Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
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1 KOTILAL BANARASWASS. NEPALI Kwar Post Bor 75 VARANASI.
2 CHAUKHAMBA VIDYABHAVAN CHawt, VARANASI
8 GURJAR GRANTHARATNA KARYALAYA, GAM ROAD, AHEDABAD-1
SARASWATI PUSTAK BRANDAR, RATAYDOLL BATHILAL AHMEDABAD-1
6 WUNSHI RAX MANOHARLAL NAI SAMAL, DELHI
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JAYANTI DALAL
Vuut P Purs
Ghulanta, Ghalbhut. Woche
AHEDABAD-1.
मारुतग्रन्यपरिपद् अन्याङ्क ९ सिरिदेववायगविरहयं नंदीसुत्तं सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं संगोधका सम्पादक मुनिपुण्यविजयः जिनागमरहस्यवेदिजनाचार्यश्रीमद्विजयानन्दमूरिवर(प्रसिद्धनाम-आत्मारामजीमहाराज )शिष्यरत्न- प्राचीनजनभाण्डागारोद्वारकप्रवर्तकश्रीमत्कान्तिविजयान्तेवासिनां श्रीजैनात्मानन्दग्रन्थमालासम्पादकानां मुनिप्रवरश्रीचतुरविजयानां विनेयः प्राकृत ग्रन्थ परिषद्, वाराणसी-५ अहमदावाद-९, वीरसंपत् २५२ विक्रमसंवत् २०२२ इस्वीसन् १९६६
साप मामणिया
सेरो प्रल रेस मोबासरी
अति पणाम
बम्प प्रम
पौरा कममा पाटी
बापदापार-1
गंथसमप्पणं
वग्यसायरवाईतरतमण-वयग-कायजोगाण ।
वरजिणआगमपयठणकरणे अपमत्तजोगाण ॥ १ ॥
जोगाजोगविहन्नूण नूग गभीग्मिाए गरिमाण ।
आगमउदारय'वरवाहिमंताण सताण ॥ २॥
आयरियपुगवाण सागरआणंदमूरिणामाण ।
महणायसदसच्चावयाण दुसमम्मि कालम्मि ॥ ३ ॥
फरकमलकोसमझे ताणं सपढ दिवगयाण मए ।
अप्पिजइ गथोऽय विणएण पुण्णविजएण ॥ ४ ॥
अन्यसमर्पण निनका मन-वचन-फायबोग श्रेष्ठ युतसागरको तरंगोमें रसा मा को श्रेष्ठ मिनागमके प्रकाशनमें मप्रमत्तमोगसे प्राच ये, योग- पयोग के निक में इस पे, गाम्मोगुणको गरिमासे मन्वित पे, 'मागमोद्वार को श्रेष्ठ पारी विमपित सन्त थे, और दुमकासमें मिनोने मपने भापमें 'महानाद' शम्बको सत्य सिद्ध किया था ऐसे साम्प्रत कामें विगत मापार्यप्रष्ठ श्रीसागरानन्दसरिबीके पवित्र परकम रूप कोपमें यह मम विनयपूर्वक समर्पित करता है। पुम्पविनय
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प्राकृतग्रन्थपरिषद् ग्रन्थाङ्क ९ earthani - . - ܚܐܶ -- . नन्दिसूत्रमूलको 'जे० ' सज्ञकप्रति के प्रथम पत्र की प्रथम पृष्ठि और अतिम (२६वा) पत्र की द्वितीय पृष्ठि । TITLETTETTE --- 17 T- TE . - -notte Lidhte I rnRTINA * ENTALITIE मागम्यमवर सगरमाRATRIKCARRESTER पम्यवसम्पदमागरमामपmतमगारपामगरसनउ74HERI परम्परागपगास्मगमम्मम्मत तामसागराच्या पार नारममपमरम्मामरामपार ययम्प्रमागबाम्मागरमामात रागा बरयासरस्मसम्मम्ममममसरमरायणनगरमागरमा ans....~intentina LJ.५.Lodina.tutanHILAOLI Irritmant.uturmesha NaticuELicellutiHITRA -tu.Lt...ALLELALJILLLLLL The-A17 "Iart----12-LJI..hu Fart-3-THE-Purry 4 C . ITTER ATT Amir FEET -J . ritute समाचार मामला HREE RATERY पाएम्मामाकरामरकामपणायम Printhetiti PANJ 1 A । FRIEEE ATTERI.il HTTTTTTTTTT, नन्दिसूममूलकी 'ग' सज्ञक प्रतिके प्रथम और अतिम (१९) पत्र की द्वितीय पुष्ठि । जनारायसीय नामामार सम्ममा समासम्पर मरनसभामरमर पाय मराराम LEARNAMAARAMPARAN 'मmarपयशसभामा ममममम rakawantualALRetunmainatane अपामा-मपीamanadRNERमाया निमम्मम्मामान मानमराRE रणार ५९ सुमारापायाम भिमतभारासा मममा m नन्दिमूत्रचूर्णिकी 'जे.' सज्ञकप्रतिका जिस पत्रसे प्रारभ होता है उस १८ पयको और अतिम (२०३वा) पत्र की द्वितीय पृष्टि ।
माइतमयपरिषद प्रत्यार ९ -- JABA Amaarcom स -- IDERTILITI LATIHAN AIRLINIEZIDENTITATE दिनको सब मिकी पर धीमारियमितपमिस्त्रदाली प्रति प्रथम और सिम (re) पनि । माठाण यजमगर समाधा सामान THERE गुस्नलारा मंसियममाया भरमया टपिटगमावास्यासमय रासहसा वारयर सपारियन प्रमुगम्त तिवमा Ja . गरपाविषयमादिरिमायरमा सामाग्रहयापमुक्षयमासमाद सतपायजामायणमा सिपपरियामामामायणसामयपव मायायमासा मापन पसायासार . --- J मभिमान भापतिले प्रथम भार असिम (1) पर।
-- N - । पादश्रीमस्वायतमााणीशासनाधिष्टायकायतमाशीदिरियसन्या परमजायजीवाडा विमानायगाणादाडागनारदाङगधा जयजगणिआमादासयवाशजयश्मयाणपतरावातिव्यराणयाशिमाऊयशडय सुशालामाशोडियमहामनावीरा॥जईसवडयाद्याअगस्तदेझिणस्सवी रस्मारदसरासरतमसियरमानवधरयस्तावागावशागदणमन्वयातरियदसणार सहरबागासघनगरतात धरकेडरिवागाराधसङमा बाश्यानरमासमा सियारियनस्साडिववरसडानादानसयासमवकराया नहंसालण्डायसिधा तवतिटयमवरयजनस्सासघरहसनगवानसभाया सुनंदिरघासमा कम्मरयडालाहविणिग्गयरसासुअरयाणदीदनालस्तापवमा वयधिरकनियरमा गुणकसरालस्स॥साद गणमयरियरिखडस्माडि साबुदस्सासघ एनमस्सनहसमागणसहस्मयवस्मासातवसंडममटालगायकिरिश्रराजमुदउहरिमनिव जयमघवदनिमालसमाविसहवाग रतियादयदनासगरमातवानादित लससानाणुरधामसजाएगदमसघसरमाश्यानविशवलायशिगटास्मसन्नाटाडागमगरह भारकादरानगवन संघसमुदस्सदम्माशमम्मदसणवदागाढावगाटरएडम्स मा . . 7 * नदिमा महिलामंडलयावसागणिविद्या विद्यावरण विवयस्मााणविनामाविनायविक्षसादामालदाणासुस्वारायसयता विदारकाम्सवर पाक्षिकापावरपरकासमहायवरकाणस्तासावसिपिएपसिाहासासमाहासाशमाअणुनागापवश्कालिअसमदरसासमाहासाग्रहा अणुनागापशकिमतरायणादिसाकाय्यम ववहारमारसितासियाणानिसादलसमहानिसाव्हसमाजबहीवासतापन्दिए गायाणाक्षायादार सागरयमतापखुडियाविमाएविततीयामनिमाविमायविधीयअगलियाएवगालियापाविवादलियापाअरुणावदायगालावायसम धरणोरवायसाविसमागोवायरसावलधारास्वायम्सादिविदावा यस्तावहाणमस्तासमुहागयता नागयारिद्यावणियाणा निग्यातिप्राणीक पियाणाकणातहसियाणाफियाणकालिमायावहादसाणा - आसीधिसेवावदिहादिसतावणाणादारानावणाणानदामिणानाanim तिभागनिसग्गाणासासिएएएसिवादरसासनादरसामगुलाया गुगपशाश्वगाविहस्साहासासहरसाणुमा अनागा पक्षावियायारसामगस्तताणस्तसमवायरसविवादय नतापानायाधम्मकदागउवामगदसाम्याग उदमागायागुताराव्या श्मदसाएपछावागरणा विवागमयरमादिहिवाटारसा सावसिा पिएएमिनाहीसासमुरहरसाअपमानागापरवाशगणयहोण्ड श्मरमसानमारमाणसाजणगानाक्षसासमाहासाअामायावन - खमासमणादापमानाशावतसरण नहिसामिाममुहिसामिाण) डाणामिबिगानदासमक्षा all ॥ahim पशुसंशाकल्यावर एका यावादिधनधेगदानबापतहति ३ - माइसमयपरिपद प्रत्यार १ wqमरियम समस्यभराम MARATरम ममममममम PHIRAIL A का -- PARAN AM पापम्प AAAAA PANI समापनमनहरमाथापामगत R -- MH H PNA ta जारा PURA कम -- M मसकता नि मियाना + NAR ARMA-- परमसमयसपासपम्पमा कम . --- सायब मित --- INi AdStreaf MPO मन नम्बिस्त्रकी Bा प्रति प्रथम भोर तास पत्र देकर पुष्टि न वर्षभए पवित्र प्रसा, 1) प्रस्तावना ॥ जयन्तु वीतरागाः ॥ चूर्णिसहित नन्दीसूत्रके सशोधनके लिये मूलसूत्रकी आठ और चूर्णिकी चार, एवं सब मिलकर बारह प्रतियां सामने रक्खी गई हैं। इनमे से मूलसूत्रकी तीन और चूणींकी एक, ये चार ताडपत्रीय प्रतियाँ हैं । इन सबों का परिचय इस प्रकार है जे० प्रति—यह प्रति जेसलमेरके किलेमे स्थित खरतरगच्छीय युगप्रधान आचार्य श्रीजिनभद्रसूरि ताडपत्रीय ज्ञान- भडारकी ताडपत्रीय प्रति है। सूचामें इस प्रतिका क्रमाद. ७७ है । इसमें पत्र १ से २६ मे नन्दीसूत्र मूल है और पत्र १ से २९७ मे श्रीमलयगिरिसूरिकृत वृत्ति है । प्रतिकी लबाई-चौडाई ३३||x २।। इच है । प्रतिपत्रमें पत्रकी चौडाईके अनुसार चार या पाच पंक्तियां लिखी हैं। प्रति तीन विभागमें लिखी गई है। प्रति शुद्धतम है । पुप्पिकाके लेखानुसार इस प्रति का सशोधन खरतरगच्छीय आचार्य श्रीजिनभद्रसूरिन स्वय किया है । अनेक स्थानपर आपने उपयोगी टिप्पनीयां भी की है, जो हमने हमारे मुद्रणमें तत्तत् स्थान पर दे दी हैं । प्रतिकी लिपि सुन्दरतम है । अन्तमें लेखककी पुष्पिका इस प्रकार है स्वस्ति । सवत् १४८८ वर्षे श्रीसत्यपुरे पौष वदि १० दिने श्रीपादेवजन्मकल्याणके श्रीखरतरगणाधिपैः श्रीजिनराजसूरिपट्टालंकारसारै प्रभुश्रीमजिनभद्रमूरिसूर्यावतारै श्रीनन्दिसिद्धान्तपुस्तक स्वहस्तेन गोधितं पाठितं च । तच्च श्रीश्रमणसद्धेन वाच्यमानं चिर नन्दतु ।। सामान्यतया श्रीजिनभद्रसूरिके उपदेशसे लिखाई गई प्रतियाँ स्तम्भतीर्थ(खंभात)निवासी खरतरगच्छीय श्रावक परीक्षित धरणाशाह या श्रीमालिजातीय (१) बलिराज-उदयराजकी पाई गई हैं। किन्तु इस प्रतिमें इन तीनोंमेंसे किसीके नामका उल्लेख नहीं है । यहा यह भी स्पष्ट होता है कि अपने विहारगत क्षेत्रमि भी आचार्य श्रोजिनभद्रमूरिको अन्य मुख्य कार्योके साथ साथ पुस्तकलेखन-सशोधन-अध्यापनादि कार्य भी था । स० प्रति- यह प्रति पाटन-सबबीपाडाके लघुपोशालिक ताडपत्रीय जैन ज्ञानभडारकी ताडपत्रीय प्रति है। इसके पत्र ८२ हैं । प्रतिपत्रमें तीन या चार पक्ति लोखी हैं । प्रतिपक्तिमें ४० से ४३ अक्षर लिखे हैं। प्रति दो विभागमें लिखी है। इसकी लवाई-चौडाई १४४ १।। इचकी है। प्रतिकी लिपि सामान्यतया अच्छी है । अन्तमें लेखककी पुष्पिका नहीं है। इसके अन्तमें अनुज्ञानन्दी नहीं है । ख० प्रति—यह प्रति खभातके श्रीशान्तिनाथताडपत्रीय जैनज्ञानभंडारकी ताडपत्रीय प्रति है। प्राच्यविद्यामंदिर- बडौदासे प्रकाशित इस भंडारको सूचीमें इसका क्रमाङ्क ३८ है । इसमें पत्र १ से १८ में नन्दीसूत्र मूल है, पत्र १८-१९ अनुज्ञानन्दी है और पुन पत्र १ से २४७ में नन्दीसूत्रकी मलयगिरीया वृत्ति है । प्रतिकी लबाई-चौडाई ३१॥४२॥ इच है। ताडपत्रकी चौडाईके अनुसार तीनसे पांच पक्तियां लिखी हुई हैं । प्रतिपंक्तिमे १०१ से ११९ अक्षर दिखे पाये जाते हैं। प्रति शुद्धप्राय है और लिपि सुन्दरतम है । प्रति तीन विभागमें लीखी गई है । अन्तमें इस प्रकारको पुष्पिका है - सं० १२९२ वर्षे वैशाख शुदि १३ मोह बीजापुरे श्रावकपौपधशालाया श्रीदेवभद्रगणि प० मलय- कीर्ति पं० अजितप्रभगणिप्रमृतीना व्याख्यानत ससागसारता विचिन्त्य सर्वज्ञोक्त शास्त्र प्रमाणमिति मनसि ज्ञात्वा सा० धणपालसुत सा• रत्नपाल ठ० गजमृत ठ० विजयपाल श्रे० देल्हासुत श्रे० वील्हण मह० जिणदेव मह• वीकलसुत ठ० आसपाल श्रे० साल्हा ठ० सहजासुत ठ० अरसीह सा० राइडसुत सा. लाइडप्रमृतिसमस्तश्रावकै मोक्षफलप्रार्यकै समस्तचतुर्विधसवस्य पठनायं वाचनार्थं च समर्पणाय लिखापितम्॥छ। इन्हीं विजापुरके श्रावकोंकी लिखाई हुई अन्य कइ ताडपत्रीय प्रतिया खभातके इस भाण्डागारमें विद्यमान है।
२ - रे पति या प्रति मामदाबादके रेसा उपाश्रयके ज्ञानमारको है। इसमें मम्मगिरीमा टीका मी फ्यपाठरूपसे शिस्ति है । सामर्मे मनुशाम्दी मी है । कागम पर मिली हुई या प्रति भनुमान सभवी सदाम सिम्मी मायम होता है। १० प्रतिमा प्रति महमदामाद स्वारको पोके उपाध्यके भानमंगरकी है। इसकी पासल्या २५ है । हरेक पमें नय पलिया है । हरेक पलिम ३१ से १२ मक्षर मिले है। प्रतिको लिपि मुन्दरतम है। मधर मोटे हैं। कागम पर हिसा हुई इस प्रतिक हमें सकी पुष्पिका इस प्रकार है- मन्दी सम्मत्ता या से ११८५ वर्षे फागुन मुवि ७ शनो श्रीमामपाठीम.. [मर पौगार दिये है। श्री मा सुमै मरतु मा इस पुष्पिका बो भक्षर विगार दिये है उनके स्थानमें हार इस प्रकार नये मर मिसे है- साह श्रीपणामुत साह सहिसम्स्य स्वपुण्यार्य पुस्तकमंहार कारापिता मस वर्षमानपुस्तकपरिपाम्नाथ ॥ ७॥ मो० मति—यह प्रसि पाटन मोहेमचंद्राचार्यअनमानमंदिरमें स्थित मोदी भामर्मसरकी है। यह प्रति विक्रमको सोलहवीं सदीमें लिखी हुई है। शु० मति–मह प्रति पाटन-हिमपदाचार्यनजाममविरमें स्थित सुमारनशानमडारकी है। प्रति प्राय शुर है। प्रति भनुमान सत्रहमी सदीके उत्तराम सिसा प्रतीत होता है। स० प्रति—यह प्रति गमोदारक मीसागरान दस्विरसम्पादित मामलमगिरिकतटीकायुज है। गो मापने भागम वाचनाके समय सम्पादित की है। यह मारि वि सं १९७३में भागमोवयसमिसि-सुरतकी मोरसे प्रकाशित हुई है। पूर्णीकी प्रतियाँ मे० प्रति -यह प्रति सम्मेर किलेमें स्थित श्रोमिनप्रीम सापनीय मैन ज्ञानमहारको तारपत्रीय प्रति है। इसका फमा १०है। इस कामें तीन प्रया-१ दशवैकारिक मगस्स्यसिंहाँमा पूर्णी पत्र १८४ । २ नदीसूत्रभूमी पत्र १८५-२२३ । १ मनुयोगवारसूत्रपूर्णा पत्र १२१-२५५ । इनमेंसे मन्दीपूर्णी भौर मनुपोगारी, ये दोनों पूर्णीयाँ किसी गंवार्यको संशोधित है । प्रतिको सबाई-चौडाई २५४२॥ पका है। प्रतिके में हेमनसग या समकाधिका नहीं है । समापि प्रतिका रंगरंग देसनेसे प्रतीत होता है कि-या प्रति तेरहवीं सर्वामें लिखित है। प्रति अपाय है। - यह प्रति माग्मोवाकनी श्रीमागरानग्दरिमहारामसम्पादित मुविस प्रति है। जिसका प्रश्न भाजपमदेवी केशरोमणी येतापरसंस्था रतस्रामको बोरसे हुआ है। पूम्यनीतो इसका कोई भी प्रति म मानेके कारण यह बात भार एपी है। फिर मी एक प्रान्तको तोरसे हमारे संशोपनमें यह माति काममें ही भाई है। दा० मति- यह प्रति मिनागमन पूम्प विजयदानमनिमहाराजससम्पादित मुक्ति प्रति है। गा भाई राम द्वारा प्रान्ति है। इस मी की मदिया है। समापि म सामानदरिम की माविको मपेशा मह उमणी भाति है। पूनिके सम्पादन मौर संगोपन के समय पाटन-मवाचार्यननशानमविरको एक प्रति मोर भतासमाई दसपतमाई मारतीय संसनि रिपामारको प्रतिको मी साम्म रपसी दी। ये दोमो प्रतियां फमश सोया मौर सदा सदा शिमी दुई प्रतियाँ है भोर मादिमरपूर प्रतिया है। समापि य पाठोंके निर्णयमें ये भी सहायक है। इस पूर्णक संपनमें हमार लिये मुस्प मापारप्तम्भ जे० प्रति हाईजोमतीय पुर प्रति है। एपमसिपाकी विभपवा सं. १० मो• पे र प्रतियोका प्रतिनमन के बाद किसी मानने संरपेषन नही किया है। या• मति- ३ - . जे० ख० ल० शु०, ये चार प्रतियां सशोधित प्रतियां हैं। इनमें भी जे० प्रतिका सशोधन खरतरगच्छीय गीतार्य आचार्य श्रीजिनभद्रसरिने किया है, जिसमें आपने नन्दोमूत्रके प्रक्षिप्त पाठादिके विषयमें स्थान स्थान पर टिप्पणीयां की हैं, जो हमने हमारे इस प्रकाशनमें दी हैं, देखो पृ ५ टि १०, पृ. ८ टि १०, पृ. १० टि ७,'पृ ११ टि ११, पृ १२ टि ५ इत्यादि। शु० प्रति अधिकतर मंगमें खं० प्रतिसे मीलतीझुलती होने पर मा जुदा कुलको मालुम होती है । इसमे स्थविरावलिकी प्रक्षिप्त मानी जानेवाली गाथायें नहीं हैं, देखो पृ ८ टि १०, पृ. १० टि ७, पृ ११ टि ११। छटे परिष सूत्रमें जो तीन गाथायें प्रक्षिप्त हैं वे भी इस प्रतिमें नहीं हैं, देखो पृ १२ टि ५। इसी प्रकार मन पर्यवज्ञानके द्रव्यक्षेत्रादिविषयक सूत्रपाठमें जो सूत्रपाठ चूर्णीकार एव हरिभद्रसूरिको अभिप्रेत है वह इस प्रतिसे पाया गया है, देखो पृ. २३ टि ३। ऐसी जो जो अन्यान्य विशेषतायें इस प्रतिको हैं उनका पादटिप्पणीयोंमें उल्लेख कर दिया है। यहा पर परीक्षण एवं अभ्यासकी दृष्टि से पाठमेदोंका निरीक्षण करनेवाले विद्वानोंसे प्रार्थना है कि इस मुद्रण, पृ १० टि ७, पृ ११ टि ११ आदि दो-चार स्थानोंमें P प्रतिका निर्देश किया है वह P प्रति कौनसी ? और किस भडारकी थी? यह मेरी स्मृतिसे चला गया है। फिर भी यहाँ इतनी सूचना कर देता हूँ कि-शु० प्रति कुछ अशमें इस P प्रतिसे मीलतीझुलती प्रति है । अर्थात् जैसे- गोविंदाण पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दो गाथायें P प्रतिमें नहीं हैं इसी तरह शु० प्रतिमें भी उपलब्ध नहीं हैं, देखो पृ १० टि ७ । यद्यपि प्रस्तुत मुद्रणमें इस स्थानमें P प्रतिके साथ शु० प्रतिका उल्लेख छुट गया है किन्तु भडारमें जा कर शु० प्रतिको पुन देखके निश्चित किया है कि गोविंदाणं पि णमो० तथा तत्तो य भूयदिन्ने० ये दोनों गाथायें शु० प्रतिमें भी नहीं है । एवं-वंदामि अजधम्म० तथा वंदामि अज्जरक्खिय० ये दो गाथायें शु० प्रतिमें नहीं हैं, देखो पृ० ८ टि १० । चूर्णी एव टीकाओंमें इन चार गाथाभोंका उल्लेख या व्याख्यान नहीं है । नन्दीसूत्रकी ऐसी और भी प्रति मेरे देखनेमें आई है, जिसमें ये गाथायें नहीं हैं। फिर भी नन्दीसूत्रकी प्राचीन ताडपत्रीय प्रतियोंमें और दूसरी बहुतसी पद्रहवीं-सोलहवीं शती में लिखित कागजी प्रतियोंमें ये गाथायें अवश्य ही उपलब्ध हैं । यहा प्रश्न होता है कि-चूर्णिकार और टीकाकारोंने इन गाथाओंका स्पर्श तक क्यों नहीं किया है। जे० और मो० प्रतिकी विशेषता यह है कि इसमें प्राय लुप्तव्यञ्जनके स्थानमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग न होकर केवल अ और था की श्रुतिवाले प्रयोग ही हैं, जो पूज्य श्रीसागरानन्दसूरिमहाराजके मुद्रणमें नजर आते हैं। ये दो प्रतियां उस परम्पराक्री हैं, जिसमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग कम हैं । आदि ण प्रयोगके स्थानमें नका प्रयोग मुख्य है । जैसे कि- नाण नाह नमसिय नियम नदिघोस निग्गय नाल निम्मल सुयनिस्सिय आदि । डे०२० प्रतियां नप्रयोगके विषयमें जे०मो० प्रतियोंके समान हैं, किन्तु इन प्रतियोंमें अस्पष्ट यश्रुतिके प्रयोग ही - प्रयुक्त हैं। खं०स० प्रतियोंमें णप्रयोगकी प्रधानता है । किन्तु स० प्रतिमें फुरन्त महन्त समन्ता आदि परसवर्णके प्रयोग नजर आते हैं, इतना खं० और स० प्रतिका मेद है। इसी तरह स० और ख० प्रतिका अन्तर यह है कि खं० प्रतिमें चडुलियम्चा पदीवम्वा आदि जैसे प्रयोग भी प्रयुक्त दिखाई देते हैं देखो पृ. १६ टि० ३ । उपर आठ प्रतियोंका परिचय दिया गया है, जो आज उपलब्ध प्रतियोंमें प्राचीन प्रतियाँ हैं। इतनी प्रतियाँ एकत्र करने पर भी चूर्णिकार एवं वृत्तिकारसम्मत ऐसे अनेक पाठ हैं जो इन इतनी प्रतियोंसे भी प्राप्त नहीं हुए हैं। इनका सूचन पादटिप्पणियोंमें यथास्थान किया है । इस नन्दीसूत्रके सशोधन, पाठ, पाठभेद, पाठोंकी कमीवेशीके निर्णयके लिये चूर्णि, हरिभद्रवृत्ति, मलयगिरिवृत्ति, श्रीचन्द्रीय -- टिप्पन इन पारोका समप्रमाबसे उपयोग पिया गया है। इतना ही नहीं किन्तु हा महाँ मन्दीसूत्रके उपरण मास्थान मावि माये है ऐसे द्वादशास्नया, समवायास्त्र एव मगमतासूतकी ममयदेवीया पति, पिस्पायस्यकममधारीमा इति, पाशिकम्पत्ति आदि भनेक शामका उपयोग भी किया है, मिसको प्रतीति इस सम्पादनकी पावटिप्पणियोंको देखनेस होगी। नन्दीसूत्रकी पूर्णिक संशोफ्नो लिये मेरा मापाररसम्म जैसलमेरको प्रति ही है। मगर यह प्रति प्राप्त न होतो तो इसका नो गौरवपूर्ण सम्पादन हुमा है, यह शक्य न बनता । संस्कृत टीका निर्मागके बाद पूर्णिमोका अध्ययन कम हो बानेसे प्राय मान वानमगरोंमें मो मो भागमिक मा मागमेकर शाबकि चूर्णिप्रयांचे हस्तप्रसियाँ है, के सभी मासि माण्डागारस्वरूप हो हो गई है। इतनी मात परूर है कि-मोग्लो प्रति प्राचीन त्यो त्यो पशुद्धियां कम रहता है। किन्तु एफ हो युगको प्रतियों के लिये यह अनुभव हुआ है कि-मगर वह प्रति प्राचीन प्रतिको मा मिम प्रदेशस्विस प्रतिको मन न हो कर, उसी गुगका या प्रदेशको उत्तरोत्तर नफसको नकस हो, तब तो उत्तरोतर मशुद्धियोकी पनि ही होती रही है इसना ही नहीं पजियाको पछिमा और सम्पर्म के सन्दर्भ गायब हो गये है। मस्त, मेरेको प्रेससमेरको प्रसि माली, मह में सिर्फ मफ्ना हो नहीं साबमें सब शासपाठी न गातार्य मुनिगण एष विनोका मी सौभाग्य समानता है। अनेक आगमोंकी पूर्णि वृत्ति मादिके अक्सोफनस प्रवीन हुमा है कि अगर प्राचीन पर ममग ममा कुसकी प्रतियां प्राप्त न हो सो मुद्रणाविमें प्राय सैकरों मतियां पाठपराधिमा मादि रहनेका सम्मब रहता है। इसा हो नहीं सन्दर्भक सन्दर्भ ष्ट माते है । विशन् संशोधकोंके प्पानमें मानेके लिये मै यहाँ एफ बासको उमृत करता इ. मनुयोगदारसूत्रको पूर्णिमा संशोफ्न मने पाटन शानमारको सो प्राचीन पाडपत्रीय इस्तप्रतियाँ मौर संमारके पोशान्तिनाबमानमारको दो सारपत्रीय प्रतियां एवं पार प्रतिमोके मापारसे मुचारतया कर लिया । कारखान होमे पर मी विमें विपास हो गया था कि-एर संशोधन मभ हो गया है। किन्तु अब मैसलमेर बामेका मोका मिश भौर किशानमगरकी प्राचीन वारपत्रीय प्रतिसे मुलना की सो कितने ही सारवान दूर हुए, इकना ही नहीं, परन्तु मम्ग अम्मा स्माममें होकर दरा-पार पहियाँ बिठना सरे कुमकी प्रतिया छूट गया हुमा ममा पाठ प्राप्त हुमा और ममेकानेर मशुद्धियाँ भी पूर हुई। यह प्राचीन प्राचीनतम एवं ममा मसग कुछकी प्रतियों के उपयोगका सामान्य है। प्रसंगवश यहाँ मा कहना मौ सचिस है कि इस नदीमचूमफि संशोधन पर्व सम्पादनमें साफ्त उपयोग, माई गई प्रतियोंके मगया इससी ममेक प्रतियां ने समय-समय पर देसी है, इससे बात हुमाल सममेरको प्रतिको अपेक्षा इन प्रतियोम त द प मावि पीक प्रयोग विपुः प्रमाणनबर भाये है। मन्दीरमके मणेवा मायास्त्रकारने नन्दौसममें कही भी अपने नामका निर्देश नहीं किया है, किन्तु पूर्णिकार भौबिन्दास्गमि माचरने भनी पर्णिमें सूत्रकारका माम निर्दिर किया है, मो इस प्रकार है- -एक कतमगोपारी पेरावलिकमे य सिप भरिस स वसितम इसगणिसासो देवायगो साबण दिष्टाप इणमाह" [पत्र ११] इस यसबारा पूर्णिकारने मम्दीसूत्रप्रणेता त्वविर श्रौदेवाचक-ऐसा बताया है। मानार्म भादरिमनपरि एवं माचार्य श्रीमगिरिपरिने माँ इसी भाशयका मल्हम मपनी मफ्नी टीकामें किया है, फिन्त इनका मम मापार पूर्णिकारन हेस ही है। पूर्णिकारक ठोससे एक होता है कि नदीसूत्रके प्रणेता नन्दिप्रस्मचिरावरिभात विमलविर बीडम्पमणिके शिष्य धादेवापत।
। पन्चामजी श्रीमन्यागविजन्दजीमहाराज- अपने चारनिर्माणसवन और जैन सागणना' निबन्ध (नागरीप्रचारिणी भाग १० अर') अनेकानक प्रमाण और युक्ति द्वारा नन्दीमूनप्रणता म्पविर दबावत और जैन आगमकी माथुर। एई वाल्लभी वाचनामों को सवादित करनेवान् श्रीदेवनिगणि क्षमाश्रमको एक नया है । नन्यकर्मग्रन्धकार आचार्य श्रीदवेन्द्रसूरि महागजने अपनी स्थापन निम देवरिवाचक, देवदि क्षमाश्रमग नागके उदेरखपूर्वक अनेकवार नन्द्रीत्रपाटो उग दिये है. यह मा उन्होंने देववान और देवतिक्षमाश्रम गको एक व्यक्ति मानके ही दिये है। यह भी बीकच्यागविगाजी महागनकी मान्यताको पुष्प बग्नवास सहन है । तथापि नन्दीको स्यांगवीमें अनिम स्थविर दुम्यगगि है, जिनको नीर्गिकाग्न दवाव को गुरु दानाय है! तर कपनाको वि. स. १२४६ में लिखित प्रतिसे ले कर आज पर्यन्तकी मानीन-भवानीन ताटपनीय एवं कागकी प्रतियोम म्यविगलिक पाटाकी की बगीक कारण कोई एक स्थविरका नाम व्यवरि मनपार पाया नहीं जाता। इस कारण उन दोनों स्थपिरों को एक मानना यह कहा तक उचित है, यह तज्ञ विद्वानोंक लिये विचारणीय है । देवाचक और देवदिनमाश्रमण न नाम और विशेषग- उपाधिमें भी अता है। माथमें यह भी देखना जरूरी है कि नन्दीका बिरामीम बायगर्वस, वायगपय, वायग. हम प्रकार वायग शब्दका ही प्रयोग मिना है, दूसर कोई वादी, क्षमाश्रमग, दिवाकर जन पदका प्रयोग नजर नहीं आता है । अगर देववाचकको अमाश्रमणकी भी उपाधि होना तो नन्दीचूर्णिकार जर मिलते है।। जी द्वादशारनयनाटाकाक अगेता सिंहवादी गणि समाश्रमग, विशेषावश्यकी अपूर्ण खोपन टोकाको पूर्ण करनया कोहार्यवाही गणि महनर, सम्मानित प्रणेता वादी मिद्धमनगी दिवाकर भादि नामोंके साथ दो विशेषग-उपाधियां जुटी हुई मिलता है इसी नग्ह देववाचक लिये भी दो उपाधिोका निर्देश जर मिलना । अन देववाचक और देवदिनमात्रमण, ये दोनों एक हा व्यक्ति है या भिन्न, यह प्रश्न अब भी विचारणीय प्रतीत होता है । कम्पमूत्रकी स्थगिल और नदीमूनकी न्याविरायीका मेलोल कैसे, कितना और कहा नक हो सकता है, यह मी विचागई है। वाचकपदी अपेक्षाकृत प्राचानता होन पर भी कल्पमूत्रकी समयसमय पर परिवर्धित स्थविराव ठाम येर और ग्वमाममग पटका ही निर्देवा नजर आता है, यह भी दोनों विर और स्थविगवळीकी विशेषता एव भिन्नताके विचारका साधन है। यहीं पर प्रसगोपात्त एक बात स्पष्ट करना उनित है कि-भडे वगमूरिकी कहावीम एक गाथा निम्नप्रकारकी नजर माती है- वाई य समासमणे दिवायर वायगे ति गट्ठा । पुत्रगय जस्मस जिणागमे नम्मिमे नामा ॥ अथोत्यादी, क्षमाश्रमण, दिवाकर और वाचक, ये एकार्थक-समानार्थक शब्द है । जिनागममे जो पूर्वगत ग्रास हैं उनके शेष अर्थात् अगोका पारम्परिक ज्ञान जिनके पास है उनके लिये ये पद है। इस गाथासे यह स्पष्ट है कि-उन उपाधियोबाले आचायोंके पास पूर्वगतजानकी परपरा थी। किन्तु माज जैन परम्परामें जो ऐसी मान्यता प्रचलित है कि-इन पदधारक आचार्योंको एक पूर्वआदिका ज्ञान था, यह मान्यता भ्रान्त एवं गलत प्रतीत होती है । कारण यह है कि अगर आचारागादि प्राथमिक अंगमागम शीर्गविशीर्ण हो चुके थे, इस दशामें पूर्वश्रुतके अखद रहनेको सभावना ही कैसे हो सकती है ।। स्थविर श्रीदेववाचककी नन्दोमूत्रके सिवा दूसरी कोई कृति उपलब्ध नहीं है । चूर्णिकार नन्दीसूत्रचूर्णिके प्रणेता आचार्य श्रीजिनदास गणि महत्तर हैं । सामान्यतया आज यह मान्यता प्रचलित है कि- जैन मागम उपरके भाष्योंकि प्रणेता श्रीजिनभद्र गणि समाश्रमण और चूर्णियोंके रचयिता श्रीजिनदास गणि महत्तर - - । हो, और ऐसे प्राचीन रहेम्व पाारसी भादिमें पाये मी पाते है किन्तु भाप्प पूर्णियोंकि मवगाहन बाद पे दोनो मान्यताएं गत प्रतीत हुई है। यहाँ पर माष्यकारोका विचार मप्रस्तुत है, भत' सिर्फ यहाँ पर पैन मागकि उपर को प्रापान पूर्णिया उपसम्म । उहाँके विपयमें ही विचार किया जाता है। माम नैन मागमाके उपर पो पूर्णिमामा प्रावमापाप्रपाम म्पासाम्य प्राप्त है उनके नाम कमश ये है- १ भाभासपूर्णि २ सूत्राणि ३ मगक्तीचूणि १ मानाभिगमणि ५ प्रज्ञापनासूमशीरपदपूर्गि बा करणपूर्णि ७ दशाकम्पपूर्णि ८ कल्पर्णि ९ कम्पविशेषभूणि । मबहारसूत्रचूर्णि ११ निधीपत्रविशेपनि १२ पचापचूर्णि १३ मौतकपाणि १९ मावश्याणि १५ दशकारिकर्णि श्रीअगसमसिंहक्वा १६ काकासिमपूर्णि कविवरणात्सा १७ उत्तराप्पयनणि १८ नदीसर्गि १९ मनुमोगदारपूर्णि २ पाक्षिकपूर्णि । उपर लिन मौस पूर्णियोंके माम दिये है उनका भौर इनके प्रणेतामोंक विषयमें विचार करने के पूर्व पतनिफ्पक पूर्णि- मचोंके प्राप्त बडेसोको में पसाप यहाँ उखत कर देता है, मो मविप्यमें विशनों के लिये काममा विचारसामग्री पनी । (१) भाचारााी । मन्त:- से हु निरामणमापतिहियो। शेष सुरेव ॥ इन्ति माघारी परिसमाप्ता ॥ नमो मुपदेषमाए मगदईए । प्रनामम् ८३ (२) मकवाचूर्णी । मन्त-~- सामिप स्नेसि गेसम्म समिसि ।। नम सचिव बीराम विठमोहाय ॥ समाप्त पेद सूप्रस्तामिर्म द्वितीयमामिति । मा भवतु मीधिनशासनाय । गर्गगनि समाप्ता || प्रत्याप्रम् ९५० (२) मगपतीनि- भीमगसीर्णि परिसमातेति ॥ इति मन् ॥ मुमदेवम सु पदे पद पसापण सिक्सिय नाण ! रिदय पि पतन (शम)रेवि पसाबागि पगिवयामि ॥ मग ५७ ७॥in (४) मीषामिामचूर्णि- इस पूर्णांकी प्रति अपानपि वास लिसी महारमें देखने में नही माई है। (५) पापनाशरीरपदपूभि । अन्ता- ममिह समयविस्त मई मुरिमिकोण होना है। निणवणमिहन्न समिम में पसोसि ॥१॥ ॥ सरीरपदस्स पुण्णी मिणमाखमासमभकित्तिमा समत्ता ।। मनुयोगदात्तणि पत्र ७१ । याकिनीमाचरासन भाषाम मरिमदरारिकम भनुयोगदासमुत्ति पत्र ९९ में भी यही छेस है। (६) मम्म्द्वीपकरपणि । अन्त:- पर्व परिक्षमागस्स तेरासिय पउप्रिय। विस्मोहीमो मागेमम्मामा ॥ नंपुरोपपगचिकरमार्ग सुष्पी समचा ।। (७) वसामुत्तमपनि । मन्ता- भाष णया कि पाप करणमओ-सम्पेसि पि पगाणं गापा || वधाना पूर्ण समाप्ता ॥ (८) कसपूर्णी- माउयममा गाहा १९ । विवरण हा पिमेसापस्सगमासे । मामिट पायगे को पनि पर म्यामा फेचिप को उf चिया मम्मपगरीए । पर्व पगि गत । ।
- अन्त:- तो य आराहणातो डिण्णससाग भवति ससारसतनि हेतु मोक्रय पावतीति ॥ कल्पचूर्णी ममाता ।। प्रन्थानम्-५३०० प्रत्यतरगगनया निर्मातम् ।। [सर्वग्रन्थानम्-१४७८ } || (९) कल्पविशेषचूर्णि- कप्पविसेसचुग्गी समत्तेति ॥ (१०) व्यवहारचूर्णि । अन्तः- व्यवहारस्य भगवत मर्यविवलाप्रवर्तने दक्षम् । विवरणमिद लगातं अमणगणानाममृतभूतम् ॥१॥ (११) निशीथविशेपणि । आदिः नमिऊगहताण, सिद्राण य कम्मचकमुकाण । सयणसि गेहविमुमाग सञ्चसाहूग भावेण ॥१॥ सविसेसायरजुत्त काउ पगामं च अत्थदायिस्स । पज्जुण्णखमासमणस्म चरण-करणाणुपालस्स ॥२॥ एवं कयप्पणामो पकप्पणामस्स विवरणं बने । पुवायरियाय चिय अहं पि न बेच उ विसेसे ॥३॥ भगिया विमुत्तिचूला भहुणाऽवमरो णिसीहचूलाए । को सबंधी तिस्सा ' भण्गड, इगमो निसामेहि ॥४॥ तेरहवा उदेशके अन्तमें- सकेरजडमउडविभूसगस्स तगामसरिसणामस्म । तत्स सुतेणेस कता विमसचुणगी गिसीहरूस ॥ पद्रहवा उद्देशके अन्तर्म- रैविकरमभिधाणकवरसत्तमवागतमश्वरजुण्ण । णाम जस्सियोर मुतग तिस्से कया चुण्णी ।। सोलहवा उद्देगके अन्त- देहंडो सीह थोरा य ततो जेट्ठा सहोयरा । कणिट्ठा देउलो गणो सत्तमो य तिइजिओ । एतेसि मझिमो जो उ मदेवी(मदधी) तेण वित्तिता(चिन्तिता) । अन्त:- - जो गाहामुत्तत्थो चेवविधपागडो फुडपदत्यो । रहओ परिभासाए साहूण अणुग्गहटाए ॥१॥ ति-चउ-पण-टुमवग्गे ति-पग-ति-तिगक्खरा ठवे तेसिं । पढम-ततिपहिं गिट्ठ सरजुएहिं णाम कयं जस्स ॥२॥ गुरुदिण्णं च गणित्तं महत्तरत्त च तस्स तुद्वेण । तेण कतेसा चुण्णी विसेसगामा णिसोहस्स ॥३॥ णमो मुयदेवयाए भगवतीए ।। जिणदासगणिमहत्तरेण रइया णिसीहचुण्णी समत्ता ।। (१२) पञ्चकल्पचूणि । अन्तः- कप्पपणयस्स मेओ परूविओ मोक्खसाहणट्ठाए । ज चरिऊण सुविहिया करेंति दुक्खक्खय धीरा ॥ पञ्चकल्पचूर्णिः समाप्ता || ग्रन्थप्रमाणं सहस्रत्रय शतमेक पञ्चविंशयुत्तरम् ३१२५ ॥ (१३) जीतकल्पवृदृचूर्णी । अन्तः- इति जेण जीयढाण साहूणऽइयारपकपरिमुद्धिकर । गाहाहिं फुड रइय महुरपयस्थाहिं पावणं परमहियं ॥ १ ॥ १. इस गाथासे ज्ञात होता है कि चूर्णिकार श्रोजिनदासगणिमहत्तरके पिता का नाम नाग अथवा तो चन्द्र होगा । २ इस गाथाके अर्थका विचार करनेसे चर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरको माताका नाम प्राकृत गोवा संस्कृत गोपा अधिक सभवित है। ३ इस गाथामें उल्लिखित देहड आदि, चूर्णिकार श्रीजिनदासगणि महत्तरके सहोदर भाई हैं।
८ मिषमाखमासमण निश्म्यिमुत्तऽपामगामसरण | तमह बंद पयो परम परमोगगारकारिणं महम ॥२॥ ॥ बीतत्पनि समाता । सिदसनतिरपा ॥ (१४) भारश्यक पूर्णी । मन्त:-- परणनयो सम्बेसि पि मबाण गापा ।। इति भाषस्सगनिमुधिष्मी समाता ॥ मग महामी ॥ (१५) बसकासिकरप्रभारस्पसिंहपूर्णी । अन्त एवमेत परमसमुचितगादिपरण-हरणाणेगपणागम मम्वाणामणरुमासा मनिममणादि वणि समासपयणेम इसकासियं परिसमच ॥ मम ॥ पीरपरस्त मगवतो तित्वे कोरीगणे मुबिपुरुम्मि । गुणागहरामस्सा पेरसामिस्स साहाए ॥ १ ॥ महरिसिसरिससमावा भावाऽमागाण मुणितपरमत्मा । रिसियवसमासमणा समा-समाण निधी मासि ॥२॥ तेसि सीसेण इमा फससमयमादणामधेघेणं । इसकासिपस्स पुष्पी फ्माण रमणातो उवणवा ॥३॥ रुपिरपद-सपिणियता निमपुणरुत्तस्विरपसंगा । वस्स्वाणर्मतरेणापि सिस्समतिबोषणसमत्मा ॥२॥ ससमम्परसममणमाण में बण समापितं पमावेण । त लमह पसार य इस पिण्णता परमणीण ॥५॥ ॥ दसकासियषुण्णी परिसमचा ।। (१६) वपातिकममणि नवविवरणास्या । मन्त-- ममपणाणतर 'कारमामो समापार' नौवणकासो गस्स गतो समाहीए पि । अहा तेग पत्तिएण म भारहगा मसि जि ॥ वकामिकी सम्भव ॥ प्रथाप्रब ७९० (१७) उपराप्पयन पूर्णि । मन्त:-- पाणिमाइसौभूतो काठियापिता य पन्जसाहीयो । गोमासियमासरमो विसातो माप्ति समेगम्मि ॥ १ ॥ ससमम-परसमबविक भोमस्सी देहिम सुर्गमीरो । साँसगणसंपरिखुदो पताणरतिप्पियो मासी ॥२ ।। सेसि सीसण इम उचरायणाण पुणिमा म । सर्य मग्गाई सोसाणं मवनुदान ॥३॥ - पप उस्मुक्त भमाणमाणेम पिरति होमा । मयुमोगपरा में मगुपिते समारेंत ॥१॥ ॥ पशिोचराप्पयनी समाता ॥ प्रथाम प्रत्यक्षारगणनया ५८५ ॥ (१८) नन्दीपपूर्णि। मन्तः- णि रे ण ग म प ण ( स दारिमा () पमुपतिसमगमट्टिताम । समद्विता मीमतचिंतिमक्सरा फर कोयतऽमिमाण पुणो ॥१॥ एकराको पथम वर्षशतेषु म्पत्रिकान्तेषु मानवतेषु नम्पप्यपनी समाप्ता इति ॥ प्रधामम् १५ (१९) मनुयोगवारम्वणि । मन्ता- परणमेव गुणो वरणगुणो । मामा परण पारित्रम् गुण समाविया अगविभा तेसु मो बाहिमो सार सो सम्ममयसम्मतो भवतीति ॥ ॥ कवि श्रीवताम्बराचार्य प्रीमिनदासगपिमाचरम्पपारानामनुयोगद्वारापां निः॥ १ स पि पर प्रिप्पन एपनेबारे भाभीचामरिधी खनिया मामते खोड मते! । ॥
। -- (२०) पाक्षिकसूत्रचूणि । अन्तः- अनुष्टुप्मेदेन छदसा प्रथाग्र चत्वारि शतानि ४०० ।। पाक्षिकप्रतिक्रमणःचूर्गी समातेति ॥ शुभ-भवतु सकल सवस्य । मंगल महाश्री ॥ १ उपर जिन वीस चूर्णियोंके आदि-अन्तादि अशोंके उल्लेख दिये है इनके अवलोकनसे प्रतीत होता है कि-प्रज्ञापना- सूत्रके वारहवें शरीरपदकी चूर्णि श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमण कृत है। आज इसकी कोई स्वतन्त्र हस्तप्रति ज्ञानभडारोंमें उपलब्ध नहीं है, किन्तु श्रीजिनदासगणि महत्तर और आचार्य श्रीहरिभद्रसुरिने क्रमग अपनी अनुयोगद्वारसूत्र उपकी चूर्णि और लघुवृत्तिों इस चूर्णिको समग्र भावसे उद्धृत कर दी है, इससे इसका पता चलता है । श्रीजिनभद्रगणि क्षमा- श्रमणने प्रज्ञापनासूत्र उपर सम्पूर्ण चूर्णी की हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है । इसका कारण यह है कि-प्राचीन जैन ज्ञानभंडारोंमे प्रज्ञापनासूत्रचूर्णीकी कोई हाथपोथी प्राप्त नहीं है। दूसरा यह भी कारण है कि-आचार्य श्रीमलयगिरिने अपनी प्रज्ञपनावृत्तिमें सिर्फ शरीरपदकी वृत्तिके सिवा और कहीं भी चूर्गीपाठका उल्लेख नहीं किया है। अत जात होता है कि श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणने सिर्फ प्रज्ञापनासूत्रके बारहवें अर्गरपढ़ पद पर ही चों की होगी। आचार्य मलयगिरिने अपनी वृत्तिमें इस चूर्णीका छ स्थान पर उल्लेख किया है । २ नन्दीसूत्रचूर्णी, अनुयोगद्वारचूर्णी और निगीथसूत्रचूर्णीके प्रणेता श्रीजिनदासगणि महत्तर हैं। जो इन चूर्णीयोंके अन्तिम उल्लेखसे निर्विवाद रूपसे ज्ञात होता है । निशीथचूर्णिके प्रारम्भमें आपने अपने विद्यागुरुका शुभनाम श्रीप्रद्युम्न क्षमाश्रमण वतलाया है। समव है कि आपके दीक्षागुरु भी ये ह। हों । इन चूर्णियोंकी रचना जिनभद्र गणि क्षमाश्रमणके बादकी है। इसका कारण यह है कि नन्दोचूर्णिमें चूर्णिकारने केवलज्ञान-केवलदर्शनविषयक युगपदुपयोग- एकोपयोग-क्रमोपयोगकी चर्चा की है एवं स्थान स्थान पर जिनभद्रगणिके विशेपावश्यक भाष्यकी गाथाओंका उल्लेख भी किया है। अनुयोगद्वारचूर्णीमें तो आपने श्रीजिनमगणिकी शरीरपदचूर्गीको साधन्त उद्धृत कर दी है। अत ये तीनों रचनायें श्रीजिनभद्रगणिक वादकी ही निर्विवाद सिद्ध है। ३ दशवैकालिकचूर्णीके को श्रीअगस्त्यसिंहगगी हैं । ये आचार्य कौटिकगणान्तर्गत श्रीवत्रस्वामीकी शाखामें हुए श्रीऋपिगुप्त नमाश्रमणके शिष्य है । इन दोनो गुरु-शिष्यों के नाम शाखान्तरवर्ति होनेके कारण पट्टावलीयोंमें पाये नहीं जाते हैं । कल्पमूत्रकी पट्टावल्लीमें जो श्रीऋषिगुप्तका नाम है वे स्थविर आर्यमुहस्तिके शिष्य होनेके कारण एवं खुद वज्रस्वामीसे भी पूर्ववर्ती होनेसे श्रीमगस्त्यसिंहगणिके गुरु ऋषिगुप्तसे भिन्न हैं । कल्पसूत्रको स्थविरावलीका उल्लेख इस प्रकार है- थेरस ण अजमृहत्यिस्स वासिहसगुत्तस्स इमे टुवालस थेरा मतेवामी महावच्चा अमिण्णाया होत्था । तं नहा- थेरे य अजरोहण १ जसमद्दे २ मेहगणी ३ य कामिड्ढी ४ । सुट्ठिय ५ मुप्पडिबुद्धे ६ रक्खिय ७ तह रोहगुत्ते ८ य ॥ १ ॥ इसिगुत्ते ९ सिरिगुत्ते १० गगी य बमे ११ गणी य तह सोमे १२ । दस दो य गणहरा खल एए सीसा सुहत्थिस्स ॥ २ ॥ स्थविर आर्यमुइस्ति श्रीवजस्त्रामीसे पूर्ववर्ती होनेसे ये कृषिगुप्त स्थविर दशकालिकचूर्णिप्रणेता श्रीअगस्यसिंहके गुरु श्रीऋषिगुम क्षमाश्रमणसे जुदा है, यह स्पष्ट है । आवश्यकचूर्णी, जिसके प्रणेताके नामका कोई पता नहीं है, उसमें तपसयमके वर्णनप्रसगमें आवश्यकर्णिकाग्ने इस प्रकार दशवैकालिकचीका उल्लेख किया है- न च -२ तमो दुधिो-यो मम्मतरो म । नपा दसवेवासिययुष्णीए पाउसोदणत ( पासणेदाणेत) महदेणं गिजरद सापस पडिबामणीय ८ । [मावस्यकवी विमाग २ पत्र ११७] आवश्यकर्णिके इस उतरणमें वकास्किपर्णीका नाम नमर आता है । दक्षनेशालिकराके उपर दो पूया भाग प्राप्त है-एक स्थविर मगसमसिंहप्रणीत मौर एसरी पो भागमोबारक श्रीसागरानन्दरि महारामने रतमामकी श्री- उपमदेषगी केशरीमसमी न घेताम्बर संस्थाको भोरसे सम्पादित की है जिसके ककि नामका पता नहीं मामी भौर मिसके भनेक उद्धरण याकिनीम्हचरापुत्र माचार्य श्रीहरिमरिमे अपनी दसवैकाषिकसमको शिष्यरिवारसिमें स्थान स्वाम पर स्वविवरणके माम दिये है। इन दो धूर्णियों से बागम्यकपर्णिकारको कौनसी पूर्णि अभिप्रेत है, यह एक कठिनसी समस्या है। फिर मी गावश्यकचूर्णकि उपर उलिम्पित उरणको गौरसे देख्नेसे अपन निर्णयके समीप पहुंच सकते है । इस उदरगौ पाउमोदणात" मह पाठ गस्त हो गया है। यास्तदमें ' चाउगोदणतं" के स्थानमें मूम्पाट "पारगेदात" ऐसा पाठ होगा । परन्तु मूलस्थानको पिना देने ऐसे पाठोंके मूग आशयका पता न पनन पर केवल शाम्दिा नि करके सम्मा पन्ध पाठोंको विशनोंने गम्त बनाने के सम्मान ददाहरण मेरे सामने है। दरकासिनको प्राप्त दोनों पूर्णियोंको मैने गरावर देखी है, किन्त "चाउछोदणं "का कोई उम्प उनमें नहीं पामा मौर इसका कोई सार्थक समन्म मी नहीं है। दश- वैकालिकसूत्रकी मगस्यसिंहापा पूर्णिमें तफ्के निरूपणकी समाप्तिके गाव "पामणेवानि" (पत्र १९] ऐसा पूर्णिकारन मिसा , मिसको मारम्पकर्णिकारने याममेदाणंत" वाक्पारा जिस किया है। इस पाठको बादके विशनोन मूस स्थानरिक्त पाठको विना देसे गात मान्दिक मुमारा पर बिगार दिया ऐसा निश्चितरूपसे प्रतीत होता है। भत में इस निर्मम पर माया इं कि-आपश्पर्णिकारनिर्दिए दावेकाधिकर्णि मायसिंहीमा पूर्णी ही है। मौर इसी कारण मगस्पसिया पूर्णी भावस्कर्णिक पूर्वको रचना है। माचार्य श्रमिमरिमे मपनी शिष्परिसाइचिमें इस चूर्णाका सास सौरसे निर्देश नहीं फिमा है। सिर्फ एपका- # रतिपाल्पा नामक दशकालिकसूत्रको प्रथम भूमिकाको म्पास्मा [फा २७३-२] "भग्ये सुम्मापाते ऐसा निर्देश करके मगत्पसिंहाया पूर्णांका मतान्सर दिया है । इसके सिया की पर मी इस पूर्णिके मामका उछेस नही किया है। इस भगतयसिंहीया पूर्णिमें सत्कारपती संभ्याम्प माचनान्तर-पाठमेव मर्पमेव एवं सूत्रपाठोकी कमी-पेसीका काफी निर्देश है, मो मतिमारपके हैं। यहाँ पर प्यान वेन मैसी एक बास मोकि-दोनों पूर्णिकारोंने अपनी पूर्णमि दशवास्त्रि उपर एक प्राचीन चूी या एचिका समान रूपसे उछेस मसालिका का पूर्णमि किया है। जो इस प्रकार है- "परमातो दृषिगतातो पशुऐसमेतगाधामो । महा- दुस्स दुरसमाए पीक्डि १ हुमगा पुणो कामा २ । सातिमाम मणुस्सा १ भपिरहाणे विम दुस्सं ॥१॥ भोममणम्मि य मिसा ५क्त पुणो सेपिम मबति । महोवर्सपमा वि स ७ दुसमो पम्मो गिर गिहिणो ८ ॥२॥ नियति परिबिसा पो ११ सापमयोग गिदिवासो १३ । पते तिमिण पोसा म हाँति भणगारपासम्मि १ सापारणा य भोगा १५ प पुष्ण-पानसमेष १६ । मौसमनि माणसाण समागमणि १७ ॥२॥ १२११॥
