनेवाले थे, तब हठात उन्हें पता चला था कि नहीं, अभी एक और जंग में उन्हें शरीक होना है। ढेर सारी बातें थीं, जो उसके परेशान दिमाग को और परेशान कर रही थीं कि तभी बाहर से भैया ने दरवाजा खोला। भैया अपनी पत्नी रत्ना के साथ अन्दर चले आये । जब से वह आयी थी, भैया ने रात ग्यारह बजे लौटने का नियम ही बना लिया था। जब सब खा-पीकर सो जाते, त्तव दोनों पति-पत्नी लौटते और चुपचाप खाना खाकर सो जाते थे। इस तरह यह भी उसके खिलाफ बगावत का मोर्चा था। भैया उससे बात करना तो दूर, उसके साये से भी भागने लगे थे। हमेशा घर में गुस्से में आकर तोड़-फोड़ कर अपना रोप व्यक्त करते । और रत्ना उसके हाव-भाव पर कड़ी नजर रखती थी कि वह क्या पहन रही है, क्या कर रही है ? थोड़ा भी वह ढंग से कपड़े पहन लेती तो वह उसे सर से पैर तक घूरकर देखती, मानो कह रही हो-'देखना ननदजी, दूसरा ब्याह करेंगी, तभी तो पति का घर छोड़ आयी हैं।' यह बात उन्होंने घुमा-फिरा- कर उसके सामने दो-एक बार कही थी। बाबूजी की तबीयत खराब चल रही थी। घर का वातावरण उसके लिए तथा बाबूजी के लिए असहनीय हो उठा था, इसलिए जब दोनों बाहर जाते, तो कई-कई घण्टे में लोटते। वाबूजी ने उसे अपना निर्णय बता दिया था। यानी वे उसके साथ रहने को तैयार हो गये थे। पर उस छोटे-से शहर में क्या नया मकान ढूंढ़ना आसान काम था? उस दिन वह और बाबू- जी रिक्शे पर किराये का घर ढूंढ़ने निकल पड़े थे। मां को तथा भैया को यह बात मालूम नहीं थी। वे दोनों डॉक्टर के घर जाने का बहाना बनाकर घर से निकले थे। 40/ अन्तिम चढ़ाई बाबूजी एकदम चौंककर उसे निहारने लगे, पर उसका चेहरा धुंबन के के कारण वे देख नही पाये। "मैं भी यही सोचता हूँ, वेटा, जब तू इन खूसार भेड़ियों के बीच रह सकती है तो वहाँ भी रह सकती है।" बाबूजी ने बहुत बुझे तथा थके हुए शब्दों में कहा, जैसे उन्होने अपनी हार स्वीकार कर ली हो। "तो राहुल को लिख दूं, तुझे लेने आ जाये ?" बाबूजी ने उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा। "हाँ।" इमसे आगे उससे बोला नहीं गया। घर लौटकर वह अपने पलंग पर तकिये में मुंह डालकर पड़ गयी। चाबूजी ने उसके निर्णय की सूचना मां को और भैया को खाने के समय दी सायद । मुनकर कोई अपनी तरफ से कुछ नहीं बोला, पर सबके चेहरे पर प्रसन्नता छा गयी। उसे सारे समय यही डर लगता रहा कि कहीं मां उसके निकट आकर उपदेश देना न शुरू कर दे, पर उसे आश्चर्य लगा, मां उसके निकट नहीं आयी और उसे अपना यह अकेलापन बहुत अच्छा लगा, विल- कुल उसी तरह, जैसे सुरक्षा का कवर हो। . - सोचते-सोचते उसकी आंखें धकने लगी। शाम गहरी होने लगी थी। रेनू पता नहीं कब पलंग से उठकर भाग चुकी थी। क्या रेनू अब पहले की तरह उससे खुल नहीं पायेगी? सोचते ही उसकी आंखें छलछला आयौं। भीड़ ! लेकिन भीड़ में भी इनसान को अपने जस्म रुलाते हैं, कप्ट देते हैं। पता नही कैसे लोग अपनों को भूल जाते हैं। बहुत मन में इनसान औरों में अपने को वोट-बिखेरे रहता है, फिर भी यह अह- सास नहीं भूलता कि उसके अपने लिए कुछ "कुछ नहीं। इनमें से एक बूंद पर भी उसका हक नहीं। कितना अदना और वेवस होता है इनसान !! बाबूजी, राहुल और भयाशायद पहले निकल गये थे। बाबूजी खाने के बाद पहले जाते हैं। आज भैया का प्रोग्राम बदल गया था, आज वे शाम से ही घर पर थे। बाहर आँगन में लाइन में सबके विस्तर लगे थे। वह पलंग आकर ठिठक गयी। मां ने जान-बूझकर रेनू को उसके पलंग पर लिटा दिया था। वह देर तक चुप खड़ी रही, फिर वह अपने पलंग की ओर बढ़ गयी। उसने मच्छरदानी उठायी । देखा, रेनू औधी पड़ी सो रही थी। उसने धीरे-से रेनू को किनारे खिसकाया और फिर खुदं उसके बगल में लेट गयी। रेनू के बगल में लेटते ही उसने अचानक महसूस किया कि उसकी छाती में दूध उमड़ने लगा है, नसें खिचने लगी हैं, जैसा कि जव रेनू नन्ही-सी थी, तव होता था। वह आश्चर्यचकित रह गयी। रेनू ने नींद से जागकर उसे देखा, फिर वह सो गयी। रेनू ने आदत के मुताविक नोंद में ही अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया, धीरे-धीरे, फिर उससे लिपटकर सो गयी। रेनू की हमेशा इस तरह सोने की पुरानी आदत थी। उसने प्यार, ममत्व से उमड़कर रेनू को अपनी बाहों में समेट लिया। जैसे मन पर रखा कई-कई मन का बोझ हट गया हो। लगा, 46/अन्तिम चढ़ाई गुरुमन्त्र कोवा सरसों के तेल की कटोरी को उलटकर झट खपरैल के उप्पर के वीया. बीच वाली मुंडेर पर बैठा कांव-काव करने लगा। उसकी कर्कश पुकार कान को फाड़ रही थी। सुकरी औंधो पड़ी कटोरी को भूमि पर से उठाते भूमि पर गिरे तेल को निराशा से देखने लगी। उसके दोनों हाथ तेल मे सने थे। वह धूप में बैठकर आराम मे देह मे तेल चुपड़ रही थी कि बीच में कौवे ने आकर सब खेल चौपट कर दिया। "दादी आयेगी तो बैंठा रह, नही आयेगी तो भाग जा," मूंगा, कुंदर तोड़ते पलटी, बोली और दोनों हाथो को हवा में हिलाया। कौवा दो-तीन बार ढीठ बना चिल्लाता रहा। फिर अन्त में उड गया और मूंगा का मन फिर धप्प-सा बुझ गया । "सच रे सुकरी, दोदी नही आयगी," मूंगा निराशा से बोली, फिर जैसे अपने-आपसे बुदबुदायी, 'हो, दीदी को आना होता तो जातो ही क्यो ?' "दीदी आने के लिए थोड़े ही गयी हैं । दशहरे में पूरे तीन बरम हो जायेंगे," सुकरी हाथ में लगे तेल को देह में चुपड़ते बोली, "अब तो दीदी के बाल-बच्चा भी हो गया होगा। अब दीदी कही हाट-मण्डई मे दिख भी गयी तो कैसे पहनान में आयेंगी। देखा ना, तीन साल में तू कितनी वडी दिखने लगी है।" गुरुमन्त्र/47 "हरे, नीन बरन हो जायेंगे दीदी की गये," कहती मुंगा दीवाल ने 1 1 "बीटी गयी, नेरा भी व्याह हो जायेगा, मैं नकली हजाऊंगी," मुक्ररी अपना आंचल उतारकर अटकती बोली, जिस पर दो-तीन बौटियां चढ़ गयी थी। "नहीं न साह, नहीं कहेंगी। लन्वनी की मां बता रही थी, 'वह बहुत उमाशा है। वह तो मेरे बाप-नमा लगेगा।" नंगा रात को उठी तो देन्या, सामने बोनाने में मौमी बनी भी पनी पड़ी है। उनके मागे दोन उलटे पड़े थे । वह बाहर आ गयी । गुपचूप अंधेरे में ऋतिया की थी, जिसे देखकर वह डर गयी। बचकवाकर उनने दरवाजे को निया शुनिया घोड़ी हिली और उसने चैन की सांस ली। अपने पर ही मी आयी, लो वह वर की कुतिया ने नी उरगयी थी। बाहर चारों नायगा-ही-नया 1 कच-ॐत्र पेड़ शान्त, इरावने से खड़े थे। रात बाबा और मानी देर नान-गये तक शराब पीते रहे थे। नशे में धुत वसुध- नी पड़ी थी नौसी, जिने अपना, गरीर का, कपड़ों का कुछ होश नहीं था। बाहर बाड़ी के पास बाबा का रिक्या खड़ा था, जिन पर नतर सो रहा था। पता नहीं इसे रिन्दों में की नींद आ जाती है ! मौनी की आंघों तक चढ़ आयी नाही को उसने ठीक किया और मौसी को जगाया, "मानी उठ, ठीक होकर मो।" कई बार जगाने पर बह जागी, करवट लेकर फिर सो गयी। उनके नह ने बार व्यक नही थी। हसीना गयी, मौनी मर्दो की बराबरी क्यों करती है ? महा की धाराव की गन्ध सारे घर में भरी थी। बृहे भूठे दोनों को बार-बाकर भाग रहे थे। छत के बॉस ने बड़बड़ाता मोटा हा उन्ना दिया, जिसे देख वह छिकाकर मुड़ गया। "नयानी, कितने मोटे-मोटे सांड चूहे हो गये हैं! हरामजादी पूनी टाँग फैलायरलोती है । एक नी हा नहीं खाती। सही है, आराम की जिन्दगी में मत्र मृस्त हो जाते हैं।" बह उठी और नीनर कोठरी में भा गयी । दूसरी कोठरी में बाबा पसरा पड़ा था, "मुकरी की नौसी, ऐमुकनीकी मीनी!"बाबादोबारहांक देता है, 48/अन्तिम चढ़ाई 1 उस दिन सुबह से ही पानी बरस रहा था, फिर भी वह बाबूजी के माय घर ढूंढने निकल पड़ी थी। अब वह शीघ्र ही इस वातावरण से निकल जाना चाहती थी। घर के वातावरण मे उसे सांस लेने मे भी कठिनाई होने लगी थी । वह किसी श्रीवास्तव का मकान था। घुमावदार सीढियां थी, जो ऊपर तक चली गयी थी और हर एक-दो सीढ़ी से लगे एक-दो कमरो का घर था। वह बाबूजी के साथ घर देख सीढियों से नीचे उतरी। पानी काफी गिर रहा था। घर पसन्द आ गयाथा, बस बात करना ही शेप था। वे लोग नीचे उतरे, सड़क सूनी थी, अचानक पानी तेज हो गया। वे लोग नीचे बनी बरसाती में खड़े हो गये। चबूतरे पर एक आठ-नौ साल का लड़का खड़ा केला खा रहा था। उसके गन्दे, फटे, चिक्कट कपडे देख उसने अनुमान लगाया-लडका भीख मांगने- वाला था शापद । वह एक थला पकड़े था, जिस पर ढेर सारी मक्खियाँ बैठी थी। उसके शरीर से इतनी दुर्गन्ध आरही थी कि वहां खड़ा रहना मुश्किल- सा हो गया था। पहले उसने सोचा-मगा दे फिर पता नहीं क्या सोच, या उसके मासूम चेहरे को देख उसे तरस आ गया। उसने उससे योही समय बिताने की गरज से पूछ लिया, "क्या काम करता है ?" "कुछ नहीं!" उसने सपाट-सा उत्तर दिया। "कहाँ रहता है, तेरा घर कहाँ है ?" "वाप मर गया और मां दूसरा आदमी बनाकर चली गयी।" उमने इतमीनान से केला खाते हुए उत्तर दिया। उसके उत्तर पर उसे हंसी आयी, "तुझसे क्या बोली?" "बोली, मैं खाना मांगने जा रही हूँ और भाग गयी। मैं रान तक उसका रास्ता देखता रहा, फिर दूसरे दिन से खुद मांगकर खाने लगा। जहाँ भी जगह मिलती है, सो जाता हूं।" "तेरा बाप नही है ?" "मैं छोटा-सा था, तभी मर गया।" पता नहीं क्यो, उस नन्हें-से बच्चे से बात कर उसे धक्का-सा लगा। मां के प्रति उसके मन में कैसी घृणा-सी बैठ गयी है और वह खुद कितना लापरवाह हो गया है। उसे अब जैसे किसी की जरूरत नहीं । वह अपनी ही बूंद का हक/41 जिन्दगी में मस्त है। उसे लगा, जैसे वह इस लड़के के रूप में रेनू को देख रही है। वह मन-ही-मन सहम-सी गयी। बाबूजी उसके मन की स्थिति समझ गये थे इसलिए उसे वहाँ से वैसे ही पानी में लेकर चौराहे की ओर बढ़ गये। इन्सान को कदम-कदम पर अपनों की जरूरत पड़ती है, ताकि अंधेरे का अहसास कम हो । पर लोगों के साथ रहने पर भी, चलने पर भी, आदमी को अपना अँधेरा तो खुद ही झेलना पड़ता है। अजीव गमगीनी से भरे गुजरते जा रहे थे दिन । उसकी समझ में कुछ नहीं रहा था कि वह क्या करे ! वह निर्णय नहीं कर पा रही थी। अपने खुद के मिटने का जश्न वह तिल-तिल मिटते हुए देख रही थी । वीरानी उसकी जिन्दगी में कुछ इस कदर हमसफर बन गयी थी कि वह जहाँ जाती, उसे लगता-हँसता-फूलता गुलिस्ताँ भी वीरान हो गया है। दिन महीनों में तब्दील होने लगे थे। उसे आश्चर्य होता था कैसा घर है यह, जहाँ किसी से विना वोले भी महीनों कट गये । उससे केवल बाबूजी ही वोलते थे, बाकी सवने बोलना बन्द कर दिया था। उसने भी जैसे अपने- आपको समेटकर सिर्फ पलंग तक कर लिया था। वह सिर्फ एक बार ही भीतर खाना खाने जा पाती थी। किराये पर घर मिल गया था, पर मां ने ऐसा हंगामा खड़ा किया कि फिर उसने वहाँ जाने का साहस छोड़ दिया। उसे वार-बार लगता था-वह कुएं से तो निकल आयी है, पर दलदल में । फंस गयी है। उस दिन हफ्तों बाद वादल छटे थे और साफ उजली धूप आने लगी थी। उसने बाल धोये थे और खुले बालों को पीठ पर फैलाये वह आंगन में विछी खाट पर बैठी थी। वाबूजी बेंत की कुर्सी पर पैर फैलाये पेपर पढ़ रहे थे। भैया जल्दी ही ऑफिस से आ गये थे, आते ही उन्होंने एक नीले रंग का अन्तर्देशीय बाबूजी की ओर बढ़ाते हुए कहा, "राहुल का पत्र आया है, उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है, माफी मांगी है।" बाबूजी सतर्क हो गये वह पहले की तरह ही बैठी रही। मां रसोई से निकलकर आ गयी थी और भाभी दालान में दरवाजे के पास आकर खड़ी 42/ अन्तिम चढ़ाई हो गयी थी। मां ने बाबूजी से कहा, "पत्र पढ़कर सुनाओ।" "मगर जहाँ लड़की का मान-सम्मान नहीं, वहाँ लडकी को जबरदस्ती भेजने से फायदा?" बाबूजी ने पत्र को विना पड़े वापस तह करते हुए उत्तर दिया। बाबूजी की वात से वहाँ एक धमाका-सा हुआ, सवने बाबूजी को 'सठिया गये हैं'-वाले अन्दाज से देखा। "अपने साथ बेटी को भी चिता पर ले जाना।" मैया ने गुस्से से तन- तनाते हुए गले की टाई खोची और उतारकर वही फेंकते दनदनाते हुए अपने कमरे में चले गये। थोड़ी देर को वहाँ का वातावरण निस्तब्ध रह गया, जैसे हवा तक को लकवा मार गया हो। बाबूजी का मुंह अपमान से नीचे झुक गया। मां के चेहरे पर ताजगी-सी आयी। वाबूजी के अपमान से उनका मन प्रसन्न हो उठा था। उन्होने तीखी आँखो से बाबूजी को पूरा, फिर उसकी तरफ मुड़- कर वोली, "यह लड़की, लगता है, इस घर को खाकर दम लेगी।" उसने चेहरा खिड़की को ओर घुमा लिया, जहां एक सफेद दीवार थी। दुख, क्षोभ से उसका मन छलनी हो गया था। इधर कुछ महीनों में उसने देख लिया था कि सिवाय अपमान के उसे कुछ नहीं मिला। बाबूजी उसका साथ दे रहे थे, इस कारण उनका भी कदम-कदम पर अपमान हो रहा या, जिससे वह भीतर-ही-भीतर टूटते जा रहे थे, पर ऊपर से कोई भाव प्रकट नही करते थे। एक तेज विचार उसके मन मे आया, क्यों न वह लौट जाये ! राहुल अपनी गलती को मान रहा है। यहाँ से अब उसे हटना चाहिए, इस तरह कम-से-कम वाबूजी को तो निजात मिल जायेगी। वह अपने साथ-साथ उनकी भी हत्या कर रही है। घर में मौत का-सा सन्नाटा सिंच गया था। बाबूजी उठकर बाहर चले गये, शायद उनकी आंखें भर आयी थी। थोड़ी देर में मां भी उठकर कमरे की ओर बढ़ गयी। वह अकेली नाखून कुरेदती, शून्य मे तकती बैठी रह गयी। -- बंद का.: 1.43 . शाम को वह और बाबूजी घर के सामनेवाली सड़क पर टहलने निकल गये थे । वह एकदम चुप थी। बाबूजी अब देख रहे थे कि वह काफी दुबली और चुप-चुप रहने लगी है, इसलिए वे भी मन से चाहने लगे थे कि वह राहुल के पास लौट जाये । वे उसकी एकाएक चुप्पी से सहमने लगे थे। "वेटा, सारी उम्र इन लोगों ने मुझे तंग किया। नौकरी करने पर मजबूर करते रहे, पर अव मैं इनकी कोई बात नहीं मानूंगा और अपने गांव लोट जाऊंगा। तेरी माँ और तेरे भैया को सिर्फ पैसे से मोह है, वही लोग संभालें अब सारा राज-पाट ।" बाबूजी ने अपनी बात शुरू की, "मैं तो बस जाने ही वाला था, पर अब जब तक तुम अपने पैरों पर खड़ी नहीं होती, तव तक कहीं नहीं जाऊँगा, वरना ये लोग चील की तरह नोचकर तुम्हें खा जायेंगे।" वह चुप रही और धीरे-धीरे बाबूजी के साथ कदम-से-कदम मिलाती चलने लगी। वह मन से काफी हद तक थक गयी थी। अब तक वह जिन्दगी को सही करने की कोशिश करती कही थी, पर नहीं हो पायी। एक मोर्चा हो, तो आदमी लड़ ले, पर हर कदम पर खतरा, मोर्चा हो, तो आदमी कितनी हिम्मत कर सकता है ? वह देख रही है, लौटना उसका निश्चित है,. वरना उसकी देह की आखिरी बूंद को भी ये लोग सोख लेंगे। हजारों मर्तबा किये हुए हिसाब-किताब को मन दोहराने लगा, पर हिसाब-किताब वही लोग करते हैं, जिनके पास कुछ वचा होता है । जो खुद दिवालिया हो, जिसके पास फूटी कौड़ी नहीं, वह क्या हिसाब-किताब करे ? पर हाँ, बैठा-बैठा वह कैंसिल हो गये सवाल को बार-बार जोड़ता-घटाता रहता है, गलती कहां हो गयी जिसकी वजह से कुल जोड़ सिफर ही पल्ले पड़ा। कभी जिन्दगी में ऐसी विवशता भी आती है कि आदमी अपने मन से ही इस कदर लाचार हो जाता है कि जान-बूझकर डूबना चाहता है "समझ- बूझकर काँटों-भरी राह पर चलना पड़ता है। "वाबूजी, मुझे पहुँचा दीजिए। मैं अब उसी घर में लौटना चाहती हूँ।' उसने लौटते हुए शाम के धुंधलके का फायदा उठाया और आखिर में वाबूजी से कह ही दिया। - 44/ अन्तिम चढ़ाई लम्बी-लम्बी हाँक रहा था। शराव सबको चढ़ गयी थी और ओसार मे बैठे लोगो की आवाज तेज और तेज होती बाड़ी लांघकर गली तक जा रही थी। "ले दादा, ले, मैं तो लडकी हार गया," बहते हुए बाबा ने दम नये पैसे के सिक्के को भूमि पर चित डाल दिया। रात को जब सब चले गये, बादा ने इतनी पी ली थी कि सुध खो बैठा था। वह वही, ओसारे मे ओखली के पास विझे बोरे पर उरटे लोटें की तरह लुढक गया था। मौसी ने आज जरा नही पी थी। वही उन लोगो को बाहर तक छोडने गयी थी और हर काम मे, हर बात मे आगे-आगे रही। कुएं के पास मूंगा अंधेरे मे खड़ी थी। मौसीबाड़ी का फाटक सुतली से कसते हुए जय लोटी तो अंधेरे मे उसे खड़ा देख चौंक गयी, "तु यहां क्या कर रही है ?" "मौसी," उसने अंधेरे में मौसी का हाथ पकड़ लिया, "कोतवाल का बेटा वही था न जो आगे-आगे जा रहा था ?" "हाँ।" "तो तू सुन ले, मैं उसके लिए नही जाऊंगी। वह अच्छा नही लगा। मैं भी दीदी की तरह भाग जाऊंगी।" "क्यों, क्या हुआ री? भली सूरत तो है। मरद की सरत नही देवते, कमाई देखते हैं। खेती-बाडीवाले के घर जा रही है, और क्या चाहिए।" "तूने देखा नही, बावा ने जब उसे शराब पिलायो तो कैसा वैवकूफ- सा घिधियाया हुआ-सा हँस रहा था।" "गिनकर पांच कोडी दे रहा है, इतना कौन देगा री?" मौसी उमे समझाते हुए बोली, "ज्यादा ना-नू