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Maire Anth Samya Ke Vichar
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सरस्वती-सिरीज़ नं०२९
मेरेअन्तसमय के विचार
श्री भाई परमानंदजी
एम० ए०, एम० एल० ए०
.
ত্নী
इंडियन प्रेस लिमिटेड
प्राक्कथन ऐडमन जेल में सा १९१५ से २० तफ रहते हुए ये नोट याद- दाश्त के तौर पर रक्ले गये। यह विशार कम बार-बार मेरे मन में गुजरता था। दो मास ये अनशन ये वारण मेरा सयाल था कि कालेपानी में ही मेरा शरीर-त्याग होगा। इसलिए उसके बाद यदि ये नोट किसी योग्य मनुष्य के हाय पड जायेंगे तो वह इहे छपवापर प्रकाशित कर देगा। सभय ने रग बदला और स्वयं मुझे ही वाको प्रकट करने का अवसर मिल गया। मो इनके अदर कोई परिवर्तन करना उचित नही समझा और ज्याने त्यों पाठकों में सामने रख दिये है। एष प्रकार से य विचार मेरे अत समय के है। तब मै समझ बैठा था कि अब मेग दुनिया में कभी कोई मबंध न होगा। होर। भाई परमानंद } विषय-सूची पृष्ठ १०२ ११७ १२४ विषय पृष्ठ विपय १ भगवद्गीता और ९ देसुर संग्राम उमका रचयिता १. राजयोग २ श्रीकृष्ण ९ ११ शानभाग ३ ज्ञान की सापक्षता १२ भक्ति-भाग ४ अतिम तत्त्व ३७ १३ पम-मार्ग ५ सृष्टि-उत्पत्ति-देवी १४ मत-मता तर विकास ८७ १५ मिद्वात ६ भौतिक सष्टि १६ आत्म स्वतत्रता ७ मानसिक विकास ७९ १७ घम और अधर्म ८ सामाजिक विकास १८ पर्नव्य अथवार तया ग्रय-सूची १३८ १४६ १५३ १५९ १ Printed ad published by & Wlitrs, Al The Indian fren Jtd, Allabebed,
पहला परिच्छेद
भगवद्गीता और उसका रचयिता
भगवद्गीता की ओर मेरा ध्यान
अना विद्यार्थी
जीवन समाप्त करने के बाद मुझे य- सयाल दृन्ना कि
यह कौन सी पुस्ता है जिसे मैं अपने स्वाध्याय के लिए हर समय अपने
साथ रस सस्ता हूँ। कालाइल पी लिपी वितार "सारटर रिसार्टस"
ने मरे दिल पर इतना गहरा असर डाला कि मैंने उसे अपना साथी
बना लिया। कुछ समय गुज़र गया । श्रर मुझे यह बात पढ़ने का
माझा मिला कि एक बार अमेरिका का एकमात्र प्रसिद्ध दार्शनिस एमर्सन
कालाइल से मिलने गया। निदा के समय कालाइल ने एममन को
भगद्गीता की एक प्रति उपहार स्वरूप भट की।
इस घटना ने मेरे
नन्दर परियतन उत्पन्न मिया। मैंने "सारटर रिसार्टस" को अलग रस
दिया और उसकी जगह भगवद्गीता को अपने साथ कर लिया ।
भगवद्गीता की सर्वप्रियता
हिन्दू-जाति का बच्चा-बचा मगद्गीता के नाम से परिचित है।
भारत में इस पुस्तक के जितने सस्करण छपे हैं, उतने शायद किसी और
। के न छपे हागे। यहाँ जितना अ ययन इसका किया जाता है उतना
क्सिी पोर का शायद ही क्यिा जाता हो। प्राय-जाति के पुराने विद्वानो
-
मेर यत समर के विचार मे कोई विरला ही ऐसा होगा, जिसने भगवद्गीता पर अपनी टीका न लिसी हो। देश की विभिन्न भाषाओं में भगवद्गीता पर कई टीकाएँ लिखी गई हैं। विदेशी भाषाओं में शायद ही कोई ऐसी हो जिसमें भगवद्गीता का अनुवाद विद्यमान न हो। मुसलमानों में भगवद्गीता का सम्मान मुसलमानों में सबसे पहला श्रादमी बुरवारा का राजकुमार अलबरूनी था, जिसका ध्यान भगवद्गीता की तरफ हुथा। उसे महमूद गजननी ने कैद कर रक्सा था। हिरासत में रमने के लिए वह उसे हिन्दुस्तान पर आक्रमणों के समय मी अपने साथ लिये रहता। अलबरूनी ने युद्ध-काल में बड़ी कठिनाइयो के बाद सस्कृत का अध्ययन किया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "भारत" में, जो तात्कालिक हिन्दुस्तान का एक निन है, उसने भगवद्गीता के कई श्लोक उद्धृत किये हैं। उसने पाच्यात्मिक दृष्टि से इसे बड़ी उच्च कोटि की और पवित्र पुस्तक बताया है। दाराशिकोह और भगवद्गीता मुगल-काल में प्रकार के आदेश से फैजी ने इसका अनुवाद फारसी भाषा में क्यिा । दाराशिकोह ने इसका नाम "सरे अक्वर" रक्वा और भूमिका में भगवद्गीता और महर्षि व्यास के सम्बन्ध में ये विनार प्रकट किये- "सचाई का मार्ग बतानेवाली, हक को पहचाननेवाली, मारफत से भग हुई, गहरे भेदो को सोलनेवाली, एक्ता दिनानेवाली, अानन्ददायिनी यह कृति विलक्षण मनुष्यों में सर्वश्रेष्ट जानी स्वामी व्यासजी की है। व्यासजी क' गुग्णानुवाद करना वागी और लेसनी की शचि से हर है।
भगवद्गीता और उसस रचयिता ३ ससार का प्रथम प्रसिद्ध दारानि अफलात्, जो श्ररर तथा यूनान के दाश निर्ग का शिरोमणि है, विभिन्न विद्याश्रा का ममश हो पर भी ज्ञान की दृष्टि से तमीम हिन्दी के तुच्छ शिष्या में से एक था। तमीम हिन्दी इतना बड़ा दारानिक था कि अफलात ने अपनी पुस्तर में उसके परिपूणवा से भरे गुणों का वर्णन अपनी अलम से रिया है। यह तमीम हिन्दी स्वामी व्यास के अनुगामी-यग में से एक था। स्वामी व्यास के पड़प्पन पा अनुमान इस एक बात से ही लगाया जा सस्ता है।" पश्चिम पर भगवद्गीता का प्रभाव भगवद्गीता और उपरिषदी के फारसी अनुवाद जर योरप में पहुँचे, तर योरप के दार्शनिस इन पढयर श्राश्चर्यचक्ति हो गये। प्रसिद्ध दर्शनवेत्ता श्लेगल भगवद्गीता को पढ़कर यजद में आ गया और टमकी प्रशसा करने लगा। शापनहारर और मत्सीनी या मेजिनी के विचारा पर भगवद्गीता का गहरा असर हुश्रा । एमर्सन का गुरु थोरो मगरद्गीता का भक्त रन गया। उसो एक स्थान पर कहा है-"मैं प्रतिदिन भगवद्गीता के पवित्र जल में स्नान करता हूँ। पर्वमान काल की कृतियों से यह कहीं बढ-चढ़पर है। जिस काल में यह लिपी गई वह सचमुच नियला ही समय रहा होगा।" भगवद्गीता का विषय यदि भगवद्गीता के विषय का अध्ययन और उसका मुकाबला हिन्दू शास्त्रों से किया जाय तो स्पष्ट दीस पडता है कि उसके रचयिता ने इसे लिसने में लगभग सभी श्रार्यशास्त्रों से सहायता ली है। वेदान्त, । सारन्य, योग श्रादि सभी दर्शनों और वेदो की झलक इसके श्लोको में ४ मेरे अन्त समय के विचार माफ पाई जाती है। उपनिषदा के तो कई शन्द एर पास्य इसमें दोहराम गये है। इसके रचयिता ने हिन्दूसाहित्य वथा दर्शन के सार को सर्वेष में एक जगह एकर कर दिया है। इसी लिए पुराण में यह कहा गया है--"समी उपनिषद गौएँ है, न पडा है, श्रीकृष्ण दूध दुहनेवाले है ग्रोर भगवद्गीता अमृतरूपी दूध है।" यादे कोई श्रादमी हिन्दू सस्कृति के समुद्र-धर्म, साहित्य श्रीर दर्शन का एक पूजे के अन्दर बन्द देग्नना चाहे तो वह भगवद्गीता पढ ले। यदि शेष सभी शान - नष्ट हो गये होते और केवल भगवद्गीता ही रह जाती तो भी हिन्दू-जाति के बड़प्पन की स्मृति दुनिया म कायम रहती। हिन्दू सभ्यता इस समय इसमें यहाँ तक मुरक्षित है कि भगवद्गीता रा प्रचार या विनाश दिन्दू धम का प्रसार या विनाग है। सच ही कहा गया है कि वैदिक धर्म के कल्लवृक्ष का पका हुया अमृतरूपी फ्ल भगवद्गीता है। भगवद्गीता और स्वामी दयानन्द आधुनिक भारत के एक बड़े विद्वान् स्मामी दयानन्द ने भगवद्गीता को यह पद नहीं दिया। विचार करने पर मालूम हाता है कि उनके ऐसा न करने के पास कारण हैं। उनके जीवन में एक ही मार काम करता है-पैदिक धम की रक्षा ! स्वामी दयानन्द को वेदो से इतना प्रेम था कि जब कोई चीज़ उन्हें इसके रास्ते में राधस मालूम देती, तो वे उसे कर देते । दूसरे हर युग में हिन्दू ग्राचार्यों ने भगवद्गीता का श्राश्रय अपने अपने विचारा का प्रचार करने का प्रयत्न किया है। इन्हीं fran के झगड़े के समय नपीन वेदान्त की नीव पड़ी। रूप से भगवद्गीता भी ननीन वेदान्त को सहायता देती मालूम होती मस्ट ३ भगवद्गीता और उसरा रचयिता है। स्वामी दयानन्द इन मत-मतान्तरा थौर नवीन वेदान्त की शिक्षा को जाति के धामिस एच नैतिक पतन के लिए उत्तरदायी समझते थे । इस कारण उहोने भगवद्गीता की भी उपेक्षा की। भगवद्गीता और वेद वेद के बारे में भगवद्गीता के विचार परस्पर विरोधी से मालूम देते हैं। कई स्थला पर, उदाहरणार्थ अध्याय ३ के श्लोर १५ में, अध्याय ७ वे श्लोक ८ और अध्याय १५ तया १७ में भी, वेद को ब्रह्म और ब्रा से ही पैदा हुआ रतलाया गया है। लेकिन अध्याय २ के श्लोक ४२, ४५, ४६, ५३ श्रादि में वेद को पीछे छोड़कर आगे जाने की शिक्षा दी गई है। इस प्राट विरोध का दूर होना तभी सम्भव है, जब हम यह समझ ले कि महाभारत के काल से पहले ही वेद शब्द के प्रयोग में भिन्नता श्रा गई थी। उस समय न केल सहिता को ही वेद कहा जाता था रल्लि ब्राह्मणग्रथों, सूत्र प्रथों आदि के लिए भी वेद शब्द प्रयुक्त किया जाता था। इन प्रथा में विशेष रीवियाँ पूरी करके उनसे विशेष फल प्राप्त करने पर जोर दिया गया है । ' भगवद्गीता में दूसरे अध्याय में इनको ही वैदिक विधियाँ कहकर इन कमाण्ड को निचला दर्जा दिया गया है । भगवद्गीता की विशेषता स्वामी दयानन्द ने वैदिक धर्म की नींव पेयल सहिता पर रवरती है। सहिता या वेद को श्रार्य अपि प्रारम्भ से ही स्वत प्रमाण और भ्राति रहित मानते चले श्राये है। स्वामी दयानद ने इस कारण वेद धर्म की रक्षा के लिए फिर उही का आश्रय लिया। इस सिद्धान्त की सत्यता एर स्वामी दयानद के उद्देश की पवित्रता में कोई सन्देह नहीं ६ मेरे अन्त समय के विचार हो सस्ता। फिर भी अप ऐसा समय मालूम होता है कि यह प्रश्न उठाया जाये कि सहिता या वेद वैदिक धर्म के पचाय एव-प्रसार के लिए वह काम कर सस्ते हैं जो अन्य मज़ों के अन्य क्रियात्मक रूप से उनके लिए कर रहे है। यदि कोई चाहे कि एक पुस्तक स्थायी धार्मिक जीवन उत्पन्न करे तो इसके लिए पुस्तक की सचाई ही काफी नहीं है बल्कि हर एक मनुष्य के लिए उसका अध्ययन करना श्रावश्यक है। वेदों की भाषा बहुत कठिन है। उनकी व्याख्याएँ भी शायद उतनी ही कठिन है। अभी तक वेदा का कोई ऐसा प्रामाणिक अनुवाद नहीं हुया जो जनसाधारण के हाथ में दिया जा सके। शुरू से- लेकर श्राज वा हमें कुछ ही नाम ऐसे मिलते है जो पैदा के जाननेवाले कहे जा सकते है। इसके लिए पार्यसमाज का प्राधी सदी का प्रयत्न हमें इस परिणाम पर पहुँचाता है कि ग्राम लोगों के लिए वेदों का अध्ययन करना और समझना असम्भवप्राय है। वेद वो सोज की उन पुस्तको के तौर पर रहे हैं निनका अध्ययन विशेष मनुष्यों के लिए मालूम होता है ।-- विदेशी जातियों के लिए भगवद्गीता यदि विदेशो में वेद धर्म के प्रसार का खयाल हो तो वहाँ के लोगों के हाथा में स्वाध्याय के लिए एक धर्म पुस्तक का-देना श्रावश्यक है। जर हम भारत में वेदों के पढ़नेवाले इतने कम पाते हैं, ता दूसरे देशों में उनको समझनेवालो के होने की श्राशा एक प्रकार से कम हो जाती है। कुछ श्रार्यसमाजी स्वामी दयानन्द-कृत सत्यार्थ प्रकाश को इस उद्देश के लिए परन्तु वे इस रात को भूल जाते हैं कि सत्यार्थ प्रकाश का एक बड़ा भाग केवल भारत से सम्बन्ध रखता है जिसमें विदेशियों को ७ भगवद्गीता और उसका रचयिता कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती। इसके मुकारले पर भगवद्गीता की हालत देखिए। इसके अंदर एक विशेष सौदर्य और श्राकर्षण पाया जाता है। विदेशों में ऐसे बहुत से स्त्री पुरुष मिलते हैं जिनको समस्त भगवद्गीता कण्ठस्थ है। इस कारण यह कहना अनुचित नहीं मि भगवद्गीता यह धर्म पुस्तक है निससे श्राय धर्म के पैलान में काम लिया जा सकता है। जाति की जाति इसे अपना धम प्राय स्वीकार करती है। इसके अतिरिक्त क्योकि इसमें वैदिक्ष ज्ञान का इन, जैसा कि ऋषि, मुनि और दार्शनिक लोग मानते चले यारे है, मौजूद है इसलिए इसे एकमत होकर श्रार्य धम की प्रामाणिक पुस्तर रहना उचित है। भगवद्गीता, याइनल और महाभारत -कुछ पश्चिमी विद्वाना का विचार है, क्योंकि भगवद्गीता की अति पवित्र शिक्षा बाइबल की शिक्षा से मिलता है, इस कारण भगवद्गीता बाइबल के अाधार पर लिखी गई है। यह बिलकुल वैसा ही व्यवहार है जैसा कएँ के अन्दर उत्पन्न हुए एक मेढक ने समुद्र की उस मछली से किया जो बाढ श्राने पर उस कुएँ में श्रा गिरी थी। मेढक ने पूछा-'समुद्र कितना बड़ा है " मछली ने उत्तर दिया-बहुत बड़ा ।' मेवर अपनी जगह से जरा पीछे हट गया। ग्रन उमने सवाल क्यिा-क्या यह इतना पड़ा है" मछलीने पवाब दिया---'नहीं, यह बहुत बड़ा है।' तर वह थोड़ा और पीछे हट गया और फिर पूछने लगा। इस प्रसर यह थोड़ा थोड़ा परे होता और बार-बार नही सवाल दोहराता रहा । यहाँतक कि वह कुएँ के दूसरे किनारे तक जा पहुंचा। जब मछली ने कहा, 'नहीं, वह इससे भी बड़ा है, तब वह घबराकर कहने ला-'यह सम्भव नही । इसमे रडा दुनिया मे कुछ नहीं हो सकता।'
म मेरे अन्त समय के विचार भगवद्गीता जैसी पुस्तर अचानक उग नही सक्ती। इसमें पूर्व शतका की मौदिर उन्नति का होना आवश्यक रात है। जब तक उप- निपदों और हिन्दु दर्शना की पिलासपी विद्यमान न हो तर तेर भगवद्गाला लिग्वी नहा जा सस्ती। इसके अतिरिक्त इसकी व्यारन्या करनेवाले दृष्टान्त महाभारत में ही मिल सस्ते हैं न कि तौरेत के किस्मे-कहानियों में । इसलिए भगवद्गीता की शिक्षा केवल गगा तट पर ही समव थी न कि दजला और फराव की भूमि में। भगवद्गीता का रचयिता महाभारत की क्या में भगवद्गीता एक चमझते हीर के समान है। महाभारत के रचयिता निस्सदेह ऋषि व्यास थे। - भगवद्गीता के ज्ञान का उपदेश चाहे उनकी गौद्धिक शक्ति का पल है चाहे सचमुच श्रीकृष्ण ने ही उसे अर्जुन से दिया, इस बात पर बहस करना सर्वथा निरर्यक है। इससे भगवद्गीता के गौरव में कोई अंतर नहीं पड़ता। यह गौरन स्वय भगवद्गीता के अन्दर ही पाया जाता है। अध्याय १८ के श्लोक ७५ में सजय कहता है-"दस प्रकार श्रीव्यास की कृपा से श्रीकृष्ण की यह उत्तम वाता मैने सुनी। इसको मैं जितना याद करता है उतना ही मैं गहरे श्रानन्द मे पड़ जाता है।" परन्तु यदि श्री व्यास ने इसे स्वय लिसार श्रीकृष्ण के मुंह से ही भुनाना उचित समझा तो यह बात कि श्री व्यास जैसे ऋपि भी धर्म के तत्त्वज्ञान का प्रचार श्रीकृष्ण के नाम से ही कराना उचित एव श्रावश्यक समझते थे, श्रीकृष्ण की निद्वत्ता और बड़प्पन को मानवी मीमा में कही श्रागे ले जाती है।
दूसग परिच्देद श्रीकृष्ण श्रीरमा का जन्म श्रीरथ्ण का जम मयुग के परित्र यन्दी-गरम एमा। या काम माता पिता से उनके मामा स द यर रस्सा था। मथुरा के नृशम राना पसनल अपने पिता उमरोन पल्कि अन्य निार सम्बधिया को भी, निनमे उसे भी टर हा गाता था, नैद में दाल रक्या था । जिग दिन श्रीकृष्ण का जमश्रा उसी या उससे पिता यमुदेव पहरेदारा की श्रसारधानी या उपेना धारण लड़ये को जमना के पार अपने गोप मित्र नन्द । यहाँ छोड़ भाये और उनके यहाँ से एक नवजात लड़की को लाकर उन्हाने श्रीकृष्ण के स्थान में रख दिया । यग ने अगले दिन समेरे उस लड़की को मरवा दिया। बाद में शर हो जाने पर बालक कृपा को द्वढने और उनसे मरवाने के लिए उस ने क्विनी ही कोशिशें की। हासी कहानियाँ लोगो के दिलों को मोहित करोवाली, परन्तु बहुत कवित्वपूर्ण, भाषा में वर्णन की गई है। थीरण का थाल्यकाल और यौवन श्रीकृष्ण ज्या-ज्या बड़े होते गये त्या-त्यों उनकी बुद्धि, मुन्दरता और उनका मुरी का जाना गोकुल के गोपों तथा गोपियों के दिलों को अपनी ओर ज्यादा पींचने लगा। श्रीकृष्ण के साथ गोपियों के -- मेरे अन्त समय के विचार " गया । स्पटी शकुनि जुया सेलने में सिद्धहस्त था। उमे विश्वास था कि युधिष्ठिर बड़ा धर्मात्मा है, वह क्षनिय के चैलेंज को भी अस्वीकार न करेगा। युधिष्ठिर ने सारा धन श्रादि और यज्ञ में प्राप्त उपहार जुए में हार दिये, राज्य हार दिया, अपने भाइयो और अपने आपको भी हार दिया। तब उससे द्रौपदी को बाज़ी पर लगाने के लिए कहा गया। युधिष्ठिर ने द्रौपदी भी हार दी। जर बाद में पाचाली को बड़ी रेइज्जती के साथ बांधकर भरी सभा में लाया गया, तर उसने भीष्म के सामने पड़ी भारी युक्ति पेश की, 'अपने आपको हार देने के बाद युधिष्ठिर को मुझे नाज़ी पर लगा देने का कोई अधिकार न था।' इसे सुनकर भी भीष्म चुपचाप बैठे रहे। इस सारे सेल का परिणाम यह हुआ कि पाण्डवों को तेरह वर्ष के लिए वनों में जाना पड़ा। इस निर्मासनकाल में श्रीकृष्ण पाण्डवों के कुशल की सार रा- बर लेते रहे। वनवास समाप्त करने पर पाएडवो ने इस पाव का प्रयत्न किया कि दुर्योधन उनके निर्माह के लिए कुछ प्रदेश दे दे। परन्तु वह विल भर भी जगह देने पर राज़ी न हुआ। अन्त में पञ्चाल-नरेश, विराट और श्रीकृष्ण की मदद से पाण्डवों ने लड़ाई के द्वारा अपना भाग लेने के लिए युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। पाण्डव और दूत सञ्जय पाएडव अभी विराट-नगर में ही थे कि कौरवों के पिता धृतराष्ट्र की तरफ से महाविद्वान् सञ्जय पाएटवों के पास दूत बनकर पाया। उसने पहले तो स्पष्ट शब्दों में यह कहा कि पाएहया के माथ बड़ा श्रन्याय हुया है। दुर्योधन ने कई बार उनके साथ क्पट क्यिा है। परन्तु पिर यह १५ श्रीकृष्ण कह दिया क्योंकि दोनों ओर एक ही वश है इसलिए युद्ध करना उचित नहीं। ऐसा करने से एक राज-धयना तो नष्ट होगा ही, साथ ही अन्य लासों क्षनिय भी मारे जायेंगे। इसलिए अर सन्तोष और शान्ति करना ही उत्तम यात है। इसका उत्तर श्रीकृष्ण ने भरी सभा में यो दिया-"श्राप वेदो और शास्त्रों के इतने बड़े विद्वान् होर क्षत्रिय को धर्म-युद्ध से रोकना चाहते हैं ! अन्याय को दूर करो और निर्मल की रक्षा करने के लिए ही क्षत्रिय बनाये गये हैं। शस्त्रा की रचना भी इसी लिए की गई है । यदि क्षत्रिय अपना धर्म छोड़ देंगे तो पाकी वर्गों के धर्मों का नाश अपने पाप है। जायगा। जिस प्रकार रोटी शब्द कहने से ही भूसे का पेट नही भरता उसी प्रकार बिना र्म के कोय ज्ञान किसी काम का नहीं।" सजय वापस चला गया। इसके बाद स्वय श्रीकृष्ण पाडवों की श्रोर से धृतराष्ट्र की समा में पहुंचे जिससे उनका हक दिलाने की कोशिश करें। वे जानते थे कि दुर्याधन उनकी बात न सुनेगा। परतु उनकी राय थी कि यह क्लक भी उसी के माथे पर लगाना चाहिए । युद्ध की तैयारियों पूरी हुई। दोनों श्रोर से फौजें कुरुक्षेत्र में मुकाबले के लिए एक्न हुई। श्रीकृष्ण अर्जुन के रयगाट बने। अर्जुन इधर का सेनापति या। दूसरी ओर भीष्म पितामह थे। अतुन का रथ जब दोनों ओर की सेनाया के बीच में खड़ा हुअा, तर उसे दोनो हा तरफ अपने भाई, गुरु और नाचाय नज़र श्राये । फ्लत वह माह के समुद्र में डूब गया। उदास होने के कारण उसकी धारतों से श्रॉस निकल पड़े। यह कहकर कि "यह तो छोटा सा राज्य है और मैं तो तीन लोक मेरे अन्त समय के विचार के राज्य के लिए भी दनको हनन न करूँगा" अर्जुन ने श्रीकृष्ण के सामने हथियार रस दिये। अव श्रीकृष्ण के सामने पर बड़ी कठिनता थी। -स, इसी का हल भगवद्गीता है। अर्जुन की कठिनता मनुष्यों की तरह जातियों के जीवन में भी कई बार ऐसी नाजुक स्थिति आ जाती है कि उन्हें मालूम नहीं होता कि धर्म क्या है और अधर्म क्या । ऐसे अवसरो पर उनके सामने एक बड़ी सठिन श्रोर पेचीदा पहेली खड़ी हो जाती है जिसका हल उहें दिखलाई नहीं देता। दोनो ओर से युक्तियाँ पेश की जाती हैं। बड़े-बड़े शूर वीरों और त्यागियो की अम्ल चकरा जाती है योर अधर्म उनको धर्म के रूप में नज़र याने लगता है। जिनो ससार से इतना विराग होता है कि वे अपना सर्वस्व त्याग देते हैं, उनकी बुद्धि भी भय के वश में होकर उलटे विचारों में पड़ जाती है। भगवद्गीता मे इस सम्बध का शान पाया जाता है। इसको भली भांति समझ लेने से मनुष्य में वह विवेक पैदा हे। जाता है जिससे यह धर्म अधर्म को ठीक तौर पर पहचान सकता है। इस बात को स्वय अर्जुन ने अध्याय १८ के श्लोर १३वें मे स्वीतर किया है। पहले उसका मन एक गहरे और कठिन समय में पढ़कर अन्धकार में चक्कर लगा रहा था। श्रीकृष्ण का उपदेश सुनने के बाद अन्त में उसने यह अनुभर क्यिा-"यापकी कृपा से मुझे सत् नान प्राप्त हो गया है। मेरा यह मोह दूर हो गया है, मेरे रे संशय छिन-भिन हो गये हैं । मैं यही करूँगा जिसकी आज्ञा पाप करेंगे।"
श्रीकृष्ण भगवद्गीता मे श्रीकृष्ण ने तीन निभिन मार्गो से वह ज्ञान अर्जुन को समझाने की कोशिश की है। प्रथम भाग, पहले से छठे अध्याय तक, में कर्म, याग और शान पर बहुत गढ़ विवाद है। दूसरे, अध्याय ७ से १२ वक, में यह बतलाया गया है कि इस समस्त ससार का, जो दृष्टिगोचर है, पीज श्रात्मा मैं हूँ, यह मुझसे उत्पन होता और सहारा पाता है । तीसरे भाग, अध्याय १३ से १८ तक, में यह बतलाया गया है कि किस प्रकार प्रकृति के गुण-तम, रज और सत्त्व- ब्रह्माण्ड के अन्दर काम करते है और किस प्रकार यह समस्त बाह्य ससार एक ही शक्ति से उत्पन होता है। श्रीकृष्ण के विभिन्न रूप भगवद्गीता में श्रीकृष्ण पहले तो अर्जुन के रथयार है। फिर वे उसे ज्ञान का उपदेश देनेवाले दिसाई देते हैं। आगे चलकर वे अर्जुन को बताते हैं कि "मैं महायोगी और महाशानी हूँ।” चौथे अध्याय में वे कहते हैं-मैं उचित समय पर दुष्टो का नाश और धम की रक्षा करने के लिए जन्म लेता है।" छठे में उन्होंने यहाँ तक कह दिया-~- "सभी भूतो और पदार्थों की श्रात्मा में ही हैं।" दूसरे भाग में स्पष्ट तौर पर यह बताया गया है-"साय ब्रह्माण्ड मेरा ही खेल है।" यह एक बड़ी भारी पहेली है कि किस प्रकार एक ही मनुष्य यह सब कुछ कह सकता है। इसका उत्तर तो साधारण है। एक ही मनुष्य किसी का बेटा, किसी का बाप, किसी का गुरु, रिसी का शिष्य–विभिन्न अव स्थाया में विभिन नामो से पुकारा जाता है। इस प्रकार एक ही मनुष्य के कई पहलू होते हैं। एक अमेरिकन लेखक का कथन है कि जब - २ मेरे अन्त समय के विचार दो मनुध्या में गलतफहमी के कारण नाराजगी पैदा होती है, ता इसका अमनी सनर यह होता है कि वे दो नहा पल्कि छ मनुष्य होते हैं जिससे भगदे का मौका निकल पाता है। वह किस प्रकार ? उन दोनों में से हर एक अपने आपको कुछ समझता है, दूसरा आदमी उसको कुछ और खयाल करता है, परन्तु वास्तव में ये दोना कुछ और ही होते है। दूसरे, हर एक मनुष्य बाह्य और अान्तरिक शरीर, जीन अोर अात्मा, से बना होता है। दूसरी चीज को जानना अपने मन की अवस्था पर निर्भर होता है। अज्ञानी तो सिर्फ बाह्य शरीर को देख सकता है। विचारवान् शरीर को ही नहीं बल्कि गुणों को भी देखता है। परन्तु जानी शरीर योर गुणा को छोड़कर केरल श्रारमा को देसता है। इस विषय में एक दृष्टान्त दिया गया है। एक समय श्री रामचन्द्र ने पीर हनुमान् से पूछा--"हमारे साथ तुम्हारा क्या सम्बध है ?" वीर हनुमान् सोचते रहे कि एक उत्तर देने से मूर्व लोग मुझे अभिमानी हेंगे और दूसरा देने से ज्ञानी मुझे अजानी कहेंगे। सोचकर अन्त में उन्होंने यह जराब दिया--"महाराज, शरीर की दृष्टि से तो मैं श्रापका दास हूँ, जीव की दृष्टि से यापमा अश और ग्रात्मा की दृष्टि से नापा स्वरूप" ईसा अपो अापको खुदा का बेटा कहते थे। परन्तु एक अवसर पर उन्होंने ठीक इस के विरुद्ध यह कहा-"मैं और मेरा पिता एक ही हैं।