णत्थि य अवेदयित्ता मोक्खो कम्मरस निच्छओ एसो १८ । पदमट्ठारसमेत वीरवयणसासणे भणितं ॥ ५॥" अगस्त्यसिंहीया चूर्णी दूसरी मुद्रित चूर्णीमें [पत्र ३५८] "एत्थ इमाओ वृत्तिगाधाओ । उक्तं च" ऐसा लिखकर उपर दी हुई गाथायें उद्धृत कर दी हैं। इन उल्लेखोंसे यह निर्विवाद है कि-दशवकालिकसूत्र के उपर इन दो चूर्णियोंसे पूर्ववर्ती एक प्राचीन चूर्णी भी थी, जिसका दोनों चूर्णीकारोंने वृत्ति नामसे उल्लेख किया है। इससे यह भी कहा जा सकता है कि----आगमोंके उपर पद्य और गद्यमें व्याख्याग्रन्थ लिखनेकी प्रणालि अधिक पुराणी है । और इससे हिमवंतस्थविरावलीमें उल्लिखित निम्न उल्लेख सत्यके समीप पहुचता है- "तेषामार्यसिंहानां स्थविराणा मधुमित्रा-ऽऽयस्कन्दिलाचार्यनामानौ द्वौ शिष्याचभूताम् । आर्यमधुमित्राणां शिष्या आर्यगन्धहस्तिनोऽनीवविद्वास प्रभावकाश्चाभवन् । तैश्च पूर्वधरस्थविरोत्तसोमास्वातिवाचकरचित- तत्त्वार्थोपरि अगीतिसहस्रश्लोकप्रमाण महाभाष्यं रचितम् । एकादशाङ्गोपरि चाऽऽयस्कन्दिलस्थविरा- णामुपरोधतस्तैर्विवरणानि रचितानि । यदुक्तं तद्रपिताऽऽचारागविवरणान्ते यथा-- थेरस्स महुमित्तस्स सेहेहिं तिपुवनागजुत्तेहिं । मुणिगणविवदिएहिं ववगयरायाइदोसेहिं ॥ १ ॥ भद्दीवियसाहामउडेहिं गवहत्थिविबुहेहिं । विवरणमेय रइय दोसयवासेसु विकममो ॥ २ ॥ आचारागसूत्रके इस गन्धहस्तिविवरणका उल्लेख आचार्य श्रीगीलाङ्कने अपनी आचाराङ्गवृत्तिके उपोद्घातमें भी किया है । कुछ भी हो, जैन आगमोंके उपर व्याख्या लिखनेको प्रणाली अधिक प्राचीन है । ४ उत्तराध्यनसूत्रचूर्णिके प्रणेता कौटिकगणीय, वज्रशाखीय एव वाणिजकुलीय स्थविर गोपालिक महत्तरके शिष्य थे । इस चूर्णिकारन चूर्णिमें अपने नामका निर्देश नहीं किया है। इनका निश्चित समयका पता लगाना मुश्किल है । तथापि इस चूर्णिमे विशेषावश्यकभाष्यकी स्वोपज्ञ टीकाका सन्दर्भ उल्लिखित होनेके कारण इसकी रचना जिनभद्रगणि क्षमाश्रमणके स्वर्गवासके बादकी है। विशेषावश्यक माष्यकी स्वोपन टीका, यह श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणको अन्तिम रचना है । छट्टे गणधरवाद तक इस टीकाका निर्माण होने पर आपका देहान्त हो जानेके कारण वादके समग्र प्रयकी टीकाको श्रीकोट्टार्यवादी गणी महत्तरने पूर्ण की है। ५ जीतकल्पवृहचूर्णीके प्रणेता श्रीसिद्धसेनगगी हैं । इस चूर्णिके अन्तमे आपने सिर्फ अपने नामके अतिरिक्त और कोई उल्लेख नहीं किया है । श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमणकृत ग्रन्थके उपर यह चूर्णी होनेके कारण इसकी रचना श्रीजिनभद्रगणिके वादकी स्वयसिद्ध है । इस चूर्णिको टिप्पनककार श्रीश्रीचन्द्रसूरिने बृहचूर्णीनामसे दरशाई है- नत्वा श्रीमन्महावीर परोपकृतिहेतवे । जीतकल्पबृहन्चूर्णेाख्या काचित् प्रकाश्यते ॥ १ ॥ उपरनिर्दिष्ट सात चूर्गीयोंके अतिरिक्त तेरह चूर्णीयोंके रचयिताके नामका पता नहीं मिलता है । तथापि इन चूर्णीयोके अवलोकनसे जो हकीकत ध्यानमें आई है इसका यहाँ उल्लेख कर देता है। यद्यपि आचारागचूर्णी और सूत्रकृताङ्गचूर्णकि रचयिताके नामका पता नहीं मिला है तो भी आचाराङ्गचूर्णीमें चूर्णि- कारने पद्रह स्थान पर नागार्जुनीय वाचनाका उल्लेख किया है, उनमेसे-सात स्थान पर. “भदतनागज्जुणिया" इस प्रकार बहुमानदर्शक ‘भदन्त'शब्दका प्रयोग किया है, इससे अनुनान होता है कि ये चूर्णिकार नागार्जुनसन्तानीय कोई स्थविर. होने चाहिए। मूत्रकृताङ्गचूर्णीमें जहा जहा नागार्जुनीय वाचनाका उल्लेख चूर्णिकारने किया है वहा सामान्यतया - ૧૨ मागम्युणिया इतना ही मिला है। मत ये दोनों पूर्णिकार मला ममा जात होते हैं। सूत्रम्साहपूर्णमि जिनम्बगीने विशेषावकमाप्फको गाभा पर स्वोपर टीका के सम्मम अनेक स्थान पर उदृत किये गये हैं, इससे इस पूर्णिको रचना भामिनम्बगणिके बादकी है तब आपारामि भिनमागणिके कोई प्रबका उम्स मही है, इस कारण इस पूर्णांकी रचना श्रौनिनमगणिके पूर्वकी होनका सम्भव अधिक है। मगनतीसपनिमें प्रीमिनभद्रगणांके विशपपरतीप्रामको गामानों के उमरण होनेसे मौर फल्सचूमि साभार विसेसारस्सगमासका नाम उल्लिसित होनेसे इन दोना पूर्णिमोकी रचना निश्चित रूपसे श्रोमिनमदगी के बादकी है। दधारपर्णीम फेसबाम फेवदर्शनविषयक पुगफ्टुपयोगादिवावका निर्देश होनेसे या पूर्णी मी भौमिनमागणी मानश्यकर्णिके प्रणेवाका नाम भूर्णीको कोई प्रतिम प्राप्त मही है। श्रीसागरानन्दसार महाराममे अपने सम्पादनमें इसको गिनवासगणिमहरात पतगई है। प्रतीत होता है कि-भापका यह निर्देश भीधर्मसागरोपाध्यायात सपागीय पावसी क्षेसको देखकर है, किन्तु पास्तबमें यह सस्म नहीं है। मगर इसके प्रणेता मिनदासगणि होते तो माप इस प्रासादभूत महती पूर्णिमें बिनभन गणिके नामका या विशेषासम्भाप्पका गाभामोका असर उछल करते। मुझे सो यहाँ प्रतीत होता है कि इस पूर्णाकी स्पना मिनमनगणिके पूर्षकी और नन्दानरचनाके बादको है। वसकासिकपूर्णी (वित्त)में और म्यारमि भौनिनभद्रगतिको कोई कतिका उमरण नहीं है, अत ये पूर्णीयां मी मिनम्नगगि ममाममणके पूर्वको होनी चाहिए । मम्मूदीपकरमचूर्गी, यह बद्रीपप्रइसिको पूर्णी मानी जाती है किन्तु वास्तवमें यह मम्मूदीपके परिधि-जीमा भनु पृष्ठ मावि माठ प्रकारके गणितको स्पष्ट करनेगा किसी प्रकरण की पूर्णी है। वर्तमाम इस पूर्णाम मूत्र प्रकरणको गाभामा प्रतिक मात्र भिकारने दिये , मत कुछ गामामोका पता मिनाम क्षेत्रसमासप्रकरणसे सगा है, किन कितनीक गावामोका पता मही पमा है। इस चूमि मिममग्रीय गृहक्षेत्रसमासको गाथामें भी उसूट ममर माती है मत यह पूर्णा उनके बावकी है। कहाँ पर पूर्णियोंकि विविध समतोको सम्पमें रख कर पूर्णिकारो विश्यमें बोअन निवेदन करनेका था यह करने के बाद मैतमें यह किसना प्राप्त है कि-प्रकापमान इस मन्वन्त्रपूर्णक प्रणेता मौधिनदासगणि महचर है जिसका स्क्यसमम पतमा प्राप्त नहीं है, फिर मी भान मन्दीसूत्रांकी नो प्रतियाँ प्राप्त है उनके मन्तमें संक्तका उम्स नबर भासा है मोरिचनाका सनत् होनेकी समावना अधिक है। मह उसेस इस प्रकार है- रानाक पचम वर्षशतेषु म्पतिमातेनु भनियतेषु मन्पप्पस्नपूर्णा समाता इति । मर्थात् शाके ५९८ (वि सं ७३३) में नवप्यपनपूर्णी समाप्त हुई। इस मसको मित्रमेक विद्वान् प्रतिका मेसनसमय मानते हैं, किन्तु मा उप कपम्भयनपूर्णिकी समासिका अर्थात् स्थनासमासिका ही निवेश करता है, मेनकाका नहीं। मगर प्रतिका मनकास होता तो समाता ऐसा न मिलकर SAT साहसा होता । इस प्रकार मयसपमें रचनासक्त् शिपनको प्रमा प्राचीन युगौ यो हो मिसका उदाहरण भाचार्य मोशागारकी भाचाराजाधि प्राप्त है। भोपाराए । ५५ ५५ बाक्लिासमा भौहरिमारिस सम्बाइ । निशीपमालम्पमाभ्याऽस्यकापि पनिकापा मीनिमासमाचपपया पूर्षगवलपरमीमासमणादिभियन नारिमरिता मापीना पा पया काम्माधिनो पोम्पा । निमहारषासमरा मिला सम्ममावे। एटीम "पू १५० + १ ११५ श्रीवाभापभियुपाताया।
१३ . - सूत्र और चूणिकी भाषा नन्दीसूत्र और इसकी चूर्णिकी भाषा का स्वरूप क्या है ? इस विषयमें अभी यहाँ पर अधिक कुछ मैं नहीं लिखता हू । सामान्यतया व्यापकरूपसे मेरेको इस विषयमें जो कुछ कहना था, यह मैंने अखिलभारतीयप्राच्यविद्यापरिपत्-श्रीनगरके लिये तैयार किये हुए मेरे "जैन आगमघर और प्राकृत वाङ्मय " नामक निवन्धमें कह दिया है, जो 'श्रीहजारीमल स्मृतिग्रन्थ में प्रसिद्ध किया गया है, उसको देखनेकी विद्वानोंको सूचना है। परिशिष्टादि चूर्णिके अन्तमें पाच परिशिष्ट और शुद्धिपत्र दिये गये है। पहले परिशिष्टमें मूल नन्दीसूत्रमें जो गाथायें हैं उनको अकारादिक्रममें दी गई हैं। दूसरे परिशिष्टमें नन्दीचूर्णिमें चूर्णिकारने उद्धृत किये उद्धरणोंको अकारादिक्रमसे दिये हैं। तीसरा परिशिष्ट चूर्णिगत पाठान्तर और मतान्तरोंका है । चौथे परिशिष्टमें नन्दीसूत्र और चूर्णिमें आनेवाले ग्रन्थ, ग्रन्थकार, स्थविर, नृप, श्रेष्ठी, नगर, पर्वत आदि विशेषनामोंका अनुक्रम है । पाँचवे परिशिष्टमें सूत्र और चूर्णिमें आनेवाले विषयद्योतक एवं व्युत्पत्ति- द्योतक शब्दोंका अनुक्रम दिया गया है । इन परिशिष्टोके बादमें शुद्धिपत्रक दिया गया है । वाचक और अध्येता विद्वानोंसे नम्र निवेदन हैं कि इस ग्रन्थको शुद्धिपत्रके अनुसार शुद्ध करके पढ़ें । संशोधन और सम्पादन इस ग्रन्थके सशोधनमे अनेक महानुभाव विद्वान् व्यक्तियोंका परिश्रम है । खास तोरसे पं भाई अमृतलाल मोहनलाल भोजकका इस सम्पादनमें महत्त्वका साहाय्य है । जिसने चूर्णि और मूल सूत्रकी प्रामाणिक प्राण्डुलिपि (प्रेसकॉपी) तैयार की है, साद्यन्त प्रुफपत्र देखे है और इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी किये हैं। भाई श्री दलसुखभाई मालवणिया-मुख्यनियामक छा द भारतीय संस्कृतिविद्यामदिर--अहमदाबाद तथा पंडित वेचरदासभाई दोसीने मुद्रणके दमें साधन्त देखकर अशुद्धियोंका परिमार्जन किया है, जिसके फलस्वरूप शुद्धिपत्र दिया है। भाई श्रीदलसुख मालवणिया का आगमोंके सगोधनमें शाश्वत साहाय्य प्राप्त है, यह परम सौभाग्यकी बात है। वसत प्रिन्टींग प्रेसके सचालक श्री जयति दलाल और मेनेजर श्री शातिलाल शाह प्रमुख प्रेसके सर्व भाईओंका प्रस्तुत मुद्रणकार्यमें आतरिक सहयोग भी हमारे लिए चिरस्मरणीय है। चूर्णिमहित नन्दीसूत्रके सशोधनमें मात्र ग्रन्थकी प्रतियोंका ही आधार रखा गया है, एसा नहीं है, किन्तु मूलसूत्र एवं चूर्णिके उद्धरण प्राचीन व्याख्याग्रन्थोंमें जहाँ जहाँ भी देखनेमें आये उनसे भी तुलना की गई है। इस प्रकार प्राचीन प्रतियां, प्राचीन उद्धरणोंके साथ तुलना एव अनेक विद्वानोंके बौद्धिक परिश्रमके द्वारा इस नन्दीमूत्र एव चूर्णिका संशोधन और सम्पादन किया गया है । मैं तो सिर्फ इस सशोधन एवं सम्पादनमें साक्षीभूत ही रहा । अत इस ग्रन्थके महत्त्वपूर्ण सशोधन एवं सम्पादन का यश हम समीको एकसमान है। अन्तमें गीतार्थ मुनिप्रवर एवं विद्वानोंसे मेरी नम्र प्रार्थना है कि मेरे इस सगोधनमें जो भी छोटी मोटी क्षति प्रतीत हो, इसकी मुझे सूचना दी जायगी तो जरूर अतिरिक्त शुद्धिपत्रकी तोरसे उसको आदर दिया जायगा। स २०२२ माघ शुक्ल पूर्णिमा महमदावाद मुनि पुण्यविजय चूर्णियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम 7 १ १ . १ पिक्स प्रचष्मायो भिमप्रय मोसमयमा दो मेर इनिराश्यहरे पांच मेर मोनियमोटर मेर मानिसको मेर-धापोपाकिबीर समस्यायिक वायोपपमिक वा मुनश्पनिक मपि १ 11 १५ १५ १ . . रिम निभरका उपकम-परम्म मावा ५ मरम्मत्र-गाथा २-२ महापौरपरमात्माको स्तुति प्पया 1-1. सामाठिसूध-भासको रप , नघर पर पम्, न समर और ममरपिरके सने दाप स्पति प्पा1-15 मिनाबसीसा- योनीत विमो नमस्पर पापा १-२१ गपपरावीस- मफ्लान् मापार " पपरोली खति मापा २१-१ स्पषिपषमीस्प- मुखस्वपिरो स्तुति मा २१ पुषर्मा बमलामि प्रभवस्वामि प्पम्मव पा. ११ स्पोमा सम्मतान मामा एमा, पा १ महागिनी भरी गुर पा ५ साल, स्यामा पाशिव बीपवर, गा १६ भार्यमा, मा २० मारमा गा १८ मार्यमन्दिन पा १५ पार पनापास्ता, पा ३ रैपदिनक्षत्र वाचक या ७ सिपा, पा ११ सन्दिमाय हिमपन्त पा 11-1५ मापदन बाचा, बा.११-26 भूतविधाचाय पा ५ मोहिल ... पाणि गा सामम्मरसे सर्व स्वपिरोपसति मा १ पर्पसम-पान-गायके मविप्री-मनतिरी पियो परीवारे लिपे पतपम मासमी परिपूरक रंट परिबारमिक परम और मामात एवं दिया पानसर-परिभामरे माण मापारि पर सापती मुत्पत्ति मादिप मिस्पष मातानिनोच प्रम परोल पम्पन्न बपिशामक धानुगामिपरि मेर १५ १५-21 भानुनिक पापिनका लम्प सिके मन्त और पपम्य मे दमा पुरतो अन्तपत मायरो भन्तुमत पापो मत- गदापि प्रमेाभ बस सन में अतिविशेष भाविका मिस्तक २ महानुपामिक भरविताय पषमारामापिशाम मामा"-" बधिसममा बरग्य पार जता पार क्षेत्र पत्र पासमान अपेमारे सापिपनी दिशा तस्म प५ प-योगमा-मापका पारसरिक पदिका सम्म पा ५१ पेत्र-प्रमाणे धमताभ स्मिथ हौवमान अपणिन ५ प्रतिपाति मभित्राम मदिरातिपाधियान १५ इस क्षेत्रमा मात्र हामी परिणामका पा ५ गा ५१ पषिमा पार . मन परमामन अधिनग १ । समाससमविनिम्मर रोमेर १५ -प्रम क्षेत्रमा माष भाषी समलि- मिपुम्मतिमनःपजामा सम्म और ५. मनपान रहार निमें-बापपोप और 4 अपरम Bा सप . :
चूणियुक्त नन्दीसूत्रका विषयानुक्रम १५ पृष्ठ २५ सूत्र विषय ३३ केवलज्ञानके भवस्थ और मिकेवलज्ञान दो भेद ३४-३६ भवस्थकेवलज्ञानके भेद और स्वरूप सिद्धकेवलज्ञानके अनन्तरसिद्ध परम्परसिद्ध दो मेद २५ २६ अनन्तरसिद्धके तीर्थसिद्ध, अतीर्थमिद्ध आदि पदह मेद २६ ३९ चूर्णिमें-पद्रह मेदोका विस्तृत स्वरूप परम्परसिद्धकेवलज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री केवलज्ञानका २७ ४४ स्वरूप २८ ११ ४२ सूत्र विषय पृष्ठ अपायके मेद और एकायिक शब्द ३५ धारणाके मेद और एकाथिक शब्द ૩૬ ५४-५६ २८ प्रकारके मतिज्ञानका और व्यजनाव- ग्रहका प्रतिवोधक और महक दृष्टान्त द्वारा स्वरूपनिरूपण ३७-३९ द्रव्यक्षेत्र काल भाव आश्री आभिनिवोधिक ज्ञानका स्वरूप ४२ गा ७०-७५ आभिनिवोधिक ज्ञानके मेद, अर्थ, कालमान, शब्दश्रवणका स्वरूप, एकार्थिक शब्द और उपसहार ४३ श्रुतज्ञानके चौदह मेद ६०-६३ १ अक्षर त्रुतके सज्ञाक्षर, व्यन्जनाक्षर और लव्ध्यक्षर, तीन मेद और स्वरूप ६४ २ गा ७६ अनक्षरश्रुत ४५ ६५-६८ ३ संनिश्रुतके कालिक्युपदेश, हेतूपदेश और दृष्टिवादोपदेश तीन प्रकार, स्वरूप और ४ असज्ञिश्रुत ४५-४७ चूर्णिमें--ईहा, अपोह, मार्गणा, गवेषणा, चिन्ता, विमर्श इन शब्दोंके अर्थका स्पष्टीकरण ६९ ५ सम्यक्थुत-द्वादशालीके नाम ६ मिथ्याश्रुत-भारत, रामायण हमी मासु- रुक्त आदि प्राचीन अनेक जैनेतर शास्त्रोंके और सम्यक्श्रुत-मिथ्याश्रुतका तात्विक विवेक ४९-५० ७१-७३ ७-८ मादि-अनादि ९-१० सपर्यवसित अपयवसित श्रुतज्ञान, और उनका द्रव्य क्षेत्र काल भाव आश्री स्वरूप ७१-७५ पर्यवाग्राक्षरका निरूपण और अतिगाट- कर्माहत दशामें भी जीवको अलरके अन- न्तमें भाग जितने मानका शावतिक सद्भाव ५२ चूर्णिमें- अक्षरपटलका विस्तृत निरूपण ५२-५६ ११-१२ गमिक अगमिक श्रुतज्ञान १३-१८ अङ्गप्रविष्ट और अजवाधश्रुत अन पाह्यभूतके आवश्यक और आवश्यक- व्यतिरिक दो प्रकार आवश्यम्भुत आवश्यकश्रुतके मालिक और टत्कारिक ४८ ७० ४५ २ चूर्णिमें-केवलज्ञान-केवलदशनविषयक युग- पदुपयोग-एकोपयोग-क्रमोपयोगवादकी चर्चा २८-३० गा ५४-५५ देवलज्ञानका उपसहार ३० परोक्षज्ञानके आभिनियोधिक श्रुतज्ञान दो मेद ३१ आमिनिरोधिकज्ञान और श्रुतज्ञानकी मदेव सहभाविता ३१ चूर्णिमें-मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका पृथक्करण मतिज्ञान और मतिअज्ञान तथा श्रुतज्ञान और श्रुतअज्ञानका तात्त्विक विवेक ३२ आभिनियोविक ज्ञानके ध्रुतनिश्रित अश्रुत- निश्रित दो मेद ३२ अश्रुतनिश्रित आभिनिवाधिकनानके भेद, स्वरूप और उदाहरण ३३ गा ५६ अश्रुतनिश्रित आभिनिवोधिकके मोत्पत्तिकी आदि चार भेद गा ५५-६० औत्पत्तिको मतिका स्वरूप और उदाहरण गा. ६१-६३ वनयिकी मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा ६५-६५ कर्मजा मतिका स्वरूप और उदाहरण, गा ६६-६९ पारिणामिक मतिका स्वरूप और उदाहरण भुतनिधित मतिज्ञानके अवग्रह, ईहा आदि चार भेद आपके पर्यावग्रह म्यपनावग्रह दो मेद न्यजनावप्रहके मेद और सम्प भावप्रहके नेद और एकाधिक शन्द ३५ इहाके मेद नौर एकाधिक शन्द नाम , ८० दो प्रकार पूर्षियुक गम्दीसूत्रका विषयानुकम 4 . ५८ ' . मात्मम्मि २९ माम पूर्णिमे-१९ एमिले मामाका मुसरविवरण प्रमियमुले २९ नाम पनिमें-पाति भुतक नामोभ मुत्त स्ववियरप। टिप्पनी में नामा कमी- नेपाल निश मापसम्मतिरिच्भुका रसहार बाशिभुषले १५ नाम पाचारपत्र सम्म ससूनम लस्स ३ लामामाघसरूप - सत्र बिपब 1 - मुनोगामारणे मूमप्रथमानुगोप और मरिकामुगोग दो प्रकार का इनका स्वरूप पूर्णिमें-सिबमणिप्रत्र पर्वन मनपार ११२-१३वारा परिमान और पिण पर निरापदावि माणे मारापको काम १६ हरमा बिस्ता १० इम्म क्षेत्र मा मात्र मामी भुवानसहा १ ११८ मा १ भुखायके चौवामेर गा ८१ मुजामा मम या पुरिने भाग गुष पा. 41 एमाभापपिषि मा ५ एनमामानविषि और सपसंहार-जी- सूत्र समामि मयम परिशिप-मम्मीस्त्राव पवार्मोन परारिम्म द्वितीय परिणिप-मचर्षियत हर रमोश मरापिकम पवीय परिशिए-नाचनीयत पामनार और मचन्ता मरेप चतुर्व परिशिए-मोस्य और पनिषत मम मममा स्वपिर सूप मी बार भारि पिपनामोश सकारारिकम पाम परिशिए-मपत्र पौरपति विपषिमाप और मुत्पचिप सोच भारारिकम " 4. . समपावासाका सम ५ विवाहप्राप्तिमात्रा लस (शवाधर्ममामा सम . पारपाना सस्प ममामि सम्म १५ पुत्तरीफ्यातिपरसापान सम १ प्रसपावरकाममा सम्म शिपारम्बो अपरिपाः पुचपिपाय दो प्रकार उनका पन और स्वस्म ११ रमिार भपके पांच मेर १.१५परिधर्मत्तिासात प्रथर और इसके मेद " वापार १सार पूर्वमनतिर- पूर्व शीनदि WEDISAमोवीनरागारासबसतरवधनादाणमंगलाधिकारणदिनिधनवाणंदणदानंदनिवाराणएन्निनंदानंदाएमादादरिसावंदाय्याश्ताधीनस्मयाविधाणिारयावाग सुणामहवणाखाक्वणवीजाणामाग्रवचनाददातापगत्तवियसरीस्वतिशिनापारमविश्वासघाताश्मामलासमदामहल्लाकवाकल्लसिंकासालाकादलाविलमा ॥गाशा यणावासखोयबारसमजालावणदीपादिसौरपदीननामावाश्मयचविणणयमवगणविनियमायणातवमासणसहमतशत्रनतातसबसतारलेअवियोवसमणमा शवमंगलायुहावितस्मयमगतहाणावसानमारोवाशिणयमन्सयोगारखण्णायोक्वेियसतोणागयययादरिमामधेरावलियरदेशातानासनकध्यमिमध उतबायकानानिवकरयानावात्राताननीयरसादसायगएदगधितगायूपदमनाएनमोकारकास्नालणविजयतिगाशासतिंदियादिविसयकसायरीसहावसरावधानिकमावण गारंवापरयवादिएगायतानस्वास्यनिवितस्पतिातगतिरिवन नावानमिानजीवातमिजावानाधासचिनक्तिमातमहादियाचरासीलरकविदाणाविधिदएका१६६६६६६६।१४।। परझिनामारणावियाणमयदेवासादिकम्मेदिडाण्डशेणापत्रवाशानदा मागनिनिविसिहोताणमा विदाणागामुदातिगगादाणानाम्साघम्नागासायोगालगदवासी वनिमयजीवगारणक्षणासाणिनिझावानीवानिहागासहायसमझानित "विशमनिाधुरवातनधासमाणनितिधियाणागााननववनेनासवलासमोनिासह लावेसबवाआपतिनियाक्तिसवनियसवितिगतिसबसमिलोगोनिस्मत गवानवावरणामकाघाच्यासाष्टाणानिमामिति रोपवीवीताछोहिरियमण्यमः दिवासराएपरिसाएधम्मामरकोशासावाजमशतसवकध्यमितएरासक्याना नवधानपरायकारिवेशदनितिनवनिमगासनातायागदकाशातगोगादासाव्याना सोसिससाणामवावायालादेसकारण नानासामाणिवाममनाणदतsima रियावयवाणयरियानाअद्यावयतिविससातामसीणधमकवानावामागदेकाशा नानाविसमागासवसनाशिननववान नक्षितावादशकदेवितिलनिसियासतानासहियरिनविधामाणावरकशनातगणाधोकादयानामाणावयणकाएदिशकातकाई नाममातरिकानागाणादोमवातशातनदेवाननमवणीणामणाहतादमितानातिनगरनिगमनानिमिवामदेवयातसोमणणायसवात्रावतोपक्षिणापरिचयनित. साबनगवधानवियरीसरदोबसणादिसयाविधमासानमा परिवानाणदिवस निशिनगवामाननवधाननस सामसदनादिसिनासदनिधि नामदोलिाडजिपितामदासायलगाववसइनाणाधितामहोकिउच्चावासबसन्नाणहिमादिनरकाणायामप्रायिवाररकोगनानाभातासगवेधम्मपिता देवसवसताएगातगपिता मदोत्तदतियाननवयाननक्षमएचप्रादिपरिसाहाननवनियताएगायाबदापाटतराइमतिपक्ससोसलतियत्सतविध सोयधम्मातगवतापाणीraixबगनामदादारातिए रावसानिराअमनासवदाएगावकमातासुनसायसंधारणाशियामनिलालमनिवामदाक्षिणाणावापुरिमय छिमधलणाणमकामरकवकारणसविकमोसमनिऽयदस- 1 4 . . -- TH सर्वापरुयमपागातसएवंदववरणवरयंपापकालयस्निाजी गनिनासारवडायलतिवनिमण्याएंसारक्यावरणानानिमुक्मिागादासात्सपावाक्यवहाण कयामणासीत्यादिष्टिकालनामिनावप्रतिपक्षकमूत्रामविवस्त्यादिाटकालअभिवतावकमाविकालतादनणानविवादलसेनाविवाधिवमादिवतापकणातावद जीवादिणवपदमानियनानियवाजधालाकावन्तेयान्तिकायश्विणियतणानाक्षेवसामयंजाबनवतातिासमयावलिमसकतनधिनाविधिवकालमासयनणावाचवावाय गादिमुत्ररकयनानियोत्यक्षायोगगासिंधुश्वाहिधशियाडशकदेवतासरंकयतणावाचवावायनामापायात्रावायामानामारावादियसमुश्वता अवयनएतादवा शूपमारणवाहितमाहीयादिवतारकयनणानगयवसवदाविविछमाणिनयासाधावताविनाशीतपालवाणापक्षादियाएंगडियावीदाराक्षाशवदेउवालसगधुवर दिएदएचविता किमाणांगनाधादिाजशाहिणाणसादावादिगणातहातमिवयएसबयाणातदेवगताकदिविदिवानागनाइदज्वालसगरमवादिएहविशवस्मासाधाका शमादिशनामधाणामागविक्यानबज्वालसंगमनेवाधिदया थाणवाक्सयाणामावलीतएकनावादाताणमयगाणामयणाणणागतासनविसन शासनदयादिजाणविषयासविशिराधोयानासाम्रदिहाणविमसम्मा प्रियाणयासणवापागारमानिदणवादिहातरकाशयमावणाएरमाणिवायगाएपसा। पनिणदिशाहायातालपादणाणावमबदछणाणयासपातास्त्र तश्यापायसराणामनिधिससाकाहाणियाबोएवास्वनकालतामुदिनागिनवासतरण पदसणवत्तपतियाकरणादाइमागदसविदसतनावएमवरणासानायचं मायारादिगणधरागमएणीतरम्यानयवृदसासितस्मेवातावदार्णिकालागनावातावल अक्षिामधावदामाणिकरणास्यसयतावास्यायरियाणिमाena 'दामिशागमनामावशिमणानसशाधाक्षिणयमाप्रमाणामाविका मनाबूगारखलगाऊनमणियमणवायतिरिनवाविप्रदवाविवरीयातमम्मष्ठयोगधरादाद मेदासम्मकतिरामाणिारणगामतमदासदासदातिवापरयतासरवाडागहिवाशाला कमातामताविततरकताअडकायतविधायकमाणाबासकशापवसवशीतमयातिमानिधनष्टनतिधुनधारातहणीममाझागाझएण्याश्रिीhane मारुतप्रवपरिषद प्रापार ९ एलेस्थापच्यराष्टिबनवायत्रीवानापतियागातस्त्रायस्कर नदीने गवादासारखापियामाहात्तयाजयसवाणेपत्तावातिलयापायाला अयशायाहालसरपबयप्रादप्यासहस्वारास्तदेसवध्यालायामस्वप्रयामरवा स्मिातक्ष्मरारतसियमलहे। अयस्यशावसायमानमगासवरातरि यदयणाविखायासेखत्रया स्ततधारकेष्टरित्रपरगामसंख्यतव, वेधारयशवस्मासम्मक्षणारियम साठाणमिकमतदारसयासघनक साम्पत्तदेसालपडामनिसियासतवक्षियमबस्टिनस्साघरदसस्तावसमायसवेदि घासमानकापारयकालादविशियमावरय्यावावालालमायरिस्मयमाय मापसावबामयिारिखष्ठम्मारावयबदमासेषयटमम्सचदेश 3 - मुप मर नरियम एउता २२२-१२५ ३० विधायकवावासासाहवाशापहवमाम्यम्घारावास्यवसावाया वागावाविवारसमाविष्टवाये सबंधवापथावदिसामुटमोवाभावाणियाम तिहास्टिात्सतसाधारमा किमणसम्मापासवश्कालेपलियामादिकारला माताजपवलिदानस्तामा छामणमणमानिस एक्सपायावावापतावोगादा लववियामधाययायास्यस्य कामायानसहाय प्रिभारस्वशितिकराववधानामहापय यावरीघातक्षायामममममाथाशपावसातयामासण्यावाईफाय पसमियातायाSHEE अतरवठाणासाथमा रामग्रीवासतमादमसिमकरर्णय पानिकतारकापसास्तवमानचकागा MH ना नारदममममी . सापतिले प्रथम पत्रकी भोर मतिम (३५५) पत्रकी पम्प पूपि।
॥ णमो त्थु णं समणस्स भगवओ महइ-महावीर-चद्धमाणसामिस्स ।। णमो अणुओगधराणं थेराणं । सिरिदेववायगविरइयं नंदीसुत्तं । सिरिजिणदासगणिमहत्तरविरइयाए चुण्णीए संजुयं । ॥ नमो भगवते वर्द्धमानाय ॥ सवमुतखंधगादीण मगलाधिकारे णंदि त्ति वत्तव्या । णंदणं णंदी, गंदंति वा अणयेति गंदी, गंदंति वा गंदी, पमोदो इरिसो कंदप्यो इत्यर्थः । तस्स य चतुन्निहो निक्खेवो । गतानु णाम-वणामु दयणंदी जाणगो अणुवउत्तो । अहवा जाणग-भवियसरीरवतिरित्तो वारसविधो तूरसंघातो इमो- भंभा १ मकुंद २ मद्दल ३ कडंव ४ झल्लरि ५ हुडुक्क ६ कंसाला ७ । फाइल ८ तलिमा ९ वंसो १० पणवो ११ संखो १२ य वारसमो॥१॥ 5 ] भावणंदी णंदिसद्दोवयुत्तभावो । अहवा इमं पंचविहणाणपख्वगं णदि ति अज्झयणं, तं च सुतसेण सन्वमुत- भंतरभूतं । तं च सव्वमुतारंभेमु विग्धोवसमणत्यमादीए मंगलं पयुज्जति । तस्स य मंगलट्ठाणावसरपत्तस्स गुरवो विणेयस्स अत्थ-सुतगोखुप्पादणत्थं अविच्छेदसंताणागतमुतप्पदरिसणत्यं च इमं थेरालि कहेत्ता ततो से 10 अत्थं कहयंति । सचमुतत्था य जतो तित्यगरप्पभवा, अतो भत्तीए पंण्णवग-सावग-पढग-चिंतगा य पढमताए णमोकारं करेत्ता भणंति- [सुत्तं १] जयइ जगजीवजोणीवियाणओ जगगुरू जगाणंदो । जगणाहो जगबंधू जयइ जगपियामहो भयवं ॥१॥ जयति गाहा । सोतिदियादिविसय-कसाय-परीसहोवसेग्ग-चउघातिकम्म-ऽप्पगारं वा परप्पवादिणो य जिणमाणो जितेंमु वा जयति त्ति भण्णति । जगं ति-खेत्तलोगो तम्मि जे जीवा तेर्सि जाओ जोणीओ-सञ्चित्त-सीत- संवुडादियाओ चउरासीतिलक्खविहाणा वा विविहपगारेहि जाणमाणो वियाणओ । अहवा जो जहा जेहिं कम्मेहि जाए जोणीए उववज्जति तं तहा जाणति त्ति विसिट्टो जाणगो वियाणगो । अहवा जगग्गहणातो धम्माऽधम्मा- ऽऽगास-पुग्गलग्गहणं, जीव त्ति सव्वजीवग्गहणं, जोणि त्ति-जीवा-जीवुष्पत्तिठाणं, जहा य ज उप्पज्जति विग- 20 च्छति धुवं वा तं तहा सव्वं जाणइ ति वियाणगो । अनेन वचनेन केवलनाणसामत्थतो सन्वभावे सबहा जाणति १ नघतादीण आ• दा० ॥ २ अणाए त्ति आ० । अणेण ति दा० ॥ ३ गयाओ णाम-ढवणाओ । दव आ० दा० ॥ ४ मादीय मंगलटुं पयु आ० ॥ ५ वलिय कहेत्ता आ० दा० ॥ ६ कथयति आ० दा० ॥ ७ पण्णावग' आ० दा० ॥ ८ जिणवसभो सललियवसभविकमगती महावीरो इत्युत्तरार्धपाठमेदचूर्णौ । नाय पाठमेद' कस्मिंश्चिदपि सूत्रादर्श उपलभ्यते ॥ ९ सग्गावघाति आ० । सग्गुवघाति दा० ॥ १० खेत्तमावो तम्मि आ० दा० ॥ 15 २ , मिणदासगणिमहरविल्याप सुग्णीए संमुग [मु. १-२ गा २-८ •पि स्पापितं मपति । भगवरु' पि नगं ति-समसणिसोगो, तस्स मगामेर एक। पम् । उप्यते-- वि० १८६ प्र०] समावि शास्त्रापमिति गुरु, प्रवीतीत्यर्पः, तिरिय मणु-दना-अमराए परिसाए पम्ममक्लाति । मोमा न पुगति से समं कायति पि संभ गुरू बनेन पपनेन परोपकारित्व प्रदर्शित मपति । भगा-सचा वाम भावकारी नगाणदो। का? उस्यते-सम्मेसिसचा ममारादमोरवेसकरणचादो। मसो मगित "समे सचाम तम्बा ण परियायतमा ण परिवेचना म अजावेतम्म" [भाषा सु१म १ त २ स् पि। पिसेसता सप्पी पम्मकापतातो आक्यकारी, ततो वि पिसेसदो मध्यसपाण ति । भमेन परनेन रिवोपदेशकीय वर्षितं ममति । मगा-सपात भाणे िपरिमपिज्जमाणे रक्स्वाधिनगणारो।को उच्यते-मणो एयण-काएरिकत-कारिता ऽणुमवेहि रक्लवो मगणाहो मवति । भनेन वपनेन सम्मपानीगं सगासा सिवा मवति । 'भगांधु' पि मगा-सपा वेसि म् नगम् । कर ? उम्पन-मो मप्पली परस्स पा भारतीए नि म परिबपति सो पंपू, मगरं च मुदङ्ग वि 10 परीसहोपसम्माविस पाहिज्जमाणो नि सचेस बंधु अपरिपयंतो विरादेवि पि मतो गगन, मनेन पचनेन सम्मसम सांघुता सिता ममति । पितामो पि नो पिपिता स पितामह, सो य मगर्न र । सम्मसचाणं पितामहो कई ! उच्यते-सम्मसचाम मरिसादिसमस्रणो पम्मो पिता रमस्वपचातो, सो प पम्मो मगरता पपीतो यतो मग पम्मपिता, एवं प सबसपार्ण मग पिठामा चि। मनेन पपनेन पम्मं पाप माविपुरिस स्पापित मपति । एतार गाहाए पयस पाता इम-"गितसमो समिपासमनिबम वि० १८६ वि०] गती महारो।" मिण 15 एव समो मिणपसमो । यसमो पि समममारमाणे। ममतो ममा गायसंपापयक्रिया समापन भगति । गाम-दारिणा पा पुरिम-परिचमचमणाप म मुस्खेफरम स विकमो मम्मति, दुपदस्स पुष एगचमणुक्लेको देव रिफमी । सेसष्ठ॥१॥ किंप- जयइ सुयाणं पभवो तित्ययराण अपच्छिमो जयद । जपद गुरू लोगाण जयइ महप्पा महावीरो ॥२॥ जपति सुताण० गारा । राग-दोसादिभरी मिनसो मिस पा भपति चि। 'सवाम '] समसवाणं वि, पायस्पो मगठाता पमनो। 'पमयो' चि परती। भगिट्ठरपणपरिसरावो पछिमो नि भपरिमो मन्पति, माया पगाणुपुष्पीए मपरिमो, रिसमो परिमो। मरिमिजीरयोगस्स रिसिहसणिवीरसोगस्स पा, भाषा सम्मारिद्विमादिसमता ऽसमतसागम्स गुरु मई माता मस्स सो प मम्मीरिपसामस्पतो मास्मा, केरसादि मिसिहसदिसामत्पठोपा महात्मा ।। २ ।। किंच- भई सब्वजगुज्जोयगस्स भई जिणस्स वीरस्स । मर सुरा ऽसुरणमंसियस्स भरं धुयरयस्स ॥३॥ मई मम्म• गारा । मापते माति वा मत्रम्, भगतो मत वि। समग ति-पागो । हरियो कि सागनिरसो माणितनो [ मात्र नि• गा.११७] । ससे कई ॥३॥इम संपस्स परमर्ग- १ पसरेया के nu १ ए धमक्या पाना समे भूगा मे भाषा सम्मे सत्य नरभान परिमारमा परेपमा गगना" उप तो । विसंपेर मा ॥८ मिमोपीरो रिसमोसा 20 ॥ ५ महो मबति। .तरपगरा. पाणरमाण मग मा .
३ मंगल संघथुई य] सिरिदेववायंगविरइयं गंदीमुत्तं । [सुत्तं २] भदं सीलपडागूसियस्स तव-णियमतुरगजुत्तस्स । संघरहस्स भगवओ सज्झायसुणंदिघोसस्स ॥४॥ भदं सील० गाहा । रहो सामण्णतो पंचमहन्चतमइओ । उस्सितो त्ति तम्सऽटारससीलंगसहस्ससिता जतपंडागा । वारसविदो तवो इंदिय-णोइंदियो य णियमो एते अस्सा। सज्झायसद्दो णंदिघोसो । सेसं कंठं ॥४॥ 5 संघस्सेव इमं चक्करूवग- संजम-तवतुंा-यस्स णमो सम्मत्तपारियल्लस्स । अप्पडिचकस्स जओ होउ सया संघचकस्स ॥५॥ संजम० गाहा । विमुद्धभावचक्कस्स सत्तरसविधो संजमो तुंबं । तस्स वारसविहतंवोमता अरगा। पारियलं ति-जा वाहिरपुट्टयस्स वाहिरूममी, सा से सम्मत्तं कतं, जम्हा अण्णेहि चरगादिएहि जेतुं [जे० १८७ प्र०] ण 10 सक्कति तम्हा एयं जयति, अप्पडिचकं च एतं । णमो एरिसस्स [ संघ]चक्कस्सेति ॥५॥ इमं संघस्सेव णगररूवग- गुणभवणगहण ! सुयरयणभरिय ! दसणविसुद्धरच्छागा!। संघणगर! भदं ते अक्खंडचरितपागारा ! ॥६॥ गुणभवणगहण० गाहा । तम्मि पुरिससंघणगरे इमे गुणा-पिंडविमुद्धि-समिति-गुत्ति-दवादिअभिग्गह- मासादिपडिमा-गोयरे य चरगादिया, एमादिउत्तरगुणा तम्मि संघणगरे भवणा कता, भवण त्ति घरा, तेहिं 15 गइणं ति-निरंतरं संठिता घणा । तं च संवपुरिसणगरं अंगा-ऽणंगादिविचित्तसुतरयणभरितं । खयोवसमितादि- सम्मत्तमइयरच्छाओ य, मिच्छत्तादिकयारवज्जितत्तणतो विमुद्धाओ । मूलगुणचरित्तं च से पागारो, सो य अखंडो त्ति-अविराधितो निरतिचार इत्यर्थः । सेसं कंठं ॥ ६॥ इमं पि संघस्सेव पर्दुमरूवग- कम्मरयजलोहविणिग्गयस्स सुयरयणदीहणालस्स । पंचमहव्वयथिरकण्णियस्स गुणकेसरालस्स ॥७॥ सावगजणमहुयेरिपरिखुडस्स जिणसूरतेयबुद्धस्स । संघपउमस्स भद्द समणगणसहस्सपत्तस्स ॥ ८॥ [ जुम्म] कम्मरय० गाहा । कम्म एव रयो कम्मरयो । अहवा जं पुव्यवद्धं तं कम्मं, वज्यमाणं रयो, तं सव्वं पि १ भद्द सील० इति संजमतव० इति गुणभवण० इति च सूत्रगाथात्रिक श्रीहरिभद्रसूरिस्त्ती श्रीमलयगिरिपादवृत्तौ च पधानुपूर्ध्या व्याख्यातमस्ति ॥ २ हरि०वृत्तौ मल्यवृत्तौ च 'सुणेमिघोसस्स इति पाठभेदो निर्दिष्टोऽस्ति । अगविजाशास्त्रेऽपि- तत्थ सरसपने हिरन-मेघ-दुदुभि-वसभ-गय-सीह-सद्ल-भमर-रधणेमिणिग्घोस-सारस-कोक्लि-उक्कोस-कोंच-चकाक-इस-कुरर-परिहिण- ततीसर-गीत-वाइत-तलतालघोस-उपकुछ छेलित-फोडित-विकिणिमहुरघोसपादुन्मावे सर सपण्ण वूया । इत्यत्र णेमिणिग्योस इति पद वर्तते ।। ३ पडाता आ० ॥ ४ ख० मो० आदर्शयो केनापि विदुपा 'बारयस्स स्थाने धारस्स इति सशोधित वर्तते। एतत्साठानुसायेंव मलयगिरिपादव्याख्यान वर्तते ॥ ५ तवो महाअरगा जे० दा० ॥ ६ अखडचारित्त मु० ॥ ७°च्छाया य आ० दा० ॥ ८ कतवर आ० दा० ॥ ९ णिरइचार आ० ॥ १० पउम आ० दा० ॥ ११ 'यरपरि' हे. ल.॥ 20 १ 5 विणदासगणिमहरपिययाए गुणीए समुम [मु० २ गा ९-१७ महोमिय कारस्पते । भागा पुमाद कम्म पंको, पम्ममार्ण नसोहो, तमो विणिमाटो संपस्तुमो । तस्स गाणे, सुत एष स्पर्ष सवरसम से णासो पतो। परमामता य से पिर पि-रावे कपिय पि-बाहिरपण कवा। छणा-मूछतरराणा य से अणेगविहा [ केसरा] तेहि गणेहि भारस पि-भपिकयोगयुक्तस्य रामसराम्स मगदिएपफेसरयुमतस्य इत्यर्थः ॥७॥ पितियगाहाए-परिपुर चि-परिसारित, बिनसरस्स पम्मकामासागवेयेम मगोपित। भणेगसमब सरस्सा य से अम्मतरपचा कता । परिसस्स सपपदुमस्स मई मनन ॥ ८॥ईम संपलग- तव-सजममयलंछण ! अकिरियराहुमुदुद्धरिस ! णिचं । जय सघचद ! णिम्मलसम्मचविसुदर्जुण्डागा! ॥९॥ तपसंगम० गारा। संपदस्स मिपो तस्सनमा, वे संरितो । मकिरिय वि-पत्पिपगारी ते गहराई 10 वेरि उमापरिसो ति- सकवे चेदं । ' पिति समास संकादिविसदसम्म से मोना । सेसं कई ॥९॥ सूरसपाहवर्ग इमं- परतित्यिपगइपक्षणासगस्स तवतेयदिवलेसस्स । णाणुज्जोयस्स जए भर दमसघसूरस्स ॥१०॥ परतित्पिप• गा । हरि-हर-हरण-सकोरम परग-यावसादयो परतिस्पिया गा, सि गागवेयपमं 18 प्रतादिपाणप्पमाते मासेति। [. १८७६० वर-षियमकरणातो य मतीपदिचिमंतछेस्सो । छेस्स पि-स्सीयो। सवादिणाणुग्मोरासपणस्स य इमम्मि भए सममूरस्स मा मरतु । सेसं ठं ॥१०॥ इमं संघसमुरलमर्ग- मा घिईवेलापरिखुदस्स सन्मायजोगमगरस्स । अक्खोमस्स भगवमो सघसमुहस्स रुदस्स ॥१९॥ मा पिति० मा । मेस-वेदिपतरे में रमगं सा पेसा, सा य मेरा वि भणति, एरं संपसमरस्स पितो 10 पेसा, वाए परिपुरो चि-वेरितो । पापणाविसमापनागकरणं मगरो। परमपादोपसर्गादिमिर्न पुम्पते । सो महतो । सेर्स कर ॥११॥ इमं संपम्स मेहम्मर्ग-तस्स प पगसस्स इसे कगा, तस्म य पमतस्स इमे अश्यया-पो मेहसा उस्सपो सिप्ला, मेहलामे रुम, मेहलाए वर्ष रहा, याम य मौदा मुरणादिपायो, नोणाविषमीरियोसरिपग्मसितो, गिजारा य समिमनुचा, द्वारा प से मयूरादिपपिस्वउपसोमिता, मगुरग्पातिमिग्नुभयोरसोमित्रो य सो, कप्पा दिसम्रसोमितो य, भवरतरेसु य रुपिवादिरवणसोमिनो । पवेसि पवार्म परिस्वेण इमाणी गालि उरसोरो- १ पयुमो का । परमोस । ३ गुमिम्मरिचस्म ति मपिट मा परिपरिपस्स जिम मा मे संपस्स परम्पर्ग मा .५ गोगागा छ .मिपो पाम सब ना सुरम्पा तिर्म मा । १ परिगपस्स पर्मात सुमति । हरिमनपरि-मम्पपिरिपरि मामेबसाममुमारेबर पाम्बास्ति। पिएसम्मका पाठ अप्राप्यारा नोपनमते ॥ १. जी (स्पि) मा । ११ सुस्परा रा । १२ मिगिरा बा ॥ बापारिषिविपरितोसरिया । १५ संथा(प) मा । ॥ . ..सपस्म ८पीसा .. n 5 . 10 सघायुई] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । सम्मइंसेणवइरदढरूढगाढावगाढपेढस्स । धम्मवररयणमंडियचामीयरमेहलीगस्स ॥ १२ ॥ णियमूसियकणयसिलायलुज्जलजलंतचित्तकूडस्स | णंदणवणमणहरसुरभिसीलगंधुद्धमायस्स ।। १३ ॥ जीवदयासुंदरकंदरुद्दरियमुणिवरमइंदइण्णस्स । देउसयधाउपगलंतरत्तदित्तोसहिगुहस्स ॥ १४ ॥ संवरखरजलपगलियउज्झरपविरायमाणहारस्स । सावगजणपउरखंतमोरणचंतकुहरस्स ॥ १५ ॥ विणयमयपवरमुणिवरफुरंतविज्जुज्जलंतसिहरस्स । विविहंकुलकप्परुक्खगणयभरकुसुमियकुलवणस्स ॥ १६ ॥ णाणवरस्यणदिप्पंतकंतवेरुलियविमलचूलस्स | वंदामि विणयपणओ संघमहामंदरगिरिस्स ॥ १७॥" [छहिं कुलयं ] सम्मइंसण० गाहा । णियमू० गाहा । जीवदया० गाहा। संवर० गाहा । विणय० गाहा । जाणवर गाहा। संघपचतस्स सम्मईसैण चेव वरं । तं च संकादिसल्लरहियत्तणयो दढं ति" रूढं ति-वड्ढितं, कहं ? विमुज्झमाणतणयो । गाढं ति-अतीव, अवगाहं ति-ओगाढं, सद्दहाणतणतो जीवादिपदत्येसु अतीवओगादं 15 ति वुत्तं भवति । एत पेढं । धम्मो दुविहो मूलुत्तरगुणेन । सो य दुविहो वि वरो त्ति-पधाणो । तत्युत्तरगुणधम्मो रयणा, तेहिं मडिता जे मूलगुणा ते चामीकरं ति, तं च सुवण्णं, तम्मयी मेहला, तया जुत्तस्स मेहलागस्स ॥१२॥ नियमो त्ति इंदिय-णोइंदिएस अणेगविधो, सो य णियमो सिलातला तेहिं चेव उस्सितो, अनुभज्झवसाण- विरहितत्तणतो कम्मविसृज्झमाणतणतो वा उज्जलसुत्त-ऽत्थाणुसरणतणतो ये जलति चित्तं, चिंतिज्जइ जेण तं चित्तं, तं चेव कूडं ति चित्तकूडं तस्स। [जे० १८८ प्र०] गंदंति जेण वणयर-जोतिस-भवण-वेमाणिया विजाहर-मणुया य 20 तेण णंदणं, वणं ति–चणसंडं । तं च लता-बल्लि-विौणाणेगोसहिसतेहिं गहणं, पत्त-पल्लव-पुप्फ-फलोवेवेतेहि मण- १ सणवरवइरदढरूढ डे० शु० ल० मु० । 'सणयोयरहरूढ स० ॥ २ढपीढं सं० ॥ ३ लायस्स स० ॥ ४ 'यलज शु० ॥ ५ गंधुद्धमा सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु । गधद्धमा हरि० वृत्तौ ॥ ६ मयदइधस्स डे० । 'मइदइदस्स ल०॥ ७ तरयणदित्तों मो. मु० । 'तरिस्थदित्तों हे० ॥ ८ विणयणयपवर मसूप्र०। चूर्णिकृत्सम्मत सूत्रपाठः कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ॥ ९ विविहगुणकप्परुयखगफलमरकुसुमाउलवणस्स ससूप्र० । चूर्णिकृत्सम्मत सूत्रपाठ- कुत्राप्यादर्श नोपलभ्यते ॥ १० सप्तदशगाथानन्तरं चूर्णिकृदादिभिरव्याख्यात गाथायुगलमिदमधिक सर्वास्वपि सूत्रप्रतिपूपलभ्यते- गुणरयणुजलकडयं सीलसुयधतवमंडिउद्देसं । सुयवारसंगसिहरं सघमहामदर वदे ॥१॥ नगर र६ चक्क पउमे चंदे सूरे समुह मेरुम्मि । जो उवमिजइ सयय तं संघ गुणायर वदे ॥२॥ अत्रार्थे जेसू. आदर्श इय टिप्पणी वर्तते-"गुणेत्यादि गाथा २ वृत्तावव्याख्यातम्" । ११ जाणावरण० गाहा जे० दा० । अशुद्धोऽयं पाठमेद ॥ १२ इसण से घहर जे० ॥ १३ 'ति चिरवढित आ० ॥ २४ य उज्जलं-दित्तिमं चितिजा तेण दित्त, तं चेव आ० । असमत्तोऽशुदवाय पाठ ॥ १५ °विताणणेगसंठाणसंठि- तेहि गहणं जे० दा० ॥ १६ लोचतेहिं आ० ॥ - बिमदासगणिमहपरमिययाए पुण्मीर सनुम [१०३-५ गा १८-२५ परिषपतो मणारं, गंपतो सरमिगप । सीसवणसरे वि जमा सापयो मंदति ममोदति रमसीत्यर्थः। विदिशादि- मिसेसतो य मपार सीसपणं, विमुदभापत्यशो य मुर्गम, महा दम्पक्णसंडे गंषेम उलुमाव वि-माप्त वा सीमगंधेग सफ्स्स गेषुटुमायस्स ॥१३॥ किंप- में पम्नतासणं सिसास्मसगाणे संकदरं ति। मारे जीवेस दयाकरणमंदर में दरं वि । वत्यय । ठे-पापछे, दरितो चि-दप्पितो, जीवदयाकरणदपितो चिघुच मपति । को य सो ? मुभिगमो। सो धेय मुनिगमो मांदो परप्पबादिसासमसंपमयाण इंदो। कर! सितमादउंचममारतलतो । हेतु चि-पासपम्मो कारण पा, ते सतमासो सचे समबति । ते य रेतयो पातू, य पासति पस्ममगाए । सा य पस्स्वाहा गामादिर- तणादिपर दिचा, खेलोसहिमादिलोसहीदिपा दिया ॥१४॥ विवोसरियास्स संपस्स सररो पि-पटक्साण, तप समिस, किंचि पमतम्गावो मोसरिवं उमारं, 10 यि सागमापाठो स्वयोवसमिय उन्मरं, तदो पसविता स्वदोरसमितसंपरदगपारा, स व पारा रो, वेय विरायवे-सोमति चि । सारगमणो फउरो पि- प्रपुर सो प गीतंदणीए रवि पिरती, ते पेष मोरा पारगादीहि य णति । न पलवस्स दे समपदेस स्वस्वाइस [२०१८८ दि०] प सकार) एवं सपपम्मतस्स गंवगमरवादी कार ति ॥१५॥ पिणयकरणचातो रिणयेमको मुमी । सो य विषयकरमचेण फरवे, व फरित विग्नु ति-कोरिस, 156प उज्जसं ति-निम्मतं, तेम उमसलन संपसिारं नसिम्वमिम सक्सिजति । सपसिारं प पापयभिपरिसा टुमा। तस्य य रिनिराकलापमा सारो कप्पलस्वा, खीरासपादिसदिफ्छेदि ये णयमरा, सदिविहिवा सानो इममिवौ समग ति वदना ॥१६॥ मनि मतादिनामा पर चि-पहाणा, ते वेद पाणावरुतियादिश्वमा इसता, बंता रवि-कंसिरचा । सिधत्तणतो चेप सपिसम नीवादिपरस्पसम्मापसमतो विपति । नाणस्स य मसो पागावरम, तम्मिगमातो 10 य विगतमस । पूनामपिरिन सिहरोपरि मा, सौ य पापाविसयाणेरि जुधा, जुगप्पागो पुरिसो घूमा इति । एवं समस्यतस्स पेरादिप्मपबासापकप्पियस्म पदामि विणयपमतो पिराम मि गापा एवं निपापदं वि ॥१७॥ एवं परमवित्पगरस्स सपस्स य पणामे फते इमा अबसैरप्पचा मावली मणति-सा शिविरा विस्पकर ? गपार २ पेराती ३ प । तत्य निषगरावनिम्णय इम मणसि- [सुत्त ३] वंदे उसम अजिअ संभवमभिणदणं सुमति सुप्पम सुपाम । ससि पुष्पदंत सीयल सिज्जस वासुपुज्ज च ॥१८॥ २- प्रारार्थ इस्पर्ष । त्तिम पामि था गीतगाणीप का . ११ ता गुणपण ति भा १९ तारिवत्त मा १५ सो प पाणातिसपरपसरूपावममगुणोपा गुगप्पाणा पुरिसा पूमा माता .११ से 8 । सेपर्स . १ स्म किया। ॥ ।७ पदमा A ॥ ९ पगतोभा 4 ८पदाणा रा ।. पपममरामा .१५ मरापण्णा भा मा ७ P 5 10 तित्थयर-गणहर-थेरावलीमो] सिरिदेववायगविरइयं णदीसुत्तं । विमलमणंतेइ धम्म संति कुंथु अरं च मल्लिं च । मुणिसुब्बय णमि णेमी पासं तह वद्धमाणं च ॥ १९॥ [जुम्म ] वंदे उसभ० गाहा ! [विमल० गाहा य] कंठा ॥१८॥१९॥ चरमतित्वगरस्स इमा गणहरावली- [सुत्तं ४] पंढमेत्य इंदभूती वितिए पुण होति अग्गिभूति ति । ततिए य वाउभूती ततो वितत्ते सुहम्मे य ।। २० ॥ मंडिय-मोरियपुत्ते अकंपिते चेव अयलभाता य । मेतज्जे य पभासे य गणहरा होंति वीरस्स ॥ २१ ॥ [जुम्म] एत्य गणहरावली ॥२०॥२१॥ तो सुधम्मातो धेरावली पवत्ता, जतो जे०१८९ प्र०] भण्णति- [सुत्तं ५] सुहम्मं अग्गिवेसाणं जंवूणामं च कासवं । पभव कच्चायणं वंदे वच्छं सेज्जंभवं तहा ॥ २२ ॥ सुहम्मं अग्गिवेसाणं० सिलोगो। समणस्स णं० महावीरस्स कासवगोत्तस्स सुधम्मे अंतेवासी अग्गिवेसायण- संगोत्ते । सुहम्मस्स अंतेवासी जंबुणामे कासवे गोत्तेणं । जंबुणामस्स अंतेवासी पभवे कच्चायणसगोत्ते । पमवस्त अंतेवासी सेजभवे वच्छसगोत्ते ॥२२॥ जसमदं तुंगियं वंदे संभूयं चेव माढरं । भदबाहुं च पाइण्णं थूलभदं च गोयमं ॥ २३॥ जसभ६० गाहा । सेजमवस्स अंतेवासी जसभद्दे तुगियायणे वग्घावच्चसगोत्ते । जसमद्दस्स अंतेवासी इमे दो थेरा- भदवाहू पायीणग्गिसगोत्ते, समूतविजए य माढरसगोत्ते । सभूतविजयस्स अंतेवासी थूलमद्दे गोतमसगोत्ते ॥२३॥ एलावैच्चसगोतं वंदामि महागिरि सुहत्थिं च । तत्तो कासवगोत्तं बहुलस्स सरिब्वयं वंदे ॥ २४ ॥ १ मणतय हे. ल. मु० ॥ २ मि ख० ले० मु० ॥ ३ इद गायायुगल चूर्णिकृता चूर्णी स्वयमेवेत्यमुल्लिखितमस्ति । पदमित्थ ईवभूई थीए पुण होइ अग्गिभूइ ति । तइए य वाउभूई तो वियत्ते सुहम्मे य ॥ मंडिय-मोरियपुचे अकंपिए चेव अयलभाया य । मेयजे य स० हे० शु० मो० ॥ ४ वायभूई डे० ल० ॥ ५ तहा मो० ॥ ६ एकविंशति-द्वाविंशतिगाधयोरन्तराले चूर्णिकृताऽव्याख्याताऽपि श्रीहरिभद्रसूरि-श्रीमलयगिरिपादाभ्यां स्वस्ववृत्तौ व्याख्याता जिनशासनस्तुतिरूपा इयमेका गाथाऽधिका सबष्वपि सूत्रादर्शपु वर्तते- णेवुइपहसासणय जयह सया सम्वभावदेसणयं । कुसमयमयणासणय जिणिंदवरवीरसासणयं ॥ जयति शु० । जयउ डे० ल० । जिणंद ल० ॥ ७ जंवुणाम स० ॥ ८ सिजभवं ल० मो० ॥ ९ पायन्नं डे० उ० ॥ १० वाईणतिसगोते आ० ॥ ११ वच्छस स० ० ल० । वत्सस शु० ॥ १२ गुत्तं शु० ल० ॥ १३ कोसियगोत्रं सम्प्र० । श्रीहरिभद्र-मलयगिरिपादाभ्यामेतत्पाठानु- सारेणैव व्याख्यातमस्ति । चूणिकृत्सम्मत' सूत्रपाठी नोपलभ्यते कुप्राप्यादर्श ॥ 15 20 - ८ । मिमदासगणिमहाचरस्सियाए भुग्णीय समुस [१०५ गा २५-३२ पलापथ गापा । घुम्भस्स भवेवासी इमे दो पेरा-महामिरी पसाबसगोचे, सहावी य बासिट्ठसगोचे । पिस्स मुविस-सुपरिवादयो आक्लीते नेहा सामु [म० ८ सूत्र २१०] वा मानितना, दो वेरि मरिगारो पत्पि, महागिरिस्स आपसीए मपिकारो। मागिरिस्स भवेवासी यामे बनिस्सहो य दो नमसमासरी सक्स मोधा । वत्य पनिसहो पावयवी मातो, तस्स पुविकरणे भपसि-पहुस्स सरिमय पदे " । 'सरिमय ति सरिसमयो, यो प नम्मकासं पाप ना ना सरीरपरिवरिपरस्या सा सा पवो मणति ॥२४॥ हास्यिगोच साइ च वदिमो हारिय च सामन्ज । वदे कोसियगोत संदिल अज्जजीयधर ॥ २५॥ हारिय० गाए । गमिसहस्स अंतेवासी सातौ हारियसगोचो । सातिस्स तेरासी सामग्रो हारिम्सगोषो पेर। सामनस्स अंतेवासी सरिलो कोसिमगोचो, सो य मजमीवपरो ति बज वि-आर्य माप रा मीट वि-मुत परति, सचस्थस्स अपिबुतिपरमपातो, पंदे पि सकसेस । पारतर या "नीवर ति, भार्यत्पाद मी परेति-सती- 10 त्पर्यः । मण्ने पुण मगति सकिस्स भतेगासी गावपरो भणगारो, सो य समसगोचो ॥२५॥ संझिस्स सीसो- तिसमुद्दसायकित्ति दीव-समुहेस गहियपेयाल । वदे मज्जसमुदं अस्खुमियसमुहगभीर ।। २६ ॥ तिसमु० गारा । पुम्पपस्मिाऽपरा ततो सारा, उचरसो पेतो, एतसरे सावकिपी । सेसंकट IR६|| वस्स सीसो [वे १८९] मो- मणगं करग सरग पभावग णाण-दसणगुणाण । वदामि अज्जमगु सुयसागरपारंग धीर ।। २७॥ भणगे० ० गापा । कासियपुम्ममुपत्य मणतीति मणको । चरण-करगकियो करातीति कारक । मुचस्पे य मनसा सापतो नपरको । परप्पनाविनयण पायमप्पमापको । नाग-सब-परमाणाणं । पमारको भापारो य । सेसं ठं ॥२७॥ तम्स सीसो- णाणम्मि दसणम्मि य तव विणए णिचकालमुज्जु । भज्जीणंदिलखमण सिरसा वंदे पसण्णमणं ॥ २८ ॥ १ पूषिता हरिमापाव सास्ती भगतार पणतत्वाम्मापनबिराामिन पासिएपेत्रीय माप्ति कि मब्यगिरिपरि चरपरष समापोम्पार पेणापत्पमफेनीया सापि, या व्या व प्रमाणम् । पोसिपगोता ॥२ मणिप पा 1. पगुट सायं . ।५ जीप ति पूर्णा पासवरम् ॥ तेची धाशिया चार्वानो पार्यनीतपर-मार्यसमुद्रामा सिबासम्झाम् । पार्यसमुत्रस्पाऽऽमनामामा प्रभावमा भिषा बार" इति हिमपातस्पपिरायल्पाम् पत्र । ७ बाकिसि.. ८परपतरेमा ॥ ९ मममंग १. मातिम माधान प्रति मिहान पर्मान सभापति गावागा मिरमविपम्पते- पदामि मसपम्म र ततो प मरगुतालचा प ममपार नियमगुपिपरधर्म । परामि मगरपिम्पबमये रविपरित्तसम्बस्से । रपमररंगम्मो भगुमोगो रक्सिमो ॥ एजाबाबुरको मेम् प्रारम रिपी- पामि मनपर्म• “एपनि मापान न पचौ मम् बासिन्दर चम्बन्मिादिति सम्मामये। ११ मम्मामविम. 15 10 H - 10 थेरावली] सिरिदेववायगविरहय णंद्रीसुत्त । णाणम्मि दं० गाहा । कंठा ॥२८॥ तस्स सीसो- वड्दउ वायगवंसो जसवंसो अज्जणागहत्थीणं । वागरण-करण-भंगी-कम्मप्पयडीपहाणाणं ॥ २९ ॥ वड्ढतु० गाहा । 'वड्वतु' त्ति वृद्धिं यातु । को य सो ? 'चायगवसो' वायेंति सिस्साणं कालिय-पुन्चमुतं ति वातगा-आचार्या इत्यर्थः, गुरुसैण्णिहाणे वा मिस्समावेण वाढतं सुतं जेहिं ते वायगा, वंसो त्ति-पुरिसपन्च- 5 परंपरेण ठितो वंसो भण्णति । सो चेव जसोवज्जणतो संजमोवज्जणतो वा जसवंसो भण्णति, सो य अणागतवंसो इत्यर्थः । कस्स सो एरिसो वंसो ? भण्णति, अन्जणागहीणं ति । केरिसाणं ? ति पुच्छा, भण्णति-जीवादिपदत्य- पुच्छास वाकरणे सद्दपाहुडे वा पहाणाणं, एवं चरणकरणे कालकरणेमु वा सन्चभंगविकप्पणास य तप्परूवणे य तहा कम्मप्पगडिपरूवणाए पधाणाणं पुरिसाणं बड्तु वायगवसो ॥