मत कर, तेरी दीदी रेलवाईवाले के साथ भाग गयी । विरादरी मे नाक नीची कर गयो और तू लम्बी नाक लिये बात करती है।" मौसी रोव से बोली, फिर जाने क्या सोच मोसी उसे वहीं लकड़ी को वल्ली पर बिठाकर पुचकारती-सी बोली, "मूंगा, अपने से अच्छे मरद से ब्याह नहीं करना चाहिए, अपनी बात नहीं रहती । अपने से कम अच्छे मरद से ब्याह करने से औरत राज करती है राज । जैसा चाहे मरद को नचा सकती है-समझी।" मौसी राज़ की बात उसके सामने खोलती. सी बोली और खुद कठल-कठलकर हंसने लगी। वैसे हो, जैसे कोई गुरु अपना अन्तिम गुरुमन्त्र देता हुआ हल्का हो रहा हो। - । गुरुमन्त्र/53 अपनी जमीन गोदावरी ने हताश होकर हारी, सूनी और रो-रोकर छिली आँखों की कोर से एक बार फिर अपने मृत बेटे पर नजर डाली और फिर पति के दुख से जड़ हुए चेहरे को देखा, जो पिछले एक सप्ताह से भागते-भागते थक गया था और इतनी भाग-दौड़ के बाद भी वच्चा नहीं बच पाया था। चारों लड़कियां रो-रोकर थकी-सी, सुन्न दीवार से टिकी वैठी थीं। अस्पताल का वही चिर-परिचित वातावरण था, जो वह पिछले एक सप्ताह से देखती आ रही थी। सारी हलचल वही पहचानी-सी थी। दुनिया का सारा काम उसी गति, उसी रफ्तार से चल रहा था, बस इतने इतने लोगों में किसी के मर जाने से दुनिया का काम तो नहीं रुकता न ! बरामदे में फिनाइल का पोंछा आज भी दिया जा रहा था,सुन्दर-सुन्दर साड़ियों में डाक्टरनियों का झुण्ड इस वार्ड से उस वार्ड आ-जा रहा था। सफेद मोजों में गम्भीर चेहरा लिये नर्से डरावनी शक्लों में इधर-से-उधर तेज-तेज आ-जा रही थीं। मरीजों का वही रोज का क्रम था, कण्ट से कराहते रुदन आज भी हवा में रचे-बसे थे। अस्पताल का वही चुप सन्नाटे से भरा वातावरण था। सब ज्यूं-का-त्यूं था, बस, इतना अन्तर हो गया था कि कल तक उसकी गोद में खेलता वच्चा लेटा रहता था और आज वह चुप निष्प्राण पड़ा था "बिना हिले-डुले आज उसकी न आवाज थी, न जिद, न कोई मांग, आज वह शान्त-सा पड़ा था। उसकी आँखों पर ढकी पलकें 54 / अन्तिम चढ़ाई पत्थर की तरह ठण्डी और भारी हो गयी थी। वह जब भी बेटे को निहारती, उसका कलेजा मुंह को आता, ऐसा जान पड़ता, कलेजा मुंह के रास्ते बाहर आ जायेगा, लगता इतनी"इतनी जोर की आवाज के साथ रोये कि सारी दुनिया को इस छोर से उस छोर तक सुनायी दे, सबको पता चल जाये कि उसका बेटा उससे छिन गया है, पर ऐसा वह कर नहीं सकती थी। उसकी ममता से भरी सिसकियां कलेजे में धुटकर रह गयी थी। जब डाक्टर ने बच्चे की जांच कर नर्स से कहा था कि बच्चा मर गया है, लाश उसके घरवालो को सौंप दी, तो वह पागलो-सी फटी-फटी आंखों से बच्चे को देखती भयानक आवाज मे रोयी थी। कहते हैं, मां जब दुख से रोती है, तो धरती भी हिल जाती है, पर थोड़ी देर बाद ही मुंह में आंचल डूंसकर उसे अपनी सिसकी घोट देनी पड़ी थी। पति ने उसे समझाया था, अस्पताल में रोना सस्त मना है। "जनक चला गया है गोदावरी," पति ने बच्चे की लाश को दोनों हायो से पागलों की भांति समेटते हुए कहा था। सिसकते-कराहते वह लोग बाहर लॉन में आ बैठे थे। वह ठगी-सी सिर पीट रही थी। दुख जब आदमी पर पड़ता है तो सहसा विश्वास नहीं होता, पर ज्यूं-ज्यू क्षण बीतते जाते हैं, सत्य को स्वीकारना पड़ता है। अभी कल ही तो जब जनक को लेकर वह लोग शहर आये थे, तो वह बोला था, "वावा, लौटते में लश्कर से नयी वुशर्ट ले देना।" उसे जीना है, वह जीयेगा, इसका उसे कितना विश्वास था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि हँसती- खेलती एक नन्ही-सी जिन्दगी दीये की तरह अचानक धप्प-से वुझ जायेगी! "वावा, मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो भंस खरीदूंगा, खूब दूध पीऊँगा और बड़ा आदमी बनूंगा," अपने बाबा की गोद में लेटा-लेटा वह आसमान से चांद • निहारा करता था। उसकी नन्ही-नन्हीं, भोली-भोली वातों से सार निहाल हो जाता था। गानी जमीन लगातार एक के बाद एक चार लड़कियों के जन्म के बाद जनक ने जन्म लिया था। उसके जन्म से कितनी प्रसन्नता हुई थी सवको। हमेशा पैर की ठोकर देकर बात करनेवाली सास ने भी पहली बार अच्छे से बोला था। अपने हाथों से असली घी में हलीरा बनाकर खिलाया था। लड़के के जन्म से उसे लगा था, उसके सारे कष्ट समाप्त हो गये हैं, वरना उठते-बैठते सास उसे कोसती रहती थी-उसके बेटे का धन समाप्त करने, खून चूसने कुलच्छनी आयी है। चौथी बेटी के सौर के समय तो जब दाई ने देहरी के बाहर झांककर कहा था, "कन्या जन्मी है," तव उसने चिरे हुए फाटक से सास का मुंह देखा था, उसके बाद फिर सास की शक्ल नहीं देखी थी। उसे घी, हलीरा कुछ नहीं दिया गया था। वह खाट पर पड़ी-पड़ी किस्मत को कोसती, रोती रहती थी। जव तीसरी छोरी हुई थी, तव सास दो दिन तक आंचल के छोर में तम्बाकू वांधे घूमती रही थी कि मौका लगते ही नवजात बच्ची के तालू में तम्बाकू रख देगी, तम्बाकू रखते ही एक घण्टे में बच्ची के प्राण निकल जाते। दाई ने उसे संकेत दे दिया था और वह अपनी बच्ची को छाती से चिपकाये, निगरानी करती रही थी। एक क्षण भी अपने से अलग नहीं किया, चौकसी में वह सारी-सारी रात बच्ची को गोद में लिये बैठी रहती थी। बाद में हारकर सास ने अपना इरादा बदल दिया, पर उसका क्रोध गालियों में, कोसने में निकलने लगा। चूल्हे में जलती कोलती तक से वह लड़कियों को मार वैठती थी। ऐसी दुखों से भरी काली रात के बाद सुख की भोर हुई थी। सारे घर में हलचल थी, खुशियों का वातावरण था, ससुर ने वन्दूक उठाकर हवा में चलायी थी, सारे गाँव को सूचना दी थी कि उनके घर वारिस पैदा हो गया है। खुशी के मारे खुद उसकी आंख से आंसू बहने लगे थे। इत्ते-इत्ते ढेर दुख देखने के बाद, लड़कियों की मां बनकर लानतें सहने के बाद आज उसे वेटे की मां बनने का मौका मिला था। उसके कमरे के बाहर रात-भर गाँव की औरतों ने ढोलक बजा-बजाकर वधाई गायी थी। खुद सास अपनी शादी का ओढ़ना पहनकर नाची थी, जिसे देखने सारा गांव जुट गया था। बूढ़े पैरों में यौवन की थिरकन भर गयी थी। ससुर ने विरादरी की पांत वुलायी 56/ अन्तिम चढ़ाई .
फिर मोटी गाली देकर चुप हो लेता है, "कुतिया पोकर सुध खो देती है।" फिर कोई आहट नहीं होती, वह भी चुप लेटी रहती है। कोठरी में ज्वार को रोटी की गन्ध भीमर गयी। रात बची रोटी उसने डीके पर रख दी यी, पत्ते से ढककर। मूंगा छोटी थी तभी मो मर गयी थी। बावा रिक्शा चलाता था । जब से मां भरी थी उसने रात को घर आना छोड़ दिया था। तीनों बहनें भूख से व्याकुल गठरी बनी कोने मे दुबकी बैठी रहती थी। दादा दहलीज झांक लेता, "बेटी, कुछ खाना नही ?" "नहीं है धाबा," दीदी बोलती और पाने की बात पर मूंगा को भूख 'लगने लगती और वह जोर-जोर से रोने लगती। "चुप कर, नहीं तो इमलीवाली चुडैल को दे दूंगी," दीदी धमकाती तो वह सहमकर चुप हो जाती। मां थी तब बाबा पैसा देता था। नहीं भी देता तो मां कमाकर से आती थी। मां जब लौटती तो वे तीनो दरवाजे के बाहर कच्ची भूमि पर बैटी एकटक रास्ते को निहारती रहती थी। थोड़ी भी मां की साड़ी दिखती और वह चहक उठती, "देख, मां आ रही है।" मां के आने का इन्तजार उतना नही रहता था जितना इस बात का कि वह साथ मे जोंधरा लाई लायेगी। मां जब मरी तो घर पर कुत्ते रोने लगे। एक दिन रात को बाबा का झनझनाता रिक्शा आया था। "बाबा आया रे !" दीदी दहलीज पर निकल आयी थी और उसके पीछे वह दोनो भी निकल आयी थी। बूढा दादा झोल-वायी पाट से उठता उत्मकता मे बाहर देखता रहा था। बाबा का लौटना अनहोनी-सी बात थी। बावा माँ के मरने के बाद कहीं आता था? बाड़ी का कपाट एक तरफ फेंकता वाया भीतर आया था। उसके पीछे कौन है ?ही साड़ी, महावर और चांदी की बिछिया पहने एक औरत थी। आते ही वह ओसारे के एक कोने मे बैठ गयी । ताक पर रखे दिये का उजाला उसके मुंह पर पड़ रहा था। तोनों ने एकसाथ-एकटक उसे देखा था। उसकी ठोड़ी पर गोदना था, जो हंसने के साथ सिकुड़ता तथा फैलता था। "तेरी मां है," बाबा ने उसकी तरफ इशारा कर बीड़ी को मोजीतमालू - को मुंह में फांकते हुए दीदी से कहा। उस अंधेरे कोने में तीनों एक-दूसरे से और चिपक गयीं। "कहां की लड़की है रे," वूड़ा दादा दरवाजे तक घिसटता हुआ आकर प्रसन्नता से वोला। "सुखदेव नाकेदार की लड़की है," वावा बोला, "उमरगांव की है।" "पहले व्याह हुआ था?" बूढ़ा दादा उस नये मेहमान के पास बैठता हुआ वोला। "हाँ, हुआ था। इसका मर्द इसे छोड़कर भाग गया," वावा ने पिच्च-से थूकते हुए कहा, जैसे उस मर्द के नाम पर थूका हो। जब से वह आयी थी, एक शब्द नहीं बोली थी। बस, टुकुर-टुकुर सवको घूरे जा रही थी। बाबा उसे अपनी कोठरी में ले गया था जिसमें माँ रहती थी। रात को दीदी दोनों को अपने से चिपकाकर बोली, "खबरदार, उसे मां नहीं कहना, मौसी कहना''मौसी, समझी?" मूंगा के अपना कोई भाई नहीं था। मूंगा के बाद हुआ था, पर चार- पांच दिन रहकर मर गया जिसे वावा ने बाड़ी के भीतर चमेली झाड़ के नीचे गड्डा खोदकर गाड़ दिया और मिट्टी वरावर कर दी। लगता ही नहीं इस चमेली के पेड़ के नीचे किसी बच्चे को गाड़ा गया होगा। साल-डेढ़ साल तक के बच्चे को वाड़ी के अन्दर पेड़ की छाँव में ही गाड़ देते हैं। बड़े बच्चे को लाश घर से बाहर निकालते हैं । मूंगा कितने दिन तक रात को दहलीज के बाहर पैर निकालते डरती थी, क्योंकि गड्ढा खोदने से लेकर वच्चे को भीतर सुलाने तक और मिट्टी ढाँपने की सारी क्रिया वह अपनी आंखों देखती रही थी। बाद में धीरे-धीरे डर कम हुआ और अब अब तो वह चमेली के पेड़ के नीचे वल्ला खेलती थी। खुद वह और घर के लोग इस बात को भूल चुके थे कि यहाँ बच्चे को गाड़ा गया है। । नयी पटरी डली थी। रेल आ रही थी। सरकार मजदूरों को बड़ी अच्छी मजदूरी दे रही थी। बाहर से भी बहुत सारे कुली आये थे। दीदी भी काम पर जाने लगी थी। रेल देखने की सबको खुशी थी। गाँव-गाँव खबर फैल 50/अन्तिम चढ़ाई चुकी थी और एक दिन रेस घड्यातो कामी. पर पसी तो दोस्रो भीमे गयो। मौसी के अपना कोई बाल-बच्चा नहीं हुआ। धीरे-धीरे मोरेशमरे से लेकर घर के कोने-कोने पर मौसी का राज हो गया। गाड़ी में सपो एक- एक मिर्च का मौसी हिसाब रखती पी। कभी भात पाने के समरदीपीर्गि तोड़ लेती तो वह पोरी तुरन्त पकड़ सी जाती। शर मोसी सामने लाड़ी होती। "क्यों री, बाडी से मिर्च कोन तोड़ा?" सब चुप, जैसे सांप सूंघ गया हो। दीदी जंगली बैल की तरह पा रही यो। उसके हाथ-पैर लम्बे निकल रहे थे। एक दिन दीदी घर लौटी, ढेर सारा रोय-पूड़ा सिमे। दोनों में हाग पर धरकर बोली, "मैं जा रही हूँ. मैंने मरद बना लिया है, परदार रिसी से कहना नहीं, ढूंढने दे उन लोगों को," कहती दीदी याडी का दरवाजा वापस सुतली से फसतो चली गयी । कच्चे कुएं की पहली पर दोनो पहले बैठी मुटुर-मुटुर जाती दीदी को निहारती रह गयी थी। दीदी रेलवे में काम करनेवारो मजदूर के साप भाग गयी पो। महा गयी, किसी को नहीं मालूम । न दीदी की किसी ने रामर ली और मोदी ने अपनी पवर दी । हिसाब दोनों तरफ से बराबर रहा। हो, जिरा दिन दीदी भागी थी, रात तक सबने रास्ता देखा था। यूपा दादा दो बार दहलीज झांककर पूछ गया था, "बैसती नहीं आयी।" उत्तर कोन देता? किसी के पास उत्तर नहीं मिलता देशवहाद खिसियाकर चुप हो गया था। रात यामा ने मौसी की रपी पराम मो पेट में उँडेल लिया था और बिना पाये माता-यमता गो गया था। हो, मौसी दो बार अपना विवाह सोलकर पोठरी मे दीया तिगे दीदी को,देखने आयी थी। कुम्हरे की वेल कूद-फांदकर छत पर चढ़ गयी थी। उसी के पास मंदिर सौरा मॅडया पर छा गया था, जिस पर सफेद-राफेद फूल बिगने लगे।
दीदी से कहा। को मुंह में फांकते हुए उस अंधेरे कोने में तीनों एक-दूसरे से और चिपक गयीं। "कहाँ की लड़की है रे," बूढ़ा दादा दरवाजे तक घिसटता हुआ आकर प्रसन्नता से वोला। "सुखदेव नाकेदार की लड़की है," बावा वोला, "उमरगांव की है।" "पहले व्याह हुआ था?" बूढ़ा दादा उस नये मेहमान के पास बैठता हुआ वोला। "हां, हुआ था। इसका मर्द इसे छोड़कर भाग गया," वावा ने पिच्च-से थूकते हुए कहा, जैसे उस मर्द के नाम पर थूका हो । जब से वह आयी थी, एक शब्द नहीं बोली थी। बस, टुकुर-टुकुर सवको घूरे जा रही थी। बाबा उसे अपनी कोठरी में ले गया था जिसमें माँ रहती थी। रात को दीदी दोनों को अपने से चिपकाकर बोली, "खबरदार, मौसी कहना 'मौसी, समझी?" मूंगा के अपना कोई भाई नहीं था। मूंगा के बाद हुआ था, पर चार- पाँच दिन रहकर मर गया जिसे वावा ने बाड़ी के भीतर चमेली झाड़ के नीचे गड्ढा खोदकर गाड़ दिया और मिट्टी बरावर कर दी। लगता ही नहीं इस चमेली के पेड़ के नीचे किसी बच्चे को गाड़ा गया होगा। साल-डेढ़ साल तक के बच्चे को वाड़ी के अन्दर पेड़ की छाँव में ही गाड़ देते हैं। बड़े बच्चे की लाश घर से बाहर निकालते हैं । मूंगा कितने दिन तक रात को दहलीज के बाहर पैर निकालते डरती थी, क्योंकि गड्ढा खोदने से लेकर बच्चे को भीतर सुलाने तक और मिट्टी ढाँपने की सारी क्रिया वह अपनी आँखों देखती रही थी। वाद में धीरे-धीरे डर कम हुआ और अव 'अब तो वह चमेली के पेड़ के नीचे वल्ला खेलती थी। खुद वह और घर के लोग इस वात को भूल चुके थे कि यहाँ वच्चे को गाड़ा गया है। उसे माँ नहीं कहना, . नयी पटरी डली थी। रेल आ रही थी। सरकार मजदूरों को बड़ी अच्छी मजदूरी दे रही थी। बाहर से भी बहुत सारे कुली आये थे। दीदी भी काम पर जाने लगी थी। रेल देखने की सवको खुशी थी। गाँव-गाँव खबर फैल 50/ अन्तिम चढ़ाई - चुकी थी और एक दिन रेल धड़धड़ाती आयी, पर गयी तो दीदी को भी ले गयी। मौसी के अपना कोई बाल-बच्चा नहीं हुआ। धीरे-धीरे मां के कमरे से लेकर घर के कोने-कोने पर मौसी का राज हो गया। वाड़ी में लगी एक- एक मिर्च का मौसी हिमाव रखती थी। कभी भात खाने के समय दीदी मिर्च तोड़ लेती तो वह चोरी तुरन्त पकड ली जाती। झट मौसी सामने आ खड़ी होती। "क्यों री, बाडी से मिचं कौन तोड़ा?" सब चुप, जैसे सांप सूंघ गया हो। दीदी जंगली बैल की तरह बद्ध रहो थी। उसके हाथ-पैर लम्ब निकल रहे थे। एक दिन दीदी घर लौटी, ढेर सारा सेव-चूड़ा लिये। दोनो के हाय पर धरकर बोली, "मैं जा रही हूँ. मैंने मरद बना लिया है, खबरदार किसी से कहना नहीं, इंटने दे उन लोगो को," कहती दीदी बाडी का दरवाजा वापस सुतली से कसती चली गयो । कच्चे कुएं की बल्ली पर दोनों बहनें बैठी मुटुर-मुटुर जाती दीदी को निहारती रह गयी थी। दीदी रेलवे में काम करनेवाले मजदूर के साथ भाग गयी थी। कहाँ गयो, किसी को नहीं मालूम । न दीदी को किसी ने खबर ली और न दीदी ने अपनी खबर दी। हिसाब दोनों तरफ से वरावर रहा। हाँ, जिस दिन दीदी भागी थी, रात तक सबने रास्ता देखा था। बूढ़ा दादा दो बार दहलीज झांककर पूछ गया था, "वैलती नहीं आयी।" उत्तर कौन देता? किसी के पास उत्तर नहीं मिलता देख वह खुद लिसियाकर चुप हो गया था। रात वावा ने मोसी को रखी शराब को पेट में उंडेल लिया था और बिना खाये वकता-बकता सो गया था। हो, मौसी दो बार अपना किवाड़ खोलकर कोठरी मे दीया लिये दीदी को,देखने आयी थी। कुम्हहे की बेल कूद-फांदकर छत पर चढ गयी थी। उसी के पास कुंदरू डोरा मंडवा पर छा गया था, जिस पर सफेद-सफेद फूल जितने लगे थे।