तीसरा परिच्छेद ज्ञान की सापेक्षता तीन प्रकार के प्रमाण पायदर्शन में पदाय को जानो के सीन प्रमाण यताये गये हैं- प्रत्यन, अनुमा और शब्द । शन्द प्रमाए में श्राप्त पुरुषों के स्था, इतिहास श्रादि पाते हैं। परन्तु यह इस दृष्टि से बहुत पमजोर है कि जासाधारए समभी से या रिसी मतला यो सामो रसार झूठ पी तरफ भर जाते हैं। मज़हनी चमत्तार और परामात साधारणतया अनु त्तरदायी माष्या पी गवाही के श्राधार पर चलाये गये हैं इसलिए ये विश्वसनीय नहीं कहे जा सकते। नब दा चीज़ा या सम्मघ सदा एक स्थान पर पाया जाता दो तय वन पर एर-दूसर की उपस्थिति का परिणाम मिलना अनुमान कहलाता है, जैसे धूएँ यो देसार श्राग का सयाल करना। विचार करो पर मालूम होता है कि अनुमान प्रत्यक्ष शान पर ही निमर होता है। प्रत्यक्ष शान गार-बार होने के बाद ही श्रनुमान या सयाल पैदा होता है। घास्तर में केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही शान प्राप्त करने का साधन है। प्रत्यक्ष यह ज्ञान है जो हमें इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होता है। इस प्रकार हम समस्त ज्ञान इद्रियों के द्वारा ही प्राप्त करते हैं। हमारी शान इन्द्रियाँ-खि, नाक, कान जीभ और त्वचा-विशेष मेरे अन्त समय के विचार रगा के द्वारा मस्तिष्क या दिमाग से सम्बद्ध है। दिमाग एक प्रकार का केद्रीय तारघर है जहाँ से वे रंगें तारा की तरह शरीर के हरएक भाग में पहुँ चती है। ये रगै दो प्रकार की है-एक निन्या-सम्बधी जो शरीर पर होने वाले हर एक याह्य सस्कार को सन्देश के रूप में मस्तिष्क तक पहुँचाती है, दूसरी गान-सम्बधी जो मस्तिष्क से सभी श्रादशा को शरीर के विभिन्न भागों तक ले जाती हैं। उदाहरणार्थ जर कोई ठढी या गरम, सख्त या नरम चीज़ बाहर से त्वचा के साथ छूती है तर यहाँ की मिया-सम्बधी रग तत्काल इस सत्कार को दिमाग तक पहुँचा देती है। फिर दिमाग मे शरीर के उस भाग को पीछे हटने या वही रहने का आदेश शान-सम्बन्धी रग के द्वारा मिलता है। ये सारी क्रियाएँ यहुत ही थोड़े समय के अन्दर होने से हमको श्राप से श्राप ही होती हुई मालूम देती हैं। इस प्रकार का सस्तार जर एक पार होरर दोबारा किसी इन्द्रिय पर होता है तब दिमाग़ में एक नई अनुभूति काम करती है कि यह संस्कार पहले भी मुझ पर हुआ है यह अनुभूवि शान की नींव है। नाल्य-काल से ही ये सस्कार बार-बार हमारी इन्द्रियों पर होते हैं। इस प्रकार हमारे दिमाग में शान का कोष दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है। झान के साधन इन्द्रियाँ क्वल इद्रियाँ ही हमारे ज्ञान के साधन हैं, इस कारण स्वभावत यदि इन्द्रिया में भेद हो तो ज्ञान में भी भेद होगा। जो मनुष्य जन्म से * रगें-Nerses ( नज)। जनिया-सम्बधी रण- Motor nerve ( मोटर नई)। ज्ञान-सम्बधी ग%DSensory nerve (सेंसरी नरें)।
1 ज्ञान की सापेक्षता २१ धे और बरे होते हैं उनको ससार की विभिन्न चीजों की शक्लों या नामों का कोई ज्ञान नहीं हो सस्ता । इस कमी को पूरा करने के लिए उनकी दूसरी इन्द्रियाँ असाधारण तौर पर तेज़ हो जाती हैं। कई अधे केरल हाथ से टटोलकर बरसा के बाद मिलनेवाले पादमी को भी पहचान लेते हैं। कई प्राणियों की इन्द्रियाँ दूसरे प्राणियो की इद्रिया से बहुत मिन होती हैं। इसलिए चीजों के सम्बध में उनका ज्ञान भी भिन्न होता है। उदाहरणार्थ कुत्ते में सूघने की शचि और बाज़ में देखने की शक्ति इतना अधिक होती हैं कि ये हमारे ग्रयाल से बाहर हो जाती हैं। शिकार के पाँव के निशानो को ज़मीन पर सूघकर कुत्ता उसकी तलाश कर सकता है। श्राम कहावत है कि क्सि प्रकार कुछ अन्धो ने हाथी को केवल हाथा से टटोलने के बाद उसके श्राकार को विभिन प्रकार से वणन किया। एस ने उसे बडी सूडवाला रताया, दूसरे ने चौड़े-चौड़े कानावाला, तीसरे ने पूछवाला और चौथे ने दाँतोंवाला। एक वस्तु का ज्ञान मनुष्य को एक विशेष प्रकार का होता है। लेकिन उसी वस्तु के ज्ञान का नक्शा चिउँटी या मछली के दिमाग पर उससे सपया भिन्न हाता है। बीच में अन्तर होने से शाम में परिवर्तन पदार्थों और हमारी इद्रियो के बीच अन्तर या फासला घट- बढ़ जाने से या बीच में किसी श्रय वस्तु के श्रा जाने से उनके सम्बध में हमारा ज्ञान बदल जाता है। एक पहाड़ को चार मील से दगो पर उसका एक रूप दिसाई देता है, दो मील पर प्रौर, एक मील पर और, अाध मील पर श्रीर, मी गज पर प्रार। इस प्रकार इस फासले रे पाँच भाग करने पर उस पहाड़ की शक्ल में स्तिने ही परिपवन दो ne- २२ मेरे अन्त समय के विचार -- जाते है। जर हम अणुवीक्षण या खुर्दगीन के द्वारा छाछ की एर वृद यो देखते हैं तब उसमें हजारों अक्टीरिया नाम के प्राणी गति करते दिखाई देते है। गाली ग्रास से देखने पर छाछ के भरे कटोरे में भी ऐसी कई चीज़ नजर नहीं पाती। दूरपीक्षण या दूरबीन से सिताय का देपने पर हमारी टि में ब्रह्मांड का नक्शा ही पलट जाता है। अँधेरे में मामूला रम्सी कभीमभी सांप के रूप में दियाई देने लगती है पीच में फासला श्रोर सूर्य की किरणे या जाने पर हम मृगजल का वह दृश्य देखते है जिससे रेत पानी के रूप में नजर याती है। कहा जाता है कि इस पानी के धोखे में हिरन दाद दौमार अपनी जान सो बैठता है। इसी प्रकार का धाग्या भर्तृहरि को हुया था जब वे राज-पाट को छोड़कर चाँदनी रात में जङ्गल में जा रहे थे। उन्होंने एक चमकती हुई मणि को देखा। तृष्णा पिर जाग उटी, उसी तरफ हाथ बढ़ाया। मालूम हुया कि वह तो पिसी भी पीत है जो चाँद की किरणों के कारण इतनी चमक रही है। दिमाग की हालत यदलने से शान में परिवर्तन भान मस्तिम को होता है। मस्तिष्क की जानवाली अवस्था को बुद्धि कहते हैं। बुद्धि की हालत बदल-जाने पर शान भी यदल जाता है। शिक्षा मिलने पर बुद्धि तेज हो जाती है। शराब, भङ्ग, अफीम आदि नशेनाली चीजों के असर से बुद्धि उलटी-सी हो जाती है। पानी के गन्दे तालार के अन्दर अशिक्षित मनुष्यो को सिवाय गन्दे पानी के कुछ नही दिसलाई देता। परन्तु बस्टीरिया का शास्त्र जाननेवाले की दृष्टि में उसी के अन्दर प्राणियो की सैक्डो-हजारों बस्तियाँ होती है। जिन चीजों को साधारण मनुष्य केवल कर या गुड़ियाँ समझता है वे उन बच्चो की शान की सापेक्षता नजर में, जो उनसे खेलते हैं, यदी महत्वपूर्ण और बहुमूल्य चीज। एक क्या है। राजा को एरव्योतिनी बताया कि श्रपुर दिन अनुर मुहूर्त में एक ऐसी हवा चलेगी कि उसमे सभी लोग पागल हो जायेंग। राजा ने अपने मत्री से मत्रा करने के पश्चात् अपो आपसे मत्री सहित एक खास जगह में पद पर दिया तारि निश्चित समय पर नलने वाली मा उई 1 लग सके। हवा चली और लोगा की शुद्धियाँ रदल गई। राजा और मत्री यादर मिलने पर लोगा को दगार उहें पागल बताते थे जर नि दूसरे सर लोग डा दोना को ही पागल खयाल रो लगे। काम, क्रोध आदि से ज्ञान में परिवर्तन जर हमारा मन काम, मोध, लोभ, माह, श्रदकार श्रादि विषयों में से किसी एक के प्रभुत्र थे नीचे पा जाता है तभी हमार ज्ञान की शरस्था बदल जाती है। भगवद्गीता के तीसर अध्याय के श्लोक ३८, ३६ और ४० में रही उत्तम रीति से बताया गया है कि हमारी इच्छा की मेल मन हो उसी प्रकार धुघला कर देती है जिस प्रकार धूया श्राग को और धूल शीशे को छिपा देती है। अपने मुंह में दनाये हुए मास के टुकड़े की छाया को पानी में देग्गर लोम के वश में होकर कुत्ता उसे मी मास समझता है और पकड़ने के लिए मुंह खोलता है। इस तरह वह अपने मुंह का टुरड़ा भी पानी में खो देता है। इसी प्रकार मत हरि ने एक सुदर श्लोक में बताया है कि छूने, सुनने, देगने, र घने, साने श्रादि विभिन्न विषयों के वश में होर हाथी, हिरन, पतला, भौंग और मछली किस तरह अपनी अपनी जान ग्गा पैटते है। रडे दुःय के साथ भतृहरि मेरे अन्त समय के विचार करते हैं कि जब एक एक इन्द्रिय इन जानवरों को इतना क्लेश पहुँचाती है तरचेचारे मनुष्य का क्या कहना जो सभी इन्द्रियो के वश में पड़ा हुआ है। इस प्रकार के अजान स एक मोटा सा दृष्टान्त है। रिसी खेत में एक सूग्वे हुए वृक्ष का तना पड़ा था। राव के वक्त अँधेरे में चौकीदार ने उसे चोर समझकर साहस तो किया, परन्तु डरते डरते ही उसकी ओर कदम बढाया। अपने सोये हुए गधे की खोज में धोनी तने को गधा ममझकर उसके पास गया। माह के पशीभूत हुई युक्ती उसे अपना प्रीतम समझार उसकी तरफ टफटकी लगाकर देसने लगी। इन्द्रियों के वश में पड़े हुए अज्ञान का अनुमान हमको गौतम बुद्ध के एर शिष्य भिक्ष की कथा से भी भली भाँति होता है। एक बड़ा मुदर नवयुवक मिद गॉव में भिक्षा माँगने जाया करता था। गाँव के शुरू में ही रहनेगली एक ललना, जो उसे देखकर मोहित हो गई थी, उसे थाली भरसर पाटा दे देती। इमे काफी समझकर वह वापस चला जाता। कुछ दिा गुजरने पर उस स्त्री ने भिक्ष से अपने मन की इच्छा इस तरह प्रक्ट ---"महारान, मैं आपके नयनों पर मर रही हूँ।" मिनु ने सलाई से अपनी दोनो अाँखें निकालकर उसके हवाले कर दी। इसी प्रकार का एक अन्य दृष्टान्त एक युवती का है जिसने 'राजा को शान का माग बताया। वह युनती रड़ी शुद्धाचारिणी थी। एक राजा उस पर मोहित हो गया। राजा ने विवाह का प्रस्ताव किया। युवती ने तीन दिन की मोहलत मांगी। इस बीच में उसने सरन जुलार ले लिया। माय नी नौकरानी को यह कह दिया कि शरीर के अन्दर से निकलनेवाले सारे मल यो एक ठीकरे में जमा रसती जाश्रो। तीन दिन के बाद
गारवा
गणार या गिर गया।
सुना भेगा उराकी राशन नगन कर र उपर Triml
एम पर तुरती ने 14--"प भार मुझे दे भी नदी पार"
टोरीगरसय पापे उगोशाला-"नासादर
गोर घर पर सोमोराग टीचर पारी सपने
साप मेगाए।"
मोपाधि नाम पार माया
मगध, प्राविाग मग पिगमे, मारमोगराम
दिया गया है। दोपयों में हर माया-पीय मग, सिमें
गै गाया है। मामी 2 में मार भी हमसी
मशीन पाए पुरता है। इसे दूगी नारों का पिपिर mom
हम साधारण प्रपरया में यान समार के पर प्रभावाधी
ले उगकी यातरिया दी और प्यान देने का भी पयाल भी
नहीं था। एमेडी जो मनुष्य पिपेर के अन्दर पेटा
"मटर टेम्पा है या एक प्रादमी मिगी उपयाग को पा रहा है।
पर उग समय पे लिए उस मटर या जयारा में विना म जाता है
कि उसको ही यास्तविप समभार उसमे उसी प्रकार मुष दुग्य अनुभव
करता है जिस पर हम अपनी दुनिया में करते हैं। यह श्वसली शान
को इतना भूल जावा है कि उसे सयाल ही नहीं पाता कि मैं सगशा
देष रमा हूँ या उसयारा पढ़ रहा है।
* निसिप जान=Abolnte-knowledge (एम्सोलूट नालेज)।
२६ मेरे अन्त समय के रिचार ससार का सारा शान हमको इन्द्रियों के द्वारा ही प्रास होवा है। ये इन्द्रियों बहुत ही निबल और श्रपूर्ण है। इसलिए यह निणर्ष साफ है कि हमें किसी चीज का निग्पेन शान नहीं है। सकता। जब हम उस ससार को ही नहीं जान सस्ते, जिससे हम इतने परिचित हैं, तथा ब्रहा श, जो इद्रियो की शक्ति से कहीं पर है, भान पिस प्रकार प्राम र सस्ते हैं ? साधारणतया मनुष्य ईश्वर का चित्र अपने दिमाग मे पाता है, अथात् जो गुण उसे अधिक पसन्द गते हैं उनके अनुसार ईश्वर का एक रूप ना लेता है। ईश्वर को छोड़ दीजिए। हम तो महापुरुषा को भी अपो अपने स्वभाव के मुकार के श्रासार देखते हैं। उदाहरणार्थ गुरु गोविन्द शाओं की दृष्टि में तो इसलाम के बड़े ग्यतरनार दुश्मन थे, परन्तु हिदू उहें राष्ट्रीय धर्म के रक्षक समझते थे, गुरु भक्त सिस उन्हें ईश्वर खयाल करते थे और समाजवादी विचार रखनेगाले सिस उपहा वर्गवादी खलाते हैं। इसी प्रकार जिन सरिया को मनुष्य पसन्द करता है, उन्हें पूर्णता का दर्जा देकर वह ईश्वर के अन्दर डाल देता है। हम प्रेम को अच्छा समझते हैं इसलिए करते हैं-ईश्वर सनसे प्रेम करता है। हम दया को अच्छा सयाल करते हैं और कहते हैं, इश्वर गड़ा न्यायकारी है। इसी प्रकार कई मनुष्य उसे कहहार या विपत्तिकर्ता और जन्यार या जब करनेवाला भी बना लेते हैं। मगरद्गीता के अध्याय १३ के श्लोक १४ में कहा गया है कि जिसे इतने गुणोंवाला कहा जाता है यह वास्तव में निर्गुण है। * समाजवादी-Socialist (सोशलिस्ट)। वर्गवादी =Communist (कम्युगिस्ट)।
शान की गरेक्षता इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण हमको उस प्रश्न ये रूप में मिलता है जो जनसाधारण की जयान पर पाया जाता है-'ईश्वर ने इस ससार को यो बनाया । इस रनने में उसका क्या उद्देश हे " बात यह है कि हमारे समस्त जीवन का प्रवाह हमें एक ही शिक्षा देता है। हम कोई काम गर मतलर के नहीं करते। हर एक काम में हमारा मवलर उसमें माथ मिला हुअा रहता है। हमारे दिमाग श्री रनावट ही ऐमी हो चुकी है कि हम इस ससार को बिना किसी प्रयोजन के रना हुना स्याल नहा कर सकते। जिम ब्रा को हमारे लिए जानना ही सम्मान नहीं उसके विषय में ऐसे प्रश्न करना, 'उसने ऐसा क्यों किया? इसमें उसमा क्या प्रोजन है' कुछ श्रथ नहीं रखता। भगवद्गीता के तीसर अध्याय का दस श्लोक साफ बतलाता है कि इस ब्रह्म ने प्रजा को यज्ञ से, श्रथात् विना विमी प्रयोजन के, रखा है। सापेत और निरपेक्ष शान व्यवहार में हमारा शान केवल सापेक्ष ही शेवा है। भगवद्गीता क दूसरे अध्याय के श्लोक ५६ और चौदहवें अध्याय के श्लोक २४ आदि में कहा गया है कि बुद्धिमान् मनुष्य की दृष्टि में सुख दुख, परामा निन्दा, प्रेय श्रेय, सोना-पत्यर एक से हैं। संसार में हम एक-दूसरे के विरुद्ध जितने द्वद दिसलाह देते हैं वे निरपेक्ष वौर पर देसने से एक ही रूप धारण किये मालूम दते हैं। उनमें अन्तर सिर्फ दर्जे का होता है, जिन्स का नहीं। विज्ञान के क्षेत्र में हम जानते हैं कि विद्युत् की लहर एक ही * विज्ञान-Science ( सायस), मेरे अन्त समय के विचार शक्ति है। इसका ऋण और धन* होना एक काल्पनिक सिद्धान्त है। इमी प्रकार। जीवन-मृत्यु, सरदी-गर्मा, भलाई बुराई, भी हमारे व्यवहार के लिए केवल परिभाषाएँ बनी हुई हैं। दायाँ और बायाँ स्वयमेव कुछ नहीं हैं। थोड़ी-सी गति एक ही चीज़ को दायें से बायें कर देती है। जो हमारा उत्तर है वह थोड़ी-सी गति से हमारा दक्षिण हो जाता है। अमेरिका के शहर वाशिंगटन में राजधानी की इमारत की छव की बनावट ऐसी है कि उसकी चोटी पर वर्ग में जो बूदें गिरती हैं, बाल भर का फक होने से उनमें से एक बूंद उत्तर की ओर लारेंस की साड़ी में और दूसरी दक्षिण की भोर मेक्सीको की साड़ी में एक-दूसरे से हजारों मील की दूरी पर जा पड़ती है। सोलहवीं सदी के विद्वानों की दुनिया इस कदर पीछे थी कि जर कोलम्बस ने स्पेन के बादशाह के सामने अमेरिका को मालूम करने का मामला पेश किया तर वादशाह ने यह मामला विश्वविद्यालय के विद्वानो के सामने रकवा । उहॉने फैसला दिया कि अगर कोई ऐसा देश पृथ्वी के नीचे मौजूद है तो वहाँ के निवासी सिर नीचे और पाँव ऊपर करके चलते हागे। इस कारण ऐसे लोगों के साथ किसी प्रकार का सम्बध पेदा करना उचित नहीं। उस समय के विद्वान् यह मी न समझ सस्ते थे कि ऊपर और नीचे दो काल्पनिक परिभाषाएँ हैं जो हमने ही अपने व्यवहार के लिए बनाई है। 1 - ऋण विद्यत् = Negative Electricity (निगेटिव इलेक्ट्रि- सिटी) A fagn=Positive Electricity (riza इलेक्ट्रिमिटी)। - शान की सांपवता દ सुख और दुख में अन्तर मुग और दुरा ये यार में यही सिद्धान्त काम करता है। दुनिया का वजमा हमें सिखलाता है कि हर प्रकार के मुग के वास्ते थोड़ा बहुत दुरा उठाना पारश्यक हावा है अर्थात् मुर २ अन्दर ही दु ख का अस्तित्व विधमान होता है। खुशी कीरोन ही ससार में दुमका सबसे बड़ा कारण है। इसी कारण मनुष्य को मुख की अपेक्षा दुग्व से अधिक अनुभव और शा प्रास होते है। हम मजदूरी क बदले में एक योझ उठाएर ले जाते हैं। इसमें काईस या मुस नहीं होता। योझ को येगार में ले जाने पर हम दुख होता है। परन्तु यही राम अपने प्यार मित्र के लिए उठाने में हर्म मुख प्राप्त होता है। एक लहमा वर्चा तर श्रम परता और यष्ट उठाता है। इससे उराको विद्या प्राप्ति का यानन्द मिलता है। इसी प्रकार ससार में एमे हर एक काम के लिए, जिसके अन्त में हमें खुशी की प्राशा हो सकता है, हमारे लिए पहले परिश्रम करना प्रारश्यक होता है। यहाँ तक कि शारीरिक स्वास्थ्य कायम रखने क लिए भी प्रतिदिन थोड़ा-बहुत व्यायाम परना, जो उस समय दुःप सा मालूम होता है, पारश्यक है। में रुपया कमाो के लिए सर्प स्तिना है। एक आदमी को रुपया कमाने में सफलता होती है। उसे मुग प्रतीत होता है। श्रसपल मनुष्या के लिए यही बात दुस सिद्ध होती है। मुकदमे में एक पक्ष जीत जाता है। उसको हप होता है। दूसरे पक्ष को इसी से खेद होता है। या होती है। रास्ते में चलता मुसाफिर उससे कितना दुप उठाता है, बल्कि वह तो दिल में जलता है। लेकिन इसी वषा से किसानो क दिल ससार मेरे अन्त समय के विचार -- स्तिने सुश होते हैं। इसका एक मुन्दर उदाहरण उस लोमड़ी का है जिसके पीछे शिकारी कुत्ते लगे हुए थे। वह बहुत थक गइ। कुत्ता की तरफ मुड़कर उसने पूछा-"यासिर तुम यह तो बतायो कि तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो।' एक ने जवार दिया-"सिर्फ तमाशा देखने के लिए।" अब लोमडी बोली -"क्या तुम यह भी जानते हो कि जो बात तुम्हारे लिए तमाशा है वही मेरे लिए मौत है ?" युद्ध में जहाँ एक पक्ष विजय के कारण खुशियाँ मनाता है यहाँ दूसरा पराजय के शोक में हवा होता है। कई बार मुग्य दुस दोनी का अस्तित्व काल्पनिक होता है। एक गायक रिसी धनी के यहाँ कुछ समय तक गाता रहा। अन्त में धनी ने कहा-"क्ल पाना । तुमसे इनाम दिया जायगा।" गवैया खुशी- सुशी घर चला गया | जर अगले दिन श्रार उसने इनाम मांगा तो धनी ने कहा-"जिस प्रकार रातों से तुमने मेरे चित्त को प्रसन किया उसी प्रकार मैंो भी एक बात कहकर तुमको रात भर खुश रक्सा।" भलाई और घुराई का अस्तित्व श्राम लोग ससार में बीमारी और दुःख को देखकर घरय उठते हैं। बहुत से लोग तो इनको इस ससार के बनानेवाले के विरुद्ध एक बड़ा इल्जाम समझते हैं। वे कहते हैं--"अगर सचमुच कोइ ईश्वर है तो यह ससार से इन बीमारियों को दूर क्यो नहीं कर देता ?' स्पेन के बादशाह एल्फायो ने ऐसे ही लोगों का मत प्रकट किया, जब यह रहा--"यदि मैं ससार की रचना के समय विद्यमान होता तो खुदा को यह ससार बेहतर बनाने की मत्रणा देता।" जर कोई भूचाल या गढ अाती है तो कई ज्ञान की सापेक्षता ३१ नास्तिक ईश्वर में विश्वास रसनेवाला से कहते हैं-"तुम अपने इश्वर को क्या नहीं बुलाते वाकि यह तुम्हारी मुसीबता को श्राफर रोके १" ससार मे इतनी बुराई को देसपर वे ऐसे घरा जाते हैं कि उनके दिमाग में एस प्रकार की बीमारी पैदा हो जाती है निसका इलान करना मुश्क्लि हो जाता है। कहते हैं एक बुढिया ने कई एक ऊँटा पर रूई के लदे हुए बोरे, देरे। उसको यह चिन्ता लगी कि इतनी रूई कौन कातेगा। इसी चिता में वह पागल हो गई। रिसी इलान से उसकी बीमारी दूर न हुई। अन्त में एक अनुभवी हकीम ने बीमारी का कारण मालूम करके उसके काना तक यह सबर पहुँचाई कि रूई के उन बोरों में भाग लग गई है। श्राश्चय में बुढिया ने पूछा-"क्या वे सभी जल गये हैं ?" उस, इसके साथ ही उसके होश हसास फिर से ठीक हो गये। बीमारी में भूल का सुधार और मृत्यु में भलाई थोड़ा विचार करने पर मालूम होता है कि ये बीमारियाँ और मौत भलाई के भी वैसे ही नमूने हैं, जैसे बुराई के। रोग यास्तव में क्या है ? यह हमारी शारीरिक भूलों का सुधार होता है। उदाहरणार्थ, जब हमें के या उलटी पाती है, तर उसका अथ यह होता है कि हमने कोई ऐसी चीज सा ली है जिसे हमारा मेदा अपने अंदर से निकालने का यन क्र रहा है। जबक्सिी घाव में पीर पड़ जाती है तब यह एक प्रकार से हमारे खून के संघर्ष का परिणाम होती है, क्याकि यह अपने अन्दर से उस गन्दे माद्द को बाहर निकालना चाहता है जो हम प्राय अपनी गलती से मेरे अन्त समय के विचार अन्दर दासिल कर लेते हैं। इसी प्रकार कई बार एसा होता है कि हम गले के अन्दर थोड़ी-सी खारिश को सारिश न समझकर, जो प्राय जरा गरम-सरद होने से पैदा हो जाती है, अपने अन्दर बलगम का ,याधिस्य खयाल करते है और वर्षों तक हर सुबह कफ को बाहर निकालने की कोशिश करते रहते हैं। हमारी अपनी श्रादते और गलतियों ही प्राय हमारी बीमारियों के कारण होती हैं । हम अपने इर्द गिर्द गदगी रसपर एक विशेष प्रकार का मच्छर पैदा कर लेते हैं, जो हमें काटता है। उससे मलेरिया बुसार शुरू हो जाता है। इस प्रकार अपनी बीमारी का कारण हम खुद पैदा करते है, परन्तु उससे अपनी रक्षा नहीं करते । छूत की बीमारियाँ प्राय हमारी शारीरिक और नैतिक गन्दगी से पैदा होती हैं जर कोई मनुष्य इस प्रकार के रोग में फंस जाय तर यह उसके लिए चेतावनी होती है कि अपनी गन्दगी से समाज के अन्य लोगों को दुग में न साये और न स तान उत्पन्न करके उनके लिए दुख का कारण बने। बलाई बीमारियाँ भी इसी प्रकार समाज की सामूहिक गदगी श्रीर * गिरावट का परिणाम होती है। जिन देशों में लोग अपने मान साफ और हवादार रखते हैं और अपना भोजन स्वच्छ रसते हैं उनमें इन बीमारियों का कहीं नाम नहीं मिलता। यद्यपि समामक रोगों का श्रारम्भ विमी विशेष भनुम्य या स्थान में गन्दगी या जहरीले माद्द के जमा हो जाने से होता है तथापि यह समाज पहले से ही इस जहर से प्रभावित होने के योग्य बना हुआ होता है।