२९॥ तस्स सीसो- जचंजणधाउसमप्पहाण मुद्दीय-कुवलयनिहाणं । वडूढउ वायगवंसो रेवंइणक्खत्तणामाणं ॥३०॥ जच्चजण गाहा । जच्चजणग्गहणं कित्तिमबुदासत्थं, सरीरवण्णेण तन्निभो। तहा सरस-पक्कमुदियफलसण्णिभो य । कुच्छितो उवलो कुवलयो, सो य कण्हकायो, कुवलयं वा-णीलुप्पलं, कुवलयं वा-रयणविसेसो। रेवतिवायगो त्ति । सेसं कंठं ॥३०॥ तस्स सीसो- अयलपुरा णिक्खते कालियसुयआणुओगिए धीरे । वंभद्दीवग सीहे वायगपयमुत्तमं पत्ते ॥ ३१ ॥ अयलपुरा० गाहा । वभद्दीवगसाहीणं आयरियाणं समीवे निक्खंतो सीहवायको, उत्तमवायकत्तणं च तक्का- लमुतसंभवं पडच्च । सेसं कंठं ॥३१ ।। तस्स सीसो- 'जेसि इमो अणुओगो पयरइ अज्जावि अड्ढभरहम्मि । बहुनगरनिग्गयजसे ते वंदे खंदिलायरिए ॥ ३२ ॥ जेसि इमो० गाहा । कहं पुण तेर्सि अणुओगो? उच्यते-वारससंवच्छरिए महंते दुभिक्खकाले भत्तट्ठा अण्णाणतो फिडिताणं गहण-गुणणा-ऽणुप्पेहाभावातो मुते विप्पणढे पुणो मुभिक्खकाले जाते मधुराए महंते साहु- समुदए खदिलायरियप्पमुहसंवेण 'जो जं संभरति' त्ति एवं संघडितं [जे० १९० प्र०] कालियनुतं । जम्हा य एतं मधुराए कतं तम्हा माधुरा वायणा भण्णति । सा य खदिलायरियसम्मय त्ति कातुं तस्सतियो अणुओगो भण्णति । सेस कंठं । अण्णे भणति जहा-मुतं ण णडं, तम्मि दुभिक्खकाले जे अण्णे पहाणा अणुओगधरा ते 25 विणवा, एगे खदिलायरिए संधरे, तेण मधुराए अणुयोगो पुणो साधणं पवत्तितो त्ति माधुरा वायणा भण्णति, तरसंतितो य अणियोगो भण्णति ॥३२॥ 15 20 १ 'भगिय-कम्म ख० मो० विना । हारि० वृत्ती अयमेव पाठ आदृतोऽस्ति ।। २ सण्णिघे वा आ० ॥ ३० ल०॥ ४ कुच्छितो पलयो कुवलयो आ० ॥ ५ जेसि तिमो ल० ॥ ६ अणुयोगो दा० ॥ ३ रेवयण' चु० २ १० प्रिणदासगणिमाचरविरड्याए मुकार संनुय [स०५ गा १३-११ तत्वो हिमवतमहतविकमे घिइपरकममईते । सज्झायमर्णतघरे हिमवते वदिमो सिरसा ॥ ३३ ॥ तनो हिम० गारा । हिमपंतपचतेग मांतवणं मुळ मस्स सो दिमतमातो, श मरो पत्यि भयो वजुठो घि, एस तिवादो । उचरतो वा हिमपण सेसविसास य समरेण निनारितो भसो, हिमतनिधारमो 5 मसो मांसो चि म्तो हिमपसमईतो । मतविकमो का ? उच्यते-सामस्पतो, महंगे वि कुस-गण-सपप्पयोपणे वरति चि, परप्पयादिभएन मा विसेसमदिसंपत्तणतो पा मातविफमो । भाषा परीसहोमसग्गे तपपिसेसे या पितिमठेप परफमतो माता । अणंतगम पनपता मनसपरो त, मांत हिमसणाम पवे । सेस कंठं ॥३३॥ " 10 16 . कालियसुयअणुओगस्स धारए घारए य पुब्वाण । हिमवंतखमासणे वंदे णागज्जुणायरिए ॥३॥ कालिय० गारिममतो घेर हिमवतसमासमणो। वस्स सीसा पागम्गुणापरितो ॥ ३४ ॥ वस्स इमा गुपफिचमा- मिर्दु-मदवसपण्णे अणुपुब्बि वायगसण पते । ओहसुयसमायारे णागजुणवायए वदे ।। ३५।। मिदु-मएम० गाहा । 'मधुपुम्भी' सामादियादिसतमगाणेच, काम्यो य पुरिमपरियायचणेव परिसाणु- सुम्नितो य पायगवर्ष पचो, मोरसत प उस्सम्मो, तेच मायरति । सेर्स ठं॥३५॥ णागमुणवायगस्स सीसो भूतविण्णो मापरितो । तम्सिमा गुणफिचमा ति गाई- तेवियवरकणग-चपय विमउलवस्कमलगन्मसरिखपणे । भवियजणहिययदइए दयागुणविसारए धीरे ॥३६॥ मदमरहपहाणे बहुविहसमायसुमुणियपहाणे । अणुओगियवस्खसहे णाइलकुलवसणविकरे ॥ ३७॥ १ मत. । मेम् प्रती 'मरते इति पाम्सोपरि टिप्पणी गपा- 'मयत वित्तो पाखाम् । २ पतिमायो मा सोहिमरतो ति भदोरिमति मातरिमो तो मन मा मते मरतबा । ५ मुरोग मिप म पनियतमगापानम् PG मिशार सस्मिपि प्रतिसम्मत हर पाबायुप्मनितम्- गोभिवान पि पमो मणुमोगे पिरम्पारभिवा । दिदि-पाचे पररले पमिदान । ततो य भूपरि नि तप-सममे भनियिम । परिपपसामवामी सबमनिम्म् ॥ पवाराबाबुमानिये “परमपि याबास नो मित् इति मे भी प्रिपनी ८ परिमपरि मा । पूरपरि । ९ लिपि त्रवि परमपमतपिपपप इति पाठ पामते । ममाता पिमद्रापार परमग माहा' इनि स्पेयेच एस पाम स्पोस्ति । पुषी पुना "तषिय. गा" ति प्रोना पता विपवरपगपया इस पर बाट सम्मापते । श्रीमग्यगिरिपारस “पवित्पारि गापापस इति प्रानिारदेव परवबियपमर्थपप इस पामेडजीतो पर न पाकिमपिपारनिधि पाठ्येशुम भाव परते ॥ १. प्मसिरिष सु 1 ११ गुमोपिप , । गुमोप 1 श्रीहरिमद मसपगिरिमामयमेव पास जमा स्वम्वोमस्ति । म इति। । 'मसमय 5 10 घेरावली] सिरिदेववायगविरहयं णटीसुत्त । ११ भूयहिययप्पगन्भे वंदे हं भूयदिण्णमायरिए । भवभयवोच्छेयकरे सीसे णागज्जुणरिसीणं ॥ ३८॥ [विसेसयं ] तविय० गाहा । गम्भो त्ति-पोमकेसरा । सेसं कंठ ॥३६॥ अड्ढभरह० गाहा । वहुविहो सज्झायो त्ति-अंगपविट्ठो वारसविधो, अणंगपविट्टो य कालिय-उकालितो अणेगविहो । सो य पधाणो ति, मुगुणितत्तणेण निस्संको त्ति कातुं । सेसं कंठं ॥ ३७॥ भूतहितय० गाहा । भूतहितं ति अहिसा । [जे०१९० द्वि० ] पाल्भं ति-धारिटं । अहिंसाभावे पाग- मता, अतीवअप्पमत्तताए अहिसाभावपरिणता इत्यर्थः। सेस कंटं ॥३८॥ भूतांदण्णस्स सीसो लोहिच्चो । तस्स इमा थुती- सुमुणियणिचा-ऽणिचं सुमुणियसुत्त-स्थिधारयं णिचं । वंदे हं लोहिचं समावुव्भावणातचं ॥ ३९ ॥ सुमुणित० गाहा । मुट्ठ मुणितं मुमुणितं । किं त ? भण्णति-जीवो जीवत्तणेण निच्चो, गतिमादिरहि अणिच्चो । परमाणू अजीवत्तणेण मुत्तत्तेण य निचो, दुप्पढ़ेसादिएहिं वण्णादिपज्ज वेहि य अणिच्चो । मुटु त मुणितं मुत्तऽत्यं धरेति । णिच्चकाल पि म्वे भावे ठितो सम्भावो, सं-सोमणो वा भावो सम्भावो, -विज्जमाणो वा भावो सम्भावो, त उन्भासए तचत्तेण, तथ्यत्वेन इत्यर्थः । तं च लोहिच्चणामं आयरियं वंदे । सेस कंठं ॥३९॥ तस्स लोभिच्चस्स सीसो दूसगणी । तम्स इमा थुती- अस्थ-महत्थक्खाणि सुसमणवक्खाणकहणणेवाणिं । पयतीए महुवाणि पयओ पणमामि दूसगणिं ॥ ४०॥" सुकुमाल-कोमलतले तेसिं पणमामि लक्खणपसत्थे । पादे पावयणीणं पांडिच्छगसएहि पणिवइए ॥ ४१ ॥ अत्य-महत्य० गाहा । खाणि त्ति-आगरो। सा य अत्यस्स खाणी। किंविसिट्ठस्स ? महत्थस्स। महत्थो य 20 अणेगपज्जायभेदभिण्णो । अहवा भासगरूवो अत्थो, विभासग-सव्वपज्जववत्तीकरो य महत्थो । एरिसस्त अत्यस्स खाणी । का सा ? 'वाणि' ति संवज्झति । सुभो समण(णो) सुस्समण(णो), तस्स सुस्समणस्स वक्खा णकहणं ति-अत्थकहणं, तम्मि अत्थकहणे सोताराण करेति वाणी णेवाणी । अहवा वक्खाणं ति-अणुयोगपरूवणं, १ घरकणग० गाहा आ० । वरकणगतविय० गाहा दा० ॥ २ घारेयन्व। यहिंसा आ० । धारेव्वं मो० ॥ ३ धारयं वदे । सम्भावुमावणया, तत्थ लोहिच्चनामाणं ॥ इति मु० पाठः । नाय पाठर्णि-वृत्तिकृतां सम्मत , नापि च सूत्रप्रतिपूपलभ्यते ॥ ४ सन् शोभनो वा भाव सद्भाव , सन्-विद्यमानो वा भार सद्भाव इत्यर्थ ॥ ५ संघेजमाणो आ० ॥ ६ फ्लाणी डे० ल० ॥ ७ सुसवण चूर्णी पाठान्तरम् ॥ ८ वाणी हे० ल० ॥९ वाणी हे. ल. ॥ १० गणी हे० ल० ॥ ११ चत्वारिंशत्तमगाधानन्तर P प्रति विहाय मासु सूत्रप्रतिपु गाथेयमधिकोपलभ्यते--- तव नियम-सच्च-संजम-विणय-Sजव-खति -मद्दवरयाण । सीलगुणगहियाण अणुओगजुगप्पहाणाणं ॥ अत्र “गद्दियाण' इति ‘गर्दिताना' ख्यातानाम्" इति आवश्यकदीपिकाकृना व्याख्यातमस्ति । एतद्गाथाविषये जेसू० प्रतौ ॥ गाथा न वृत्तौ कुतश्चित् " इति टिप्पणी वर्तते ॥ १२ पडि मु० ॥ १३ खाणी, दृसगणि ति संयं आ० ॥ एपाऽपि , -- 15 . 10 विणतासगणिमहत्वरविराया पुण्णाप संजय [सु०६-७ गा १२-१३ काम सिमरखेपमादियाहि कारि पम्मकाणं । तत्प स्टाण वि मागवाण तस्स पाणी नाणि नणेति, किमग पुम पम्मस्सरणहमागताण है। भाता पारो-"मुसवण" नि सत्य सबम वि-पापा, तेस सरं जा पि मुस्सापा, परफारसोपानो मणति । मापा मुस्सरणा शासवा इत्ययः। संस ॥४०॥ मा वि दुरसमिणो म चरणपुती- सुकुमाल० गारा । परयण-दुवालसर्ग गणिपिरग नस्स मत्यि सो पापयनी, गुरपो चिकाट मारपण मपिम् । सेस 3॥४१॥ एस पमोकारा मापरिपपुगपाणपुरिसाण पिसेसमापातो फलो। इमा पुष [पं० १९१प्र० सामानको समविसिद्धाम केजा-- जे अण्णे भगवते कालियसुयआणुओगिए धीरे । ते पणमिण सिरसा णाणस्स रूवण वोच्छ ॥ ४॥ ॥ घेरायलिया मम्मत्ता ॥ जे अण्णे गााकठा ॥४२॥ एवं प नाणपक्षमायण मरिहत्स देजति, गो मवरिस्स देरमा । मसो मथित- [सुत्त ६] सेलघण १ फुटग २ चालणि ३ परिपूणग ४ इंस ५ महिस ६ मेसे ७ य । मसग ८ जल्ग ९ पिराली १० जाग ११ गो १२ मेरि १३ आमीरे ॥४३॥ सा समासो तिविहा पण्णता, त जहा-जाणिया १ अनाणिया २ दुब्बियस्दा ३ ।' . सेलपण गारा । एस्य अरिग इम हरेम-मप्पसरयसम्मसारिण, पसस्वमाविस य मरम्मसा रिण। तराईस मेमनमा-भागसारिण मरिरा, गो-मेरी आमीरेम य पसत्योस्मसोपमीवा मरिा । सेसा मममरिया ॥४३॥ इमस्स य नाणपस्मणायगस्स पालणे परिसा माणिगार तिनिहरा माणिवमा । तस्य भानिया- राष-दोसपिसेसम्म् मममिमगरिया या इसमा-मम् । सा सल माबगपरिसा एणतचिता मापपम्मा ॥१॥ [पमा मा १६५ १ मिमा २ दिमम स । पिप Pr पम्पर्ष। ४ भामीरी सिपि ममन्दिषु । एष एष पास भारिमन मण्यपिरिम्य मामायोऽस्ति । ५ एतत्स्वानन्तरं । मो प्रति पिपत्तिाभिरमामावोनि मेय अमित मामाता पाठ रफ्बम- बाधिमा बा- बीमिप नासा पुचि र गुमापसमिया । दोसे प बिबरमती बापट बाविप परित। ममामिमा बदा- मादोर पनामाप मिपमनप-सौ-कारगम्पा । रपणमिण मसीपिया प्रवानिया सा म परिमा। दुनिषता - नपा निम्मामो बाब पुष्णा परिमस्स गोसेवा पत्पिपारपुप्पो र गामेपपिपलो। एक्लाम्पस पय मामि माल ता स-मानिसकारम एक पापावर चौ . मामाम् बोम्म पम्माबठे " इति । मामीरीस बा 15 1 परिसा णाणपरूवणा य] सिरिदेववायगविरदयं णटीसुत्तं । १३ इमा अजाणिया- 10 पगतीमुद्धमजाणिय मियछावय-सीह-कुक्कुरगभूता। रयणमिव असंठविता मुहसण्णप्पा गुणसमिद्धा ॥२॥ [ कल्पमा गा ३६७ ] इमा दुन्चियड्ढा- किंचिम्मत्तग्गाही पल्लवगाही य तैरियगाही य। दुवितड्ढिया उ एसा भणिता तिविहा भवे परिसा ।।३॥ 5 [कल्पभा. गा. ३६९] एत्थ जाणिया अनाणिया य अरिहा ॥ एवं कतमंगलोवयारो थेरावलिकमे य दंसिए अरिहेस य दंसितेसु दुस्सगगिसीसो देववायगो साहुजणहितहाए इणमाइ ७. णाणं पंचविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणियोहियणाणं १ सुयणाणं २ ओहिणाणं ३ मणपज्जवणाणं ४ केवलणाणं ५। ७. नाणं पंचविहं० इत्यादि । अस्य व्याख्या-णाती णाणं-अवबोहमेत्तं, भावसाधणो। अहवा णज्जइ अणेणेति नाणं, खयोवसमिय-खाइएण वा भावेण जीवादिपदत्या णज्जंति इति णाण, करणसाधणो। अहवा गज्जति एतम्हि त्ति णाणं, नाणभावे जीवो त्ति, अधिकरणसाहणो । पंच इति संखा । विधिरिति भेदो। पण्णत्तं पण्णवितं प्ररूपितमित्यनर्थान्तरम् , अस्थतो तित्थकरेडिं, मुत्ततो गणधरेहिं । अहवा पण्णा-बुद्धी, पहाणपण्णेण अवाप्तं पण्णत्तं, सम्मबिटिणा लद्धमित्यर्थः । अहवा पहाणपण्णातो अवाप्तं पण्णत्तं, तित्थकरसमीवातो गणधरेहिं 15 लद्धं ति वुत्तं भवति । अहवा पण्णा-बुद्धी, तीए अवाप्तं पण्णत्तं, तित्थकर-गणधरा-ऽऽयरिएहिं कहिज्जतं [जे० १९१ द्वि०] • बुद्धीए पण्णत्तमिति । तदित्तणेण अधिकतत्थं नाणं संवज्झति । जे पुनमुवण्णत्या पंच णाणभेदा तेपा प्रतिपद- मभ्युपगमे जहासदो। अत्याभिमुहो णियतो वोधो अभिनियोधः, स एव स्वार्थिकप्रत्ययोपादानादाभिनिवो- धिकम् । अहवा अभिनिवोधे भवं, तेण निव्वत्तं, तम्मतं तप्पयोयणं वाऽऽभिणिवोधिकं । अहवा आता तदभिनिवुज्झए, तेण वाऽभिणिवुझते, तम्हा वाऽभिणि बुज्झते, तम्हि वाऽभिनियुज्झए इत्ततो आभिनिवोधिकः । स एवाऽऽभि- 20 णिबोधिकोपयोगातो अनन्यखादाभिनियोधिकम् १ । तहा तन्छृणोति, तेण वा मुणेति, तम्हा वा मुणेति, तम्हि वा सुणेतीति मुतं । आत्मैव वा श्रुतोपयोगपरिणामादनन्यत्वाच्छृणोतीति श्रुतम् २ । अवधीयते इति अवधिः, तेण वाऽवधीयते, तम्हि वाऽवधीयते, अवधाणं वा अवधिः, मर्यादेत्यर्थः । ताए परंपरोपणिवंधणातो दन्बादतो अवधीय(यं)त इति अवधी ३ । परि-सन्चतोभावेण गमणं पज्जवण पज्जवः, मणसि मणसो वा पज्जवो मणपज्जवो, स एव नाणं मणपज्जवनाणं । तहा पज्जयणं पज्जयः, मणसि मणसो वा पज्जयः मनःपर्ययः, स 25 एव नाणं मणपज्जयणाणं । तहा आयो पावणं लाभो इत्यनान्तरम् , सव्वतो आतो पज्जातो, मणसि मणसो वा पज्जायो मणपजायो, स एव नाणं मणपज्जव(?पज्जाय)णाणं । अहवा मणसि मणसो वा पज्जवा मणपज्जवा, तेसिं तेमु वा नाणं मणपज्जवनाणं । तहा मणसि मणसो वा पज्जया [मणपज्जया], तेर्सि तेसु वा नाणं मणपज्जयनाणं । गमणपरावत्तेगो लाभो मेदा य बहुपरावत्ता । मणपज्जवम्मि नाणे णिरुत्तवयणऽत्य पंचेते ॥१॥४॥ " - 30 १ जे होति पगयमुद्धा मिग इति कल्पभाष्ये ॥ २ तुरिय आ० दा० ॥ ३ सतदिविणा आ० ॥ अधिकृतार्यम् इत्यर्थ । “त जहा ' इति सूत्राशे विद्यमान 'तद्' इति पदमनुलभ्येद वचनम् ॥ ५ इत्यतः इत्यर्थः ।। ४ तदित्यनेन मिमदासगगिमहाचरविरमाए मुण्णार संजुम [मु. ८-१९ "कसम्मगं सदे सकसमसापारपं अणतं च ।" [विशेषा गा० ८१] इस्पर्पः ५। नाणसो य सम्मत्या मिनियोपिकादीब समाणाधिकरणा [० १९२ प्र०] दहष्या, समरा-आमिनियोपिकप नाण च आमिनि- पोपिकनाणं । एवं सम्वेस ऐट्रमं । पुण य-किमेस मतिनामादियो कमा ! एत्य उचरं मम्पति-एस सकारणो उरणासो । इमे य से कारणा-सुलसामिचमतो सम्बकामविणेदहितपणतो इंदिया मिदियणिमिष 5 घणतो तृष्ठरस्वतोवसमकारमधमतो सम्मवादिपिसयसामवणतो परुषससामभचपभो य सम्मापे य सेसमाण संमपातो मतो मादीए मति-मवार कताई । म वि य "मतिपुनः सत" [मुच ४३] वि पुर्व मतिमार्ग कतं, तस्स य पिट्ठतो मुत ति । भाषा ददिया-णिदियनिमिरचणमविसिटे पि मति-मुस परोरदेसपममेचमदातो भरिवरयणकारमपणतो य मतिविसेसचणवा य मतस्स मतिमभवरं मतं ति । मति-सयसमाभकारूचना मिय- सपपरिम्गाचणवो समिरम्नयसाहम्मसमता सामिसाएम्मचर्णतो य फस्या फाळेगतामणवो य मवि-मुठाणतरं 10 मलपि पि मणिवो । ततो य छउमत्यसामिसामग्मपणतो य पुम्गलरिसपसामग्णवणतो य नपारसममारसाम मणतोय पचपखमापसामणचणतो य माहिसमणवर मणपनपना ति। सपनाशचमचमतो सम्माविमुदचमतो य विरतसामिसामष्णवणसो य सम्बावसापामत्तणतो य सम्युचम दिणमो य दवे फारसं मपिस ।। ८ त समासमो दुविह पण्णत्त, त जहा-पञ्चक्ख च परोक्खं च । ८ सम्म पेतं समासतो दुरि-परफर्म च परोक्त प० इत्यादि । इस अप्परसम्पचमतो पुमा पचास 15 पणविमति । इस नीनो मासो । का। उच्यते-"मर म्याप्तौ " इति, गाणप्पणताए मत्से पसा वि खेप जीरो अवस्यो, णापमावेष मापति चि ममितं भवति । माया "अस मोममे" पेतस्स पा समस्पे असा चि मालो, पाम्पति मस्के पेस्पेर्य । मासं पति पाति पि पचनस, अणिदिय ति पुर्व मपति । पसरामो य से परपिमादि मेदा दम्मा । माखावो [२. १९२ मि.] परेसन मार्म उप्पमति तं परोक्तं समेई पसरामो ईदिय-मनो- निमिर्च वहममिति । ९ से कि त पचास ? पञ्चरखं दुविई पण्णसं, तं जहा-इंदियपञ्चक्ख च णोई- दियपचक्खं च। १० से कि त ईदियपञ्चक्ख ? इदियपच्चस्व पचविहं पण्णत, त जहा-सोइदिय- पञ्चरख चरिखदियपञ्चसं घाणिदियपञ्चपलं सणेदियपञ्चक्ख फासिदियपञ्चक्ख । से त इंदियपश्चक्ख। ९ से किं तं परमर्म ! पुग। 'स' पिस पवक्तनामयो । कि त ति परिपणे, कतिमदं ति पुर्व मरति । ते पसिन। ति मायरियो पसंदसुरमसित तस्सम्मकाणेब पचपखसम्न करितकामो मार-पार्स पुषि पण्णत्त ति। १० रिय ति-पुमासेरि सठाममिमपि वर्मिविय, साईदियमावि विमा समावप्परेसेहि सा परम सतोषसमावो ना मदी मारिदिय, तस्स पचास ति दियपषसे । तं पैपपिई । पर भार-मा ििवत बा ॥'चप पपिति विसति सुते पिपरो मा ॥ सो सम्मता इफामा ॥ ५ स्पा मा ॥ परोक्त पर बस ना ॥७पन्तुदिप .८ बिस्मिदिन मो मु. 10 १पच मो ॥
5 10 आणुगामियं भणाणुगामिय च मोहिणाणं] सिरिदेववायगविरइय णदीसुत्त । १५ दबिंदियावत्थियपदेसमेत्तम्गहणतो सेसप्पदेसेमु अणुवलद्धी खयोवसमनिरत्थता वा भवति । आयरिय आह-ण एवं, पदीवदिद्वंतसामत्थतो, जहा चतुसालभवणेगदेसजालितो पदीयो सव्वं भवणमुज्जोवेति तहा दलिदियमेत्तप- देसविसयपडिवोधओ सव्वातप्पदेसोवयोगत्थपरिच्छेययो खयोपसमसाफल्लया य भवति त्ति ण दोसो। भाविदियो- वयारपञ्चक्खत्तणतो एत पञ्चक्खं, परमत्थओ पुण चिंतमाणं एतं परोक्खं । कम्हा ? जम्हा परा दबिंदिया, भाविदियस्स य तदायत्तप्पणतो॥ ११. से किं तं णोइंदियपच्चक्खं ? णोइदियपच्चक्खं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-ओहि- णाणपञ्चक्खं १ मणपज्जवणाणपच्चक्खं २ केवलणाणपञ्चक्खं ३ । १२. से किं तं ओहिणाणपचक्खं ? ओहिणाणपञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा- भवपञ्चतियं च खयोवसमियं च । दोन्हं भवपञ्चतियं, तं जहा-देवाणं च णेरतियाणं च । दोन्हं खयोवसमियं, तं जहा-मणुस्साणं च पंचेंदियतिरिक्खजोणियाणं च । ११-१२. णोइंदियपञ्चक्खं ति इंदियातिरित्तं । त तिविहं ओहिमादी। अवहि त्ति-मज्जाया, सा य रूविदव्वेसु त्ति, "रूविस्सऽवधे" [तत्वा अ १ सू २८] त्ति वयणातो, तेसु णाणं ओहिनाणं । 'भवपच्चईतो' त्ति भणिते भण्णति-णणु ओधी खयोवसमिते भावे, गरगादिभवो से उदइए भावे, कहं भवपच्चइतो भण्णति ? त्ति, उच्यते-सो वि खयोवसमितो चेव, किंतु सो चेव खयोक्समो णरग-देवभवेसु अवस्सं भवति त्ति, दिहंतो पक्खीणं आगासगमणं व, एवं भवपच्चडतो भण्णति । खयोवसमियं पुण णर-तिरियाणं, तेमु णावस्सं उप्पज्जति 15 त्ति खयोवसममवेक्खति॥ खयोवसमसरूवं च मुत्तेणेव [जे० १९३ प्र०] भणितं- १३. को हेऊ खायोवसमियं ? खायोवसमियं तयावरणिज्जाणं कम्माणं उदिण्णाणं खएणं अणुदिण्णाणं उवसमेणं ओहिणाणं समुपज्जति । अहवा गुणपडिवण्णस्स अणगारस्स ओहिणाणं समुप्पज्जति । १३. को हेतु त्ति इच्चादि । सो य खयोवसमो गुणमंतरेण गुणपडिवत्तितो वा भवति । गुणमंतरेण जहा 20 गगणभच्छादिते अहापवत्तितो छिदेणं दिणकरकिरण ब विणिस्सिता दवमुज्जोवंति तहाऽवधिआवरण- खयोवसमे अवधिलंभो अधापवत्तितो विण्णेतो। गुणपडिवत्तितो- गुणपडिवण्ण० इत्यादि । उत्तरुत्तर- चरणगुणविसृज्झमाणमवेक्खातो अवधिणाण-दसणावरणाण खयोवसमो भवति । तक्खयोवसमे य अवधी उप्पज्जति ॥ १४. तं समासओ छव्विहं पण्णत्तं, तं जहा-आणुगामियं १ अणाणुगामियं २ 25 वड्ढमाणयं ३ हायमाणयं ४ पडिवाति ५ अपडिवाति ६ । १४. आणुगामियं ति । अणुगमणसीलो अणुगामितो, तदावरणखयोवसमाऽऽतप्पदेसविमुद्धगमणत्तातो लोयणं व ॥ १ सत्रमिद प्रश्न निर्वचनात्मकमपि उपलभ्यते-से किं तं भवपञ्चश्यं ? २ दुण्ह, तं जहा-देवाण य रइयाण य । से किं तं वयोवसमियं ? २ दुण्हं, तं जहा-मणूसाण य पंचेदियतिरिक्खजोणियाण य । जे० मो० हे. मु० । किञ्च- चर्णि-वृत्तिकृता नेद पश्नोत्तरात्मक सूत्र सम्मतम् ॥ २ इयं' ति आ० दा० ॥ ३ "दियाणं ख० ॥
निमदासगणिमहत्तरविण्याप पुणीए समु [अ० १५-२१ १५ से कि तं आणुगामिय ओहिणाण? आणुगामिय ओहिणाण दुविह पण्णतं, तं जहा-अंतगय च मज्झगयं च । १५, मतगयं ति। ना मतसं पर्णत पणत, मविसिहो वसो। एर्ष मोरासियसरीरंते ठित गत ति पगई, तं च मातपदेसफहगापरि, एगदिसारममामा य अंतगतमोपिया मम्मति । माग सम्बावपदेसविसदेस नि 5 मोरासियसरीरेगसेण एगदिसिपासणगत ति मतगई मम्मति । भारा फडतरमस्पो मण्णति-पगदिसायपिउपसद खेचातो सो अवपिपरिसा मतगतो सि ममा तमा मंगतं मणठि। ममग पुग मोरासियसरीरमग्मे फरगपिसदीतो सन्चासप्पदेसपिम्दीता पा सपदिसारसमचमतो मम्मगतो पि ममति । मापानपिउपस- दलेचम्स मा भापिपुरिसो मजागठो पि अता या ममगता मणति ॥ १६ से कितं अतंगय ? अतगपं तिविद पपणतं, त जहा-पुरओ अंतगये । 10 ममगमो अंतगयं २ पासतो अंतगयं ३ । १७ से कि तं पुरतो अतगय ? पुरतो अतगयं से नहानामए केद पुरिसे उक वा चुडलिभ वा अलाय वा मणि वा जोई वा पदीव वा पुरओ काउं पणोल्लेमाणे पणाल्लेमाणे गच्छेज्जा । सेसे पुरमो अतगर्य । १८. से कि त मग्गओ अंतगयं ? मगओ अतगय से जहाणामए केइ पुरिसे 1 उक वा चुडलिय वा अलाय वा मणि वा जोई वा पर्दव वा मग्गओ का अणुकद्देमाणे मणुकड्ढेमाणे गच्छेज्जा । से च मग्गमो मतगयं २ । १९. से कि त पासो मतगय ? पासओ अंतगय से जहाणामए केर पुरिसे तकं वा चुदलिय वा अलाय वा मणि वा जोई वा पईव वा पासो काउ परिकद्देमाणे परिफद्देमाणे गच्छेज्जा । सेन पासो मतगय ३१ से च अंतगयं । २० से कि त मज्झगय ? से जहानामए केइ पुरिसे उफ वा चुडलिय वा अलाय वा मणि वा जोई वा पईवं वा मत्पए का गच्छेज्जा । से सं मनागय । १५-२० उमत्ति-दीविया । घुरसि पि-तणपिरी भागे परममिता । अपार वि-दास्प नर्सत । मणि का मस्त । मोर पि-मालगादिठित भगमि जसवं । पदीयो पि-दीमती । 'पुरतो' नि अमातो 'पमोच' ति १५ १६-१९ पुत्र मतगये पति परमानन पाये पते ॥ २१-१९ मा बासिम विभाग * मो बा १-१९ चा परमिमम्मा ममापमा पीपम्पा मणिम्या मोहिम्पा विसर पारी पनि । ४१ पु महार्य वा परी का मणि पा मोति वा पुरवा इति पार तसिपि समप्रति एयते । म पि-विसम्मत पर प्राचार पम्पत पवापि नामावानुवारेमाम्मानित पारय मुळे पाठ गतोऽस्ति । मठार्य पा मणि या पदी वा मोति पा पुरमो पनि म प्रय बास्मासापरपेषु मारऽ पते । ५पा समुप्पामागे समुप्पामा गणिमा ने 6 । 10 १७ 10 अगाणुगामिय वड्ढमाणयं च ओहिणाण ] सिरिदेववायगविरइय णदीसुत्त । "णुद प्रेरणे" इत्यहितस्स दंडग्गहितस्स वा परंपरेण नयनमित्यर्थः । 'मग्गतो' ति पिट्ठतो 'अणुकड्ढणं' ति इत्थग्गहितस्स दंडग्गहितस्स वा अणु-पच्छयो कड्ढणं ति । 'पासतो' त्ति दाहिणे वामे वा पासे सा(दो)पा- स[जे० १९३ द्वि० ]जमलहित । परिकड्ढियं ति-हत्य-डंडगहितं वा परि-पासतो द्वितस्स कड्ढणं परिकड्दणं ।। सीसो पुच्छति- २१. अंतगयस्स मज्झगयस्स य को पइविसेसो ? पुरओ अंतगएणं ओहिनाणेणं 5 पुरओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, मग्गओ अंतगएणं ओहिनाणेणं मग्गओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाणि जाणइ पासइ, पासओ अंतगएणं ओहिणाणेणं पासओ चेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, मझगएणं ओहिणाणेणं सव्वओ समंता संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ । से तं आणुगामियं ओहिणाणं । २१. अंतगतस्स० इञ्चादि । आयरियाऽऽह-पुरतो० इञ्चादि। 'सन्चतो' त्ति सवाल वि दिसि-विदिसासु 'समता' इति सव्वातप्पटेसेसु सव्वेसु वा विमुद्धफडगेस। अहवा 'सव्वतो' त्तिसन्चास दिसि-विदिसामु सव्वातप्प- देसफडगेमु य । 'से' इति निदेसे अवधिपुरिसस्स, 'मंता' इति णाता। अह्वा “समत्ता" इति समंदबादयो तुल्ला अत्ता इति-प्राप्ता इत्यर्थः॥ २२. से किं तं अणाणुगामियं ओहिणाणं? अणाणुगामियं ओहिणं से जहा- 15 णामए केइ पुरिसे एगं महंत जोइट्ठाणं काउं तस्सेव जोइट्ठाणस्स परिपेरंतेहिं परिपेरंतेहि परिघोलेमाणे परिघोलेमाणे तमेव जोईट्ठाणं पासइ, अण्णत्थ गए ण पासइ, ऐवमेव अणाणुगामियं ओहिणोणं जत्थेव समुप्पज्जइ तत्थेव संखेज्जाणि वा असंखेज्जाणि वा संवद्धाणि वा असंबद्धाणि वा जोयणाई जाणइ पासइ, अण्णत्थ गए ण पासइ । से वं अणाणुगामियं ओहिणाणं । २२. णो गच्छंतमणुगच्छति ति अणाणुगामिकं, संकलापडिबद्धहितप्पदीवो व्च, तस्स य खेत्तावेक्खखयो- वसमलामत्तणतो अणाणुगामित्त । पेरतं ति-समंततो अगणिमासण्णं, तस्स य जोइस्स सव्वतो दिसि-विदिसामु समंता परिघोलणं ति-पुणो पुणो इतो इतो परिसकणं ॥ २३. से किं तं वड्डमाणयं ओहिणाणं ? वड्डमाणयं ओहिणाणं पैसत्थेसु अज्झ- १ पासे दोसु वा सय जम आ० दा० ॥ २ मग्गो अंतगपण० इत्यादिसूत्राश पासओ अंतगएण० इत्यादिसूत्राशश्च स० स० प्रत्यो पूर्वापरकमव्यत्यासेन वर्तते ॥ ३ समत्ता इति पाठमेश्चूनिर्दिष्टोऽस्ति ॥ ४ “सव्वायप्पएसेमु इत्यादौ तृतीयायें सप्तमी" इति नन्दिवृत्तौ श्रीमलयगिरिपादरेतत्पाठोद्धरणे व्याख्यातमस्ति पत्र ८५-२ ॥ ५-६-११ ओहिन्नाण ३० ल० ॥ ७-८ अगणिहा ख० स० ल० शु० ॥ ९ सर्वासु सूत्रप्रतिपु अत्र जोइट्ठाण इत्येव पाठो वर्तते ॥ १० पवामेव मु० ॥ १२ अगणि- पासेणं, तस्स आ० । अगणिपासण, तस्स दा• ॥ १३ पसत्येहिं अज्झवसाणहाणेहि खं० मो० ॥ 20 चु०३ 10 विणदासगगिम्हरियार मुम्णार सनु [अ० २३-२७ गा १०-५१ वसांणट्ठाणेसु वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स विसन्ममाणस विसृज्यमाणचरिचस्स सवमो समता मोही वडद । जावतिया तिसमयाहारगस्स मुहमस्स पणगजीवस्स । ओगाहणा जहन्ना मोहीखेत्तं जहनं तु ॥४४॥ सब्बबहुअगणिजीवा णिग्तरं जचिय मरेज्जम् । खेत्त सव्वदिसाग परमोही खेचनिहिट्ठो ॥ १५ ॥ अंगुलमावलियाण भागमसंखेज्ज दोमु सखेज्जा। अंगुलमावलियंतो आवलिया अगुलपुहत्तं ॥ ४ ॥ इत्यम्मि मुहतो दिवसतो गाउयम्मि चौद्धब्बो । जोयण दिवसपुहत्वं पक्वतो पण्णवीसामओ ॥४७॥ भरहम्मि अद्धमासो जंबुद्दीवम्मि साहिमो मासो। वास च मणुयलोए वासपुहचं च रुयगम्मि ॥१८॥ संखेज्जम्मि उँ काले दीव समुद्दा वि होंति संखेज्जा । कालम्मि असंखेज्जे दीव-समुहा उ मइयब्वा ॥१९॥ काले चउण्ह बुडी कालो भइयब्यु खेपचुडीए । वुट्टीए वन्व-पज्जव भइयन्वा खेत-काला उ ॥ ५० ॥ सहुमो य होइ कालो तत्तो मुहुमयस्य हवइ सेत् । मंगुलसेदीमेचे ओसप्पिणिमो असखेज्जा ।। ५१ ॥ से च वडमाणय मोहिणोण। २३ पर्पनं पड़ी, पुमारस्पाता उरकरि परमाणे ति, १ उम्पुर्ण परणयणरिमुदिमपेरल, तो पसस्पन्ससाणहाणा आदिपसरपलेमाणुगता मति, पसत्पदमयसारिमणुनि पिर्त पसस्पयवसायो मगति, पसत्यम्मरमाणाता य परया ऽतविमुदी, चरणा-ऽवविमुदीतो प परमपचतसदीयं पड़ी भवति । श्मामा य मागुकोम-विमनिममापिरहिसदेसमगारामा पा परियार ॥ ४४-५१॥ 18 मो.५ पापये १ सापा 1बीतुन । पीसतो. पि ..मजतो पसरपंमा रा ॥ ७ भागमविलाशिला गापा 1-1..
१९ 5 सिरिदेववायगविरइय णदीसुत्तं । वड्ढमाणयाइ भोहिणाण तब्भेया य] २४. से किं तं हायमाणयं ओहिणाणं ? हायमाणयं ओहिणाणं अप्पसत्थेहि अज्झवसायट्ठाणेहिं वट्टमाणस्स वट्टमाणचरित्तस्स संकिलिस्समाणस्स संकिलिस्समाणच- रित्तस्स सव्वओ समंता ओही परिहायति । से तं हायमाणयं ओहिणाणं । २४. हाणि त्ति-इस्समाणं, पुन्नावत्थातो अयोऽधो इस्समागं । तं च वड्ढमाणविपक्खतो भाणितव्वं । अप्प- सत्यलेस्सोवरंजितं चित्तं अणेगासुभत्यचिंतणपर चित्तं संकिलिट भम्पति ।। २५. से किं तं पडिवाति ओहिणाणं ? पडिवाति ओहिणाणं जण्णं जहण्णेणं अंगुलस्स असंखेज्जतिभागंवा संखेज्जतिभागं वा वालग्गं वा वालग्गपुहत्तं वा लिक्खं वा लिक्खपुहत्तं वा जूयं वा जूयपुहत्तं वा जवं वा जवपुहत्तं वा अंगुलं वा अंगुलपुहत्तं वा पायं वा पायपुहत्तं वा वियत्थिं वा वियत्थिपुहत्तं वा स्यणि वा स्यणिपुहत्तं वा कुच्छि वा कुच्छिपुहत्तं वा धर्णयं वा धणुयपुहत्तं वा गाउयं वा गाउयपुहत्तं वा जोयणं वा जोयणपुहत्तं वा जोयणसयं वा जोयणसय- 10 पुहत्तं वा जोयणसहस्सं वा जोयणसहस्सपुहत्तं वा जोयंणसतसहस्सं वा जोयणसतसहस्सपुहत्तं वा जोयणकोडिं वा जोयणकोडिपुहत्तं वा - जोयणकोडाकोडिं वा जोयणकोडाकोडिपुहत्तं वा+उकोसेण लोगं वा पासित्ता णं पडिवएज्जा । से तं पडिवाति ओहिणाणं । २५. उप्पण्णोहिनाणस्स पुणो पातो त्ति पडिवाती, नाशेत्यर्थः । तं च खेत्तविसेसोवलंमेणं भण्णति । ते य इमे-असंखेयंगुलभागादिया । दुप्पभिति जाव णव त्ति अंगुलपुढत्तं भण्णति । दो हत्था कुच्छी। पडिवातिणो 15 नाव उक्कोसो लोगमेत्तै एव ।। २६. से किं तं अपडिवाति ओहिणाणं ? अपडिवाति ओहिणाणं जेणं अलोगस्स एगमवि आगासपैदेसं पासेज्जा तेण परं अपडिवाति ओहिणाणं । से तं अपडिवाति ओहिणाणं । २६. अपडिवाति त्ति, सो वि क्खेत्तविसेसोवलंभातो चेव णज्जति, अतो भण्णति अलोगस्स एगमवि त्ति। 20 'अवि' पदत्थसंभावणे, किमुत दुपदेसादिउपलंभे ? इत्यर्थः । [जे० १९४ प्र०] ॥ २७. तं समासओ चउबिहं पण्णत्तं, तं जहा-दबओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दव्वओ णं ओहिणाणी जहण्णेणं अणंताणि रूविदव्वाइं जाणइ पासइ, उकोसेणं १ अप्पसत्येसु अज्झवसायहाणेसु स० ॥ २ ओही हायति ख० स० जे० मो० ॥ ४-५ जयमा जे० मु० ॥ ६ पुहुत्त पुहत्त पहुत्त शब्दा सर्वास्त्रपि सूत्रप्रतिषु क्रमपरिहारेण आवृत्त्या दृश्यन्ते ॥ ७ विहत्यि ३ गासुतत्थ जे० ॥ वा विहत्थिं मो० मु० ॥ ८ घणुं वा धणुपु जे० मो० मु० ॥ ९ जोयणलफ्स्त्रं वा जोयणलक्लपुहत्तं जे० मो० मु० ॥ १० →+- एतचिझमध्यगत पाठ सं० स० नास्ति ॥ ११ "मेत्तए वा आ० दा० ।। १२ स० विनाऽन्यत्र-पदेसं पासति तेण ख• शु० । पदेस जाणइ पासइ तेण जे० हे० ल० मो० ॥ १३ अविपदत्थो संभा आ० दा० ॥ १४ तत्थ इति ख. सं. ल. शु० नास्ति ।। -- २० पासइ २। विणवासगगिम्हचरविणमाए पुष्णाए संनुप [मु०२८-२९ गा ५२ सव्वाइ रुविदव्वाई जाणइ पासइ १ । खेत्तओ णं ओहिणाणी जइण्णेण अंगुलस्स असखेज्जतिभाग जाणद पासइ, उकोसेण असंखेज्जाइ अलोए लोयमेचाई खंडाई जाणद कालो ण मोहिणाणी जहण्णेणे आवलिपाए असंखेज्जतिभागं जाणइ पासद, उकोसेणं असखेज्जाओ उस्सपिणीमो अवसप्पिणीओ'अतीत च अणागत च कालं जाणइ पासइ ३ । भावमओ ण ओहिणाणी जइण्णेणं अणते भावे जाणइ पासइ, उकोसेण वि भणते मावे जाणइ पासइ, सब्वभााणमणतर्भाग जाणइ पासइ ४ । २७ विस्परेन सपोवसमविसेसतो असखेजविसमापियाम, भोपिमादिगतिपम्मरसाणं या पदासविक विस्परो, वे पर इमं चतुविद समासता मबति दन्नादि । वनमा भोपिण्णाणी नागणेच तेयामासंतरे भगवे दणे उरसमति, उपोसतो सम्पमिदम्माई । माणा चि नाम, संप में विसेसम्पागणार्म, सागारमिस्पर्मः। 10 पासति पि देसणे, प म सामणगार्ग है सब, अणागारमित्पर्य । खेच-सम्दो य प्रचसिदं । मागको भोपियापी भरणेब अमते माथे उसमति, उकोसता वि मते, माण्णापरावो उकोसपदे ममतगण । उफोसपदे पिने मारा ते सम्ममात्राम मर्णतमागे पाति ॥ २८ ओही भवपतिमो, गुणपञ्चतिमो य वणिओ एसो। तस्स य बहू वियप्पा, दवे खेचे य काले ये ॥ ५२ ॥ से मोहिणाणं । २८ मोधी भर० गापा । रमता गविगप्पा परमाणुमादिवमापिससाठो । खेपठो पि ममपस खेपमागरिकप्पादिया । कासतो वि वासियमसंखेग्ममागादिया । मापसा वि षण्मपग्मवादिया ॥५२॥ मणपरमानाणमिदार्षिावस्स सम्म पणितमादीप [पप्रम् १ । उदापि सामी बिसेसिम्मा सत्रेरि--- २९. [१] से किं त मणपज्जवणाणं ? मणपज्जवणाणे णं भंते ! कि मऎस्साणं 20 उप्पज्जा अमणुस्साण १ गोपमा मणुस्साणं, णो भमणुस्सार्ण । [२] जद मणु स्साणं किं सम्मुच्छिममणुस्साणे गम्भवतियमणुस्साणं । गोयमा ! णो सम्मुच्छिम मणुस्साणं, गम्भवतियमणस्सार्ण । [२] जइ गम्भवतियमणुस्साणं किं कैम्मम्म १ढोपप्पमाधीचात पं विमा । २. मोसप्पिनीमो समप्पिषीमो में से है सर्व पि मते. । पणिस्ता हरिमापादा चायमेन पाठ सम्मतः ॥ ५ परमापारस्पमितिल-10 बापाशुपतोपामि परंप राबत्रामगोरम्मानि । तिमो शनिदो इति नित पाठमेरा ॥ ७ वस्सेप । ८ पामयापानम्न पगति क्षार परिमारिपार-मम्पपिरिभाषम्पास्मान एक बापाविम उपायते- मतिपय सियरा प मोरिमारियति । पासति सम्मो मेसा रोष पासति ।। • सम्म मोहि प. पाचपच ॥ ११ पुष्पसमा मो ॥ १॥ मसाले । एवमाप्रति परिमर सह (२९) धरम् । १५ ममित्र पो म । एमति म मरिमर मजे (१) गए । 11. . ५ मागो बोगीत परिमा ॥१२ मा मते। म मावि.
२१ ओहिण्णाणस्स भेया मणपज्जवगाण च ] सिरिदेववायगविरइय गंदीसुत्त । गगम्भवकंतियमणुस्साणं अकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्ताणं अंतरदीवगगम्भवकंतियमणु- स्साणं ? गोयमा ! कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो अंतरदीवगगम्भवकंतियमणुस्साणं । [४] जइ कम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम- वकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! -संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो । असंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं । [५] जइ संखेज्जवासाउयकम्म- भूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं किं पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं अपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! पज्जत्तगसंखेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगभवकंतियमणुस्साणं, णो अपज्जत्तगसंखेज्जवामाउयकम्मभूमगगम्भ- वकंतियमणुस्साणं। [६] जइ पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भकंतियमणुस्साणं 10 किं सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं मिच्छदिट्ठिपज्ज- त्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं सम्मामिच्छदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवा- साउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं ? गोयमा ! सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयक- म्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं, णो मिच्छद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भव- कंतियमणुस्साणं, णो सम्मामिच्छदिडिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणु- 15 स्साणं। [७] जइ सम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणु- स्साणं किं संजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं असंज- यसम्मद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं संजयासंजयसम्मद्दि- डिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं? गोयमा ! संजयसम्मद्दिट्ठि- पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो असंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तग- 40 संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं, णो संजयासंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखे- ज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवकंतियमणुस्साणं । [८] जइ संजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तग- संखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं किं पमत्तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्ज- वासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं अपमत्तसंजयसम्मद्दिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउय- कम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा! अपमत्तसंजयसम्मदिद्विपज्जत्तगसंखेज्जवासा- 25 उयकम्मभूभगगब्भवतियमणुस्साणं, णो पमत्तसंजयसम्मदिट्ठिपज्जत्तगसंखेज्जवासाउयक- १ जति खे० । जदि स० ॥
२२ मिणवासगणिमाक्सिमाप कुणीर संजुम [सं०१०-१२ म्मभूमगगन्भवतियमणुस्साणं । [१] नइ अपमत्तसजयसम्महिट्ठिपज्जचगसंखे- ज्जवासाउयकम्मभूमगगन्मवर्फतियमणुस्साणं किं इद्विपत्तअपमतसंजयसम्महि द्विपज्जनग- संखेज्जवासासाउयकम्मभूमगगन्मवर्कतियमणुस्साणं अणिड्डिपत्रअपमत्तसजयसम्मद्दिष्टि- पज्जत्तगसंखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं ? गोयमा! इडिपत्तअपमचसजप- 5 सम्मदिद्विपज्जतगसंखेज्जवामाउयकम्मभूमगगम्भवकतिपमणुस्साण, णो अणिविपत्तअपम चसजयसम्मदिहिपज्जत्तगसखेज्जवासाउयकम्मभूमगगम्भवतियमणुस्साणं मणपज्जवणाणं समुपज्जा। २० किं मणुस्सा इस्पादि। सम्मरियममणुस्सा गम्मपतिपमणुस्साम घेम पत-पिचादिम संमति । कम्ममगा पपस मरोस परम एरसदस पंचसु मापियोस प । हेमवताविस मिधुमा ते अकर्मभूमगा । तिमि 10 जोपणपते समममसमोगादिचा सीमनसिहरिपादपतिद्विता एमगादि पप्पण मंतरदीवगा । किं पन्नचार्ग मपग्मचाण १ ति । पज्मसी णाम-सची सामत्यै । सा य पुमायबोरपया उप्पमति । साओ प छ पनचीमा- भारार-सरीर-दंदिय प्राणापाणु भासा-मबपग्मती घेति । तस्य एगिरियाणं पटरो, मिगलिंदियाम पैच, मम्मम्मी संपगारतो पप घेय, समीम घ छ। क्त्यमासरपग्मची नाम समरसपरियामासची मागरसम्मची। समारनपा परिणामणसची सरीरफरमची । पंचममिदियामं [० १९५६ ] मोम्मा पोमगला पियिषु अणामागनिम्मचित 15 पिरिपकरणेब तम्माषणयमससी ईदियपग्मती । [उस्सास पोमगममोम्गामापागम गाण-मिसिरगसती मागा पाणपग्मती । पामोग्गे पागले पेसूप मासचाए परिणामेसा पामोगवार निमिरणसची मामापरमधी ! मम मोग्गे पोसे घेचूर्ण मपत्ताए परिपामेत्ता मबनोगवाए निसिरमसती मनपज्मपी । एताभो पग्मतीमा पग्न चयणामकम्मादएर्ण णिमपिजाति, मा मेसि मन्यि से परमत्तया । अपग्मचमणामझम्मोदपणे भनिनचायो मेसि ते अपग्मपया । अप्पमसनवा जिगकप्पिया परिसरमिसदिमा भामदिया परिमापहिवामगा य, एत समदोपयोगोउपचवतो मपमचा । गम्नासिमो पण पमचा, फाडा मणुपयोगसमरवावो । मासा गमासी मिमाता य पमचा वि अप्पमपा मि मरंति परिणामसना । 'हिप्पधस्सति भामोसरिमादिमानवरपिचरस ममपनबनाण ठप्पखर पि । मारा 'मोहिनामियो ममपस्नबनाम उप्पजति' चि मामे नियम मणति ॥ ३० ते च दुविह चैप्पज्जइ त जहा-उज्जुमती य विउँलमती य । ३० रिम् मती उमुर्मा, सामग्यम्गादिमि पि मणिव होति । एस मगोपनापपिसेसो चि। मोसम पिसेसपिपुर उरम्मति, पातीबहुविसेसविसिहं मत्प उपसमा ति ममित रोति, परी ग पितिमो चि भापति । पिपुमा मती विपुलमती, पहुविसेसम्पारिणि ति मणि भवति । मगोपनापपिससे नापति, विदेतो मा-णेण पो चितितो, ६ पदेसका गदिमणेगपभापपिसेसपिसिट भाषति ॥ बारा रिज विशुपमती इम एमादी पिसेससकर्म मप्मवि- १ सामरपतोपमा २ मा पिपिनि पाना . मशिता ॥ ५ परिपत्र ratt पालि सपना मावि . निमसमती 10 11 म्भापापापजमा हा मेसिमा २३ मगपज्जवणाणं तस्सामी तब्भेया य] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्तं । ३१. तं समासओ चउविहं पण्णत्तं, तं जहा-देवओ खेत्तओ कालओ भावओ। तत्थ दवओ णं उज्जुमती अणंते अणंतपदेसिए खंधे जाणइ पासइ, ते चेव विउलमती अन्भहियतराए जाणति पासति । खेत्तओ णं उज्जुमती अहे जाव इमीसे स्यणप्पभाए पुढवीए उवरिमहेट्ठिलाई खुड्डागपयराई उड्डे जाव जोतिसस्स उवरिमतले तिरियं जाव अंतोमणु- स्सखित्ते अड्डाइज्जेसु दीव-संमुद्देसु सण्णीणं पंचेंदियाणं पज्जत्तगाणं मणोगते भावे जाणइ 5 पासइ, तं चेव विउलमती अड्डाइज्जेहि अंगुलेहिं अब्भहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं "खेत्तं जाणति पासति । कालओ णं उज्जमती जहण्णणं पलिओ- वमस्स असंखेज्जतिभागं उक्कोसेणं पि पलिओवमस्स असंखेज्जतिभागं अतीयमणागयं वा कालं जागति पासति, तं चेव विउलमती अब्भहियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं विति- मिस्तरागं जाणइ पासइ । भावओ णं उज्जुमती अणते भावे जाणइ पासइ सव्वमा- 10 वाणं अणंतभागं जाणइ पासइ, तं चेव विउलमती अब्भहियतरागं विउलतरागं विसुद्धत- रागं वितिमिरतरागं जाणइ पासइ । ३२, मणपज्जवणाणं पुण जणमणपरिचिंतियत्थपायडणं । माणुसखेत्तणिवद्धं गुणपच्चइयं चरित्तवओ ॥ ५३॥ से तं मणपज्जवणाणं । 15 १ दवओ ४। दवओ ल० ॥ २ तत्थ इति व० सं० ल० नास्ति ॥ ३ अमहियतराए विउलतराए विसुद्धतराए वितिमिरतराए जाणति जे० डे० मो० ल० । अमहियतराप विसुद्धतगए वितिमिरतराए जाणति स० स० । एतयो पाठदयो प्रथम सूत्रपाठमेद श्रीमलयगिरिपार्ट स्ववृत्तावाढतोऽस्ति । द्वितीय पुन पाठभेदो भगवता श्रीअभयदेवसूरिणा भगवत्या- मष्टमशतकद्वितीयोद्देशके मन पर्यवज्ञानविषयकस्त्रव्याख्यानावसरे जहा नंदीए इति सूत्रनिर्दिष्टनन्दिसूत्रपाठोद्धरणे तद्वधाख्याने चादृतोऽस्ति । चूर्णि-हारेमद्रवृत्तिसम्मतस्तु सूत्रपाठः शु० आदर्श एव उपलभ्यते ।। ४ उज्जुमती जहनेणं अंगुलस्स असंखेजमार्ग उक्कोसेणं अहे नाव मु० । नोपलभ्यते कस्मिविदप्यादशेऽय पाठ, नापि घृणिकृता वृत्तियां वाऽय पाठः स्वीकृतो व्याख्यातो वा वर्तते । अपि च श्रीअभयदेवाचायणापि भगवत्या अष्टमशतकद्वितीयोद्देशके नन्दीपाठोद्धरणे नाय पाठ उलिखितो व्याख्यातो वाऽस्ति । नापि विशेषावश्यकादौ तट्टीकादिपु वा मन पर्यवज्ञानक्षेत्रवर्णनाधिकारे जघन्योत्कृष्टस्थानचिन्ता दृश्यते ॥ ५ इमीए ल० ॥ ६ उवरि- महेडिल्लेसु खुडागपयरेसु उड्ढ ख० स० । उवरिमहेट्टिल्ले खुदागपयरे उड्ढ ख० स० विना मलयगिरिवृत्तौ च ॥ ७ 'तलो खं० स० शु०॥ ८ समुद्देसु पण्णरससु कम्मभूमीसु तीसाए अकम्मभूमीसु छप्पण्णाए अतरदीवगेसु मण्णीणं हे. शु० मो० मुः। श्रीमद्भिरभयदेवाचार्यभगवत्यामष्टमगतकद्वितोयोद्देशके नन्दीसूत्रपाठोद्धरणे एष एव सूत्रपाठ आदतोऽस्ति । ॥ ९ जेहिमंगु मो० मु० ॥ १० अन्भद्दियतरं विउलतर विसुद्धतरं वितिमिरतर खेत्तं इति हरिभद्र-मलयगिरिवृत्तिसम्मत सूत्रपाठ' जे० मो० मु० ॥ ११ खेतं इति जे० स० हे. शु० नास्ति । भगवत्यामभयदेवाचार्योद्धते नन्दीपाठेऽपि नास्ति । १२ च भगवत्यां श ८ उ • नन्दीपाठोद्धरणे ॥ १३ अमहियतरमा विउलतरागं इति पदद्वय ख० स० सं० नास्ति । भगवत्यामपि नन्दीपाठोद्धरणे एतत् पदद्वय नास्ति ।। १४ अन अमहियतरागं विउलतरागं वितिमिरतरागं इति पदत्रय ख० सं० ल. भगवत्या नन्दीमत्रपाठोद्धरणे च नास्ति, केवल विसुद्धतराग इत्येकमेव पद वर्तते ।।
११ बिगदासगणिमहचरविरुपाए पुग्णीर संभुर्य [१०१५-१६ ३१-३२. सप्णिमा मगण मणिते मणोखो मर्णवे अर्णवपदेसिए दम्दताए समाते य पणादिए मारे मगपञ्चरनाणेण पक्वं परस्त्रमाणा मागाति पि मणिसं । ममियमस्पं शुम पसल म पस्तिति, जेण मणासवर्ष ससममुर्च रा, सा य पदमत्या व अशुमागता [५० १९५ प्र०] पेस्त्रवि पि भतो पासणवा मगिता । मागा एनुमत्यम्स एगसिपावसमर्मम पि विविधापयोगसमयी भगति, नात्पर रिश रिपुसमतीण उपयोगा, मतो 5 पिसस-सामम्मम्ममु उपउम्मतो नाणति पासइ चि मणित, म दोसो । रिपुलमठी पुण दम्ताए पप्माविपरि प अधिगवर जामतात्पर्य उपरिमहेटिलाइ खुदागपतराई सि इमस्स माषणत्य इम पप्परिग्नति-तिरिय- मागम्म उहााहारसनायणसायम्स बहुमन्स एत्प असंखेयासमागमेचा सोगागासप्पपरा मलोगेण संहिता सनसुहावरा मुडागपतर दि मणिता, वे य समतो रज्जुपमाणा। तेसि जे बहुमा दा सुहागपतरा सेसि पि बामग्म नपुरीष रतणप्पमपुषिसमभूमिमागे मदरस्स पहुमगा एस्प अनुप्पदेसा रुपगा, मचा दिसि-रिदि 10 मिरिमागो परसो,-एवं तिरियमोगमम्म। एसातो सिरियमोगमम्माता रम्नुपमाणसागप्पतररिता उपरि तिरिय अमखेपासमागमसखेयंगुसमागरही, उपदियो वि मंशुममसंखेयभागारो घेर, परं तिरियमुनरिं प अंगुरप्रमखेयमागवलीए मार लागरही णेतमा मात्र उहालागम , सावो पुणो सेणेच कमेम संबो कावप्पो उररिलागता रमपमाणो । मतो प ठहमोगमन्मादो उगरि देता य कमेण सागपतरा माणिवत्रा मार मार रमुप्पमामा सुशगपवर पि । विरियोगमम्मरमुप्पमाणसागप्पतरेरितो पिडा भंगुममसखेयमागरी । तिरिय, मारगारण वि भगुमस्समससमागा घेर, एवं महेलागो व तमो मार महेसागंतो सब रमूमा । मत्तरसूपयररिता उपरपरि पमण गुडागपतरा मापितमा भार तिरिपसोगमन्मरम्मुप्पमामा रागपतर दि । एवं गागपणे कत इम मम्मति-उपरिम ति-तिरियसोगमन्मादो मे १९५ वि.] महा भार पम नापग सवा सार प्रमीए रपणपमपुरीए परिमसुशागपतर ति मम्मति । सदसरा मोलोगे भार महेसापगामरतिणो रेटिमगाागप्पवर पि मगति, रिजुमती भयो सार पम्पतीत्पर्यः। मारा मासोगम्स उमरिमा राशगपतरा तिरिपपागम्ग पाटिमा गुडागपतरावे मार पप्पतीत्यर्पः । भग्गे मगति-उरिम नि-पासागापरिनिता ते उपरिमा। के यते। उच्यते--सजतिरिपयोग पसिणो तिरियपागम्य का भरा परमातममताविणा साल पेक ने रेडिमा त भार प यतीत्यर्थः, इमप परति, मामायगाममणपजामाणममापारम्गमणवा । उक्त प- पार्मापिका ग्रामा न नियम्यारमिन । मनागताम्मसी मारान् पति वासिनामपि ॥१॥ - [ भागनिगमम्माम उम्मागरमागता। मजति उत्पने-"उम्मापमामता मिणे द" [पर सम्हा गा ३१५) नि पपगाना। भंगपादिया य मे पमामा त सम्पदानिणाणा इति, मानसियनणता पनं म्म । रिनुमतिमनारमणमापाता रिएण्मनी मनिपनराग पेरी उगममा मि। एगरिमि पि मम्मतिपर्ममा मावि निगपतता नगा भन्मापं नि नमा रिपूरमार्ग मगनि । मारा ना पहा पहाता नपानमना भन्मतिता 7m निपमा पहागागारमेम गिमा मातिपतिसमती भमनिपतराग मनामनिनादापार मत माननि, न प निपमा रिपू पप । भारा भापाम शिम अमापतराग पोष रिपन गर्न १ मेसोमालि। ॥ २ मामला पा मागो। जित मा.लि. नाप जानिप पामरियो।