- . बूढ़ा दादा जब जवान था तब इस बाड़ी में सागौन के पांच पेड़ लगाये थे। दादा बुढ़ा गया, वावा भी बुढ़ा गया, पर सागौन के पेड़ अभी तक नाबालिग ही थे। बाबा कहता है, "यह पेड़ बढ़ जायेंगे तव खूब पैसा आयेगा। तव इस घर को ईंट का बनायेगा।" पर वावा के मरने के बाद कौन बनायेगा? वस, इसी बात से वावा शराव पीकर दुखी हो जाता। जब भी वावा शराब पीता, उने मरे हुए वेटे का दुख सताता। वह जलती-कोलती लेकर तीनों के 'पीछे दौड़ता, "चले जाओ मेरे घर से, मेरा धन खाने के लिए जन्मे हो।" मोती तीनों को मुर्गी की तरह कोठरी में ढांप देती और कपाट के आगे खड़ी हो जाती। तव वावा फुग्गा फाड़कर रोने लगता । मौसी चिल्ला- चिल्लाकर लड़ती, "मैं कहूँ तुझसे नशा संभलता नहीं तो पीता क्यों है ? तुझसे अच्छा नशा तो औरत संभाल लेती है, काहे का मरद बनता है ?" खुद मौसी जात से औरत थी पर उसका गुर्दा मरद का था। नशा भी खूब संभाल लेती थी और घर-आये पटवारी काका, तूसा सेठ, लकमू दरजी के साथ बैठकर वीड़ी भी पी लेती थी। घर पर जितने भी लोग आते, सब मौसी को ही पूछते, वावा को कोई नहीं पूछता था। सव जानते-बूझते हुए भी वावा मौसी से कुछ नहीं कहते थे । वावा मौसी से बहुत डरते भी थे। अक्सर तूसा सेठ आता और ओसारे में रखी खाट पर बैठकर भीतर झांकने की कोशिश करता तो झट मौसी उसकी पीठ पर धौल जमा देती, "सेठ, बात इमली को करने आया है और महुए की गन्ध लेता है। खवरदार ! मेरे घर लड़कियां हैं, उधर आँख उठाकर देखा भी तो तेरा भुरता बना दूंगी, समझा ? फूट यहाँ से।" और मौसी घृणा से वहीं थूक देती थी। उतरती साँझ को घर पर चहल-पहल थी। पता चला, लड़की देखने- वाले आये हैं । वावा शायद दीदी के कारण डर गया था, इसलिए वह अपने सामने लड़की को दे देना चाहता था। मूंगा चुपचाप कोठरी में चली गयी। मौसी उसे खोजती भीतर तक आयी, "मूंगा, मुंह-हाथ धोकर, ले यह साड़ी पहन ले !" मौसी ने उसके हाथ में अपनी साड़ी थमा दी। 'पीछे वाड़ी से वह जब साड़ी बदलकर लौटी तो देखा, वावा शराब पीकर 52/ अन्तिम चढ़ाई थी और खुद सिर पर साफा बांधकर, छाती तानकर, हुक्का गुहगुडाते हुए सबमे बयाई स्वीकारी यो। हमेशा बेटे की मां बनी रहने पर गर्व करनेवाली सास पहली बार बेटी के लिए रोयी थी, "मेरी बेटी होती तो उसे मनीजे को काजल लगाई में इतना देती कि उसका घर भर जाता, पर मेरे भाग्य खोटे, दो बेटे ही बेटे हुए।" मास ने हर नेग-दस्तूर बडे मन से किये थे। दिन हफ्तों में, फिर महीनों मे, फिर साल मेबदल गये और नन्हा जनक सात साल का हो गया । जनक सात बरस का था और सात जगह से उसकी ब्याह की बात आ गयी थी। ससुर ने मूंछों पर ताव देकर बात लौटा दी यो, "भर नौ का होगा मोड़ा तब वात लेंगे !" पर किसे पता था, होनी नाग बनकर इसने बैठी है। जनक को अचानक बुधार आया, गांव के लोगो ने कहा, इस साल श्राम में ज्यादा दौर आया है, इसी से बच्चो को बुखार आया है। पर धीरे-धीरे बुखार बढ़ता गया। सरकारी अस्पताल के डाक्टर ने देखा तो कहा. पोलिया हो गया है। दवा-दारू, झाड-फूंक सब करवाये, पर बुखार नहीं उतरा। आखिर हाक्टर ने हाथ टेक दिये-ग्वालियर के बड़े अस्पताल ले जाओ। और फिर आखिर बस में बैठकर शहर की ओर वह लोग चल पड़े थे। "गोदावरी, क्या सोच रही है ? अब क्या करें? बच्चे का क्रिया-करम करना पड़ेगा। मैं सुबह से चक्कर काट आया, कोई भी टैक्सीवाला सास ले जाने को तैयार नहीं है, और जो तैयार होता है, वह पूरे पांच सौ मांगता है।" पति ने हताश होकर उसे बताया। "नही, मेरे बेटे को गांव ले चलो, सबको उसका मुंह दिखा दो, यहाँ परदेश में किसके सहारे करोगे मेरे बेटे को ? क्या परदेश की मिट्टी ही मेरे बेटे के नसीब में है ?" "हूं, आखिर मां-बाप भी तो देख लें बेटे का मुंह।" कहकर पति चुप घुटने मोड़कर उदास वैठ गये। अस्पताल की हलचल वैसी ही थी। लड़कियां रोते-रोते निढाल पड़ी- पड़ी ऊंप रही थी। गोदावरी गोद मे जनक को लिये मक्सियां आंचल से FC अपनी जमीन . . भगाती बैठी थी, आंसू थे कि रुकना ही नहीं चाहते थे और मन था जो जनक को मरा हुआ स्वीकारना नहीं चाहता था। "सुन," अचानक पति ने उसके कन्धे झकझोरे, "एक काम हो सकता है, इने वस में ले चलते हैं, पर तू उसे जीवित बच्चे की तरह गोद में समेटे रहना, रास्ते-भर रोना-धोना नहीं और रास्ते-भर आँचल ढांककर इसे दूध पिलाती रहना, जरा भी शक न होने देना, क्योंकि वस में जिन्दा आदमी जाते हैं, मरे हुए नहीं। थोड़ा भी शक हुआ, तो हम सब जेल की हवा खायेंगे।" "आँ, क्या कहते हो,” उसने जोर से सिसकी भरी, “जनक को दूध पिलाऊँ ? मोड़ा तो रूठ गया, मेरी छाती पत्थर कर गया।" "शान्त हो जा गोदावरी, अकल से काम ले, इस तरह जनक को लेकर गांव जा सकेंगे क्या? सोच ले, विना जनक के लौटना पड़ेगा, और ज्यों- ज्यों देर होगी, समस्या और विकट हो जायेगी। अभी ताजी-ताजी बात है, मेरी बात मान ले।" गोदावरी वेवकूफ-सी गूंगी बनी पति को निहारती रही, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। अभी कल ही की तो बात है, जनक को हंसाते- खिलाते, बस की खिड़की से बन्दर, मन्दिर दिखाते वह लोग बस से लाये थे, और आज क्या हो गया, जो छिपाकर चोरी से ले जाने की बात होने लगी? उसका बेटा जनक अव जनक नहीं रहा ? "चल, चल गोदावरी, जनक को लेकर उठ!" पति ने उसे कन्धे से उठाकर खड़ा किया। लड़कियों ने वाकी सामान पकड़ लिया। पति उसे सहारा देकर ले जाने लगा । गोदावरी छाती से चिपकाये अपने छोने को ले चलने लगी, उसे धूप न लगे, सो उसने उसे आँचल से ढाँक लिया था। चलते-चलते जनक का पैर हिलता-डुलता तो उसे लगता कि दुनिया झूठ बोलती है, बच्चा जिन्दा है और उसकी छाती में मुंह गाड़े जनक शान्त नींद सो रहा है, थका-सा । लम्बी बीमारी ने उसे कितना कमजोर कर दिया है। बसस्टैण्ड आते ही पति उससे हटकर चलने लगा, साथ ही हिदायत देने लगा, "देख, सारे रास्ते रोना मत, गोदावरी, मन को पत्थर कर ले। जनक को गांव ले जाना है।" 58/ अन्तिम चढ़ाई और गोदावरी ने कलेजा पत्यर कर लिया। ममता की चीखी को, रुदन को उसने दांतो से भीचकर भीतर रोक लिया । नही, वह नहीं रोयेगी। उसे अपने बेटे को अपने उधर ले जाना है, वह धर जायेगा। वह माँ है, और मां होकर बच्चे को परदेश मे अजनबियो के हाथ सौप जायेंगी? वह लोग बस में बैठ गये । वह पत्थर की मूर्ति बनी बैठी रही। कण्डक्टर दोबार आया, "अजी गोद के बच्चे का भी टिकट लगेगा, दिखाओ कितने वर्ष का है।" "सो रहा है बाबू, टिकट तुम ले लो, सात वर्ष का छोरा है." पति ने फैमें गले से कहा। "बड़ी गहरी नीद में है, जरा भी शोर से उठ नहीं रहा।" कण्डक्टर ने टिकट पति को थमाते हुए अपनी दरियादिली दिसायी। "हाँ बाबू, बड़ी"गहरी नीद में है," कहते पति के गले से जोर से सिसकी उठी पर फिर गले में घुटकर रह गयी। सारे रास्ते वह चुप बनी बैठी रही। बच्चे को छाती से चिपकाये वह फटी-फटी आंखों से सामने विछी डामर की सड़क को निहारती रही। गाँव- पर गांव आते रहे, लोग उतरते-चढ़ते रहे । सारे लोग उतरकर नाश्ता-पानी करते रहे, पर वह लोग तो दूसरी दुनिया के वासी थे, कभी भूख-प्यास लगती ही नही हो, 8ठ बने बैठे रहे। "अजी बच्चों का मुंह मूख रहा होगा, पानी-वानी तो पिला दो!" एक यात्री ने हमदर्दी दिखायी। "नही हुजूर, गरीब के बच्चे हैं, इन्हें भूख-प्यास नही लगती।" यस फिर चल पडी। यात्रा इतनी कठिन हो सकती है, यह वह कभी सोच भी नहीं सकते थे। जब बस उनके गांव में पीपल के पास रुकी तो उसका कलेजा मुंह को आने लगा । बच्चे के भार से उसकी बांह मारी हो गयी थी। भीड़ के पीछे पीछे वह भी उतरने लगी। पति लड़कियो को बांह पकड़-पकड़कर उतारने लगा। पति ने उसे उतारने के लिए उसकी गोद से जनक को लिया। जनक को पति की बाहों में देते हुए उसे लगा कि वह एकदम हलकी-सी, तिनके- सी हो गयी है। जैसे उसका अपना कोई वजन ही नहीं हो। सारा भार तो । जनक का था और पहली बार उसे लगा कि उसकी गोद सूनी हो गयी है दुख से उसकी छाती फटने लगी, वह एकदम नीचे उतरकर रोने लगी, उसके साथ पति, बच्चियां सब रोने लगे। बस के तथा आसपास के सारे आदमी चकित रह गये और आश्चर्य से उन्हें देखते रह गये। किसी की कुछ समझ में नहीं आया। पति जनक की लाश को दोनों बाँहों में संभाले आगे चलने लगा। और उसे लगा कि वेटे को अपनी जमीन देने के सुख से वह निश्चिन्त और हल्की हो उठी है । . 60/ अन्तिम चढ़ाई पत्थरवाली गली वह और शाईस्ता दौड़ती हुई घर के दालान में एक-दूसरे पर गिर पड़ी। दोनों की मांस घोकनी की तरह तेज-तेज चल रही थी। अपनी गली में आकर कुत्ता भी शेर हो जाता है न ! बस, उसी तरह वे दोनों भी अपने घर पहुँचकर अपने-आपको मुरक्षित-सा महसूस कर रही थी। अभी भी ये सहमी-सहमी-मी पत्थरवाली गली की ओर निहार लेती थी, जैसे धुल यहाँ तक न आ पहुंची हो। पर नही, चुडैल की इतनी हिम्मत कहाँ जो यहाँ तक आ पहुँचे ! दालान मे टूटी चूड़ियो का ढेर इधर-उपर पड़ा था। हरी, पोलो, नीली, लाल चूड़ियों के टुकड़े सारे दालान मे विपरे थे। लगता था-~अभी-अभी खाला ने अपनी दुकान समेटी है। "जेदा, कहां गयी थी तुम दोनो?" खाला ने फट-से दरवाजा खोला, और बाहर दालान मे आती हुई बोली, "तुझसे कितनी दफा कहा है. आज- कल बाहर मत जाया कर, रमजान के दिन हैं, कोई-न-कोई गाहक आ जाता है। मैं दुकान देख कि घर ? तेरे दादा का रहना, न रहना तो बरावर "बस, थोड़ा यूं ही.."।" उसने धवरायी हुई यावाज पर काबू पाते हुए कहा। "अरे, अल्लाह खर करे," खाला ने इस बार मतकंता से दोनों को पूरा, "तुम दोनो इस तरह सहमी क्यों हो?" खाला ने वही दालान मे रखे पत्यरवाली गली वोली, । . मोढ़े पर बैठते हुए पूछा। उनके हाथ में पतली-सी छड़ी थी, शायद वह बकरियां बांधते-बांधते इधर आ गयी थीं। उसे लंगा कहीं खाला छड़ी से पिटाई न कर दें ! खाला का कुछ ठीक नहीं, गुस्से में होती हैं तो जो हाथ में होता है उसी से मार बैठती हैं। "खाला, हम दोनों छोटे टोले पर चूड़ियां पहुँचाने गयीं तो यह चल, तेन्दू बीनकर ले आयें," उसने अपने गुनाह को शाईस्ता पर डालते हुए सफाई से बयान दिया, "वस, मैं इसके साथ चली गयी। हन दोनों तेन्दू चुनते-बनते बीच जंगल में पहुंच गयीं। बातों में पता ही नहीं चला। अचानक मैंने सिर उठाया तो देखा पेड़ पर लाल रंग की नयी साड़ी लटक रही थी। वस, हम दोनों डरकर पीली पड़ गयीं । भागते-भागते यहां पहुंची हैं तो जान-में-जान आयी है। तुमने ही तो बताया था न, कि बीच जंगल में पेटवाली औरत को गाड़ते हैं और निशानी के लिए पेड़ पर नयी साड़ी टाँग देते हैं, ताकि सबको पता रहे और कोई भटका मुसाफिर भी वहाँ सुस्ताने न वैठे।" "उफ् अल्ला !" खाला ने अपनी सहमी साँस को बाहर किया, "अरे कम्बख्त, भरे जंगल में मत जाया करो। वहाँ पेटवाली औरतों को या जच्चा को गाड़ते हैं गाँववाले, नहीं तो जागकर वह गांववालों को तंग करती हैं। देखा नहीं था नाकेदार की बहू जचकी में मरी थी, उसे ले जाकर तरिया ऊपर गाड़ दिये। वह दो दिन में ही जाग गयी और गाँव में आकर अपना बच्चा ढूंढ़ती थी। इसीलिए तो दूर जंगल में गाड़ते हैं।" "हाँ खाला, नाकेदार की बहू को गांववाले भैसा-गाड़ी में डालकर ले गये थे न?" शाईस्ता वोली। "हाँ,” खाला ने पान की पीक को दालान के बाहर फेंकते हुए कहा, "गाँववाले जचकी में मरनेवाली औरत को भैंसा-गाड़ी में ही डालकर ले जाते हैं, नहीं तो कहते हैं वह पलटकर आ जाती है और भैसा-गाड़ी में ले जाने से नहीं आती। जब मुझे बाजार के दिन गाँव से लौटने में देर हो जाती है तब गांववाले बेचारे भैसा-गाड़ी में बिठाकर जंगल पार करा देते हैं। रात ज्यादा हो जाये तो जंगल का रास्ता भंसा-गाड़ी में बैठकर ही पार करना चाहिए तो कहते हैं, इससे कोई भटकी हुई रूह पीछा नहीं करती, 62 / अन्तिम चढ़ाई - रास्ता नहीं रोकती । नहीं तो रास्ते में आकर सड़ी हो जाती है।" "उस दिन देखो न, पटेल के लड़के की शादी थी, मैं चूड़ियां पहनाने उसके गांव गयी थी," साला आगे बोली, "पटेल ने जबर्दस्ती रोक लिया, रात को नेग-दस्तूर देखकर जानो। नेग-दस्तूर होते-होते काफी रात हो, गयी थी और लोटते में घना जगल पड़ता था। होगरी के किनारे-किनारे रास्ता था, जहां घेत का जगल है। पटेल ने मुझे भैसा-गाड़ी में पहुंचाया। सारे रास्ते में डरकर बैठी थी। बॅत के जंगल में जरा भी हवा चलती और सांय-सांय की आवाज होती तो बस मुझे लगता कोई औरत उठकर पीछा कर रही है। जब जगल पार हुआ तव जान-मे-जान आयो। इलिए तुम लोगों से कहती हूँ, ज्यादा मारे-मारे मत फिरा करो, इधर-उधर, समझो !" तभी सामने से दादा लाठी टेक-टेककर आते दिखे। वह शायद मस्जिद मे नमाज पढ़कर लौट रहे थे। उनके आगे-आगे गली का कुता चल रहा था, जिसे वह अपनी लाठी से खेद रहे थे, पर वह कुता भी एक ढीठ था, जाता ही नहीं था। उसकी यह आदत रोज की बन गयी थी, वह रोज दादा के साथ लौटता था। दादा उसे रोज टुकने मे से वासी रोटी का टुकडा निकालकर देते थे, बस उसी के लालच में वह माता था । खाला रोज बह- बड़ाती थी, पर दादा उसे बिना नागा रोटी का टुकड़ा हाल देते थे। "चल, मैं खाना बना रही हूं, कोई गाहक आ जाये तो तू चूडियो पहना देना," साला उसे ड्यूटी पर तैनात करती अन्दर चली गयी। उनके जाते ही तम्बाक की वह सोधी गन्ध भी चली गयी थी जो उनके मुंह से, बटा से निकलकर सारे दालान में भर गयी थी। शाईस्ता उठकर जाने लगी और उसने ओड्नी से सिर को अच्छे से ढका, दाईस्ता को विदा दी और चूड़ियो के तोड़े लाने अन्दर चली गयी। सलवार के नेफे में खोसे पांच रुपये निकालकर उसने खाला की पैसे रखने की पुरानी जग-खायो छोटी-सी सन्दूकची में डाल दिये। सन्दूकची में तीन अठन्नियां, चार चवन्नियां और कुछ चिल्लर पड़े थे। पांच का नोट रखकर उसने दस का एक सिक्का उठा लिया और चुपचाप अपनी कमीज की जेन्द्र में रख लिया। इस छोटी-मोटी चोरी को वह अपनी मेहनत समझा।
खाला को भी पता रहता, पर वह भी अनदेखा कर देती थी, क्योंकि उसके विना उनका काम भी नहीं चल पाता था। खाला को अब उसकी तरफ से पूरा इत्मीनान हो गया था। अब खाला के बाहर के ग्राहकों को वह संभाल लेती थी। हाथ चाहे कड़े हों, चाहे मुलायम, अब वह बड़े आराम से हाथों को पेचदार घुमा-घुमाकर चूड़ियां पहना देती थी। उससे चूड़ियां भी कम तड़कती थीं। खाला तो अब कहने लगी थीं, थोड़े दिनों में पूरे दुकान का भार उस पर डालकर मुसल्ला विछाकर अल्लाह को याद किया करेंगी। शाईस्ता भी अब अपने बाप की दुकान पर बैठने लगी थी। पीर साहब की दरगाह के नीचे उतरनेवाली सीढ़ी पर ही उसके बाप की इलायचीदाने और चढ़ावे की चादर की दुकान थी। मुंहअँधेरे जब दरगाह खुलती, तव शाईस्ता टुकना लेकर दरगाह में चली जाती और चढ़ाये हुए इलायचीदाने समेटकर ले जाती। उन्हें साफ करती और फिर वह दुकान में नये सिरे से विकने लगता था। जव शाईस्ता पांच साल की थी, तब से ही उसके अब्बा ने उसे इस काम में लगा दिया था, अब तो वह इस काम में माहिर हो गयी थी। मुंहोंधेरे वह दरगाह में इलायचीदाना समेटने पहुंच जाती थी, तब कोई उठा नहीं रहता था। बस, दरगाह के मुजावर जागते थे। गांव के लोगों को पता चल जाये तो लोगों की श्रद्धा ही टूट जाये। दुकान में दरगाह के और उसके बावा का आधा-आधा शेयर होता था। रोज वही चादरें चढ़तीं, रात को वही चादरें उतारकर वापस दुकान में पहुंचा दी जातीं। यह सारा काम बहुत सफाई से होता। कोई जानता नहीं था, जो जान भी लेता तो अपनी जुवान बन्द रखता। धर्म के कामों में बोलकर कौन अपने सिर गुनाह लिखाये ? , "जेवा वेटी जा, नुक्कड़वाली दुकान से टाइम पूछ आ," दादा दालान पर वैठते थके-से बोले। "दादा, अभी तोखाला दुकान पर बैठाकर गयी हैं, आयेंगी तो डाँटेंगी," चूड़ियों के तोड़े खोलकर छांट-छांटकर छोटी-बड़ी चूड़ियां अलग करते हुए वह बोली, "रमजान का आखिरी जुमा है, औरतें चूड़ियाँ पहनने आती-जाती 64/ अन्तिम चढ़ाई रहती हैं न!" "जा, रानी बेटी है न," दादा ने खुगामद-भरे लहजे में कहा, फिर अपनी अचकन से दस का सिक्का निकालकर उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोले, "ले, जा, रास्ते में बिस्कुट खा लेना।" दम का सिक्का देखकर उसने फली, विखरी चूड़ियों को जल्दी-जल्दी बांधना शुरू किया और एक बार मुडकर अन्दर झांका। साला आस-पास नहीं दिखी। उसने सिर का दुपट्टा ठीक किया और दादा के हाथ से दस का सिक्का ले लिया। "लाओं, अब इतना कह रहे हो तो पूछकर आती हूँ, पर तब तक तुम दुकान पर रहना, कोई गाहक आये तो रोककर रखना।" "हाँ, हाँ, रोककर रस्तूंगा, पर देष तू टाइम पूछकर सपाटे से आ," दादा ने प्यार मे उसके सिर पर हाथ फेरा, "रानी बेटी है, बात मान लेती है, जा!" यह नोचे पत्थरवाली गली में उतर गयो । दादा ज्यो-ज्यों बूढे होते जा रहे हैं, मठियाते जा रहे हैं। मिलिट्री से रिटायर क्या हुए हैं, जमे सबकी जान आफत में है । बार-बार समय पूछने भेजते रहते हैं । घडी भी बस एक वह नुक्कादवाली परचून की दुकान पर ही है। परचूनिया उसे देखते ही एक यांस दबाकर बेशर्मी से मसखरी करता है, "रानी के लिए पड़ी शहर से ला दूंगा, फिर रोज-रोज टाइम देखना।" यह बन्नो आपा की सूनी दहलीज पर थोड़ी देर बैठी उनको चरती चत्तखो को देखती रही, फिर चुपचाप घर लौट आयी और बड़े ही सजीदा अन्दाज मे अपने मन से झूठ-मूठ बोली, "दादा, तीन बज गये. "तीन !" "क्या, तीन बज गये ?" दादा एकदम सतर्क हुए, "वकत भी कितनी तेजी में चला जाता है !" "कोई गाहक आया?" साला नहाकर आयौ थी, उनके हाथ में देर- सारे निचोड़े गीले कपडे थे, जिनको उन्होने बांस के अहाते पर फैला दिया। "नहीं खाला, अभी तो कोई नहीं आया," उसने लाल चूड़ियों को 'निहारा, जिन पर लाल-सुनहरे छोटे थे। ये यास चूड़ियां थी। इन्हें साला नयी-नयी व्याही दुल्हनों को पहनाती थी। एक बार उसने भी जिद पकड़ी पत्थरवाली गली/65.
