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Sathotari Hindi Upanyaso Main Rajnitik Chaitna

Krishana Kumar Bisaa · 2011/03

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साठोत्तरी
हिन्दी-उपन्यासों में
राजनीतिक चेतना
कृष्णकुमार बिस्सा 'चन्द्र'
दिनमान प्रकाशन
३०१४, चर्खेवालान दिल्ली ६

मूल्य ६००० / प्रथम सस्करण १९८४/प्रकाश दिनमान प्रकाशन, ३०१४, चर्खेवालान, दिल्ली ११०००६/ आवरण जोशी/ मुद्रव मानस प्रिंटिंग प्रेस, ६/४७५३, पुराना सीलमपुर, दिल्ली ३१

समर्पण।
श्रध्येय गुरुवर डॉ० देवीप्रसाद गुप्त
जिनके चरणो मे बैठकर मैंने इस
शोव-ग्रथ को पूर्ण किया ।
-कृष्णकुमार बिस्सा 'चन्द्र'

प्रस्तावना अरस्तू के अनुसार मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है और हम जिस युग मे रह रहे हैं वह राजनीति का ही युग है । हमारे दैनिक जीवन में राजनीति की व्याप्ति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है वि विनान, साहित्य, धम, उद्योग, नीति, कूटनीति आदि क्षेत्रो तथा व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्वजनीन सम्ब धा मे राजनीति की पेठ हो गयी है । अस्तु, साहित्य की अभि व्यक्ति में राजनीतिक चेतना का समाहार एक अपरिहाय स्थिति बन गयी है। साहित्य की विविध विधाओ मे उप यास सर्वाधिक लोकप्रिय इसीलिए है कि उसके माध्यम से मानवीय चेतना के गतिशील स्तरो का सशक्त अकन किया गया है। महत्ता की दष्टि से उपयास महाकाव्य का स्थानाप न बन चुका है और रत्फ फाम ने उप यासकार को नये समाज का महाकवि कहा है । वस्तुत उपयास जनताविक साहित्य विधा है। जिसम स्वनामधर्मी आयामो मे युग जीवन का यथाथ समग्रता से चिनित होता है। हिदी की साहित्यिक सरचना मे ही नहीं अपितु वश्विक स्तर पर उप यास की लोकप्रियता सवमा य है । प्रेमच दयुगीन उप यासो मे राजनीति का प्रवेश हो गया था और प्रेमच दो- तर हि दो सौप पासिक मरचना में राजनीति एक प्रमुख प्रत्यय वनकर उभरी। डा बनभूषण सिंह जादश का शोध प्रब ध 'हिदी के राजनीतिक उप यासा का अनुशीलन (१६०० १६६३) शोध प्रघ छठे दशक के हिदी उपन्यासो म राज नीति के समाहार का सम्यक मूत्याक्न प्रस्तुत करता है । सन् १९६३ से १९८३ तक गत दो दशको मे लिखे गये राजनीतिक चेतनापरक हिदी उप यासो का अध्ययन अनुशीलन प्रस्तुत शोध प्रब घ का विषय है। प्रस्तुत शोध प्रब घडा० ब्रजभूषणसिंह के शोधाय का पूरक प्रयास हाते हुए भी इस दष्टि से विशिष्ट है कि गत दो दशका मे हमारे दश को तथा विश्व की राजनीति मे जो आमूल चूल परिवतन हुए हैं तथा भारतीय राजनीति म जो नये अप्रत्याशित मोड आय, वे पहले कही अधिकाटिल और महत्त्वपूर्ण हैं । सन् १९६३ से १९८३ तक के बीस वर्षों को राजनीति दल बदलुओ से लाछित और भ्रष्टाचार से कारित है तो सत्ता और विपक्ष की हरकारो के निर्माण और पतन की घटनाओं के कारण हमारे दर मे लोक्तत्र की गहरी नीव ढल जाने को साक्षी है। प्रकारान्तर उतार- चढाव और उत्थाग-पतन की राजनीति है। स्वभावत हि दी ये सजग कथा कारा ने अपनी कथाकृतियो मे इन राजनीतिक परिवतना के प्रामाणिक दस्तावेज़ के रूप मे सशक्त उपयास लिखे हैं। साठोत्तर हिदी उप यासो के अभ्वार मे से प्रतिनिधि रचनाकारो के १४ उपयास इस आलोच्य पुस्तक में सम्मिलित किये गये हैं। वे हैं-एक और मुख्यमत्री, प्रजाराम, हजार घोडो का सवार (श्री यादवे द्र शर्मा 'च द्र) सबहिं नचावत राम गोसाई (श्री भगवतीचरण वर्मा) काली- आंधी (श्री कमलेश्वर), रागदरवारी (श्री लाल शुक्ल), कटरा बी आर्जू (डा० राही मासूम रजा), महामहिम (थी पदीपप त), महाभाग (मनू भण्डारी) जगल त तम (श्री श्रवण कुमार गोस्वामी) दारल शफा (श्री राजकृष्ण मिश्र), समय एक शद भर नही है (धीरेद्र अस्थाना), सु राज (हिमाशु जोशी) और शक्तिभग (भीमुद्राराक्षस) प्रस्तुत पुस्तष को पूण परान में मुझे जिनका सहयोग, समथा और मार्ग- दशन प्राप्त हुआ उनके प्रति आभार व्यक्त करना अपना पुनीत क्त्त य मानता हूँ। इस नम म सवप्रथम मैं हि दी ये उन समथ कथाकारा के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ जिती क्या कृतिा मेरे शाध काय का आधार बनी हैं । हिदा के सुप्रतिष्ठित कथागर पूज्य पिताजी श्री यादवेद्र शर्मा 'चन्द्र' और माताजी श्रीमती पाति भट्टाचाय वी सतत सप्रेरणा से यह काय निविधा सम्पूण हुआ है, उनो प्रति जागार प्रदशन की जौपचारिकता न करके उनके नाशीर्वाद की कामना करता हूँ। परिवार के अप सदस्या म अग्रज श्रीनवरतन विस्सा, श्री विजय तुमार बिस्सा आभार व्यक्त परता हूँ कि उहान मुझे इस काय को पूर्ण करने मे गिरतर प्रेरणाएँ दी। डा० आदश सक्सेना, डा० उमाकात गुप्त, दिलीप कुमार, श्री बुलाकी शर्मा और प्रकाशक चाचा श्री प्रेमच द शर्मा जिहान इस पुस्ता को णोघ्र प्रकाशित कर पाठमो तक पहुंचाया। आशालक्ष्मी -कृष्णकुमार विस्सा 'चद्र' नया शहर बीकानेर (राजस्थान) विषयानुक्रमणिका पप्ठ सहपा १ हिदी उपपास का विकासात्मक परिप्रेक्ष्य और साठोत्तर हिदी उप यास उपन्यास पारिभापिर स्वरूप विववन, हिदी उपयास विकासात्मक परिप्रेक्ष्य प्रेमचद पूर्ववर्ती युग प्रेमचद युग, प्रेमचदोत्तर युग, समकालीन औपयासिक सरचना, साठगत्तर हिदी उप यासो मे राजनीतिक चेतना का म्वरूप एव ममीक्ष्य उपयासो का मक्षिप्त परिचय । २ समीक्ष्य उपयासी की सजनात्मक प्ररणाएं सजन शाब्दिक विवचन, औपयामिक सजन की प्रवृत्तिया साठोत्तर राजनीतिक उपयासा की सजन प्रेरणाएँ एव समीक्ष्य उप याम-एक और मुग्यमत्री समकालीन राजनीतिक चेतना का पवताकार दपण, सहिं नचावत राम गामाई पूजीपति व राजनीति वा के उत्थान या इतिहास, काली आँधी नारी के राजनीति में प्रवेश को कहानी, राग दरबारी शहरी और ग्रामीण राजनीति का पोस्ट माटम कटरा वो आजू निम्न वग की जार्जुना, तम नाजावाजाइना, महाभाज चुनावी पडयमा का ययाय स्प, जगलतम पच्चीस सालो यो राजनीति का चित्रण, महामहिम जनता पार्टी के शासन को व्यग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है, हजार घोडा वा सवार दलितो, शोपितो की व्यथा का दपण, दारुल शफा लोनुप राजनीति एव उसके अवमूल्यन का दस्तावज, समय एक शन भर नहीं है युवा पीढी, नक्सली आ टोलनो का चित्र, शाति भग आपातकाल का पणित इतिहास प्रजाराम अत्याचार, भयावहता आतक के साथ समृद्धि, शाति विकास या चित्र, सुराज लोक्तानिय समाजवादी व्यवस्था का पडवा यथाप।पिकप ३ कम्य विश्लेषण औरयामिर क्य सद्धातिर स्वाप विपचन, कथ्य चयन के विविध सोन स्थान के प्रकार एव पथात्मक सयाजन की विशेषताएँ समोर उप यासा मा क्यासार, पथा विधान सम्बधी विशेषताआरे आधार पर कम्य विश्लेषण ।

४ राजनीतिक विचारधाराए, राजनीतिक विचारधाराओं की सदीतिक स्वरूप विवेचन एव । प्रवृत्तिमूनक विश्नेषण । (ग) लोक्ताभिक समाजवाद समाज वाद स्वरुप, परिभाषा और मून तत्व, परिभाषाएँ, समाजवाद के मूल तत्व, समाजवाद और लाकतन, समाजवाद और पूजी- वाद समाजवाद और गाधीवाद, समाजवाद और साम्यवाद । दाशनिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिर एव क्लागत परि प्रेक्ष्य में समाजवादी दशन-दाशनिक पहल, सामाजिक पहलू, समाज पाद की भारतीय परम्परा और उसके प्रमुख बिता- मानवे द्रनाथराय और ताक्तानिक समाजवाद, राममनोहर लोहिया ममीक्ष्य उप शसो में निरूपित लोक्तात्रिक समाजवाद थी प्रमुख प्रवत्तिया--सामाजिक संगठन का लोरतत्रीय आधार, लोक सामथ्य या जनशक्ति में आस्था, व्यक्ति के स्थान पर समष्टि को मा यता, पूजीवादी शोषण का प्रतिरोध, शोपित, दलितो और पीडितो के प्रति सहानुभूति, सामाजिक समता को सकल्पना, श्रम का महत्ता का प्रतिपादन, राजनीतिक और आर्थिक स्वातव्य पर समान बल, राज्य सत्ता का लोप और वगहीन आदश समाज की कल्पना, निष्कष, लोक्तानिक समाजवादी विचारधारा पर आधारित हिदी उप यासो का मूत्यावन । (ख) माक्सवादी विचारधारा-मावसंवाद का सद्धातिक स्वरूप विश्लेषण, द्वन्दात्मा भौतिक्वाट, वर्ग एव वग सघष, सवहारा अधिनायकत्व या एकाधिपत्य राज्य सत्ता के लोप और बगहीन समाज की अवधारणा, माक्सवादी चिंतन मे का और साहित्य सम्बधी मा यताए, वला साहित्य की प्रेरणा साहित्य और राजनीति, आधुनिक हिदी के राज- नीतिक उप यासा मे माक्सवादी चि ता की अभिव्यक्ति, वग वैपम्य और वग सधप की प्रवत्ति, कातिमय चेतना, शोषण के विरुद्ध हिंसा की अभिस्वीकृति, उपनिवेशवाद का विरोध 'कला जीवन के लिए' सिद्धात का समथन, जनशक्ति मे आस्था, श्रम की महता का प्रतिपादन सम वितरण का सिद्धात, राज्य सत्ता का लोप एव आदश साम्यवाद की परिकल्पना माक्सवादी विचारधारा पर आधारित हि दी उप यासो का मूल्याक्न । (ग) राष्ट्रवादी चेतना-राष्ट्र शाब्दिक व्युत्पत्ति एव पारि- भापिक स्वरूप विश्लेषण, कोशीय नथ, राष्ट्र और राष्ट्रीयता, राष्ट्र और राज्य का सम्बध एव अतर राष्ट्रवाद के प्रकार, राष्ट्रवादी चेतना का विकासात्मक परिप्रेक्ष्य वदिक कालीन राष्ट्रवादी चेतना, रामायण और महाभारतमाल, जन बौद्ध काल, मध्य युगीन राष्ट्रीय चेतना, आधुनिक युग मे राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रवादी चेतना को प्रमुख प्रवत्तियों -स्वदेश गौरव एव राष्ट्र भक्ति सणिम अतीत का गौरवगान, राष्ट्र वदना दे स्वर एव प्रशस्तिगान, राष्ट्र की होनावस्था का चित्रण, विदेशी शासन के प्रति आगोश तथा विद्रोह की भावना, नव जागरण का उदघोप, स्वतता सघप, राष्ट्रीय ममृद्धि वा महाभियान, भौगोलिक एक्ता की भावना, जोय एकता, धार्मिक एकता की भावना, निष्कप, राष्ट्रवादी विचारधारा पर आधारित हि दी उप यासो का मूल्याग्न । (घ) गाधीवादी चेतना-गाधीवाद की पृष्ठभूमि, गाधीजी का जीवन परिचय, व्यक्तित्व की गरिमा भारत का स्वतत्रता मग्राम और गाधीजी, देश के सवतोमुखी विकास मे गाधीवाद का प्रभाव गाधीवाद के स्वरूप विश्लेषण, भारतीय सामाजिक जीवन और गाधी वाद भारतीय धार्मिक नैतिक जीवन और गाधीवाद, भारतीय 'राजनीतिक जीवन और गाधीवाद, सत्याग्रह, असहयोग, अहिंसा का पालन, गाधीवादी दशन के आधार पर सर्वोदयी समाज की सकल्पना, गाधीवाद की प्रमुख प्रवृत्तिया-अस्पश्यता उमूलन, साम्प्रदायिक एकता पर बल, खादी एव ग्रामोद्योग का प्रचार प्रसार, सत्याग्रह, असहयोग एव सविनय अवज्ञा आदोलन का अनुसधान, सामाजिक कुप्रथाआ एव रूढिया का विरोध अहिंसा की शक्ति मे अटूट विश्वास नारी मुक्ति का समथन, द्रुतगामी मशीनीकरण एव औद्योगिकीकरण का विरोध, सर्वोदय आर्थिक अभ्युदय का कायक्रम आध्यात्मिक निष्ठाओ का परिप्रेश्य मानयतावादी चितन मूल्यो की प्रतिष्ठा का आग्रह, निष्कप, गाधीवादी विचारधारा पर आधारित हि दी उप यासो का मूल्याकन । ५ राजनीतिक चेतना एव परिवेश १५३-१७४ शादिक विवेचन परिवेश, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता की राजनीति राजनीतिक सस्थावाद, भाषा की राजनीति आनु वशिकता की राजनीति नारी चेतना के परिवर्तित आयाम शहरी और ग्रामीण राजनीति एव सस्थागत राजनीति आ दो- लनकारी प्रवत्तिया, जातिवाद पर आधारित वतमान राजनीति, निष्कर्प। ५ उपसहार १७५-१७८ अध्ययन के निष्कष, उपलधिया और सभावनाएँ ६ प्रथानुक्रमणिका १ | हिन्दी उपन्यास का विकासात्मक परिप्रेक्ष्य और साठोत्तर हिन्दी उपन्यास उपन्यास पारिभापिक स्वरुप विवेचन साहित्य को सबसे अधिक लायप्रिय विधा 'उप यास' आधुनिक युग की देन है। जो स्थान प्राचीन काल मे महाराव्या का था, वही आज "उप यास' का है। 'उपयास में दुनिया जसी हो, उसे वैसी ही चित्रित करने का प्रयास किया जाता है।" इसीलिए उपयास आज साहित्य का सबसे प्रमुख अग बन गया है । उप- “यास ही एक ऐसी विधा है, जिसमें लोकहित की भावना अय विधाओ की बनिस्बत ज्यादा कलात्मक एवं सशक्त रूप से उभरी है, क्योकि 'जीवन और जगत ये प्रति छाया अपनी सम्पूणता में उपयास मे ही चित्रित हो पाती है।" संस्कृत साहित्य में 'उप यास' शब्द मनोरजन के अथ मे प्रयुक्त होता है। आग्ल समीक्षक हडसन भी उप यास मे मनोरजन को सर्वोपरि मानते हैं।' 'उप यास ने अल्प समय में अपने व्यास को इतना फैलाया है कि यह सामान्य पथ्य और घटना से लेकर गहनतम विषय दशन तक को अपने में समेटन मे समय हो गया है। उसकी सफलता उसमे वर्णित अथवा चित्रित तत्त्वो की मान- वीय स्पदनशीलता पर आधारित होती है ।" साहित्य की उस प्रमुख विधा 'उप यास' यी शाब्दिक व्युत्पत्ति का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि उपायास शब्द संस्कृत की 'अस' धातु से बना है, जिसका अय होता है-रखना (असुनेपणे) इगमे 'उप और 'नि उपसग है और 'घर' अथ प्रत्यय का प्रयोग है। उप यास का मुरुपाय है, सम्यक रूप से 'उपस्थापन'। डा. मण्डोनल ने १ डॉ० वेचन, आधुनिक हिदी उपन्यास उदभव और विकास, प० १३ २ हेनरी जेम्स, दी आट आफ फिक्शन, पृ० ३६३ ३ इट्रोडक्शन टू दि स्टडी आफ लिटरेचर, पृ०१३२ ४ हॉ० बेचन, आधुनिक हिदी उपन्यास उद्भव और विकास, पू २१ ५ हिदी उपन्यास साहित्य, पृ० १० १० अपने शब्द कोप मे 'उप यास' के अर्थ पिए है-विमप्ति (इटीमेशन), अभि- क्थन (स्टेटमेट), उद्घोषणा (डिक्लेरेशन), वाद विवाद (डिस्कशन)' स्पष्ट है कि यद्यपि 'उपयास' शन सस्कृत वाड मय मे प्रचुरता से प्रयुक्त होता था, कि तु फिर भी इस शब्द से वह अथ ग्रहण नहीं किया जाता था, जो प्राय आज कल हम लेते हैं अर्थात गद्यपद्ध पर्याप्त लम्पी क्था । यह अय इस शब्द का सवथा नूतन अथ है जो आधुतिक युग में प्राप्त हुआ है और यही अथ आज इसका प्रधान व अधिकतम प्रचलित अथ भी है । उपयास शब्द वा मया में अथ मे सबसे पहला प्रयोग बगला भापा म मिलता है। 'उपयास' अय क्ला रूपो से भि न इसलिए भी होता है कि उसमे वह शक्ति है कि जीवन के गोपनीय अतरग यथा-मानसिक सघप को भी वह पाठा के मम्मुख उत्घाटित करता है। इस प्रकार ययाथ का यह चित्रण उमरो भिन है जो कविता, नाटक, सगीत, चित्रकला द्वारा होता है । उप यास अपनी परिधि मे समूचे अविभाज्य जीवन को समेटता है। कुछ भी नही है जो इमकी परिधि से बाहर है--मनुष्य का घेतन, अद्धचेतन अथवा अचेतन । 'किमी विधा को परिभाषित करना एक दुष्कर कार्य है, जिसमे 'उप यास' पो परिभाषाबद्ध करना और भी कठिन है क्योंकि यह सर्वाधिक रूपातरणीय विधा रही है। जिम प्रकार 'माहित्य अथवा बविता' को परिभाषित करने के अनेक प्रयत्न देश विदेश में किए गये हैं, कि तु कोई भी एक परिभाषा सम्पूर्णत स्वीकृत नही हुई उमी प्रकार 'उपन्यास' की भी अनेक परिभाषाए अनेक विद्वाना ने दी हैं कि तु कोई भी एक परिभाषा उप यास के सब पहलुओ को सीमावद्ध नहीं करती। उपयास के सम्बध म भारतीय एष पाश्चात्य विद्वानो की परिभाषाए हम इस प्रकार से देख सकते है। राल्फ फाक्स ने उप यास के सम्बध मे कहा है कि मानव जीवन की विविध सर्वांगीण अभियक्ति उप पामो म ही सभव है। उप यास केव न गद्य लिखी हुई कथा ही नहीं है । उसो उसे मानव जीवन का गद्य माना है । वाल्टर एलन का कहना है कि महान उप यासो मे महान चरिनो का रहना अनिवाय है। बिना महान चरित्रो के कोई महान उप यास नहीं हो सकता । जाज मूर के विचार से, 'उपन्यास समकालीन इतिहास के सिवाय और कुछ नहीं है । जिस युग में हम १ जनेन्द्र और उनके उप यास, प० ३ २ आधुनिक हिदी उप यास उम्भव और विकास पृ० २०-२१ ३ आलोचना (श्रीपतराय का लेख) (७, प० ६६ ४ आटेफ टी० सिप्ल डिक्शनरी आफ नाघेल, प० २०३ ५ राल्फ फाक्स, दि नावेल एण्ड दी पीपुल, प० २५ वात्टर एलन, दि इगलिश नावेल, पृ० १५ जी रहे हैं, वह उसके सामाजिक परिवेश का बिलकुल पूण और सही-सही पूर्व निर्माण है।" वावू श्यामसुदर दास की परिभाषा-'उप यास मनुष्य के वास्त- विक जीवन की काल्पनिक कथा है।" उपयासकार प्रेमचद ने उपयास की परिभाषा इस प्रकार की है-मैं उप यास को मानव-चरित्र का पिन मात्र समझता हूँ। हेनरी जेम्स उप यास को जीवन का सघपमय चित्र मानते हैं । डा० मूलर के शब्द 'उपन्यास मूलत मानवीय अनुभव का निरूपण है, चाहे वह यथाथ हो अथवा आदश और इस प्रकार उस याम मे अनिवायत जीवन की आलोचता रहती है।" आचाय रामचन्द्र शुक्ल ने हि दी उपन्यास लेखन के प्रारभिक दिनो में अपना मत व्यक्त किया था-'मानव-जीवन के अनक रूपा का परिचय कराना उपयास का काम है । यह उन मूम घटनाओ को प्रत्यक्ष करने का प्रयत्न करता है जिनमे मनुष्य का जीवन बनता है और जो इतिहास आदि की पहुंच के बाहर है । उपन्यास की काव्यमय व्याख्या करते हुए डी० एच० लारेंस कहते हैं कि-'उपन्यास जीवन की एष उज्ज्वल पुस्तक है। पुस्तकें जीवन नही हैं, वे सिफ हवा मे परथराहट पैदा करती है, लेकिन उप यास एक ऐसी थर- थराहट है जो समूचे जीवित मनुष्य को कपा सकती है । कविता, दशन, विज्ञान या किसी भी पुस्तक की थरथराहट से कही ज्यादा जबरदस्त उप यास की पर- पराहट है।" गद्य साहित्य मे उप यास की महत्ता का मुक्त कठ से स्वीकारते हुए डॉ० देवीप्रसाद गुप्त ने लिखा है कि-'गद्ययुग का महाकाव्य उप यास है।" स्पष्ट है कि भारतीय और पाश्चात्य विद्वानो ने उप यास के सदभ मे अपने युग से प्रभावित होकर इसके विभि न पहलुआ के सम्बध मे अपने मतव्य प्रस्तुत किये हैं । सुपमा प्रियदर्शिनी ने प्रस्तुत परिभाषा मे उपयास की सभी विशेप. ताओ को समेटने की चेष्टा की है, 'उप यास वैयक्तिक दृष्टि से वास्तवाभासा कल्पित कथा पात्रो को लेकर जीवन के एकागी या बहुरगी गतिशील यथार्थ को अकित करने में नित्य नवल रूप धारण करने में समर्थ, अपेक्षतया बडे आकार का रोचक वणनात्मक गद्य रूप है। १ एडवर्ड वेनेबेबीट, केवलकेड आफ इगलिश नावेल, पृ० २० २ बावू श्यामसुदरदास, साहित्यालोचक, ५० १५० ३ प्रेमचन्द, कुछ विचार, पृ० ३८ ४ जनेद्र और उनके उपयास, ५ पूर्वग्रह ४६ ४७ उप यास अ, ५०५ (नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग १५, जुलाई १५, १९१० मे प्रकाशित लेप का पुन प्रकाशन) ६ वही पृ०१ डॉ देवीप्रसाद गुप्त, साहित्य सिद्धात और समालोचना, पृ. २११ F सुषमा प्रियदर्शिनी (स०), हिंदी उप यास, पृ० ८३ हिन्दी उपन्यास विकासात्मक परिप्रेक्ष्य मन १८८ से हिदी उपयास साहित्य का प्रारम्भ माना जाता है। उप याम रचना शैली के विकास का आज एक शताब्दी हो चुकी है। सन १८८२ से ल कर १९१८ का काल हिदी उपन्यास की प्रयागावस्या का काल था । इस समय महिदी उपायाम भांति भौति के प्रयोगो के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनान मे लगा रहा । उप यास की रचना शाली मे निरतर परिवतन परिलरित होते रहे हैं । ए समय तर एमा समझा जाता या विहिदी के उप यासकार को चेतना केवल मनोरजन ही को मुख्य उद्देश्य मानती है । सन् १९१८ हिदी उप याम के लिए मवश्रेष्ठ माना जा सकता है क्योकि इमो बप मुशी प्रेमचन्द के प्रथम हिदी उप यास मेया मन' का प्रकाशन हुआ और हिदी उपन्यास जीवन तथा समाज के यथाध स्वरूप एवं मानवीय संवेदनाओ के चिषण का माध्यम बना ।" प्रेमचद ने अनुभव के वजर को ताडयर जीवन छोरी को छा विना ऊपर से भागी जा रही स्थायी का जीवन से जाडर एक प्रामाणिक, विश्वसनीय और माथा क्या ससार रचा।' प्रेमचद हिदी के प्रथम उप “यासमार हैं जिनकी रचनाएँ 'उप यास' की कसौटी पर पूरी तरह से खरी उत रती हैं । उपल्यामवार के मे प्रेमद की सवप्रमुख विशेषता यह है कि उन्होने समकालीन यथार्य को बहुत कनापूर्ण दग से कया साहित्य म जोड दिया। सम सामयिक यथाथ को बहुत ही क्लापूण प्रामाणिक, विश्वमनीय एक साथक रूप से क्या सूत्र मे पिरान वाले वे प्रथम हिटी उप यासकार थे। 'प्रमचद ने हिली उपयामा को एक सवथा ननोन दिशा प्रदान की और उसे शव अस्वथा से निकालकर प्रगति और विकास की ओर दिशा मुख किया, अत इही के आधार पर माल विभाजन तकसगत माना जाता है। हिदी उपन्यास का काल विभाजन इस प्रकार किया जा सकता है ~~ (१) प्रेमचन पूर्ववर्ती युग (१८८२ से १८१८ तक) (२) प्रेमचंद युग (१९१८ से १६२६ तक) (३) प्रेमचदोत्तर युग (१९२६ से १६५० तक) (४) समकालीन युग (१९५० से आज तक) १ बुलाकी शर्मा मनोविज्ञानिक पर आधारित उपयास (दलित), २०५ डा. वीप्रसार गुप्न प्रेषचद का अवधारणामा (लेख) परिप्रय, वातायन पु. ११५ हा० गोपाल प्रमचद वे उपयाम (लेख), वातायन (वय १९, अक १० प्रेमबत अक) प० २८ बाल मनोविज्ञान पर आधारित उपन्यास, पृ०६ ५ डॉ. सुरेश सिंहा, हिली उरयास शिल्प और प्रवृत्तियो, १० १८ ३ प्रेमचन्द पूर्ववर्ती युग हिदी मे कहानिया की नियमित परम्परा उनीसवी शताब्दी से नजर आने लगी थी। पहले इन कहानिया मे मौलिकता, विश्वसनीयता और कलात्मकता का पूणरूप से अभाव था । तत्पश्चात हि दी उप घाम लेखन का क्रम सन १८०० के लगभग प्रारम्भ हुआ । उस समय तक उपयास और कहानी के अतर की स्पष्ट रेखाए भी नही उभर सकी थी। अत उस समय की कहानी के सीमा क्षेत्र मे ही उप यास भी समाहित था। ये कथाएं पौराणिक आख्याना पर आधारित हैं और कथाकार रागात्मक कल्पनाआ से प्रेरित हैं । इस समय हिदी गद्य के रचनाक्रम मे हमे तीन महत्त्वपूर्ण ग्रथ मिलते हैं। पहला लल्लूलाल का 'प्रेम सागर' (१८०३) दूसरा सदल मिश्र का 'नासिकेतोपाख्या।' और तीसरा सयद इशाअल्ला खां की (१८०३) 'रानी केतकी की कहानी' (१८०० से १८१० बीच) 'रानी घेतकी की कहानी' मौलिक रचना मानी जाती है । प्राय सब पाय उच्च मध्यवर्गीय है । डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी का मत है कि - यह कहानी मुस्लिम परम्परा को अतिम कहानी है ।" थी बुलाकी शर्मा का मत है कि रानी येतकी की कहानी, कहानी और उपयास दोनो ही कसौटी पर खरी नहीं उतरती।' हिदी का प्रथम उप यास किसे माना जाए? इस सम्बध मे विद्वानो मे मतभेद है । रामचन्द्र शुक्ल प्रमति आलोचक ताला श्रीनिवासदास के 'परीक्षा गुरू' को हिदी का प्रथम मौलिक एव नये शिल्पा मे ढला आधुनिक उप यास मानते है । जिसका प्रकाशन सन् १८८२ म हुआ था। डा० माताप्रसाद गुप्त का मत इनसे 'भिन है। उनका कहना है-'हिदी का पहला उप यास 'परीक्षा गुरू' (१८८४ द्वि० स०) माना जाता है, वितु यह धारणा ठीक नहीं है, क्योकि १८७१ स भी पूर्व उप यास रचना के प्रमाण मिलते हैं । इस प्रकार का पहला उपयास जिसका उल्लेख मिलता ह-'मनोहर उपयास' (१८७१) है जिसके सम्पादक है-- सदानद मिश्र तया शभुनाथ मिथ । लेखक का नाम नहीं दिया हुआ है, किन्तु यह अनुवाद ज्ञात नहीं होता, क्याकि यह सम्पादका द्वारा केवल 'सग्रहीत और 'सशोधित' कहा गया है । इसकी कथावस्तु के सम्पध में कोई भी सकेत नहीं है, यह अवश्य सेदजनक है।" हिदी के प्रथम उपयास के सम्बध मे विचार परें तो हमारे सामने इनके अतिरिक्त और भी रचाएं सामने आती हैं। इनमे प० गौरीदत्त लिखित "देवरानी जेठानी की कहानी' (१८७०) मुशी ईश्वरी प्रसाद मुरिस रियाजी' और मुशी कल्याणराव मुरिस अव्वल द्वारा लिखित 'वामा शिक्षा और दो १० हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य २ बुलाको शर्मा, बाल मनादिपान पर आधारित उप यास (टवित), पृ. ६ ३ गे० मावाप्रसाद गुप्त, हिंदी पुस्तर साहित्य, पृ०३४ भाई और चार वहना की कहानी' (१८७२) प० श्रद्धाराम फिल्लौरी लिखि 'भाग्यवती' (१८७७) आदि रचनाएँ प्रमुख हैं । अतत सन १८८२ मे प्रकाशित लाला श्रीनिवासदास के उप यास 'परीक्षा गुरु' को हिदी का प्रथम उप यास स्वीकार किया गया है । 'परीक्षा गुरू' के निवेदन मे कहा गया है कि-'अपनी भाषा मे यह नयी चाल की पुस्तक होगी।" 'परीक्षा गुरू' अपने समकालीन मध्यम वग समाज और देश दशा का विस्तृत परिचय देता है।' उनीसवी शताब्दी मे हि दी साहित्य मे मौलिक अमौलिक उपयास लिखे गये परतु अधिकाश उप यासा का उद्देश्य सिफ पाठक का मनोरजन करना था। कुछ सामाजिक शिक्षाप्रद उपयास भी लिखे गये लेकिन वे मनोरजक उपयासा के आगे पसद नही किये गये। लाला श्रीनिवासदास के 'परीक्षा गुरू' के, पश्चात सामाजिक प्रश्नो को लेकर लिखित बालकृष्ण भट्ट के 'नूतन ब्रह्मचारी, 'सौ अजान एक सुजान' राधाकृष्ण के निस्सहाय हिदु' राधाकृष्ण गोस्वामी के विधवा विपत्ति मेहता लज्जाराम शर्मा के 'स्वतत्र रमा और परतत्र लक्ष्मी', "हिदु गहस्थ' आदि उल्लेखनीय है । सन १८८८ मे ठाकुर जगमोहनसिंह ने आदश प्रम का चित्रित करने वाली गद्य पद्य मिश्रित क्था कृति 'श्याम स्वप्न' की रचना पी। लेखक ने इसे उप यास माना लेकिा आज का आलोचक इसे उप यास पहना उचित नहीं मानता है । हि दी उप यास के आरभिक काल में सामाजिक शिक्षाप्रद उपयासो को उतनी लोकप्रियता नही मिली जितनी की तिलस्मी ऐय्यारी और जासूसी उपयासो को मिली। हिदी उप यास वे उस प्रारभिव युग म पाठको को रचि निर्माण इ ही उप यासो ने किया। केवल जनरुचि को सतुष्ट करने के उद्देश्य से काशी से व्यवसायी वग के श्री देवकीन दन यती ने १८८१ ई० महिदी में एक नय ढग ये उप यासा की परम्परा चलायी, जिस तिलस्मी और ऐयारी उप यास कहा जाता है। इसके अतगत श्री खत्री ने च द्रकाता (४ भाग) चद्रकाता सतति (२४ भाग) और भूतनाथ' जिसे श्री देवकीन दन खत्री के खत्री ने सपूण किया। गोपालराम गहगरी ने जासूसी और अपराध सबधी उपयास सन १६०० मे जासूस नामक पत्रिका म लिखे जिसमे उनकी अनेक जासूसी और अपराधविषयक क्याएँ प्रकाशित हुई । विशोरीलाल गोस्वामी ने पुत्र दुर्गाप्रसाद १ (क) रामचद्र शुक्ल हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ० ४१० (ख) डॉ० श्रीकृष्ण लाल श्रीनिवास प्रथावली, पृ० ११ (ग) डॉ० प्रतापनारायण, हिदी उप यास का उभव और विकास, प० ३२ (घ) महेद्र चतुर्वेदी हिदी उप यास एक सर्वेक्षण, पृ० १६ २ लाला श्रीनिवासदास, परीक्षा गुरू ३ . बेचन, आधुनिक हिन्दी उप यास उद्भव और विकास, पृ० ५४ भी तिलस्मी, ऐय्यारी, ऐतिहासिक, सामाजिक और जासूसी उप यास लिपने की क्षमता पाठको के सामने प्रस्तुत की। शुक्ल जी कहते हैं कि-'इनके उप यासो मे समाज के कुछ सजीव चित्र, वासनाआ के रूप, चियापण वणन और थोडा बहुत चरित्र चित्रण भी अवश्य पाया जाता है।" उहोने प्रणयिनी परिणय, हृदयहारिणी, आदश रमणी, लीलावती आदि उप याम लिसे । गोस्वामी जी न सन् १८६८ में 'उप यास' नामक मासिक पत्रिका निकाली जिसम उनके ६५ छोटे बडे उप यास प्रकाशित हुए। किशोरीलाल गोस्वामी ने भावी पीढी के उपयासकारो के लिए माग दिखाया है।' उहें हिदी मे ऐतिहासिक रोमासो का जमदाता माना जा सकता है। अतिरजनाआ के बावजूद जीवन और समाज के कतिपय यथाय चित्रण गोस्वामी जी की रचनाओ के द्वारा प्रस्तुत हो सके हैं। 'प्रेमचद से पूर्वकालीन उप यासो मे चरित्रा के विकास या उत्थान पतन की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता था, वे सिफ मनारजक तत्त्वो की ओर ध्यान रखते थे।" प्रेमचद से पूर्व हि दी उपयास प्रधान रूप से अद्भुत, अलौकिक घटना व्यापारो मे विस्मय विमुग्ध सा उलझा रहा है। प्रेमचद वे हिदी क्षेत्र मे पदापण करने से पूर्व हिदी उप यासो का मूल उद्देश्य या तो जनता का मनी- विनोद था अथवा जनता का सुधार । ऐसी अनिश्चितता की अवस्था म प्रेमदद मार्ग प्रशस्त किया। एक कुशल कलाकार की भाति उ होन समस्त द्वारा को कांट-छांटकर उपयास के लिए सुदर राजमाग तयार कर दिया। प्रेमचन्द युग 'प्रेमवद का आरभ हिदी उप यास म नय युवा है: वरन् वास्तविक अथ उप यास-युग आरम हाता है। झोपडियो में पुआलों पर पड़ी तडपती हुई भारती मे सरल तथा स्वाभाविक यौवन के मौष्टर वा ir चक्की मे पिसने वाले दीन जना म भी मदम १ आलोचना (उपयास अब), पृ. २ डॉ० कृष्णनाग, विशोरीलाल प्राट विवचन आजकल (उपयास) गर, बाल मनोविनान पर इन ५ डॉ. मनुनाटिन्ट Art, ६ डॉ. त्रिभुवन, frier : ० मुराद ८. i गिर ३ नाम से प्रेमचंद का पहला उप यारा प्रकाशित हा ! प्रेमचद में 7 पन यासो के द्वारा एक युगात उपस्थित हुआ | हो। निज जीवन की छोटी हाटी घटनाओ और प्रसगो मम स डी-दही सामाजिया, मन और आर्थिक समस्याओ या मानव की सहज प्रतिविया मा पुट देवर राम सिरसा गोई म प्रस्तुत दिया जो पारयो यो तात यरन म रिद हुई ।' मघा ने उपदेशात्मयता का, वही व्यग्यात्माता का आश्रय लिया है।उही भारतीय जन जीवन-परिवेश और यास्तरियता को नजदीकी ग देशा, भागा और उह अपनी रचनाओ मे उतारा । 'यस्तुत प्रेमचट युग म प्रमचद ये साथ-साथ उपन्यास साहित्य में जो समान सापेरता मायो, वह उनकी सबसे बड़ी दन है।' उहाने जीवन की सच्चाई का माया, शापण ये पिलाप सघपरिया ! ato रामविलाग न मितना सही कहा है-'प्रेमपद का साहित्य बीसवी सदी के हिंदुस्तान का सच्चा साहित्य है।" प्रेमचंद के समकालीन रुपयासयाराम गवश्री जमवर प्रसाद, वृदावनलाल, निराला, मगवती प्रसाद वाजपपी, विश्वम्भरनाय काशिम, पाहय बेचन शर्मा उग्र, प्रतापनारायण श्रीवास्तव ये म प्रमुखता से लिए जा सकते हैं । प्रेमचदोत्तर युग सन् १९४७ में भारत की स्वन ५ता प्राप्त हुई। हि दुरतान बगाल और पाकिस्तान में विभक्त हो गया। इसस न वेवल देश वटा अलि सस्कृति, सभ्यता और आथित स्थिति भी बदल गयो । जिसके फलस्वरूप दोना राष्ट्रा म भयपर बेरोजगारी, गरीबी, कामातजा और ववरता बढने लगी, जो अभी भी मौजूद है । स्पष्टत लेखक भी इससे अछूता नही रह मरता था, क्योधि वह अन्तत एक सामाजिक प्राणी है, जिस पर परिस्थिति की प्रतिषिया होती है। प्रेमचद पूर्ववर्ती तथा प्रमचद युगीन उपल्यासो मे जिन समस्याओ को अक्ति किया गया या वे प्रेमवीतर काल मे नवीन रूप में विस्तार के साथ प्रस्तुत की गई। इस काल में मनोविश्लेपण तथा ययाथवाद की प्रवत्तियां प्रधान रूप से मिलती है। इसमें मनाविज्ञान, सास्कृतिक, आमिर, वैयक्तिक सामाजिर सभी समस्याए विस्तार से मिलती हैं । प्रेमचद के पश्चात के Trयासकाराने पुरुष और नारी के शारीरिक सवधा को सामाजिक तथा नैतिक दायरे तक सीमित न रहार उसे मानव को महज प्रवत्ति के रूप मे ग्रहण किया है । जसे यशपाल ने सम्म १ बुलाफी शर्मा, बाल मनोविज्ञान पर आधारित उपन्यास, पृ० १० २ राजेश्वर गुरु प्रेमचद एक अध्ययन, पृ० ११६ ३ हिदी उप यास एक सर्वेक्षण, पृ० ५१ डॉ० रामविलास शर्मा, प्रेमचंद और उनका युग, पृ. १५६ और रोटी की आड मे रोमास और प्रणय वे उद्दाम रूप को अपने उप यासो मे वण्य विषय बनाया ह । डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं-'यशपाल के पान जन जीवन के प्रतिनिधि नही है वे उस वग के लोग है, जिनके लिए संक्स और आत्म पीडा की समस्याएं प्रधान हैं।" प्रेमचदोत्तर काल मे मनोविज्ञाा का विषय प्रेमपद के बाल से अधिक गहरे स्तर तक उभरा है। पात्रो की टूटन, यौन कुण्ठा, चेतना, प्रवाह, प्रकतवाद, तज्जय स्वप्न तथा प्रतीकात्मवता का प्रभाव कमोवेश इन उपयासा में ज्यादातर मुखर हुआ है। इस युग मे पारम्परिव विपर्यो और शली दोना के प्रति लेखया ने विद्रोह पिया ह । 'इस दौरान मे समाजवादी यथायवादी उप यासा का सृजन हुआ।" उप यास के इस युग में नयी भूमिका का अपण पिया, नये प्रयोग किये, मानव सत्यो को पकड़ने के लिए नयी दिशा में पदम उठाया। इस युग के प्रमुख उप यासकारो में भगवतीचरण वमा, यशपात, जनेद्र कुमार, अज्ञेय, इलाचद्र जोशी, उपेद्रनाथ 'अशक, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, रागेय राघव, फणीश्वरनाथ रेणु, अमृतराय, विष्णु प्रभावर धमवीर भारती, शभुदयाल सक्सेना आदि के नाम उल्लेखनीय - समकालीन औप यासिक सरचना "प्रेमचद के पश्चात हि दी उपयास पर किसी एक लेखक का प्रभाव न होने से और विभिन्न व्यक्तिगत सफन प्रयोग होने के कारण सन् १९३६ से १९५० के युग का प्रेमचदोत्तर युग या प्रयोग काल की सजा दी गई है। शेष १९५० से आज तक का युग समकालीन युग के नाम से पुकारा जाता है । इस युग के वैज्ञानिक चिंतन ये परिप्रेक्ष्य मे विनवाद का विकास हुआ । व्यक्तिवादिया ने व्यक्ति को लक्ष्य और समाज के निमित्त बना वाली विचारधारा को अपनाया। स्वाधीन भारत के हिंदी उप यासो मे व्यक्ति साधन और समाज साध्य की विचारधारा के रूप में उत्तरोत्तर निरूपण हुआ है । नव चेतना विकासजनित । स्वातग्य भावना स स्त्री पुरुष मे पारस्परिक स्पर्धा का स्फुटन हुआ है । हि दी के उप यास प्राय स्वातव्य-सघप की पष्ठभूमि को लेकर लिखे गय कि तु स्वतत्रताज य परिस्थितियो मे जिस समद्ध जीवन की साहित्यकार परिकल्पना करता था, वह यथाथ के सम्मुख सफलीभूत नहीं हो सकी। उसे आज जो १ हॉ० रामविलास शर्मा प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ, पृ० ११६ २ और इसान मर गया, पृ०६ ३ कमल कुमार जौहरी, हि दो के स्वच्छदतावादी उप यास, पृ० ४५८ डा. हेमेन्द्र पानेरी, स्वातत्र्य हिंदी उप यासो मे मूल्य सक्रमण, प० १४६- . सामाजिक जोग निधायी पडता है, 'वह है व्यापक भ्रष्टाचार, चतुर्दिक नैतिक पतन, राष्ट्र जीवन का सम्पूण विघटा आनि।" यह याल उप पासो की सख्या शिल्प को दृष्टि से पुष्पल विकास का युग रहा । आकार सौष्ठय और अनुभव की गहराई प्राप्त परने वे ध्येय से अनेक प्रयोग इस पाल मे दिये गये। इसा चन्द्र जोशी, अशेय, जनेद्र द्वारा प्रतिष्ठित वैयक्तिव उप यास तथा नागार्जुन, रेणु, यज्ञदत्त आदि द्वारा पुनर्जीवित सामाजिक उप यास दो प्रकार को सशक्त धाराए एक साथ इस युग म प्रवाहित हुई। इन साहित्यिक भूमिकाओ तया स्वतयता प्राप्ति के पश्चात् विवसित सामाजिर मनोवृत्तियो के परिवेश में उपन्यास को पर्याप्त सामाजिर व्यापकता और मनोवज्ञानिक गहनता अजित करने का सुयोग प्राप्त हुआ । आधुनिय बोध पोलेपर आगे आने वाले लेखकों में राजेन्द्र यादव, नागाजुन, रेणु नरेश मेहता आदि प्रमुख हैं । १९६० के पश्चात् हि दी उप पास क्षेत्र के प्रमुख लेखक हैं-कमलेश्वर, माहन राकेश, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, निमल वर्मा, हिमाशु जाशी, राजेद्र अवस्थी, शलेश भटियानी, राही मासूम रजा, मनू भण्डारी, श्रीलाल शुक्ल, शानी, उपा प्रियवदा, शिवानी, मनोहर श्याम जोशी आदि की रचनाए समकालीन भाव योघ की रचनाएँ हैं। वतमान की कथा राजनीतिक प्रचारवादिता का धयान, गरीबी और आजी विका का प्रश्न, ग्रामीण जनता म शक्षिक और सास्कृतिक चेतना या प्रश्न तथा यथाथ के नये कदमो को अभिव्यक्त करने म लेखषीय प्रतिभा अनुभव की प्रामाणिकता को लेकर आगे बढी है। इस युग की वृतियो मे व्यवस्था का एक विक्षिप्ततापूण विराध मिलता है योर विच्युतियो, उ मादपूण, विक्षोभ, अति रजववाद तथा वहशीपन, आतक आदि इम काल की प्रधान विशेषताए हैं। साठोत्तर हिन्दी उपन्यासो मे राजनीतिक चेतना का स्वरूप हिंदी उपन्यासो की रचना का यथाथवादी युग प्रेमचद से ही शुरू होता है। हिटी के प्रारभिक उपयासा मे राजनीतिक दृष्टिकोण सवथा वाछित विषय था। स्वतंत्रता के पश्चात राजनीतिक उप यासो की विपुल परिमाण मे रचना हुई लेकिन आलाचको का मत है पि उस समय हिन्दी में राजनीतिक उपयासो १ डा. महद्र चतुर्वेदी हिदी उपन्यास एक सर्वेक्षण, पृ० १८० २ शिवदानसिंह हि दी उप यास के अस्सी वष पृ० १०६ १०७ डा० ज्ञानचर गुप्त, हिंदी उप यास और ग्राम चेतना, प० २६८ ४ डॉ. विजय मोहनसिंह, आधुनिक उपयास मे प्रेम की परिकल्पना, पृ० ३९२ की कोई सुव्यवस्थित परम्परा नही थी। प्रेमवद के पूर्ववर्ती उप यासो मे राज- नीतिक चर्चा प्राय नहीं के बराबर थी और अग्रेजी शासन काल मे यह सभव भी नही था । प्रेमचद ही प्रथम उप यासकार थे, जिन्होने राजनीतिक पष्ठभूमि पर उपयासो की सरचना की। राजनीतिक उप यास की परिभाषा अभी तक निर्धारित न होने का कारण यही है कि आलोवक व इतिहासकार उसका पृथक रूप से अस्तित्व मानने मे हिचक्ते रहे हैं। राजनीतिक प्रभाव को दष्टिगत रख कर ही किसी उपयास को 'राजनीतिक उप यास की सज्ञा देना सर्वथा उपयुक्त है। ऐसे राजनीतिक उप यासो मे सम सामयिक राजनीतिक घटनाओ, राजनीतिक पात्रा अथवा राजनीतिक सिद्धातो का प्राधा य एव अक्न रहता है । हिदी मे राजनीतिक उप यास का जम परिस्थितिजय है, जो सामाजिक उपयास की परिसीमा से आगे बढ़ा हुआ एक साहसिक कथा प्रयास वहा जा सकता है । हिदी उपयास का शैशव अति क्षीण सामाजिक एवं राजनीतिक वातावरण मे आरभ हुमा था। प्रेमचद का 'प्रेमाश्रम' उपयास हिदी का प्रथम राजनीतिक उप यास माना जाता है । 'रगभूमि' 'कमभूमि' मे गाधीजी के आदोलना का वणन मिलता है । सियारामशरण गुप्त ने 'गोदें' 'नारी' और 'अतिम आकाक्षा' उप यास मे गाधी वाद के तात्विक स्वरूप को ग्रहण कर उसके सत्य और अहिंसा का प्रतिष्ठापन कर हृदय परिवर्तन से सामाजिक सुधार की परिकल्पना की है। जनेद्र के सुनीता' 'सुखदा' 'विवत्त' आदि उप यासो मे गाधीवाद को बौद्धिक रूप से स्वीकार किया गया है। गादान' में मजदूर आ दोला और समाजवादी चेतना का वणन किया गया है। यशपाल ने दादा कामरेड, दशद्रोही, पार्टी कामरेड' मप्नुय का सच, झूठा सच आदि राजनीतिक उप यासा की सरचना की । सन् १९६० के पश्चात् राजनीतिक विषयो पर जा प्रमुख उप यास लिखे गये, उनका परिचयात्मक विवेचन यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है- एक और मुख्यमनी (१९६९) श्री यादवेद्र शर्मा 'चद्र' रचित 'एक और मुख्यमत्री' मे स्वतत्रता के पश्चात् देश की राजनीति के विघटनशील परिवेश और पतनशील नेतृत्व का ययाय चित्र अकित किया गया है। कथाकार ने हमारे बदलते हुए समाज को पेश किया है, जिसका मूल आधार राजनीति है। हमारा आज का सामाजिक जीवन वसे ही राजनीतिक प्रधान हो गया है, पर इसमे सो मूलत वे ही पात्र उठाए गए है जो पूरी तरह राजनीति मे डूबे हुए हैं। प्रस्तुत उपयास मे स्वाथ- परता, भ्रष्टाचार, दल-बदलू, धूत्तता एव पाखले आदर्शों से युक्त राजनीतिक नया शिषक, अक्टूबर-दिसम्बर १६७२, पृ० ३५६ स्वरूप का प्रस्तुत करने मे लेग्रव' पूर्णतया सफल रहा है। उपयास का नायक अरविंद मध्यमवर्गीय परिवार का मुशिक्षित महत्वाकाक्षी युवक है। उसकी महत्त्वा काक्षा ही उसे राजनीतिक क्षेत्र की ओर पीच ले जाती है। और वह माज के राजनीतिज्ञो की भाति हयकण्डे जपनाता हुआ प्रदेश का मुख्यमत्री भी बन जाता है और अपने पद का खुलकर दुरुपयोग करता है। वह शारान की प्रत्यक व्यवस्था को अपन कब्जे मे करन मे लग जाता है । शची, सत्या आदि न जाने क्तिनी सामाजिक एव राजनीतिक क्षेत्र में वापरत नारियो से उसके अनतिक सबध हैं । यह अनतिकता वतमान सामाजिक माहौल म आम बात बन चुकी है। वह शची को मुम्यमत्री बना देता है । शची के मुख्यमत्री बनने से अरविंद की शक्ति कम हो जाती है। विरोधी पक्ष का भय उसके मन में इतनी गहराई से उतर जाता है कि वह मानसिक रोगी बन जाता है और आत्म हत्या कर अपने राजनीतिक जीवन को समाप्त कर लेता है । रत्नलाल शर्मा का कहना है कि इग उपयास में यथाथ जीवन का चित्रण है परपना सिफ इस बात को सजाने की है । कथाकार की पक्ड बडी मजनून और उसकी दष्टि सूक्ष्म है।" सवहिं नचावत राम गोसाई (१९७०) भगवती चरण वर्मा के उप याम सहिं नचावत राम गोसाइ' मे सामाजिक और राजनीतिक जीवन के परिवेश के अतिरिक्त स्वतन भारत की सच्ची और यग्यपूण तस्वीर प्रस्तुत की गई है । इस उप पाग मे उनकी अपनी पुरानी विस्ता गोई हो अपन फाम म लोटती नहीं दिखती वरन अच्छे व्यग्य लेखक के रूप में भी उभरत दीखते हैं । इस उपन्यास मे स्वतत्र भारत की जीवन धारा के दो पहलुआ का विशेष रूप से उदघाटन किया गया है। एक तरफ पूजीपति उग विकास का रणन है ता दूसरी तरफ नेता और मश्रिया के उदय का । आधुनिक युग में हमारी जान की भारतीय जिदगी भी इतनी विसतिया से भरी है कि इस सामातार व्यग्य दष्टि अपनाये बिना शायद क्यिा हो नहीं जा सकता। हमारा समसामयिक जीवन इतनी निगशा, कुठा आर तनाव से भरा हुआ है कि उस पर व्यग्य के अतिरिक्त और क्सिो चाट का क्दाचित कोई असर नहीं पड सक्ता । भगवती बापू के पास यह व्यग्य दष्टि है । उनके किसी भी पूर्व वर्ती उप याम मे व्यग्य प्रभावशाली रूप मे नही उभर पाया है । 'सबहिं नचावत राम गुसाई इस दृष्टि से रोचक और पठनीय उप यास है ।' - रत्नलाल शर्मा ममाज कल्याण, अतिम पष्ठ से उद्धत २ डॉ. गोपालराय, समी, जुलाई १९७०, पृ०२- १ काली आधी (१९७४) श्री कमलेश्वर क्त 'काली आधी' उप यास मे कमलेश्वर ने इस उपयास मे यह उद्घाटित करने का प्रयास किया है कि स्वन यता से पहले भारतीय नारी के साथ एक बहुत ही प्राचीन मूल्य जुडा हुआ था, वह था पति की सेवा करना और बच्चो की देखभाल करना । यही मातन काल से स्त्री का धम माना जाता था। स्वतयता के बाद इस पर प्रहार किया जाने लगा, जिसके फलस्वरूप नारी घर वाहर राजनीतिक क्षेत्र मे आई और विपरीत परि- स्थितिया का सामना कर समाज मे अपना स्थान बनाया । आधुनिक नारी को इसी गाथा को कमलेश्वर ने 'काली आधी' मे चित्रित किया है । नारी के इस द्वद्व का लेखको मार्मिक चित्रण किया है। आज की भ्रष्ट राजनीति की ओर भी लेखक ने सवेत किया । यह उपयास नये परिप्रेक्ष्य को प्रस्तुत करता है क्योकि इसका क्यानव देश की ऐमी सममामयिक राजनीति मे प्रभावित है जिसमें नतिक मूल्या का ह्रास हुआ और भ्रष्टाचार पनपा । राजनीति में चलने वाली उठक पटक को पूरी जीवतता के साथ 'काली आधी' के पात्रो न जिया है। ईमानदारी से कही गई यह कहानी यथाथ के इतने नजदीक है,कि पाठक आद्योपात इसका रम लेता है । इस उप पारा पर फिल्म भी बन चुकी है, यह इसकी लोकप्रियता का एक और प्रमाण है।' राग दरबारी (१९७५)। हिदी के राजनीतिक उप यासो मे श्रीलाल शुक्ल कृत 'राग दरबारी' या महत्त्वपूर्ण स्थान है। व्यग्य शती मे लिखे इस उपयाम मे आज वी राजनीति के क्रूर एव घणित पक्षो को बडी ईमानदारी से लेखक ने उजागर क्यिा है । इस उप यास के सम्बध मे डा. लक्ष्मीनारायण दुरे लिखते हैं कि-'श्रीलाल शुक्ल का उप यास राग दरबारी' रचना हि दुस्तान के गावा की हालत, इस दुनिया को पुलिस, थानो, अफसरो, स्कूलो, विद्यार्थियो, प्राचार्यों, ग्राम के र जनीतिज्ञो और उनके चगुल मे पड़ी सहकारी सस्थामा सबवे घणित कारनामा एव पक्षा को बडी ईमानदारी के साथ उभारती है ।२ हि दी उपयास परम्परा मे 'राग- दरबारी' पहली रचना है जिसमे यग्य को इतने विस्तृत फलक पर रचा गया हो। यह परम्परागत हिदी के औपयासिक शली मे एक नया प्रयोग है और यही इसकी निजता एव वैशिष्टय भी है। ८ । । + H 111 १ कमलेश्वर-काली आधी, मुख पृ० से उद्धत, २ हॉ० लक्ष्मीनारायण दुवे--मधुमती, अप्रैल ०४६ कटरा वी आर्जू (१९७८) राही मासूम रजा में उप यास 'कटरा बी आमे आपातकाल और उसके अन्त की पृष्ठभूमि को अपित लिया गया है । 'स्टग यी आजू' आज के राजनी तिर जीवन को मामिक गाया है । आपातकाल में सामा य जनता पर किए गये अमानवीय अत्याचार, विरोधो स्वर को याने के लिए दमनपूग नीति, नगरोगी खूबसूरती के नाम पर ववर ज्यादतिया, जबरदस्ती नसवदी और परिवार नियो जन के नाम पर अफसरा में इनाम की सूर छतोट आदि का राही मासूम रजा ने 'कटरा यी आजू' मे ययायं चित्र पीना है। इस उपन्यास मे पाठारे समक्ष आपात्कार वीभत्स एव भयावह स्वरूप पलचित्र की मांति उजागर हो जाता है जिसका असर उमरे दिमाग पर अमिट रहता है । इसम छाटे तबके और निम्नवर्गीय समाज के पात्रा को प्रस्तुत किया गया है । मागवीय सपदनामी, परस्पर प्यार एव सहानुभूति, आवाक्षाओ और छोटी-बड़ी माजआ एय स्वप्निल ससार मे विवग्ते और साथ ही अभावों से भरी जिदगी जीत इस समाज का राही ने मार्मिक अमन किया है। यह आपातकाल भोर उसी बाद की राजनीतिक स्थिति पर करारा व्यग्य है जिसका जोड मिलना मुश्किल है। इस व्यग्य की धारा ने कटरा बी आर्जू' को महत्वपूर्ण दस्तावेज बना दिया है।' महाभोज (१९७६) भन्नू भण्डारी के उपयाम 'महाभोज में आपातकाल में विकास की पराजय और जनता पार्टी के शासन काल की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है । आपका बटी' के बाद 'महाभोज' मन भण्डारी का दूसरा उप यास है । 'महाभोज' का परिवेश हमारा आधुनिक राजनीतिक जीवन है । वतमान में व्याप्त कुसी राज नीति को लेखिका ने इस उप यास में खूबी स बांधा है । इस कृति का राम नीतिक परिवेश अत्यन्त भ्रष्ट, घिनौना और लज्जित करने वाला है । देवतुल्य 'राजनेताओं के बीच कुर्सी को लडाईयो हो रही हैं। ज्योतिषियो को महत्व, अगूठियो का प्रचलन इत्यादि नाना प्रकार के अधविश्वास हमारे मत्रिया और राजनेता के व्यक्तित्व के अग बन गए है । इतना ही नहीं, आज की राजनीति मे गाली-गलौज, हुडदग गुण्डागर्दी और हत्या तक माय हा गयी है । बाटो के लिए राजनीति, लहाने भिडाने, काले का मफेद और सफेद का काला करने की राजनीति आज जोरो पर है। इस कटु यथाथ को 'महाभाज' म उदघाटित किया गमा है । देश में फैली राजीतिक भ्रष्टता के अय रूपो को भी इसमें समेटने का प्रयास किया गया है। आज के राजनेतामा द्वारा आश्वासनो पा इन्ववारी में डाग और उनकी असलियत को भी परतात इस उपन्यास में की गई है। हिन्दी १ गोपालराय-समीक्षा, माष-अप्रैल १९७६, पृ० ३१ हिरोमन रोड उपयास परम्परा मे शुद्ध राजनीतिक उपयोती को सध्या नगण्य सी है। हिदी के श्रेष्ठ राजनीतिक उम मासो-से-अनू भण्डारी के 'महाभोज' का विशिष्ट स्थान है। लाकार जगलतत्रम (१९७६) धी श्रवणकुमार गोस्वामी के 'जगलतत्रम' उप यास में जानवरो को प्रतीक बनाकर वतमान राजनीति और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, चोर बाजारी, रिश्वतखोरी आदि को चित्रित किया गया है तथा आज के राजनेताआ द्वारा आश्वासन देने की प्रथा का सुदर चित्र खीचा गया है इसमे सिंह 'राजनेता', नाग 'पूजीपति', मोर 'प्रशासक', चूहा 'आम आदमी के रूप में प्रतीक माने गये हैं । 'जगनतम' मे पच्चीस सालो को पच्चीस रामा यी कहानी के रूप में प्रस्तुत किया गया है । जगल और जानवरो की यह कथा ऊपरी तौर पर बच्चो के लिए लगती है लेकिन प्रतीका पर गहराई से दष्टिपात करने पर हमारी राज नीति और राजनेताओ की परत दर परत फ्लई खोल कर रख देती है। महामहिम (१९८०) 12386 गया प्रदीप पत के 'महामहिम में जनता पार्टी के शासन काल को व्यग्यात्मक शैली में चित्रित किया गया है । इसमे आज के राजनीतिज्ञो के चरित्रहीन व्यक्तित्व को उजागर करने का सफल प्रयास हुआ है । आज की राजनीति मे कमे छुटभैये- छुटभैये लोग नेता बन जाते हैं ? उस विडम्बना का प्रत्यक्ष चित्र अक्ति किया गया है । इसमे राजनीति के नियमा से अनमिन मुख्यमत्रो को छवि प्रस्तुत को गई है । यह उपन्यास जनता शासन पर लागू न होकर प्रत्येक मरकार पर लागू होता है क्योकि सत्ताहीन महामहिमो की नीयत सदैव से जनता का शोषण करने की हो रही है, सिफ चेहरे बदलते रहते हैं । वतमान राजनीति में व्याप्त अमानवीयता, सिद्धातहीनता और भाई भतीजावाद पर लेखक ने करारी चोट की है। हजार घोडो का सवार (१९८१) श्री यादवेद्र शर्मा 'चद्र' का 'हजार घोडा का सवार' उप याम शोपित एव दलित वग की उपेक्षा, व्यथा, सामाजिक स्थितिया पर चित्रण करने वाला महाकाव्यात्मक उप यास है । समीक्ष्य उप यास मे तलालीन समाज में जातीय अत्याचारो, सामाजिर अत्याचार, वेगार प्रथा, सूदखारी का लेखक ने मार्मिक चित्रण किया है । 'लेयर का भय उपयासो से भिन इस उप यास का फलक काफी विस्तृत है लेकिन एकाध स्थलो को छोडकर इसके गठन में कहीं भी हमे किसी तरह का बिखरापन नजर नही आता और पाठक की दिलचस्पी मे वही 1 भी कमी नही होने देता।" आचलिक पात्रा की भाषा मारवाडी तथा हिन्दी का मिश्रण है, पाठका की सुविधा के लिए। वैसे पूर्ण रूप से उनकी भाषा स्टाइवेंक, यूजीन ओनील रेणु और राही मासूम रजा की भांति रखी जा सकती है।' समीक्ष्य उपन्यास एक ऐसी सघपशील व्यक्ति की गाथा है, जो वतमान समाज व्यवस्था को मानवीय सवेट पालो की मूल्यवत्त के परिप्रेक्ष्य मे वग घेतना से मुक्ति के अहसाम मे विश्लेपित करता है। दारुल शफा (१९८१) श्री राजकृष्ण मिश्र कृत 'दारूल शफा' आज को सत्ता लालुप राजनीति और उसके अवमूल्यन का कच्चा चिटठा पालने वाला यथाथपरक उप यास है। इसकी कहानी कुछ घण्टा मात्र की कथा है । यह कहानी विधायक निवास 'दारूल शफा' वे इद गिद घूमती रहती है । इसम विधाया और मत्री बनने के इच्छुक लोगो को कारगुजारिया की वडे ही सजीव ढग प्रस्तुति हुई है। आज की शासन-व्यवस्था में सत्ता प्राप्ति के लिए जो क्रूर और घृणित काय किए जाते हैं, उसका 'दारूल शफा' प्रामाणिक दस्तावेज है। इस उपन्यास मे एक राज्य के मुख्यमत्री के चुनाव और उसके लिए विधायको की पीचातानी, गुटबाजी धन प्रलोभन देना आदि इस उपयाम को पष्ठभूमि है । प्रस्तुत उप यास म आज की राजनीति में उखाड पछाड की घटनाओ के साथ साथ राजनीतिक जीवन मे याप्त अनुचित सेक्स सम्बधो और चारित्रिक नतिक विकृतियों को भी उपन्यासकार ने उजागर किया है । 'दारूल शफा' आज की जिदगी का असली दस्तावेज है ।' समय एक शब्द भर नही है (१९८१) धीरेद्र अस्थाना का 'समय एक श भर नही है उपन्यास में युवा पीढ़ी के जन आदोलन तया युवा पीढी के नक्सली आ दोलन और सत्ता का अधापन दर्शाया गया है । आज के जीवन मे भ्रष्ट राजनीति के दवाव से नयी पीढी किस तरह तबाह हो रही है इसमे मुख्यत वणित किया गया है। उप यास की घटना स्मक्ता और विवरणात्मक्ताम भी मन को छूने वाले अनुभव है। किसी गह राई को न पाने पर भी समकालीन सच्चाई से सीधी टक्कर सी हो जाती है । अपने समय वी चतना से लस एक विचारगत चमक रचनावार ने पदा की है। धीरेद्र अस्थाना का यह उपपास अपनी समग्रता मे रचनात्मक प्रबुद्धता और १ सुरेश उनियाल नया शिक्षक टीचर टू डे ५० १०१ २ योगेदविसलय, शिविरा माच १९८३, ५० ४५७ ३ श्रीलाल शुगर-उप यास वे प्रथम पनेप से कृष्णदत्त पालीवाल-ममीगा, अप्रैल जून १९८३, ५०४८ ४ परिवेगगत जागरूकता का जीवत परिचय देता है। शाति भग (१९८२) मुद्राराक्षम का 'शाति भग' उप यास आपातकाल के तीन साल के क्रूर इतिहास पर आधारित है । यह वृति सन्चे अर्थों मे तत्कालीन मनुष्य की सम्पूर्ण मानसिकता को उद्घाटित वरन या प्रयत्न है । 'इस उप यास म क्या नहीं है । कथा के नाम पर आपातकाल के रण मे आदमी पर पड़ने वाली मार का विव 'रण है और हर आदमी की पीडा को अलग-अलग चित्रो मे उभारा गया है।' इस उप यास मे विभिन पानावे माध्यम से आपात्काल को सम्पूर्ण वीभत्सता को मामिक रूप मे उदघाटित किया गया है । इस कृति मे लेखक ने वतमान राज नीति में राजनीतिज्ञो । भ्रष्ट चरिन वो उद्घाटित करने का प्रयास किया है। आपातकाल के जीवन के इग स्प की आवगहीन रपट प्रस्तुत करने वाली यह रचना निश्चय ही एक उपलब्धि है। शिल्प की सहजता तथा विवरणा की प्रामाणिकता के कारण यह उप यास आपात्काल के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप मे याद रखा जाएगा। प्रजाराम (१९८३) श्री यावेद्र शर्मा चद्र' कृत 'प्रजाराम' मे आपात्काल और जनता पार्टी के शासन के छह महीना को जाधार बनाया गया है । जहाँ एक ओर आपातकाल का अत्याचार भयावह आतक और मत्रासपूण चित्रण लेखक ने किया है तो दूसरी ओर समद्धि शाति और विवाम का चित्रण लेखक ने किया है। इस उपयास का नायक प्रजाराम मवथा प्रती मात्र है जा आपात्काल की मान- सिकता का द्योतक है । इजीनियर आशुतोप अपने स्वाय के लिए अनेक भ्रष्टाचार, गलत मस्टोल बनाता है, सीमेट के मामले मे धाधली करता है तथा और भी अनेक भ्रष्ट तरीके अपनाकर लाखो का वारा यारा करता है । एसा भ्रष्टाचार अधिकारी वग साधिकार वरते आये हैं। आशुतोप वा बडे नेताआ के साथ मेल जोल होने के कारण उसका कोई भी विरोध करने वाला नहीं था । अफ- सर पुरस्कार लेने हेतु जबरदस्त नसबदी करने लगे थे । शहरा की सुदरता के नाम पर मकानो पर बुलडोजर चलाये जा रहे थे। ऐसी अनेक घटनाओ का यथाथपरक चित्रण इस उपयाम मे किया गया है। आपातकाल को पष्ठभूमि पर लिखे गए उप यासो मे 'प्रजाराम' का जपना विशिष्ट स्थान है। सुराज श्री हिमाशु जोशी कृत 'सुराज' कम पष्ठो मे सिमटा हुआ वहद् कथा को - १ डा. आदश सक्सेना-समीक्षा, अप्रैल-जून १६८३, पृ० २१ २६ अपने में समाहित किए हुए है। इसमे लोक्तात्रिक समाजवादी व्यवस्था के सच्चे मगर कडवे यथाथ को चित्रित किया गया है । आज की शासन व्यवस्था में समानता के नाम पर निम्न वग किस तरह पीडामय जिदगी भोग रहा है । उसके लिए कानून, याय, समानता इत्यादि निरथक हैं । लडाई का अगुमा कथा- नायक काका की हत्या कर दी जाती है। काका की हत्या साधारण हादसा न होकर गाधीवादी सिद्धाता की हत्या है। गरीबा को नयी सुबह की बराबर तलाश है। निश्चय ही हिमाशु जोशी की यह कृति भ्रष्ट राजनीति द्वारा गरीबो के सूखते आसुओ का यथाथ दस्तावज है।

२ समीक्ष्य उपन्यासो की सृजनात्मक प्रेरणाएँ सृजन शाब्दिक विवेचन सृजना या सरजना का अथ है--सृष्टि करना, बनाना ।' साहित्य मे सृजन का अथ हुआ मौलिक एव नूतन वचारिक धरातल पर लेखन कार्य किया जाना । सजनात्मक प्रेरणा ही साहित्यिक कम की जमदात्री है । लेखक के अन्तर में कुछ खदबदाता है, वह उस खदबदाहट से इतना विह्वल हो जाता है कि उस विह्वलता को कागजो पर उतारना आवश्यक हो जाता है। ऐसा लेखन ही ईमानदारीपूण कहलायेगा। लेखक यथास्थितिवादी नही बन सकता। वह मानवीय मूल्यो का अवमूल्यन सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार भोर आदशों की हत्या देखकर चुप नहीं रह सकता । वह मानवीय मूल्यो को स्थापना के लिए, सामाजिक जीवन में सुधार के लिए एक आदर्शों की रक्षा के लिए बराबर जूझता है । ये स्थितियां उसके सजन को प्रेरणा प्रदान करती हैं। औपयासिक सृजन की प्रवृत्तिया उप याम लेखन वहद स्तर के सोच एव अनुभव पर आधृत होता है । उप *यासकार इतिहास का अध्ययन करता है। अतीत की ऐतिहासिक स्थितियो एव व्यवस्था का वतमान मे तुलनात्मक विवेचन करके निष्कर्ष देता है कि परिवतन समाज के लिए कितना हितकर रहा है। सामाजिक परिवेश सजन मे महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। समाज के बदलाव, उसकी परिवेशगत स्थितियो मे बदलाव की वजह इनके सहारे भी सजनात्मक प्रेरणा मिलती है। उपयास या कहानी यथाथ भूमि पर आधारित होकर नीरस न हो जाए, उसमे कथा तत्वा पा निर्वाह किया जाना आवश्यक है, जिससे कथा का रसा- स्वादन मिल सके । उसके लिए लेखन कल्पना-तत्व का ध्यान रखता है। वह यथार्थ को पतीली चूल्हे पर चढाकर नीचे कल्पना की आच देता है । इस .