२५ केवलणाण तव्भया य] सिरिदेववायगविरइय णदीसुत्त । उपलभत इत्यर्थः। अहवा दो वि पदा एगट्ठा । विसिढविमुद्धिविसेसदंसगो तरसदो त्ति, यथा शुक्लः शुक्लतर इति। किंच-जहा पगासगदनविसेसातो खेत्तविसृद्धि(द्धी) विसेसेणऽक्खिज्जति तहा मणपज्जवनाण-चरणविसेसातो रिजुमणपज्जवणाणिसमी[जे० १९६ प्र० ]वातो विपुलमणपज्जवणाणी विसुद्धतरागं जाणति, मणपज्जवनाणाव- रणखयोक्समुत्तमलंभत्तणतो वा वितिमिरतरागं ति भण्णति । अहवा पुचवद्धमणपज्जवनाणावरणखयोवसमुत्तमलंभ- त्तणतो विमुद्धं ति भणितं तस्सेवाऽऽवरणवज्झमाणस्सऽभावत्तणतो पुन्यबद्धस्स य अणुदयत्तणतो वितिमिरतरागं-ति 5 भण्णति । अहवा दो वि एते एगट्ठिया पदा। मणपज्जवनाणस्स सेसं कंठं ॥ इदाणिं केवलनाणं भण्णति, मण- पज्जवनाणाणंतरं सुत्तकमुदिट्टत्तणतो विमृद्धिलाभुत्तमयो य केवलं भण्णति- ३३. से किं तं केवलणाणं ? केवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-भवत्थकेवलणाणं च सिद्धकेवलणाणं च ३३. से कि त केवलेत्यादि सूत्रम् । केवलनाणमभेदे वि भेदो भव-सिद्धावत्यादिएहिं अणेगधा इमो 10 कज्जति-मणुस्सभवद्वितस्स जं केवलनाणं तं भवत्थकेवलनाणं । चसहो उस्सण्णं भेददंसणे । सबकम्मविप्पमुक्को सिद्धो, तस्स जं णाणं तं सिद्धकेवलनाणं ॥ ३४. से किं तं भवत्थकेवलणाणं ? भवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-सजो- गिभवत्थकेवलणाणं च अजोगिभवत्थकेवलनाणं च । ३४. मणादितो जोगो, सो य जहासंभवातो, तेण सह जोगेण सजोगी, तस्स जं नाणं तं सजोगिभवत्थ- 15 केवलणाणं । अजोगी-सव्वजोगनिरुद्धो सइलेसभावहितो, तस्स जं णाणं तं अयोगिभवत्थकेवलनाणं ॥ ३५. से कि तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं ? सजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणं च अचरिमसमयसजोगिभवत्थ केवलणाणं च । से तं सजोगिभवत्थकेवलणाणं । ३६. से किं तं अजोगिभवत्थकेवलणाणं ? अजोगिभवत्थकेवलणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-पढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च अपढमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च, अहवा चरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं अचरिमसमयअजोगिभवत्थकेवलणाणं च । से तं अजोगिभवत्थकेवलणाणं । 20 ३५-३६. पढमसमयो केवलणाणुप्पत्तिसमयो च्चेव, अपढमो वितियादिसमयो-जाव सजोगित्तस्स चरमसम- 25 एत्यर्थः । अहवा एसेवऽत्यो समयविकप्पेण अण्णहा दंसिज्जति-सजोगिकालचरिमसमए चरिमो त्ति-पच्छिमो, ततो परं अयोगी भविष्यतीत्यर्थः । अचरिमो त्ति-चरिमो न भवति, चरिमस्स आदिसमयातो आरभ ओमत्यगं जाव पढमसमयो ताव अचरमसमया भण्णति, एतेसु ज णाणं तं अचरमसमयभवत्थकेवलनाणं । सेसं कंठ ।। । १ "विसुद्धिविसेसो लक्खि आ० दा० ।। २ °त्तरमयो आ० दा० ॥ चु०४ 10 २६ निगासगगिमदतरवियपा पार संजय [मु. १७-१९ ३७ से त कि सिदकेवलणाणं ? सिदकेवलणाणे दुविहं पण्णत, त जहा-अणतरसिद्ध केवलणाणं च परपरसिद्धकेवलणाणं च । ३७ से वितमिद्धकेयनाणेम्पादि यभम् । तस्य मिदकरममाण दुर्मि-भगतरं परंपरं । तत्य अणठर णा समपवर पस, सिदस्वप्रयमसमयातिन त्यथ ।। ३८. से कि त अणतरसिदकेवलणाण ? अणतरसिद्ध केवलणाण पप्णरसविई पण्णत, त जहा-तित्यसिद्धा १ अतित्यमिदा २ तित्यगरमिद्धा ३ अतित्यगरमिद्धा १ सयबुद्ध सिद्धा ५ पत्तेयबुद्धमिद्धा ६ बुद्धचोहियमिदा ७ इत्यिलिंगमिद्धा ८ पुरिसलिंगसिद्धा ९ णपुसगलिंगसिद्धा १० मलिंगमिद्धा ११ अण्णलिंगमिद्धा १२ गिहिलिंगमिद्धा ३ एगसिद्धा ११ अणेगमिद्धा १५ । सेतै अणतरमिद्धकेवलणाण । १८. ते पंचनराविमा तित्यमिदारया । 'तिस्पमिदा' पति जे वित्ये सिदा ते वित्यमिदा, तित्य प-- पानुरम्मो ममगमंचो परमादिगणपग पा, मणिन प भारिस-"तित्यं मत ! तित्य ! [अ० १९६० मरादि नित्य गोतमा! असा साप तित्यंफरे, सित्य इम पानपग्मो समयसपा" [मग म २०२० । स् १८२] सम्मि तित्यकाममारे उपग्णे ततामा वित्यकारमाराता जे मिदा ते विरपसिदा । अतिरप-पानुरस्मसंघम्स अमावा विस्थकाममासम्म पा अमागा। तम्मि भतिरपासमाव भविस्यमाममाता पाजे सिदा ते भविस्यसिदा। संप 15 सित्तं तित्यतर तिस्प पा मणुपपणे नग मर बिसामिणिपमिवया परिसमादयो तिस्पकरा, सेममा तिरयकर णामकम्मदयमार दिवा वित्पारमारावो पा मिदा समा त तिस्परमिठा ३ मतित्वारा सामग्णकारिणा गोसमाति, तम्मि भतिस्पकरमापे द्विवा मतिन्पकरमाराता पा मिदा मतित्परसिदा ४ । मपमर पुदा सर्प- पुढा, सर्व श्रेप्पणिग्न मा नाइसरणादि फारम पश्य पुदा सम्पुढा । तमुच्यने-माधमत्सयमन्तरेण प प्रति दास्ते पपपदा । त य दरिरा-तित्पगरा तित्यगरसतिरिका मा । परिचेरि अपिकारा । किंप-सपपदम्स पारसरित हि उपही मरति, पुग्नापी स मुतं भवति पाणमा । मति स नत्यि वा गिनियमा गुरुसम्मिो परिमाना, गण परिति । पा पुमाधीतसतसंगको मस्पि ना म दिपवा पपपति, गुरुसप्णिा रा परिपम्नति । मा य पंगपिपारपिटरममाम्गा, या वस तो एका घेर पिरति, मम्मा गछे विरतीत्पर्यः । एतम्मि मारे हिता सिदा पताता वा मावासा मिटा सपपुवसिदा ५ । 'पचेयपदा' पोय-पान पमादि कारणम मिसमीप पुदाः मत्सदा । परिमत्ययमतिपदानां च पपेय नियमा विचारो जमातमा य ते पचेपपदा, समाजमावया । विष-पपेयपदाप मारणेण दुषिता उकामण गरविपो उमसी नियमा पाउरपरमा मरति । किंप-पसेपमुदाम पुनापीतं घर णियमा ममति, नाण्णणं एगारसगा, उकासम मिष्मदसपुमा । लिंग पस देपसा पपसि, भिजिवा पा मबति । जया [ज १९४ प्र ] मपित-"कर्ष पोपमुदा" [मार गा.१११९] इति । पतम्मि माष पवातो पा सिदा पपेपदसिदा ६ । मुदापिता-मे सतपुदेखि सित्वफरादिएर योरिता, पापादेखि पा पिकाविपरिमोमिता वे बुदपापिता । भएमा पुदवापिए मोभिता बुदरोपिता, एब हम्मा- 50 विपक्नुिमामाइया मति । भरमा पुट इति-प्रतिपुमा, तेरि प्रतियोपिता पुटलोपिता, प्रमवादिमिराबपि। १ मप्पमा पाबा मारा। २मितमा मा ॥ ३ पारिपारविपरपोग्नोगा । हारा ।
. 10 २७ सिरिदेववायगविरइय गंदीसुत्तं । केवलणाण तब्भेया य] एतभावे द्विता एतातो वा सिद्धा बुद्धवोधितसिद्धा ७ । 'सलिंगसिद्धा' दवलिंग प्रति रजोहरण-मुहपोत्ति-पडिग्गह- धारणं सलिंगं, एतम्मि दबलिंगे द्विता एतातो वा सिद्धा सलिंगसिद्धा ८1 'अण्णलिंगसिद्धा' तावस-परिवाय- गादिवकल-कासायमादिदव्बलिंगट्टिता सिद्धा अण्णलिंगसिद्धा ९। एवं गिहिलिंगे वि-केसादिअलंकरणादिए दन- लिंगे द्विता सिद्धा गिहिलिंगसिद्धा १० । इथिलिगं ति-इत्थीए लिंग इथिलिंग, इत्थीए उपलक्खणं ति वुत्तं भवति । त तिविहं-वेढो सरीरनिव्वत्ती णेवच्छं च, इह सरीरनिव्वत्तीए अधिकारो, ण वेद-णेवच्छेहिं । तत्थ वेदे 5 कारणं-जम्हा खीणवेदो जहण्णेणं अंतोमुहुत्तातो उक्कोसेण देसूणपुचकोडीतो सिझति, णेवच्छस्स य अणियत- तणतो, तम्हा ण तेहि अहिकारो । सरीराकारणिवत्ती पुण णियमा वेदुदयातो णामकम्मुदयाओ य भवति तम्मि सरीरनिव्वत्तिलिंगे ठिता सिद्धा तातो वा सिद्धा इथिलिंगसिद्धा ११ । एवं पुरिस-णपुंसकलिगा वि भाणितन्या १२-१३ । एकसिद्ध त्ति-एकम्मि समए एक्को चेव सिद्धो १४ । अणेगसिद्ध त्ति-एकम्मि समए अणेगे सिद्धा, दुगादि जाव असत ति । भणितं च- वत्तीसा अडयाला सट्ठी बावत्तरी य बोधव्वा । चुलसीती छण्णउती दुरहित अटुत्तरसतं च ॥१॥१५॥ [वृहत्से गा ३३३] चोदक आह-गणु एते पण्णरस भेदो छभेदहिताअण्णोण्णनिरवेक्खा ण भवंति कहं पंचदसभेद त्ति पण्णता? आचार्य आह-गणु तित्यापतित्थपुरिसविजे० १९७ द्वि० ]भागुप्पण्णा-ऽणुप्पण्णकालभेदतो वा दो भेदा परोप्प- रविरुद्धा १, तहा तित्यगरणामकम्मुदयातो अभावतो य दो भेदा परोप्परविरुद्धा २, तहा लिंगादिया दवलिंग- 15 पडिवत्तिभेदा परोप्परविरुद्धा ३, तहा मोहुत्तरपगडिवेदभेदोदयतो त्विमादिसरीरलिंगणिवत्ती परोप्परविरुद्धा ४, एगा-ऽणेगा वि एककालसहचरिता-ऽचरितत्तणतो भिण्णा ५, सयबुद्धादयो वि णाणावरणक्खओवसमविसेसपडि- बोधविसेसत्तणतो प्रतिविसिट्ठा ६, एवं तित्थादियाण अण्णोष्णलक्खणसभावहिताणं पंचदस भेदा पण्णत्ता, किंच- जहा मतिणाणे गैचादियाण चरिमपज्जवसाणाणं अण्णोण्णा[वेधत्तणे वि भेदो इह पि जइ तहा तो को दोसो ?, किंच-नाणाणयाभिप्पायत्तणतो मुत्तस्स य अणेगगम-पज्जायत्तणतो अभिधाणभेदत्तणतो य पंचदसभेदकरणं ति ण 20 दोसो ॥ इदाणि तं चेव सिद्धकेवलणाणं समतभेदतो अणेगधा विसेसिज्जति- ३९. से किं तं परंपरसिद्धकेवलणाणं ? परंपरसिद्धकेवलणाणं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा-अपढमसमयसिंद्धा दुसमयसिंद्धा तिसमयसिद्धा चउसमयसिंद्धा जाव दससमयसिद्धा संखेज्जसमयसिद्धा असंखेज्जसमयसिद्धा अणंतसमयसिद्धा, से तं परंपरसिद्ध केवलणाणं । से तं सिद्धकेवलणाणं । ३९. पढमसमयसिद्धस्स जो वितियर्समयसिद्धो सो परो, तम्स वि य अण्णो, एवं परंपरसिद्धकेवग्नाणं भाणितव्वं । तं च 'अपढमसमय' इत्यादि । नास्य प्रथमः समयो विद्यत इत्यप्रथमः, द्वितीयसमयसिद्ध इलार्थः, स च परंपरसिद्धविसेसणस्स प्रथमः, तस्स परतो वितियादिसमया माणितव्या ॥ १ मेदा विमेद् आ० दा० । अत्रेदमवधेयम्-श्रीमद्भिर्हरिभद्रपादै मलयगिरिचरणश्च स्वत्तवृत्तौ तीर्थसिद्धा-ऽतीर्थसिद्धरूपमे- दद्वयान्त पञ्चदशमेदान्तर्भाव सङ्कल्प्येव चालना-प्रत्यवस्थाने उपन्यस्ते स्त तदनुसारी पाठमेदोऽपि चूादशेषु दृश्यते । किञ्च-चूर्णी- सत्कप्राचीनतमे आदर्श षड्मेदान्त पञ्चदशमेदान्तर्भावावेदक छम्मेदहिता० इत्यादि पाठो वरीवृत्यते, आचार्यप्रतिविधानमपि पड्विमागा- वेदकमेव विद्यते इत्यस्माभिः छम्मेदहिता० इति पाठ एव मूले आदृतोऽत्ति । सत्रार्थे तद्विद एव प्रमाणमिति ॥ २ गत्यादिकाना चरमपर्यवसानानाम् “गइ इदिए य०" तथा "मासग परित्त० " इति आवश्यकनियुक्किगाया १४-१५ निर्दिष्टाना द्वाराणाम् इत्यर्थ ॥ ३ °णुवेक्खताण वि आ० दा० ॥ ४-५-६-७ सिद्धकेवलणाणं ल० ॥ ८ समयो तम्मि सिद्धो आ० दा०॥ - 25 २८ 5 । शिणदासगणिमहाचरविरामाप पुण्णार संजु [मु.१० ४० त ममासमो चउब्बिह पण्णत्त, त जहा-देवमो खेत्तओ कालो भावओ। तत्थ दव्वओणं केवलणाणी मबदबाइ जाणइ पामह । खेतमओ णं केवलणाणी सव्व खेत्तं जाणइ पासइ । कालओ ण केवलणाणी सब्य काल जाणइ पामद । भावओ ण केवलणाणी सेंव्वे भावे जाणइ पासइ । ४० त मन पि पनि दनानिय । 'सम्मान' ति पम्मा भम्मा गासावया, लेरितो मीसम्मा मणवराणा, वेरितो वि पुमान्यना मणसगमा, एत सम्व समता माणति । खेप पि मोगामागमदमियम- मत सरलतो माणति । फास पि समया-अमियादिर्य तीपमणागवसनदं पा सरूवतो सम मागति । भाषा वि इपिमा मामा भीरमाया अभीरमाया य । तत्प भीरमारा फम्मुदयसवपपरिणामिवपरतणा गति-कसापा दिया कम्मदपछपम्पणा मणेगविपा, उनसमा ० १९८ प्र० सय-सारसमनीपसवचलखमा भणेगविहा, 10 पारिभामिता य नीर मया-उमषचादिया, बनीपासचदम्पस पम्माऽभम्माऽऽगासा गति द्विति भनगासिरसपा मारुमगा य मर्णता, पुमगमन्ना य महुम-बादर-विस्ससापरिणता मम्भिदमणुमादिया मणेगविमा । परमाणे- माम य पणादिपज्जया पगादिया मर्णता । एते दम्मादिया सरे सम्मपा सनत्य सम्मकार्स उपयुसो सागार भागारसनलणेरि पाच-सरि नापति पासति य । एरय फेमसम्माण-दसणापयोगेरि बहुमा समयसम्मा भायपुदीए पकप्ता इम मर्मति-- केपी भणति जुग जाणा पासति पकेपली नियमा। अण्णे पगतरिय इति सुतोवदेसेर्ण ॥ १॥ अण्णे ण व वीसु दमणमिति जिणपरिदस्स। जंपिय केपलनाण तं घिय से इंसर्ग येति ॥ २॥ [विशेषग, गा १५३५४] वस्थ मे ते मति 'पुगप माणति पासति य के इम उमरचि उपविसति- फेवसाई सादी-अपनबसिताई दो वि भणिताई। तो पेंति के मुग जाणति पासति यमपण्णू ॥३॥ 18 भ शाराऽऽपी-णिहणत्त मिबरणक्यो ति जिणस्स । इतरेतरापरणया भारपा णिचारणावरण ॥ ४॥ तह प भमपण्णुतं भसम्पदरिसित्तणप्पसंगो प । पर्गतरोषयोगे जिणस्स दोसा पविभीता ॥५॥ [मिशेषण, गा १९३ १९५] एवं परेप पहुपा मणिवे भागमवादी उचर इमं मार- भपणति, मिण्णत्तोपयोगकासे पितो तिनाणिस्स । मिण पापही सागरोषमाई लपोषसमो ॥६॥ [विशेषण. गा २०२] १ एप्पमो । बम्पमो. मानि ॥ मातिाप * ॥५ऽमगुपारीममा - ॥ तत्पइतिर म ..सममा 5 केवलणाण-दसणोवोगवायत्थलं ] सिरिदेववायगविरहय गंदीसुत्त । २९ जहा छउमत्थस्स मति-सुता-ऽवधिणाणेच अंतमुहुत्तकालोवयोगसंभवे उपयोगा-ऽणुवयोगेण य छावहिसागरा से ठितिकालो दिहो, तहा जति ज़िणस्स गाण-दसणा सादिअपज्जवसाणा उवयोगा-ऽणुवयोगेण भवंति तो को दोसो ? । जति एतं ते णाणुमतं तो इमं ते कहं अणुमतं भविस्सड ?-- अह ण वि एतं तो सुण, जहेच खीणंतराइओ अरहा । संते वि अंतरायक्खयम्मि पंचप्पगारम्मि ॥७॥ सततं ण देइ [जे०१९८ द्वि० ] लभइ व मुंजइ उवमुंजई य सवण्णू । कजम्मि देइ लभइ व भुंजइ व तहेव इहयं पि ॥ ८॥ किंच- दितस्स लभंतस्स व भुजंतस्स व जिणस्स एस गुणो। खीणंतराइयत्ते ज से विग्धं ण संभवति ॥९॥ उवउत्तरसेमेव य णाणम्मि व दसणम्मि व जिणस्स । खीणावरणगुणोऽयं, जं कसिणं मुणइ पासति वा ।। १० ।। [विशेषण गा. २०३-६ ] पुणो पर आह- पासंतो चि न जाणइ, जाणं व ण पासती जति जिणिदो। एवं ण कदाइ वि सो सवण्णू सव्वदरिसी य ॥११॥ उत्तरं आचार्य आह- जुगवमजाणतो वि हु चतुहिं वि नाणेहिं जह चतुण्णाणी । भण्णह, तहेव अरहा सवण्णू सव्वदरिसी य ॥ १२ ॥ 10 15 20 - , पर एवाऽऽह- तुल्ले उभयावरणक्खयम्मि पुवयरमुम्भवो कस्स । दुविधुवयोगाभावे जिणस्स जुगवं? ति चोदेति ॥ १३ ॥ उत्तरं आचार्य आह- भण्णति, ण एस नियमो जुगवुप्पण्णेसु जुगवमेवेह । होयत्वं उवओगेण, एत्य सुण ताव दिदंतं ॥ १४ ॥ जह जुगवुप्पत्तीय वि सुत्ते सम्मत्त-मति-सुतादीण । णत्थि जुगवोवयोगो सब्वेसु तहेव केवलिणो ॥ १५ ॥ किंच-- भणितं पि य पण्णत्ती- पण्णवणादीसु जह जिणो समयं । जं जाणती ण पासति तं अणुरतणप्पभादीणि ॥ १६ ॥ [ विशेषण गा २१५-२०] १ पुव्वं समुन्मवो आ० दा० ॥ 25 5 10 15 भिगवासगणिमवरपिछयाए पुष्णी समुस [सु० ११-१५ गा ५१-५५ मे मगति केवलणाम ईसणाम एगचं से इम हेतुनुचिं मणति- जाकिर खीणापरणे देसमाणाण संभवो ण जिणे । उभयापरणातीते तह केवलदमणस्सामि ॥ १७ ॥ एस ते राजुसी जहा मत्वसापर्वम ससाए सा उत्तर() ऐवजुपीए मणति- देसण्णाणोषरमे जहफेवलनाणसंमयो मणितो। देसासणविगमे तह केवलदसण होतु ॥ १८ ॥ मह देसनाणदंसणपिगमे तय केषल मत नाण । ण मतं फेवसदसणमिच्छामेस णणु तवेदं ॥ १० ॥ [विशेषण गा १५५-५७ ] मण्णति महोहिणाणी जाणति पासति प भासित सुसे। ण य णाम मोहिदमण-जाणेग ताइम पि ॥ २०॥ [मरपण, गा १७८ ] एवं परामिणाये परिसिदे पगारोवयोगता सिदा ता रिम मणति- जह पासतु तह पासव, पासति सो जेण दसणं तं से। जाणा य जेण अरहातं से णाण तिघेसम्म ॥ २१ ॥ [विरोमग गा १०२) किंच-सिदाधिकारे पर्गतरो, १९९प्र०योगर्दसिगा इमा फरा गारा- नाणम्मि दसणम्मि य एसो एगतरपम्मि उपउत्सा। मन्वस्स केयलिस्सा जुगर्न दो णत्यि उपयोगा ॥ २२॥ [विशेषण गा २२९ ] पि भाववीए- उपयोगो पगतरो पणुबीसप्तिमे सत सिणायस्स । मणितो विगरस्थो पिय ण्टुरेसे विसेसेतु ॥ २३ ॥ [विशेषग, गा २५२ ] कस्स प णाणुमतमिण जिणस्स अति होन दो वि उपयोगा। र्ण ण होति जुगर्व असो मिसिदा सुते पामो ॥२५ ।। [विशेषग गा २९९) ४१ मह सबदवपरिणामभावविष्णत्तिकारणमणतं । सासयमप्पडिवाती एगविहे फेवलं गाणं ॥ ५५ ॥ केवलणाणेणऽत्थे णा जे तत्य पण्णवणजोग्गे । ते भासद तित्ययरो, वेइजोग तयं इंवद सेर्स ॥ ५५ ॥ से न केवलणाणं । से त पचलणाण । १ पाचोय सुपं गतेसि स्पर्व पास किा पामतरतेम मिरिस्ति । प्वात-मम्मे में पत-पाप स हा स स पाम्पोमध मात 'वेषा' भोपाम् । इति पारिपचौ । “माप ले परा-भोप पूर्व परति तत्रावर्षो मोना मानमरकलाद प पाम्योगातुर्व माति, सुवमिति पनि प्रय। त मम्पपिरपा । २ मये ४ मा -जिय से च पक्ष मे पास सम्मत मोपाम्दोमायपि प्री। 30 ।
परोक्षजानं तद्भेदी च] सिरिदेववायगविरइय णदीसुत्त । ३१ ४१. अह सव्वव्व० गाहा । केवलनाणेण० गाहा । एताओ जहा पेढियाए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ सेसं कंठं ॥ इदाणि कमागतं बहुवत्तन्वं पारोक्खं भण्णति- ४२. से' किं तं परोक्खणाणं ? परोक्खणाणं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आभिणिबोहि- यणाणपरोक्खं च सुयणाणपरोक्खं च । ४२. अक्खस्स इंदिय-मणा परा, तेनु जं गाणं त परोक्ख । मति-श्रुते परोक्षमात्मनः, परनिमित्तन्वात् , 5 अनुमानवत् । णणु सुत्ते इंदियपञ्चक्खं भणितं ? उच्यते-सञ्चमिणं, एत्यं जं इंदिय-मणेहिं वहिलिंगपञ्चयमुप्पज्जति तमेगंतेणेव इंदियाण अत्तणो य परोक्खं, अणुमाणतणतो, धूमाओ अन्गिणाणं व । जं पुण सक्खा इंदिय-मणो- निमित्तं तं तेसिं चेव पञ्चक्ख, अलिंगत्तगतो, अत्तणो अवधिमादि व्व, अत्तणो तु तं एगंतेणेव परोक्ख । इंदियाणं पि तं संववहारतो पञ्चक्ख, ण परमत्थतो। कम्हा ? जम्हा दबिंदिया अचेतणा इति । तं दुविहं - मतिणाणं मुतनाणं च । इह मति-मुताणमुवण्णासकमे कारणं पुव्वुत्तं दद्वध्वं ॥ मति-मुताण य अभेदसामिणिरूवणत्थं इमं सुत्तं- 10 ४३. जत्थाऽऽभिणिवोहियणाणं तत्थ सुयणाणं, जत्थ सुयणाणं तत्याऽऽभिणिबोहिय- णाणं । दो वि एयाइं अण्णमण्णमणुगयाइं तह वि पुण ऍत्थाऽऽयरिया णाणत्तं पण्णवेति- अभिणिबुज्झइ त्ति आभिणिवोहिये, सुंणतीति सुतं । मतिपुव्वयं सुयं, ण मती सुयपुब्विया । ४३. जत्थ मतिनाणेत्यादि । 'जत्थ' ति पुरिसे जत्थ व इंदिय-नोइंडियखयोवसमे मतिणाणमत्थि 15 तत्थेव मुतनाणं पि । अहवा जत्थाभिनियोधियसरुवं तत्थेव सुतं पि नियमा, अण्णोण्णाणुगता भवंतेते । आइ- मति-मुताणं अण्णोण्णाणुगतत्तणतो सामि-काल-कारण[जे० १९९ द्वि० ]-खयोवसमतुल्लत्तणतो य एगत्तं पावति, णो दुगपरिकप्पणं ति, अत्रोन्यते, मति-मुताणं अण्णोण्णाणुगताण वि आयरिया भेदमाह दिटुंतसामत्थतो, जहा आगासपइहिताणं धम्मा-ऽधम्माण अण्णोण्णाणुगताणं लक्खणभेदा भेदो दिट्टो तहा मति-मुताण वि सामि-काला- दिअभेदे वि भेदो भण्णति- अभिणिवुज्झतीत्यादि । एवं लक्सणा-ऽभिधाणभेदा भेदो तेसिं । अहवा इमो 20 मति-सुतविसेसो-"मतिपुचयं सुतं, ण मती सुतपुब्बिया" इति, जतो मृतस्स मतिरेव पुव्वं कारणं । कहं ? उच्यते-मतीए सुतं पाविज्जति, ण मतिमंतरेण भापयितुं शक्यते, गदितं च मतीए पालिज्जति, परिवत्तयतो णो पणस्सइ ति" जतो, मतिरेव सुतपुवा ण भवति । णणु सुतं पि सोतुं मती भवति ? उच्यते-त दव्यमुतं, भावश्रुतादित्यर्थः । अहवा मति-सुताण भेदकतो विसेसो, मतिणाणं अट्टावीसइभेदभिण्णं, सुतणाणं पुण अंगा-s- १ चूर्णि-वृत्तिकृता से किं तं परोक्त्रं ? परोक्ख दुविह इति पाठोऽत्र सम्मत, परोक्षज्ञानोपसहारेऽपि त से त परोक्त्रं इत्येव पाठ' स्वीकृतोऽस्ति, किच सर्वेष्वपि सूत्रादर्शयु उभयत्रापि परोक्खणाण इत्येव पाठ उपलभ्यते ।। २ चूर्णि-वृत्तिकृद्धि किल जत्थ मतिनाणं तत्थ सुतनाणं, जत्थ सुतनाण तत्थ मतिनाण इतिरूप सूत्र मौलमावेनाजीकृतमस्ति । किञ्च-श्रीचूणिकदादिभि मौलभावेनाङ्गीकृतमेतद् जत्थ मतिनाण इत्यादि सूत्र साम्प्रतीनेष्वादशेयु नोपलभ्यते । अपि च चूर्ण्यवलोकनेनैतदपि ज्ञायते यत् चूर्णि- कृत्समयमाविष्वादशेपु पाठमेदयुगलमप्यासीदिति ॥ ३ तत्थ आमि ख० सं० ॥ ४ इत्थ आय मो० मु० ॥ ५ पण्णवति शुः । पण्णविति हे० ल० । पण्णवयंति मो० मु० ॥ ६ अभिणिवोज्झतीति ख० । अभिणिवुज्झतीति सं० शु० । अभिणिवुज्झईइ ल० ॥ ७ 'हियं णाण, सु स० ल० विना ॥ ८ सुणेइ ति मो० मु० ॥ ९ पुन्वं जेण सुय सं० डे० । चूर्णों वृत्त्योश्च जेण इति पद नास्ति । पुव्वं सुयं ख० हे० विना ॥ १० °ण-विधाण दा० ॥ ११ त्ति, जतो मतिमेव सुतं पवण्णो भवति आ०॥ , न मिणशासगणिमहचरविरायाए पुगाए सजुम [१० ११-१६ गा ५५-६५ भगाइमेदमित्र मणेगा । भाना मति मुवार्ग ईदियोरसदिविमागवो मदो इमो-सोचिदियोषपदी० गा [विश्या गा १२२] पूर्वपद् व्यासम्पया । मारा मति-सतमद मर्गति-पुदीदिटे. गाग। [विशेषा गा १२८] एवीए गाराए भत्या मति सविसेसो य ना विसेसाबस्सम सा माणितमो। मण्मे पागसमें मतिमाम संगसम प मुठमाण मनवि तचम घडति, जमा वाग संपविद्वषेण मानापस्सम सर्व परिणामा दसिम्नति, तमाम 5 शुज्जते इत्यर्यः। भारणो मतिमतमदो-खराणुगत मुत, अणखरै मतिनाणं ति । भस्ममत्यापर्क मतिणावं, स्व-परमत्यायक मुखनाण । अश्या मवि मुताण मापरपम्दावा [पे० २०० प्र०] मदा दिहो । तरलतो पसमविसेसातो र मति-मवाण मेदो भवति ॥ मगिता मति-सुखविससो। इवाणि जरा मति-मुक्माणान कम फारममेदेहि मेदो विहो ना मतीए एतस्स य सम्म- मिछपिसेसो देसणपरिमगरातो मा चि मतो मुर्च मपति- १५ अविसेमिया मती मतिणाणं च मतिअण्णाणं च । विसेसिया मती सम्मदिहिस्स 10 मती मतिणाण, मिच्ादिहिस्स मती मतिअण्णाणं । अविसेसियं सुर्य सुयणाणं च सुय- अण्णाण च । विसेमियं सुर्य सम्मदिहिस्स सुयं सुयणाणं, मिच्छहिट्ठिस्स सुर्य सुयअण्णाणं । ४४ भविसेसिता मतीस्पादि । सामिणा अविसेसिता मती इम पचमा-माभिणियोपिकेस्पादि । पसो सम्पप। विसेसिता मटीस्पादि । मवा पुष इमेण सामिणा विससिता मती मनति तदा इम बचमा- सम्मरिहिस्स मतीस्पादि सुप्रसिदं । मषिसेसि सतमिस्पादि एव पि उबउग्निई एम पेव पचलं । माया नाम 15 दिसेसणेष भविससिवा मठी तार मती पर पचम्चा । सब मती गापमाणसाविसेसगावो इमं पचमा- भामिनिवाधिकेत्यादि सुप्रसिद। भाण-प्यामसरविसेसण का मणति-सम्मथ- मिसामिागवणयो सम्मदिहि स्स मतीस्यादि उपसिद । मते वि एवं चेत्र पवन । पर मार-ताठखयोवसमचमता पठाइमस्यूम य सम्मपरि परपणतो सादिविसपाग य समुपसमातो कई मिरिहिस्स मति सता मामा ति मपिता ! उम्पवे-- सदसइपिसेसबातो मरोतु मतिपितोयममातो । नायफसामागावो मिपिहिस्स मगाणं ॥१॥ मतिपुर्म मतं ति काई मतिणा र पुष मणामि- ४५. से कि तं आमिणिवोहियणाणं ? आमिणिवोहियणाणं दुविहं पण्णतं, तं जहा- सुपणिस्सियं च असुपणिस्सियं च । ४५ से कितं आमिनियोपिकेस्पादि मुत्त । तत्प 'मुनिसि' ति मत ति-सतं प सामादियादि पिंदुसारपझपसार्म । एतं दपमुत गरिव । त अणुसरतो गं मविणाणमुपजति असगिस्साए उप्पम वि मुवातो 2 पा गिमा त मुतगिस्सिा मष्यति । तं व उमगोरा आप पारमाठितं पम्मेदं । 'मस्सुनिस्सिव ' तिनं पुन दम-मानसूतपिरवेस आमिमियोपिकमपनति स ममुपमावातो समपणं ति ममतनिस्सित मन्मति । तंग उपचियादिमुदिपठम् ।। एम--- १यमा रा ॥ ५ पिसेसर्वसन मा पा ॥३गप मा स्थापित सपा से मो विषयसम्मम्मामा १५५ पत्र नदीमापासेसर उपसते । बौदरिमप्रसरिमापि सानापपमेष सूत्रपामासास्ति । पिसेसिपा सम्मरिस्सि मती मविणा मिणादिस्सि मती प्रतिमाचार्य । पर भविससिय रुप सपणापमपाण पिसेसिप सम्मपिस्सि उर्प सपणाण मिणादिस्सि सुपे सुपमामा । ... । बममेर एसपाठ श्रीमय मण्य गिरिणा सौम्यो भासमापस्ति । पिसेसिपा मती सम्महितीस्स मतिपा, मिस्सि मतिमण्या । मरिसेठिय सुर्य सुपपा मगमग्णार्पविसेसि एपं समरिस्सि एपणार्ण माहिस्स उपमन्मा । - 1 10 5 10 असुयणिस्सियं मइणाणं उप्पत्तियाइबुद्धीओ य] सिरिदेववायगविरइय णंदीमुत्त । ३३ ४६. से किं तं असुयणिस्सियं ? असुयणिस्सियं चउन्विहं पण्णत्तं, तं जहा- उप्पत्तिया १ वेणइया २ कम्मया ३ पारिणामिया ४ । बुद्धी चउबिहा वुत्ता पंचमा नोवल भइ ॥ ५६ ।। पुब्बं अदिट्ठमसुयमवेइयतक्वणविसुद्धगहियत्या । अव्वाहयफलजोगा बुद्धी उप्पत्तिया णाम ॥ ५७ ॥ भैरहसिल १ पणिय २ रुक्खे ३ खंड्डग ४ पड ५ सरड ६ काय ७ उच्चारे ८॥ गय ९ घयण १० गोल ११ खंभे १२ खुड्डग १३ मग्गि १४ स्थि १५ पंति १६ पुत्ते १७ ॥ ५८ ॥ भरह सिल १ मिंढ २ कुकुड ३ वालुय ४ हत्थी ५ [य] अगड ६ वणसंडे ७ । पायस ८ अइया ९ पत्ते १० खाडहिला ११ पंच पियरो १२ य ॥ ५९॥ महुसित्थ १८ मुद्दि १९ यंके २०० य णाणए २१ भिक्खु २२ चेंडगणिहाणे २३ । सिक्खा २४ य अत्थसत्थे २५ इच्छा य महं २६ सतसहस्से २७ ॥६० ॥१॥ भरणित्थरणसमत्था तिवग्गसुत्तत्थगहियपेयाला । उभयोलोगफलवती विणयसमुत्था हवति बुद्धी ॥ ६१ ॥ णिमित्ते १ अत्थसत्थे २ य लेहे ३ गणिए ४ य कूब ५ अस्से ६ य । गद्दभ ७ लक्वण ८ गंठी ९ अंगए १० रहिए य गणिया य ११ ॥१२॥ सीया साडी दीहं च तणं अवसव्वयं च कुंचस्स १२ । निव्वोदएँ १३ य गोणे घोडग पडणं च रुक्खाओ १४ ॥६३ ॥२। उवओगदिवसारा कम्मपसंगपरिघोलणविसाला । साहुक्कारफलवती कम्मसमुत्था हवति बुद्धी ॥ ६४ ॥ हेरण्णिए १ करिसए २ कोलिय ३ डोएं ४ य मुत्ति ५ घय ६ पवए ७॥ तुण्णाग ८ वड्ढती ९ पूतिए १० य घड ११ चित्तकारे १२ य ॥६५॥३। १ वेणयिया ख० शु० । वेणतिया स० ॥ २ ५८-५९ गाथे ख० शु० डे० ल० प्रतिपु पूर्वापरव्यत्यासेन वर्तेते ॥ ३ गडग ख० ॥ ४ पय ल० ॥ ५ कुक्कड ३ तिल ४ वालुय ५ हत्थि ६ अगड ७ इतिरूप" सूत्रपाठ सर्वास्वपि सूत्रप्रतिपूप- लभ्यते । आवश्यकनियुक्त्यादावपीत्थम्भूत एव पाठ उपलभ्यते, तथैव च तत्र सर्वैरपि चूर्णी-वृत्तिकृदादिमि व्याख्यातोऽस्ति । किश्चात्र एतत्सूत्रचूर्पोदावव्याख्यानाद् मलयगिरिपादवृत्त्यनुसारी पाठो मूले आइतोऽस्ति ॥ ६ पायस पाठानुसारेण मलयगिरिणा व्याख्यातमस्ति, न चोपलभ्यतेऽय पाठ कुत्राप्यादर्श ॥ ७ २० पणए २१ भिक्खू २२ य चेडग प्रत्यन्तरे ॥ ८ आसे ल० ॥ ९ अगए १० गणिया य रहिए य ११ सर्वास्वपि सूत्रप्रतिषु । आवश्यकनियुक्त्यादौ तवृत्त्यादौ च मूलगत एव पाठ उपलभ्यते ॥ १० नियोदएण १३ गोणे शु० ॥ ११ डोवे मो. मु० ॥ १ 15 20 ८ पत्ते ९ अइया १० इति . 10 २० विणदासगणिमाचरविरायाप सुम्पीय सनु [मु०१६-५० गा १५-१५ अणुमाण हे दिट्ठतसाहिया वयविवागपरिणामा । हिय-णीसेसफलवती बुद्धी परिणामिया णाम ॥६६॥ अमए १ सेट्ठि २ कुमारे ३ देवी (?) ४ उदिमोदए हवति राया ५। माहू य णंदिसेणे ६ धणदत्ते ७ साव(वि)ग ८ अमचे ९ ॥६७॥ सैमए १० अमञ्चपुत्ते ११ चाणके १२ चेव थूलम। १३ य । गासिकसुदरीनंदे १४ वहरे १५ परिणामिया बुद्धी ॥ ३८ ॥ चलणाइण १६ आमडे १७ मणी १८ य सप्पे १९ य सग्गि २० थभि २१ दे २२ । परिणामियबुद्धीए एवमादी उदाहरणा ॥ ६९॥ ४। से त अमुपनिस्सियं । ४६ पुत्र० गाए। [मरहसिल० गागा भरागारामपु० गाए॥५७॥५८॥ ५९॥६०॥ उप्पषिया गतामा मसिया- मरणिक १० गागा निमिसे. गाए। सीता० गारा ॥६१॥ ६२ ।। ६३॥ पिणा २० २. वि.]यस मुस्पा गया २।इमा कम्माया- उपभोग गारा।हेरणि गारा ॥ ६४॥६५॥ कम्माया गया ।इमा पारिणामिया- 18 मणु० गाहा । भमए गारा। म्ममए गारा। थलणा० गारा । एतामोसमामो महा णमोकारे (माव० मि गा ९३८-५१) वा वहमामा॥६६॥ ६७॥६८॥६९।। ४ । वानि मुतपिस्सित उम्गाय सविस्परं ममति- ४७ से कि त सुपणिस्सियं मतिणाणं १ सुयणिम्सियं मतिणाणं चउलिई पण्णचं, तं जहा-उग्गहे १ ईहा २ अवाए ३ धारणा ४ । ४७ ए सामयस्स स्वादिअस्पस्स य विसेसनिरपेक्सस्स अणिोसस्स मप्रायमरः । तस्सेवबस्स * विवारबिसेसम्णेसबमीरा । तस्म मिसेसणपिसिस्मस्पस्स म्पसातामायः, मिसेसापर्गतमिस्पी। तमि सेसासासस्पस्स परण-भगिधुती पारणा इत्यप ।। तस्य- १८. से किं त उग्गहे ? उम्गहे दविहे पणते, तं जहा-अत्योग्गहे य वजणोग्गहे य। १८. ओग्गहो दुरिहो--मत्योमाटो पनणमोम्गो या एस्प मममोमाइम्स पणणम्मिता 'नस्पो मगरातो पा पुम मपयोमगारो ममइ' चिपमणोम्गामेय पुर्ण मणामि- १ विवाहपरिप .२ पिस्सेस , मो ससगे मो • पामधुनी । ५पादिमसेसपिसेसनिर मा रा । भीमणपगिरिपरस्त भावस्पाची परित्तो पार्प पूर्णिपाठ एकस्म उरतोकि गरा मिर-धाममा मारिरिसेमबररियल मनिीत्सत्स मसम्पापमयड दि । १ पबिसेसेजेोपमीरामा सम्बिसेसाबमस्त पर पा म रे पर १९८-1]. [भाष का प.-1मिमाति ७ एस भासातो भा ८ गम इत्यर्थः।
२ सुयणिस्सिय मडणाणं वंजणोग्गहाई य ] सिरिदेववायगविरडयं णदीसुत्तं । ३५ ४९. से किं तं वंजणोग्गहे ? वंजणोग्गहे चउबिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोर्तिदियवंज- णोग्गहे १ घाणेंदियवंजणोग्गहे २ जिभिदियवंजणोग्गहे ३ फासेंदियवंजणोग्गहे ४ । से तं वंजणोग्गहे। ४९. वंजणाणं अवग्गहो वंजणावग्गहो, एत्य वंजणग्गहणेण सदाइपरिणता दव्या वेत्तया । वंजणे अवग्गहो वंजणावग्गहो, एत्थ वंजणग्गहणेण दबिदियं घेत्तव्यं । एतेसिं दोण्ड वि समासाणं इमो अत्थो-जेण करणभूतेण । अत्थो वंजिज्जड तं वंजणं, जहा पढीवेण घडो। एवं सदादिपरिणतेहिं दव्वेहि उवकरणिदियपत्तेहिं चित्तेहिं संवद्धेहि संपसत्तेहिं जम्हा अत्थो जिज्जइ त्ति तम्हा ते दव्या वंजणावग्गहो भण्णति। एस वजणावग्गहो सुत्तसिद्धो चतुम्विहो। ५०. [१] से किं तं अत्थोग्गहे ? अत्थोग्गहे छबिहे पण्णत्ते, तं जहा-सोइंदिय- अत्थोग्गहे १ चक्खिदियअत्थोग्गहे २ घाणिदियअत्थोग्गहे ३ जिभिदियअत्थोग्गहे ४ फासिदियअत्थोग्गहे ५ णोइंदियअत्थोग्गहे ६। [२] तस्स णं इसे एगट्ठिया णाणा- 10 घोसा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-ओगिण्हणया १ उँवधारणया २ सवणता ३ अवलंबणता ४ मेहा ५। से तं उग्गहे। ५०. [१] से कि तं अत्थोग्गहेत्यादि सूत्रम् । अत्थस्स ओग्गहो अत्थोग्गहो । सो य बंजणावग्गहातो चरिमसमयाणंतरं एकसमय अविसिढिदियविसयं गेण्हतो अत्थावग्गहो भवति । चक्खिदियस्स मणसो य वंजणाभावे । पढम चेव जं अविसिहमत्थग्गहणं कालयो एगसमयं सो अत्थोग्गहो भाणितन्त्रो । सबो वेस विभागेण छविहो 15 दंसिज्जति, ण पुण तस्सोग्गहस्स काले सदादिविसेसवुद्धी अत्थि । णोइदियो त्ति-मणो । सो य दव्यमणो भावमणो य। तत्थ मणपज्जत्तिणामकम्मुदयातो जोग्गे मणोदव्वे घेत्तुं मणजोग्ग(? गोपरिणामिता दवा दव्यमणो भण्णति । जीवो पुण मणणपरिणामक्रियावण्णो भावमणो । एस उभयरूबो मणदव्यालंवणो जीवस्स नाणवावारो भावमणो भण्णति । तस्स जो उवकरणिदियदुवारनिरवेक्खो घडाइअत्थसख्वचिंतणपरो बोधो उप्पजति सो णोइंदिय- स्थावग्गहो भवति । [२] घोस त्ति-उदत्तादिया सरविसेसा [जे० २०१ प्र० ] घोसा भणंति । वंजणं ति-अभिलावक्खरा । ते इमे एगट्ठिया पंच-ओगिण्हणता इत्यादि । एते ओग्गहसामण्णतो पंच वि णियमा एगहिता। उग्गह- विभागे पुण कज्जमाणे उग्गहविभागंसेण भिण्णत्था भवंति । सो य उग्गहो तिविहो-वंजणोग्गहो सामण्णत्थावग्गहो विसेससामण्णत्थावग्गहो य । एगट्टियाण इमो भिण्णत्थो-वंजणोग्गहस्स पढमसमयपविठ्ठपोग्गलाण गहणता ओगिण्हणता भण्णति, 'उ-प्पावल्ले' त्ति कातुं १ । वितियादिसमयादिसु जाव वंजणोग्गहो ताव उवधारणता 25 भण्णति २। एगसामइगसामण्णत्थावग्गहकाले सवणता भण्णति ३। विसेससामण्णत्थावग्गहकाले अवलंबणता १ चक्खुदि स० सं० ॥ २ 'घेजा मो० मु० ॥ ३ ओगेण्ह' मो० मु० ॥ ४ अवधा जे० ॥ ५ अवि सविदिय' आ० । अविसिट्ठसविदिय दा० ॥ ६ वुद्धिमत्थि जे० ॥ ७ विसेसावग्गहो सामण्ण' आ० दा० । हारि० वृत्ती त्रिविधश्चावग्रह -सामान्यावग्रह विशेषावग्रह विशेषसामान्यार्थावग्रहश्च" इति आ० दा० प्रतिगतचूर्णिपाठमेदानुसारि मेदनामत्रय दृश्यते । किच जेसलमेरुदुर्गस्थप्राचीनतमे ताडपत्रीयादर्श विसेसावग्गहो इति स्थाने बंजणोग्गहो इति पाठो वर्त्तते । मलयगिरिपार्दरपि नन्दिवृत्तौ व्यञ्जनावग्रह इति जे० प्रत्यनुसारि नाम निष्टङ्कितमस्ति । तथाहि-" इहावग्रहस्निधा, तद्यथा-व्यसनावग्रह सामान्यार्थावग्रह विशेषसामान्यार्थावग्रहश्च । ८ भण्णति, आपल्ले आ० दा० ॥ 20 " पत्र १७४-२ ॥
5 मिणवासगणिमहारपिस्याप पुष्णाए जुर्म [४० ५१-५५ मम्पति ४ । उत्तरुपररिसेसमामण्णत्यारमारे भाव मेरया पार सार मपा मण्णइ ५। भस्थ पमणावमाहो नत्यि तस्य सपणादिया तिष्णि एगहिता ममति । आह--णण मिण्मस्पंदसणे एगद्वित चि मिरुद उच्यते, म विरुद, मतो समरिकप्पेस उमास्सेर सहल दमिनति ।। वाणि उमासममतरं - ५१ [१] से कि त ईहा ? ईहा छबिहा पण्णत्ता, त जहा-सोतेंदियईहा १ चम्सि दियईहा २ घाणेदियईहा ३ जिन्मिदियईहा ४ फासेंदियईहा ५ णोइदियईहा ६ । [२] तीसे ण इमे एगट्ठिया णाणाधोसा णाणावंजणा पंच णामयाँ भवंति, त जहा- आभोगणया १ मग्गणया २ गवसणया ३ चिता ४ वीमंसा ५। से ईहा । ५१ [१] सा एग्लिा मुधसिदा । [२] इमे वस्सेगट्टिया, वे मिशिसामम्मतो एगडिता घेव, अत्यविकपणावो पुप मिष्यस्था । इमेग 10 विभिणा-मामोयणता इस्पादि । बामगरसमयामतरं सम्भूतगिसेसत्यामिरमासायमं मामोयमा मणति ११ घस्सेय पिसेसस्थस्स भणयबारेगमम्मसमासोयर्ण ममापा मम्मति २ । तस्सेरऽस्वस्स पारगपम्म परिचामो मष्णयपम्मसमासोगण व गवेसणता मपसि । तस्सेर वदम्माणुगतस्पस्स पुमो पुनो समासोपणवेण पिता मणति ४ । वमेनत्यं निवाऽपिवादिई धम्म-मावेर्ति विमरिसतो वीमंसा मम्मति ५। पम पहुपा मत्पमासार्यतस्स उकोमतो अंतमतकास सना हा मरति । हामवरं मनायो- ५२ [१] से किं तं भवाए ? अवाए छविहे पण्णत्ते, त जहा-सोईदियानाए । चक्खिदियावाए २ घाणेदियोवाए ३ जिम्मिदियावाए ४ फासेंदियौवाए ५ णोइंदियावाए। [२] तस्स ण इमे एगट्ठिया णाणाघोमा णाणावंजणा पंच णामधेयौ भवंति, तं जहा- आउट्टणया १ पचाउट्टणया २ भवाए ३ बुद्धी विष्णाणे ५। से तं भवाए। ५२ [१] सा छविरा मुत्तसिदा । [२] तम्सगहिवाम पंच, ते य भरायसामम्मपणता मियमा एगद्विता धेर, भमिपाणमिष्णवणतो पुण मिणत्या [ष २०१] पेण विपिणा-आउटणता त्यादि । एपमारनिपचस्स भरपसरूपपरियार पुलम्स य परिणमुप्पादतम्स आउणता मम्मति १। रणमापनियास्म मि तमत्पमासोपवस्स पुणा पुणो णियाम पनाउण मणति २ । मनासए भरणयर्ष का भरपारमारपारितरपस्स भापारपतो मावो सि मगर ३ । पुया पुणा वमत्पारमारणायभारित पुम्भता पुटी भए । दम्मि पसायपारितमरप सिस पेरलतो भरपारपता परियाण नि मम्मति ५॥ भापामतरं पारणा- .५ परिमादि मिसमिकयसोरमविपाशी रामरामोमा सरमूनापविशनिमुपमा बतिरपणामपरिसायोम्मापामेल पिम, " विरारि प्रतो । * पोरसमरिमेणा रा ससामाभिमुनमेश पतिरस्परमाणपर्माधिपानीशापयस्मिन मिइनि मनयगिरिपत्तो पाए । ..पपरिप ८९-१-११-१२ पमपाए १५ "पिमा मो मु०१४ मापापपा पचावापान पर मम्म परपोष। मारिणया पपारपार १५ पिम्मा म 15 10 १ पिचामा पगा ॥२ पिपित ४ पेमा मोस निस्पानिलासिम-सामोपामिम्पाये। . ।
३७ 5 ईहावायधारणाओ पडिबोहगदिटुंतो य ] सिरिदेववायगविरदय णदीसुत्तं । ५३. [१] से किं तं धारणा ? धारणा छबिहा पण्णता, तं जहा-सोइंदियधारणा १ चक्खिदियधारणा २ घाणिदियधारणा ३ जिभिदियधारणा ४ फासिंदियधारणा ५ णोइंदिय- धारणा ६॥ [२] तीसे णं इसे एगट्ठिया णाणाघोसा णाणावंजणा पंच णामधेया भवंति, तं जहा-धरणा १ धारणा २ ठवणा ३ पतिट्ठा ४ कोटे ५ । से तं धारणा । ५३. [१] सा य छबिहा मुत्तसिद्धा । [२] तस्सेगहिता पंच । ते य सामण्णधारणं पडच णियमा एगठिया, धारणत्यविकप्पणताए भिण्णत्था । उमेण विधिणा-धरणा इत्यादि । अवायाणंतरं तमत्थं अविचुतीए जण्णुकोसेणं अंतमुहुत्तं धरतस्स धरणा भण्णति १ । तमेव अत्थं अणुवयोगत्तणतो विचुतं जहण्णेणं अंतमुहुत्तातो परतो दिवसादिकालविभागेमु संभरतो य धारणा भण्णति २ । 'ठवण' ति ठावणा, सा य अबायावधारियमत्य पुबावरमालोइयं हियतम्मि ठावयंतस्स ठवणा भण्णति, पूर्णघटस्थापनावत् ३ । 'पति' त्ति सो चित अवधारितत्यो हितयम्मि प्रभेटेन पइट्टातमाणो 10 पतिद्वा भण्णति, जले उपलप्रक्षेपप्रतिष्ठावत् ४ । 'कोटे' ति जहा कोटगे सालिमादिवीयाः पक्खित्ता अविणट्ठा धारिजंति तहा अवातावधारितमत्थं गुरूवदिहें मुत्तमत्थं वा अविणटं धारयतो धारणा कोटगसम त्ति कातुं कोढे त्ति वत्तन्वा ५॥ ५४. ईचेतस्स अट्ठावीसतिविहस्स आभिणिवोहियणाणस्स बंजणोग्गहस्स परूवणं करि- स्सामि पडिवोहगदिद्रुतेण मल्लगदिटुंतेण य । ५४. इच्चेतस्सेत्यादि मुत्तं । 'इति' उपप्रदर्शने । 'एतस्स ' ति जं अतिकतं अट्ठावीसतिभेदं । ते य के अट्ठावीसं भेदा ? उच्यते-चउन्विहो वंजणावग्गहो, छविहो अत्यावग्गहो, छबिहा ईहा, छबिहो अवायो, छविधा धारणा, एते सव्वे अट्ठावीसं । एत्य अट्ठावीसइविहस्त मज्झातो जो वजणावग्गहो चउनिहो तस्स दिटुंतदुगेण 15 परूवणा॥ 20 ५५. से कि तं पडिवोहगदिद्रुतेणं ? पडिबोहगदिलुतेणं से जहाणामए केई पुरिसे कंचि पुरिसं सुत्तं पडिवोहेज्जा 'अमुगा! अमुग!' त्ति, तत्थ य चोयगे पन्नवगं एवं वयासी- किं एगसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति?जाव दससमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? संखेज्जसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? असंखेज्जसमयपविठ्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति ? । एवं वदंतं चोयगं पण्णवगे एवं वंया- सी-णो एगसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छंति, णो दुसमयपविट्ठा पोग्गला गहणमा- 25 १ धिज्जा मो० मु० ॥ २ त्रिपञ्चागत्तमसूत्रानन्तर श्रीहरिभद्र-श्रीमलयगिरिभ्या व्याख्यात सर्वेष्वपि सूत्रादर्शपु एक सूत्र- मधिकं वर्तते । तचवम्-उग्गहे एकलामइए, अतोमुहुत्तिया ईहा, अतोमुहुत्तिए अवाए, धारणा संरोज वा कालं असखेज्ज वा कालं । एव अट्ठा स० हे. मो० शु० । उग्गहे पक्क समय, ईहा-ऽवाया मुहत्तमहं ति, धारणा संखेज्ज वा कालं असखेज्जं वा काल । एव अट्ठा ल० । उग्गह एकं समय, ईहा-ऽवाया मुद्दुत्तमेत्त तु । कालमसव संखं च धारणा होति णायचा ॥ १॥ एवं अट्ठा ख० ॥ ३ एवं अट्ठा सर्वासु सूत्रप्रतिषु वृत्त्योश्च ॥ ४ पयस्स अट्ठा आ० दा० ॥ ५ से ण जहा मो० ॥ ६ केयि शु० ॥ ७ पवं इति ख० स० नास्ति ॥ ८ चोदगं स० ॥ ९ वदासी ख० ॥
मिणवासगणिमाइपिस्याए उम्णीर संजुम मु०५६ गच्छंति, जाव णो दमसमयपविठ्ठा पोग्गला गइणमागच्छति, णो संखेज्जममयपविट्ठा पोग्गला गहणमागच्छति, असखेज्जसमयपविद्या पोग्गला गहणमागच्छंति । से तं पहि- बोहगदिट्ठतेणं। ५५. से जहाणामयेत्यादि । 'से' चि परिपोषकस्स णिरेसे । 'माणामये' पि मराणा [० ३ २०२ प्र०म, समता मारमाभिमापरुवादित्यर्थः । सम्वण्णुप्पणीपमत्वं तापुसारि मुर्च मा भपदिवियाम चणयो ममगठमाणो सीसो पुष्पयो गातो पोवको, मावा तमम मुचमस्पं वा 'अपामाप' ति मण्णमाणो वोसचोटपो य वादगो मण्णति । पायणमविरुदै निहोस मुचत्य पष्मठो पणगा, विरुद-पुणश्चमुत्त पा अस्यतो ममिरुद दरिसता पप्णवसि जो सो वा पप्पगो मणति, ययापन सपपष्मीस्पया। बादको ससय- मावष्णो पण्णवर्ग पुच्छति-~'कि एगसमयादिपष्टिा' इत्यादि । एवं चादक पुष्यमिप्पायेम पते पाय- गाज-'जो पगसमयपविद्धा' इत्यादि । मो पस परिसहो कतो एस साइफरिमाणनणगण ति मो गाममागमति, इरा पोम्गता गरणमागस्पवेत्यर्थः । एवं एगादिसमयपछिपाम्गपरिमिदेनु मा अमुष्या- 'मसंसनसमयपम्हिा पोमाया गाणमागछति' चि । इमस्स अगणुपोगत्यो मणुयागत्वा य । वस्प मममु योगो इमो-महा पपासी सगिसो भदाणे पचारेण इसारेण वा पीतीरतिचा सगिर्द पविठो चि, पर असंखे- मेहि समपरिमागता परिधा कप पिछेमु पामाला गेगति पि, एप मगणुपागो मपति । इमो अयोगत्यो- 15 परमसमयादरम्म पतिसमयं पविसमाणेस असंखेजामे समए में पविठ्ठा गेहगमाग छति, वे य सराविषि प्याणमणग चि काd, भवो वेसिं गाणसपविद्धं । सो य असंखेनासमया किंपमाणे असंखेजए मरति ? उच्यते-जाणेब भावसियाए भसखेमामागमस समये गयेस ति, उकोसेप [थे २ २३०] संखम्बाम भारठियाम भाणापाणुफासपुरचे पा, उमपपा नि अपिस्दै ।। गतो परियोपकविर्दुवो । यानि भाषागविद्रुतो- ५६ [१] से कि त मल्लगदिठ्ठतेण ? मल्लगदिहतेण से जहाणामए केई पुरिसे आवाग- 20 सीसाओ मलगं गहाय तत्येग उदगदिं पक्खिवेज्जा से णटे, अण्णे पक्खित्ते से वि गडे, एवं पक्खिप्पमाणेसु पक्खिप्पमाणेसु होही से उदगविंदू जे ण त मल्लगे वेहिति, होही' से उदगवि जेणं तसि मल्लगमि गहिति, होही" से उदगविंदू जे" णं तं मल्लग भैरे- हिति, होही से उदगविंद्र जे ण त मल्लगे पवाडेहिति, एवोमेवे पक्खिप्पमाणेहिं परिख- प्पमाणेहिं अर्णतेहिं पोग्गलेहिं जाहे तं वजणं पूरित होति ताहे हु" ति करेति णो" चेव २ मापारिको इन मासमन्तस्य मामाचरम् । तेग बहा का सितो! से न ५ भन्ने विप रिमा माणे पपिपपमानी-७-२५ोरिति छ । हाnि८ राति से ... मागे व . १२-१५ योग रिश १५ महिमि इपनमा पिसगासामहामापमापारीप्रीम पो मर्म हाटी से बदष मि मतगंसि मारिदितिवधि मतिनियमनुरसम्पत मागममतपत्र उत्तिनियमविपुः १५ मेप । प्रमेय aan मेप पक्विपमा मतेर पोप - सिमामा नमुहारमै । मप पक्षिणमा पोग्ग + । मप पपिमपमा पपिपपमारि पोग्ग . . १गदरयमा व ४ ह में । १७'दो' वि 10 ३९ सिरिदेववायगविरदय गंदीसुतं । मल्लगदिद्वतो] णं जाणति के वेसे सद्दाइ ?, तओ ईहं पविसति नओ जाणइ अमुगे एस संदाइ ?, तओ अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तओ णं धारणं पविसइ तओ णं धारेड संखेज्जं वा कालं असंखेज्जं वा कालं [२] से जहाणामए केई पुरिसे अव्वत्तं सदं मुणेज्जा तेणं सद्दे त्ति उग्गहिए, णो चेव णं जाणइ के वेस सद्दे त्ति, तओ ईहं अणुपविसइ ततो जाणति अमुगे एस सद्दे, ततो 5 णं अवायं विसइ ततो से उवगयं हवति, ततो धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखेज वा कालं असंखेज्जं वा कालं। *एवं अव्वत्तं रूवं, अव्वत्तं गंध, अव्वत्तं रसं, अव्वत्तं फासं पडिसंवेदेज्जाद । [३] से जहाणामए केई पुरिसे अव्वत्तं सुमिणं पंडिसंवेदेज्जा, तेणं सुमिणे त्ति उग्गहिएँ ण पुण जाणति के वेस सुमिणे त्ति, तओ ईहं पविसइ तओ जाणति अमुगे एस सुमिणे त्ति, ततो अवार्य विसइ ततो से उवगयं हवइ, ततो धारणं विसइ तओ णं धारेड संखेज्ज वा कालं असंखेज्जं वा कालं । से तं मल्लगदिद्रुतेणं । १ के वि एस मो० मु० ॥ २ सहे त्ति य० । सद्द त्ति स० ॥ ३ तओ उवयाणं गच्छति, तमो से उबग्गहो ४ गच्छति सं० स० शु. ल. ॥ ५ संखेजकाल असंखेजकाल ल० ॥ ६ केयि शु० ॥ ७ सुणेह तेण ढे० ल०॥ ८ सह त्ति स० शु० । सद्दो त्ति जे. हे० ल० मो० ॥ ९ सद्दाइ, तओ ईह पविसइ सर्वाउ सूत्रप्रतिपु हारि० मलय० वृत्त्योश्च ॥ १० गच्छति च० स० शु० ल० ॥ ११ पडिवजेति संखेज्ज सं० म० ॥ १२ → 4-एतचिहमध्यवत्तिसूत्रस्थाने जे० मो० मु० प्रतिषु रूप-गन्ध-रस-सर्शत्रिपयाणि चत्वारि सूत्राण्युपलभ्यन्ते । तानि चेमानि- से जहानामण केई पुरिसे अवत्तं स्वं पासिजा, तेणं रुवे त्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस स्वेत्ति, तमो ईह पविसइ तो जाणइ अमुगे एस सवे ति, तो अवायं पविसइ तओ से उवगयं हवइ, तो धारणं पविसइ तओ णं धारेड सखिज्ज वा काल असम्निज्जं वा कालं । से जहानामए केई पुरिसे अव्वत्त गधं अग्घाइजा, तेणं गंधे त्ति उम्गहिण, नो चेव णं जाणइ के वेस गंधे त्ति, तो ईहं पविसइ तो जाणइ अमुगे एस गधे, तओ अवायं पविसर तओ से उवगयं हवड, तो धारण पविसह तो णं धारेह सखिज्ज वा कालं असंखिज्जं वा कालं । से जहानामए केई पुरिसे अञ्चत्त रसं आसाइजा, तेणं रसे त्ति उग्गहिए, नो चेव णं जाणइ के वेस रसे त्ति, तओ ईह पविसइ तओ जाणइ अमुगे पस रसे, तमो अवाय पपिसइ तओ से उवगयं हवइ, तो धारणं पविसइ तओ णं धारेइ संखिज्ज वा काल असखिज्ज वा काल । से जहानामण केई पुरिसे अश्वत्तं फासं पडिसवेइजा, तेणं फासे त्ति उग्गहिण, नो चेव ण जाणइ के वेस फासे ति, तओ ईहं पविसइ तओ जाणइ अमुगे एस फासे, तओ अवाय पविसइ तओ से उवगय हवइ, तो धारण पविसेइ तओ णं धारेइ संखिज्ज वा कालं असग्विज्ज वा काल ॥ १३ केयि शु० ॥ १४ पासिजा मो० ल० शु० ॥ १५ सुमिणो त्ति हे. ल० । सुधिणो त्ति मलयगिरिटीकायाम् ॥ १६ प नो चेव ण जा' मो० मु० ॥ १७ के वि सु हे० ल० ॥ १८ गच्छति ख० स० शु० ल० ॥ १९ पडिवजति हवइ ख० ॥ स० स० ॥