थी पहनने के लिए, तो खाला ने डांट दिया था, "अभी नहीं, शादी में पहनना, तेरी गोरी-गोरी भरी कलाइयों में खूब खिलेंगी ये लाल बूड़ियाँ !" की दुकान शाम को वह शाईस्ता के घर से लौट रही थी। उसके हाथ में लालटेन थी, जो वह ठीक कराने ले गयी थी। शाम वस ढलने को ही थी । वह तेज-तेज कदम बढ़ाती घर की ओर बढ़ने लगी। सामने देखा-दादा लाठी के सहारे गर्म खाकी मिलिट्रीवाला कोट पहनकर जा रहे थे, जिसकी पीतल की बटन आज भी चमकती थी। दादा के इस कोट पर कितनों के हाथों की सिलाई थी-अम्मा, खाला, और खुद उसके अनाड़ी हाथों की। सिर पर मफलर लपेटे वह धीरे-धीरे पैर घसीटते जा रहे थे। "दादा, अंधेरा होने को है, तुम कहाँ जा रहे हो ?" उसने लपककर उन तक पहुंचते हुए पूछा। "अरे जेवा, तू कहाँ गयी थी वेटी? बस ज़रा नुक्कड़ में समय पूछने जा रहा था।" "फिर वहीं...?" वह चौंकी, "तुम्हें मालूम है न, वह पच्चीसों मर्तबा तुम्हें कुत्ते-सा दुत्कार चुका है, फिर वहीं टाइम पूछने जा रहे हो।" "क्या करूं वेटी, समय जानने की बुरी आदत पड़ गयी है, जाती नहीं। और किसी पहचानवाले के पास घड़ी भी तो नहीं।" "मगर वह दुकानदार तुम्हें देखते ही चिढ़ता है, क्यों जाते हो उसके पास बार-बार ?" "अच्छा ले, तू कहती है तो नहीं जाता," दादा लाठी को हाथ में रखे वहीं खड़े हो गये, "यहीं खड़ा रहकर किसी दूधवाले का रास्ता देख लेता हूँ, आजकल सव दूधवाले घड़ी बांधते हैं।" "तुम चलो तो..." उसने अनुमान से सोचकर समय बताया, "अभी छः बजा होगा।" "नहीं, तू बहलाती है," दादा हैंसे, "समय हमेशा सही बताना और जानना चाहिए।" दादा आंख का कीचड़ साफ करते हुए बोले, "मैं यहीं खड़ा रहता हूँ, तू जा।" - - - 66/अन्तिम चढ़ाई - "नहीं, तुम घर चलो, में समय पूछकर आती हूँ।" दादा को उसने वापस भेज दिया। उनको समय पूछने की इस आदत मे मोहल्ले के सारे लोग तग थे। हर बाधे-पौन घण्टे के बाद वह समय पूछने किसी के भी घर पहुंच जाते। कोईयदि गलत ममय बताकर टालना चाहता तो तुरन्त समझ जाते और दूसरी जगह टाइम पूछने चले जाते। दादा नौकरी में थे तो समय को पाबन्दी के लिए मगहूर थे। बड़े-बड़े साहब तक इस बात के लिए दादा की इज्जत करते थे-समय के और बात के पक्के । बडे साहब नाम के चार बजे सडक पर मे गुजरनेवाले हैं, और दादा की ड्यूटी लगी हुई है, फिर तो सारे लोगों को शामत आ जाती । सुद ग्यारह बजे से डटे हैं और मवको लगा रखा है। बडे साहब को गाडीमाम के चार बजे के बजाय रात के ग्यारह बजे मडक कोंस करती और वः अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते । वह घूप में, वारिश मे, ठण्ड में, भूसे-प्याने सई रहले और सबको बडा रखते । समय की पावन्दी मे ही वह अपने मारे दैनिक काम करते थे। आज भी अगर पता चल जाये कि सात बज गये हैं नो वह चाय नहीं पीते। सव मना-मनाकर थक जाते हैं, पर वह यही कहते हैं, "चाय का टाइम निकल गया।" नुवाड़ की दुकानवाला दादा को कई बार झिडक चुका है। उस दिन तो उसने चिल्लाकर कहा था, "दादा, काहे को टाइम पूछ-पूछकर मग खाते हो, अभी तुम्हारी मौत में बहुत टाइम है।" दादा झिडकी साकर, मुंह लटकाकर लौट आये थे। उस दिन में उसकी दुकान पर नहीं जाते, बस उसी की खुशामद करते हैं, और वह भी उसकी दुकान पर जाने में काफी कतराने लगी है। एक दिन भर-दोपहर मे दादा ने उसे समय पूछने भेजा था। उस दिन दुकानदार दुकान पर न बैठकर भीतर घर मे था। उसने भीतर झांका तो वह दीवार पर गड़े नाईने में देख-देखकर बाल संवार रहा था। "आओ रानीजी," दुकानदार ने आईने में ही उसे देस लिया था, और वाल संवारते-संवारते मुस्कराया था। "दादा ने पूछा है टाइम कितना हुआ है ?" उसने भीतर मारते हुए पूछा। दीवार पर बड़ी-बड़ी रंगीन तस्वीरें टंगी चो, मोहर, जान पत्थरवालो परी।
महिलाओं की। "भीतर आकर बैठ, बताता हूँ।" दुकानदार बोला। वह रंगीन तस्वीरें देखती मुग्ध-भाव से भीतर कोठरी में चली गयी थी। दुकानदार मौके की तलाश में था ही, उसने लपककर दरवाजे की कुण्डी चढ़ा दी और उसे पकड़ लिया। उसने भयभीत होकर दुकानदार को देखा और घवराई-सी छटपटाती दौड़ने लगी, छीनाझपटी में उसकी सारी ड़ियाँ भी टूट गयीं। आखिर वह दरवाजे की कुण्डी खोलने में सफल हो गयी और भाग खड़ी हुई। उस दिन के बाद उसने उसके घर का रुख नहीं किया। उसने यह बात दादा और खाला से छुपा ली, क्योंकि सुनते ही दादा लड़ने के लिए दुकान- दार के पास पहुंच जाते और दुकानदार उनके बुढ़ापे का खूब मजाक उड़ाता। उस दिन से दादा टाइम पूछने भेजते तो वह आधे रास्ते से ही 'लौट आती और अन्दाज से जो मन में आता समय बता देती। दादा को भी तसल्ली हो जाती और वह निश्चिन्त होकर दूसरे काम में लग जाते। - . 'पत्यरवाली गली। वह भी दादा की ही तरह पुरानी थी, जिसमें बड़े-बड़े, गोल-गोल पत्थर थे। पता नहीं ये पत्थर यहां कौन विछा गया था। उन पर १ ठीक-से चलते भी नहीं बनता था, पैर में चुभ-चुभ जाते थे। वैलगाड़ी भी 'बड़ी मुश्किल से निकलकर आती थी। दादा कहते हैं, उनकी नानी के जमाने में यहाँ नदी का घाट था । नदी का बहाव भी इधर ही था। फिर पता नहीं कैसे नदी ने अपने-आप अपना रुख मोड़ लिया। सबसे पहले यहां एक साधु ने कुटिया डाली थी, उसके पास एक कुत्ता था। कई वर्ष के बाद साधु चला गया। कुत्ता वहीं छूट गया। फिर कुछ लोग बाढ़ से घर-बार छोड़कर इधर भटककर आये और उन्होंने अपने वसेरे यहां डाल लिये। धीरे-धीरे घर बड़े, मोहल्ला हुआ। फिर गांव बस गया। पत्थरों को जोड़-जोड़कर लोगों ने घर बना लिये, पर यह गली वैसी ही पड़ी रही, जिस पर दौड़ते भी नहीं बनता था। गाँव की यही मुख्य गली थी। इसी से होकर सारे लोग, औरत, मर्द, बच्चे, गाय, भैंस, बकरी आते-जाते थे। जब वह छोटी थी तब बार- - •68/ अन्तिम चढ़ाई बार गिर जाती थी दौड़ते हुए ! भारी मोच आ जाती थी, तब उमे गुम्गा आ जाता था। वह दादा से शिकायत करतो तो दादा हैसकर बोलने, "at, अच्छी तो है पत्थरवाली गली | आसानी से कोई चोर नही या माता और. कोई चुपचाप भाग नहीं सकता। रात के अंधेरे में कोई भी चले तो नही आवाज साफ घरो के अन्दर तक सुनायो देती है।" छोटा-सा गाँव ! चरती मुगियां, धूमते सूअर, कंचीयेलने दचं, यह सी बकरियां, बत्तखें और कबूतर, यही इन लोगो की दौलन यी, जर थी और यही कुछ पुरानी पीढ़ी, नयी पीढ़ी के लिए वमीयत में छोटी थी। सुबह की धुन्ध चारों तरफ फैली रहती, जिममें दूर-दूर धुंधला जाता। दो मुगियो सामने की खपरैल की पर दही और को मटका-मटकाकर इधर-उधर चौकन्नी-सी हिला रहा और देनी हैरान हों कि आस-पास की चहल-पहल नगर का नहीं करें गली मे चरती एक मुर्गों गर्दन तानकर सर नहीं छटर ॐों को निहार रही थी। शिकायत, उलाहने ने भरै माद चट्टोनमें मैं कह रही हो, 'टहरो, बताती हूं। कहाँ चट्टी हो, रायकेलनमा गयी?' धूप का पहला टुकड़ाशाईस्ताको खुला छोरिल्ला या दुक धूप का सेंक लेने सारा मोहल्ला कहीं-न-कहीं में पाया जुन्दामा कहें तो ज्यादा ठीक होगा कि बाड़े के दिन की बात माईल की काय से ही शुरू होती थी। वही जाना-पहचाना रोजदालादाय !दान कहे, रिटे। कोई मुंह धोकर सूरज को प्रगान कर रहा है। कई के मानकानी बांधे नन्हें बच्चे । नन्हीं बच्चियों का झुण्ड, नर के कदद पहने जाने की तयारी में बाता डा। जवान लड़कियों का झुण्ड धेि को दोबार डिका माय की दोस्तों की चाली दनादा रहता कि कौन रान महर ने सिनेमा देखकर बाबी है, किमने किन साना ने नाड़ी मांगने पहनने के लिए या किसने किया मिनेना के लिए उधार पैले मणि, महर से लौटने पर किस-किमको इन्दा की डांट पड़ी, व्हर में किसको लड़को ने छेड़ा, कौन पत्थरवाली गली चोरी से अपने प्रेमी से मिलने गयी, आदि ढेर वातों को गर्मी रहती, जिससे जाड़े की सुबह और गर्म हो उठती। बड़ी लड़कियों की बातें सुनती छोटी लड़कियां होती, जो आधी बात समझ पाती और आधी नहीं। फिर उसमें अपनी तरफ से, अपनी अकल से बढ़ा-चढ़ाकर अपने दोस्तों को सुनाती रहतीं। रामू काका के घर की सूअरनी ने दस वच्चे जने थे, जो अब इस लायक हो गये थे कि मां के साथ मोहल्ले में घूमें । इसलिए उन्हें खोल दिया जाता था। सूअरनी के साथ उसके बच्चे ची-चों चिल्लाते पत्थरवाली गली में घूमते फिरते। जहां उन्हें भूख लगती, वहीं सूबरनी पर आक्रमण करते, लगभग उसे गिरा-सा देते और उसके थनों पर टूट पड़ते। सूअरनी करवट लेटी रहती और बच्चे शोर करते उसके थन चूसते रहते। उसे अपने अब्बा की ठीक से याद नहीं, क्योंकि वह घर पर ज्यादा नहीं रहते थे। दादा का नाम रियासत हुसैन तथा अव्वा का नाम दमदार हुसैन था। अम्मा का नाम बुटू था और खाला का अनार। अब्बा पक्के जुआरी और शराबी थे । अफीम की तस्करी उनका धन्धा था। रोज रात वह ट्रेन के साथ आते और उसी ट्रेन से लौट जाते। रोज रात चारह बजे मानेवाली ट्रेन पर चढ़ जाते और दूसरे स्टेशन पर नाले के पास कूद जाते । बस, इतना ही काम था, जिसका उन्हें ढेर-ढेर पैसा मिलता था। ट्रेन से माल आता और बीच में ही माल गायब कर दिया जाता। कभी पुलिस पीछे लगतीतो वह शहर बदल लेते। सारी उम्र ही गली-गली भटकते हुए गुजारी थी। अब्बा के इस काम से दादा काफी दुखी रहते थे। अफीम की तस्करी से लेकर चावल की तस्करी तक करते थे। एक रात वह घर आये तो उनके साथ उनका दोस्त भी था। अम्मा ने दोनों के लिए खाना बनाया। बोरों के पीछे रखी वोतल भी लाकर दी। दोनों रात-गये तक खाते- पीते और तेज-तेज बातें करते रहे। अम्मा पास की ही जमीन पर सो रही थीं, वह भी उनके साथ सो रही थी। अब्वा शराब के नशे में अपने दोस्त से चोले, "मेरी हर चीज में तुम्हारा हिस्सा है। यहां तक कि मेरी बीवी में भी - 70/ अन्तिम चढ़ाई .."हम दिन वाट लेंगे, जब मैं बाहर रहे तो तुम यहाँ रहो, जब तुम बाहर रहो तो मैं इसके साथ रहूंगा।" अम्मा ने घबराकर अपनी बात भीष ली थी। अम्मा घर पर चड़ी देवने का काम करती थी। दादा तब मिनिटे रिटायर नहीं हुए थे। अम्बा का वह दोस्त गोले देहवाला नोह मया। वह घर पर अक्सर आने लगा। जब भी वह ज्ञाता, अन्ना के लिए जी- अच्छी चीज लाता और उसके लिए देर-ढेर सिलौने । परिवार बन्न उससे बहुत हिल-मिल गयी। कुछ ही महीने में अम्मा को पता चला कि वह मां बननेवाली हैं। अन्धा तस्करी के धन्धे में काले दिनों में नैन। जब वह लौटे तो उन्हें पता चला। उस रात वह बहुत गुले में,नहन उस दिन खूब सराव पी और अम्मा की खूब पिटाई की। "सुन री हिनाल औरत, तूने मेरे माय घोखा किया, हंद मैना नतीजा जल्दी ही मुगत लेगी । तूने मेरी नस्ल सराद कर दी।" बच्चा जन्म से आगबबूला हो उठे, "औरत की जात साली मुर्गों को बात है, तर सो दिन वांध दो, दाना दे दो, वह उसी का आँगन पहचानने नदी है। अम्बा गये तो फिर लौटकर नहीं आये। दादा मिलिट्री में पंदन देकर आ गये थे। अब्बा का दोस्त घर पर बराबर माता-बातामा बना दुकान पर भी नहीं बैठती थीं। दुकान को गिरती हुई नव नमें अपने कन्धे दे दिये थे, अब उन्होंने ही दुकान पूरी तरह नगर। अन्दा पर नहीं आते थे, पर उनकी सबर मिल जाती भी अपकन उन्होंने तस्करी का धन्धा छोड दिया है और इंट बनाने का टेकर है। शहर में एक औरत भी रख ली है। औरत बाल-दिवा है, चिकनी देहवाली। शराब पी-पीकर बया का क्या करना छलनी हो गया है। एकदिन पुलिस पर आयी और दादा से बोली, "चर बुरे, की लारा पहचान नै! दादा बाहर गये, फिर दो-तीन दिन बाद सबा का कन-दन कर लौटे। बया के दोस्तों ने धन्धा छोड़ देने की दुश्मनों उन निशान, और शराब में जहर मिलाकर पिना दिया था। यथारा ददैन को अपने घर ले गया। अम्मा अपने कपड़ों की गठरी उठाये, इसी पत्थर- वाली गली से उसके पीछे चुपचाप चली गयी थीं। उनके चलने की आहट से दादा लालटेन लेकर बरसती रात में वाहर तक गये थे। गली में कुत्ते भौंकने लगे थे। सूअर दड़वों में कसमसाने लगे थे। मुर्गियां अपने-अपने दड़बों में करवट बदलकर पंख फटफटाने लगी थीं, जैसे सव सतर्क होकर पूछ रही हों-कौन कौन जा रहा है ? दादा लालटेन लेकर नदी तक उनका पीछा करते रहे थे, फिर हारे हुए-से इसी ऊबड़-खाबड़ गली से संभल-संभलकर लौट आये थे। उस बरसाती रात में पहली बार अब्बा को याद करके चिल्ला-चिल्लाकर रोये थे। कहते हैं भारी-से-भारी दुख और नदी के बाढ़ का पानी एक-न-एक दिन उतरता है। बस, उसी तरह धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया। उसे अम्मा की याद ज्यादा नहीं आती थी, पर अम्मा का गाया दादरा खूब याद आता था। अम्मा की आवाज बड़ी सुरीली थी। अक्सर वह दोपहर को गुदड़ी सिलते-सिलते, चूड़ियाँ पहनाते-पहनाते बरसाती दोपहरिया में दादरा गाया करती थीं.- टोपीवाला सिपहिया मैं साथ चलूंगी जी तुम चलोगे दुकान, तो मैं भी साथ चलूंगी जी तुम चलोगे वाजार, तो मैं भी साथ आऊँगी जी टोपीवाला सिपहिया." तुम खरीदोगे सौदा, मैं मोल करूंगी जी तुम जाओगे परदेस, तो मैं भी आऊँगी जी तुम करोगे कचहरी, तो मैं जाँच करूँगी जी टोपीवाला सिपहिया.