प्रक्रिया में जो मजन होता है वह ययाय पृष्ठभूमि के साथ साप रजक तत्व भी लिए रहता है । साठोत्तर राजनीति उप यासो की सृजना के पीछे जो आधार रहा है वह इसी तरह है। एक और मुख्यमत्री (यादवेन्द्र शर्मा 'चद्र) सन १९६३ में श्री यादवेन्द्र शर्मा पद का उपयास 'ए और मुख्यमत्री' देश के राजनीतिक जीवन को २० साव की गाथा पर आधारित उपयास प्रकाशित हुआ । इस उप यास ये सभी पार राजनीति में ये हुए लगते हैं। चहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री चन्द्र जी ने गद्य माहिरय विविध रूपो का मजन किया है। आपन लगभग ६० उपयारा, १५ पहानियों के माह तीन नाटा और पचास उच्च स्तरीय वाल माहिन्य उपयास तया अनेक रेखाधिष, नियघ, रिपोताज आनि साहित्यिम विधाओं में सृजन किया । आप राजस्थानी भाषा मे दो उप पास तीन नाटक तथा एक कहानी-संग्रह भी प्रकाशित हो घुमे हैं। उपल्यासो मे प्रमुख हैं - सयासी और सुदरी (१९६४), दिया जला दिया बुझा (१९५५) नया इसान (१९५६) साभा अनदाता (१९५८) सपना, खून का टीका (१९५६), नयना नीर भरे (१९५६) बडा आदमी (१९६१), सावित्री (१९६३) ठराणी सावन आंखा मे (१९६४) एक और मुख्य मत्री (१९५६), घूघट और धुधम्म (१९७०) जनानी हयोटी (१९७२), ढोग्न झुंजक्ली, हजार घोडो का मवार (१९८१) प्रजाराम (१९८३)। प्रमुख महनी सग्रह हैं--- उन खोल रिल्ली बब बन गई जना की पीडा, राम की हत्या, पीटर बहुत बोलता है आदि । नाटको में आन के दातार शराब खराव है, तास का घर, वह अन्य बाल उपयागी रचनाआ की सप्टि भी चद्रजी ने की है। श्री चन्द्र जी के उप यासा में शिल्प और कथय का सुदर रूप दखा जाय तो उसमे एक और मुख्यमत्री सदर उदाहरण कहा जा सकता है। इस उपन्यास मे स्वान योत्तर भारतीय राजनीति मे याप्त धनता प्रष्टाचार राष्ट्र- द्रोहिता स्वाथपरता, दल उलू राजनीति को विडम्बनाओ नशसत्ताआ, क्रूरता, खोखता पद गभिचारो एवं हमारे बनावटी जीवन से सम्बन्धित घटनाम को प्रस्तुत करने मे नेखक को प्रभत मफलता मिली है । उप याम में आज के राजनेताआ की मक्कारी शक्लो को दया जा सकता है। अरविंद ने लम्बे सवाद से स्थानक मे शिथिलता उपन होती है। घटना पर घटना घटित होती है जो पाठक के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोडती है । 'यही वणनात्मक, कही नाटकीमता तोकही पूर्व दीप्ति शैली मे स्थान के प्रस्तुतीकरण से कथानक मे सरसता एव रोचकता की निर तर अभिवृद्धि होती है। इन विशेषताओं के आधार डा० देवदत्त शर्मा, हिदो के सामती चेतनापरक उपयाम, प०७० क २६ पर कहा जा सकता है वि च द्रजी के क्या पृतियो मे 'एष और मुख्यमत्री' एष सवयेष्ठ रचना है । लेयर उपयास लियने की प्रेरणा के बारे मे कहते हैं कि- 'मैं सन् ५८ से अपने स्वर्गीय मित्र सासद श्री पनालाल बारूपाल के साथ रहा । नाथ एवेयू मे । वहा विभिन्न राजनेताओ से मिलता था तथा ससद भी जाया करता था। वहा मुपे चरित्र मिले तथा देश की राजनीति से मेरा निकटतम, परोक्ष सत्रिय सम्बध रहा--सम्पूर्ण देश की राजनीति का चरित्र और पात्रो की प्रेरणा ही इसका सजन प्रेरणा स्रोत है।" ययाकार ने हमारे बदलते हुए समाज को पेश किया है जिसका मूल आधार राजनीति है। हमारा आज का सामाजिक जीवन वसे ही राजनीति प्रधान हा गया है, पर इसमे जा मूलत वे ही पात्र उठाये गए हैं जो पूरी तरह राजनीति मे ड्रये हुए हैं। प्रस्तुत उपन्यास की रचना या मुख्य उद्देश्य स्वात-योत्तर भारत की राजनीति के विघटनशील परिवेश और पतनशील नेतृत्व का यथाथ चित्रण करना है। इस उपयास मे यथाथ जीवन का चित्रण है, वरपना सिंफ इस बात का सजाने की है । कथाकार को पकड बडी मजबूत और उसको दृष्टि सूक्ष्म है। देश की राजनीति के परि वर्तित परिवेश या व्यापक रचनाफलक पर प्रस्तुत करने वाले उप यासा में 'एक और मुख्यमत्री' मूध य स्थान का अधिकारी है । सबहिं नचावत राम गोसाई भगवतीचरण वर्मा हिदी के जाने माने उप यासकार श्री भगवतीचरण वर्मा का 'सबहिं नचावत राम गोसाई' उप यास का प्रथम सस्करण १६७० म प्रकाशित हुआ। इस उप यास मे श्री वर्मा जी ने स्वतत्रता के पश्चात् समाज की सच्ची, मजेदार और व्यग्यपूण तस्वीर पेश करने का सफल प्रयास विया है । उहोने अपने रचना- काल मे अनेक विषयो पर असख्य उप यासो का सृजन किया था। प्रेमपद के समय उप यासो मे समाज की मूलभूत समस्याओ का चित्रण किया जाता था। उनके बाद वर्मा जी ने इस परम्परा को नयी गति प्रदान की। इस विषय के अतगत उहोने जिन उप यासो का सृजन क्यिा उनम प्रमुख है-~जाखिरी दोव, भूले बिसरे चित्र, वह फिर नहीं आई, टेढे मेढे रास्ते, अपने खिलौने, रेखा, सहि नचावत राम गोसाई आदि । इहोने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर 'चित्रलेखा' यादवेद्र शर्मा 'चद्र' से साक्षात्कार २ रनलाल शर्मा, नया शिक्षक, अक्टूबर दिसम्बर ७२, ५० ३५६ ३ श्रीमती बसती पत, हिदी उप यास रचना विधान और युग बोध, पृ० ४३ ४. रत्नलाल शर्मा, समाज कल्याण, अतिम कवर से उद्धृत ३० और 'पतन' नाम के उप यासो की रचना की। श्री वर्मा जी न अपने उपयासों मे अतीतो मुखी तथा विकासोमुखी विचारो के सघप को उपस्थित किया है। देश के विभाजन ने जो नई कथा सामग्री जुटाइ, उस पर भी कई उपयास रचे हैं। इसके अतिरिक्त वर्मा जी ने-थके पांव, धुप्पल, मार्चाग्दी, तीन वप आदि उप यासो की रचना की थी। भगवतीचरण वर्मा ने सामाजिक और मनोवैज्ञानिक ध्वनि रूपको की रचना की है । इनका राख और चिंगारी' बहुत सुदर ध्वनि- रूपक है । इसके अतिरिक्त और भी ध्वनि रूपको की रचना इहान की है । भगवती बाबू के उपयासो मे व्यक्तिया की ही नहीं, पूरे परिवेश की प्रधानता होती है । व्यक्ति प्राय उस पूरे परिवंश का अग होता है, वह कही भी उस पर हावी नहीं होता। इस उप यास को सजना के पीछे उनका यह उद्देश्य है कि आज के आधुनिक समाज मे जो विसगतियां आ गयी हैं जा आदमी-आदमी के परस्पर सबधो को तोड़ रही है, आर्थिक समानता, पद का दुरुपयोग आज समाज मे आदमी की सच्चाई को किस प्रकार दवा दिया जाता है उसका चित्रण करना है । हमारा समसामयिक जीवन इतनी निराशा, कुठा और तनाव से भरा हुआ है कि उस पर व्यग्य के अतिरिक्त और किसी चाट का कदाचित कोई असर ही नही पड सकता। इसीलिए वर्मा जी ने व्यग्य शली को लेकर ही इस उप यास का सृजन किया है। इसके पीछे डा. गापालराय का मत है कि भूले विसरे चित्र' मे १८६० से १९३० ई० के कालखण्ड को उप यास को पृष्ठभूमि के रूप में चुना गया है। 'सीधी सच्ची बातें' मे १९३६ से १९४८ के भारत का चित्र प्रस्तुत किया गया है । यद्यपि उप यासकार के रूप मे, इस उपन्यास मे भगवती बाबू को सफलता नही मिली, यानि वे इसमे कल्पित ससार का विश्वमनीय, साथक और जीव त चित्र नहीं बना पाये हैं। सबहिं नचावत राम गोसाई इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि 'सीधी सच्ची बात' से भगवती चावू के कृतित्व के प्रति जो निराशा उत्पन हुई थी, वह इससे दूर ही नहीं होती, उनकी सभावनाओ के प्रति भी आस्था जगती-सी दिखाई देता है। इस उपयास मे उनकी अपनी पुरानी किस्सागोई ही अपने पूरे 'फाम' मे लौटती नही दीखती, वरन् वे एक अच्छे व्यग्य लेखर के रूप में भी उभरते दीखते है।' काली आँधी (कमलेश्वर) श्री कमलेश्वर मत 'काली आँधी' में स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय नारी का राजनीति में प्रवश व उसके इस क्षेत्र मे विशिष्ट स्थान बनाने का अमिक १ गोपाल राय, समीक्षा, जुलाई १९७०.१०२ विकास दर्शाया है। भारतीय नारी के साथ प्राचीन काल से यह प्राचीन मूल्य जुहा रहा कि पति की सेवा करना और बच्चो की देखभाल करना ही नारी का धम माना गया । स्वत त्रता के पश्चात् नारी ने राजनीतिर क्षेत्र मे प्रवेश किया। उसे घर और घर के बाहर भनेकों सघर्षों का सामना करना पड़ा । राजनीति में सफलता के लिए नारी अनेक व्यक्तियो की शरण मे गयी, अनेक तिकडमा के आधार पर सफलता प्राप्त करती रही। राजनीति में प्रवेश करने के बाद नारी का अपने बच्चो और पति से सबध क्टता सा गया है। सुपरिचित उपन्यासकार श्री कमलेश्वर जी ने अपने उप यास 'काली आँधी' मे आधुनिक नारी के इसी सघर्ष को प्रस्तुत किया है। इसमे लेखक ने आज को भ्रष्ट राजनीति की ओर भी सकेत किया है। इस उप यास वे अतिरिक्त श्री कमलेश्वर ने अनेको उपयासो की सृजना की है जिनमें प्रमुख हैं-'समुद्र मे खोया आदमी' 'तीसरा आदमी' आगामी अतीत, 'वही वात' 'डाक बगला' । 'सुबह दोपहर शाम' उपन्यास म कमलेश्वर ने स्वातत्र्य पूर्व की तनावपूण स्थितियो का चित्रण किया है । अग्रेजी शासन में भारतीया की मानसिकता, राष्ट्रीयता की भावना, स्वतत्रता प्राप्ति के लिए कातिकारियों की भूमिका और तत्कालीन परिस्थितिया का प्रतिबिम्ब तो है ही, ग्रामीण व्यवस्था, गांवा मे फले सस्कारा का मार्मिक चित्रण है । कमलेश्वर हिदी के लब्ध प्रतिष्ठित उप यासकार हैं। उनके कई उपयासो को आधार बनाकर फिल्म भी बन चुकी हैं। जिनमे से 'काली आँधी' का नाम भी लिया जा सकता है। उपयास की नायिका मालती अपने पति के प्रोत्साहन से ही राज- नीति मे प्रवेश करती है, पर धीरे धीरे राजनीति उस पर हावी हो जाती है और उसका पति और परिवार पीछे छट जाते हैं। कमलेश्वर ने इस उपयास की सृजनात्मक प्रेरणा कहाँ से प्राप्त की, इसका उल्लेख नही किया है। लेकिन उपयास का अध्ययन करन के पश्चात् यह कहा जा सकता है कि सृजना के पीछे आज की राजनीति में आधुनिक नारी ने अपने दायित्वा को भुला कर, उन सनातन मूल्यो को समाप्त कर अनेक सघर्षों के बाद आज की राजनीति मे प्रमुख स्थान बना लिया है। उससे प्रभावित होरर लेखक ने इस उपयास की सजना की है। काली आंधी' का कथानक देश की ऐसी समसामयिक राजनीति से प्रभावित है, जिनमे नैतिक मूल्यो का ह्राम हुआ है और भ्रष्टाचार का विकास हुआ है। पामा की मनोवैज्ञानिक क्षणो की परड मे कमलेश्वर सफल रहे हैं। इस कथ्य के माध्यम से कमलेश्वर ने आज राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर भी सकेत किया है।

m म - राग दरबारी (श्रीलाल शुक्ल) श्रीलाल शुक्ल कृत 'राग दरबारी' उप यास सातवें दशक में सर्वाधिक चर्चा पा विषय रहा है। इसी परम्परा का उपयाम शिवप्रसाद सिंह का 'अलग- अलग वैतरणी' में नाम से प्रकाशित हुआ। इन दाना उप यासो ने पाठ को अपनी ओर इतना भाकृष्ट किया जितना कि दस बारह शाला में किसी और उप यास ने नहीं किया । उपयास ने क्षेत्रमा प्रवेश करन से पहले धीलाल शुक्ल , एक व्यग्यकार के रूप म हिदी-साहित्य म अपना अगद का पाव' जमा चुके थे । अत उप यास की शैनी को अपना लेना उन लिए वहा स्वामाविक और उनके रचनाकार का सहज विकास ही पहा जायगा । इतने बडे पमाने पर व्यग्य को उठाने का यह हिंदी म पहला ही प्रयास है । परम्परागत हिदी को औप या सिक पाली में यह एक नया प्रयोग है और यही इसपी निजता एव वशिष्ट्यता भो। स्वतगता के बाद हमार जीवन मूल्मा मा हास, घुटन, कुण्ठा, पलायन आदि मूल्पहीन अवस्या का अग बन गया । हमार परिक्श की सामाजिक विद्रपताआ और कुरुपताना के साथ उपजी बुद्धिजीवी वे समट बोध को पीडा की प्रासगिक सायक्ता को उगवे यथाथ की प्रामाणिवता म झन पहचानने की कोशिश और रेखाक्न ही राग दरबारी की रचा का उद्देश्य है। श्रीलाल शुक्ल न राग दरबारी' के अतिरिक्त जिन उप यासा की मुजना की उनमे प्रमुख हैं-~आदी का जहर, मवान और ताजा उपचास अज्ञात वास' है, जो अपराध शैली म लिये गये राम और उत्तेजक उपयास में 'राग दरबारी' को सामाजिक चेना अपनी स्थरता के बावजूद परिवश एव स्थितियो के अतविरोध को निममता स उदघाटित परन बाली उसको व्यग्य दृष्टि 'मनातवास' म गायब है। लेखक ने उप यास की सजन प्रेरणा का उल्लेख नहीं' किया है । उपन्यास के पठन के बाद तखक की सृजना के बारे में कहा जा सकता है रि स्वातम्योत्तर भारत में जनतात्रिक व्यवस्था का विफलताओ ने हमारे जीवन- मूल्या आस्थाओ माशों, विश्वासा एव सास्कृतिक परम्परागो की नीच हिलार रख दी है ! मरवारी योजनाए भ्रष्टाचार की उत्स (उपज) हैं । नतिक मूल्यो का हास हमारे जीवन की सबस बडी विडम्बना है। जननत्र म चुनावों की महत्ता एक पवित्रता मात्र एक छाया, धोया और मौत बन कर रह गयो । नता, समाज सेवक, सरकारी नौकर मेवा क नाम पर समाज को लूट रहे हैं । भाई-भतीजावाट, तिकडम, साजिश घूसपोरो, सत्ता मोह स्वाथपरता कुनबा परस्ती, झूठ, धांधली अन्याय भामरति आदि हमारी मूल्यहीनता और चरित्र- विघटन की देन है। रचनाकार ने इन दष्टिया को लेकर अपनी कोशलता के साय प्रसगो को विस्तार दिया है। जिससे उसके रख-रो को उघडा जा सके। - इस तरह लेखक ने इन विचारों से प्रभावित होकर 'राग दरबारी' की रचना - की है। - -- 1 श्रीलाल शुक्ल की यह रचना हिंदुस्ताना के गाव की हालत, इस दुनिया को पुलिस, थानो, अफसरो, स्कूलो, विद्यार्थियो, प्राचार्यों, ग्राम के राजनीतिज्ञो और उनके चगुल मे पडी सहकारी सस्थाओ, सबसे घृणित कारनामा एव पक्षो को बडी ईमानदारी के साथ उमारती है। डॉ० आदित्यनाराण त्रिपाठी का मत है कि-'राग दरवारों की रचना हास्य कोटेड व्यग्य की धार पर खड़ी है। हिदी उपन्यास में पहली बार व्यग्य का इतना विस्तार मिला। यह कहना गलत न होगा कि सभवत 'राग दरबारी' हिन्दी उप यास की पहली रचना है जिसमे वृहद स्तर पर व्यग्य को निर तर बनाये रखा जा सका है।" कटरा बी आजू (राही मासूम रजा) राही मासूम रजा ने अपने पहले उपयास 'आधा गांव' के विशेष चर्चित होने के बाद सन्' १९७८ मे कटरा बी आजू' उपयास की रचना की। यह उप यास आपातकाल से पहले की पृष्ठभूमि से शुरू होता है और 'जनता राज' के उदय पर आकर समाप्त होता है। इसके अतिरिक्त रजा के प्रसिद्ध उपयासो मे 'जाधा गांव' मे पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुसलमानो और सम्बद्ध वाता- वरण तथा पात्रो को उमुक्त गतिशील और जीवत चित्रण किया गया है। दिल एक सादा कागज' मे'ढाका, गाजीपुर और बम्बई की त्रिकोण कहानी कही गयी है । 'ओस की बूद' साम्प्रदायिक दगा को लेकर लिखा गया और 'सीन ७५' मे बम्बई की फिल्म नगरी की आतरिक स्थिति को खीचा गया है । अगर क्थ्य और शिल्प की दृष्टि से देखा जाय तो रजा के उपयास मे 'कटरा बी भाजू' एक सवश्रेष्ठ रचना कही जा सकती है। समीक्ष्य उपयास मे कुछ ऐसे लाक्षणिक और आलमारिक प्रयोग हुए हैं जो तुरत ध्यान आकर्षित करत हैं और पाठक को बांध लेत है । जसे मां को आंखा मे ममता की जगह मोतिया हर डिब्बे मे उस परिवार की भूख आयी थी। इन लाक्षणिक प्रयोगो म मानवीकरण सबसे अधिक है इसे राही की गद्य शैली की प्रमुख विशेषता माना जा सकता है । ऐसी प्रवाहपूण लाक्षणिक वैचित्र्य से परिपूण चित्रात्मक गद्य मे लिखे गये 'कटरा बी - १ लक्ष्मीनारायण दूबे, मधुमती, अप्रैल ८२, पृ० ४६ २ डॉ० आदित्यकुमार त्रिपाठी, औप यासिक समीक्षा और समीक्षाएँ, पृ० १२८ ३ राही मासूम रजा, कटरा बी आजू, पृ० ४३, . ४ वही, पृ०४ आजू' जैसे उपयास हिदी मे यम ही है। स्थानीय वौली को रचनात्मक ढंग से प्रयोग किया है। पात्रो की मानसिक्ता, सोच विचार, भावना को इस प्रकार से भाषा के माध्यम से लेखक ने रक्त किया है कि पात्रों के व्यक्तित्व से भापा को अलग किया जा सके । इम सबध मे गोपालराय का मत है-'यह भाषा इन पात्रा की जि दगी का, उनके पूरे व्यक्तित्व का पर्याय हो गयी है। इतनी अटपटी, हिंदी व्यापरण की दष्टि से बेतरतीब, अपध्रप्ट शब्दो से युक्त भाषा को इतना व्यग्य- पूर्ण, अर्थवान, व्यजनायुक्त, सटीक, सजनात्मर भाषा बनाना राही जैसी श्रेष्ठ प्रतिभा के ही बूते की बात है।' उक्त विशेषताओ के आधार पर निस्सयोच कहा जा सकता है कि यह उप यास रजा को क्याकृतिया में विशिष्ट स्थान रखता है। लेखर ने उप यास लिखने की प्रेरणा का उल्लेख नहीं दिया। इस उपन्यास के अध्ययनोपरात इसकी सृजनात्मक प्रेरणा के बारे में कहा जा सकता है कि रजा ने इस उपन्यास के माध्यम से आपातकाल मे सामाय जनता के साथ ऊचे तबके के द्वारा हुए अमानवीय व्यवहार, उनके निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु किए अत्याचार, स्थानीय नेताशाही और नौकरशाही ने जिस प्रकार पुलकर आपात्- काल मे अत्याचार का खुला खेल खेला, उमसे प्रभावित होकर रजा के उपयास के रूप में प्रस्तुत हुआ है । इस उपयास के सम्बध में जुगमिदर तायल का मत है कि- 'क्टार वी आजू मानवीय पीडा या जिजीविषा का मार्मिक चित्रण करने वाली रचना नहीं बन पायी है आपात स्थिति के अत्याचारो का नाटकीय चित्रण करने वाली रचना हो गई है । अनेक स्थलो पर अति नाटकीयता के कारण यह कृति संवेदना जगाने के स्थान पर खीझ और झुझलाहट भी उत्पन करती है। निष्कप रूप मे यह कहा जा सकता है कि राही कृत 'कटरा बी आजू' कथ्य और शिल्प की दष्टि से विशिष्ट कया कृति है। महाभोज (मनू भण्डारी) 'महाभोज' का प्रथम सस्करण सन् १९७६ में प्रकाशित हुआ। इसमें आपात- काल के बाद काग्रेस की पराजय और जनता पार्टी के शासन काल के समय को आधार बनाया गया है । 'महाभोज मनू भण्डारी के 'आपका बटी' के बाद लिखा गया दूसरा उपायास है । मनू भण्डारी ने अपने प्रथम बहुचचित उपयास . १ डॉ. गोपालराय समीक्षा, मार्च अप्रल १६७६,०३२ २ जुगमिन्दर तायल-समीक्षा, माच-अप्रल, १६७६, पृ. ३४ ३५ 'आपका बंटी' में एक बच्चे की मानसिकता के विभिन्न स्तरा को बहुत सफलता से उद्घाटन किया है। 'महाभोज' आज की राजनीतिक जीवन में आयी तिकडमबाजी, शैतानियत, मूल्यहीनता और सडाघ का चित्रण करने वाला उपन्यास है । आज को राजनीति को पूजीवादी व्यवस्था ने किस प्रकार भ्रष्ट और निकम्मा बना दिया है उसका प्रत्यक्ष चित्रण इस उप यास मे किया गया है । 'महाभोज' की रचना मे जिन दो उपररणो को मुख्य आधार बनाया गया है वे हैं घिसेसर नामक एक पिछडी जाति के युवक की हत्या और इस हत्या की पृष्ठभूमि मे विधायक के चुनाव की प्रक्रिया । महाभोज सामाजिक उत्पीडन और उस पर टिकी हुई व्यवस्था पोषक राजनीति के विरुद्ध सवेदनशील रचनाकार को विनम्र किन्तु साहसपूण प्रति- किया है।' मन्नू भण्डारी लेखन को दशा में अपने बनाये प्रतिमानो को लापने मे सफल हुई है फिर भी 'महाभोज निश्चय ही अच्छा उप यास है। यह पाठक को पूरा उपयास पढने के लिए बाध्य करता है । उपयास के अनेक स्थल पाठक के मस्तिष्क को झकझोरने मे सफन होते हैं । शुरू से मत तक उपयास रोचक बना है। लेखिका ने इस उपचास की सृजनात्मक प्रेरणा के सम्बध मे स्वय कुछ भी उल्लेख नहीं किया है, फिर भी इस कृति को पढन के बाद कहा जा सकता है कि लेखिका के समक्ष आडम्बरयुक्त राजनीतिज्ञा के प्रपच, उनकी स्वाथपरता और आदशहीनता, अमानवीयता एव निममता रही और उसी से अभिप्रेत होकर उसका नग्न चित्रण लेखिका ने अपनी इस कृति म किया है । लेखिका को अपने व्यक्तिगत दुख-दद, अतद्व द्व या बातरिफ नाटक' को देखना बहुत महत्वपूण सुखद और आश्वास्तिदायक तो लगता है, मगर जब घर मे आग लगी हो तो सिफ अपने अतर्जगत मे बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही अप्रासगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक उप यास के पीछे यही लगन लगता? सभवत इस उपन्यास के पीछे यही प्रश्न रहा हो । इसे लेखिका अपने व्यक्तित्व और नियति को निर्धारित करने वाले परिवेश के प्रति ऋण शोध के रूप में देखती है। महाभोज' आज की राजनीति में आयी हुई मूल्यहीनता के साथ पूजीवाद ने आज की आम व्यवस्था को किस प्रकार भ्रष्ट और दूषित बना दिया है। लेखिका ने इसी राजनीतिक व्यवस्था का चित्रण किया है । डा. गोपालराय का . १ बुलाकी शर्मा-बाल मनोविज्ञान पर आधारित हिदी उप यास (दकित पृ० ६६ २ अजय तिवारी आलोयना, जन० माघ, ६४ ६५, अक, पृ० ६७ मत है कि-'महाभोज' मे आज की राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनतिक ताएँ, तिकडमबाजी का यथाथ चित्र प्रस्तुत किया है। आज की राजनीति मे धन, गुण्डा गर्दी और छल प्रपच का प्राधा य हो गया है । उपयास लेखिका का राजनीतिक जीवन का अनुभव उसका निजी भोगा या उसके बीच मे गुजरा अनुभव न भी हो, उसने उसे इस कौशल से प्रस्तुत किया है कि उसमे कही भी अविश्वसनीयता नही नजर आती है। श्री बुलाकी शर्मा ने भी अपना मत प्रक्ट- करते हुए कहा है कि-मन भण्डारी अपने पात्रो के अतससार को अभिव्य क्त करने म बहुत मोहक एव लुभावनी शैली का सहारा लेती हैं। जगल तन्त्रम (श्रवणकुमार गोस्वामी) श्री श्रवणकुमार गोस्वामी कृत 'जगल तत्रम' उप यास का प्रथम सस्करण' १९७८ में प्रकाशित हुआ। इसमे लेखक ने जानवरो के प्रतीको के माध्यम से आज की राजनीति और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोर बाजारी आदि शोपणो को प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। सिंह 'राजनेता', मोर' प्रशासक , चूहा 'आम आदमी और नाग पूजीपति' का प्रतीक है । इस उप यास के अतिरिक्त श्री श्रवणकुमार गोस्वामी के दो प्रमुख उप यासो मे एक 'सतु' है जिसमे फिल्मी दुनिया में नायक और नायिकाओ की निजी जीवनी मे झाकने का प्रयास किया है। फिल्म नायिकाएं और नायक स तान की जरूरत कब और किन परिस्थितिया मे महसूस करते हैं, और स तानोत्पत्ति के प्रश्न को लेकर उनके दाम्पत्य जीवन मे क्तिने उतार चढाव आते हैं, इन सब बातो पर प्रकाश डालना इस उप यास का अभिप्रेत रहा है, इसमे फिल्मी दुनिया व्यावसायिक दावपेंच रोचक ढग से प्रस्तुत किए गए है । दूसरा उप यास जो अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है भारत बनाम इडिया' । स्वतत्रता के बाद भारत मे आर्थिक विकास का लाभ मुटठी भर लोगो और बडे-बडे नगरो तक ही सीमित रह गया । लाखों गाव, स्वा की हालत ज्यो की त्यो बनी हुई है । लगता है भारत दो हिस्सो मे विभक्त हा गया है । शहर यानि 'इडिया और गाव यानि भारत'। अब इडिया की हुकूमत भारत पर चल रही है। इसम लखक ने इस सामाजिक आर्थिक विसंगति को दष्टिगत रख उप यास का ताना वाना बुना है। गांव और शहरो 'मतर, अमीरी गरीबी के पक, शोपम और शोपिता के अतर यो लेखक इस कृति के माध्यम स उपाइन म सफल रहा है। १. डा. गोपाल राप-समीक्षा, अक्टुबर दिसम्बर ८०, अक., १० ३२ -- -- म 'जगल तत्रम' श्रवणकुमार गोस्वामी का प्रथम उपायास है । यह इनकी सृजन परम्परा मे अपना विशिष्ट स्थान रखता है और यह अय उप यासो से भिन विषय को लेकर लिया गया है। उप यास की सृजना के बारे मे लेखक उपयास के तीन पृष्ठ पर 'मुये कुछ नहीं रहना है के अतगत लिखता है-'येवल यह कहना है कि 'जगल तत्रम' आपात स्थिति की उपज नहीं है । सन १९७३ मे भारत जब स्वतत्रता की रजत जयती मनाने की तैयारी में मग्न था, तभी २६ फरवरी और २५ मई के बीच इम उप यास का सृजन किया गया।" इसमे 'लेखक ने कथा के पच्चीस सालो को पच्चीस रातो के माध्यम से प्रस्तुत किया है । । इसमे आज की राजनीति के तहत चलने वाली तथा-कयित लोक्तात्रिक शासन प्रणाली मे यथाथ चित्रायन मे भारतीय राजनीति के परखचे उडाए हैं । नाग पूजीपति का प्रतीक है जिसके जाल मे छटपटाते हुए आम आदमी का वणन लेखक ने किया है। 'जगल तत्रम' मे जगल और जानवरो की क्या बच्चों की सी लगती है। प्रतको पर ध्यान जाते ही आज के राजनीतिज्ञो की परत-दर-परत कलाई खोलकर रख देती है। पच्चीस वर्षों के इतिहाव को यथाथ को ऐसी स्वाभाविक, सहज सरल भाषा शैली में साथ प्रतीकात्मकता के आद्योपात निर्वाह के साथ व्यक्त किया है कि देश का पूरा नक्शा सजीव हो उठा।'जगल तत्रम' में बुद्धिवादी के प्रतीक के रूप मे गिरगिट, अवसरवादी आयाराम गयारामों के प्रतीक रूप में सियार भेडिया आदि भी आते हैं । 'उप यासकार ने स्थानो और पात्रो के नाम बदल कर अखबारी घटनाओ का सिलसिलेवार वणन समसामयिक राजनीति के रूप में भाषा समस्या, बैक राष्ट्रीयकरण,जीप घोटाला काण्ड, पब्लिक स्कूल रिलीफ के कार्यों मे घपला, “यायपालिकालो मे हस्तक्षेप, जूनियर की मुख्य न्यायाधीश पद पर नियुक्ति व्यापार का राष्ट्रीयकरण भगल- वाद को घोषणा, पडोसी से युद्ध, जीत, समझौता आदि को प्रस्तुत कर दिया है।' । । महामहिम (प्रदीप पत) "महामहिम' प्रदीप पत का आज की राजनीति पर लिखा हुआ व्यग्यात्मक उपयास है। इस उप यास का प्रथम प्रकाशन १९८० मे हुआ। इस उप यास के अतिरिक्त लेखक ने अय उप यास भी लिखे हैं, जिनमे प्रमुख हैं- --एक अस १ श्रवणकुमार गोस्वामी-जगल तत्रम, प०७ २ बजनाथ राय-समीक्षा, अक्टूबर दिमम्बर १६८०, पृ० ३८ हा लक्ष्मीनारायण दुबे--समकालीन हिदी उप यासो मे राजनतिक मनो विज्ञान के स्वर (मधुमती अप्रल ८३, पृ०५२-५३) ३६ भव मृत्यु, 'अन्तराल ये धाद' और 'आम आदमीशा शव' नामर कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है । 'मैं गुट निरपेक्ष हूं', 'प्राइवेट सेक्टर का व्यग्यकार' नामक पुस्तक मे लेखक के व्यग्य लेखो एय पहानियो का सफलन है । सभ्य और शिल्प की दृष्टि से 'महामहिम' एक सुदर कृति कही जा सकती है। आज की राज- नीति मै छुटभये गुटभये और टुच्चे लोग किस तरह नेता बन जाते हैं उसका लेखक ने आखा देखा हाल प्रस्तुत किया है । लेखक ने जनता सरकार के शासन काल को आधार बनाया है। मग्य शनी मे लेखा ने वर्तमान राजनीति का नग्न चित्र प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । यह जनता सरकार पर लागू न होर सभी सरकारो पर लागू होता है । उप यास की क्या मे रोचकता और प्रवाह है । यह उप याम मूल्यहीनता पर प्रहार करते हुए गलत ढग बी राजनीति का विरोध करता है । सक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रदीप पत का यह उपन्यास हमारे राजनीतिक जीवन उसके आस पास के परिदश्य की सशक्त अभिव्यक्ति होने के कारण एक जीवत कथाकृति है। जिसमे सिद्धात. हीन और अमानवीय राजनीति की अतर्कथा बडे बेबाक ढंग से प्रस्तुत की लेखक उपयास लिखने की प्रेरणा के बारे मे कहता है कि --'एक छुटभैये और गुटभैये नेता से मेरा परिचय है । मार्च ७७ के बाद उनकी आन शान मे मैंने निराले परिवतन होते देखे । उनकी आवाज बदल गई, तेवर बदल गये और रहन सहन बदल गया। उनसे जब भेंट होती, कुछ लिखने का मन होता और आखिरकार यह उप यास लिखा गया । यद्यपि इसमे उनका चरित्र कही नहीं है, लेकिन उनके जसा चरित्र है । यद्यपि इस उप यास मे घटनाए पूणत सच्ची नहीं हैं लेकिन वे सच पर आधारित हैं । उप यास को रचना करते समय कुछ नोट्स भी काम आ गए जि हे मैं पिछले अनेक वर्षों से सजोता गया था ।' हजार घोडो का सवार (यादवेन्द्र शर्मा चद्र) समीक्ष्य उप पास का प्रथम प्रकाशन १९८१ मे हुआ । इसमे बीकानेर के गहन गहवरो मे पडे शोपित सजीव चरित्रो व वस्तुओ को उजागर करने का लेखक ने प्रयास किया है। यह उपन्यास पेशेगत बनी हुई शोपित जातियो के उत्पीडन व शोपण की गाथा है । बीसवी सदी के आरम्भ से लेकर १९५२ के आम चुनाव तक की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थितियो का बेवाक और १ प्रदीप पत, महामहिमा, कवर के प्रथम फ्लेप से उद्धत २ प्रदीप पत, महामहिम, दो शब्द मे से उदघत । यथार्थपूर्ण चित्र इस उप यास मे प्रस्तुत हुआ है । बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री पद्रजी ने गद्य-साहित्य के विविध रूपो का सृजन किया है । आपने लगभग ६० अयास, १५ कहानी सग्रह तीन नाटक और पचास उच्च स्तरीय बाल साहित्य उपयास तथा अनेक रेखाचित्र, निबध, रिपोर्ताज आदि साहित्यिक विधाओ में सृजन किया है । आपके राजस्थानी भाषा मे दो उपन्यास, तीन नाटक तथा एक कहानी सग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। उप यासो मे प्रमुख है-सयासी और सुदरी (१९६४), दिया जला दिया बुझा (१९५५), नया इसान (१९५६), खम्भा अनदाता (१९५८), सपना, खून का टीका, नयना नीर भरे (१९५६), घडा आदमी (१९६१), सावित्री (१९६३), ठकुराणी, सावन आखो मे (१६६४, एक और मुख्यमत्री (१९६६), धूघट और घुघरू (१९७०), जनानी उयोदी (१९७२), ढोलन कुंजक्ली (१९८०), प्रजाराम (१९८३) आदि । प्रमुख कहानी- सग्रह-जकडन, खोल, दिल्ली का बन गई, जाक यो पीडा राम की हत्या, पोटर बहुत बोलता है आदि । नाटको मे आन के तावेदार, शराब खराव है आदि का घद्रजी ने सुजन किया है। मीरा पुरस्कार और फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार प्राप्त 'हजार घोडो का सवार' उपन्यास चन्द्र जी की क्याकृतियों मे विशिष्ट स्थान रखता है । समीक्ष्य उपायास में तत्कालीन समाज में व्याप्त जातीय अत्याचारो एव सामाजिक अत्याचारो, बेरोजगारी, सूदखोरी, आदि विकृतियो का मार्मिक चित्रण किया गया है। इस उपयास में आचलिक शब्दो के प्रयोग से पाठक तत्कालीन समाज जुड जाता है । यह कृति साधारण मनुष्य के शोषण और उत्पीडन के खिलाफ यातनापूण सघप-यात्रा का दस्तावेज है । गीधू के चरित्र को देखकर यह आश्चय होता है कि मनुष्य कसी-कैसी स्थितियो से गुजरता है और कितनी पीडाओ को झेलकर भी जिन्दा रहता है । यह रचना मनुष्य की इसी अदम्य जिजीविषा को रेखांकित करती है । इसमें क्रूर सामती पूजीवादी व्यवस्था के अन्तगत सर्वा- धिक दलित शोषित लोगो के सूक्ष्म रचनात्मक तटस्थता के साथ यथाथ अकन से लेखक ने जबरदस्त प्रभाव उत्पन किया है। मानवीय स्थितियो में जीवन जीने वाले की कथा के साथ ही इसमें लेखक ने राजस्थान के सामाजिक जीवन का ही नही सारे देश के सामाजिक, राजनीतिक जीवन की पते उदघाटित कर दो हैं । गोधु की सघर्ष यात्रा पाठक के हृदय को कपा जाती है । लेखक उप यास को सृजनात्मक प्रेरणा के बारे में अपना मत इस तरह व्यक्त कर रहे हैं ~~'हजार घोडो का सवार' की सजना प्रेरणा मुझे मेरे स्वर्गीय दोस्त भूतपूर्व ससद सदस्य श्री पन्नालाल बारूपाल के जीवन में मिली है। बारूपाल जी का जीवन संघर्षों और मानव जीवन के सभी मायामो को स्पर्श करता था। उसमें चढावो-उतारो का सिलसिला था । जनके जीवन की अनेक घटनाओ को मैंने आधुनिक परिवेश को स्थितियो को जोडकर बीकानेर के पिछले ५० साल का सम्पूर्ण जन साधा-

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भव मत्यु, 'अतराल के याद' और 'आम आदमी का शव' नाम
प्रकाशित हुआ है । 'मैं गुट निरपेन हूं', 'प्राइवेट सेक्टर का ध्या
पुस्तक मे लेखक के व्यग्य लेखों एव कहानियों का सपना है । पर
की दृष्टि से 'महामहिम' एव सुदर पृति कही जा सकती है।
नीति मे छुटभये गुटभये और टुच्चे लोग किस तरह नेता या
लेखक ने आपो देखा हाल प्रस्तुत किया है । सेयर ने जनता स"
काल को आधार बनाया है। उपग्य शैली में लेखा ने तमा
नग्न चित्र प्रस्तुत करने से सफल प्रयास किया है । यह
लागू न होार सभी सरखारो पर लागू होता है । उप यासह
और प्रवाह है । यह उप यास मूल्यहीनता पर प्रहार कर
राजनीति का विरोध करता है । सक्षेप मे पहा जा सपर
यह उपन्यास हमारे राजनीतिक जीवन और उसने या
सशक्त अभिव्यक्ति होने के कारण एक जीवत स्थान
होन और अमानवीय राजनीति की अतथा बडे
गई है।
लेखक उपयास लिखने की प्रेरणा के बारे में
और गुटभये नैना से मेरा परिचय है। माघ ।
मैंने रिले परिवतन होते देखे । उनकी आवाज
रहन सहन बदन गया। उनसे जब भेंट होती,
आखिरकार यह उप यास लिखा गया । यद्यपि
लेकिन उनके जैसा चरित्र है । यद्यपि इस उप
हैं लेकिन वे सच पर आधारित है। "
नोटस भी काम आ गए जिहे मैं पिछले

वक्तव्य है--'इस उप यास में वर्णित पार उत्सुरदास गुरुपद स्वामी, लोवीराम जैसे पात्रो के पीछे मुझे उनके असली चेहरे भी अक्सर जर आये, जिससे यह मनुमान लगा कि श्री मिश्र ने वर्षों तक असली दारुल शरा के परे लगापर इन राजनीतिक तरज के मोहरा की उठा पटव को बहुत बारीकी से देखा होगा।" श्रीलाल शुक्ल का मत है कि 'दारुल शफा' एए वस्ती भी हो सकती ह और मस्या भी, और काल्पनिक होते हुए भी आज की जिदगी में उस जगह ह. जहा आपाधापी, हिंसा, भ्रष्टाचार, स्वाथपरता और चापलूसी का हमारा जाना पहचाना यथाय, अपने विवरण को प्रखरता के कारण, बिल्कुल अजनबी ढग से उभरता है और हमारी सामाजिक चेतना पर हमला बोलता है । दारुल शफा' आज को जिदगी का असली दस्तावेज ह ।' रामचन्द्र तिवारी का मत है कि 'दारुल गफा' राधाकृष्ण मिथ का आज वो सत्तालोलुप राजनीति और उसके अव- मूल्यन का कच्चा चिटठा पोलने वाला यथाथपरक उप यास है। इसकी कहानी कुछ घटा की है और उसका वेद है- 'दारल सफा' । दारुल शफा ही एक प्रकार से इस उप यास का नायक भी है। दारुल शफा' एक स्थान न होकर एक विशेष प्रकार की भोग प्रधान संस्कृति का जीवत प्रतीक है। आज की राजनीति में जिम प्रकार विचारो और आदर्शों के स्तर से नीचे उतर कर सत्ता प्राप्ति के लिए किए जान वाले दूर और घणित जाड-तोड की राजनीति रह गयी है 'दारुल शफा' इसका प्रमाणित दस्तावेज है । समय एक शब्द भर नही है (धीरेन्द्र अस्थाना) पिछले दिनो हिदी मे छोटे और अच्छे उप पास न सिफ सख्या मे अधिष लिखे गए, बल्कि उनमे वडे आकार और फ्लक वाले उप यासा की तुलना मे समकालीन जिन्दगी का अधिक विश्वसनीय चित्रण किया गया है । इसी ढग का एक छोटा उपयास है-धीरेद्र अस्थाना का 'समय एक शब भर नहीं है' जिसमे युवा पीढी के जन आदोनन या युवा पीढी का नक्सली असतोष और सत्ता का अधापन दिखलाया है । इस उपणस मे नकसली आदोलन के कारणो व उसके मूल स्रोत को टटालेने का प्रयास किया गया है। इस वृति के अतिरिक्त थी धीरेद्र अस्थाना को अय महत्त्वपूण कृतियो मे 'आदमखोर' (उपन्यास) लोग । हाशिए पर (कहानी सग्रह) तथा 'कथा खण्ड १ अमृतलाल नागर, दारुल शफा, भूमिका पृ० ५ २ श्रीलाल शुक्ल, दारुल शफा, फ्लेप (कवर) से अवतरित ३ रामचद्र तिवारी, समीक्षा, अप्रेल जून १९८३ पृ० ३६ ४२ एक' (सम्पादित कहानी सकलन) के नाम लिए जा सकते हैं । 'समय एक शब्द भर नही है की सजन प्रेरणा के पीछे लेखक की नक्सली मा दोलन की भावना रही होगी। इसमें लेखक ने नक्मली आदोलन के कारणो व मूल स्रात को टूटने का प्रयास किया है। इसमें लेखक ने एक निश्चित विचार धारा को समयन प्रदान किया है । लेखक नक्सली मा दोलन को जा समुदाय को सहानुभूति दिलाने का प्रयास किया है। भ्रष्ट राजनीत के नीचे आज की युवा पीढी किस तरह तबाह हो रही है । इही विचारधारा से प्रभावित होकर लेखक ने इस उप यास की रचना की है । डा. देश ठाकुर का इस उपायास के सम्बध में मत है कि 'धीरेद्र अस्थाना ने जिस वेलौस तरीके से नक्सली सधप का समथन किया है, वह नए पुराने स्मेच्छाचारी लेखको वे मुह पर एक तमाचा तो जडता ही ह साथ ही उन समीक्षको, आलोचको वे पडयन पी भी पोल खोल देता है जो जसे विसगतिपूण समाज म भी साहित्य को जीवन से असपृक्त करके उसके कलागत सौदर्य को देखने-परखने की बात कहते हैं । इस छोटी सी कृत न यह प्रमाणित कर दिया है कि जीवन से निरपेक्ष साहित्य का कोई सोदय नही होता और जीवन का यथाथ और उसका सघष ही अतत साहित्य का वस्तुगत सौ दय बन सकने की क्षमता से सम्पन होता है।" शाति भग (मुद्रारक्षस) मन् १९८२ मे मुद्राराक्षस वे 'शाति भग' का प्रथम सस्करण प्रकाशित हुआ। इसमे आपातकाल के तीर सालो के घणित इतिहास का वणन किया गया है तथा आज की भ्रष्ट राजनीति और राजनीतिजो को घिनौनी और क्रूर शक्लो का लेखक ने मार्मिक एवं यथाथ चित्र इस उप यास मे क्यिा है । इस उपयास अतिरिक्त लेखक ने साहित्य की अनेक विधाओ में साहित्य सजन किया है । विशेषकर नाटको मे इनका नाम प्रमुख नाटककारो मे लिया जाता है। नाटक प्रमुष है-~-'गुफाए' । निधि- सुनो भई साधा' के अतिरिक्त उहोंने जो उप पास लिसे हैं उनमे प्रमुख है-अचला एक मन स्थिति, मसाराम भगोडा और कहानी सग्रह श द दश के नाम से प्रकाशित हुआ है। 'शाति भग' मुगा राक्षम को कृतिया मे प्रमुख रचना वही जा सकती है। क्योकि इसमें लेखक ने आपात्काल के दौरान सामा य जनजीवन व दलित वग पर दिए गए शोषणा व अत्याचारा या वणन करने मे विपी भी प्रकार की कमी नहीं आने दी है। 'अपना' की राजना में लेपरोल्पना का सहारा लेकर आपातकाल की विभी- १ डा० देवश ठाकुर, संचेतना, पृ १३ पिका का वर्णन किया है। सर्जना के बारे में कहा जा सकता है कि आपात्- फाल मे उच्च वग द्वारा, सामा य वर्ग पर किए गए अमानवीय व्यवहार निजी स्वार्थों के लिए अत्याचार किया जाना, स्थानीय नताशाही और नौकरशाही पिस तरह खुलकर आपात्काल में खेली, निर्दोप व्यक्ति किस तरह से दडित किये गये । इससे प्रभावित होगर लेखक ने इस उप यास की रचना की। 'शान्ति- भग' के सम्बध मे डा० आदश सक्सेना का मत ह कि -"शान्ति भग' आपात्- काल के जीवन की विभीषिका का पूर्वाग्रह मुक्त परतु मार्मिक आकलन प्रस्तुत परन का सार्थक प्रयास किया गया है । यद्यपि इसमे इतिहास कही नही है परतु वह है सब जो उन तीन वर्षों में घृणित इतिहास का आधार है।" इसमे कोई कथा विशेष नही है । आपातकाल में सामाय जन जीवन पर पड़ने वाली भार का विवरण है जो अनेक आदमी को पीडा अनेक चित्रा मे उभर कर हमारे सामने आई है । डा. सक्सेना का मत है कि-'फिर भी यह उप यास राज नीतिक उपयास नही, बल्कि एक ऐसा सामाजिक उपयास है जो समाज के राजनीतिक उत्पीडन की कथा कहता है, इस उत्पीडन के दशन का वाचक बना है। प्रजाराम (यादवेद्र शर्मा चन्द्र) यादवेन्द्र शर्मा चद्र रचित उपन्यास 'प्रजाराम' का प्रथम सस्मरण १९८३ मे प्रकाशित हुआ। इस उप यास में आपात्काल और जनता शाशन के छह मास के समय को अधार बनाया गया है । इस उप यास मे जहा आपातकाल के आतक, सत्रास, अत्याचार का वणन है तो वही आपातकाल वी उन अच्छाइयो का वर्णन भी है जिसमे आम आदमी को कुछ समय के लिए राहत मिली थी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी चद्र जी ने गद्य साहित्य के विविध रूपो का सजन किया है। चद्रजी ने लगभग ६० उपन्यास, १५ कहानी संग्रह, तीन नाटक और पचास उच्चस्तरीय बाल साहित्य उपयास तथा अनेक रेखाचित्र, निबंध, रिपोताज आदि साहित्यिक विधाओ का सृजन किया। उप यासो मे प्रमुख हैं-'सयासी और सुदरी (१९६४), दिया जला दिया बुझा (१९५५) नया इसान (१९५६), खम्भा अन्नदाता (१९५८), सपना, खून का टीका (१९५६), नयना नीर भरे (१९५९), बडा आदमी (१९६१), सावित्री (१९६३), ठकुराणी, सावन आखो मे डा० आदश सक्सेना, समीक्षा, अप्रैल जून ८३, प० २२ २ वही पृ०२२ 'प्रजाराम की सजनात्मक प्रेरणा पर 'प्रजाराम' की प्रेरणा व रचना काल आपातकाल के आरम्भ के छह मा, दौरान इसका सृजन हुआ था। उसकी प्रेरणा मुझे तत्कालीन प्रत्यक्ष नाओ से हई। मैंने मोचा दि एक ऐमा उपयास लिखा जाय जो नायव तथा तटस्थता से अवेपीतष्टि से लिखा गया हो वम मैंने सजन आरम दिया और एक ऐमा उपयास जो उस काल को बताता है--लिख दिया। उपचास में मेरा निजी नजरिया है, जो यथाय को अपने ढग से स्पश करता है द्रजी कह स-राज (हिमाशु जोशी) थी हिमाशु जोशी कृत 'सु राज' कम पप्ठो मे लिखा गया वहद कथा को लिए हुए उप यास है । इस रचना मे लेखर ने वतमान लोक्र्तानिक व्यवस्था के सच्चे मगर पडो यथाथ का चित्रण किया है। समारता की दुहाई देती इस व्यवस्था मे निम्न वग क्तिनी पीडमय जिदगी भोग रहा है । इसके लिए कानून, याय, समानता इत्यादि शन्द निरथक हो गये हैं । स्वय लेखक पेशता मे सत्ता, शक्ति सम्म नता याय ये शन मात्र कुछ ही लोगो तक सीमित रह गए हैं। दिन प्रतिदिन बढ़ती अथ की महत्ता अनेक अनयों के द्वार खोल रही है। राज- नीतिक प्रप्टाचार, सामाजिक शिष्टाचार या पर्याय बन गया है। थानायक गोगि अत्याचारा के विरुद्ध आवाज उठाता है लेकिन उच्च तप द्वारा उसकी १ पादयेद्र शर्मा 'पद्र से माक्षातकार पराग ५ २ हिमांशु जोशी, गुराज, पृ० ४ ४५ आवाज पूर्ण रूप से दबा दी जाती है। थी हिमाशु जाशी अपनी पीढी के अग्रणो कथाकार हैं। इनकी रचनाएँ सहज, सरल, मार्मिक आदि विशेषताएं लिए हुई मिलती हैं। इनके प्रमुख उमृन्यास हैं-अरण्य, महासागर, छाया मत छूना मन, समय साक्षी है, तुम्हारे लिए आदि । 'कगार की आग' पहाडी जीवन के इग उपयास मे जोशी ची ने समाज के सम्पन लोगो के मानसिक स्तर पर तीखा प्रहार किया है। कहानियो के क्षेत्र मे भी इनका कम महत्वपूर्ण योगदान नही है । जतत रथचक्र, मनुष्य चिह्न जलते हुए डैने हिमाशु जोशी की विशिष्ट कहानियों तथा कहानी सग्रह विशेष उल्लेखनीय हैं। 'सु-राज' को सजनात्मक प्रेरणा के बारे मे लिखते हैं-'सु राज जब लिख रहा था तो लगा कि बिना अधिक विस्तार दिए ही, रचना स्वय समाप्त हो गई। इसका पटनाश्रम बहुत लम्बा है, अत किसी भी सीमा तक इमे विस्तृत किया जा सकता था, कि तु कम से कम शब्दो में अधिक से अधिक समेटने के सहज प्रयास के कारण उप यास बनत बनते यह उप मासिका वन गई।' मनुष्य और मनुष्य के बीच की दूरी निर तर बढ रही है। ऐसी विक्ट स्थिति मे जो ईमानदार है, ईमानदार बने रहना चाहता है। वह कसे जिए ? जो असमर्थ है-~-असहाय, वह दुबल पाव आस्था को किम धरती पर कहां टिकाए ? 'सु राज का गागि का या देव' के जीवन की क्या यही विडम्बना नहीं ? जा विचार या साहित्य समाधान नहीं दे सकता वह पगु होता है गूगा । दष्टि होते हुए भी दृष्टि हीन होता है । जन स्थिति ऐसी है तो क्या साहि य का दायित्व कुछ और अधिक बढ जाता ? मेरा जीवन आरम्भिक काल कुमाऊ के पवतीय प्रदेश हिमाचल की तराई तथा नेपाल की सीमा रेखा के समीप बीता है । 'सु राज' मे कुमाऊ पवतीय क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर लिखा है । कहानी का उद्देश्य जीवन सघप को प्रदर्शित करना है। जिदा रहने के लिए मरने वा।" कथानायर गागि गरीवा की लड़ाई का अगुआ है। जिस कारण उसकी हत्या कर दी जाती है। उनका वेवसूर बैटा देवा हत्या और डकैती के जुल्म में जेल में ठूस दिया जाता है। 'गागि को हत्या साधारण हादसा न होकर पूरे शोषित समाज की हत्या थी। गरीबो को हर वक्त शापित की रात समाप्त होने का इतजार है। निश्चय ही हिमाशु जोशी को यह कृति भ्रष्ट राजनीति द्वारा गरीबो के सूखते आंसुओ का यथाथ दस्तावेज है ।

(१९६४), एक और मुख्य मत्री (१९६६) घूघट और घुघरू (१९७०), जनानी डयोढी (१९७२), ढोलन कुजक्ली हजार घोडा का सवार (१९८१) प्रजाराम (१९८३) । प्रमुख कहानी सग्रह-जवडन खोल दिल्ली वन बन गई जनव की पीडा, राम की हत्या पोटर बहुत बोलता है आदि । नाटषा मे मान के दावेदार, शराब खराब है, तास का घर तथा अय वाल उपयोगी रचनाओ की सृष्टि पद्र जी ने की है। 'प्रजाराम' क्थ्य और शिल्प की दष्टि से एक उत्तम राना कही जा सकती है। उपयास की क्या सरपट-सी भागती मी नजर आती है। इसकी घटना एक दूसरे से इतनी वरीय गौर एक दूसरे से इतनी जुडी है कि पाठ उरामे मग्न-सा हो जाता है। आपातकाल के विषय को लेबर लिखे गए उपयासो मे 'प्रजाराम' एक विशिष्ट स्थान बनाए रखता है। इसकी भाषा सरल, सुबोध ललित एवं रोचव है । सवाद पात्रानुकूल हैं । 'प्राराम' की सजनात्मक प्रेरणा पर श्री चन्द्रजी वा कहना है कि- 'प्रजाराम' की प्रेरणा व रचना काल आपातकाल के आरम्भ के छह माह है । उसी दौरान इसका सृजन हुआ था। उसकी प्रेरणा मुझे तत्कालीन प्रत्यक्ष चद घट नाओ से हुई । मैंने मोचा कि एक ऐमा उप यास लिखा जाय जो नायकहीन हो तथा तटस्थता से पीष्टि से लिखा गया हो बम मैंने सजन आरम्भ कर दिया और एक ऐमा उपायाम जो उस पाल को बताता है-लिख दिया। इस उप यास मे मेरा निजी नजरिया है, जो यथाथ को अपने ढग से स्पश करता है।' - स-राज (हिमाशु जोशी) श्री हिमाशु जोशी कृत 'सु राज' कम पप्ठो मे लिखा गया वहद कथा को लिए हुए उप यास है । इस रचना लेखक ने वतमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के सच्चे मगर कडवे यथाथ का चित्रण किया है। समारता की दुहाई देती इस व्यवस्था में निम्न वग कितनी पीडमय जिदगी भोग रहा है । इसके लिए कानून "याय, समानता इत्यादि शब्द निरथव हो गये हैं । स्वय लेखक के शब्द मे सत्ता शक्ति सम्पनता याय ये शत मात्र कुछ ही लोगा तक मीमित रह गए हैं । दिन प्रतिदिन बढती अथ की महत्ता अनेक अनर्थों के द्वार खोल रही है । राज- नीतिक भ्रष्टाचार सामाजिक शिष्टाचार का पर्याय बन गया है। क्यानायक गागि अत्याचारो विरुद्ध आवाज उठाता है लेकिन उच्च तबके द्वारा उसकी १ यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र से साक्षातकार के दौरान उद्घाटित विचार। २ हिमाशु जोशी, सु राज, ५०४ आवाज पूर्ण रूप स दवा दी जाती है । श्री हिमाशु जाशी अपनी पीढी के अग्रणी कथाकार है । इनकी रचनाएँ सहज, सरल, , मार्मिक आदि विशेषताएं लिए हुई मिलती हैं। इनके प्रमुख उपन्यास हैं -अरण्य, महासागर, छाया मत छूना मन, समय साक्षी है, तुम्हारे लिए आदि । 'कगार की आग' पहाडी जीवन के इस उप याम म जोशी नी ने समाज के सम्पन लोगो के मानसिक स्तर पर तीखा प्रहार किया है। कहानिया के क्षेत्र में भी इनका कम महत्वपूर्ण योगदान नही है । जतत रथचक्र, मनुष्य चिह्न जलते हुए डने हिमाशु जोशी की विशिष्ट कहानियां तथा कहानी सग्रह विशेष उल्लेखनीय हैं। 'सु-राज' की सजनात्मक प्रेरणा के बारे मे लिखते हैं ~'सु राज जब लिख रहा था तो लगा कि बिना अधिक विस्तार दिए ही, रचना स्वय समाप्त हो गई। इसका घटनाक्रम बहुत लम्बा है, अत किसी भी सीमा तक इमे विस्तृत किया जा सकता था, कि तु कम से कम शब्दो मे अधिक से अधिक समेटने के सहज प्रयास के कारण उप यास बनते बनते यह उप यासिका बन गई ।' मनुष्य और मनुष्य के बीच की दूरी निर तर बढ रही है । ऐमी विकट स्थिति मे जो ईमानदार है, ईमानदार बने रहना चाहता है। वह कसे जिए ? जो असमर्थ है-~-असहाय, वह दुवत पाव आस्या को किम धरती पर कहा टिकाए ? 'सु राज का गागि या या देव' के जीवन की क्या यही विडम्बना नही ? जा विचार या साहित्य समाधान नहीं दे सकता वह पगु होता है गूगा । दष्टि होत हुए भी दृष्टि होन होता है । जब स्थिति ऐमी है क्या माहिय का दायित्व कुछ और अधिक बढ जाता ? मेरा जीवन आरम्भिक काल कुमाऊ के पवतीय प्रदेश हिमाचल की तराई तथा नपाल वो सीमा रेखा के समीप बीता है । 'सु राज' में कुमाऊ पवतीय क्षेत्र की पाठभूमि पर लिया है। कहानी का उद्देश्य जीवन सथप का प्रशित करना है। जिदा रहने के लिए मरने वा।" स्थानायक गागि गरीवा की लड़ाई का अगुआ है । जिस कारण उसकी हत्या कर दी जाती है। उनका वेक्सूर बैटा देवा हत्या और डकैती के जुल्म मे जेल में ठूस दिया जाता है । 'गागि' की हत्या साधारण हादमा न होकर पूरे शोषित समाज की हत्या थी। गरीबो को हर वक्त शोपित की रात समाप्त होने का इतजार है। निश्चय ही हिमाशु जोशी को यह कृति भ्रष्ट राजनीति द्वारा गरीबो के सूखते आंसुओ का यपाथ दस्तावेज है।