गाा को साता समाज के सामाजिर पार्यों के विषय में पर घिनित्र कानून काम करता है। यदि समाज का एक मदस्य साई सामाजिक पाप करे तो उसकी सजा उस अनि तक ही सीमित नहा रहती कि उसका असर समस्त समाज के लिए घातक सिद्ध होता है क्योकि प्रकृति समस्त समाज का भी एक हो शरीरीक या सामूहिक अवस्था में एक ही शरीर समझती है। सिर पर यह पड़ा भारी पाप होता है कि उसने अपने एक अंग या अवयव का इतना गन्दा और गुमराह रहते दिया। सामाजिक नियम यह है कि कार मनुष्य अक्ला या कुछ मनुष्य मिलकर शेष सारे समाज का पीछे छोड़ स्वय उनति नहीं कर सकते । जस पर जिस मनुष्य में आगे बढ़ने की इच्छा हो वहाँ पर उसके लिए श्रावश्या है कि समाज के बाकी हिस्मो को भी वह अपने साथ ले। प्रकार समाज की भलाई म व्यक्यिा की अपना अपनी भलाई पाई जाती है। यह कैसी फिजूल बात है कि हम सुद हा भूलें करक अपने अन्दर बीमारियाँ पैदा करें, फिर उसे दूर करने के लिए हर मौके पर इश्वर को मुलाते फिरें। जहाँ जीवन होगा यहाँ मृत्यु होगी एक श्रय दृष्टि से दमो पर मालूम होता है कि जीवन और मृत्यु की एक दूसरे से अलग पहचान नहीं की जा सस्ती। यदि ससार में मृत्यु मा अस्तित्व न होता तो नया जीवन कहाँ से पैदा हो सकता ? प्रकृति के अन्दर केवल परिवतन का एक नियम काम करता है जिससे एक जगह मृत्यु और दूसरी जगह जीवन उत्पन हाता हुश्रा नजर आता है। बती * शरीरी-DOrganism ( आर्गेनिज्म)। ३ मेरे श्रतासमय के विचार । का जलना उसका जीवन है। पत्ती का जल चुक्ना ही उसकी मृत्यु है। इसी प्रकार हम भी ज्या-ज्यों जीवन में पढ़ते हैं त्यों-त्यों मृत्यु के निकट चले जाते हैं। इससे एक और दृष्टि से देखिए। यदि साधारण जानदारों के अंदर मौत न हो तो थोड़े काल में ही यह पृथ्वी किसी एक प्रकार के जानदारों से इतनी भर जाय कि अन्य असरय प्रकार के जानदारों के लिए इस पर कोई स्थान ही न रहे। हाथी ससार में सरया में सबसे कम फैलनेशला जानवर समझा जाता है। कहते हैं, यह सौ वर्ष से अधिक जीता है और हथनी छ परस के बाद केवल एक उच्चा देती है। उम्र भर में एक जोड़े से लगभग दस बच्चे पैदा होते हैं। परन्तु डारविन ने हिसार लगारर देखा है कि अगर हाथी की मृत्यु न होती तो सात सौ चालीस वर के अन्दर हाथी के केवल एक जोडे से एक करोड़ पचास लास हाथी पैदा हो जाते। इसी एक उदाहरण से अनुमान लगाया जा सकता है कि मृत्यु न हाने पर यह पृथ्वी थोडे समय के लिए भी जीवन को सँभाल न सक्ती । जीवन का मूल्य सिर्फ मृत्यु से ही होता है। यदि सृष्टि के प्रारम्म से श्रान तक किसी मनुष्य और क्सिी पशु की ( क्योंकि यह तो असम्भव है कि मनुष्य न मरें और पशु मरते चले जायँ) कोई मृत्यु न होती तो श्रान जमीन का क्या हाल होता' बुढापे का जीवन कोई पसन्द नहीं करता। पचपन में वह रह नहीं सस्ता, क्योंकि हर एक के लिए स तान उत्पन्न करना भी श्रावश्यक होता है। फिर सके लिए यौवन से होवा? बाप, दादा, परदादा श्रादि अनेक पीढियों तय सर लोग जवान ही कैसे होते ?-~-यह एक और समस्या है।
ज्ञान की सापक्षता यू कुछ लोगा को भूचाल बहुत ही भयानक मालूम होते हैं। परतु वे यह भी भूल जाते हैं कि वही कारण, जा इस पृथ्वी को विभिन वस्तुएँ उत्पन करने के योग्य बनाता है, भूचाल भी पैदा करता है। प्रारम्भ में पृथ्वी श्राग के गोले के समान थी। समय गुज़रने पर ज्या-ज्यों उसमें गरमी कम होती गई त्यो त्या उसके ऊपर जीवन उत्पन्न होता गया। यन भी पृथ्वी की प्रान्तरिक आग के गोले की गरमी दिन प्रति दिन कम हो रही है। इससे पृथ्वी कहा न कहीं सिकुड़ती है जिससे कभी-कभी भूचाल आता है। भूचाल अधिक्तर ज्वालामुखी पहाड़ों के निकट पाते हैं। जर ज्वालामुसी का अस्तित्व मनुष्यों के लिए पयाप्त चेतावनी है कि वे इनसे बचकर रहें, यदि कोई मनुष्य जान बूझकर प्राग में पड़ना चाहे तो इश्वर उसको बचा नहीं सकता। राग द्वेष एक ही भाव के दर्ज है नेतिक ससार की भी यही हालत है । पलत राग द्वष साथ-साथ चलते हैं। किसी एक से प्रेम करना दूसरों से द्वेष रखना है। जो मनुष्य अपने बच्चो को ही प्यार करता है, यह दूसरो के बच्चों को उनमें बराबर कभी नहीं समझ सकता। जिन जातियो में देश भक्ति का भार बहुत ज्यादा होता है उनके लिए दूसरी जातियो से घृणा रसना श्रावश्यक हाता है। उनके अदर मानर प्रेम का भान नहीं उत्पन्न हो सकता । यही हाल सत्य और असत्य का है। कहा जा सकता है कि जो कुछ दिल में हो उसे प्रकट करना सत्य है और उसके विरुद्ध असत्य। निस्सन्देह यह बात ठीक है। परन्तु दिमाग की ननावट चुछ ऐसा उनी है कि रिभिन मनुष्यो के अन्दर एक ही बात पिभिन तरीका पर प्रकट हाती है।
मेरे अन्त समय के विचार एक मनुष्य व्याग्यान देता है। हर एक सुननेवाला उसे अपनी अपनी बुद्धि के अनुमार समझता, सयाल करता और पान करता है। यादमी जब दश प्रेम के प्रभार के अधीन होता है तो उसे सत्य का एक विशेष रूप दिखाई देता है। परन्तु वह मनुष्य जप भयभीत होता है तब सत्य के म्प को वह बिलकुल बदला हुआ पाता है। अमेरिका के दार्शनिक जेम्ज का दर्शन जो कृत्यसाधक्तावाद* के नाम से प्रसिद्ध है इसी सिद्धान्त पर आश्रित है कि निरुपाधि तथा शुद्ध सत्य को जानना बेहदा गयाल है। हर एक आदमी के सत्य का सयाल उसकी दिमागी हालत के अनुसार हुया करता है। जो नात एक मनुष्य को उसकी विशेष अपस्या में मन्तोष या प प्रदान कर सस्ती है वही उसके लिए सत्य है। इस दशन के अनुनार इस बात की कुछ परवा नहा कि सचमुच कोई ऐसी सत्ता है या नहीं जिसमा जनसाधारण ईश्वर का नाम देते हैं। केवल इतना ही पयाप्त है, क्योंकि ईश्वर का एक विचार उन लोगो को लाभ पहुंचाता है। इसलिए उनके वास्ते वह सत्य का महत्व रखता है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक ६६ मे इसी प्रकार का विचार प्रकट किया गया है-"जो अज्ञानी की रात है वह ज्ञानी का दिन है। मूर्य के लिए दिन जानी के लिए रात है।' * कृत्यसाधक्तावाद = Prigumatism (प्रैगमैटिज्म)। + निरुपाधि = Ah-olute (एन्मोजूट)।
चाया परिच्छेद अन्तिम तय पाह्य जगत् के भीतर आन्तरिक नस्य क्या है? मगरनीता के दूमर अध्याय के श्लार २६ में पहा गया है.-"कुछ लोग उसे श्राश्रय देगो, वृष प्राश्चय करते और उछ प्राश्यय सुनते हैं। परन्तु यह सर युद्ध करते हुए पोर उसे गनता नहीं।" छादोग्य उपनिषद ने यदे सुन्दर टॅग मे यह रहस्य गगला है-"यद सय रिगये सहार है ।' इसे प्रमरा दल परने का प्रयल किया गया है। एक अध्याय में उल्लेख पाता है कि राय के प्रारा से प्राणिया पा जावा चलता है और चोद ये प्रकाश से बनस्पतिया या। इस पारण शायद सूर्य और चाँद के सदार दा यह सारा जगत् चलता है। मत्यराम जय नान यी पोन में एक ऋषि के पास जाता है तो उसे बड़े लम्बे-चौड़े दृष्टान्त देकर कृषि बतलाते हैं-शायद यह अग्नि ही ना है तो सर कुछ दाम करती है। प्रागे चलकर कहा गया है-~शायद मह प्राण ही है जो सबको जलाता है, इसलिए प्राण ही ब्रहा है। श्तकेतु के विद्या समाप्त करने पर उनके पिता ने पूछा-"निस प्रकार मुट्ठी मर मिट्टी से सारी पृथ्वी का मान हा जाता है इस प्ररार कौन सा एक तत्व है निसो जानने से यह सर जाना जाता है?" जय श्वेतकेतु को इसा उत्तर समझ में न आया तब उद्दालक ने उसे समझाने के लिए कुछ देर प्यासा रगार मताप---यह पानी ही जीवन का सहारा है, यही है -- मेरे अन्त समय के विचार ब्रहा है। फिर कुछ देर के लिए भूसा रनकर बताया-यह अन ही जीवन का सहारा है और इसलिए यही ब्रहा है । जन इससे भी ठीक टीक समझ में न पाया, तर नमक और पानी के दृष्टान्त से समझाया- जैसे यह नमर पानी के अन्दर घुला हुआ है परन्तु दिग्वलाई नहा देता वैसे ही वह तत्त्व सबके अन्दर है परन्तु दिसलाई नहीं देता। मागे चलकर सनकुमार से नारद मुनि ने ब्रहा जानने की इच्छा प्रस्ट की। उसने बताया-~-वेद, अग्नि, सूर्य श्रादि सर उस एक ब्रह्म ही के चिह्न हैं। इन सबके द्वारा उसका ध्यान करो। अन्त में प्रजापति ने इन्द्र को बतलाया-मन, प्राण, वाणी-सबसे परे यह ब्रह्म है। उस ब्रह्म को भूमा कहते हैं, क्याकि सब कुछ उसके सहारे पर है, वह किसी के सहारे नहीं है। दर्शन क्या कहते हैं? न्याय श्रीर याग दर्शन तीन अन्तिम तत्वों को स्वीकार करते हैं। प्रकृति, आत्मा और ब्रहा । प्रकृति जड़-रूप है। जीवात्मा अल्पज्ञ है, पुण्य पाप करनेवाला और पल भोगनेवाला है। ब्रह्मा सार है, इन सरको रननेवाला और चलानेवाला है। सास्य दर्शन प्रकृति और पुरुष, दो अन्तिम तत्वों को ही पयास सम झता है जिनके पारस्परिक मेल से या सारा ससार चल रहा है । सारन्य को नहा पर पड़ी आपत्ति यह है-यह इस संसार को क्यों बनाता है। अपनी इच्छा से या मजबूर होकर ? यदि अपनी इच्छा से ऐसा करता है तो उसे क्या यावश्यक्ता थी? और यदि विवश हाकर ऐसा करता है तो वह परमात्मा ही नहीं रहता, क्याफि तर उसे विश करनेवाली कोई और शक्ति है। - अन्तिम तत्त्व वेदान्त दशन प्रकृति और पुरुष की जगह केवल एक ही तत्व यतलाता है। यह है ब्रह्म। प्रकृति नहा की शक्ति के प्रदशन का नाम है। बौद्ध दार्शनिक क्या मानते हैं ? चौद्ध दर्शन के अन्दर इस सिद्धान्त के सम्बध में तीन मत पाये जाते हैं-क्षणिकवाद, विज्ञानवाद और शून्यवाद । क्षणिकवाद के अनुसार यह ससार केवल पारेपर्तन का नाम है। हर एक चीज़ प्रतिक्षण बदलती रहती है, कोई भी वस्तु स्थिर नहीं । इसका एक दृष्टान्त नदी है। पानी की लहर और मिट्टी के किनारे को नदी रहते हैं। ये लहर और किनारा क्षण क्षण में बदलते रहते है। इसलिए परिपतन के प्रदर्शन को ही नदी का नाम दिया जाता है। इसी प्रकार दिये की ली है जिसमें प्रतिक्षण बत्ती और तेल पदलते रहते हैं। ससार का एक और उदाहरण श्रग्निचर है जिसमें लाड़ी के दोनों सिरों में भाग लगार उसको जोर से घुमाने पर अग्नि का एक चकर सावन जाता है। विज्ञानवाद सार बाह्य ससार का मन या कल्पना की उपज मानता है। (वाटलैंड के चक्ते और राम का मत विज्ञानवाद से मिलता है।) इसके अनुसार जो कुछ हम जानते हैं वे इद्रियों के द्वारा मन पर पड़े हुए सस्कार हैं। उदाहरणाथ एक मेज का ज्ञान हमारे लिए उसके रंग, ऊँचाइ, सख्ती, नरमी श्रादि से सीमित है। यह हमें छूने और देखने से प्राम होता है। वास्तव में मेज क्या है ?.--यह हम नहीं जानते। इसी प्रकार साप ससार उन सस्कारा का संग्रह कहा जा सकता है। सस्कार मन के द्वारा होते है इसलिए यह ससार मन की शक्ति से बना हुआ है।
मेरे अन्त समय के विचार .. . ब्रह्म है। फिर कुछ देर के लिए भूसा रसर पताया-यह अन्न ही जीवन का सहारा है और इसलिए यही, ब्रह्म है । जब इससे भी ठीक ठीक समझ में न पाया, तर नमर और पानी के दृष्टान्त से समझाया- जैसे यह नमक पानी के अन्दर घुला हुआ है परन्तु दिसलाई नहा दता वैसे ही वह तत्त्व सबके अन्दर है परन्तु दिग्नलाई नहीं देता ।" यागे चलकर सनकुमार से नारद मुनि ने ब्रा जानने की इच्छा प्रकट की। उसने बताया-- --वेद, अग्नि, सूर्य श्रादि सर उस एक ब्रह्म । के चिह्न हैं। इन सबके द्वारा उसमा ध्यान करो।- अन्त में प्रजापति ने इन्द्र को रतलाया--मन, प्राण, वाणी-सरसे परे वह ब्रह्म है। उस ब्रह्म को भूमा कहते हैं, क्योंकि सब कुछ उसक सहारे पर है, वह किसी के सहारे नहीं है। दर्शन क्या कहते हैं? न्याय और याग दर्शन तीन अन्तिम तत्वों को स्वीकार करते हैं प्रकृति, श्रात्मा और ब्रह्म। प्रकृति जड़ रूप है। जीवात्मा अल्पज्ञ है, पुण्य पाप करनेवाला और फल भोगनेवाला है। नहा सर्वग है, इन सरको रचनेवाला और चलानेवाला है। सास्य दर्शन प्रकृति और पुरुष, दो अन्तिम तत्त्वों को ही पयास सम भता है जिनके पारस्परिक मेल मे यह सारा ससार चल रहा है । सौल्य को ना पर बड़ी आपत्ति यह है--वह इस समार को क्यों बनाता है १ अपनी इच्छा से या मजबूर होकर ? यदि अपनी इच्छा से ऐसा करता है तो उसे क्या धारश्यकता थी? और यदि निरश होकर ऐसा करता है तो वह परमात्मा ही नहीं रता, क्याफि तर उसे विश करनेवाली कोई और शचि है।
शन्तिम तत्व वेदाच दशन प्राति और पुरुष की जगह कवन एप दी तत्व पटनाता है। यह है का प्रतिमा की शशि प्रदशन का नाम है। पौर दार्शनिक क्या मानते हैं? चौद्ध दशन से धन्दर इस सिद्धान्त के समय में वीन मत पाये जाते है- क्षणिकवाद, विशनगद और शत्यगद । क्षणिक माद ये अनुसार यह मगार काल परिपतन का नाम है। हर एक नीज प्रतिक्षण दलती रहती है, फोर मी घम्नु स्थिर नहीं। इसका एक दृष्टात दी है। पानी की लहर और मिट्टी के किनारे को नदी कहते हैं। ये लहर और किनारा क्षण तय में पदलते रहते हैं। इसलिए परिपता के प्रदर्शन को ही नदी का नाम दिया जाता है। इसी प्रकार दिये को ली है जिममें प्रतिनग पत्ती और तेल रदलते रहते हैं। ससार का एक और उदाहरण अग्नि-चत्र है जिसमें लाड़ी क दोनों सिरों में भाग लगाकर उसको जोर से घुमाने पर अग्नि का एक चकर सा उन जाता है। विशनगद मार नाह्य ससार यो मन या कल्पना की उपज मानता है। (लाटलेट के रक्तं और हम या मत विज्ञानराद से मिलता है। इसके अनुमार जो कुछ हम जानने है वे इन्द्रियों के द्वारा मन पर पड़े हुए सरकार है। उदाहरणाथ एक मेज़ का शान हमारे लिए उसके रंग, ऊँनाइ, सख्ती, नरमी श्रादि से सीमित है। यह हमें छूने और देखने से प्राम होता है। वास्तव में मेज़ क्या है ?--यह हम नहीं जानते। इसी प्रकार साय ससार उन सस्कारों का सग्रह कहा जा मस्ता है। सस्कार मन के द्वारा होते है इसलिए यह ससार मन की शक्ति से चना हुआ है। TH मेरे अन्त समय के विचार शून्यनाद का अभिप्राय यह है कि वास्तव में इस ससार का कोई अस्तित्व नहीं है। मन से इमकी कल्पना होती है । मन के न रम्ने पर क्ल्पना उड़ जाती है। बस, इससे मिन ससार कुछ नहीं है । पश्चिमी दार्शनिकों के मत जर्मन दाशनिका में सबसे बड़ा काट है जो दर्शन म अपना कदम श्रागे बढ़ाता है। इसरा मत है रि यद्यपि यह ससार केवल मस्कारों का ही सग्रह है परन्तु मन के अन्दर स्वयमेन कुछ सस्कार पैदा करने की शक्ति है। उन पर बाहर से कोई भी असर नहीं पड़ता। उदाहरणार्थ देश और माल का सस्कार हमारे मन में पाया जाता है। परन्तु देश और काल का अस्तित्व मन से बाहर कुछ नही है। काट सभी सस्कारों को मन के विभिन्न प्रकारों में गॉटता है। इसके अतिरिक्त न हम ससार को जान सकते हैं और न सासारिक मन को जो ब्रह्माण्ड के अन्दर काम करता है। ईगल और तरीके पर चलता है । वह कहता है कि एक गैर हस्ती, अथात् असत्य, है। दूसरा उसके मुकारले पर सत्य है। दोनो के मल से ससार बनता है । हेगल सत्य को एक प्रकार की निरुपाधि बुद्धि समझता है जिसका फैलार यह समस्त ससार है । फिरटे का मत है कि यह ससार अहकार से ही उनता है। शापनहावर, जो साख्य और उपनिषदा के दर्शन को पर्याप्त समझता है और अपनी पुस्तकों में बार-बार उनके उद्धरण देता है, सासारिक वामना -RAM * सासारिक मन - Cosme mind ( कास्मिक माइड)। 1 फिश्टे = Frhte 1 अहकार = Ego (गो)। $ सांसारिक यासना = Cosmic Will (कामिक विल)।
अन्तिम तय को ससार पा कारण समभता है। घह पौधों और जानवरो के उदाहरणों से सिद्ध करो का प्रयत्न करता है कि उन सबके अदर वासना विद्यमान है जो ससार को उत्पन रता है। इस मामना को नष्ट करने पर ही ससार का श्रन्न हो जाता है। इस बारे में भगवद्गीता क्या कहती है । भगवद्गीता के अध्याय १५ ये श्लोर १६, १७ और १८ में यहा गया है कि 'पुरुष दो हैं एक नाशवान् , दूसरा नाश-रहित । पुरुषोत्तम और है। वह इस ससार को थाम हुए है। यह मैं हूँ। इसलिए वेदा में मुझ पुरुषोत्तम सा गया है।" अध्याय ७ के श्लोर ५, ६ और ७ में यह रताया गया है--"अपरा श्रोर पग प्रतियाँ, दोनो, मेरी है। इन दोनों से समस्त ससार उत्पन्न होता है। इसलिए वास्तव में उसकी उत्पत्ति और विनाश मुझसे हा है। य सर पदाथ मेर गिद पसे पिगेय हुए हैं जेसे माला के धागे में मनरे। मुझसे अलग य कुछ नही " अध्याय ६ के श्लोक ४ मे कहा गया है-"मैं नव्यक्त है। मुभगे की यह सारा ससार पैला हुया है।" श्लोक ६ मे रतलाया गया है-niry श्रामाश में हवा चलती है वैसे भी मुभमें मारा सगार चला सास्य की श्रापत्ति का उत्तर भगवद्गीता क अयाय ५, माय... में आता है -"ब्रह्म इस ससार को इसन ना करता। २५ गत स्वभाव है जो लयमेर ाम करना चाहता है।" बोद्ध मतवाले आपत्ति करते हैं क्योरि "स मगार में कयान गुग्ण ही गुण दियाइ देते हैं इसलिए यह समा गुगा मे मिनकर या हुना है। गुणी को टूटने की ज़रूरत ही क्या है। गरगनायं ने इसका A ४६ मेरे श्रत समय के विचार खुदा को मनुष्य की श्रेणी में ले पाता है, मेरा मज़हर मनुष्य को उनति करते करते खुदा बनाता है। गुदा की मिहरवानी* पर भरासा रसना फज़ल है। केवल पुरुषार्थ ही हमें ध्येय तक ले नाता है। इस प्रकार मेरा मजहब जीवन के ममि उत्कर्ष का सिलसिला है। अन्तिम तत्त्व और प्राचीन दार्शनिक प्राचीन साल के दर्शनोत्ता भी इसी विचार पर या ठहरे। मिल में प्राचीन समय से घेदान्त का बीज विद्यमान रहा है। फेसागोरसा ने श्रार्य दशन की लहर को यूनान या ग्रीस में चलाया। श्राहयानिक मत ये दार्शनिक एनेक्सामेंढर ने यह शिक्षा पैलाई कि यह ससार ही ब्रहा है । इसी में बार-बार प्रलय और उत्पत्ति होती रहती है। एम्पोटालीज़ भी प्रकृति और पुरुष को एक मानता था । मध्य-युग में रोमन कैथोलिक चच और इस्लाम दोनो सेमेटिक या पैग़म्बरी मजहमा ने इस सिद्धान्त को दयाने में कोई कसर न छोड़ी। इन विचारों को रसने और इनका प्रचार करने के अपराध में गिनारदिनोब नो रोम में जिन्दा जलाया गया। शम्स तबरेज़ और मन्सूर इस्लाम में नत्र और धमान्धता के शिकार हुए । इस पर भी ईरान में अलगज़ाली तथा हाफिज और सीरिया में जलालुद्दीन स्मी इसी विचार के अन्दर मगन रहे और इसका प्रचार करते रहे। पारप के दर्शनोत्ता स्पिनोजा और गैरे, इसी विचार के रंग में रंगे हुए थे। * खुदा की मिहरवानी = Gince (ग्रेस)। फैमागारस = Pythagoras ( पाइथागोरस )} * श्राइयानिक मत = Ionic School (श्राइयानिक स्कूल)।
पाँचर्चा परिच्छेद -- सृष्टि-उत्पत्ति-देवी-विकास ससार में कार्य कारण का सिलसिला भगवद्गीता के अध्याय १० के श्लोक ८ में कहा गया है.-"सृष्टि मुझसे उत्पन्न हुई है।" अध्याय ६ का श्लोक १० कहता है-"मेरी यक्षता में चर और श्रचर सष्टि पैदा होती है ।" अध्याय १४ का श्लोक ३ बतलाता है-"मेरी योनि महत् ब्रह्म है। मैं उसमें चीज डालता हूँ और तर सब कुछ उत्पन्न होता है।' हम कोई नष्टा मार्ने या न माने, इस बात से तो किसी को इनकार नहीं हो सस्ता कि ससार में परिवतन या एक ही नियम काम करता है। बौद्ध लोग इसे क्म का नियम कहते हैं। हम इसे काय-कारण-सम्बध का नाम दे सकते हैं। ससार में कोई चीज़ अचानक या फेवल सयोगश नहीं होता। प्रत्युत हरएक चीज का पहले कोई कारण होता है, जिसका यह काय होती है। सूर्य का ताप कारण है। भाप की उत्पत्ति कार्य है। अब यह भाप उन यादलों का कारण है तो उसका कार्य हैं। फिर बादल कारण बन जाते हैं और परसात काय होती है। क्या कारण हो जाती । * फम का नियम-Law of cusation (ला श्राव् काज़ेशन)।
मेरे अन्त ममय के विचार ~ । है और यह अन्न उसका कार्य होता है, जिसमे प्राय सभी प्राणी पढते है। इस प्रकार यह सिलसिला चला जाता है । एक प्रसिद्ध प्रश्न है-बीज परले उत्पन्न हुअा या वृक्ष ? यह इस प्रकार हल होता है-"नीज कारण है यार कारण प्रकृति के साथ सदा विद्यमान रहता है ।", एक रत्ती सैकडो विभिन्न कारणों के होने से बनती है और उसके जलने पर कितने ही भिन्न परिणाम उत्पन्न होते हैं । छोटी से छोटी गति रड से बड़ा नतीजा पैदा कर सकती है। कारलाइल ने एक जगह कहा है--जब हम एक पत्थर उठाकर दूसरी जगह फेंकते हे तर इससे पृथ्वी का गुरुत्ववेन्द्र रदल जाता है । माद्दा और अन्तिम कारण-परमाणु हिन्दू शास्त्रों में कारणो के तीन प्रकार रतलाये गये हैं-उपादान, निमित्त अोर साधारण । घड़े का उपादान कारण मिट्टी है, निमित्त कारण कुम्हार और साधारण औजार वगैरह। ससार में जो कुछ हमें इन्द्रियगोचर होता है उस सर का उपादान कारण माद्दा या प्रकृति है । वैशेषिक दर्शन में प्रकृति के ईस तल तलाये गये हैं। कल के रसायनवि पहले ७२ तत्वों को मानते थ। परन्तु रेडियम के श्राविष्करण से रसायन शास्त्र में क्रान्ति आ गई है। अब यह सिद्ध हुधा है कि ये ७२ तच भी आगे ऐसे ही और ज्यादा नारीक जरों या कणों से बने हुए है जिससे एक तत्व के कण दूसरे तत्त्व के रूप में परिणत हो जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि वास्तव में माद्दा केवल * गुरुत्वकेंद्र=Centre of Gravity ( सेंटर प्रान् प्रविटी) । रसायन = रसायन शास्त्र - Chemstiz (कैमिस्ट्री)। +
सटि उत्पत्ति -देवी विकास
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ताप,
एक ही प्रशर य पणों से याहुना है। इन पणों को प्रणु* और
परमाणु कहा गया है। एर अणु का व्यास TEET इन्च और
एप परमाणु या इञ्च माना गया है। यह भी हिसार
लगाया गया है कि एक घनमूलीया इन्च वस्तु इधीस लाख पद्म
(२१०००००००००००००००००००००
) अणु पाये जाते हैं।
ताप, आयाज प्रादि शक्तियों का स्रोत एक है
भौतिक विज्ञान भी इसी परिणाम पर पहुंचता है कि विजली,
श्राराज, प्रकाश, चुम्यक्त्व श्रादि सभी प्राकृतिक शचियाँ एक दूसरी
में तनदील हो सकती है। ये सभी एक ही शचि से निकली हुई मानी
जा सकती हैं जिसे 'फोस' या 'एननी' रहा जाता है। यह फोस गति
का नाम है जो मादा के अन्दर काम करती है। यह गति प्राय कपन!!