में एक बहुत बड़े दीवान थे, जो बहुत पैसेवाले थे। उनके घर कितना पैसा है, किसी को पता नहीं था। पर हर साल मे एक वार घरवालों की निगरानी मे, यानी खुद दीवान साहब की निगरानी मे बडा-सा लोहे का सन्दूक सोला जाता था, और पक्के सौमेण्ट के आंगन मे नोटों के वण्डली को सावन की धूप दिखायी जाती थी, ताकि दीमक वगैरह न लगने पाये। बड़े-से आँगन में नोटों के वण्डल फैला दिये जाते थे, फिर उन्हें ज्यों-का-त्यो वापस लोहे के सन्दूक मे रख दिया जाता था। जिस दिन नोट सुरवाये जाते थे, उस दिन वाहर के किसी परिन्दे को भी फटकने की इजाजत नहीं थी। उन्ही दीवान साहब की एक लड़की थी जो आधी पागल थी। उस लडकी के लिए दो नौकर तैनात रहते थे, जो उसे स्कूल ले जाते थे, और वहां उसका मन न लगता तो उसे लौटा लाते थे। घर आकर वह योडी देर मे फिर स्कूल जाने की जिद करती तो फिर उमे स्कूल ले जाते । बस, इसी तरह सारा दिन कटता या उसका नौकरी के साथ । दीवान की लडकी थी, इसलिए मास्टर बहुत घबराते थे। कभी उससे कोई प्रश्न नही करते थे, उसकी परीक्षा नहीं ली जाती थी, और फिर भी उसे पहले नम्बर से पाम कर दिया जाता था। उसके लिए स्कूल तफरीह की जगह थी। जब तक मन करता बैठती, जब मन ऊब जाता लौट आती। इसी प्रकार दादा बताते हैं इस मोहल्ले के अपने पुराने दोस्तो के बारे में कि उनका एक दोस्त था जो बड़ा ही दमदार आदमी था। तहमद वांधे, कन्धे पर गमछा रखे, सिर पर चुमडी बनाकर नमक रखकर बेचता फिरता या। उसकी औरत घर-घर आटा पीसने, दाल दलने जाती थी। धीरे-धीरे पंसा जुडा और उसने अपने लिए जमीन खरीदी। जब मकान बनाने के लिए खुदाई का काम शुरू हुआ तो बरगद के पेड के पास बड़ी-सी एक गुण्ड मिली थी, जिसमें पुराने जमाने के असली चांदी के रुपये थे। तभी से उनके घर दोख सद् का वास हो गया। कहते हैं, जिसके घर उनका वास होता है, पैसों की बरसात होती है। पर घर की पहली बौलाद इनकी खुराक हो जाती है। जिनके घर शेख स होते हैं, उनके घर पर वृहस्पतिवार को गुड़ के गुलगुले बनते हैं। कढाई से गुलगुले निकालने में चम्मच का इस्तेमाल नहीं करते, गर्म-गर्म तेल में हाथ डालकर गुलगुले छानते हैं। दादा के दोस्त के पत्थरवाली गली/73 घर पैसा-ही-पंसा था, सोना-ही-सोना, पर इनके घर में पहला जो वच्चा होता था, वह मर जाता, यानी शेख सदू को भेंट चढ़ जाता था। आखिर में तंग आकर उन्होंने उसे अपने घर से निकालने का उपाय सोचा। दुश्मन से उन्होंने बदला लिया। उनका एक दोस्त भीतर-ही-भीतर उनकी जड़ें खोदता था। उन्होंने उसे घर खाना खाने वुलवाया और जाते समय वही गड़े हुए चांदी के पांच सिक्के उसे मेंट करके शेख सद् को उसके साथ विदा कर दिया। शेख सदू के जाने के बाद उनके घर वाल-बच्चे होने लगे। दादा बताते हैं, पहले जमाने में शेख सदू बहुत बड़ा धनी सेठ था। हमेशा मैला-कुचैला रहता। औरतों के साथ ऐश करना ही उसका मुख्य काम था। मरने के बाद आज भी उसकी आत्मा भटक रही है। इसी प्रकार दादा न जाने कितने किस्से बताया करते हैं ! उन्हें हर घर की बातें दादा बताते हैं मस्जिद के मौलवी साहब के घर में जिन्नात का वास है। घर के अन्दर छोटी-सी मस्जिद में जिन्नात रहते हैं। रोज मौलवी साहब के साथ नमाज पढ़ते हैं, किसी को तंग नहीं करते। बस, हर जुमेरात को खिचड़ी पकाकर नयी सनकी में उन्हें खाना दे दिया जाता है। इसी प्रकार उनके छोटे भाई के घर नापाक जिन्नात हैं । मौलाना की तीन बीवियां हैं । हर जुमेरात को एक-एक वीवी के कमरे को नापाक जिन्न खटखटाता है और रात उसी की खाट पर गुजारता है। . मालूम हैं। । दादा इधर काफी बूढ़े हो चले हैं। उनकी दमे की बीमारी बढ़ती जा रही थी। मोतियाविन्द आँख की रोशनी को खा गया था, जैसे आँख को ग्रहण लग गया हो। अव वे ज्यादातर खाट पर ही लेटे रहते, फिर भी पुरानी आदत उन्हें चैन नहीं लेने देती थी। वे थोड़ी-थोड़ी देर में टटोलते हुए बाहर निकल पड़ते टाइम पूछने के लिए। दादा कहते हैं कि उसकी वढ़िया जगह शादी कर देंगे। खाला ने पुराने जमाने के चांदी के सिक्कों को अन्दर के कमरे की दहलीज पर गाड़कर रखा है। यह वात घर के लोगों के सिवा कोई नहीं जानता। ये रुपये उसकी शादी 74/अन्तिम चढ़ाई के लिए रखे गये हैं। मौलाना के छोटे बेटे के लिए उसकी बात आयी थी, पर दादा ने मना कर दिया । दादा कहते हैं जिन्नातों के घर में अपनी बेटी नहीं देंगे। पोछे आंगन में एक पीपल का पेड या। दादा कहते हैं, जब वह छोटे थे, तब उन्होंने ही उसे लगाया था। पीपल के पेड़ के तने से पीछे घर की दीवार भमकने लगी थी, जिस वजह से दादा ने उस पेड़ कटवा दिया। तव में ही मारे लोग कहने लगे हैं कि पीपल का पेड़ कटवाना अपशकुन होता है। पर दादा बेचारे क्या करते ? अव गिरे हुए घर को उठानेवाला फोन रह गया था? बस, साला की चूड़ियो की दुकान से ही घर का पर्ष चलता था। चूडियो भी रोज-रोज पहनने कौन आता है, त्योहारो पर ही औरतें चूड़ियां पहनने आती थी। आंगन के कोने में कच्ची देशी हल्दी का पेड़ था। कुन्दरु की वेल पूरे मंडवे पर फैल गयी थी, जिसमे छोटे-छोटे कुन्दर लगे थे, जो देखने से बड़े ही भले लगते थे। वह छोटे टोलेवाले मौलाना को जच्चा बहू को चूड़ियां पहनाकर लौट रही थी। आज वह बहुत सुदा थी, क्योकि मौलाना की बहू ने उसे नयी कडाई की हुई बोढ़नी दी थी। लौटने में देर हो गयी। वह जल्दी-जल्दी चलने लगी। रास्ते का कुछ हिस्सा सूने जगल से पड़ता था। उसके हाथ मे चूड़ियों का तोडा या, जिसे पकडे वह लौट रही थी। शाम जगल के रास्ते में उतर आयी थी। वह तेज-तेज कदम बढ़ाती चलने लगी कि उसने अचानक देखा, सामने वही नुक्कड़वाला दुकानदार साइकिल पर शहर जा रहा है। उसे देखते ही वह सहम-सी गयी और झट से पेड़ की आड में हो गयी, पर दुकानदार ने उसे देख लिया था। वह साइकिल से नीचे उतरा और साइकिल को पेड़ से टिकाकर उसकी ओर बढा और उसे पकड़ लिया। वह बहुत छटपटायी, चिल्लायी, उसके हाथ में चूड़ियो का जो तोड़ा था, वह पेड़ से टकरा गया और चूड़ियां टूटकर दिसर गयो। कोषको सारी चूड़ियां उसकी टूटी इज्जत की तरह टूट गयो थी। साला कहती। पत्यरयाली गली।
घर पैसा-ही-पैसा था, सोना-ही-सोना, पर इनके घर में पहला जो बच्चा होता था, वह मर जाता, यानी शेख सदू को भेंट चढ़ जाता था। आखिर में तंग आकर उन्होंने उसे अपने घर से निकालने का उपाय सोचा। दुश्मन से उन्होंने बदला लिया। उनका एक दोस्त भीतर-ही-भीतर उनकी जड़ें खोदता था। उन्होंने उसे घर खाना खाने बुलवाया और जाते समय वही गड़े हुए चांदी के पांच सिक्के उसे भेंट करके शेख सद् को उसके साथ विदा कर दिया। शेख सदू के जाने के बाद उनके घर वाल-बच्चे होने लगे। दादा बताते हैं, पहले जमाने में शेख सदू बहुत बड़ा धनी सेठ था। हमेशा मेला-कुचैला रहता। औरतों के साथ ऐश करना ही उसका मुख्य काम था। मरने के बाद आज भी उसकी आत्मा भटक रही है। इसी प्रकार दादा न जाने कितने किस्से बताया करते हैं ! उन्हें हर घर की बातें मालूम है। दादा बताते हैं मस्जिद के मौलवी साहब के घर में जिन्नात का वास है। घर के अन्दर छोटी-सी मस्जिद में जिन्नात रहते हैं। रोज मौलवी साहब के साथ नमाज पढ़ते हैं, किसी को तंग नहीं करते। वस, हर जुमेरात को खिचड़ी पकाकर नयी सनकी में उन्हें खाना दे दिया जाता है। इसी प्रकार उनके छोटे भाई के घर नापाक जिन्नात हैं। मौलाना की तीन बीवियाँ हैं । हर जुमेरात को एक-एक बीवी के कमरे को नापाक जिन्न खटखटाता है और रात उसी की खाट पर गुजारता है । दादा इधर काफी बूढ़े हो चले हैं। उनकी दमे की बीमारी बढ़ती जा रही थी। मोतियाविन्द आँख की रोशनी को खा गया था, जैसे आँख को ग्रहण लग गया हो। अब वे ज्यादातर खाट पर ही लेटे रहते, फिर भी पुरानी आदत उन्हें चैन नहीं लेने देती थी। वे थोड़ी-थोड़ी देर में टटोलते हुए बाहर निकल पड़ते टाइम पूछने के लिए। दादा कहते हैं कि उसकी बढ़िया जगह शादी कर देंगे। खाला ने पुराने जमाने के चांदी के सिक्कों को अन्दर के कमरे की दहलीज पर गाड़कर रखा है। यह बात घर के लोगों के सिवा कोई नहीं जानता। ये रुपये उसकी शादी 74/ अन्तिम चढ़ाई के लिए रखे गये हैं। मौलाना के छोटे बेटे के लिए उसकी यात आयी थी, पर दादा ने मना कर दिया। दादा कहते हैं जिन्नातों के पर में अपनी बेटी नहीं देंगे। पोछे आँगन में एक पीपल का पेह था। दादा महते हैं, जब यह छोटे थे, तब उन्होने ही उसे लगाया था। पीपल के पेड़ के तने से पीपे पर पी दीवार भसकने लगी थी, जिस वजह से दादा ने उस पेड़ को फटया दिया। तब में ही सारे लोग कहने लगे हैं कि पीपल का पेड फटवाना अपशकुन होता है। पर दादा बेचारे क्या करते ? अव गिरे हुए घर को उठानेयाला फोन रह गया था? बस, खाला की चूड़ियों की दुकान रोही पर का यां पलता था। चूडियो भी रोज-रोज पहनने फोन आता है, त्योहारों पर ही औरों चूडियां पहनने आती थी। आंगन के कोने मे कच्ची देवी हल्दी का पेड़ पा। कुन्दरु की वेल पूरे मंडवे पर फैल गयी थी, जिसमे छोटे-छोटे गुन्दर लगे थे, जो देखने से बड़े ही भले लगते थे। वह छोटे टोलेवाले मौलाना की जच्चा बहू को चूड़ियाँ पहनाकर सीट रही थी। आज वह बहुत खुश थी, क्योंकि मौलाना की बहू ने उगे गयी कदाई की हुई मोढ़नी दी थी। लौटने में देर हो गयी। यह जरदी-जल्दी घलने लगी। रास्ते का कुछ हिस्सा सूने जंगल से पड़ता था। उसके हाथ में चूडियों का तोटा था, जिसे पकडे यह मौट रही थी। शाम जगल के रास्ते में उतर आयी थी। यह तेज-नेज कदम बढ़ाती घलने लगी कि उसने अचानक देखा, सामने वही नुवाड़वाला दुकानदार मा.पिन पर शहर जा रहा है। उसे देखते ही वह सहम-सी गयी और मट-गे पेड़ की बार में हो गयी पर दुकानदार ने उसे देख लिया था। वह माइकिल में नीचे उतरा और साइकिल को पेड़ में टिकाकर उसकी मोर वहा और मे परर लिया। वह बहुत छटपटायी, चिल्लायी, उसके हाथ में दियां का नोट था, वह पेड़ से टकरा गया और चुडियां टूटकर बिगर गयी। परी सारी चूड़ियां उसकी टूटी इज्जत की तरह टूट गयी थीं। गाला रहती हैं पत्यावारी औरत की इज्जत सावुत चूड़ी की तरह है, यदि एक वार टूटी तो फिर टूटती ही चली जाती है। उस वीरान जंगल में सिवा लौटते पक्षियों के कोई दूसरा उसकी गुहार सुननेवाला नहीं था। रात-गये जब वह घर लौटी तव दादा लालटेन जलाकर सामने बैठे. उसका रास्ता देख रहे थे । खाला दरांती से बड़ा-सा कटहल काट रही थीं। वह जमीन पर दादा के पास बैठ गयी और फूट-फूटकर रोने लगी। खाला हैरान होकर उसके पास आ गयीं। उसने रो-रोकर सारी बात बतायी। दादा गुस्से से तनतना उठे, जैसे अलार्म घड़ी वज उठी हो। रात वह सो. नहीं पायी थी, उसने देखा दादा भी सारी रात अपनी खाट पर बैठे रहे। दीये के उजाले में उनका साया लम्बा होता दीवार तक खिंच गया था। - - सुबह जब सूरज टहल-टहलकर अपने माने का ऐलान सारे मोहल्ले में कर रहा था, तव खाला ने रो-रोकर उसे उठाया, "जेवा उठ, देख तेरे बाबा को क्या हो गया!" उसने नींद से चौंककर आँखें खोली और भयभीत आँखों से साला को देखा, फिर दादा की ओर तिर घुमाया। दादा कोने में गठरी वने लुढ़के पड़े थे-विल्कुल बन्द घड़ी की तरह। सामने का दरवाजा खुला था। नीचे-नीचे उतरती पत्यरवाली गली थी। उसने डबडवाई आँखों से देखा। अब इस पर कौन उतरकर आया-जाया करेगा? 76/ अन्तिम चढ़ाई जमाना बदल गया है गली के दोराहे पर बनी उस तीन-मंजिला हवेलो को मटमैली पीली रगत को देखते ही मन प्रसन्नता से किलक उठा । मन में एक हूक-सी उठी। यह पर जिसमे उसका बचपना पला था, यहीं उसने उन की उस सरहद को छुआ था जिसे छूते ही मन में ढेर-सारो तरगें उठती हैं, आँसो में इन्द्र-धनुपी रग छा जाते हैं। आज वही घर अजनबी, चुप-सा लगा। उसकी दीवारें, जो पहले हमेशा ड्यूटी पर तैनात सिपाही को वर्दी की तरह धमकती रहती थी, आज मटमैली होकर धूल खा रही थी। तांगा जैसे ही घर के सामने रुका, बदरी काका सामने बगीचे मे दिस गये। उनके हाथ में कैची थी, वह गेट पर दोडे-से आये, "बिटिया आ गयी, बिटिया आ गयी..." उनकी लम्बी गुहार सुनते ही सामने के हॉल से बाबूजी जल्दी-जल्दी योख का चश्मा ठीक करते, लगभग दौड़ते-से बाहर आये। "अरे वैटा, तार क्यो नही कर दिया, कोई स्टेशन पर लेने आ जाता!" चाबूजी तेजी से उसके निकट आये और ममता से उसके सर पर हाथ फेरने हुए बोले । हड़बड़ी मे उन्हे ध्यान ही नहीं रहा था कि उनकी आँख भर आयी है । जैसे ही उन्हें इस बात का ध्यान आया, उन्होंने तुरन्त अपने पर काबू किया। उसने पहली ही नजर मे ताड़ लिया कि बापूजी उम्र मे ज्याद बूढ़े लगने लगे हैं। --- जमाना बदल गया।
"बदरी काका, अब तो तुम वाकई बूढ़े हो गये हो," उसने कहा और वावूजी के साथ अन्दर की ओर बढ़ गयी। मौत का घर जो विचित्र सन्नाटे और सूनेपन से सहमा हुआ-सा था, लगा थोड़ी देर के लिए प्रसन्नता से भर गया है। नानीमाँ के विना वह घर कितना विचित्र लग रहा था ! सारी हवेली में वही एक थीं जो तेज बोला करती थीं, और आज उनका न होना मन को किस बुरी तरह पोट रहा था। घर के सारे लोग इकट्ठे हो गये थे। आंगन में छत तक चढ़ी चमेली खूब- खूब फूल आयी थी, जिसकी महक से सारा घर भरा हुआ था। पूरे घर में वस चमेली ही थी जो आज भी उसी तरह महक रही थी, चहक रही थी। पूजा की थाली हाथ में लिये मां आती दिखीं, तो वह चौंक पड़ी। उसे आश्चर्य हुआ, धक्का-सा लगा। मां इतनी जल्दी इतनी बूढ़ी कैसे दिखने लगीं ! मां के आते ही धूप-अगरबत्ती और घी की सुगन्ध वातावरण में रच- बस गयी, जो उनकी पूजा की थाली से उठ रही थी। उस महक के पास आते ही वह उठकर खड़ी हो गयी एकदम से 'इत्ते-इत्ते वर्ष बाहर रहने से भी बचपन के संस्कार गये नहीं हैं, उसने महसूस किया। - । "लगता है विटिया हॉस्टल से आ गयी है।" सोना मौसी उसके कमरे का ताला खोलते प्रसन्नता से चहकी और बोली, "साथवाले कमरे भी कल भर जायेंगे।" "अच्छा, क्या भैया, दीदी और सीमा आ रहे हैं।" प्रसन्नता का तेज झोंका आया और वरसों के बन्द कमरे को जैसे अपनी ताजी हवा से महका गया। सव कितने, कितने दूर हो गये हैं। वावूजी के चार बच्चे वास्तव में चार दिशाओं की तरह बँट गये थे। सीमा के व्याह में सब इकट्ठे हुए थे और आज सीमा तीन बच्चों की मां हो गयी है । मैया जव से विदेश से लोटे हैं उसने उन्हें नहीं देखा । सीमा के व्याह में भी वह कहां आ पाये थे । कमरे बरसों से ज्यों-के-त्यों थे। हर चीज वही । वही पलंग, दीवार से लगी पुस्तकों की अलमारी, आईना वगरैह सव जैसा-का-तैसा है । कमरे में घुसते ही बरसों पहले की स्मृति ने उसे कुरेद-सा दिया। तब यह कमरा 78 / अन्तिम चढ़ाई । ।