३ कथ्य-विश्लेषण औपन्यामिक कथ्य सैद्धातिक म्वरूप-विवेचन उपयास के रचना विधान के सम्बध में अधिकाश विद्वाना ने छह तत्व--- कथावस्तु, चरित्र चित्रण, कथोपकथन, देशकाल, भाषा शैली एव उद्देश्य स्वीकार किये हैं। इन तवा मे स्थानक को उप यास का प्रमुख तत्व माना गया है। इसके लिए अनेक शब्द प्रचलित हैं । यथा स्थावस्तु, विषय वस्तु, इतिवत कथा, वस्तु, वत आदि । क्या के अभाव मे उप यास का अस्तित्व ही सभव नहीं है। कहानी ही उपन्यास का विषय है। उप यास अतत एक कहनी है एक कहानी की तरह ताजी दिलचस्प और कथनीय ।' डा० प्रतापनरायण टण्डन कयानक को उपयास की नीव रहते हुए लिखते हैं ~~-'कथानक ही वह वस्तु हाती है जिस पर उपयास का भवन खडा होता है।" पश्चिम के प्रसिद्ध ममालोचर फास्टर ने भी उपास म क्यानक की ही प्रधानता का स्वीकार किया है। कथानक ही वास्तव में उप यास का वास्तविक आधार ही उपायासकार अपनी कथाकृति की सृजना रता है। कथानक के आधार पर ही उपयास का ढाचा निर्मित होता है। कथ्य-चयन के विविध स्रोत स० प्रताप नारायण टडन न हिदी उप यास प्ररणा-स्रोत के रूप में प्राचीन भारतीय कया साहित्य को प्रमुख माना है तथा कथा साहित्य मे कथा १ विलियम हारी हडसन एन इद्रोडक्शन एन टू द स्टडी आफ लिट्रेचर (१०५४,५० १३६ २ डा० प्रतापरायण टडन, हिती उपयास मे क्या मिल्प का विरास (१९५६) १०७५ ३ ६० एम० फास्टर, माम्पैक्ट आफ द नाविल, पृ० २७ ४७ शिल्प के विभिन्न रूपो का आधार धार्मिक, पौराणिव, नीति प्रधान, लोक तत्व प्रधान ऐतिहासिक एव कल्पनात्मक माना है। कथावस्तु के चार प्रमुख स्रोत होते हैं। इतिहास, पुराण, सम मामयिक घटना चर और लेखकीय कल्पना।' इस परि- प्रेक्ष्य में आज के उप यासा का अध्ययन-अनुशीलन किया जा सकता है। कथानक के प्रकार एव कथात्मक सयोजन की विशेषताए उपयास के कथानक का सृजन किस प्रकार होना चाहिए तथा उसमे क्या- क्या गुण एव विशेषताएं होनी चाहिए, इस सदभ मे साहित्य शास्त्रियो ने विशद् विवेचन प्रस्तुत किया है । डॉ० टडन ने सम्बद्धता, मोलिक्ता निर्माण कोशल, सत्यता और रोचक्ता को अच्छे स्थानक के गुण माने हैं। हडसन ने उप यास के कथा चयन में उसके प्रस्तुतीकरण की विधि और व्यवस्था की दृष्टि से उपमास के कयानक का दो प्रकार से माना है-सुव्यवस्थित और अव्यवस्थित ।' डॉ० रामदत्त भारद्वाज के मतानुसार कथाना के सगठन और वि यास के काय कारण सम्बध, मनावैज्ञानिक क्षण, उत्कठा, सघप, भविष्य सक्त, चर्मोत्कष और सत्याभास का होना सामायत आवश्यक है। डॉ. कैलाश प्रकाश के अनु- सार व्यवस्था एव अग्विति क्था वस्तु के मुख्य गुण हैं, घटनाओ का उपयोगी चयन, महज विकास, स्वाभाविक गति, अकृत्रिम क्रम बधन और निश्चेष्ट परिणति कथावस्तु का सफल बनाते है ।' औत्सुक्य भी उप यास के कथानक की एक विशेषता होनी चाहिए । रिचड चच के अनुसार क्यानक की सजीवता इसमे है कि वह पग पग पर पाठको का चक्ति करता जाए।" डॉ० श्याममुदरदास ने सुगमता, स्वाभाविक एव मनामुग्धता का श्रेष्ठ कथाना के गुण स्वीकार किए हैं। उप यास के कथानक को प्रस्तुत करने के लिए अनका लियो का प्रयोग किया जाता है जैसा आत्म कथात्मक वणनात्मक, डायरी शली, पत्रात्मक आदि । इस विवेचन के आधार पर हम कथानक की निम्नलिखित विशेषताएँ निर्धारित कर सकते है- १ कथानक का स्वाभाविक विकास हो । १ हिदी उप यास मे कथाशिल्प का विकास, पृ० १३६ २ डॉ. देवीप्रसाद गुप्त, हि दी के आधुनिक पौराणिक महाकाव्य, पृ० २४ ३ हिदी उप यास मे क्या शिल्प का विकास, प० ७६ ७६ ४ डब्ल्यू०एच० हसइन, द स्टडी आफ प्रोज फिक्सन पेज, पृ० १४४ ५ डॉ० रामदत्त भारद्वाज, काव्यशास्त्र की रूपरेखा, पृ० २११ डा० क्ताश प्रकाश, प्रेमचद पूर्व हिदी उप यास, पृ० २५ रिचड चच-द ग्रोध आफ इगलिश नाविल पृ० १६७ ७ २ क्यानक मे औत्सुक्य एव रोचकना का सुदर समय हो। ३ क्यानक का सपाजन कल्पना शक्ति का प्रयोग करते हुए सवथा मोलिक ४ घटनाओ मे सुसम्बद्धता हो । समीक्ष्य उपन्यासो का कथ्य-विश्लेषण एक और मुरयमत्रो कथासार 'एक और मुख्यमत्री' उप पास का कथानक वतमान भारतीय राजनीतिक परिवेश है । इस उप पास का प्रमुख आधार ायक अरविंद को बनाया गया है । अरविंद एक मध्यम वर्गीय परिवार का सुशिक्षित महत्त्वाकाक्षी कि तु वेरोजगार नवयुवक है। वह पारिवारिक जीवन के प्रति लापरवाह है। इसी कारी के पीछे व्यग्य चाण सहने पड़ते हैं वह आहत हो जाता है-'जमाना आओ दो भाभी, आकाश के तारे भी तोडकर ले आऊगा।" इतना कहकर अरविंद हमेशा के लिए सोना (भापी) निम्मा और अपन पिता तुल्य भाइ चाद को छाडकर चला जाता है। बाद मे सोना का अपनी भूल का अहसास होता है तब तक अरविंद दूर जा चुका होता है । जिसे भाभी के तानो से घर छोडना पड़ता है, बस यही उसके लिए वरदान हो गया। अरविंद अपनी महत्वाकाक्षामा की पूर्ति के लिए हिंदू महासभा का नेता बन जाता है । वह दिन भर समिति के कार्यों में व्यस्त रहता है और रात को विभिर जन नेताओ के माथ अरविंद अपनी ओजपूर्ण वाणी के सहारे हिदू महासभा का प्रमुख नेता बन जाता है । अरविंद के राज नीतिक जीवन की पहली विजय ठाकुर नरेद्रसिंह को हया के आरोप से मुक्त करवाना। इससे उसको अपने समुदाय मे इज्जत बढी बल्कि आर्थिक लाभ प्राप्ति भी हुई। अरविंद अवमरवादी पार है। वह अपनी महत्वकाक्षाआ की पूर्ति के लिए और शरणाथिया के बाद प्राप्त करने हतु गुलाब नाम को अपहृता शरणार्थी युवती मे विवाह करके वह न देवल उसके पिना मतराम की अपार सम्पति का स्वामी बन जाता है अपितु शरणार्थियों का प्रिय नेता भी। इस प्रकार शादी मे भी राजनीति और दान में भी राजनीति का खेल खेला। अरविंद वाक-पटुता, १ डॉ. देवदत पार्मा हिदी के सामती चेतनापरक उप यास पृ० ६६ २ एक और मुख्यमत्री, पृ. ६ ३ सरिता (पाभिव), द्वितीय (सितम्बर, १९७१) से उधृत ४ रनलाल शर्मा, नया शिक्षक, अक्टूबर दिसम्बर, ७२, ५० ३५७ दूरदर्शिता, कर्मठता और प्रतिमा के बल पर हिंदू महासभा से त्यागपत्र देकर फाप्रेस की सदस्यता प्राप्त कर चुनाव लड़ता है और बहुमत से विजयी हो जाता है।' अरविंद अपने में मुख्यमत्री बनने की अदम्य आकाक्षा लिए हुए है । इसके लिए वह विभिन प्रचार के भ्रष्टाचार, हिंसा, अनाचार, तिकडम करता है। मुख्यमत्री बनने की आकाक्षा और तोय होती जाती है । वह चाहता था कि- 'सव पर उसका कब्जा हो, कांग्रेस की सारी मशीनरी पर उसका वब्जा हो, सब उसके इशारो पर चलें।" मुख्यमत्री बनने की अदम्य आकाक्षा को लिए हुए सब प्रकार को तिकडमी और टुच्चाइयो को काम में लेकर वह मुख्यमत्री बन जाता है। अरविंद अपने बचन की सहपाठी और पहली प्रेमिका शची की आड मे अनेक घृणित हथकडे अपनाता है और अनेक राजनीतिज्ञो को अपदस्थ करता है। गुलाब जैसी सुदरी और पतिता नारी के होते हुए भी-शची और सत्या (रेव यू मत्री श्री सरोज की पुत्री) व न जान कितनी अय सामाजिक एव राज- नीतिक क्षेत्र मे तथाकथित प्रगतिशील नारिया के साथ देह व्यापार करता है। अरविद के प्रयत्न स्वरूप शची मुख्यमत्री बन जाती है जिससे उसके विराधिया की मुह की खानी पडतो है । वह शची को अपने हाथ की कठपुतली रखना चाहता था पर वसा नही हुमा ।५ और शची का अपदस्थ पर फिर से मुख्यमत्री बन जाता है । विरोधिया का भय उसके मन में इतना गहराई से समा जाता है कि वह मानसिक रोगी बन जाता है।६ अनक प्रकार के राजनीतिक कुचक्रो और जघय कृत्यो की ममव्यथा अरविंद के मस्तिष्क में ऐसी हीन अथियो और कुण्ठानो को जन्म देती है कि वह अबत आत्मघात करके अपने सत्तालोलुप महत्वाकाक्षी एव विलासी जीवन का अत कर लेता है। कथ्य विश्लेषण प्रस्तुत उप यास की रचना का मुख्य उद्देश्य स्वातन्योत्तर भारत की राज नीति के विघटनशील परिवेश और पतनशील नतत्व का यथाथ चित्रण करना है। उप यासकार के शब्दा मे-'दश के राजनैतिक जीवन की बीस वर्षों की १ यसती पत हिदी उप यास रचना विधान और युग बोध, प० ३८ २ यादव द्र शर्मा च द्र, एक और मुख्यमत्री, पृ० १६ ३ हि दी उपयास रचना विधान और युग बोध, पृ० ३८ ४ हिदी उप यास रचना विधान और युग बोध, पृ० ३८ ५ रत्नलाल शर्मा-नया शिक्षक, अक्टूबर-दिसम्बर, ७३, पृ० ३५७ ३ सरिता, सितम्बर द्वितीय, प० १९७१ ७ हिदी उप यास रचना विधान और युग बोध, पृ०३० र यही, प०४३ यह गाथा है-मेरा उप यास ।" हमारे देश पी स्वातन्योत्तरकालीन राजनीति में व्याप्त धूतता भ्रष्टाचार, स्वाथपरता, राष्ट्र द्रोहिता, दल-बदल राजनीति की विडम्बनाआ, नृशसताआ, खोखले आदर्शों, व्यभिचारो एव हमारे बनावटी जीवन से सम्बधित घटना का को प्रस्तुत करने में लेखक को प्रभूत सफलता मिली है। क्याकार ने हमारे बदलत हुए समाज को पेश किया है जिसका मूल आधार राजनीति है। हमारा आज का सामाजिक जीवन वसे ही राजनीति प्रधान हो गया है, पर इसमे तो मूलत ये हो पात्र उठाए गए हैं जो पूरी तरह राजनीति मे डूबे हुए हैं। 'एक और मुख्यमत्री इस दृष्टि से भी एक महत्त्वपूर्ण उप यास है कि इसने राजनीति की मक्कार शक्ल के बारे मे विशद सूचनाएं देने का प्रयास किया है।' अरविद के लम्बे मवादो से कयानक मे शिथिलता उत्पन होती है । एक घटना के बाद दूसरी घटना घटती रहती है जो पाठक के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोडती है । कही वणनात्मक, कही नाटकीय तो कही पूर्व दीप्ति शैली म कयानक के प्रस्तुतावरण से कथानक में सरसता एव रोचकता की निरतर अभिवृद्धि होती है। अगर हिदी के दस पारह थष्ठ उप यासा का नाम लिया जाए तो 'एक और मुख्यमत्री' उनमे से एक है। एक और मुख्यमत्री एक महाकाव्यात्मक श्रेष्ठ उपन्यास है। इस उपन्यास मे यथाथ जीवन मा चित्रण है, कल्पना सिफ इस बात को सजाने को है । क्याकार की पक्ड बडी मजबूत और उसकी दष्टि सूक्ष्म है। १ सहि नचावत राम गुसाई कथासार भगवत्ती बाबू के इस उप यास में स्वतन भारत की एक सच्ची, मजेदार और व्यग्यपूर्ण तस्वीर पेश की गयी है। प्रस्तुत उप यास मे पात्रो के चरित्रो, मनो- भावा का उजागर तिस्तत फल पर दिया गया है। भगवती बाबू के उपयासो मैं इतना ही कहूगा (एक और मुख्यमत्री की प्रस्तावना से उदधत) २ हिदी के सामती चेतनापरव उप यास प०७० ३ नया शिक्षक, अक्टूवर दिसम्बर ७२, ५० ३५६ प्रभातकुमार त्रिपाठी---ज्योत्स्ना, प०५८ डॉ. देवदत्त शर्मा-हिदी वे सामती चतनापरत उपयास, २०७० नया शिक्षक, अक्टुबर-दिसम्बर ७२, ५० ३५६ डॉ. देवीप्रमाद गुप्त-उपयास के अतिम फ्लप से उदधत रत्नलाल शर्मा-समाज कल्याण अतिम पष्ठ ६ डॉ. गोपालराय समोला पत्रिका, पूर्णांक १३, जुलाई ७०, १०२ ८ मे व्यक्तियो को नही पूर परिवेश की प्रधानता होती है, व्यक्ति प्राय उस पूरे परिवेश का अग होता है, वह कही भी उस पर हावो नही होता।" भगवती- चरण धर्मा ने आधुनिक युग का चित्र प्रस्तुत किया है जो आज विसगतियो से भरा पडा है । उसको उहोने व्यग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया है । उप यासकार ने उपयास को चार भागो मे विभक्त करके अपनी बात को अमवद्ध रूप से विस्तार दिया है । प्रधम भाग 'राधेश्याम बुद्धि' अध्याय में आज का व्यापारी किस तरह पूजीपति और उद्योगपति बनता है, उसके विकासक्रम को आधार बनाया गया है । घासीराम की परचून की दुकान है और उसका एक मात्र पुत्र मेवालाल पढाई के साथ-साथ रुपयो के लेन देन का काम भी करता है। राधेश्याम जो घासीराम का पोता था, राधेश्याम के अनप्राशन सस्कार के समय पुरोहित जी को दक्षिणा देने के सम्बध मे वाप बेटो मे झगडा हो जाता है और मेवालाल पामीराम के थप्पड मार देता है। मेवालाल के इस व्यवहार से दुखी होकर अपना सब कुछ उसे देकर तीथ याना पर निकल पडता है । घासीराम के जान के बाद उसन रकम लेन देने का काम शुरू कर दिया ।तिक डम भिडा कर वह अपने घर के सामने वाली हवेली खरीद लेता है और वहां मेवालाल एण्ड सस के नाम से कम्पनी खोल लेता है । लेखक उमके चरित्र को प्रक्ट करता हुआ कहता है-'अगर घासीराम डाडी मारने मे कुशल थे तो मेवालाल जालसाजी और तिकडमवाजी मे आस पास के किसी तिकडमवाजी जालसाजी से कमजोर नही पडता था।" मवालाल का काम चल पडता है। साल भर हाने के बाद भी घासीराम नहीं लौटता है तो तो वह (मेवाराम) उसकी (घासीराम) इच्छानुमार नगरपालिका के पार पर कब्जा कर मदिर बना लेता है । वह जातीयता और धम के पाम पर चदा इक्टठा कर मदिर का विस्तार परवा देता है । घासीराम डेढ साल बाद लौट जाता है। अपने पाते राधेश्याम को शिक्षा देने लगता है । मेवालाल ने नकली खाते वही बनाने का काम शुरू किया जिससे उसकी आय बहुत अधिक होने लगी। मेवालाल राधेश्याम को पढ़ाने के लिए विलायत भेज देता है, वहां उसकी मुलाकात जैसुखलाल से होती है, यह उमसे सौदा करके ए फ्लावर मिल की मशीन खरीद लेता है जिसे कानपुर मे स्थापित कर लेता है । राधेश्याम को शादी हीरालाल की पुत्री गगा से कर दी जाती है । गगा के आगमन से उसका व्यापार चरम विदु की ओर बढ़ने लगा, जिसस उसको गणना देश के ही नही बल्कि विश्व के उद्योगतियो में होने लगी। पहला खण्ड जिसमे राधेश्याम के पितामह, पिता और स्वयं उसके विकास १ डा. गोपाल राय-समीभापत्रिका, पूर्णाक १३, जुलाई ७०, पृ० २ २ भगवतीचरण वर्मा-सहि नचावत राम गुसाई, पृ० १५ ३ सहि नचावत राम गुसाई, पृ०५१ की कहानी कही गयी है किस्सागोई की दष्टि से रोचक होने के साथ साथ पूंजी वादी विकास का चित्र प्रस्तुत करती है।' दूसरे भाग का नाम भाग्य' है । नाहरसिंह जो डकत है, उसकी वीरता देख फर महिधर अपनी जमीदारी नाहरसिंह का सौंप पर कलकत्ता चला जाता है। नाहरसिंह को राठौर वश का वशज घोषित कर दिया जाता है । वह अपने मित्र गनेशी को लेकर डाका डाला करता है जिससे वह अपना भरण-पोपण करता है। वह अपनी पुरानी प्रमिका भभरी से शादी करके उसे ठकुराइन भानमती बना देता है। साल भर के बाद उसके पुत्र केहरसिंह होता है । भौतारीलाल के घर डाका डालते वक्त गोली लगने से नाहरसिंह मत्यु को प्राप्त होता है । केहरसिंह जमीदारी का स्थान ग्रहण कर लेता है। उसकी शादी रघुराजसिंह आगरा वाले की पुत्री लक्ष्मी के साथ कर दी जिससे जबरसिंह नाम का लडका उत्पन होता है। उस पढाने के लिए आगरा भेज दिया जाता है । वहाँ वह काग्रेस म शामिल हा जाता है । वह तिकडम लगाकर शहर का प्रमुख नेता बन जाता है । जब्बर- सिंह अपनी कूटनीतिक चाल और गुण्डागर्दी स विधायक बना जाता है और बाद म राज्य का गहमानी। तीसरा अक जिस लखक ने भावना नाम दिया है । गोपालराय के अनुसार व रामलाचा का जनमत बहना अधिक पसद करेंग। भावना की सज्ञा अगर क्सिी का देनी ह तो जब्बरसिंह को पत्नी धापतकौर को दी जा सकती है।' राजा पृथ्वीपाल की शादी शलजा स करवा देन पर रामरामझु को कुछ गावो की जमीदारी पथ्वीपाल दे देता है। रामसमझु ब्राह्मण हाते हुए भी शराब और मांस मछली का शौकीन ह। कमलनयन अपनी पुनी नदिनी की शादी राम समझ से कर देता है । जिसस रामसिंहासन नाम का पुत्र उत्प न होता है । उच्च शिक्षा ग्रहण कर यह ताल्लुके का भार सभाल लेता है। राम सजीवन को पढने के लिए विलायत भज दिया जाता है । इसका सारा यच प्रभादेवी (राम सिंहासन की पठिन) देती है। वह लौटते वक्त एक अग्रज मम से शादी वर आता है । रामसमझु की मरयु व पश्चात् वह जायदाद का हिस्सा मागने लगता है और योट मे इसके लिए मुकदमा दायर कर देता है । रामसिंहासन के तीन पुत्र हैं। राम उदित रामानुज और रामलोचन । रामलोचन का छाड दोनो ऐय्याशी हैं। रामानुज क्ला प्रमो है और रशीदा नाम की लडकी को अपन साथ बम्बई भगा ले जाता है। रामलाचन के सामने ही उसकी दुनिया नष्ट हो रही थी इस मुपद मेवाजी, रामउदित की फिजूलवर्षी तथा रामानुज ये बीस हजार रुपये लेकर गायब हो जाने के फलस्वरूप उसके पिता सिंहासन पर पचास हजार का र्जा गोपालराय-समीक्षा, अ.१३ जुलाई ७०, पृ. ३ २ वही, पृ०३ हो जाता है। राजा पग्वीपाल का पोता महिपालसिंह रामलोचन को गृहमत्री जब्बरसिंह से मिलवाता है । उसको पलो धनवत कुवर उसकी भुआ निकल आती है तथा उसी की सहायता से रामलोचन थानेदार और बाद में शहर या पोतवाल, डी० एस० पी० बन जाता है। इस उपयास का महत्त्वपूर्ण माग 'उठा-पटक' है जिसमे उद्योगपतिया और काग्रेम मग्रियो की साठ गाठ मत्रियो की आपमी फूट और उनकी शतरजी चालें, मजदूर सघों के नेताओ में खोयले व्यक्तित्व साहित्यिक गोष्ठियो में होने वाली सुशामद और पूठी तारेवानी आदि का व्यग्यात्मा चित्र अक्ति दिया गया है।' सेठ राधेश्याम जबरमिह फी सहायता से कृषि अनुमधानशाता और टफ्टर पी फैक्टरी खोलने के नाम पर जमीन प्राप्त कर लेता है साथ ही साथ एक करोड रुपयों के शेयर भी सरकार को भेज देता है । लेकिन विगाना के विरोध के कारण वह भूमि पर कब्जा नही कर पाता है । जवरसिंह के भाई हिम्मतसिंह को कृषि अनुसंधानगाला का मैनेजर बना दिया जाता है । रामलोचन शहर कात- धाल का स्थान ग्रहण कर लेता है और यह पद अपनी गरिमा और ईमानदारी से निभाता है। जबमिह का आदमी और धनयतकौर वा भतीजा होने के कारण रामलोचन निरतर सनति करने लगा। राधेश्याम की पत्नी गगा देवी द्वारा धनवत कुवर का अपमान किए जाने पर रामलाचन राधेश्याम को गिरफ्तार करो की ठान लेता है। राधेश्याम ब्लक मार्केटिंग, नस्करी व अन्य अवैध गैर- कानूनी काय करता है । कृषि अनुसंधानशाला के उपाटन वाले दिन वारट रदद होने के बाद भी रामलोचन राधेश्याम को गिरफ्तार कर लेता है। रामलोचन की इस हरकत से जबरसिंह उमसे नाराज हो जाता है और उसको सस्पैण्ड कर दिया जाता है । झझावत के कहने पर वह नौकरी से इस्तीफा देकर चुनाव लडने की ठान लेता है। वह जबरसिंह के सामने आगरा क्षेत्र मे खडा हो जाता है और यह जबरसिंह से बारह सौ नौ वोटो से जीत जाता है । रामलोचन विरोधी पक्ष का महत्त्वपूर्ण सदस्य और विधायक बन जाता है । लेखक रामलोचन पाध्यक्तित्व व्यक्त कर कहता है, 'सर विधायक उसका आदर करते हैं, सब अफसर उसका आदर करते हैं। साथ ही उससे लोग डरते भी है क्योकि गाली गलौज और मार पोट मे यह किसी से कम नहीं पड़ता था। जवरसिंह को कौंसिल का मैम्बर बना दिया जाता है। कथ्य विश्लेपण 'सबहिं नचावत राम गोसाई मे स्वतत्र भारत की एक एक सच्ची, मजेदार १ सबहिं नचावत राम गुसाई, ५० १३७ २ गोपालराय--समीक्षा अब १३, जुलाई ७०, पृ० ३ ३ सहिं नचावत राम गोसाई, पृ० २८३ और व्यग्यपूण तस्वीर परापी गई है। मगयतीचरण वर्मा ने अपने उपयासों में व्यापक सामाजिक राजनीतिक चित्रफ्लक पर व्यक्ति पानी में मनोभावोगो उभारने का प्रयास करते हैं । इसी बात को उहोने अपने इस उप यास ये सभी पात्रो वे आतरिय व वाह्य मनोभायो को उद्घाटित परने का प्रयास किया है। उहोंने इस उप यास को प्यग्यारमा शली मलिया है। उनो विमी भी पूर्ववर्ती उपयारा में व्यग्य प्रभावशाली रूप म नही उभर पाया है। 'सबहिं नपावत राम गोसाई' इस दप्टि से एर पठनीय उपयारा है। डा. गोपालराय का मत है कि- 'क्लारमय उपलब्धि की दृष्टि से कदाचित इस उप यास को बहुत ऊँचा दर्जा न दिया जा सके, पर यह एव पठनीय उप यारा है।" काली-आधी कथासार कमलेश्वर ने अपने उप पास 'काली आंधी' म आधुनिक नारी पा राज- नीतिक क्षेत्र योगदान व उसकी सफलता का चिप अस्ति दिया है । उनको अपने लिए निर्धारित सनातन मूल्यो से घोर टक्कर होती है। उहें घर और बाहर के संघर्षों का सामना करना पडता है । राजनीतिक क्षेत्र मे सफलता के लिए उहे अनेक तिकडमो को शरण लेनी पडती है और वे भी काय करने पडते हैं जो परम्परागत दृष्टि से नारी के लिए निपिद्ध समझे जाते हैं । राजनीति मे स्त्री के आने से पति और सतान से सम्बध नाम मात्र के रह जाते हैं । स्त्री ने सफलता प्राप्त करने के बाद पति पत्नी म परस्पर वैमनस्य और ईर्ष्या प्रज्ज्वलित हो जाती है । कमलेश्वर ने अपने उपयास 'बाली आंधी मे आधु निक नारी के इसी सपर्प को प्रस्तुत किया है । उप यास की नायिका मालती अपने पति जग्गी बाबू द्वारा निरतर प्रोत्साहन देने के कारण वह राजनीतिक क्षेत्र मे प्रवेश कर लेती है। जग्गी वाबू मालती को भापण लिखकर देते थे इस तरह मालती भाषण देने के अभ्यास के कारण एक सफल राजनीतिक वक्ता बन गई । जग्गी बाबू खजुराहो मे अपना होटल चलाते थे। जिला परिषद के चुनाव मालती की पहली राजनीतिक विजय थी और यही से जग्गी बाबू को अपना छोटापन व अपमानित होना पड़ा था। मालती के स्वागत समारोह के वक्त मच पर जाते वक्त एक वालिटयर द्वारा रोका जाना ही उनकी जिन्दगी का पहला अपमान इस जीत के कारण सहना पड़ा था। जग्गी वाबू के होटल के कारण मालती को बदनाम किया जान लगा। इस बात का लेकर मालती और जग्गी बाबू में झगड़ा होता है और जग्गी बाबू अपनी एक मात्र पुत्री लिली को लेकर कही और चले जाते हैं । वे जाते वक्त अपना होटल भी बद कर जाते २ गोपालराय, समीक्षा, जुलाई १९७०, पृ० ३ हैं। जग्गी बाबू लिली को पंचमढ़ी के स्कूल और वही पे होस्टल में भर्ती कर भोपाल के गोल्डन सन होटल के असिस्टेंट मैनेजर और फिर बढते-बढ़ते मैनेजर हुए और वही रहने लगे। लिली पचमढी मे पढती रही। उसे अपनी मां से मिलने का मौका ही नहीं मिला और मालती जी चुनाव जीतती जीतती एक दिन मिनिस्टर हो गई । इस बार ससद के चुनावो मे भापाल क्षेत्र मिला था। वे वहाँ कुछ प्रभावशाली स्थानीय सामाजिक और राजनीतिक लोगो से सम्पक आरम्भ करती है। उह आत्मविश्वास जाता है कि वे इस चुनाव को अवश्य जीत पायेंगी। वे जातिगत मोहल्ला के प्रभावशाली व्यक्तियो को अपना मुख्य कायकर्ता बना लेती हैं । बनिया के वोट प्राप्त करने के लिए वे लाला दामोदर को खडा कर देती है जो बाद मे मालती के समथन मे बैठ जाता है। मालती जी अपने कायकर्ताआ के साथ हाटल गोल्डन सन मे निवास करने आती है, तो वहाँ जग्गी बाबू को देखकर चौक पडती है। वह गुरुसरन के माध्यम से लिली और जग्गी वावू हाल चाल ज्ञात करती है । मालती को देखकर जग्गी बाबू रात भर टैरेस मे टहलते रहे और मालती जी भी रात को अच्छी तरह से मोई नहीं । जग्गी बाबू मालती जी को पसद का खाना होटल में बनाने लगे थे उनके सोने आदि की व्यवस्था भी उनकी रुचि के आधार पर कर दी जो सम्बध बिगडने से पहले उह ज्ञात थे । अगले रोज से मालती जी ने चुनाव के कायक्रमो मे रुचि लेना आरम्भ कर दिया। विरोधी लाग जातिवाद के नामपर वोट इकटठे करने लगे थे। इस्लाम खतरे में कहकर वोट इकटठे किए जा रहे थे। शहर में साम्प्रदायिकता के दगे भडकने भारम्भ हो गए थे। मालती जी के चुनाव कार्यालयों पर हमले विरोधियो द्वारा किये जाने लगे । फिर भी वे झुकने को तैयार नहीं थी । जग्गी बाबू और मालती के सम्बन्धों को लेकर विरोधियो द्वारा पर्चे बांटे जाने लगे। मालती जी ने जग्गी बाबू को सभा मे ले जाकर सबके सामने स्पष्ट रूप से जग्गी बाबू की तरफ इशारा कर महा कि-'जी । यही है मेरे पति । पति परमेश्वर, मेरे दोस्त मेरे प्रेमी और मेरे यार । जो कुछ भी हैं, यही हैं। और ये मेरे साथ आपकी अदालत में मौजूद हैं ।" यह कहकर मालती जी ने अपनी जीत का पक्मा रास्ता बना दिया था। छुटिटया होने की वजह से जम्गी बाबू लिली को भोपाल ले आये थे।लिली चुनाव देखकर मस्त सी रहने लगी थी। चुनाव नजदीक आते जा रहे थे। सब लोग इसमे व्यस्त से नजर आ रहे थे । आखिर चुनाव हो गये । पहले तो विरोधी गुट के लोग आगे चल रहे थे। लेकिन भाग्य ने ऐसा पल्टा खाया कि मालती जी की अपने निकटतम प्रतिद्वदी से सात हजार वोटो मे जीत हुई। स्वागत समा- रोह म लिली मालती जी से आटोग्राफ लेने जाती है, लेकिन वे उसको पहचान नहीं पाती हैं। पता लगते ही उनका ममता रूपी हृदय पिघल सा जाता है। वे १ कमलेश्वर, काली आंधी, प० ६१६२ लिली से मिलने के लिए आतुर हो उठती हैं । लिली से मिलते ही उसको अपनी गोदी मै उठा लेती हैं और उसके मुह पर चुम्बनो को बौछार लगा देती हैं । खुशी के मारे आँखो से दो चार अश्क भी बह निकलते हैं । लेखक ने यहा पर मामिक चित्र उपस्थिति किया है । वे लिली व जग्गी बाबू का दिल्ली ले जाना चाहती थी, लेकिन परिस्थितियां ऐमी नही थी कि वे उनको अपने साथ ले जाती। लिली आगे पढ़ने के लिए पचमढी फिर चली जाती है। कथ्य विश्लेपण कमलेश्वर ने अपने उपयास 'काली आधी' मे आज की राजनीतिक क्षेत्र की नारी की विवशता जो उसन इस क्षेत्र में प्राप्त की है नारी को राजनीतिक क्षेत्र में सफलता के लिए दिन परम्परागत नियमा को तोडना पडता है, पति मोर सतान से सम्बध विच्छेद करने पड़ते हैं आदि परिस्थितियो का मार्मिक चित्रण किया है। मालती और जग्गी बाबू के सम्ब ध विच्छेन से उत्प न स्थिति से उपजे द्वद्ध का वढ़िया चित्रण किया है।' 'काली आंधी' का कथानक देश की ऐसी सममामयिक राजनीति से प्रभावित है, जितम नतिक मूल्यो का ह्रास हुआ और भ्रष्टाचार का विकास हुआ । पात्रो के मनावैज्ञानिक क्षणा की पपड मे भी फ्मनेश्वर सपन रहे हैं। इसकी सफलता इसके फिल्मीकरण व उसकी प्रसिद्धि से लगाई जा सकती है। गोपालराय का मत है कि कानी आधी को कोई श्रेष्ठ औपन्यासिक कृति नहीं माना जा सकता। पमनेश्वर ने समस्या को रोमानी अदाज मे हो प्रस्तुत किया है और मध्यमवर्गीय सिो दशक और पाठ की भावुप्ता को जगाने म भी वे नहीं चूके हैं । इस पय्य के माध्यम से कम लेश्वर ने आज के राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर भी सकेत दिया है, पर यह समेत मात्र से आगे नहीं जा सका है। एक पित्मी कहानी के लिए इससे अधिक की आवश्यरता भी शायद नहीं थी। आज की राजनीति में चलने वाली उठा पटर का पूरी सजीवता के साथ काली आँधी' के पात्रो ने जिया है। यह ईमानदारी में कही गई पहानी मपाथ इतने नजदीय है कि पाठक आद्योपात इसका रस लेता है। राग-दरवारी यथासार साठोत्तरी हिदी उप पाम-मेगन म भारत की स्वतता के पश्चात् राग नीतिन जन जीवामो मुख्य मुद्दा यनाया गया है और उसरे मामाजिर मनी विमान कोयटे गरात स्पराम उभारा एव निधारा गया है।ग दृष्टि से राय १ गोपामराय, समोसा, मई-अगस्त १९७५, पृ. ७२ । धिक महत्वपूर्ण उप यारा श्रीलाल शुक्ल का 'राग दरबारों' (१९६८) है। जो आज की राजनीति के पणित, दूर पारनामो एव पक्षो को वही ईमानदारी के साय उभारती है। डा० आदित्यप्रसाद त्रिपाठी या पहना है कि-'राग- दरबारी' औपन्यासिक परम्परा बी हदों को तोडती हुई अपनी शिल्पगत प्राविधि की 'टोन' मे व्यग्यात्मक्ता ये नयेपन की नोक पर सजनात्मक्ता की नई सरहदा का स्परा करती है जो इस विधा के सप्रेषण की क्लास्मरता मे एक नया मोड है, जिससे व्यग्य के सामथ्य पी पहचान गहरी हाती है।" पृति वे कया केन्द्र मे शिवपालगज है जो न गांव है, और न ही कोई कस्वा। उसकी शसिमयत दाना के बीच की है। चाहे तो इमे हम कस्वानुमा गांव पह सकते हैं । 'राग दरबारी' के पथ्य के सम्बध मे डॉ चद्रकात वादिवडेकर का कपन है कि शिवपालगज-राजनीति के बलात्कार से मलक्ति हुमा है और उसकी कलक गापा हो 'राग-दरवारी' का पप्य है।' उमे विशुद्ध गाँव मानने में कठिनाई यह है कि यहाँ पाना, कालेज, कोमापरटिव यूनियन, मिठाई एव पसारियो की दुकानें हैं । ये सब मिलकर इसे एक सामाय भारतीय गांव की शक्ल नहीं देते हैं। वास्तव मे यह सब एक वस्बे की निशानी है । टाउन एरिया वाली दर से ज्यादा टैक्स देने के भय से शायद इसे गजहो ने गांव ही रहने दिया। यहां के लोगो को गजहा कहा जाता है। लोग-बाग इन गजहाँ को मुह लगाना नही पाहते, क्योंकि ये गजहे साले बडे लुच्चे व पोइया विस्म के लोग होते हैं । ये लोग अपने आप पर भी भरोसा नहीं करते हैं। शिवपालगन के : मे वद्यजी और उनको कोठो आबाद है। धंद्यजी इस कृति के सर्वाधिक महत्त्वपूण पात्र हैं । इनकी 'पहुँच' बहुत व्यापर और हाथ लम्बे हैं । परिवेश की विकृतियो को उभारने में रचनाकार ने वद्यजी के व्यक्तित्व और उनकी मानसिकता को गहराई एव विस्तार से उठाया है। इही को छत्र छाया मे कालेज गुटबदी का अखाडा बना हुआ है, कोआपरेटिव यूनियन पर इनका करना है, ग्राम प्रधान इनकी इच्छा पर नियुक्त होता है। इनकी कोठी सामतो के दरयार को प्रतीक है । वे जीवन से निराश युवको को आशा का सदेश देते हैं । वे हर बीमारी का कारण व्यक्ति का वीय-क्षय होना बताते है। उनके कथन मे गीता, गांधीवाद, धमयुद्ध, प्रेम, अहिंसा प्रजातत्र आदि समाहित हैं। कालेज के प्रिंसिपल साहब वैद्य जी के आदमी हैं अध्यया अध्यापन में जाहिल विस्म के आदमी हैं । पूरा व्यक्तित्व तिकडम वाला है। खना विरोधी लेक्चरार है। हमेशा इन दोनो मे सना-सनी का मौसम कायम रहता है । खना और मालवीय युग का प्रधान भीखम खमेडी और गायादीन है । कालेज मे १ डॉ० आदित्यप्रसाद त्रिपाठी, औप यासिक समीक्षा और समीक्षाएँ, पृ० १३३ २ हा० च द्रकात बादिवडेकर, उप यास स्थिति और गति, ५० २८५ ५८ मैनेजर या चुनाव तमचे के बल पर पुन वैद्यजी प्राप्त कर लेते हैं । इसकी शिकायत सभी विरोधी लोग थिमा विभाग तक लिख भेज देत हैं । छोटा पहलवान जो वैद्य जी के बडे लडो नद्री पहलपान का चेला, शिष्य है । वह एक दिन अपने बाप कुमहर प्रसाद की पिटाई कर देता है और कुराहर छोटे पर मुकदमा ठोर देता है। यहां के लागा या सामाजिर पय 'भाग' मानी जाती है । इमम वाम, पिस्ता, विसमिरा मिला कर पीसी जाती है। शिवपालगज की कोआप टिव यूनियन मे गवन की योजना वैद्यजी इस लिए बनाते हैं ताकि उसकी ईमानदारी पर शक न रिया जा सके। इधर कुछ दिनो के बाद वद्यजी की रुचि गांव सभा म और जाT तगी थी। प्रधान के लिए वैद्यजी ने मगलदास उफ सनीचरा यो इम पद लिए याय समझा । वद्य जी की कृपा और चुनाव की महिपालपुर वाली पद्धति के सहारे सनी ारा गांव सभा का प्रधान बन गया । पिना दुम का बादर, मूख, मसखरा, शिवपालगज वा एक निठरला गांव सभा वा प्रधान मनीचरा था। सनोचरा की विजय लोक्तानिक मूल्यो एव प्रणाली के खोखले हो जान का सबूत है । लगड जो नवल प्राप्त करने की लंगा तार कोशिश कर रहा है। हर वार उसे असफलता ही प्राप्त होती है क्योकि वह बाबू को रिश्वत देना नही चाहता है । पिना रिश्वत आज के समाज मे कोई काय असम्भव है । रिश्रत आज सवमाय मूल्य बन चुका है। ऐसे कामो से वद्य जी के भानजे रगनाथ को बेहद घणा होती है । बद्री पहलवान गयादीन की पुत्री बेला से शादी करना चाहता था । लेकिन गयादीन' को यह पस द नही था। उसकी शादी कही और पक्की करने की सोचने लगा । खना और प्रिंसिपल मे कालेज मे हाया पाई हो जाती है । पुलिस मे रिपोट दज करा कर इसकी शिकायत डिप्टी डायरेक्टर को की जाती है। वे समझौता कराने आने वाले थे। उमसे पहले ही वैद्य जी खना से इस्तीफा लिखवा लेते हैं । प्रिंसिपल इस पद के लिए रगनाथ को ग्रहण करने का कहता है पर तु वह साफ इकार कर देता है। 'राग दरबारी' उप यास मे गाँवो में चलने वाली राजनीति व उसके हथकण्डो का मार्मिक तथा यथाथ चित्रण किया गया है। कथ्य विश्लेषण श्रीलाल शुक्ल का उप याम 'राग दरबारी' रचना जिन्दगी, हि दुस्तान के गाव की हालत इस दुनिया की पुनिस, थानो, अफसरो प्राचार्यों ग्राम के राजनीतिज्ञ और उनके चगुल मे पडी सहकारी सस्थाना मबके घणित करनामा एव पनो को बडी ईमानदारी के साथ उभारती ह। राग दरबारी की रचना हास्य 'कोटेड' यग्य की धार पर पडी ह । हिदी उप यास । ." स्कूला विद्यार्थियो, १ डॉ० लक्ष्मीनारायण दुबे, मधुमती, अप्रैल ८२, पृ० ४६ इद गिद इस उपयाम का 7-टनम मूचि - देशराज रहते हैं जाए-है। 'घटरा मौरी . नुक्कड़ पर पहलवानर है। यहाँ अM १ डॉ० आश्कि-नि-मंग और मे पहली बार व्यग्य को इतना विस्तार मिला । यह कहना गलत न होगा कि सम्भवत 'राग दरबारी हिदी उपन्यास की पहली रचना ह जिसमे वहद स्तर पर व्यग्य को निरतर बनाये रखा जा सका है। इतन बडे पैमाने पर व्यग्य को उठाने का यह हिदी मे पहला ही प्रयास है। परम्परागत हिदी की औप- "यासिक शली मे एक नया प्रयोग ह और यही इसकी निजता एप वशिष्टयता है। इसकी भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है जा पाटक के मस्तिष्क पटल पर अपना विशिष्ट स्थान रख जाती ह। पाठक की जिज्ञासा लगातार त्रियाशील रहती ह। कटरा बी आजू कथासार 'कारा बी आजू' आपातकाल (जून १६७५ माच १६७७) मे भूत पर लिखा गया उप यास है। 'बटरा बा आजू' उप यास के रूप में एक राजनीतिक टिप्पणी है। 'कटरा वी आजू' मे अपातकान में मन्द बन्दा पर किये गए अमानवीय अत्याचार, विरोधी स्वर ददान को दना, पुलिम का अत्याचार जैल मे पामा य व्यक्ति के सायबर नगरो की खूबसूरती के नाम पर अत्याचार, ज्यातिया और दिन और परिवार नियोजन प्रसार आ-ि अत्याचाराका राही नसून 'टी आजू मे हृदयस्पर्शी सरल और सुबोध भापा पवित्र का प्रयास किया है। जिसमे वे पूण रूप मन मोह है।र जार में आपातकाल का आँखो देखा हाल प्रस्तुत किंत: ras आपातकाल को भूल पाना कठिन हाण। रजा ने प्रस्तुत उप यास में निम्नई (मह) को पात्रो के माध्यम से प्रस्तुत किया है। दाइ, मटाय की सरल ज्यादा प्रभावा वे बाव? दरी परमर प्यार और सहानुभूति, आशामा आन्द्राको दया मानों में भरी जिदगी का राही मासूम रवानेन्द्रिाहाके बाद रजा इमर्जेसो वा माहौल खडा फटकटौहना है रितले को पढ़कर 1 २ हॉ० गान-पृ. ८ * ६० व्यक्ति या आना जा है लेकिन यह इम मोहल्ले में नही रहता है । पेशे से पत्र. पार और यामपयी है । विल्लो जो पहलयान की मानजी है जो यहाँ पर 'जनता लाण्डरी' नाम से लाण्डरी चलाती है। यह देश से प्रेम रती है और वह उससे गादी इसलिए परना नहीं चाहती है कि उसरा अपना निजी मवान नहीं है। यह मकान बनान पीपातिर एम एम पमा दाँत रा पर इट्टा पर रही है । जम्मू मिया ने दो लडकियां हैं महनाज और शहाज । महनाज येया (विधवा) हो चुकी है, याद मे उसका निकाह जोयन मियां पे साय होता है और यह मवदी और परिवार नियोजन का प्रसार परतो परती नेता बन जाती है । शहनाज मास्टर बदल हगन पर फिदा है । आपातकाल की घोषणा पहलयान देशराज और बिम्लो के सरल स्वभाव यो ताहयर रय देती है । देशराज, बिन्लो तथा शहनाज और मास्टर बदल हसन के सपने घूल म मिल जाते हैं। प्रेमा जो आशाराम की प्रमिया है, किसी बात को लेकर इन दाना में अलगाव हो जाता है । प्रेमा भाषाशवाणी मे यूज रीडर है। आपातकाल में पारण देशराज और दूसरी तरफ प्रेमानारायण जसे सहज विश्वासी युवमा यो अमानवीय अत्याचारों का सामना करना पड़ता है। इस आपातकाल में शहनाज और जोखन मिया जसे टुच्चे लोग नेता बन जाते हैं । चालान राजनीतिश की तरह फायदा उठाते हैं। नगरो पे सोदय के नाम पर मकानो पर बुलडोजर चला दिया जाता है। जब बिल्लो के मकान पर बुलडोजर चलाया जाता है तो वह उसके आगे आकर शहीद हो जाती है । वदल हसन की जबदस्ती नसनदी कर दी जाती है जबकि वह शादी शुदा नही होता है। पुलिस के घोर अमानवीय अत्याचारो के कारण दशराज पागल हो जाता है। रजा ने प्रस्तुत उप यास मे मापातकाल की कडी आलोचना की है। पर उनकी राजनीतिक दृष्टि धुधली नहीं है । उहोंने उप यास के अत मे तथा कथित सम्पूण क्रांति के नाम पर दल बदल कर जनता पार्टी मे हाने वाले स्वार्थी नेताओ की असलियत की ओर समेत किया है । आपातकाल के उपरात इंदिरा गांधी की पराजय हुई और जनता पार्टी का शासन स्थापित हुआ, पर जल्दी ही इस पार्टी के अतविरोध उभर कर सामने आने लगे। थोडे ही दिनो मे पार्टी टूट गयी । आज इस पूजीवादी अथ यवस्था ने राजनीति को पूर्ण रूप से दूषित और भष्ट बना दिया है। आज की राजनीति धन, गुण्डागर्दी और छल प्रपच पर आधारित है। कथ्य विश्लेषण 'कटरा बी आजू 'आपातकाल (जून १६७५ माच १९७७) को घटना पर आधारित उपन्यास है। 'कटरा बी आजू' उप यास के रूप मे एक मार्मिक राज- नीतिक टिप्पणी है।' राही मासूम रजा कुशल कथाकार हैं वे अपनी कहानी को बड़े करीने और मौलिकता के साथ नियोजित करते हैं । किस्सागोई मे वे बडे दक्ष हैं यदि उनके उप यासो मे थाडी सी भावुकता और थोडा सा रोमास होता तो वे हिंदी के इतने लोकप्रिय कथाकार होते कि विमल मित्र जसो को कोई पूछता नहीं। यह इमरजेंसी और उसके बाद की राजनीतिक स्थिति पर करारा व्यग्य है, जिसका जोड मिलना कठिन है। इस व्यग्य की धारा ने 'क्टरा बी आज' को महत्वपूर्ण उपयास बना दिया ह । इस उपयास मे रोचक सवादो की भरमार है । सवादा की रोचकता राही को अपनी शैली का चमत्कार है । बात कहने की उनकी अपनी अदा ह। इसकी भाषा इन पात्रो की जिदगी का, उनके पूरे व्यक्तित्व का पर्याय हो गयी ह । इतनी अटपटी, हिदी व्याकरण की दष्टि से बेतरतीब अपभ्रप्ट शब्दो से युक्त भाषा को इतना व्यग्यपूण, अथवान व्यजना. युक्त और सटीक सजनात्मक बात भाषा बनाना राही जैसे प्रतिभा के ही बूते की बात है। एक ओर समीक्षक उनकी सफलता बता रहे हैं तो दूसरी ओर जुग- मदिर तायल इसे एक असफल रचना घोषित करते हुए कहते हैं- आपात- स्थिति के तनाव भरे वातावरण मे बुलडोजर ड्राईवर मकान तोडते समय अपने साथ ट्राजिस्टर भी रखते थे, यह विश्वसनीय नही लगता है । 'कटरा बी आजू' मानवीय पीडा या जिजीविषा का मार्मिक चित्रण करने वाली रचना नहीं बन पायी है, आपात स्थिति के अत्याचारो का नाटकीय चित्रण करन वाली रचना हो गयी है । अनेक स्थानों पर अति नाटकीयता के कारण यह कृति संवेदना जगाने के स्थान पर खीझ और झुझलाहट भी उत्पन्न करती है। इस तरह समीक्षकों ने उप यास के सदभ मे अपने कथन कहे । निष्कपत यह कहा जा सकता है कि मानवीय सवेदना, आजू ओ, आपातकाल के अत्याचाराका यथाय चित्र प्रस्तुत करने मे रजा सफल हुए है। महाभोज कथासार मनू भण्डारी ने 'महाभोज मे आपातकाल बाद कांग्रेस की पराजय १ गोपालराय, शिविरा दस्तावेज २, सन् ८१, पृ०८ २ हरदयाल, समीक्षा, माच अप्रैल ७६, अक ११ १२, पृ०२७ ३१ ३ गोपालराय, समीक्षा, माच अप्रैल ७६, अक ११-१२ ४ हरदयाल, वही, पृ० २५ ५ गोपालराय वही, पृ० ३२ ६ जुगमदिर तायल, वही, पृ० ३४ ७ जुगदिर सायल, समीक्षा, मार्च-अप्रैल अक ११-१२, पृ० ३४ । । और जनता पार्टी के शासन काल के समय यो उपायाम का आधार बनाया है। यह मनू भण्डारी या 'आपका वटी' के बाद या व उनका दूसरा उप यास है । 'महाभोज आज के राजनीतिक जीवन में आयी हुई मूत्यहीनता, तिकडमवाजी, शतानियता और सडाघ का चित्रण करने वाला उपन्यास है। आज की राज नीति ने जीवन का अथहीन और विषाक्त बना दिया है। इसी पूजीवादी व्यवस्था न राजनीति को पूणत ध्रप्ट और दूषित बना दिया ह । मनू भण्डारी ने महाभाज मे इमो राजनीति का वणन किया है।' 'महाभोज यथाथवादी उप यास है । इसम विसेसर की हत्या और उसस जो लोग राजनीतिक लाभ उठा रहे है उसका वणन किया गया है। दिसेसर जिसकी हत्या कर दी जाती है । हत्या के कुछ दिनो बाद चुनाव होन वाले हैं। बिसेसर का गाव सुकुल बाबू के चुनाव क्षेत्र मे साता है। ये भूतपूर्व मुख्यमत्री हैं और काग्रेस के टिक्ट से चुनाव लड़ रहे है । उनका लखन से सीधा मुकाबला है, जिस तत्कालीन मुख्यमत्री दा साहब का समथन प्राप्त है । लखन दा साह्य के सम्मुख हत्या का आरोप अपने ही गुट के सदस्य जोरावर पर लगाता है और उसे भय है कि यही बात उसकी पराजय का कारण बन सकती है क्योकि बिसू हरिजन वग से सम्बधित था। इस बात को लेकर उसम और दा साहब में बहस होती ह, वह उस ममय जावेश में आ जाता है तो दा साहब उस नम्रता से समझाते हैं। आवेश राजनीति का दुश्मन ह राजनीति मे विवक चाहिए । विवेक और धीरज ।' उधर सुकुल बाबू विसू की हत्या का ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। वे दा साहब से पहले विसू के गाव मे सभा करना चा ते हैं और जल्द से जाद उ हाने सभा का आयोजन किया लेकिन बिसू का बाप होरा शहर जा चुका होता है । हीरा के न हान के कारण उनका आना सफल सिद्ध नहीं हुआ । दा साहब ने दत्ता का सरकारी विज्ञापन, कागज का डबल कोटा देकर उसके पत्र 'मशाल' को अपना राजनीतिक हथियार बना लिया और दूसरी तरफ त्रिलोचनसिंह दा साहब के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा था। उसे विश्वास था कि वह जल्द ही विधान सभा म दा साहब के विरुद्ध अविश्वास रखने वाला है और उसमे विजयी हागा । लेकिन दा साहब ने विरोधी विधायको का महत्वपूर्ण पद देकर निलोचन का स्वप्न भग कर दिया। अब दा साहब जल्द से जल विसू के गाव म सभा करने की योजना बनाने लगे। उस गांव मे उहोने घरेलु उद्योग या नना का प्रसार किया । उनकी सुरक्षा का समुचित व्यवस्था की। मता विसू के पिता होरा से लघु उद्योग योजना का २ गोपाल, समीक्षा, अक्टूबर टिमम्बर ८०, अक्-४, पृ० ३२ ३ गोपाल राय, शिविरा दस्तावेज २, सन् ८१, पृ०६ . १ मनू भण्डारी, महाभाज, पृ० १८ उद्घाटन कराके उसका हृदय जीत लिया। विदाजा बिसूका दोस्त है वह एक मात्र व्यक्ति था जो समा मै व्यवधान उत्पन करता है । दा साहब एस० पी० सक्सेना को विसू की हत्या के सम्बध मे बयान लेने भेजते हैं तो दा साहब उसे बतलाता है कि वहां पुलिस वाला रवया न अपनाकर उनके साथ उदारता और नम्रता के साथ बयान लिया जाय । दा साहब कहते हैं-~-'देखा सक्सेना किसी के साथ जोर जबरदस्ती या सख्ती न हा, मिठास से पश आआ' लोगो मे हिम्मत और हौसला जगे और वे अपनी बात कह बिना डर के कहें खुल कर मह । गांव वालो को लगना चाहिए कि उहें वालने का मौका मिला है । हमे उन लोगो की विश्वास जीतना ह ।' इस बात को सक्सेना पूणरूप से निभाता है और बहुत से व्यक्तिया से यह बयान लेता है । वह बिसू का केस आमर-हत्या का घोपित कर देता है। गांव वाले इसका विरोध करते हैं तो पुन जाच होती है और पता चलता ह विसू की हत्या विदा और उसकी पत्नी रूक्को द्वारा की गई है। इस उप यास में अनक चेहरे दिखलाये गये हैं जो सत्ता की लड़ाई में लड रहे है । कथ्य विश्लेषण 'महाभोज' मे आज की राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, अनतिकताए, तिकडमवाजी का यथाथ चित्र प्रस्तुत किया है । आज की राजनीति मे धन, गुण्डागर्दी और छत प्रपच का प्राधा य हो गया है । उपयास लेखिका का राज- नीतिक जीवन का अनुभव उसका निजी भागा या उसके बीच मे गुजरा अनुभव न भी हो, उसन उस इस कौशल से प्रस्तुत किया है कि उसमे कही भी अविश्व- सनीयता नही नजर आती है। उपयास मे दा साहब राव चौधरी, सुकुल जी आदि राजनीतिक प्रतिनिधित्व करते है जो तरह तरह वे चेहरे धारण किये सत्ता की लड़ाई लड रह है तो दूसरी आर हीरा, तोचन, एस० पी० सक्सेना व्यवस्था में पिस रहे है । इस प्रकार बुजुआ राजनीति के घिनौने चेहर को बेनकाब करने मे मनू भण्डारी को अपने उपयास म सफलता मिली है।' सबसे खतरनाक शतान यह होता है जो ऊपर से सत दिखता है। दा साहब सत के एक नही अनक चहर एक पर एक घढाये रहते हैं, जिसके नीचे उनकी शता- नियत पुलकर खेलती है।दा साहन की सफलता का यही राज है। मनू भण्डारी उपयास लेखन की दिशा में अपन बनाये प्रतिमानो को लापन मे सफल हुई है, फिर भी 'महाभोज' निश्चय ही एक 'अच्छा' उप यास है, यानि १ मनू भण्डारी, महाभाग, पृ०६७ २ गोपाल, समीक्षा अक्टूबर दिसम्बर ८०, मक-४, पृ० ३२ ३ गोपालराय, शिविरा दस्तावेज २ सन् ८१, पृ०६ ४ गोपाल, समीक्षा, अक्टूबर-दिसम्बर ८०, अक-४, पृ० ३२ इस उपयास को दोगरा पड़ा ना रापता है। उपायारारे अनेक स्परत पाठर को मोरने मे सपन और रोचपता तो सुर से मत सर यनी रहती है। इसमें घटना एक दूगर रो जुटी हुई है जो पाठप को पूग उस याग पड़ा यो विस परती है जग विगू को हत्या गा रहस्प स स स या रहता है । इसलिए पहा जा साता है कि महाभोज पाठर को गुरूस मत तर पड़ने को विवश पर देता है। जगल तत्त्रम् कथासार 'जगलतमम्' यास मे जानवरो यो प्रतोर बनाकर सेघर ने आज की राजनीति और ममाज म व्याप्त प्रप्टानार, रिश्वतखोरी, चोर बाजारी आदि शोपणो को जानवरो के माध्यम से प्रस्तुत किया है तथा आज की राजनीति मे नताओं द्वारा भाषणा मे आश्वासन देने की प्रक्रिया या गुदर चित्र प्रस्तुत पिया है । समीक्ष्य उपयाग म सिंह राजनेता' मोर प्रशासक' नाग 'पूजीपति' चूहा 'आम आदमो का प्रतीक और लोमही भालू, टिपरली, भेडिया जनता के प्रतीप हैं । प्रस्तुत उप याम म यानादी के तत्पश्चात पच्चीस यों की कथा को पच्चीस रातो की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रमुग चार न तुओं के माध्यम से लेखक ने आज की राजनीति के तहत चलने वाली तथायित लोक- तात्रिक शासन प्रणाली मे यथाथ चित्रावन मे भारतीय राजनीति के परखचे उडाये हैं । नाग पूजीपति का प्रतिनिधित्व परता है। जिसके जाल में छटपटाते हुए आम आदमी का वणन उप याममार ने किया है। एसी ही स्थिति आज की शासन-व्यवस्था मे है। आम आदमी पूजीपतिया के जाल में फसा हुआ है, वे उनका खून चूसन में कोई कसर नहीं रखत। आज की राजनीति मे नेता और पूजीपतियो मे किस तरह गठनधन बैठ जाता है उसका ययाय चित्र लेखक ने खीचा है । लेखक यह कहानी नानी के माध्यम से बच्चा के सामने प्रस्तुत करता है। जब सिंह मोर, नाग, चूहा एक दूसरे को मारना चाहते हैं तो शिवजी नाराज होकर उहे मृत्युलोक मे भेज देते हैं । यहा आवर सिंह एक जगल का प्रमुख नेता बन जाता है मोर उसका प्रशासक (सलाहकार) नाग पूजीपति और चूहा आदमी (आम) बन जाता है । वहा जगलतसम (प्रतात त्र) को स्थापना कर देता है । आज के पूजीपतियो की सफलला के बारे मे लेखक सिंह के माध्यम से नाग को कहता है- यहा वाणिज्य मे वही सफल होता है जो जहर उगलने की खूबी रखता है और हमेशा दो जुबाना का प्रयोग करता है । इसी कारण मैं तुम्हे वाणिज्य विभाग सौंप रहा है। धन की बात पर सिंह और नाग मे,बहस होने पर सिंह कहता है कि धन के माध्यम से सब कुछ खरीदा जा सकता है तो नाग पूछ बैठता है कि महाराज धन के बल पर गद्दी प्राप्त की जा सकती है । और जाश म सिंह कह देता है क्यो नही । इस भूल का अहसास होने पर सिंह को पछतावा होता है कि उसने ऐसी बात नाग को क्यो कह दी? यह कहकर सिंह चितित हो जाता है और मोर से सिंह सलाह लेता है। इसके बाद सविधान लागू कर देता है। नाग (पूजीपति) की आय पर नियत्रण और कर (टैक्स) लगा दिया जाता है। जब नाग पर प्रतिबंध लग जाता है तो वह मोर से गठबंधन कर लेता है और नाग गर कानूनी कार्य करने लगता है। नाग अनाज और रोजमर्रा की चीजा के दुगने दाम कर देता है । इसके विरोध मे चूहा सिंह के सामने प्रदशन करता है । सिंह को मार और नाग के गठबंधन के बारे में बतलाता है । सिंह चूहे को नाग और मोर के प्रति कार्यवाही करने का आश्वासन देता है । जब मोर (प्रशासक) को इस बात का पता चलता है तो वह चूहे की खातिरदारी करके प्रसन्न कर लेता है । नाग अपन पंसो के बल पर चूहे को अखबार शुरू करवा देता है । अखबार दो भाषाओ जगली भाषा (हिन्दी) और एक मोर भाषा (अग्रेजी) में शुरू होता है। इससे चहे ने आम जनता में जागरण की लहर उत्पन कर दी । वह हर रोज किसी न किसी बिदु को लेकर हडताल, प्रदशन करने लगा जिससे सिंह चिंतित हो उठा। रात को जगलवाणी (आकाशवाणी) से राष्ट्र के नाम सदेश प्रसारित करता है और जनता को जगल में मंगलवाद (समाजवाद) लाने का आह्वान करता है । इससे चूहा प्रसन्न होता है और सिह की प्रशसा में सब कुछ लिख देता है । इससे नाग नाराज होता है और प्रेस बद करने की धमकी देता है तो सिंह चूहे को इस संबंध में कहता है कि वह जिस दित प्रेस बद करेगा, उसके एक दिन ही पहले हम उस प्रेस का जगलीकरण (राष्ट्रीयकरण) कर देंगे । बैंको का जगलीकरण कर दिया जाता है, जिससे नाग सिंह का विरोधी बन जाता है । सिंह चुनाव की घोषणा भर देता है । जव सिंह के पास धन का अभाव हान लगता है तो वह नाग से धन प्राप्त करने का सफल प्रयास करता है । इमरे एवज (बदले) में सिंह नाग को कहता है-'नाग आज से तुम जिस जिस किसी को भी जहाँ भी चाहो जैसे भी चाहो, जब भी चाहो, अपनी इच्छानुसार इस सकते हो।" चुनाव में सिंह जीत जाता है। बाढ और तूफान के आने के कारण सबका ध्यान उस तरफ हो गया। रिलीफ के नाम पर भ्रष्टाचार होने लगा । चूहे ने इस बात को लेकर प्रदर्शन . १ श्रवणकुमार गोस्वामी, जगलतत्रम, पृ० २१ २ वही, प०५६ ३ भारभ कर दिया, इसमे सिंह नाराज हो जाता है । उसके अप्रधार पर प्रतिरघ लगा दिया जाता है । यहा अदालत मे अपील करवे मुकद्दमा जीत जाता है । तभी जगलीस्तान (पारिस्तान) आप्रमण पर देता है और जनना निल खोलकर दान देती है । सना दुश्मन की बहुत सी जमीन पर बना कर लेती है लेकिन सवार समझोता पर दुश्मन की भूमि वापस लौटा देती है । चूहे से सब लोग तग हो जाते हैं तो मिह नाग पाहता है कि चूहे की गिरफ्तार कर ला और यह समाचार निवाल दा दि जेल में प्लग से अनेक फैदो और चूहे की मौत हो गयी है। कथ्य विश्लेषण 'जालतम' उपयास में लखक ने जारो वो प्रतीक मानार आज की रानीति मे व्याप्त भ्रष्टाचारी, रिश्वतपोरी मिलावट, आय व वित्री कर चोरी- तस्करी मूल्यवद्धि आदि बाता को व्यक्त किया है। जगल और जानवरो भी यह स्था उपरी तौर पर बच्चो के लिए लगती है लेकिन प्रतीको पर दष्टिपात करने पर हमारी राजनीनि और राजनेताआ की परत दर परत फ्लई बालकर रख दती है। इस प्रकार उप यासकार न अपन देश के पच्चास साल के इतिहास का पच्चीस रातो के माध्यम स व्यक्त किया है। पच्चीस वर्षों के इतिहास के पपाथ कर ऐसी स्वाभाविय, सहज, सरल भाषा शती म मायक, प्रतीकात्मकता के जाद्यपात निर्वाह के साय व्यक्त किया है कि देश का पूरा नशा सजीव हो उठा है। महामहिम प्रदोष पन द्वारा सृजित महामहिम व्यग्यात्मक शनी मे लिखा हुआ एक राजनीतिक उप याम है । जनता पार्टी के शासन काल को आधार बनायर इसकी रचना की गई है । इस उपन्यास म लेखक ने आज के राजनीतिज्ञा के चरितहीन चरित्र को उनागर करने का प्रयास किया है । आज की राजनीतिक स्थिति पर देखक कामात य है- हम में से कोई भी न तो राजनीति से बच सकता है और म हो राजनीति युरो चीज है । लकिन राजनीति का इस्तमाल व्यापक मानवीय हितो के लिए न इसे निजी स्वार्थी जाड-तोट, साम्प्रदायिकता का जहर फैलान और मत्ता ये दुरुपयाग के लिए करना दुरी बात है । यह सिद्धातहीन और अमा- नवीय रागनाति है । यह व्यग्य उप यास एक प्रकार से सिद्धातहीन और अमा १ बजनापराय, समीक्षा, अक्टबर दिसम्बर १९८०, १०३८ ६७ नवीय राजनीति के प्रति विरोध प्रदर्शन ही है ।" भाग की राजनीति के छुटभैये गुट भये और टुच्चे लोग भी नता बन जाते है । उपयास मे धणित राज्य की राजनीति का वणधार केद्रीय मंत्री श्री चद्रिका प्रताप सिंह है। राज्य की राजनीति इही के इशारो पर चल रही है। जब मुख्यमत्री बनाने या प्रसग आता है तो व अपने चमचे लुभावनसिंह को बुलाकर पूछते हैं-'तुम्ही बताओ नुभावन, विसे मुख्यमत्री बनाए।' और लुभावन जानना चाहता है कि वे किस तरह वा व्यक्ति चाहते हैं । तर मत्री चन्द्रिका प्रताप सिंह वहत हैं-'जितने एम० एल० ए० चुने गए हैं सबकी इमेज खराब है। इसलिए ऐमा आदमी लाओ जिसकी कोई इमेज हो न हो। न अच्छी न बुरी यानि ऐमा आदमी जो क्सिी पद पर न रहा हो।' और लुभावन मुख्यमत्री की खोज मे लग जाता है । लुभावन न मत्री है और न ही एम० एल० ए० । फिर भी वह सरकारी बगले मे रह रहा है, जिस उसन तिकडम भिडा कर अपने नाम एलाट करवा लिया था। चन्द्रिका प्रताप सिंह के व्यक्तित्व के बारे मे लेखक बताता है कि यो ता चन्द्रिका प्रसाद आनी ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध है । वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में क्सिी का काम नहीं करते हैं लेकिन यह सिद्धात उनके रिश्तेदारो पर लागू नही होता है। इस तरह वद्रिका प्रसाद को राजनीति भाई भतीजावाद पर आधारित है । लुभावन सिंह बद्रि प्रसाद के पहन पर मुख्यमत्री को साज में लग गया है।। तोताराम नाम का व्यक्ति सुबह सुबह उसके घर आता है, किसी रिश्तेदार का मडिकल कालेज में एडमीशन करवाने हेतु । लुभावन को ताताराम मुख्यमत्री पद के लिए उचित नजर आया। ताताराम ने न तो पचायत का चुनाव लडा, नरिसी ब्लाक का प्रमुख और न ही नगरपालिका का चुनाव । द्रिका प्रसाद जिस तरह का मुख्यमत्री चाहते थे वे सभी गुण ताताराम में समाहित थे। लुभावन ताताराम को चद्रिकाप्रसाद से मिलवाता है और वे उसे मुख्यमत्री बनाने की स्वीकृति प्रदाा कर देते हैं। वे लुभावन से कहत हैं कि इम तोते को जो श द हम रटा देंगे वो ही शब्द रटता रहगा। यह हमार इशारों पर अच्छी तरह से चरा सकता है । जव तोताराम का नाम विधायका के सामने प्रस्तुत किया जाता है तो विरोधी विधायक उसका विराध करते है । व तोताराम के मुख्यमत्री बना। पर सतुष्ट नहीं है। विराधी सदस्य गुप्त वार्ता परते हैं लेकिन सफल नहीं होते । लेकिन बाद मे तोताराम का समथन विरोधी नेता जटाधर शुक्ल के द्वारा ही किया जाता है । हुआ यह कि जब चन्द्रिमाप्रसाद का पता चला कि जटापर शुक्ल तोताराम के विरुद्ध बगावत करने वाला है तो १ प्रदीप पत, महामहिम भूमिका, पृ० ६ २ प्रदीप पत, महामहिम, पृ० १३ उसके समथर सदस्यो को अच्छे विभाग और मत्री पद प्रदान कर अपनी ओर कर लेता है जिसके फलस्वरूप जटाधर शुक्न अबेला रह जाता है। उसको मत्रिमण्डल मे नहीं लिया जाता है जिससे जटाधर शुक्ल अप्रसन्न हो जाता है। तोताराम जिसने सभी राजनीति की शतरज की एक चाल भी नही सीखी थी, जब मुख्यमत्री की शपथ लेने जाता है तो बिना शपथ लिए ही मुख्यमत्री की सीट पर जा बैठता है। राज्यपाल के आने के बाद भी वह वैसा ही वठा रहता है जबकि प्रत्येक मुख्यमत्री को राज्यपाल के सम्मान मे उठना पडता है। तोताराम वहां पर अजीव गरीब व्यवहार परता है । लुभावनसिंह उसे कहता है कि 'राज्यपाल के आते ही तुम्हे उठना चाहिए । तब तोताराम जवाब देता है कि तो फिर तुमने यह बात पहले क्यो नही बताई?" इस बात से अदाजा लगाया जा सकता है कि तोताराम न तो राजनीति जानता था और न ही मुख्यमत्री पद की गरिमा। जटाधर शुक्ल विशिष्ट सदस्य है । वह एक शादी करने के बाद भी अपनी उम्र से पच्चीस वर्ष छोटी च द्रमुखी से फिर शादी कर लेता है । उसका अनेक स्त्रिया के साथ अवध समध है। आवास मत्री जनारनसिंह जटाधर शुक्ल को कोठी खाली करने को कहता है तो उसका प्रत्युत्तर होता है कि अगर तुम कोठी खाली करवाओगे तो मुझे सूखा राहत कोप गबन वाली फाईल को फिर से खोलना पडेगा । यह सुनकर जनादन हत्प्रभ हो जाता है और कोठी खाली न करने को कह देता है। तोताराम मुख्यमत्री बनन के बाद भी अपने रिश्तेदार का मेडिकल कालेज मे भर्ती वाली बात आज के राजनीतिज्ञों की भांति भूल जाता है । तोताराम ने सपूर्ण राज्य मे पूण नशाबदी लागू कर रखी है पर तु खुद शराव का नियमित सेवन करता है । मत्री बाढ के नाम पर किये गए चदे का गबन कर जाता है । जव तोताराम के प्रति विरोध ज्यादा होने लगा तो विधान सभा का अधिवेशन समाप्त कर दिया ताकि उसके प्रति अविश्वास का प्रस्ताव न रखा जाय । जटाधर शुक्ल को और शक्तिहीन करने के लिए उसके दो अय मित्र विधायको को मनी पद दे दिया जाता है लुभावन बाढ के बाद ठेोदारो को पुल आदि का ठेका दिलवाकर उनसे कमीशन खाने लगा। ठेकेदार कमच द ठेका कसल करवाकर अपनी कम्पनी को ब्लकलिस्ट मे अक्ति करवा कर पैसा इकट्ठा कर रहा था। वह शहर की नशा- बदी समिति का अध्यक्ष है, फिर भी स्वय शराब का नियमित सेवन करता है। जटाधर शुक्ल छात्रो को उक्साकर आदोलन शुरू करवा देता है। उपकुलपति, मत्री और मुख्यमत्री इस आदोलन को रोकने म असफल होते हैं । इस आदोलन १ प्रदीप पत, महामहिम, पृ.६३ -- का सचालन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रमुख नेता और विधायक स्वामी ब्रह्म- पारी कर रहा था । तोताराम को इस बात का पता चला तो उसे मत्री बनाकर इस आदोलन को समाप्त करवा देता है लेकिन हिदु मुस्लिम दगो को रोक पाने मे असफल रहता है। स्वामी ब्रह्मचारी के प्रयास से दगे बाद हो जाते हैं। तोताराम को मुख्यमत्री बने छह मास होने वाले थे। फिर भी मुख्यमत्री बने रहने के लिए विधायक बनना जरूरी होता है। विधायको की बैठक होती है तमाम विधायक तोताराम के नेतत्व मे विश्वास करते हैं और तोताराम को विधायक बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है । कथ्य विश्लेषण 'महामहिम' मे प्रदीप पत ने जनता सरकार के शासन काल को आधार बनाया है । व्यग्य शैली में उहोने वतमान राजनीति का नग्न चित्र हमारे समभ उपस्थित किया है । लेखक राजनीति को अछूत नही मानता क्योकि बहुत कोशिश करने पर भी उससे बचा नहीं जा सकता । वतमान राजनीति की सिद्धात-हीनता, अमानवीयता एव भाई भतीजावादिता पर लेखक ने करारी घोटें की हैं । यहाँ 'इमेजरहित' व्यक्ति मुख्यमत्री बनाये जाते हैं और उसे पदा सोन न कराने वाले अपने स्वार्थ की तिजोरी भरने में लगे हुए हैं। उनके लिए देश और देशवामी कुछ मायने नहीं रखते। 'यह उपन्यास जनता सरकार के समय पर आधारित होते हुए भी प्रत्येक सरकार पर लागू होता है । क्योंकि सत्ताहीन महामहिमों का इरादा और नीयत जनता का शोषण करना ही रहा है, सिफ चेहरे बदलते रहते हैं । कथा मे प्रवाह और रोचकता है। पाठक मे औत्सुक्य रहता है कि देखें आगे क्या होगा? इन राजनीतिक चेहरो पर पाठ सहज ही विश्वसनीय मुस्कान बिखेर देता है। हजार घोडो का सवार कथासार यादवेद्र शर्मा चद्र का 'हजार घोडो का सवार' उपन्यास दलित वर्ग को ध्यथा, उपेक्षा और सामाजिक स्थितियो का चित्रण करने वाला एक महा. काव्यात्मक उपयास है । 'बीसवी सदी के आरभ से लेकर सन् १६५२ के आम चुनाव तक की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थितियो का बेबाक और यथार्थ पूर्ण चित्रण इस उप यास मे मिलता है।" उपयास मे तत्कालीन समाज में १ सुरेन्द्र तिवारी, सचेतना (पत्रिका) यथाथपरक दो आचलिक उप यास निबध से उद्धृत, पृ० ५५ बेरोजगारी, सूदखोरी, जातीय अत्याचारो एव सामाजिक अत्याचारो का मार्मिक चित्रण हुआ है। उप यास का नायक गीषू मेधू चमार वा सबसे बडा लडका है जो जूती गाठने का काम करता है । गीधू बडे जीवट वाला आदमी है । चमार होने के बावजूद उसे हिम्मत साफ गोई अयाय के विरुद्ध आवाज बुल द करने के गुण उसे अपने पिता से मिले हैं। मानवता घम निरपेक्षता, समानता और स्वतत्रता के बारे में उसके विचार नातिकारी हैं। मधू चमार जूतिया बनाकर अपने परिवार का पालन पोषण करता था। उसके परिवार मे गीधू के अलावा पत्नी होरी पुत्र कालिया और पुत्री पूदडी थी। शोपित वग का होने के कारण मेघू अपने बच्चो का पटाना तो दूर की बात उह अच्छी तरह से शिला पिला भी नही सकता । सामती व्यवस्था शोषण धम, ईश्वर पूजीवादी यवस्था ऊच नीच मामाजिक रूढिया असमानताओ का विरोध रूपी मा यताओं पर गोधू के प्रातिकारी विचार रखने वाला पात्र है। बाल्यावस्था मे दी गीध महाणा (मजदूरी)करने भी चला जाता था। उसके प्रातिकारी विचार वचपन से ही दष्टि गत होने लगते हैं । जब उसका दोस्त जमन धुर्ज पर दीया रखते वक्त गिर जाता है। घटना स्थल पर ही जमन को मत्यु हो जाती है तो वह वहा काम करना छोड आता है । मेठ मोहन का बेटा गणेश अपने यहां काम कर रही मलमी की गरीबी का नाजायज फायदा उठाकर उसके साथ अनैतिक सबध स्थापित कर लेता है । ममय तेजी के साथ चलने लगा। गीध का विवाह चाडामर के मेघवाल शिवराम की बेटी जानकी के माथ हो जाता है। ठाकुरो ब्राह्मणो बनियो व उच्च वग के लोगो के तथा सामतवादी अ याय अत्याचार के क्ट अनुभव भी उमने प्राप्त कर लिए हैं, तभी वह मानवतावादी अगरजिया बाबा के मम्पक मे आता है । यह एक फवड मत है और उस घोर मामती व्यवस्था के भीतर ठाकुर को चमार के हाथ का और ब्राह्मण को भगी के हाथ का छा पानी पिलाने मे जरा भी नहीं हिचकता है । स्वय लेखक के शब्दो मे-'अगरजिया यानि अलमस्त वह जिन्दगी मे बडा अलमस्त है पर विचारो में गभीर ताक्य व मानवीय सवेदनाओ का भरा पूरा पाय है वह इ साता के बीच, एक्ना ममता और भाई चारा का उदघोष करता है वह ईश्वर को मानता है पर आदमी के भीतर वह जाति धर्म, रग भेद के सख्त विरुद्ध है। वह कहता है कि जिस भूमि पर केवल जाति धम और ऊच नीच रहते हैं वहाँ आदमी कैसे रह सकता है ।वह आदमी मे गलत ढग से भेद करने के सख्त विरुद्ध है। इससे बड़ा दुखी है । वह भूरा को घम का आधार मानता है भूख ही हर धर्म की असलियत को बता देती है। वह अछूतो का लडने भिडने की १ यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र सारिया (पाक्षिक) मेरा प्रिय पात्र' लेख से उदधृत १ मई १९८२, पृ० २७ - ७१ प्रेरणा देता है, बेसहारो को सहारा देता है। इसीलिए सामतवादी और रूढिवादी लोगो के हाथो मारा जाता है । गीधू अलगरजिया बाबा को गुरू मानता था और उनी हत्या के पश्चात एक म अमहाय और कमजार हो जाता है। शाति और समानताको योन मे वह घर छोडकर साधु वा जाता है। हरिद्वार के आश्रमो मे धम की आड मे हो रह अनाचार एन अत्याचार "खता है। उस इस जीवन से विस्तृष्णा हो जाती है और वहां से भाग आता है। पुन अपने शहर बीकानेर आ जाता है। शुभ होता है वही सामनशाही अत्याचार, अस- मानता और जीविका का सघप । ठाकुरो मे झगडा होने पर भावलपुर भाग जाना और वहा हिदुओ को जबरदस्ती मुरा मान बनाने का विरोध करने के फल- स्वरूप स्वय की जान बचाने की खातिर पुन बीकानेर आ जाना। इस बार सेना मे भर्ती हुआ । सैनिक बनकर वह उत्तर पश्चिम सीमाप्रात, मेरठ चटगाव और जबलपुर गया। सेना से छटनी होने पर पुन वीकार की शरण में जाना पड़ा। उसने युकना स्वीकार नहीं क्यिा था । वह समूचे समाज और उसकी सडी गली मा यताओ के विरुद्ध लडने को सदैव अगुआ रहता है इसलिए उसे पग पग पर परेशानिया उठानी पडती हैं । अपनी मां हीरी की मृत्यु पर वह औसर नही करना चाहता पर समाज के दबाव के कारण उसे मजबूरन औसर करना पड़ा। 'सामी' के घर भोजन करके वह स्वय को दोपी नही मानता लेकिन पत्नी और समाज के दबाव में आकर दण्ड स्वरूप उसे पचायत का भाजा कराना पड़ता है। पचो के जूते तक को मिर पर रखता है । घुटता और परेशान होता है इही परिस्थितियों में वह जूझता रहता है और देश आजाद हो जाता है । गीधू गिर धर गोपाल बनकर ससद का सदस्य बन जाता है। समद राजनीति नई जिम्मेदारियां नया रहन सहन, दिखावा लेन देन द्रासफर की राजनीति सत्ता हथियाने के लिए गठपधन स्वार्थी तत्त्वो द्वारा उसे अपने जाल में फसाने की कोशिशें की जाती हैं | गोधू की घुटन तडपनाबढती जाती है और एक दिन कुटिल राजनीतिज्ञो के घात-प्रतिघात मे गोधू कुछ हरिजनो को उनके यायपूण अधिकार दिलाने के लिए सघष करता हुआ शहीद हो जाता है । उपन्यास मे तत्कालीन समाज मे बेगार प्रथा, सूदखारी जातीय अत्याचार एवं सामाजिक अयाय का मार्मिक चित्रण है। कथ्य विश्लेषण यादवेद्र शर्मा च द्र ने राजस्थान को ऐतिहासिक और सामतवादी पप्ठभूमि पर कई शक्तिशाली रचनाए लिखी हैं। उहोने सामतवादी के शोषण और किसान, मजदूर एव हरिजनो ये पीडन को भी निकट से देखा है और अनुभव किया है । यही कारण है कि उनकी रचनाओ के चित्र इतने स्पष्ट और पैने हैं।' १ नवीन चद पत, जाजक्ल, नवम्बर १९८२, पृ० A ४५ ७२ श्री चन्द्रमा नवीनतम उप यास 'हजार पोहो का सवार' हिदी उप यास यात्रा पा एक महत्वपूर्ण पडाय है । इस यात्रा में एक छोर पर यदि 'गोदान रखा जाय तो दूसरे छोर पर 'हजार घोडो का सवार' म्यत ही प्रतिप्टिन हो जाता है, इसलिए पि सामाजिक उत्सोहन पो जिम वास्तविकता का प्रथम बार 'गादान' मे चित्रित किया गया था, उसी की नवीनतम परिणति हजार घोडा का सवार' मे दृष्टिगत होती है। लेखक के भय उप यासा से भिन्न इस उप यास का परत पापी विस्तत है लेकिन एकाधस्थलों को छोडवर इगये गठन म यही भी हमें किसी तरह का विपरापन नजर नही आता और पाठक की दिलचस्पी को कही भी कम नहीं होने देता। कुल मिलाकर लेखप की सशक्त बलम नै उक्त काल का सही दस्तावेज प्रस्तुत क्या है । प्रगतिशील विचारधारा का उचित माग दशन इस उपयास के द्वारा मिलता है। उन दिना में बीकानेर समाज का चित्र वडा मामिक एव आश्पक है। आचलिक पानों को भापा मारवाडी तथा हिदी का मियण है, पाठको की सुविधा के लिए । वैसे पूणरूप से उनकी भापा स्टाइनबैव, यूजीन, पानील, रेणु और राही मासूम रजा की भांति रखी जा सकती थी । 'हजार घोडो का सवार' एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। 'हजार घोडो का सवार' मे घटनाक्रमा मा गुथाव है, भाषा की जो रवानगी है, स्थितियो का जो मार्मिक चित्रण है, वह इस उप यास को अधिक महत्त्वपूर्ण यनाता है। चद्र जी का यह उप यास एक ऐसे सघपशील व्यक्ति की गाथा है जो वतमान समाज व्यवस्था को मानवीय सवेद नामो को मूल्यवत्ता के परिप्रेक्ष्य मे वग चेतना से मुक्ति के अहसास मे विश्लेषित करता है । 'हजार घोडो का सवार' का फ्थ्य भी सामाय शोपित जन की व्यथा कथा ही है। यह उपयास इसी सदी के पूर्वाद्ध की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विषमताओं और परिस्थतिया का सुदर दस्तावेज बन पडा है । लेखक ने सभी कोणो से इस अवधि के भारतीय जीवन को अभिव्यक्ति दी है और समाज्य वग के प्रति अपनी सवेदना प्रकट की हैं । उपयास की भाषा अत्यत प्रवाही है बीच- बीच मे राजस्थानी के पुट ने भाषा के प्रवाह को बढ़ाया है।' १ डा० आदश सक्सेना, सप्ताहात (साप्ताहिक) ३ जनवरी १९८२, पृ. ३ २ सुरेश उनियाल नया शिक्षक टीचर टुडे, ५०१०१ समाग (दनिक) कलकत्ता, ७ सितम्बर १९८२, पृ० ४ ४ योगेद्र किसलय शिविरा, माच १९८३, पृ० ४५७ ५ सुरेद्र तिवारी सचेतना, पृ०५५ ६ डा. देवेश ठाकुर ब्लिट्ज (साप्ताहिक), ८ जनवरी १९८३, पृ० १२ दारुल शंफा लिये पानालये कथासार 'दाग राजनतिमा के सत्तालोल बीकानेर अवमूल्यन का बच्चा चिटठा खालने वाली ययाय परक उपयास है । इसकी कहानी कुछ घटो को है और उसका केद्र है-'दारुल शफा' । दाल शफा ही एक प्रकार से इस उप यास का नायक भी है । 'दारुल शफा' एक स्थान न होकर एक विशेष प्रकार की भोग प्रधान सस्कृति का जीवत प्रतीक है।" वतमान राजनीति में सत्ता के लिए जो क्रूर और घणित काय किए जाते हैं उसका 'दारुल शफा' प्रामाणिक दस्तावेज है। भाज का नेता सेठा, स्मगलरो, पूनी डकैतो के साथ साय युवा वर्ग को सरक्षण देकर अपनी शक्ति को बढाता है। धन के बल पर वह समाज की प्रत्येक व्यवस्था को खरीदने की क्षमता रखता है। एक राज्य मे मुख्यमत्री के पद का चुनाव ही इस उप यास की मुख्य पृष्ठ- भूमि है। इसमे उत्सुकदास और कृष्णबल्लभ का एक गुट है जो सत्ता को अपने अधीन करना चाहते हैं और दूसरा गुट रगीनराय का है जो उत्सुक्दास के मुख्यमत्री बनाने की बात पर अपना विरोध प्रकट करता है। इसके अलावा एक और गुट लोवीराम का है। जिस पर दोनो गुट अपना प्रभाव बतलाते हैं। लोबीराम को जो गुट अधिक धन दिखला देता है वह उधर ही झुक जाता है । उत्सुकदास गुरुपद स्वामी का शिष्य है। गुरुपद स्वामी कद्र मे गृहमत्री हैं। इसकी आड मे उत्सुक्दास अनक घणित व गैर कानूनी काय करता है । वह लोगो से धन प्राप्त कर उहें मीमेट, लोहा, कोयला आदि के फर्जी परमिट देकर, ठेका दिलवाकर करोडो के बारे ‘यारे करता है। उत्सुकदास के सहयोगी विधा- यक कृष्णाल्लभ के भाई यशोदाबल्लभ एक कामयार सेठ से मिलकर अफीम की पेटिया के नीचे तारो के बडल विदेशी व्यापारी के हाथो बेच देता है। इस ताबा घोटाला काण्ड का विरोधी विधायक विरोध करते हैं | तारा घोटाला काण्ड के चचित हो जाने तथा उसमे उत्सुक्दास का नाम जुडा होने के कारण मुख्यमत्री पद के उम्मीदवार होन की वजह स उत्सुक्दास की स्थिति कमजोर हो जाती है । इम काण्ड की जांच का काम गुरुपद स्वामी की भाभी वाई जी के गोद लिए पुत्र कमठ और ईमानदार पुलिस आफिसर फूलदास को सौंप दिया जाता है । वह यशोदा बल्लम की पत्नी शाति प्रणाली का प्रेमी भी है । वह तौबा घाटाला काण्ड की जांच के दौरान यशोदा बल्लभ तांगो के तार से भरे दो टुव पक्ड लेता है। जिसके परिणाम स्वरूप यशादा वल्लभ अपने १ रामचन्द्र तिवारी, समीक्षा पत्रिका, अप्रेल जून १९८३, पृ० ३६ डकत मित्र दुलभ पाछी द्वारा फूलदारा की हत्या रवा देता है । इस तरह की हत्याएं आज की राजनीति की आम बात है। जब उत्सुक्दास के मुख्यमत्री बनने की चर्चा हुई तो रगीनराय व अय विरोधी विधायकोने इम काण्ड को अधिक उछाता । रत्गुरदाय के साथी यशोत वरलभ के द्वारा फूलदास को हत्या करने के परिणाम स्वम्प पुलिस भी उत्सुक दास की विरोधी बन गयो । मुख्यमत्री या चुनाव नजदीय देववर लावीगम रगीनराय के गुट म शामिल होने की मोचता है लेकिन उत्सुर दास उस विमला देवी के सौदय जाल में फमाकर उसे रगीनराय के गुट में सम्मिलित होने से वचित कर देता है। पार्टी मीटिंग में रंगीनराय को पार्टी अध्यक्ष और कृष्ण वल्लभ को पार्टी की प्राथमिक मदस्यता से निलम्बित कर दिया जाता है। पार्टी अध्यक्ष सभी विधायको से एक्ता रखने की अपील करता है। कथ्य विश्लेषण 'दारल शफा' म मुख्यमत्री के चुनाव को मुख्य आधार बनाया गया है। इस उपन्यास में दर्शाया गया है कि किस तरह राजनेता पैमा के बल पर समाज की प्रत्येक मशीनरी (व्यवस्था) को खरीद लेते है । रामकृष्ण मिश्र का पहला उपन्यास है और वह भी राजनीतिक उप यास । आज की राजनीति में उखाड पछाड की घटनाओ के साथ साथ राजनीतिर जीवन मे याप्त अनुचित सक्स सम्बधो और चारितिक नैतिक विकृतियो को भी उप यासकार ने उजागर किया है। जिसमे गुरुपर स्वामी और बाईजी का सम्बध शाति प्रणाली और फलदास, लोवीराम और लक्षमनिया का सम्ब ध, उत्सुक्नाम का विमला देवी और प्रतिभा का सम्बध जिमम आज की राजनीतिक जीवन का विकृत व घणित चेहरा देखा जा सकता है। उप यास की भाषा सरल सुबोध और वोधगम्य लेकिन लम्बी घटनाएँ सवाद बीच बीच मे बोरियत पटा करते हैं। 'उप यास की घट नाएँ क्याTक मौलिक और यथाथ लगता है न कि कपोल कल्पित। दारल शफा' आज की जि दगी का असली दस्तावेज है।" समय शब्द भर नही है कथासार छोटे उपन्यासो की परम्परा मे एक और उप यास प्रकाशित हुआ, धोरेद्र अस्थाना का उप यास 'समय शब्द भर नही है जिसमे आज के युवा वग मे जन आ दोनन की भावना या युवा पीनी का नक्सलवादी आदोलन और सत्ता के अधेपन को दिखलाया गया है। क्थानायक भवन विशोर जिसका बचपन का श्रीलाल शुक्ल, उप यास के पलेप से (क्वर) उदधृत - १ नाम टेकवाद था जिसे उनके घर घाला ने रपा गा। उसे इस सडियल नाम टरच द में उतनी ही नफरत है जितनी पदधारी काग्रेसी से, इसलिए उमने अपना नाम भुवन रख लिया है, भुवन विशोर । री०ए० करने के बाद उसके विचार पर वालो से मेल न खाने के कारण वर सविधा सम्पन पर को छोड- पर हमेशा के लिए चला जाता है और तर भी नही लौटा जर उसके पिता को किमी नक्सलवादी ने निममता के माथ खत्म कर दिया । उसया अपने परि- वार के प्रति इतना आक्रोश था कि उसके पिता ह यारो के प्रति प्रतिहिंसा तक के भाव भी नहीं उभरे। उन उमरे एक नवमलो दोस्त को गिरफ्तार कराया जिसे जेल में इतना अमानवीय “यवहार और अयाचार किया गया कि वह मर गया। घर को छोडकर वन देश की राजधानी गया और वहां नवमली आदोलन मे शामिल हो गया। उमन नौकरी भी की कितु पौववें महीने बाद निकाल दिया गया। फिर चार वप एक बडे प्रेस मे प्रफ रीडरी करके और अमरिकन लाइनरी में अध्ययन परके बिताये। ये वक्त उमने भूप टण्ड गर्मी और कुष्ठाओ के पासदापी दद के साथ बिताये। फिर उसने हिन्दी और दशन म एम०ए० किया। इन दिना मे फुटपाथ की जिनगी के साथ उसका नजदीको रिश्ता कायम हो गया। मेरठ रहा, फिर अध्यापक बना। इसके बाद भुवन क्लात्ता चला जाता है। कलकत्ता । राजधानी में लाल किले पर नार झडा लहराने की तमना रखने वाले नवमतवारी, शान्ति कारिया का केन्द्र स्थल । यहाँ वह एक साप्ताहिक मे महायव मम पास्ट पर नियुक्त हो गया । जहाँ उसफा सगीत बनर्जी नाम की रोमाम (प्यार) कर बठता है। वह उससे जल्द ही शादी में (सगीता) किसी बात पर नाराज होकर क्लबत्ते सत्र उसने उपयास लिखने आरम्भ कर दिये । उमrat एक छपने से वारण वह एक प्रतिष्ठित स- तीसवें साल और मताईसवें शहर नैनीतु zzrr m दह अपन अय नक्सलवादी दोस्त मागू, मदान कर जाता है।