० निगदासगणिमहचरविल्माए पुगाए संजुम [मु. ५६ ५६ [१] तस्प भाषागसीसरी ति[आ] रागढाममेर, भाषाभापागटामस्स मासम्ण समता परिपरंत, माया मापागमचारियान म ठाम समापागसीसय मणति । 'मयंसेहि ति मयमसमयादारभ्य प्रतिसमयं ममता मरिशती स्पता मणता । 'माहे से गंजण परितं भवति' ति, पत्य वनणगाणेम सराइपुम्गममा बिदियं वा उमयसवपो या घेतल्य, विषा नि म विरोधो। वमन परियं ति कई ! उच्यते-नदा पुम्गलदष्वा पंजणं तदा प्रिय ति पभूता ते 5 पोमायया नावा, स्त्र प्रमाणमागता सरिसपपरिपोषसमस्या माता इस्पर्यः १। मदा प्रेम दम्मिदिर्य पजर्ग खडा परिय ति कर ? उप्यसे-मादे सेरि पोमगछेसं दलिदिय माघ मरितं पापितं तदा परिप ति मष्यति २। जदा च उमयसंवषो वंमण तया पूरिय ति को उज्यते-दम्मिदियस्स पुम्ममा मंगीमारमागता, पुम्गसा प दनिदिए अनुपक्का, एस उमयमायो, एतम्मि उमयमा पुग्गछेरि इंदियं परित, इंदिपण रि समिसपपरियोपकप्पमाना पुमामा गरिता, एष उभयसामस्यतो विष्माणमायो भवतीत्यर्थ:३। 'हुति करो' सिनणे परिवे व मत्य गहा 10 चि पूर्व भगति । एस एफसमयिमा अत्यापम्ग। वे पुप किंपगारं गेहति ? उच्यते-'ना न प जागति के गि एस सादी' तफाले सामणमणिरेस, सादिविसस ण माणइ चिपुर्व माति। किंच-सरूप-णाम मावि-गण-किरिया- रिकप्पविसई मनास्थ्येय साणातीत्पर्यः । एस्थ परिमापकालावो मे० २०१ प्र०] पुमं पंजमोगरा से मनति । एसा एक ममणोमाइस्स परूषणा कता । पनामाइस्स परता 'इंति करेति' चि एतम्मि परिपकासे एग समश्यो अत्यापम्गो से मवति, ततो से फमेन पायाय पारणाभो घि। एस्प परिमार-मल्लविवेहि मेमणो 10 मास्स अस्पोमास य मिणकारखा र दसिता । पर मार-साधु मे परिपोष-मगदिढहि पमण प्रत्यारा- हाण मेदो देसितो, मागरमो पुण समस्पे पापग्णे ण मनमोम्गही सपिलनति, जतो पुष्षामेर सराइमत्य विष्णापरणजते, मणिस घ मचे 'से मापामय केपि परिसे'त्यादि । भाषा इमस्स मुवस्स इमो सांपो-पर भार-पदुक्के ममता सम-जाम मोति-सम-फियाविकसविमुख मनास्पेर्य शूमातीत्सेतद् धिरुभ्यो, कसा ? यवः सोऽभिरित-से महापामवेत्यादि । माया इमो संबपो-मसप्तपतिबापा-मष्ठगवितेहि पंजप प्रत्यापमाण मेदो 10 देसितो, पण प्रचे मछगदिवेणेव पनप ऽस्थाममाहाण मेदो वंसिबति- [२] 'सेनाणामते 'त्यादि। प्रतुधारणसामाणतरमेय पर आर-पत्य मुचे मन सम्परे म मरिस- मंति,नतो मम्मच सा मुणे' चि मणित, सामेवेवपारिते परमवोमबाप एव सविनम्नति चि। मायरिय मार-ग सुम मचामिप्पार्यभापसि, गणु ममत्सासरमातोमस्पायम्गामााम कसं, मतो अम्मचमणिरेस सामपं विकप्पररिय ति मणति, तस्स प पुर्म यमणापम्गदग मवितम्प, मेवा एतम्गारिणी सोवाविहदिपस्स अस्पामगोनपोमारमतरण कण मपति चिनियमेसो, सो य कासामचमतो उप्पसमतपत्रेचविझवतो व मक्विमति । घोदा मा-मति पर्म सो में एचे मगित "वेग सरेति मामरिते" तं का ? तप्यते- "वेणं सरे ति मोमारि विषपसा सूत्रकारोऽमिपचे इति करमनिरसाता समविसेसविसर पदमाममुकं [२० २ १६.] माति, गो पेत्र में नाणति फे पेस मरे। ति,मद अयोध्यमिस्पेवं पुष्यते, कमा! तप्यते-एकसमपचातो मस्थाबमास्स, किंप पणतो य पण्णरगो सेपपारामिपायतो " ते सोचि मोगदिवे "पिते, णदासो। मति पा "सोऽय" 50 मिसि पुदी मवे तो पावो बम, बम, का उपवे-णो मसो मस्पायगासमपमेचे काळे "सर" इति १ पुन बगविदिप मम पिरती भूषिपामेरा २ माफर्म भरित मा । “मामृत विरिपती॥ १ भमिपका इस्पा पमा परि ति मग्णा इति मा मन्दिरको पामेरमै । " पठारमा । ५ नाति-विरिपा सेतो पचम्गारियो पात - - - मल्लगदिटुंतो] सिरिदेववायगविरइय गंदीसुत्तं । ४१ विसेसणाणमत्थि, अह तम्मि वि समए सद्दोऽयमिति बुद्धी हवेज तो फुडं अवाय एव भवेज, णो य तकाले अबातो इच्छिज्जति, जतो अत्थपरिच्छेदो असंखेज्जसमयकालिओ भवड त्ति । अण्णे पुण आयरिया एतं सुत्तं → विसेसत्याव- ग्गहे भणंति-'अव्वत्तं सदं मुणेज' त्ति एस विसेसत्थावग्गहो, 'तेण सद्दे ति उग्गहिते' ति, एतं सुत्तखंडं सामण्ण- सहत्थावग्गहदंसगं, कहं ? उच्यते-जतो भण्णति "णो चेव णं जाणति के वि एस सद्दे "त्ति संख-संगालि-करय- लादिको त्ति, एसो वि अविरुद्धो मुत्तत्थो । 'ततो' अत्यावग्गहसमयागंतरं पढमसमयादिसु 'ईहं अणुपविसति' 5 'ईई ति केड संसयं मण्णते, तं ण भवति, संसयस्स अण्णाणभावतणतो, मतिणाणंसो य ईह त्ति । आह-को पुण संसयेहाण विसेसो ? उच्यते-इह जं थाणु-पुरिसादिअत्थे पेहितं चित्तं तदत्थपडिवोहत्तेण पडिहतं मुत्त इव चेतो संसयो भण्णति, तं च अण्णाणं, जं पुण हेतूबवत्ति-साधणेहि सत्भूतमत्थस्स विसेसधम्माभिमुहालोयणं तस्सेवऽत्य-. स्स अधम्मविमुहं असम्मोहमविफलमत्थपरिच्छेदकं चित्तं जं तं ईहा भण्णति । अणु त्ति-अवग्गहातो पच्छाभावे असं- खेजसमइयं परिमाणतो ईहोवयोग अविच्छेयत्तणतो अंतमुहुत्तकालं ईहति, ततो विसिट्ठमतिनाणखयोवसमभाव- 10 तणतो अंतमुहुत्तकालभंतर एव जाणति 'अमुते एस सद्दे' संख-संगादिए ति। दुरववोधत्तणतो पुण अत्थस्स अवि- सिट्टमइण्णाणखयोवसमत्तणतो वा ईहोवयोगअंतमुहुत्तचुतो अणवगतत्यो पुणो वि अण्णं अंतमुहुत्तं ईहति, [जे० २०४ प्र०] [एवं] ईहोवयोगाविच्छेदसंताणतो वहुए वि अंतमुहुत्ते ईहेज्जा, ण दोसो । ततो ईहाणंतरं अवातो। सो य सदाइअत्थपडुप्पण्णस्स जे परधम्मा तेम्म विमुहस्स सधम्मे य अवधारयतो ‘ण एस संगसद्दो, णिद्ध-मधुर- गंभीरत्तणतो संखसद्दोऽयमित्येवमवगतत्यो [जहण्णतो] असंखेज्जसमयितो उक्कोसतो णियमा एगंतमुहुत्तिओ जो 15 अववोधो अत्यपरिच्छेदो सो अवातो भवति । ततो अवायाणंतरं धारणं पविसइ त्ति । सा य धारणा जाणतो असंखेज्जसमते अविच्चुतीए तमत्थं धरेति, उक्कोसतो अतमुहुत्तं, अणुवयोगतो पुण तमत्थं विस्मृतं पुणो वि संभरइ त्ति धारणा। एवं सा संखेज्जवासाउयाणं मुहुत्त-दिवसादिकालसंखाए संखेज्जं कालं भवेज्ज, असंखेजवासाउयाणं पुण असंखेनं कालं। एवं चक्खिदिए वि रूवं भाणितव्वं, वंजणोग्गहवजं । घाण-रस-फासिदिएमु वि जहा सोइंदिते तहा सव्वं 20 माणितव्वं । 'संवेदेज' त्ति एते सदादिइंदियत्थे पडुप्पण्णे इंदियं स्वं स्वं इंदियत्यं आयखयोवसममणुरुवं मुभम- मुमं वा वेदेजें त्ति । अहवा फरिसिंदयवज्जं सेसिदिएहिं पत्तमिदियत्थं प्रायसो इट्टमणिटं वा स्वं आत्मानुगतं वेदन वेदते, न शरीरेण अनुपलक्षं वा वेदयतीत्यर्थः । फार्सिदियमत्थं पुण स्वं अनुगतं शरीरानुगतं च दुहा वि फुडं वेदइ त्ति संवेदेज त्ति अतो भणितं । एवं मणसो वि सुविणे सदादिविसएमु अवग्गहादयो णेया, अण्णत्थ वा इंदियवावारअभावे मणेमाणस्स 25 त्ति । इह मृत्चेण निदरिसणं मणे- [३] से जहाणामतेत्यादि मुत्तं । कंठं । सुविणो मे दिट्टो त्ति सुविणदिहें अव्वत्तं सुमरइ । तच्च प्रतिवो- धप्रथमसमये मुविणमिति संभरतो अत्यावग्गहो, तस्य प्रथमावस्थायां व्यञ्जनावग्रहः, परतो ईहादि । सेसं पूर्ववत् । जग्गतो अणिदियत्थवावारे वि मणसो जुज्जते वंजणावग्गहो, उवयोगस्स असंखेजसमयत्तणयो, [जे० २०४ द्वि०] उवयोगद्धाए य प्रतिसमयमणोदव्यग्गहणतो, मणोदव्वाणं च वंजणववदेसतो समए य असंखेज्जतिमे मनसो नियमा- 30 १ →- एतच्चिद्वान्तवर्ती पाठः जे० नास्ति ॥ २ एणस्सऽत्या आ० दा० ॥ ३ णादिकर आ० दा० ॥ ४ 'सु पविलु चित्त आ ॥ ५ वेदेज ति। एते सहाई चक्खुइंदियवज्ज सेसिदिहिं आ० दा० ॥ ६ नुपलम वा आ० दा० ॥ ७ तस्य पूर्वमवस्था जे० दा० ॥ [ चु०६ १२ विमदासगणिमरचरविययाए सुष्णीर समुस [मु. ५७-५८ गा०७०-५ भग्राम मवेत् । सस्य च मयमसमपार्थमतिगोपकाछेऽयविप्राः तस्य पूर्वमसम्येयसमयपु म्यअनावग्रह। शेपमी. रादि पूर्ववत् । सीसो पुति-उमादी उफमातिकमे एगतस्मभावे वा किं सादिवत्पुपरिच्छेदो ण माति ! माचार-आम, ण मयति, अत एप प क्रमे नियमा, ममा णो अगदिस इति वमा पुन उमाहो, नमा य अणीरिक पो अवगतिािणवरं तमा अपायो, जमा य यमारास ण पारिजति परई भवापापतरं तमा धारमा । ममा य एस प्रमनियमो वमा सम्बो आमिगिपोधिपनाणापगमो नियमा पर मनति, भत पर कारणा सम्मे अपम्पादयो मतिनागमदा मतीसपः॥ ५७ तं समासओ चउब्बिई पण्णत्तं, त जहा-दैव्वओ खेतओ कालो भावमो । तत्य दवओ णं आमिणिवोहियणाणी आएसेणं सव्वंदब्बाइ जाणति ण पासति ।। खेचओ णं आमिणिवोहियणाणी माएसेणं सब्वं खेच जाणइ ण पासइ २ । कालो र्ण 10 आमिणिवोहियणाणी आएसेणं सब काल जाणइ न पासइ ३ । मावमो णं आभिणि घोहियणाणी एसेणं सब्वे मावे जाणइ ण पासइ । ५७ तं समामतो पतुम्बिईत्यादि मुच। तच' मतिनाणं खयोवसमस्यवो एगपि पि शेतु णेयभेद चमतो नाणामदा दम्माविया से मपति । 'वष्यतो पति दम्पदो पक्षम्ये 'ति पयपासकारे, देसीवपणसो या '' भाषा, भपाबानान्ते पत्रमी विमतिः, सत्य पायसवयमसेलीता दपतो में एवं बामिनिमोपियनामी समति- 15 'आदेसेणमित्यावि, देसो नाम-मकारो। सा य सामष्णता विससतो य । तस्य दम्पनातिसामग्णावेसे सम्परामाणि भम्मस्पिकायादियाणि माणति, पिसेसपणे विमा पम्मस्पिकाये पम्मस्थिकायस्स देसे पम्मस्पि- कायस्स पदसेस्पादि फेयी माणति, सम्पे प यापति, ना मुहुमपरिणता भविसरत्या मप्पग्मरमादिया य। 'प पस्सई' पि सम्वे मामम विसेसादेसहिते पेम्मादिप, पासुमवासुसणेण स-सराइवे केपि पासति चि पचम्म । भापादेसो-पचं, तस्सादेसता सम्पदव्ये भामतीत्यादि । चोक मार-नति पुर्व का मतिनाणे ? ति, उभ्यते- 20 एपोपलयम पम पसरतो तम्मायणपुदिसामत्पतो [ये . ५ प्र०] मुठोपयोगणिरवेक्सा वि मती परचा पिप सुपादेसो विक्यते १ । खेच पि सामाण-विसेसादेसतो । तस्म सामप्यतो मेचमागासं, व घेग सबग पप्पमो । बमो. ॥२तत्य इति पर से ..पास्थि मे मो मुनिमामगनपुररये ५५ पने पुर्वठित 1-1-५१ज इस क्षेत्रमा मानिसको मर्मपि सारेषु जापति पासति म पाओ सापति प पासति पनि पाठमेरेन पा मगपत्यो बामपतमीतगोप १५ च पर्तते । नामपरंपरेका-"एममो विमा प्रिय मामिनिमोविनियम पाश्यि पर नामिनियोधिपान का 'मापसेप' सिनाप-प्रभा सामाम्ब-विसम्मान व बारे ऐन' मोमो बिमाकपा नवसपसेपपेमति मागर, मरा भासेन परिकामा साम्मानि' बस्तिमान 'मानाति माय-बारमापेक्यामपुष वामसाबारपारपारूपालाद, पात पति भाषाफेवगामापते परम्पोपोमिवात् । तमो तिजपाभित्र बानिनिमोभिमानविषय मेश पापिस पानामनियोरिहा न भार' विवाद भुपरिवर्मन्या पा समरिमोतरम् । स पाटो पतति । इरानम्पोवामान्तरे 'पासा' पि पाठान्तरेणापीठम् । एर मन्दिरोकारवा परिभावीमा मामाणम्भारेप-प्रसार सब सामान्यतो रिसेपथ । म पगरिमामामारेपन सरप्पाम पाखिममानि मानाति निरपि वा बर्मासिसोबर्मासिबल ए बादिम पायति सान् पर्मास्विशान् समारीच बोमरणाचतान् पासपम्ति २५ पो॥७मषि सतरण पप्पणापारिया मा त बिपिमा मनापारिप एस ८ सेसा सविद यम्मारिए पापा ।
आभिणिवोहियणाणस्स दन्वाइमेयाइ ] सिरिदेववायगविरइय गंदीसुत्त । तममुत्तं अवगाहलक्खणं सव्वं जाणति । विसेसतो वि लोगा-ऽलोगुड्ढ-ऽह-तिरियादिविसेसखेत्ते जाणति, ण जाणइ य केयी, क्षेत्रं न पश्यत्येव २। काले विआदेसो सामण्ण-विसेसतो। तत्थ सामण्णतो इमं भण्णति, ण य दरिसणतो, णिचमणिचं वा मुत्तममुत्तं वा कलासमूहं सबदवाणि वा कलेइ त्ति कलणं वा कालो, तमेवंविहं सामण्णतो सब- कालं जाणति। विसेसादेसो-समया-ऽऽवलिगादि उस्सप्पिणीमादि वा विसेसकाले केयि जाणति, ण जाणति केयिं, कालं ण पश्यत्येव ३। भाव इति भवनं भूतिर्वा भावः, एवं सबभावे भावजातिमेत्तसामण्णतो जाणति । विसेसादेसतो 5 जीवा-जीवभावे। तत्थ नाण-कसायादिया जीवे, अजीवे वण्णपजवादिए अणेगहा वीसस-पयोगपरिणते, एत्थ मति- णाणविसयत्थे जे ते जाणति, सेसे ण यागति, सबभावे ण पासइ त्ति, मतिणाणस्स असव्वण्णेयविसयत्तणयो । ५८. उग्गह ईहाऽवाओ य धारणा एव होंति चत्तारि । आमिणिबोहियणाणस्स भेयवत्थू समासेणं ॥ ७० ॥ अत्थाणं उग्गहणं तु उग्गहो, तह वियालणं ईहं । ववसायं तु अवायं, धरणं पुण धारणं विति ॥ ७१ ।। उग्गह एक समयं, ईहा-ऽवाया मुहुत्तमद्धं तु । कालमसंखं संखं च धारणा होति णायव्वा ॥७२॥ पुढे सुणेति सद, स्वं पुण पासती अपुढे तु । गंधं रसं च फासं च बद्ध-पुढे वियागरे । ७३ ।। भासासमसेढीओ सदं जं सुणइ मीसँयं सुणइ । वीसेढी पुण सदं सुणेति णियमा पराघाए ॥ ७४ ॥ ईहा अपोह वोमंसा मग्गणा य गवेसणा। सण्णा सती मती पण्णा सव्वं आभिणिवोहियं ॥ ७५॥ से तं आभिणिबोहियणाणपरोक्खं । 10 15 20 १ ईह अवाओ स० शु० ल० मो० ॥ २ अत्थाणं उग्गहणम्मि उग्गहो तह वियालणे ईहा । ववसायम्मि अवाओ, धरणं पुण धारणं विति ॥ मो० डे० ल० मु० । हरिभद्रपादै मल्यगिरिपार्दैश्चायमेव पाठमेद' निर्दिष्टो व्याख्यातश्चापि वर्तते ॥ ३ त्तमतं तु हरिभद्रप्रि-मलयगिरिवृत्त्यो निर्दिष्टोऽय पाठमेद ॥ ४ मीसियं हे० मो० मु०॥ ५ ख० स० शु० मो० प्रतियु से तं आभिणियोहियनाणपरोक्ख इति एकमेव निगमनवाक्यम् , जे० डे० ल० मु० प्रतिषु पुन से त्तं आमिणिवोहियणाणपरोक्वं, से तं मतिणाणं इति निगमनवाक्यद्वय दृश्यते । किञ्च हरिभद्रसूरि मलयगिरिवृत्त्यो प्रथम निगमनवाक्य व्याख्यातमस्ति, चूर्णिकृता द्वितीय निगमनवाक्य व्याख्यात वर्तते इति वृत्ति-चूर्णिकृतामेकतरदेव निगमनवाक्यमभिमतम् । अपि च चूर्णिकृता चूर्णा- “से कि त मतिणाण ?" ति एस आदीए जा पुच्छा तस्स सव्वहा सरूवे वणिते इम परिसमत्तिदसग णिगमणवाक्यम् ---" से तं मतिणाण ति" इत्यादि [पत्र ४४ पं० ४] यन्निगमनवाफ्यव्याख्यानावसरे निष्टङ्कितमस्ति तत्रैतत् किल चिन्त्यमस्ति यत्-चूर्णावपि से किं तं आभिणिवोधिकेत्यादि सुत्तं [ सुत्त ४५ पत्र ३२ ] इति आदिवाक्यमुपक्षिप्त वर्तते तत् किमिति चूर्णा निगमनवाक्यव्याख्यानावसरे " से कि त मतिणाण' ति एस आदीए जा पुच्छा" इत्यादि चूर्णिकृता निरदेशि ? इत्यनार्थे तद्विद एत्र प्रमाणमिति ॥ -- १४ मिणदासगणिमहतरविरइयाए पुष्णीर संनुय [१०५९-१५ गा० ७१ ५८. उग्गा ईहा गाए । अस्पाणं० पापा । उगह एई० गाहा । पुढे सुणेइ० गारा । मासा समगारा। ईहा मारा। एताभोगारामो मापटियाए [भाव०नि० गा०२-६ तथा गा० १२] तदा मागितम्या इति ॥७०।७१।७२||७||७४||७५।। "से कि सं मतियाण "[सर्च १५] ति एस आदीए मा पुग्ण सस्स सना सरुवे पणिवे इम परिसमधि- 5 सगं भिगमपवाक्यम्-"से ते मतिणाण" ति । भाषा सीसो पुति-जो एस पणियसरूवेम ठितो पागनिससो सो किंरचयो ? भाषार्प मार-स' इति निरसे, '1'ति पुमपमामरिसणे, वे एतद् 'मतिमान' ति स्वनामामपान मित्यर्पः । भाना 'से' घिमस्य पञ्जनसोप को पतं मतिणाण ति मपति, एतामद् मतिमानमित्यर्थः ॥ शाणि सन्ममरण करपक्रियापार नधुरिट्स कमप्पा मुतणावं मपति- ५९ से कि त मुपणाणपरोक्स ? सुयणाणपरोक्खै चोईसविहं पण्णतं, त जहा- 10 अक्खरसुतं १ मणक्खरसुवै २ सण्णिासुर्य ३ मसण्णिसुयं ४ सम्मसुर्य ५ मिच्छनुयं ६ सादीयं७ मणादीयं ८ सपज्जवसिय ९ अपज्जवसिय १० गमियं ११ अगमियं १२ अगपविलु १३ अणंगपविट्ठ १४। ०९. से कि[थे २०१६० ते सतनाणेत्यादि । प पतापरमवयोगसमचमतो एगपि पि मासरादिमारे पर भाव भागरिं वि चोरसरि मणति । तस्य मेरसर सिरि-माणसरं अमिसारक्सर 18 पपरतरं च । तस्य माणासरं "पर संपरणे" न क्षरतीस्पतरम्, न पश्यपते मनुपयोगमीत्यर्मः, आसमापचमतो, संप मार्ग मरिसेसको चेतनेत्यर्थः। भाइ-पर्व सम्ममबिसेसतो पापमस्वरं कमा सुत मासरमिति मगति ! उम्पते-सरिविसेसतो ।। अमिसारणमा असर मपिता, पनयन, एर वार ममिलापोतुमाहपता पुतपिप्पा पस्स भक्तरवा मगिता २। इदापि पाणक्खर-णिनति मणेपामिरेतो भस्पो इति बनो, स पार्थस्य, पे पिपर्णकमन, मागा द्रम्मे गुणविशेषनर्मकसद । पर्पते-ममिमप्यतेऽनेमेति पहिरम् ३ ॥ पस्प ए- ६० से कि ते अक्सरसुत ? अक्सरसुत तिविहं पपणत्त, तं जहा-सण्णपखरं १ वजण पवर २ लद्धिमत्सरं ।। ६० मे किं तं अक्सरसुतं रस्मादि । पाखरसर सुगतो मासतो मा मनस्तरम। तस्वमसरम्मो अमिसायो पा दम, खयोबसमम्दी मापमुतं । वर पोसरं निविष सम्वासरादि ॥ तस्प- ६१ से किं तं मण्णखरं ? सण्णक्खर अक्सरस्स सठाणा गिती।से तं सण्णसर । ६१ सणस्परं' मस्तरागारविसेसो । सो य प्रमाविसिपिरिमाणो मणेगरिपो भागारो। वेस भा(म)- कारादिमागारेम नमा प्रकारे कारसम्णा पर भाति, एवं सेसेस वि, तमाचे सपाखरा मगिता, नाप पागारं बड़े ठकारसम्या उप्पम्नतीत्पी १॥ बरस मो . २ मा दिपिा-मानपचर मिवापरपणावर । सत्य नार्ण ३ माषणा मपरं मा ५ वी सपनायर से...., . 10 " । ।
. , मक्खरा-ऽणक्खराइ सुयणाणं ] सिरिदेववायगविरहयं गंदीसुत्त । ६२. से किं तं वंजणक्खरं ? वंजणक्खरं अक्खरस्स, वंजणाभिलीवो। से तं वंजणक्वरं। ६२. व्यक्तीकरणं वंजणं, व्यज्यते अनेनार्थ इति वा व्यञ्जनम् , यथा प्रदीपेन घटः, व्यञ्जनं च तदक्षरं चेति व्यञ्जनाक्षरम् , तच्चेह सर्वमेव भाष्यमाणं अकारादि हकारान्तम् ,अर्थाभिव्यञ्जफत्वाच्छब्दस्य । तमेवं अक्खरं अत्याभिव्यंजकं वंजणक्सरं भवति, जहा घटः पटः इत्यादि २॥ ६३. से कि तं लद्धिअंक्खरं ? लद्धिअक्खरं अक्सरलद्धियस्स लद्धिअक्खरं समुप्पज्जइ, 5 तं जहा-सोइंदियलद्धिअक्खरं १ चाखदियलद्धिअक्खरं २ घाणेदियलद्धिअक्खरं ३ रसणि- दियलद्धिअक्खरं ४ फासेंदियलद्धिअक्खरं ५ णोइंदियलद्धिअक्खरं ६ । से तं लद्धिअक्खरं । से तं अक्सरसुयं । ६३. 'लद्धक्खरं' ति अक्वरलद्वी जस्सऽस्थि तस्स इंदिय-मणोभयविग्णाणतो इह जो अक्खरलाभो उप्प- जति तं लद्धिअक्खर । तं च पंचविहं सोइंदियादि । जहा सोइंदियलद्धिओ सदं सोतुं संख इति अक्खरदुयलाभो 10 भ[जे० २०६ प्र० ] वति, एवं सव्वत्थ लद्धिअक्खरं भाणितव्यं ३ । इह सण्या-वंजणक्खरे दो वि दव्यमृतं गहितं, मुतविण्णाणकारणत्तातो, लद्धक्खरं भावमृतं, लद्धीए विष्णाणमयत्तणतो भयणा वा १॥ इद्राणि अणक्खरसुतं- ६४. से किं तं अणक्खरसुयं ? अणक्खरसुयं अणेगविहं पण्णत्तं, तं जहा- ऊससियं णीससियं णिच्छूद्रं खासियं च छीयं च । णिसिघियमणुसारं अणक्खरं छेलियादीयं ।। ७६ ॥ से तं अणक्खरसुयं । ६४. अणक्खरसदसवणतो करतो [? वा] अणक्खरमृतं भवति । तं च अणेगविहं इम- ऊससितं० गाहा। पूर्ववत् कंठा [आव० नि० गा० २०] ॥७६॥ २ । इदाणिं सण्णिमसण्णिमुतं- ६५. से किं तं सण्णिसुतं ? सण्णिसुतं तिविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालिओवएसेणं १ हेऊवएसेणं २ दिद्विवादोवदेसेणं३ । ६५. सण्णिस्स सुतं सण्णिमुतं । असण्णिस्स मुतं असण्णिमुतं । तत्र संज्ञाऽस्याऽस्तीति संज्ञी । सो य सणी तिविहो-'कालिओवदेसेण' इत्यादि । चोदक आह-जइ सण्णासंबंधयो सण्णी तो सव्वे जीवा सण्णी, जतो एगिदियाण वि दस आहारादिसण्णातो पढिज्जंति ? आचार्याह-उहोहसण्णा थोवत्तणतो णाधिक्रियते, जहा णो करिसावणेण धणवं भवइ ति, सेसआहारादिसण्णाओ वि भूयिष्ठतरा वि णाधिक्रियते, अणिद्रुत्तणतो, जहेह हुंड- संठितो ण मुत्तित्तणतो ख्ववं भण्णति । एते अधिकतसण्णाए अणुवणयदिटुंता । इमे उवणयदिटुंता-जहा बहुधणो 25 धणवं, पसत्थणिवत्ति-देहमुत्तित्तणतो य रूववं भण्णति, तहेव महती सुभा य संज्ञाऽधिक्रियते । सा य संज्ञान संज्ञा- मनोविज्ञानम् , तत्सम्बन्धात् सन्नीत्यर्थः ॥ उक्तः प्रसद्गः । प्रकृतमुच्यते- १ लावो वंजणक्खर । से त ख० स० ल० शु० ॥ २ अस्मिन् सूत्रे सर्वत्र लद्धियक्खरं इति स० शु० मो० ॥ ३ °णतो कारणतो वा आ० दा० । अनक्षरशब्दध्रवणत 'कुर्वतो वा' मापत इत्यर्थ ॥ ४ कार्षापणेन ॥ 15 20 १६ विगासगणिमहतरविल्याए मुष्णीए संजुरी [१० ६५-६८ १६. से कि त कालिओवएसेणं ? कालिओवरसेण जस्से णं अत्थि ईहा अपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमंसा से ण संणि ति लज्मइ, जस णं णत्यि ईहा अपोहो मग्गणा गवसणा चिंता वीमसा से णं असणीति लन्मइ । से तं कालिमओवएसेण ।। ६६ 'कालिवारदेसेण' ति साऽदिपदसोदो टम्यो, सस्मभरणे 'वीरपासितोपदेसर्ग' वि पचमा दीर- मायत, कारितोचि विसेसण। फस्स ? ठच्यवे-उपदेसस्स, जानिपमवणे मुडुचकालिचोदीएकासितोषा पामरी कतो वा दीरकास्तिोपदेसेमं ति माणितलो । उपदिसणमुपदेसो, उपदेसो दिपा आदसो सिपा पमस्म पिपा परमण चिमा परखा। दीएकासिमा उपक्षेसो दीकासिमोपदेसो, सेण दीरकारिवारवेसेणं नस्स सप्या मरति सा भादिपदसोपावो कासिभोवदेसेम सप्णीत्यर्थः । आचा कारिप-पामारादि मुच बदुवदसेण सम्णी मम्मति। सो म इमरिसोमो य मवीवकाछे मुदी वि० २०६ दि० ] इदं सदिति रुतमणुमूव या समरति, पमाणे य इदिक- 10 गोदिपण पा माणवरं साइमत्यसमन्द अण्णत-नगरेगपम्मेदिक चिसवस्सेर परपम्मपरिधागे सम्माषु गवारपारणे य 'मबोहो' चि मवादो। विसेसपम्मग्णेसणा ममामा, मरा मधुरमीरचणवो एस संखसा इति। बीसस-पयोगम्मपणियमणि घेत्यादि गोसणा । मो यज्मागवे य पितयति 'कांना ते तत्प फार्म' पति मणोपासवणाणगसे रिक चिता। बाव-पता-परत्वपरिता रितस्मिरिसो धीमंसा । माला 'किमेय?' ति ईरा। पिण्यारपारितो मत्पो भवोपो । ममिससियस्पस्स मणोचयप-काएर जायणा ममाणा । भमिसितत्वे व 15 मपपत्रमाणे गोसणा । भणेगा संकप्पकरण किंवा । इन्दमर्येषु पीमंसा, मा पिसमणि हितमदित पूरै कसं थोष बहु इत्यादि । भहमा सकापतो चे विविधा भामरिसमा वीमंसा । मामा 'मयोहा' चि भवावो । सेसा राएगहिपा । बस्सब मप्पयरषिकप्पण ममोदम्पमणगतं चि धापति एस कासिमोपदेसेप सणि पि । सो य मर्णवे ममोमोगे सवे पे मणेति, एतसदिसपणो मणविष्णाणारखखयोपसममुपश्यतो य परा पनसमवो परीपारिपगासेण कुरा सोरसम्दी मपति ता मपसयोरसमसदिमतो मगोदम्बपगासेण मगोण्टेरि ईरिपरि 20 फरमत्य उपसमतीसपः। कास्तिोपदेससम्मीयिरपण असप्पी, मोर अविमुदपाखुमधो मदमदप्पगोसे मोक्म्दी ममया एवं सम्मसिमपंचेदियझसमिस्स, सकोसलपोपसमे वि अप्पमणोदमम्गामसामत्पे मवपरिनामचषतो य मसप्पिमो पविक्षदमप्पा प अयोपसम्मोत्सः । पदो रि मसिमुदा परिदियाप, ततो वेदियागं, वो रि परिसदा वे दिया परपुरसम्दी । मस्स य मा दिया सतरा वेस मरमगाविस पपत्ते । विगसिदिपाण रि मावेसंतरतो मगोवम् ० २ ७ प्र गाणं ममदमप्पत्यसो य माणितम । सो य ममो वेसि मममो घेर 25 इसमो, मादपणतो, असीस्यद् शानदा । तयो मोवियस्तिो वि समीपातो ममता विणागे पनि दिपाण, महामक्सग्पि पिसमावितस्स यता एगिदियाण समपा मणामारे रिचार्ण सम्ममाणीकासितोपदेससप्पिमो पते सम्मुणिमादयो सम्बे मसप्णी मरतीस्पर्म: १॥ वाणि-- ६७ से कि त हेमवएसेणं ? हेऊवएसेणं जैस्स गं मत्यि अभिसधारणपुब्धिया १ स्सास्विप है. H॥२अबोहो मो हसणीति हो मु.स्स परिय- ॥ ५बोडो मो मु .मरम्-पप-परमगरिया-नवनिमय इसी ८'प्पापमाणेा । उपमामे मा ..सेवा पचति एसजे बा । पावित पारख मो पोस्टक । १. महत्तपतो पा . ॥ पणी . पा । ११ गासापापा बस्सभत्पिप..
- , सण्णि-असण्णिसुयणाणं ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्त । करणसत्ती से णं संण्णीति लभइ, जस्स णं णत्थि अभिसंधारणपुब्विया करणसत्ती से णं असण्णि त्ति लब्भइ । से तं हेऊवएसेणं । ६७. 'हेतूवदेसेणं ति हेतुः कारणं निमित्तमित्यनन्तरम् , 'उबदेसेणं' ति पूर्ववत् । हेतूतो सँण्णा भवति त्ति जेण तेण सो हेतुउवदेसेण सण्णी भवति । 'जस्स' त्ति जीवस्स, 'णं' वाक्यालंकारे देसीवयणो वा आत्म- स्वरूपपदर्शनवचनोपन्यासे वा, अव्यक्तेन विज्ञानेन अभिसन्धार्य पूर्व ततः विज्ञानम्यैव ‘करणशक्ति' करणं-क्रिया 5 शक्तिः-सामर्थ्य, अथवा करणे शक्तिः करणशक्तिः, अथवा करण एव शक्तिः करणशक्तिः। तच अभिसंधारणं संचिंत्य संचिंत्य इटेषु विसयवत्थूल आहारादिमु प्रवर्तते, अणिहेनु य णियत्तते । एवं सदेहपरिपालणहेतो पव- तंति। ते य पायं पडुप्पण्णकाले, ण तीता-ऽणागतकालावलविणो भवंति, उस्सण्णमेवं, केयिं तु तीता-ऽणागतकाला- वलंविणो वि भवंति, ते पुण ण दीहकालाणुसारिणो। किंच-तेसु वि आगतो मुहुमो संताणचोदको अविस्सरणहेतू दट्टन्यो । एवं ते विकलेंदिया सम्मुच्छिमपंचेंदिया या(य) हेतुवायसण्णी भणिता, ते पड़च्च असण्णी जे णिचेट्टा 10 इटाणिविसय[अविणियट्टवावारा मत्त-मुच्छिय-विसोवयुत्तादिसारिच्छचेतणहिता पुढवादिएगिदिया इत्यर्थः २॥ इदार्णि- ६८. से किं तं दिहिवाओवएसेणं ? दिट्ठिवाओवएसेणं सण्णिसुयस्स खओवसमेणं सण्णी लब्भति, असण्णिसुयस्स खओवसमेणं असण्णी लम्मति । से तं दिविवाओवएसे- णं ३ । से तं सण्णिसुतं ३ । से तं असंण्णिसुतं ।। ६८. दिहिवाओवदेसेणं ति दृष्टिः-दर्शनम् , वदनं वादः, उपदेशनमुपदेश इति, अनेन दृष्टिवादोपदेशेन संज्ञीत्यभिधीयते । सो य सम्मट्ठिी सण्णी, तस्स सम्मदिद्विणो सण्णिस्स जं सुतं तं सण्णिसुतं, तेण सण्णिसुत- खयोवसमभावेण जुत्तत्तणतो दिट्ठिवातसम्णी लव्भति । अहवा दिहिवायसण्णि त्ति मिच्छत्तस्स [जे० २०७ द्वि०] मुतावरणस्स य खयोवसमेणं कतेणं सण्णिमुतस्स लंमो भवति, एवं सो दिहिवातसण्णी लव्भति, तस्स सुतं दिहि- वातसण्णिमृतमित्यर्थः । तं खयोवसमियभावत्थं समद्दिह्रि सणि पडुच्च मिच्छट्ठिी असण्णी भणितो । सो य मिच्छ- 20 त्तस्मुदयतो अस्सण्णी भवति, तस्स मुतं असण्णिसुतं । तं च मुतअण्णाणावरणखयोवसमेणं लमति, एवं दिद्विवातअ- मण्णीत्यर्थः, तस्स मुतं दिडिवातअसण्णिसुतं । एवं दिद्विवाते सण्णि-असण्णिमु सुतखयोवसमभादो(वा) सुतं घेतव्वं इति । पर आह-खयोवसमभावहित(तो) सण्णितणतो लक्खिजति खाटगभावहितो केवली किण्ण सणि ? त्ति, उच्यते- अतीतभावसरणतणतो पड्डुप्पण्णभावाण य बुझणतो अणागतभावचिंतणतो य सण्णि त्ति, तं तहा जिणे अणुसरणं णत्थि, जेण सो सबदा सव्वधा सव्वत्थ सबभावे जाणतीत्यर्थः, तम्हा केवली णोसणीणोअसण्णी भवति । 25 पुनरप्याह परः-इर मिच्छादिट्ठिणो वि केयिं हिता-ऽहितनाणवावारसण्णासंजुत्ता दीसंति किं ते असणिणो भणिता ? उच्यते-तस्स जा सण्णा सा जतो कुच्छिता, जहेह कुच्छितवयणमवयणं कुच्छितसीलमसीलं वा, तहा तस्स सण्णा कुच्छितत्तणतो असंज्ञैव दट्ठव्वा, अण्णं च तस्स मिच्छत्तपरिग्गहातो नाणमनाणमेव दट्टच्वं । भणितं च- १ सण्णि तिल दे. शु. । सण्णी लव० स० जे० ॥ २ असण्णी ल ख० स० ४० ल० शु० ॥ ३ 'हेतु- वाओवदेसेणं' आ० दा० ॥ ४ सपणी भवति आ० दा० ॥ ५ एवं तेर्सि विकलेंदियाणं सम्मुच्छिमपंचेंदियाण या हेतुवायसण्णा भणिता आ० दा० ॥ ६-७ वादोव उ० । वातोव स० ॥ ८ 'स्मययतो जे० ॥ ९ भावसुतं आ० दा० ॥ 15 .
१८ 10 [ विणवासगणिमहचरविरायाए उम्मीर सेजुरी [म०६९-७० "सदसदविसेसमावो." [निरोपा० गा० ११५] गाए । ठा। एवं पि ते मसणी। मार-एगिलियामं मोर समी खेर अतो ते मसणी घेर, वेरितो ईदियाइ नार समुच्छिमपदी ऐते मिसिद्धसरसणाए रेनुपायसप्पी ममिता, कासितोपदेस पुण पाप ते दिमसम्मी, रियाणअरिसिहतमतो, विहिवातोरदसं पुष पाप कासि कोपदेसा रि मसप्णी मरिसिद्धवगतो चेप, यसो गज्जति विहिबारसणी सम्बुचमा, उचे य उपरि ठवितो, जुष- 5 मेवे, कामियरेनुसणीणं पुण उस्मरण कमा ? उच्यते-सम्पत्य मुचे सप्णिमाण में क तं कासितोपदस- सणिस्स, अतः सर्वप्र तत्सत्यवासापनार्य मादौ कासिम मे० २०८ प्र० काम कतमित्यर्षः। रिप-सम्मि असमीण समनम्काऽमनस्का इति क्रमम दर्भितो मगति, अप रिकछेन्द्रिया अमनस्का इति मत्पमनोदव्यग्रहण सामयम्, प्रतिनिधये पुनर्मनस्वेपाम् । यस्माइसम्- कमि-कीट-पापा समनस्का मामामामा । ममनस्कार पत्रविमा पपिपीमायाइयो बीमाः ॥१॥ ] इति ॥ मणितं सष्णि-असप्पिसु ३।४। दामि सम्म-मिच्छामर्स । वेव मुर्च- ६९. [१] से कि त सम्मसुतं ? सम्मसुत जं इमं अरईतेहिं भगवतेहिं उप्पण्णणाण- दसणधरेहि तेलोकचहित महिय-पूइएहिं तीय-पंझुप्पण्ण मणागयजाणएहिं सवण्णूहि सन्व- दरिसीहिं पणीयं दुवालसंग गणिपिडग, तं जहा-आयारो ? सूयगडो २ ठाण ३ समवाओ 15 ४ विवाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ ६ उचासगदसाओ ७ अंतगडदसाओ ८ अणुचरो ववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागमुतं ११ दिद्विवाओ १२ । [२] इचेयं दुवालसंग गणिपिडगं चोइसपुब्बिस्स सम्ममुत, अमिण्णदसपुन्धिस्स सम्मसुत, तेण परं मिण्णेसु भयणा । से सम्मसुतं ५। ६९. [१] से कि ते सम्मसुसेत्यादि । 'न' इति भगिरिछस्स गाणं, 'इम' ति परसमारे । रण 10 नमसम-प्यणादि परांठीति मरता, मरिणो पा ईवा परिता । तेसिं गुपसंपदाए पिसेसम्-'भगवेरि' पम्म मस मत्य-ससी-पय-विममा पते छप्पदस्पा मगसणा, ते जेसि मस्यि वे भगतो । फेसनाम-ईसभाप मार रणरावे फरणाप-दसणा उप्पजति, ते य जुगपसप्पण्णे सम्ममणागवई मधुप्पण्णसरुवे मिराररणे सम्परम राण-पसर-विसस-सामष्णेनिसए कि मुगपपरचे गाण-ईसणपरे ते नाण-सणेरि तीपदाए सम्मरम्भाष- माये मामंति, वा परप्पणे मशागते य मामति, विकासने दम मार य पाप्पपणे काल नापतीत्यर्थ । रिसम्दो ॐ सर्वरपनेषु करणापे मारपनमतिपारका मोफ वि-सिमि सोगा सो, ते य कांउपस्तिपा, मम तमि पासिप्राणम् । भवनरासिनो ओमागनिरासी, बणपर-मोति-तिरियम मणम्मा तिरियमोफनिवासी, ऊर्व पैमानिध। १ पण तरणतातो ते असणीमा २ पोसि पुरतरसमीए हेतुपामा .मी. ५रत्यारनामा ५ वरप सम्ममुत मा पमिरिक्तित-पादित- पाय यसप्रति परिमा मममितियोप।पिम्मा मामे मोम सापार मेगन मागोवारएनम मिम्मत Remi-1]. . पण दो मु.८सीति । पदम न - , ॥ ॥ d . .५मममि विसर..
४९ . " सम्म-मिच्छसुयणाणं] सिरिदेववायगविरड्य गंदीसुत्तं । एवं मायोरत्या अहेलोइयग्रामसंभवाद् वाच्यम् । 'चहितं' ति चाहितं मेक्षिनं निरीक्षितं दृष्टमित्यनन्तरम् , त्रैलो- क्येन [जे० २०८ द्वि० ] चहिता-मनोरथदृष्टिदृष्टा, अथवा गोशीपचन्दनादिना चर्चिता। त्रैलोक्यस्य मनोहिता महिता, अथवा महिमाकरणेन महिता, सा च महिमा महाजनसमुदयेन गीत-नृत्य-नाटकाद्यनेकमेक्षणकरण- विधानः । अणलिय-मणवज्ज-सन्भूतत्थ-विसारयवयणेहिं थुना पूइया । अथवा अन्योन्यविषयप्रसिद्रा होते एकार्थ- वचना । 'पणीतं' ति तिमततिसमुपवादिमते अभूतत्यरूवे वजेऊण इमं जहत्यं दुवालसंगं पणीतं, जह णवणीतं 5 दहियातो, भूतत्येण वा जुत्तं मकरिसेण णीतं प्रणीतं । 'दुवालसंग' इत्यादि कंटें। इहंगगतं आयारादि, अणंगगतं च आवस्मगादि । एतं सव्वं दबटितणयमतेण सामिणा असंवद्धं पंचत्यि- काया इव णिचं सम्ममुत भण्णति । अहवा एतं चेत्र दुवालसंगादि सामिणा संबद्धं भयणिजं सम्ममृतं मिच्छमुतं वा उच्यते-सम्मदिटिस्स सम्ममृतं, मिच्छद्दिटिम्स मिच्छमुतं । इमं चेव मुतपरिमाणतो णियमिजति- [२] जो चोदसपुची तस्स सामाठियादि विंदुसारपज्जवसाणं सव्वं नियमा सम्ममृतं, ततो ओमत्थगप- 10 रिहाणीए जाव अभिण्णदसपुची एताण वि सामाट्यादि सव्वं सम्ममुतं सम्मगुणत्तणतो चेव भवति । मिच्छविट्ठी पुण मिच्छणुभावत्तणतो अभिन्नदसपुन्चे ण पावति, दिटुंतो जहा अभन्यो अभव्याणुभावत्तणतो ण सिज्मतीत्यर्थः । तेण परं' ति अभिण्णासपुन्वेहितो हेटा ओमत्थगपरिहाणीए नाव सामादितं ताव सब्वे मुतहाणा सामिसम्मगुण- त्तणतो सम्ममृतं भवति, ते चेव मुतढाणा सामिमिच्छगुणत्तणतो मिच्छमुतं भवति ५ ॥ इटाणि मिच्छमृन- ७०. [१] से किं तं मिच्छसुतं ? मिच्छसुतं जं इमं अण्णाणिएहि मिच्छद्दिविएहिं 15 सच्छंदवुद्धि-मतिवियप्पियं, तं जहा-भारहं रामायणं हेभीमासुरक्खं कोर्डलयं संगभदियाओ खोडमुहं कप्पासियं नौमसुहुमं कैणगसत्तरी वेइसेसियं बुद्धवयणं "वेसितं कैविलं लोगायत सद्वितंतं माढरं पुराणं वागरणं णाडगादी,अहवा बावत्तरिकलाओ चत्तारि य वेदा संगोवंगा। १ वा । कई तं चेव सम्मसुयं मिच्छमय वा ? उच्यते आ० दा० । वा । कहं ? उच्यते जे० ॥ २-३ मिच्छा- सुयं हे० ल० मो० मु० ॥ ४ इत आरभ्य चत्तारि य वेदा संगोवगापयन्त सूत्रमिद समप्रमपि अनुयोगद्वारेषु वर्तते [सू० ४१] ॥ ५ मिच्छट्ठिीहिं जे० मो० मु० विना ॥ ६ विगप्पि जे० मो० मु० ॥ ७ हंभीमासुरुस्खं ख० इ० शु० । दमोमासुरुक्तं मो० । भीमासुरुक्न जे० मु० । "मंभीयमासुरुक्खे माडर कोटिलद्दनीतिमु ।” अस्य व्यवहारमाप्यगाथार्धस्य मलयगिरिस्ता व्याख्या-'भम्भ्याम् आसुवृक्षे माटरे नीतिशास्त्रे कौटिल्यप्रणीतासु च दण्डनीतिषु ये कुशला इति गम्यते ।" [व्यवहार० भाग 3 पत्र १३२ ], अत्र प्राचीनासु व्यवहारभाष्यप्रतिपु “हंभीयमासुरफ्त" इति पाठो वर्तते । “ भाभीयमासुरक्ख मारह-रामायणादि- उबएसा । तुच्छा असाहणीया मुयअण्गाणं ति ण वेति ॥ ३०३ ॥ [ सस्कृतच्ठाया-] आभीतमासुरदं भारत-रामायणायुपदेशा । तुच्छा असाधनीया श्रुताज्ञानमिति इद ब्रुवन्ति ॥ ३०३ ॥ [भापार्थ-] चौग्शास्त्र तथा हिंसाशास्त्र, भारत, गमायण आदिके परमार्थशून्य अत एव अनादरणीय उपदेशोंको मिथ्याश्रुतज्ञान कहते हैं। [गोमटसार-जीवकाण्ड पत्र ११७] । निघण्टे निगमे पुराणे इतिहासे वेटे व्याकरणे निरुके शिक्षाया छन्दस्विन्या यज्ञवल्पे ज्योतिष साख्ये योगे क्रियाकल्पे वंशिके वैशेपिके अर्थविद्याया वार्हस्पत्ये आम्भिर्ये आसुर्ये मृगपक्षिरुते हेतुविद्यायाम्" इत्यादि [ ललितविस्तरे परि० १२ ३३ पद्यानन्तरम पत्र १०८] ॥ ८ कोडिल्लयं मो० मु० ॥ ९ सयम हे० ल० । सदम शु० । सगडम मु० । अनुयोगहारेषु सगमहियाओ सतमदियाओ इत्येते नामान्तरे अपि प्रत्यन्तरेषु दृश्येते ॥ १० घोडमुदं शु० । स० सं० प्रत्योरेतशामव नास्ति । अनुयोगद्वारेयु पुन घोडगमुहं, घोडयसुह, घोडयसह, घोड्यनुयं इति नामान्तराण्यपि प्रत्यन्तरेषु दृश्यन्ते ॥ ११ नागमुहुमं जे० मु० अनु० ॥ १२ कणगसचरी नामानन्तरं रयणावली इत्यधिक नाम शु० ॥ १३ वतिसें शु० ॥ १४ तेसियं स्व० सं० जे० डे० मो० । तेरासि मु० ॥ १५ काविलिय हे. ल. मो०।मु० । काविलं अनु० ॥ १६ णागायतं स० ॥ १७ पोराणं हे० ॥ १८ वागरण इति नामानन्तर भागवतं पायंजली पुस्सदेवयं लेहं गणियं इत्यधिक पाठः जे० हे. मु०, नाय पाठोऽनुयोगद्वारेप्वपि ॥ - - चु०७ HP- ५० १ " " बिगदासगणिमहाचरक्सिमाए पुण्णीए संजुम मि०७१-०२ [२] इंचताई सम्महिहिस्स सम्मतपरिग्गहियाई सम्मसुर्य । इयाइ मिदिहिस्स मिच्छत्तपरिग्गहियाइ मिन्छेसुतं । [३] अहवा मिच्छहिहिस्स वि ऐयाइ चेव सम्मसुयं, कम्हा सम्मत्तहेउवणओ, जम्हा ते मिच्छदिद्विणो तेहिं थेव संमएहिं चोइया समाणा के सपरखदिट्ठीमो मेंति । से मिच्छेमुयं ६। ७. [१] से कितं मिासुत इत्यादि । मणाणं इतेवि० २०९प्र०] माणागिवेहि। अमाप-मबापो विरीयत्पयोपोगा प रतो-अगसेत्पर्यः । मियादिहि वेरि मियादिहिते, मिष्य पि-अनृत, दिहि पि दरिसणे, मिच्छादिछिणा मशगरि ति मणि मरति । स-त्यास्मनिषा, भन्दा ममिमाया, केन्यमतस्पेन या मत्वस्स नो मोरोस पुदि:-मग्रामाश्म् , उत्तरम ईरादिविकप्पा सम्मे मती । भागा नावावरमलयोक्सममा 10.पुदी, सो घेर नदा ममोदष्पणुसारतो पपचा सदा मती मध्यति । एस आत्मामिमायादि-मतिमिर पपूर्व मिविपासनाविकसितमिति रषित, तब मारमावि नाप पारि य वेदा संगोलगा, समेते सोगसिया, सोपतो वेवेसि सरूप माणित । एस सम्म मिपामापटि ति कार्ड मिळमुलं माणितष्यं । एतम्मि सम्म-मिमामत पिकप्पे परो विकप्पा माणितमा इमेक विधिया- [२] सम्ममवं सम्मविहिमो सम्ममस पेर.१, सम्मम मिशविहिमो मिपमुव २, मिसत सम्मदिहिना 15 सम्ममुर्त ३, मिच्छमतं मिणपिहिमो मिन्सुखं घेर ४ । 'वतार सम्मरिहिस्स सम्मचपरिमादिताई सम्ममत' एत्प मुन परम-सामविकप्पा दम्पा । 'याई ति सम्म मिमामवाई, मागा मिग्मताई थे। सेस । 'मिणदिहिस्स' इवादिमुत्ते विसिय मतुस्परिकपा एम्पा । सत्य परमविकप्पे सम्ममुर्त सम्मचगुणेप सम्म परिपामयतो सम्ममुलं घेर मरति १ मितियषिकप्पे विमा संरसंमुख सीर पिचमरोश्यतो प सम्म भरावा मिच्छतुदयतो सम्ममुवे मिष्यामिपिसतो मिसुर्व माति २ ततिपविरुप्पे तिफसादिमपि पि उपउच उपका 10 रफारिचनतो सम्म भरति ता मिण्यते मिरमामोसमावो सम्ममवे स्तरमामुपायकरमचमतो है से सम्ममुर्व भरति ३ परिमविकप्पे मिपमतं, तपेर मिणमिणिवेसतो मिसर्व क्षेत्र मरति । [] तस्स पा मिरिद्विषो त म मिच्छमस सम्ममुरा मरति । फमा मणति ! उध्यवे-परिणाम विसेसतो, ममा वे मिच्छदिदिगो वरि० २ ९ ६०] पेर' पुमारसिम्टेरि मिम्मतमगिरि चोरिता' ममिता 'समामा' इति सत', बोदणाणवरं यात्मकासाबस्पायां सन्त इत्यर्थः । पुमनं सासण परिरणो से - सपरयो, पम्मि मा विही है 'बर्मेति' परिवति, पति चि पुच भपति । नमा पर तमा त पुम्ममियम सम्ममत से मपति । पर भार-पचापगमसमावसामण्णे सम्मच-मताम को पतिविसेसो जेण मष्यति 'सम्मत- परिमारिवाई सम्ममद ! उत्पते-नए जाण-दसणार्म भरपोपसामग्णे मेदो ता सम्म पता पि मनिस्सति । १ पयाणि पेष सम्म मु नपक्षिषु । तिजोरमदेव पाम तम्मतेप्रीत । २ पण मिष्यति सति । परियमेर एवम सम्म १ 'पिरिमिस मो 8 । मपि मामा-पिप्पारिपत्य व सादिषु पस्योरपि मम्मावान यतते ।५ पपाई पेत. नास्ति । भौहरिमानाचारी मारपरं पास पारि महिमा । ससमयपति मो । भामापपिरिसार खासगरेपण बामसम्मतिमिप्यासुप ११ मध्यापस्पापासमा ५ वस्सेस पस्यो।५ पप्मारा। ॥ १.पाप पातत्येण हा मापस्सन 5 सादि-सपज्जवसियादिसुयणाणं] सिरिदेववायगविरइयं णंदीसुत्त । ५१ कई ? उच्यते-जहा विसेसाणं वोधमवात-धारणे नाणं, अवग्रहेहाबोधे च दंसणं तहा इमं । तत्ते जा रुती तं सम्मत्तं, तत्थेव जं रोचकं तं मुतं । एवं मिच्छत्तपरिग्गहे वि वत्तव्वं ६ ॥ इदाणि सादि-सपज्जवसाणे- ७१. से किं तं सादीयं सपज्जवसियं ? अणादीयं अपज्जवसियं च ? इच्चेयं दुवालसंगं गणिपिडगं विउच्छित्तिणयट्ठयाए सादीयं सपज्जवसियं, अविउच्छित्तिणयट्ठयाए अणादीयं अपज्जवसियं। ७१. से किं तं सादीयं इत्यादि । इह पज्जातट्टितो वोच्छित्तिणतो, तस्स मतेणं दुवालसंग पि सादि सपज्जवसाणं । कहं ? जहा णरगादिभवमवेक्खातो जीवो व्य । दबहितो पुण अवोच्छित्तिणतो, तस्स मयेणं दुवा- लसंग पि 'अणादि अपज्जवसाणं च' त्रिकालवत्थायी, जहा पंचत्थिकाय च ॥ एसेवऽत्यो दयादिचतुकं पडुच्च चिंतिज्जति । तत्थ- ७२. तं समासओ चउब्विहं पण्णत्तं, तं जहा-दव्वओ खेत्तओ कालओ भावओ | 10 तत्य दव्वओणं सम्मसुयं एगं पुरिसं पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, वहवे पुरिसे पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं १ । खेत्तओ णं पंच भरहाई पंच एखयाई पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, पंच महाविदेहाई पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं २। कालओ णं ओसप्पिणि उस्सप्पिणि च पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, णोउस्सप्पिणिं णोओसप्पिणिं च पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं ३। भावओ णं जे जया जिणपण्णता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति 15 दंसिज्जंति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जंति ते" तहा पडुच्च सादीयं सपज्जवसियं, खाओवस- मियं पुण भावं पडुच्च अणादीयं अपज्जवसियं ४ । ७२. दबतो सम्ममृतं एगपुरिसे सादि जं पढमताए पढतिः सपज्जवसाणं देवलोगगमणातो, गेलण्णतो वा णद्वे, पमादेण वा, केवलणाणुप्पत्तितो वा, मिच्छादंसणगमणतो वा सपज्जवसाणं, अहवा एगपुरिसस्सेव सादिसपज्जवसाणतणतो। दवतो चेव वहवे पुरिसे पडुच्च अणादि अपज्जवसाणं, अण्णोण्णहितसंताणाविच्छेयत्तणतो, 20 मणुयत्तणं व जहा । खेत्ततो भरहेरवएमु तित्थगर-धम्म-संघातियाण उप्पाद-बोच्छेदत्तणतो सादि सपज्जवसाणं, महाविदेहेस अवुच्छेदत्तणतो [अणादि अपज्जवसाणं]। कालतो ओसप्पिणीए [जे० २१० प्र०] तिसु, उस्स- प्पिणीए दोमु साद्यंतं, णोओसप्पिणिणोउस्सप्पिणिततियं महाविदेहकालपलिभागं पडुच्च तिमु वि कालेमु अव- द्वितत्तणतो अणादि अपज्जवसाणं । इदाणि भावतः-'जे' इति अणिविट्ठस्स णिदेसो । 'जदा' इति काले पुव्वण्हे अवरण्हे वा, दिया रातो वा पुचि जिणेहिं पण्णत्ता भावा, पच्छा त एव गौतमादिभिः 'आघविजंती'त्यादि, 25 १ साणं अवोधिवातकरणे णाण आ० मो० ॥ २ इच्चेइयं मो० मु० ॥ ३ वुच्छि मो० मु० ॥ ४ अवुछि मो. मु० ॥ ५ तत्थ इति पद ख० स० दे० ल• शु० नास्ति ॥ ६ एराव स० शु० ॥ ७ पच विदेहाई ल० ॥ ८ णं उस्सप्पिणि ओसप्पिणि च जे० मो० मु० । नाय पाठश्चूर्णिवृत्तिकृतां सम्मत ॥ ९ णोओसप्पिणि णोउस्तप्पिणिं च ल० । हारि०वृत्ती एतदनुसारेणैव व्याख्यातमस्ति ॥ १० ते तया भावे पहुच्च जे० डे० मो० । ते भावे पहुच्च ल० । चूर्णिकृता ते तदा पडुच्च इति पाठान्तरनिर्देशेन सह ते तहा पहुच्च इति पाठ आदृतोऽस्ति । वृत्तिकृया पुन ते तया पहुच्च इत्येव पाठोऽङ्गीकृतोऽस्ति ॥ .