कितना भला लगता था । दूसरी मंजिल पर सव वहनों के अलग-अलग कमरे थे। सबने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें सजा रखा था। भैया के कमरे में तब किसी को जाने की इजाजत नहीं थी, शायद वहाँ आज भी सुन्दर-सुन्दर फिल्म-स्टारों के चित्र टंगे हों। "विटिया, अपना सामान देख लो," सोना मौसी लम्बी घुमावदार सीढ़ियां चढ़ते हाफ-सी गयी थी, फूली हुई सांस को काबू में करते करते घोली। "सोना मौसी, पहले तो तुम सारी हवेली में चकरी की तरह घूमा करती थी और अब सीढ़ियां चढ़ते हुए थकने लगीं," उसने अपना सूटकेस अलमारी में रखते हुए मजाक से पूछा। "पहले-सी देह, पहले का समय अब कहां रह गया, विटिया !" सोना मौमी टण्डी साँस खीचते हुए बोलती हैं, "बड़ी मालकिन भी भर गयी। मरते तुम्हें, बच्ची को खूब याद करती थी। किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह अचानक सोते सोते ही चल बसेंगी!" "सच मोसी, नानीमों को बहुत याद आती है।" उसने उदास होते हुए कहा, "कितना विचित्र है, हम लोग उनकी मौत के बाद इकट्ठे हो रहे हैं !" कहते हुए उसने खिड़की का पट खोल दिया। खिड़की खोलते ही नीचे बगीचे मे सहा वट-वृक्ष दिख गया, जिस पर आज भी ढेर-सारी चिड़ियाँ शोर कर रही थी। पहले सावन के महीने में झूले डाले जाते थे। सारा बगीचा सावन के गीतो से गूंजने लगता था, जवान ठहाके वीचे में फूटा करते थे। "दीदी भी आ रही हैं, सोना मौसी ?" उसने पलटकर पूछा। "नहीं, खबर आयी है दामाद बाबू की तबीयत अच्छी नहीं है, इसलिए वह नहीं आयेंगी," सौना मौसी पलंग पर नयी चादर विधाते-बिछाते बोली। ओह ! तो दीदी नहीं आ रही हैं। उन्हें देखे भी कितना समय हो गया है ! चलो, भैया को देख लेगी वह । कसे दिखते होंगे अव! अब तो कितने ही स्मार्ट हो गये होगे! पहले वे लोग छुट्टियों में आते थे तो कितना ऊधम मचाते थे। मैया जब कालेज में पड़ने लगे तब उनका स्वागत घर में एमे होता था जैसे किसी राजा के आगमन की तैयारियां हो रही हों। सारा घर टिप-टाप किया जाता था। वह तब छोटी थी और अपनी नयी फाक और तेल-चुपड़े बालों में सारे घर में घूम-घूमकर भैया का इन्तजार करती थी। "क्या बात है, विटिया को कोई देखने आनेवाला है ?" बदरी काका छेड़ते। "देखो काका, ठीक नहीं होगा!" वह मुंह विचकाकर रुआंसी हो जाती। बाबूजी ने खासतौर पर नीचे जमीन में एक कमरा याने तलघर बनवा दिया था, भैया के लिए, भैया गरमी की छुट्टियां इसी कमरे में काटते थे। दीदी काफी चिढ़ जाती थी, उन तीनों बहनों को अपने तपते कमरों में ही दोपहर काटनी पड़ती थी। लड़का होने का फायदा भैया खूब उठाते थे। 'देखो लड़का होने का फायदा,' दीदी बड़वड़ाती मौर गीले खस के पंखे ने हवा करती बोलती, 'विटियन की तो कोई कद्र ही नहीं, कोई पूछता नहीं, जैसे घरे पर से उठाकर ले आये हों। हे भगवान, अगले जनम में तू भैया की जगह मुझे और मेरी जगह मैया को जनम देना, तव देखेंगे लाट साहब के नखरे।' दीदी बड़बड़ाती फिर जैसे अपने को ही समझाती बोलती, 'पर भगवान ने सुन भी ली तो अगले जनम में ही आराम मिलेगा, इस जनम में तो इसी कमरे में रहना है न !' - शाम को घर में वेतरह हलचल हुई। जो घर कुछ देर पहले सन्नाटे से भरा था, अब वहाँ पुरानी जानी-पहलानी आवाजों का शोर था। सुबह से ही तारा घर व्यस्त-सा हो उठा था । वाबूजी हर नौकर को कुछ-न-कुछ आदेश दे रहे थे। सोना मौसी कमरों की सफाई में लगी थीं। अम्बो रसोई में व्यस्त थी, उन्हें तो जैसे सबकी पसन्द रटे हुए पहाड़े की तरह याद थी। भैया, भाभी, सीमा, राकेश यानी सीमा के पति, मां, वावूजी सव - 80 / अन्तिम चढ़ाई बरसो बाद जब पीछे की बारादरी में जमा हुए थे, तब नानीमां की कमी किस तरह से खली थी। ऐसे ही तो सब जमा होते थे। नानीमा रात-गये तक उन लोगो से कालेज की बातें पूछा करती थी, आज उनकी खाली कुरमी ने मन को कितना सहमा-सा दिया था। आदमी हसता, खेलता अचानक कहां चला जाता है ! शाम से मां नानीमां को याद कर कितनी बार रो पड़ी थीं, सीमा तो जमे आज भी नन्ही बच्ची थी। वह नानीमां को याद कर बच्चों-सी रो रही थी। उसकी आँखें जो भैया को निहार रही थी, अपनी पुरानी पहचानवाले मैया को ही देखना चाहती थी, पर चुहलबाजी मे सबसे आगे रहनेवाले मैया की जगह गम्भीर, संजीदा भैया को देख उसका मन बुझ-सा गया, जैसे किसी ने उसके भीतर की खुशी का स्विच बन्द कर दिया हो। क्या समय आदमी को इतना बदल देता है ! नानीमा के कमरे में जव वे लोग गये तब भिड़े हुए कपाट को बाबूजी ने आहिस्ता-से खोला। सव धक्-से रह गये। मूना बड़ा-सा कमरा, और उनकी याद मे जल रहा था एक घी का दीया। उसे आज भी नानीमों का 'पुराना कमरा याद है । नानीमाँ जो जमीदारनी बहू कहलाती थी। खूब रोब- दाब था उनका । मां के जनमते ही नाना मर गये थे और नानीमा ने जमी- दारी की ढीली पडती रास को फिर से खीचकर मजबूती से संभाल लिया था। माँ के थोड़ा बडा होते ही उन्होंने घर-दामाद रख लिया था। बाबूजी को नानीमां ने ही वकालत पास कराकर वकील बनाया था। बहुत बड़ा हालनुमा कमरा था नानीमा का। यह कमरा घर के आखिरी हिस्से में पड़ता था इसलिए वहुत शान्ति रहती थी। खिड़की की सलाखों को थामे चमेली की वेल ऊपर-ऊपर तक चली गयी थी। खिले-खिले चिटके हुए सफेद फूल शरारती बच्चो की तरह आँखें फाडे खिडकी से अन्दर झांकते रहते थे और अपनी महक को सारे कमरे में सोच देते थे। ऐन खिडकी के पास एक ऊंची लम्बी-सी तिपाई पर पोतलका वडा-सा नक्काशी. दार फूलदान रखा रहता था। फूलदान इतना बड़ा था कि उसमें आसानी मे नन्हें-से बच्चे को छिपाया जा सक्ता पा। अब उस पर गर्द-ही गई।
- लेकिन पहले सारे वाग के फूल उसमें सजे रहते थे, जिनकी मीठी-मीठी गन्ध सारे वातावरण पर छायी रहती थी। बड़ा-सा नक्काशीदार पलंग था जिस पर पीतल की मूठ लगी थी। पहले इस पर मखमल की कालरवाली चादर बिछी रहती थी, पर अब सादा चादर विछी थी। बड़ी-बड़ी शीशे-लगी अलमारियाँ थीं। दीवारों पर आदमकद तस्वीरें लगी थीं। एक चित्र, जो नानीमाँ की जवानी का था, बहुत सुन्दर था। नाना की भी एक बहुत बड़ी तस्वीर लगी हुई रखी थी। पहले जब भी वह नानीमां के कमरे में आती, तो वड़े ध्यान से नाना की तस्वीर देखा करती थी । इतना तेज/था उनके चेहरे पर कि वह ठगी-सी घूरती रहती थी। जरी का साफा बांधे, शेरवानी पहने बड़े रोबीले दिखते थे वह। नानीमां की आँखों पर पट्टी बंधी रहती थी। तेज रोशनी से उनकी आँखों में तकलीफ होती थी। उसे जब से नानीमां की याद है उसने हमेशा उनकी आंखों पर पट्टी बंधी हुई देखी थी । झुर्रियों से भरा सफेद चेहरा था, गाल लाल-लाल अंगारे-से दहकते रहते थे। छोटे कद की थीं नानीमाँ । दिन- भर विस्तर पर पड़ी रहती, शाम को उनकी खास नौकरानी उमा उन्हें वगीचे में टहलाने ले जाया करती। जब भी वह नानीमां को देखती, उसके मन में ढेर सारी दया, ममता, प्यार उमड़ पड़ता था। कितने प्रश्न थे, जो मन में उठते थे-कव से कम दिखने लगा ? पट्टी क्यों वांधे रहती हैं ? पर किसी से पूछने का साहस नहीं होता था। नानीमाँ की आँख पर पट्टी बंधी रहती थी, पर वह हवेली की हर हल- चल से पूर्ण परिचित रहती थीं। जब भी दोपहर को वह उनके कमरे में आती, वे उसे अपने पास बैठा लेती और पूछतीं, "शालू, गुलाव की महक तीखी और तेज है, क्या ठण्ड शुरू हो गयी?" "हाँ नानीमां," वह उत्तर देती। नानीमा फूलों की गन्ध से हर मौसम का पता लगा लेती। हर मौसम के फूलों के दर्शन भी उन्हीं के कमरे में आने से होते। उनकी ऊपर की आँखें भगवान ने बन्द कर दी थीं, पर उन्हें हर बात की खबर होती । उनका रोम-रोम आँख हो गया था। वह अनगिनत आँखों से देखतीं। नानीमां अपने बचपन की बातें अक्सर सभी बहनों को सुनाया करती। . 82/ अन्तिम चढ़ाई
"सबका बचपन एक-सा होता है, सबको तितली गोपाहता
है," नानीमा बताती, "हम लोग भी गेट सोलारमामा जी
को पता चलता तब हमारी गवर्नेश को समा मिली है मा
होती थी ? एक पैर पर उछलते हुए मैदान मे त गार गरे।
हमारी गवर्नेस जरूरत से ज्यादा मोटी पी। यह At me l
तंग करने का मूड होता, हम लोग महल में भाग मारो और
सजा मिलती। बेचारी रोती रहती, तो लोगों के पास TIT,
अपमान के मारे कई-कई दिन भूली रहती।
"मिस चू जो हमें अगरेजी पढ़ाया करती थी," गालीगो ARE THt,
"वह यही पर पर रहती थी। मिग पू याद उनकी fulft.infan
उन्होंने शादी नहीं की थी। अण्डे की तरह गदग का मकान भी
লারা, বন নাথম মীলানারা খা গাগায় শত শত
खेला करते तब उधर जाने की किमी पोजागीantum
चु के कमरे में जो मामली कालीन विद्या मामाकरिता
का अण्डा गिर गया। भगवान जाने निश्यिा farmen
और कैमे अण्डा कालीन पर गिर गया। काग्रीन NAME
गया, कालीन सराव हो गया। मिग ने गाया में TE-main
दिया और बेचारीमारी को, जोडी नोकगनी भीlarit"
नानीमा बतानी और बनानदार होगा
।
- । अलग नौकर नियुक्त थे। रोज सुबह-शाम कुत्ते अपने नौकरों के साथ घूमने जाते और शाम को बगीचे में बाबूजी और भैया के साथ गेंद खेलते। दिन- भर वे बन्द रहते । अपने बन्द कमरों में उछल-उछलकर भौंकते रहते। उनके गले में पड़ी चेन की आवाज दूर तक सुनायी देती। दिन का तीसरा पहर शुरू होते ही जब वे लोग बगीचे में जाने की तैयारी में रहते, धूप दीवारों से सरककर नीचे उतर रही होती। गिलहरियाँ 'पेड़ की परछाई को देख-देखकर उछल-कूद कर रही होती। दरख्तों के साये लम्बे हो जाते। पेड़ से गिरे सूखे पत्ते शरावी-से इधर-उधर डोल रहे होते। त्रिलोकी अपने साथियों के साथ कुत्तों को हवाखोरी के लिए ले जाने की तयारी करता होता और कुत्ते प्रसन्नता से दुम हिलाते रहते । घोड़ों की हिन- हिनाहट और कुत्तों की मुकानों से हवेली का पीछे का हिस्सा हमेशा आवाद- सा रहता । जव भी कुत्तों की भुकानें सुनायी देती, गिलहरी झट-से पेड़ पर चढ़कर दुबक जाती। फिर थोड़ी देर के वाद खतरे की सम्भावना न देखते हुए नीचे उतर जाती। उसके कमरे की एक खिड़की बगीचे में खुलती थी, वहाँ से वह देखती। गेंदे के फूलों की बहार रहती। पीले-पीले हल्दी रंग में सने फूल हरे-हरे नाजुक पत्तों के बीच सुन्दर लगते । याद करते-करते उसकी आँखें नम हो आयीं। नानीमां के कमरे में रखा हुआ दीया अभी भी जल रहा था। जैसे आभास दे रहा हो कि नहीं अभी 'भी वह हैं, उनकी याद है। शाम को उसने देखा, सीमा के कमरे में एक और पलँग लगा है, तो उसे आश्चर्य हुआ। "मौसी, दूसरा पलंग किसके लिए लगा रही हो?" "अरे, दामाद वाबू के लिए लगा रही हूँ," सोना मौसी बोलीं तो वह हैरान रह गयी और शर्म से उसका सर नीचा हो गया। "तुमसे किसने कहा मौसी, सीमा के कमरे में दामाद वाबू का पलंग लगाने को!" उसने आश्चर्य से पूछा। पहले दामादों को सामने मर्दाने में सुलाया जाता था। वे केवल खाना 34/अन्तिम चढ़ाई - - - खाने ही भीतर आते थे। इसीलिए आज यह सब देख उसे बडा आमचर्य हो रहा था। मीमा के कमरे मे बाकायदा दो पलंग विछे हुए थे, जिन पर फूलों- वाली चादर पड़ी थी "अरे विटिया, तुम शहर में रहनेवाले लोग"सुना है वही तो दिन-भर औरत-मरद की सेज सजी रहती है। विस्तर तक नहीं उठाये जाते !" "अच्छा," उमे जोर-से हंसी आ गयी, "इतनी सारी जानकारी तुम्हें कौन दे गया? "अरे विटिया, हम बाहर नहीं देखे तो क्या हुआ, लल्लन की मां बेटे के साप बम्बई धूम आयी है । वही लौटकर बता रही थी। वहां बिस्तर उठाने का रिवाज ही नहीं। जमाना बदल गया विटिया, अब कौन दामाद मर्दाने में सोते हैं। गांव मे उस दिन पटवारी का दामाद आया था, उम बाहर सुलाया, तो नाराज हो गया। गांव-भर मे हल्ला हो गया । वह ऐमा नाराज हुआ कि उसे मनाना मुश्किल हो गया । कौन जाने हमारे दामाद बाबू भी नाराज हो जायें !" सोना मौसी बिस्तर लगाकर वहीं बैठ गयो, "अरे विटिया, दामाद की जात और सुआ की जात एक है। सोने के पिंजरे में भी रखो तो उड़ जाते हैं।" फिर वह उल्ने हुए बोली, "चलूं, शाम का दीया मन्दिर में जलाना है, आरती लेने तो नीचे आओगीन !" "हाँ !" उसने हैरानी से उत्तर दिया । उमे आश्चर्य हुआ। सोना मौसी का बात करने का ढंग कितना बदल गया है, पहले तो वह हुक्म चलातीधी मन्दिर में पहली घण्टी टनटनायी नहीं कि हाथ का काम छोडकर मन्दिर की ओर दौड़ना पड़ता था आरती के समय, नहीं तो खैर नही रहती थी। कोई देर से पहुंचता तो बस दारोगा की तरह वही-बडी आँस निकालकर बोलती, "कहाँ रह गयी थी ?आरती का टाइम नहीं मालूम?"और अब वही मौसी कैसा धीमा बोलने लगी हैं। "हे राम, ये साड़ी है ! पहले तो नाचनेवालियां ऐसे पतले कपड़े पह- नती यों, यच्छे घर को बहू-बेटियां नहीं !" उसकी अमरीकन जाजेंट को साड़ी देश सोना मौसी हैरानी से बड़बड़ायी। "तुम पह्नोगी, मोसी! तुम्हें दो-चार दै जाऊंगी।" उसने हंसते हुए । कहा।
- - "हमें कौन ऐसे कपड़े पहनने हैं," सोना मौसी ने घबराकर कहा, "शहर का फैशन शहर में, गांव का गांव में।" "मौसी, तुम शहर आओ तो मजा आये, खूब घूमा दूं तुम्हें।" "हमें बुढ़ापे में अपना परलोक नहीं बिगाड़ना," सोना मौसी बोली और कमरे से बाहर आ गयीं। काफी पहले गांव से वावूजी ने नौकर भेजा था, पर वह शहर की चमक-दमक देखकर घबरा गया। रोज काम खत्म कर रोता, "दीदी बाई, हमें गाँव भेज दो, यहाँ तो हमारे प्राण निकल जायेंगे, चौवीस घण्टे घर में कैद रहो । लगता है जीते-जी नरक भोग रहे हैं । न त्योहार पता चले, न नेम-दस्तूर, जात-पात तो है ही नहीं। राम-रामः । शेर और वकरी एक घाट पर पानी पी रहे हैं। हमें तो गांव भिजवा दो, होली आ रही है और हमारा जी कलप रहा है गाँव जाने को।" उसकी बातों को सब हंसकर टाल देते। वह जरूर उससे डर गयी थी और किसी सामान के लिए उसे पैसा कभी नहीं देती थी, कि कहीं टिकिट कटाकर भाग न जाये, पर सचमुच एक दिन वह बाजार गया तो लौटा ही नहीं। जब दूसरा दिन निकला तो परेशान, पुलिस में रिपोर्ट लिखवायी, शहर का चप्पा-चप्पा छान मारा, पर पता नहीं लगा। बाद में दो-तीन माह के बाद वावूजी का पत्र आया कि वह नौकर एक महीने में पैदल चलकर गांव पहुंच गया है। - सुबह-सुबह बाबूजी पूजा करके दोनी में प्रसाद लेकर हमेशा की तरह चिल्लाये, “शालू, सीमा, रज्जन, प्रसाद लो !" "अरे धीरे पुकारो, सीमा और कुंवरजी अभी सो रहे हैं !" मां ने अपने कमरे से निकलते हुए उन्हें बताया। "क्यों !" वावूजी अचकचा-से गये, फिर जैसे कुछ समझते हुए चुपचाप . वाहर चले गये। सीढ़ियों पर खड़ी वह जाते हुए वावूजी को देखती रही। उसे आश्चर्य हुआ। यदि पहले का समय होता तो वावूजी घर सर पर उठा लेते, पर 86/ अन्तिम चढ़ाई आज वह कितनी आमानी से बाहर चले गये थे। उसे याद आया, दोदी का जब ब्याह हुआ था और वे सभी पढती थी और छुट्टियों मे घर आयी हुई थी तभी पहली बार दीदी अपनी नन्ही-सौ वैटी को लेकर मायके आयी हुई थी। रात को दीदी मुन्नी को उसे थमाकर ऊपर छत पर जीजाजी के पास चली गयी थी, जहां से वह लौटी नहीं, शायद वही सो गयी थी। मुली, जो उसके कमरे में ही सो गयी थी, अचानक उठकर रोने लगी। उगे भय हुआ कही बाबूजी बान न लें। वह मुन्नी को दवाये, घोरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ती ऊपर छत पर चढ़ गयी और अन्तिम सौदी पर खड़ी होकर धीरे-धीरे पुकारने लगी--दीदी, दीदी । दो-तीन बार आवाज देने पर दीदी उठी। उन्हे मुन्नी को थमाकर वह लौट पड़ी। पर नीचे उतरते ही वह सन्नाटे मे आ गयी। बाबूजी का कमरा खुला था और वे दरवाजे पर ही खड़े थे। "तुम ऊपर कहाँ गयी थी?" "जी," वह हकलायी थी, "मुन्नी रो रही थी तो दीदी को देने गयी थी।" "वहाँ तो कुंवर साहब सो रहे हैं !" बाबूजी ने जोर से उपटकर पूछा। "दीदी भी ऊपर है।" उसने सहमकर धीरे-से सफाई दी। "हूँ," बाबूजी एकदम गरजे, "अपना मुंह तो घुलता नहीं, दूसरे का मुंह धोने चली है। पढ़ाई-लिखाई करना छोड़ दूसरे के बच्चे संभालती फिर रही है । खबरदार, कल से जो मुन्नी को अपने पास रखा और गृहस्थ लोगो के बीच में गयी तो टांग तोड दूंगा, जा, सीधी अपने कमरे मे।" वह सहमी सी अपने कमरे मे चली गयी। दरवाजा लगाते हुए उसने सुना वाबूजी नाराज हो रहे थे, "लड़की को छत पर किसने भेजा? अरे, दो दिन मापके आपी है, तो अलग कमरे में नहीं सो सकती? छोटी बहनों पर सराय असर पड़ता है। समझा देना कुसुम को, मह चलन यहां नहीं चलेगा। दो दिन के लिए आयी है, लाज-शरम से रहे, बस।" वावूजी की डांट केवल मां के लिए ही नहीं थी, ऊपर तक गयी थी। दीदी ने सुना और दूसरे दिन से ही दीदी चोर घी तरह बाबूजी से छुपती- फिरती रही। सही भी तो था, वे लोग इतनी बड़ी हो गयी थी, पर कभी चावूजी के पास मां को वैठे नही देखा । एक दिन सीमा चुपचाप बता रही जमाना बदल गया है|87 - - थी कि मां वावूजी के कमरे से तेजी से निकलकर अपने कमरे में चली गयी है। भैया की नयी-नयी शादी हुई और भाभी घर आयी हुई थीं। गमियों के दिन थे, सारे दिन भैया-भाभी अपने कमरे में रहते । शाम को भी अपने कमरे से बाहर नहीं आते तो उन लोगों को बड़ा आश्चर्य होता था कि भैया और भाभी को गरमी नहीं लगती! एक दिन शाम को नानीमाँ और वे लोग सब आँगन में बैठे हुए थे तब नानीमा ने पलंग पर बैठे-बैठे भैया को आवाज दी। थोड़ी देर में भैया नीचे आये, उनके पीछे भाभी भी थीं। "लो वेटा, थोड़ी शाम की खुली हवा भी खा लो," नानीमां ने हुक्का गुड़गुड़ाना छोड़कर भैया से कहा और खुद पलंग के किनारे खिसक गयीं। भैया नानीमां की गोद में सर रखकर लेट गये। भाभी पास रखी मचोली पर बैठ गयीं, पर थोड़ी ही देर में भाभी बैठे-बैठे बोर हो गयीं तो उन्होंने धीरे- से भैया के पैर को छू दिया, जैसे इशारा कर रही हों कि कमरे में चली। भैया पहले तो चमककर उ० गये, पर तुरन्त फिर सतर्क हो गये। "क्या हुआ," नानीमा वोली, फिर तुरन्त समझ हुक्का गुड़गुड़ाते बोलीं, "अरे बूंघट निकाल लिया तो क्या हुआ, पाखी है पाखी (तितली)। क्या जमाना आ गया है, अव तो लोग लुगाई लेकर दिन-भर पड़े रहते हैं," नानीमाँ बड़- । वड़ायों, "पहले हमारे जमाने में तो भैया सफेद रंग की साड़ियाँ ही मिलती थी, जिसे हम लोग अपने मनचाहे रंग में रंग लेते थे-लाल, हरा, पीला। मर्द लोग सफेद धोती-कुर्ता ही पहनते थे। कभी चोरी-छुपे दोपहर को मर्द अपने कमरे में आ जाता तो, भैया, तुरन्त चोरी पकड़ में आ जाती थी। पसीने से साड़ी का रंग छूट जाता था और सफेद धोती पर लग जाता था। वस वाहर निकलते ही दोस्त पकड़ लेते-हाँ, भाभी के कमरे में गया था ? फिर भैया, रात को भी कमरे में जाना क्या आसान बात थी, हम लोगनी बहुएं थीं। सबके अपने अलग-अलग कमरे थे। सास बहुत टेढ़ी थी। हम लोगों को रात को पान लेकर सास के पैर छूने जाना पड़ता था, यह हमारी ससुराल का नियम था। पर वह पैर छूने दे तब न, हम लोग सव हाय में पान लिये खड़ी रहतीं, जो पान देकर पैर छू लेता उसके भाग्य वड़े। यही नाटक करते-करते आधी रात कट जाती थी और अब देखो बहुमों को कोई 88/ अन्तिम चढ़ाई .