इसी आदोलन के दौरान भुवन विशोर को अपनी प्रेमिका सगीता बनर्जी मिल जाती है और मावेश में आपर उसपी पिटाई कर देता है। फिर उसे अपने किये पर पछतावा होता है तथा संगीता से प्यार मरा वादा करता हुआ रहता है-'तुम्हारे प्रीि कोई नपरत मेरे मा मे नही है। मैं आज भी तुम्हें उसी शिद्दत मे प्यार करता हूँ। प्यार की इस गर्माहट और गहराई वो मैं सभाले रहूँगा और तुम्हारा इतबार गगा। तुम याना तुम जरूर आना।" भुवन सगीता या कधा दबावर जुलूम की ओर चल पाता है, जहां पुलिस की गोलियां चल रही थी। कथ्य विश्लेपण इस उप यास में सती आदोलन ये कारणो एक मूल सोत को टटोलने या प्रयत्न किया गया है। उप यास भी घटनात्मपता और विवरणात्मयता में भी मन पा छा वाले अनुभवा से लैस यह कृत्ति है। उप यामकार ने अपने समय की चेतना और विचारो की चमक रचना मे पंदा पो है, वितु शिल्प के स्तर, भाषा के स्तर पर यह कृति कोई अधिा प्रभाव नही हाल पायी है। राजकुमार गौतम इम उपायाम के सम्घ लिगते हैं-'समय शल भर नहीं है' किमी वाद विशेष की सिफारिश 7 करते हुए भी मच वे उग महत्व को साफ करता है जो उमकी जन चेतना के लिए मबसे बड़ी जरूरत है।' डा० दवेश ठाकुर को इस उपयाम के सम्म धम ऐमी राय है। वे पाते हैं---'नवमलो आ दो- लन पर 'समय शहर भर नहीं है' सभवत हिंदी मे लिखी गई अपनी तरह की पहली रचना है जिसमे नक्मलवाद को इतना स्पष्ट समथन किया गया है।" शान्ति भग कथासार 'मुद्रा राक्षस' । उपयास 'शाति मग' आपातकाल के तीन माल के घणित इतिसास पर आधारित है। यह उपयाम मनुष्य की सम्पूण मानसिकता को उदघारित करन का लक्ष्य रखवर चलता है। यह वह मनुष्य था जो पीडित था। अत्याचार का शिकार या अमतुष्ट और क्रुद्ध था, पर तु भीषण रूप से आतक्नि था। पेशेवर राजनीतिनो ने उसके चरित्र बल को ही ठित नही कर दिया था उसकी जीवनी शक्ति को भी समाप्त कर दिया था। आपातकाल के १ धीरेद्र अस्थाना, 'समय शब्द भर नहीं है, प० ७६-८० २ राजकुमार गौतम, उपन्यास के क्वर से उदधत ३ डा. देवश ठाकुर, मचेतना, प०१३ ७७ जीवन के इस रूप की आवेगहीन रपट प्रस्तुत करने वाली यह रचना निश्चय ही एक उपलब्धि है। उप यास की क्या एक मोहल्ले पर केंद्रित है । इस मोहल्ले का नाम सराय दुर्विजय है । यह एक मिनी भारत के समान है । यहाँ के निवासियो की मान सिकता आम भारतवासी की मानसिकता को उदघाटित करती है। यहा स्कूल गडहिया वाला है, जिसके अध्यक्ष नदकिशोर हैं जा हिदी पढाते हैं । यहाँ की महिलाएं अपना काय समाप्त कर महिला मण्डल की सभा का आयोजन करती है। इस महिला मडल की सभी सदस्यो का काम अवकाश के समय मे दूसरे घरो के रहस्यो पर रसपूण चर्चा करना है, भले ही उनके स्वय के परिवार मे बसे ही रहस्य पल रहे हैं । यहाँ परे रहते हैं जो रेलवे मे गाड के पद पर कायरत हैं । मुशी जी विरोधी दल से सो धत हैं । आपात् की घोषणा होते ही उनको गिरफ्तार कर लिया जाता है। खरे ड्यूटी पर अपमानित हुए और आत्म- सम्मान की रक्षा के प्रयाप्त मे विस्फोट मे मृत्यु के ग्रास बने । लाला बुदनमल रस्तोगी जनसघ के अच्छे व प्रभावशाली नेता हैं इनको भी आपातकाल के कारण गिरफ्तार कर लिया जाता है। इस सराय में एक और महत्त्वपूण व्यक्ति रहते है वे हैं हरिराम वद्य । इनकी बडी पुत्री सतो का दहेज कम देन के कारण उसकी ससुराल वाले मारकर घर से निकाल देते हैं और वह फिर वैद्य जी के घर आ जाती है। वैद्यजी पानी मे रग और विशेष प्रकार की गध मिला कर बेचने हैं, यह बात सभी घर वाले जानते है । मुशी जी एक बार मच पर भाषण दे रहे थे ता एक औरत अपने हाथ में बच्चा लिए मच पर आती है और उनके चरणा गिर जाती है तथा चिल्लाती है कि ये मेरे पति और इस बच्चे के पिता है, मुझे और बच्चे का छाड भाग आय है । मुशी जी समझ जाते हैं कि यह चाल उसके विराधियो और त्रिलोचन पाडे की ही हो सकती है। अत यह बात देखते हुए वे उस स्त्री का अपने घर ले आते है । खरे के बड़े बेटे का नक्सलवादी कहकर पुलिस पकड कर ते जाती है, वह जेल से भागने सफल तो हो जाता है लेकिन उसे पुलिस की गोलिया का शिकार बनना पड़ता है और मृत्यु को प्राप्त होता है। नदकिशार आपात्काल के समथन की रला में अपने स्कूल के बच्चों को ले जाता है । नसबदी का जबरदस्ती के साथ प्रचार किया जा रहा था। नसवादी इधर यकायक जैसे एक उद्योग बन गयी थी । एक तरफ बहुत से लोगो ने प्रेरणा के नाम पर कमाई शुरू कर दी, दूसरी तरफ नसब दी से बचने के लिए अस्थायी रूप से जल्दी- जल्दी घूस की दर भी तय हो गयी। निश्चित घूस देकर नसबदी से बचा जा १ डा. आदर्श सक्सेना, समीक्षा (पत्रिका) अब १, अप्रैल-जून ८३ अफ, पु० २० ७६ सरता था।' दुर्गा Tोडी वाया जिसपी बाजार म पचौड़ी यो दुकान है। नसबदी या पर उसम और पत्नी म बहस होती है जिसरी कौन पराये । निश्चय हाता है कि पत्नी की रावती कराई जाय लेयित आपरेशन सफल न होने के पारण यह मृत्यु पा प्राप्त होती है। सरकार की नीतिया ये साथ सह्याग परोसे प्रयास में वचारे दुर्गा पौडी वाले को अपनी पत्नी वा सय दो की भेंट चढानी पड़ी और सय राजी रोटी वमान के अवसर नृशसतापूवर छीन लिए गए। तदपिशोर पर जबरदस्ती नस व दी करने का प्रयास किया जाता है । वह सब दी करवाना नहीं चाहता था। नसब दी का प्रमाण पत्र पश परन कारण उस नौररी सनिलम्बित कर दिया जाता है । सराय व गरीब और निहत्य घसीटे वा भरे बाजार मे डाकू अभियान के नाटक म गोनी से उड़ा दिया जाता है, उसकी लाश प्राप्त करने के प्रयास मे रुक्की का पुलिस के बहशीपन का शिकार होना पडता है । यही नहीं फटीचर कवि मधुर जी के आत्म सम्मान को कुरेद कर व्यवस्था ने उह पहले भीषण प्रतिरोध के लिए विवश किया और अपमान और कारावास की दारुण यत्रणा का पात्र बना दिया। मुशी जसे देवता लागा का भी इस भ्रष्ट व्यवस्था ने नही बरशा। इदिरा गाधी नापावाल हटाकर चुनाव की घापणा कर देती है। त्रिलोचन पाडे चुनाव हार जाते हैं, पडित सदाद मुख्यमत्री बना दिया जाता है। 'अपने सशक्त चिनण के कारण य पात्र उपयास की आत्मा बन जाते हैं। नद किशोर का उम्मीद बन जाती है कि उसके केस पर पुन विचार होगा लेकिन उस निराशा का सामना करना पडता है । सदान द पर कातिलाना हमला होता है जो कवि मधुर जी के द्वारा किया जाता है । इस तरह शाति भग' उपयास मे मुद्राराक्षस ने एक सराय का कदि दु बनाकर आज के मनुष्य की मान सिकता, आजुभा, तिकडम, भ्रष्टाचार, आपातकाल का भय, जबरदस्ती नसबदी का प्रचार आदि अनेक निगिनत समस्याओ को हमार समाने रखा है। कथ्य विश्लेपण मुद्राराक्षस का उप यास शाति भग जापालाल के जीवन की विभीपिका का पूर्वाग्रह मुक्त पर तु मार्मिक जाकलन प्रस्तुत करने का साथक प्रयास किया गया है यद्यपि इसम इतिहास कही नही है, पर तु वह सब जो उन तीन वर्षों के मुद्रा रा स शाति भग ५०७६ २ डा० आदश सक्सना समीक्षा (पत्रिका) जाल जून, अक १, ५० २१ ३ वही, प०२१ ४ वही, प० २२ ७४ घणित इतिहास का आधार है। साथ ही इहोने आज के राजनीतिज्ञा के चरित्र एव भ्रष्ट राजनीति का उद्घाटन करने का भी प्रयास किया है। 'शाति भग आपात्काल के जीवन के इस रूप की आवेगहीन रपट प्रस्तुत करने वाली यह रचना निश्चय ही एक उपलब्धि है। 'शाति भग' उपयास में कोई क्या विशेप नहीं है। आपाताल म आम आदमी पर पड़ने वाली मार का विवरण है, जो अनेक आदमी को पीडा को अलग अलग चित्रो मे उभारा गया है। इसमे घटनाएँ एक दूसरे से सबधित होकर चलती हैं । भाषा सरल और सुबोध तथा लेखक न करपना का सहारा लेकर उपयास को यथाथ रूप दो का प्रयास किया है। डा० आदश सक्सेना का मत है वि-फिर भी यह उप यास राजनीतिम उपयास नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक उप यास है जो समाज के राजनीतिक उत्पीडन की क्या कहता है । इस उत्पीडन के दशन का वापर बना है।" शिल्प की सहजता तथा विवरणो को प्रामाणिकता के कारण यह उपन्यास निश्चय ही आपात्काल के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप मे याद रखा जायेगा। प्रजाराम कथासार प्रस्तुत उप याम की पृष्ठभूमि आपात्काल और जनता शासनकाल के छह मास को लिया गया है। इस उपायास म जहाँ आपात्काल के आत, सनास, अत्याचार एव भयावह स्थितियो का चित्रण है वही आपात्काल की उन अच्छाइयो का भी है जिसमे आम आदमी को थोडे समय के लिए राहत मिली थी। उपयास के नायक 'पजाराम के सबध मे लेखक का मत द्रष्टय है-- 'प्रजाराम' कोई नाया विशेष नही है, वह सवथा प्रतीक चरित्र है और तत्कालीन मानसिकता का द्योतक भी है । अत उसे उसी सदभ मे देखा जाय । २६ जून १९७५ का पूर ऐतिहासिक दिन जब प्रधानमत्री इंदिरा गाधी ने आपात्लाल की घोषणा की। उस समय प्रजाराम सिनमा का नाइट शो देखकर बाहर निकलता है तो उसे पता चलता है कि देश में इमरजेंसी लागू हो गई है। इमरजेंसी का नाम ही उपस्थित व्यक्तियो मे भय उत्पन कर देता है । तभी वहा भ्रष्ट इजीनियर आशुतोष आता है तो प्रजाराम उसे बताता है कि १ डॉ० आदश सक्सेना, समीक्षा, अप्रैल जून, अब १, पृ०२० २ वही, पृ० २२ ३ यादवेन्द्र शर्मा चद्र, प्रजाराम, 'मैं इतना ही कहूँगा' से उद्धृत ८० इमरजेंसी लग गयी है यह सुनकर वह अवाक रह जाता है । उसने वाध पर सीमेट की जगह राय, यमीशन एक सौ मस्ट्रोल की जगह पांच सौ मस्ट्रोल लिखा है । अपनी नौकरी के दौरान उमन लाखो रुपयो की आय की। वह बी० नाथ और रामेश्वर को फोन परता है तब रामेश्वर कहता है-'देश मे फल रही अराजक्ता लूट खसोट महंगाई भ्रष्टाचार को रोकने के लिए इमरजेंसी की सख्त जरूरत थी।" आपावाल के समथन में पहले बयान प्रकाशित करने में जुट जाते हैं। बी० नाथ कहता है-~~-'मैं आपावाल ने समथन में एक अपील निकालना चाहता हूँ ताकि हमारी प्रधानमत्री हम अपना खास आदमी समझें।" आशुतोप आपात्काल स इतना भयभीत है कि उस हर व्यक्ति सरकारी जासूस लगता है । प्रजाराम प्रधानमत्री की नीतिया का विरोध करता है तो उस मीसा के अतगत बद करने की धमकी दी जाती है। आपात्काल की आड मे रामेश्वर जसे टुच्चे लोग भी नेता और पूजीपति बन जाते हैं । आशुतोप के घर जब 'रेड पड़ने लगती है तो इसका बचाव रामेश्वर इस तरह करता हुआ उसको कहता है--- ऐसा कि तुम काग्रस फड मे इक्कीस हजार दे दो। और बीस सूत्री कायम पर बुक्लेट छाप कर वटवा दो। इस तरह आशुतोष को राजनीतिक सरक्षण प्रप्त हो गया। इम तरह बीस सूत्री कायम जनता तिए नही वरन प्रधानमत्री एव उनके पुत्र से जुड़े लोगो के लिए वरदान सिद्ध होने लगा। ये सब प्रजाराम की आंखो के सामने घटने लगा। सजय गांधी को राता रात पचहत्तर करोड जनता का राजकुमार बना दिया जाता है। रामश्वर एक स्थान पर कहता है-और सजय महान नेता है हम ही कहते बल्कि ये कितने ही ससद सदस्य अधिकारी, राजनता जोर जन-जन कह रहा है । एक तरह से सारा देश बह रहा है ।" सजय गाधी को खुश करने उसक कृपा पात्र बनने क लिए स्वागत द्वार बनाये जाते हैं तथा नव यौवाए हाथो में मालाएं लिए खडी मिलती हैं तो-'सजय बडी ही छिछोरी नजाकत से मालाएं लोगो पर फर रहा था, विशेषत सुदर चेहरो पर । रामश्वर विदेशी जासूस बन जाता है तारि भारत मे रूसी प्रभुत्व कम पर दिया जाय । आपातकाल मे नसबदी के काय क्रम मे लोग पुरस्कार हेतु जबरदस्ती नसबदी करन लगे, पलेक्टर एम्बेसडर कार लेने हेतु । अखबार भी १ यादवेद्र शर्मा चद्र, प्रजाराम, पृ०७ २ वही, प० १२ ३ वही, पृ० ३० ४ वही, पृ० ५१ ५ वही, पृ०६१ सरकार के रुख की तरह चलो लगे। 'नाजायग बस्तियां साफ हो रही थी, बुलडोजर सुदरता के नाम पर बदसूरत परा के वाशिंदो को उजाड रहे थे।" जनता में मातम ध्याप्त हो गया लेकिन प्रधानमंत्री के निकटस्थ लोग मापात काल को लोगा के लिए वरदान बताते रहे और प्रधानमत्री को विश्वास दिलाते रहे कि सजय देश या महान् नेता हो गया है । बापासाल की ऐसी सपलता देवार चुनाव की घोषणा कर दी और जे० पी० के प्रयासो से विरोधी दल मिलवर 'जनता पार्टी' दे नाम से नये दल था गठन कर लेते हैं। आपातकान दमन चक्र, बबरता, अधिनायक वाद, भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार से क्रुद्ध होकर काग्रेम को हराने मे जनता पार्टी सफर हो जाती है । मुरारजी दसाई भारत के चौथ प्रधानमत्री बन जाते हैं । आशुतोप जैसे भ्रष्ट लोग जनता पार्टी के तदर्थ समिति के वरिष्ठतम सदस्य बन जाते हैं । रामेश्वर आत्महत्या कर लेता है। जनता महगाई के विरोध में प्रधानमत्री का घेराव करती है और उसका नतृत्व प्रजाराम करता है । यह देख प्रधानमत्री प्रजाराम से पूछता है कि तुम नता कब बन गय, तो प्रजाराम कहता है-माननीय मत्रीजी इस देश म लीडर व मत्री बनने के लिए क्या काई लम्बी तपस्या करनी पड़ती है ? जसे आप प्रधानमत्री बने, वसे में प्रधान नेता बन गया। जनता के ससद सदस्य २४ माच १९७७ को राजघाट पर गांधी जी की समाधि पर शपथ लेत हैं और वहां पर दगा हो जाता है । एस० पी० गोली चलाने का आदेश दे देता है और प्रजाराम घायल होकर गिर जाता है तथा भाग जाता है। प्रजाराम अपातकाल की गलत नीतिया का विरोध करता है तब उसे जेल जाना पड़ता है और जनता शासन म भी सही विरोध पर भी उसकी बात नही सुनी जाती है, . कथ्य विश्लेपण यादवेद्र शर्मा चद्र ने इस राजनीतिक उपयास 'प्रजाराम' मे आपातकाल एप जनता सरकार के प्रारभिष छह माम का विश्लेपण किया है। आपात्काल मे चारो ओर भय तथा सत्रास, आतक, असमजसता का वातावरण फैल गया था । सरकार के समथक एव सत्तालालुप दोनो हाथो से पसे लूटने मे लग गए, वहीं ईमानदार और निष्पक्ष लोगो का बुरी तरह से तग किया गया तथा उहे सलाखों के पीछे डाल दिया गया । लेखक ने उस समय की जनता की मन स्थिति एव व्याकुलता का चित्रग 'प्रजाराम' के रूप में किया है। प्रजाराम १ यादवेद्र शर्मा चद्र, प्रजाराज, पृ० ६१ २ वही, पृ० १४२ सामा य पुरुप न होकर एक प्रतीक पुरुष है-विराट जन शक्ति एव जन चेतना पा प्रतीक। लखक को आपातकाल म पराबिया के साथ साथ अच्छाइया भी नजर आती हैं कि उस समय अराजक्ता कम हो गई और क्मचारी अनुशासित रहने लगे थे । प्रजाराम अनेक बार एसा सोचता है कि प्रधानमत्री की नीतियां जनहित म है । लेकिन क्यिा वयन सही तरीके स नही हो रहा है । लेखक का दष्टिकोण आपातकाल वी अच्छाइया और बुराइया म सामजस्य बिठाना रहा है । सजय वी हठधर्मिता एव दभ की वजह चडाल चौकडी को बताया है । रामश्वर द्वारा आत्महत्या तथा उस द्वारा इस आशय का लिखा पन सजय को निर्दोप बताने की कोशिश है। जनता शासन के प्रारभिक छह महीनो में उपजे मतभेद, कुसियो की लडाई एव अनुशासन हीनता का भी लेखक ने अच्छा चित्रण किया है। इसमे क्या सरपट भागती रहती है और पाठक उसमे मग्न हो जाता है। भाषा ललित एव रोचक है । सवाद पायानुकूल हैं । आपात्काल की पृष्ठभूमि पर लिखी कृतियो में 'प्रजाराम' का अपना अलग स्थान रहेगा। कथासार सु-राज । सुराज' कम पष्ठा मे सिमटा हुआ एव वहद क्था लिए है । लेखक के शब्दाम--- इसका घटनाक्रम बहुत लम्बा है, अत किसी भी सीमा तक इस विस्तत दिया जा सकता था। इसका क्यानक गागि-पाक इद गिद घूमता रहता है । काका न शादी नहीं की फिर भी कही की इट, यही का रोडा जोडकर एक गृहस्यी बसा ली थी। उस गहस्थी मे भी भरभाव रहता है । छोटी बहू मानद की विधवा बहू एव बच्चो के साथ दुव्यवहार करती है। दवा विरोध करता है। कावा भी समझाते है लेकिन निस्सार । काका दुखी है । उ होने सपना देखा था कि आजादी के बाद यहां सब पुशहाल हो जायेंगे लेकिन यथाथ धरातल पर क्या हुआ ? व देवा से कहते हैं - घर बाहर सब जगह से मरा सपना टूट रहा है । मुझ कही कोई किनारा नहीं दीखता किसका मिला है जीन का हक धनवोट, अलमोडा के गरीया पर वरावर अत्याचार होते रहे । घना को देवदार ये पेडा को चोरी से काटने के अपराध मे दण्डित किया जाता है। जमीदार लोहार, हरिजनो की जमीनें दाव लते हैं। गोचर का रास्ता भी बद हो जाता 7 २ १ सुराज, लेयर के दो श स उदधृत २ हिमाशु जोशी, सुराज, पृ० १६ ८३ है। काका ने इस अयाय के विरुद्ध संघप विया और हरिजा को अपना हक दिलवाया । जमीदार काया वे शत्रु बन गये । उनसे बदला लेने के लिए देवा को हत्या के अपराध मे फंसा दिया जाता है । सब जानते है कि यह अन्याय हुमा है लेविन देवा को बचाया नहीं जा सका और उसे सजा हो गई। 'गागि' पी भी कि हो अज्ञात लोगो ने हत्या कर दी और गरीबो का हिमायती उठ गया । काका कहते हैं--'अब तक मैं समझा था, सुराज आ गया। गागि वावा या सुराज । अपने लोगो का राज । पर अब लगने लगा है सुराज नहीं आया और न फिलहाल माने वाला है ।" याका का क्थन बिल्कुल सत्य है । सुराज पान के लिए बदलाव जरूरी है जसा दवा म आया है, जो हम जीन नहीं देंगे, हम उनका जीना भी पठिन कर देंगे तुम्हें जो भी सहायता चाहिए मैं दूगा । तुम मुझे सहारा दो, मैं तुम्ह मुक्ति दूगा।" यह परिवतन ही नई सुबह ला सकेगा, लखक का यही मन्तव्य है । कथ्य विश्लेषण 'सु राज श्री हिमागु जोशी का लघु उपयास है। इस वृति मे लेखक ने वतमान लातात्रिक व्यवस्था के सच्चे मगर कडव यथाथ का चित्रण किया है। समानता की दुहाई देती इस व्यवस्था मे निम्न वग कितनी पीडामय जि दगी भाग रहा है । उसक लिए कानून, याय, समानता आदि शब्द निरथर हो गए हैं। स्वय लखम २ शब्दा म -- -सत्ता, शक्ति, सम्पननता, “याय, ये शब्द मात्र कुछ ही लागो तक सीमित रह गए हैं । दिन प्रतिदिन बढ़तो अथ की महत्ता अन अनयो के द्वार खान रहा है। राजनीतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक शिष्टाचार मा पर्याय बन गया है।' गागि का गाधी जी के बताय सिद्धातो का अपनाय हुए है। गरीबा पर अत्याचार हाता देखकर सीना तानकर खड हो जात है । हारजना या वरात म सबसे आगे लगत है । हर दुखी का घर उ होन अपना घर समझा। हर असहाय का सहायता पहुचाई।" देश आजाद होने पर परमान द पाण्डत न उनसे कहा था-लडाई खत्म हो गई गगा। अग्रज हार गए । कि तु गराव क घर एक जून भी चूल्हा नहीं जलता देख काका को लगता था लडाई कहा खत्म हुई ह ? धनकोट के जन काका से पूछत हैं आप ता कहत थ क का, गराबो के लिए अच्छे दिन आयेंगे । सबके साथ न्याय होगा। पर - १ हिमाशु जोशी, सुराज पृ० २३ २ वही, पृ० ४६ ३ वही, सुराज के सम्बध मे लेखक के दो शब्द से उद्धत ४ हिमाशु जोशी, सुराज,पृ. १४ ५ बहो, प०१५ ४ यह क्या याय है, जहा कोई रो भी नहीं सकता" इसका जवाब उनके पास गरीबों की लड़ाई के अगुआ वाया की हत्या कर दी जाती है। उनका बेकसूर बेटा देवा हत्या और डकतो के जुल्म मे जेल के मोक्चों के पीछे डाल दिया जाता है । हमे अभी सुराज मिलन में समय लगेगा। 'गागि' की हत्या साधारण हादसा न होकर गांधीवादी सिद्धातो की हत्या है। गरीबो को नई सुबह की बराबर तलाश है। निश्चय ही हिमाशु जोशी की यह कृति प्रष्ट राज नीति द्वारा गरीबो के सूखते नासुआ का यथाथ दस्तावज ह । १ हिमागु-जोशी-सुराज, ३.४३ R ४ ४ राजनीतिक विचारधारा राजनीतिक विचारधाराआ से हमारा आशय उन चितन पद्धतियो से है, जो सवदेगीय व अतर्राष्ट्रीय स्तर पर सवमा य एव प्रवलित तथा राज नोति के मूलभूव आधारो से जुड़ी हुई हैं । इनमे से कतिपय विचारधाराए जैसे माक्सवाद, लोकतात्रिक समाजवाद, राजतनवाद, अराजक्तावाद, समाजवाद, राष्ट्रवाद आदि शुद्ध राजनीतिक चितन से प्रसूत हैं किंतु कतिपय विचार- धाराएं राजनीति से इतर क्षेत्रों से भी सम्बघित हैं जैसे मानवतावाद, गांधीवाद, सर्योदयवाद आदि । हिदी वे कथाकारो ने देश विदेश में प्रचलित राजनीतिक चितन पद्धतियो को घटनात्मक प्रेरणाआ, अनुभूतियो एव सामाजिक चेतना की प्रवत्तियों से मदभित करके क्या-कृतियो मे चित्रित किया है। दूसरे शब्दो मे उप यामकारा ने राजनीतिक विचारधाराओ के सैद्धांतिक आधारो का निरूपण न करके इन विचारों को व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व जीवन से जुडी हुई प्रतिक्रियाओ को चित्रित किया है । उपयासकारो को चिता, सृजनधर्मी आस्था और सजगता का मानदण्ड व चेतना है, जो समीक्ष्य उप यासो की घटनाओ, पात्रा के क्रिया कलापो सवादा एव द्वद्वात्मक स्थितियो, परिस्थितियों के माध्यम से व्यक्त हुई है । वस्तुत यही राजनीतिक चेतना राजनीति शास्त्र या राजनीति विज्ञान से साहित्य और विशेष रूप से उपयासो मे चित्रित राजनीतिक चेतना को विभाजक रेखा है। लोकतात्रिक समाजवाद समाजवाद स्वरूप, परिभाषा और मूल तत्व समाजवाद शब्द की उत्पत्ति' 'सोसियस' (Sccious) शब्द से हुई है जिसका अर्थ समाज है। समाजवाद का सम्बध समाज के समग्र स्वरूप में सुधार लाने से है । वतमान युग मे समाजवाद एक सशक्त विचारधारा ही नहीं अपितु समाज दशन के पम उभरा है। समाजवाद शब्द का अंग्रेजी पर्याय 'मोलिज्म' (Socialıım) परिभापाए मानव अप्रेजी-हि दो कोश समाजवाद यो परिभाषित परते हुए लिखा गया है-(१) समानबाद रामाजत? वह सिक्षात है जिसमे द्वारा व्यक्तिक म्वतमना सामूहिक हित के आगे गोण होती है। (२) प्रतियोगिता उत्पादन के स्थान पर सहकारी पद्धति भूमि एव पूजी पर राष्ट्रीय स्वामित्व, उत्पादन का राज्य द्वारा वितरण १३) नि शुरक शिक्षा तथा बच्चो का भरण पोषण, गाय भाग (उत्तराधिकार) का उमूलन ।' वैवम्टर शब्द कोश के अनुसार समाज वाद मामाजिक सगठन के मामहिक अथवा सहकारी स्वामित्व और वस्तुओं में उत्पादन एव वितरण के लिए लोपतमाम व्यवस्था ये अनिवाय साधनो पर आधारित राजनीतिक एव प्राधिक गिद्धात है अथवा यह (ममाजवार) एक नीति या व्यवहार है जो उपयक्त मिद्धातो पर आधारित है। समाजवाद का उद्देश्य प्रतियोगिता के स्थान पर महयोग लाभ कमाने के स्थान पर मामाजिक सेवा तथा सभी को आय तथा सामाजिक अवसर अधिक ममान रूप से उपलब्य परना है। ममाजवाद यक्ति के विरोध में सामाजिक जीवन को महत्व देता है। समाजबाद मे व्यक्तिवाद मामतवाद और पजीवाद द्वारा उत्पान सभी विषम ताओ और गइया का अंत हो जाता है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि ममाजवाद लोकनर का कोई स्थान नहीं होता। मावजनिक सम्पत्ति पर सरकार का अधिकार होता है और सरकार मर्वाधिधारवादी हाली है। समाज- वादी समाज की रचना यापर लोस्तर पर आधारित है जिसमे राज्य के सभी श्रमिक वानियाशील रहते हैं। समाजवादी लोक्त में सभी मामाजिक अधिकार उपलब्ध होते हैं जैसे धम करने, विधाम करने अवकाश का अधिकार नि शक्ल शिक्षा स्वास्थ्य मेवा, बद्धावस्था में सुरक्षा, भाषण, प्रेस, सभा, निर्वा चित होता आदि स्वतत्रता का अधिकार । वस्तुत एक दानिक सिद्धात के रूप में समाजवाद ममाज की सभी उपलब्धियों में कायकारण सम्बध स्थापित १ सत्यप्रकाश और बलभद्र प्रकाश मित्र (स०) मानव अग्रेजी हिंदी कोश (१९७१)१० १२९० २ Webster's New Internaſioa Dictionary of the English Language, Vol 2, p 2387 ३ M Rosenthal and Yudin (Editor), A Dictionary of phin losophy p 415 ८७ करता है । अत कहा जा सकता है कि समाजवाद अपने आतरिक परिवेश मे द्वद्वात्मक भौतिकवाद का पर्याय है तथा बाह्य रूप मे प्रगतिशील विश्व रथ को कल्याण पथ पर परिचालित करने वाला सारथी और उस पर आरूढ़ मानवीय अधिकारों-स्वतत्रता, समानता, प्रेम एव उत्थानमूलक चैत यता का रक्षा है।' समाजवाद के मूल तत्व डा० सुपमा कश्यप ने समाजवाद के जिन तत्वो का उल्लेख किया है वे इस प्रकार हैं- १ सामाजिक प्रभुत्व का पक्षधर समाजवाद का शाब्दिक अय भी यही हाता है कि ऐसी विचारधारा या दशन जो व्यक्तिवाद के स्थान पर सामाजिक दशन वी श्रेष्ठता का महत्व देता है। समाज के सामूहिक प्रयास से ही व्यक्तिया या कल्याण होता है । अत व्यक्ति से समाज अधिन महान और उच्चतर होता है । २ व्यक्तिगत सम्पत्ति का अत समाजवाद मे पूजीवाद की विषमताआ को कोई स्थान नहीं है। पूजीवाद शोषण और व्यक्तिगत लाभ की व्यवस्था पर टिका होता है । इसके विपरीत समाजवाद मे निजी सम्पत्ति का राष्टीयकरण हो जाता है और श्रमिक वग को उनके श्रम का पूरा लाभ प्राप्त होता है। ३ प्रतियोगिता के स्थान पर परस्पर सहयोग को मान्यता देना पूजीवादी समाज व्यवस्था मे स्वतय प्रतियोगिता को प्रश्रय मिला होता है। इससे कमजोर वग घनी से मुकाबला नही कर पाता। इससे एकाधिकारवादी प्रवत्तियां उत्पन्न होती हैं और समाज में आर्थिक वग बन जाते हैं। समाजवाद न केवल आर्थिक प्रतियोगिताओ को समाप्त करता है अपितु समाज के किसी भी विशिष्ट वग को श्रेष्ठता का भी अत करता है। सामाजिक जीवन का विकास परस्पर महयोग से ही संभव होता है, न कि प्रतियागिता से । ४ समता और स्वतत्रता समाजवाद के सुदृढ स्तम्भ हैं समाज मे अमीर और गरीब, स्त्री-पुरुष, उच्च और निम्न जितने भी वग हो उनको दर परके सवकी समानता स्थापित की जाती है । वगहीन समाज में ही वास्तविक स्वतत्रता का उपभोग किया जा सकता है । समाजवाद मे ही डा० शयरलाल जायसवाल, हिदी गद्य साहित्य पर समाजवाद का प्रभाव, पृ० २१ धमियो को सामाजिक माप प्राप्त होता है। और उनका विभामरे पर्याप्त मपसर मिलते हैं। ५ उत्पादन के साधनो पर सामाजिक नियत्रण समाजवादी समाज म सभी प्रकार को सम्पत्ति पा राष्ट्रीयकरण हाने से उत्पादन में साधना पर समाज का ही निमवण होता है। निजी उद्योग व्यक्ति या शोषण मरते हैं और पूजीवाद यो इसस प्रयय मिलता है । अत उत्पादन में साधना पर ममाज का आधिपत्य होने से उपभोक्ता वस्तुएं सभी को समान रूप मे उपलब्ध होती हैं और सबको सावजनिए मवाओ पा समान रूप से लाभ मिलता है। ६ समाजवाद राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक स्वतत्रता का पक्षधर है पूजीवादी अथवा व्यक्तिवादी समाज व्यवस्था में आम आदमी यो कागजी स्वतरता तो प्राप्त होती है रितु व्यवहार मे वह जातीय श्रेष्ठता, आपिक- सम्पनता और गजनीतिक पद ये सामने पटपुतली से ममा व्यक्तित्वहीन हो जाता है और उसके लिए स्वनमता महन घोडा मात्र होती है।' समाजवाद और लोक्तत्र समाजवाद अपने प्रारमित रूप से राय विचारधारा के रूप में प्रचलित हुआ पा जिसमे व्यक्ति और पजीवाद के द्वारा उत्पन सामाजिक वित्तियों और विषमताओ को दूर करने के लिए सामाजिक सर्वोपरिता की बात कही गयी थी। व्यक्तिवादी और पूजीवादी समाज व्यवस्था व्यक्ति और पूजी को इतना अधिक महत्व दिया गया कि समाज विलित होने लगा। अल्पसख्यको पर बहुसख्यक जन समुनय हर प्रकार से शोषण परता रहा । वग युक्त समाज म लोक्ता प्रासन पद्धति को मा यता दी गयी है । इगलण्ड, अमेरिका, भारत, जापान फास आदि राष्ट्रो मे लोन्तत्र प्रचनित है कि इन देशो में लोकसम कागजी है और लोकतम के नाम पर सुविधा सम्पन्न लोग ही सत्ता तक पहप पाते है और समाज मे आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विषमताएं बरकरार रहती है। भारत जमे विशाल देश मे आम आदमी के लिए निर्वाचित होना मुश्किल काम है। समाजवादी लोक्ता का सर्वोच्च स्वरूप है। समाजवादी लाक्तत्र में सभी सागरिको को सवधानिक अधिकारो की प्राप्ति का अधिकार होता है। समाजवादी लोक्तत्र म अमिर वग को बिना किसी भेदभाव के डा० सुषमा श्यप, स्वातत्र्योत्तर हिंदी महाकाव्यो मे राजनीनिक चेतना, पृ०२५५-२०६ ८६ आर्थिक सुरक्षा का अधिकार प्राप्त होता है।' प्रो० सीले के अनुसार लोकतत्र में प्रत्येक व्यक्ति शासन मे हाथ बटाता है। समाजवाद और पूजीवाद पूजीवाद सामाजिक-आर्थिक सिद्धातो पर आधारित समाज की सरचना है, जो सामतवाद के स्थान पर प्रतिष्ठित हुई। पूजीवाद में उत्पादन वे साधनो पर व्यक्तिगत प्रभुत्व होता है और मजदूर वग पर शोपण होता है । सामतवादी समाज व्यवस्था को बदलने मे पूजीवाद हो सफल हुआ । पूजीवाद विकास के दौर में पूजीवाद के विरोधी तत्व उभरे और वग सघष प्रारम्भ हुआ। पूजी- पतियो, पिचौलियां आदि के साथ सवहारा वग का सघप बढ़ता गया और द्वितीय महायुद्ध के रूप मे पूजीवाद साम्राज्यवाद प्रक्ट हुआ। पूजीवाद मे स्वय गति- रोध उत्पन हो जाने से इसका ह्रास होने लगा और समाजवादी स्वरूप का उदभव तथा विकास हुआ। इस प्रकार मानव विकास के ऐतिहासिक दौर मे पूजीवादी यवस्था को समाप्त कर समाजवाद प्रतिष्ठापित हुआ है । रूस, चीन, क्यूवा, चेकोस्लोवाकिया यूगोस्लोवाक्यिा, रूमानिया आदि दशो मे समाजवादी व्यवस्था का निर्माण हो रहा है। समाजवाद और गाधीवाद समाजवाद एक अतर्राष्ट्रीय विचार दशन है जो मानव के सतत् सघपशील विकासश्रम का परिणाम है। समाजवाद मे व्यक्ति के विकास की सम्पूर्ण सभावनाए निहित हैं। दूसरी ओर गाधीवादी गाधीजी के विचारो का समुच्चय है । गाधीवाद के मूल सिद्धात सत्य अहिंमा प्रेम भ्रात भाव आदि हैं। इसे वाद न रहकर जीवन मे एक प्रयोग के रूप में एक तरीका समझना चाहिए। गाधीवाद ऐसा वाद है जिसमे सभी का कल्याण सभव है । गाधीवाद में समाज को तिवारी ढग से बदलने की सभावना नहीं होती। गाधीवाद सामाजिक राजनीतिक समस्याओ वा हल नैतिक स्तर पर ढूढता है । गाधीवाद आध्यात्मिक मूल्यो (नैतिकता, धम, सत्य, अहिंसा) पर जाधारित है, ईश्वर-श्रद्धा और ईश्वर विश्वास उसके मूल आधार हैं घम इसका प्राण है । परोपकारिता अर्थात मानव. मात्र की नि स्वाथ सेवा आत्मसिद्धि का मुख्य साधन है।' समाजवाद और साम्यवाद समाजवाद गतिशील समाज का समग्र दशन है। समाजवादी दशन का विकास पूजीवाद से सघष करने के परिणामस्वरूप उदभूत हुआ। साम्यवाद एक M Rosenthal & KP Yudin (Editor) A Dictionary of Philosophy, p 116 पी० ० चडढा-राजनीतिक विचारधाराए, पृ० ४१६ t १ २ १० वैज्ञानिक दशन है जो एतिहासिप विकास के नियमो पर आधारित है। स्थापण कार्ल माक्म ने पी थी। साम्यवाद मे मिसी राजनीतिष सताको आवश्यकता नहीं होगी। माम्यवादी समाग म राजनीतिक और वधानिय सस्थाए और विचारधाराएं स्वत समाप्त हा जाएंगी। समाजवाद सामाजिक स्थिति या एक दौर है जिसमें पूजीवाद या अस्तित्व खत्म हो जाता है । कम्युनिग्म समाज का एक वा दौर है । यह ममाजवाट के वाद की प्रगति है । बम्पुनिग्म समाजवाद ये सफल हो जाने पर ही मुमरिन हो सरेगा अर्यात समाज की तमाम भौतिक और सास्कृतिा आवश्यक्ताओ का पूरा करने के लिए माफी पैदावार बढा सक्ने पर ही वह मुमपिन हा सकेगा।' माक्सवादी साम्यवाद मा माक्सवाद आधुनिक कातिकारी चिन्तनशील धारा है। यह एक भौतिकवादी जीवन दशन है जो परोभ चितन की अपेक्षा भौतिक सम्पन्नतामय स्वरूप सामाजिक जीवन को ही अपना लक्ष्य मानता है।' डा० रणजीत लिखते हैं कि माक्सवाद एक प्रकार का नया और वज्ञानिव' मानवतावाद है, जिमे राजनीति और अथशास्त्र के क्षेत्र में समाजवाद और साम्यवाद दशन के क्षेत्र मे द्व द्वात्मक वस्तुवाद और समाजशास्त्र तथा इतिहास के क्षेत्र मे ऐतिहासिक वस्तुवाद कहा जाता है ।' दार्शनिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एव कलागत पहलुओ के परिप्रेक्ष्य में समाजवादी विचार दशन दाशनिक पहलू समाजवाद एव' यापक जीवन दशन है, जिसमें सामाजिक जीवन का प्रत्येक पक्ष समाहित है । वतमान समाजवाद जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहना अधिक उपयुक्त होगा यह कालमाक्स की देन है। माक्सवादी समाजगद अथवा वनानिक समाजवाद का दाशनिक आधार द्वद्वात्मक भौतिकवाद है । द द्वात्मक भौतिक- वाद का प्रनुख गुण प्रतिकूलता या विरोध (Contradiction) है । द्वद्वात्मक भौतिस्वाद प्रकृति और समाज को समझने का एक दाशनिक तरीका है । दद्वा स्मक दशन में कुछ भी नतिम और पूण नहीं है। यह प्रत्येक वस्तु मे बाह्य और आतरिक परिवता को लक्षित करता है। आइ० डब्ल० रासन -कम्युनिज्म क्या है ? प० २१ २२ डा. जनेश्वर वर्मा-हि दी का य म माक्सवादी चेतना (भूमिका) ५०५ डा. रणजीत--हिदी की प्रगतिशील कविता पृ० ३१ - २ ग्रहण किया। द्वद्वात्मक भौतिकवाद वैज्ञानिक उपलब्धियो के सामा य नियमो तथा मानवीय इतिहास के अनुभवो से उदभूत हुआ जिससे यह मालूम हुआ कि सामाजिक जीवन और मानव चेता प्रकृति की तरह ही निर तर परिवर्तित एव गतिशील है। द्वद्ववाद के मूल सिद्धात को माक्स न होगेन के दशन होगेल का दशन आदशवादी है और विचार अथवा चेतना को प्रमुख एव शाश्वत मानता है और भूत तत्त्व को गौण । माक्स ने इसके विपरीत भूत तत्व को प्रमुख माना और चेतना को उसका गुणात्मक परिवतन स्वीकार किया । द्वद्ववाद के तीन सामाय रियम हैं- १ मात्रात्मकता से गुणात्मकता में और गुणात्मक्ता से मानात्मकता मे परि वर्तित होने का नियम (The Law of Transformation of quaniti tative in to quatitative changes and yke versa) २ विरोधी विचारो, घटनाओ, वस्तुओ, शक्तियो आदि को एक्ता और सघप का नियम (Law of Unity and struggle of opposites) ३ निषेध के विरोध का नियम (The Law of the Negation of negation) सामाजिक पहलू माक्स ने द द्वात्मक भौतिकवादी सिद्धात को मानव समाज के इतिहास पर आरोपित किया और इतिहास को भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत की। इस द्वद्वा- रमक भौतिकवादी व्याख्या के अनुसार विश्व का, उसके विकास का, मानव जाति के विकास और मानव मन पर इस विकास के प्रतिविम्ब का सच्चा चित्र मिल सकता है क्योकि यह प्रणाली जीवन और मत्यु, पुरोगामी और प्रतिगामी परि पतना की असख्यक क्रियाओं प्रतिक्रियाआ का सदा ध्यान रखती है । माक्स ने मानव इतिहास को निम्नलिखित छह अवस्थाओ मे विभक्त किया है- (१) आदिम साम्यवादी अवस्था, (२) दास प्रथा को अवस्था, (३) सामतवादी अवस्या, (४) पूजीवादी अवस्था, (५) समाजवादी अवस्था या सवहारा वग का अधिनायकत्व । (६) साम्यवादी अवस्था।" ऐतिहासिक द्वाद्वात्मक भौतिकवाद में पजीवाद से समाजवादी “यवस्था के सत्रमण को ऐतिहासिक अनिवायना का स्वरूप प्रदान किया है। पूजीवादी समाज अवस्था से समाजवादी समाज व्यवस्था मे सक्रमण करने के लिए जो समय १ डगेत्स-समाजवाद काल्पनिक तथा वनानिक, पृ० ६२ २ पी० के० चडढा-प्रमुख राजनीतिक विचारक, ५० १३३ १२ लगता है उमरे मध्य मानय के गामाजिर जीवन में प्रत्येर पक्ष मनोन सबों Tा निर्माण हो रहा है। समाजवाद और क्ला समाजवादी दशन मे पला व्यक्तिपरय होर समाजपरस मानी जाठी है। पला सामाजिर चेताया ही पिगिष्ट स्वरूप है, परत उसका मूल जन गमुदाय पे भौतिय दिया प्यापार में है जिसरे सूत्र विसी विशिष्ट उत्पान पद्धति के अतगत प्रतिपमित होने वाले सामाजिक सयधो से सम्बद्ध हैं। बता पा जाम धम की प्रक्रिया में ही हुआ है । पिसी महत्त्वपूण काय के प्रारम्भ परने मे पहने मामूहिर उत्मार और शक्ति को जगाने के लिए नाटकीय दग से ममूर नत्यो यो प्रथा चनी जिनमे लयात्म ध्वनियो के सहार सामूहिय अग सचालन यी पला पा विकाम हुआ।' पसासार की प्रतिभा का निर्माण भौतिक शाक्तियो वे मयि परिवेश में होता है। जिम क्लावार या जीवन से सम्पक नहीं हाता गमाज से कोई सबध नहीं होता उसपीपला दष्टि अतिशय पल्पनाजीवी, एकागी और जीवन शृय हो जाती है। सामाजिक दर्शन कलाकार की मम भेदी दष्टि उम नितन और उपकी भावनामा को नई दिशा देता है। इस प्रकार ममाजवादी दर्शन में कला सामाजिक जीवन पी गतिशीलता को ही प्रेरित परती है। । लोकतान्त्रिक समाजवाद की भारतीय परम्परा और उसके प्रमुख चिन्तक मानव समुदाय को आदिम अवस्था समाजवादी थी। मानव अपनी शारी रिक व मानसिक विशिष्टताओ के कारण जीवन रक्षा के लिए समूहों में रहता था। पश्चिम में इस विचारधारा का प्रारम्भ १९वी सदी मे हुआ। भारत में २०वी शताब्दी के द्वितीय शतक से | आधुनिक भारतीय समाजवाद पर पश्चिमी ममाजवादी विचारधारा का पूरा प्रभाव पडा । भारत मे लोक तात्रिक समाजवादी विचारो के व्यवस्थित प्रचार प्रसार का सूत्रपात सन १९३४ से माना जाता है । मानवे द्रनाथ राय और लोक्तनात्मक समाजवाद श्री एम० एन० गय गाधीजी के क्टु बालाचा थे । उहे युवावस्था मे ही विश्व भ्रमण करने का अवसर मिला। (वे १९२० मे रूस पहुचे और लेनिन के साथ १ v I Jerome -Culture in a Changing workd p 69 George Thomson Marxism and poetry P 9 प्रकाशच द गुप्त-हिंदी साहित्य मे जनवादी परम्परा, पृ० १० २ ३ काफी समय तक काम किया। १९२६-२७ में चीन गये और वहाँ भी समाजवाद के निमाण हेतु काय लिया। फिर भारत आ गये और काग्रेस मे चार साल तक कार्य किया, फिर काग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। भारतीय लोक्तात्रिक समाजवादी आदोलन के विकास मे राय महोदय के उप मानयतावाद एव नव मानवतावाद को विशिष्ट दन है। राय की मानवतावाद या ढाचा भौतिकवादी है । भौतिक वाद ही उनके विचार म मानवता के सक्ट को दूर कर सकता है । श्री राय को यह महत्त्वपूण अवधारणा है कि प्रजानत्र तभी सफल हो सकता है, जव आध्या स्मिक घेतना से मुक्त व्यक्तित्व जन मार्यों को सम्पन करते हैं। उहोने मान- वीय गुणो के प्रभाव के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मामलो में भी स्वी- कारा है । समकालीन मानव के पप्टो वो इसी प्रकार दूर किया जा सकता है । राममनोहर लोहिया भारतीय समाजवादी आदोलन के जुझारू नेता के रूप मे डा० राममनोहर लोहिया का नाम प्रसिद्ध है । आप हमेशा सरकारी नीति ये आलोचर रहे हैं। श्री लादिया ने राष्ट्रभाषा हिंदी को उचित स्थान दिलाने मे भरसक प्रयास किया । उनका प्रल मत था कि लाव भाषा से ही वास्तविक प्रजातत्र की स्थापना हो सकती है । विके द्रीकृत अर्थ व्यवस्था के वे पक्षपाती थे और कुटीर उद्योग का विकास चाहते थे। छाटी मशीनो से चलन वाले छोटे उद्योगो से अधिक्तम लोगो को रोटी रोजी मिलेगी। द्वद्वात्मक भौतिकवाद का मानते थे, कि तु माक्सवाद के अध भक्त नहीं थे। इतिहास के चात्रिक सिद्धात मे उनका विश्वास था। महात्मा गाधी के सविनय अवज्ञा आदोलन का सहारा लेकर जन अधिकारी की प्राप्ति चाहत थे । समीक्ष्य उपन्यासो मे निरूपित लोकतान्त्रिक समाजवाद की प्रमुख प्रवृत्तिया १ सामाजिक सगठन का लोकतत्रीय आधार लोकतात्रिक समाजवाद मे समाज के सगठन का आधार लोक्ता होता है । राजनीतिक सत्ता से लेकर भय सभी आर्थिक, सास्कृतिक, धार्मिक संगठन, जन भावनाओ के अनुकूल ही गठित होते हैं। फासीसी राज्य क्राति मे लोक्ता को वैधानिक रूप प्राप्त हुआ था कि तु इस प्रकार के प्रजातत्र को माक्स ने वैधा निक अधिकारो का खेल बताया है। प्रजातन का विकास पूजीवादी और समाज वादो देशा का भिन भिन्न रूपा से हुआ है। वस्तुत पूजीवादी देशो मे सामाजिक सगठन का आधार पूजीवादी प्रजातत्र है । भारत मे भी राजनीतिक, आर्थिक सगठन, पूजीवादी प्रजातन के आधार पर ही गठित हुए हैं।