10 ५२ विणदासगणिमइपरपिछयाए चुनर संजुम [मु०७३-७४ 'आपपिचति' माल्यापन्ते सामणतो [रिसेसवो] विमेससामगतो पा, पणरिजति भेदामेदेखि, वेसि मेदम- मदाणे सस्यमनखार्म परमणा, देसिजति उवमामेष मा गो सा गपय इति, पिसणं हेतु-रिवेषि, उपसमा उरणयोपसबारे सपणएरिया। बावा एगहिसा एते। '' इति पग्णयमिजाम गिरसो । 'वा' इति पप्पा पणपणिज्जे या पाप सादि सपजससाणे मनति । तस्य पप्णमग पप उपयोगती सरमिसेसतो पयत्यो भासन बिसेसतो य सादि सपजपसामं । पम्मरणिग्मे पाय गतीतो ठाणतो दुपदेसादिमेदतो तदेगपदेसादिमगारतो एगसमपाविमस्याणतोष्णादिपम य मासम्म सादि सपजससाणं । पारस या "सदा पापा 'या' इति फाल मनापपर्यपसितम् । मानता भूतान सायोपचमिके मावे निस्पं मर्तते सामिलममन्ध इति । ७३ अहवा भवसिद्धीयस्स सुयं साईयं सपज्जवसियं, अभवसिद्धीयस्स सुर्य अणा दीयं अपज्जवसिय। ७३ महवा सादि सपनवसाग सपरिपरस्पर मंगचतुझे परममंगे सम्मसहिसमुतमापो बितेयमो, भणेगरि पा स्योपसममाय पान दमादिउपयोग मा पार पाममगो ममति । मितियमंगो मुमो, माया मममाण ममागदसमागेम मुखमाको माणितष्यो। परिम-सतियमंगेस अविसिहसतमानो ममम्म-मणे पाप नोएसम्बो। अभवसिदीयस्स इस्पादि प्रतसिद्धं । परिम-उतियमंगेस प्रमादिसतमारो विहो मुताभि कारखो, इमरा मतिमावो सिदाम्पो, मति-सवाण मण्णोग्णागसपणतो। सो प पनादियाममानो माप्पो 15 ममाणावे० २१ २० मणुकोसो पावेज, उमोसो म माति, कमा! ममा उकोसनापमापो केनसियो मनति ।। वस्स य सचे इम पमाण परिणति- ७४ सब्वागासपदेसग्ग सव्वागासपदेसेहिं अणंतगुणिय पज्जवेग्गस्वरं गिफज्जा । ७४ सम्पागासपदेस इत्यादि सर्व । सवमिति-अपरिसेप्ससम्पमा मपिकियेप मपति, सन माकास सम्बाकास, सम्पागासस्स पदेसा सम्यागासपदेसा, में पठेसि मम्म-म परिमा ठिपुर्ण माति, एत समागासप्प- 20 देसरासिया माणवेण रासिमा भाणेण एपित सारे रासिपमा सम्मति सम्पपक्षपाण धर्मा मरति । पञ्चाया गाम-एकस्साऽप्रशासपदेसस्स मातो मासासादी पम्नमा ते पल्माए समे सपिरिता, वेसि सपिरिवाण में ममा पतप्पमाणे मालरं सम्मदि। [भपसरपरल] समाखरं वि दुमिर-पाण अकाराविवनमुतपसर । सत्य नाणमक्सरं वि मषिसेसतो सम्मनापमक्सर, ममा त जीवाती उप्पण्य मणष्णमावचषवो मो पसरति ति, घर पुग सम्मपज्जायनुलचमको फररमाण घेषम्पं, ममा केपर्स सम्बामपन्जायविष्णपिसमय मति । हेप केस णेपे परय, वस्स वि परिमाणं इमर्ग पेर विपिणा माणितम--'सम्यागासपदेसमा इत्यादि पूर्वमत् । ते य सम्पदमपनापा समासको तीस इमण विपिमा-गुरु मह यस्ता भासह पते परी, पंच पप्पा, रोगपा, पंप रसा, मढ फासा, भगिरपस्य सटामसरिता सटापा, एवे सचरण सप्प समति । भमुचदाणेसु भगुरुका पेप एको पमापो समना । १ "मामित विप्रोता मासासम्दे, मारनामा सात इस वि दारिनबिरतो । “अपरिमल' ति माहवार पाम्पारम्टे, सामानहरमा विशेषस्मतमा पाप्प - वि मम्यम्मदिरोमापि प t साई सप , पम मो ममावती ११० मालपामेरामार वाम्मू-चियो सम्मका " ( ५३ सिरिदेववायगविरहय णदीसुत्तं । पज्जवग्गक्खर अक्खरपडलं च ] एत्य य एकेके भेदे अणंता भेदा संभवंति । किंच मुत्तदव्वेमु णतविसेसतो अणियोगधरा अट्ठावीसं मूलपजाए भणंति । कहं ? उच्यते-ते चेव तीसं सव्वगुरु-लहुपज्जाएहि विहूणा । जतो भणितं- निच्छयतो सबगुरुं सबलहुं वा ण विजते दव्यं । ववहारतो तु जुज्जति वादरखंधेसु णण्णेसु ॥१॥ [कल्पमा गा. ६५ ] णिच्छयणयमतेण सवधा गुरुं लहुं वा नत्थि दव्वं । जदि हवेज तो तस्स पडमाणस्स ण विरोधो केणइ 5 हवेज्ज, सव्वलहुस्स वा उप्पयमाणस्स, जतो य णिचपडणं उप्पयणं वा ण विज्जति तम्हा [जे० २११ प्र०] सवधा गुरुं लहुं वा दव्वं नत्थि । ववहारणयादेसेणं पुण दो वि अत्थि, जहा-सव्वगुरु कोडिसिला वजं वा, सबलहुं च धुम-उलुगपत्तादी। एवं ववहारणयादेसतो वादरपरिणामपरिणतेस खंधेस गुरुभावो लहुभावो य भवति । 'णऽण्णेमु' ति ण मुहुमपरिणामेमु त्ति वुत्तं भवति ।। के पुण मुहुमपरिणता दया ? के वा वादरपरिणता ? उच्यते-परमाणतो आरद्धं एगुत्तरवड्ढितेसु ठाणेसु 10 जाव मुहुमो अणंतपदेसिओ खंधो, एतेन ठाणेम मुहमपरिणता दवा लभंति, एतेसिं च अगरुलहुपज्जाया भवंति । वादरो पुण परमाणतो आरभ जाव असंखेजपदेसितो खंधो ताव ण लब्भति, परतो वादरपरिणामो खंधो लब्भति, सो य जहण्णो वि अणंतपदेसिओ नियमा भवति, तातो एगुत्तरवढिया अणंता अणंतहाणावडिया वादरा खंधा । ते य ओराल-विउव्वा-ऽऽहार-तेयवग्गणाम भवंति, णियमा य ते गुरुलहुपेज्जाई भवंति । सीसो पुच्छति-जे रूविगुरुलहू दवा अगुरुलहू य तेसिं के थोवा बहू वा ? उच्यते-थोवाणि गुरुलहुदवाणि, तेहितो 15 रूबीअगरुलहुयदव्या अणंतगुणा । कहं पुण ते अणंतगुणा भवंति ? उच्यते-धूराणं अणंतपदेसिताणं खंधाणं सट्टाणे अणंतातो वग्गणातो, सुहुमाणं पि अणंतातो वग्गणातो, धूरवग्गणठाणेहितो उवरिं भासादिवग्गणहाणेनु एक्कक्के अणंतातो वग्गणातो, हेटतो वि थूरवग्गणहाणाणं परमाणूणं एका वग्गणा, एवं जाव दसपदेसियाणं संखेजपदे- सियाणं संखेजातो वग्गणातो, असंखेजपदेसिताणं असंखेज्जाओ वग्गणाओ, एतेणं कारणेणं गुरुलहुदव्वेहितो रूवीअगरुलहुदवाणि अणतगुणाणि भवंति । आदेसंतरेण वा वाटरठाणेस वि मुहुमपरिणामो अविरुद्धो ति 20 भाणितव्यो । उक्तं च--- गुरुलहुदव्वेहितो अगरुलहूपज्जया अणंतगुणा । उभयपडिसेहिता पुण अणंतकप्पा [जे० २११ द्वि०] वहुविकप्पा ॥२॥ [कल्पमा गा ६७] गुरुलहुपज्जायजुत्ता जे दव्वा तेसिं चेव जे गुरुलहुपज्जाया तेहिंतो रूविअगरुलहुयदवाण जे हुयपज्जाया ते आधारअणंतगुणत्तणतो अणंतगुणा एव भवंतीत्यर्थः । 'उभयपडिसेधिता णाम' अगरुयलहुया । 25 'पुण' विसेसणे। किं विसेसेति ? उच्यते-अरूविदव्वाधारा इत्यर्थः। अहवा 'उभयपडिसेधिता णाम' वादर- सुहुमभाववज्जिता जे दव्या, अरूविण इत्यर्थः। तेसु 'अणंतकप्पा गाम' अणंतप्रकारा । कई ? उच्यते-आकासत्थि- काए देस-पदेसपरिकप्पणाए, एवं धम्मादिसु वि । 'बहुविकप्प' ति तेर्सि अणंतकप्पाणं एकेको अणंतप्रकारो। कहं पुण ? उच्यते-जम्हा एक्कक्के आगासप्पदेसे अणंता अगरुलहुयपज्जाया भवंति तम्हा ते बहुविकप्प त्ति । ते य सवण्णुवयणतो सद्ध्या इति ॥ १ पजाया भवंति आ. दा० ॥ २ अस्या गाथाया एतदुत्तरार्द्धमेव कल्पमाष्ये वर्तते ॥ ३ अविरुविण जे० । अवरूविण दा० ॥ ४ णाम' एफेका यणत आ० दा० ॥' " अगरुल- 30 ५१ 5 15 शिगदासगणिमातिरहसाए पुण्णीय सेनुर [मु. ४५ सरि अविदम्याम य पम्नापभप्पा इम मणति-रुपिदमार्ग के य अगरमापमाया ते पमादेष पिरिता, परितो पफम्स घेर चदम्बस्स जे गरुपमहुपजाया ते अपंतगुणा मातीस्पर्थ । एत्व सीसो मणति-कातिवनि पुम भागी मसदनाम पिरितपचापरितो यमुनाप मारुमपनाया ममतगुणा मति । उप्यते-नाम्त्पत्र परिमार्ण, बहुपा पि मानतएपं गणिनमाणे मापदम्मपनाएम मत्पि परिमाण ।। एरंगते परिमाणाप इम मम्मति-- पण एवेज निरोपो मगरससम्बयाण तु असते! मतमसजोगो नहित पुप सम्मिन्सस्स ॥ ३ ॥ [रुपमा गा ६९] जतो अमुचदम्बाण बहुरा रि मणवएम राणिममाणे पेमायण प मपति । ततो 'केनेति' कनान्पेन प्रकारेण 'मन' चि मव 'णिरोहा माम' परिमाण १ परिणेदस्पर्य , कि मुत्तवपरितो अमुचनमाण मापस- 10 हुपनायपरिमाण मस्सिति ! चिनेत्पश्यते, 'अपवमसंमोगा' 'मत' महीर अयुधमाणो जमा समोगो। [२० २१२ प्र० ] 'महिर्य' ति यत्र । 'पुण' पिससणे। किं बिससपति ? सविनये । सदित्यनेन समुपदमपश्तो, तस्स विमनसो-मुचदम्पपगारा, तेस पञ्चायोपतपतो अमुकदासमु य पनायाण मतीरबहुपचमतो, मवा मुक- इन्वेस्सिा समुचदम्पपजायाण परिमाणकरणसंमोगो एरोटेणेन प सुजवेप पातेस्पर्म ।। पर्व तु माणसेहि मास्टट्रपज सजु । पोति मगच दम्प माविकायाम हुपतु ॥४॥ [कप्पमा गा ७०] 'पसमिति' यपदमुकं । सस बैठ । परि 'मविकाताण पनुप' वि पम्मा ऽपम्मा-गास जीवान ति एतेसिं पण वि नियमा पञ्यं भर्णता मगरुपयायपम्नाया मति । उच्यते-ममा एतेसि एकेको पवेसो भणरि मारपपपपना संगचा समा पम्मा-अम्मेगनीबस्स य असखेमपटेसचममा मसलेनमर्णता पत्ते भति । बागासपदसपपरिमामचमतो पण तस्स नस्थि परिमाणं, वरानि समनपरतो भपता उक्ता इत्पर्पः ।। एवं ताप यमनतसक्तम् । यपेदानीं तद फेमसान पयानन्तं तमयमुच्यते- उरपदी० गारा । कम्पमा गा ७१ सय रूविदम्बा ऽसविषयाम य नापतिया गुस्सपश्चाता सम्मे माचिदम्याप पजे मालपनाया एते सम्बे जुग जापति पासति य मतो, एपमपत झरनाममक्सर ति समसगममिरितम् । इवाणि 'मकारारिदममतमरखर ति मति अविसेसतो पाणमकम्मरसत यं पा सा मि सरवसवो ना पंकटं तदा सरपखरं पंसमक्सरं मम्मरसर मा मम्मति । वस्य 'सरस्सर' भरतरं मासर सरवि-गति सरति पा इस्पतो सररसरं मफारादि, मणम्समा रममिपाणं सरति, ण पासरस्सरमंतरेण भत्यो समरिमा चि सरपसर। फकारादि समषक्सरा, मापते तनार्य इति पर्यापन पयदिन मेमनातरम् । तरि पेन सर-संमपरसरे िमदा मत्पी पग्मिमति भमिम्मप्यते पा पदा सणवानर मणति। एफेफस्स महारादिकातिमसरस्स स-परप- नाममदा इम-मकारस्स प पनामा करा दीप प्रवासपा, वत्प दोहो- २१२६ ] उपाचा ऽनुशास- 30 रिमिता, पर्ष इम्म पठारपि, पुनरप्पकको सानुनासिका निरनुनासिरूम, इस्पद अशावधमद । पर सेसक्लाग पिनासमर्म मा भारितना। भासा सरपिसेसठो परेममसरस्स मगंवा सपनपा । एस्प मकारस्स १ पग्माया 0२ मपुममाप्पो मा सिमेवरा 10 सरपरस्समा स U - ५५ 5 ? सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्त । अक्खरपडल] अकारजातीसामण्णतो सपज्जाया अट्ठारस, सेसा परपज्जाया, एवं संखेज्जा पज्जाया । अहवा अकारादिसरा कका- रादिवंजणा केवला अण्णसहिता वा जं अभिलावं लमे स तस्स सपजायो, सेसा तस्स परपज्जाया, ते. य सन्वे वि अणंता । जतो मुते भणितं-"अणंता गमा अणंता पज्जया" । [सू० ८५ त ९४ आदि] भणितं च- पण्णवणिज्जा० गाहा [कल्पमा गा. ९६४] । अक्खरलंभेण० गाहा [विशेषा. गा १४३] । अणभिलप्पाण अभिलप्पा अणंतभागो, तेसि पि अणंतभागो मुतनिवद्धो इति । अहवा अकारादिअक्खराण पज्जाया सबदव्य- पज्जायरासिप्पमाणमेत्ता भवंति । कहं ? उच्यते-जे अभिलावतो संजुत्ता-ऽसंजुत्तेहिं अक्खरेहिं उदत्ता-ऽणुदत्तेहि य सरेहिं जावतिए अभिलावे अभिलप्पे य लभति ते सव्वे तस्स सपज्जया, सेसा सव्वे तस्सेव परपज्जया। आकास मोत्तुं सन्चस्स सपज्जएहितो परपज्जया अणंतगुणा । आकासस्स सपज्जएहिंतो परपज्जया अणंतभागे । पर आह-कहं तस्सेव परपज्जया य? णणु विरुद्धं, उच्यते-सव्वक्खराण घडाइवत्थुणो वा दुविहा पज्जया चिंतिजंति- संबद्धा असंवद्धा य । तत्थ अकारस्स अकारपज्जया अकारभावत्तणतो अत्थित्तेण संवद्धा, घडागारावस्थायां 10 घटपर्यायवत् ; ते चेव णत्थित्तेणं असंबद्धा, नत्थित्तस्स अभावत्तगतो, जहा घटाकारावस्थायां मृत्पर्यायवत् । अकारे इकारादिपर्याया णत्थित्तेण संवद्धा, अकारे णत्थित्तभावत्तणतो, जहा मृदवस्थायां पिंडाकारपर्यायवतः ते चेव अत्थित्तेण असंवद्धा, अस्थित्तअभावत्तणतो, घटाद्यवस्थायां पटपर्यायवत् । एवं अक्खरेसु घडाइपज्जाया वि चिंतणिज्जा, घडादिसु य अका(? क्ख)रपज्जाया, इच्चेवं एक्केकमक्खरं सबपज्जोयमं ॥ [जे० २१३ प्र०] एवं सर्वात्मकाः सर्वपर्यायाः, अतो भण्णति-सबागासपदेसग्गं अणंतगुणितं पजवग्गं अक्खरं निष्फज्जति ।। 15 एवं नाणक्खरं अकारादिअक्खरं णेयअक्खरं च तिणि वि अणंताऽभिहिता । एत्य नाणक्खरं जं तं नीवस्स संसारत्थस्स ण कताइ ण भवति त्ति । जतो भणितं - ७५. सव्वजीवाणं पि य णं अक्खरस्स अणंतभागो णिचुग्घाडियओ, जति पुण सो वि आवरिज्जा तेण जीवो अजीवत्तं पावेज्जा। सुट्ठ वि मेहसमुदए होति पभा चंद-सूराणं । से तं सौदीयं सपज्जवसियं । से तं अणादीतं अपज्जवसितं ७।८।९।१०। ७५. सव्वजीवाणं पि य णं इत्यादि मुत्तं । सधजीवग्गहणे वि सति 'अवि' पदत्थसंभावणे, किं संभाव- यति ? इम-सिद्धे मोत्तुं, चसदतो य भवत्थकेवली मोत्तुं । 'ण'कारो वाक्यालंकारे । अक्खरं ति-नाणं, तस्स अणं- १ रेसु णत्थित्तभावत्तणतो घडाइपज्जाया आ० दा० । रेसु घडेसु घड इव पज्जाया मो० ॥ २ जायमयं । एवं आ० दा० । ज्जायमयं । एवं सर्वत्रका. सर्व मो० ॥ ३ द्वादशारनयचक्रवृत्ती इद सूत्रमित्य वर्तते-सव्वजीवाणं पिय णं अक्खरस्स अणंततमो भागो णिच्चुग्धाडितो। तं पि जदि आवरिजिज तेण जीवा अजीवत पावे । सुछ वि मेहसमुदये होइ पभा चंद-सुराणं ॥१॥ अत्रैव च नयचक्रप्रत्यन्तरे अणंतभागो इति जीवो अजीवतं इति च पाठमेदोऽप्युपलभ्यते ॥ ४ 'डिमो सं० चूर्णि च विना ॥ ५ अत्र चूर्णिकृता चूर्णा जति पुण सो वि परिजेज इत्यादि गाथैवोग्लिखिताऽस्ति, नयचक्रोद्धरणेऽपि पाठमेदेन गार्थव दृश्यते, अस्मत्स्वीकृतसूत्रप्रतिषु ये विविधा पाठमेदा वर्तन्ते, यच पाठस्य स्वरूपमीक्ष्यते, एतत्सर्वविचारणेन सम्भाव्यते यदत्र सूत्रे, गायैव भ्रष्टता प्राप्ताऽस्ति । यत्तिकृतोराचार्ययो पुनरत्र किं गद्य गाथा वा मान्याऽस्ति? इति न सम्यगवगम्यते, तथापि वृत्तिस्त्ररूपावलोकनेन गाव तेषा सम्मतेति सम्भाव्यते ॥ ६ सो वि घरिज्जेज्जा सं० शु० । सो वाऽऽवरिज्जेज खे० ॥ ७ तेण जे० मो० मु० ॥ ८ अजीवतं ल. ॥ ९ पावेज स. ॥ १० सादि सप स० शु० । सादि सप खं० ॥ 20 1 ५५ विणवासगनिमाचरचिरश्माए पुष्णाए संजुम [१० ७६-८१ तमागो निपुग्पारियतो, सो फेरस न समपति, फेरपम्स अधिमागसपुष्णपणतो या भोपीए वि ण समवति, ममतमागस्स ममामचमतो, अवधेः मसस्पयमकतिसमवादित्यर्म'; ममपजपनाणे नि रिजु-विपुलदुमेन्समनतो ममसमागो ण माति, किंब माफ्-िमणपजराम मिबुग्घारममारचवतो इस ममधिकारो परिसिढे मतिरावे ति आसरस्स अणतमागो निपुग्धारिययो' भपिकतमुतस्म या मास्तरम्स अगतमागो निशुम्पारियो । मत्य 5 सर्व सस्य मतिमाण पि घेक्षम । 'मि' ति सबकास । 'उम्पारिसता' चि पापरिवति । सो य मणवभागो पुस्पादिएगिवियान वि पथम निमुग्पाहा, मावा सम्पमामो भणयमागो निधुम्पाटो पुरपिकाइए, चैतन्पमा मास्मनः । तं च उपोसपीणिदिसहितनाम-देसमानरमोदए नि गो आपरिजति । मति पण सो नि परिग्जेन वेण मीरो ममीरय पाये। म वि महसमुदए होति परा पर-सराण ॥१॥ [फल्पमाष्ये गा ७० 10 नमा सो मावरिजति समा जीवो जीरचे ग परिचयति । सो य कमा मारिम्मति उपवेदन समावसस्वचणवो। र दिता नारा मह नि मेदिए ममे कर-सरप्पा मापसे मां दव्य मोमासति, मरा भणतेरिमाण-सणाररमकम्मपुमारि एपेको भातप्पदेसो भावेटियपरिवेरितो ते कम्मापरमपरछे मे नाणस्स भगतमागो उम्मरति, [५० २१३ 2 ] तो य से अब नाणमस्तरं सम्बमरण मपति । सवो पुरविकार- तेरितो बाउकातियाप पणतमागेम विमुदतर नाणमनसर, पमं कमेयं तेउभाउमणस्सति मेदिय-तेईदिय-पदार- 18 दिय-मसणिपंचेदिय-सजिपंचेंदियाम य पिसवतर भवतीत्यर्थः। ७।८।९।१०॥ मनितं सादि सपनरसिर्व अमादि सपनपसितं प । पत्पेर प्रसगता ममसरपास मणित । एम पहुवचन मास्तरपरस समासतोऽमिरितं । वित्यरतो से मस्पं निण-पोरसम्मिया काए ॥ १ ॥ [॥मपम्बर परसे सम्म ॥] इवाणि गमिपाआमिर्य- ७६ से कि तं गमियं ? गमियं दिहिवाओ । अगमिय कालित सुय । से से गमिय। से तं अगमियं । । १२ । ७२ गमबहुपक्षणतो गमिय । सस्स सक्लम-मादि-मम्म ससाणे या फिनिविसेसनु मुचे दुगादिस- तमासा घमर परिजमाण गमिये मप्पति, त प पषिप्सस्सप्ण विहिमावा । मगोणपस्परामिपासहित परिम्नति त भगमिर्प, संप मापसो मापारादि फासिपमुस ११ । १२॥ उर्फ गमिया आमियं । सामि भगाणग-पविद्ध-संप गमिया मिर्य धेष समासदो मंगा-मेगपविह मन्गति । कीउपते--सम्ममुतस्म सम्मागतसमता । ७७ अहवा त ममासओ दुविई पण्णसं, त जहा-अंगपवि? अंगवाहिरे च । ७७ भादया अरिवमम्गारदिवाणुसारि मत मतं ममामतो दुवि इस्पादि गर्न । ..पाप मा ५भर्ममपतिपय जापापविन मारित्व। ग गमियाऽगमियंगवाहिरुक्कालियाइसुयणाण ] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्त । पायदुगं जंघोरू गातदुगद्धं तु दो य वाहूयो । गीवा सिरं च पुरिसो वारसअंगो सुतविसिहो ॥१॥ इञ्चेतस्स मुतपुरिसस्स जं सुतं अंगभावभागट्टितं तं अंगपविटं भण्णति । जं पुण एतस्सेव मुतपुरिससस वडरे- गद्वितं तं अंगवाहिरं ति भण्णति । अहवा- गणहरकतमगगतं जं कत थेरेहिं वाहिरं तं च । णियतं वंगपविढं अणियत सुत वाहिरं भणितं ॥१॥ 5 . 10 - 15 ७८. से किं तं अंगबाहिरं ? अगंबाहिरं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-आवस्सगं च आव- स्सगवइरित्तं च । ७९, से कि तं आवस्सगं ? आवस्सगं छव्विहं पण्णत्तं, तं जहा-सामायियं १ चउ- वीसत्यओ २ वंदैणयं ३ पडिकमणं ४ काउस्सग्गो ५ पञ्चक्खाणं ६ । सेतं आवस्सयं । ७८-७९. से किं तं अंगवाहिरमित्यादि । कंठं ॥ ८०. से किं तं आवस्सयवइरित्तं ? आवस्सयवइरित्तं दुविहं पण्णत्तं, तं जहा-कालियं च उकालियं च। ८०. आवस्सगवतिरित्तं दुविहं र कालियं उक्कालियं च । तत्य 'कालियं' जं दिण-रातीणं पढम- चरिमपोरिसीस पढिज्जति । जं पुण कालवेलवजं पढिजति तं उकालियं ॥ तत्थ- ८१. से कि तं उकालियं ? उकालियं अणेगविहं पण्णतं, तं जहा-दसवेयालियं १ कप्पियाकप्पियं २ चुल्लकप्पसुतं ३ महाकप्पसुतं ४ ओवाइयं ५ रायपसेणियं ६ जीवाभिगमो ७ पण्णवणा ८ महापण्णवणा ९ पमायप्पमादं १० नंदी ११ अणुओगदाराई १२ देविदत्थओ १३ तंदुलवेयालियं १४ चंदावेज्झयं १५ सूरपण्णती १६ पोरिसिमंडलं १७ मंडलप्पवेसो १८ विज्जाचरणविणिच्छओ १९ गणिविज्जा २० झाणविभत्ती २१ मरणविभत्ती २२ आयवि- 20 सोही २३ वीयरायसुतं २४ संलेहणासुतं २५ विहारकप्पो २६ चरणविही २७ आउरपञ्चखाणं २८ महापञ्चक्खाणं २९ । से तं उकालियं । ८१. उक्कालियं अणेगविहं दसवेयालियादि । कप्पमकप्पं च जत्थ सुते वणिजति तं कप्पियाकप्पियं २। कप्पं जत्थ सुते वणितं तं कप्पसुतं, अणेगविहचरणकप्पणाकप्पयं [जे० २१४ प्र०] च कप्पसुतं । तं दुविहं-चुलं महंतं च । चुल्लं ति-लहुतरं अवित्थरत्यं अप्पगंय च चुल्लकप्पसुतं ३। महत्थं महागंयं च महा- 25 १-२ अणंगपविढं स्व. सं हे० ल० शु० ॥ ३ वंदणं ख० स० हे० ल० शु० ॥ ४ काओसग्गो खं० ॥ ५ "ओवाइय'ति प्राकृतत्वाद वर्णलोपे औपपातिकम्" इति पाक्षिकसूत्रवृत्तौ । उववाइयं शु० मु० ॥ ६ रायपसेणीयं ख० । रायपसेणइय डे. ल. शु० ॥ ७ 'क्खाण २९ पवमाइ । से तं जे• मो० मु० । पवमाइ इति सूत्रपद चूर्णि-वृत्तिद्भिर्नास्ति व्याख्यातम् । अपि च जेसू. प्रतौ अनार्थे "टीकायामिद न दृश्यते” इति टिप्पनकमपि वर्तते ॥
मिणासगणिमहपरनिरापाए पुग्णीर संजुरी [मु.८२ कप्पसृत ४ । एमेव [पण्णषणा] पप्पमनस्यो सरिस्परा ८॥ मण्णे य सवित्परत्या नस्य मपिता सा महा- पण्णपणा ९। मजादियो पंचविदो पमावो, वेस घेप मामोगपुनिया उपरती अप्पमातो, एवे मत्व सरित्यरस्था देसिजति समय पमादप्पमाई १० । सरचरितं पश्यापिनवे नत्य सा सूरपण्णसी १६ । पुरिसो चि-सह पुरिमसरीर, वा, ततो पुरिसावो निप्पण्मा पारिसी, एवं सध्यस्स पत्युमो भदा स्वममाषा छाया मगति तदा । पोरिसी भवति, पतं पोरिसिपमाप उचरायमस्स मंते दक्सिमायणम्स य मादीए एक दिपं मपति, मतो परं भटु एकमहिमागा मालमस दरिसमायणे पति, उपरायणे य इस्सवि, एवं मर मरले मष्णोप्मा पोरिसी मत्व अजमायणे दसिजति वमम्मपण पोरिसिमरस १७ । पदस्स सरस य दारिणुचरेम मरछेस जरा मंडलातो मरले परेसो सा पणिज्जवि मत्यज्यणे तमन्नयन मंडलप्पबेमो १८ । मिज चिनार्म, परम-पारित, पिरियो पिसिहो या मिण्यो-सम्मायो स्वरममित्यया, फर्स या निसपो, त भस्पज्मपणे परिणति उमग्मायण विना 10 चरणपिणिच्छयो १९ । समान पखाउसो गयो गमो, सो नस्स भत्यि सो गणी, पिज चि-या, प मोइसनिमिचगत गाई पसस्पेस मे मजे करति, जहा-पवारणा १ सामाइयारोरम २ उम्हारणा ३ सवस्स उस-ससुरेसा ऽगुग्णावो ४ गणारोपण ५ दिसामुणा ६ सेवेमु य मिमाम-पोसा ७, एमाझ्या फमा प्रेस विडि फरम-परखप मूहुच-मोगेस म जे जत्प करमिक्षा [५० २११ वि०] ते मत्यज्यणे पग्निम्मति समझपम गणिविखा २० । पिरमन्यरसार्म माम, निमपर्ण सिमची, समेई पाय मस्प पबिजति महायणे वमनापर्य 15 झाणविमत्ती २१ । मर-पाणपरिवागो, सिमयणं-पिमची, पसस्थमपसत्पाधि समेवापि मरणापि मस्प पनिम्मति सम्पयणे वमन्मयम मरणधिमत्ती २२ भाव पि-आस्मा, तस्स रिसोदी तरेण परमगुणेहि य मासोयगारिगणेण य मा ममति सहा मत्य मम्मयणे पम्पिम्नति तमन्मयम भातविसोही २३ । सरागो वीतरागो य एतेसि जस्थ सस्तकापा, विसेसतो वीतरायस्स, तमायण पीतरागसुतं २४ । पापातो निमापातो पा भचमछेहो फसायादिमापस हो य मा महाकासम्मो वा पणिजवे मस्पज्मयणे तमायण संकेहणासुत 20 २५ । विपरमं विरो, वस्स कप्पा-विपि चि बुध माति, सो गिणकप्पे पेरकप्पे पा, मिणकप्पे परिम-भागम्य परिरिया य गुम्बा, पतेसि सरित्वरो विपी मस्प अनपणे पविमति] समनापग बिहारकप्पो २६ । परण-पारिच तस्स सिसी परणमिडी, समेवो परमविशी पणिजति मत्प समायणे तममायग परणविही २७ । बाउरो-गिसाषा, किरियातीतं पातुं गीतस्वा पञ्चरसाति, विणे विणे दम्यासे पता भंवे प समादम्पदावा पवार मचे बेरमा नवा मधे नितमस्स भरपरिमपषमसापं कारेति, पतं नस्पज्जपणे सरिस्पर पम्निमा समजायमै भारपसाणे २८ । पेरफप्पेणं निणकप्पेष मा पिरिचा मते पेरकप्पिया पारस पासे संग करेगा, निमकप्पिया पुम विसरणे [ये २१५ प्र ] संलीग का निभान संकरेचा निम्मापा सहा घेम मानरिम पपरवति, पत सरिस्परं मस्पऽपपणे परिणति समापण महापच्यामार्ण २९ । एवे मम्मपणा मामिपाणत्या मणिया ।। उक्त उपासियं । इवाणि कामिय-- ८२ से कि त कालियं ? कालियं अणेगविह पण्ण, तं जहा-उत्तरायणाइ ! दसामो २ कप्पो ३ ववहारो ४ णिसीह ५ महाणिसीह ६ इसिभासियाई ७ जंयुद्दीवपण्णती 1 “बाप मापन महापना विवारिनची २ काठिये मर्षपतिमिर्प मांगपति गणेग t 8 मार पाम्यूमि तिम्रो सम्मोपीत। 30 ५९ - 5 कालियसुय] सिरिदैववायगविरइयं गंदीसुत्तं । ८ दीवसागरपण्णत्ती ९ चंदपण्णत्ती १० खुड्डियाविमाणपविभत्ती ११ महल्लियाविमाणपविभत्ती १२ अंगचूलिया १३ वैग्गचूलिया १४ विवाहचूलिया १५ अरुणोववाए १६ गरुलोववाए १७ धरणोववाए १८ वेसमणोववाए १९ देविदोववाए २० वेलंधरोववाए २१ उट्ठाणसुयं २२ समु- ट्ठाणसुयं २३ नागपरियाणियाओ २४ निरयावलियाओ २५ कप्पवडिसियाओ २६ पुफियाओ २७ पुष्फचूलियाओ २८ वण्हीदसाओ २९ । ८२. से किं तं कालियं इत्यादि मुत्तं । जं इमस्स निसीहस्स मुत्तत्थेहिं वित्थिण्णतरं तं महाणिसीहं ६। सोहम्मादिसु जे विमणा ते आवलितेतरहिते प्रतिविभागेण विभयइ जमज्झयण तं विमाणपविभत्ती भण्णति । ते य दो अज्झयणा-तत्येग मुत्तत्थेहिं संखित्ततर खुड्डं ति ११, वितियं सुत्तत्येहिं वित्थिण्णतरं महल्लं ति १२ । अंगस्स चूलिता जहा-आयारस्स पंच चूलातो, दिहिवातस्स वा चूला १३ । वग्गो ति विवक्खाव- सातो अज्झयणादिसमूहो वग्गो, जहा अंतकडदसाणं अट्ठ वग्गा, अणुत्तरोववातियदसाणं तिण्णि वग्गा, तेसिं चूला 10 वग्गचूला १४ । वियाहो भगवती, तीए चूला वियाहचूला, पुव्वंभणितो अभणिओ य समासतो चूलाए अर्थों भण्यतेत्यर्थः १५ । अरुणे णाम देवे तस्समयनिवद्धे अन्झयणे, जाहे तं अज्झयणं उवउत्ते समाणे अणगारे परियट्रेति ताहे से अरुणे देवे समयनिवद्धत्तणतो चलितासणे जेणेव से समणे तेणेव आगच्छित्ता ओवयति, ताहे समणस्स पुरतो अंतद्धिते कतंजली उवउत्ते मुणेमाणे चिट्ठति, समत्ते य भणति-सुभासितं, वरेह वरं ति, इहलोगणिप्पिवासे से समणे पडिभणति-ण मे वरेण अट्ठो त्ति, ताहे से पदाहिणं करेत्ता णमसित्ता य पडिगच्छति १६ । एवं गरुले 15 १ बंग ख० स० ल० शु० ॥ २ वियाह शु० ल० ॥ ३ उबवापपदान्तानि सूत्रनामानि अस्मदादृतास्वष्टासु सूत्रप्रतिषु चूदिशेपु हारि०वृत्तौ मलयगिरिवृत्तौ पाक्षिकसूत्रयशोदेवीयवृत्तौ च क्रमव्यत्यासेन न्यूनाधिकमावेन च वर्तन्ते । तथाहि- अरुणोववाए वरुणोवधाए गएलोववाए धरणोववाए वेसमणोववाए वेलंघरोववाए देविंदोववाए उट्ठाण जेसू० मोसू० मुसू० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेलधरोववाए देविंदोववाए वेसमणोववाए उहाण ३० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए वेलंघरोववाए देविंदोववाए वेसमणोववाए उट्ठाण स० शु० । अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए वेलघरोववाण देविंदोववाए उट्ठाण ख० । अरुणोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए. वेस- मणोववाए उट्ठाण ल० । अथ च-अरुणोववाए इति सूत्रनामव्याख्यानानन्तर हरिभद्रवृत्तौ "एव वरुणोववादादिसु वि भाणियब" इति, मलयगिरिवृत्तौ च "एव गरुडोपपातादिष्वपि भावना कार्या” इति, पाक्षिकसूत्रवृत्तौ च “एव वरुणोपपात-गरुडोपपात- वैधमणोपपात-वेलन्धरोपपात-देवेन्द्रोपपातेष्वपि वाच्यम्" इति निर्दिष्ट दृश्यते । चूादर्शपु पुन पाठमेदत्रय दृश्यते-१ श्री- सागरानन्दसूरिमुद्रिते चूादर्श [पत्र ४९] “एव गरुले वरुणे वेसमणे सक-देविंदे वेलधरे य ति" इति, २ श्रीविजयदान- रिसम्पादिते मुद्रितचूकॊदर्शे [पत्र ९०-१] 'एव वरुणे गरुले धरणे वेसमणे वेलधरे सके-देविंदे य ति" इति ३ अस्मा- भिराहते शुद्धतमे जेसलमेरुसत्के तालपत्रीयप्राचीनतमचूर्फादर्श च “एव गरुले धरणे वेसमणे सके देविदे वेलधरे य ति" इति च । श्रीसागरानन्दसुरीयो वाचनामेद आदर्शान्तरेषु प्राप्यते, श्रीदानसूरीयो वाचनामेदस्तु नोपलभ्यते कस्मिंश्चिदप्यादर्श इत्यत सम्मा- व्यते--श्रीमद्भिर्दानसूरिमि मुद्रितसूत्रादर्श-चूकॊदर्शान्तर-हारि०वृत्ति-पाक्षिकत्त्याद्यवलोकनेन पाठगलनसम्भावनया सूत्रनामप्रक्षेप क्रममेद- वापि विहितोऽस्तीति । अस्माभिस्तु जेसलमेरीयचूर्णिप्रत्यनुसारेण सूत्रपाठो मूले स्थापितोऽस्तीति॥४°परियावणियाओ जे० स० डे० शु० । 'परियावलियाओ ख० मो० ल० ॥ ५ याओ कप्पियाओ कप्पवडि° सर्वासु सूत्रप्रतिषु । श्रीमता चूर्णिकृता कप्पियाओ इति नाम आदृत नास्ति । किञ्च-सर्वास्तुपि नन्दिसूत्रप्रतिषु एतन्नाम दृश्यते, श्रीहरिभद्रसूरि-मलयगिरिवृत्त्योः पाक्षिकसूत्रटीकायां चापि एतनामव्याख्यान वर्तते । तथाहि-"कप्पियाओ' त्ति सौधर्मादिकल्पगतवक्तव्यतागोचरा ग्रन्थपद्धतय कल्पिका उच्यन्ते ।" नन्दीहारिवृत्तिः । एतत्समानव व्याख्या मलयगिरिवृत्तौ पाक्षिकटीकाया च वर्तते ॥ ६ वण्हीदसामओ इति नाम्न प्राक् वण्हीयाओ इत्यधिक नाम शु० । नेद नाम चूर्णि-वृत्त्यादिपु व्याख्यात निर्दिष्ट याऽस्ति । ७ पव गरुले वरुणे वेसमणे सक्के- देविंदे वेलघरे य ति आ० मो० । एवं वरुणे गरुले धरणे वेसमणे वेलंधरे सक्के देविदे यत्ति दा० ॥
निमहामगिमसिहपाए पुण्णाए संनुस [म०८१-८१ १७ परणे १८ पेसमणे १९ मके देदे २० घेलंघरे २१ य चि। 'सहाणसुते' ति मन्मयन सिंगनाइयग्ने मस्स ण गामम्स पा मार रायमीए । एगल्सस्स रा समगे आमरते को उपउचे तं उठाणसते पि अमापन परियति एवं दो तिप्पि पा पारे सारे से गामे पा भाव रायपाणी पा इस पा उद्वेति, उम्पसा चि एवं मति २२ । से थेच समणे २० २१५६०] उस्स गामस्स पा नार रायपापोए या उद्धे समाणे पसरणे पसव्यस्से 5 सासणन्प उक्उचे सहवागमुतं परियको एक दो तिष्णि या पारे सारे से गामे पा नाप रायाणी या बाबासेति । समद्धाममुपे चिपकने वगारसोवादो समुदाणसुये घि ममित । सप्पणा पुद्विर्य पिकत्संकप्पस्स मागासेति २३ । 'णागपरियाणिय' चि अन्मयणे माग भि-नागहमारे, वेस समयनिवार्य अध्ययण, त मदा समणे उपयुचे परिपेति क्या मध्यसकप्पस्स वित मागमारा सस्पस्था व परियाणति, संति गमसति मपिएमाव । करेंति, सिंगणायफरनेस य परया मरतीस्पर्यः २५ । निरयापलियासु आपसियपषिदेतरे य निरया सम्मामिपो 10 य पर तिरिया पसगतो गणिजति २५ । सोहम्मीसाणकप्पेस जे कापविमामा ते फापरडेसया के पम्मिता, वेस यदेपीमो मा जेम तयोबिसेसेब उपरया वा पस्मिता, लामो य कप्पयरेंसिया मणिया २६ । सेनममार- विगसितो पुष्फितो, सनममावविद्युतोऽपुफिसो, मारमाय परिद्ववेचा पमनामाग विगसितो पण सीया मो, वस्स हामषे परमव य विसंघमा देसिना मत्य ता पुफिया २७ । एसेम्पो सविसेसो पुष्फलाए दसिम्मति २८ । मपगमणिमो ने इसे वे संपगसासोमाता ममिणो मणिया, वेसि परियं गठी सिगामा प समस्य मणिता ता पहिवसातो । दस चि-भरस्था सम्पयमा पा २९ ॥ ८३ एवमाईयाई परासीतीपइण्णगसहस्साई.भगवतो मरहमो उसहस्स माइतित्वय रस्स, तदा संखेज्जाणि पइण्णगसहस्साणि मज्झिमगाणं जिणवराण, चोइस पदण्णगसह स्माणि भगवमो वदमाणसामिस्स । महवा जस्स जत्तिया सिरसा उप्पचियाए वेगवियाए फम्मयाए पारिणामियाए चउबिहाए बुद्धीए उववेया तस्स तरियाई पइण्णगसहस्साइ, पसेय 0 बुदा वितचिया चेव । सेव कालियं । से आवस्सयवहरिवं । से त भणंगपविट्ठ । ८३ मगरमी उसमस्स पठरासीतिसमपसारस्सीवो रोत्या, पामगमयमा वि समे कासिम उकास्पिा परासीतिसास्सा। करी जतो ते परासीति समणसासा महतमम्गाउनदि में मुखमपुसरिया लिपि पिनाते ते सगे पाणग्गा, भाषा तमगुस्सरतो अप्पमो पयणकोसष्ठेन में पम्मदेसणाविस मासवे ते सम्भ पाण्णर्ग, नमामर्मतगमपाय मुर्च विद्व परयम नियमा मम्मवरगमाणपाठी मपति तमा [० २१५ प्र०] पाण्यग । ए चरासीती पाणगसास्सा मर्मतीस्पर्मी। एतेम विपिमा मग्निमविस्पगरा संलेखा पायगस- स्मा । समयस्स वि भगवो ममा पोरस समपसारस्सीतो कोसिया समनसंपरा तमा पोरस पापगमाय- १ पाति २ मगपमो मपभो सिरिससासामिस्ट मरिममगार्ग निणार्य संमेगापि पापपमा स्सापि बोरस है । मगरमो परापो सरस्म समणावं मझिमगार्ण मारिए । ममदमो प्रसारिसि- (सिपिम्स समबस्स मसिमगार्म एवारिक । यात्रामप्पो पाम्नेहा मसिममा समापुत्तयसेन समारोप निरोप पाझे चिकतो सम्म । रिफायने माल एल पामे पहातोस्ति । पूपिता पुसे । पामगारेम मामाथि सम्माबत . सिरिपसासामिस्स मा निता सास्स हद सास्स ति मतपगिरिमा सिरिसासामिस्त इति पामेधारतोऽस्ति सीमा से मि दिया। . वरिमा सिरिस 5 10 ६१ अंगपविट्ठसुयणाणं आयारे य] सिरिदेववायगविरइयं गंदीसुत्तं । गसहस्सा भवंति । अहवा 'जत्तिया सिस्सा' इत्यादि मुत्तं । इह मुत्ते अपरिमाणा पइण्णगा पइण्णगसामिअपरिमाण- त्तणतो, किंच इह मुत्ते पत्तेयबुद्धप्पणीतं पइण्णगं भाणितव्यं । कम्हा? जम्हा पडण्णगपरिमाणेण चेव पत्तेयबुद्धपरि- माणं कीरइ त्ति भणितं 'पत्तेयबुद्धा वेत्तिया चेव' ति । चोदक आह-णणु पत्तेयबुद्धा सिस्सभावो य विरुज्झते ? आचार्याह-तित्थगरपणीयसासणपडिवनत्तणतो तस्सीसा भवतीत्यर्थः।। भणितं कालितसुतं अंगवाहिर च । ददाणिं अंगपविर्ट- ८४. से कि तं अंगपविढं ? अंगपविठं दुवालसविहं पण्णत्तं, तं जहा-आयारो १ सूर्य- गडोर ठाणं ३ समवाओ४ वियाहपण्णत्ती ५ णायाधम्मकहाओ६ उवासगदसाओ७ अंतगड- दसाओ ८ अणुत्तरोववाइयदसाओ ९ पण्हावागरणाई १० विवागसुतं ११ दिद्विवाओ १२ । ८४. से किं तं अंगपविलु इत्यादि सूत्रम् ॥ ८५. से कि तं आयारे? आयारेणं समणाणं णिग्गंथाणं आयार-गोयर-विणय-वेणइय- सिक्खा-भासा-अभासा-चरण-करण-जाया-माया-वित्तीओ आघविज्जंति । से समासओ पंच- विहे पण्णत्ते, तं जहा-णाणायारे १ दंसणायारे २ चरित्तायारे ३ तवायारे ४ वीरियायारे ५। आयारे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ । से णं अंगट्ठयाए पढमे अंगे, दो सुयक्वंधा, पणुवीसं अज्झयणा, पंचासोती उद्देसणकाला, पंचासीती समुद्देसणकाला, अट्ठा- 15 रस पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा । सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्ण- विज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जंति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं नाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवैणा आघविज्जइ । से तं आयारे १ । ८५. [से कि तं आयारे इत्यादि मुत्तं] । आयरणं.आयारो । गोयरो-भिक्खागहणविधाणं । विणयो- 20 णाणातियो तिविहो वावण्णविधाणो वा । वेगइया-सीसा, तेसिं जहा आसेवणसिक्खा। भासा-सच्चा असच्चामोसा य। अभासा-मोसा सच्चामोसा य । चरण-"वतसमिति०" गाहा [ ] । करणं-"पिंडस्स जा १ इह तित्थे अपरिमाणा इति पाठो मलयगिरिसूर्युद्धतचूण्युद्धरणे ॥ ३ विवाह ख० विना ॥ ५ चूर्णा सखेजाओ पडिवत्तीओ, संखेजाओ णिज्जुत्तीओ, इति पाठो व्यत्यासेन व्याख्यातोऽस्ति ॥ ६-७ सीइ ल० ॥ ८ 'स्सातिं शु० । स्साणि मो० मु० ॥ ९ चूर्णिकृता एवआया इति पाठो न गृहीतो न च व्याख्यातोऽस्ति, किन्तु श्रीहरिभद्रसूरिणा श्रीमलयगिरिणा च एप पाठो गृहीतोऽस्ति, साम्प्रत च प्राप्तासु सर्वास्त्रपि नन्दीसूत्रमूलप्रतिषु एप पाठो दृश्यते । समवायागसूत्रवृत्तावमयदेवरिभिः एवंआया इति पाठो नन्दोसूत्रत्वेनाऽऽतो व्याख्यातश्चापि दृश्यते । तैरेव च तत्र स्पष्ट निर्दिष्ट यद्-असो पाठो न समवायानसूत्रप्रतिषु वर्तत इति । एतच्चेदं सूचयति यत-चूर्णिकारप्राप्तप्रतिभ्यो भिन्ना एव नन्दीसूत्रप्रतयो हरिभद्रादीना समक्षमासन् , तथाऽभयदेवसूरिप्राप्तासु समवायागसूत्रप्रतिषु एप पाठो नासोत् । सम्प्रति प्राप्यमाणासु च समवा- याङ्गसूत्रस्य कतिपयानु प्रतिषु दृश्यमान एप पाठोऽभयदेवसूरिनिक्षिप्त-व्याख्यातपाठानुरोधेनवाऽऽयात इति सम्भाव्यते ॥ १० वणया आ स. ल. ॥ ११ आचारे र. ॥ २ सूयगड स० ॥ ४ वाइणा ल० ॥
मिणदासगणिमहारविहसाए मुष्णार मजुप [मु. ८५-८७ पिसोही." गारा [म्पस. मा ३.१ गा २८९] । नाय पि-सजमनसा, सस्स सारण भारोमात चि-यापामुणे धेसयो । वर्तनं मची । एतं सम्म मापार 'भापविम्बइ सि माम्म्पायवे । मुखमत्यस्स य पदार्म पापणा सा परिचा, मता ण मववि, मादि-अतोरखमत्तमवा । भाषा भोसप्पिपि उससप्पिमिकासं का पाप परिचा, तीता मागत सम्पद घ पाप ममता । उरकमादि पामादिणिक्षेपकरण प अपियोगरारा, ते भायारे संखेना, तेसि पणा 5 गवयणगोयरवणतो। परो-पदानाठी । 'पडिरतीमो पि दमादिपदस्यम्भुनगमो परिमाऽमिमापिसेसा य परिवधीमो, ते समाससो मुत्पटिबदा संखेमा । तिमिरा जेन निरखेगमादिनि खत्ती वेष सखेमा । पर मवेरा पिंग्समा सेज्जा इरिया मासजाया सस्पेसणा पासेसमा [० २१९६०] मोमारपरिमा सवसचिफया मावणा विमोची, पते पर्ष गिसीसझा पणुवीस अन्नपणा । पचासीठी उपसणकाला । प उप्यते-भगस्स मुतपर्व पस्स मामयणस्स टोसगस्स, पवे पउरो पि पफो टोसपकासो । पर्व सत्पपरियार सत उसनकासा, मोग- 10 विनयस्स ग्र, सीतोसपिजस्स धतुरो, समयस्स पहरा, सोगसारस्स छ, घुयम्स पंच, माापरिष्याए सत्त, बिमो- पावतपस्स म्ह, उरभागसुवस्स चतुरो, पिरेसमाए एपारस, सम्माए तिष्णि, इस्पिाए तिम्मि, मासजावाए दो, मत्पेसणाए दो, पावेसवाए दो, उमगरपरिमाए दा, सत्तियाणं सच, मारगाए एको, विमोचीए पपा, पवे समे पपासीति । पोषक आर-नदिदो मतसचा पमुवीसं ममायणाय महारस पदसास्सा पाग्गेम मरति तो में मपित "पनवमवेरमामा म्हारसपदसास्सिमो वदा।" [माचा० नि गा०११] चि एवं विग्मति । भाचार्य मार-पषु 15 एस्प रि मणित 'सर्पपचूला भट्टारसपदसास्मितो पेदा' चि, शमुखासारयपवेहि सहितो पापहवरा य बरू म्मेत्यर्थः । माया दो मुतलंपा पीस मनायना प, पतं मायारमासस्विस्स मापारस्स पमाण मणिर्त । द्वारस परसास्सा पुण पाममुखोपस्स णपषमधेरमायस्स पमाण । रिचिचस्पबदा य अचा, गुलदेसठो सिं भस्पो माणितम्रो । अवस्वररपणाए संखेजा मक्खरा । ममियामिषेयरसता गमा मति वे य ममंदा इमेण सिपिणा-मुर्व मे माउस वेणं मगवतामुर्व मे माउस, तर मन मे भा०, या मुठ मे मा० मतं मया श्रा, सरा मुसं मदा था तरि सर्व मदा मा०, एवमादिगमेहि मण्ममाम मतगम । मालपजएर मत्पपमा म मतं । परिचा वसा, अर्पता मति । यता पामरा पमफासरिता । सासत पिपंपस्थिकाइयाश्याप दि-विधिमा, पयोगठी वीससापरिणामता मे० २१७७ मा जाममा मामलादी । एते सम्म भापारे धम निबदा । निम्नुपि-संगाणि-रेव्दारमादिपदि य णिकाइया। किंच एते माणे य 'निणपष्मता' जिप- प्पनीया मावा 'भापनिम्नति' नाव उससिर्जति पतेसि पयाम् पूर्वपत् व्याख्या । एमिमामारे महिमित से रिसे 'एप' ति ना मापारे निपया परविता यता सम्पदणमागान मावा माति । बिबिष पि-अणेगपा भाषमाणो विपाता भरवि । मष्णपारास्तिो मा विसिद्धतरे मिसि पर पा भावमापा विणाया ममति । सेस निगमणए । से मायारे ॥ ८६ से कि त सूयगडे ? सूयगडे ण लोए सूरज्जइ, अलोए साजर, लोया ग्लोए सूरजह, जीवा सूरजति, अजीवा सूइज्जति, जीवा जीवा सहज्जति, सममए सदज्जद, ० परसमए सइज्जइ, ससमय-परसमए सूरज्जइ । स्यगडे णं भासीतस्स किरियावादिसयस्स. चउरासीईए भकिरियेवादीणं, सप्तट्ठीए अण्णाणियवादीणं, बत्तीसाए वेणझ्यवादीणं, तिण्इं १ति... विसोपस्सप 4 मिनासी । , ५ पाया। मो सूयगहे ठाणे य] सिरिदेववायगविरइय गंदीमुत्तं । ६३ तेसट्ठाणं पावादुयसयाणं बूहं किच्चा ससमए ठाविज्जइ । सूयगडे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए विईए अंगे, दो सुयक्खंधा, तेवीसं अज्झयणा, तेत्तीस .उद्देसणकाला, तेत्तीसं समुद्देसणकाला, छत्तीसं पदसहस्साणि पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणता थावरा, सासय-कड-णिवद्ध-णिकाइया 5 जिणपण्णत्ता भावा आपविज्जंति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उव- दंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं सूयगडे २॥ ८६. से किं तं मूयगडेत्यादि मुत्तं । 'सूइज्ज' त्ति जधा णहा सूई तंतुणा सूइज्जइ, उबलभतेत्यर्थः । अहवा जहा सूयी पडं सूतेइ तहा सूयगढे जीवादिपदत्था सूइज्जति । 'बृह' फिच त्ति प्रतिव्युइं, तेण प्रतिव्युहेन ते 10 परप्पवादी णिपट्ट-पसिणे कातुं ससमयस्स सव्भावे द्वाविज्जति । उद्देसयपरिमाणं नातुं उद्देमणकाला जाणज्जा। सेसं कंठं । से तं सूयगढे २ ।। ८७. से किं तं गणे? ठाणे णं जीवा गविज्जति, अजीवा गविज्जति, जीवा-ऽजीवा गविज्जति, लोए गविज्जइ, अलोए गविज्जइ, लोया-ऽलोए गविज्जइ, ससमए अविज्जइ, परसमए गविज्जइ, ससमय-परसमए विज्जइ । ठाणे णं टंका कूडा सेला 15 सिहरिणो पव्भारा कुंडाई गुहाओ आगरा दहा णदीओ आघविज्जंति । ठाणे णं ऐगाइयाए एगुत्तरियाए वुड्डीए दसट्ठाणगविवड्डियाणं भावाणं परवणया आघविज्जति । ठाणे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ निज्जु- तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए तइए अंगे, एगे सुयक्खंधे, दस अज्झयणा, एकवीसं उद्देसणकाला, एकवीसं समुद्देसणकाला, वावरिं 20 पदसहस्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परिता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविजंति १ तेवट्ठाण स० स० जे० डे० ल० । हारि०वृत्ती समवायाङ्गस्त्रादिपु च तेसट्ठाणं इति पाठो वर्तते ॥ २ पासंडिय सयाण जे० हे. मो० मु० । श्रीमलयगिरिभिरयमेव पाठ आदृतोऽस्ति । ३ यिदिप शु० । बिईए ल० ॥ ४ जति स०४० ल. डे० ॥ ५ → - एतचिन्हमध्यवर्ती पाठ जे० मो० मु० प्रतिपु ससमय-परसमए ठाविजा इति पाठानन्तरं वर्तते ॥ ६ ठाणे णं इति ख० स० ल० शु० नास्ति ॥ ७ पगाइयाण गुत्तरियाणं दसठाण स० दे० ल० शु० ॥ ८°षणा जे० मो० ॥९ जति स. हे शु० ॥१० जे० हे. विनाऽन्यत्र सिलोगा, सखेजाओ संगहणीमो । से णं ख० स० ल० शु० समवायागसूत्रे च । सिलोगा, संस्खेजाओ निज्जुत्तीमओ, संखेजाओ पडिवत्तीओ। से णं मो० मु० ॥ ११ स्त्र० स० ल• शु० प्रतिषु अणता गमा अणंता पज्जवा इति नास्ति ॥
बिगदासगणिमहरपिसमाए अण्णाए समुन [स.८८-९० परूविज्जति देसिज्जति णिदसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आधविज्जइ । से तंगणे ३ । 40 से कितं ठाणेस्पादि सर्च । 'ठाषिजति' चि स्तस्पत स्पाप्पचे, मापवेत्यर्थः । छिण तर टक । पूर्व वि-महा पेस्सोररि मब सिदायसमाइया कहा। हिममतादिया सेसा । सिरेण सिारी, मा तहो । म ई उपरि अषसुनय त पम्मारे, म पापमयस्स उररिमागे रत्यिमागिर हर निमा पम्मा । गंगादिया हंग। तिमिसादिया गए । उप-सरण-रतणादिया मागरा । पोररीयादिया दपा । गगा- सिंधुमादियामो णदीमो । सेस फठ । स ठाणे ३ ॥ ८८ से कि त समवाए ? समवाए ण जीवा समासिज्नति, अजीवा समासिज्जति, जीवा जीवा समासिज्जति, लोए समासिज्जति, अलोए समासिज्जति, लोया ग्लोए 10 समासिज्जति, ससमए समासिज्जति, परसमए समासिज्जति, ससमय-परसमए समासि ज्जति । समवाए ण एगाइयाणं एगुत्तरियाणं अणगसयविवतियाण भावाणं परवणा आष- विज्जति । दुवालसंगस्स य गणिपिडगस्स पैलवग्गे समासिज्जति । समवाए णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुमोगदास, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा मिलोगों, संखेज्जाओ णिज्नु- चीमो सखेज्जामो पवित्तीओ, संखेज्जामो संगहणीमओ । से णं अंगठ्ठयाए चउत्ये 15 अगे, एगे मुयसंघे, एगे अज्मयणे, एगे उद्देसणकाले, एगे समुद्देसणकाले, एगे चोयाले पदसयसहस्से पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खय, मणंता गमा, मर्णता पज्जवा, परित्ता तसा, अणता यावरा, सासत-कह णिवद्ध णिकाइया जिणपण्णता भावा आपविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति देसिज्जति णिदेसिज्जति उवदसिज्जात । से एवआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपस्वणी आघविज्जति । से नं समवाए । ८८ से किंत समपाए इस्पादि । समपाए निक्खेको पम्भिहो । बम्बे सषिचाविवमसमपातो, मार समबातो इम पेष मामा मस्प पा एगत्व बोदायाद मा माषा सणिमादियसनोगा या मानसमवावो । मारसमपाए पा इमं गिरुष-भीमा 'समासिचंति' सम मासाति । सम ति-ण विसर्म, भावस्पित मन्माति रिकं इस्पः । मासाति-भाभीर्यवे, मुखमा बामेन तेस्पर्यः । मावा समास पिसामग्गेऽमितिसमे २१७ दिसमपदस्पाण समासतो विमरिसो चि । सेसे कठे। उक्त समवाया ४॥ १ पपपार २ तिः . ॥३मा एच. ५ सवित्स मो है ५ पमपणे । पाठयम्गे सत्ता-पाहामा मिमिकाम 'पाग ति पर्यवपारमान ममियादिसममा पमा परित्ता सामादि । पपसम्म मिचा प्रयत् पर फापर प्रसारिवरित । परमा पास UAE मारपरिमाणम् ति समवायाराति - पत्रे ॥ . बायस्स में मायन-सिमेगम संतामो संगाजीमो । से सियोमा संपेग्नामो निमावीमो, संदेबागे परिपतीयो । से मो 9.८ पपा । . U ॥ म 4 म में समवाए वियाहे णायाधम्मकहाओ य] सिरिदेववायगविरइयं णदीयुत्तं । ८९. से किं तं वियाहे ? वियाहेणं जीवा वियाहिज्जति, अजीवा वियाहिज्जंति, जीवा-जीवा वियाहिज्जंति, लोए वियाहिज्जति, अलोए वियाहिज्जति, लोया-ऽलोए वियाहिज्जति, ससमए वियाहिज्जति, परसमए वियाहिज्जति, ससमय-परसमए वियाहि- ज्जति । वियाहे णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगों, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। 5 से णं अंगठ्ठयाए पंचमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, एगे सातिरेगे अन्झयणसते, दस उद्देसग- सहस्साई, दस समुद्देसगसहस्साई, छत्तीसं वागरणसहस्साई, दो लक्खा अट्ठासोति पयसह- स्साई पयग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिबद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परू- विज्जंति देसिज्जति णिदंसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, 10 एवं चरणकरणपरूवणा आघविज्जइ । से तं वियाहे ५ । ८२. से किं तं वियाहेत्यादि । 'वियाहे' त्ति व्याख्या, इह जीवादयो व्याख्यायंते। इह सतं चेव अझ- यणसणं । गोतमादिएहिं पुढे अपुढे वा जो पण्डो तव्यागरणं [च] । सेसं कंठं । से तं वियाहे ५ ॥ ९०. से कि तं णायाधम्मकहाओ ? णायाधम्मकहासु णं णायाणं णगराइं उज्जाणाई चेडयाई वणसंडाइं समोसरणाई रायाणो अम्मा-पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-पर- 15 लोगिया रिद्धिविसेसा भोगपरिचागा पैवज्जाओ परियागा सुयपरिग्गहा तवोवहाणाई संले- हणाओ भत्तपञ्चक्खाणाई पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणवोहिलामा अंतकिरियाओ य आघविज्जति । दस धम्मकहाणं चग्गा । तत्थ णं एगमेगाए धम्मकहाए पंच पंच अक्खाइयासयाई, एगमेगाए अक्खाइयाए पंच पंच उवक्खाइयासयाई, एगमेगाए उवक्खाइयाए पंच पंच अक्खाइओवक्खाइयासयाई, एवमेव सपुव्वावरेणं अद्भुट्ठाओ कहाण- 20 गकोडीओ भवंति त्ति मक्खायं । णायाधम्मकहाणं परित्तां वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, १-२ विवाहे जे० मो० मु० ॥ ३ विवाहस्सणं जे० डे० मो० मु० ॥ ४ ० विनाऽन्यत्र-सिलोगा, सखेजामो संगहणीओ । से णं ख० स० ल० शु० । सिलोगा, संखेजाओ निज्जुत्तीमो, संखेजाओ' पडिवत्तीओ । से ण जे. ५ °स्लाई, चउरासीई पयसहस्साई पयग्गेण, इति समवायानसूत्रे पाठ । अत्राभयदेवीया टीका-"चतुरशीति पदसहस्राणि पदाणेति, ममवायापेक्षया द्विगुणताया इहानाश्रयणात् , अन्यथा द्वे लक्षे अष्टाशीति सहस्राणि च भवन्तीति ।" इति ११६-१ पत्रे । तपैतदर्थसमर्थक 'विवाहपण्णत्तोए ण भगवतीए चउरासीइ पदसहस्सा पदग्गेण" इति समवायाझे ८४ स्थानके सूत्रपाठोऽपि वर्त्तते ॥ ६ वणया ल० ॥ ७ जति सं० सं० ल० ॥ ८ विवाहे ख० स० विना ॥ ९ चेतियाति वणसंडातिं शु० ॥ १० पियरो धम्मायरिया धम्मकहाओ इह-पारलोइया इड्ढिविसेसा जे० मो० मु० । 'धम्मायरिया धम्मकहाओ इहलोइय-परलोइयइड्ढी- विसेसा" इति समवायाङ्गे ॥ ११ पच्चजापरियागा ख० स० डे० ल० शु० । “पवनाओ सुयपरिग्गहा तवोवहाणाइ परियोगा सलेहणाओ" इति समवाया ॥ १२ वग्गा पण्णत्ता । तत्थ स० ॥ मो० ॥ चु०९ मिणदासगणिमहचरक्रियाए पुग्णीय समुपं [स. ९१-९२ संखेज्जा वेदा, संखेज्जा सिलोगा, सखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, मखेज्जाओ सगहणीमो, संखेज्जामओ पडिवधीओ। से णं अंगठ्ठयाए छठे अंगे, दो सुयक्खघा, एगणेवीस णात ज्झयणा, एगणवीस उद्देसणकाला, एगणवीस समुइसणकाला, संखेज्जाई पेयसहस्साई पय ग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणता गमा, अणंता पज्जवा, परिचा तसा, अर्णता थावरा, 5 सासत-कह-णिबद्ध णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति देसिज्जति णिदसिज्जति उपदसिज्जति । से एवमाया, एव णाया, एव विष्णाया, एवं चरण-करणपर्वणा आघर्विज्जति । से तंणायाधम्मकहाभो ६ । ९० से किं तं णायापम्मकहेस्पादि सर्च । एफणवीसं गातापमा, माय पि-माररपा, रिवियो मा पजति त्यो ते णाता, पते परमसतखचे । अरिसादिसणखणस्स पम्मस्स कसा पम्मकहा, पम्मियामो 10 या कामो पम्मामा, मरम्माणग पि पुत्वं भाति, एते रितिक्मतसथे । परम वितियमुतखवे भपिवार्म णाता-अम्मााण गगरादिया मम्मति । पितिय मुसरखने इस पम्ममाण पम्मा । पमो वि-सम्यो, पम्निसे- सणविसिष्ठा दस मन्सयमा धेय से दहला । परामवीस भाठा, दस य पम्मकायो । वस्प णावेस मादिमा इस माता वेस, ण वेस भक्तादियादिसमपो । ससा पार पाता, पेस एकके भाते पचासीस पचासीस माला यामो मवैति, वत्य वि एकाए मस्खाइयाए पंप पंच उपरलाइयाससाई मति, वस वि एकाए उपसा 15 याए पंच पंप अक्साइओमनाइयसताई मर्गति, एक पते पर कारीमो । एतायो पम्मकाराम सोतम चिकाई एकोणीसाए णावाम दसम य पम्मकहाण पिसमो फमति-दस णावा देस प प पम्मकहातो दसाई परोप्पर मुदा । एवं पिसेसे को सेप्सा पर पाता, वे मम पचासीसाए गणिता भावा तिमि सता सहा मनस्तायाम, पवे भास्लामपंचसरिता सोपिता, वस्य ससं पचास सत, वे उपस्स्लाइयपंपसरि गणितं माता उपपखारतामं सर्त सास्सा, वे पंचहि मरस्लाइसोयनसायसरि गमिवा एष माता महातो मासाइपकोरीयो । 'पदग्गेण ति 10 उपसमापर मिवावर णामियपई अस्पातपदं मिस्सपल घ, एवे पदे परिफिथ पंचम् ० २१८ प्र० सा णपरिप सरस्सा पदग्गेण मर्मवि, पदमा मुचामास्यपदग्गेण ससेखाए पदसाम्साई मति । मापा जाचरी- पिसास्सपेबसाला बि संखेमपदसहस्सेहि ण मिरुन्मति । स । से णातापम्मकहामो ६ ॥ ९१ से किं त उवासगदसामो ? उवासगदसामु ण समणोवासगाणं णगराइ उज्जा णाइ थेइयाइ वैणसंढाइ समोसरणाई रायाणो अम्मा पियेरो धम्मकहाओ धम्मायरिया ॐ इहलोग-परलोइया रिदिविसेसा भोगपरिमाया परियागा सुयपरिगदा तवोवहाणाई सील- ब्बय-गुण वेरमण-पचक्खाण-पोसहोववासपढिवज्जणया पडिमाओ उवसग्गा संलेइणाओ १. मो H Rनागर-सिमेगा सयामो समापीमो। सेप 1 । सिमोगा, सोनामो विग्यसीमो संबेनामो परिवसीमो। सेन किवा मम्पपिरिमा च म त एक पाझे मामातोपामवीर मौ । पयसपसा समायो.. पणया प.. १.देतिपाति ९ बमसंग नास्ति । १२ पिपरी धम्मापरिपा पम्ममायो। यो छ । १६मोय-पप्पा रसिपि मो छ ॥२ बीस मनमायणा. . है . कमवायो। ५सीखा पपसास्वा, ॥९सपबम्म १५ पा पम्ममामो परि .