मार्म ही नहीं रह गयी है।" नानीमां की बात सुनकर भाभो और भैया में जाते और मभी लोग हंसने लगते। उसने खिड़की से बाहर निहारा, सच मे सोवो तो कितना विविध लगता है, आंख के सामने से एक कितना बडा समय गुजर चुका है । यही वट-वृक्ष तव भी था और आज भी है, पर वह पुराने लोग आज सामने नहीं। उसे याद आता है इस वट-वृक्ष की पत्तियां सहलाता, उन्हें छूता, छेडता, घमाता- सा सूरज उस दिन भी निकला था, हमेशा की तरह। तब वह अपने इमी कमरे में खड़ी-खड़ी नीचे का दृश्य निहारती थी। उस दिन मूरज की तेज किरणे आसपास छिटकी-सी पड रही थी। वट की नयी पत्तियां तेज धूप का आनन्द ले रही थी। अभी भोर का अधिक समय नहीं हुआ था, पर लगता था जैसे दिन सर पर चढ़ आया हो। सोना मौसी अपनी किनारीदार साड़ी को संभालती जल्दी-जल्दी सीढियां उतरती आयी, उनके आते ही रसोई से लेकर भण्डार-घर मे भूकम्प सा आ गया। सारे नौकर सोना मौमी का रोव मानते थे, क्योंकि भण्डार- घर की चावी उनकी कमर में लटकती और दिन भर के लिए हिसाव करके राशन वहीं देती थी। सबकी रसद का वही इन्तजाम करती, नौकरी की श्रेणी के अनुसार उन्हें चीजें मिलती । जो खास नौकर ये उन्हें चावल, दाल और साग के अतिरिक्त देशी घी और थोड़ी-सी मिठाई भी प्राप्त हो जाती और बाकी नौकरों को चावल-दाल और एक साग पर काम चलाना होता या। जिस पर कभी मौसी प्रसन्न हो गयी, उसे उस दिन ज्यादा चीजें प्राप्त हो जाती। इसलिए सारे नौकर उन्हें मखमली और चिकनी मुलायम आयो से निहारते रहते । मजाल है भण्डार-घर के अन्दर कोई घुस जाये ! अकेली ही सबके लिए रसद निकालती, बड़े-बड़े घड़े के आकार के कुम्हड़े अकेले काटती और छोटी-बड़ी श्रेणी के अनुमार उनका भाग लगातीं। कोई धीरे- से फुसलाकर कहता, "सोना दीदी, मेरे घर मेहमान आये हैं, योड़ा ज्यादा रसद देना। तुम तो हमारा पेट पालती हो, भण्डार-घर को रानी हो, गरीब - दया करना।" और सोना मौसी तुरन्त मुलायम पड़कर हाथ ढीले कर और रसद ज्यादा दे देतीं। सोना मौसी के आते ही हलचल तेज हो जाती। वह जैसे आते ही सारे र में होती गड़बड़ को एक नजर में ही ताड़ जाती। चमरू और वदरी को रामदे की सीढ़ी के पास बैठे वीड़ी फूंकते देखतीं तो नाराज होकर मुंह ना लेती, वे लोग तुरन्त वीड़ी फेंककर अन्दर की ओर भागते । "क्यूं रे, इतना दिन चढ़ आया और तुम लोग वीड़ी फूंक रहे हो ? गुसलखाना ठीक किया?" "बस अभी ठीक किये देते हैं, थोड़ा फिनायल की शीशी खत्म हो गयी थी, कम्पनी का माल हमारे यहाँ पहुँचता भी तो देर से है," कहता हुआ चमरू अपनी जान छुड़ाकर गुसलखाने की ओर भागता। तभी सोनू राउत, जो कावड़ लिये बाहर जा रहा होता, मसखरी से थोड़ा रुकता और बोलता, "राम-राम सोनावाई !" "हरामी," सोना मौसी मुंह टेढ़ा करके हंस देती, "कितने कावड़ पानी लाया अव तक ?" "क्या करें, रात-भर नींद ही नहीं आयी, इसलिए सुबह देर से उठा हूँ। तुम्हारी शक्ल की एक चुडैल आकर रात-भर तंग करती रही और भोर होने को आयी तभी ज़रा आँख लपकी। उठा तो देखा दिन सर पर खड़ा वोल रहा था। पहले ही सोच लिया कि दरोगनी बाई तो अब जान खा ही लेंगी। तुम्हें दरोगनी वाई कहना ज्यादा ठीक लगता है !" सोनू ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा। "चल हट, मसखरी करता है ! फूट आँख के सामने से, काम करने दे!" सोना मौसी ने कमर में आंचल खोंसते हुए कहा । सारे घर में सोनू राउत ही ऐसा था जिसके सामने सोना मौसी नरम पड़ जाती थीं, शायद इसलिए भी कि वह उसकी जात का था और सोन बचपन से ही नानीमां का मुंहलगा नौकर था । नानीमां उसे स्नेह से खोटल कहती थीं। सोनू कद में थोड़ा ठिगना था, इसलिए नानीमां उसे वचपन खोटला कहतीं। सोनू के गुर्दे में ही इतना दम था जो वह सोना मौसी मजाक-दिल्लगी कर लेता। सोना मौसी की भी उस पर खास नजर 90 / अन्तिम चढ़ाई ! इसतिए रमद भी वह उसे औरों से मच्चादेती। कभी-कभी पापन गरी के भीतर मुड और मिठाई के दौने छुपाकर दे देतो। सोनू होली का समय चौका जवान नौकर था। उसने अपने सारे पारीर को सरसों सेस पिला- पिलाकर पुष्ट कर लिया था। उसके पारीर को घटा देवकर सोना मौसी निहाल हो जाती। "लो, आ पहुंची कर्जदारनो, कर्जा वसूलने के लिए?" सीन ने वट. वृक्ष के नीचे देखते हुए जोर से कहा, "क्यों जगनिया पाई, काहे को सुबह- सुबह मरने आ पहुंची है, भोर में तो तुझे देखकर सारा दिन राराब हो जाता है।" सोना मोसी ने पलटकर वट-वृक्ष की तरफ देखा। वहाँ से धीरे-धीरे, बैठे-बैठे घिसटती हुई जगनिया बाई आ रही थी। यह रोज सुबह भण्डार• घर के सामने अपनी रसद लेने आ पहुंचती है। "नही आऊंगी तो साऊँगी क्या! अरे, तू योका जमान है, तो शयको तो भगवान ने वैसा नहीं बनाया न ! बची-खुची माटी का जैसा-तैसा पुतला गढ़ दिया और दुनिया में नरक भोगने भेज दिया।" "भगवान को भी मसखरी सूझी थी, तभी तो तुझे मनाया। अरे तेरे नाम से तो मैं रमशान में लकड़ियां पहुंचा आया हूँ, और सू है कि यहाँ बैठे. चठे खा रही है, वहाँ जाती नहीं," सोनू ने उसे चिढ़ाते हुए कहा। "हरामी, अरे मेरे लिए लकडीतू पहुंचायेगा ! यह नहीं कहता, अपने लिए पहुँचाने गया था। तू मर, तुझे ले जायेंगे श्मशानघाट, मैं क्यों जाऊ !" जगनिया बाई बड़बड़ायी। "सोनू, क्या बकरक लगा रखी है. चल पानी पहुँचा सय कमरों में, यहाँ खड़ा दिल्लगी कर रहा है," सोना मौसी ने डाटा। सोनू तुरन्त यहाँ से चम्पत हो गया। जगनिया बाई बड़ी मुश्किल में बरामदा चढ़कर ऊपर आयी। सोना मौसी ने शट-से ताला सोलकर रायरी पहले उसको रसद अलग की और यह रसद रोकर अपने गन्दे फटे औचम को जोड़ती सीढ़ियां उतर गयो। रसद के भार से उससे पलते नहीं बनता या किसी तरह हाफते-हॉफ्ते वह अपने घर पहुंच जाती। एक ब्राह्मण परिवार में जगनिया बाई ने जनम लिया था। मां-बाप जमाना बदल गया है19 । पांचवीं सन्तान थी। दीये के उजाले में सुईन ने जैसे ही एक अनहोनी बच्ची को देखा तो डर-सी गयी। विचित्र आकृतिवाली वह बच्ची थी, बित्ते भर की तो थी ही, पैर के नाम पर दो पतले लुंझ-पुंझ मांस के लोयड़े लटक रहे थे। न जाँघ थी, न घुटना, न पंजा। जचकी करते सुईन का बुढ़ापा आ गया था, पर इस तरह का बच्चा उसने नहीं देखा था। बाप ने जव वच्ची को देखा तो सर पीट लिया। उत्तेजना के कारण उसका दिमाग शून्य-सा हो गया । अर्घ-विक्षिप्त की-सी अवस्था में उसने उस बच्ची को उठा लिया और फावड़ा लेकर चल पड़ा जिन्दा गाड़ने । मां सौर में पड़ी थी। उठकर बाहर नहीं जा सकती थी, बस वहीं पड़ी-पड़ी रोती रही और भगवान की दुहाई देती रही। धीरे-धीरे यह खवर सारे गांव में फैल गयी। किसी ने आकर नानाजी को यह खबर दी, उन्होंने दो आदमियों से उसे बुलवाया और खूब डॉट लगायी। उत्तर में ब्राह्मण रो पड़ा, "सरकार, मैं मानता हूँ कि मैं बड़ा भारी पाप करने जा रहा था। पर आप ही बताइए इसे मैं कैसे रख सकता हूँ? कब तक इसे खिलाता रहूंगा? चार घर की भिक्षा पर ही मेरे परिवार का पेट पलता है। मान लीजिए कल मैं मर गया तो इसे कौन दो कौर भोजन देगा? यही सब सोचकर इसे मिट्टी में गाड़ने जा रहा था, इसका जीना किस काम का! उसी दिन से भण्डार-घर से रसद ले जानेवालों में से उस नन्ही-सी वच्ची का भी नाम दर्ज करवा दिया गया। याने उसका सारा खर्चा अब हवेली से दिया जायेगा। उस दिन के बाद से रोज उसे यहाँ से रसद मिलने लगी, साल में दो जोड़े कपड़े मिलने लगे, त्योहारों पर अलग कपड़े मिलते थे। जब तक उसके मां-बाप जिन्दा थे तब तक वह रसद लेने आ जाते थे, पर जव से वे लोग मरे तब से उसे अकेले ही रसद लेने पहुंचना होता है। "अरे जगनिया वाई, कितनी उम्र रसद खायेगी, मरकर छुट्टी पातू । यहां का खाकर खूब मोटा रही है," सारे नौकर उससे मजाक करते, पर जैसे उस पर कोई असर नहीं होता था। वह बोलियां रोज सुनती थी, जब उसका जी जलता तो वह भी चिल्ला-चिल्लाकर गालियां देती, अंगुलियाँ फोड़ती और फिर अन्त में आंसू पोंछती अपने घर चली जाती। जहां भी , 92/अन्तिम चढ़ाई सड़क के किनारे दो लोग खड़े बात करते रहते, जगनिया बाई को शक हो जाता कि जरूर उसी पर हंस रहे हैं नासपोर्ट। तब शायद वह पांचवीं जमात में पढ़ती थी। उस दिन वह नानीमा के मखमली कालीन पर, जिस पर बहुत ही सुन्दर विलायती बेल-बूटे कडे थे, बैठी शान्त मन से अपनी गुडिया को साड़ी पहना रही थी। तभी बदरी काका एक लड़की को लेकर आये थे। "यह कौन है, इसे तो पहले कभी यहाँ नही देखा," उसने आश्चर्य से बदरी काका से पूछा। "कौन है बिटिया," नानीमा ने उसकी आवाज पर पलंग पर से उठते हुए पूछा। "मालकिन, कल रात यह और इसकी मां मेरी छपरी में सहमी हुई-सी बैठी थी। रात बहुत पानी बरस रहा था मे ! लगता है इन्होंने कई दिनों से खाना भी नहीं खाया था। ये लोग अच्छे घर के जान पहते हैं, इसका नाम है अम्वो।" "अच्छा !" नानीमा ने परों में चप्पल डालते हुए कहा । "जो!" कहता बदरी प्रसन्न हो गया। "क्या नाम है रे इसका ?" नानीमां ने पूछा। "अम्बो।" बदरी काका ने कहा, जैसे ही उन्होंने कहा वैसे ही उसने अपने हाथ की गुड़िया को नीचे रख नन्हीं-नन्ही आँसें उठाकर उसे देखा। यह हैरान रह गयो, इतना तेज, इतनी शान्ति ! ऐसी आँखें तो केवल माँ दुर्गा की ही हैं। बड़ी-बड़ी गहरी झील-सी आँखें,जहाँ दूर-दूर तक हरियाली- ही-हरियाली थी। "ठीक है, सोना के पास ले जा, कहना मैंने भेजा है।" नानीमा ने कहा, फिर जैसे वह उसकी तरफ देखते हुए बोली,"शालू बेटा, तू भी साप चली जा और सोना मौसी से कहना इस लड़की को रख लेगी।" उसने हाथ की गुड़िया को अपनी कमर पर रख लिया, बिल्कुल उसी तरह जमे औरतें बच्चे को पाती हैं। जैसे वह अचानक बडी-सी हो गयी । थी क्योंकि नानीमां ने उसे एक काम जो सौंप दिया था। वे लोग कमरे से बाहर निकल ही रहे थे कि नानीमा की आवाज आयो, "क्यों रे बदरी, तू इस लड़की की सिफारिश क्यों कर रहा था, कोई खास बात है ! "नहीं, नहीं मालकिन !"वदरी बुरी तरह भयभीत हो उठा। "अच्छा जा!" नानीमां ने हंसते हुए बात को टाल दिया। भण्डार-घर के सामने एक बेंच पड़ी थी। उसी पर पीले रंग की बार्डर- वाली साड़ी पहने सोना मोसी बैठी थीं। बड़े-से पान के बीड़े से मुंह ठसाठस भरा था, नाक में तीन नगोंवाली बड़ी-सी कील थी, गले में सोने की माला और हाथ में कांच की चूड़ियों के अलावा सोने की चूड़ियां भी थीं, पैरों में झालरवाली खूब चौड़ी चांदी की पट्टी थी। "क्यों रे बदरी कामचोर, सुबह से कहां था? तू समझता है मेरी आँख में तू धूल झोंक पायेगा? सोना भण्डार घर में रहती है पर सारी हवेली की खबर रखती है, तू सुवह से कहाँ था और यह किसको पकड़ ले आया रे!" सोना मौसी ने चिल्लाते हुए कहा और जैसे पहली बार उस लड़की को पूरा और बोली, "हूँ, तो यह कौन है ?" बदरी सिटपिटा-सा गया। सोना मौसी उस लड़की को ऐसे धूरने लगी जैसे आंखों से ही चीर-फाड़कर खा जायेंगी। "सोना मौसी, यह अम्बो है, इसे काम पर रख लो । नानीमां ने भेजा, है," उसने कहा। "क्यों रे वदरी, तू फिर कोई नया जुगनू पकड़ ले आया," सोना मौसी ने डपटकर पूछा । पर उन्होंने अपना लहजा तुरन्त नरम किया, क्योंकि बदरी नानीमाँ की सिफारिश लेकर आया था, "हूँ तो यह बात है, पहले ही तु बड़ी मालकिन की सिफारिश ले आया न ! अब क्या रखा है, जब बड़ी मालकिन ने कह ही दिया है तो इसे रखना ही है। पर तू समझ ले, हवेली से कोई सामान यदि गया तो तुझे ही पकड़गी।" "सब काम करेगी यह, तुम जो वताओगी सब करेगी। ऐले नाराज नहीं हुआ करते।" बदरी नरम पड़ते हुए धीरे-से बोला, क्योंकि वह जानता था कि नौकरी चाहे किसी ने भी दी हो, पर सोना मौसी की दया पर ही रहना होगा, किसी को निकालना सोना मोसी के वायें हाथ का खेल है। - - 94/अन्तिम चढ़ाई "तू चुप कर, फालतू टाय-टांप लगाता है !" सोना मोती ने बदरी को घुड़का और कडक आंतो से सम्बो को देखते हुए बोली, "क्या काम जानती "सब काम आता है," अम्बो ने घबराते हुए कहा, "वैसे मैं रसोई भी अच्छी बना लेती हूं।" "अच्छा, रसोई बना देती पर अभी तो महाराज है, बाद में देखेंगे।" सोना मौसी ने उसे ऊपर से लेकर नीचे तक पूरते हुए कहा, "पान बनाना जानती हो?" "अरे, जी बोलने से काम नहीं चलेगा, यहां सबकी पसन्द अलग-अलग हैं, दिन-भर मे हजार से ऊपर पान बनाने पड़ेंगे, यह मामूली काम नहीं "हजार !" अम्वो की आँखें आश्चर्य से फैल गयी। "हां, सबकी पसन्द लग है।" सोना मौसी बेंच पर बैठते हुए बोली, "सबसे बड़ी मालकिन के कमरे में सुबह आठ बजे पान का डिब्बा जायेगा, जिसमें चांदी के वरक तथा पूरा पान का मसाला डला होगा, पर हो, छालियाँ एकदम कागज की तरह पतली होंगी, और लौंग की जगह, चाँदो की बनी लोगों की सांकल लगानी होगी, पान का पत्ता भी स्पेशल कलकत्ते. वाला होगा, याने सबसे ऊंचे दरजे का पान होगा। अगर उन्हें पान पसन्द नहीं आया तो आगे की बात तुम सोच लो। बड़ी मालकिन के कमरे में चार धार पान जाते है । सुबह, दोपहर, शाम और रात । हर समय पान के डिब्बे बदले हुए होंगे । समय के अनुसार पान का मना भी बदला हुआ होना चाहिए। छोटी मालकिन के कमरे में भी यही पान जायेगा, पर उसमें इलायची डली हुई होनी चाहिए, और इतने ही समय पर पान जायेगा। सेक्रेट्री साहब के कमरे में केवल तीन बार पान जायेगा। रात को वह घर चले जाते है। उनका पान कपुरी तथा मोटो सुपारोवाला किमामो पान होगा, पर हां, सुपारी चिकनी होगी और काला लसनउवा जदा होगा। धाहर हाल मे मेहमानों के लिए पांच समय पान जायेगा। एक डिव्या रसोइए के लिए रसोईघर में जायेगा । एक हिव्या आफिस जमाना बदल गय एक डिव्या मेरे पास आयेगा और बाहर से आने-जानेवालों के लिए अलग पान बनेंगे। घर के नौकर पान मांगे तो उनके लिए चालू पान बनाने होंगे, बड़े मालिक पान नहीं खाते। इस तरह हर आदमी के साथ उनका अपना मिजाज है, इसलिए तुम्हें दो-चार दिन समझना होगा, फिर तुम अपने आप सब समझ लोगी। पान खुद तुम्हें पहुँचाने होंगे। तुम्हारे पानघर में किसी को आने की इजाजत नहीं होगी, अगर किसी दिन तुम पकड़ ली गयीं तो उसका दण्ड भी तुम्हें भुगतना होगा। पान से अगर किसी को किसी भी तरह की बीमारी हुई या चक्कर आया तो उसका दण्ड तुम्हें भुगतना होगा, समझी!" "जी...," अम्बो भौंचक्की-सी मौसी का मुंह ताक रही थी। इतने तरह के पान, इतने तरह के मिजाज होते हैं ! पान बनाना इतना कठिन काम लगा उसे कि उसके माथे पर पसीना छलक आया। गुड़िया को पकड़े वह भौंचक्की-सी सोना मौसी को निहार रही थी। उने तो आज पता चला कि हवेली में इतने तरह के पान बनते हैं, उसे यह सब मल-भुलैया-सा लग रहा था। "हां, एक बात और, खास मेहमानों के आने पर तुम्हें मुझसे आकर पूछ लेना चाहिए कि किस तरह के पान बनाये जायेंगे।" "अगर मैं रोज आपसे पूछ लूं तो?" "लो सुनो," सोना मौसी ने सर पर हाथ मारा, "अरी आफत की मारी, वैसे ही मेरे सर पर क्या कम काम है, जो तू रहा-सहा दिमाग भी चट कर जायेगी। मुझसे रोज पूछने की कोई जरूरत नहीं, मुझे जो समझाना था सो समझा दिया, तू अपना काम कर । बड़े घरों में काम करना बड़े दिमाग का काम है । वह तो तेरी भोली सूरत पर तरस खाकर इतना सव वता दिया । अच्छा जा, और भी