२ लोक मामध्य या जाति में आग्या यतमा मुग यररा समतिमाही उपाप मरमा है। नूतन समाजको रचना म जाति मी विनीनता ही आजम उप यासों को प्ररणा है। ३ व्यपिन के म्याद पर समष्टि को मा यता सारतत्र म टपरित में स्थान पर ममाज पा प्रमुगा दी जाती है । समान वादी लोक्ता अपो या तभी सायर पराा है जब समाज म सुघ-दुस कसिए व्यक्ति स्वय या गमपित करना है। ४ पूजीवादी शोपण या प्रतिरोध समस्त पूजीगद गामाजिक सेवा गापण पर आश्रित है। इस पूजीवा का विरोध करने के लिए समार भर म शापिता सगठा स्थापित हुए हैं। समाज वादी समाज की परियता और गयो स्थापना के प्रयास निरतर चलते रहे हैं । माम म भोर यी प्रातियो क मूल म जीयाली शोपण व प्रतिरोध ही कायरत रहा है। हमारा नेश १९४७ म अग्रेजी की दासता से मुक्त हुआ और साम्राज्यवादी शोपग या अन हार साप्त समाजवाद मी स्थापना हुई। देश के माहियारो ने गो आनी रचनामा म गोपित, दलिता और पीडितों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की है। ५ शोपितो, दलितो और पीडितो के प्रति सहानुभूति लोकतानिा समजवादी व्यस्था म व्यक्ति द्वारा व्यन्ति का शोषण, उत्पीडन अथवा दलन के लिए काई स्थान नही है । वगभेद पूजीवादी समाज की देन है । अत समाज राती समाज मे वग नहीं होते हैं । जब धग ही नहीं होता है तो उस समाज मे शोपण और उत्पीडन भी नहीं होता है । ६ सामाजिक समता की सकल्पना सामाजिक समता का सिद्धात लोकतानिय समाजवाद की आधारशिला है। जिम समाज मे ममता का महत्व नही दिया जाता उसमे व्यक्तिवादी पूजीवादी वग भेद पनपत हैं और मानव के द्वारा मानव का शोपण होता है । ममता मानव को समान धरा पर खडा करती है और विकास के समाम अवसर उपलब्ध होते ७ श्रम की महत्ता का प्रतिपादन श्रम से ही अथ की सिद्धि होती है । दुनिया का समस्त ऐश्यय-वैभव ज्ञान विज्ञान कला कौशल श्रम की महत्ता को ही प्रतिपादित करते हैं । पूजीवादी व्यवस्था का ढाचा श्रम के शापण पर ही खडा है। मावसवाद के अनुसार सवहारा वर्ग के अधिनायकत्व मे वगहीन समाज की स्थापना होगी । उस समाज मैं प्रत्येक व्यक्ति श्रम के आधार पर ही अपनी जीविका उपाजित कर सकेगा।' प्रत्येक व्यक्ति के लिए थम आवश्यक है । लोक्तात्रिय समाज मे श्रम का अधिक महत्व है। र राजनीतिक और आर्थिक स्वातत्रय पर समान वल लोकतात्रिक समाजवादी व्यवस्था मे राजनीतिर स्वतत्रता के साथ आर्थिक स्वतत्रता भी होनी चाहिए । विना आर्थिक स्वतत्रता के राजनीतिक स्वतत्रता कोरा दिखाया है । पजीवादी व्यवस्था में राजनीतिक स्वतत्रता ता प्राप्त होती है किंतु आर्थिक स्वतत्रता का अभाव रहता है। हमारे देश मे आर्थिक स्वतत्रता के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। ६ राज्य सत्ता का लोप और वगहीन आदर्श-समाज की सकल्पना आदश लोक्तात्रिक समाजवादी व्यवस्था मे हर प्रकार के वर्ग का अत हो जाता है । सोवियत रूस मे वगहीन समाज की स्थापना का प्रयास किया गया है। निष्कप [-स्वत पता था दोलन के समय ही दश वे नेतागण देश मे लोकतात्रि- कात्मक शासन प्रणाली स्थापित करने के लिए वचनबद्ध थे। इसमे अग्रणी नेताओ मे जवाहरलाल नेहरू थे। लोकतान्त्रिक समाजवादी विचारधारा पर आधारित हिन्दी उपन्यास 'एक और मुख्यमत्री' मे लेखक ने लोकतात्रिक समाजवादी व्यवस्था का समयन एव पूजीवाद का विरोध किया है तथा शोषिता को सगठित होकर पूजी वाद के खिलाफ जाति का आह्वान किया है - 'मजदूरो को सबसे पहले उठकर पूंजीपतियों के खिलाफ कातिकारी लडाई शुरू करनी चाहिए और इस लडाई में सभी मेहनतकशो और शोपितो को अपने साथ एकत्रित करना चाहिए।' लोक्तानिय समाजवादी विचारधारा म जनता की शक्ति व उसकी महत्ता वा उद्घोष करता है और जन शक्ति मे विश्वास करता हुमा कथानायक अरविंद कहता है-'मैं आपके दुख दर्द को दूर करने मे तन और मन लगा दूगा । आपका मत कभी भी रग ला सकता है । आप उस दल को ही मत दें, जिस दल का देश मे बहुमत और जिनके पीछे जनमत हो । आज जनमत काग्रेस के पीछे बना है । इसलिए आप काग्रेस को वोट देकर सफल बनायें।' १ John Strachy, The Theory and Pract ce of Socialism,P 405 २ एक और मुख्यमत्री, पृ० १ ३ वही, पृ० ८४ 1 से इस व्यवस्था म पूजीवाद के शोषण व उराको उपस्थिति को स्वीकार नही दिया गया है। रामाजवादी व्यवस्था सम्पत्ति में समान घटवारे पर जोर देता है और धन के नाधार पर बी गई नेतागिरीमा विरोध करती है। एक और मुख्यमत्री' में इस दष्टि स लोक्तात्रिय समाजयादी व्यवस्था का समर्थन दिया गया है। यथा बिना पसा आज की नेतागिरी पगु है, सपा नेता वही बन सकता है जो या तो बिल्कुल तिकडमी हो या जिसकी तिजोरिया मे चादी के सिक्के नाचते हा । पसा, जातीयता का जार, रिवडम, झूठ, कठोरता, घम का नाम नतागिरी।" इस तरह धन पर अधारित पूजीवादी व्यवस्था ये रहत लोक्तानिक समाजवादी व्यवस्था हीन होती जा रही है । यह व्यवस्था मानव मानव में व्याप्त वमनस्य भाव आधिक, शर्मिक एवं राजनीतिक असमानता तथा भेदभाव को समाप्त कर सब म सम भाव एवं मातृत्व की स्थापना करना चाहती है । लोग अपनी जरूरत से ज्यादा धन का सचय करते हैं, जिसके फलस्वरूप गरीवी बढ़ती जाती है, छोटा पूजीपती वडा यूजीपति बनने के लिए अनतिक साधनो को अपनाता है । शापित व्यक्ति शाषण की चक्की मे निर तर पिमता जाता है। अरविद अपनी धम-पली गुलाब कहता है इसान को हर चीज उतनी ही मिलनी चाहिए जितनी कि उसे जरूरत हो । जरूरत से ज्याला मिल जान पर आदमी-आदमी की सजा स हटकर कुछ और बा जाता है । यह कुछ और बन जाना उस सहजता से अलग कर देता है । स्वत नता के पश्चात् भारत म लाक्तानिक समाजवादी व्यवस्था लागू की गई । लेकिन इसके परिणाम सुखकर नही निकले। आज दलित एव पीडित वग पर निर तर शापण हात जा रहे हैं। इस शापण का प्रमाण इस उपन्यास म एक शोपित व्यक्ति के माध्यम से मिलता है। वह शोषित व्यक्ति मुख्यमत्री अरविंद से कहता है-'आप मत्रो जी हैं न ? सरकार मुझे माफ करें, आपको बताऊँ । यहा हमे अपनी मजदूरी की एवज में ननाज भी पूरा नहीं मिलता। ये आपके अफसर जमीदारा के कारि दो से कम नहीं हैं । हमे खूब लूटते हैं। इनमे कोई दया हया नही। इह हम पर रहम नही आता है सरकार । आप अचरज करेंगे कत आपके एक अफसर ने शराब पीकर एक लडकी की इज्जत ले ली थू है ऐसी जिदगी और जीन पर । पर जीना पड़ता है लाशो की तरह मिदगी को कंधो पर ढोना पडता है। आज इस लोक्तात्रिक समाजवादी व्यवस्था मे न जाने इस शापित की तरह क्तिने और शोपित व्यक्ति इस यवस्था के अदर पिस जा रहे हैं फिर भी जी रहे हैं जीने के लिए सिफ लाश बनकर। एक और मुख्यमत्री, पृ० ७२ २ वही, २०६२ ३ वही, पृ० ३६५ १ १७ - 'सबहि नचायत राम गोसाई' में गयादीन हिंदुस्तान की स्वतत्रता के पश्चात् इस लोकतांत्रिक समाजवादी व्यवस्था या मूल्याकन करता हुआ कहता है- हिंदुस्तान स्वतत्र हो गया है, और उसे यह भी मालूम था कि महात्मा गाधी और पडित जवाहरलाल नेहरू न इस देश के जानवरो से गये वीते आदमियो को मनुष्य की तरह रहना, व उसकी कोटि मे ला सडा कर दिया।" अयोग्य भ्रष्टा- पारी नताओ के भाई भतीजे का ऊँचे पदो पर पहुच जाना, लेकिन योग्य होने पर भी सामाजिक राजनीतिक जीवन मे पिसी महत्वपूण गवस्था को प्राप्त न कर पाने की चोट जनतात्रिक चेतना से उपजी है । प्रजातात्रिक व्यवस्था में राज- नोतिष से व्यक्ति का सीधा सम्पन होने से वह स्वय को राजनीति का अग मानने लगा है। इसीके परिणाम स्वरूप लोक्तात्रिय मूल्यो की प्रतिष्ठा होती रही है । इस विचार से यह उपन्यास अधिक प्रभावित रहा है । पूजीवादी व्यवस्था मे गरीब किसानो को अपना हक नही मिल पाता। कामरेड रवीन्द्र मिसानो को वास्तविक मुभावजा दिलाने के लिए कहता है - हम लोग तो साधनहीन, उत्पीडित और शोपित वग के आदमी हैं । सहायता करने के साधन हम लोगा के पास पहा ? और यह सरकार पूजीवादी सरकार है, आप स्वय पूजीपति हैं । तो इस सरकार का और आपका भरोसा कस किया जा सकता है ? नहीं तो सेठ जी, इन किसानो को उचित मुआविजा मिलना चाहिए।" यहा लेखक पूजीवादी व्यवस्था का विरोध करता है और शापण समाप्त कर मानव मानव में शाति और आपगी वैमनस्य स्थापित करना चाहता है तथा सम्पत्ति वी समानता को दूर करना चाहता है । लकिन आज इस भ्रष्टा चारी शासन व्यवस्था में नेता लोग अपने निजी स्वाथ के पीछे शोपित व दलित वग पर शोपण समाप्त न करके वरन् उनको और अधिक शोपित बना रहे हैं । आज इस कथित लोक्तानिक व्यवस्था मे सिफ पूजीपति लोग ही चुनाव लड मक्ते है । गरीबो के लिए चुनाव लडना स्वप्न मात्र है । नोट से वोट खरीदे जा रहे हैं। जब जबरसिंह की चुनाव में हालत खस्ता होती है तो राघश्याम नोटो से वोट खरीदता है और पत्नी से कहता है.---'सुना है कडा मुकाबिला है । सिफ रुपया ही बचा सकता है । मिनिस्टर साहब को।' 'राग-दरबारी' व्यग्यात्मक शली मे लिखा गया उपयास है। इसमे लोक- तात्रिक समाजवादी व्यवस्था में सत्ताहीन व्यक्ति अपने विरोधी को जनतात्रिक व्यवस्था के सिद्धात को बतलाते हुए कहता है- विरोधी मे भी सम्मानपूर्वक व्यवहार करना चाहिए । देखो न, प्रत्येक बडे नेता का एक एक विरोधी है। सभी ने स्वेच्छा से अपना-अपना विरोधी पकड रखा है । यह जनता का सिद्धात २ सबहिं नचावत राम गोसाई, पृ०४३ १ वही, पृ० १६३ २ वही, पृ० २८० १८ है। हमारे नेतागण मिसी गासीनतास विरोपियों का शेल रहे है। पिराधोगन अपनी यात यवते रहत हैं । माई रिसी से प्रभावित नहीं होता। यही मार्ग विरोध है । आपका भी यही स्वरूप अपना पाहिए।" आग की सोरताकि व्यवस्था म ससाहीन यात और विराधिया की नीति को स्पष्ट दिया गया है। मनीचर जो प्रधान के लिए पाग्य नहीं होता है फिर भी इस सोस्तावित व्यवस्था में गाय वा प्रधान बन जाता है। तय प्रिसिपस साहय महते है-'हाँ भाई प्रजाता है। इसम तो सब जगह इसी तरह होता है।" सोरतात्रिक समाजवादी व्यवस्था में प्रत्यय व्यक्ति को अपने अधिकार प्राप्त परने में लिए बोलने की स्वतत्रता है । यह शोषण से बिलाप योन सकता है । यय जी कहते हैं-मैं प्रजातन से चलता हूँ । सवरा बोलने की स्वतंत्रता देता हूँ। तभी ता अध्यापर जा मरे ही पिलाफ है-मरा विरोध परते पूम रहे हैं।" 'महाभान' मे दलित भौर शापित यग पर पुसिरा और लोक्तात्रिक समाज वादी व्यवस्था के प्रप्ट राजनीतिनो के अत्याचार को यतलाया गया है। बिमू ये हत्यारे को राजनीतिय शरण मिलने पर लायन वायू दुखित होकर पहता है- अत्याचारी को सरदाण दो और पीडिता यो कुचलो। यही थे हमारे आदर्श और सिद्धात जिह लेकर चले थे ।" समाज में गिरी हुई जातियो को अत्याचार से मुक्ति दिलाने पे लिए सुवुल वायू पाव मे बडे हो जाते हैं वे सो हरिजनों के ऊपर हो रहे शोषण का विरोध करते हुए महते हैं- खडा हुआ आप लोगा ये हा यी लडाई लडने के लिए। विमू की मौत का हिसाव पूछने के लिए। यात घेवल बिमू की मौत की नही यह सब आप सब लोगो के जिदा रहने का सवाल है अपने पूरे हप के साथ जिदा रहने का । यह मौत कुछ हरिगतो की या विमूवी नही आपवे जिदा रहन के हक की मौत है । आपका यह हक जरा से स्वाथ ये लिए गांव में धनी क्सिाना हाथ बेच दिया गया है । और वही हा आपको दिलवाना है। जुल्मो ने आप लोगो के हौसले तोड दिए हैं, इसलिए मे लड गा । आप लोग साथ देंगे तो भी और नही देंगे तो भी।" 'महाभोज' में जनता की एकता और उसकी शक्ति को भी प्रतिपादित किया गया है-'इस बात को देय लिया सबने कि जनता पी एकता मे बडा जोर है । तूपानी जोर । तूफान आता है तो बडे बडे पेडो को जड सहित उखाड फेंकता है । जनता एक होती है तो बडे-बडे राज्य उलट देती है । पिंका हुआ आदमी ही इस बात को सबसे ज्यादा महसूस करता है । कुसी पर बैठना है तो १ राग दरबारी, प० ४५ २ वही, प० १२१ ३ वही, प० ३७५ ४ महाभोज, ५० ५८ ५ वही, पृ० ३६ है । जनता मे फट डालो कुर्सी बचानी है तो जनता में फूट डालो, जनता की एक्ता कुर्सी के लिए सबसे बड़ा खतरा है।" 'जगलतत्रम' मे श्री श्रवणकुमार गोस्वामी ने जाावरो के प्रतीको के माध्यम से कथा को पिरोया है । नाग पूजीपति का प्रतीक है-उसके शिकजे मे तडपते हुए दलित और शोपित वग के सामाय व्यक्ति को दिखलाया गया है । आज इस व्यवस्था मे शोपित व्यक्ति किस तरह दाने दाने के लिए मोहताज हो जाता है, उसका सजीव और मार्मिक चित्रण किया गया है । इसमे लेखक पूजीवादी व्यवस्था का विरोध कर शासन आम आदमी, दलित, शोषित और पीडित वग के हाथो म देने का सुझाव प्रस्तुत करता है। पूजीपति की स्थिति यहाँ उपस्थित हुई है-'यहाँ वाणिज्य मे वही सफल हाता है, जो जहर उगलने की खूबी रखता है और हमशा दो जुबानो का प्रयोग करता है । ' पूजीपति जमाखोरी और चोर बाजारी के बलबूते पर अधिक बडा पूजीपति बनता जा रहा ह । उस पर किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं क्योकि उसे भ्रष्ट राजनीतिज्ञो का आशीर्वाद प्राप्त है। चूहा (आम आदमी) सिंह (राजनेता) से इस नाग (पूजीपति) के अत्याचारो के बारे मे कहता है-'नाग चीजो की कीमतें लगातार बढाता जा रहा है । यह चोर बाजारी और जमाखोरी करता है । वह हमारे हिस्से का राशन तक हमे नहीं देता, फिर भी आप उसके खिलाफ कोई कारवाई नहीं करते, आखिर क्यो ?'3 सिंह लोकतात्रिक समाजवादी व्यवस्था की घोषणा करता हुआ रहता है--'मगलवादी (समाजवादी) समाज मे वाला बाजार नहीं होगा। कोई रिश्वत नही ले सकेगा। कोई अपने पास जरूरत से ज्यादा धन जमा नहीं कर सकेगा। हर चीज पर सरकार का अधिकार होगा। सरकार आप सबके कल्याण के लिए अनेक क्रातिकारी कदम उठाने जा रही है।" 'महामहिम' उप यास में बताया गया है कि लापतात्रिक सरकार मे राज नीतिक एक कठपुतली का खेल बनकर रह गया है और राजनीति आज मजाक का विषय बन चुकी है । इसमे आज लोकतात्रिक समाजवाद में मजदूरो, दलितो, पीडितो और शापित वग अपने ऊपर किये जा रहे शोषणो के विरद्ध किये जा रहे आदोलनो का वर्णन किया है । औरतें हाथ मे बनर लिए हैं जिस पर अक्ति है- किसानो को सही दाम दो, बेरोजगारो को काम दो। उनका नारा 23 १ महाभोज, पृ०७६ २ जगलतग्रम, पृ० २१ ३ वही, प०४१ ४ वही, पृ० ४८ ५ महामहिम, पृ०६७ १०० - पा---'रोटी पपडा और मकान दे न गये जो, यह सरकार निरम्मी है। जो शरपार नियम्मी है, वह सरकार बदलनी है।' 'हजार पाडो या सवार' में श्री यादद्र पार्मा चद्र ने शापित व्यक्तिया पर किये जा रहे सोपणा वा यथाथ चित्रण दिया है। लेयर ने अमीर गरीब को असमानता सूर्योदय ६ आधार पर की है-'मय उग वाया घा, धूप पसर गयो यो सफेद चादर सो । जहाँ ताजा धूप सुवों में लिए ताजगी, उत्साह और मानद विधरती है, वहीं हरिजना के लिए चिता, समर्प और शोषण की गरमाहट फैजाती है।" अलगाजिया पाया पगहीन समाज की परपना करता है। यह मानव मात्र फे लिए जीता है। समाज आथिक, सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक अस मानताए नाम मात्र को भी न हा। यह पहता है-'तरी इच्छा, इसीलिए ही मैं कहता हूँ कि वगहीन समाज की रचना होनी चाहिए।" गोधू को कभी-कभी अगरजिया बाया ये शन्द याद हा आते, जो कहा परते थे-'चाहीन समाज की रचना कैसे हो । उमरे लिए तो बाधिष भेदभाव मिटाने पड़ेंगे। शो द्वारा बनी जातिया यो फिर समाप्त करना होगा। वणाश्रम के तहत जो कुछ भी गलत है उस मिटाना होगा।" शोषत गोधू से वगहीन समाज व लोगो म चेतना जाग्रत करन के सबंध म महता है--'मजदूरो मे उम चेतना को भर रहा हूँ जिसस वे अपने वोट का सही उपयोग कर सकें। वे ज्यादा अपनी मागो के लिए सचत हो जायें । यदि उनमे वगहीन समाज के लिए चेतना जाग्रत हो गई तो धम व जातियो की दीवार दहती जायेगी और वे अपने को एक स्थिति का मनुष्य समझने लगेंगे।'५ 'दारुल शफा मे लेखक ने पूजीवाद के स्थान पर लोरतात्रिक समाजवादी व्यवस्था और मजदूरो तथा शोपितो की सरकार को मा यता प्रदान की है। 'पूरे देश में समाजवाद आयेगा पूजीपतिया का मुह काला होगा। यह मुट्ठी यह मट्टी तो मजदूरो की एकता का निशान है । इसमे बद है वक्त की यह सुबह है जिसको हजारो साल से शोषितो का इतजार था।" शाति भग म नाज की जनता की शक्ति और अपने अधिकारी और अधिक समानता पाने के लिए कितनी सूझ-बूझ से काम लेती है। समथन विसी और का तथा वोट किसी और को देने की रणनीति का लेखक ने पर्दाफाश किया है-- १ महामहिम २०६७ २ हजार घोडा का सवार, पृ०१७ ३ वही, पृ० १५८ ४ वही, पृ० ३५८ ५ वही, पृ० ३६५ ६ दारुल शफा, पृ०५४ 'दरअसल जनता उतनी बेवकूफ नही रह गई थी । कई जगह तो इतनी चालाक' हो गई थी कि चुनाव के अतिरिक्त क्षण तव त्रिलोचन पाण्डे और प्रधानमत्री के नारे लगाती रही और मौके पर वोट विरोधी दलो को डाल आयी।" 'प्रजाराम' मे व्यक्ति के स्थान पर समाज को प्रधानता दी गई है । 'मनुष्य को जाति तबको मे वाटना एक तरह से राष्ट्र को विनाश के कगार पर खडा करना है होना तो यह चाहिए कि लोग अपने अपने धम का निजी तौर पर पालन करें।" इस पूजीवादी व्यवस्था मे अमीर लोग अपने हिंस्र जवडो मे गरीब को जवडते जाते हैं - इस व्यवस्था और आप जैसे लोगा की वजह से कोई भी परिवतन नहीं आ सकता। प्रजा तो पिसती जायेगी। पूंजीपति और अधिक पैसे वाला होगा। गरीब और अधिक गरीब होगा। फिर अनेक तरीको से धनी बनने वाला नव पूजीवाद भी अपने हिंस्र जबडे निकालेगा। सब गरीब आदमी को निगल जाएगे निगलते रहगे।" उपरोक्त विवेचन में हिदी उपयाम परम्परा में जो राजनीतिक उपयास लिखे गए उनमे गांधीवादी विचारधारा का जो रूप दिखलाया गया था उसका सक्षिप्त विवरण और लेखक किस तरह गांधीजी के विचारो से प्रभावित था, उही विचारो और कथनों को स्पष्ट किया गया था, उन्हें यहाँ सकलित किया गया। -- माक्र्सवादी चिन्तन मार्क्सवाद का सैद्धातिक स्वरूप विश्लेपण माक्सवादी समार की सफल विचारधाराओ मे इसका नाम सर्वाधिक प्रतिष्ठित है । माक्सवाद ससार या बहुचर्चित अपूव क्रान्तिकारी और महान् शक्तिशाली चितन है। यह भौतिकवादी जीवन है, जो परोक्ष चितन की अपेक्षा भौतिक सम्पन्नतामय स्वस्थ मामाजिक जीवन को ही अपना लक्ष्य मानता है।" माक्सवाद विश्व की कम्युनिस्ट पार्टियो का वह घोपित सिद्धात है जिसके आधार पर वह अपनी राजनीति, आर्थिक व साम्कृतिक योजनालो को निर्मित कर सव- हारा जाति की मफलता के उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करती है। माक्सवाद ही ऐसा पहला दशन है जिसका पहला उद्देश्य है पजीवादी व्यवस्था १ शाति भग, प० २२२ २ प्रजाराम, पृ० ११३ ३ वही, पृ० १५४ डा० जनेश्वर वर्मा, हिदी काव्य में माक्सवादी चितन, भूमिका, पृ० ५ डा. हरिकृष्ण पुरोहित, आधुनिक हिदी साहित्य की विचारधारा पर पाश्चात्य प्रभाव, प० २७८ ५ १०२ पर समाजवादी व्यवस्था किस तरह स्थापित की जाय । 'माक्सवादी चितन एक राजनीतिक अथवा श्रमिक क्राति का कायम मात्र नहीं है अपितु यह एक सवव्यापी जोवन दृष्टि है।" येवर वे गन्गे में--'माक्सवाद फेवल श्रमिक वग को खुल द आवाज ही नही है यह वतमान समाज के प्रभावों तथा जटिलताओं को निश्चित रूप से समझने की वृहद प्रणाली है । प्रातिकारी परिस्थितियों तथा समाज से सबधित विविध रूपा का अध्ययन करना ही इसका उद्देश्य है ।" माक्सवाद के दाशनिर पक्ष का द्वद्वात्मक भौतिकवाद सिद्धात के नाम से जाना जाता है । 'माक्मवाद एक प्रकार का नया और वैज्ञानिक मानववाद है जिसे राजनीति और अथशास्त्र के क्षेत्र में समाजवाद और साम्यवाद दशन के क्षेत्र में द्वद्वात्मक वस्तुवाद और समाज शास्त्र तथा इतिहास के क्षेत्र में ऐतिहासिक वस्तुवाद कहा जाता है।" द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धात दद्वात्मक भौतिकवाद मनुष्य से लेकर प्रकृति के सम्पूण क्रिया कलाप को परखने और समझने का माक्सवादी दृष्टिकोण है, जो दद्ववाद और भौतिकवाद नामक दो विचार सरणियो ३ सयोग से विकसित हुआ है।' यह द्वद्वात्मक भौतिकवाद इसलि' कहा जाता है कि प्राकृतिक घटनाओ को देखने, परखने और पहचानने का इसका अपना ढग द द्वात्मक है और इन प्राकृतिक घटनाओ की इसकी व्याख्या, धारणा एव सिद्धात विवेचन भौतिकवादी है।" मावसवाद हुद वाद सतत गतिमान, परिवतनशील और विकासमान रूप में विश्व की विवेचना करता है। प्रकृति के विकासक्रम को समझने के लिए द द्ववाद के जमदाता 'हीगेल' ने निम्नलिखित तीन सामा य नियमो का प्रतिपादन किया है- १ विपरीता की एकता और सघप का नियम २ मात्रा भेद से गुण भेद का नियम ३ प्रतिपोध के प्रतिपोध का नियम । १-विपरीतो की एकता और सघप का नियम यह नियम भौतिक जगत की शाश्वत गति एव विकास के स्रोत का उसके वास्तविक कारणों का उदघाटन करता है । वस्तुओं और पापारो का अत- १ डा० रामकिशन सैनी, आधुनिक हिंदी महाकाव्य मे पाश्चात्य चिंतन, पु० ६२, एल. २ सी० वेवर, राजदशन का स्वाध्ययन, पृ० २०७ ३ डा० रणजीत, हिदी की प्रगतिशील कविता, पृ०.३१ J Statin, Problems of Lennuism, p 569 १०३ विरोधी होना सावत्रिक है । विश्व मे कोई वस्तु या व्यापार नहीं है जिसे विप रीता मे बाटा न जा सके । 'भिन से भिन्न वस्तुओ और व्यापारो का विकास यही सिद्ध करता है कि किसी वस्तु के विपरीत पहलू शातिपूवक नहीं रह सकते। विरोधी जब मिलेंगे तो सघष जरूर होगा और सघष नये स्वरूप, नई गति, नई परिस्थिति अर्थात विकास को जरूर पदा करेगा।" २--मात्रा-भेद से गुण भेद का नियम यह नियम बतलाता है कि विकास कसे और किस ढग से चलता है और इस प्रक्रिया की क्रिया विधि क्या है ? इस नियम के अनुसार मात्रा और गुण एक दूसरे से स्वतत्र नहीं हैं। उनम घनिष्ठ आ तरिक सबध है । उनके महत्त्व- पूण भेद भी हैं । गुण को मात्रा मे परिवतन होने से वस्तु परिवर्तित हो जाती है, कि तु खास सीमाओ के अदर परिमाणात्मक परिवतन होने से वस्तु की काया पलट नही होती है। ३-प्रतिपोध के प्रतिपोध का नियम प्रतिषोध के प्रतिपोध का नियम भौतिक जगत के विकास की आम दिशा अथवा प्रवत्ति का उदघाटन करता है। यदि किसी वस्तु की स्थिति को हम पहली अवस्था कहे तो उस वस्तु के विनष्ट हो जाने पर जो वस्तु अथवा स्थिति उत्पन होगी उसे प्रतिपोध की अवस्था कहा जायेगा, फिर इस वस्तु के भी विनष्ट और विलीन हो जाने पर जो नवीन स्थिति उत्पन होगी, उस तीसरी अवस्था को प्रतिपोध का प्रतियोध कहा जायेगा।' वग एव वर्ग सघर्ष मकाइवर के अनुमार--'किसी वर्ग का अथ ऐसी श्रेणी अथवा प्रकार से है जिसके अतर्गत व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह आते हैं ।" यह परिभाषा वग के सामाय स्वरूप को प्रकट करती है, जो आदिम मानव समूहा अर्थात कबीला पर लागू होती है। काम के बंटवारे ने समाज को दो श्रेणियो मे बांट दिया है, पोपको और शोपितो । लेनिन के अनुमार -'वग वह चीज है जो समाज के एक भाग के श्रम को हडप लेने का अधिकार बनाती है। यदि समाज का एक भाग सारी १ राहुल साकृत्यायन, वैज्ञानिक भौतिकवाद, पृ० ४६ 2 Ds Z A Almad, Philosophy of Socialism Introduction, P 18 ३ राहुल साकृत्यायन, वनानिय भौतिकवाद, पृ० ७३ ४ आर० एम मकाइवर तया सी० एच० पैज, सोसायटी, पृ०३४८ १०४ भूमि हडप लेता है, तो समाज मे दो वर्ग जमीदार और किसान बन जाते हैं । यदि समाज का एक भाग तमाम मिलो, कारखानो, शेयरो, और पूजी पर अधि- कार कर लेता है और दूसरा भाग इन कारखानो मे मजदूरी करता है, तो समाज मे दो वग---पूजीपति और सवहारा वर्ग बन जाते हैं।' आतरिक असगतियों के कारण वर्गों मे सघप वगों के ज मकाल से ही होता आ रहा है मानव जाति का इतिहास वग सघर्षों का इतिहास है । ऐसी लडाई का अत या तो समाज का सारा ढाचा बदलने मे हुआ है या लडने वाले दोनो वर्गों की बर्बादी मे हुआ है। सर्वहारा अधिनायकत्व या एकाधिपत्य सवहारा अधिनायकत्व माक्सवाद का सार तत्व है । अधिनायकत्व अर्थात सर्वहारा की अखण्ड शक्ति द्वारा सवहारा वग पूजीवादी का अत तथा समाज- वाद का निर्माण कर सकता है । 'मवहारा एकाधिपत्य एक क्रातिकारी शक्ति है, जिसका आधार पजीपतियो के विरुद्ध बल का प्रयोग है।" जहां तक समाज वादी क्राति का मबध है माक्स के वग मघप के सिद्धांत का यही आशय निकलता है कि सवहारा वर्ग शासक वर्ग के रूप मे सुसगठित होकर राजसत्ता पर अपना एकछत्र अधिकार जमा लें। मर्वहारा अधिनायकत्व के तीन पहल हैं । जोर जबरदस्ती का पहलू सवहारा अधिनायकत्व का पहला पहलू है । रचनात्मक पहलू दूसरा आधार पहलू है और शैक्षणिक इसका तीसरा पहलू है। राजसत्ता के लोप और वर्गहीन समाज की अवधारणा राजसत्ता का लोप और वगहीन समाज की स्थापना माक्सवाद का लक्ष्य है । सवहारा अधिनायकत्व तो उस लक्ष्य तक पहुँचने का प्रारभिक साधन मात्र है । सवहारा को सत्ता स्थापित हो जाने के बाद वह उत्पादन के समस्त साधनो को सामाजिक घोपित कर देगा । उत्पादन के साधनो पर समाज का अधिकार हो जाने पर मात्र उत्पादन को पद्धति का भी अत हो जाएगा। आर्थिक व्यवस्था मे इस प्रकार सुधार हो जाने से वग सघर्ष का मूल कारण ही समाप्त हो जायेगा। १ लेनिन, समाजवादी विचारधारा और संस्कृति, प्रगति प्रकाशन मास्को, ३ २ स्टालिन-लेनिनवाद का मूल सिद्धात, प० ३६ The class struggle necessarıly leads to the dictetorship of thc probefarit Letter from Mart to Joseph Weydeme year, March 5, 1852 १०५ मार्क्सवादी चिंतन में कला और साहित्य संवधी मान्यताएँ मानमवाद पला के मूल को मानव जीवन के भौति विपास पी सापेक्षता मे ही देखने और समझने में विश्वास करता है। वह कला पा अस्तित्व भौतिर जीवन से अलग नहीं मानता। कला भौतिक जीवन की ही अभिव्यक्ति परती है । पला मनुष्य के चारो ओर की दुनिया को प्रतिविम्बित करके हमें इस दुनिया का बोध प्राप्त करने में सहायता देती है और राजनीतिष, नैतिष एव पलात्मक गिमा के शक्तिशाली पर मायाम करती है।' कला को किसी व्यक्ति विशेष ने आरम्भ नहीं दिया, अपितु उसका विकास मानव जीवा के साथ-साथ हुआ है । आज माधुनिक अर्यो मे जिस कला को सशा प्रदान की गयी है वह वास्तव में अति प्राचीन काल से चली आयी विकास की एक लम्बी प्रक्रिया का परिणाम है, जिसके सूत्र मानव-जीवन के सामाजिक और सास्कृतिक विकासश्रम के साथ अविच्छिन रूप से सम्बद्ध हैं।' कला और साहित्य की प्रेरणा माक्र्सवादी धारणा के अनुमार कला की प्रेरणा का स्रोत व्यक्तिपरक न होकर मूलत सामाजिर है। पला सामाजिर चेतना का विशिष्ट रूप है और इस नाते उसका मूल जन-समुदाय ये भौतिक क्रिया व्यापारों मे है, जिसके सूत्र किसी विशिष्ट उत्पादन-पद्धति के अतर्गत प्रतिफलित होने वाले सामाजिक सबधो से सम्बद्ध हैं। कलाकार की समस्त काल्पनिक सृष्टि उसी वस्तु जगत का प्रति- विम्य हैं, जिसमे सप्टिकर्ता रहता है । यह कल्पना सप्टि वस्तु जगत के साथ उसके सम्पक तथा जगत की वस्तुओं के प्रति प्रेम या घणा का पल है। वास्तविक जीवन के अभाव मे फ्ला साधना अपूर्ण है फ्ला के मूल पेरणा उसके तत्त्व उस आत्म-सम्पदा के अग होते हैं जो अपने वास्तविक जीवन मे सवेदनात्मक रूप से अजित की जाती है । निष्कपत माक्सवादी चितकों को मा यताओ के आलोक में पहा जा सकता है कि सजनात्मक चेतना को प्रेरित करने वाली प्रतिभा नैसगिक होती है, वितु अपने विकास के लिए वह सामाजिक सम्पद एव वस्तुगत यथाथ पर निभर करती है । १ वि० अफ्नास्येव-माक्सवादी दशन, पृ० ३१७ २ Christopher Caudwell illusion and Reality, p 28 V I Jerome, Culture in a Changign world, p 69 रल्फ फाक्स-उप यास और लोक जीवन, पृ०१३ डा० रामक्शिा सैनी-आधुनिक हिदी के महाकाव्यो मे पाश्चात्य चिंतन, प०७५ ३ ४ साहित्य और राजनीति सभी देशों के माक्सवादियों की पुकार रही है कि प्रगतिशील लेखक का पार्टी लेखक होना चाहिए। ल्फ पायस ने लिखा- 'शतिकारी मेखक सदा पार्टी लेप हाता है। इसका मतलब यह नहीं वि वह दिन प्रतिदिन की समस्यामा पर पार्टी के नारे लाग करता है, वरन् यह पार्टी की चेतना को समथन देने के लिए नमी चेतना का साहित्य मजन किया करता है।" गोर्वी साहित्य और राजनीति की पारस्परिस्ता का पट्टर ममथक था और पार्टी के नेतृत्व म ही साहित्य की रचना करन के पक्ष में था।' साहित्य का प्रयोजन माक्सवाटी चितन कला और साहित्य की सोद्दश्य रचना में विश्वास करता है । यह कला बना के लिए शिक्षा तवा तीव्र विराध करता है । उसको धारणा है कि काव्य जीरन के लिए है और जीवन का सत्य स्वरूप का चित्रण और उद घाटन ही काव्य का उद्देश्य है। मामवाली चिन्तन साहित्य का उद्देश्य जान कल्याण और सामाय जन जीवन उत्कर्ष में सहायक होती है। - आधुनिक हिन्दी के राजनीतिक उपन्यासो मै मार्क्सवादी चितन की अभिव्यक्ति माक्सवादी विचारधाग का आविभाव पश्चिमी विश्व मे हुआ । आरम्भ में भासवादी विचारधारा यूरोप के पश्चिमी देशा तक सीमित थी, परतु सोवियत सघ की स्थापना विश्व इतिहास की एक ऐसी पटना थी जिसने समस्त ममार को मावसबाद की ओर आकर्षित किया। हिन्दी साहि य पर माक्सवाद के चितन का प्रभाव इतना व्यापक है कि उसका कोई भी साहित्य रूप उससे अछूता नहीं है। उपयाम भी इस विचारधारा से अधिक प्रभावित रहा है। साहातरीहिदी के राजनीतिक उप यासों में माक्सवाती चितनको निम्नलिखित प्रतियो के रूप में देखा जा सकता है। २ डा० धमवीर भारती~~-प्रगतिवाद एवं समीक्षा पृ० ११० डा० रवी द्रनाथ श्रीवास्तव-~-विदेशी माक्सवादो समीक्षा शोषक निवघ, समालाचक सितम्बर १९५६, ०४२ Marxım Goaky Literature and Life, p 137 डा० जनेश्वर वर्मा-हिदी काव्य म माक्सवादी चेतना भूमिका, पु०६ ३ १०७ ७ १ वग वंषम्य और वग-सघप की प्रवृत्ति । २ कातिमत चेतना। ३ शोषित, दलितो के प्रति सहानुभूति । ४ शोषण के विरुद्ध हिंसा की अभिस्वीकृति । ५ उपनिवेशवाद का विरोध । ६ पला जीवन के लिए' सिद्धात वा समर्थन । जन शक्ति में आस्था। थम की महता का प्रतिपादन। सम वितरण का सिद्धात । १० राजसत्ता का लोप एव आदश साम्यवाद की परिकल्पना । वग वैषम्य और वर्ग मघप की प्रवृत्ति माक्सवादी जीवन दशन के अनुसार प्रत्येक देश और बाल मे समाज दो प्रमुख वर्गों में विभक्त रहता है । एक वग विशेषाधिकार प्राप्त उत्पादन के स्वामियो अर्थात् शोपको का होता है और दूसरा बेग श्रमिको अर्थात् शोपितो का । इन दोनो वर्गों के हित परस्पर विरोधी हाते हैं। कालमावस की धारणा थी कि पूजीपति वग और सवहारा वग में वग सघप अनिवार्य है तथा अत मे पूजीवाद का विनाश और सवहारा वर्ग की विजय निश्चित है ।' फातिमत चेतना शोपण पर आधारित पूजीवादी व्यवस्था को बदलने के लिए माक्सवादी चितन सुधारवाटी उपायो मे विश्वास न कर क्राति द्वारा आमूल चूल परिवतन पर जोर देता है। काति के पृष्ठभूमि के रूप मे सवहारा वग के मगठन उनमें वग चेतना के सचार, वर्ग सधप और अदोलनकारी प्रवत्तियो को प्रोत्साहन देता है । सत्ता हथियाने के लिए सवहारा वग द्वारा विद्रोह और क्राति आवश्यक है । माक्मवादी चितन के काति सिद्धात का प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव हिदी साहित्य पर भी पड़ा है। शोपित और दलित वर्ग के प्रति सहानुभूति माक्सवाद शोषण का विरोधी और शोषित समुदाय का प्रबल समथक है। लेनिन के अनुसार-'समाजवाद ने सारी दुनिया मे मानव द्वारा मानव के समस्त शोपण के खिलाफ लड़ने का लक्ष्य अपने सामने रखा है। हम उस जनवाद को १ सुभाष कश्यप और विश्वप्रसाद गुप्त-राजनीति काश, पृ० ५६ २ डा० धर्मनारायण मिथ~समाजवाद, प०७३ J Stalin, Problems of Leninism, P 574 10 १०८ ययाथ महत्त्व देते हैं, जो शोपित के पाम आता है, उन लोगो के काम आता है जो हीनता की स्थिति मे हाल दिए गए हैं।" साहित्य म शोषित और दलित वग पे प्रति सहाभूति प्रकट करना मावमयादी चितन स अनुपरित साहित्य पारो की मुख्य प्रवत्ति है। शोषण के विरद्ध युद्ध और हिंसा की स्वीकृति मावसबाग चिता में सही गलत मारिणय परने से पूर्व दद्वात्मक भौतिक वाद को दृष्टि से उसका विश्लेषण परला आयश्यक होता है । सैनिन के अशुमार 'माक्सवाद, इस बात का निश्चय परने के लिए कोई विशेष युद्ध प्रगतिशील समझा जा सकता है या नहीं, वह जनवाद तथा सवहारा का हित साधन भरता है या नही और इस अथ मे रचित याय आदि है या नहीं, प्रत्येक युद्ध के ऐति हासिक विश्लेपण की अपेक्षा परता है ।" मायसयाद युद्ध में महत्त्व को उसके उददेश्य को दष्टि म रणार आता है । माक्सवाद साम्राज्यवाद की धार निदा करता है । शोपण, उत्पीडन के विरुद्ध युद्ध अनिवाय मानता है। उपनिवेशवाद का विरोध पूजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर वर्गहीन समाज की स्थापना करना मावमवाद का ध्येय है । उपनिवेशवाद पूजीवाद के विकास की ही एक अवस्था विशेष है । पूजीपतियो का एकाधिकार सघो के लिए जब अपने देश मे लाभप्रद ढग से पूजी के विकास के लिए क्षेत्र नही रह जाता तो वे पिछडे देशो का अपना उपनिवेश बनाते हैं और फिर लाभ अजित करने के बाद वहां की जनता का शोषण करते हैं । इसलिए मावसवादी अनुयायी उपनिवेशवाद का घोर विरोध करते हैं। 'कला जीवन के लिए' सिद्धात का समर्थन मनुष्य को कृति मे सोदय का योग क्ला बहलाता है। काल मानस क्ला की उपयोगिता के मस्थापक थे । माक्मवाद स्पष्ट शब्दो मे वला की सोद्देश्यता को स्वीकार करता है। वह 'क्ला क्ता के लिए' सिद्धात का विरोधी और 'क्ला जीवन के लिए सिद्धात का पक्षधर है । लेनिन-मोवियत सत्ता क्या है ? पृ० ६८ २ लेनिन-माक्सवाद का विकृत रूप तथा साम्राज्यवादी अथवाद, पृ०१० डा. शमविशन सैनी, आधुनिक हिंदी महाकाव्यो मे पाश्चात्य चितन, पू०६६ डा. नगेन्द्र (म.)-पाश्चात्य वाव्यशास्त्र माक्सवादी परम्परा, प० । ५ आधुनिक हिन्दी महाकाव्यो में पाश्चात्य चितर, ६६ १०६ जनशक्ति में आस्था मावसवाद में जनता का अभिप्राय उन लोगा से है जो काम करते हैं। वैमनस्यपूर्ण वग समाज मे ये ही शोषित होते है । दास समाज मे यह मुख्य तया दास लोग बी जमात थी और सामती समाज मे भूदासो और दस्तकारा की, पूजीवादी समाज में जनता में मजदूर वग, किसान, मेहनतकश, बुद्धिवादी और अय समूह, जो सामाजिक प्रगति मे योगदान परते हैं, शामिल होते हैं।' माक्स वाद जनता को अपूव शक्ति और उसकी निश्चित विजय में पूर्ण आस्था रखता है। श्रम की महत्ता माक्सवादी विचारधारा में मानव माल के लिए थम करना अनिवाय है। इस व्यवस्था मे निबटटू एव निठल्ने व्यक्तियो का स्थान नहीं है । पूजीवाद का विरोध इसलिए किया जाता है क्योकि वह श्रमियो को उचित मूल्य न देवर खुद सम्पूर्ण लाभ को हडप जाता है । श्रम को अनिवायता इस विचारधारा की प्रमुख शत है । लेनिन के शब्दो मे-~-'जो लोग काम नहीं करते उ अगर मता- धिकार से पचित पर दिया जाय तो सच्ची समानता होगी। जो काम नहीं करे, वेखाय भी नहीं । ' 'मनुष्य को श्रम करना चाहिए ताकि वह जीवित रह सके' ट्राटस्की का नारा था। सम वितरण का सिद्धात घग वषम्य के कारण समाज मे दु ख द य व्याप्त है, उसका कारण सुख सुविधाओ का असमान वितरण ही है । अगर सभी को एक जसी सुविधा, अवसर, समान, पद, वतन, समान अधिकार प्राप्त हो तो सघष का नाम ही नहीं रहेगा। व्यक्ति का समान शिक्षा, समान अवसर प्रदान करना, याय पाना और समाज में ऊचा उठने का अवसर दिया जाना चाहिए । डा० गणपतिचद्र का मत है कि भले ही हम माक्स विचारधारा से शत प्रतिशत सहमत न हो, वितु इतना तो सभी स्वीकार करत हैं कि श्रमिक वग को पूरा पारिश्रमिक मिलना ही चाहिए, चाह मजदूर को गरीबी अमोरो म न बाटी जाय, वितु अमीरो की अमीरी तो मजदूरा म बाटनी ही चाहिए । १ वी० आफस्नोव, माक्सवादी दशन, प० २३० २ लैनिन--सोवियत सत्ता क्या है ? प्रगति प्रकाशन, मास्को १९६७, पृ० २५-२६ ३, 'Man Must Work In order not to dre' --Anderson Thorton Master of Russian Marxism, P 128 डा० गणपतिचद्र गुप्त, हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास, पृ०७५७ , राज्य के लोप एव आदश साम्यावस्था की परिकल्पना साम्यवाद माक्सवाद का व्यावहारिक परिवद्धन है । साम्यवाद का प्रयोग विविध अर्थों में किया जाता है। कभी-कभी इसका अथ समाज के ऐसे सिद्धात के रूप में किया जाता है जिसमे सम्पत्ति पर सबका समान अधिकार हो । अय स्थलो पर साम्यवाद का प्रयोग समाजवाद के पर्याय के रूप में किया जाता है।' माक्स और एगेल्स के अनुमार साम्यवादी व्यवस्था के अतगत राज्य लुप्त हो जायेगा, समाज में सभी वर्गों की समाप्ति हो जायेगी, समाज मे शोपण करने वाले वर्गों का विनाश हो जायेगा परिवार, सम्पत्ति तथा धम का लोप हो जायेगा और उत्पादन इतना अधिक होगा कि वस्तुनो का वितरण काम के अनुसार नही आवश्यकता के अनुसार होगा।' मार्क्सवादी विचारधारा पर आधारित हिन्दी उपन्यास 'एक और मुख्यमत्री' उप यास मे साम्राज्यवाद का घोर विरोध दर्शाया गया है । भारत सन १९४७ मे अग्रेजो के चगुल से स्वतत्र हुआ लेकिन दुर्भाग्य से वह दो हिस्सो मे बट गया । अग्रेजो की चाल काम आयी, उन्होने जि ना को बरगलाकर अलग मुस्लिम देश 'पाकिस्तान की माग करवाई और अलग राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान' का जम हुआ। उसके परिणाम के सवध मे लेखक का मत है कि-'साम्राज्यवाद के पोपक और फूटनातिज्ञ जग्रेजो की चाल ने जिना जैसे मुस्लिम लोग के नेता को भड़काकर इस्लाम खतर मे है' जसे धार्मिक नारो को बुल द करवाया जिसन पाक्स्तिान का निर्माण कराया, उसने हिदुओ मे हि दुव की भावना को और तीव्र कर दिया। माक्सवाद ऐसी धार्मिक भावनाओ पर आधारित साम्प्रदायिक राष्ट्रा व साम्राज्यवाद का विरोध करता है। माक्सवाद पूजीवाद का कट्टर विरोधी है। वह सम्पत्ति के समान चत्वारे पर जोर देता है एव पसे के आधार पर सत्ता और नेतागिरी का विरोध करता है । 'एक और मुख्यमत्रो' में माक्स के इस दष्टिकोण का समर्थन किया गया है। यथा--'बिना पैसे आज की नेतागिरी पगु है । सफल नेता वही बन सकता है जो या तो बिल्कुल निक्डमी हो या जिसकी तिजोरियो में चांदी के सिक्के नाचते हैं । १ सी० ई० एम० जोड, आधुनिक राजनीति सिद्धात (हिदी सस्करण), प्रवेशिका, पृ०६१ ६२ २ डा० धमनारायण मिश्र, समाजवाद, पृ० ६७७ ६७८ ३ एक और मुख्यमत्री, पृ० १६ पैसा जातीयता मा जोर, तिषडम, शूठ, पठोरता, धर्म या नाम । नेतागिरी।" माक्सवाद मे धम और जातीयता के नाम पर शासन करने की कल्पना भी नही की जा सकती है। उपयास का मानायर अरविद अपनी राजनीतिक सीढ़ी पर सफलता के साप चढ़ रहा है, उसरे समक्ष कई पाटिया थी। शापित और गरीबो का प्रति निधित्व करने वाली पम्युनिस्ट पार्टी भी पी। लेखा के शब्दो मे-'माक्स और एजल्स की सबसे बडी ऐतिहासिक देन यह है कि उहोंने संसार के सभी देशो के मजदूरों को उनके अपने पत्तव्यो में प्रति सचेत किया और उनकी अपनी मेहनत की भूमिया बतलाई । पूजीपतियो के खिलाफ लड़ाई शुरू करनी चाहिये और इस लड़ाई में सभी मेहनतकशा और शोषितो को अपने साथ एकत्रित करना चाहिए।' इस तरह लेखक ने शापितों के संगठन को मा यता दी है। सामस वग का विरोध भी इस उप यास में वर्णित हुआ है । हैदराबाद मे सामतो के विरोध में विद्रोह किया गया। पूजीवाद की समयक और सामतो को हितषी पार्टी पाग्रेस पी जा विसानो का पसद नही पी। सधप हुआ और वहां पहली बार जनता का शासन स्थापित हुआ। कम्युनिस्ट पार्टी अपने नतृत्व में साम्राज्य- वादियो के खिलाफ जनता का रागठित करके उ हे अपने सही अधिकार दिलाने मे सबपरत एव प्रयत्नशाल है।' लय का विश्वास है kि-'सवहारा के उत्पी- नये मम वा समझकर दुनिया में मजदूर एक हो' का नारा बुल द करने वाली यह जनवादी संस्था एक दिन अय की विषमता मिटाकर विश्व मे मजदूरो एवं किसाना को सावभौमिक सत्ता स्थापित करने में अवश्य सफल होगी। जन सेठ प्रीतमवद को मिल ये मजदूर स्थायी होने व पूण अधिकार के लिए हडताल कर दते हैं तब सेठ प्रीतमघद अपने सरीखे उद्योगपतियो के सहारे देश की अथ-व्यवस्था चलाने का दम्म भरते हुए अरविद से कहता है---'कुछ पम्युनिस्ट हमे लूटना खसोटना चाहते हैं। आप जसे समझदार मत्री चुप हैं । ऐसा क्यो ? देश की आर्थिक स्थिति हम उद्योगपति वनाए हुए हैं या ये मजदूर?'५ माक्स ने उद्योगपतियो के इस प्रश्न का जवाब दिया है । पूजीवादी व्यवस्था के पोपर यह समझते हैं कि अथ अवस्था उही की बदौलत चल रही है जबकि सच्चाई बिल्कुल इसके विपरीत है। १ एक और मुख्यमत्री, पृ०७२ २ वही पु०५१ ३ वही, प० ८२ ४ वही, पृ० ८२ ५ वही, पृ० ६४ आज भ्रष्ट लोक्तायिय व्यवस्था मे मजदूरो को अपने अधिकारी से दिस प्रकार वचित किया जाता है उसरा लेखा ने ययाय चिन खीचा है । 'माक्सवाद मे भाई भतीजावाद को योई स्थान नहीं, बल्कि सब को समान अवसर प्रदान किये जाते है । जति पूजीवादी व्यवस्था में सयको समान अवसर प्राप्त नहीं होते।' सेठ रतनलाल शची को यहता है-~-'तुम्ह मालूम ही है कि अरविंद जी की कृपा से मैंने अपने प्रात मे तो मिलें और लगा ली है। लाखो का 'लोन मिला सरकारी । अच्छो प्रगति की है मैंने । दूसरी प्रगति की है के द्रीय वाणिज्यमन्त्री के भतीजे ने । एक पाम मे मामूली सा क्लक था जो आज तीन सहकारिता के आधार पर चलने वाले उद्योगो का मालिक है।" इस तरह पूजीवादी व्यवस्था में मजदूरी के अधिकारो और सहकारी समितिया का लाभ उच्च वर्ग के लोग ही प्राप्त करते हैं। मजदूरा को सघप करते समय सगठित रहना बहुत आवश्यक है । हमे अपना सघष शातिपूर्ण तरीके से करना चाहिए । पाग्रेस के शासक समाजवादी व्यवस्था का नारा अवश्य बुलद करते हैं पर वह अपना और अपने देश का विकास पूजी वादी तौर तरीको से कर रही है ऐसे में मजदूरी को सगठित हावर सधप करना चाहिए। हमारी सरकार समाजवादी बहलाना पस द करती है लेकिन मजदूरो के वाजिब आदोलन को कुचलने के लिए पुलिस का इस्तमाल करती है । लेखक के शब्दो मे---- यह समाजवादी समाज के स्वप्न देखने वाला देश कौन से समाजवाद को परिकल्पना कर रहा है ? कौन से रक्तहीन समाज की स्थापना होगी इन लोगों पर 'सबहिं नचायत राम गोसाई' में मोतीलाल को मिल मे मजदूर वेतन के अपने अधिकार को लेकर हडताल कर देते हैं । राधेश्याम उनकी मांग को स्वी- कार कर लेता है तो तय मोतीलाल यह उठता है-'कह तो दिया पट्ट से कि मांगें मान लेते हैं । सो आदमियों को हराम की तनख्याह देनी पडेगी और बीस हजार की चप्पत ऊपर से पडेगी।" स्पष्ट है कि उद्यागपति मजदूरी के वाजिब हको को स्वीकारते क्तिने दुखी होते हैं । मुख्यमनी जबरसिंह के पास उसी का रिश्तेदार नौकरी प्राप्त करने जाता है तो वह रहता है-'हमारी सरकार ने जमीदारी घत्म कर दी है, यह मेहनत- कश मजदूरो और किसानो का राज है, शोषण, उत्पीडन बद। ये सिद्धात सबके लिए नहीं था, सिफ रिश्तेदारो के लिए है। राधेश्याम को पली गगादेवी को पूजीवादी व्यवस्था का अच्छा खासा ज्ञान था, उसने कामरेड रवीद्र से कहा-'इसका मुनाफा पहले तो मजदूरो और कायकर्तामा पो मिलेगा, बोनस के रूप मे, फिर सरकार को मिलेगा विभिन करों एवं इनकमटक्स के रूप मे, इम सबसे जो कुछ बचेगा, वह हम लोगो को मिलेगा। महाभोज' में दलित और शोपित वग के विसू व उसके साथियो पर पुलिस तथा लाक्तानिक समाजवादी व्यवस्था के भ्रष्ट राजनीतिनो के अत्याचार को बतलाया गया है । बिसू के हत्यारे को राजनीतिय शरण मिलने पर लोचन बाबू कहते हैं-~-'अत्याचारी को सरक्षण दो और पीडितो को कुचलो। यही थे हमारे आदश और सिद्धात, जिसे लेकर चले थे हम " लोचन बाबू कहते हैं कि- 'मजदूरो यो सरकारी रेट पर मजदूरी न मिलना आदमियों को जिदा जला दिया जाना दिन व दिन वो अत्याचार---असुरक्षा विसू की मौत सबसे तो चार चांद लग रहे हैं न पार्टी की इमेज पर ? पार्टी का ध्यान ही किसे रह गया है आज १५ वास्तव में आज की तथाकथित समाजवादी सरकार की ऐसी ही नीतियां हैं । दत्ता साहब दा साहब से कहते हैं कि- गाव मे पहले ही तनाव है और यह जायेगा । आपस मे ही मार-काट मचेगी। और इस सबका परिणाम पिसेगा बेचारा गरीबो का तबका । सम्पन लोग तो जसे तसे बच ही जाते हैं--पसे के जोर से, ताकत के जोर से | मरता है तो गरीब हो, है न? नहीं नहीं । यह बात सही है कि अत्याचार मजदूर, गरीब १ सबहि, नचावत राम गोसाई, पृ० ३४ २ वही, प० १४० ३ वही, पृ० १६१ ४ महाभाज, प०५८ ५ वही, पृ० ५६ इन । ६ वही, पृ० लोगो पर होते आये न वि अमोरों पर होता है। श्रयण कुमार गोस्वामी ये उप पास 'जगलतत्रम' की पथा जानवरो ये प्रतीको को लेकर लिखी है । नाग पूजीवाद का प्रतिनिधित्व करता है । इसके शिवजे मे तडपते हुए आम आदमी का चित्रण किया गया है । वह आम वस्तुओ का इतना सग्रह अपने गोदामो मे कर लेता है कि आम आदमी एक-एक दाने का मोहताज बन जाता है। इसमे लेखक पूजीवाद का विरोध पर शासन आम आदमी, दलिन और शोपित वग के हायो देने का सुझाव रखता है। इसी उद्देश्य से कारखानो और वैया का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है । प्रदीप पत ने 'महामहिम' मे लोक्तात्रिक सरकार में मजदूरो के शोपण का विरोध करते हुए उसमे चल रहे आगेलनो का वर्णन किया है । जसे कुछ महिलाओ ने वैनर हाथो म लिए हैं, उस पर लिखा है-'क्सिाना को सही दाम दो, बेरोजगारा को शाम दो।" उनका नारा था-'रोटी, कपडा और मकान दे न सके जो, वह सरकार निकम्मी है। जो सरकार निकम्मी है, वह सरकार बद लनी है।" मूल्यवद्धि के कारण कुछ ट्रेड यूनियनो मे भी अपना आदोलन आरम्भ कर दिया। पूजीवादी समुदाय की तरफ से इस आदोलन को बबरता के साथ दगा दिया जाता है। 'हजार घोडो वा सवार' मे निम्न श्रणी के लोगो पर सामत वग व राजाओ के गरदावगे के शोपण का यथाथ चित्रण किया है । लेषक ने अमीर गरीब का भेद सूर्योदय के आधार पर किया है-- सूय उग आया था, घूप पसर गई थी सफेद चादर-सी' । जा ताजा धूप मवर्गों के लिए ताजगी और उत्साह और आन द बिखेरती थी, वहा हरिजनो के लिए चिता, सघप और शोषण की गर माहट फैलाती थी।" जब हमीद खां भगिन सुनगडी को मार रहा था तो मेधू उसको छुडाता है । उपयास का नायक अपने बापू मेधू को शोषण के विरुद्ध आक्रोश भरे शब्दो मे मुक्का तानकर कहता है-'बापू मुये ही उस वगत बड़ी रीस आयी थी । सोच रहा था कि मुक्के ही मुक्के मारकर इस जमादार के दात तोड डालू । हरिजनो पर सामतो के शोषणो व रूढियो का वणन है । गीधू क्रातिकारी विचारा से युक्त पात्र है। इसकी आवाज को सामत वग, जमीदार और राजाओं के आदमियो द्वारा शक्ति के बल से दबा दिया जाता है। कितना १ महामहिम, ५०६७ २ वही, ५०६७ ३ वही,१० १५२ ४ हजार घोडो का सवार, प०१४ ५ वही, पृ० १६ - विचित्र शोपंग। हर सबल निबल का शोषण करता रहता है । हे भगवान् । यह शोपण कर पत्म होगा? उसे सहसा बाबा अलगरजिया बाबा की याद हो आयो। अलगरजिया बाबा जरूर समता की बात करता है। जाति, धम और अभिजात वग द्वारा शोपित जन के शोपण के विरुद्ध आग भरे शब्द उगलता गोधू बाबा को पूछता है कि बाबा यह शोपण और अत्याचार कर समाप्त होगा तो अलगरजिया बाबा उसका उत्तर देते कहते हैं---'उसके लिए एक स्वतत्र चेतना और सगठन की जरूरत है उस सगठन द्वारा सारा सवहारा वर्ग अपनी शक्ति से उस राज्य की पुनस्र्थापना करेगा, जहाँ कोई वग नहीं होगा। जहाँ निजी सम्पत्ति भी नहीं होगी । जहाँ तमाम लोग मिलजुल कर काम करेंगे और सारे सुखा व आनदी का मिलकर उपभोग करेंगे । जहाँ दासता नहीं होगी। जहाँ शोपण नहीं होगा। क सुदढ समानता होगी । वहाँ ईश्वरीय राज्य होगा। ईश्वरीय सत्ता का सीधा तात्पय है कि प्रजा की अपनी सत्ता होगी।" यहा लेखा सवहारा वग और उसकी सत्ता म विश्वास व्यक्त करते हैं। इसमे एक पान है जो माक्सवाद के सिद्धाता से प्रभावित है वह है हरि नारायण विस्सा । हरिनारायण नागा को कहता है-बाबा ! जिसके पास उत्पादन की लगाम है, वही स्वामी है, उत्पादन के साथ ही उत्पादक के पास समृद्धि आती है। वह फिर अपना एकाधिकार कायम करता जाता है । इस तरह धीरे धीरे स्वामी को निरकुशता बढ़ती जाती है । वह समाज भे वगहीन समाज की परिकल्पना भी करता है। स्वामी सदानद गोधू को रहता है-- 'य धम के ठेकेदार, पूजीपतियो से मिलकर आम आदमी का शोषण करते हैं अनपढ़ व गवार लोगो को नि:य करते हैं।" बासू गोधू को राखाल मुखर्जी की साम्यवादी परिभाषा बतलाते हुए कहता है -'साम्यवाद में राजनीति का अथ भाई भतीजावान, भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी और पुलो व बांधा मे सीमेट की जगह राख मिलाना नहीं है, बल्कि वहाँ राज- नीति पा अथ देश का निर्माण करना है । व्यवस्था में एक आमूल चूल परि- वर्तन । निश्चि ते जीवन । गोधू को कभी कभी अलगरजिया बाबा के शब्द याद हो आते थ, वगहीन समाज की रचना कैसे हो ? उसके लिए तो आधिक - १ हजार घोडो का सवार, प० १४६.१४७ २ वही, पृ० १४६ ३ वही, पृ० १५७ १५८ ४ वह१० १६८ ५ वही, पृ० ३१६ भेदभाव मिटाने पड़ेंगे। पेशा के द्वारा बनी जातियो यो फिर समाप्त परना होगा । वर्णाश्रम के तहत जो कुछ भी गलत है उसे मिटाना होगा।" 'दारलशफा' में पूजीवाद के स्थान पर समाजवाद ने मजदूरो को सत्ता को अपनी सहमति दी है। पूरे देश में समाजवाद आयेगा पूजीपतिया का मुह पाला होगा। यह मुट्ठी यह मुद्री तो मजदूरो की एपसा का निशान है इसम बद है वक्त यो वह सुबह । जिसमा हजारो हजारो साल से दुनिया के तमाम मजदूरों को इतजार है।" 'शाति भग' के पात्र साम्यवादी व माक्सवाद का विरोध करते हुए पहते हैं- समाजवादी तो अराजक्तावादी है, पम्युनिस्ट विदेशी एजेंट है वासी सब देश को मुगलमानो के हाप वेच देना चाहते हैं । 'कम्युनिस्ट देश के दुश्मन और गद्दार हैं।" श्री यादवेन्द्र शर्मा चद्र ने अपने उपयास 'प्रजाराम' में भी माक्सवादी अवस्या का समर्थन किया है । पामरेष्ठ निखिल प्रजाराम को कहता है-'दर- असल पम्युरिस्ट पार्टी प्रधानमत्री की प्रगतिशील नीतियों का समयन कर रही है-जसे बको का राष्ट्रीयकरण, साम्प्रदायिक सस्थाओ पर प्रतिवध, सागडी प्रथा का अत कामरेड निखिल भावुकता के साथ प्रजाराम को कहता है कि-'हां भाई रूस के नेताओ और जनता ने नई व्यवस्था के लिए लम्या सघप किया था। माक्सवादी दशन के मद्धातिक व व्यावहारिक पक्ष को समझा था। क्राति के बाद वहाँ के जन जन ने एक ऐमी रचनात्मक लडाई लडी थी, जिसने जारशाही व सामती मूल्यो को समाप्त करके इसान की मून जावश्यक्ता, रोटी कपडा और मकान को पूरा किया। उहाले आदमी को एक निश्चित जीवन दिया, जिससे व्यक्तिगत दुराकाक्षाओ व सम्पत्ति के संग्रह की प्रवृत्ति मिटती गई। इसके उत्तर मे प्रजाराम अपने देश की स्थिति का ब्यौरा देता हुआ निखिल से कहता है, मैं कहता हूँ कि देश के इसानों का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षित व व्यवस्था से जुड़े अल्प मत से शोषित है। चद मुट्ठी भर लोग यहा के करोडा लोगो का भीपण शोषण कर रहे है । क्या यह अयाय नही ?" - १ हजार घोडो का सवार, पृ० ३५८ २ दारुल शफा, पृ० ५४ ३ शाति भग, पृ० १२० ४ वही, पृ० १२३ ५ प्रजाराम, प०३५ ६, वही, पृ०३६ ७ वही, पृ०३६ धीरेन्द्र अस्थाना के समय शब्द पर नहीं है' में नक्सलवादियों में वादी- लन और किसानो का सरपार के विरुद्ध विद्रोह मे मावसवादी चिन्तन से प्रभा- वित नजर आता है । नक्सलवादियों को सरकार जेलो ठूस रही थी, उनके साथ अमानवीय अत्याचार दिये जा रहे थे। उनकी पिटाई इतनी अधिक की जाती थी कि उनके लिए जिदा रहना नामुमकिन सा था। उनका केन्द्र स्थल था--- पालमत्ता । राजधानी के लाल किले पर लाल झण्डा लहराने की तमना रपने याले नक्सलवादी पाद्र स्थल था।" नैनीताल के एक होटल या मालिक आशू जो विचारो रो कट्टर माक्सवादी है । एक हिदी का साप्ताहित अवधार निकालता है-'ननीताल दपण। आशू जिस पार्टी को विलाग परता था उसके योद्धा कालेजो, अदालतो, विसान सभाओ, ट्रेड यूनियन और प्राध्यापको से लेकर बस ड्राइवरो और बैंक कमचारियो तक फले हुए है ।" इस तरह ये लोग माक्स- वादी विचारधारा के प्रबल समथर हैं। आशू भुवन को शालीनता और आत्म विश्वास के साथ अपना व पार्टी का उद्देश्य बताते हुआ कहता है-'जोते हुए लाग क्राति नही होती, काति के लिए विचारधारा का जन्म होता है। जिसके पास खाने के लिए कुछ नहीं है उसी सव हारा के द्वारा लाई जाने वाली क्राति अराजकता मे न बदल जाये इसी बात के लिए अति को एक रणनीति है और यह रणनीति सही विचारधारा के अतगत ही सफलता प्राप्त कर सकती है। मुफालिसी, बदहाली और दमन शोषण के शिकार करोड-करोडो लोगो की खुशहाली के लिए क्राति ही एक मात्र विकल्प है और इस काति को सही ठिकाने पर पहुंचाने के लिए जिस शख्स ने सही विचारधारा दुनिया को दी, सौपी उसके नाम से तुम वाकिफ हो-काल माक्स । माक्सवाद एक शब्द भर नहीं है, जैसे नवसलवादी एक गाव भर नहीं है। राष्ट्रवादी चेतना राष्ट्र शाब्दिक व्युत्पत्ति एव पारिभाषिक स्वरूप विश्लेपण पतमान युग मे 'राष्ट्र' शब्द प्रथमत और अनिवार्य रूप से राजनीति विज्ञान के सदर्भो से जुडा हुआ है । 'राष्ट्र शब्द मे मानव चेतना की भावात्मगता निहित है । 'राष्ट्र' शब्द 'सवधातुम्य ष्ट्रन' इस उणादि प्रत्यय के सयोग से 'रास शब्द' अथवा 'राज़ शोभने' धातु से बना है। इस प्रकार 'राष्ट्र' शब्द का अर्थ 'रासते चारू शब्द कुवते जन यस्मिन प्रदेश विशेषे तद् राष्ट्रम'-क्सिी प्रदेश के लोग एर १ समय एक श द भर नहीं है, पृ० १५० २ वही, पृ० २४ विशिष्ट भाषा द्वारा जहाँ विचार विनिमय करते है, यह स्थान विशेष राष्ट्र है।' 'राष्ट्र राज्य जन समुदाय, समाज, देश, प्रात आदि अपों में जाना जाता है। कोशीय अर्थ 'राष्ट्र' का अर्थ है राज्य, देश प्रजा।' 'राष्ट्र' शब्द का अंग्रेजी पर्याय नेशन (Nation) है जो लेटिन के 'नेशा (Natro) शटल से बना है । इरावा अय जम या वश से है । 'राष्ट्र' की सवसम्मत परिभाषा परना कठिन है । विद्वाना ने 'राष्ट्र के अनेकानेक तत्वो पर बल दते हुए परिभाषित करन या प्रयत्न किया है। डा० सुपीद्र के अनुसार 'भूमि, भूमिवासी जन और जन सास्कृतिक का समुच्चय 'राष्ट्र' है ।' डा० विद्यानाथ गुप्त ने 'राष्ट्र' को परिभाषित करते हुए, लिखा है-'पिसी निश्चित भौगोलिक इकाई पर बसा हुआ जन समुदाय जिसकी अपनी ही सभ्यता तथा सस्कृति हो, अपनी ही भाषा तथा घम हो एव अपनी ही विधि निषेध की परम्परा हो 'राष्ट्र है।" आजकल किसी राज्य का जन-समुदाय राष्ट्र है । इस प्रकार प्रत्येक राज्य एक राष्ट्र है और प्रत्येक नागरिक उस राष्ट्र का सदस्य है । बहुत से राज्यो मे कई राष्ट्र या राष्ट्रीय जन समूह रहते हैं । 'एक राष्ट्र के निर्माण हेतु पाच तत्वो की आवश्यकता होती है । निश्चित देश, जाति भाषा, संस्कृति और धम । कि तु धीरे-धीरे इन पांच तत्वो मे लचीलापन आया और राष्ट्र ने व्यापक स्वरूप ग्रहण क्यिा । अब एक निश्चित भू भाग पर बसने वाला जनसमुदाय, जो एक या अनेक जातियो का जन समुदाय हो, एक या अनेक भाषाओ मे बोलता हो, एक या अनेक धर्मों की मानने वाला हो, उसकी सस्कृतियाँ हो सकती हैं और जिसमे अपनत्व अथवा एकानुभूति को भावना हो, राष्ट्र की सजा से अभिहित है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता राष्ट्रीयता राष्ट्र के प्रति प्रेम भावना ममत्व या अपनत्व का भाव लिए होती है । वास्तव में राष्ट्रीयता को शब्दों में बाधना कठिन है। राष्ट्र के प्रति भक्ति ही राष्ट्रीयता है। राष्ट्रीयता ऐसी अनुभूति है जिसका उदभव मानव- घेतना मे होता है। श्री विद्यानाथ गुप्त ने राष्ट्रीयता के स्वरूप को स्पष्ट करते १ विद्यानाथ गुप्त, हि दी कविता मे राष्ट्रीय भावना, प० १ २ भार्गव आदश शब्द कोप, पृ० ५३ ३ डा० सुधी द्र, हिदी कविता मे युगा तर, प० ३७ डा० विद्यानाथ गुप्त हिदी कविता मे राष्ट्रीय भावना, प०५ डा० सुषमा कश्यप, स्वातव्योत्तर हिदी महाका यो मे राजनीतिक चेतना, ४ पृ०२९५ हुए लिखा है-'राष्ट्रीयता वास्तव मे मन की एक अवस्था है । वह व्यक्ति को राष्ट्रीयता के सून मे तभी बांधती है जब उसका ऐसे जन समूह से एक्त्व हो जाता है, जिसका रहन-सहन, रीति रिवाज, सस्कार तथा अन्य जीवन की समस्याएँ तथा बधन उसी के समान हो।" किसी राष्ट्र के जन-समुदाय के सामूहिक गौरव को अनुभूति का होना राष्ट्र यता का प्रमुख लक्षण माना गया है । डा० के० के० शर्मा राष्टीयता को आ तरिक भावना मानते है । राष्ट्रीय वस्तुगत न होकर अ त वरण से सबंधित है इसे अनिर्वचनीय भी कहा जा सकता है । राष्ट्रीयता एक प्राकृतिक जन की उस स्थिति का द्योतक है जिसके अनुसार वह राज्य से एक वफादारी के सबंध जुड़ा हुआ है। राष्ट्र और राज्य का सबध एव अतर राष्ट्र और राज्य लगभग सामानार्थी है । राज्य के लिए निश्चित भू भाग, उस भू भाग पर बसने वाला जन समुदाय सम्पूण प्रभुत्व सम्पन राज सत्ता और शासन व्यवस्था आवश्यक है । ये तत्व राष्ट्र के लिए आवश्यक है। राष्ट्र एक विकासशील सस्था है। राज्य व्यक्तियो का ऐसा समुदाय है, जो अय समु दाया से ऊपर है । एक राज्य मे कई राष्ट्रो का समावेश हो सकता है कि तु एक राष्ट्र मे कई राज्य नहीं हो सस्ते । विसी राज्य के निवासियो के लिए यह आवश्यक नहीं कि उनमे परस्पर राष्ट्रीय एकता की भावना हो ही। किसी भी राष्ट्र के जन समुदाय द्वारा उस राष्ट्र के सदभ मे मा य विचारधारा को राष्ट्र- वाद कह सकते हैं । माधुनिक राष्ट्रवाद की विचारधारा का विकास पाश्चात्य देशो और विशेष रूप से यूरोपीय राष्ट्रो के उदय के साथ हुआ । गूच महोदय राष्ट्रवाद को फामीसी राज्य क्राति का शिशु मानते हैं।' राष्ट्रवादी विचार पभी स्थिर नहीं रहे हैं । १८वी शताब्दी मे राष्ट्रवादी विचारो का उदभव हुआ। तब से राष्ट्रवाद का क्रमिक विकास होता रहा है । राष्ट्र को सुदढ बनाने वाले मुख्य तत्व हैं-(१) भौगोलिक एक्ता, (२) जातीय एकता, (३) विचारों या आदर्शों की एकता या समान सस्कृति (४) भाषा को एक्ता, (२) घम की एक्ता, (६) विदेशी शासन के प्रति समान अधीनता। अत राष्ट्रवाद राष्ट्र को भावनाओ से ओत प्रोत एम विचारधारा है। यह विचारधारा जड नहीं है बलि राष्ट्रीय जन समुदाय के चेतन मन मा यमि- १ विद्यानाय गुप्त, हि दी कविता मे राष्ट्रीय भावना Tot २ 'Nationalism 1s the child of French Revolutions" GP Gooch Studies ts Modren fistory,P 217 ३ डा० सुभाष कश्यप और विश्वप्रकाश गुप्ठ, Hiram, T०२४ Ter व्यक्त करती है। विश्व का अतर्राष्ट्रीय स्वरूप राष्ट्रवाद के महत्तम स्वरूप का ही परिणाम है । किसी भी प्रकार का सकुचित दप्टिकोण, चाह वह जातीय, धार्मिक सामाजिा अथवा भौगोलिक हो, राष्ट्रवाद का विरोधी है। विशुद्ध राष्ट्रवाद वही है जो जन समाज की इच्छाओ, सकल्पो तथा आकाक्षाओ मे तात्विक समवय उपस्थिति कर सके।' राष्ट्रवाद के प्रकार गष्ट्रीयता के विविध तत्वो पर राष्ट्रवाद के भी अनक प्रकार होते हैं । डा० सुधाकर शकर क्लवडे ने राष्ट्रवाद के निम्न प्रकार बतलायें हैं--(१) आत्रा- मक राष्ट्रवाद, (२) स्वय तप्त राष्ट्रवाद (२) उदारमती राष्ट्रवाद, (४) साम्य घादी राष्ट्रवाद (५) स्वाधीनतावादी राष्ट्रवाद । लियो मालिन राष्ट्रवाद के विकास की दृष्टि से तीन प्रकार निर्धारित किये हैं-(१) मुक्त राष्ट्रवाद-~- जिसका विकास १९वी सदी के प्रथमाद्ध मे यूरोप मे हुआ और पोलण्ड, ग्रीस, इटली, आयरलैण्ड आदि राष्ट्र अस्तित्व में आये। (२) अधिकार सम्पन राष्ट्रवाद-इसमे बुद्धिजीवियो का विशेषाधिकार होता है तथा इसका प्रारम्भ मध्यम श्रेणी के लोगो को प्रभावित करने के लिए होता है। (३) सर्वाधिकार. वादी राष्ट्रवाद। राष्ट्रवादी चेतना का विकासात्मक परिप्रेक्ष्य वैदिक कालीन राष्ट्रवादी चेतना प्राचीन भारतीय साहित्य में राष्ट्रवादी चेतना का क्षेत्र बडा व्यापक रहा । वेदो को भारतीय माहित्य का सबसे प्राचीनतम ग्रथ माना जाता है। ऋग्वेद मे राष्ट्र प्रेम से युक्त अनेक उदाहरण मिलते हैं । ऋग्वद काल मे भारतीय राष्ट्र की आयजाति ने आध्यात्मिक क्षेत्र मे ही नहीं अपितु आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रो मे भी उनति प्राप्त की थी। भारतीयों के परम पवित्र ग्रंथ वेदा में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। ऋग्वेद मे अग्नि, इद्र, मरुत का ही केवल गायन नही किया गया बल्कि इसके साथ तत्कालीन समाज के चित्र भी उपस्थित किये गए हैं।' डा. विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, राजनीति और दशन, पृ० २३ २ डा० सुधाकर शकर क्लवडे, आधुनिक हिंदी कविता में राष्ट्रीय भावना, पृ० ३६-३७ डा० सुधाकर शकर क्लवडे, आधुनिक हिंदी कविता मे राष्ट्रीय भावना, . १ ऋग्वेद मे उल्लिखित राष्ट्र शब्द से आर्यों की समस्त भावना के साथ देश, राज्य, जाति व सस्कृति सभी का समग्र चित्र उपस्थित हो जाता है। इस प्रकार वेदो मै राष्ट्रीयता की भावना को अभि पक्ति करने वाले अनेक सूत्र हैं। हो इसका स्वरूप देवताओं के कीर्तिगान मे, मातृभूमि के स्तवन मे, समृद्ध सामूहिक जीवन की कामना करने में देखा जा सकता है । यथा-'माता भूमि पुत्रों ह पथिव्या।" उपनिषदो व बाह्मण ग्रथो मे भी राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति अनेक स्थलो पर मिलती है । उपनिषदों मे जाति जीवन के उत्थान का सदेश देती हुई निम्न पक्ति को विस्मत नहीं किया जा सकता--'उठो जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सदा सघपशील रहो।" उपनिपद मे ही जातीय एकता का सदेश दिया गया है । भारत का प्राचीन नाम आर्यावत है और यह आयजाति की क्रीडा स्थली रही है । आपों ने जातीय एकता के द्वारा राष्ट्रीय एकता को सुदढ़ किया था। सस्कृत भाषा व तीथ स्थलो ने भी राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ किया । रामायण और महाभारत काल वाल्मीकि रामायण महाभारत श्रीमदभागवत गीता, कालीदास के महा- काव्य एव अय सस्कृत के प्रसिद्ध रचनाकारों यथा--माघ, भारचि, श्री हर्ष, बाणभट्ट आदि ने अपनी रचनाओ के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को एकसूत्रता और निरतरता प्रदान की है। पुराणो मे अनेक पूवकालीन कथाओ के माध्यम से जो चित्र प्रस्तुत किए गए हैं, उससे राष्ट्रीय एकता का ही प्रसार हुआ है। विष्णु पुराण में भारत की नदियां, हिमालय पवत और समुद्र का जिस प्रकार पणन किया गया है उससे राष्ट्रीय एकता बलवती हाती है- 'उत्तर यत्समद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वष तदभारत नाम भारतीयत्र सतति ।" जन-बौद्ध काल जन तथा बौद्ध काल मे इस देश में महाजनपद-म, मामी,गन, मल्ल, कुरू, पचाल आदि गणराज्य स्थापित थ। म यरवदम्या में अवर होते हुए भी राष्ट्र एक राष्ट्रीय चेतना से योनबाट ने हा जाति- १ अथववेद काण्ड १२, मूक्त १/१० २ 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वर्गाना ~ fermVली ३/१४ ३ विष्णु पुराण, अ०२, Free १२२ पति के भेद मिटाकर जनता की भाषा में ही जनकल्याण का प्रसार करके राजनीतिक एकता की भावना को भी प्रभावित पिया। आगे बौद्ध धम से प्रभावित होकर सम्राट अशोक ने राष्ट्रीय जीवन को सगठित पिया। सम्राट समुद्रगुप्त द्वारा आयोजित अश्वमेघ यज्ञ भारतीय राष्ट्रीय चेतमा को एक्ता को ही पुष्ट करता है। डा० राधा बुमुद मुकर्जी न लिया है-'यह सम्पूर्ण देश हमेशा से राजनीतिय म्प से एक तथा नवजीवन से प्रेरित एव गतिमान रहा है, यह नव जागत राष्ट्रीय चेतना विविध विचारा और कार्यों में अभिव्यक्त हुई है।" कुछ इसी प्रकार या विचार स्मिय महोदय ने भी प्रकट किया है-दो हजार वष से भी अधिक समय से यादश राजनीतिक एकता रही है।" मध्ययुगीन राष्ट्रीय चेतना मध्ययुगीन गष्ट्रीयता पी भ वनाएं इस देश की विविध अपभ्रश भाषाओ मे अभियक्ति हई हैं । इस समय देश अनेक छोटे छोटे टुकडो मे बट गया था। जातीय एव धार्मिक परमा सकुचित दप्टियोण एव राजनीतिक विदेश के पारण राष्ट्रीय भावनाओ के विकास मे कुछ बाधाएं उपस्थित हई । कि तु वीर गाथा काल अथवा चारण काल मे रासो साहित्य के द्वारा राष्ट्रीयता के कुछ स्वर अवश्य सुना दिए । मध्य युग हिन्दू और मुस्लिम सस्कृतियो का मम्मिश्रण का काल है । मघर्ष के बाद गेनो जातियो मे मेल-जोल बढा । घम इतिहास, रीति-रिवाज पला सगीत आदि के मेल से नयी भारतीय मुस्लिम सस्कृति का निर्मोण हुआ। हिदी और गर्द इस देश की आम जनता को भाषा बन गई। कबीर, दादू, नानक देव जायमी रदास सूफी कवियो और भक्तो नै राष्ट्रीय जीवन को पुन नया स्वरूप प्रदान दिया। तुलसी सर ने राष्ट्रीय जीवन को पुन सगठित किया और गति प्रदान की। ममित्रान दन पत के श दो मे- 'मध्ययुगीन दाशनिक सता तथा कवियो ने देश को सास्कृतिक विघटन और ह्रास से बचाया। रीतिकाल में राजनीतिक सामाजिक एव जातीय जीवन मे घोर पतन आ गया था। रीतियुक्त शृगारिक रचनाओ द्वारा राज्याश्रित कवियो ने अपने आश्रय दाताओ को प्रसन करने के लिए विलासपूण शृगारिख रचनाओ का निर्माण किया। डा० विद्यानाथ गुप्त ने लिखा है-'रीतिकाल मे- कोई ऐसा कवि दप्टि गोचर नही होता जिसने व्यापक रूप में राष्ट्रीयता का प्रचार कर सम्पूर्ण देश १ RK Mukerjee The Gupta Empire (2nd Edition) P 144 ૨ V A Smith, Ancient and Hjodu India (Part I) 1923, P 10 ३ सुमित्रान दन पत--चिदम्बरा, प्रस्तावना -- को एक सूत्र मे अनुस्यूत करने का प्रयास किया हो, परतु जो पाय उहोंने सीमित रूप में किया, वह राष्ट्रीय गौरव से खानी रही।" केवल भूपण न देश तथा जाति के लिए अपनी वाणी को मुखरित किया। आधुनिक युग में राष्ट्रीय चेतना १८वी शताब्गे मे मुस्लिम शासको की स्थिति कमजार हो गई और धीरे- धीरे उनका स्थान अग्रेजो ने ग्रहण किया । भारत मे राष्ट्रीयता का प्रथम उत्थान १८५७ चे स्वतत्रता संग्राम से प्रारम्भ होता है। देश के कुछ महान् समाज सुधा- रका ने राष्ट्रीय जागरण को अपना लक्ष्य बनाया और सास्कृतिक, जार्थिक, सामा जिन एव राष्ट्रीय आ दालन प्रारम्भ किये । अग्रेजा के आगमन से अग्रेजी साहित्य से उनके आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन की जामवारी प्राप्त हुई । १८८५ मे काग्रेस की स्थापना हुई। सन १८५० से १८८५ के मध्य भारते दु हरिश्चन्द्र का उदय हुआ । इहाने हिदी साहित्य को नवीन गति प्रदान की और राष्ट्रीय भावना का स्वरूप निर्धारित किया। १८६५ से १९२० त भारतीय राष्ट्रीय आदोलन मे तिलक प्रधान रहे । इनके बाद राष्ट्रीय आन्दोलन का सवालन गाधी जी के हाथ में रहा । अग्रेजो को कूटनीति ने इस देश के लोगो में हर तरह से कमजोर बना दिया था। कपटपूण नीति अर्थात 'फूट डालो और राज्य करों के द्वारा अग्रेजों ने इस देश का हर तरह से शोषण किया। गाधीजी के सत्य, अहिंसा, एव सत्याग्रह के सिद्धातो के आधार पर राष्ट्रीय आदोलन निरतर गति परडता रहा । सक्षेप मे यह कहना उचित है कि काप्रेस के स्वाधीनता आदोलन की प्रमुख घटनाओ-गम, नरम-दल की राजनीति, तिला का उग्र राष्ट्रवाद, जलियावाला बाग, सविनय अवज्ञा आदोलन, आजाद हिंद फौज का सगठन आदि का भारत की राष्ट्रीय एकता पर गहरा प्रभाव पड़ा है। राष्ट्रवादी चेतना की प्रमुख प्रवृत्तियाँ स्वदेश गौरव एव राष्ट्रभक्ति किसी भी देश की गुरुता, विशालता, समद्धि अथवा गुणवत्ता से उस देश के निवासिया मे गौरव की भावनाएं उत्पन होती हैं । स्वभावत व्यक्ति जिस देश मे जम लेता है, वह जिस समाज मे पल पर बड़ा होता है उस समाज और धरती से, उस स्थान से भौतिक सामाजिक परिवेश से जुड़ जाता है । नदी-नाले, १ विद्यानाथ गुप्त-हिंदी कविता में राष्ट्रीय भावना, पृ० १८८ - पन-पर्वत, दम सताएँ, खेत लिहान, पशु पक्षी, सबके साप तादारस्य-सा स्थापित हो जाता है । परियार, जाति, समाज, रीतिरियाज, भाय, विचार सभी उमके दुध सुय म भागीदार हात हैं । देशभक्ति के अभाव म राष्ट्रीयता समय नहीं है। 'देशभक्ति जनगणता और जन पस्कृति राष्ट्र ती पाश्व हैं, परतु देश- भक्ति आधार भूत है, उसके बिना 'राष्ट्रीयता' यी यस्ता नहीं की जा सक्ती।" स्वणिम अतीत का गौरवगान भारत या गौरव अक्षुण्ण है, येवल कुछ साल के लिए वह सुप्त हो गया था। देश में अतीत गौरव, अपने प्राचीन प्रय तथा उसको वीर गाथाओ के इतिहास की मुरमा ही जीवन म नव जागति का साधन बन सकती है। भारत का अतीत अति गौरवशाली रहा है । उसके स्वणिम अतीत के स्मरण से खोय हुए गौरव को पुन प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है । इससे देशवासियो में देशभक्ति के भाव पनपते हैं। राष्ट्र-वदना के स्वर एव प्रशस्तिगान राष्ट्र-यदना राष्ट्रीय भावना या प्रतिरूप है । देश के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करना ही राष्ट्रवदन है। किसी राष्ट्र पे महान् गुण ही उसके निवासियों को प्रेरित करते रहते हैं । राष्ट्रीय भावधारा हजारो वर्षों से एक रूप मे प्रवा- हित होती रहती है। राष्ट्र की हीनावस्था का चित्रण भारत अपने स्वणिम अतीत के लिए सदा से प्रसिद्ध रहा है, कि तु कुछ समय के लिए विदेशी आशाताओ ने इसके गौरव को धूमिल कर दिया। अग्रेजो ने राष्ट्रीय जीवन को एक प्रकार कायर और पगु ही बना डाला। अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी और बेकारी अग्रेजी शासन की देन है । स्वतत्रता के पश्चात भी भारत अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त नहीं कर सका। विदेशी शासन के प्रति आक्रोश तथा विद्रोह की भावना राष्ट्रीय जागरण के समय महान नेताओ ने अनुभव किया कि पराधीनता अभिशाप है । अग्रेजो के शासन में भारत की जनता उत्पीडित थी। धीरे धीरे अग्रेजो के प्रति भारतीयो के हृदय मे विद्रोह तथा आक्रोश की भावना घर करने डा० सुधी द–हि दी कविता मे युगातर प० २३६ २ डा० सुषमानारायण-भारतीय राष्ट्रवाद के विकास को हिदी साहित्य मे अभिव्यक्ति, पृ० ४४ । १ 7 लगी। १९१७ को रूसी क्रांति के परिणामस्वरूप वहाँ सोवियत समाजवादी राज्य को स्थापना हुई । भारतीय नेताओ को ज्ञात हो गया कि उनकी दीन-हीन दशा मा मूल कारण पराधीनता है। नेताओ ने जनता में विद्रोह के स्वर भर और दासता से मुक्ति प्राप्त करन हेतु सकल्प किया । नव-जागरण का उद्घोष राष्ट्रीय एकता के प्रसार मे छत्रपति शिवाजी का विशेष महत्त्व है । राष्ट्र- जागरण काय मे शिवाजी ने मुगल सम्राट औरगजेव का मुकाबला किया था। स्वतत्रता-मघर्ष देश को स्वतंत्रता मामानी से नही मिली। इसके लिए नारी पुरुषा, बाल वृद्धा ने अपने प्राणो को बलि दी है । काग्रेस की अगुवाई मे देश के नेतागणा ने अंग्रेजों की दासता से मुक्ति प्राप्त करने के लिए निरतर सधप किया और तभी सन् १९४७ मे दश स्वतन हुआ । राष्ट्रीय समृद्धि का महाभियान स्वतनता प्राप्ति के पश्चात् देश मे लोगो पर दोहरा दायित्व आ गया। एक तरफ स्वतत्रता की रक्षा करनी थी तो दूसरी ओर समद्धि के लिए सवल अभियान को आवश्यक्ता थी। सभी के प्रयत्ना से देश का माथिक विकास हुआ। भोगोलिक एकता की भावना प्रकृति ने भारत राष्ट्र को भौगोलिक रूप से विशिष्टता प्रदान की है। उत्तर में हिमालय, पश्चिम दक्षिण में अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बगाल की खाडी से परिसीमित है। यह नदियों का देश है, जिसमे हरे भरे मैदान धन- घाय से परिपूर्ण रहते हैं । जो सभी निवासिया में एकता का अहसास दिलाते हैं। इस प्रकार राष्ट्र को एकता के सूत्र मे बाधे रखने मे भौगोलिक एक्ता का महत्वपूर्ण योगदान है। जातीय एकता -- हजारो वर्षों से इस देश मे अनेक जातियां निवास करती रही हैं । देव, असुर, आर्यों, द्रविड, हूण, मुसलमान, ईसाई, मगोल आदि जाति के लोग आये और यही पर स्थायी रूप से बस गये । कई बार जातीयता के नाम पर सघप हा, वितु मत में सभी न मिलकर रहने या संकल्प व्यक्त किया। हिंदू मुस्लिम प्रग में पारण भारत-पाकिस्तान का बटवारा हुआ। सेविन फिर भी आज भी इस देश में हिन्द्रा इसाई, मुगलमान, पारसी एक साथ मिलकर रहत धार्मिक एकता की भावना भारत विभिन जातिया और धर्मों का देश है । आयों के समय से ही इस देश म अनय मत मता तर और धम पनपत रहे, मितु जाति और धम की बने पता उनकी भावात्मकता कायम नही कर सकी । अपनी धार्मिक नैतिक एकता की नीय पर आश्रित यह देश अखण्ड भार्यावत ये नाम से विख्यात हुआ। निष्कर्ष जाति, धम, सम्प्रदाय, भाषा और सस्कृति की भिनताआ के पारण कभी कभी ऐसा प्रतीत होता रहा है कि भारत कभी एक राष्ट्र नहीं रहा है किंतु पैदिक युग म लेकर रामायण, महाभारत, हपवघन से जाज तक भारत का राष्ट्रीय स्वरूप असण्डित रहा है। हां कभी-कभी इसकी भौगोलिक मीमाओ मे फेर-बदल अवश्य हुआ है । मिनता में एकता को अनुभूति भारत को एक सूत्र में बांधे हुए है । स्वातत्र्योत्तर भारत ने तीन बार विदेशी आगमणो का जिस तत्परता से मुकाबला किया उससे स्पष्टत परिलक्षति हुआ है कि भारत एक राष्ट्रवादी विचारधारा पर आधारित हिन्दी उपन्यास 'एक और मुख्यमत्री' में बतलाया गया है कि हिन्दुस्तान जनेक जातियो का निवास स्थान रहा है। यहां लोगो मे धार्मिक, जातीय, साम्प्रदायिक और राज नीतिक समवय विठाना जरूरी है। इसके बिना राष्ट्र की एकता का सवाल ही नही उठता है । कथानायक अरविंद हिंदू महासभा के सदस्या के सामने कहता है-ताक्त और शासन धम को सनातन नहीं बना सकते। धम का शाश्वत बना सकती है तो उसको अच्छाइया, उसकी सहिष्णुता और उसकी विशाल एकत्त्व भावना ।"जनतत्र दिवस के अवसर पर अरविंद अपने देश के गौरवशाली १ एक और मुख्यमत्री, पृ० २६ १२७ अतीत, स्वतंत्रता संग्राम और उसके पश्चात् देश की एकता तथा अखण्डता घे बारे में कहता है-'सन् १९४७ मे हमे अत्यत त्याग और सघप के पश्चात राजनतिक स्वतत्रता प्राप्त हुई और २६ जनवरी १९५० को अनेष कठिन संघों के पश्चात् हमारा देश सब प्रभुत्वसम्पन जनतत्र घोषित हुआ था। हमारी यह वास्तविक स्वतत्रता की मजिल थी । इसी ने हमारे जन जीवन को जाति, धम, रंग के भेदभाव से मुक्त समानता प्रदान की। आज भारत के प्रत्येक नागरिष के लिए सामाजिक, राजनतिक व आर्थिक क्षेत्र समान रूप से पुले हैं और उस याय प्राप्त होने के समान अधिकार प्राप्त हैं। अवसर ओर स्थिति की समानता और विचारो की अभिक्ति तथा संगठन की स्वतत्रता की यह वपगाठ है । अत हम सभी इसका अभिनदन करत है और भविष्य में लोक कल्याण की भावना के लिए इसकी नीव को मजबूत करने का सकल्प परते है ।" लेंषष ने राष्ट्रीय भावना का सबल बनाने के लिए साम्प्रदायिक एक्ता, आर्थिक, राज- नीतिक समानता व एकरूपता लान पा आह्वान किया । इही आधारों पर हो राष्ट्रीय एकता और जन-जन म राष्ट्रीयता की भावना प्रबल हो सकती है। स्थानायक अरविंद हि दुस्तानी मुसलमानो मे जो राष्ट्रीय भावना, साम्प्रदायिकता की भावना व उनम पक्के राष्ट्रवादी होने के बारे में कहता है- 'एक पत्रकार अरविंद स कहता है--सिफ इसलिए कि हम डवे की चोट नहीं वह सकते कि काश्मार हमारा है । पाकिस्तान हमारा तब तक दुश्मन रहेगा जब तक वह वाश्मीर के बार म अनगल आलाप परना बद नहीं करेगा। आप देख लीजिए एक दिन पाकिस्तान अमरिका और ब्रिटेन की गुप्त सैनिक सहायता के प्रोत्साहन स हमारे दश पर हमला करगा। यहां 4 मुसलमान दश द्रोह परेंग ।' पत्रवार की इस बात का करारा जवाव और हिदुस्तानी मुसलमाना की राष्ट्रवादी भावना,तथा दशभक्ति के बार में रहता है-'नही नही, भारतीय मुसलमान एस नहीं है । व पक्के राष्ट्रवादी है । देशभक्त है । मिस्टर तनेजा, क्या रूस म मुसलमान ही हैं । साम्प्रदायिकता के नाम पर आज अनेक प्राता म दगे फपाद हो रहे हैं। हिंदू सिक्ख और मुसलमान जातीयता के नाम पर एक दूसरे का खून बहा रहे हैं, जो अपने आपको योपला बनाते हैं साथ ही राष्ट्रीयता की भावना और राष्ट्र ये कमजार व उसके विकास म बाधा उत्पन कर रहे हैं। हिंदू और सिरपोका जो साम्प्रदायिक दगा हुआ उसी सबध मे अरविंद सोचता है-'उरो लगा कि सारे के सारे लोग उजाल के नाम पर अधेरे म जा रहे हैं, वज्ञानिक प्रगति के ३ १ एक और मुख्यमत्री, ५० १३८ २ वही पृ० २१३ ३ वही पृ० २१४ डेविड बनह नाम पर आध्यात्मिक अवनति मे गिर रहे हैं, सम्पूर्ण विकास के नाम पर छोटी छोटी सकोणता मे वट रहे हैं। राष्ट्र की एकता का नारा एक्दम खोखला हो रहा है। उसे कैसे सभाला जाय ? उसने नेत्र मूद लिए। उसने सोचा कि एक बार उसे देश का एकमात्र डिक्टेटर बना दिया जाय तो वह इन सभी समस्याओ का राष्ट्रीय स्तर पर समाधान प्रस्तुत कर दे। अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश मे अराजक्ता फैल जायेगी। उसकी अखण्डता टूट जायेगी। ओह ! मेरे देश के लोगो, आपको क्या हो गया है।" 'सबहिं नचायत राम गोसाई मै लेखक ने राष्ट्र की हीनावस्था का चित्रण किया है और अग्रेजी शासन के प्रति आक्रोश भरे शब्दो का प्रयोग किया है। हिन्दुस्तान स्वतन हो गया फिर भी कानपुर का निवासी बिटिश उद्योगपति का हि दुस्तानियो के साथ वही व्यवहार है जो उनका अंग्रेजी शासन के समय था । यह गयादीन से कहता है-~~ गयादीन, यह गांधी सुअर का बच्चा है। नेहरू सुअर का बच्चा है ।२ गयादीन को मालूम है कि महात्मा गांधी और पडित जवाहरलाल नेहरू न देश के जानवरो से गय-बीते आदमियो को मनुष्य की काटि मे लाकर खडा किया। उन व्यक्तियो के बारे मे इतने कडवे शब्द कहने पर गयादीन साहब (बर्नहम) को कहता है -'हजुर हरामी का पिल्ला है।" और ये शब्द कहार गयादीन ने अंग्रेजो के प्रति जो आक्रोश था, उसी भाव को प्रकट कर दिया । जबरसिंह के अदर राष्ट्रीयता की इतनी भावना प्रबल थी कि वह स्वाधीनता संग्राम मे कूद पडा-- वह मरो या मरो का नारा कहता हुआ आगरा पहुच गया । अपने दो विद्यार्षिया के साथ जबरसिंह रेल की पटरियां उखाडते हुए गिरफ्तार कर लिया गया। विद्यार्थी तो छोड दिए गए, जबरसिंह को सात साल की सजा हो गयी। 'राग दरबारी' मे रगनाथ शिवपालगज को देखकर सोचने लगा कि- 'महाभारत की तरह, जा कही नहीं है, वह यहां है, और जो यहाँ नही है, वह कही नही है । उसे जान पड़ा कि हम भारतवासी एक हैं और हर जगह हमारी बुद्धि एक सी है । उसने देखा कि जिसकी प्रशसा मे सभी मशहूर अखबार पहले पृष्ठ से ही मोटे अक्षरो मे चिल्लाना शुरू करते हैं जिसके सहारे बडे बडे निगम, आयोग और प्रशासन उठते, गिरते हैं, घिसटते है, वही दांवपेंच और पैतरेबाजी की अखिल भारतीय प्रतिभा यहां कच्चे माल के रूप मे इफरात स फैली पड़ी १ एक और मुख्यमत्री, पृ० २२१ २ सबहिं नचावत राम गोसाई, पृ० ४३ ३ वही, पृ० ४३ ४ वही, पृ०६ १२६ है। ऐसा सोचते ही भारत की सास्कृतिक एकता मे उसकी आस्था और मजबूत हो गयी।" रगनाय राष्ट्र समयक पात्र है। इस तरह देश की सास्कृतिक एकता और अखण्डता के सदध मे उसके विचार थे। यह उपयास व्यग्य शैली मे लिखा गया है। इसम समज और राष्ट्र की समस्याएं चाहे वे राजनीतिक हा, सामाजिक हो, आर्थिक और अतर्राष्ट्रीय समस्या हो, सभी को व्यग्य-शली के आधार पर ही लेखक ने पाठको के सामने प्रस्तुत किया है। चारी डकैती से राष्ट्र के विकास में बाधा उत्पन तो हाती है, साथ साथ देश का राष्ट्रीय गौरव दिनप्रतिदिन अधकार में चला जाता है। वद्यजी कहते हैं-'चोरी ! हकती । सवत्र यही सुन पडता है । देश रसातल को जा रहा है। 'फटरा बी आजू' मे उपयास के के द्र स्थल का नाम 'क्टरा बी माजू' नही वरन् 'कटरा मीर बुलाकी' है। यह माम्प्रदायिक तनावो से मुक्त मौहल्ला है, हिदू-मुसलमान एक साथ रहते हैं। जो भारतीय अनेकता को एकता के सूत्र मे बांधन के लिए एक प्रमाण है । शमसूमियों का लडका अब्दुल हक पाकिस्तान चला गया। वहां वह शरणार्थी की भाति दरिद्र-सा जीवनयापन कर रहा है। अब्दुल हक हिदू मुस्लिम दगो को कल्पना करते हुए चौक पडता है, जि हाने उसे अपन दश स दूर धकेल दिया और जिससे भारत की अखण्डता का विनाश हुआ। साम्प्रदायिक दगे सिफ हिदुस्तान मे नही होते वरन् पाकिस्तान मे भी हात हैं। यही हिदू मुस्लिम, ब्राह्मण, अछूत, महाराष्ट्र, तामिलनाडू मझगडे होते रहते हैं । वहाँ शिया, सु नी मुसलमान, कादयानी, वगाली और पजाबी बलव होले है। दानो ही सरखारें क्या जनता की सरकारें नहीं हैं । ये साम्प्रदायिक दंगे ही राष्ट्र की एकता में वाधक होते हैं। 'काली बाधा' मे राष्ट्र के निर्माण के लिए नारियो को आगे आने का आह्वान क्यिा है । जग्गी बाबू इसी सबध मे कहते हैं कि देश के निर्माण मे औरतो को भी आगे आना चाहिए। औरतें यानि हमारी आधी जनसख्या जब तक इस तामीर में हाथ नहीं बटायेगी तब तक हर काम की स्पीड आधी रहेगी यह बेहद जरूरी है कि हमारे घरो की औरतें आग आयें और हर काम म मदों का हाथ बटायें ।" वतमान मे राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आन के लिए जातीयता के नाम पर सत्ता प्राप्त करना चाहती हैं । यहो जातीयता की भावना राष्ट्रको समजोर और खोखला बनान का काम करती है। मालती इस जातीयता के नाम पर चुनाव लड़ने वालो का विरोध करती है और पहती है कि-'हम जातियों राग दरबारी, पृ० ५७ ५८ २ वही, पृ० ८५ ३ कटरा बी आज, पृ० ६२ ४ काली मांधी, पृ०७ १ ? के आधार पर भी चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योकि हमारी नीति विसी पास जाति के लिए नहीं है, पूरी जनता के लिए है ।" मालती एक जगह भाषण मे भी कहती है वि---'अगर हम हिदू और मुसलमान की तरह सोचते रहे तो यह मुल्क गारत हो जाएगा। 'महाभोग' मे वतमाT शासन-व्यवस्था में राजनीतिक दल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए जातिवाद को लेकर सत्ता प्राप्त करते हैं। जातिवाद का विरोध ही नाममात्र रिखावा होता है जो देश की भौगोलिक एकता की अखण्डता को रोक्ती है । लोचन वावू कहत हैं—'कौन देख रहा है अपना स्वाथ ? गरीब तवये के हित की बात करना अपने हित की बात करना है ? जातिवाद का विरोध करना अपना स्वाथ है । दा साहर गांवा, के लोगो मे बोलने की स्वतत्रता, अपने अधिकारो के प्रति सचेत, और अत्याचारो के विरुद्ध घोलन व उनमे नवजागरण उत्प न करने के लिए कहते हैं- केवल गांव की ही नहीं, पूरे देश की यही हालत हो गयी थी। आतक ने गले दबा रखे थे सबके कोई भी चू नही कर सकता था। हम लोग शुरू से यही तो कोशिश कर रहे है कि लोग दहशत से मुक्त हो निडर बनें खुलकर अपनी बात कहे। पर अभी भी जस लागो म डर है । सही बात कहने का साहस नहीं जुटा पाते।" महामहिम व्यग्य शली मे लिखा गया उप यास है । लेखक ने राष्ट्रवादी विचारधारा के तत्वा का विश्लेपण व्यग्यात्मक शली म किया है। मुख्यमत्री तोताराम जा राजनीति से अनभिज्ञ है और जातिवाद पर आधारित राजनीति का सख्त विरोधी है। 'हजार घोडो का सवार' मे अलगरजिया बाबा कातिकारी विचारो का पात्र है। उसका इस समाज और व्यवस्था से इतना आरोश है कि वह इस पिछडे वग का इससे मुक्त करान की ठान नेता है । धम क्या है उसके विचार हैं-यह भूख है न, वही असली धम है । इस धम के शिकार लोगों का नया धम बनाना चाहिए, वह धम होगा--मनुष्यता, गरीबी उस धम को मानने वाला आदमी जातिया म नही बट सकता उस घम के विरुद्ध एक और धम होगा-अमीरी । अलगरजिया बाबा इस राष्ट्र को विदेशी शासन से मुक्त कराने के लिए जनता में नवजागरण का उत्घाष करता है साथ ही उस अतीत के स्वर्णिम । १, काली आधी, २०१७ २ वही, पृ० ४० ३ महाभोज, प० ५८ ४ वही, प०७७ ५ हजार घोडा का सवार, १० १४७ दिनो को भी याद दिलवाता है । साथ ही कुत्सित परम्पराओ और रूढियो के परित्याग पर जोर देता हुमा कहता है कि-'तेरी इच्छा, अतीत की सारी कुत्सित परम्पराओं व रूढ़ियो को जडमूल से उखाडना पडेगा। कभी कभी ये विरासतें नयी व्यवस्थाओ को भी कुत्सित कर देती हैं और अवसर मिलने पर हडप भी सकती हैं इसलिए याद रखो, जब तक प्राति की सारी सम्पदा हडपकर जन शोषण करने वाले राजाओ, ठाकुरो, सामतो जागीरदारो, सूदखोगे, तथा विदशी राक्षसो को नही समाप्त किया जायेगा तब तक नयी व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकती। तुम सभी गरीबो को ईश्वर और धम के खोखले आतक से मुक्त करो। उहे कहो कि सत्य, बुद्धि प्रेम और समता ही ईश्वर है। यही पर स्वर्ग है और यही पर नरम है। इसलिए तुम्हे मिलकर इसी धरती पर स्वग बनाना है। यह तभी सभव हो सकता है जब तुम विदेशी व देशी सत्ताधारियो के शोषण से नाम आदमो को मुक्त कर दोगे।" आम जनता को अग्रेजी शासन के विरुद्ध व स्वतनता प्राप्ति के लिए यहाँ प्रेरित किया गया है। गोधू ने अपने नाम के पीछे 'भारतीय' लगाना शुरू कर दिया। वह भावलपुर में नारिया पर अत्याचार और हिदुओ के बलपूर्वक मुसलमान बनाने का विरोध करता है । उस समय हर जाति दूसरी जाति को हीन समझती है। अछूत समझती है । सेठ मोहता गोधू को पत्र मे लिखता है-मैं तुम्हारे 'भारतीय' बहने की बात से प्रसन्न हू । इममे तुम्हार विचारों की विशालता झलकती है क्योकि दुनिया मे मनुष्य से बडी न कोई जाति है और न काई धम । मनुष्य सबसे बडा है, महान् है, और महत्वपूर्ण है । पर जहा अधकार फला हो, जहाँ कुछ ही प्रतिशत पढ़े लिखे लोगो के हाथ मे सार लोगा को बागडोर हो, वहा कसे 'मनुष्य' वडा हो सकता है ? मुझे लगता है कि समय के साथ मनुष्य छोटा और बहुत छोटा हाता जायेगा।" आज मनुष्य जातिया के नाम पर इतना अधिक सघपशील आक्रामक हा गया है कि मानव जाति खतरे म पड गयी है । गोधू अग्रेजी फौज मे शामिल हो जाता है तो सामतशाही, अग्रेजी शासन का विरोधी, राष्ट्रवादी विचारधारा का समथक लक्ष्मीराज स्वामी गोधू को डांट भरे स्वर मे कहता है- मुझे नही मालूम था कि तुम अपनी जान की वाजी साम्राज्यवादियो को बल देने के लिए लगा रहे हो? जिन अग्रेजो को हम देश से बाहर निकालने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, तुम उनके साम्राज्य को सुरक्षित करने जा रहे हो। गीधू को सेना में भर्ती होने के बाद अहसास हुआ कि. वह क्यो सेना में भर्ती हुआ? अग्रेजो का कुत्ता की तरह व्यवहार उसे १ हजार घोडो का सवार, पृ० १५६ २ वही, पृ० २९७ ३ वही, पृ० ३११ साधू या पसता पा । उहाने हर जगह भयपर जातियाद पैसा दिया था। भारत में आदमी को बांटने मे य अग्रज बडे ही स्पस हुए।" यही जातिवाद की भावना भारत की भौगोलिक एसा म याथप साबित हुई। अंग्रेजी शासन के दौराा राष्ट्र पो इसनी होनायस्था हो गयी। मनुष्य अनाज पे दाने-दाने पे लिए मोहताज हो गया था। स्थिति यहां तक पहुँच गयी थी पि-'मुट्ठी भर पायल मे बदसे वे वमौने दस दस साल की लडकियों के साथ यसात्वार पर लेते थे। एष एक मछली के लिए एक एक औरत उहें मिल जाती थी। पृणित ही पृणित पा।" ऐसी होनायस्था अग्रेजी शासन के दौरान हिदुस्तान मे थी । लोग अपने पट की आग बुझाने तक के लिए अपनी बेटियो को इन कमीने अंग्रेजा के हाप चेष देते थे। ऐसी हीनायस्था अग्रेजों के शासन के दौरान थी। गोधू अग्रेजो से इतनी सख्त नफरत परने लगा कि उसने प्रण कर लिया वि यह सेना को छोड मागेगा। अपने साथी यामू को कहता है-'अरे पगले । इन अग्रेजो के लिए हम क्या मरें और गोधू अग्रेजी सेना को छोड़कर भाग आता है । गीपू अग्रेजा ये चगुल से भारत को स्वतत्र परना चाहता था और घह भी हिंसा के माध्यम से। यह कहता है-'अहिंसा से अंग्रेज नही जायेंगे। यदि जायेंगे भी तो इस देश को लूट खसोटकर, तबाह करके। जब न, तब मुझे हरिद्वार में बताया गया था कि हर बडा अग्रेज अफसर साल दो साल मे लखपति बन जाता है। देखना, कभी न कभी ये लाग इस देश को नगा कर देंगे। इस देश मे जातियो व धर्मों को लडा देंगे। ये बडे कुटिल हैं।" भारत की स्वतत्रता के बाद पहली बार सामूहिक रूप से जाना गया कि धम स्तिना क्रूर, हत्यारा और रक्तपिपासु होता है। पहली बार ही अग्रेजो पी कुटिलता के फलस्वरूप आदमी के भीतर अधा धर्म जागा था। इसी धम के नाम पर हिदुस्तान और पाकिस्तान का निर्माण हुआ। स्वतत्रता के पश्चात् लोग जातीयता के नाम पर वोट प्राप्त करने लगे। जबकि गीधू इस जातीयता का सख्त विरोधी था । उसको लोग जाति के आधार पर वोट प्राप्त करने को कहते, इस पर वह उत्तेजित होकर कहता है-मैं आपकी तरह बनिया नही हूँ जो हर काय म नफा नुकसान देखता रहूँ। अपनी स्वाथ सिद्धि के लिए मैं अपने सिद्धाता को ताक मे नही रख सकता। मैं जानता हूँ कि मुझे कुछ भी नही १ हजार घोडो का सवार, पृ० ३१३ २ वही, पृ० ३१३ ३ वही, प० ३१६ ४ वही, प० ३४५ ५ वही, पृ० ३४६ . मिलेगा। मत निकालो, पर मैं यह भी जानता हूँ कि एक दिन आप सब इस देश में एक एक वग को इतना बांट देंगे, उसे इतना काट डालेंगे कि यहां केवल छोटी छोटी जातियां ही रह जायेंगी। उन जातियो वा वैमनस्य, पृणा, छोटापन, ओछापन और सकीणता इस देश को नरक बना डालेगी। इस देश मे न कभी कोई भारतीय रहेगा और न कोई आदमी। यहां रहेंगे, धम, जातियां, सम्प्रदाय 1 और जाति का आदमी दूसरी जाति के आदमी से घृणा करेगा। सन् १९४७ का पाकिस्तान तो एक बना है । मुझे लग रहा है कि जिस तरह के यहाँ देशसेवक और नेता पदा हो रहे हैं वे 'हजारो 'जातिस्तान' प्रदान कर देंगे। बामण बनिये को नफरत से देखेगा। चनिया राजपूत से धणा करेगा। राजपूत जाट को दबोचेगा । शूद्र इन सबको । मतलव एक जाति वाला दूसरी जाति वाले को अजगर की तरह निगलने की चेष्टा करेगा।" 'दारुल शफा' में स्वतत्रता के पश्चात राष्ट्र को हीनावस्था को चित्रित किया है । किस तरह आज के नेता लोग राष्ट्र को गर्त में डाल रहे हैं। उनके काले कारनामो को प्रस्तुत करना ही लेखक का उद्देश्य रहा है। रंगीनराय की दष्टि मे लोबीराम का चरित्र है-'बस्ती जिले के कोने-कोने में उसका जाल विछा था। जिले का अनाज आलू बनस्पति साबुन, किराना, मोमेट मोटे कपड़े का स्टाक गोदामो मे भर लिया जाता। प्रदेश के बडे-बडे जखीरेबाज, ब्लक मार्केटियर मनाफाखोर उसके साथ थे । इन लोगो के मुनाफे में हिस्सा बांट करता है। मिलो का उत्पादन कम करके उत्पादनक्षमता घटाकर बाजार में कृत्रिम पमी पैदा की जाती है । दाम बढ़ते मांग पूर्ति का सतुलन बिगडने पर काले बाजार में धीरे धीरे माल निकाला जाता । शराब बनाने के कारखाने मे गेहूँ जो सडाकर मप्लाई करने का भी काम करता । देश मे अकाल भुखमरी होगी, विदेशो से अनाज की भीख मांगी जायेगी उसकी बला से। गेहूँ को सडाकर शराब बनाने का काम नहीं रुक सकता। लेकिन सभी साले चोर हैं।" इसी तरह की अनतिकता आज प्रत्येक नेता अपना रहा है और राष्ट्र को पतन के गर्त मे धकेल रहे हैं। विजली विभाग से तारो की चोरी इन तेतामो द्वारा करायी जाती है। राज नौतिक दबाव से इन चोगे को छुडाने का प्रयास पिया जाता है । रगीनराय कहता है कि-'पहले तो बिजली बोड को दस लाख की चपत लगार माल हथिया लिया फिर साठ सत्तर लाख के नकद मुनाफे पर तांदा विदेशी तस्करों को बेच पाया। यह देश के लोगो को सरासर चूतिया बनाना है। १ हजार घोडो का सवार, पृ० ३६४ २ दाल शफा,पृ०७३ ३ वही, पृ० ३६६ 'शातिभग' में मुशी के व्यक्तित्व में राष्ट्र और उमदी भक्ति तया गरिमा की बात सन् १९४२ में घर कर गयी ! इसी भक्ति से प्रभावित होकर उहोंने-- 'कुछ लडको को लेकर उन्हाने एक सरकारी कालेज के उपर लगे वर्तानवी झण्डे का उतार कर फाड दिया और उसकी जगह तिरगा लगाने जा रहे थे कि पुलिस ने उह पकड लिया । थाने लाने से पहले भी उहे पीटा जा चुका था । मुकदमे का फैसला हुआ तो उ हाने फिर नारा लगाया। उहे वीस येतो की सजा मिली . 'प्रजाराम' में बताया गया है कि स्वतंत्रता के पश्चात हम विरासत में मिली मुनाफाखोरी महगाई भ्रष्टाचार, वैयक्तिक स्वाथ पूतियां तस्करी, भाई- भतीजावाद है। लोग अपने निजी स्वार्थों को अधिक महत्व देते हैं। यहां का मानव अपने घर को सजाने के लिए राष्ट्र को उजाड देता है। आपात्काल की घोषणा राष्ट्र के हित व जनहित के लिए लगाई गयी ताकि देश मे शाति स्थापित हो सके, 'अब स्थिति भयानक हो रही है, चारों ओर अधेरा फैल रहा है । शब्द अथहीन होकर हवा में उछल रहे हैं। हमारा दश क्सि निपत्ति से टकराएगा, यह तो ईश्वर जाने। आज तक की राजनीति ने इस देश मे भयावहता ही दी है। आदमी-आदमी को बांट वर राज्य की प्रवृत्ति कभी भी राष्ट्रीय व भावात्मक एक्ता यो जम नहीं दे सकती। वह देश को अराजकता की आर ले जाएगी।' जनता पार्टी के शासन में भारत की एक्ता कामदिलाऊ एनर के आगे देखी जा सकती थी। ये युवको को कतारे-जिसमे हिंदू मुसलमान, मिख, ईसाई भीड । ये सभी खडे थे भूख को मिटाने के लिए। जब भूख शात नहीं होगी तो राष्ट्र में भौगोलिक और सास्कृतिक एकता का सवाल उत्पन ही नहीं होता है। 'भूख ही सबको जोड़ती है, धम नही।" अत में प्रनाराम इस प्रष्ट शासन- व्यवस्था तथा इन लोगो को समाप्त करने का माम जनता को आह्वान करता है जिहोंने इस देश में जातिवार, माम्प्रदायिकता के नाम पर लादमी-आदमी में शाखाए विभक्त कर दी हैं । प्रजाराम रहता है~~-'अब हम खून का बदला खून से लेंगे और उस व्यवस्था के लिए एक लम्बी लडाई लडेंग, जिसम देश का अशिति भूखा नगा और मेहातवश इसान एक नई जिन्दगो पाएगा। वह घद बौद्धिक ऐय्याशी और उन अयायो का सामना करेगा। यह भाई भतीजा- वाद, मत्री वा वेटा मत्री प्रधानमत्री का बेटा प्रधानमत्री को वश परम्परा या विरोध करेगा और भ्रष्ट राजनीति व अपमरशाही को जहों से उखाड फैकेगा। तुमने हरिजनों, दलितों, अल्पसज्यका और जातिवाद के नाम पर १ शाति मग, पृ० २६-२७ २ प्रजाराम, पृ०७६ ३ वही, पृ.७६ ४ वही ५० १४० सम्बा राज्य कर लिया है, वोटो की हिंस्र और निदयो राजनीति के तहत तुमने देश को विराटता को लघु कर दिया तथा आदमी को बाट डाला। आदमी बटकर अपनी वास्तविक शक्ति और ऊर्जा को भूल गया है।" प्रजाराम आगे कहता है कि-'इT आदमखोरों और हत्यारो से देश को बचाओ ये राज्य- सत्ता और पूजी की दोगली सतान एक दिन हमे जाति धम सभ्यता और सस्कृति के नामो से ठग कर हमारी मनुष्यता को मगरमच्छ की तरह निगल जायेंगे। गाधीवादी चेतना - गाधीवाद की पृष्ठभूमि गाधीजी का जीवन परिचय गांधीजी का जम २ अक्टूबर १८६६ को पोरव दर मे हुआ था । पिता कर्मचद गाधी राजकोट के दीवान थे । गाधी जी की शिक्षा पोरब दर और राजकोट मे हुई । गाधी जी पर माता पिता का गहरा प्रभाव पडा । १३ वष की आयु में विवाह हुआ और गाधीजो सोलह वर्षों के थे तब पिताजी का स्वगवास हो गया । ४ सिनम्बर १८८८ को विलायत मे बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए चले गये। वहाँ पूण रूप से वैष्णव रहते हुए उहोंने बैरिस्टरी की डिग्री प्राप्त की। १२ जून १८६१ को बम्बई लौटे और वही पर वकालत आरम्भ की । प्रारम्भ मे वकालत जमी नही, सन १८६३ मे अफ्रीका के एक हि दुस्तानी, व्यापारी सेठ अब्दुल्ला के मुकदमे के सिलसिले मे उहे दक्षिण अफ्रीका जाना पहा । वहाँ उनको रग भेद नीति का शिकार होना पड़ा, अग्रेजों के विरुद्ध उहाँने वहां भारतीयो का सगठन बनाया और उनमे जागृति उत्पन को। १६०१ में वे भारत लौटे और तब से काग्रेस के साथ भारत की आजादी के लिए प्रयत्नशील हुए। व्यक्तित्व की गरिमा वाल गगाधर तिलक के बाद भारतीय राजनीति में गाधी युग का अवतरण हुआ । भारत के इतिहास मे गाधी युग युगा तरकारी परिवतनो और अनेक प्रकार की हलचलो का युग है । गाधी ने देश के स्वतत्रता आ दोलन के साथ साथ सामाजिक जीवन के सभी क्षेत्रा मे गतिशीलता, परिवतन और परिष्कार किया । उहोन कूटनीतिक चाला, षडयन, हिंसा, असत्य छल-कपट आदि के स्थान पर सरल, निष्कपट जीवन को अपनाया। डा. सुधाकर शकर क्लवडे १ प्रजाराम, पृ० १५६ २ वही, प० १५६ ने लिया है कि-'यह तो गांधीजी पे जिहोंने सत्य, अहिंसा तथा यधुत्व के बल- बूते पर विदेशी सत्ता की विकराल शक्ति को चुनौती दी और विश्व भर के राष्ट्रा ये सम्मुरा यह आदश प्रस्तुत कर दिया कि पणा को प्रेम से, हिंसा को अहिंसा से, बरता को सत्य से भी विजित किया जा सकता है।' भारत का स्वतनता-सग्राम और गाधीजी सन् १९२० से १९४७ तक गाधी द्वारा अनेक देशव्यापी आदोलन चलाये गये, जिनमे प्रमुख हैं-सन् १९२० २१ असहयोग आदोलन, खेडा सत्याग्रह, अहमदाबाद सरयाग्रह सन् १९३० का नम कानून तोडना, सविनय अवज्ञा आदोलन और १९४२ मे 'भारत छोडो आदोलन' । 'गाधीजी में राजनीतिक क्षेत्र मे मागमन के साथ ही देश मे तीन महत्त्वपूर्ण घटनाए घटी, जिहोने सम्पूर्ण देश को एक स्वर तपा एकमत से उनके साथ कर दिया। वे तीन महत्त्वपूर्ण घटनाएं पी-सन १९१६ मे जनता की इच्छा के विरुद्ध रोलट एक्ट स होना जलियावाला बाग की नशस एवं अमानुपिय घटना तथा खिलाफ्त का प्रश्न ।" जिस समय गाधीजी वा भारतीय राजनीति मे आगमन हुआ उस समय देश अनेक समस्याओ से ग्रसित था । विश्वयुद्ध की समाप्ति पर न केवल मानवीय मूल्यो का ही हनन हुआ था अपितु जनजीवन और सम्पत्ति नष्ट हुई थी। देश मे भयकर गरीबी साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अस्पश्यता, गुटबदी, फट आदि मा भयकर बोलबाला था। देश के सर्वतोमुखी विकास मे गाधीवाद का प्रभाव गाधीजी का कार्य मात्र राजनीतिक स्वतत्रता प्राप्त करने तक ही सीमित नही पा, बल्कि समाज व्यवस्था करने का भी था जिसका आधार सत्य और अहिंसा हो। उनको चितनधारा का मम मात्र भारतीय जनता तक ही सीमित नही या, बल्कि वह सम्पूण मानव जाति के लिए है। गाघोजी भारतीय राष्ट्र के निर्माण में १९१५ से १९४८ तक सक्रिय रहे । स्वतत्रता प्राप्ति के लिए उहोंने पहली बार अहिंसा का माग अपनाया । ससार की राजनीति मे अहिंसा एक हथियार । डा. सुधाकर शकर कलवडे, आधुनिक हिंदी कविता मे राष्ट्रीय भावना, प०१६८ २ सुषमा नारायण, भारतीय राष्ट्र के विकास की हिदी साहित्य मे अभि- व्यक्ति, पृ० १६ ३ डा० अरविद जोशी, गाधी विचारधारा का हिंदी साहित्य पर प्रभाव, प०४५ शक्ति बन गई । एक शक्तिशाली राष्ट्र के विरुद्ध इसके द्वारा युद्ध किया गया और युद्ध मे जीत भी हुई पुरानी खानी नये फैशन के रूप में सामने आई। अछूतोद्धारमा प्रयारा किया और राष्ट्र उनकी अदभुत क्षमता को देखकर घबरा गया तथा भारत ससार के लिए एक समस्या बन गया।" इस प्रकार विलक्षण, व्यक्तित्व अटूट कमनिष्ठा, स्वस्थ चितन वे धरोहर और प्रबल जन- समर्थन की शक्ति से समवित गाधी जी ने भारतीय जन और जीवन के हर क्षेत्र को प्रेरित और प्रभावित किया । उही को विचारणा गाधीवाद के नाम से राजनीति और दशन के क्षेत्र मे सुविख्यात हुई। गाधीवाद स्वरूप विश्लेषण महात्मा गाधी ने स्वय स्पष्ट किया है कि उहोंने किसी नवीन विचारधारा या जीवन शन का प्रतिपादन नही क्यिा अपितु प्राचीन सिद्धातो को पुन आलेखित किया है। गाधीजी ने 'हरिजन' माच १९३६ अक में लिखा है- 'मैं किगी नये मिद्धात को प्रारम्भ करने का दावा ही करता। मैंने अपने तरीके से शाश्वत सत्यो का प्रयोग करके अपने दैनिक जीवन की समस्याओ को सुलझाने का प्रयत्न किया है । मेरा ममस्त दशन, यदि इसे दशन की सजा दी जाय तो वही है जो कुछ मैंने कहा है । इसे 'गाधीवाद' नहीं कहा जा सक्ता क्योकि इसमें 'वाद' नाम की कोई वस्तु नही है। जिस जीवन-दर्शन को महात्मा गाधी ने अपनाया उसे गाधीवाद नाम से अभिहित किया जाता है । एक सार्वजनिक सभा में बोलते हए स्वय गाधीजी ने एक बार पहा था-'गाधी मर सकता है पर गाधीवाट अमर रहेगा।" यहां यह स्पष्ट करना उचित होगा कि गाधीवाद गांधी जी के किसी मूल सिद्धात का उदघाटन नहीं करता। वस्तुत गाधीवाद अथवा गाधी दशन को यदि हम समझना चाहे तो उसे 'सर्वो दप दशन' से समझा जा सकता है। हा यह बात अलग है कि आज गाधी की विचारधारा के लिए सामा यत गाधीवाद शब्द का प्रयोग किया जाता है। गाधीवाद को स्पष्ट करते हुए रामनाथ सुमन ने लिखा है कि 'गांधीवाद सत्य की साधना का विनान है। उसकी समस्त प्रवत्तियां ब्रह्म मे उसके दढ विश्वास से उदभूत हुई हैं। यह ब्रह्म सवदष्टा, सवशक्तिमान और सवव्यापक है । जगत उसी के कारण और उसी को लेकर है। आधुनिक युग के महान् १ गाधी विचारधारा का हिदी साहित्य पर पभाव, प० २६ २ Harijan, March 1936 Ibid ४ डा० पटटाभि सीतारमैया, गाधी और गाधीवाद (प्रथम भाग) पृ०२६ ५ रामनाथ सुमन, महात्मा गाधी, पृ० १५८ ६ पुरुष महात्मा गाधी को ससार एष श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, प्रथम पोटि के समाज-सुधारक, महान् राष्ट्रीय नेता और प्रगाढ देश भक्त के रूप में जानता है । लग्नि उसका काई सुम्पप्ट राजनीतिक रशन था या नहीं, इस बारे में अधिमाश लोगो को स देह है। महात्मा गाधी, हाम, लाय, और रूसो की तरह ऐसे राीतिक दाशनिक नही थे जि होन अपना समय किमी सुसम्बद्ध राजनीतिक दशन के निर्माण में लगाया हो । उनरा वास्तविक उद्देश्य भारत का और फिर सारे समार को सत्य तथा अहिंगा के आदर्शों पर नये सिर से निर्माण करना था । गाधीजी ने अपने विचार को भापणो, लेयो, पना के माध्यम से व्यक्त किया। गांधीजी ने इतिहास में पहली बार सत्य, अहिंसा और प्रेम के आध्यात्मिक एव नैतिक सिद्धाता का राजनीति के क्षेत्र मे इतने विशाल पमान पर प्रयोग किया तथा इसमे सफलता प्राप्त की। प्राचीन सत महात्माआ न गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी तक ने अहिंसा के सिद्धात को केवल व्यक्तिगत जीवन मे ही लागू किया था । गाधी जी ने इतिहास में पहली बार अहिंमा को जीवन के समान दर्शन के रूप में स्वीकार किया और उसके आधार पर समाज एव राज- नीति की प्रत्येक ममस्या को हल करो का प्रयास किया ।' गाधीजी के अनुसार अहिंसा सम्पूण धम की जान है । सत्य की तरह हिंमा भी सवशक्तिमान और असीम है और ईश्वर के ममानाथक है। अहिंसा सर्वकालीन सव व्यापर नियम है जिसका जीवन की प्रत्येक परिस्थिति मे बिना किसी अपवाद प्रयोग हो सकता है। मत्य के गाधी जी ने दो भेद दिए हैं--(१) साधना या व्रत रूप सत्य, आशिक या अपेक्षित सत्य, (२) साध्यपूण सत्य निरपेक्ष सावभीम या-शाश्वत सत्य । रिचड ग्रे के अनुसार गाधी जी मामाजिक सत्य के क्षेत्र मे महान वैज्ञानिक हैं। गांधीजी एकादश महाव्रतो मे विश्वास करते थे । ये महाव्रत ही उनके जीवन के सिद्धात बहे जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं-सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचय अस्वाद अस्तेय, अपरिग्रह अभयम, स्वदेशी, कायिम श्रम, सवधम सभव, अस्पश्यता निवारण आदि सिद्धाता को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र मे अपनाया और प्रभावित किया। भारतीय सामाजिक जीवन पर गाघीवाद का प्रभाव गाधी जी ने अपने सिद्धातो का प्रयोग समाज सुधार के रूप में भी किया है। १ डा० सुभाष काश्यप तथा विश्व प्रकाश गुप्त, राजनीतिक कोश, ५० १५१० १५२ २ गाघीजी, हरिजन, १४३ १६३६ ३ गांधी जी-हरिजन, ५६-१९३६ राधाकृष्णन -महात्मा गाधी, पृ० ८० ४ - उहीने समाज के प्रत्येक पहलुओ का सूरम निरीक्षण दिया। वे समाज मे परस्पर प्रेम की स्थापना करना चाहते थे । साम्प्रदायिकता को हटाकर उस स्थान पर पारस्परित राभाव और प्रेम स्थापित करना ही उसा अतिम लक्ष्य था । उहाने भारत मे रामराज्य की बरसता की थी। उ होने स्त्रिया को पुरुषो के समान अधिकार देने की बात कही। गांधी जी ने समाज सुधार के निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया-साम्प्रदायिक एकता यादी, मातृभाषा, राष्ट्र प्रेम, आर्थिक समानता, प्रौड शिक्षा, स्त्रिया को उनति, मद्यपान निपध, अस्पश्यता शिवारण ग्रमोद्योग, विराा मजदूर, विद्यार्थियो या सगठन आदि । गाधी जी समाज की तत्कालीन व्यवस्या से सतुष्ट नहीं थे । गाधी जी ने समाज की बुरा इयो को दूर करने के लिए बाक प्रयल दिये और उह अपने इस काय मे सफ लता मी मिली । सामाजिा क्षेत्र मे गाधी का योगदान अविस्मरणीय है । भारतीय आथिक जीवन और गाधीवाद गाधी जी के आर्थिक विचारो से भारतीय अथ व्यवस्था पर प्रभाव पड़ा जो उहें अपशास्त्री प्रमाणित करता है । सर्वोदय तथा ट्रस्टोशिप सिद्धात मे उनकी । आर्थिक विचारधारा का प्रमाण मिलता है । वुटीर उद्याग और चरखे के विकास मे उनका आर्थिक दष्टिकोण ही स्पष्ट होता है । वे गावा मे स्वावलम्बी अथ 'व्यय का निर्माण करना चाहते थे । वस्तुत गाधी जी के आर्थिक दृष्टिकोण का निर्माण खादी तथा दूसरे ग्रामोद्योगा के विकास एवं आर्थिक समानता के सिद्धाता से हुआ है। गाधी जी या आथित दष्टिकोण उनके नतिक तथा आध्यात्मिक जीवन दशन की शिवाय "परिणति है। स्वभावत वे मनुष्य की आपिक आवश्यकताआ और प्रश्ना पर भी अस्तेय, अपरिग्रह, मनुष्य की नैतिक मताई तथा प्राणी मात्र के साथ आध्यात्मिक एकत्व का बोध की धार्मिक भाषा मे विचार करते हैं।' सक्षेप मे वहा जाए "तो गाधीवादी अथ-व्यवस्या पूजीवाद का विरोध करती है और आर्थिक विकेन्द्री करण में उसका दृढ विश्वास है । व मनुष्य के पास व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहने में और सम्पति का समाज में विवे द्रीकरण करने मे विश्वास करत थे। भारतीय धार्मिक नतिक जीवन और गाधीवाद गांधी जी मुख्यत हिदू धम के अनुयायी थे वितु उनके हृदय में मानव- धम के प्रति विशेष अनुराग था। उनका विश्वास था कि विभिन घम एक ही सत्य की प्राप्ति के अलग अलग माग हैं।' धम के बारे में गाधी ने स्पष्टत १ रामदीन गुप्त-प्रेमपद और गाधीवाद, पृ ०६० २ Selections From Gandhi, P 244 & 632 १४० कहा है कि-(१) सभी धर्म सत्य होते हैं । (२) सभी धर्मों में कोई न कोई भूल या कमी अवश्य होती है । (३) सभी धम मेरे लिए उतने ही प्रिय हैं जितना हिदू धम (४) दूसरे धार्मिक विश्वास के लिए मेरे मन मे उतना ही सम्मान है जितना अपा धार्मिक विश्वारा के लिए। इसीलिए घम परिवतन की कल्पना असभव है । बोरा ये लिए हमारी प्रार्थना यह होनी चाहिए कि 'प्रभु । उ हैं अपने उच्चतम विवाम के लिए जितने भी प्रकाश व सत्र की आवश्यक्ता हो, वह लिखा।' ईश्वरीय एक्ता और व्यापकता के सबध मे उहोंने कहा है- 'ईश्वरीय प्रकाश किसी एक ही राष्ट्र या जाति की सम्पत्ति नहीं है। ईश्वर न पावे मे है, न काशी मे है, ईश्वर प्रकाश है, अधकार नहीं । यह प्रेम है, घृणा नहीं, यह मत्य है, महान है और हम मव उमसी चरण रज हैं । गाधी जी की मा यता थी कि आत्म शुद्धि और शुद्ध आचरण मे नैतिक' वल उत्पन होता है । अत वे व्यक्तिगत जीवन की शुद्धि पर विशेष बल देते थे। इसके लिए प्राथना, उपासना, व्रत, प्रतिना, ब्रह्मचय आदि को उपयोगी मानते थे।' भारतीय राजनीतिक जीवन और गाधीवाद जिस समय महात्मा गाधी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश लिया उस समय लोगों ने अपने स्वाथ की प्राप्ति के लिए राजनीति को स्वाथ-सिद्धि का अस्त्र बना लिया । गाधी ने सत्य अहिंसा, सत्याग्रह सिद्धात को लागू कर भारतीय राज नीति में चेतना का मत्र फूवा । उहोंने स्वीकार किया है कि-'जब से मैंने यह जाना कि सावजनिक जीवन क्या है तब मेरे प्रत्येक शटल और काय के मूल मे धार्मिक चेतना और निता त धार्मिक हेतु रहे हैं । गाधी ने सवप्रथम धार्मिक राजनीति की नीव गली। अपनी बात मनवाने के लिए सत्याग्रह को विशेष महत्व दिया। मत्याग्रह से उनका तात्पय था -'अहिंसा द्वारा सत्य का आग्रह ।' भारतीयो पर अग्रेजो का शामन अयायपूण और पर था। इस बुरे शासन को हटाने के लिए गाधी जी ने असहयोग आ दोलन आरभ किया । असहयोग का एक रूप मविनय अवज्ञा था। गाधी जी की विचारधारा के अनुमार सविनय अवज्ञा से तात्पय है-सरकार के कानूनो को भग कराना, जा नतिव नही है। सविनय अवना इस बात का प्रतीक है कि प्रतिरोधकारी सविनय अर्थात अहि- , १ प० जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रपिता, १० ३२ २ हरिजन, २०-४ १९२४ ३ डा० सुपमा कश्यप-रवात योत्तर हिदी महाकाव्य मे राजनीतिक चेतना, महात्मा गांधी-यग इण्डिया (भाग-३), पृ० ३५० १४१ संक रूप से कानून की अवज्ञा करता है।' गाधी जी देश को स्वतत्र कराना चाहते थे। यही उद्देश्य लेकर उन्होने स्वतत्रता संग्राम लडा। गाधी जी ने राजनीतिक संघों के दरम्यान सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के द्वारा नतिक बल का प्रयोग किया । इन सिद्धाता का न केवल भारतीयो पर ही गहरा प्रभाव पडा अपितु अतरराष्ट्रीय जगत में भी इनको अपनाया गया । सत्यागह स्वतत्रता सग्राम मे गाधी जी ने अग्रेजी सरकार का प्रतिरोध अहिंसा से किया, यही सत्याग्रह था । सत्याग्रह पर गाधी जी ने कहा-'राष्ट्रीय अथवा राजनीतिक जीवन में सत्य और करयाण के लिए कृत संकल्प हाकर आग्रह करना ही सत्याग्रह है।' सत्याग्रह सत्य के लिए निरतर खोज है और सत्य तक पहुंचने तक का सकल्प है । सत्याग्रह एक सतत् विकासशील शक्ति स्वरूप है। यह एक प्रकार का उच्चतम धेय है। सहनशीलता व आस्था उसके मूल तत्व है। हम सभी बुराइयो से सत्याग्रह के द्वारा असह्योग करते हैं।' डा. रामनाथ सुमन ने लिखा है कि-- सत्याग्रह निजी रूप में आध्यात्मिक साधना है । समष्टि रूप में सामाजिक कल्याण की साधना है। वह व्यक्ति तथा समाज के दोपो को दूर कर दानो के बीच हितकर सबंध स्थापित करता है । सत्याग्रह वे निम्न- लिखित तत्व हैं- १- सत्याग्रह सत्य और न्याय के आधार पर ही हो । २–सत्याग्रही में क्षमा भाव हाना चाहिए और वह अपने विपक्षी को मूलक सुधार हेतु पूरा अवसर प्रदान करे। ३-सत्याग्रह सत्य और ईश्वर में पूरी आस्था का आधार लिए हुए होता ४-सत्याग्रह मे अहिंसा का स्थान सर्वोपरि है । ५- सत्याग्रही में प्रसनतापूर्वक कष्ट सहन करने की क्षमता होनी चाहिए। ६ - वह नम्रतापूर्वक समझौते के लिए तैयार रहे। सत्याग्रह की कई पद्धतियां है, जिनमे प्रमुख इस प्रकार हैं- हडताल, उप सत्याग्रह प०२४ २ M K Gandhi--Modern Indian Social and Politıcal Thought, P 343 ३ रामनाथ सुमन-गाधीवाद की रूपरेखा, पृ १०१ ४ श्रीधर शर्मा एव सरोज गग -~-आधुनिक भारतीय सामाजिक और राजनतिक चितन, पृ० ३४४ १४२ वास प्रायना, प्रतिज्ञा अमदयोग, कर वदी, धरना, मविनय अवज्ञा, आमरण अनशन, अहिमा धरना। देश की आजादी के नडाई में गाधीजी ने समय समय पर इनमे से अधिकाश पद्धतिया का प्रयाग किया था। भारत की तत्कालीन परिस्थितियो मे स्वराज्य प्राप्ति के लिए सत्याग्रह ही सर्वोत्तम साधन था। असह्योग अमहयोग सत्याग्रह का ही एक अग है । जो काय अथवा वातें अनुचित और अनीतिपूर्ण हो उसके साथ असह्याग किया जाता है । बुरे कार्यों में भाग न लेकर उसका बहिष्कार करना ही असहयोग है । गाधी जी ने कहा है कि असहयोग की जडें घणा मे नही बरिय प्रेम मे होती हैं । सत्य के आधार पर किए गए असह- योग का अतिम परिणाम विजय होना है । भारतीय राजनीति मे असहयोग आ दो लन १९२० से आरम्भ हुआ । गाधीजी के अनुसार सहयोग के सिद्धा त निम्न १-सरकारी उपाधियो, आफिमा का त्याग २--वि-शी वस्तु का बहिष्कार ३-सरकार का रण देना बंद करना ४-माउसिला वा वायकाट ५-वकीला द्वारा वकालत छोडना ६-सरकारी पार्टिया तथा उत्सयो वा बहिष्कार । अग्रेज सरकार इस देश की जनता को नावनाओ के प्रतिवून थी, उमका शासन अयायपूण और अनतिक था अत अग्रेज सरकार को हटाने के लिए गाधोजी । असह्याग आ दोलन चलाया। अहिसा का पालन गाधीवादी दशन मे अहिंमा सम्पूण दशन की धुरी है । भारतीय संस्कृति मे ऋपिया का जमर वाक्य हिंसा परमो धम' गाधी दशन के लिए प्रकाश स्तम्भ है । गाधीजी अहिंसा को प्रेम पा पर्यायवाची मानते थे। व अहिंसा के द्वारा व्यक्तिगत हानि नाभ स दूर रहते हुए समस्त मानता का कल्याण चाहते हैं । गाधीजी हर प्रकार के बुरे विचार व बुरे कम का हिंमा मानते थे। गाधी जी इसी अहिंसा के सिद्धात पर चलकर सत्य को खाज म लगे थे। उनके लिए सत्य १ , श्रीधर शर्मा एव सरोज गग-आधुनिक भारतीय सामाजिक और राज नतिक चितन, प० ३४४ हा० अरवि द जोशी-गाधीविचारधारा का हिदी साहित्य पर प्रभाव, (पाद टिप्पणी), पृ० ८६ २ साध्य था और अहिंसा साधन । गाधीजी भारत मे रामराज्य स्थापित करना चाहते थे । उनके इस प्रयत्न मे अहिंसा का स्थान प्रमुख था। गाधीवादी दशन के आधार पर सर्वोदयी समाज की सकल्पना गांधीजी के विचार सर्वोदयवाद मे समाहित हुए हैं । सर्वोदयवाद अथवा विश्वव्यापी उन्नति का मूल आधार मानव स्वभाव मे निहित कल्याण कामना है । प्रेम और सत्याग्रह द्वारा व लोगो का हृदय परिवतन करना चाहते थे। हिंसा के लिए उनके हृदय मे कोई स्थान नहीं था। सदियवादी मा यता के अनुसार यदि नैतिक रूप से अपील की जाय तो लोग स्वेच्छा से अपने अधिक धन माल और सुखो का त्याग कर देंगे।' गाधीजी ने आर्थिक समानता के लिए मशीनो का विरोध किया था । उनका विश्वास था कि बड़े पैमाने पर उत्पादन से हजारो हजार लोगो में वेकारी फतेगी और कुटीर व्यवसाय समाप्त हो जायेगा। उनकी राय मे सर्वोदय समाज एक बड़े परिवार की तरह होता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्ट क्षमता के अनुसार पूण स्वतत्रता के साथ सेवा करे। सर्वोदयवाद केवल आर्थिव जीवन तक ही सीमित नहीं है अपितु इसमे मानव के समग्र विकास को सभावनाएं निहित है। यह गाधीवाद का निचोड कहा जा सकता है। गाधीवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ अस्पृश्यता उन्मूलन हिदू समाज में छुआछूत कारण जातीय एकता को बडा धक्का लगा है। महात्मा गाधी ने अस्पृश्यता निवारण के लिए आजीवन अथक प्रयत्न किए, वितु फिर भी यह बुराई समाज से दूर नहीं हो सकी है। साम्प्रदायिक एकता,पर बल राष्ट्रपिता महात्मा गाधी के लिए जाति सम्प्रदाय धम आदि का भेट असह्य था। भारत मे अनेक मम्प्रदाया के लोग निवास करते हैं । राष्ट्रीय एकता के लिए सभी धम और सम्प्रदायाँ म एकता होनी चाहिए । साम्प्रदायिक कट्टरता किसी भी राष्ट्र को खण्डित कर देती है। खादी एव ग्रामोद्योग का प्रचार-प्रसार राष्ट्रीय स्वतत्रता आ दोलन का नेतत्व करते समय गाधीजी ने अनुभव R.C Gupta-Socialism, Democracy and India, 32 १ P १४४ किया कि देश मे जागति लाने के लिए सर्वो मुखी प्रयास करने होगे। पूजीवाद उत्पादन की विभीषिकाए अत्यत विकट रूप धारण करने लगी थी । शोषण एव बेकारी को दूर करने के लिए गाधीजी ने पादी एवं ग्रामोद्योग की योजना का प्रचार किया। चर्खा उद्योग को प्रारम्भ करके देश का जागरण करना भी उनका उद्देश्य था। सत्याग्रह, असहयोग एव सविनय अवज्ञा आन्दोलन का अनुसमथन अग्रेजो को हिदुस्तान से निकालने के लिए गाधीजी ने अनेक उपाय किये। उह जन सहयोग प्राप्त हुआ शोर जन जागति उत्प न हुई । गाधीजी सत्य, अहिंसा, और सत्याग्रह मे आस्था रखते थे। उ होने अग्रेजी शासन के प्रति सत्या- ग्रह, असहयोग एव सविनय अवज्ञा आदोलन चलाने के लिए जनता का आह्वान किया। सामाजिक कुप्रथाओ एव रूढियो का विरोध भारतीय सामाजिक जीवन में बहुत सी कुप्रथाएँ, सढियां और बुराइयाँ जमल चुवी थी। गाधीजी न अनेक आ दालनो द्वारा इन बुराइया का दूर करन का प्रयास किया। यह प्रयास गाधीवादी विचार दशन वा सामाजिक पक्ष था। अहिंसा की शक्ति मे अटूट विश्वास 'रामराज्य' गाधीजी का परम आदश था । अहिंसा के माध्यम से राम राज्य को प्राप्त करना उनका लक्ष्य धा । गाधीजी के राम भी अहिंसा प्रिय थ । गाधीजी का लक्ष्य हिंसा से और शानि द्वारा सत्य को प्राप्त करना था। व अहिंसा को सत्य का पहलू मानते थे । विश्व के महाविनाश का सत्य अहिंसा से बचाया जा सकता था, ऐसी गाधीजी को मायता थी। नारी मुक्ति का समर्थन भारतीय समाज मे नारिया की दशा अच्छी नहीं रही है । पुग्प हमेशा उहे दासी के समान समझता रहा है । पुरप सत्ता प्रधान समाज मे नारी सभी अधिकारो स वचित रही है । गाधीजी समाज मे नारी को उचित स्थान दिलाना चाहते थे। द्रुतगामी मशीनीकरण एव औद्योगिकीकरण का विरोध देश की जनसंख्या को देखते हुए गांधीजी मशीनीकरण एवं औद्योगिकीकरण के विरोधी थे। उनके अनुमार देश की बेकारी और बेरोजगारी को दूर करने के लिए लघु उद्योग और कुटीर व्यवसायो का विकास करना उचित या। गाधीजी को मा यता थी कि औद्योगिकीकरण एव मशीनीकरण की प्रक्रिया अपनावर भारत पूजीवादी विभोपियाओ का शिकार हो जायेगा। सर्वोदय आर्थिक अभ्युदय का कार्यक्रम सर्वोन्य गाधीवाद दशन का व्यावहारिक प्रतिफलन है, जिस प्रकार समाज- वादी दशन की परिणति अतत साम्यवाद मे होती है। सर्वोदय समाज की स्थापना के लिए गाधीनी ने रामराजाको आदश माना था और ग्रामराज्य या ग्राम स्वराज्य स सह प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। आध्यात्मिक निष्ठाआ का परिप्रेक्ष्य (सत्य, ईश्वर का पर्याय, धर्म और नैतिकता, प्रार्थना, व्रत, सयम, ब्रह्मचय आदि) महात्मा गाधी नवयुग मे भारतीय आध्यात्मवाद के निष्ठावा प्रवक्ता थे। वे सत्य को ईश्वर के समकक्ष मानत थे। उनका कहना था कि सत्य ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य है । सत्य के बरा पर ही गाधीजी ने अग्रेजी साम्राज्य का अत किया । सत्य मे उनको दढता निर तर यनी रही । गाधीजी ने अपने जीवन मे सत्य को अत्यधिक महत्त्व दिया है। उनके लिए सत्य ईश्वर का पर्याय था । यह विश्व भी सत्य पर ही टिवा है। मानवतावादी जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा का आग्रह गाधीवाट के मिद्धात भारत के लिए ही नहीं अपितु विश्व जीवन का सुख और शान्ति प्रदान करने वाले हैं। काल माक्स की तरह गाधीजी ने भी विश्व का सुव्यवस्थित विता देने का प्रयास किया है । माधीजी नतिक और आध्या त्मिक मूल्यो मे अधिक विश्वास करते थे। उनके सिद्धातो की मूल शक्ति आत रिक है । प्रेम ही विश्व मानव को एक व्यवस्था म सगठित कर सकता है, ऐसी गाधीजी की मrयता थी। निष्कप गाधीवाद महात्मा गाधी के विचारोमा व्यापक भिधान है । गाधी जी के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं, जसे राजनेता, समाज सुधारक, अथवेत्ता, शिक्षा शास्त्री और धर्मोपदेशव आदि । जीवन के प्रत्येक पहलू पर उनके अपने विचार थे । गाधीवादी चेतना का मूल उत्स राम की क्त्तव्यनिष्ठा, कृष्ण की व्यवहार कुशलता, महावीर की अहिंसा, कबीर की असलग्नता और तुलसी की १४६ शीलता में निहित है । उहान सत्य, अहिंसा, प्रेम, यधुत्व और नैतियता के विचारों को अपने राजनतिक सिद्धाता म शामिल दिया । व राजीति, सामाजिर सग- ठन और आर्थिक जोया पो धम से पृथप नहीं मानते थे। हिदी साहित्य की सभी विधाजो पर गाधीवाद पाध्यापक प्रभाव पडा। गाधीवादी विचारधारा पर आधारित हिन्दी उपन्यास एक और मुख्यमत्री' म गाधीजी के नारी चेतनावादी विचार से प्रभावित एक पात्र हैं-क्यानायर अरविंद । जिमको धमपत्नी गुलाब, जिसका भारत- पाकिस्तान के बंटवारे के समय मुसलमान अपने साथ उडा ल गये थे, वह उनके चगुन से भाग जायी लेकिन समाज में बदजात, पापिन कही जाने लगी । शादी से पहले अरविंद इन आहृत महिलामो के प्रति अपनी स पदना जाहिर करता है जिससे किसन गुगाव के बाप सतराम को कहता ह कि तुम अरविंद से गुलाब की शादी की बात करा, अरविंद सतराम वो पहता है कि पसा मेरे जीवन का लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य है-सामाजिक, धार्मिक और सास्कृतिक प्राति । मैं जानता हूँ आपकी लडकी दागो मे भर गयी है आज के सामाजिक परिवंश मे वह कलकिनी कहलाएगी। उसका कही भी जादर सम्मान नहीं है। वही भी ठहराव टिवाव नहीं है वि तु मरे लिए वह उतनी ही पविन है, जितनी पहल थी लाला जी मुझे कोई भीतर मे मजबूर कर रहा है कि मैं आपको बेटी को अपना लू।" इसमे लेखक गाधीजी के नारी चेतना विषयक विचारो से प्रभावित है। गाधीजी वी हत्या पर एक सभा मे अरविंद कहता है-'साथिया । बापू की मृत्यु हमारी स्वतयता के उज्ज्वल मुख पर भयकर क्लक है । मैं कहता हूं कि हत्यारे के इस दुस्साहस के पीछे एक सम्पूण याजना होनी चाहिए, कई आदमियो का बल होना चाहिए । आज इस क्थन के विपरीत वात हा गयी है कि मनुष्य ईश्वर का पुत्र है और ईश्वर सवका समान दष्टि से देखता है यदि यह सही है ता विश्व के प्रागण म कभी अशानि, अराजक्ता और खून खराबी नहीं होती। महामानव बापू को जात को गोद मे नही सुलाया जाता । विश्व म शाति स्थापित करने पर वह बल देता है। जब लोग अपनी जरूरत स ज्यादा धन का सचय करते है जिसके फलस्वरूप गरीबी बढ़ती जाती है पूजीपति और बडा पूजीपति बनता जाता है । इस सबंध १ एक और मुख्यमत्री, पृ० ६७ २ वही, पृ० ७६ . मे भरवि गुमाय मे रहता है कि-'गान पो हर पीग उतनी ही मिलनी पाहिए जिनने को उसे जरूरत हा । जाख से ज्यादा मिल जाने पर आदमी आदमी की सपा से हट कर घुछ और मन जाता है । यह नुछ और या जाना उसे सहजता से अलग पर देता है गुलाव।" छुप्रान गिटा ने लिए अरविंद अपो शहर में एक ऐसी पाठशाला का उद्घाटन परा है जिसमें हरिजना में साथ साथ सभी जातिया ये वाला शिक्षा प्रहण परेंगे । सभी समान रूप से यादी को अपायेंगे। इस उप यास म गाधी जी मे महिमा ये सिखात पा मा उग स्थान पर मिलता है जब अरविंद गाधी को असालि दो वक्त कहता है pि-'जिग युग पुरुष ने भारत जैसे दलित पोडिन देश में राजनैतिक, सामाजिक, साध्यात्मिक पाति या सूत्रपात किया, जिग अद्वितीय पुरुष न जन-जन मे समता, एकता का गदश फूग, उस मनीपी निर्धारित अहिंगा ये माग पर घना की हम शपप लते हैं और प्रतिज्ञा परते हैं कि दा के मामूहिक विकास में अपना सरस्म अपण पर देंगे।' हिंसर पटनाओं पे परिणाम, पता और गोंदम पल्याण समाज ये सामूहिक्ष सिम को और पिनाना भाये प्रााश डालत हुए पहते हैं कि-'हमे सामाति मे तनिन विभाग नही है। सामाति और हिमा उपायों से देश की अग्रण्डता को यतरा पना हो जाता है, इसलिए शानिपूण उपायो से रावहारा या की समस्या समाधाा प्रस्तुत हाना चाहिए । इमपे लिए मुझे एरो नाय- पागों को मारता है जो अपना एप-एप क्षण मानव जाति के हित के लिए अपण कर दें तालि प्रत्यर आदमी को अपन जीवाह, जात्म विवाम का सुअवसर व सुविधाए मिले। शार भाई गाधीजी या प्रबल सगया है । उसकी वाणी में सच्चाई, अहिंसा और परोपकारी वाणियों से हमशा मुखरित रहती थी सेविन समाज पे हिंसय सत्वा द्वारा उसकी भी गाधी जी की तरह हत्या कर जाती है। गांधीजी खादो को पहनना पसद करते थे और पाग्रेसी नता भी खादी पहनते हैं इनी विचारधारा से प्रभावित हारर 'सहि पावत राम गोसाई' में राधेश्याम अपने दोस्त जसुखलाल का वास ज्वाइन और यादी धारण करते यमन कहता है-'मैं काग्रेस में शामिल हा गया हू और खादी पहनने लगा हू, बस इतनी सी बात है । कल तरे लिए भी यादो के कपडे सिलवा दूगा । स्व राज्य आ रहा है-स्वराज्य के माने हैं रामराज्य और रामराज्य का मतलब १ एक और मुख्यमत्री, प० ६२ २ वही, पृ० ११७ ३ वही, पृ० २२३ १४८ गाधीराज है।" जर सदाशिव गौतम के सामने रायम्हादुर गभीरसिंह खड़ी हाता है जिसे हराा मुरिल पा । यहाँ यारा की इज्जत का सवाल था तो जारसिंह पहता है कि-'मुवायला हम यमराज वा पर सपते हैं, आदमी पी पया विसात । लेकिन बडे-यह लोगो से पूछ लिया जाय, हा तो पाग्रेस के सेवक हैं-गाधी जी के तुच्छ सेयर, सिपाही हैं । जयरसिंह अपने आपका गाधीजी या पटटर शिष्य और भक्त मानता था। वह गाधी जी के विचारा से बहुत ज्यादा प्रभावित था। गभीर सिंह अपनी पुत्री धनवती की शादी की बात रघुराज से उनके भानजे जबरसिंह के लिए घरता है। उस समय रघुराज दहेज के विरोध में कहता है--- राजा साहेब, हम लोग महात्मा गाधी के अनुयायी हैं तो यह समझ लीजिए कि हम दहेज पहेत की प्रथा का उपाड फेंकेगे। इसलिए आप दान-दहेज की बात को लेकर अपना मा छोटा मत कीजिए। झम्मनलाल महेश्वरी जो पूरे देशभक्त हैं और गाधी जी के विचारो से बहुत ज्यादा प्रभावित हैं स्वतत्रता सम्राम के वक्त इहाने शातिरारियो को अय प्रदान किया था। व गाधीजी के जफ्रीका आदोशन से इतना प्रभावित हुए पि अपो नाम के पीछे महेश्वरी के स्थान पर सत्याग्रही शब्द जोड दिया । 'गाधी द्वारा चलाये जाने वाले हरव' आलालन म महात्मा गाधी वे विशेष शिप्य की हैसियत से उहाने सक्रिय भाग लिया वह अपन हाथ से बुने हुए गूत की खादी वस्न पहनत थे, दिन रात चर्खा चलात थे, हरिजन बस्ती म रहते थे और जब इनसे ऊब जाते थे तब जेल चले जाते थे।' 'महात्मा गाधी द्वारा निर्धारित ब्रह्मचर्य धग निभाने के लिए इहाने अपनी पत्नी तव को शग लिया और इस महान त्याग से प्रभावित हाकर उनके मित्र और जनुयायियो ने उह त्याग मूर्ति की उपाधि से विभूपित कर दिया। वे राधेश्याम को कहते हैं --मैं तो गाधी का अनुयायी है। जिदगी भर मैंने सर्वोदय का काम किया है।' स्यागमूर्ति अर्थात झम्मनलाल सत्याग्रह जी चर्खा यज्ञ भी किया करते थे। 'उस दिन उनके कमरे का फर्नीचर हटा दिया और वहाँ जाया करता था । ठीक आठ बजे सुबह वह ग्यारह बजे तक वह लगातार वर्षा पर सूत १ सहि नचावत राम गोसाई, १० ३६ २ वही, ०६० ३ वही, पृ० ६३ ४ वही, पृ० १५३ ५ वही, पृ० १५२ ६ वही, पृ० १५४ वह मोन प्रत धारण किये रहते थे। जो भी आवश्यक परामश इस अवधि में उनसे किया जाता था, वह लिखकर उत्तर दिया करते थे।" 'राग दरवारी' ध्यग्यात्मक शली मे लिखा हुआ उप यास है । इसमे गाधी वादी विचारधारा के अतगत आज के दपागे मै चतन वाली भ्रष्ट राजनीति और रिश्वतयोरी जसी कुप्रथा का वर्णन किया है । 'आज रिश्वतखो वा रोग सारे समाज मे कोढ पी तरह विकराल रूप में बढ़ रहा है। लगड को अपनी जमीन की यापी चाहिए, लेकिन विलम्ब हाते देस रगताथ कहता है कि आक्लि दफ्तर वाले यडे शरारती हैं । सी सी गलतियां निकालत हैं ।' जैग गाधीजी उपती प्राथना सभा में समझा रहे हैं कि हम अग्रेजा से घृणा नहीं करनी चाहिए, उसी वक्त लगड़ ने मिर हिलाार पहा-' --'नही बापू, दफ्तर वाले तो अपना काम करते हैं । सारी गडबड अर्जीनवीस न की है। विद्या का लोप हो रहा है। नये नये अर्जीनवीस गलत सलत लिख देते हैं। 'मैनेजर का चुनाव हाने जा रहा था जिसमे वैद्य फिर इस पद की प्राप्ति के लिए संघप पर रहे थे । चुनाव स्थल पर उनका गुण्डा ठाकुर बलरामसिंह आपर पूछता है कि मारपीट तो नहीं हुई तो लडको ने जवाब दिया--'कैसो मारपीट ? हम लोग तो प्रिंसिपल साहब के दन मे हैं अहिंसावादी हैं । इस वाक्य से भी पता चलता है कि वद्य जी भी गाधीजी की अहिंसा के प्रवल समथक और उससे प्रभावित थे। उनका कहना- 'मुझे हिंसा की बातें अच्छी नहीं लगती।" 'महाभोज' मे मन भण्डारी ने गाधीजी के धम सम्बधी कत्तयो और वम का विवेचन किया है । दा साहब लखन को समझते हुए कहते हैं-दखा भाई। मेरे लिए राजनीति धमनीति से कम नही । इस राह पर मेरे साथ चलना है तो गीता का उपदेश गाठ बांध लो। निष्ठा से अपना क्त्तव्य किये जाआ, बस ! फर पर दष्टि ही मत रखो।" सुकुल बाबू हरिजनी बिसू की मौत की सांत्वना और उनके ऊपर हो रहे शाषण का विरोध करते हुए पहते हैं वि- 'खडा हुआ हूँ आप लोगो के हक की लड़ाई लड़ने के लिए। विसू की मौत का हिसाब पूछने के लिए। बात केवल विसू की मौत की नहीं यह सब जाप सब लोगो के जिंदा रहने का सवाल है अपने पूरे हक के साथ जिंदा रहने का। यह मौत कुछ हरिजनो की या एक बिभू को नहीं आपने जिदा रहने के हक की मौत है । आपका यह हक जरा से स्वाथ के लिए गांव के धनी frसानो के हाथ बेच दिया गया है और वही हक आपको वापस दिलवाना है । जुल्म ने १ सबहिं नचावत राम गोसाई, पृ० १८६ २ राग दरबारी, प० ७८ ३ वही, प० १६० ४ वही, प० २६३ महाभोज.०२५-२% ५ १५० आप लोगा के होगले तोड़ दिए हैं, इसलिए मैं लडूंगा, आपकी यह सहाई आखिर दम ता लगा । पाप लोग साय वेंगे तो भी नहीं देंगे तो भी "दा गाहर गाधीनी की वुटीर योजना ग्रामोद्याग मा गमयन करते हुए गांव वालों को कहते हैं- मुझे तो ऐगे तिमोर और उत्साही नवयुवरी को आवश्यकता है इस योजना नि । चाहता हूँ कि घरेलू उद्योग यागा यो आप लोग ही समान लें आप लोग ही चलाएँ । कितना बड़ा सपना था यापू का पि हर गांव और हर ग्रामीण आथिरप से स्वतत्र बने ममथ बो।" 'महामहिम में हिंगा का विरोध किया गया है। मुख्यमत्री तोताराम सवाद- दाता सम्मेला मे विरोधी दलो को हिंसा की वारदातों पर दोर वक्तव्य देता है.-'विप के ता प्रदेश भर में हिंगा और अराजरता का वातावरण पैदा परने पर अगाता हैं । तेवित हम हर कीमत पर माता की रक्षा करेंगे।" समाज में व्याप्त प्रधाओ जसे ना-हेज की समस्या । शापको द्वारा शोपितो पर अत्याचार का भी खर ने पणन किया है और सामाजिव भाति का मस भी व्यक्त किया है-'सामाजिक और सास्कृतिक प्राति अपने आप हो जाती है, किन्तु हम लोग दुशानदार और विसान ये मजदूरी और माला के परम्परागत प्रेम के रिश्ते को नही बदलेंगे, इसलिए हम देवल सांस्कृतिक प्राति करेंगे। आप चाहें तो पोडी बहुत सामाजिक प्राति की जा समती है यही दान दहेज को ममस्या को लेकर ।" 'हमार घोडो का सवार' में गाधीजी के निद्धातों का प्रबल समथन किया गया है। जिसमे वगहीन समाज को कल्पना, मत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, असहयोग, सत्याग्रह आदि को मा यता प्रदान की गई है। अलगरजिया बावा कहता है- तरी इच्छा इमीलिए ही में रहता हूँ कि वगहीन समाज की रचना होनी चाहिए। अलगरजिया घावा आगे कहत हैं- तेरी इच्छा, हृदय गरीब व शोपित लोगो का बदला जा सकता है, पर पापाण व निरनुश लोगो का नहीं । लिए हिंसा, असहयोग और सत्याग्रहो के साथ साथ नपुसकीय हिंसा का त्याग भी जरूरी है। गाधोजी वे सत्य, ईश्वर सम्बधी विचारोको प्रतिपादित करता करता हुआ अलगरजिया बाबा कहता है-~-'इस निराधार ईश्वर को तम सब मार डालो। ये धामिन दलालो वा ईश्वर महात्मा गाधी ने भी कहा है-'सत्य ही ई १ महाभोज, प० ३६ २ वही, ५०६० महामहिम, पृ० १०१ ४ वहीं, प०१४२ ५ हजार घोडो का, ६ वही,प०१५८ - .