के रूप में दिखाई दती है। हना के अन्दर गति होने से श्रावाज, ठोस
नीज़ा के अन्दर गति होने से ताप और सूर्य की किरणा की गति से चीजो
के रंग उनते हैं। जो यस्तु सूर्य की किरणा से उत्पन हुई लहरों को
अपने अन्दर जज्च कर लेती है यह काले रंग की और जो सभी लहरों को
पापम कर देती है यह सफेद रंग की दिसलाई देती है।
* अणु = Molecules (मालीक्यूल्ज)।
परमाणु = Atom (ऐटम)।
+घनमूलीय = Cubre (क्यूविक)।
भौतिक विज्ञान % Phy ice (फिजिक्स)।
॥ पन% Vibration ( पाइशन)।
४
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५० मेरे शन्त समय के विचार n हरनर्ट स्पसर कहता है कि माद्दा और वामन कमी अलग अलग नहीं रह सकते और यह समस्त ब्रह्माड इन दोनों के गुएन और विभाजन ' का पल है। श्राजकल यह पयाल ज्यादा ज़ोर पकड़ता जाता है कि मादा और तात, दोनो, वास्तव में एक ही है। अन्तर देवल इतना है कि कम्पन के बहुत ही तेज़ होने पर वह 'फोस' के रूप में और बहुत ही मन्द हो पर वह मादा के रूप में प्रकट होती है। भगवद्गीता और अव्यक्त ब्रह्म विनान वस्तुओं की बाह्य सोज में बाहर से चलकर अन्दर जाता है । दशन और मज़हर ब्रहाइ पी श्रावरिफ खोज करते हुए अन्तिम तत्वों पर श्राकर मिल जाते हैं। भगवद्गीता के अध्याय २ का श्लोक २८ कहता है-"हम वस्तुओं के श्रारम्भ और अन्त को नहीं जान सकते, केनल उनसी वीच की अवस्था को समझ सक्ते है।" इतना तो हमें स्पष्ट नजर आता है कि जड़ होने के कारण माद्दा अग्ला कुछ नहीं कर सकता और 'फोर्स' या ताकत पिना शान के प्रधी है। इसलिए भगवद्गीता के अध्याय ७ के लोक ५ और ६ में कहा गया है-'परा प्रकृति और अपर प्रकृति (अथात् माद्दा और ताकत) मुझसे सहारा लेकर चलती है।" अध्याय ७ के श्लोक २०, २१ और २२ में भी साफ कहा गया है-"इन तत्वों से परे एक और बड़ा अव्यक्त है जो कभी प्रकट नहा होता, परन्तु उससे सब कुछ प्रकट होता है।" अध्याय १५ के श्लोक १७ में उसे पुरुषोत्तम कहा गया है, जो दोनों पुरुषो, अर्थात् क्षर और अक्षर, से परे है और तीनों लोकों के अन्दर रहता हुश्रा उनको श्राश्रय देता है।
सृष्टि-उत्पत्ति-दैवा निरास अपर कहा गया है कि पुरुषोत्तम को जानना एक अोर रहा, हम प्रकृति की दोनों अवस्थात्रो, माद्दा और ताकत, की वास्तविक्ता को भी नहीं जान सकते। हाँ, इनके द्वारा पड़े हुए सस्कारों का ज्ञान हमें जरूर होता है। इन सस्कारों से ही हम इतना समझ सकते हैं कि इन शक्तियो वाला ब्रह्म है। प्राश्चय की बात है कि विभिन्न मजहमा से सम्बध रसनेवाले लोग माद्दा अथात् प्रकृति-सम्बधी ज्ञान से तो इतनी घृणा करते हे ओर जिस ब्रह्म का कोई ज्ञान सम्भव नहीं उसे रानगीर सा ग्रयाल र उसपे ज्ञान के इतने लम्बे-चौड़े दावे करते हैं। सृष्टि-उत्पत्ति में आदि विकास अध्याय १४ के श्लोक ४ और ५ म कहा गया है-"जो कोई पदाथ किसी रूप में प्रकट होता है, उसकी योनि महत् ब्रह्म है श्रार में उसमें बीज देनेवाला पिता हूँ।" प्रकृति के तीन गुण हैं-सत्त्व, रज और तम । गुण जीय को शरीर से बाँधते हैं । अध्याय १३ के श्लोक ५ और ६ में कहा गया है-"मूल प्रकृति (अव्यच), बुद्धि (महत्तत्त्व), अहकार, पाँच महत्तत्य, ग्यारह इन्द्रियों, पाँच सन्मानाएँ, इच्छा, द्वप, सुस, दुख, सघात, चेतना और साहस-ये सब प्रकृति के ही विकार हैं।" ससार में सबसे पुराना दर्शन जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति के लिए विकास के सिद्धान्त की शिक्षा दी गई है, साख्य है। उत्पत्ति शब्द ही, जो सृष्टि की पैदाइश के लिए प्रयुक्त होता है, विकास के शाब्दिक अथ को प्रस्ट करता है। उत्पत्ति का जो फम भगवद्गीता में दिया गया है, उस जैसा * विकास का सिद्धान्त-Theory of Evolution (थियरी श्राव एवोल्यूशन)।
५२ मेरे अन्त समय के विचार ही मनुस्मृति आदि तथा कई पुराणों में भी पाया जाता है। इसके अनु- सार बहा दो शक्तियों में प्रकट होता है। मनु ने कहा है-"अाधा ब्रह्म स्त्री बना।" सम्भव है, तौरेत में यादम की पसली से हवा का निम्लना मनु से लिया गया हो पुरुष और प्रकृति को कवित्वमय भाषा में पीज के रूप में नर और मादा कहा गया है। प्रकृति से महत्तच अर्थात् बुद्धि बनती है। इस बुद्धि को भगवद्गीता में योनि कहा गया है। मनुस्मृति में इसको हिरण्यगर्म अडा ताया गया है। इस महत्तव से अहकार उत्पन्न होता है। अहकार से विभिन्न प्रकार के भेद शुरू होते है। अहकार ही पृथात्व उत्पन करता है । - किसी जीव, उदाहरणार्थ चिउँटी, से भी यदि प्रश्न किया जाय कि संसार के दो हिस्से कौन से है तो वह यही उत्तर देगी --एक में और दूसरा शेष सारी दुनिया । अहकार मे सृष्टि के दो भाग हो जाते है-सह-इद्रिय और निरिंद्रय। इनमें से पहले भाग से पाँच शान इद्रियाँ तथा पॉच कर्म इन्द्रियाँ और दूसरे भाग से पाँच त माताएँ--पृथ्वी, जल, श्राकाश, अग्नि और वायु-रनती है। नाराश का गुण शब्द है। आकाश पदलकर हवा ननती है जिसका गुण स्पर्श है। इमसे तेज, जिमका गुण रूप है। तेन से पानी, जिसका गुण रस है। पानी से मिट्टी, जिसका गुण गन्ध है। इनमे से बाद में पानेवाले हर एक में एक एक गुण अधिक होता जाता है। इन पाँच में मन और बुद्धि मिलने से ये सात हो जाते हैं। इन सात तल्लो के मिलो मे समस्त सृष्टि वनती है। भगवद्गीता के अध्याय १० के श्लोक १६ में सात पिया, चार पूरजो और मनु की उत्पत्ति का उल्लेस है। यह किन्हीं विशेष व्यकियो , सृष्टि उत्पत्ति-देयी विकास मी तरफ इशारा नहीं मालूम होता। प्रत्युत, जैसा कि मामय उपनिषद् में लिखा है, सात ऋषियो का अर्थ सात इन्द्रियाँ , चार पूर्वजों का श्रय मन, चित्त, बुद्धि तथा प्रकार है और मनु का अर्थ है मनुष्य । इससे पहले और बाद के श्लोका में भी केवल गुणा का उल्लेख है व्यक्तियो पा नहीं। यह सक्षिप्त सा वृत्तान्त है जो हिन्दू शास्त्रों में प्रकृति के अन्दर श्रादि विकास का मिलता है। बाप्पारम्भमाद और श्रादि विकास वतमान विज्ञान की उनति हो जाने पर सृष्टि-उत्पत्ति का जो मत स्वीरार किया गया है, वह लैपलेस थोर काट या वाप्यारम्भवाद* है। यह मत स्पष्ट शब्दा में पाय-शास्त्रा के सिद्धान्त का ही वणन करता है। अन्तर इतना है कि इसमें ब्रह्म और पुरुष का कोई उल्लेख नहीं। यह फेवल प्रकृति से इस प्रकार शुरू होता है -मादा पहले पहल परमाणों सी चाप के रूप में था। (इस पाप को बुली कहा गया है। ) इस भाप में गति की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई जिससे यह ईथर अर्थात् श्राकाश में परिणत हो गई। 'फोस' या गति के रूप में प्रकट हो ईथर दो प्रकार का हो जाता है -~-एक केन्द्रिय, दूसरा महबरी । यह गति इतनी तेज होती है कि इसके कारण गैसवाली श्राग के दर्द डरड़े हलकों या * लैपलेस और काट का बाप्पारम्भवाद-Nebulan theory of Laplace and Kant (नेबुलर थियरी श्राव लैपलेस एड काट)। tan-Nebulz 1 ईथर-Ether d ५४ मेरे अन्त समय के विचार ८ मडली की शक्ल में बन जाते हैं। केन्द्र में सबसे बड़ा महल रहता है जिसकी स्थिति सूर्य की होती है। इसके इर्द गिर्द सभी दिशाओं में श्राग के गोलों के रूप में नभमहल उत्पन्न हो जाते है। इनमें से एक हमारी पृथ्वी है। धीरे धीरे ये महल अपना ताप बाहर निकालने पर ठढे होने शुरू हो जाते है। पहले तो तरल, फिर अधिक ठठे होने पर ऊपर से ठोस रूप ग्रहण करते है। ठोस होने के बाद ये इस योग्य होते है कि इन पर जीवन कायम रह सके। पृथ्वी के अान्तरिक भाग में अभी तक आग ही श्राग है। यदि पृथ्वी को एक हजार फुट नीचे खोदा जाय तो इसमें पानी को उबालनेवाला ताप होता है। सूर्य, पृथ्वी श्रादि से यह ताप दिन प्रतिदिन निगल रहा है। सूर्य की गरमी जब बहुत कम हो जायगी, वब पृथ्वी टुकडे टुकड़े होकर चकनाचूर हो जायगी। इसके बाद उसके अन्दर उत्पत्ति के उलटे वह प्रक्रिया शुरू होती है जिसे हिन्दू शास्त्रों में प्रलय कहा गया है । एक समय आता है जन समस्त ब्रह्माण्ड में ही यही प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसे महाप्रलय कहते है। इसका वर्णन मों किया गया है- चल और अचल सभी, नष्ट हो जाते है। गध को जब करके सर्वन जल ही जल हो जाता है। वर सबको अग्निः जन्म कर लेती है। इसमें सूय , मी छिप जाता है फिर हवा सको जज्न करती है। तर रूप नही रहता । फिर स्पर्श श्राकाश में मिल जाता है। शेष शल्द ही रह जाता है। शब्द को मन जन्न कर मन और बुद्धि को काल निगल जाता है और काल लय ब्रह्म में हो जाता है। लेता है। का १५ सृष्टि उत्पत्ति-देवी विकास ब्रह्माण्ड और निशान ब्रह्माण्ड के विषय में ज्यौविष, भूगम* श्रादि विद्याएँ कई बातें बतलाती हैं। यह सर्वमाय बात है कि प्रकाश की रफ्तार एक लास छियासी हजार मील प्रति सेरह है। सूर्य जमीन से इतना दूर है कि उसका प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने में श्राट मिनट लगते हैं। बुधा श्रादि कई ऐसे सितारे हैं जिनका प्रकाश पृथ्वी तक श्राने में कई दिनो का समय लग जाता है। श्रालया सेंटार वे सितारे हैं जिनका प्रकाश तीन वप के बाद पृथ्वी पर पहुंचता है। साइरस का प्रकाश बीस वर्ष के बाद और श्रामाशगङ्गा। का प्रकाश दो हजार वष के बाद पृथ्वी तक श्राता है। कुछ ऐसे नेत्रुली हैं जिनका प्रकाश उत्पत्ति-काल से चल रहा है परन्तु अभी तक पृथ्वी पर नहीं पहुंचा। इसी प्रकार भूगमविद्या का विद्वान् हक्सले लिसता है कि पृथ्वी की बनावट के अन्दर विभिन्न प्रकार की तहें पाई जाती हैं और उनमें से हर एक तह के बनने में कई युग लगे हैं। पृथ्वी के अन्दर एक तह कोयले की है जिसके बनने में साठ लाख वर्ष का समय लगा है। चाल्स लायल ने चाक की तहो की बनावट से अनुमान लगाया है कि पृथ्वी को वतमान * ज्यौतिष और भूगभ विद्या= Astronomy ind geology (ऐस्ट्रानेंमी एड जिपालजी)। + बुध= Mercurn (मारी) | 11741 BER=Alpli Centrur ६ साइरस-Cirrus श्राकाशगङ्गा = Milky way (मिल्की वे)।
५६ मेरे श्रन्त समय के विचार रूप में पाने के लिए बीस करोड़ वर्ष लगे होंगे। इससे पूर्व का हिसाब लगाने के लिए हमारे पास कोई साधन नहीं। इसके मुकारले पर हिन्दू ज्योतिष शास्त्र सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय के काल का स्टा-उया एक हिसार हमारे सामने रखता है। । ब्रह्माण्ड और भगवद्गीता भगवद्गीता के अध्याय ८ के श्लोक १६, १७, १८ और १६ में ब्रहारानि और ब्रह्मदिन को एहजार युगों का बताया गया है। ब्रह्म लोक अव्यक्त रात से निकल एक हजार वर्ष तक दिन की हालत में रहकर प्रलय को प्रास हो जाता है श्लोक ०३ और २४ में दक्षि गायन और उत्तरायण में मरने का उल्लेख है । उपमा के तौर पर वे केरल ज्ञान और ज्ञान की अवस्थाओं की अोर सक्त करते हैं। दक्षिणायन और उत्तरायण से युगों की गिनती शुरू होती है। ज्योतिष शास्त्र में सृष्टि के दिनरात का हिसार इस प्रकार लगाया छ मास का उत्तरायण अथात् देव का एक दिन और छ मास का दक्षिणायन अर्थात् देव की एक रानि कहलाते है। इस तरह के ३६० दिन और रात के मिलने से देव का एक वर्ष बनता है। ऐसे ४४०० देव-धपों का सत्ययुग, ३३०. देव प्रपों का त्रेता, २२०० देव-वयाँ का द्वापर और ११०० देव-वर्षों का कलियुग होता है। १२००० देव-वधा का एक महायुग होता है, ७१ महायुगा का एक मन्वतर और १४ मन्वतरों का एक कल्प होता है जिसमें सृष्टि का प्राधा काल गुज़र जाता है। गया है सष्टि उत्पत्ति-देवी विकास १७ जीवन के चिह्न और प्रकृति रसाया शास्त्र विभिन्न वस्तुशा को सजीर श्रोर निर्जीव* भागा में नॉटता है। सनीव माद्दा में विशेषतया कबन या अश अधिक एव पेचीदा मिश्रणो मे पाया जाता है। योरप के विद्वानों को जीवन का बीज हँढने के लिए बड़ा प्राश्चय हो रहा है। जहाँ तक सजीर माद्दा का सम्बध है, उसकी उत्पत्ति एव मिा उनति की रात विकास के सिद्धान्त के अनुसार सष्टवया बताई जा चुरी है। श्रर यह मालूम करना की है कि जीवन का श्रारम्भ क्यार और कहाँ से होता है। यह समस्या अभी तर हल करने योग्य समझी जाती है, यद्यपि सर जगदीशचन्द्र सु के अन्वेषरा ने इस प्रश्न पर रहुत प्रकाश डाला है। उहोंने प्रयोगा के द्वारा यह सिद्ध परो का प्रयत्न किया कि जीवन वल सजीव माद्दा में ही विशेषतया प्रकट नहीं होता, बल्कि निजीय माद्दा प्रथात् सनिज पदार्थों के अन्दर भी यह चैसी ही अवस्था में पाया जाता है। जीवन में बह चिह्न 'बाह्य वस्तुयो से प्रभाषित होना। और श्राक्षण, तथा दप या निराकरण गातुत्रों के अन्दर भी वैसे ही पाये जाते हैं। कुछ विशेष धातुएँ मदा यास शस्ल के सटिका|| में ही पाई जाती है। उन धातुश्री की पहचान की जाती है। जन उनको मार दिया जाय तब * समीर और निनाव%Organic and inorganic (श्रार गैनिक एड मनग्रारगैनिक)। ह्य वस्तुया से प्रभावित होना=Response (रिस्पास)। अारपण= Attraction ( ऐट्रेक्शन ) । द्विप या निराकरण - Repulsion ( रिपल्शन ) ! | सटिर=Crystal (क्रिस्टल)। इन स्परिकों से 3D ५८ मरे अन्त समय के विचार वैसे स्फटिक नहीं बनते। अम्लजन और श्राजन गैसों में, जिनके मेल से पानी बनता है, पारस्परिक श्राफर्षण उसी प्रकार है, जिस प्रकार नर के शुभ श्रोर मादा के रजा में होता है। कुछ निर्जीव मूलतत्व प्रापस में मेल करते हैं। परन्तु जर कहीं इनको अपना अाकर्षण रखनेवाला मित्र मिल जाता है, तब ये अपने अस्थायी या तात्कालिक साथी को छोड़कर तुरन्त असली मित्र से जा मिलते हैं। श्राकर्षण और निराकरण के ये गुण प्रारम्भिक परमाणुश्रा में केन्द्रीय और महबरी गर्दिश के कारण एक तरफ खीचते और दूसरी तरफ हटाते हैं। पशुश्रा में श्राकर यही गुण रागद्वप के रूप में प्रस्ट होते है। जीवन के लक्षण में उन्नति हिन्दू शास्त्रों में जीन के लक्षण राग, द्वप, सुस, दुरा, इच्छा और प्रयत्न बताये गये हैं। जीन जीवन या जिन्दगी के अथ में समझना चाहिए। जीन विद्या के जाननेवालों ने भी जीवन के लक्षण प्राय ऐसे ही किये हैं। जीवन का पीज प्रकृति के अन्दर पुरुष बनकर प्रारम्भ से ही हर एक सजीव वस्तु में विद्यमान होता है और उसकी भावी उन्नति बाह्य और श्रान्तरिक परिस्थिति पर निर्भर होती है । प्रभावित होकर हर एक सजीव वस्तु को आन्तरिक रूप से अपने आपको उसके अनुकूल बनाना पड़ता है। विशेष सस्कारा द्वारा बार-बार प्रभावित होने से वे विशेष शक्तियां उत्पन्न होती हैं, जिनको इद्रियों कहा जाता नाह्य सस्कारो से * शुन-Sperm ( स्पर्म)। + रज-Orum (श्रोवम) जीव विद्या= Biology (बाइबालोजी)।
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छठा परिच्छेद भौतिक स्मृष्टि वृक्ष और बीज ऋषि उद्दाला ने अपने बेटे श्वेतकेतु से कहा-"बड़ का एक चीन ले श्रा।" यह ले श्राया। फिर कहा-"इसको चोदो श्रोर देखो समें क्या है।" उसने तोड़कर देसने से याद जवार दिया--"इसमें श्रसस्य नन्हे-नहे पीज है।" उसके अन्दर से एक ना सा चीन उठाकर उद्दालक ने कहा-"देखो, इसमें क्या नज़र आता है।" श्वेतकेतु बोला--"बस, इस चीज के अतिरिक्त धीर कुछ नज़र नहीं पाता।" इस पर ऋषि उद्दालक ने कहा- "जिसके अन्दर तुमको कुछ दिसाई नहीं देता यहाँ पर यह का एक बड़ा वृक्ष है। इसी नन्हे बीज के अदर वृक्ष का तना, शाखाएँ, पत्ते और फ्ल पैदा करने का सामान विद्यमान है।" एक और उदाहरण लेकर देखिए। एक बड़ा सुन्दर नगर है । उसके अन्दर बड़े शानदार महल, मकान और हवेलियाँ हैं। ये सत्र क्सिसे बने हैं। ईट, चूने प्रोर पत्थर से। ईट, चूना और पत्थर क्या है ? ये सब प्राय रत के कणों से मिलकर बनते हैं। अन्त में ये क्ण या ज़र हैं जिनके मेल से इतनी बड़ी विभिन्नताओं का प्रदर्शन इस नगर के रूप में होता है।
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मेरे श्रत समय के विचार कहा जाता है कि मेंढको के शरीर के सूरो हुए टुकडे मिट्टी में पड़े रहते हैं योर परसात में फिर उन टुकड़ों से ही मेंढक उत्पन हो जाते हैं। यह तो सृष्टि के विभाजन का एक पुराना मोटा सा तरीका है। वर्तमान कार में डारविन को निस्सन्देह जीवन विद्या का प्रवर्तक समझना चाहिए । उसने अपने अनुमन और प्रयोगों से सभी जातियो का, निमास के द्वारा, धीरे धीरे एक ही जाति से उत्पन्न होना सिद्ध किया है । इस सिद्धान्त की झलक पतञ्जलि के योग-दर्शन (कैरल्यपाद २) में भी मिलती है-"जात्य न्तरपरिणाम प्रकृत्यापूरात्" प्रकृति को अपने अन्दर जज्ब करने से एक जाति दूसरी में बदल जाती है। इसका अर्थ यह है कि पाह्य सस्कारों से प्रभावित होकर विकास के द्वारा जाति उन्नति करती है। इस प्रकार अपने अन्दर प्रकृति के गुण एकत्र करता हुअा अमीरा एक दिन देवता बन सकता है । यदि हमें सयाल रहे कि श्रारम्भ में मनुष्य से केरल कुछ थावाज़ निकलीं जिनके, बाद में, निशान पर सकेत बनाये गये तो एक जीवन कोश से सृष्टि का होना अासान मालूम होगा। इन्हीं कुछ श्रावाजों के इक्छा होने से शब्द, शब्दी से भाषा और एक भाषा से हजारों भाषाएँ उत्पन्न हो गई। इसी प्रकार प्रारम्भ में दस तक गिनती बनी। इन दस अका के आधार पर ही गणित के लम्बे चौडे और पेचीदा नियम बने हैं। डारविन का सिद्धान्त हारचिन ने मालूम किया कि इस विकास के अन्तस्तल में एक अन्य सिद्धान्त काम करता है, जिसे योग्यतम अवशेषां रहना चाहिए। योग्य * जाति %Species (पीशीज़)। योग्यतम अशेष- Survival of the fittest (सरवाइवल श्राव दि फिटेस्ट)।