६७ 5 उवासगदसाओ अतगडदसामो य] सिरिदेववायगविरदय णंदीमुत्तं । भत्तपञ्चक्खाणाइं पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ पुणवोहिलामा अंत- किरियाओ य आघविज्जति । उवासगदसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए सत्तमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, दस अज्झयणा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, संखेज्जाइं पंदसहस्साई पयग्गेणं । संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासय-कड-णिवद्ध- णिकाइयां जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जंति णिदं- सिजति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपत्रणा आघविज्जति । से तं उवासगदसाओ ७ । ९१. से कि त उवासगदसातो इत्यादि मुत्तं । उवासक चि-सावता । तेसिं अणुब्बत-गुण-सीलव्यतोव- 10 देसणा दसमु अझयणेमु अक्खात त्ति उवासगढसा भणिता । तास मुत्तपढग्गं एकारस लक्खा वात्रणं च सह- स्सा पदग्गेणं । मुत्तालावयपदेहि संखेजाणि वा पदसहस्साई पदग्गेणं । सेसं कंठं । से तं उवासगदसाओ ७॥ ९२. से कितअंतगडदसाओ ? अंतगडदसासुणं अंतगडाणं णगराई उज्जाणाइं चेतियाई वणसंडाइं समोसरणाइं रायाणो अम्मा-पियंरो धम्मकहाओ धम्मायरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा भोगैपरिचागा पैव्वज्जाओ परियागा सुतपरिग्गहा तवोवहाणाई संलेहणाओ 15 भत्तपचक्खाणाइं पाओवगमणाई देवलोगगमणाई सुकुलपञ्चायाईओ, पुणवोहिलाभार अंतकिरियाओ य आघविज्जति । अंतगडदेसासु णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोग- दारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ संगह- णीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए अट्ठमे अंगे, एंगे सुयक्खंधे, अट्ठ १ संखेजाओ संगहणीमो जे० मो० नास्ति ॥ २ सखेजाओ पडिवत्तीओ स० हे. ल. गु० नास्ति ॥ ३ संखेजा पदसहस्सा जे. मो. मु० ॥ ४ पदसयसहस्साई समवायाझे ॥ ५ वणया ल०॥ ६°ज्जति ख० स० डे० ल०॥ ७ अक्खाइज्जति ति आ० दा० ॥ ८ वणसडाई इति स० स० हे. ल. गु० नास्ति ॥ ९ 'पियरो धम्मायरिया धम्मकहामो जे० ल० मो० मु०॥ १० 'लोइय-पारलोइया इढिवि मो० । लोइय-परलोइया इढिविजे० मु० ॥ ११ भोगपरिमोगा ख० ल• शु० ॥ १२ पन्चज्जा परियागा सुत ख० । पव्वज्जा सुत ल० ॥ १३ → एतचिहमध्यवर्ती पाठ मो० मु० नास्ति ॥ १४ °दसाणं जे० स० ॥ १५ संखेज्जाओ सगहणीमओ इति जे० मो० मु० नास्ति ॥ १६ सखेज्जाओ पडिवत्तीओ इति ख० सं० ल० शु० नास्ति ॥ १७ एगे सुयक्खधे, दस अज्झयणा, सत्त वग्गा, दस उद्देसणकाला, दस समुद्देसणकाला, सखेज्जाई पद- [सत]सहस्साई पयग्गेणं इति समवायानसूत्रे पाठः । अत्राभयदेवीया टोका- "नवरं 'दस अज्झयण' त्ति प्रथमवर्गापेक्षयैव घटन्ते, नन्द्या तथैव व्याख्यातत्वात् । यह पठ्यते 'सत्त वग्ग' त्ति तत् प्रथमवर्गादन्यवर्गा- पेक्षया, यतोऽत्र सर्वेऽप्यष्ट वर्गाः, नन्द्यामपि तथापठितत्वात् । तवृत्तिश्चयम् -- अट्ट वग्ग' ति अत्र वर्ग समूह , स चान्तकृतानामध्यय- नाना या । सर्वाणि चकवर्गगतानि युगपदुद्दिश्यन्ते ततो भणित 'अट्ठ उद्देसणकाला' इत्यादि " । इह च दश उद्देशनकाला अभिधीयन्ते इति नास्याभिप्रायमवगच्छामः । तथा संख्यातानि पदशतसहस्राणि पदाणेति, तानि च किल त्रयोविंशतिर्लक्षाणि चत्वारि च सहस्रा- १३ - णीति ।" १२१-२ पत्रे ॥
रिणदासगणिमाहचरविण्याए पुगीर संमुम [१०५३-५. वग्गा, अट्ठ उद्देसणकाला, अट्ठ समुद्देसणकाला, संखेज्जाइ पयसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अर्णता गमा, अर्णता पज्जवा, परित्ता तसा, अर्णता थावरा, सासत-कह णिचद णिकाइया जिणपण्णचा भावा आषविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदेसि ज्जति उवदसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एव चरण-करणपरूवेणा आषविज्जति । से त अंतगडदमाओ ८ | ९२. से कितं असगरदसातो इत्यादि सच । मकरदस पि-कम्मको संसारस्स पा मंदो करो ते असता, ते य तित्यारादी, दस सि-पामाग्गे इस अमापम चि सरसतो मनुकास घि। भाषा दस पि-अपत्या, सर्दसे मा मवस्था सा पष्णिम्मति सि मतो मवादसा । सरीरा-ज्युदसाय मा दस अवको चि भैठकलदसा । परं 'भंतकरकिरियामो' चि मस्य व्यारम्पा-मसलाम किरिया भवफाकिरिया, गहूब ता 10 मतकरकिरियामा चि मणिता । किरिय चि-क्रिया, चर्या स्पर्प । मापा फिरिय पि-कर्मक्षपपक्रिया, सा य सेठेसिमपत्याए । माला किरिय चि-सहुमकिरियमाण । पाना पातिकम्मेमु मंतकडेसु किरिय पि-कम्मरंपो, सा य इरियाररितो ति मणिव होति । एतं च माषषिजति । पम्गो चि-समो, सो प अवराम ममयमाग पा। सगे सम्मायणा शुगर उरिसति । तास सुचपदम्ग पीस मक्खा पखरो य सास्सा पदगोणं । सखेनापि मा पदसरस्साणि मुत्तामारगपदग्गेम । सेसई । से मतगरदमा ८ ॥ ९३ से कि त अणुत्तरोक्वाइयदमामो ? भणुत्तरोषवाइयदसासु ण अणुचरोवचाइयाणं णगयई उज्जाणाई चेइयाई र्वणसंडाई समोसरणाइ रायाणो अम्मा पियरो घेम्मकहाओ पम्मा यरिया इहलोग-परलोगिया रिद्धिविसेसा मोगपरिचागा पवज्जपरियागा सुतपरिग्गा तवोवहाणाई पडिमाओ वसग्गा संलेहणाओ भत्तपचरखाणाई पाओवगमणाई अणुवरो ववाइयत्ते उववत्ती सुफलपश्चायादीमो पुणवोदिलामा अंतकिरियाओ य आषविज्जति । 10 अणुचरोववाइयदसामु ण परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुयोगदाय, संखेज्जा वेदा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेजामो संगहणीओ, सखेज्जामओ पहिवत्तीओ। से ण अंगठ्ठयाए णमे अंगे, एंगे सुयक्तधे, तिपिण वग्गा, तिष्णि उद्देमणकाला, तिण्णि समुइसणकाला, सखेज्जाई पयसहस्साई पयग्गेणं, सखेज्जा अस्खय, अर्णता गमा, अणता पज्जवा, परित्ता तसा, अर्णता यावरा, मासय कह णिवद्ध णिकाइया जिणपण्णता भावा २ 'पिबति में । पतो.५ पम्मापरिपा पम्मकामो मो 8 मोप-पाठोपा मे ७ अगुचरोपपतो B मणुचरोपवाय चि . 2.सा. मो . पाणा: १. संगमामो पिसीमो ही मालि। मधेमामा संगनीमो मो नास्ति । १३ संग्मामो परिपतीमो. नास्ति १५ पगे सुपर रम मसपा तिणि पागा, रस गरेमयकामा रस ममुरेसबकामा सपेरमा पपसयमास्सा पपणे प.मि समपाया। बामपरेपपादा-अपमम्तयो पर वर्षे याप्रमार वर्मा गुमाते समय पोरपनपना भरीच परमेष नमामिधाम सम्वे रति, मनानियोग लि १५-14 11 . १पया . " समय सपनसंगति मोह एप मो॥ - ६९ भणुत्तरोववाइयदसामो पण्हावागरणाहं च ] सिरिदेवयायगविग्ड्यं गंदीमुत्तं । आघविज्जति पण्णविज्जंति परूविज्जति दंसिज्जति णिदसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवेणा आधविज्जइ । से तं अणु- त्तरोववाइयदसाओ ९। ०३. से किं तं अणुत्तरोववातियदमा इत्यादि मुत्तं । णस्थि जस्मृत्तरं यो अणुत्तरो, उववजणमुरवातो उप्पत्तीत्यर्थः, अणुत्तरो उपवातो जम्स सो अणुत्तरोवबाइओ, तेसि बहुश्यणातो [ में० २१८ द्वि० ] अणुत्तरोब- 5 वाइय त्ति, बग्गे बग्गे य दसऽज्झयण त्ति अतो अणुत्तरोववातियदमा भणिता। संसारे मुभभावं पड़च अणुत्तरः, अहवा गतिचतुकं पटच अणुत्तरः, अडवा देवगतीए चेव अणुत्तरः । अणुनरदेवेमु जेसि उपवातो नेमि णगरादिया कहिज्जति । इह वग्गो ति-समृहो, सो य अझयणाणं, बग्गे वग्गे दस अध्ययना इत्यर्थः । तेमिं पदग्गं छातालीसं लक्सा अ य सहम्सा, संखेनाणि वा पदसढम्साणि । मेस कंटं । से तं अणुत्तरोवबाइग्रदमा ९ ।। ९४. से किं तं पाहावागरणाई ? पण्हावागरणेसु णं अठ्ठत्तरं पसिणसयं, अछुत्तरं ॥ अपसिणसयं, अछुत्तरं पसिणा-ऽपसिणसँयं, अण्णे वि विविधा दिव्वा विजा- तिसया नाग-सुवणेहि य सद्धि दिवा संवाया आघविज्जंति । पण्हावागरणाणं परिता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ णिज्जु- तीओ, संखेज्जाओ संगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से णं अंगठ्ठयाए दसमे अंगे, एगे सुयक्खंधे, पणयालीसं अज्झयणा, पणयालीसं उद्देमणकाला, पणयालीसं समुद्देसण- काला, संखेज्जाई पदसहस्साई पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भाषा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जंति उवदंसिज्जंति । से एवंआया, एवं णाया, एवं विण्णाया, एवं चरण-करणपरूवणा आघविज्जइ । से तं पण्हावागरणाई १०॥ १४. से किं तं पण्हावागरणाहं इत्यादि मुत्तं । पण्हो त्ति-पुच्छा, पडिवयणं वागरणं, प्रत्युत्तर- 20 मित्यर्थः । तम्हि पण्डावागरणे अंगे पचासदारादा व्याख्येयाः परप्पवादियो य । अगुवाहुपसिणादियाणं च पसिणाणं अद्वैत्तरं सत । किंच-जे विज-मता विधीए जविजमाणा अपुच्छिता चेव सुभासुभं कहयंति तारिसाणं अपसिणाणं अठ्ठत्तरं सत । अंगुहादिपसिणभावं अपसिणभावं च वाफरेंति तारिसाणं पसिणा-ऽपसिणविजाणं अट्ठत्तरं सत । अहवा अणंतरा जे कहेंति ते पसिणा, परपरे पसिणापसिणा, तं पुण विजाकहित कहेंतस्स परपरं २ विज्जति स० स० दे० ल० शु० ॥ ३ सय, तं जहा-अंगुट्टपसिणाई, बाहुपसिणाई महागपसिणाई, अण्णे वि जे० ४० ल० मो० मु० । नाय पाठर्णि-वृत्तिकृद्भिगृहीतो व्याख्यातो या विद्यते ॥ ४ वि विचित्ता दिव्या सर्वासु सूत्रप्रतिषु । हारि० वृत्ता एप एव पाठो व्याख्यातोऽस्ति । मलयगिरिपादा पुन चूर्णिकारमनुसृता सन्ति ॥ ५ दिव्वा शु० स० एव वर्तते ॥ ६ दिव्वा सधाणा संघणंति इति चूर्णिकृनिर्दिष्ट पाठमेदः, दिव्या सन्धाना सन्धनन्ति ७ संखज्जामो संगहणीयो इति जे. मो. नास्ति । ८ संखेज्जाओ पडिवत्तीमो स० स० ल. शु० समवाया च नास्ति ॥ ९ विज्जति ख० सं० दे० ल. शु० ॥ 15 १ घणया ल० ॥ इत्यर्थ ॥
P - 3 जिमदासगणिमहचरमिरायाए पुष्पीय संयुय [१० ९५-१०१ मपति । अण्णे य विविषा विजातिसता कहिति । किप णागा मुगण्या माणे य मपणवासिणो ने विज-मंदा परिसिता यारसा साहुणा सह सवदति-मल्प फरेंति । पारंतर वा “विम्चा सपाणा सपर्णति" सदुसखा ममति, परदाम गर्मितादि पा उर्वति । दसममगस्स पदमा वागतिं सरला सालस य सहस्सा पदग्गेणं, संखेनागि पा पदसहस्सापि । ससे फट । स च पाहायागरणाई १० ॥ ९५. से कि त विवागमुत ? विवागमुते ण सुकह दुकहाणं कम्माणं फल-विवागा आघविज्जति । तत्य णं दस दुइविवागा, दस सुहविवागा। से' किं त दुहविवागा ? दुइविवागेसु ण दुइविवागाण गगराइ उज्जाणाइ वणसंडाई चेहयाई समोसरणाइ रायाणो अम्मा पियरो धम्मकहाओ धम्मायरिया ईहलोइय-परलोइया 'रिद्धिविसेसा निरयगमणाई दुइपरपरामओ संसारमैवपवचा दुफुलपधायाईओ दुलझोहियत्त 10 माघविज्जति । से त दुइविवागा। से किं तं मुइविवागा ? सुहविवागेसु णं सुइविवागाण गगराई उज्जाणाई वणसंडाइ चेझ्याइ समोसरणाई ययाणो अम्मा पियरो धर्मकहाओ धम्मायरिया इहलोइअ-परलोइया रिदिविसेसा भोगपस्त्रिागा पव्वजामोपरियागा सुतपरिगहा तवोवहाणाई संलेहणाओ मतपश्चरखाणाई पामोवगमणाई देवलोगगमणाई सुहपरंपरामो मुकुलपञ्चायादीमो पुणवो- 18 हिलामा अंतकिस्थिाओ य आषविज्जति । विवागमते णं परिचा वायणा. संखेज्जा अणुयोगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेन्जाओ णिज्जत्तीओ, संखेज्जाओ सगहणीओ, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ। से ण अंगठ्ठयाए एफारसमे अंगे, दो सुयसंधा, वीसं अज्झयणा, वीस उद्देसणकाला, वीर्स समुद्देसणकाला, संखेज्जाद पैदेसहस्साइ पदग्गेणं, संखेज्जा अरखरा, अर्णता गमा, अर्णता १० पज्जवा, परित्ता तसा, मणंता थावरा, सासय-कह णिबद्ध णिकाइया जिणपण्णत्ता मावा आप- विति पण्णविज्जति परूविज्जति दसिज्जति णिदसिज्जति उवदंसिज्जति । से एवआया. एवं गाया, एवं विण्णाया, एव चरण करणपख्वणा आषविज्जति । से विवागसुतं ११। ०५. से कित विवागत इत्यादि । विविपो पाका विपरनं पा विपाका, कर्ममा मुममममो या १ पिपागे मामयिग्मा ये मो 8 से fedsरधिागा इतिघ मात । समपायारे प्रमा बच्चे पम्मायरिया पम्मधामो #. होग-परणेगिपा से ५ इरिपि मो- .. पपपपा तममाया ॥ ८ से पुरवियाणा । से fe. सदपियागा! इति ए मालि। समपापाडेपो ९ धम्मापरिपा पम्मामोतोग-पारमेगियासिरिसेसा . १५ बिबागापरस प मो 8 पिपागेम । ।५ परसवसर मा १५ विति...। - म है - मो 8 । । ममनन ॥११ मा परित २ विवागसुय दिद्विवाओ य परिकम्मे सुत्ताह च ] सिरिदेववायगविरहयं णंदोमुत्त । जम्मि मुत्ते विपाको कहिज्जति तं विपाकमुतं । विपाकसत्तस्स मुत्तपदग्गं एगा पदकोडी चुलसीति च लक्सा वत्तीसं च सहस्सा पदग्गेणं, संखज्जाणि वा पदसहस्साई पदग्गेणं [जे० २१९ प्र०] । मेसं कंठं । से तं विवागसुतं ११ ॥ ९६. से कि तं दिठिवाए ? दिट्ठिवाए णं सव्वभावपरूवणा आघविजेति । से समा- सओ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-परिकम्मे १ सुताइं २ पुब्बगए ३ अणुओगे ४ चूलिया ५। 5 १६. से किं तं दिहिवाते त्ति । दृष्टिर्दर्शनम्, बदनं वादः, दृष्टीना वादी दृष्टिबाटः, तत्र वा दृष्टीनां पातः दृष्टिपातः, सभेदभिण्णाओ सचणतदिट्टीओ तत्य वदंति पतंति व ति अतो दिहियातो । सो य पंचभेदो- परिकम्मादि । ९७. से किं तं परिकम्मे ? परिकम्मे सत्तविहे पण्णत्ते, तं जहा-सिद्धसेणियापरिकम्मे १ मणुस्ससेणियापरिकम्मे २ पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३ ओगाढसेणियापरिकम्मे ४ उपसंपज्जण- 10 सेणियापरिकम्मे ५ विप्पंजहणसेणियापरिकम्मे ६ चुतअचुतसेणियापरिकम्मे ७। ९८. से किं तं सिद्धसेणियापरिकम्मे ? सिद्धसेणियापरिकम्मे चोदसविहे पण्णत्ते, तं जहा-माउगापयाई १ एगट्ठियपयाई २ अट्ठापयाई ३ पाढो ४ आमासपयाई ५ केउभूयं ६ रासिबद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभूयपंडिग्गहो ११ संसारपंडिग्गहो १२ नंदा- वत्तं १३ सिद्धावत्तं १४ । से तं सिद्धसेणियापरिकम्मे १। ९९. से किं तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे ? मणुस्ससेणियापरिकम्मे चोदसविहे पण्णते, तं जहा-माउगापयाई १ एगट्ठियपयाई २ अट्ठापयाई ३ पाटो ४ आमासपयाई ५ केउभूयं ६ रासिवद्धं ७ एगगुणं ८ दुगुणं ९ तिगुणं १० केउभूयपडिग्गहो ११ संसारपैडिग्गहो १२ णंदावत्तं १३ मणुस्सांवत्तं १४ । से तं मणुस्ससेणियापरिकम्मे २। १००. से किं तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ? पुट्ठसेणियापरिकम्मे एकारसविहे पंण्णत्ते, तं 20 जहा-पाढो १ आमासपैयाई २ केउभूयं ३ रासिवद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ तिगुणं ७ केउ- भूयपडिग्गहो८ संसारपंडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० पुट्ठावत्तं ११ से त्तं पुट्ठसेणियापरिकम्मे ३। १०१. से किं तं ओगाढसेणियापरिकम्मे ? ओगाढसेणियापरिकम्मे एकारसविहे १ विज्जति स० स० ४० ल० ॥ २ परिकम्म जे० मो० मु० विना ॥ ३ सुयाई स० ॥ ४ ओगाहणसें समवाया ॥ ५ विजहणसे ख० स० ल० शु० । विप्पजहसें समवायाझे ॥ ६ चुयमचुयल• शु० । चुयाचुय डे० ॥ ७ अट्ठपं स० ॥ ८-९ परिग्गहो ल० ॥ १० सिद्धादह स० । सिद्धयद्ध समवायाझे ॥ ११ परिग्गहो जे० ॥ १२ स्सादहं स• । मणुस्स- पद्धं समवाया ॥ १३ पयाई पवमादि । से त्त पुढ स० स० । पयाई २ इच्चाइ । से तं पुट्ठ ल• ॥ १४ परिग्गहो जे ॥ 15 ७२ 5 , विणवासगणिमहचरपियमाए पुष्णीए संजुम [सु. १०३-६ पण्णत्ते, त जहा-पादो। आमासपयाई २ केभ्य ३ रासिबद्ध ४ एगगुणं ५ दुगुण : तिगुणं ७ केउमयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णदावत्तं १० ओगादावत्त ११ । से से भोगादसेणियापरिकामे । १०२ से कि त उवसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ? उवसंपज्जणसेणियापरिक्रमे एकार सविहे पण्णते, त जहा-पादो १ आमासपयाइ २ केउभूयं ३ रासिद्ध ४ एगगुणं ५ दुगुण ६ तिगुणं ७ केवभूयपडिग्गहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावत्तं १० उवसंपज्जणावत् ११। से तं उवसंपज्जणसेणियापरिकम्मे ५। १०३ से किं तं विपंजहणसेणियापरिकम्मे ? विपंजइणसेणियापरिकम्मे एगारस विहे पण्णत्ते, त जहा-पादो। आमासपयाई २ केउमूर्य ३ रासिबद्धं ४ एगगुणं ५ दुगुणं ६ 10 तिगुणं ७ फेठभूयपडिमगहो ८ संसारपडिग्गहो ९ णंदावन १० विप्पजहणावत्तं ११ । से न विप्पजणसेणियापरिकम्मे ६॥ १०४ से कि त चुयमचुयसेणियापरिकम्मे ? चुयमचुयसेणियापरिकम्मे एगारसविहे पण्णत्ते, तं जहा-पादो १ आमामपयाई २ फेठमूर्य ३ रासिवढे ४ एगगुणं ५ दुगुण ६ तिगुणं ७ केउमयपडिग्गहो ८ मंसारपडिमाहो ९ गंदावतं १० चुयमचुयावत्तं ११ । से सं 5 धुंयमचुयसेणियापरिकामे ७ । ९७-१०४ सत्प परिकम्मे विमोम्गकरणं, मा गणितस्स सोसस परिकम्मा, उमादितमुचत्यो सस गणितस्स मोम्मो मबति । एवं गरिवपरिकम्ममुक्त्यो सेसमचादिविहिपातमतस्स जोम्गा मति । न च परिक ममतं सिबसेणियापरिकम्माविम्ममेदयो सपति, उपरमेदतो वेसीतिविरं मावरफ्यादी । दंप सर्म सम्छ परमई सक्यतो पोखिम, नागतसपदासं पा पर्व ।। किंच-- १०५. [ दियाइ सत्त परिकम्माई, छ सममइयाई, सत्त आजीवियाइ, छ चउकणइ- याई, सच तेरासियाई । से परिकम्मे ।। १०५ एतेसिं सवर्ण परिकम्माप छ मादिमा परिफम्मा ससमाका, ससिदोरमशाफ्ना एपेस्पर्पः। मानीपिकापासरस्था गोसाम्पपचिता, तेसि सिदंतमतेम पुता-पुतसरिता सच परिकम्मा पम्पनिम्नति । पाणि परिकम्मे पतर्षिता–णेगमो दुविहो-सगरितो मसंगरितो य, संगदिवो साई परिलो, मसंगदितो ममहारं, तमा १नभूपपादि । सेतं भोगार - .२ परिम्पो में पारोपवापिसे सब 4 -५ विगाप, पाहोचादि। सेस पिणाम ७-८पमधुप है. ११ एकर परमप्रति पूर्व सूमन र पर्वत । षि-मणिकमिा पुनराप्त गस्यत इति समबापासमार दत्रांचोऽनमत्रो खपत । १२ पाई माया से 10 " . . A द स . से ९ पास से पुप dt.. ॥ १.पप्रमुय .. .
दिट्ठिवाओ परिकम्मे सुत्ताई च] सिरिदेववायगविरदय गंदीसुत्त । ७३ संगहो ववहारो रिजुमुतो सद्दाइया य एक्को, एवं चतुरो,णया । एतेहिं चतुर्हि गएहिं छ ससमइकाई परिकम्माई चिंतिजति त्ति अतो भणितं-'छ चतुकणइयाई ति । ते चेव आजीविका तेरासिया मणिता । कम्हा ? उच्यते-- जम्हा ते सर्व जगं त्र्यात्मकं इच्छंति, जहा-जीवो अजीवो जीवाजीवश्व, लोए अलोए लोयालोए, संते असंते संतासंते एवमादि । णयचिंताए वि ते तिविहं णयमिच्छंति, तं जहा-दबहितो पजवहितो उभयद्वितो, अतो [जे० २१९ द्वि० ] भणियं-'सत्त तेरासियाई ति सत्त परिकम्माई तेरासियपासंडत्या तिविधाए णयचिंताए 5 चिंतयंतीत्यर्थः १॥ १०६. से किं तं सुत्ताइं? सुत्ताई वावीसं पण्णत्ताई, तं जहा-उज्जुसुतं १ परिणयापरि- णयं २ बहुभंगियं ३ विजयचरियं ४ अणंतरं ५ परंपरं ६ मासाणं ७ संजूहं ८ संभिण्णं ९ आयच्चायं १० सोवत्थिप्पण्णं ११ णंदावत्तं १२ वहुलं १३ पुट्ठापुढे १४ वेयावचं १५ एवंभूयं १६ भूयावत्तं १७ वत्तमाणुप्पयं १८ समभिरूढं १९ सव्वओभई २० पण्णासं २१ दुष्परिग्गहं २२ । 10 १ सुत्ताई धावीसाइ पण्णत्ताई, तं जहा स० स० । सुत्ताइ महासीति भवतीति मक्खायाई, तं जहा सम० ॥ २ द्वाविंशतिसूत्रनाम्नां नन्दिसूत्रप्रत्यन्तरेषु पाठमेदोऽधउल्लिखितकोष्ठकाद् ज्ञातव्य - ख० प्रति स० प्रति जे० प्रति दे० प्रति ल० प्रति मो० प्रति शु० प्रति 0 D 0 . . . १ उज्जुसुत २ परिणयापरिणय ३ बहुमंगिय ४ विज्झवियच्चिय विज्झायवाविय ५ अणतरं . . 0 बहुभगीय विजयविधत्त . विजयचरिय बहुभगीय विजयविधत विजयचरिय वियचवियत्त . . ६ परंपर D . ७ समाण मासाण मासाण समाणसं समाणस सामाण समाएसं ८ सह सजूह सजह सजूद १० मिण्ण . समिण्ण . १० आयचाइ ११ सावहिपत्त १२ गंदावत्त आयचाय सोवस्थिप्पण्ण आहचाय सोमस्थिप्पन्न जह सभिण्ण आहव्यय सोमच्छिप्पन्न आइन्चय सोवत्यियवत्त आहव्वाय सोवत्यिम घट आहव्याय सोवत्थिप्पन . मदावत्त . . १३ बहुल . । . . . . वियावत्त वियावत्त . 0 . . १८ १४ पुढापुट्ठ पुच्छापुच्छ १५ वेयावध वियावत्त वियावत्त १६ एवभूय १५ भूयावत्त दूयावत्त दूयावत्त दुयावत्त 2 वत्तमाणय वत्तमाणप्पय वत्तमाणुप्पत्त १९ समभिरूढ २० सव्वओभद्द २१ पण्णास २२ दुपरिग्गह दुष्पदिग्गह दुप्पडिग्गह परिग्गह अत्र शून्येन पाठमेदामाषो ज्ञातव्य , न तु पाठाभाव इति ।। दुयावत्त वत्तमाणुप्पत्त दुयावत्त वत्तमाणश्य दुयावत्त वत्तमागुप्पत्त . . । . . . . दुप्पडिग्गह चु० १० ७१ मिणदासगणिमइपरविययाए पुण्गीए सैनुय [१० १०७ गा. ७०-७१ देचेयाइ पावीम सुत्ताई छिण्णच्छेयणइयाई ससमयमुत्तपरिवाडीए सुचाइ १, ईमेयाई वावीस सुत्ताई अच्छिण्णच्छेयणइयाइ आजीवियसुत्तपरिवाहीए सुचाई २, इनेयाइ यावीस मुत्ताइ तिगणझ्याइ तेरासियमुत्तपरिवाडीए सुत्ताइ ३, इंचेयाइ वावीस सुत्ताई चउकणइयाई ससमयसुत्तपखिाडीए सुत्ताई ४, एवामेव सपुन्वावरेण अट्ठासीति सुत्ताई भवंतीति मक्लार्य । 5 से च सुत्ताई २। १०६ 'सत्ताई सि उग्नुमनाइयाई वापीस एपाई। वाणिय सचाई सम्पदम्माण सम्मपराग सम्बणताण सयमंगविरुपाण य देसमापि, सन्नस्म य पुनगतमवस्स मस्पस्स य स्यग चि, मतो से सूपणचावो मुला मणिता भामिपामस्पाते। परदार्षिसमस्यता पारियाणा, मागतसमदायता पा पमा।तषपातीस मुवा विमागतो महासीति मुघा मपति इमण विपिणा-मारीस सुसा गिग्णछेदणमामिलापतो।कई सिगारे णवो चिमपति! 10 उध्यवे-मो भया सर्व गिण देण इति, भरा-"पम्मो मंगसमुई." वि सिमागो (दप भ १ गा १]। एस सिसोगो मुच ऽत्पता पधेयदेव ठिता, पारितियादिसिमोगे भवेरसइचिपुष भवति। जिष्णो दो नस्मस मपति छिम्पच्छेद , मत्सेकं फरिपतपर्यवेत्यर्थः । एते एवं पारीस ससमवयसपरिपारीए सपा ठिवा । एते र पानीस अमिणरणतामिप्पायतोमानीवियसपरिवारीए ठिया। मणिपणदो माा-पसेर दुमपुलिपपरमसिसोगो मस्थवो पितियाइसिमोगे मवेक्खमाणो,पिवियादिया य पदम मणिपणवामिप्पापया मति । एनपि पानीस 1 मुलामास्वररयपविमागद्विता वि मत्पयो मप्पोष्णमवरखमाणा मरिणच्छेदणपदित चिमणति । मपपिंताए वि पानीस पेप सचा, 'वेरासियान विभपायाई ति पिकानयामिमापतो पित्पतेस्पर्य । ता ससमये विगपरिवाए पानीसं चेप मुचा पठकमाया । एवं पतरो [० २२० प्र०] पारीसातो मट्ठासीति मचा मवति । से त उचाइ २॥ १०७ से किं तं पुल्वगते ? पुज्वगते चोइसविहे पण्णत्ते, ते जहा-उप्पादपुर्व ! 20 अंग्गेणीय २ पीरियं ३ अत्षिणत्यिपवातं नाणप्पवात ५ सञ्चप्पवादं ६ आयप्पवादं ७ कम्मप्पवाद ८ पञ्चक्राणं ९ विजणुप्पवाद १० भवसं ११ पौणायुं १२ किरियाविसाल १५ लोगविवुमार १४ । प्पायस्स णे पुवस्स दस वत्थू चत्वारि चुप्लयवत्यू पण्णता १। अंग्गेणीयस्स णं पुन्वस्स चोइस वत्थू छुवालस चैलवस्थ पण्णत्ता २ । बीरियस्स णं पुवस्स अट्ठ वत्यू अट्ठ छुटवत्य पण्णत्ता ३ । अत्पिणत्थिप्पवायस्स णे पुवस्स अट्ठारस १-१-५-पाई मो म ॥ २-४-१-८ आता इति पर एष पयो मात्र समशयाोप मास्ति ।। .मति चमचा ॥ १० भागेपि ॥ १ बापपवार दिना ॥ १५ पिसाणु में - मो 84 ११ पापा । पापार ॥ १५ गरिमा को रध्यापस्स प पुपरस मागेमीपम्प प पुषस्सा भीरिपस्स में पुणस्त प्रमादिमा वापत्तमि पूर्णमामला प्रणापपुष्पस्स- भगोपीयपुनम बीरिपपुनरम सवारि, पाम्मेदो मो मु एमवे ॥ १५ गुबत्यू । विपादप ने . मो ॥१५ भग्गेबापस्स... मिमाषत्प्रे मा मु ॥ १८ पुष । भूमिमा . मी ॥ . मौ ।
७५ 10 दिट्ठिवाओ पुव्वगयसुय च सिरिदेववायगविरइयं णदीमुत्तं । वत्थू दस चुल्लवत्थू पण्णत्ता ४ । णाणप्पवादस्स णं पुवस्स वारस वत्थू पण्णत्ता ५। सच्च- प्पवायस्स णं पुव्वस्स दोण्णि वत्थू पण्णत्ता ६ । आयप्पवायस्स णं पुवस्स सोलस वत्थू पण्णत्ता ७ । कम्मप्पवायस्स णं पुव्वस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता ८ । पञ्चक्वाणस्स णं पुब्बस्स वीसं वत्थू पण्णत्ता ९ । विज्जणुप्पवादस्स णं पुवस्स पणरस वत्थू पण्णत्ता १० । अवंझस्स णं पुव्वस्स वारस वत्थू पण्णत्ता ११ । पाणायस्स णं पुब्बस्स तेरस वत्थू पण्णत्ता १२ । । किरियाविसालस्स णं पुवस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता १३ । लोगविंदुसारस्स णं पुवस्स पणु- वीसं वत्थू पण्णत्ता १४ । दस १ चोदस २ अट्ठ ३ ऽद्वारसेव ४ वारस ५ दुवे ६ य वत्थूणि । सोलस ७ तीसा ८ वीसा ९, पण्णरस १० अणुप्पवायम्मि ॥ ७७॥ वारस एक्कारसमे ११, वारसमे तेरसेव वत्थूणि १२ । तीसा पुण तेरसमे १३, चोद्दसमे पण्णवीसा उ १४ ॥ ७ ॥ चत्तारि १ दुवालस २ अट्ठ ३ चेव दस ४ चेव चुल्लवत्थूणि। आइल्लाण चउण्हं, सेसाणं चुल्लया णत्थि ॥ ७९ ॥ से तं पुव्वगते ३॥ १०७. से कितं पुव्वगतं ? ति, उच्यते-जम्हा तित्थकरो तित्यपवत्तणकाले गणधराण सबसुताधारत्तणतो 15 पुव्वं पुव्वगतमुतत्थं भासति तम्हा पुन्च त्ति भणिता, गणधरा पुण मुत्तरयणं करेन्ता आयाराइक्रमेण रयंति द्वति य । अण्णायरियमतेणं पुण पुव्वगतमुत्तत्थो पुव्वं अरहता भासितो, गणहरेहि वि पुवगतसुतं चेव पुव्वं रडतं पच्छा आयाराड । एवमुक्ते चोदक आह-णणु पुज्वावरविरुद्धं, कम्हा ? जम्हा आयारनिन्जुत्तीए भणित-"सन्वेर्सि आयारो०"गाहा आचाराङ्गनि गा ८]|आचार्याऽऽह-सत्यमुक्तम्, किंतु साठवणा, इमं पुण अक्खररयणं पड्डुच्च भणितं, पुव्वं पुन्या कता इत्यर्थः। ते य उप्पायपुव्बादिया चोदस पुन्या पण्णत्ता । पढमं उप्पायपुव्वं ति, तत्थ सबदवाणं 20 पज्जवाण य उप्पायभावमंगीकाउं पण्णवणा कता, तस्स पदपरिमाणं एका पदकोडी १ । वितियं अग्गेणीयं, तत्थ वि सव्वदव्याण पज्जवाण य सन्चजीवविसेसाण य अग्गं-परिमाणं वण्णिजड त्ति अग्गेणीतं, तस्स पदपरिमाणं छण्णउतिं पदसतसहस्सा २ । ततियं वीरियप्पवायं, तत्थ वि अजीवाणं नीवाण य सकम्मेतराण वीरियं प्रवदति त्ति वीरियप्पवादं, तस्स वि सत्तरि पदसतसहस्सा ३ । चउत्यं अत्थिणत्थिप्पवादं, ज लोये जहा अत्थि जहा वा णत्थि, अहवा सितवादाभिप्पाढतो तदेवास्ति नास्तीत्येवं प्रवदतीति अत्थिणत्थिप्पवाद भणितं, तं पि पदपरि- 25 माणतो सर्टि पदसतसहस्साणि ४ । पंचमं णाणप्पवादं ति, तम्मि मतिणाणाइपंचकस्स समभेदं प्रख्वणा जम्हा कता तम्हा णाणप्पवाद, तम्मि पदपरिमाणं एका पदकोडी एगपणा ५ । छठं सच्चप्पवादं, सच-सजमो सच्च- १ चूलवत्थू ल० शु० । चूलियावत्थू जे० हे० मो० मु० ॥ २ विजाणु जे० ल० मु० ॥ ३ पाणायुस्स स० । पाणाउस्स जे० ३० ल० मो० मु० ॥ ४ चुलब मो० शु० सम० ॥ ५ चूलिया सं० विना ॥ ६ स्याद्वादाभिप्रायत ॥ ३ .
बिणदासगणिमहाचरविडयाप पुण्मीर संजय [१० १०७ गा० ७७-७९ इश्चयाइ बावीस सुत्ताई छिण्णच्छेयणइयाई ससमयसुत्तपरिवाडीए सुंचाई १, ईचेयाई यावीस सुत्चाई अच्छिण्णच्छेयणइयाइ आजीवियसुत्तपरिवाहीए सुनाई २, इचयाइ बावीस मुत्ताइ तिगणझ्याइ तेरासियमुत्तपरिवाहीए सुचाइ ३, देखेयाइ बावीस सुत्ताई चउफणइयाई ससमयसुत्तपरिवाहीए सुचाई ४, एवामेव सपुलावरेणं अट्ठासीति सुत्ताई भवंतीति मक्खायं । 5 से तं सुत्ताई २। १०६ 'मुचाई ति उम्दसताइयाई पाषीस सुचाइ । वाणिय सचाइ सम्बदमाग सम्बपञ्चपाप सम्पयवाद समर्मगविकमाण य वंसगागि, सम्मस्स य पुष्पगवमुतस्स भत्पस्स प पग चि, मतो ते स्यणचावो एचा मषिता महामिषाणस्पावे। ते य इवाणि एचस्यतो योनिमणा, मागससमदायसो या बचा। वेव पावीस मचा दिमागतो महासीति सचा मवि इमेण विधिणा-नावीस चा रिगरपदणसामिप्यायतो।रिणदवसोचि मगति ! 10 उम्पते-मो भयो सर्च प्रियदेमासि, मा-"पम्मो मंगसमुफई." वि सिसोगो [दश भ १ गा १] एस सिसोगोमुच ऽस्यतो परेय देण ठितो, पो वितियादिसिसोगे मपेक्सपियुष ममति । णिो दो मस्सस मावि हिम्मदा, प्रत्येकं कल्पितपर्यतेस्पच । एतेष पारीस ससमवपरिपारीए सचा टिवा । एते पर पाबीस मणिपदणवामिपायतोमागविममुचपरिसारीए ठिता। मणिपतो नहा-एसेर दुमपुस्फिरपटमसिमोगो मत्वतो पितियाइसिसोगे मरेक्समापो, वितियादिया य परम अणिवपतामिपाययो मपति । एपंपि पापीस 1 मुचामास्वररयमसिमागट्टिवा पि मस्ययो अमोणमोक्खमाणा मणिनगपटिस पि मणति । पचिसाए गि बावीस पेप प्रत्ता, 'परासियाण विकमायाई वि प्रिनयामिमायतो निस्पतेत्पर्षः। वा ससमये विपपरिवाए बावीस वेर मुचा पतफमाया । एवं परो [2० २२० प्र० ] पालीसातो महासीति पचा मनसि । सेच 4 सपार २॥ 0 १०७ से किं तं पुव्वगते ? पुबगते चोदसविहे पण्णत्ते, त जहा-उप्पादपुर्व ! अंग्गेणीय २ वीरियं ३ अत्पिणत्थिप्पवातं हे नाणप्पवात ५ सञ्चप्पवादं ६ आयप्पवादं ७ कम्मप्पवाद ८ पञ्चखाणं ९ विजणुप्पवाद १० भवनं ११ पाणायु १२ किरियाविसाल १३ लोगवितुसार १ । प्पायस्स णं पुल्बस्स दस वत्थू चत्तारि चैलयवत्यू पण्णचा १। अग्गेणीयस्स णं पुल्वस्स चोइस वत्यू वुवालस घुलवत्यू पण्णता २ । वीरियस्स ण पुवस्स भट्ट वत्यू भट्ट चुलवत्यू पण्णता ३ । अत्पिणत्मिपवायस्स णं पुवस्स अट्ठारस 1-1-40 पाt मो म 1-1-1-८ सुत्ताहति पर "ल पत्ते का समचाया अपि नास्ति । महिपमनचाप ॥१. भोपि ॥ १ वाजपा-विध ॥ १२ विमाण- मो ५ २५ पापा । पाचार.. ।। १४ भास्मा पप्पापस्स 4 पुस, भागेषीयम्म पुम्बस्स पीरियस्म से पुष्पस्म सारित चलपि पूनामावाम रणपपुम्पस्सनं भगणीपपुनस्स में सीरिपपुण्यस्त सवारि. पारमेपो मो मा १५ प्रमत्र । भियावत् । मो 8 n५ मीणावस्थ. मिमाषर ! मा ॥१८ म' । मियाल . . मी .. पो " n ह ७५ 10 दिविवाओ पुबगयसुय च] सिरिदेववायगविरइयं णदीमुत्तं । वत्थू दस चुलवत्थू पण्णत्ता ४ । णाणप्पवादस्स णं पुवस्स वारस वत्थू पण्णत्ता ५। सच- प्पवायस्स णं पुव्वस्स दोण्णि वत्थू पण्णत्ता ६ । आयप्पवायस्स णं पुवस्स सोलस वत्थू पण्णत्ता ७ । कम्मप्पवायस्स णं पुव्वंस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता ८ । पञ्चक्खाणस्स णं पुवस्स वीसं वत्थू पण्णत्ता ९ । विज्जणुप्पवादस्स णं पुवस्स पणरस वत्थू पण्णत्ता १० । अवंझस्स णं पुव्वस्स वारस वत्थू पण्णत्ता ११ । पाणायस्स णं पुब्बस्स तेरस वत्थू पण्णत्ता १२ । । किरियाविसालस्स णं पुव्वस्स तीसं वत्थू पण्णत्ता १३ । लोगविंदुसारस्स णं पुव्वस्स पणु- वीसं वत्थू पण्णत्ता १४ । दस १ चोदस २ अट्ठ ३ ऽद्वारसेव ४ वारस ५ दुवे ६ य वत्थूणि । सोलस ७ तीसा ८ वीसा ९, पण्णरस १० अणुप्पवायम्मि ॥ ७७॥ बारस एकारसमे ११, वारसमे तेरसेव वत्थूणि १२ । तीसा पुण तेरसमे १३, चोद्दसमे पण्णवीसा उ १४ ॥ ७८ ॥ चत्तारि १ दुवालस २ अट्ठ ३ चेव दस ४ चेव चुल्लवत्थूणि। आइल्लाण चउण्हं, सेसाणं चुल्लया णत्थि ॥ ७९ ॥ से तं पुव्वगते ३॥ १०७. से किंतं पुब्वगतं ? ति, उच्यते-जम्हा तित्थकरो तित्थपवत्तणकाले गणधराण सव्वमताधारत्तणतो 15 पुच्वं पुव्वगतमुतत्थं भासति तम्हा पुन्च त्ति भणिता, गणधरा पुण मुत्तरयणं करेन्ता आयाराइकमेण रयंति द्वति य । अण्णायरियमतेणं पुण पुन्यगतसुत्तत्यो पुव्वं अरहता भासितो, गणहरेहि वि पुवगतसुतं चेव पुव्वं रइतं पच्छा आयाराइ । एवमुक्ते चोदक आह-णणु पुन्वावरविरुद्धं, कम्ढा ? जम्हा आयारनिग्जुत्तीए भणितं-"सन्वेसि आयारो"गाहा[आचाराङ्गनि गा ८ ]|आचार्याऽऽह-सत्यमुक्तम्, किंतु साठवणा, इमं पुण अक्खररयणं पहुच्च भणितं, पुव्वं पुन्या कता इत्यर्थः। ते य उप्पायषुब्बादिया चोदस पुब्बा पण्णत्ता । पढमं उप्पायपुध्वं ति, तत्थ सबदव्वाणं 20 पज्जवाण य उप्पायभावमंगीकाउं पण्णवणा कता तस्स पदपरिमाणं एका पदकोडी १ । वितियं अग्गेणीयं, तत्थ वि सव्वदवाण पज्जवाण य सन्नजीवविसेसाण य अग्गं-परिमाणं वणिज्जइ त्ति अग्गेणीतं, तस्स पदपरिमाणं छण्णउतिं पदसतसहस्सा २ । ततियं वीरियप्पवायं, तत्थ वि अजीवाणं जीवाण य सकम्मेवराण वीरियं प्रवदति त्ति वीरियप्पवादं, तस्स वि सत्तरिं पदसतसहस्सा ३ । चउत्थं अत्थिणत्थिप्पवादं, जं लोये जहा अत्थि जहा वा णत्थि, अहवा सितवादाभिप्पादतो तदेवास्ति नास्तीत्येवं प्रवदतीति अत्थिणत्थिप्पवादं भणितं, तं पि पदपरि- 25 माणतो सहि पदसतसहस्साणि ४ । पंचमं णाणप्पवादं ति, तम्मि मतिणाणाइपंचकस्स सप्रभेदं प्रख्वणा जम्हा कता तम्हा णाणप्पवाद, तम्मि पदपरिमाणं एका पदकोडी एगपणा ५ । छठें सच्चप्पवादं, सच्च-सजमो सञ्च- १ चूलवत्थू ल० शु० । चूलियावत्थू जे० हे० मो० मु० ॥ २ विजाणु जे० ल० मु० ॥ ३ पाणायुस्स स० । पाणाउस्स जे० ३० ल० मो० मु० ॥ ४ चुलब मो० शु० सम० ॥ ५ चुलिया स० विना ॥ ६ स्याद्वादामिप्रायत ॥ ? .
७६ - 18 विणवासगनिमाचरचिरइयाप पुष्णाए समुप [मु० १०८-१० पपण पा, व सर्व मत्य समेदं सपरिवर्स च पणिज्जति सबप्पपाद, उस्स परपरिमान एगा परफोडी एप्प दापिया ६ । सचर्म आपप्पयास, माय पि-आत्मा, [अ० २२० वि० ] सो णेगा मत्व णपारिसणेहिं गम्मि जति पप्पराद, सस्स वि पदपरिमाण रेखीस पदकोडीयो ७ । महम कम्मप्पबाद, णाणानरपाइयं विभ कम्म पगति-द्विति-अशुमाग-प्पदेसादिपरि मेदेहि अाणेहि य उत्चरचरमेदेहि मस्य बणिज्जति स कम्मप गाद, वस्स वि पदपरिमाण एगा पदकोडी मसीति च पदसहस्साणि मरवि ८१ परम परमाण, पम्मि सम्पपवरखागमरूप पणिजति पि असो पक्षस्लामप्पाद, तस्स य पदपरिमाप पारासीति फरसतसास्सानि माति ९ । इसमें पिजणुपवान, तस्य य मणेगे विचाविसमा पणिवा, सस्स परपरिमान पगा पाकाली दस प पदसतसहस्साणि १० । एगाइसम अयंत ति, पं गाम-णिप्फर्स, म नमः, सफछेत्यर्या, सम्मे णाम-सर-समममोगा सफला पमिति, अपसत्या य पमादादिया सम्वे मममफला बगिता, मता अरंभ, 10 तस्स पि पदपरिमाम मधीस पदकोरीमो ११ । पारसमं पाणायु, तस्य आ-भापपिपाण सम समई माणे य माणा पष्णिता, तस्स पदपरिमाम पगा पदकोरी एप्प प पदसतसास्सा १२ । तेरसम किरियाषिसास, तस्व कायकिरियादियामो पिसास पि-ममेवा, सममकिरियामो प दकिरिपविरामा य, तस्स वि परपरिमाने पर कोरीयो १३ । पोरसमं छोगपिंदुसार, प इमम्मि सोए मुतसोए पा पिदुमिन मातरम्स [सारं-] सम्मधर्म समस्सरसपिरातपस्तिषमतो सोगबिंदुसार, तस्म पदपरिमाण भररस पदकोरीमो १४ । ३ ॥ दाणि मणिमोगो सि- १०८. से किं तं अणुमोगे ? अणुओगे दुविहे पण्णचे, तं जहा-मूलपदमाणुआगे य गंडियाणुओगे य । १०८ अनुयोग इस्पेसद् अनुस्मो योगः अनुयोग इति । एवं सर्प एव सप्रायों पाग्यः । मन्म-भर पर्याय शिप्यादियोगविक्षाताऽनुपागो पापा । स प दिविष भूसपरमाणुयोगो गरिकापिशिएम ॥ तस्य- १०९. से कि त मूलपढमाणुओगे ? मूलपढमाणुओगे णं मरहताणं भगवताणं पुब्ब भवा देवलोगगमणाइ आउँ चवणाई जम्मणाणि य अभिसेया रायवरसिरीओ पञ्चज्जाओ, तवा य उग्गा, केवलनाणुप्पयामो तित्यपवचणाणि य मीसा गणा गणषय य अज्जा य पवत्तिणीमो य, संघस्स चउब्बिस्स जं च परिमाणं, जिण मणपज्जव मोहिणाणि-समत्तसुय णाणिणो य वादी य अणुत्तरगती य उत्तरवेउन्विणो य मुणिणो जचिया, जत्तिया सिद्धा, • मिडिपहो जह य देसिओ,जचिर च काल पादोवगओ, जो जहिं जत्तियाइ भत्ताइ छेदत्ता अंतगडो मुणिवरुत्तमो तमरओघविष्णमुफो मुक्खसुहमणुत्तरं च पत्तो, एवे अन्ने य एवमादी भावा मूल्यढमाणुओगे कहिया । से च मूलपदमाणुभोगे । .२ प फिरिप में रिधगम .. नरपिणा यमुपिणो इति दम पारित ॥षता ..ो ॥ मगुत्तर पचो से . 40 तीसरे . मु॥४ायत ॥५चर ॥ परमम्मे ॥
७७ . जे अणुओगसुयं मूलपढमाणुओगो गडियाणुओगो य] सिरिदेववायगविरइय णंदीसुत्तं । १०९. 'मूलपढमाणुयोगो' त्ति, इह मूलभावस्तु-तीर्थकरः, तस्य प्रथम-पूर्वभवादि, अहवा [जे० २२१ प्र० ] मूल एवं प्रथमः मूलपढमाणुयोगो। एत्य तित्थगरस्स अतीतभवभावा वट्टमाणभवे य जम्मादिया भावा कहिज्जति। अहवा मूलस्स पढमा भावा ते मूलपढमाणुयोगो भण्णति । एत्थ तित्थकरस्स जे भावा प्रसूतास्ते परियाय- मृत-सिस्साइया भाणितव्वा ।।. ११०. से किं तं गंडियाणुओगे? गंडियाणुओगेणं कुलगरगंडियाओ तित्थगरगंडियाओ 5 चक्वट्टिगंडियाओ दसारगंडियाओ बलदेवगंडियाओ वासुदेवगंडियाओ गणधरगंडियाओ भद्दबाहुगंडियाओ तवोकम्मगंडियाओ हरिवंसगंडियाओ ओसप्पिणिगंडियाओ उस्सप्पिणि- गंडियाओ चित्तंतरगंडियाओ अमर-णर-तिरिय-निस्यगइगमणविविहपरियट्टणेसु एवमाइयाओ गंडियाओ आघविज्जंति । से तं गंडियाणुओगे । से तं अणुओगे ४ । ११०. गंडियाणुओगो त्ति इक्खुमादिपर्वगंडिकावत् एक्काहिकारत्तणतो गंडियाणुओगो भणितो। ता य 10 कुलकरादियाओ, विमलवाहणादिकुलकराणं "पुन्वभव जम्म णाम प्पमाण" गाहा [ आव नि गा. १४९ ] एवमादि जं किंचि कुलकरस्स वत्तव्यं तं सव्वं कुलकरगंडियाए भणितं । एवं तित्थकरादिगंडियासु वि । 'चित्ततर- गंडिय' त्ति चित्रा इति-अनेकार्था, अंतरे इति-उसभ-अजियतरे ता दिट्ठा, गडिका इति-खंडं, अतो चित्तंतरगंडिका भणिता । तासि पख्वणे पुवायरिएहि इमा विधी दिहा- आदिच्चजसादीणं उसभस्स पयोपदे णरवतीणं । सगरमुताण सुबुद्धी इणमो संख परिकहेति ॥१॥ चोद्दस लक्खा सिद्धा णिबईणेक्को य होति सबढे । एवेकेकटाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥२॥ पुणरवि चोइस लक्खा सिद्धा निवतीण दोण्णि सबढे । दुगठाणे वि असंवा पुरिसजुगा होति णातव्या ॥३॥ जाव य लक्खा चोदस सिद्धा पण्णास होति सबढे । पण्णासवाणे वि तु पुरिसजुगा होतऽसंखेज्जा ॥४॥ एंगुत्तरा तु लक्खा सबढे णेय जाव पण्णासा । एक्केकुत्तरठाणे पुरिसजुगा होतऽसंखेजा ॥५॥ १। विवरीयं सबढे चोदस लक्खाइं निबुतो एगो । स चेव य परिवाडी पण्णासा जाब सिद्धीए ॥६॥२। तेण पर दुलक्खादी दो दो ठाणा य समग वच्चति । सिवगति-सबढेहिं इणमो तासि विही होड ॥७॥ दो लक्खा सिद्धीए दो लक्खा णरवतीण सबढे । एवं तिलक्ख चतु पंच जाव लक्खा असंखेजा ॥८॥३। सिवगति-सबढेहिं चित्तरगंडिया ततो चउरो । एगादेगुत्तरिया एगादिविउत्तरा वितिया ॥९॥ ततिएगादितिउत्तर तिगमादिविउत्तरा चतुत्थेवं। [जे०२२१ द्वि०] पढमाए सिद्धको दोणि य सव्वट्ठसिद्धम्मि॥१०॥ तत्तो तिण्णि णरिंदा सिद्धा चत्तारि होति सबढे । इय जाव असंखेजा सिवगति-सबढसिद्धेहिं १ ॥११॥ ताहे विउत्तराए सिद्धेको तिमि हौति सबढे । एवं पच य सत्त य जाव असंखेज दो वि त्ति २ ॥१२॥ एग चतु सत्त दसगं जाव असंखेज होति दो वि त्ति । सिवगति-सबढेहिं तिउत्तराए तु तव्या ३ ॥१३॥ १ परूवणा पुन्वायरिपहि इमा दिट्ठा आ० दा० ॥ २ पगुत्तरा उ टाणा सबढे चेव जाव पण्णासा । एकेक- तरठाणे दा० ॥ ३ सम्वट्ठाणे य आ० ॥ ४ तेसिं हारि०वृत्तौ ॥ ५ दोणि ति दा० ॥ ६ रा पत्थ गेयचा आ० । राए मुणेयष्वा दा० ॥ 15 21 25 ७८ 6 10 ८ मिणदासगणिमातरविरुयाए पुग्णार संमुम [सु० १११-१२ सारे-तिफगादिपिठचराए मठमचीस तु सियग ठावेतुं । फाम पत्यि तु खेयो सेसेस ईमो मवे खेको ॥१५॥ दुग पण परग तेरस सघरस दुवीस छ व महेव । पारस पोरस ता वीस एप्पीस पणुमीसा ॥१५॥ एफारम देरीसा सीतासा सतरि सबसचरि या । इग दुग सचासीवी एगपरिमेव पापट्टी ॥१६॥ मउपचरि पठीसा छातास सत तोष पनीसा । एवे रासीले विगमंटेवा माकमसो ॥१०॥ सिपगति सोहि दो दो ठाण विसमचरा णेया । भार उणवीसठाणे उगठीसं पुम पीसाए ॥१८॥ पिसमुचरा य परमा एबमसंख विसावरा गेया । सम्मत्य वि मंतिम् माणाए मादिम ठाम ॥१९॥ गई । मठणचीसं पारा ठावेतु पत्यि परमए खेयो । सेसे भरपीसाए सम्मत्य दुगादियो खेमो ॥२०॥ सिपगति परमादीए मितियार वह यहोवि सम्महे । इय एगैसरिताई सिपगति-सम्माठागाई ॥२१॥ एममसंखजामो पितरगरियामो सवा । नाप मिवसाधुराया ममिविणपिता समुपप्णो १ ॥२२॥ एप गादि पिचवरगठिया समचा । इमा एतासिं ठरणा- सिदा सरला १४|१४] १४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४ सम्पटे सरला १ २ ६ ९ | १०५० एवं भाव असंखेमा परिसशुगा सिदा । मवो परे- सिद्धा रूपमा १ ६ १०५० सम्महे सकता १४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४|१४ एवं पि मसखेजा पुरिसरागा सिदा । एते नि लक्सा- ६ ९ ११०/११/१२ ३ ५ ६ १० ११ १२ एवं माप मसलेम्बा भापसिया दुगादिपराधरा दो [थे. २२२ प्र ] निगमि ।। सिदा ९११, १३, १५, १०, १९ ६ १०|१२|१४|१६१८/२० एवं मससेखा। एगादेराचरा पामा पितरंगरिया णेया ॥ सिदा ९ | १३ | १७/२१/ २५/२९| ३३ | २०४१ सम्छे ७।११।१५/१९/ २३|२७३१३५९|४५ एम मसखेखा । एमादिगिउचरा वितिया पिचवरगरिया ॥ रमे म मामा वान्तरमनियापारम्पविशेषायाममा मात्रमरित्नभिसकारारिमनीनार मप्रियदुर्गपरम्पारपाषा ११ मे पये प्रपी । २ ४ ७ mr 1. २ ४ सिदा ममता सम्पढे सरस्सा ४ ७ ८ 20 ar २ ८ ३ ७९ सिरिदेववायगविरइयं णदीसुत्त । दिद्विवाओ चूलियामओ य] ७४ 5 10 सिद्धा ७|१३| १९ २५|३१|३७ ४३ ४९ ५५ सबढे ४ | १० | १६ २२ १० १६|२२२८|३४ ४०४६/५२५८ एवं जाव असंखेजा। एगादितिउत्तरा ततिया चित्तरगंडिया ।। सिवगति | ३ ३ ८ १६ १६ २५/११/१७ २९/१४/५० ०८०५ सन्वटे ५ | १२ २० ९.१५ ३१, २८/२६७३, ४ ९०६५ २७ १०३ सबढे २९ ३४ ४२ ५१ ३७/४३ ५५ ४० ७६ १०६ ३१ १०० ९८ ७५ ५५ सिवगति ३१ ३८ ४६ ३५ ४१ ५७ ५४ / ५२ ९९ ३० ११६/ ९१ ५३ १२९ सेसं गाहाणुसारेण तव्वं जाव असंखेजा ४ ॥ १११. से कि तं चूलियाओ? चूलियाओ आइल्लाणं चउण्हं पुवाणं चूलिया, अव- सेसा पुब्बा अचूलिया । से त्तं चूलियाओ ५ । १११. 'चूल' ति सिहरं । दिटिवाते जं परिकम्म-मुत्त-पुच-अणुयोगे यण भणितं तं चूलासु भणितं । ताओ य चूलाओ आदिल्लपुलाण चतुण्डं जे चूलवत्यू भणिता ते चेव सव्वुवरि दृविता पढिज्जति य, अतो ते मुयपचय- चूला इव चूला । तेसिं जहक्क मेण संखा चतु वारस अट्ठ दस य भवंति ५ ॥ ११२. दिट्ठिवायस्स णं परित्ता वायणा, संखेज्जा अणुओगदारा, संखेज्जा वेढा, संखेज्जा सिलोगा, संखेज्जाओ पडिवत्तीओ, संखेज्जाओ णिज्जुत्तीओ, संखेज्जाओ 15 संगहणीओ । से णं अंगठ्ठयाए दुवालसमे अंगे, एगे सुयक्वंधे, चोद्दस पुवा, संखेज्जा वत्थू, संखेज्जा चुल्लवत्थू, संखेज्जा पाहुडा, संखेज्जा पाहुडपाहुडा, संखेज्जाओ पाहुडि- याओ, संखेज्जाओ पाहुडपाहुडियाओ, संखेज्जाई पैंदसहस्साइं पदग्गेणं, संखेज्जा अक्खरा, अणंता गमा, अणंता पज्जवा, परित्ता तसा, अणंता थावरा, सासत-कड-णिवद्ध-णिकाइया जिणपण्णत्ता भावा आघविज्जति पण्णविज्जति परूविज्जति दंसिज्जति णिदंसिज्जति उव- 20 दंसिज्जंति । से एवंआया, एवंणाया, एवंविण्णाया, एवं चरण-करणपख्वणा आघविज्ज- ति । से तं दिठिवाए १२ । ११२. संखेजा वत्थू पणुवीमुत्तरा दो सता । 'संखेज्जा चूलवत्यु' त्ति चतुत्तीस ।। १-२ चूलिया स्र० स० ल० शु० ॥ ३ चूलिया, सेसाइ पुब्वाइ अचूलियाई, से तं जे० मो० मु० ॥ ४ चूलिया ख० स० ० शु० ॥ ५ दिट्ठिवाए ण ख० स० ल० शु० ॥ ६ अंगहाए ख० शु० ॥ ७ यारसमे जे० मो० मु० ॥ ८ पुवाई जे. मो० मु• ॥ ९ चूलवत्थू ख० स० सम• विना ॥ १० पदसतसह सम० ॥ ११ विजंति स० जे० ॥ , , ८० -- 5 मिगदासगगिमहरविरायाए धुण्णए सेनुम [सु० ११३-१६ गा० ८. ११३ इंचयम्मि दुबालमंगे गणिपिडगे अणता भावा भर्णता अभावा भर्णता हेऊ अर्णता अहेऊ अणता कारणा भणंता अकारणा अणता जीवा अणता अजीवा अणंता भवसिद्धिया अर्णता अभवसिद्धिया अर्णता सिद्धा अणता असिद्धा पण्णत्ता । संगहणिगाहा- भावममावा हेउमहेऊ कारणमकारणा चेव । जीवाज्जीवा भवियममविया सिद्धा असिद्धा य ।। ८०॥ ११३ अर्णता भाव चि मपनं मतिर्दा माप, ते प मीना-जीवात्मका मर्मता प्रतिपदा । 'अपवा ममा' सि भमयन अमायः ममूतिया । नाजीमा मनीरवेण भमापो, ममीरा य नीरवेण, पडो पहचेप, पडो य घरचेण, एमादि मंसा ममावा प्रतिपदा । माग भा नामाया माना सि परिपक्वतो पाया धेर मणता ममावा मपति । 'मणवा 'चि पंच-दसारयषपणेस परखपम्मत्वं सपरम्लसच ममिलसिवमस्पसापक 10 पयम हेतू मनति, भामा सम्पनुचिनुचे वयण हेतू मणति, मामा सम्पे जिणषयणपरा इद, मतिपतिकचनवो, मिसहेतुपपण म, एचस्म य अण[ थे० २२२ गमचमतो, एष भगवा हेत् । मणितपरिरक्ततो य अगवा पेर मोदू । 'अणता कारण' चि फासापर्य कारण वि, वे यपयोग-वीससातो भाता मानिसम्मा। मंच मस्स मसापक तस्स अकारण, मा पासादयो परस्स, एवं भवता अकारमा । 'मणंठा नीमा' इत्यादि कठे।। ११४ ईच्चेइयं दुवालसंग गणिपिडगं तीए काले अर्णता जीवा आणाए विरादेवा 15 चाउस्त संसारकतारं अणुपरियट्टिस । इमेहर्य दुवालसंग गणिपिडग पडप्पण्णकाले परिचा जीवा आणाए विराहेता चाउरत संसारकंतारं अणुपस्पिटुंति । इभेइयं दुवालसंगै गणिपिढगं अणागते काले अर्णता जीवा माणाए विराईचा चाउरतं संसारकतार अणुपरियट्टिसति । ११४ मे दुपालसर्ग गणिपिवर्ग तीते काळे मर्णता जीवा माणाए निरादेचा इस्पादि । 'वाससंग गपिपिर' ति तिमि पम-पचतो मस्पतो तदुमपदो य । पमेव माना तिमिरा-उचापा मस्पामा १खेपम्मि. ॥२ कारणा दी। मनीष मविपउमविपा तत्तो सिया. याममारता बनवानामोनिसमानो वकारिकम्मानिनिमियरम-पत्यारिलो प्रमोमपारी-पापागनीसार- निगममीमा मिरविमति मापमपमन पर्ष पनि । या “पतिमा परमो माययो पहिलामुखलोवपरी-पितो ५ मिमी बहारो • पवारपिपरी - मिपम नियमबमिपुरी समो । P इति ["ald पंचायत पन्त पशाधिकाभिमाषा । मसानों पर मार मायम--पापार-ममनापसामन पचागमन मेगा मा पुन रसायन । वा-गरावि पसापमा पाप काहामि, पतिया पापो मरतो , पानानिमयो मितिमो एवरेस दो को रविमो पालो मनमो • गियो परमो मचलो ५ विदेशतिरी मो गारो मो मारविमरोगामी मिनमन बामो भगमनाविमो समो, रविबरणे या ३ -१९ । बामराव प्रतिमारप बमोचम-'प्रविमोफसव-नियमनापीमनपरी [मार 1-1-11] कामिपरिमदाकि पत्र । - सेप Aमत रे । निमत्ती विकास परिसडोसिये.आप परितो र निमम .. ११. " एकाबिनियुधि । बस्सा मामा हारिम तिराया । योग पारपौषिममपि न विस्मरणीयम् । ४ अपमे सपस्वपम्मन्सपस्मत-ममिमसितमयसापा - ५ पारामतोमा राखे । एवमपि च ।