ईश्वर है। जिस प्राणी में इन तत्वा को लोप है फिर भी वह ईश्वर का नाम लेता है, तो वह मार है । उस पाखण्डी के ईश्वर पर कभी भी विश्वास नही करना चाहिए ।" गीध भी दया, अहिंमा और अपरिग्रह या सगथक है, 'धम इतना बच्चा नहीं है । घम एस आचरण है जो भादमी को यच्छाइयो मे पूर्ण घरता है। हर घम के सही आचरण तीन ही ह- दया अहिंसा और अपरिग्रह । इन तीनो का आचरण परने वाला समता या समया होता है और यही समता प्राणी का ईश्वरमय बनाती है।" 'दारल शफा' में भी हरिराना को अपने समुचित अधिकार दिलान वा आह्वान किया गया है। लोबीराम रगीनराय को कहता है-~-'हां रायसाहन, यह मेरा निणय है हम-रिजोका शताब्रियो से शोपण होता चला आया है। हाय बापू तुम वहाँ हो । देखो अब । भारत के हत्य ये समान गवसे विशाल प्रदेश में आज बीस वर्षों में भी क्मिी इग्जिन को मुख्यमत्री नी बनाया गया। लेकिन मृये बापू का सपना पग परना है।' गाधीजी के आह्वान पर स्वत त्रता संग्राम मे लोग किस तरह शामिल होते थे इसका जिनगीनराय अपने भाषण में करता है-'उस आजादी का सपना जिमे छ भर पाने के लिए हमने तरस तरम कर दिन गुजारे, तड़प-तडपकर राते काटी। गाधीजी की आवाज पर हजारो लाखो लोगो ने पढाई लिगाई बीपी बच्चो को त्यागकर मां बापू भाई, बहनो के प्यार छोडवर अपने देश को सव कुछ दे डाला सब कुछ।" 'जगलतग्रम मे प्रतीका के माध्यम से कथा कही गई है। सिंह (प्रमुख राजनेता) जगलवाणी (आकाशवाणी) से राष्ट के नाम मटेश मे गाधी जी के हिमा के सिद्धात का समर्थन करता हआ कहता है.--'कुछ दिन पहले इस जगल के कुछ भाई रधु भटककर जगलिस्तान (पाकिस्तान) की सीमा में चले गये थे, जिसे वहाँ के जानवरो न मार डाला | यह हमारा बहुत बड़ा नुकसान पा वितु फिर भी हमने उसे बर्दाश्त कर लिया था क्योकि हम शाति के साथ रहना चाहते हैं। हम यह भी चाहते हैं कि हमारे पडोमी भी शातिपवन रहे। विजय के उपलक्ष मे आयोजित सभा मे जगलिस्तान के सम्बध में कहता है कि--- 'उसे शक हो गया था कि जगलतत्रम, मगलवाद और अहिंसा के पुजारी है, इस लिए हमे हथियार उठाना आता नही ।" वह अधिवेशन मे कहता है-'हमारे ३ १ हजार घोडो का सवार, पृ० १५६ २ वही, प० १८९ दारुल शफा, प०७३ ४ वही, पृ० ३०६ ५ जगल तयम, पृ० १२ ६ वही, प० ।