काम हैं मुझे।" सोना मौसी उठी और धड़- घड़ाते हुए भण्डार-घर में घुस गयीं। । वाबू जी का दीवानखाना अव पूरी तरह खाली पड़ा रहता है। वहां आज भी ऐशो-आराम की सारी चीजें सजी थीं, पर उन पर धूल-ही-धूल थी। पहले 96/ अन्तिम चढ़ाई । यही कमरा राजनीतिक, साहित्यिक अखाड़े से लेकर वकालत तक वा अड्डा था । हर नयी स्कीम इसी हाल में पककर तैयार होती थी। नानाजी जब जर्मनी की लडाई से लौटे थे तब इसी हाल में उनका स्वागत किया गया था। आज वहीं कमरा कैसा सूना-सूना पड़ा था। वीरान-सा, वकालत की सारी पुस्तकें अब धूल खा रही थी, उनके पीछे चिड़ियों ने अपनी गृहस्थियों सजा ली थी। दीवार पर वाबूजी को बचपन में लेकर जवानी तक की फोटो लगी थी। कही नेहरूजी के साथ, कही राजेन्द्र बाबू के साथ, कही वाबूजी उद्घाटन कर रहे हैं, कही भाषण दे रहे हैं, कही चरखा कात रहे हैं। पहले वाबूजी बोलते भी कितना थे, पर अब तो लगता है जैसे बोलते ही नहीं । भैया का जब जन्म हुआ या तब सुना है सबसे ऊपरवाली मंजिल बनी थी और घर मे ढेर-सारा आधुनिक सामान आया था। "हर पीढ़ी को अपनी आनेवाली पीढी के सामने कुछ-न-कुछ यादगार बनानी चाहिए. इससे आगे की पीढी में हौसला रहता है !" बाबूजी अक्सर कहते. "देखो, इसीलिए पहले हर राजा, वादशाह अपने समय में कुछ-न- कुछ महल बनवाता था, जिसे देख उसको आगे की पीढ़ी भी बनाती थी।" "देखो, जमाना बदल गया, पर किघर से?" वाबूजी पीछे हाथ बांध- कर उसके आगे खड़े हो जाते हैं। कभी वह तेजी से आगे बढ़ जाते, कभी एकदम उसके पास, सामने आकर सड़े हो जाते। फिर वह उसे टकटको बांधकर देखते हुए कहते हैं, "देख शालू बेटा, पहले कितना अच्छा वक्त या मेरा, नौकर-चाकर, बाग-बगीने, पर अब जैसे कुछ भी नहीं है । न जमींदारी का वह रोव-दाब रहा, न वकालत की वह शान रही। अब तो मेरी वकालत चलती ही नहीं है,"बाबूजी पलभर रुकते हैं और गहरी सांस सोचते हुए बोलते हैं, "पर वेटा, देना-लेना जरूरी है न, खर्च एक भी कम नही हुए । तेरी नानीमा के मरने पर कितना खर्च करना पड़ा, गांववाले तो पहले की ही तरह आज भी सोचते हैं। देखो, समय क्यानो क्या हो गया, छोटे-छोटे लोग आगे बढ़ गये, अब यहां कितने वकील हो गये हैं जो कारों में घूम रहे हैं, पर मेरे तो जैसे पैर ही टूट गये हैं !" "नही वाबूजी, ऐसी बात नहीं है." वह बोलती है, "आपने हमें ऊंची- -से-ऊंची तालीम दी। भैया को अच्छी जगह रखकर पढ़ाया, आज वह रमाना बदल गया है।
बड़े अफसर हैं। इतने बड़े परिवार का खर्च था, फिर भी बढ़िया घरों में हम सवको आपने व्याह दिया। उन लोगों ने क्या किया? सव व्यापारी लोग थे, लड़का बी. एस-सी. फेल हुआ तो बी. ए. कराकर लॉ में दाखिला दिला दिया और बैठा दिया वकालत के लिए। आप खुद देखें, तो चौवे काका के तीनों वेटे बी. एस-सी. फेल होकर वकील नहीं हुए? कौन भैया की तरह उनके लड़के किसी ऊंचे पद पर हैं।" "हां, बात तो ठीक है वेटा," बाबूजी सोफे पर बैठ जाते हैं, "पर लोगों को यह दिखता नहीं न, वह तो यही समझते हैं उनके बच्चे लायक निकले और हमारे कपूतक्योंकि सब परदेश चले गये, कौन हमारे धन्धे पर बैठा ? बुढ़ापे में वकालत भी नहीं चलती. 'वकालत का पेशा तो पीढ़ी की बलि मांगता है। एक-न-एक वेटा तो इसे देना ही होता है, पर मैं क्या करता, मेरा तो एक ही वेटा था। मैं चाहकर भी उसे बांध नहीं सकता था। "देखो, सोना, बदरी और अम्वो बस यही लोग बच गये हैं जो आज भी मेरे साथ हैं, शायद इसलिए कि इन लोगों को बचपन से यहां पाला- पोसा गया, कभी इन्हें अपने से अलग नहीं समझा। वरना इस बुढ़ापे में मुझे और तुम्हारी मां को ही सबकुछ देखना पड़ता। सही समझो तो अब लगता है ये लोग ही मेरे असली बच्चे हैं ! वावूजी फिर बोलते हैं, और थके-से खिड़की के बाहर देखने लगते हैं। "बाबूजी, आप बात तो सही कह रहे हैं, पर किया क्या जा सकता " "देखो शालू, तुम लोग मौत के समय भी नहीं पहुंच पाये, आये भी तो तब, जवकि सारा काम हो चुका है।" वाबूजी ठण्डी सांस खींचते हुए पाहते हैं, "अगर ऐसा ही मेरी मौत पर हुआ तो बिरादरी में तो बेटा, मेरी नाक कट जायेगी। वह आदमी कितना बदकिस्मत होता है, जिसे अपने ही बच्चों के कन्धे न मिलें।" "वाबूजी..." वह परेशान और दुखी होकर उनको निहारने लगती है। वाबूजी ने कितनी पाड़वी और सच्ची बात कह दी थी भाज । वह जमाना जिसे आज याद करो तो फितना-कितना भला लगता है, कितनी 98/अन्तिम चढ़ाई ताम-झाम थी, पर आज जैसे कुछ भी नहीं। तमाशा दिखानेवाले जमे अपना सारा सामान बांधकर जा चुके हैं। "लो, आदमी का जन्म भी कसा! बच्चे छोटे थे तो कितनी व्यस्त थी जिन्दगी ! काम खत्म ही नही होता था। पर अब तो दिन ही नहीं कटना। बच्चे बडे हुए, एक-एक कर सब उड़ गये डाल पर से !" मां रुआंसी-मी तखत पर बैठती हुई वोलती हैं। वहां बैठे सारे लोगों मे मां की बात को कोई नही समझता, कोई उत्तर नही देता, सब जैसे अपने-आपमे धूप-से हैं, पर वह खुद मां के दर्द को पहचानने लगी है, क्योंकि अब उसका बेटा भी बडा हो गया है। "बहू, दो-दो बेटो की मा हो, हरछठ का उपवास रख लिया करो न!" मां भाभी को एक बार देखकर फिर से समझाने लगती हैं। "यह क्या होता है ?" भाभी भोलेपन से कहती हैं, "माँ, तुमने शादी पर मुझे करवाचौथ का व्रत रखने को कहा था, पर यह मना करते हैं, रहते हैं, मत रखो, तबीयत खराब हो जायेगी, इसलिए नहीं रखती हूँ।" "राम-राम-राम," मां हैरान-परेशान होकर भाभी को देखती हैं. “बहू, तुमने करवाचौथ का व्रत भी छोड़ दिया ?" माँ फिर बुदबुदाने लगती हैं, "पति के लिए नहीं किया तो फिर वेटों के लिए क्या करोगी।" "हरछठ का व्रत क्या होता है, मो?" भाभी पूछती हैं, पर मां कोई उत्तर नहीं देती, और मूनी-सूनी आँखों से छत को देखने लगती हैं। "भैया, कम-से-कम राखी पर तो एक चिट्ठी डाल दिया करो, तुम्हारे पत्र पटने को जी तरस गया है।" सीमा अपने पुराने यन्दाज में वैसे ही उचकती हुई बोलती है। "सब बेकार दस्तूर है," भैया हाथ में छडी घुमाते हुए बोलते हैं, "यह क्यों नहीं कहती कि साड़ी भेजो !" भैया सीमा की तरफ झुक आये, "अरे, तुझे पता है हमारी जितनी तनख्वाह है उसमे डबल का पर्चा है ! बस, तुम्हारे बच्चों की शादी मे सब कर्जा पटा दूंगा। बडिया भात लेकर आऊंगा।"
"ना भैया ना, तुम्हें जो देना है, अभी दे दो। हमारे बच्चों की आस में हमें क्यों रखते हो? कौन जाने बड़े होकर ये कोर्ट में जाकर ही शादी कर लें, जमाना बदल गया है न।" सीमा हँसते हुए कहती है। उसकी इस बात ने शाम के वातावरण में घिर आये भारीपन को कम कर दिया था। सब जोर से हंस देते हैं। "अरे, तू दो-दो हजार कमाता है, बहनों के नाम साल में चार-पांच सौ नहीं निकलते ? मैं तो हर साल तेरी बुआ लोगों को कपड़े भेजती हूँ और तू अभी से बहनों को भुला बैठा!" मां बोलती हैं, फिर जैसे समझाने के अन्दाज में कहती हैं, "बेटा, तीज-त्योहारों से ही तो आदमी एक-दूसरे को याद करता है, तू उतना भी नहीं करता! "मैया, तुमने मेरी शादी में जो वढ़िया-बढ़िया सामान खरीदा था न,' सीमा फिर चहकते हुए बोलती है, "इलेक्ट्रिक केटली और टोस्टर दिया था न, पता है क्या करती हूँ मैं ! केटली में दाल पकाती हूँ और टोस्टर में पतला-पतला शकरकन्द काटकर सेंकती हूं।" "क्या !" भैया हैरान-से रह जाते हैं, "देख, किसी और के सामने यह वात न कहना, वरना लोग तुझे पागल कहेंगे।" "क्या कहूँ, मुझे गांव में व्याह दिया, वहां इलेक्ट्रिक केटली और टोस्टर का क्या काम !" सीमा उसी मूड में बोलती है। सीमा की बात पर सब हंसने लगते हैं। भाभी तो हंस-हंसकर दोहरी हो जाती हैं, फिर जैसे तरफदारी करती बोलती हैं, "तुम्हारे भैया दिखते ऐसे हैं, पर सवकी याद करते हैं। राखी अगर समय पर नहीं पहुंचे तो उदास हो जाते हैं और खाना नहीं खाते। पिछले साल ऐसा ही तो हुआ, राखी नहीं मिली, यह उदास थे, खाना नहीं खाया, बोले भूख नहीं है। डेढ़ बजे पोस्टमैन अचानक लिफाफे लेकर आ गया, वस फिर क्या था, तुरन्त राखी बांधी, तिलक लगाया और खाने बैठ गये।" "मैया, दीदी के घर बेटी का व्याह होगा, आओगे न !" वह पूछती - "वह भात मांगने आयेगी तो आऊंगा, नहीं तो नहीं।" भैया नाश्ते की प्लेट टेवल पर से उठाते हुए बोलते हैं । 100/ अन्तिम चढ़ाई "तू तो दिल्ली रहता है मैया, इतनी दूर भात मांगने जायेगी तब उसकी बेटी के व्याह मे आयेगा!" मा हैरान होकर बोलती हैं, "ऐमा मत करना वेटा, विना बुलाये आ जाना, उतना पैसा कहाँ से लारंगी देवारी कुसुम ।" "लो मां, तुम भी बेटियों का साथ देने लगी।" भैया ढीठ बने वोलते हैं, "बिना भात मांगे में शादी में कैसे आऊंगा! "अच्छा, लो मैया, मैं अभी से भात मांग लेती हूँ, पर दीदी की लड़की की शादी मे जरूर आना!" सीमा दौडकर जाती है और पूजा-धर से पूजा की थाली से बताशा उठाकर अपने हाथो में रख, भैया के आगे फैला देती है। "पर यह तो तू भात मांग रही है, कुसुम दीदी मांगे तब न !" भया हंसते हुए बोले। "अरे बेटा, कोई भी लहकी भात मांग लेती है, यात तो एक ही है । तू भात देने नहीं आयेगा तो बिरादरी में वेचारी कुसुम की हंसी हो जायेगी। मामा के घर का पहने-ओढे विना लड़की का भांवर कैसे होगा?" मां उदास होते हुए बोली। "अच्छा वावा, या जाऊंगा, तुम लोग तो जैसे मेरे पीछे ही लग गयी !" मैया बात को समाप्त करते हुए बाहर चले गये। कुसुम दीदी की शादी लगी थी तव मां पर्दे लगी बड़ी-सी बैलगाडी में बैठकर उसे साथ ले बताने की थाल लिये दूर के मामा के यहाँ भात मांगने गयी थी। शादी के समय मामा आये थे, घूमधाम से भात लेकर । बाहर ड्योढ़ी पर ही मामा को रोक लिया गया था। मां औरतो के साथ मगलगान गाती हुई भाई को लिवाने बाहर आयो यो । दोनों भाई-बह्न को एक-एक पीढे पर खड़ा कर दिया गया था। दोनों ने एक-दूसरे को तिलक लगाया, बताशा खिलाया, फिर मामा ने मां के पैर छुए, फिर वह अन्दर आये। नानीमा बताती थीं, पुराने समय में एक लहकी का माई बहुत गरीव पा, उसे कई-कई दिन खाना नसीब नहीं होता था। वहन संकोच से भाई को बुलाती नहीं, पर मन-ही-मन मनाती रहती है कि किसी तरह भाई या जाये। भाई विना बुलाये टूटी-सी अपनो मन्दूक लिये बहन के घर पहुंच जाता है। दोनों एक-दूसरे को देखकर रोते हैं। भाई सन्दूक खोलता है पुराना - वस्त्र देने। पर यह क्या, सन्दूक से थान-के-थान कपड़े निकलने लगते हैं, यहां तक कि बहन के आगे थान के अम्बार लग जाते हैं। इस तरह भाई और वहन दोनों की इज्जत भगवान ने रख ली थी। मां बताती हैं पहले उनके गांव में एक लड़की थी, जिसका अपना कोई भाई नहीं था । जव उसकी लड़की की शादी होनेवाली थी तव वह रो-रोकर वेहाल हो गयी, पर ऐन शादी शुरू होने के दिन सारा-का-सारा गांव उमड़ पड़ा था भात देने । कपड़े, बर्तन, गहने, रुपयों का ढेर लग गया। इतने भाई खड़े हो गये कि वह तिलक करते-करते थक गयी थी। "वहू, एक-दो दिन और रह जाओ, कोन तुम लोग दिल्ली से रोज आ पाते हो!" मां बोलती हैं, "मां की मौत हुई तो सब कोई जमा हो गये वरना कौन आता है। अब तो डर लगता है, मेरे मरने पर भी तुम लोग आ 'पाओगे या नहीं! "क्या करें, माँजी," भाभी बोलती हैं, "वच्चे सब कान्वेण्ट में पढ़ते हैं और उन्हें छुट्टियां नहीं मिल पातीं।" "देखो तो मेरे भाग्य", मां पूजा की थाली में दीया रखते बोली, "मैंने अपने बेटे के बच्चों को भी नहीं देखा । सारे लोग दिल्ली जाकर देख आये, पर मैं दिल्ली जा नहीं पायी। बच्चों को बहू एक-दो दिन के लिए ही ले आती, क्या गांव में हम वच्चों को नहीं रख सकते थे? हमारे बच्चे क्या गांव में नहीं रहते थे?" "माँ, तुम उनके बच्चों को रोज फलों का रस और अण्डा नहीं खिला सकती, वे वहीखाते हैं।" सीमा पूजा के लिए फूलों का हार पिरोती वोलती है, "जाने दो, क्या फर्क पड़ता है, मैया-भाभी आकर खड़े हो गये, क्या यही । बहुत नहीं है ?" "हां, उम्मीद से कहीं ज्यादा!" मा आँचल से अपनी गीली आंखें पोंछ लेती हैं। वातावरण फिर भारी हो उठता है। भाभी गुस्से से बाहर चली जाती हैं। "मां, बहू को बढ़िया साड़ी दिया करो, गहने दिया करो, तब वह 102/ अन्तिम चढ़ाई त्योहारो पर माया करेगी!" सीमा फिर वोलती है। "लो बिटिया की वात, हम बहू को अब साडी दें, गहने दें।" मां हैरान हो मुड़कर कहती हैं, "अरे, बुढापे मे तो उनको हमे देना चाहिए न कि हम !' "मां, जमाना बदल गया है," सीमा हाथ नचाते हुए बोलती है, "अब सब उल्टा हो गया है । वहू अब ससुराल नहीं आती, तभी आती है जब उसे साड़ी मिले।" "हे भगवान, क्या जमाना आ गया है," मां गहरी सांस खीचते हुए बोली, "पहले यह घर कितना भरा-भरा था, क्या ऐशो-आराम थे, नौकरों- चाकरों की कैसी चहल-पहल रहती थी। हर त्योहार पर कितना भी कप्ट हो, चाहे नदी मे बाढ आ जाये, पर तुम लोग उसी कच्चे रास्ते से हॉस्टल से घर आते थे, लेकिन अब कोई नही आता । सड़क भी पक्की हो गयी, नदी पर बडा भारी पुल भी बन गया, गांव में बस और ट्रेन भी था गयी, फिर भी कोई नही आता!" मा हताश होकर कहती हैं योर अपनी लाल हो आयी आंखो से दीये को घूरने लगती हैं। माज सुबह से ही वातावरण काफी भारी था। पहले भी वह लोग जाया करते थे पर इतना बुरा कभी नहीं लगता था। आज जाते हुए लग रहा था पता नहीं अब कब लौटना होगा। वह और सीमा सुबह से छुप-छुपकर कई बार रो चुकी थी। मां तो जैसे सुबह से ही रो रही है। सोना मौसी, अम्बो, बदरी काका जैसे अचानक और बूढ़े लगने लगे हैं। थके हुए-से सूनी-सूनी आंख उठाकर वे लोग बार-बार आसमान को देखते हैं और जैसे अपने आप ही वुदबुदाते हैं -पता नही बच्चे अब कव लौटेंगे। घर के सामने तीन तांगे सड़े हैं, जिन पर सवका सामान लादा जा चुका है। विदाई का वह क्षण, जिसे याद करते ही कलेजा कोप जाता था, आखिर पास आ ही गया। बदरी काका तांगे को पकड़े हुए अपने गमछे से बार-बार आंखें पोंछ लेते हैं, बावजी दालान मे दुखी-परेशान-से खड़े हैं। माता बदल गया है। 103 मां आगे बढ़ती हैं और बहू के सर पर हाथ फेरते बोलती हैं, "वहू, बच्चों को एक बार यहाँ जरूर लाना, सब देख आये हैं, मैंने ही उन्हें नहीं देखा है।" "हाँ माँजी, इस बार आऊँगी तो वच्चों को अवश्य लाऊँगी!" भाभी झुककर माँ और वावुजी के पैर छू लेती हैं। विदा लेकर वे लोग तांगे में भारी मन-से बैठ चुके होते हैं, कि अचानक वह देखती है वाबूजी हाथ से रुकने का इशारा कर अन्दर चले जाते हैं और जब लौटते हैं तो उनके हाथ में एक बड़ी-सी तस्वीर दिखती है, जो बरसों से दीवानखाने के बड़े-से हॉल की दीवार पर लगी थी। बाबूजी की वही ऐतिहासिक फोटो थी, जिसमें वह राजेन्द्र बाबू को माला पहना रहे थे। "वेटा, यह फोटो लेते जाओ," बाबूजी तांगे तक आकर भैया के हाथ में तस्वीर थमाते हुए बोले, “यहाँ अब इसको देखनेवाला कौन आता है, तुम्हारे पास रहेगी तो लोग जानेंगे, बच्चों को भी पता चलेगा कि उनके दादा का क्या जमाना था तांगा आगे बढ़ गया। घोड़ों की टाप के बीच बाबूजी के बाकी शब्द पीछे छूट जाते हैं, उसे लगने लगता है घोड़ों की तेज-तेज टाप उसके माथे पर पड़ रही है। - " -
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