भौविस सहि ६७ या प्रर्थ यह न समझना चाहिए कि यह जरूर अशा ही हो माल्य यह कि वह अपो अन्दर इद गिर्द की परिस्थिति के साथ अघिर चालवा पैदा कर मरे। पाय परिस्थिति दो प्रकार की होती है-अनुपल और प्रतिकूल । "अनुकूल परिस्थिति को प्रपो लाम के लिए इस्तेमाल करना पौर प्रतिाल परिस्थिति से अपने पचार या प्रयत्न करना, जीरन बनाये ग्यो के लिए प्रारश्यक है। या भी यह स्वाभाविक पात है मिश्रल परिस्थिति के अन्दर रहने से हर एक जानदार मुग अनुमर करता है और प्रतिकूल परिस्थिति के अन्दर रहते से दुस। इसी कारण पहरो के लिए गग श्रीर दूसर के लिए दूप पढ़ जाता है। इसी प्रकार अपने श्रार को जीवित रखने के लिए हर एक प्राणी को दूसरा के मुकाबले पर सघर करना पड़ता है। इसी सघयकाल में एक जाति पे श्रन्दर भद उत्पन हा जाते हैं और नई जाति की नींव पड़ जाती है। इससे निपल का विनाश होता है और बलवान् की उनति । उदारणाथ, हिरना को चलवान् पशुओं के शिकार हा जाने का भय रहता है। स्वभावत तेज़ भागने में ही उनका बचार हाता है। चयन नियम के अनुसार केल यही हिरन यच सकते हैं, जिनमें अधिक तेज भागने की योग्यता होती है। ऐसे हिरना की नस्ल पागे उन्नति करती है। इसी प्रकार जहाँ अधिक सर्दी पड़ती है वहाँ लम्बी लम्बी पशम वाले जानपरा की नस्ल उन्नति कर सकती है, अन्य जानवर सर्दी से जल्दी मर जाते हैं। झाड़ियों, पौधा और वृक्षा में रहनेवाले यही पतगे उन्नति कर सकते हैं, जिनके रंग में पत्तों से अधिक समानता होती है क्योंकि पहचान नाफर वेश्य * चयन नियम=DLar of Selection (लॉ श्राव् सिलेक्शन )।
६८ मेर अन्त समय के विचार जानवरों के शिकार नहीं होते। समझदार प्राणियों की अवस्था में वहीं अधिक उन्नति करेंगे जो अपनी बुद्धि से अपने आपको इद गिद की परिस्थिति के अनुकूल बना सकेंगे। मानव जाति तक पाने में कितना समय लगा इस प्रकार विभिन्न जातियाँ विकास और चयन के नियमो के अनुसार उन्नति करते-करते मानव जाति उत्पन्न करती हैं। इस विकास के उदा हरण हम अपने सामने मनुष्य की बनाई हुई चीज़ो, घड़ी, मोटर, साइक्लि अादि के अन्दर पाते हैं। वर्तमान काल की घड़ी को पूर्ण होते लगभग तीन सौ वर्ष का समय लगा है। इन तीन सौ सालो में यह कई प्रकार की शकलों से होकर गुजरी है। लकड़ी के सिलोनों से शुरू होकर सैकड़ों प्रकार की साइकिलों की क्रमश उन्नति का परिणाम वतमान साइ- किल है। अन यदि उन बीच की अवस्थाओं का पता लगाने का प्रयन किया जाय तो किसी दूकान से वे पुराने नमूने नहीं मिल सकते । इसी प्रकार प्रकृति भी उन नमूर्ना को, जो उसके काम नहीं पाते, एक तरफ फेंकता जाती है। पुरातत्त्व विद्या* से हमें इस विषय में बड़ी सहायता मिलती है। पुरानी हड्डियों की खोज से मालूम हुआ है कि इस पृथ्वी पर तीन प्रकार के बड़े पशुयों को कितना समय लगा है। पहला युग मछलियों का गिना जाता है। इसकी आयु तीन करोड़ चालीस लास वर्ष बताई जाती है। इस काल में पृथ्वी पर केवल मछलियों ही रिद्यमान थी। इसके पश्चात् दूसरा काल रेंगनेवाले जानवरो का है जिनकी आयु का अनुमान एक करोड़ दस लास वर्ष लगाया गया है। इसके पीत जाने पुरातत्व विद्या= Archeology (पारकेवालोजी) ।
भौतिक सृष्टि ६६ पर वतमान काल दूध पिलानेवाले जानवरा का है जिसकी आयु के तीस लास साल अब तक गुजर चुके हैं। इनसे भी पूर्व दो युग हड्डी रहित प्राणियों के गुजरे हैं। इनकी श्रायु का अनुमान किसी प्रकार नहीं लग सका। इन प्राणियों में पहले एक जीवन-कोशवाले और बाद में इनके अतिरिक्त एक से अधिक जीवन कोशोवाले जानदार थे। उन विभिन्न योनिया की सस्या, जिनमें से पशु-जीवन गुजरा है, गिनी नहीं जा सकती। जीवन विद्या का विद्वान् हैक्ल अपनी पुस्तक 'लॉस्टलिंक' में लिग्नता है कि जीवन के प्रारम्भ होने से मनुष्य तक पहुंचने में छप्पन लाप तिहत्तर हजार योनियाँ होती हैं जो लुस हो चुकी हैं या इस समय जीवित हैं। अचम्भे की बात है कि पुराणों में भी ऐसा ही पिचार पाया जाता है कि जीव को मनुष्य योनि प्राप्त करने तक चौरासी लाख योनिया में से गुज़रना पड़ता है। मनुष्य और ब्रह्माण्ड विकास के सिद्धान्त पर कुछ लोग इसलिए हँसते हैं कि मनुष्य से निचली योनि बन्दर है अथात् एक दृष्टि से मनुष्य उन्दर की सतति हुया। सच तो यह है कि इस तथ्य से घराने की कोई बात नहीं है। सृष्टि के भारम्भ से उन परमाणयों मे विकास का सिद्धात काम करता है जिनसे समस्त ब्रह्माण्ड बनता है। यदि वही नियम प्राणिया के अन्दर काम करते हुए नई नई जातियाँ उत्पन्न करे तो इसमें श्राश्चय ही क्या है ! वहशा मनुष्या के कई ऐसे जगली कबीले अब भी पाये जाते हैं जिनका ऊँची किस्म के बन्दर से भेद करना मुश्स्लि है। चीन और हिमालय के पीच में जो जगल हैं, उनमें ऐसी शक्ल के जानवर जो मनुष्य और बदर, * लॉस्ट लिंक=Lost Link ७० मेरे अन्त समय के विचार दानो, से समता रसते है। हाल ही में जावा में एक पुरानी नसल की हड्डियाँ मिली हैं जिनको वैज्ञानिका ने पूछ-रहित पदरों के पजर समझकर मनुष्य और चन्दर को मिलानेवाली जाति ठहराया है। चन्दर से उत्पननसल कहलाने में हम जो शरम महसूस करते है वह रिलकुल दूर गे जाय यदि हम अपने श्रारम्भ का ध्यान करें। यह शुज* या नर-बीज क्या होता है जिससे हम बनते हैं ? और, फिर नर मास में उसके अन्दर कैसे कैसे परिवर्तन होते हैं। खयाल किया जाता है कि इस नन मास के समय के अन्दर उस नर पीज को उन सभी अवस्थाश्रो में से गुजरना पड़ता है जिनसे एक जीवन कोश को मनुष्य के दर्ज तक पहुँचने में गुजरना पड़ता है । गर्भ विज्ञान के अध्ययन से मालूम होता है कि मनुष्य, सबर, कुत्ते और सरगोश के बच्चों की उन्नति माता के पेट में बहुत समय तक एक ही ढग पर होती है, बल्कि कई मास तक उनका रूप एक दूसरे जैसा होता है। इसके पश्चात् भेद शुरू होता है । सृष्टि के विकाम का सिद्धान्त हमें यह सिखलाता है, कि मनुष्य कोई खास तौर पर पैदा की हुई अलग हस्ती नहीं है, बल्कि यह ब्रह्माण्ड का वैसा ही एक टुकड़ा है जैसा कि एक पर- माए । ब्रह्माड के साथ सच्चा भ्रातृ-भाव इसी शिक्षा से उत्पन हो सकता है। शान कहाँ होता है? एक बड़ा सवाल है-अहट, मैं हूँ, का ज्ञान क्सिमा होता है ? क्या ज्ञान मस्तिष्क में होता है जो स्त्रय मास का एक लोथड़ा है ? मानव शरीर • शुन%DSperm (स्पर्म)| f गर्भ विज्ञान = Embryology (एम्नियालोजी) श्रह = Ego (ई)।
भौतिक सृष्टि ७३ अथात् पुरुष की व्यक्तिगत चेतनता है। यही चेतना प्रकृति की विभिन्न अवस्थानों में बदलती हुई अपने विशेष उद्देश को पूर्ण कर रही है । यह उद्देश वही है जो पानी की उस बूद का है जो चाहे मादलों के द्वारा और चाहे भूमि के अन्दर मे होकर समुद्र तक पहुँचने के प्रयत्न में लगी होती है। इसे श्रावागमन कहा गया है। श्रात्मा का श्रावागमन रेग्नागणित में बताया जाता है कि पिदु पोर रेखा काल्पनिक बातें हैं। वे कुछ चीज नहीं हैं, परन्तु उनका ऐसा अस्तित्व है कि उस पर समस्त गणित अवलम्बित है। अफलातून कहता है कि यह केवल विचार है जो एक शरीर को छोडकर दूसरे में जाता है । शापनहावर का मत है कि केवल वामना, शरीर नदलती है। बौद्धमत इसे कम रहता है जो अपने इर्दगिर्द इन्द्रियो का सूक्ष्म शरीर एकत्र कर लेता है। यह सूक्ष्म शरीर एक दूसरा स्थूल शरीर धारण करता है। सैद्धा के विचार में कर्म का अन्त ही निवाण या मुक्ति है। बौद्ध मतवाले आवागमन का बड़ा दृष्टान्त बगूला देते। हवा के अन्दर गति एक विशेष रूप धारण करके अपने इद गिद मिट्टी के कण जमा कर लेती है। इससे उसका विशेष श्राकार जाता है। जब यह गूला एक जगह खतम हो जाता है तब यही दूसरे स्थान में जारर नया शरीर धारण करती है । श्राज क्ल के सता = Individual Con-ciousness (इडि श्राइडिया)। पासना = Will (विल)।
७२ मेरे अन्त समय के विचार शान है, परन्तु शरीर के श्रान्तरिक श्रमा के काम करने का सास पता हमें एछ नहीं। भगवद्गीता के अध्याय १३ के श्लोक ५ और ६ में कहा गया है-"ये विकार-परिवर्तन-क्षेत्र, श्रथात् शरीर, में उत्पन्न होने हैं।" यह सत्य का एक पहलू है। वास्तविक साल जहाँ का तहाँ ही रह गया-क्या शान मस्तिष्क में होता है, जो स्वय मास का एक लोथड़ा है। जड प्रकृते और ज्ञान वर्तमान विज्ञान तो इस बात को ही पर्याप्त समझता है कि माद्दा, प्रकृति, उन्नति करता है और ये सब परिश्तन माद्दा के अन्दर ही उत्पन होते हैं। परन्तु आयशास्त्र इसके मुकारले पर यह मानते हैं कि ज्ञान मस्तिष्क में नहीं हो सकता। जाननेवाले को अपने स्वरूप का ज्ञान होना असम्भर है। वैसे ही जैसे श्राप अपने श्रापको देस नहीं सकती। यह पुरुष है जो चेतन रूप में बैठकर प्रकृति के अन्दर सभी परिवर्तन उत्पन्न करता और उनका तमाशा देखता है। भगवद्गीता के अध्याय १३ के श्लोक २१ में कहा गया है-"यह पुरुष है जो प्रकृति के इन गुणों का निरीक्षण करता है। पुरुष का इन गुणों में बंध जाना ही उसके जम मरण का कारण होता है।" विकास-क्रम के अन्दर यदि प्रकृति के साथ पुरुष को काम करता हुश्रा माना जाय तो यह प्रम एक प्रकार का श्रामिक विकास हो जाता है, जिसमें प्रकृति विभिन्न रूप धारण करती है। ये सब श्रात्मा की उन्नति की विभिन्न सीढिया होती हैं, जिनके द्वारा मनुष्य जीवन को बहुत ही निचली अवस्था से शुरू होकर ऊँची अवस्था तक जा पहुँ चता है। स्वामी शङ्कराचार्य यह मानते हैं कि जिस वस्तु में अहङ्कार, में का हाना, पाया जाता है वह प्रकृति के अन्दर एव सर्वव्यापक शक्ति, भौतिक सुष्टि । यह ससार न था तय मी में मौजूद था। जर यह दम न था तब भी मैं मौजूद था। मैं बहुत पुराना प्रेमी हूँ। मैं हमीर, शान, या यादशाह रहा हूँ, वरीक्त का पीर और शरत्र का शहर भी । मैं तो पुराना प्रेमी हूँ।) श्रानागमन और भगवद्गीता भगवद्गीता के अध्याय १४ के श्लोक ५ में कहा गया है -"प्रकृति के गुण, सा, रज और तम, जीप को शरार के साथ बाँध देते हैं।" अध्याय १५ के श्लोक ७,८और १० में बताया गया है-"जीव लोक में मेरा ही नश जीप के अलग रूप में अपने नारा पोर इद्रिया एकत्र करके प्रकृति के अन्दर हरक्त करता है, और, जब यह शरीर छोड़ता है वब डामो साथ लेकर इस प्रकार चला जाता है जिस प्रकार हवा फूला में से मुगध लेकर चली जाती है। प्रशानी लोग इसक याने जाने या प्रकृति के गुणा में पँसने को नहीं देस सस्ते, यह तो केवल शानियों को नज़र आता है।" अध्याय २ के श्लोक १३ में बताया गया है-"जीर को इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा पाते हैं। मृत्यु के बाद उसे नया शरीर मिल जाता है।" आगे चलकर श्लोक २२ में कहा गया है-कपड़ों के पट जाने पर मनुष्य उहें उतार देता है। एसे ही जीप एक शरीर को छोड़ दूसय धारण कर लेता है।" अध्याय ६ के श्लोक ४१,४२ और ४३, श्रध्याय ७ का श्लोक १६ और अध्याय = के श्लोक २५ आदि भी श्रावागमन का वणन करते है। यहाँ प्रश्न उठता है-पुरुष प्रकृति में क्यो श्रा फंसता है ? पात पर है कि प्रकृति और पुरुष, दोनो, काय कारण की तरह लाज़िम और मन्न जूम हैं, ये एक दूसरे से अलग नहीं रह सक्ते। भगवदगीता में इन
मेर श्रन्त ममय ये विचार
श्राविकारों में वार का तारा उदाहरण इस सिद्धान्त को स्पष्ट पता
है। हजारों मीलों के अन्तर पर दो स्थानों पर श्रीज़ार रस्मे हैं। श्रापाज
एक जगह की जाती है परन्तु ईथर के द्वारा उमी क्षण यह दूसर म्यान में
जा मुनाई देती है। इसी प्रकार जर विशेष प्रकार के गुण एक स्थान का
छोड़ते हैं तब उस समय प्राने योग्य दूसर औज़ार या शरीर में जा प्रवेश
करते हैं। मौलाना रूम ने कहा है-"हमची सब्ज़ा चारहा रोयदा श्रम,"
( वनस्पतियों के समान में कई बार उत्पन हुअा हूँ)। शम्सुल तरेज़
रहता है-
चन्दा हजारासाल शुद कालिबम रा साखतन्द
ई कालिये जुजबी मा मन नाशिक देगना श्रम ।
वानून दरकश्ती चुदम वायूमुफ श्रदर बैद चाह,
श्रन्दर दम ईसा दम मन आशिके देरी। श्रम।
श्रादमन धूद मन उदम यालम न बुद 7 मन उदम,
ई दम न यूद व मन बुदम मन पाशित देरीना अम ।
शाहे एकीकृत बुदा अम पीर तरीक़त बूदा श्रम,
शहर शरीअत चूदा श्रम मन प्राशिके देरीना श्रम ।
( कई हजार
हुए, उन्होंने ( प्रकृति ने ) मेरे शरीर को बनाया।
मेरा पृथक् हुया शरीर मत देखो। मैं प्राचीन काल का नाशिक, प्रेमी
नूर के साथ मैं उसकी नार में था। मैं युसफ के साथ कुएँ
में
कैद था। मैं ईसा के दम के अन्दर विद्यमान था। में
बहुत पुराना
प्रेमी हूँ। जर श्रादम भी उत्पन्न न हुआ था तब मै मोजूद था।
* तार का तार = Wneless (वायरलेस)।
जर
भौतिक मृष्टि ७७ प्रमाण मिलता है। बाणों की शय्या पर लेटे हुए वे उपदंश कर रहे थे- "जिस सभा में अन्याय हो उससे धमात्मा को उठ जाना चाहिए।" इस पर प्रश्न किया गया -"द्रौपदी के अपमान के समय श्राप उस सभा में क्यों बैठे रहे है. इसके उत्तर में उन्होने स्पष्टतया स्वीकार किया-पाप के अन्न ने उस समय मेरी प्रात्मा को मलिन कर रक्खा था।" मनुष्य में परिवर्तन कुछ श्रादमी भगवद्गीवार पर यो हँसी उड़ाते हैं-"अादमी सारी उमर पाप करता रहे और अन्त समय में पहुँचकर परमात्मा का ध्यान कर ले। यह तो मुक्ति का बड़ा श्रासान तरीका है।" यह बात समझी की है। पर सम्भव नहीं कि जिस मनुष्य का मन सारी उमर विशेष विचारो में फंसा रहा हो वह अन्वकाल में पहुँचकर अचानक परमात्मा की ओर चला जाय। इसके विपरीत उस समय तो बार-बार वही गावे दुख के साथ मन में पाती हैं जिनमें दिल सदा लगा रहा हो। जिन लोगों ने किसी मनुष्य को मरते देखा है, उन्होंने यह अनुभव किया होगा कि क्सि प्रकार प्राण त्याग करते समय आदमी उही बातों का ध्यान करता और मुख से उसी प्रकार के शब्द या वाक्य बड़बड़ाता है जो उसके मन में सदा रहे थे। मनुष्यो के अदर, उनके जीते जी भी, अचानक परिवर्तनों के जा उदाहरण मिलते हैं वे केवल प्रकट रूप में वैसे होते हैं, वास्तव में नहीं । यद्यपि वाल्मीकि पहली उमर में डाकू था, परन्तु उस समय भी वह अपने माता पिता श्रादि सम्बधियो को मुख देने के लिए डाके डाला करता था। * श्रध्याय ८, श्लोक ५।
मेरे ग्रन्त समय के विचार उसरा प्रयोजन उस समय भी एक प्रकार से दूसरो का भला था जो ऋषि बन जाने पर उसके अन्दर दूसरे रूप में प्रकट हुश्रा। प्राट कार्यों से ही मनुष्य की वास्तविकता नहीं मालूम होती । यह तो उसकी श्रद्धा में पाई जाती है । शुरू शुरू में औरङ्गज़ब शगब बहुत पीता था और विलास प्रिय भी था। गद्दी मिलते ही यह पडा परहेजदार बन गया। वास्तव में नात यह यी कि जपानी चढते ही उसके अन्दर यह इच्छा प्रबल हुई कि उसे गद्दी मिल जाय। अपने पिता की मजलिसो में सरप्रिय बनने के लिए वह समा के नियमों पर चलता था । बाद में उसका उद्देश उस मजहबी दल को खुश करना और मजबूत बनाना था, जिसने उसे गद्दी प्राप्त करने में सहायता दी थी। इसी प्रकार बन्दा, लछमनदास. नैरागी साधु से एक रहे सेनानायक बन गये। यही नहीं, उन्होंने पञ्जान का इतिहास बिलकुल और ही बना दिया होता यदि लाहौर के पास बागवानपुरा की लड़ाई में पाँच हजार तत्लालसा सिक्ख उनका साथ छोड़कर लाहार के मुसलमान शासक के साथ न जा मिले होते । इस प्रसिद्ध राष्ट्र-नायक की यदि श्रान्तरिक अवस्था को देखा जाय तो मालूम होगा कि बाद में भी उसका दिल वही था जिसने यौनन म हिरनी का शिकार करके उसका पेट चीय था। हिरनी के पेट से जीवित बच्चा निक्लने पर उहें इतना दुस हुअा कि उह ससार से ही 'हा गई। फिर जब गुरु गोविन्दसिंह ने इन्ही वैरागी । की करूपाजनक अवस्था की वे सेन तब सेना सातवा परिच्छेद मानसिक विकास शान का विकास - . ब्रह्माण्ड में ज्या ज्या विभिन्न प्रकार के प्राणा उत्पन्न होते हैं त्यों त्या उनक अन्दर धीरे धीरे दिमाग की उन्नति हाती जाती है। इससे शान का श्रारम्भ हाता है और मनुष्य-जाति ये श्रदर मानसिक विकास का चर चलता है । यह विकास क्योंकर शुरू होता है ? और किन कारणों से उन्नति पसा है?-इस विषय में कई मत हैं। इसमें से एक तो यफल का श्रार्थिक मता है जो उसने अपनी अँगरजी की प्रसिद्ध पुस्तक 'हिस्ट्री श्राद् सिरलिज़शन" अथात् "सभ्यता का इतिहास" में वणन किया है। इसके अनुसार ज्ञान के प्रारम्भ के तान बड़े कारण हैं-भोजन का श्राधिक्य जलवायु और प्राकृतिक दृश्य । जिन देशों में सभ्यता शुरू हुई उनकी भूमि किसी न किसी बड़ी नदी के कारण भोज्य पदाथ बहुत ज्यादा उत्पन्न करती थी। यहाँ का जलवायु गरम होने से मनुष्यों की प्रारश्यकताएँ बहुत कम थीं। वहाँ लोगों को बड़े मकानों की ज़रूरत भी नहीं थी। गगा, नील और दजला-फरात, इस मत के बड़े उदाहरण हैं। इन प्रदेशा में गेहूँ, चावल और गनर अधिक पैदा होने से मनुष्य का पट श्रासानी से मर सस्ता था। इस प्रकार भोजन का झझट न रहने से बहुतेरे लोगा यो सोच विचार के लिए काफी समय मिलता था। प्राकृतिक दृश्यों को वक्ल इसलिए श्रावश्यक समझता है कि ये मनुष्य में सोचने की शोर *बकल Buchle अार्थिक मत= Exonome Theory (इकानामिक थियरी)।
८० मेरे अन्त समय के विचार झुकार उत्सन करते है। परन्तु ये इतने अधिक न हों कि मनुष दिमाग पर प्रभुत्व जमाकर उसे सोचने से ही रोक दें। इन प्रदेशों परिस्थिति ऐसी अनुकूल थी कि वहाँ एक ऐसी श्रेणी पैदा हो गई जिस. पास काम करनेवाला की सख्या बहुत बढ़ गई। निश्चिन्तता होने के उसे मनुष्य की वर्तमान उन्नति की नाव डालने का अवसर मिला । यह भी सयाल रपना चाहिए कि विभिन्न देशों की भूमि और जलवार मनुष्य के शरीर, रग, मस्तिष्क और भाषा पर उड़ा विचिन प्रभाव डालत है। इंगलैण्ड, जापान, अफरीका अादि के रहनेवाले लोगों के रंगरूः श्रादि में जो फर्क है वह प्राय उनके दर्द गिर्द की प्रकृति के प्रभार से है इसी प्रकार प्राचीन यूनान देश में नगरों के प्रजातन्त्रों की नींव इसलिए पही कि यूनान में इतनी छोटी-छोटी अलभ्य पहाड़ियाँ हैं कि तर सर्भ नगरों का एक शासन के अधीन होना सम्भव न था। झान का प्रारम्भ और पशु जीवन हरबर्ट स्पेंसर विकास के सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान का प्रारम्भ पशु जीवन में ही ददता है। पशुओं में दो नही आवश्यकताएँ या इन्छाएँ पाई जाती हैं, प्रथम पेट भरने की और दूसरी समय पर भोग की। दूसरी इच्छा के साथ साथ सन्तान प्रेम और वश-वृद्धि का भाव भी उसर होता है। दूसरे शब्दा में स्त्रय जीवित रहना और नसल को कायम रखना- ये पशु-जीवन के दो बड़े मौलिक सिद्धान्त हैं। जानवर दो प्रकार के हैं । एक वे जो अपनी सूराफ आसानी से नासिल कर सकते हैं, उदाहरणार्थ कबूतर, हिरन, मेड श्रादि। दूसरे वे शिकारी जानवर हैं जिनको अलग अलग खूराक हूँढने में आसानी होती है। इस प्रकार के जानवर बाज, शेर, कुत्ता आदि हैं। कुना यहाँ तक तो समझदार है कि अपनी चूसी हुई हड्डी को मिट्टी से ढाँपकर दूसरे दिन के लिए रख देता है ताकि कोई दूसरा उमे सा न ले, परन्तु इसके साथ ही वह अपनी जाति का इतना वैरी है कि भारत में इसका नाम गाली के बराबर हो गया है। इसके .