१५० आप लोगा के हौसले तोड़ दिए हैं इसलिए मैं लडूंगा, आपकी यह लडाई आखिर दम तर डूगा । आप लोग साथ देंगे तो भी नहीं देंगे तो भी।" साह्य गाधी नी यो युटोर योजना ग्रामोद्याग या ममयन करते हुए गांव वालों को कहते हैं-- मुझे ता ऐसे fr९ और उत्माही नवयुवकों की आवश्यक्ता है इम योजना रेलिग । चाहता हूँ कि घरेलू उद्योग याजा को आप लोग ही सभाल लें आप लोग ही चलाएं। कितना बड़ा सपना था बापू का कि हर गांव और हर ग्रामीण आपिन रूप से स्वतत्र बने ममथ बो।" महामहिम' मे हिमा वा विरोध दिया गया है । मुन्यमनी तोताराम सवाद राता सम्मेला मे विरोधी रलो की हिंसा की पारदातों पर ठारा वक्तव्य देता है-'विपापे नेता गदश भर में हिंसा और अराजसता का वातावरण पदा करने पर अगादा हैं । तेवित हम हर कीमत पर जनता की रक्षा करेंगे।" समाज मे याप्त कुप्रथाओ जैसे दाा-दहेज की समस्या । शोषको द्वारा शोपितो पर अत्याचार वा भी लेखक ने यणन किया है और सामाजिक प्राति का मत भी व्यक्त किया है-'सामाजिक और सास्कृतिय प्राति अपने आप हो जाती है, कित हम लोग दुकाातार और पिसान वे मजदूरो और माला के परम्परागत प्रेम के रिश्ते को नहीं बदलेंगे, इसलिए हम केवल सांस्कृतिक प्रति करेंगे। आप चाहे तो थोड़ी बहुत सामाजिम माति की जा सकती है यही दान दहेज को ममस्या को लेकर ।" 'हजार घोडो का सवार' मे गाधीजी के सिद्धातोरा प्रवल समथन किया गया है । जिसमे वगहीन समाज की कल्पना, मत्य, अहिंसा अपरिग्रह, असहयोग, सत्याग्रह आदि को मा यता प्रदान की गई है। अलगरजिया बाबा कहता है- 'तेरी इच्छा इसीलिए ही मैं कहता हूँ कि बगहीन समाज की रचना होनी चाहिए ।५ अलगरजिया बाबा आगे कहते हैं-- तेरी इच्छा, हृदय गरीब व शोषित लोगो का बदला जा सकता है, पर पापाण व निरकुश लोगो का नही । 'इस- लिए अहिंसा, असहयोग, और सत्याग्रहो के साथ साथ नपुसकीय हिंसा का त्याग भी जरूरी है।'६ गाधीजी के सत्य, ईश्वर सम्पधी विचारा को प्रतिपादित करता करता हुआ अलगरजिया बाबा कहता है-'इस निराधार ईश्वर को तुम सब मार डालो। ये धार्मिक दलालो का ईश्वर है। हमारा और तुम्हारा नहीं । महात्मा गाधी ने भी कहा है-'सत्य हो ईश्वर है, प्रेम ही ईश्वर है, अच्छाई हो १ महाभोज, प०३६ २ वही, प०८० महामहिम, पृ० १०१ ४ वही, प०१४२ ५ हजार घोडा का सवार, ५० १५८ ६ वही, पृ० १५८ ।