सुयणाणविराहगा-ऽऽराहणाण फलाह ] सिरिदेक्वायगविरइय गंदीसुत्त । ८१ तदुभयआणा य ऐव एगहिता तहा वि अभिधाणतो विसेसो कजति-यदा आज्ञाप्यते एभिः तदा आज्ञा भवति, तंतुंपटव्यपदेशवत् । आज्ञाप्यते यया हितोपदेशत्वेन सा आज्ञा इति । इदाथि एतेसिं विराहणा चितिजति-ज सुत्ततो दुवालसंगं गणिपिडगं तं अत्थतो अभिनिवेसेण अण्णहा पागतो ताए अत्याणाए मृत्तं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीवा संसारं भमितपुया, गोट्ठामाहिलयत् । अहवा जं अत्यतो दुवालसंगं गणिपिडगं तं मुत्ततो अभिणिवेसेण अण्णता पढंतो ताए मुत्ताणाए अत्यं विराहेत्ता तीते काले अणंता जीवा संसारं भमितपुब्बा , जमालिबत् । अहवा आणं ति-पंचविहायारायरणसीलस्स गुरुगो हितोपदेसवयणं आणा, तमण्णधा आयरंतेण गणिपिडगं विराधितं भवति, एवं तीए काले अणंता जीवा संसार भमितपुया, एसो अवरसमो अत्यो। इमो अणक्खरसमो-आणाए विराधेत्ता इति जहा छायाए भुजित्ता गनो, णो च्छायाए करणभूयाए मुंजित्ता, किंतु च्छायाया भुक्त्वा गतेनि, एवं आज्ञायां विराधनं कृत्वा । सा य आणा इमा-'इचेयं दुवालसंगं गणिपिडगंआणाए विराहेत्ता'। सेसं पूर्ववत् । पड़प्पण्ण-अणागतेमु वि मुत्तेमु एव चेव वत्तव्यं, णवरं पड़प्पण्णे काले परित्ता नीवा 10 इति, अणंता असंखेजा य [जे० २२३ प्र०] ण भवंति, सणिमणुयाणं संखेजत्तगतो॥ ११५. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अतीतकाले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकंतारं वितिवेइंसु । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं पडुप्पण्णकाले परित्ता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकंतारं वितिवयंति । इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं अणागए काले अणंता जीवा आणाए आराहेत्ता चाउरतं संसारकतार वितिर्वतिस्संति । ११५. तिमु वि आराधणमुत्तेसु एवं चेव वत्तव्यं ।। ११६. इच्चेइयं दुवालसंगं गणिपिडगं ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ ण भवति ण कयाइ ण भविम्सति, भुविं च भवति य भविस्सति य, धुवे णिअएं सासते अक्खए अब्बए अव- ट्ठिए णिच्चे । से जहाणांमए पंचस्थिकाए ण कयाति णाऽऽसी ण कयाति गत्थि ण कयाइ ण भविस्सति, भुविं च भवति य भविस्सति य, धुवा णीया सासता अक्खया अव्वया 20 अवट्ठिया णिचा, एवामेव दुवालसंगे गणिपिङगे ण कयाइ णाऽऽसी ण कयाइ णस्थि ण कयाइ ण भविस्सति, भुवि च भवति य भविस्सति य, धुवे णिऔए सासते अक्खए अव्वए अवट्ठिए णिच्चे। ११६. ण कताइ णाऽऽसीत्यादि । त्रिकाले नास्तिखभावप्रतिषेधकं सूत्रम् । 'भुवि च' इत्यादि त्रिकाले अस्तिखभावप्रतिपादक सूत्रम् । त्रिकालभावितणतो चेव अचलभावखाद् ध्रुवं मेर्वादिवत् । धुवत्तणतो चेव जीवादि- 25 १ पए पग दा० ॥ २ ततुमि. पटं व्यय, देवदत्तवत् आ० दा० ॥ ३ तीण काले जे० मु० ॥ ४-५-६ वीइव जे. मो० । वीतीव शु० ॥ ७ णीते स्त्र. ल. शु० ॥ ८°णामे ख० ॥ ९ काया ख० हे. ल. शु० ॥ १०-ण भवंति ण कयाइ ण भविस्संति, भुविं च भवति च भविस्संति य, धुवा णीया सामता अक्खया अन्वया अवडिया णिचा, स० ल० शु० ॥ ११ णीते ख० ल. शु० ॥ चु० ११ ८२ मिणदासगणिमहत्तरविययाप मुनाए संजुम [सु० ११७-१९८ गा०८१-८५ ममपदस्पेस नियुक्त नियत मासोकवचन पंचस्विफायेप्पिय । पियवचणवो घेर 'सासर्व पद ममतीतिश्चायतम् , मसिसमया-ऽपलिक-महर्व दिनादिपिन कास' । सासवचमतो घेर पायणादिसु 'भक्खय' नास्प आयो मलयम्, गंगा-सिंधुमगाईप्वपि पोररीकाछन् । अरस्तयचमतो थे 'मष्वप' नास्य व्ययो सम्पपम् , मानुपोजराद परिसमापन् । भनयवणतो घेर सममाणे माहित मदीपादिवत् । भवद्विवचमयो पेष सम्बदा चिंतिम्मान निर्य' माकासनद् 5 अविनाशीत्पर्यः । भावा एसे घुमादिया एगहिता । पोदक भार-यं दुबाम्संग धुपादिपदपररित किमाणागेज दिलुसतो मा सम्मं ? भापार्याज-ममा निगा भगव्यायाविषो मा वेसि पयण सर्म आणावे घेव गमा, करिषि दिततो नि गम्म । र साससंगस्स पुरादिपवितस्पस्स सापको इमो विद्वतो-से महानामते त्यादि ।। ११७ से समासतो चविहे पण्णत्ते, त जहा-दब्बो खेत्तमो कालो भावमओ । तत्य दव्वमो ण सुयणाणी उवउत्ते सव्वदव्वाई जाणइ पासइ । खेत्तओ णं सुयणाणी उवउत्ते 10 सब खेत्तं जाणइ पोसइ । कालओ ण सुयणाणी उवउत्ते सेव्व कालं जाणइ पासइ । भावमो ण सयणाणी उवउत्ते सब्वे मावे जाणइ पासइ । ११७. ध दुराससंगम पनि दम्बादि । भमिष्णदसपुम्मादियाम भार मुठनागकेपली वे पाप मणितं । दम्ममो प मुसनाणी ससनाणेबोरपुपो मुरविष्णचीए सम्बदम्मादि भापति पासति य । पशु पासा चि निरोगे? उच्यते-गमा अदिद्वाम वि मेम्मादिपाण पुतणामपासणवार मागारमासिद, म यादिहं तिता, 15 पण्णवणाए य मणिता मतमाणपासणस पि, ण विरोपो । भारतो पण मे धवनाणी सम्बदम्ममाग-पासमवाम मासा । सा य मयणा मविपिसेसता माणितमा। पर्व तेक्का-मारेस रि[३० २२३ वि०] माणिवना॥ सुसनापदंसमस्प मपति- ११८ अक्सर १ सपणी २ सम्म ३ सादीय ४ खल सपज्जवसिय ५ च । गमियं ६ अंगपविढे ७ सच वि एए सपरिवरसा ॥८॥ [भाष.नि. गा ११] आगमसत्यग्गहणं जं चुद्धिगुणेहि अहहिं दिहूँ। पिति सुयणाणलमं तं पुज्वविसारया धीय ।। ८२॥ सुस्सूसइ १ पडिपुन्छइ २ सुणेइ ३ गिण्डव ४ य ईहए ५ यौवि । ततो अपोहए ६ वा धारे ७ करे वा सम्म ८॥३॥ मूर्य १ हुंकार २ वा वादफार ३ पडिपुच्छ ४ वीमसा ५। तनो पमंगपारायण ६ च परिणिट्ट ७ मत्तमए ॥७॥ जिवा गापा मा परिमायापुरी। Hा सम्प न बालम्पुर ३ 1. निdि. 10 तरपति समास्ति.७१ पासा . ११माधि । पाशि . .१५पान 5 सुयणाणलाभ-सवण-वक्त्राणविहिमाह ] सिरिदेववायगविरडय णदीसुत्त । ८३ सुत्तत्थो खलु पढमो, वीओ णिज्जुत्तिमीसिओ भणिओ। तइओ य णिवसेसो, एस विही होइ अणुओगे ॥ ८५॥ [आव०नि० गा० २१-२४] से तं अंगपविट्ठ । सेत्तं सुयणाणं । से तं परोक्खणाणं । ॥से तं णंदी सम्मत्ता॥ ११८. अक्खर० गाहा । एसा चोहसविहसुतभावपरूवणा कता ॥ ८१ ॥ एत्थं आयारादिगणधरागम- पणीतस्स पत्तेगबुद्धभासितस्स वा तहाकालाणुभावतो बल-बुद्धि-मेधा-ऽऽयुहाणि जाणिऊण जे य सुतभावा आयरिएहिं निज्जूढा तेसु गहणविही दंसिज्जइ-- आगम० गाहा ।।८२॥ इमे ते अट्ठ बुद्धिगुणा- सुस्सूसति० गाहा ॥८३॥ विणेतस्स अत्थसवणे इमा विही- मूयं हुंकार० गाहा ॥८४॥ गुरुणो अणुयोगकहणे इमा विही- सुत्तत्यो खलु० गाहा ।।८५|| जंण भणितमूणं वा अतिरित्तं वा वि अहव विवरीतं । तं सम्मऽणुयोगधरा कहेंतु कातुं मम खंति ॥१॥ णि रेणे गमत्तण ह संदा जि या पमुपतिसंखगजहिताकुला। कमट्ठिता धीमतचिंतियक्खरा, फुडं कहेयंतऽभिधाण कत्तुणो ॥ छ । शकराज्ञो पंचमु वर्षशतेषु व्यतिक्रांतेषु अष्टनवतेपु नंद्यध्ययनचूर्णी समाप्ता इति ॥छ॥ छ । ग्रन्थानम् १५००॥ 10 15 १ गणधरपणीतस्स आ० दा० ॥ २ गिरेणगामेत्तमहासहाजिता पस्यती संखजगद्विता आ० ॥ ३ सकराजतो पचसु वर्पशतेपु नन्द्यध्ययन आ० ॥
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om प्रथमं परिशिष्टम् नन्दीसूत्रान्तर्गतानां सूत्रगाथानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका गाथा गाथा २ २ ५ र गाथा गाथा सनाक गाथाङ्क सत्राक गाथा सूत्रा ११८ अक्खर सण्णी सम्म ८१ 'ओही भवपञ्चतियो २८ जेसि इमो अणुओगो ५२ ३२ [आव नि गा १९] कम्मरयजलोहविणि- २८ णाणम्मि दसणम्मि य अड्ढभरहप्पहाणे ३७ कालियसुयअणुओग- ३४ णागवररयणदिप्पंत- १७ अणुमाणहेउदिद्रुत ४६ ६६ काले चउण्ह वुड्ढी २३ णिमित्ते अत्थसत्ये य ४६ ६२ [आव नि गा ९४८] [आव नि गा ३६] [आव नि गा ९४४ ] अस्थमहत्थवखाणि ४० केवलगाणेणध्ये ४१ ५५ णियमूसियकणयसिला २ १३ अस्थाणं उग्गहण ५८ ७१ [आव नि गा ७८]] णेरतियदेवतित्थकरा पत्र-२० टि०८ [आव नि गा ३] खमए अमच्चपुत्ते ४६ ६८ [टीकाद्वयसम्मता गाधा, अभए सेट्टि कुमारे ४६ ६७ [आव नि गा ९५०] आव नि गा ६६] [आव नि गा ९४९] खीरमिव जहा हंसा पत्र-१२ टि०५ णेवुइपहसासगय पत्र-७ टि०६ अयलपुरा गिरखते ५ ३१ [चूर्णि-टीकाद्वयानाहता गाथा ] [टीकाद्वयसम्मता" गाथा] अह सञ्चदव्वपरिणाम- ४१ ५४ गुणमवणगहण ! सुय २ ६ तत्तो य भूयदिन्न पत्र-१० टि०७ [आव नि गा. ७७] गुणरयणुज्जलकडयं पत्र-५ टि०१० अगुलमावलियाण २३ ४६ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] [आव नि गा ३२] ३३ गोविंदाण पि णमो पत्र-१० टि०७ आगमसत्थग्गहण ११८ ८२ तवनियमसच्चसजम- पत्र-११ टि०११ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा ] [आव नि गा २१] [चूर्णि-टीकाद्वयानाता गाथा ] चत्तारि दुवालस अ १०७ ७९ ईहा अपोह वीमंसा ५८ ७५ तवसंजममयलंग! २ ९ [आव नि गा १२] चलगाहण आमडे ४६ [ आव नि गा ९५१] तवियवरकणगचपय- उग्गह ईहाऽवाओ ५८ ७० जच्चजणघाउसम- ३० तिसमुद्दखायकिर्ति २६ [आव नि गा २] ७२ उग्गह एक समय जयह जगजीवजोणी- दस चोदस अट्टहा- १०७ [आव नि गा १] जयइ सुयाण पभवो २० नगर रह चक्क पउमे पत्र-५ टि०१० उप्पत्तिया वेणइया ४६ ५६ जसमई तुगिय वदे २३ [चूर्णि-टीकाद्वयानाहता गाथा] [आव नि गा ९३८] जावतिया तिसमया २३ ४४ न य कन्थह निम्मामो पत्र-१२ टि०५ उवमोगदिट्ठसारा ४६ ६४ [आव नि गा ३०] [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाथा] [आव नि गा ९४६] जा होड पगइमहुरा पत्र-१२ टि०५ पढमेत्थ इंदभूती २० ऊससिय नीससियं ६४ [चूर्णि-टीकाद्वयानादृता गाया ] २ १० [आव नि गा २०] जीवदयासुदरकद २ पुट्ट सुणेति सई ५८ एलावच्चसगोतं २४ जे अण्णे भगवते ७३ ४२ [आव नि गा ५] तत्तो हिमवतमहत- ६९ १ ৩৩ or 10 ४ परतित्थियगहपह- ८५ नदीसूत्रगामानामकाराविक्रमेणानुक्रमणिका यापार गापा पापा पापा २ १५ ८ २७ ८१ २ १ ८५ समान पुष भदिट्ठमसुम १६ [भार. नि. पा ५.] पारस एमारसमे १०७ मणी करग भरग मई दिवेशापरि २ मा सन्नबगुमो मई सौम्पराग २ मरणिवरणसमत्वा १९ [बाव चि. या m] महम्मि अदमासो [मार न. पा..] मह सिप पणिय ससे १६ [बार. नि. पा. ५. ] मर सिममिर र १६ [नार, नि. गा. ५१] माबमभाषा उम मासासमतामो ५८ [बार . या..] मुसदिययप्पगम्मे मणपणदणाण पुण ३२ [बाल वि. मा ..] २३ १८ ८२ प्यार पापा महुसिम मुहिमके ६० संनमसक्तुंगार [भाग वि. मा ११२] संबस्वरमपगसिपउन्म- महिय मोरियपुचे " सावगमणमडुमरिपरि २ मिउमावसंपण्णे सौपा सासरी दोहप १६ मूब हुकार या ११८ [बार मि. मा ५.५] [भाष नि. पा 1 मकुमाम्कोमसतो ५ पहाट नायगवसो २९ मुल्यो मल फामो ११८ बदामि मम्मम्म पत्र-८ टि १० [मार मि. मा. ] [षि-भागामाता मावा] समुणिमणिपाणि पदामि मम्मरक्लिप पा-८ टि०१० मुस्स्सा परिपुथ ११८ [एपिसाबाताव पाषा] [भाष मि पा. १२] बदे उसम मम्पि २ मुहम्म अमिावेसाणं मिणममयपवरमुणिवर पत्र-५ टि०८ मुहुमो महोई कामे २३ [१६ पाषाप्रपम चरणपाठमेरा] [भाष मि. पा ३.] पिणयमयपवरमणियर २ १२ सेम्पण छग बामणि विमसमणतासम्म ३ १९ [भाष मि पा ] सम्मसणवारवर १२ हस्पम्मि मुदुचतो २२ सम्भबअगमियाला १५ [माय मि. पत ] [बाप नि.मा.] हारिबगो साई सम्पम्मिट काठ २३ १९ हेरपिणए करिसप १६ [भाल न. पा. २५] [भाष मि पा. १४.] ૨૨ ५१ ५९ ४३ ८० UP R ५ २५ २ अश भोजने अशू व्याप्ती २ ९ [ ]] शुद् प्रेरणे द्वितीयं परिशिष्टम् नन्दीसत्रचूर्ण्यन्तर्गतानामुद्धरणानामकारादिवर्णक्रमेण अनुक्रमणिका गाथादि पत्रा गाधादि पत्रात गाथादि पनाए एवमसखे-जाओ अउणत्तरि चउवीसा जह जुगनुप्पत्तीय वि २९ अउगत्तीस वारा [विशेषगरती गा २१९] एव तु अणतेहि ७८ ५४ जह पासतु तह पासतु ३० [कल्पभाप्य गा ७०] अक्खरलभेण समा ५५ एव बहुवत्तव्य ५६ [विशेषणवती गा १९२]] [विशेपावश्यक गा १४३] जं केवलाई सादी- [नन्दीचूणी] २८ अण्णे ण चेव वीसु २८ [विगेपणवती गा १९३] [विशेषणयती गा १५४ ] ३० कस्म व णाणुमतमिण ११ [विशेषणपती गा २४६] जाव य लक्खा चोइस [पाणि धातु १५२५] फिचिन्मत्तग्गाही १३ जुगवमजाणतो वि हु २९ १४ [ पल्पभाष्य गा ३६. ] [विशेषगरती गा २१६] [पाणि धातु १२६५] कृमिकीटपतङ्गाद्या ४८ णवत्रभचेग्मडओ ६२ अह ण वि एत तो सुण [ आचाराज निं गा ११]] [विशेषणवती गा २०३] केण हवेज निगेधो १७ अह देसणाणदसण ३० [कलमाप्य गा ६९] [पाणि धातु १२८३ ] [विशेषणवती गा १५७] २८ ततिएगादि तिउत्तर आदिच्चजसादीण तत्तो तिण्णि परिंदा इहराऽऽयोणिहणत्त २८ १४ तह य असञ्चण्गुत्तं २८ [विशेषणवती गा १९४] [विशेषणवती गा १९५] इहाऽधोलौकिका ग्रामा २४ गणहरकतमगगतं ताहे विउत्तराए ७७ उवउत्तस्सेमेव य २९ गमणपरावत्तेगो तित्थं भते! तित्थ? १३ २६ [विशेषणवती गा २.६] [भगवती श २० उ ८ सू. ६८२] उवयोगो एगतरो ३० गुणदोसविसेसण्णू १२ तियगादिविउत्तराए ७८ [विशेषणवती गा २३२] [कल्पभाप्य गा ३६५] तुल्ले उमयावरण- २९ उवलद्वी अगुरुलहू ५४ गुरुलहुदव्वेहितो ५३ [विशेषणवती गा २१७] [कल्पमाप्य गा ७१] [कल्पभाष्य गा ६७] तेण पर दुलक्खादी उस्सेहपमाणतो मिणे देह २४ चोदस लक्खा सिद्धा ७७ दितस्स लभतस्स व २९ [वृहत्सग्रहणी गा ३३५] जति पुण सो वि वरिजेज ५६ [विशेषणवती गा २०५] एक्कारस तेवीसा [कल्पभाष्य गा ७४] दुग पण णवग तेरस ७८ 'एग चतु सत्त दसग जह किर खीणावरणे ३० देसण्णाणोवरमे ३० एगुत्तरातु लक्खा [विशेषणवती गा १५५] [विशेषणवती गा १५६] ७७ केयी भणंति जुगव [विशेषणरती गा १५३ ] केवलमेग मुद्ध [विरोपावश्यक गा ८४] ৩৩ [ ] به لما ७८ ७७ ৩৩ H ८८ नदीस्त्रपूर्णिगतानामुबरणानामकाराविक्रम पहार पापारि पठसमिति [[ -- ३० २९ गाधादि दो सासा सिदार पम्मो मगरूमुटुं [पण म. १ या..] नागम्मि दसणम्मि य [मिलाती मा २९९] निम्तो सम्बगुरु [समाप मा १५] पगसौमुरमबागिय [फसमाम्म गा ३१.] पागवणिमा माया [सभाम्प पा ५५.] २९ पावाद पुग्रवि चोदस साला पुष्वमय मम्म णाण [भाषस्यपनि गा. १४५] मगित पि य पण्णती [विसपनाती पा. २३ ] भण्गति होहिणागी [पथरी गा ] भगति ण एस गियमो [विशेषपदी मा २१०] भण्णति मिपगमाचो [विशेफाली गा १२] ममा मद मरल ३० पिरीय सम्म रिसमुत्रा य परमा सतत ण देह म्मद [विशेफ्यवती गा ..] सदसदविससगातो सिपालमा पा. ११५] सने सचा ण हत्या [भाधारण भु. १ म १८ १३ २९ २ २८ १ पायदुग पोस -- ] [ २९ पासतो मिण पाण्इ [रिसेपली ग ११५] पिरस्समा विसीही [मवारमापस पा १८१] ७८ सम्वेसि मापारो [बाचार नि गा] सिबगति परमादाए सिक्गति-सम्पटेरि कि- सिबगवि-सबढे दो रुप पक्षेममुदा [मावस्यनि गा. १५९] सविस्सामने [.. स. १८] ७७ १५ ३ हतीय परिषिष्टम् नन्दीसूत्रमूर्णिगतानि पाठान्तर-मतान्तरनिदर्शकानि स्पानानि पत्र पनि पत्र पति मपणामरियमतेण मणे माया २२२२२२२ महमा पारो भाणे पुण केन १७-१३ १२२ ११५ २१. ८११५२६७ २ भण्मे अमे ममंति पुम आयस्यिा पारतर इम ९२५ २१-२१ पारंतर चतुर्थ परिशिष्टम् नन्दीसूत्र-तचूर्ण्यन्तर्गतानां ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृप-श्रेष्ठि-नगर-पर्वतादीना- मकारादिवर्णक्रमेणानुक्रमणिका [अस्मिन् परिशिष्टे * एतादृक्पुष्पिकायुतानि नामानि नन्दीसूत्रमूलगतानि ज्ञेयानि, ० एतादृक्शून्ययुतानि नामानि उद्बरणस्थानत्वेनास्मामिर्निर्दिष्टानि ज्ञेयानि, शेषाणि च नामानि चूर्णि-टिप्पणिसत्कानि ज्ञेयानि ] किम् ? किम् ? किम् ? . ७ विशेषनाम पत्रम् *अकपित [निम्रन्य-गणधर ] अगस्त्यसिंह [निग्रन्थ-स्थविर ] ८०टि० *अग्गिभूति [निम्रन्थ-गणधर ] *अग्गिवेस [गोत्र] अग्गिवेस *आगेणिय [जैनपूर्वागम] ७४टि० *अग्गेणीय ७४ अग्गेणीय ७५ अजितजिण [तीर्थकर ] *अजिय अजिय अज्ज [गोत्र] *अज्जणागहत्थि [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] अजगागहत्थि ९ अजधम्म ८टि० *अजमगू अजरक्खिय ८टि० अज्जवहर ७८ . ६ विशेपनाम पनम् अणुत्तरोववाडयदसा [जैनागम] ६९ *अणुत्तरोववाडयदसाओ ४८,६१, ६८,७० *अस्थिणत्थिप्पवात [जैनपूर्वागम] अत्थिणस्थिप्पवाद ० अनुयोगद्वार [जैनागम] ४८टि०, ४९टि० *अभय [राजपुत्र] ३४ अभयदेव [निम्रन्थ-आचार्य ] २३टि०, ४२टि०,६५टि०, ६७टि०,६८टि० *अभिणदण [तीर्थकर] *अमरगइगमण- गडियामो [ दृष्टिवादप्रविभाग] *अयलभाता [निम्रन्य-गणधर ] *अर [तीर्थकर] अरुण [ देव] *अरुणोववाए [जैनागम] ०अर्थविद्या [शास्त्र] ४९टि० *अवझ ७७ विशेपनाम पत्रम् अंगविज्जा [जैनागम] ३टि० *अंतगडदसाओ , ४८,६१,६७ अंतगडदसातो अधगवण्ही [राजा] ६० *आउरपञ्चक्खाण [जैनागम ] आउरपच्चक्खाण ०आचाराग २,२टि० ०आचाराङ्गनियुक्ति ६२,७५ आजीविक [ दर्शन] ७२,७३,७४ *आजीविय ७२,७४ आतविसोही [जैनागम] आदिचजस [राजा] ৩৩ ० आमीयमासुरुक्ख [ शास्त्र] ४९टि० आम्भिर्य ४९टि० आयप्पवात [जैनपूर्वागम] *आयप्पवाद ७४,७५ *आयविसोही [जैनागम] ५७ *आयार ४८,६१ मायार ४६,४९,६२, ७५,८३ आयारनिजुत्ती आरिस २६ आर्यजीतधर [ निर्ग्रन्थ-स्थविर ] ८टि० ८ ६ ९ ७७ ७ ८ ८टि० " ८ " ८ [जैनपूर्वागम] ७४,७५ *अजसमुद्द *अजाणदिल अन्झाणदिल *अणत [तीर्थकर ] *अणुओगदाराइ [ जैनागम] ८टि० अवझ ७६ [जैनागम] अंगचूलिता *अगचूलिया ५९ .
७ " ० " H २४३० " ७७ H ७ M H " . १९ १९२० ४९ . " " मवीमत्र-सर्णि-रिपर्णाताना मय-कार-स्पविस्नृपादिमानामनुक्रम मिपमाम पिम् । परम् पिपनाम किम् । पत्रम् विपनाम किम् । पाम् आर्यमा [मिप्रय स्खविर] ८रि० [मेत्र] कासप [गौत्र] मार्यसमुत्र ८० कपसाव [पोत्र *किस्मिानिसास [नपूपिम] ७१७५ ०मावस्यकलापिका [मागम] ११टि. किरियालिसास [पैसाम] आवस्यकनियुक्ति २२६,१९, *एम टि. मुमारगपिया [शिवारप्रविमाम] ७७ १७५१ ऐमपत्य ८टि. सगरगडियामो मास्यकनिर्मुकि नागम] २०टि०, मोवाइय [नागम] [स] २०नि०,२५दि० मोसप्पिगिरिमामो [स] भारस्पकाचि [पारप्रतिमाग] १९टि ०मारस्सग [मोत्र] चायण कोपिलर [] १९२० +मावस्सग झोसिय [पोत्र] ८७टि. बामण +आपुरुषम [पाम] १९टि गगसरि [भ] कोसिय ८ मामुर्य [पनामम] गप्प ५८ क्रियाप [प] १.टि. ०आसुक्ष प्पसियामो ९ ५९ संविसापरिप [निर्मपरि] इतिहास अप्पयरेंसिया ९ संदिलायरिय ६ इसिमासिया नाम पप्पमुख *पियाविमाणपविमचि [मागम] ५९ अवमूति [निव-पार] प्पासिम [पात्र] सुरिमाविमाणपश्मिति उद्राणमुप [समागम] कप्पिमामा [मायम] ५९टि० [स] १९ उढाणमुत प्पियाम्पिय पोमुह १९टि. उत्तमपगाई कप्पिमाप्पिय गगभरगडियामो (माविमाप]७७ उप्पादपुम [नपूर्वाग्म जम्मप्पगति [पाम ९ गमिम १५ उपायपुत्र ७५ उम्मप्पयार [बमपूपिम ] ७१७५ जगमिविना [भापम] [] कम्मापवाद ७६ गगिविमा +उपाय भिमामम] ५७० [निम-प्रोमुर] २६ • रागदसामो १८६१ करिसायम [नामप) १५ *गम्मापाप पमाप [मागम ) १२ १३, गंगा [मरी) ६५,८२ उपासगरमामो गोरेमोग (तरामीभाव) ७१ •उपम-द (ब गरिमायुमोग ७६७७ उसम [पि] २५ गडियामोग •उरानिगिगरियामो वित [urm] मोद्वामाश्मि [REATANT निरमान] परिम ५०2. गोतम [GHTTA] २६५ पगाग •विनिय ५.. पावाप मा (मोत्र] गोमरसार [म.. M ७ १९ H *सोरमा " " ४ . A P N ७ में " २. ७ ९३ नन्दीसूत्र-तचूर्णि-टिप्पगीगताना ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनाम्नामनुक्रम पत्रम् विशेषनाम किम् ? विशेषनाम किम् ? *महागिसीह [जैनागम] *भरह पनम् [क्षेत्र] १८,५१ २२,५१ [ शास्त्र] ४९टि० महाणिसीह भरह भागवत *महापच्चक्खाण भारध महापच्चक्खाण ८ " " ९ विशेपनाम पिम् ? पत्रम् रायपसेणिय-सेणीय-सेणइय [जैनागम ] ५७,५७टि० रिसभ [तीर्थकर] २,२६ *रुयग [गिरि] १८ रुयग २४ रेवइणक्खत्त [निर्ग्रन्थ-स्थविर ] रेवतिवायग ९ *लेह [शास्त्र] ४९टि० लोगबिंदुसार [जैनपूर्वागम] ७४,७५,७६ *लोगायत) [शास्त्र] ४९,४९टि० णागायत लोहिच्च-लोभिच्च [ निर्ग्रन्थ-स्थविर ] ११ *लोहिच्च ११ *वइसेसिय-चति० [शास्त्र ] ४९,४९टि० *वग्गचूलिया-वग० [जैनागम ] ५९, ५९टि० *वग्धावच्च) [गोन] *तुगिय " ७ " *भारह *महापण्णवणा भूतदिण्ण [निग्रन्थ-स्थविर ] १०,११ महापण्णवणा *भूयदिण्ण ११ *महाविदेह [क्षेत्र] ५१ भूयदिन्न १०टि० महाविदेह २२,५१ [नगरी] ९ मधुरा [तीर्थकर] १टि०,२ *महावीर *मरणविभत्ति [जैनागम] महावीर मरणविभत्ति *मडलप्पवेस [जैनागम] ०मलयगिरि [निग्रन्य-आचार्य] ३टि०, मंडलप्पवेस ४टि०७टि०८टि०, *मडिय [निग्रन्य-गणधर] १०टि०,१७टि०, मदर [गिरि] २४ २०टि०,२३टि०, *माढर [गोत्र] २७टि०,३२टि०, माढर ३३टि०,३४टि०, [शास्त्र] ४९ ३५टि०,३७टि०, माधुरा वायणा [जनागमवाचना] ९ ४३,टि०,४८टि०, मानुपोत्तर [गिरि] ८२ ५०टि०,६०टि०, *मुणिसुन्वय [तीर्थकर] ६३टि०,६६टि०, *मूलपढमाणुओग [दृष्टिवादप्रविभाग] ७६ ६७टि० मूलपढमाणुयोग ७६,७७ ०मलयगिरिवृत्ति [नन्दीसूत्रटीका] ३टि०, ० मृगपक्षिरुत [शास्त्र] ४९टि० ३६टि०,३९टि०, *मेतज्ज-यज [निम्रन्थ-गणधर ] ७,७टिं० ४०टि०,५२टि०,. मेरु ५८टि०,५९टि० *मोरियपुत्त [निर्ग्रन्थ-गणधर ] *मल्लि [तीर्थकर] ०यजकल्प [शास्त्र] ४९टि० *महल्लियाविमाणपविभत्ती [जैनागम ] ५९ योग ४९टि० महल्लियाविमाणपविभत्ती ५९ रतणप्पभा [नरक] २४,२९ *महाकप्पसुत ५७ *रयणप्पभा २३ *महागिरि [निम्रन्थ-स्थविर ] *रयणावली [शास्त्र] ४९टि० महागिरि *रामायण ४९ *वच्छ " + ७ ५९टि० [गिरि] ४,८१,८२ ७ वच्छ *वहिदसातो [जैनागम] ६० वण्हीटसाओ *वण्हीयाओ *वद्धमाग+सामी [ तीर्थकर] ७,६० *वरुगोववाए [जैनागम] ५९टि० *ववहार *वाउभूति [ [निर्ग्रन्थ-गणधर] *वागरग [शास्त्र] ४९ *वायगवस [निम्रन्थवश] ९ वायगवस *चायभूह [निम्रन्य-गणधर ] ७टि० वासिद्ध [गोत्र] ८ ९ ८ t با f لہری اومده یه هه 3 و همه 14 ،1 دامدي ا و همه ما { 1 به 2 1 124 :1) عمله ) ۹t المه ) لا د ده ها(۰۱ء 1 اريدها } در اناء لمبة ( د .) البلد ܒܒܝܢܐE المهمه لمه ( د ) ولية (( مشهد ) جEH االد ارسمهم بهره حلالمانية الملفالان 24 وأه دارالله هرط ہ ما } امل) 4 ? اراها مارا } .لمياهلال يسلعدد 26 H وشكة ها را ( مسد) في مولد ) الله ) بهد ہ هاندا .هطاليا هل المطع د ملا بنطا | ايه) للداعية] Aa ܕܝܬܐ ( عليك ܐܕ ܐܐ مباهله ليلة (41rn) s7 s6 [ra] پا E ہا اريدند و المللي لیتر۔ مسلر اورعدل ، ، ، ܕܒܐܝܛ • المللمرة { علومه) (نه ) SA الم هولستة درلود [هلة } ماه • الطراط اخلطيمها عطلة ) الله لما اهللا الطي 25 دردهالعطاء و تسلط (مره ) .ميعا . وللملا ليلها و (ا ) ملط { .لعلويطلع للطعا اور د. (ادبند) 52 الاطعم •4. BE h اط नरममावानो पारम्पविर-मपादिनाममनुस्म " " " ९ नन्दीसूत्र-तचूर्णि-टिप्प गीगताना ग्रन्थ-ग्रन्थकार-स्थविर-नृपादिनानामनुक्रम विशेषनाम पिशेपनाम विशेषनाम पिम् । किम् ? किम् ? पत्रम् पत्रम् परम् [क्षेत्र] *भरह १८,५१ गयपसेणिय-सेणीय-सेणहय *महामिसीह [जैनागम] २२,५१ भरह [जनागम ] ५७,५७टि० महाणिसीह [शास्त्र]] ४९टि० [नीर्थकर] सिम *भागवत *महापचक्याण २,२६ ५० भारध [गिरि] महापधक्खाण *रुयग ५८ १८ ४९ रुयग *भारह *महापण्णपणा २१ भूतदिण्ण [निर्गन्ध-स्थचिर) १०,११ महापण्णवगा वटणखत्त [निर्गन्ध-स्थपिर ] *भूयदिण्ण ११ *महाविदेह [क्षेत्र] रेवतिवायग भूयदिन्न १०टि० महाविदेह २२,५१ *लेह [शान] ४९टि० [नगरी] ९ मधुरा *महावीर [तीर्थकर ] १टि०,२ लोगबिंदुमार (जनपूर्वागम] ७४,७५,७६ *मरणविभत्ति [जनागम] महावीर *लोगायत [शास्त्र] ४९,४९टि० मरणविभत्ति ५८ *मटलप्पवेस [जनागम] जागायत ०मलयगिरि [ निग्रन्य-आचार्य ] ३टि०, मडलप्पवेम लोहिच्च-लोभिच [निम्रन्य-स्थपिर] ११ टि०७टि०८टि०, *मडिय [निग्रन्थ-गणधर] *लोहिच ११ १०टि०,१७टि०, मदर [गिरि] २४ * बहसेसिय-चति० [शास्त्र] १९,४९टि० २०टि०,२३टि०, *माहर [गोत्र] *चग्गचूलिया-बग० [जैनागम ] ५९, २७टि०,३२टि०, माढर ५९टि० ३३टि०,३४टि०, [गार] ४९ * वग्धावच्च [गोत्र ३५टि०,३७टि०, माधुरा वायणा [जनागमवाचना] ९ *तुगिय । ४३,टि०,४८टि०, मानुपोत्तर [गिरि] ૮૨ *वच्छ ५०टि०,६०टि०, *मुणिमुञ्चय [तीर्थकर] चच्छ ६३टि०,६६टि०, मूलपढमाणुओग [दृष्टिवादप्रविभाग] ७६ भवण्हिदसातो [जैनागम ] ६० ६७टि० मूलपढमाणुयोग वण्हीढसाओ ५९ ०मलयगिग्वृित्ति [नन्दीसूत्रटीका) 3टि०, मृगपक्षिरुत [शास्त्र] ४९टि० *वण्हीयाओ ५९टि० ३६टि०,३९टि०, *मेतज्ज-यज्ज [निर्ग्रन्थ-गणधर ] ७,७टि० *वद्धमाग+सामी [ तीर्थकर ] ७,६० ४०टि०,५२टि०,. मेरु *वरुणोववाए [जैनागम] ५९टि० ५८टि०,५९टि० * मोरियपुत्त [निग्रन्थ-गणधर ] *ववहार ५८ *मल्लि [तीर्थकर] ०यनफाप [शास्त्र] ४९टि० *वाउभूति [निर्ग्रन्थ-गणधर ] *महल्लियाविमाणपविमत्ती [जैनागम ] ५९ योग ४९टि० *वागरण [शास्त्र] महल्लियाविमागपविभत्ती ५९ रतणप्पमा [नरक] २४,२९ *वायगवस [निग्रन्थवश] ९ *महाकप्पसुत *रयणप्पमा २३ वायगवस ९ *महागिरि [निग्रन्थ-स्थविर ] *रयणावली [शास्त्र] १९टि० *चायमूह [निर्ग्रन्थ-गणधर ] महागिरि *रामायण ४९ वासिटु [गोत्र] ७ ७ ७ ७६,७७ [गिरि] ४,८१,८२ ७टि० ८ " ८ 0 ८टि. . , ६ " ७ ७ " " . ८ " ९१ नदीसूत्र तमूर्णि-टिप्पणासाना प्रम-प्रकार-स्थविर-भूपादिनानामनुक्रम विषेषनाम विम् । पत्रम् विपनाम विपनाम पिम् । बासिष्ठ [गोत्र] चित्-फत मरी-१९टि०,१२टि०, सद्वित्त [पास] “भामुदेवगडियामो [ीपावप्रतिमाय] ७७ सकाकारी-१५टि०,१६टि सापार [बनसाथ ९ क्यामुपुम [वीर] पौहरिमा- २३टि ,३०टि०, +समयाम [नायम ] १८,६१,६४ निवणुप्पयात निर्माणम] मम्ममिए ११टि०,३२टि , समगाय विमगुप्वाद पायों] ५०टि०,५२९ ०समबामाज ६२टि०,६५टि० विमाचरणनिणिन्म [ नागम] ५७ ५०,५८टि. ६५टि०,६७टि, चिन्नाचरमविगम्य ५८ १ टि०,६७टि०, ६८टि ,२९टि० विमाणुप्पवाद [मैनपूपिम ] ७१टि०, ६९०,७२१० ७०टि ,७१० ७५टि. पेतस [गिरि] ६० ७२टि०,७१टि कवितार [भिप्राप-पनवर] अपेद [स] १९ समवायागनाति, ७पटि० विमम [पर] वेद १९टि० समुद्धासुम बिमसमारण [अमर] वेद ५० समुट्ठाणसुप ६ कवियाह [वैमागम] ९५ परे [स] ससि [वीकर] ६ नियाहचूला ओम्परोक्याप [पैमागम ] सखि [मिक्सपिर] विवागमुत समणे [प] ६० समिछ *विवागमय १८९१७ समगोपाए [ मैनाम] ५९ संती [वीर] ६५टि० सिर्य समय विवाहमिया-विमाह ,५९५९टि. सेसिय १९टि सम्प [निप्रप-समिर] *तेरासिय १९टि विशेषगस्ती [गवान] २८ २९ ३ संम्य शिक निरोपारस्पा [नागम] २५टि. समणामुप्त (नाम्म] वैशेपिस १९टि ८२टि *साई [निर्मपतविर विशेपास्यक- १२टि. म्पयहारमाप्प [जमाफम ] १९टि०६१ सागरामन्वसिविप्राय माचार] ५९४० महामाप्यममा २८ट १२० म्पारग [] १९टि० साती [निम-मदिर रीपटकाति कराग [राचा] ८३ *सामन्न विसेसाबस्सग ૨૨ माडिय [निप्र परि] ८टि सामन मिया [साम] १५टि० सामाविय (नागम] ३२,१९ सम [प्रमरितेप] सोन्म [बाज] १९टि बीतरागमुत सगमरियाभो-समम [पास] १९ सिप्रेस [र] क्यापरायमुष्ठ संगम०-साम०-सगडम १९ सिंधु [मो] ६१८२ चार [दर] २ सगर [माती] सोय [वीर] पीरिय मागम] ७१७. सपप्पलाद निपूक्मि] ७१७५ सीह [निप्रकसरि] बौरियसवाय सरपवाद सहबायक " ७ ७ " ७ H १९० ८ " ८ ५२ 7 ८ " " १ ९ . " नन्दीसूत्र-तञ्चूर्णि-टिप्पांगतानां ग्रन्य-ग्रन्थकार-स्थविर नृपादिनानामनुक्रम ९५ स्मि? किम् ? पनम् सेन्नमव विपनाम अहाग्यि [ गोत्र ८ ४ हाग्यि इटि०, G .. पिशेपनाम किम् ? पत्रम् सुट्टित [निग्रंथ-स्थविर ] मुपडिवन्द्र *मुपास [तीर्घर] ६ *नुप्पभ ६ मुबुद्धि [ अमात्य] *मुमति [तीर्थर] ६ सुवग्ण [देव] *सुहथि [निर्मन्य-स्थविर] सुहथि *सुहन्म [निग्रन्य-गणधर] सुहम्म-धम्म ७,७टि० मुहस्ती [निन्ध-स्थविर ८टि० सूयगड ६२,६३ *मूरपण्यत्ति सूरपण्णत्ति [निग्रंन्य-स्थविर विशेपनाम पत्रम् [निर्ग्रन्य-म्पविर] (देशविशेष हरि हरिभद्रमृरि [निबन्ध-आचार्य ] टि०, ४टि०,७टि०,८टि०, १०,टि०,२०टि०, २३टि०,२७टि०, ३२टि०,३७टि, ४२टि०,४३टि०, ४८टि०,५०टि०, ६०टि०,८०टि० * हग्विमगटियामो [दृष्टिपादप्रविभाग] ७७ *हंभीमारस्व-रुक्व [शास्त्र] ४९, ४९टि० * भीमास्क्स ४९टि० ०भमीयमानुरुक्ख १९टि० हीयमामुरुक्त ४९टि० हारि०वृत्ति [इम्मिरिस्त- नन्दीसूमति ] पटि०,९टि०, ३६टि०,३९टि०, ४०टि०,५२टि०, ५९टि० हिमवन्तस्थविरावली [ जनशास्त्र] ८टि० हिमवंत ८ [गिरि] १०,६४ [जैनागम] ४८,६१, *हिमवत खमासमण [निग्रन्थ-स्थविर ] १० हिमवत+खमासमग " १० ० हेतुविद्या [शास्त्र] ४९टि० *सेजभव हेमवत [क्षेत्र] २२ पवम परिशिष्टम् नदीसूत्र- तर्पान्तर्गतानां विषय-व्युत्पस्पादियोतकानां शम्दानामकारादिवर्णमेणानुक्रमणिका [मस्मिन् परिशिष्टे गएतारस्पुष्पिकाचिदाड़िता पमा नदीमास्त्रान्त सूत्रासा स्वय म्मामाता हेमाः, +एनाप्रतिकाचिदारिता "दा' पूर्णिकता पयसन्दर्म स्वम प्रयोरिता हेया, शपाय शम्दा प्रान्तर्गता पूर्णिहता म्पास्याता मोसमा । पप पत्र-पति पत्र-पछि ७१-१५ १७-२१ १७-२ अभिवावरतर मराहत मनाव [सन्त राम्] १५-२२ पत्र-पति ११-१७ १८-२. +मणियोग अणागुगामिक माण मगुचर मगुचमिवाइस भमेगसिर मणंतर अणन्द्रिगसिब मण्णाण अग्णागिन {भगा व मकारण ८०-१३ मकिरिय परिष] भरम [बा मातो" मारपर- ताए बापेममा ति पापागो बगो भाषमान पाति ति मन मपति । भाषा "मान माने परस्म वा सम्प बना ति भागो पाम्यति मुगपत कर। मम्पर ५५-२३ भरा मिविपिन मिरतिपार] १-१७ मगमिय [जन्मानरानियमदिन भर्मपर) ५६-२५ माग [परिमा २७-९ २७-२ २५-१३ २६-१७ मनिभ अस्मिारसिद मतिमसिद अप मपिपिसवार मनगद भषगर मरम्ह १५-१९ भवधि १९-२२२१ मरायण [हितावर] अपम्पमता १५-२५ मदि माप्त ५६-२१११-१६ भदाय २५-२० अपाय १३-११ मनि भबोर पापामारियाग सपम्मापुजारभार मोरा तिमmuv६-११,१९ भयंत्र मरापिगमन मग [रिया भमुनिल १०-२५ ११-२१ ७५-२५ गनुपता [भनुम् योगः मगगन ७५-०२ भपामसमयमरपोपमग २५-०८ अपग्मि मागिमरमोपलाम मगोमा निगमाया नाम२५-१६ मmran) अनुरो मरममय २२-१ ममार ममताभ भैगरि भग नन्दीसूत्र-तचूर्ण्यन्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्त्यादिद्योतकाना शब्दानामनुक्रमः । पत्र-पकि पत्र-पक्ति शन्द पत्र-पक्ति शन्द उववात अंगुलपुहत्त अंतकड उवासग १९-१५ ६८-७ ६८-८,९ १६-५,६ ६९-४ ६७-१० ६७-११ १८-२० उवासगदसा अतकडदसा अंतगतमोधिण्णाण उस्सण्ण आ ए एक्कसिद्ध २७-९ शब्द इदिय १४-२८ इंदियपच्चक्ख १४-२९ इदियपज्जत्ति २२-१५ ईहा [१ ज पुण हेतूववत्ति- ३४-२०, साधणेहिं सब्भूतमत्थस्स ४१-९ विसेसधम्माभिमुहालोयणं ४६-१०, तस्सेवऽत्यस्स अधम्मविमुह १३ असम्मोहमविफलमत्यपरिच्छेदक चित्त ज त ईहा (पत्र ४१), २ अतीतकाले सुदीहे वि इद तदिति कृतमणुभूत वा सुमरति, वट्टमाणे य इदिय-णोइदिएण वा अण्णतर सद्दाइअत्यमुवलद्ध अण्णत- वइरेगधम्मेहि ईहइ त्ति ईहा (पत्र ४६), "किमेय?' ति ईहा (पत्र ४६)] *ईहा ४३-१० ओ ओगिण्हणता ओमत्थग ओसण्ण ३५-२५ २५-२७ २२-२४ क उ आउहणता ३६-२२ आउर ५८-२३ आउरपचक्खाण ५८-२५ आघविज्जइ [आख्यायते] ६२-२ आणा-जा ८१-२,६ आणापाणुपज्जत्ति २२-१५ आणुगामिय १५-२७ आतविसोही ५८-१७ आता ५८-१६ आदेस [१-प्रकार , २-सुत्त] ४२-१५,१९ आभिणिवोधिक १३-१८,१९, २०,२१ आभोयणता ३६-१० आय १३-२६ आयप्पवात ७६-३ आयार ६१-२० आल [अधिकयोगयुक्त] ४-३ आवागसीसग भावागसीसगति४०-१,२ आपागट्ठाणमेव, अहवा आपाग- ठाणस्स आसण्ग समता परिपेरंत, अहवा आपागमुत्तारियाण ज ठाण त आपागसीसय भणति] आसइज्जति [आश्रीयन्ते] ६४-२३ आहारपज्जत्ति २२-१३ उद् ६-५ उक्का [दीविया] १६-२२ उक्कालिय ५७-१५ *उग्गह ४३-१० उग्घाडितत [उद्घाटितक] ५६-५ उज्जल ६-१५ उन्जुमई २२-२४ उट्ठाणसुत ६०-१ उप्पायपुग्व ७५-२० उवउज्जत २४-५ उवदेस [ उवदिसणमुवदेसो, ४६-६ उपदेसो त्ति वा आदेसो त्ति वा पण्णवण त्ति वा परूवण त्ति वा एगट्ठा] उवदसणा ५२-२ उवधारणता ३५-२५ उवरिमखुट्टागपतर २४-१८ कड [कित्तिम] ६२-२१ कणिया [वाहिरपत्ता] ४-२ +कण्हुइ २२-२० कप्प ५८-२० कप्पवडेंसिया ६०-११ कप्पसुत ५७-२४ कप्पिया ५९टि०५ कप्पियाकप्पिय ५७-२३ कम्म ३-२३ कम्मापवाद ७६-४ +कयार [ देश्य स कचवर] ३-१७ करणशक्ति ४७-५,६ कल्पिका ५९टि०५ कहण १२-१ कत ६-१८ कारण ८०-१२ कालिओवएससण्णी ४६-१७,२० कालिय ४६-८,५७-१४ किरिया ६८-१०,११,१२ किरियाविसाल ७६-११,१२ इ इड्ढिप्पत्त इथिलिंगसिद्ध २२-२१ २७-८ ९८ नदीमध-सपूर्णान्तर्गतानां निपय-म्पत्यादिपोतकाना शदानामनुस्म । पत्र-पचि मामा [सम्ममवा] १२-१ ति] कुषी (ो रवा (वास्त- १९-१५ प्रमाणम्)]] कुमसम .डिवो गमो ९-१३ जम्मो सोर पायो भीमण, ३ परियो) परण ५८-८,२२ परणविही ५८-२२ परिम २५-२५ पहित (ल.)[मनोरru] १९-१ पित [वितिमान ति५-१९ पिचतरगरिका गोषमाव २८-८ बोइ (मादिमिनो यो १५-२३ अप] मोणि फोटु स्व प्र साणी ११-२० ५९-८ २०-८ प्राण माणलिमतो ५८-११ ५८-१५ सागपतर ट ग क चिंता [भोगमापते व FOR 'प्रपा १६-१२, छ वर्म! पति १५ मलोबासमबानुगत dि १ पर जि (पत्र -1)] पुरस्म [मो पनि १६-२२ पिथ] ५७-२५ ५७-२५ ठ ठरणा गम ५८-१० गणिविना गरिमदि०) [सार] ११.११ गम्म [पोमोसप] गमिय गोसणा [पयोग-१६-१२ मानिकपनि सेवानि १६-१२, पोरबा, ममिसिक्ने पापमयाने बायम भराचा (पत्र .)] प १२१५,११ १७-१,५० ५५ २५ पोषक ३८६७ मंदिपोस णदी णग १-२८ उनुमत्य मागपरिमाप्मिय पाण-नाण ५०-८ १३-१११२,११॥ २.-९ ५६-८ गाल ५-१५ गिरिमासिब २७-१ गुण गुणपतिम-इस २०-१६॥ २३-१४ *गुणपसिष्ण १५-१८ गुरु [मानि शामिपि गु-] २.२ गोचर भग [१ मेपो ११७२१३ (पत्र 1) सपनि मेपे (पत्र २)] बतागा [संपवा] णाणपबाद पाय णिव गिर्व जोखिम पोइदिमजावगह पोइनिसपास १-१ १५-१६ बपति ११७१२-२ १-१ प पोस २५-२१ बसस पर ९९ नन्दीसूत्र-तचूर्ण्यन्तर्गतानां विषय-व्युत्पत्यादिद्योतकाना शब्दानामनुक्रमः । , पत्र-पक्ति पत्र-पकि " शब्द +तवोमता तपोमयाः तित्थ तित्थकरसिद्ध तित्थसिद्ध तिरियलोगमज्झ तिसमयाहारग तूरसघात तेलोक थ थिर द दरित दव्वमण दञ्चिदिय दस-सा पत्र-पक्ति शब्द शन्द प ३-९ पमादप्पमाद ५८-२,३ पडण्णग ६०-२३,२४ २६-११,१२ परपरसिद्धकेवलणाणं २६-२,२७-२२ पर ६-११ २६-१६ परिकड्ढिय १७-३ २६-१० पगम ११-६ परिकम्म ७२-१६ २४-१० पच्चक्ख १४-१७,३१-८ परिघोलण १७-२३ पच्चक्खाणप्पवाद ७६-६ परिवुड १८-३ ४-५,२० १-४ पच्चाउट्टण+ता ३६-२३ परोक्खणाण ३१-५ ४८-२५ पज्जत्तय २२-१८ पल्लव ६४ टि०५ पज्जत्ती २२-११ पसत्थझवसाण १८-२१ ४-२ पज्जय १३-२५ पसिण ६९-२४ पज्जव १३-२४ पसिणापसिण ६९-२४ ६-५ पज्जात १३-२६ पंक ३५-१७ पढिवत्ती ६२-५ पाणायुं ७६-१० १४-२८ पटिवाती १९-१४ पारियल्ल ३-९ ६८-७,८ पढमसमयसजोगिभवत्थ- पावयणी १२-५ ६०-१५ केवलणाण २५-१८ पासओ अतगय १६-१० २०-१० पढमसमयमजोगिभवत्थ- पासणता २४-३ ५२-२ केवलणाण २५-२२ पासतो १७-२ ४७-१६ पणगजीव १८-३ पुष्फचूला ६०-१३ ४७-२० पणीत ४९-५ पुफिया ६०-१३ ४७-१९ पणोल्लण १६-२३ पुरतो ४-१० १६-२३ पण्णत्त १३-१३,१४,१५,१६,१७ पुरतो अतगय ७१-७ १६-९,११,१७-५ पण्णवग ३८-७,८ ७१-६ पुन्व ७५-१६ पण्णवणा ५८-१ ध पूड़य ४९-४ पण्णविज्जति ५२-१ ६६-९,१० पेरत १७-२२ पण्णा १३-१४,१६ ३७-७ पोरिसिमडल ५८-७ पण्ह ६९-२० ३४-२१,३७-९, पोरिसी ५८-४ ४१-१८ पतिट्ठा ३७-१० प्रजापना पत्तेयबुद्ध ५८ टि०१ ४३-११ २६-२३ फ न पत्तेयवुद्धसिद्ध २६-२८ +फड्ग १७-१२ २०-९ । पदीव १६-२३ ४४-१५ पव्भार ६४-५ वधु २-९ ६०-९ पभव २-२१ वुद्धबोधित २६-२८ दसा दसण दसिज्जति दिद्विवाओवदेस दिद्विवातअसण्णी दिद्विवातसण्णी दुमाघरिस दृष्टिपात दृष्टिवाद , धम्मकहा धरणा धारणा *धारणा नाण व नाणक्खर निरियावलिया मन्दौस्म-ताम्यन्वगतानां विषय-व्युत्पत्यादिपोशकानां शम्दानामनुकम । पत्र-पति पभ-पि एम मुरबोपिसमिद २७-१ मरण ५८-१५ यमाम ५९-११ मुदि ५०-९,१० मरणविमती ५८-१६ गुदी महत्य ११-२०,२१ वही म बण ५-२१ भगत १८-२१ महाप्पमत ५७-२५ यसर १७-१८ भत्रम् महामा २-२३ बपिहादसामो भरपामाग २५-११ महापरमाण ५८-२७ ममत ५०-२५ मयपतिम २०१३ महापम्णवणा महित १९-२,३ ५-१६५-१८ माबमण मम्सयस ५८-८ बाण मारिदिय ११-२९ मंता १७-१५ बनणस्तर मासापनधि २२-१६ माता ६२-१ बगरम्म १५-१ म मापुरा बायगा ९-२१ बाणोमाह-मारमा २५-१५,७ मगणा [. बिसेसत्यम मिष्य २६-११ बस भयनारेगबम्पसमा-४६-११,११ मिमादिहित ५०-७ बागरण ६९-२० प्रेयर माममा मति (पत्र) मुरिया ९-१०,१२ बातगा-पगा मेसम्ममा मम्ममा, १* मसपामागुयोग ७७-२१ बामग मिममित्तल पमोमवार मभा विउमराग २५-१,१११२१-२१, भारणा मम्पमा (.) मग्गभो मतगम १६-१०१०:१० मगगाती ३-२३ रिमम १७-१ खनि मिमगुप्पाव मप्रा-प १६-२७८,२० मग बिपरेतो भो विग्य ५८-८.१. शिरोपर विमापरणनिगिस माजमति २२-१७ मिएन मरपायगामार्ग २५-२५.२८ म ििगध्य मगरकर १५-२७ मदिभार १५-१० ग्गिाग १३-२५२८ १-१५ मिनिमितराग मा+n १५-२० छोगनिदुसार २१-२ मन समाग ७-२१ मनिमा ३०-११. ११-२२ मरामुन महत 12-... ५९-१.६१-१११ दिनुस्मता २२-२५ मनविय ६८-१०१९-८ विमटी ५८-१४१५ २६-२५ पत्र-पकि नन्दीमून-तपूर्ण्यन्तर्गतानां विषय-न्युपत्यादियोनकाना मन्दानामनुक्रमः । १०१ पत्र-पफि पन-पफि विमाणपविभत्ती ५९-७ मच जग २-२७ वियाण १-१८,१९ श्रुतम १३-२२ सयानगणिनीन १८-५ वियाह ६५-१२ सन्यतो १७-११,१२ स वियाहचूला ५९-११ सहलेसभाव २५-१६ सफिलिट विरायते ६-१२ सजा सधन्यवाद १५-२६ विविध ६२-२५ सजोगिमवायरलगाण २५-१५ +मताणचोदक ४७-९ विमाल ७६-१२ सजोगी +संधर २५-१५ ९-२६ विमुद्धतराग २३-६,९,११, सन्साय १२-४ सलेहङ्गासुन ५८-१९ २५-३,५ सण्णत्वर ४४-२४ +पवर [पन] २१-१२ विहार ५८-२० सण्यावर १४-२६ सगर विहारफप्प ५८-२२ सण्णिमुत १५-२१,२६ समय १२-८ वीतरागनुत ५८-१८ सगी-सनी १५-२१,२६ सिनचलणाण २५-१२,२६-१ वीमसा [१ गिधा-ऽणियादि- ३६-१३ +सतत्त [म शार] २८-८ मुत १३-२२ एहि दल-मावेदि विमरिसतो ४६-१३, सतबुद्ध २६-१८ सुतगित्सित ३२-२५ वीमसा भणति ( पत्र ३६), १५,१६ मभाव ११-१३,१४ मुत्त २ आत-पर-दर-परत्ययदिता- सम ६४-२२ मुयमगाण ३२-१०,१२ ऽतिविमरिसो बीममा (पत्र समत्ता १७-१३ मुयणाण ३२-१०,११ १६), ३ भदया संपतो ममाण चेर वियिधा आमरिसणा ५०-२४ मुसवण १२-२,३ बोमसा (पन ४६)1] समुट्ठाणमुय मुस्सवग वीरियप्पवाद ७५-२३ समता १७-१२ नुरपणत्ती ५८-३ चूह ६३-१० सम्मत्त ५१-२ वृत्ती ६२-२ सयबुद्धसिद्ध २६-२३ ह वेला सरीरपज्जत्ती २२-१४ हायमाण-हस्समाण १९-४ वेढ ६२-५ सललित २-१५ हेद्विमग्नुड्डागपतर २४-१९ वेणइय ६१-२१ सलिंगसिद्ध २७-१ हेतू ८०-१० च्यक्षन ४५-२ सवण १२-२ हेतूवदेसमसण्णी-हेतुवायम ४७-१०,११ न्यजनाक्षर ४५-३ सवणता ३५-२६ हेतूवदेससण्णी-हेतुवायस ४७-४,१० पाम् पाता पूर्णिसमन्वितस्य नन्दिसमस्प शुद्धिपत्रकम् एवम् पाधि मामो बाबो) ममति । भारम् म एम् 1 पसत्पेस ។ मायो भवति- ति मो परत्येस ५-1-1 11 १. १८ - ५ उपो नियमो. ५ मियमो २ ५ पा सजन ११ पिरिम्प ९ स्स परि पेरते परि पेरतेरि पति स्त्रीण पारि मम्म ११ १२-१३ भोशिवाय ३ 14 . सम पिवार भार्षिय पामा एमासम सम गिनाय सापिस प्पेशामा समासमने . १९ १ १ १ सा ११ ' 1 १ - ११ १३ प्माचा म्भासपा बारेम पारेम । बरसा पूरि निम्नप्रभाव पम्- पमन परापरमो ममी। मेरामा परापता ५। १५ सामो हेमामा हेवा-मान वाशिमवी मिरपयोगिम्भी। पम्मति पासासाठ TORT सते तर . पर्षिया बनना सपर १ ॥ १५ 14 समेर । - ॥ - ११ ३ माग से सा(राधन सम स ॥ मग्मग मशगर्व सापासमा पास ) इस [1] । ta - १. उत्तर मषित। १. १५ समता तिममा से राम्-ति राब B . स १. . परिपेरतर परति पौधाप १. १३ १. १. d माति पिताम मिन बन्नो पर्व पपप "रिका, भरा 'रिणाममा] मनुरन मियप्रति पिबाधि समेष 11 १. पामेष गोदिया बोदिया १ २ । मा शुद्धिपत्रकम् । १०३ अशुद्धम् पृष्टम् पकि शुद्धम् अशुद्धम् पृष्ठम् पति ३१ १३ १९ ३१ ११ स देव ३२ ३२ २८ २० एव लयखणा-ऽभिधा' एपल्यवणाऽभिधा त सधेय वृत्ती 'वृत्ता वृत्ता जोइदियावाए। णोइदियाघाए ६ । माइगदितेण' महादिहते ? माहगदिट्टतेग मनगदिहतेन . २९ १८ ३२ २६ १६ ३२ ०५ १९ ३ चिता निता 'जोगे 'मोग्गे 'विस[मयि विमयदि समरिहि सम्मदिहि सामध्यम्, सामर्यम् तरिमेदः, 'तस्त्रिमेदः, घग पडग देविदो देषिदों चिमणा विमाणा गु० हारिपती । पदणग्गा पाण्गगा यत यत् 'नूर' फ़िप आहरणा, आहरणा सदुम मुहुम' भवतीतिशा भयतीति हा "टिपणि "टिप्पणी १ सदाइ सदाइ. ३० सद ति, सद ति, २३ २८ मुमिणे सहा ति गुमिणे सहो ति सदाइ, ६३ 'यूह किच १५ ८ १४ ६८ सद्दाद, "बोह- उगहो, माणितव्या १० 'मोदग- उरगद्द, माणितम्या ८२ १ ६ चूर्णिसमन्वितस्य नन्दिभस्प शुदिपत्रकम् प १ १ २ १८ ३ ५ २८ १२ मापो मयोबीयो) १२ मपति- मनति । ति ५ नियमो नियमो. १९ पा समत पारा चिकिप ११ । सम दुपियायचे 'मियाय पपि प्पेशामा प्पेलम्मा १ समापन समासमपे मूवारम भूगरिब प्मारपा स्मासपा बारेम पारेन । भीमा पूसार निम्नप्रकारेष हेयम् - पब । परबत्तपोभमो मेवा प. परापत्ता ५। " १८ प्रमेष समेष । . १ १ सामो पामास 'पा मम्पनी मम्मति - २० १ ११ ३ TER बा प सर्व १ . बर्षमा बरि पूर्षिन पर्वमा पार पपी १ . परम्पप से पा(परोपसर १-२ १५ मन्मग मम्मी सापासमारो पाले ) []। सेवा " उत्तरप्रमो चरमो मपित। राव १७ समा पिसम्मा राप्त १५ ति समा १. '' सेdf . स परिपेरदेखि परिपेखी स परखी पेरी Bed मात १ 1 परमेष पर्व दिया, बगीचा पर्व रियामापा १ मोहिचान भोलिबाग १. । विवाधि H भ जपति सिकषि भूत ३ B
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