मासिक विरास चार में कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं। एर कुत्ता पो गाँर में साथिया के बतार से तग पा गया। उसने किसी दूसरे गाँव में जाने का निश्चय दिया। परन्तु जहाँ कही जाता यहाँ के कुत्ते गाँव से मील भर पाहर हो उसके पीछे पड़ जाते और वापस भगा देते। इस प्रकार भागते मागते यह पिर अपने ही गाँव में था पहुँचा । यहाँ के दूसरे कुत्तों ने उससे पूछा-पिर क्यों श्रा गो? उसने उत्तर दिया--प्राप माइयों की कृपा से। मैं जदों यही जाता था यहाँ के कुत्ते मुझे पहले से ही निकालने को तैयार होते थे। पहली किस्म के जानराको शिकारी जायरा से रचो के वास्ते भी इकहा रहा लाभकारी होता है। उनमें बहुतेरे ऐसे हैं जिनसे बच्चों का सम्मिलित प्रेम सदा जाड़े के रूप में रहना सिसला देता है। साररा का उदा- हरा बड़ा विचित्र है। नर और मादा पद्यों की जोड़ी नियत करते समय रहुत से सारस एकत्र होकर मारपी विवाद के समान श्रानन्द मनाते हैं । इकह रहने से पशुशो में भी एक दूसरे से सहानुभूति श्रीर सम्मि लित रक्षा का विचार उत्पन्न हो जाता है। दो घोड़े इकहे रहने से श्रापस में एक दूसरे पर प्राण तक योछावर करने पर तैयार हो जाते है। हाथियों के उदाहरण से यह बात सूर स्पष्ट हो जाती है। जङ्गल में चरते वक्त नेता सबसे प्रागे होता है और बच्चे बीच में। शत्रु के मुकारले में कायरता दिसलाने पर नेता को हटा दिया जाता है। भोजन जुटाने के लिए इकट्ठा रहना--यह बात चिउँटी और शहद की मक्खी के उदाहरणों से अच्छी तरह प्रकट होती है। इन दोनों के श्रदर विभिन प्रकार के काम करने के वास्ते हिंदुओं के यों के समान विभाजन पाया जाता है। कुछ का काम सूराक जमा करना होता है, कुछ का सन्तान पैदा करना, कुछ शनु से लड़ने का काम करती हैं और शेप अपने ऊपर सेना का काय लेती हैं। वहशी आदमी और उन्नति वहशी श्रादमी भी इही सिद्धान्तों के अनुसार चलते है। इह रहने से उनके अन्दर सहानुभूति की भावना उत्पन होती है। भोजन- ६ प ८२ मेरे अन्त समय के विचार सामग्री की खोज में ज्या-ज्यो श्रीजारों की जरूरत पड़ती है, त्यों-त्यों ये औजार मिल्कियत या यादगार का काम देते हैं। इस प्रकार सन्तति प्रेम के साथ सम्पत्ति प्रेम का पीज बोया जाता है। भोजन प्राप्त करने के उद्देश से वहशी कवीलों में परस्पर लड़ाइयाँ होती हैं। इनमें जो मनुष्य अच्छी तरह मुकाबला करके कनीले को बचाते हैं वे अपने जीवन काल में बुजुर्ग श्रीर मृत्यु के पश्चात् जनसाधारण की दृष्टि में देववा उन जाते हैं। इन लोगा के कारनामों को श्रानेवाली नसल में जारी रसना कीले के लिए इस कारण यावश्यक होता है कि पोरों के लिए प्रशसा और कायरों के प्रति घृणा उत्पन्न हो। ऐसे बुजुर्गों के मृत शरीरों को कायम रखने के लिए करें बनाई जाती हैं। ये करें पूजना और इसके साथ मकारे वनाना मजहब की एक नार है। उनके गुणों को गाने और लोगों को सुनानेवाले मजावर मज़हनी नेता बन जाते हैं। हरबर्ट स्पेंसर ने फन परस्त मजहबों और उनके रीति रिवाजों का अध्य यन करके ये निष्कर्ष निकाले हैं। मिली, चाल्डियावासी अोर यहूदी रूह या यात्मा को डरल माना करते थे। यह डबल या जोड़ा रूह उहें स्वप्न श्रादि में दिखलाई दिया करती थी। इस जोड़े के लिए कत्र बनाना चे पारश्यफ समझते थे। परन्तु श्रार्य जाति के लिए इस निष्कर्ष का ठीक फहना मुश्किल है। श्रायों में कत्र पूजा का निशान भी न था। वे मुर्दे का जलाना ही धर्म समझते थे, क्योंकि वे जानते थे कि मुर्दे के अन्दर से श्रात्मा कहीं और चली जाती है । प्राचीन यूनान श्रादि देशों में प्राकृतिक शचियो को सूक्ष्म अात्माएं समझकर उनकी पूजा का रिवाज पाया जाता था। इसका भी फब परस्ती से कोई सम्बन्ध नहीं मालूम देता । * इस प्रकार के वर्ग के आधार पर उपरि लिखित निष्कर्ष निकालना तर्कशास्त्र का निगमनात्मक (Deductive, दिडक्टिर) तरीका कहा जाता है। योरप में यह वरीका सोलहवी शताब्दी में चेकन (Bicon) ने जारी इसका नियम यह है कि विमान की सहायता से जो याते देखी किया।
मानसिक विकास अवतार और पैगम्बर मनुष्य को प्रारम्भिक अवस्था में असाधारण दिमाग रसनेगाले ऐसे कई व्यदि हुए हैं जिन्होंने संसार का पथ प्रदर्शन किया। प्राय देखा जाता है कि यदि बच्चे को कुछ न सिसलाया जाय तो वह वहशी छा बन जाता है। यहाँ तक कि मान सिसलाने से वह कुछ गेल भी नहीं सकता। इसी प्रकार जो दल या कोले यहशी दालन में चले श्रा रहे हैं वे बहुत काल से इसी अास्था में हैं और उन्हाने काई उन्नति नहीं की। सिपलाये जाने पर उनमें विचित्र परिवर्वन उत्सन्न हो जाता है। उकल भी यह मानता है कि समार में असाधारण बुद्धि रसनेवाले भानर पैदा होते हैं जो मनुष्या के लिए दीपक का काम देते हैं। उई यह प्रकृति से ऊपर अवीतात्मक शक्ति पाला कहता है । वह उनके होने का कोई कारण नहीं बदला सकता। मत्सोनी (मेजिनी ) कहता है कि ससार पथ प्रदर्शन के लिए ईश्वर श्रापश्यकतानुसार अपने श्रापमो मनुष्या में प्रकट करता है। यह विचार भगवद्गीता के चौथे अध्याय में या पाया जाता है-“धर्म की रक्षा के लिए जय-जर जरूरत पड़ती है, वा-चब मैं जन्म लेता हूँ।" इस्लाम, ईसाई और यहूदी-चीना सेमेटिक मज़हर इसे मजहबी सिद्धान्त बनाकर इस पर अपनी नोंच रखते हैं। विशेष व्यक्तियों गई हो, उनको एकत्र करके उनसे विशेष निष्कर्ष निकाले जाते हैं। बेकन से पूर्व पुरानी दुनिया के तर्क का तरीका श्रागमनात्मक (Inductive, इण्ड क्टिव) था। इसके अनुसार साधारण निरीक्षण में से काल्पनिक शक्ति के द्वारा नियम स्थिर करके उनसे सामयिक निष्कर्ष निकाले जाते हैं। वर्तमान तकशास्त्री निगमनात्मक तरीके को क्तिना ही अच्छा कहें, इस बात से इनकार नहा हो सकता कि पुराने तरीके के न होने पर किसी बड़े दर्शन (Philosophy, फिलासफी) की नीनन पड़ सकती थी। * अतीवात्मक=Transcendental (ट्रासें डेंटल)। .
मेरे अन्त समय के विचार को इन्होंने खुदा के पैगम्बरों का पद दिया जिनको श्रोर खुदा अपने फरिश्ते सन्देश-बाइक के रूप में भेजता था और कई पर उनमे पातचीत भी किया करता था। खुदा के ये सर श्रादेश और हिदायते इन मजहों की पवित्र पुस्तकों में पाई जाती हैं। यायशास्त्र ब्रह्माण्ड के सरल भान को वेद कहते हैं। वेद को भग वद्गीता में ब्रह्म कहा गया है। यह ज्ञान अटल और अनादि है। इस ज्ञान को मन्त्री के रूप में देखने और स्पष्ट करनेवाले ऋषि कहलाते है । इस बात पर थोड़ा मत भेद पाया जाता है कि यह समस्त पान मानव-सृष्टि के श्रारम्भ में ही कुछ ऋषियों के द्वारा प्रकट हुया या विभिन्न समयों में । इस विषय में एर मत तो यह है कि सर वेद प्रारम्भ में ही विशेष मनों के में प्रकट हो गये और इनके अर्थ समझनेपाले अपि बाद में भी होते रहे। (इसी कारण उन पियों के नाम पर वे मन पाये जाते हैं ।) दूसरा मत यह है कि वेद मन्त्र भी विभिर समयो पर उन ऋपियों पर प्रकट होते रहे जिाके नाम मनों से मिलते हैं। परन्तु एक बात पर सभी सहमत है- वेद स्वत प्रमाण है और उनकी निदा करनेवाला नास्तिक है। यदि प्राचीन आर्य साहित्य के इतिहास पर विचार किया जाय तो मालूम होता है कि पार्य-जाति के ज्ञान प्रारम्भ तथा उन्नति पार्यों के विचारों की उड़ान और प्रकृति के साथ सपर्क पर निर्भर है। श्रार्य साहित्य के चार काल हैं। वैदिक काल में ऋषि प्राति के दृश्य देखकर वैसे ही प्रेम तथा श्राश्चर्य प्रकट करते हैं जैसे जन्म लेने के बाद बचा। यह बच्चा जन श्रति पोलता है तब ससार की हर एक वस्तु, यहाँ तक कि सूर्य और चाँद को भी, अपने हाथा में लेने की इच्छा शोर प्रयत्न करता है। दूसरा काल उपनिषदों का है जर कि बुद्धि शान्त होकर ध्यान में लगी हुइ मालूम देती है। ब्रहाण्ड के अतस्तल में जो रहस्य काम करते हैं, उनकी गोज का उल्लेस उपनिषदों में पाया जाता है। मचिकेता का प्रभ क्तिना सुदर है-मृत्यु के बाद श्रात्मा विधर जाती है ? मैनेयी याज्ञ- वल्क्य से पूछती है-~नारमा क्या है ?
मानसिक विकास वीसरे काल में तक प्रधान है। इसम दर्शन के पई सम्प्रदाय पैदा हो गये। ये सब दुपदर्शी हैं और इस दु रा को दूर करने के लिए अपने अपने तरीके से उपाय ढूंढते हैं। नौद्धमत इस दशन को मज़हन के दर्जे पर ले जाता है-"इच्छा छोड दो। बस, यही निगाण है।" भगवद्गीता स्वाती है कि शानी की दृष्टि में सुख और दुःस जयवर हैं। अध्याय २ या श्लोक ५६ और अध्याय १४ के श्लोक २४ २५ पताते हैं-"ससार में दुस हे परतु उससे डरो मन । अपने कर्तव्य का पालन करते जानोगे तो सही सुस मालूम होगा।" बौद्धमन दु स से घराकर उससे मुक्ति हूँढवा है। भगवद्गीता दुम के ऊपर विजय प्राप्त कर उसे सुप बना देती है। चौथा पौराणिक काल है। इसमें पुराणों का रिचान पाया जाता है। कभा कभी लोग प्राचीन भाषा के शब्दों के प्रयोग न समझकर उनके अर्थ यापने हालात के अनुसार करने लगते हैं। भाषा का प्रारम्भ ज्ञान के प्रारम्भ के साथ मिलता हुशा प्रश्न भाषा का प्रारम्भ है । इस विषय पर विचार करना प्रारश्यक है। स्वामी दयानद तो वेद शान के साथ शब्द को भी अनादि मानते है। शब्द ज्ञान का पहनाना है। जन ऋषियों के मन में ज्ञान का प्राश हुअा तर वह इन्हीं शब्दो के द्वारा हुआ। लोक्मा य बाल गङ्गाधर तिला वेद ज्ञान को अनादि मानते हैं । परन्तु वे यह भी कहते हैं कि हर हिमानी युग के अंत में इस पृथ्वी पर एक तूफान पाता है जो धीस पचीस हजार वर्ष के बाद एक प्रलय सी होती है। वब यह ज्ञान विचारों के रूप में याद रह जाता है । फिर सृष्टि पैलने पर इनको मृपि अपने शब्दों में वणन करते हैं। मनुस्मृति में इस तूफान को मनु का तूफान कहा गया है। समवत इसी को नाइल नह का तुफान यदाती है। (शब्द मनु और नू में साम्य बहुत पाया जाता है।) * दर्शन के सम्प्रदाय - Sehools of philosophy ( स्कूल्ज श्रार पिलासी)। पुराण - Mythology (माइथालोजी)। * हिमानी युग=DGlacial period (ग्लेशियल पीरियड)।
मेरे अन्त समय के विचार को इन्हाने खुदा के पैगम्बरों का पद दिया जिनकी ओर खुदा अपने फरिश्ते सन्देश-वाहक के रूप में भेजता था और कई बार उनसे बातचीत मी किया करता था। खुदा के ये सत्र श्रादेश और हिदायतें इन मज़हा की पवित्र पुस्तको में पाई जाती हैं। अायशास्त्र ब्रह्माण्ड के सफल ज्ञान को वेद कहते हैं। वेद को भग वद्गीता में ब्रहा कहा गया है। यह ज्ञान अटल और अनादि है। इस ज्ञान को मन्ना के रूप में देसने और स्पष्ट करनेवाले ऋषि कहलाते है । इस बात पर थोड़ा मत भेद पाया जाता है कि यह समस्त ज्ञान माना-सृष्टि के यारम्भ में ही कुछ ऋषियो के द्वारा प्रकट हुश्रा या विभिन्न समयों में । इस विषय में एक मत तो यह है कि सब वेद प्रारम्भ में ही विशेप मनों के रूप में प्रकट हो गये और इनके श्रर्य समझनेवाले ऋषि नाद में भी होते रहे। (इसी कारण उन ऋषियो के नाम पर वे मन्त्र पाये जाते हैं।) दूसरा मत यह है कि वेद-मन्त्र भी विभिन्न समयों पर उन ऋपियों पर प्रकट होते रहे जिनके नाम मन्त्रों से मिलते है । परन्तु एक बात पर सभी सहमत है- वेद स्वत प्रमाण है और उनकी निन्दा करनेवाला नास्तिक है। यदि प्राचीन श्राय साहित्य के इतिहास पर विचार किया जाय तो मालूम होता है कि यार्य-जाति के ज्ञान का प्रारम्भ तथा उन्नति आर्यों के विचारो की उड़ान और प्रकृति के साथ सपर्क पर निर्भर है। श्रार्य साहित्य के चार काल हैं। वैदिक काल मे ऋपि प्रकृति के दृश्य देखकर वैसे ही प्रेम तया श्राश्चयं प्रकट करते हैं जैसे जम लेने के बाद नचा। यह पच्चा जर श्रास सोलता है तर समार की हर एक वस्तु, यहाँ तक कि सूर्य और चाँद को भी, अपने हाथों में लेने की इच्छा और प्रयत्न करता है। दूसरा काल उपनिषदो का है जन कि बुद्धि शान्त होकर ध्यान में लगा हुई मालूम देती है। ब्रहारह के अन्तस्सल में जो रहस्य काम करते हैं, उनकी खोज का उरलेस उपनिषदों में पाया जाता है। नचिकेता का प्रभ किवना सुन्दर है-मृत्यु के बाद श्रारमा किधर जाती है ? मैनेयी याज- वल्क्य से पूछती है --श्रारमा क्या है?
मानसिक विकास तीसरे काल में तक प्रधान है। इसमें दर्शन के कई सम्प्रदाय* पैदा हो गये। ये सब दुःखदर्शी हैं और इस दु ग्य को दूर करने के लिए अपने- अपने तरीके से उपाय ढूंढते है । बौद्धमत इस दशन को मज़हर के दर्जे पर ले जाता है.---"इच्छा छोड़ दो । बस, यही निवाण है।" भगवद्गीता पताती है कि ज्ञानी की दृष्टि में सुख और दुस अरावर हैं। नयाय २ का श्लोक ५६ और अध्याय १४ के श्लोक २४ २५ बताते है-"ससार में दुस है परतु उससे डरो मत । अपने कर्तव्य का पालन करते जायोगे तो टस ही सुस मालूम होगा।" गौद्धमत दु स से घबराकर उससे मुक्ति हूँढता है। भगवद्गीता दुस के ऊपर विजय प्राप्त कर उसे सुख बना देती है। चौथा पौराणिक काल है। इसमें पुराणों का रिवाज पाया जाता है। कभी कभी लोग प्राचीन भाषा के शब्दा के प्रयोग न समझकर उनके अर्थ अपने हालात के अनुसार करने लगते है। भापा का श्रारम्भ शान के प्रारम्भ के साथ मिलता हुया प्रश्न भाषा का प्रारम्भ है। इस विषय पर विचार करना आवश्यक है। स्वामी दयानन्द तो वेद ज्ञान के साथ शब्द को भी अनादि मानते है। शब्द ज्ञान का पहनारा है। जब प्रषियों के मन में ज्ञान का प्रकाश हुअा तर वह इही शब्दो के द्वारा हुया। लोकमान्य बाल गङ्गाधर तिलर वेद ज्ञान को अनादि मानते हैं। परन्तु वे यह भी कहते हैं कि हर हिमानी युग के अंत में इस पृथ्वी पर एक तुफान पाता है जो चीस पचीस हजार वर्ष के बाद एक प्रलय सी होती है। तब यह ज्ञान विचारों के रूप में याद रह जाता है। फिर सृष्टि पैलने पर इनको मृपि अपने शब्दों में वणन करते है। मनुस्मृति में इस तूफान को मनु का तूफान कहा गया है । समवत इसी को बाइबल नूह का तूफान बताती है। (शब्द मनु और नू में साम्य बहुत पाया जाता है।) * दर्शन के सम्प्रदाय = Schools of philorophy ( स्कूल्ज श्राव पिलाससी) पुराण = Mythologs (माइथालोजी)। + हिमानी युग%DGlicial period (ग्लेशियल पीरियड)।
मेरे अन्त समय के विचार को इहाने खुदा के पैगम्बरों का पद दिया जिनकी अोर सुदा अपने फरिश्ते सदेश चाहक के रूप में भेजता था और कई बार उनसे बातचीत भी किया करता था। खुदा के ये सब अादेश और हिदायते इन मज़हया की पविन पुस्तकों में पाई जाती हैं। पार्यशास्त्र ब्रह्माण्ड क सक्ल शान को वेद कहते हैं। वेद को भग वद्गीता में ब्रहा कहा गया है। यह ज्ञान ग्रटल और अनादि है। इस भान को मन्त्रा के रूप में देखने और स्पष्ट करने गले ऋपि कहलाते है । इस बात पर थोड़ा मत भेद पाया जाता है कि यह समस्त ज्ञान माना-सुष्टि के प्रारम्भ में ही कुछ ऋषियों के द्वारा प्रकट हुश्रा या विभिन्न समयो में । इस विषय में एक मत तो यह है कि सर वेद प्रारम्भ में ही विशेष मन्त्री के रूप में प्रकट हो गये और इनके अर्थ समझनेगले ऋषि बाद में भी होते रहे। (इसी कारण उन पिया के नाम पर वे मन्न पाये जाते हैं ।) दूसरा मत यह है कि वेद-मान भी पिभिन समयों पर उन ऋषियों पर प्रकट होते रहे जिनके नाम मन्नों से मिलते हैं। परन्तु एक पात पर सभी सहमत है-- वेद स्वत प्रमाण हैं और उनकी निन्दा करनेवाला नास्तिक है। यदि प्राचीन श्रार्य साहित्य के इतिहास पर विचार किया जाय तो मालूम होता है कि श्वार्य-जाति के ज्ञान का प्रारम्भ तथा उन्नति पार्यों के विचारों की उड़ान और प्रकृति के साथ सपर्क पर निर्भर है। आर्य साहित्य के चार काल हैं। वैदिक काल में भूपि प्रकृति के दृश्य देखकर वैसे ही प्रेम वथा श्राश्चर्य प्रकट करते हैं जैसे जन्म लेने के बाद बच्चा। यह बच्चा जर श्रा, पोलता है तर ससार की हर एक वस्तु, यहाँ तक कि सूर्य और चांद को भी, अपने हाथो में लेने की इच्छा और प्रयत्न करता है । दूसरा काल उपनिषदा का है जर कि बुद्धि शान्त होकर ध्यान में लगा हुइ मालूम देती है। ब्रह्माण्ड के अन्तम्तल में जो रहस्य काम करते हैं, उनकी खोज का उल्लेस उपनिपदों में पाया जाता है। नचिकेवा का प्रश्न विता मुन्दर है-मृत्यु के बाद आत्मा किधर जाती है? मैनेयी याज्ञ वल्क्य से पूछती है-~श्रात्मा क्या है ?
मानसिक विकास आवश्यक होता है। चीनिया ने सातवी शताब्दी से पूर्व ही छापाखाना, मुद्रण-यन्त्र और समाचारपत्र जारी किये थे। योरप के ईसाई पादरियों ने मुद्रण-क्ला चीन से ले जाकर योरप में प्रचलित की। प्राचीन मिस्रवासी जानवरों के चिन सींचकर लिखा करते थे। एक चित्र अवसर के अनुसार विभिन्न श्रों के लिए सोत होता था। इसको चित्र लिपि कहा जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के दमियान एक लेख मिला जिस पर लेटिन भाषा के साथ कुछ चित्र विद्यमान थे। लेटिन भाषा से उस लेस की चित्र लिपि पढने में मदद मिली। इस चिन- लिपि की सहायता से ईसा से छ सात हजार वर्ष पूर्व के मिस्र का इतिहास मालूम हो गया है। चाल्डिया के वासी रेसानों की सहायता से लिखते थे। इसे क्यूनि- फार्म तरीका कहा जाता है। ये लोग ईटा पर पुस्तकें लिखकर उ है भाग में पका लेते थे। ऐसी पुस्तको का एक संग्रहालय नैनवा के महलों के खंडहरों में पाया गया है। टाहर नाम के स्थान में रहनेवाले फिनीशियन लोग थे जिहाने खास श्रावाजों के लिए सास निशान नियत र रक्से थे। ये अक्षरा के रूप में थे। थीम्स का रहनेवाला काडमस नामक एक शख्स इसा से पद्रह सौ वर्ष पूर्व इन अक्षरों को यूनान या ग्रीस में ले गया। यूनान से ये रोम पहुँचे और वहाँ से इनका रिवाज समस्त योरप में हो गया । फिनीशिया और चाल्डिया के अक्षर मिलाएर बेबेलोनिया के अक्षर बनाये गये । वेला निया के अक्षरो से अरची लिपि उत्पन्न हुई। पुराने पारसी लोगो ने मी, यद्यपि उनकी भाषा श्रायभाषा की एक शासा है, अक्षरों की नकल यहाँ से की। * चिन लिपि = Heroglyplnes (हेरोग्लिफिक्स)। + क्यूनिफार्म तरीका=Cuneiform method (क्यूनिफार्म मेथड)। 1 टाइर=fyre फिनीशियन = Phoenieran || थीस-Thebes ८६ मेरे अन्त समय के विचार बाबु अरविन्द घोष ने भाषा के प्रारम्भ को विकास के सिद्धान्त के अनुसार सिद्ध करने का प्रयत्न क्यिा है। उनके परिणाम इस प्रकार हैं- श्रारम्भ में मनुष्य पशुओं के समान कुछ श्रावाजें निकालते थे। (इन श्रावाजों को अरविद बाबू ने चीज शब्द* कहा है । ) वे अावाज विशेष गतियों के सम्बन्ध से विशेष अर्थ प्रकट करती थीं | एक काल के बाद जब इन श्रावाजों के कई विभिन्न श्रर्थ समझे जाने लगे तर ये धातु बन गई। ज्या ज्यों इन धातुर्थी के प्रयोग और अर्थ बढ़ते गये, त्यो त्यों हासे कई शब्द उनने शुरू हुए। पहले-पहल ये शब्द समष्टिगत अर्थों में प्रयुक्त होते थे जिससे एक शब्द अवसर के अनुसार कई अर्थ देता था। इन शब्दों को तरल, आसानी से बदलनेवाले, कहा गया है। (वेदों के बहुत से शब्द इस प्रकार के हैं । ) बहुत समय गुज़रने पर जर इन शब्दों की सख्या बहुत बढ़ी तब एक एक शब्द विशेष अर्थ देने लगा। इससे उसका अर्थ सीमाबद्ध हो गया। यही कारण है कि पुरानी सस्कृत में श्लेष का प्रयोग बहुत पाया जाता है और एक ही शब्द कई अर्थो में इस्तेमाल होता है। यह अन्वेषण मापा विज्ञान को एक नये रूप में प्रकट करता है। इस दृष्टि से अध्ययन करने पर मालूम होता है कि न केवल श्रार्य नसल की शाखाओं की भाषाएँ बल्कि अन्य भाषाएँ भी चैदिक भाषा से विशेष सम्बन्ध रसती है। अक्षरों का प्रारम्भ अक्षरों के श्राविष्वार में अन्य जातियो का हाथ दिखलाई देता है। लिसने की प्राचीनतम फला चीनियो की मालूम होती है। चीनी भाषा में हर एक पूर्ण वाक्य के लिए विशेष चिह्न या सके है। जो मनुष्य इस भाषा का पडित होना चाहता है उसे लगमग पैंसठ हजार चिद याद करने पड़ते हैं। साधारण शिक्षा के लिए दो-तीन हजार चिल्लों का जानना * बीज शब्द-Seed sound (सीड-साउड)। 