ईश्वर है। जिस प्राणी मे इन तत्वो को लोप है, फिर भी वह ईश्वर का नाम लेता है तो वह मक्कार है । उम पाखण्डी के ईश्वर पर कभी भी विश्वास नही करना चाहिए।" गीधू भी दया, अहिंमा और अपरिग्रह का समथर है, 'धम इतना पच्चा नहीं है। घम एम आचरण है जो भारमी को अच्छाइयो से पूण करता है। हर घम के सही आचरण तीन ही है~दया, हिमा और अपरिग्रह । हा तीनो का आचरण करने वाला समता पा रामया होता है और यही समता प्राणी को ईश्वरमय बनाती है।" 'दारुत शफा' म भी हरिरानो को अपने समुचित अधिकार दिलाने का आह्वान किया गया है । लाबी राम रगीनराय को कहता है-'हो रायमाहन, यह मेरा निणय है हम रिज' का शताब्दिया से शोषण होता चला आया है। हाय बापू तुम यहाँ हो ! देखो अब । भारत के हदय के समान सबसे विशाल प्रदेश मे आज बीस वर्षों में भी किसी हरिजन को मुख्यमत्री नहीं बनाया गया। लेकिन मुझे बापू का सपना पूरा करना है। गाधीजी के आह्वान पर स्वतत्रता संग्राम मे लोग किस तरह शामिल होते थे इसका जिक्र रंगीनराय अपने भाषण में करता है-'उस आजादी का सपना जिमे छ भर पाने के लिए हमने तरम तरस कर दिन गुजारे तडप तडपकर राते काटी। गांधीजी को आवाज पर हजारों लाखो लोगों ने पढाई लिखाई बीबी बच्चो को त्यागकर मां बापू, भाई बहनों के प्यार छोडकर अपने देश को सब कुछ दे डाला मब कुछ।" 'जगलतम' मे प्रतीको वे माध्यम से कथा कही गई है। सिंह (प्रमुख राजनेता) जगलवाणी (आकाशवाणी) से राष्ट के नाम मटेश मे गाधीजी के अहिमा के सिद्धात का समर्थन करता हआ कहता है-'कुछ दिन पहले इम जगल के कुछ भाई बधु भटक्कर जगलिस्तान (पाकिस्तान) को सीमा में चले गये थे, जिहें वहां के जानवरो न मार डाला। यह हमारा बहुत बड़ा नुकसान या ति फिर भी हमने उसे बर्दाश्त कर लिया था क्योकि हम शाति के माथ रहना चाहते हैं । हम यह भी चाहते हैं कि हमारे पडोमी भी शान्तिप्रवद रहे।५ विजय के उपलक्ष मे आयोजित सभा मे जगलिस्तान के सम्बघ में कहता है कि- 'उसे शक हो गया था कि जगल तत्रम, मगलवाद और अहिंसा के पुजारी हैं, इस लिए हमे हथियार उठाना आता नही । वह अधिवेशन मे कहता है-हमारे १ हजार घोडो का सवार, पृ० १५६ २ वही, प० १८६ ३ दारुल शफा प०७३ ४ वही, प० ३०६ ५ जगलतमम, प० ८२ - जो भाई निर्बल हैं, उसे ऊपर उठने का मौका मिलना ही चाहिए।" 'शाति भग' उप यास मे मुशी जी गाधीजी के विचारो से बहुत प्रभावित कथा पात्र है । 'वे आज भी नियम से चर्खा चलाते हैं । जितना सूत निकाल लेते थे सिफ उतने के ही कपडे खद्दर भण्डार से लाते थे।" जबकि सदानन्द चर्खा चलाने का काम सिफ गाधी जय ती के दिन होने वाले कायक्रमो के उदघाटन के वक्त करते थे । आज पूजीपति कितना प्रगति कर रहा है मुशी जी की विचारधारा मे-आज कराडपति दो सौ गुना ज्यादा अमीर हो गया है और गरीब की गरीबी पाच सौ गुना बढ गई।" ये पूनीवादी प्रवत्ति गाधीजी के सपनो को साकार करने मे रोडा अटका रही है । 'प्रजाराम' मे प्रतीक नायक 'प्रनाराम' इदिरा गाधी की पराजय के बाद महात्मा गाधी वी समाधि के पास बैठा सोच रहा था-'आज नई पार्टी जनता पार्टी फिर उसी व्यक्ति की पूजा का अपना श्रीगणेश कर रही है महात्मा गाधी की। वही व्यक्ति पूजा का प्रतीक । एक यही नाम है जिसे ये नेता प्रजा और दलित वग के शोषण करने का हथियार बनाये हुए हैं । हमे गांधीजी के सपनों का भारत बनाना है देश मे रामराज्य लाना है।' वह (प्रजाराम) आगे सोचता है-'हे राष्ट्रपिता | आपकी इस ब्रह्माण्ड मे कही भी आत्मा है तो वह आपर इन राजनेताओ को समझा दे कि कम से कम आपके पवित्र नाम के माध्यम से देश की भूखी नगी जनता का शोषण न करें। वह शपथ को सत्य साथक करें। प्रजाराम एक काग्रेसी को कहता है- तभी तो मैं कहता हूँ इस व्यवस्था और आप जसे लोगों की वजह से कही भी परिवतन नही आ सक्ता प्रजा तो पिसती जायेगी। पूजीपति और अधिक पसे वाला होगा । गरीव अधिन गरीब होगा । फिर अनेक तरीको से धनी बनने वाला नव पूजीवाद भी अपने हिंसक जबड़े निकालेगा। वह गरीब आदमी को निगल जायेगा। निगलते रहेगे ।' गरीबो को इस पूजीवाद के हिंस्र जबडो से मुक्ति दिलाने के लिए गाधीजी के सिद्धातो को अपनाना बहुत आवश्यक है। 'कटरा बो आजू' में लेखक ने त कालीन समाज में व्याप्त दहेज जसी व्यवस्था को समाप्त करने की बात करता है। शम्सू मियां दहेज का विरोधी है। लेपिन आज का समाज दहेज को 'आ हजरत' (मुमलमान अपने पैगम्बर को 'आ हजरत कहते हैं) का आदेश मानते हैं । शम्सू मिया का विचार है 'यदि दहेज नहीं दिया है तो शायद बारात वापस लौट सकती है।' १ जगततत्रम पृ० १०१ २ शातिभग प० २८ ३ वहीं, पु० २६ ४ यही पृ०३१ ५ प्रजाराम, प०१०४-१०५ ५ ५ राजनीतिक चेतना एव परिवेश साठोत्तर हितो के राजनीतिक उपन्यासो मे चेतना और परिवश व्यापक स्तर पर मिलता है। परिवेश वे शानिय अथ की ओर गिर डालें तो आदश हिदी प्राब्द कोश मे इसका अथ बतलाया गया है-परिधि येष्टन, घेरा।हिदी शब्द कोश मे परिवश पा अथ-घेरा, परिधि बतलाया गया है। स्वत त्रता पश्चात जो उपयास लिने गये हैं उनका देशकाल और वातावरण तलालीन परिवेश को लेकर लिखा गया । वही समय उस समय या परिवेश बन गया है । स्वतत्रता के पश्चात भारतीय राजनीति मे जो धूणित परिवेश समाहित हुए हैं, उनमे वतमान को भ्रष्टाचारी व्यवस्था जो राष्ट्र के विकास मे बाधक मिद्ध हो रही है । आज की राजनीति मे जातीयता की राजनीति, साम्प्रदायिकता की राजनीति सस्थागत राजनीति, भाषा को राजनीति, आनुवशिाता की राजनीति, शहरी और ग्रामीण राजनीति तथा आदोलनकारी नीतियां आज धर्तमान राजनीति को अपनी परिधि मे समेटी हुई हैं । आज राजनीति इ ही परिधि के इद गिद घूमती रहती है। वतमान मे जसी व्यवस्था चल रही है इससे वर्तमान उप यासकार अधिक प्रभावित रहा है। इही परिवेशो को आधार लेकर आज उप यासो की सजना की जा रही है। साठोत्तरी हिदी उप याम में इन परिवणो का व्यापक स्तर पर यथाथ चित्र खीचने का प्रयास किया गया है। इन परिवेशों के निर्माण में जो बिदु सहायक रहते हैं, उसमे राष्ट्र की भौगालिक स्थिति, वातावरण, जलवायु, सामाजिक रीति रिवाज, परम्परा, व विश्वास, रूढियो आर्थिक तनाव, फैशन- परस्ती, पिछडापन अय बि दुपरिवेश को बनाने में सहायक रहती है। साठोत्तर राजनीतिर उप यासो मे इन निर्माण के तत्वो और परिवशो का व्यापक फलक पर चित्रण किया गया है । हम सभेप में इन परिवेशो को निम्न विदुओं की सहायता से अध्ययन कर सकते हैं--- ५० रामचन्द्र पाठक (स०) -आदश शब्द कोश, १९३१६ २ हिदी शन्न कोश, पृ० ३६५ १ भ्रष्टाचार - ब्रिटिश शासन काल मे भ्रष्टाचार अनेक स्तरो पर व्याप्त था। प्रेमचद के पूर्ववर्ती उपयासो मे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इसका विरोध किया गया है। हिदी उपन्यास साहित्य मे पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार पर व्यापक चित्रण मिलता है। वर्तमान मे पुलिस के अतिरिक्त अय ऐसा विभागो में भी भ्रष्टा चार फैला हुआ है। कोई भी ऐसा विभाग ही रहा है जहां कोई भ्रष्टा- चारी नहीं हो। बिना रिश्वत दिये काम को सम्पूण कराना कल्पना से परे की बात हो चुकी है। वतमान मे किमी काय को सम्पूण कराने के लिए नीचे से लेकर ऊपर तक के व्यक्ति को प्रसन किया जाना आवश्यक होता है। इस भ्रष्टाचार को हिंदी के साठोत्तर उप यासो मे देखा जा सकता है 'एक और मुख्यमत्री' मे पुलिस के अत्याचार व भष्टाचारी रूप को दिखाया गया है । एक तसील का थानेदार एक हरिजा युवती के साथ बलात्कार करता है । औरत उसके घर मे सफाई का काम करती है । उसका परिवार यही गया हुआ था। तब उसने यह घणित काय किया। 'मेहतरानो ने डटकर विरोध किया। उसके कपडे भी फट गए । अत मे थानेदार ने वेहोशी की सी अवस्था मे उससे बलात्कार किया।" लेकिन राजनेता उसको बचाने में लग गये, इतना बहुत कुछ करने के बाद भी उसे बारह साल की सजा सुना दी गई। शिवचरण मिश्र विकास अधिकारी त्रिवेदीजी का भानजा था। उसकी नियुक्ति वहाँ कर दी गई थी जग विकास की काफी सम्भावनाएं थी । लेकिन वहां का प्रधान निहायत ईमानदार था वह हर काय नियमो के अतगत करता तथा भ्रष्टाचार के समार से कोसो दूर रहता था। मिश्रजी इनसे विपरीत थे, रिश्वत लेना इाका जम सिद्ध अधिकार सा लगता था। पुस्तको की खरीद के वक्त वे प्रकाशक से रिश्वत मांगते हुए कहते हैं-'क्यो नहीं दे सकता है ? मैं गत तीन वप से विकाम अधिकारी है। मैंने सभी प्रकाशको से इतना कमीशन लिया है याने सारे बारह प्रतिशत बिल पर और शेष नकद के रूप मे । नवद बिल पास करने के पहले लिया है। जबरसिंह 'सहि नचावत राम गोसाई मे राधेश्याम मत्री से कृषि अनु सधान शाला व ट्रैक्टर को फैक्टरी खोलने के लिए जमीन और अनुदान प्राप्त करने को बहता है । इस काम के बदले यह कहा जा सकता है कि रिश्वत के रूप मे जो देना चाहता था उसके सबध में जवरसिंह से 'उमरे भाई हिम्मतसिंह के मनेजर बनाने के बारे मे कहता है । हिम्मतसिंह एग्रीकल्चर मे डिप्लोमा कर १ एक और मुख्यमत्री, प० १७८ २ वही, पृ० १६० चुका पा । राधे राम कहता है-'कृषित अनुसघानशाला के फाम मे मैनेजर पा पर मैंने आरक्षित पर दिया है उसके लिए। जिस दिन जमीन मिल गई उसी दिन से लण्ड डेवलमेट का नाम आरभ कर दे-आप उहे वुग लीजिए। पद्रह सौ से वाईस सौ रुपये पा ग्रेड होगा।" 'क्टरा वो आजू' में पुलिस के अत्याचार का भयानक रूप दिखलाया गया है । आपातकाल के दौरान सामा य व्यक्ति से पूछताछ के लिए कठोर यात- नाएँ, पुलिस द्वारा दी गयी। देशराज को 'आशाराम' या पता पूछने के लिए अमानवीय यातनाएं पुलिस द्वारा दी गयी । यातना वितनी बार थी, उसका पता इन पथनो से लगाया जा सकता है-'जगदम्याप्रसाद ने अपना नाम खत्म होते होने देश के हाथ पर अपना एक भारी बूट वाला पाव रप दिया। देशराज तडप गया । पर उसमे इतनी तायत नही पी पि' हाथ को उस भारी पवि वाले जूते के नीचे से निकाल सके।" आपातकाल के समय पुलिस ने यातनाओ के लिए मनुष्य के एक भी भग को वचित नही रखा । यथा-'जगदम्बाप्रसाद ने पल- भर परी को देखा और फिर उ होने एक पर का चुनाव किया और उसे झाडू से निकालकर यापस भाये । खुर्शीद आलम खां अब भी हैरान थे। बाबू जगदम्बा प्रसाद ने वह देश के चूतड में खोस दी जहाँ अब भी तीन दिन पहले भरी जाने बाली मिच की जनन मौजूत पी पर का रंग गहरा नीला था तीनो सिपाही जोर-जोर से हमने लगे और देश बदन के दर्द से बेपरवा पानी के गिलास के पिए उसके साथ साथ दद और जिल्लत के उस कमरो मे चिल्लाता रहा । 'राग-दरबारी' में पुलिस के हरामीपन व एकपक्षीय व्यवहार के सबध मे प्रिंसिपल साहर कहते हैं-'पुलिस ने जबरदस्ती दोना पक्षो पर १०७ वा मुर दमा चला दिया। इसे कहते हैं पुलिस का हरामीपन । बदमाशी बना ने की, मार पीट पर उसके साथी आमाद हुए और चालान हुआ तो उन लोगो का भी और हमारा भी। यह अधेर नगरी चौपट राजा ।" 'महाभोज' मे विसू का हत्यारा गिरपतार नहीं हुआ था कि चुनाव आ गया । चुनाव जीतने के लिए उसके हत्यारो को खोजना आवश्यक हो गया था। लेकिन पुलिस उसे गिरफ्तार करने में असमथ रही। पुलिस गांव मे बयान लेने जाती है । दा साहब यह भी जानते हैं कि ये पुलिस वाले क्रूर किस्म के व्यक्ति होते हैं । वे इस सबध मे सिहा से कहते हैं-पुलिस के सामने जनता को १ सहि नचावत राम गोसाई, पृ० १५० २ कटरा बी आज, प० १८० ३ वही, पृ० १८४ ४ रागदरबारी, पृ० २२४ १५६ अधिक सुरक्षित महसूस करना चाहिए आतकित नही । जनता यदि डरती है तो फलक है, यह पुलिस वालो के लिए।" मेरे दा साहब ने यह इसलिए कहा कि अगर बिसू का हत्यारा पकडा गया तो उनकी पार्टी अवश्य जीत जाएगी। वे आगे सि हा को और कहते हैं--'ऐमी घटनाएं घटें और पुलिस ठीक-ठीक पता न लगा पाये तो मतलब क्या पुलिस का ? इसस वेहतर है कि आप और हम इस्तीफा देकर वठ जायें ।" आज पुलिस इस तरह के केसा को सिद्ध करने मे प्राय असफल हो रही है । सिहा को डी० आई० जी० बना दिया जाता है। इस खुशी में पार्टी दी जाती है । लोग हाथो मे कीमती गिलास थामे हुए काई दल देश मे बढते भ्रष्टाचार पर चिता कर रहा था जबकि वे उस समय एक भ्रष्टाचारी के यहाँ दावत उडा रहे थे । 'लेकिन किसी के दिमाग मे एक क्षण के लिए भी यह बात न आयी की डी० आई० जी० की हैसियत का आरमी इतनी कीमती शराबें कहाँ से पिला सकता है, कसे पिला सकता है ? किसी बडे जौहरी की दुकान के शो केस की शोभा बढाने वाला क्म के पम वीस हजार का हीरो का सेट थीमती सिहा के शरीर की शाभा बढाने से आ पहुंचा कहा से आ पहुचा 23 इससे अदाजा लगाया जा सकता है कि सिहा किसी बडे भ्रष्टाचारी व्यक्ति से कम नहीं है। 'महामहिम' मे बतलाया गया है कि आज पुलिस भ्रष्टाचारियो का साथ कैसे देती है । दगे के समय बनियो ने अपने माल गोदामा मे माल गायब करके आग लगा दी ताकि बीमा से पैसे वसूल कर ले और माल बाजार में ऊँची कीमत पर बेचने के लिए रख दिया। रिपोट पुलिस ने सहप लिषी । जिसने कहा- 'हमारा पचास हजार का माल नष्ट हुआ। पुलिस ने उससे कहा-'एक लाख का माल नष्ट होने की रपट लिखाओ।' जिसने वहा हमारा पचास हजार का माल जल गया -पुलिस ने कहा, 'एक लाख का मान स्वाहा होने की बात करो।" पुलिस जमाखोरो और मुनाफाखोगे को पकडने बजाय मजदूरा पर अपने डण्डाको आजमाने लगी। 'हजार घोडो का सवार' मे गोधू जब ससद सदस्य बन जाता है तो सेठ दौलत चद अपने कुछ काम गोधू मे करवाना चाहता था, उसके बल्ले वह जीप, घडी दे देता है । गीधू लेना नही चाहता था, पर मन मार कर उसे वे वस्तुएं लेनी ही पड़ी। बलवीर गिह की दष्टि मे गीध 'यह भी मानता हूँ कि इम भ्रष्टाचार के सागर म जो भी पड़ेगा वह भ्रष्ट हो जायेगा। फिर ये भूगनगे लोग ऐय्याशी १ मन्न भण्डारी-महाभोज, पृ० ४५ २ महाभोज, प०४५ ३ वही प० १७४ ४ महामहिम,प० १५० १५७ जिदगी से बचकर भी कैसे रह सक्ते है ? लेकिन गीधू को सरलता से अपनी आर मिलाना फठिन है। यह तो मानना ही पडेगा कि उसके भीतर एक श्रेष्ठ मानव है । हमसे एक श्रेष्ठ मानव ।" 'शाति भग' मे बतलाया गया है कि आपात्काल के दौरान भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर था। नसरदी के नाम पर अफसर लोग पसे लूट रहे थे। नदकिशोर नसबदी पराना नहीं चाहता है। उससे प्रमाण पत्र देने के बदले पैसे मागे जाते हैं । वह पसा भी नहीं देना चाहता था । इसका यह फल हुआ कि उसे नौकरी से हटा दिया गया । खरे के बेटे बालकृष्ण को आतकवादी कहकर पुलिस उसे गोली से मार देती है। 'प्रजाराम' म आशुतोष नाम का इजीनियर है, जो पूणरूपेण भ्रष्टाचार मे डूबा हुआ है । उसने बाध मे जो भ्रष्टाचार अपनाये उसके सवध मे प्रजाराम उसे कहता है-'मुझे आप नही पहचान सकते तो भला आप किसका पह- चानेंगे ? जिम आदमी ने आपवे कहने पर एक सो मस्ट्रोल की जगह पांच सौ मस्ट्रोल बनाए थे, उसे आप नहीं पहचानत ? आपने सीमेट मे राख मिलाई थी। आपने इस तरह खूब पसा बनाया था।" उपय क्त उदाहरणा से पता लगाया जा सकता है कि आज भ्रष्टाचार हमारे चारो तरफ इस कदर पल गया है कि कोई भी आदमी इससे बचा नहीं है। पुलिस का आतक आदमी को स्वतत्रताओ पर रोक सी लगा देता है । पुलिस के नाम से आदमी पाप उठता है। कुछ चुनीदे पुलिस वालो ने ही इस विभाग को अधिर बदनाम पर रखा है। हमे आम जनता को पुलिस के भय से मुक्त और भ्रष्टाचार को समाप्त कर राष्ट्र की उनति मे सहायर बनना चाहिए। साम्प्रदायिकता की राजनीति भारत की राजनीति मे सवप्रथम राजनीतिक दलो वा गठन धार्मिक स्वरूप में हुआ । स्वतत्रता से पूर्व सामाजिक आदोलन हुए उसम अधिकाश का नेतृत्व हिदू सुधारको रिया और यही कारण है कि धम के रूप में नये युग की नयी वाणी 'वनित हुई । भारत के नवजागरण काल मे धार्मिक आदोलना के कारण हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के समीप न आ सके । अग्रेजा ने इसका लाभ उठाते हुए स्थिति के अनुकूल 'फूट डालो और राज्य करो' की नीति को प्रश्रय देकर साम्प्रदायिक भावना का विस्तार किया। १ हजार घोडा का सवार, पृ० ४०६ २ प्रजाराम, पृ० ३२ - मुस्लिम साम्प्रदायिकता को प्रातरिया ६ स्वरस हा २० वी शता के प्रारम्भ में हिंदू महासभा का आविर्भाव हुआ। यह हिदू राज्य की स्थापना का स्वप्न देती थी। ऐसे अनेक दलो या गठन हुआ जो साम्प्रदायिकता के आधार पर बने थे, जैसे मुस्लिम लीग, जनसघ, साम्यवादी दल आदि । स्वतयता के पश्चात भारतीय राजनीति में साम्प्रदायियता किस तरह फैल गई उसको हम साठोत्तर हिदी उप यासो मे इस तरह से देख सकते हैं 'एक और मुख्यमत्री' मे बतलाया गया है कि भारत जस विशाल देश मे अनेक जातियो का निवास है । इनमे आपसी साम्प्रदायिक सहभावना का होना अति आवश्यक है। जब जनता म साम्प्रदायिकता की भावना अपन घृणित रूप में उपस्थित होती है तब राष्ट्र का पतन आरम्भ हो जाता है। अरविद सोचता है-'पजाबी सूवे को लेकर जो अकाली दल के प्रमुख कायकर्ताओ ने जातीयता, प्रातीयता व साम्प्रदायिकता का विष वमन किया था, वह देश के लिए कितना घातक सिद्ध हुआ। सिक्खो का अनग प्रात और हरियाणा अलग । कितनी भया नक स्थितिया उत्पन हा गई थी।" इसका परिणाम यह हुआ कि सिक्खो और हि दुभो म, विशपत आयसमाजी और जनसघी विचारधारा के लोगो के बीच के तनाव न हिमा का रूप धारण कर लिया था। "क्टरा वी आजू' मे आशाराम को पूरा यकीन था वि' 'मुरारजी भाई और उस थैली के तमाम चटटे बट्टे जनसथ से गठजोड करके प्रगतिशील ताक्तों के खिलाफ मोर्चे बनायेंगे। और एक मजिल पर जमायते इस्लामी और इस तरह की दूसरी तमाम मुस्लिम साम्प्रदायिक पार्टियां भी उसी बडे गठजाड का हिस्सा बन जायेंगी अपनी ये परेशानियों वह किससे कहता, क्यापि खुद उसकी पार्टी दो हिस्सो में बट चुकी थी।" 'राग दरबारी मे प्रिंसिपल ख ना ने अपना नाम असली नाम खना ही रख लिया। वह गांव में सभी से साम्प्रदायिक सद्भावना रखने पर जोर देता था । 'ख ना मास्टर का असली नाम ख ना था। वैसे ही जसे तिलक, पटेल गांधी, नेहरू आदि हमारे यहां जाति के नही व्यक्तियो के नाम हैं । इस देश में जाति प्रथा को खत्म करने की यही एक सीधी सी तरकीय है। जाति से उसका माम छीनकर उसे किसी आदमी का नाम बना देने से जाति के पास और कुछ नही रह जाता। वह अपने आप खत्म हो जाती है ।' धम, जातिवाद को समाप्त करके ही देश में साम्प्रदायिक एकता को लाया जा सकता है। २ ३ एक और मुख्यमत्री, पृ० २१६ २१७ कटरा बी आ— पृ० १६ राग दरबारी, प० २६ १५६ वर्तमान राजनीति में लोग चुनावो मे सफलता के लिए साम्प्रदायिकता और गरीब तबके के हित की बात कहकर सफलता प्राप्त करते हैं। 'महाभोज' मे दत्ता साहब कहते हैं-~'ठीय है भाई तुमको,चुनाव जीतना है पर लोगो की शाति और आपसी सद्भावना पर तो मत जोतो। होगा क्या, गांव मे पहले ही तनाव है और बढ़ जायेगा । आपस मे ही मार पाट मचेगी। और इस सब का परिणाम ? पिसेगा वेचारा गरीबो या तबका। सम्पन लोग तो जैसे-तैसे वच हो जायेंगे-पसो और तारत के जोर से, मरता तो गरीब ही है न?" दुहाई गरीयो की सब देते हैं, पर उनके हित को बात कोई नहीं सोचता । जनता को बाटकर रखो कभी जात की दीवारें खीचकर, तो कभी वग की दीवारें खीचकर । जनता का बटा बिखरापन ही तो स्वार्थी राजनेताओ की शक्ति का स्रोत है।" ''महामहिम' व्यग्य शैली म लिखा हुआ उप यास है । यह जनता पार्टी के शासन काल को लेकर लिखा गया है। विरोधी पार्टी सत्ताहीन पार्टी का सि तरह बदनाम करती है और साम्प्रदायिकता के नाम पर दगा करवाती है। स्वामी ब्रह्मचारी के शिष्य किस तरह साम्प्रदायिकता को बढावा देते हैं यथा-- 'इस प्रकार साम्प्रदायिा सद्भावना के लिए आयोजित मुशायरा शुरू होने से पहले ही साम्प्रदायिकता की चपेट में आ गया। 'हजार घोडा का सवार' मे बतलाया गया है कि अग्रेजा के शासन के समय से ही साम्प्रदायिक एकता की भावना समाप्त होती चली गयी। एक जाति दूसरी जाति के लोगो को हीन दृष्टि से देखती थी। सेठ मोहता गीधू को पत्र म लिखता है-'भगी मेघवाल के घर का नही खाता और मेघवाल सासी के घर हर जाति दूसरी जाति को हीन समझती है। अछूत समझती है । ऐसी स्थिति में छुआछूत की लडाई न ता सैद्धातिक रूप से लडी जा सकती है और न व्यावहारिक रूप से। उसके लिए एक सही लडाई की जरूरत है। जब गीधू सासिया और कजरा के घर का खाना खा भाता है तो सीता दादी अपने भानजे की सगाई गोधू की लड़की से तोड देती है । उस समय रमाडी गोधू को कहती है-'कोई अपनी जाति बिरादरी के विना नहीं रह सकता। आपने सौसिया व कजरा के साथ खा पी लिया है, फिर उही को अपनी बाई बेटी भी या। १ महाभोज, पृ० ४७ २ वही, पृ० ४८ ३ महामहिम,प० १४७ ४ हजार घोडो का सवार, पृ० २६६ । में १५ अगस्त । भाग्रा हुआ । निगाप्रायिकाम पर देश में दरोरा दिल । देशरी साना में गाप मारसा की नदियाँ भी यहती दगी गया । हिदू मुमतमान के भाग और काले माम गुम हो गया। राड य वयमा का राग रास र अशोर या रनिगाहप्यारा, मारमादिलो परतेपाम भोर मगायो पी पपरता भूम गय । हर हि मागागर और हर गुगसमान पगैजयो।" पहली बार सामूहि पगे जाग गया rि 'धम nिा पूर, हपारा और रमत PिIE RITI है। पहली यार तो अप्रेमापी मुटिया मे फरस्वरूप आमी ये भीतर अथा घम जागा पा।" 'पाली माधी मनसाय रे पा साम्प्रति म पर गे होते हैं और सिरह पर म सपनपा रे नि प्रतिहपगडे सपनाते हैं और साम्प्रतापिता पा नहर पारा ही माग होना है।यून बहारर पाय यो जीता मिस साहर सपा पिराण करते हुए कहते हैं--- यह नाम उा जाहिल और पियापरम्त लोगो मा है जो दीयोमता को धूम मिला दा हो गरीर और डा भूमे सोगामा, गोरिदगी यो जद्दो- जहद म अपना नागी यहा रहे हैं। य यहगो लाम उ यूगार जगली जानवरा में बात लेगा पाहते हैं ताकि आपस मे एरो रह अपने भाईयों पी गदा पाटते रह और उन लागो ये पिलाप न उठ घडे हों जा सचनुच खून चूसते हैं गरीयो या पूर चूगो वाले तसे भी यह साजिश है पि गरीय एक न हो पाए 'दारुल गफा में एक पा लोवीराम है । राजनीति के दाव पेंच तो उनको यूच आत है लेकिन सत्ता चला सो या सत्ता पो घरी का हिस्सा बने रहना उनको यमी नहीं आया । वे जाति, वग व इलाके ये माधार पर नेता बन गये। हरिजन और पिछडे वग में नेता की उमरती हुई नस्न पो लीराम ने ठीक वक्त पर पहनाना । उनकी समस्याएं जितनी उनकी जागी समनी थी, पार्टी मे बहुत कम लोग तव जानते थे। 'प्रजाराम मे प्रजाराम के माध्यम से लेना ने बताया है कि हर चुनाव १ हजार घोडो का सवार, पृ० ३३४ २ वही, प० ३४९ ३ वही, पृ० ३४६ ४ काली आधी, प०५६ ५ दारुल शफा, प० ३७० आते ही साम्प्रदायिकता, जातीयता, धम उभरकर आमने आता है और तब व्यक्ति के मन से राष्ट्रीयता की भावना मिट सी जाती है । प्रजाराम एक ससद सदस्य से कहता है-'इस देश में एक बार फिर जाति, सम्प्रदाय और घम उभर आये है । यह उभार कभी न कभी बहुत ही नाजुक स्थिति को ज म देगा। क्योकि जन तक राष्ट्र मे न केवल सामाजिक बरिक भावनात्मक व सास्कृतिक तादात्म्य नहीं होगा, तब तक राष्ट्र सही माने में प्रगति नहीं कर सकता। मनुष्य को जाति, धम के तबको मे बाटना एक तरह से राष्ट्र को विनाश के कगार पर खडा कसा है।" उपयुक्न उदाहरणो से यह निप्प निकाला जा सकता है कि स्वतत्रता के पश्चात भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता किस तरह घर कर गई है । आज चुनाव साम्प्रदायिकता के आधार पर जीता जाता है । अग्ज एक जाति दूसरी को हीन दष्टि से देखती है । जाति के नाम पर साम्प्रदायिक दंगे हो रहे हैं । हिन मुसलमान से, सिक्ख हिदू आपस मे लड रहे हैं । अकाली साम्प्रदायिक भावना के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग कर रहे हैं । यही साम्प्रदायिकता एव प्राती यता की बात राष्ट्र के विकास मे बाधक सिद्ध हो रही है । राजनीतिक सस्थावाट स्वतनता की प्राप्ति में काग्रेस वा महत्त्वपूण रोल रहा था। स्वतत्रता में पश्चात् भारत मे काग्रेस का शासन रहा । अपनी गलत नीतिया के कारण काग्रेस का सत्ता से हाथ धोना पड़ा और शासन जनता पार्टी के हाथो में आया । स्वतत्रता के पश्चात् भारतीय राजनीति का दल बदलू का जबरदस्त राग लग गया। आज के ससद सदस्य और विधायक को जिस तरफ अपना व्यक्तिगत स्वाथ दिखाई दिया वह उसी दल मे शामिल होने लगे । यह रोग कम न होर अधिक तीव्र होता जा रहा है । आज नेता लोग सत्ता को प्राप्त करने के लिए व निजी स्वार्यों की पूर्ति के लिए राजनीतिक दलो का गठन कर रहे हैं । जितने अधिक राजतीतिक दल हागे उतने ही प्रजातत्र के लिए बाधक होते हैं। वत- मान मे भारतीय राजनीति के प्रमुख दत है-पाप्रेस (आइ), काग्रेस (एम), लोक्तायिक समाजवादी पार्टी, जनता पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, लोबदल, भारतीय कम्युनिस् पार्टी माक्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, प्रजा समाजवादी, संयुक्त समाजवादी, स्वता, जनसघ, शारखएर, मुस्लिम लीग, रामराज्य परिपंद अकाली दल, द्रविड मुनेत्ररडगम, फारवड ब्लावा, गणतत्र परिपट, हिदू महासभा और तेलगू देशम । इतनी अधिक पार्टियां किसी अय प्रजातात्रिक राष्ट्र मे नहीं मिलती हैं । भारतीय राजनीति में इन सस्याओ का योगदान है । उसको हम - . १ प्रजाराम, पृ० ११३ - हिदी के साठोत्तर उप यासा में इस तरह देख सकते हैं- 'एक और मुख्यमत्री' मे अरवि द हिंदू महासभा या कट्टर समथक और महत्त्वपूर्ण नेता था। हिंदू राष्ट्र देखा उसका स्वप्न था। जब उसे लगा कि हिदू महासभा मे रहकर न सत्ता को प्राप्त कर सकेगा और न ही राजनीति मे उच्च पद, यश, धन प्राप्त कर सकेगा। इस कारण वह काग्रेस में शामिल हो जाता है । गाधी जी को श्रद्धांजलि दते वक्त कहता है-'स्वतनता के पिता की मृत्यु हमारे लिए असह्य है । मैं क्या करू, हम स्वय अपराधी हैं । हम केवल तडप सकते हैं । वापू । मरी श्रद्धाजलि-जो न हे बच्चे की तरह मोन है- स्वीकार करना । अत म मैं अत्यात खेद के साथ घोपणा करता हूँ कि आज से मैं हिदू महासभा या छोड़कर जा रहा हूँ। इतना कहकर वह बैठ गया। पम्यु निस्ट पार्टी व पानस के वायकर्ता निश्चेष्ट हो गय और हिंदू महासभा के नेताओ पर वज्रपात हो गया ।" इस तरह आज प्रत्येक नेता अपने निजी और राजनीतिक स्वार्थों को पूर्ति के लिए दव बदल का सहारा लेते हैं । 'क्टरा बी आजू में बताया गया है-लोग कुछ विधायका को लेकर दल बदल करत रहत है । सिफ उद्देश्य यह है कि व मत्री बना दिए जा सकते है। यथा-अभी यश सेशन सुपुद नही हुआ था कि वह मत्री हटा दिए गये और लालगज के ठाकुर का दामाद मत्री हा गया क्याकि वह पलार क्रास करके बाईस एम. एल० ए० लोगो के साथ कानस म आ गया था। राग दरबारी मे गांव की पचायत समिति के चुनाव में कुछ दिना से वद्यजी रुचि लन लगे थे । जबस उहाने प्रधानमत्री का भाषण अखबार मे पढा था। उस भाषण म बताया गया था कि गावा का उद्धार स्कूल सहकारी समिति और गाव पचायत के आधार पर ही हो सकता है और अचानक वद्य जी को लगा था कि व अभी तक गाव का उद्धार सिफ कोआपरेटिव यूनियन और कालिज के सहारे करते आ रहे थे और उनके हाथ मे गाव पचायत तो है ही नहीं।' और वैद्यजो गाव का प्रधान सनीचरा को बना देते हैं, जिसे राजनीति को वण माला का भी ज्ञान नही है। ऐसी राजनीति चलती है ग्रामीण सस्थाओ मे। भाज को राजनीति मे सत्ताहीन पार्टी दल बदलुआ के साथ जो यवहार ईख्न यार करतो है उस हम महामहिम' मे उस स्थान पर देख सकते हैं। प्यारेलाल मत्री बनने की इच्छा लेकर सत्ताहीन पार्टी में शामिल हो जाता है। इस सम्बध म के द्रीय मत्री चद्रिका बाबू तोताराम को कहते है-'प्यारेलाल और १ एक और मुख्यमत्री, ५०७६ २ कटरा बी आजू, प० ६६ ३ राग दरबारी, पृ०११८-११६ उनके सापियो को मत्रीमण्डल में शामिल नहीं किया जायेगा। घबराओ मत, वे लोग तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड पाएगे। अभी अभी दल बदलकर आये हैं अब फिर इतनी जल्दी दल परिवतन करने की हिमाक्त नहीं करेंगे हाँ।" विरोधी पार्टी के विधायक सत्ताहीन पार्टी को बदनाम करने के लिए हडतालें, जुलूसो, दगों को करवाते हैं । ऐसे स्वामी ब्रह्मचारी हैं, जो मत्री बनने के लिए ऐसा कर रहे हैं। 'समझौता हो गया कि विधायर दल की आपात बठक मे स्वामी ब्रह्मचारी का गुट जुटाकर शुक्ल का साथ नहीं देगा और इसके बाद अगले ही दिन मत्रीमडल विस्तार करने की घोषणा परवे पुरस्कारस्वरूप ब्रह्मचारीजी के क्सिी साथी को गह मत्रालय सौंप दिया जायेगा।" 'दारुल शफा' मे बतलाया गया है कि आज नोट के बदले विधायको को खरीदा जा सकता है। आज इनकी रेट क्या चल रही है इसका चित्र इस स्थान पर उपस्थित हुआ जब उरसक्दास द्वारा लोबीराम की खरीद के समय पसा तय करते वक्त आता है । आज की रेट सुनकर उत्मकदास चौंक पड़ते हैं। बलराम पहता है-'तीस चालीस । नही गुरुजी साठ से क्या कम होगे।' साठ । बाप रे वाप !! क्या रेट है आजाल ?' सवाल तो उत्सुकदास ने पूछा और खुद ही जवाब देने लगे-पांच तो राज्य के चुनाव में दिये थे, इसमे मत्रीमण्डन न मिलने के लिए एव दो और चाहेगा साला।' 'प्रजाराम' मे आपातकाल के समय सामा पजनता का इतना शापण किया गया कि आदमी अपने अधिकारो और स्वतंत्रताआ को भूल गया था । इदिरा गाधी चुनावों की घोषणा करती हैं। प्रजाराम इस काग्रस को हराने के लिए कमर कप लेता है । उसने बम एक ही नारा लगाया 'तुम किसी को भी अपना ओट दो, पर काग्रेस को वोट मत दो। उसे हर कीमत पर हटाओ। उसने प्रजातन, तानाशाही व स्तरता के नाम पर हमे छना है । इसके हर शब्द जाल के पोछ आम आदमी का शोपण है।" काग्रेस के बडे वड नताओ ने अवसर का फायदा उठाया और काग्रेस छोडकर जनता पार्टी में शामिल हो गये। आशुतोष कहता है-इसे अवसरवादिता को राजनीति कहते हैं । प्रजाराम क्ल के काग्रेसी आज जनता पार्टी के महारथी बन सकते हैं, तो क्ल का अवसरवादी आज इनका भापू क्या नहीं बन सकता। उपयुक्त वर्णन से यह निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय राजनीति मे प्रत्येक १ महामहिम, प०६१ २ वह, पृ० १७२ ३ दारुल शफा, पृ० ३१६ ४ प्रजाराम, पृ० १०० ५ वही, ५० १०४ सस्या (दल) अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को प्राप्ति के लिए अनैतिक हथकण्डो को अपनाता है। आज प्रत्येक नेता जैसी राह वसी चाल चलता है । जिस दल को उनति का रास्ता दिखाई देता है, उच्च पद प्राप्त होने की सभावना होती है, तो वह उस दल में शामिल हो जाता है । वतमान राजनीति मे दल इतने अधिक हैं कि किसी पार्टी का स्पष्ट बहुमत कम ही मिलता है, जिसके फनस्वरूप आज राजनीति को दल बदलू जमा भयार रोग लग चुना है। भारतीय राजनीति को सही ढग से चलाने के लिए दल बदल का रोग समाप्त करना हमारे लिए अत्यत आवश्यक है, जो राष्ट्र को कमजोर बना रही है। भाषा की राजनीति , । ब्रिटिश शासको ने अपने घम और क्लक बनाने की खातिर अग्रजी का प्रचार किया। भारत स्वतन हो गया, अग्रेज चले गये लेकिन उनकी भाषा नही गयी । आ7 अग्रेजी भापा का स्थान राष्ट्र भाषा हि दी के समक्ष ही है। आज भाषा भारत की एकता मे बाधक सिद्ध हो रही है। प्रत्येक प्रात को अपनी अलग भाषा है ! जसे गुजरात की गुजराती, उडीसा की उडिया, महाराष्ट्र की मराठी, राजस्थान की राजस्थानी, पजाब की पनाबी, तमिानाडू की तेलुगु तमिल आदि भापाए हैं जो एक प्रात विशेष मे बोनी जाती हैं । दक्षिण भारत और उत्तर भारत भाषा के नाम से एक दूसरे से विभाजित हैं। उतर भारत की प्रधान भाषा हि दी है और दक्षिण म अग्रेजी का प्रभुत्व है । जब तक राष्ट्र भापात्मक एकता से परिपूर्ण नही होगा तब तक राष्ट्र का संगठित होना मुश्किल लगता है। सरकार को जनता में एक भाषा व एकता का प्रचार करना चाहिए । स्वतता के पश्वात भापा राजनीति का प्रमुख अग बन गयो। भाषा के नाम पर चुनाव नडे जाने लगे हैं । वनमान मे पापा की राजनीति किस तरह फैल रही है उसको हम हि दो के साठोत्तर राजनीतिक उपयासो मे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। 'ए और मुभानी म कथानायक अरविंद सोरता है कि भारत के वासी अपनी स्वय की भाषा स इतना प्रेम नहीं करते हैं, जितना विदशी भाषा अंग्रेजी से करते हैं । उत्तरी भारत और दक्षिणी भारत भाषा के नाम से एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं । अरविद अपन आप स कहता है-'हमारी भावात्मक एक्ता का अस्तित्व कहाँ है । हम भारतवासी भी विस अजीय मिट्टी के बन हुए हैं जिह आने देश की भाषा से प्रेम न होकर अंग्रेजी से है। सारा दक्षिण यह भी कहता है कि हमारी राष्ट्रमापा कोई दक्षिणी भापा हो तो भी कोई बात थी, पर वे अग्रेजी के लिए राष्ट्र की सम्पत्ति और उत्तरी भारत के लोगो को परेशान . करते हैं।" 'दारुल शफा' मे लोवीराम हरिन्नो व दलित वर्ग का समथन प्राप्त करने के लिए उनकी भाषा, हाव भाव से परिचित हो चुका था। हरिजन और पिछडे वग के नेताओ की उभरती हुई नस्ल वो लोवीराम ने ठीक वक्त पर पहचागा । उनकी भापा, हाव भाव, उनकी समस्याएं जितनी उसा जानी समझी थी, पार्टी में बहुत कम लोग जानते थे।" उपरोक्त वणन से पता लगाया जा सकता है कि भारत जसे विशाल देश मे एक भापा नहीं है। हिदी राष्ट्रभाषा नाम मात्र यी है। सरकार को हिदी को भखिल भारतीय भापा बनाना चाहिए। आनुवशिकता की राजनीति भारतीय राजनीति पर कुछ विशेष परिवारो या अधिकार हो गया लगता है। इन परिवारो के सदस्य प्रमानुमार शासन मे आते रहे हैं। आज मत्री का बेटा मत्री विधायक का बेटा विधायक, अफसर का बेटा अफमर आदि पदो के लिए स्थान पा रहे हैं। प० नेहरू के बाद उनकी बेटी श्रीमती इदिरा गाधी भारतीय राजनीति पर छाई रही हैं। इदिरा जी ने अपने बेटे सजय को आगे लाने मे पूरी कोशिश की। उनके आकस्मिर देहावमान पर राजीव गांधी को पायलट से हटाकर युवा राजनेता बना दिया गया । वह प्रवत्ति स्वस्थ लोकतत्र के लिए अहितकर है। साठोत्तर हिदी उप यामो मे इस यानुवशिषता की राजनीति का विरोध किया गया है। आज भाई भतीजावाद वो भी भारतीय राजनीति में देखा जा सकता है। 'राग दरवारी' मे वद्य जी पई राजनीतिज्ञो और अधिकारियो को परास्त करके वहाँ पहुँच गये जहाँ स कोआपरेटिव इसपेक्टर की रक्षा का आदेश निकल रहा था। वहाँ उह विदित हुआ कि सहकारिता-आदोलन मे अब एक नये चि तन का संचार हुआ है जो भाई भतीजावाद, जातिवाद आदि उच्चवर्गीय सिद्धातो को एक मे लपेटकर भविष्य मे कायकर्ताओं की प्रेरणा का स्रोत होगा।' 'दारुल शफा' मे ताबा काण्ड की जाच केन्द्रीय मत्रीमडल के पास भेज दी जाती है । गुरुपद स्वामी उस समय गहमत्री बने थे। इस काण्ड के अपराधी उही के ग्रुप के आदमी थे । इस ताबा काण्ड ने उसकी प्रतिष्ठा को हिला सा दिया था। 'उनके पिछले जीवन से सम्बधित जितने घपले थे, वह सब उहोने जान १ एक और मुख्यमत्री, पृ० २१६ २ दारुल शफा प० ३७० ३ राग दरबारी, पृ० ३३० बूमकर अपने माने-माने बेटे को बोत्रियो के रिश्तेदारो, भाई की लडकी लडको की खातिर झेले थे । उम सबकी जिम्मेदारी वह अपने ऊपर ओढ़ लिया करते । सब कुछ होते हुए इन घपलो से उनके खानदानी रिश्तेदारो भाई भतीजों के दोस्तो को किमी न किसी रूप मे फायदा ही पहुचा था ।" इस तरह आज प्रत्येक नेता अपने परिरिक मदस्यो के विकास की ओर अयधिक ध्यान देता है । 'इतने महत्त्वपूर्ण पद पर पहुंचने के बाद उहोने मन ही मन सौगध उठायी, घपले न करने की। खानदानी रिश्तेदारो, नातेदारो, भाई भतीजो के घधेबाज पिछलग्गू दोस्तो को उहोने बडी सोज यता से काट रखा था।" आज ऐसी नीति प्रत्येक नेता अपना ले तो राष्ट्र निरन्तर विकास की ओर उन्मुख होता रहेगा। लेकिन इस बात से नेता लोग दूर भागते हैं । 'हजार घोडो का मवार' मे गिरधर गोपाल अर्यात गोधू जब ससद सदस्य बन जाता है तो उसके सम्मान मे सेठ दोलतच द भोज का आयोजन करता है। गीध वगहीन समाज की स्थापना पर जोर देता है । सेठ आज के चुनाष व राज नीति के सम्बध मे कहता है-'लोग तो अभी से कहने लगे हैं कि देखते रहिये श्रीमान आगे चलकर मत्री का वेटा मत्री बनेगा, ससद सदस्य का बेटा ससद सदस्य। यह क्या अनीति नही है 3 'प्रजाराम' मे तत्कालीन व्यवस्था के बारे मे प्रजाराम कहता है-सिपा हियो नम्हारे बबर अत्याचार महते महते हम थक गये हैं । अब हम खुद खून का बल्ला खन मे लेंगे और उस व्यवस्था के लिए एक लम्बी लडाई लडेंगे, जिसमें देश का अशिक्षित भखा नगा और मेहनतकश इमान एक नयी जिन्दगी पायेगा। वह चाद बौदिक ऐय्याशो और उनके अयायो का सामना करेगा। वह भाई भतीजावाद मत्री का बेटा मत्री प्रधानमत्री का बेटा प्रधानमत्री ससद सदस्यका बेटा ससद सदस्य अफमर का बेटा अफसर की वश पर- म्परा का विरोध करेगा और भ्रष्ट राजनीति व अफसरशाही को जडों से उखाड फकेगा। तुमने हरिजनो, दलितो, अल्पसंख्यको और जातिवाद के नाम पर लम्बा राज्य कर लिया है। इस तरह आज की राजनीति पर आनुवशिक्ता पूर्ण रूप से हावी हो चुकी है। नारी चेतना के परिवर्तित आयाम स्वतत्रता के पश्चात् महानगरो की पढ़ी लिखी स्त्रियां घर की चौखट को १ दारुल शफा प० २२३-२२४ २ पही, २०२२४ ३ हजार पोहो या सवार, पृ० ३७६ ४ प्रजाराम, पृ० १५६ लाधकर राजनीति मे जन समूह के साथ जुड गगी । अतीत मे रजिया बेगम, चांद बीवी अहिल्यावाई, नूरजहाँ अदि राजनीति से सम्बधित रही थी। भारत को स्वतनता मे रानी लक्ष्मीनाई का योगदान महत्वपूर्ण रहा । राष्ट्रीय आदो लनो में विभिन्न प्रदर्शनो, जुलूसो आदि मे भाग लेने के साथ वे पुलिस को गोलियो और लाठी सहने मे भी आगे रही। नारी शिक्षा के परिणामस्वरूप नारी जागरूक होकर चारदीवारी को लाघ पर राजनीतिक क्षेत्र मे आ गई है। वतमान राजनीति मे नारी का स्थान महत्त्वपूर्ण है । आज भारत की प्रधान मत्री नारी ही है। वह है श्रीमती इदिरा गाधी । इनके अलावा अन्य महत्त्वपूर्ण पदा पर नारी का स्थायित्व है। वास्तव में स्त्रियो के राजनैतिक व्यक्तित्व के विकास मे राष्ट्रीय आदोलन का ही प्रभाव नजर आता है। साठोतर हिली में राजनीतिक उपयासो में नारी के योगदान का उल्लेख इस तरह मिलता है। 'एक और मुख्यमत्री' मे कथानायक अरविंद की प्रेमिका शची अरविंद के कहने पर राजनीति में आ गयी थी। धीरे धीरे वह विधायक भी बन गयी है। फिर काग्रेस में शामिल हो गयी । मत्री सेवाराम की अरविंद से तनातनी हो गयी-'ताव में आकर उसने अपने पद से इस्तीफा दे दिया । अरविन्द ने उसे स्वीकार कर लिग और मग्रियों के पोट फोलियो मे एक बार फिर उसने हेर- फेर की। इस हेर-फेर मे शची शिक्षा उपमत्री बन गयी।" चौधरी जी नारी में विकास के लिए कहते हैं-'यह मेरा गितान ही व्यक्तिगत मुझाव था। आखिर नारियों भी क्न प्रगति करेंगी। वह भी पुरुषो के मकावले क्व वधे से कधा मिलाकर चलेंगी"शची को मुख्यमत्री बनाने के लिए चुनाव मे खडा करके अपना ममथन देता हआ परमारों से कहता है-'लोक्ता की रक्षा करते हए वह चाहेगा कि नेता कामवैधानिक रूप से चनाव कराया जाय । उसकी और से श्रीमती शची रानी खड़ी होगी। अब हम नेता के मामले को लेकर किमी तरह का कोई समझौता नही करेंगे । और इस तरह शची प्रात की मुख्यमन्त्री बन जाती है। माची ने पुत्र को जम दिया तो उसे देखकर अरविंद उसके अतीत को याद करना है-'जो एक दिन अपने जिस्म का सौदा करती थी-महानगर मे । जिसके चेहरे पर बाजारू औरतो जैसा बाईयाँपन था और श्री एक टूटी हुई निराशा। कुठाओ मे घिरी स्त्रियो जमी निर्भीकता और स्पष्टता थी उममे । वही शची माज क्तिनी पवित्र और सौम्य है। मां बनकर वह जस नारी जीवन को महान् साथक्ता को मिद कर रही है। उसने कई बार नितात मोन रहार १ एव और मुख्यमत्री, पृ० १८२ २ वही, पृ० २३१ ३ वही, पृ. २८६ शची को देखा । उज्ज्वलताओ से चमकती उसको मुखश्री मारपणता की परा- काष्ठा को चूम रही थी।" 'काली आधी' की मुख्य पात्र मानती जी हैं । जो अपने पति के कहने पर राजनीति में अपना सब कुछ त्यागपर शामिल हो जाती है । वह अपने पति जगी वायू और लिल्ली से दूर चली जाती है और राजनीति में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान वा लेती है। यह महिलाआ को आगे आने के बारे मे पहती है-'तो बहनो, हमे एक महिला सेवा दल बनाता है मुख्यमत्री महोदय का गर मे आ रहे हैं और उह दिखाना है कि हम महिलाए भी अपना मोर्चा सभाले हुए हैं आने वाले चुनावो मे हमे बहुत काम करता है मैं चाहूगी कि कम से कम तीस महिलाए आगे आयें और दल का निर्माण पर।" मालतीजी नारी होते हुए भी ससद सदस्य बनने की शक्ति अपने व्यक्तित्व मे रखती थी। आज समाज को ऐसी सधपशील व शासा को अपने हाय मे लेने को शक्ति हानी चाहिए। उपर्युक्त विश्लेषण के बाद कहा जा सकता है कि स्वतत्रता के पश्चात् भारतीय नारी को घर की चारदीवारी को लापकर आदमी के साथ कधे से कंधा मिलाकर चलना होगा। आज महत्त्वपूर्ण पदो पर नारी पहुंच चुकी है। शहरी और ग्रामीण राजनीति एव सस्थागत राजनीति भारतीय स्वतत्रता संग्राम के आदोलना मे भारतीय गावो ने नगरी एवं महानगरो के साथ कधे से कंधा मिलाकर साथक सक्रियता प्रदान की थी। स्वतत्रता के पश्चात गावो मे पवायनी राज्य और वयस्क मताधिकार प्रदान किया गया। आजकल ग्रामीण क्षेत्र शहरो और महानगरो की अपेक्षा राजनीति क्षेत्र के प्रमुख केद्र स्थल बनते जा रहे हैं । भारत की अधिकाश जनता गावो मे चाहे अनचाहे रूप से निवास करती है । अत भारतीय गाव राजनीतिक दलो के आक्षण के केन्द्र हैं । ग्रामीण क्षेत्र राजनीतिक दलो के सघष क्षेत्र बन गये हैं । इमें लो के कारण आज गांवो की राजनीति अधिक विषाक्त हो चुकी है। पचायती राज्य का उद्देश्य ग्रामीण जीवन मे प्रजातात्रिक मूल्यो की स्थापना करना था कि तु महानगरो को राजनीति से जुडकर अनेक विघटनकारी तत्व इस पचायली राज्य मे समाविष्ट हो चुके हैं। साठातर हि दी के राजनीतिक उपयासो मे ग्रामीण और शहरी राजनीति का चित्रण कुछ इस तरह मिलता है । 'राग दरबारी आजादी के बाद के भारत मे महानगरीय नेताशाही और नौकरशाही के भष्ट मूल्यो की टकराहट से उभरते ग्रामीण परिवेश का यथाय १ एक ओर मुख्यमत्री, पृ० ३०२ २ काली आंधी, पृ० १३ कया चित्र है । 'राग दरबारी' मे शिवपालगज की ग्रामीण राजनीति में वैद्य का आधिपत्य है । वंद्यजी स्वाथपरता, अवसरवादिता, गुण्डागर्दी, गुटबाजी, मारपीट व भाई भतीजावाद आदि गुणों से परिपूर्ण हैं। वैद्यजी-'छगामल कालेज के मैनेजर ही नही सर्वेसर्वा हैं । कालेज मे किसी अध्यापक के आने जाने की शक्ति पूणत वेद्य जी के हाथ में निहित है । कालेज मे अध्यापक को बिना किसी इण्टरव्यू के नौकरी में रख लिया जाता है। उम्मीदवार में केवल एक ही योग्यता होनी चाहिए कि यो वैद्य की चापलूसी करना जानता हो। इसी का परिणाम है कि कक्षा में विनान पढाने के स्थान पर घर गहस्थी की चर्चा करन वाले तथा आपे- क्षित घनत्व के क्रम मे आटा चक्की का विवरण देने वाले मोती बाब् कालेज के सबसे योग्य अध्यापक हैं।" वैद्यजी ग्राम प्रधान सनीचर को बनाकर सत्ता को पुन हथिया लेते हैं । वैद्य जी का कहना है कि प्रधान बनने से पहले सनीचर सारी जनता को धमका दें कि देखो भाई मैं किसी से कम तिकडमी नहीं हूँ। भला आदमी समझकर मुझे योट देने से इकार मत करना। सारे गांव की सत्ता का विकेन्द्रीकरण वद्यजी ने कर रखा है। थाना और पुलिस भी उनकी नेतागिरी को स्वीकार करते हैं, और सिर तक झुकाते हैं । तभी तो थाने का दरोगा रुप्पन बाबू को कहता है- 'मैं आजादी मिलने से पहिले बस्तावर सिंह का चेला था। अब इस जमाने मे आपके पिताजी का चेला है। पुलिस या दरोगा कोई भी यदि वैद्यजी के गुर्गे पर हाथ छोडता है तो वैद्यजो उसका बोरिया बिस्तर उठवाने में तनिक भी देरी नहीं करते हैं । जोगनाथ के मामले मे दरोगा का तबादला इसी का प्रभाव है।" महानगरीय राजनेताओ की गुटबदी मे वैद्यजी का महत्त्वपूण स्थान है- 'गुटबदी परमात्मानुभूति चरम दशा का नाम है । उसमे प्रत्येक 'तू' में' को और प्रत्येक 'मैं' तू को अपने से ज्यादा अच्छी स्थिति में देखता है । वह उस स्थिति को पकडना चाहता है ।" वद्यजी इस महामत्र का प्रयोग सभी जगह करते हैं ताकि उनकी कुर्सी हमेशा के लिए जमी रहे । आज राजनीति में गावो को राजनीति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। महाभोज' मे बतलाया गया है कि विसू की हत्या से चुनाव के वक्त जो तनाव आ गया था, जिसके कारण चुनाव मे मत विस ओर जायेंगे यह निसी को पता नही था। १ राग दरबारी पृ० २४ २ वही, प० २३० ३ वही पृ० २० ४ वही ५ वही पृ० ८६ प्रर र दल वोट प्राप्त करने के लिए अनेक याजनाओ की घोषणा करने तगे थे। सुयुत यहते हैं—'वस अब खेत मजदूरो और हरिजनो को अपनी तरफ करने का काम जोर शोर से वगे। योजना का पैसा सरकार से लें और वोट हमको दें। पिछले चुनाव मे जैसा हमारे साथ हुआ डीक वैसा ही दा साहब के साथ करवा दो इस बार।" निष्कर्पत रहा जा सकता है कि स्वतनता की प्राप्ति के पश्चात भारतीय राजनीति में ग्रामीण राजनीति शही राजनीति पर किस तरह हावी हुई है उसका चित्रण इन उप यासो में विस्तत फ्लव पर किया गया है। आदोलनकारी प्रवत्तियाँ पुछ ऐगे बसामाजिक तत्व होते हैं जो देश के विकास म बाधा उत्पन परते है । जनता का सघप के लिए उपसार हैं और जनता उनके पते पर हड तालें, यूनियन माम्प्रदायिक रगे कराया करती हैं। ये असामाजिक तत्व अपने स्वार्थी की पूर्ति के लिए इस बेचारी जनता को अपना हथियार बनाते हैं । अकाली नेता साम्प्रदायिकता के नाम पर सिक्स जनता को आदोलन के लिए उक्सा रहे हैं । वगाल मे माक्सवादी मजदूरो को अपन अधिकार प्राप्ति के लिए सधप की प्रेरणा दे रहे है। आज वगाल का व्यापारिक क्षेत्र इस यूनियन- अजी, हडताल तालपदी के दौर से गुजर रहा है। वातावरण पूणतया अशात हो गया है। सघष मजदुर नेताओ के द्वारा किया जाता है परतु उसका दुष्परिणाम आम मजदूरा को भोगना पडता है । यूनियनबाजी और हडताल की वजह से कारखानो पर तालावदी हो गयी है जिसके कारण मजद्दर बेरोजगार और आर्थिव दष्टि से अपारिज हो गया है । साठोत्तर राजनीतिक उप यासा मे इस आदोलन की प्रतियो को उल्लेखित किया गया है। उसका हमे निम्न सवादा से पता लगा सकता है-- 'एक और मुख्यमनी' में साम्प्रदायिकता के नाम पर जो दगे करवाये जाते हैं उनके सम्बध में उल्लेख क्यिा गया है-'पजाबी सूबे को लेकर सिवपा और हिदुओ मे काफी तनाव पैदा हो गया था। यह घटना उमे (अरविंद) को पजाब के एक मत्री ने अत्य त ही गुप्त रूप से वततायी थी-सिवखो और हि दुआ मे विशेषत आयसमाजी और जनमधी विचारधारा के लोगो के बीच का तनाव हिंसा का रूप धारण कर रहा था। जगह जगह प्रदशन हो रहे थे। जमजात ब्राह्मण मास्टर तारासिंह ने जोश मे आवर मिक्खो में प्रातीयता एवं पथक्ता की भावना भर दी थी। इस बात को लेघर पजाव मे गे हाने लगे। १ महाभोज १०६०६१ २ एक और मुख्यमनी, प० २१७ १७१ इसी तरह की भावना से लोंगेवाला, भिण्डरवाला सिक्खो में प्रातीयता का विप भर रके दगे करवा रहे है। मजदूर अपनी मागो को लेकर हडताल कर देते हैं। उनकी मांगें उचित होते हुए भी रतनलाल उह स्त्रीकार नहीं करता है । अरवि द सोचता है यदि इनकी मांगे पूणरूप से स्वीकार कर ली तो ये मिर पर चढ़ आयेंग और आ दो लन, हडताल तेज कर दी जाती है।' 'दसवें दिन अ य ट्रेड यूनियनो एव मजदूर सगठना ने प्रात यापी हडताल रख दी और नगर मे सम्पूण हडताल को घोषणा कर दी गयी।" मजदूर नेता निशात मिया का जेल मे देहात हा जाने से हडताल और तेज हो गयी । मजदूरो और पुलिस के आपसी सघष मे आठ मजदूर मारे जाते हैं । अंत में परिणाम यह निकतला है कि मजदूरो का खून बहाकर पूजीपति लोग उनकी मांगो को स्वीकार कर लेते हैं, वतमान मे पूजीपति वग इसी तरह की नीतियों का आथप लेता है। 'सबहि नचावत राम गोसाई' मे बतलाया गया है कि मोतीलाल की मिल में मजदूर वेतन को लेकर हडताल कर देते हैं । उनकी मांग वेतन वृद्धि को लेकर है । राधेश्याम उनकी मांगे स्वीकार कर लेता है तो मोतीलाल कहता है-'कह तो दिया फ्टट से कि मांगें मान लेते हैं सो आदमियो को हराम की तनख्वाह देनी पडेगी और बीस हजार की चपत ऊपर से पडेगी।" स्पष्ट है कि उद्योगपति मजदूरो के वाजिब हको को स्वीकारते कित्तन दुखी होते हैं। 'महामहिम' मे छानो के भादोलन का चित्र प्रस्तुत किया गया है। छात्र यूनियन फुलपति की नियुक्ति को लेकर विश्वविद्यालय मे हडताल कर देती है। छात्र नारे लगाते हुए विधान सभा भवन के समक्ष पहुंच गए। मार्ग मे उहोंने बेकार पडी ईंट पत्थरा का क्राति के लिए सदुपयोग कर डाला । राह मे पडने वाले बाजार में जो दुकानदार समझदार थे, उहोंने जुलूस के आने की खबर सुनते ही दुकान बद कर दी और शो केशो को ताले लगा दिये। जिहाने दुकान बद नहीं की, उनमे से कई के शो केरा प्राति के चपेट में आ गए। विधान सभा भवन पहुंचकर छात्र 'जिन्दावाद' और 'मुर्दाबाद' के नारे और जोश सरोश के। साथ लगने लगे। 'समय एक शब्द भर नहीं है' मे नक्सलवादिया का आदोलन और छात्रो के आदोलनों का वर्णन किया गया है। इनके साथ मजदूर, अध्यापक और अय १ एक और मुख्यमत्री, प० २४६ २ सबहिं नचायत राम गोसाई, प.० ३४ ३ महामहिम, प० १२८ १७२ शहरवासी भी हैं । जुलूस का नारा था 'हर जोर जुलमी टकसर मे सथप हमारा नारा है, ननीताल काड मे गिरफ्तार साथियों को रिहा करो रिहा करो । तानाशाही नहीं चलेगी नही चलेगी।"पुलिस फायर करके जुलूस को बिखेर देती है । जनता ने जो शातिपूर्ण जुलूस निकला या उसे सरसार वे दरदो पुलिस ने निममता से कुचल दिया। इस तरह स्वतत्रता के पश्चात मजदूरा और छात्रो मे जो आ दोलनकारी प्रवत्ति समाहित हुई उसका साठोत्तर राजनीति उप यासा में विस्तृत पलक पर चित्र खीचा गया है। जातिवाद पर आधारित वतमान राजनीति जि ना ने जातिवाद के नाम पर हि दुग्तार को दा भागो म विभक्त कर दिया । स्वत त्रता के पश्चात भारतीय राजनीति मे जातिवाद पूर्ण रूप से हावी हो गयी थी। जाति के नाम पर प्राता के निर्माण के खानिर उग्र आ दोलन किए जाने लगे। प्रत्येक चुनाव जाति के नाम पर लड़ा जाता है। आज अकाली जाति के नाम उग्र आ दोलन कर रहे हैं। सिख हि दू एक दूसरे के दुश्मन बन गये हैं । अकाली खून को नदिया बहाकर खालिस्तान का निर्माण करना चाहते हैं। मानव का मानव द्वारा आज खन बहाया जा रहा है । जातीयता के नाम पर साम्प्रदायिक दंगे हाते जा रहे हैं। जातीयता पर राजनीतिर दलो का गठन हो रहा है -जैसे शिव सेना मुस्लिम लीग हिदू सभा, रामराज्य परिपद अकाली दल जनसघ इत्यादि । पूर्वी भारत मे हि दुओ मवर्णों द्वारा हरिजनो पर अत्या- चार जातीयता के आधार पर किये जाते है । उसको जि दा जला दिया जाता है। वतमान सरकार जातीय दग, जातीय चुनावा पर जकुश लगाने में असमथ रही है। साठोत्तर हिदी उप यास में जातीयता के नाम पर आधारित वतमान राजनीति को इस तरह दव सक्त हैं। मुख्यम री' मे अरविद नोटो के बदले वोटो को खरीदने में पीछे नहीं रहा । चौधरी दीनाराम को उसने ऐसे चुनाव क्षेत्र से खडा क्यिा जहा चौध रियो का बहुमत था। पर जब प्रतिद्वद्वी चौधरी उम्मीदवार ने ता यह नारा लगाया कि-'जाट की बेटी जाट को ता जाट का वार जाट को तो अरविन्द ने उम आदमी की खाट खडी कर दी। उसने जातीयता के विप को लेकर चौधरी लागो की विभिन जातियो म फूट डलवा दी और दीनारामजी पा पक्ष मजबूत होने लगा । स्पष्ट रूप से चौधरी लागो में दो ग्रुप हो गय । राजपूत लोग भी om समय एक श द भर नहीं है, पृ० ५२ १७३ दो भागो मे विभक्त हो गए थे। सिद्धेश्वरीप्रसाद सिंह के कारण कुछ राजपूत काग्रेस के बडे भक्त थे।" ऐसी स्थिति प्रत्यक चुनाव मे देखी जा सकती है। 'राग दरवारी' मे चुनाव की तीन प्रणालियो का उरलेख किया गया है। एक रामनगर वाली, दूसरी नेवादावाली और महिपालपुर वाली। नेवादावाला तरीक्षा कुछ ज्यादा आदशवादी था । वहाँ कई जातियो वे लोग चुनाव लड़ने के लिए पडे थे, पर उनमें मुख्य उम्मीदवार हरिजन और ब्राह्मणो मे था । ब्राह्मण उम्मीदवार न रावर्गों के बीच ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का कई बार पाठ किया और समझाया कि ब्राह्मण पुरुप ही ब्रह्मा का मुह है। उसने यह भी बताया कि शूद्र पुरुप ब्रह्मा का पर है। प्रधान के पद के बारे में उसने कई उदाहरण देकर बताया कि उसका सम्बध मेघा और वाणी से है जो पैर मे नही होती, मिर मे होती है, जिसमे मुह भी होता है । अत ब्राह्मण को स्वाभाविक रूप से प्रधान बनना चाहिए, न कि शूद्र को। उसने रियायत के तौर पर यह भी मान लिया वि काई दौड धूप का ऐसा काम, जिसम पैरा की आवश्यकता हो-जैसे याय पचायत के चपरासी का काम निश्चित रूप से शूद्र को ही मिलना चाहिए, पर प्रधान के पद के लिए शूद्र का घडा होना वेद विपरीत बात होगी। आज सिफ शहरी चुनावी मे जातिवाद हावी नही है वरन् ग्रामीण राजनीति में भी पूर्ण रूप से हावी है। 'महाभोज में चुनाव के वक्त विसू नामक हरिजन की हत्या कर दी जाती है। दा साहब जोरावर को हत्या का दोषी ठहराते हैं । इसके फलस्वरूप उनकी पार्टी को हरिजना के वोटो से वचित रहना पडेगा । इसके सम्बध मे वे कहते हैं --'और आप हैं कि इसी मूख का पल्ला पकडे हुए हैं। मारा ह गरीबा को तो भुगतने दीजिए सजा। नहीं चाहिए हमे जोरावर के वोट । अब इसके वोटो के चकार मे हरिजनो के सारे वोट तो गये ही गांव के दूसरे लोगो के वोट भी नहीं मिलेंगे। सारा हिसाब लगाकर देख लिया है मैंने, ले डूबेगा जोरावर का साथ । माथे पर कल और आत्मा पर बोय, सो अलग।" 'महामहिम' में तोताराम जब अपने मायमण्डल का विस्तार करता है तो इसमे पहले के द्रीय मत्री चद्रिया बाबू से परामश लेता है तो वे तोताराम को कहते हैं-'प्यारेलाल और उनके साथियो को मनिमण्डल में शामिल नही १ एक और मुख्यमत्री, प० २७६ २ राग दरबारी, पृ० २३८ ३ राग दरवारी, पृ० २३८ ४ महाभोज, १० १७१८ । - किया जायेगा । घबराओ मत, वे लोग तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड पाएँगे। अभी अभी दल-बदलकर आये हैं अब फिर इतनी जल्दी दल परिवतन क्रन को हिमा कत नही करेंगे रो। और फिर दयो, तोता बाबू, हम जातिवादी नहीं है। हमारी एक लडरी न बनिया के यहां शादी की है। लेकिन ये साले बनिये, बामन और हरिजन हात बढे सतनाक हैं, इनसे जरा बचकर रहना एक नौरगीलाल का तुमने मनी बनाया, पर वही देखो, बाढ सहायता समितिया मे तुम्हे दगा द गया।" 'हजार घोडो का सवार मे म्वत नता के पश्चात गीधू को टिकट देने का प्रस्ताव रखा जाता है । दो सुरक्षित सीटा पर दो नाम थे गीधू और चतुरभुज । सभी लोग गीधू वा जातीयता के नाम पर चुनाव लडने को कहते हैं। जाती यता के नाम पर चुनाव का गोधू विराधी है। इसीलिए उसने अपने नाम के पीछे 'भारतीय लगा दिया । जातीयता के नाम पर चुनाव लडने के सम्बध में सेठ गणेश करता है- उसके लिए तुम्हे भारतीय वारतीय के चक्कर को छोडकर चमार का प्रमाण पत्र लाना पडेगा। तुम्ह तो राजनीतिक क्षेत्र में चमार की जगह मारतीय' समझने लगे है। यह भारतीय वाई जाति नही है। इमलिए तुम्ह प्रामाणि रूप से वताा पडगा वि तुम चमार हा । तुम नि मदेह ससद सदस्य बन जाओग। तुम्हारा जीवा बदल जायगा। ठाठ बाट हा जायेंगे। इस पर उत्तजित होकर गीधू कहता है-'पर मैं यह भी जानता हूँ कि एक दिन आप सब इस देश में एक एक वग को इतना वाट देंग उसे इतना काट डालेगे कि यहाँ फेवल छोटी छोटी जातिया ही रह जायेंगी। उन जातियो वा वैमनस्य, घणा, छाटापन, ओछापन और सकोणता इस देश का नरव' बना डालेगी। इस देश मे न काई भारतीय रहेगा और न कोई आदमी । यहा रहगे धम, जातिया सम्प्रदाय । और एक का आदमी दूसरी जाति के आदमी से घृणा करेगा। सन ४७ का पाकिस्तान ता एक बना है । मुझे लग रहा है जिस तरह यहा दश सेवा और नेता पैदा हो रहे हैं, व हजारो 'जातिस्तान' पैदा कर देंगे। 'प्रजाराम' में क्या प्रतीक प्रजाराम जनता के सामने वतमान जातीयता की राजनीति के विरोध में कहता है तुमने हरिजना, दलित, अल्पसंख्यको और जातिवादी के नाम पर लम्बा राज्य कर लिया है। बाटो की हिन्न और निक्षयी राजनीति के तहत तुमने देश की विराटता को लधु कर दिया और नादमी को १ महामहिम, पृ० ६१६२ २ हजार पाडो वा सवार, पृ० ३६३ ३ वही, पृ० ३६३ ३६४ १७५ बाट डाला। आदमी बटकर अपनी वास्तविक शक्ति और ऊर्जा को भूल गया उपर्युक्त उदाहरणो से हम इस निमप पर पहुंचते हैं कि स्वतत्रता के पश्चात राजनीति मे जातिवाद किस तरह उसका प्रमुख अंग बन गया है। लोकतात्रिक व्यवस्था का सही लाभ आम जन को नहीं मिल पाता। उसे जातीयता को कुत्सित राजनीति का शिकार बनाकर राजनेता स्वार्य सिद्धि में लगे हुए है । इस जाती यता से उवरना बहुत आवश्यक है। इस तरह साठोत्तर राजनीतिक उप यासो म जिन परिवेशो का चित्रण हुआ उसका सक्षेप मे परिचय था। आज इस परिवेश ने राजनीतिक व्यवस्था को एकदम खोखला कर दिया है । आज की राज नीति आश्वासनो की मान राजनीति रह गयी है । हमे इन परिवेशो का समाप्त कर स्वच्छ राजनीति की स्थापना करनी होगी। १ मजाराम, पृ० १५६ ६ उपसहार अध्ययन के लिए रुप, अनन्धिया और सभावनाएँ बतमान शागन याम्या और परिश को लेबर हिदी उपयासा की सजना होती रही है। राजनीतिक उप यासाचे व वर म राजनीतिक सामाजिक जीवन, राष्ट्रा और विश्व के मतिजाका विशिष्ट दृस्मियोग देखने का प्रयाम दिया गया है । हिनी राजनीति। उपचासा या उद्देश्य मुख्यत परिश मे बदलते मानर सूरयो की प्रतिष्टा करना है और आम जनता म राष्ट्रीय एव अतरराष्ट्रीय भूमिरा पर विश्व अधुत्व, एकता और मानवत्ता पा जयपाल करता है । यस्तुत राजनीतिक उप यासा म सामाजिक परिवश ही उवर होता है, जो उमे पुष्ट बनायर य रचना को पुष्ट करता है। स्वतंत्रता से पूर्व जो राजनीतिक उपयास लिग गय उनम भारतीय राष्ट्रीय आ दोरन का विस्तार स वणन किया गया है। स्वतत्रता के पश्चात भी मनम' उपन्यास इस विषय पर रचे गय हैं। हिंदी ने राजनीतिक उप यासा मे सभी तरह की समस्या और परिवेश को विस्तृत रूप म चित्रित किया गया है। इन उप यासों में सामाजिक समस्यामा की आर भी ध्यान आकर्षित कराया गया है । एमी समस्यामा मे नारी समस्मा, सक्स की समस्या, जातीय असमानता, भ्रष्टाचारी शासन व्यवस्था का विरोध, आर्थिक असमानता नादि मुख्य हैं, जिहे राजनीरिय परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत दिया गया है । नब राष्ट्र के निर्माण के माय अनेक सामाजिक, नति, आपिक समस्याएँ उठ खडी हुई थी, लेकिन ये समस्याएँ वैसी को वसी आज भी हमार सामने खड़ी हैं । हिनी के साठोलर राजनीतिक उपन्यासों में इसी कटु सत्य को लेकर राजनीतिर और सामाजिद समस्याओ के परिवेश में मानव जीरन की घाणा की गयी है । साठोत्तर हिरी उर यातो मे जीवन की व्याख्या मुख्यत माक्मादी, लोक्तात्रिक समाजवादी व्यवस्था, साधीवाली और राष्ट्रवादी सिद्धातो के रि दुवो पर आधारित है । इस लघुशोध प्रबध मे मुख्यत आपातकाल भौर उमके श* की पृष्ठभूमि पर सजित उप यासों की समीक्षा की गई है। ऐसा १७७ स्वाभाविक भी है क्यापि आपातकाल की सभावना को बुद्धिजीवी वर्ग ने गभी रता से महसूस किया था। इस काल मे गोक्तन का अस्तित्व ही सदेहास्पद बन गया था और चारो ओर सशय के बादल मडरान लगे थे उसी स्थिति को माठो तर उप यासा मे वाणी दी गयी। जिसमे क्टराची आजू प्रजाराम, शाति भग, महामहिम, दारल शफा, महामाज प्रमुख हैं । 'एक और मुख्यमत्री' म एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा के माध्यम से भारत की बीस साल की राजनीतिक व्यवस्था का चित्रण किया गया है । 'सहिं नचावत राम गासाई मे स्वतयता के पश्चात पूजीपति वग और राजनीतिक वग के उत्थान का वणन है । स्वतत्रता के पश्चात राजनीति में नारी की भूमिका एक महत्ता का विवेनन 'काती धी' म दिया गया है । 'राग दरवारी' मे शहरी और ग्रामीण राजनीति के घिनौने व घणित चेहरो को उदघाटित करन का प्रयास हुगा है । आपात्काल भार उसवे अत की पष्ठभूमि वा यथाथ चित्रण 'कटरा बी आजू' में हुआ है। महाभाज' म चुगावा की राजनीति मे याप्त पडयनो को उजागर किया गया है। 'जगलतनम म प्रतीको के माध्यम से राज नीति के पच्चीस सात को हानी पचीस राता के माध्यम स कही गई है। महामहिम' में जनता पार्टी वे शासन वो व्यग्यात्मक शैली म चिनित किया गया है । 'हजार घाडो का सवार' शापित एवं दलित वग की उपेक्षा, उनकी व्यथा एव सामाजिक स्थितिया का सच्चा दस्तावेज है । वतमान सत्तालोलुप राजनीति एव उनके अवमूल्यन का बच्चा चिटठा योलने वाला यथाथपरक उप यास 'दारुल शफा है। समय एक शब्द भर नही है म युवा पीढी के जन मा दोलन तथा युवा पीढी नक्सती जा दोलन और सत्ता का जधापन दर्शाया गया है । 'शाति भग' म बापगत्काल वे तीन साल ये घूर इतिहास का विवेचन है । आपात्वाल और उसके पश्चात जनता पार्टी के शागार महीनो की पृष्ठ- भूमि पर जाधारित 'प्रजाराम में नहा आपातकाल के अत्याचार, भयावहता, जाता और मनास का वणन है, वही दूमरी आर समृद्धि, शाति और विकास का वित्रण भी है। मुराज म लोकतात्रिक समाजवादी व्यवस्था के कडवे यथाथ को प्रस्तुत किया गया है। समीय उप यासा व सवाद नाटकीय, प्रसमानुपूल, साद्देश्य एव अथवत्ता पूर्ण हैं । इन सभी अ यासाने पाना के अतद द्वा का उजागर करने म सामायत लेखा सफल रहे हैं। इन उप यासो की भापात्मन सरचना और शली विधान वे आयाम भी वविन्यपूर्ण है। तमाम लेखकों ने आचलिक शदा के अलावा मप्रजी, उदू पारसी एव परिनिष्ठ हिंदी का प्रयोग किया है । रचना उद्देश्य की दृष्टि से तमाम नखका को प्रभूव सफलता मिली है । इन उप यासा मे बताया गया है कि जाज की राजनीति किस तरह व्यवसाय बन चुकी है। आज की राजनीति का घृणित, क्रूर चेहरा इनमे देखने को मिलता है । आज के नेता व्यक्ति- १७६ गत स्थापों को प्राप्ति के लिए दल रल हो रहे हैं भाई भतीजावाद की नीति पा रहे हैं और जनता योगिमित कर रहे हैं। एमी राजनीति की सधिमाश लप्पा । पट भत्रागा की है। प्रस्तुत लघु शोध प्राधम अधिगीत जोपयागिय वृतिया र अध्ययन की उपलब्धियों को प्टि स यह शिवदन परना प्रासगिय होगा निहिती ये साठोत्तर राजनीतिय उपपासो म विभिन्न राजनीतिर विपया को उठाकर वतमान राज- नीति पी विडम्बनाना यो प्रस्तुत किया गया है। ममीक्षप उप यासा मे राजनीति जाल म यक्ति गिरा तरह पैरा गया है, उसका यथाथ चित्र पीपा गया है। आज रिश्वत मुपायोरी जमायोरी भाई भतीजावार साम्प्रदायिक दगे, भ्रष्ट रास्यावार सायपरता, दल बल्लू सस्याएं परिवार नियाजाघे नाम पर ज्याद- तियां, आश्वासना राजनीति, छुटभये और गुटभय नता की कहानी वगार प्रया गूटपोरी और पोपले आदर्शों से मुक्ति आदि समस्याए समीक्ष्य उप यासा की रचनात्मक उपलब्धि है। प्रस्तुत लघु शोध प्रवध यी उपलब्धिया एव निपपों पर विचार करने के पश्चात ति मयाब कहा जा सकता है कि इा उप यासा के माध्यम से वतमान राजनीति का यथाथ रप हमारे सम्मुख चियित हुना है। समा7 म परिवतन साने लिए जन चेतना आवश्यक है । यह परिवतन यथाथपरक राजनीतिक उप यासा ये सजन स भी सभव हो सकेगी, ऐसा मरा विश्वास है। वतमान राजनीति भ्रष्टाचार से चरम विदु को छूने के लिए वृत सवल्प है और आम इसान ग्राहि नाहि पर रहा है । आम जनता को भ्रष्ट राजनीति से उवार पर नूतन एव स्वस्थ परिवेश प्रदान करने के लिए इसी तरह सतत सशक्त औप या सिर कृतिया के सजन की महती जावश्यकता है। यह सताप का विषय है कि हिटी के कथाकार इस आर सचेष्ट हैं और इस विषय पर निर तर स्वागत- योग्य कथाकृतियो का सजन कर रहे हैं। - ग्रथानुक्रमणिका आधार नथ श्रीलाल शुक्ल मनू मण्डारी हिदी उप यास १ एव और मुरपमग्री (१९६६) यादरद्रशमा चद्र २ सयहिं न वावत राम गोसाई (१९७०) भगवतीचरपा यमा ३ पाली जाधी (१९७४) यमलेसर ४ राग दरबारी (१९७५) । कटरा ची भा। (१९७८) डा० राही मासूम रजा ६ महामाज (१९७६) ७ जगलागग (१९७६) थरण पुगार गाम्यामी ८ महामहिम (१९८०) प्रदीप पत ६ हजार धारा या रायार (१९५१) यादाद्रपमा भद्र १० दारल शफा (१८८१) राजप्ण मिश्र ११ समय र श भर नहीं है (१९८१) धोरं द्र जस्था १२ ज्ञाति भग (१९८२) मुद्रा राम १३ प्रजाराम (१९८३) यादवद्र शर्मा भद्र १४ सुराज (१९८३) हिमांशु जोशी सहायक प्रय डा. विजयमोहनसिंह १ माधुरि उपयास म प्रेमरो परि मल्पना १५० श्रीधर शर्मा एव सरोज गर्ग सो० ई० एम० जोड डा० बेचन डा० सुधाकर शकर क्लवडे मै पाश्चात्य डा० रामविशा सनी डा० हरिकृष्ण पुराहित २ आधुनिक भारतीय सामाजिक और राजनतिक चितन ३ आधुनिक राजनीति सिद्धात ४ भाधुनिक हिदी उप यास उदभव और विकास ५ आधुनिक हिनी कविता मे राष्ट्रीय भावना ६ आधुनिक हि दो महाकाव्य चितन ७ आधुनिक हिदी साहित्य की विचार धारा पर पाश्चात्य प्रभाव उायास और लोग जीवन ६ उप यासकार प्रेमच द १० उप यास स्थिति और गति ११ अापयासिक समीक्षा और समीक्षाएँ १२ चम्युनिज्म क्या है ? १३ वात्पति तथा धनानित १४ या पशास्त्र की रूपरखा १५ किशोरीलाल गोस्वामी ने उपयासो का वस्तुगत एक रपगत विवचन १६ कुछ पिचार १७ गाधी जोर गावीवाद १८ गाधीवाद की परखा १६ गावी विचारधारा का हि दी साहित्य पर प्रभाव २० चिदम्बरा २१ प्रगतिवाद एक समीक्षा २२ प्रेमपद और उनका यु। २३ प्रेमच द और गाधीवाद २४ प्रेमचद एक अध्ययन २५ प्रेमच द पूर्व हिदी उप यास २६ पाश्चात्य काव्यशास्त्र माक्सवादी परम्परा २७ बाल मनोविज्ञान पर आधारित हिदी उप यास राल्फफाक्म डा० सुरेश गुप्त डा० च द्रकात वादिवडेकर टा० आदित्य कुमार त्रिपाठी जाई० डब्ल्यू० राब्मन डगेल्स डा० रामरत्त भारद्वाज डा०वृणाग प्रेमदद डा० पट्टाभि सीतारमैया रामनाथ सुमन डा० अरविद जोशी सुमित्रान दन पत डा० धमवीर भारती डा० रामविलास शर्मा रामदीन गुप्त राजेश्वर गुरु डा० क्लाश प्रकाश (स०) डा० नगेन्द्र बुलाकी शर्मा १५० पी० के० चड्डा पी० ० चड्डा २८ भारतीय राष्ट्रवाद के विकास की डा० सुपमानारायण हिदी साहित्य मे अभिव्यक्ति २६ महात्मा गाधी राधा कृष्णन ३० महात्मा गाधी रामनाथ सुमन ३१ माक्सवाद का विकृत रूप तथा लेनिन साम्राज्यवादी अथवाद ३२ माक्सवादी दशन वि० अफनास्येव ३३ राजदशन का स्वाध्ययन सी० एल० वेबर ३४ राजनीति और दशन डा० विश्वनाथ प्रसाद वर्मा ३५ राजनीतिक विचारक ३६ राजनीतिक विचारधाराएँ ३७ राष्ट्रपिता प० जवाहरलाल नहरू ३८ लेनिनवाद का मूल सिद्धात स्टालिन ३६ विदेशी माक्सवादी समीक्षा डा० रवीद्रनाथ श्रीवास्तव ४० वैज्ञानिक भौतिकवाद राहुल सात्यायन ४१ श्रीनिवास प्रथावली डा० श्रीकृष्णलाल ४२ समाजवाद डा० धमनारायण मिश्र ४३ समाजवादी विचारधारा और सस्कृति लेनिन ४४ साहित्य, सिद्धात और समालोचना डा० देवीप्रसाद गुप्त ४५ साहित्यालोचक बाध्यामसुदरदास ४६ सोवियत सत्ता क्या है ? लेनिा ४७ स्वातन्य हिदी उप यास मे मूल्य डा० हेमेद्र पानेरी सत्रमण ४८ स्वातन्योत्तर हिदी महामाय्य मे डा० सुपमा कश्यप राजनीतिक चेतना ४६ हिदी उप यास (स०) मुपमा प्रियदशिनी ५० हिदी उपयास डा० हजारीप्रमाद द्विवेदी ५१ हिदी उप यास और ग्राम पेतना हा०शानचद ५२ हिंदी उपयारा और यथाथवाद डा० निमुवनगिह ५३ हि दो उप याम एष सर्वेक्षण डा० महेद्र पतुदी ५४ हिंदी उपन्यास एव सर्वेक्षण डा० रामदरश मिश्र ५५ हिती उपायाम का उद्भव और विकास डा० प्रताप नारायण ५६ हिंदी साहित्य का इतिहास रामचन्द्र शुक्ल ५७ हिटी उपयाराने अस्सी दप शिवदान सिंह १८२ डा० प्रतापनारायण टडन ५८ हिदी उप यास मे क्था शिल्प का विकास ५६ हिदी उपयाग में मध्यम वग ६० हि दो उपयास रचना विधान और डा० मजुनता मिह श्रीमती बसती पत युग बोध विद्या! 1 गुप्त ६१ हिदी उपयाग शिल्प और प्रत्तिया डा० सुरेश सिहा ६२ हिदी कविता मे युगा तर डा० सुधी द्र ६३ हिदी पविता मे राष्ट्रीय भावना ६४ हि दी का य मे माक्मवादी चेतना टा० जनेश्वर वर्मा ६५ हिदी को प्रगतिशील कविता टा० रणजीत ६६ हिदी के आधुनिक पौराणिक महाकाव्य डा० दवीप्रसाद गुप्त ६७ हिटी के स्वच्छदतावादी उप यास कमल कुमार जौहरी ६८ हिंदी के सामती चेतनापरक उपचास डा० देवदत्त शर्मा ६६ हिदी गद्य साहित्य पर समाजवाद का टा० शकरलाल जायसवाल प्रभाव ७० हि दी माहित्य का वैज्ञानिक इतिहास डा० गणपति चन्द्र गुप्त ७१ हि दो साहित्य मे जनवादी परम्परा प्रकाशच द गुप्त सस्कृत ग्रन्थ ७२ अथर्व वेद काण्ड ७३ विष्णु पुराण अग्रेजी प्रथ V A Smith WHHudson 74 Ancient and Hindu India (Part I) 75 An Introduction to the Study of Literature 76 Aspect of the Novcl 77 Cavelcad of English Novel 78 Culture in Changing world 79 Literature and Lift 80 marxism and poetry 81 Modren Indian Social and political Thought EM Fisterur Adward Benebabitt V I Scromc Marxim Gorhey Glorge Thonson MK Gundhi Dr ZA Ahmed 82 philosophy of Socialism Introduction 83 Socialism D mos icy and India 84 Society 85 Studies Is Afodren History 86 Th. Art of Fiction 87 The English Novel 88 The Growth of English Novel 89 The Gupta Empire 90 The Novel and The Pupil 91 The Study of Prose Fiction 92 The Theory and Practices of Socialism 93 Young India Part III RC Gupta RM Mac?vier GP Gooch Hencry James Waltar Allen Richard Church Joh RK Muherjee Ralf Tor W H Hudson John Strachy MK Gandhi फोश एव विश्वकोश १ आदर्श शब्द कोश २ भागव आश शब्दकोश ३ माना अंग्रेजी हिदी पोश ४ राजनीतिक पोश ५ हिदी शद पोश Ę A Dictionary of philosophy u Dictionary of Novel 5 Webster s New Joternational Dictionary of the English Language, Vol 2 पन पनिकाएं १ आजकल २ आलोचना ३ नया शिक्षक ४ नवभारत टाइम्स (हि दी दनिक) ५ नागरी प्रचारिणी पत्रिका ६ ब्लिटज (साप्ताहिक) ७ मधुमती

१८४
यादा
-िदिग
१० गमान पत्या
१० गागि
माग
१४ -रा
१५ Hariyin inch 1936

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Sathotari Hindi Upanyaso Main Rajnitik Chaitna

Author
Krishana Kumar Bisaa
Title
Sathotari Hindi Upanyaso Main Rajnitik Chaitna
File name
Sathotari Hindi Upanyaso Main Rajnitik Chaitna
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2011/03
Publisher
Din Maan Prakashan Delhi
Language
Sanskrit
Pages
191
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551574
Barcode
4990010032301.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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