1 धातु = Root sound (रूट साउद)। समष्टिगत Collective (फलेक्टिव)। तरल Fluid (प्रइड)। %D मानसिक विकास प्रावश्यक होता है। चीनियो ने छावनी शवान्दी से पूर्व ही छापाखाना, मुद्रण-यत्र और समाचारपत्र जारी रिये थे। योरप के ईसाई पादरियों ने मुद्रण-फला चीन से ले जाकर योरप में प्रचलित दी। प्राचीन मिरायासी जानवरों के नित्र पांचयर लिसा करते थे। चित्र अवसर अनुसार विभिन्न प्रयों के लिए सोव होता था। इराशे चित्र लिपि कहा जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी में दर्मियान एक लेग्य मिला जिस पर लेटिन भाषा के साथ कुछ चित्र विद्यमा7 थे। लेटिन भाषा से उस लेप की चित्रलिपि पढ़ने में मदद मिली। इम चित्र- लिपि की सहायता से इसा से घ सात हजार वर्ष पूर्व के मिस या इतिहास मालूम हो गया है। चाल्डिया के वासी रेपात्रों की सहायता से लिग्नते थे। इसे न्यूनि फार्म वरीका कहा जाता है। ये लोग ईटा पर पुस्तके लिवकर उ हे भाग में पका लेते थे। ऐसी पुस्तयों का एक सग्रहालय नैनरा के म लों के खडदरा में पाया गया है। टाहर नाम के स्थान में रहनेगले पिनीशियन लोग थे जिन्हाने सारा श्रापाजों के लिए खास निशान नियत कर रपसे थे। ये अक्षरा के रूप में थे। थीम्स का रहनेवाला पाहमस नामर एक शख्स इसा से पद्रह सौ वर्ष पूर्व इन अक्षरों को यूनान या ग्रीस में ले गया। यूनान से ये रोम पहुँचे और यहाँ से इनका रिवाज समस्त योरप में हो गया । फिनीशिया और चाल्डिया के अक्षर मिलाकर बेलोनिया के अक्षर बनाये गये । नेलो निया के अक्षरों से अरबी लिपि उत्पन्न हुई। पुराने पारसी लोगा ने भी, यद्यपि उनकी भाषा श्रायभाषा की एक शारसा है, अक्षरों की नकल यहाँ से की। * चित्र लिपि = Hierogly pincs (हेगेम्लिफिक्स)। + क्यूनिफार्म वरीका=Cunelform method (क्यूनिफार्म मेथड)। 1 टाइर-Tyre ६ फिनीशियन = Phoenieran ॥ थीस%Thebe- - मेरे श्रन्त समय के विचार देवनागरी अक्षर अत्यन्त बैगानिक ढङ्ग पर बनाये गये हैं। केरल यही अक्षर हैं जो उच्चारण शास्त्र के अनुगामी कहे जा सस्ते हैं। इसरा मतलब यह है कि देवनागरी में जितनी अावाज़ मुंह से निकलती है उतनी ही लिसी जाती है और जो लिखी जाती है वही वोली जाती है। इनके प्रचलन का ठीक समय नहीं बताया जा सकता। सम्भव है कि प्राचीन माल में ससार का नातियों के पारस्परिक सम्पर्फ के कारण ये अक्षर पाणिनि या किसी अन्य ऋषि ने रनाये हो । समानता की एक विचित पात यह है कि जहाँ पर योरप की भाषामा में अक्षर 'ए' (एस), जो दो मिश्रित श्रानाज़ो के लिए इस्तेमाल होता है, एक ही है वहाँ देवनागरी में भी मिश्रित श्राराज देनेगला वैसा ही अक्षर 'क्ष' पाया जाता है। भाषायों का स्त्रोत भ्ग्राय नसल की शाखाओं की भाषाश्या का स्रोत एक भाषा मानने में तो पिसी विद्वान् को इनकार नहीं, क्याकि उनकी पारस्परिक समानताएँ बहुत प्रपल हैं। पारिवारिक प्रयोग के प्राय समस्त शब्द, दिनी के नाम और दस तक की गिनती के शब्द एक जैसे ही मालूम देते हैं । यूनानी, लैटिन, जर्मन, अँगरेजी श्रादि और यहूदी भाषा में भी ईश्वर का नाम एक ही स्रोत, दिव्य धातु,से निकला हुया है । दिव वातु का अथ चमन्ना है । भाषाया की एपता या ससे रडा प्रमाण उनके व्याकरणों में पाया जाता है। व्याकरण भाषा के पजर के समान है। प्राय सभी बच्चों को व्याकरण याद करने पर बड़ा जोर दिया जाता है। पर तु इसका वास्तविक लाभ रहुत कम लोगो को मालूम है। भागना के व्याकरणों की तुला करने से स्पष्ट नजर अावा है कि वे प्राय हर पात में एक दूसरे के समान हैं । यदि भाषाया में भिन्नता होती तो उनकी बनावट क्यार एक सी होती १ परमी और चीनी जैसी जिन भाषाओं का वास्तविक स्रोत से , - * उचारण शास्त्र - Plhonetics ( फोनेटिक्स)।
मानसिक विकास ८६ । सम्बन्ध नहीं है, उनमें व्याश्रण पाया ही नहीं जाता। कुछ लोग हैरान होते हैं कि यदि भाषायों का स्रोत एक है, तो इतनी विभिनताएँ कहाँ से श्रा गई । इसका उत्तर स्पष्ट है। थोडी थोडी दूरी पर जलनायु श्रादि के प्रभाव से भाषा में परिवन का दोना एक साभाविक कानून है। अपने श्रापमो उस काल में समझिए जब न समाचारपन थे, न छापाखाने, और पुस्तक का उप लब्ध हाना भी एक कठिन गत थी। अब आगे चलिए उस काल में, जर लिसने की क्ला का श्राविष्कार न हुअा था। ऐसी परिस्थिति में इन विभिननाया का होना किसी प्रकार आश्चर्यजनक मालूम न होगा। इससे यह भी पता चलता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मणों का इतना श्रादर और मान क्यों किया जाता था । ब्राह्मण वे व्यक्ति थे जिहें उस समय के पुस्तकालय मस्तिष्क के अन्दर उठाने पड़ते थे, बल्कि ज्ञान का यह कोश दूसरा के सुपुर्द करने के लिए उन्हें योग्य शिष्य हूँदने पड़ते थे। बड़े अाश्चय की बात है कि उन्होंने किस प्रकार वेदों, उपवेदो, वेदाङ्गो, उपनिषदो, शाम्बा श्रादि को केवल मस्तिक और भाषा के द्वारा हजारा वर्षा तक कायम रखना। मापा का महत्त्व एर दृष्टि से भाषा लोहे के उस सन्दूक के समान है जिसमें सारे साहित्य के कोश जमा हा। भारत के ग्राों ने अपनी भाषा और धार्मिक रीतियों को पुरानी दुनिया, मिस्र श्रादि, में पैलाया। बौद्ध मत के उत्कप-काल में उनका दशन परमा, चीन आदि देशों में पैला । मुस्लिम उत्कप के समय अरों ने हिदुस्तान से ज्ञान-सम्बधी लाभ उठाया। हाम- उल्रशाद और उसके बेटे के खिलाफत-काल में बगदाद के व्यापारी भारत में व्यापार के उद्देश से श्राते और यहाँ की पुस्तकों की नस्लें भेंट के रूप में अपने देश को ले जाते। दशन, ज्योतिष, वैद्यक, बीजगणित* यादि विषयों की सैक्डों पुस्तक वाँ पहुँची! आयुर्वेद का अरसी भाषा में श्रनु- वाद किया गया। अरर लोगों ने इन सभी विद्याओं को स्पेन में उस समय विश्वविद्यालय स्थापित करके पैलाया जर हि शेप समस्त वारप * चीनगणित - Algebra (अल्जेय)।
. मेरे श्रत समय के विचार स्लिम काल में अभी अन्धकार में था। विचित्र यह बात है कि यूनानी दर्शन भी घोरप में भरती भाषा के द्वारा फैला भाषा केवल सभ्यता के कोश का सन्दूक ही नहीं है । यह राष्ट्रीयता की वह बड़ी पुस्तक है जिसमें राष्ट या जाति का इतिहास लिसा हुआ मिलता यह वात वैदिक संस्कृत के तुलनात्मक अध्ययन से मालूम हुई कि योरप की जावियाँ भी आर्य नसल से हैं। मारत में जर शक श्रादि विदेशी लोगों का पाना शुरू हुश्रा तर उनकी भाषा की मिलावट श्रादि कारणों से प्राकृत भाषा बन गई। चौद्ध मत के उत्कर्ष काल में इस भाषा का न केवल हिन्दुस्तान बल्कि बग्मा श्रादि में भी पवित्र भाषा का दर्जा हो गया । तर भारत में लोगों के विभिन्न टुकड़े हो गये और प्राकृत बगाली, गुजराती, मराठी श्रादि भाषाओं में विभक हो गई | इन पर फारसी की छाप उसी प्रकार लगी जिस प्रकार भारत पर मुस्लिम राज्य की लगी। श्राजक्ल हमारी भाषा अँगरेज़ी से प्रभावित हो रही है। यहाँ यह समझ लेना श्रावश्यक है कि भाषा के बने रहने से राष्ट्रीयता बनी रहती है और उसके विनाश से राष्ट्रीयता विनष्ट हो जाती है । यतमान शिक्षा प्रणाली से प्रभावित होकर श्राम शिक्षित लोगों का दिमाग इस प्रकार का बन गया है कि वे यह समझ नहीं सकते कि भारत के नवयुनकों को अपनी भाषा छोड़कर अन्य भाषा के द्वारा शिक्षा देना प्रकृति विरुद्ध बात है। हिसाब लगार देखने से पता लगता है कि शिक्षा काल में हमारे बच्चों का श्राधे से ज्यादा समय केरल एक विदेशी भाषा सीसने और समझने में व्यय होता है। अपनी भाषा की रक्षा का एक ही तरीका है-सारी शिक्षा और गवर्नमेंट सम्बन्धी कार्य इसमें हो। तभी हमारी माग सजीन बनेगी और उसमें नया साहित्य उत्पन्न होगा। जो लोग अपनी भाषा में पहले उच्च कोटि की पुस्तमें देखना चाहते हैं और बाद में उसे शिक्षा का माध्यम बनाना चाहते हैं वे घोड़े के आगे बन्धी जोतकर उसे चलाने की कोशिश करना चाहते हैं।
पाठवाँ परिच्छद सामाजिक विकास मामाजिक जीवन का कानून भगवद्गीता के अध्याय १८ का श्लोक ६१ कहता है-'स्वय भगवान् सबके हृदय में बैठकर ससारचक वो चला रहे है।" इस ब्रह्माण्ड को हम केवल उयोग का फल सममें या रिसी पड़ी शचि की तदवीर का खुला और बन्द होना। यह यात हमें साफ दिखलाई देती है कि वे समस्त शरियाँ, जिनसे राष्ट्रो का इतिहास बनता है, अन्य प्राकृतिक शचिया के समान सास कानूनों के अधीन चलती हैं। हा कानूनों का शान इतिहास के सम्पूर्ण अध्ययन के लिए श्रावश्यक है। व्यक्तिगत जीवन और राष्ट्रीय जीवन में बड़ा फर्क यह है कि एक साधारण सी भूल या घटना व्यक्गित जीवन में क्रान्ति उत्पन कर सकती है, परतु राष्ट्रीय जीवन की लहर किसी ऐसी घटना से कम प्रभावित हुश्रा करती है। एक मनुष्य ट्राम से गिरकर या पॉन के पिसल जाने से ऐसी चोट साता है कि वह उसके जीवन पर स्थायी प्रभाव उत्पन कर देता है। राष्ट्रीय जीवन ऐसी दुर्घटनाओं से प्राय मुक्त होता है और उसके कान मोर तबदीली के चलते हैं। इन्ही कानूनों के श्राधार पर मानवीय इतिहास को विशानी का पद मिल जाता है। जिस प्रकार इतिहास से निकाले गये परिणाम राजनीति कहलाते हैं उसी प्रकार ये * इतिहास के कानून%DLaws of History (लाज ऑव हिस्ट्री)। + विज्ञान%DScience (साहस)।
मेर अन्त समय के विचार कानून इतिहास चिया* का दराना है। इन काानों का अध्ययन करके एम मजहर के वास्तविक तत्व तक पहुँच सकते हैं । जीवन-सचालन और पयाल किसी भी मनुष्य के जीवन को लेकर उसके चरित पर ध्यान करने में विदित होगा कि उसके प्राय समी कामों के अन्तस्तल में एक मास सयाली है जो उसे चलाता है। साधारण सांसारिक लोग केवल श्राराम से नीवित रखना चाहते हैं। श्राराम का जीवन व्यतीत करने के विचार से चे वरह-तरह की मिहनत करते पोर कष्ट उठाते हैं। समझदार प्रादमी श्राराम की इस जिन्दगी में कुछ अथ नहा देखता। इन लोगा का उद्देश पायम होता है, परन्तु यह पायम ही उनके सिर पर सब क्ट लाता है। बहुत सोच विचार न रसनेवाले मनुष्य केवल दो पाशविक भावों के श्राधार पर अपना जीवन व्यतीत करते हैं-एक जीवन स्थिर रसना और दूसरा नसल बढ़ाना। जब एक मजदूर दिन में पाठ घण्टे मेहनत करके दो रुपये कमाता है तर अपने जीवन के एक दिन को वह दो रुपये के रूप में परिणत कर लेता है। इससे वह अपने परिवार का पोषण करता है। ज़रा धागे चलकर देखने से मालूम होता है कि कई अन्य सयाल भी हैं जो सासारिक मनुष्यों के जीवन को चलाते हैं कहीं पर यह विषय का दासत्व है, कहीं पर धन एकन करने की इच्छा और कहों पर प्रसिद्धि का सयाल । कनूस की ज़िन्दगी में यह खयाल काम करता है कि जिस किसी तरह से हो सके वह रुपये को सभी जगह से पोंचकर उम स्थान पर ला रक्खे जिसे वह अपना समझता है। पनियों के बारे में कहावत है-'वनिये की कमाइ ब्याह या मकान ने साई ।' अथात् वह अपना और दूसरा का पेट काटकर उम भर में जो कुछ जमा करता है उसे लड़के लड़की का ब्याह करने या मकान * इतिहास विद्या= Knowledge of history (नालेजॉय हिस्ट्री) दर्शन = Pinlosophy (of History) फ्लिासपी ऑघ हिस्ट्री। + सयाल = Idea (नाइडिया)।'
सामाजिक विकास चनमो म पर्च पर देता है । दूसरे शब्दों में ब्याह या मकान उसके समस्त जीवन को सा जाता है। एक शरस को शपर या व्यभिचार की प्रादव है। वह अपना श्राराम, इज्ज़त गारद सब कुछ त्यागकर समस्त जीवन को सिफ उस श्रादत का शिकार बना देता है। प्रसिद्धि पी इच्छा प्ररास नीय भार है। परतु इसके बदले जीना वरदील करतेगाला की सरया बहुत बाड़ी है। राष्ट्रीय जीवन ग्रार सयाल जिस प्रकार व्यरिगत जीवन के अन्तस्तत में सयाल काम करता है उसी प्रसार राष्ट्रीय जीरन का भा वही चलाता है। हर राष्ट्र के इतिहास में किसी एक सयाल का प्रदर्शन और पैलाव दिसलाइ देता है। प्राचीन स्वार्टी के लोग शारीरिक सौन्दर्य के खयाल पर हद से ज्यादा मुग्ध थे। स्पाटन माता पिता को जर कोई पचा शारीरिक दृष्टि से निपल मालूम देवा तो वे उसे पहाड़ की चोटी से गिराकर मार देते। जापान में देश प्रेम का भाव है। यही उनका मज़हर और यही उनका श्राचार है। जापान युद्ध के समय जापान की कितनी ही कुंवारी लड़रिया ने वेश्यावृत्ति इसलिए ग्रहण कर ली कि इसके द्वारा धन कमाकर वे उसे अपने देश को भेज सकें। श्रमरीका में व्यक्तिगत समानता का सिद्धान्त वहाँ के सामाजिक जीवन के अन्तस्तल में पाया जाता है। यहाँ तक कि बेटे पाप का श्रीर शिष्य गुरु का कुछ मान नहीं करते। वहाँ शासर और शासित, स्त्री और पुरुष का दजा परार है। यह सयाल चाहे कितना ही ऊँचा क्यो न हो, जब किसी जाति में श्रला ही जोर पक्ड़ जाता है तर श्राय विचारों के दर जाने से उस जाति के पतन का कारण होता है। राजपूता के अदर मान का सयाल मान के मुतारले पर उहें व्यक्तिगत या राष्ट्रीय जीवन का भी कोई महत्त्व नजर न श्राता था। ऐसे कितने ही उदाहरण मिलते हैं जिनमें राजपूतो ने पहले अपनी रमणियो को कत्ल किया और पिर तलवार लेकर स्वय जान पर खेलते हुए शत्रु पर टूट पड़े। सर्वोपरि था। --- मेरे अन्त समय के विचार रीतियां, सस्थाएँ और खयाल इसी प्रकार के खयाल के आधार पर जातियों के अन्दर अपनी अपनी सस्थाएँ और रीतियाँ या नैतिक रिवाज बनाये जाते हैं। स्त्री-जाति के दर्जे को लीजिए। कुछ जातियों के अन्दर स्त्री को निम्न समझकर परदे में रसने का रिवाज है। कुछ पश्चिमी जातियों के अन्दर न केवल स्त्रियो बल्कि लड़कियों को भी पूर्ण स्वतनवा प्राप्त है । यहाँ तक कि माता पिता की अनुज्ञा के पिना ही लड़कियां अपने विवाह का प्रबन्ध कर सकती हैं। इस आयु में न लड़की के अन्दर विचार शीलवा का इतना भाव होता है, न लड़के के अन्दर । प्राय कामभाव के प्रभुत्व में, जिसे प्रेम का नाम दिया जाता है, सम्बध हो जाता है। इस परिणाम यह होता है कि थोड़ी ही देर बाद सम्बध विच्छेद या तलाक की बारी आ जाती है। जापान में परदा तो कहीं दूर रहा, स्त्री और पुरुषों के एक स्थान में दिल कुल नजे नहाने का रिवाज है। हिन्दुस्तान इससे घबराता है, परन्तु इससे इतना तो सिद्ध होता है कि वहाँ के लोग काममार के इतने गुलाम नहीं हैं और स्त्री को नग्न देखकर भी अपनी तबीयत पर काबू रख सकते हैं। स्याम के छोटे से देश में स्त्री पुरुष के पहनावे और सिर के बालों में भी कोई विशेप भेद नहीं होता। वहाँ पर स्त्रियों को न केवल राजनीतिक अधिकार वैसे ही दे दिये गये हैं, बल्कि पुरुषों से अधिक शक्ति प्राप्त है। इसका एक कारण यह है कि कुछ समय हुया वहाँ की स्त्रियों ने अपनी सेना बनाकर घरमा के लोगों के आक्रमण से अपने देश की रक्षा की थी। हिन्दुओं के अन्दर स्त्री और पुरुष का दर्जा बराबर है। विवाह के पश्चात् पुरुष को पति और स्त्री को पत्नी कहा जावा है। भगवद्गीता में बेटों के नाम माता के नाम पर दिये हैं और विवाह को धर्म समझा गया है (इसलिए यह अधिकता माता पिता के अधिकार में होती है)। यहाँ तक कि स्त्री पुरुष के समागम के समय भी वेद-मन्त्रों के द्वारा गर्भाधान कग्ना लिया है। गर्भाधान सस्कार इसलिए किया जाता है कि जा सन्तान हो, यद वाममाव की विशेषतागले वीर्य से न हो, रल्कि धर्ममाव - सामाजिक विकास वाले वीर्य से हो । विवाह को एक पवित्र धर्म समझने का खयाल था जिससे इस देश में सती की रस्म जारी हुई। इस प्रकार की पवित्र स्त्रियाँ हिंदु स्तान में ही जन्म लेती रही हैं, जिन्होंने अपने प्रेम को पवित्र एप मिलावट रहित रखने के लिए अपने शरीर का बलिदान किया। यहाँ तक ही नहीं, यह भी कहा गया है कि श्राप्त धर्म के तोर पर स्त्री अपने पति का नाम बनाये रसने के लिए अपनी पवित्रता को भी कुरनान कर सकती है ।* समाज की उन्नति का आधार मत्सीनी समाज की नीव अोर उन्नति सङ्गति के सिद्धान्त पर आश्रित समझता है। वेदमन्त्र भी यही कहता है-"हम सब परस्पर मिलकर बैठे, सरके विचार एक से हो, हमारी श्राशाएँ एक जैसी हा" हरबर्ट स्पेंसर समान की नींव सहयोग को समझता है। इसे वह दो प्रकार का बतलाता है। एक वह जिसमें व्यक्तिगत लाभ दृष्टिगोचर हो, दूसरा वह जिसमें समाज के सामूहिक लाभ का भाव प्रबल हो। पहली अवस्था में प्रत्येक मनुष्य के व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्य इसलिए मुक्करर होते हैं कि उनकी पूर्चि से स्वय उसे तो लाभ पहुंचता है और समाज की उन्नति होती है। दूसरी अवस्था में समाज परस्पर मिलकर उस विशेष कार्य को अपने हाथ में लेता है, जिसकी पूर्ति से समाज को बल प्राप्त होता है और व्यक्तियों को व्यक्तिगत लाभ। दूसरे सिद्धात का अाधार युद्ध है। अपनी शचि बढ़ाने के लिए अन्य कलीलो या जातियों के साथ संघर्ष और युद्ध ही युद्ध प्रिय समाज का सिद्धान्त है। योरप के राष्ट्र अभी तक इसी सिद्धान्त के अनुसार बढ़ते और उनति करते चले आये हैं। यह स्पष्ट है कि जिन राष्ट्रों में प्रकार का सहयोग होगा वे ज्यादा सामाजिक होंगे, अर्थात उनमें परस्पर • नियोग की अोर सस्त है। मिसीनी = Mazen सगति= Assocration ( एसोसिएशन )1 सहयोग =Co-operation (कोवापरेशन)।
६६ मेरे अन्त समय के विचार एक दूसर के साथ अधिक सहानुभूति होगी। पड़ोसी राष्ट्री से घृणा और स्वदेशवासियों के प्रति प्रेम, यह योरप की देशभक्ति का मूल मन्त्र है। परतु जो राष्ट्र पहली लिग्म के सहयोग पर समाज को चलायेंगे वे स्वभा वत कम सामाजिक होंगे अथात् उनमें पारस्परिक सहानुभूति कम होगी। हरवट स्पेसर इससे यह निष्कर्ष भी निकालता है कि जो राष्ट्र या जातियों अधिक सामाजिक होती है वे उन राष्ट्री या जातिया पर राज करती हैं जो कम सामाजिक होती है। योरप के राष्ट्रों ने जब से सभ्यता के पथ पर पग रचना है तबसे उनके अन्दर सहयोग का यही सिद्धान्त काम कर रहा है। इसी कारण वे एशिया की जातियों के मुतारले पर बहुत ज्यादा सामाजिक हैं। हिन्दू समाज का श्राधार-यश सम्भव है, श्रारम्भ में हिन्दुस्ताा में श्रार्यजाति को लडाई भिडाइ से काम लेना पड़ा हो। परन्तु इसमें कोई सदेह नहीं कि उनके समाज का श्राधार पहले प्रकार का सहयोग रहा। इसमें हर एक सदस्य अपने-अपने धर्म का पालन करने में स्वतन्त्र है ( यद्यपि ये धर्म या कर्तव्य निश्चित करने में समाज का हित सामने रक्सा गया है।) यही कारण है कि हम हिन्दू जाति के अन्दर श्राधुनिक देशभक्ति भाव कम पाते हैं और उनको इसके मीखने में भी लम्बा समय लग रहा मालूम देता है। हिन्दू-समाज की नीव दूसरों के विरुद्ध संघर्ष पर न सड़ी थी बल्कि एक अन्य बडे सिद्धान्त पर जिसे वेदो और भगवद्गीता में यज्ञ का नाम दिया गया है। इसरा अर्थ ऊँचे के लिए निम्न का बलिदान है। वेद में कहा गया है-"मेरी नायु यश के अर्पण हो। मेरी आँसें यज्ञ के अर्पण हो। मेरी बुद्धि और मन यज्ञ के अर्पण हो ।" अन्यत्र कहा गया है-"यज्ञ ही विष्णु है।" भगवद्गीता के अध्याय ३ के श्लोक 20 में यही भार पाया जाता है-"प्रजापति ने यज्ञ से इस ससार को उत्पन्न किया।" यश यह कार्य है जिसका करना केवल धर्म के तौर पर श्रावश्यक हो और जिसमें स्वार्थ का लेश भी न हो। में मनुष्य जो भी काम करता है, पिसी न किसी लाम को ससार सामाजिक विकास ६७ सामने रखकर । दूसरो की भलाई के काय मी प्राय इसलिए किये जाते है कि शिक्षा तथा उपदेश अादि से मनुष्यों का स्वभाव ऐसा बन जाता है कि उहे दूसरों भले का काम करने में शानद होता है। यश वह कार्य है जिसमें शानद की परवा भी न हो। इसी अध्याय ३ के श्लोक ११, १२ तथा १३ और अध्याय ४ के श्लोक २५ श्रादि में यश का स्पष्ट वर्णन दिया गया है। देवतानों को प्रसन्न करने के लिए या करना एस श्राव श्यर करन्य बताया गया है। देवता के श्रन्दर श्राचार्य, माता और पिता भी सम्मिलित हैं। यज्ञ क्या है? 'यज्ञ शब्द भी सस्कृत के कई श्रय शब्दों की तरह पहले सामूहिक अर्थ में प्रयुक्त होता था। एक समय के पश्चात् इसका प्रयाग सीमित होकर विशेष श्रथ में होने लगा। यज्ञ यज् धातु से निकला है। यन् के अर्थ देव पूजा दान और सगति हैं। इसी श्राधार पर प्राचान पार्टी के समाज मे हर एक मनुष्य के लिए पांच बडे दैनिक कराव्य बनाये गये है जिनको पन महायज्ञ कहा जाता है-ब्रह्म यज्ञ श्रथात् श्रामिक उमतिक लिए स्वाध्याय, देव-यज्ञ श्रथात् हवा की शुद्धि के लिए अग्निहोत्र या होम, पितृ-यज्ञ अथात् बड़ो की सेवा, अतिथि-यज्ञ अर्थात् घर श्राय का मान और बलिवैश्वदेव-यज्ञ अथात् पशु-पक्षियों को कुछ न कुछ पिलाना । इन यजी में दान और सगति के अतिरिक्त देव-पूजा पड़ा श्रावश्यक कर्तव्य है। इसलिए देव किसे कहते हैं, इस पर थोड़ा विचार करना लाभप्रद होगा । देव शब्द दिय् धातु से निग्ला है जिसके कइ अथ है- ज्योति, विजय, व्यवहार, स्तुवि, मद, काति, विचार, श्रानन्द, मीड़ा यादि। इस प्रकार यज्ञ का श्रथ मनुष्या की सगति के अतिरिक्त प्रकाश का विस्तार, पापिया पर विजय, श्वापस में श्नच्छा बरतान, प्रशसनीय कार्य करना स्वाभिमान की रक्षा, ज्ञान, उपकार श्रादि हैं। प्राय भाषा- सस्कृत में यज्ञ सबसे मीठा और प्रिय शब्द है। यज्ञ का एक बड़ा सुदर उदाहरण महाभारत में पाना जाता है। जब पाण्डवा ने युद्ध में विजय एक .
मेर अन्त समय से विचार - लाभ करके असमेघ यश रचा, तर जीव-जन्तु श्रादि समी प्राणियों को यह का अवशेष--पवित्र भोजन-सिनाया गया। उस समय एक नेवला यश यी चेदी पर श्राया। यहॉ सर ऋषि और परिव बैठे थे। नेवले का भाधा शरीर सोने का था। यह वेदी पर घर-उधर लेटा। ऐसा करने के बाद उसने वक्ष-"यह यश किसी काम का नहीं हुआ।" समा ने नाश्चय से पूछा-"क्या ! तुम कैने ऐसा कहते हो" मेरले ने उत्तर दिया---"एक समय यहुत भयानक दुर्भित पड़ा था। कई दिन तक लोगा को साना न मिला। जगल में, एक कुटिया में, एक प्रामण, उमकी पगी, बेटा और बहू रहते थे। चार दिन वक भूसे रहने के पश्चात् यह वादा। यहीं से कुछ जो ने लाया। लड़के की मां ने उससे चार रोटियाँ बनाई। वे पाने के लिए बैठे ही ये फि द्वार पर किसी भूग्वे फी श्रापाज श्राई–'अरे, मैं कई दिन से भूसा मर रहा हूँ।' ब्राह्मण उसे दुटिया के अन्दर ले भाया थोर अपने हिस्से की रोटी उसके सामो प दी। परन्तु इससे उसकी तृप्ति न हुई। सन ने अपनी अपनी रोटी उसके अर्पण कर दी। वह तो सार चलता चना, परतु अगले दिन उस कुटिया में चार मुर्दे पाये गये। मैं वहाँ जा पहुँचा। जौ ये पाटे के कुछ कण मेरे शरीर के एक तरफ लग गये। बस, उसी समय यह श्राधा भाग सोने का हो गया। इस यज्ञ में मैं यह देसो श्राया था कि यहाँ पर मेरा बाकी श्राधा शरीर भी वैसा ही स्वर्णमय बनता है या नदीं। परन्तु इस यज्ञ का मुझ पर कोई प्रभार दियलाई नहीं देता राज्य का आरम्भ फ्रास का प्रसिद्ध क्रान्ति से कुछ समय पहले रूस ने मासोसी भाषा में एक छोटी सी पुस्तक "सामाजिक मुबाहिदा" लिखी। इसमें बतलाया गया-"यादमी प्राकृतिक अवस्था में यहुत प्रसन्न था। तर मनुष्य स्वतन्त्र एकएक कर। *रूसा=rousseu सामानिक चिनास EE मोर रार था चवमान समाज यो अवस्था में श्राकर श्रादमी पहुव गिर गया है। यह पयाल बिलकुल नया या! अमीर लोग इस प्रस्तार की दिलगी उड़ाते थे। पारलाइल ने उसी समय भविष्यवाणी के रूप में यहा-"जो लोग इस नये विचार पर हँसो है, उनके पाता के शरीर के चमड़े इस पुस्तक की जिन्दै बाँधो के काम श्रायेंगे।" यह मविप्पणी फ्रान्ति के समय ठीक सिद्ध हुई। इग्लैंड के प्रसिद्ध विद्वार लकिशोर हान्मा दोना समाज को राजा और प्रना के पारस्परिक मुयाहिदे पर ग्राभित मारते हैं। इनमे थाना सा ही अन्तर है। हान्स कहता है-जर एस यार प्रजा ने समस्त अधिकार राजा के हाथ में द दिये, तर वे उन्हें वापस नहीं ले सकते। इस कारण राजा का पद एक्वत्र शासक पा है। इसके मुकाबले पर लॉक का मत है कि प्रजा ने सिफ इकरार किया है। राज्य और महाभारत महाभारत या शान्ति-पर्व राजनीति, युद्ध तथा शान्ति और राजशासन : के पिया पर उच्च कोटि का व्याख्यान है। पुराना होने पर भी यह वर्तमान काल में भी येसा ही शिक्षाप्रद है। उसमें भी राज्य के श्रारम्भ के बारे में विचार किया गया है। यहां बताया गया है कि प्रारम्भिक काल, सत्ययुग, में मनुष्य साधे सादे और प्राय शुद्ध श्राचार के थे। वर न कोई चोरी करता था, न झूठ बोलता था और न किसी को दुख देता था। तब न दण्ड की आवश्यक्ता थी, न माना की। जर प्रजा बहुत बढ़ी तब लोगो के अन्दर झूट, चोरी आदि पाप शुरू हुए। इनसे तग श्राकर कुछ लोग प्रजापति के पास गये। प्रजापति ने कहा-"तुम सब मिलकर अपने म से एक को राजा बनायो जो सरकी रक्षा करे। इसके बदले में तुम लोग अपनी उपज का दसवाँ और सम्मत्ति, श्रथात् बैलों श्रादि, का चौथा हिस्सा उसकी भेंट क्रो।" इसके अनुसार मनु पहला राजा बनाया गया। उसने * लॉक %Lock 1 हान्स-Hobbes # रानशासन%DGovernment (गवर्नमेंट)। 4 मेरे अन्त समारे विचार विभिन कानुन श्रादि बनाये। भागे चलकर महाभारत में भी बताया गया है कि राजा को हटा दना भी प्रजा के हाथ में है जब कोई गना प्रजा की रक्षा करने की योग्यता न ग्यता हो तर उमे मिस्त्री या दृश्न देनेवालो मी समझकर एक तरफ हटा देना चाहिए। जरूरत के पस्त किमी मनुष्य को भी, चाहे वह शद्र ही क्यों न हो, राना बनाया जा सकता है। उसी प्रकार जिस तरह नाव हनने के समय जा कोइ भी नार का पना सके, उसे ही नायक ना देना चाहिए। महाभारत में राज्य का काम चलाने के वास्ते दो सभाएँ बनाने का उल्लेख है। इनमें चारों वणों के प्रतिनिधि चुने जाने चाहिएँ। अान्तरिक सभा-अर्थात् मन्त्रि-समा~में चार ब्राह्मण, वीन क्षत्रिय, दो वैश्य और एक शूद्र होना चाहिए। दूसरी वही सभा में चार ब्राहाण, दस क्षत्रिय, बीम वैश्य और टम शूद्र हो । उन्नति और अनति ब्रह्माण्ड २ चलने का गिला दग हैं।' इसम पिसी चीज को, चाहे यह कितनी ही उत्तम क्यों न हो, सदा दे लिए स्थिरता प्राप्त नहीं ! मोत्तम सिद्धान्तो रे अन्दर ही उनके विनाश का वीज विद्यमान होता है। यह उनति करते है। उनकी शक्ति बढ़ती है। शक्ति बढ़ने पर घमण्ड हो जाता है। घमण्ड के कारण वे श्रधे हो जाते है और अपने दापा को देर नहीं सकते। जिस धन दौलत की वृद्धि पर हमें इतना गर होता है, उसक अमर ही विषयासक्ति और क्लिासप्रियता वा चीज होता है, उसी प्रकार जिम तरह विद्यार्थी ये परिश्रम के अन्दर उसके भागी सुख का बीज होता है। धन जमा करने से भोग विलास बढ़ता है। विश्यामक्ति का भाव बुद्धि पर परदा डाल देता है। इस प्रकार मदाप राष्ट्र दूसरों के साथ न्याय या अन्याय की परवा नहीं करते। प्राचान काल में जिन लोगो ने जातीय अभिमान रे वश में होकर नई बड़े साम्राज्य बनाये, वे एक दिन ऐसे गिरे कि उनके गुलामों का उन पर प्रभुत्व हो गया। उन्होने सबको अपने अंदर जन्य वग्ने का प्रयत्न क्रिया। चाहे वे पचा मरें या सामानिक विकास । नगे, उसने इस सिद्धान्त को बिलकुल मुना दिया कि गुलाम का मालिक भी वैसे ही जम्नाग में कद गता है जैसे गुलाम, क्योकि मालिक को सदा गुलाम की फित रहती है। यह कहा जा सकता है कि पिछले लोगों के पतन के कारण समझने से हम अपने प्रापको गिरने से बचा लेंगे। परन्तु उन कानूनो की प्रक्रिया को हम सदा के लिए नहीं रोक सकते। प्राकृतिक नियम पटल हैं। शरार पीने से नशा होता है। ऐसे हो दूसरा पर प्रभुत्व प्रान करने से मद या घमण्ड उत्पन्न होता है। भगवद्गीता के प्रध्याय ७ वे श्लोक ३० में कहा गया है-शानी मुझको ही अधिव, अधिभूत श्रोर अधियश जानते हैं। मैं ही समस्त ससार को उत्पन्न करता हूँ, मैं ही उसे चलाता हूँ और उसका नाश भी करता है। मैं ही साम्राज्या को बनाता ओर रिगाड़ता हूँ। मेर नाटक के दृश्य हैं। या काल-चन अनादि काल से इसी प्रकार चला आता है। भगवद्गीता का ग्यारहवाँ अध्याय सबसे बहार सुन्दर दृश्य पेश करता इसम ब्रह्म के विराट स्वरूप अथात् सृष्टि की स्थिति और विनाश के टया का ऐसे शब्दा म वणन किया गया है जा मानवी कलम का काम नहीं । का गया है-"में सबसे बड़ा काल हूँ जो मरका नाश करता है। देसो, ये सारे योधा विस तरह मेरी दाढ़ा के नीचे पात्र पिस रहे । अर्जुन, तुम केवल निमित्तमान हा । यह चर तो स्वयमेव मेरी शचि से चल रहा है।" वित्त की उड़ान और सान्दय इससे आगे नहा जा सकते । इमी कारण अजुन अत मे, ययाय २८ श्लाक ७७ मे, रहता है-"हे रि, म उस अद्भुत पम्प से बार-बार याद कर प्रमन हाता हैं।' यहाँ पहुँचकर इतिहास दशन पोर दशाइविरास में परिणत हो जाता है. दोनो करूप हा जाने में। ज्या जो हमारे अन्दर ब्रह्म का चिन वास्तविकता के निकट पहुँचता है, हमारा दशन या तविर अस्तित्व बार उनके प्रदशन को, वस्तु और उमझी छाया को एक ही समझने लगता है।
नवाँ परिच्छेद देवासुर-संग्राम प्राकृतिक निर्वाचन हारिन ने जहाँ विकास का निरूपए क्यिा है, वहाँ उसकी प्रक्रिया को एक पास कानून मे लाना श्रावश्यक समझा है। निरास योग्यतम अवशेष के कानून पर चलता है। वनस्पतियों और जानवरों में, परस्पर और एक दूसरे के विरुद्ध, एक सर्य चल रहा है जिसका उद्देश हर एक का अपने श्रापको बचाने की कोशिश करना है। इस बात की परवा करके कि दूमरे इससे मरते हैं या जीते, इस सघर्ष में जो प्राणी राह्य परिस्थिति के अधिक अनुकूल होगा वह पच जायगा, शेप मारे जायेंगे। दूसर शब्दों में, स्वय प्रकृति योग्यतम का निवाचन करती है और वही वनस्पतियों श्रीर जानवरों में उनति करता है। जैसा कि पहले भी कहा गया है, योग्य का अथ यह नहीं है कि वह निश्चय ही सबसे अच्छा हो । वास्तव में देखा जाय तो वनस्पति और पशु जगत् में अच्छा शब्द का अर्थ सिवा इसके कुछ नहीं है कि उसे राह्य परिस्थिति अधिक पसन्द करती है । बाह्य परिस्थिति म मनुष्य का पड़ा भाग है। परन्तु जब हम मानव सष्टि में श्राते है तर योग्य का अर्थ मी उन्नति करने लगता है। यहाँ पर जीवित रहने के लिए मनुष्य को बाह्य परिस्थिति के अनुकूल बनाना ही पर्याप्त नहीं है। उसे अपने परिवार को भी योग्य बनाना चाहिए, नहीं तो "अन्य योग्य परिवार के मुकाबले वह अमेला जीवित न रह सकेगा। * योग्यतम अवशेष %DSenyil of the fittest ( सवाहवल ऑय् दि फिद्देस्ट)।
देवासुर-सप्राम परिवार के जीवित रहने के लिए यह जरूरी है कि यह अपने पीने को मी पलगन् बनाये और कनीने ये वास्ते अन्य जातियों या राष्ट्रों के मुकारले जिन्दा रहने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी उस जाति या राष्ट्र को योग्य बनाये, जिसमें कई कनीले सम्मिलित हैं, नहीं तो किसी भी याग्य जाति या राष्ट्र के मुकारले यह फपीला माग जायगा। राष्ट्रा या जातिया की श्रयस्था में सबसे अधिक यह फैलेगी जो प्रकृति के मानूनों को मालूम करके प्राकृतिक शचियो पर अपना अधिकार जमा लेगी और साथ ही प्रकृति की उत्पन्न की हुई बीमारियों से अपो श्रापको बचा सकेगी। मनुष्य के सम्बध में यह करना अधिक यथाथ है कि दूसरों के मुकारले यह मनुष्य जीवित रहेगा जिसमें राष्ट्र, पीले और परिवार में दूसरा की अपेक्षा अधिक योग्यता पाई जाती है। श्रय मनुष्य का श्रादर्श व्यक्तिगत नही रहवा, यल्लि राष्ट्रीय हो जाता है। डारविन का अन्वेषण डारपिन ने वनस्पतियों के सत्य उदाहरण देकर यह सिद्ध किया है कि विभिन प्रकार की घास खेत में परस्पर सघप करती हैं। खेत म पहले एक घास होती है। थोड़े समय के पश्चात् दूसरी बढ़ना शुरू करती है। यदि दूसरी श्रधिक बलवान् हाती है तो वह पहली के लिए बड़ो की कोई जगह नहीं छोड़ती। यही हाल वृक्षों का है। किसी बड़े वृक्षनिस्ट छोटे पौधे बढ़ नहीं सस्ते, क्योंकि वहाँ की भूमि से सारी खूराक बडा वृक्ष अपने लिए सींच लेता है। श्रर जानवर को लीजिए। मछलियों में बड़ी अपने से छोटी पर निगाह करती है। जगल के पशुओं का भी यही हाल है। बलपान जागर निग्ल को मारकर मा जाता है। कीड़े- मकोडे पक्षियों के भोजन हैं। प्राय वही पीड़े बचकर यहते हैं जिना रंग दरख्तो के पत्तों या फूलों के समान होता है। इस तरह वे श्रासानी से छिप सकते हैं। हिग्नों की यह जाति बढ़ती है जो ज्यादा तेज़ दौड़ने से अपने को बचा सक्ती है। धीरे दौड़नेवाले हिरन श्रासानी से शत्रु का शिकार हो जाते हैं। श्रय प्राणियों के अतिरिक्त प्रकृति का भी राध १०४ मेरे अन्त समय के विचार परिस्थिति में पड़ा हाथ होता है। जहाँ बहुत सख्त सदों पड़ती है, वहाँ बती जानवर अपनी नसल फैला मकते हैं, जिनके शरीर पर बाल अधिक हा। गरम योर रतीले स्थान में ऊँट की वृद्धि का असर होता है, क्याकि कई दिन तक पानी के मिना गुजारा कर सस्ता है। हरबर्ट स्पसर पोर निर्वाचन का कानुन हरनर्ट स्पेसर मा मत है कि समान के अन्दर विभिन्न सदस्यों में बीच, जाति या राष्ट्र के अन्दर उसके विभिन्न हिस्सो के नीच और ससार में विभिन्न राष्टी या नातियों के बीच जीवित रहने के लिए संघर्ष पाया जाता है। योरप में समाज की विभिन्न श्रोणियों के अन्दर यह सघा प्राचीन काल मे चला पाता है। राम के इतिहास में इसका प्रमाण गरीबों और अमीरा की कशमरश में मिलता है। इस सम्बन्ध में एक नया बहुत प्रसिद्ध है। गम के निधन पेशेवाले लोग शहर को छोड़ एक पहाड़ी पर जाकर "ग्राबाद हुए। उनरी शिकायत थी कि कमाते तो हम हैं, परन्तु भाग पिलास धनी करते है। एक वृद्ध ने उनके पास जाकर उ हे पेट योर पॉर का उदाहरण यो माया-"एक सर हाथा अओर पैरा ने काम करना रोड टिया । कारण कि काम करने का कष्ट तो वे उठाते हैं, परन्तु पाने के वक्त सब कुछ पट हड़प कर जाता है। हाथ-पाँव ने काम करना छोड़ दिया और पेट म कुछ न गया। या हाथ पाँव भी सूबने लगे। ऐसा ही दशा तुम्हारी होगी। इस उदाहरण से प्रभावित होकर के सर पेशाले वापस शम में आ गये। पारप में यह सघप खास ढङ्ग पर चलता है। पहले पल समाज पर चच का प्रमुत्न था। यहाँ तक कि बादशाह भी पोप पीर उसके पादरिया ते कापते थे। सुधार* के श्रादोलन के पश्चात् साग अधिकार चच के हाय स निकलकर नादशाहा श्रार उनके सरदारों के हाथ में चला गया। तपश्चात् फ्राम कोव ने एक और परिवर्तन उत्पन्न कर दिया जिससे इस * मुधार = Rrformation (रिफार्मेशन ) ।
देवानुर-सग्राम १०५ यह शक्ति जनसाधारण के हाथा में चली गई। तर योरप म बादशाहो का कोई महत्त्व न रहा। गत अध शताब्दी में मजदूर लोग, जो पारप के शूद्र समझे जाने चाहिएँ, जाग उठे। योरप का भागी सवर्ष इन्ही लोगा का भेगा। इन्हीं का भविष्य उज्वल दिसलाई देता है। देवासुर-सग्राम मानर जगत् में इस समय का उल्लेख करते हुए भगवद्गीता के ग्रयाय १६ में इमे दैत्री पोर आसुरी प्रकृतियो के दमियान कशमक्श का रूप प्रकट दिया गया है। इन दोना प्रकृतियो का सग्राम मदा चलता रता है। श्लोक ६ में बताया गया है-"श्रामुरी प्रकृति के लाग मनुष्य जाति के शत्रु हाते हैं। उनकी अपवित्रता, चालाका ग्रार दम्भ मसार में विनाश लाते हैं!" दैवी प्रकृतिपाले ससार का भला करते है। निभयता, शाच, सत्य नादि उनके गुण होते हैं। पशु जगत् में तो यह मामला बिलकुल ही साफ है । भेड़ और मेड़िये से पूछिए-"कान सी बात अच्छी है-निर्बल की रक्षा करना या उसे पा जाना , भेड़ तो या गी- "निबल की रक्षा करना धम है।" भेडिया इसके ठीक उल्टा रहगा । मनुष्य की अवस्था में ये दोनो परस्परविराधी प्रकृतियाँ हैं। मनुष्य भी प्राय दो प्रकार के हैं। कुछ ऐसे हैं जो चीज के समान अपने आपको मिनट करके पड़ फलदार वृक्ष पैदा करते हैं। बहुत से ऐसे है जो दूसरा का नुकमान परके खुश होते है। इन दोनों प्रकृति का समय ससार में मदा नारी रहता है। मनुष्य के अन्दर भी हर समय दोनो प्रकार के भागों का इद-युद्ध हाता रहता है। कभी देवमाव की तो कभी श्रानुर भाव की जात होती है। क्षण क्षण की इस विजय या पराजय के अनुसार मनुष्य ऊपर उठता या नीचे गिरता है। देवताओ और असुरा का युद्ध पुराण के अन्दर रूपा के तौर पर देवताओं और दैत्यों के बीच युट का उल्लेख अक्मर पाया जाता है। उपनिषद् में देवता प्रथ इन्द्रियाँ और श्रमुर का नय विषय किया गया है। ये प्रतिक्षण श्रापम में लडाह १०६ मेरे अन्त समय के विचार । करते हैं। यदि और श्रागे देखा जाय तो मालूम होता है कि संसार में देवी और श्रासुरी गुणों का युद्ध हमेशा ही चलता रहता है। एक लड़की जब लाखा रुपयो पर लात मारकर अपनी पवित्रता की रक्षा करती है तब उसमें देवी गुण की विजय होती है। यदि वह अपनी पवित्रता की रक्षा में प्राण दे देती है तब भी दैवी गुण की जीत होती है। परन्तु इस विजय प्रामि से पूर्व दोनों प्रकार के गुणों का बड़ा मारी युद्ध होता है । मनुष्य का शरीर तो मरने के लिए बना है, केवल विचार या ग्पयाल* जीवित रहता है। इन विचारों से वह देवलोक या इन्द्र लोक बनता है जहाँ पितृगण या मृत पूर्वज रहते हैं। भगवद्गीता के पहले अध्याय के श्लोक ४२ में जिस पिंह श्रादि का उल्लेख है, उससे पूर्वजों की स्मृति कायम रसना अभीष्ट है। दुनिया में अधिकार और प्रकाश या, सफाई और गन्दगी का, धर्म और अधर्म का युद्ध सदा से ही जारी है। महाभारत का युद्ध दुर्योधन के विरुद्ध न था, बल्कि रावण और क्स के विरुद्ध युद्ध की तरह दैत्यगुण के विरुद्ध था। सिग्य जर मुगल सेना से युद्ध करते थे तब उनके अन्दर गुरु तेगबहादुर के हौतात्म्य या शहादत का मार जोश मारता रहता था। नये विचार के विरुद्ध युद्ध एक महापुरुष जर ससार में कोई नया विचार पैदा करता है, तो पद उस समय तात्कालिक सभी शधियो के निद्ध युद्ध की घोषणा करता है। यह विचार राजनीतिक स्वतत्रता का भी हो सकता है और मजहनी स्वतन्त्रता का भी। एक मनुष्य अपने व्यक्ति के श्राधार पर एक नया मज़हन चलाता है। उसका विचार लासो करोडो मनुष्यों के दिमाग पर अधिकार जमाकर उन्हें अपना माध्यम बना लेता है। ऐसे ही विचारो ने ससार यो नष्ट भ्रष्ट कर दिया है। सयाल या विचार के सामने एक क्या, लासी मनुष्यों के जीवन का कोई महत्व नहीं होता। खयाल के प्रभुत्व के कारण क्तिने युद्ध हुए, क्तिने निदोंघ मारे गये, बेचारे * विचार या खयाल-Iden (श्राइडिया)। - एक मजही देवामुर समाम मनुध्य पर क्या-क्या मुसीबतें पाई। अपने अन्दर गन्दगी जमा करके मनुष्य प्लेग या ताऊन जैसी वराई बीमारी का बीज पैदा कर देता है जो नगर या प्रान्त में तबाही मचा देता है। बुरा सयाल या कुत्सित विचार भी ऐसा ही होता है। इसा ने एक गुलाम फ़ौम में जम लिया, उनकी शिक्षा भ्रातृत्व और भ्रातृ प्रेम के भायों से भरी थी। शति-सम्पन लोगों ने इन भावों को दबाना चाहा। परतु इसा सपल हुए। इसा से पहले एक मनुष्य ने सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अपना बलिदान कर दिया। रोम में दो गुलामों को लड़ाकर तमाशा देखने का महा शोर था। इन गुलामों का सून देसकर हजारों दर्शक खुश हाते थ। एक बार यह तमाशा होने लगा। दोनों शोर से तलवारें चमक रही था कि अचानक एक वृद्ध दोनों के बीच में लाकर खड़ा हो गया । बुड्ढा लहूलुहान होरर भूमि पर गिर पड़ा। परिणाम स्वरूप यह तमाशा सदा के लिए बद हो गया। यह श्रादमी शायद अारकेमेडीज़ था या अारटेमेडीज। कुछ भी हो, इतनी बड़ी श्रासुरी शक्ति के विरुद्ध दैवी गुण ने चुपके से युद्ध किया और विजय प्राप्त की। इन प्रकृतियों के अन्तस्तल म श्रासुरी प्रकृति के अतस्तल में यात्म प्रियवा या खुद-पसन्दी का भाव काम करता है और दैवी प्रकृति के अन्तस्तल में श्रात्म विस्मृति या बेखुदी का। आत्म प्रियता का वणन भगवद्गीता के अध्याय १६ के श्लोक १३, १८, १६, २० और २१ में पाया जाता है। श्रासुरी प्रकृतिवाले मनुष्य का खयाल होता है कि जिस वस्तु का सम्बघ उसके अस्तित्व से है वह सबसे अच्छी है, किसी अन्य वस्तु का उससे अच्छा होना सम्भव ही नहीं। रह जिस मज़हब को अपना मान लेता है, उसके लिए उसके दिल में ऐसी वमाधता उत्पन हो जाती है कि वह दूसरों को दुनिया से मिटा देना चाहता है। जिस देश में उसम जम होता है उसके लिए वह समस्त ससार को नष्ट करने पर तैयार हो जाता है। अपनी इच्छा के मुकाबले पर वह किसी दूसरे की इच्छा की परवा ही नहीं करता।
मेरे अन्त समय के विचार - फ्रास की अन्ति से मनुष्य केवल अपने अधिकारी को ही समझते हैं, उई स्व उचव्य का कभी ध्यान नहीं होता। मसीनी कहता है- में ऐसे मनुष्यो की सच्या बहुत ज्यादा थी। वे हर समय अपने अधि कारा का उल्लेख करते थे। इसी कारण वह शान्ति सफल न हुई।" जिस ममाज के समी सदस्य अपने अधिकारी का ही ध्यान करें उसका सरस्था सराव ही रहती है। नीट्शे और देवयोनि मन दाशनिक नीटशे* यतमान युग का एक बड़ा तत्ववेत्ता हुआ है। उमने विकास के सिद्धाव से एक कदम आगे बढ़ने का यत्न किया पर सपा और निमांचन के कानून को ही पयाप्त नहीं समझवा । वह कहता है-"विकास सिद्धान्त के साथ-साथ प्रकृति का एक विशेष उद्देश भी है। नद है नमूने की उत्तमता उत्पन करना। प्रकृति में यह मतत प्रयत्न पाया जाता है कि योनि या जाति का अगला नमूना पहली सभी योनियो से उत्तम हो। प्रकृति की सहायता से हम मनुष्य की अवस्था में पहुंचे हैं। इसलिए अब हमारा कर्तव्य है कि अपने अन्दर ने एक ऐसी नई योनि या जाति पैदा करें, जो शारीरिक श्रोर दिमागी ग्ववियो म वर्तमान मनुष्य से ऐसे ही श्रागे हो जैसे मनुष्य पशुओं से आगे इस पानि या जाति का नाम नीट्शे ने देवयोनि रकवा है। इसका उत्पन करने का उसका ग्यास तरीका है। वह कहता है-"प्रकृति में अममता है। मनुष्य भी बुद्धि में बड़ा भेद रसते हैं। इस अममता या नावरावरी से हमें लाभ उठाना चाहिए । बल्कि इस नाररारी का उद्देश ही यह है कि नो मनुष्य शारीरिक और दिमागी तौर पर उच्च कोटि के है उनकी नसल को उन्नति देकर एक नई योनि पैदा की जाय, ऐमे ही जैसे रेत में से सोने केरणा को चुन लिया जाता है।" aizd=Nietachet + योनि%DSpecres (सीसीज़ )! 4 देवोनि =DSuperman (मुपरमैन)। - T .
देवासुर संग्राम 1०8 निम्न श्रोणिया का नीटशे मीनार की बुनिया के समान समझता है । ये बुनियादे बहुत चौड़ी होती हैं, पर तु इनका काम केवल चोटी को सहाग देना होता है। विशेष व्यति मीनारो की उन चोटियों के समान हैं जो तूफान और आँधियाँ अपने सिर पर उठाती है, पर तु सदा सूय की चमक में रहती हैं। केवल इस उच्च श्रेणी को उत्पन करना ही नीटशे निम्न- श्रोण्यिा का उद्देश समझता है। वर्तमान साम्यवाद* को, जो सभी मनुष्या को परावर बनाना चाहता है, वह एक रोग टहराता है । ईसाई श्राचार नीति को वह एक गुलाम कौम का प्राचार सयाल करता है, इसलिए उसमा मन है कि ईसाई सूनिया का कोई महत्त्व नहीं । मनु के नियम और नीटशे न्स योनि का उत्सन करने के जो नियम नीट्शे ने बताये हैं वे सब उसने प्राय मनु + धमशास्त्र से लिये हैं। वह कहता है-"ससार में सुद्धिमत्ता और अनुभव मनु ने एकत्र किये हैं। उसका निणय अन्तिम है। उससे इधर उधर जाने का कोई रास्ता नहा है।" राष्ट्र के उत्प पथ के लिए विशेष नियम बनाये गये हैं। वण-व्यवस्था को वह अपने उदेश के लिए यावश्यक समझता है। ब्राह्मण श्रेणी की और भी उन्नति करके वह नद योनि उत्पन करना चाहता है। श्राय शास्त्रा में ब्राह्मण को समान की समी विशेषतानी का सत माना गया है। इमी सारण यता कहा गया है कि यदि शहर मे आग लग जाय तो सरस पल्ले बामग् का बचाना धम है। ब्राहाण + मुशायले अन्य श्रेणिया म इतना महत्व न था। नीटशे ब्राह्मण को पवित्रता तथा सुन्दरता का प्रतिनिधि मानता है। ब्राह्मण राज की ग्ातिर काम नहीं करते बल्कि इम कारण कि उन्होंने राज के लिए जम लिया है। घाझए का जीवन उपचार के लिए है, इसलिए हर अवस्था में अपने जीवन का यनासा उसका धम है। प्राचीन भारत में ब्राह्मण यद्यपि * साम्याद %Socralism ( सोशलिज्म)। १ श्राचार नीति- Moralute (मेरिनिरी)।
मेरे अन्त समय के विचार सभी चीजा का मालिक होता था, तथापि किसी चीज़ पर उसका अधिकार नहीं होता। एक ब्राहाण जर नगे सिर और नगे पाँव राजा के दरबार में जावा व उसके वप के पल के कारण राजा भी सड़ा हो जाता। भगवद्गीता के अध्याय ३ के श्लोक १४ और १५ में कहा गया है- "ससार एक यज्ञ है जिसमें हर एक चीज़ दूसरे के सहारे पर चलती है। सब प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न आदलों से और दल सूर्य की किरणों से ।" सूर्य सरसे अधिक यश-रूप है। उसकी किरणे समुद्र से मार लेकर न केवल वादल बनाती हैं, बल्कि पौधों और मनुष्यों को जीवन भी देती हैं। यर यन ब्रहा है। जो मनुष्य इस चक्र को आगे नहीं ले जाता, वह निपल ही जीता है। ब्राह्मण होना ही ससार को श्रागे ले जाने के लिए यन है। नोदशे और मनु में भेद दार्शनिक और पि के तरीके में एक अन्तर है। नीशे उस नसल को उत्पन्न करने के लिए युद्ध को बड़ा पवित्र माध्यम समझता है । युद्ध के द्वारा अपने उत्कर्ष और शक्ति-वृद्धि के लिए यह युद्ध के प्राचीन देवता-चोडन*-की पूजा करता है । ईसाइयो के खुदा की अपेक्षा वइ वोडन को बहुत बलशाली मानवा है । ऋषि मनु तो देव-गुणों को विकसित करके सच्चे बाहाणों के द्वारा देव योग उत्पन्न करना चाहते हैं, परन्तु दार्श निक नीटशे इसका तरीका निम्न राष्ट्रों और श्रोणियो को दबाना तथा नए करना समझता है । मगरद्गीता मी श्रासुरी भावों का विनाश करना मत लावी है। वह कहती है कि मनुध्यो से कोई द्वपन होना चाहिए। जब देव-गुण ससार में उन्नति करेंगे तर निम गुण स्वयमेव मिट जायेंगे । गीता में क्षनिय के लिए युद्ध अावश्यक यतलाया है, केवल उस समय जर निल की रक्षा करनी हो या किसी अन्याय को दूर करना हो । अध्याय १५ के श्लोक ४३ में क्षत्रिय के गुण वीरवा, निर्भयता, साहस, युद्ध-कौशल श्रोर दान कहे गये हैं। क्षत्रिय डरकर भाग जाने से पाप का भागी होता है | । * बोडनWoden | दसवाँ परिच्छेद राजयोग सुख की खोज प्राणी मनुष्य-जम पाकर, कस्तूरीमाले हिरन की भाँति, आत्मा की सुगध सी अनुभव करता है और जानते या न जानते हुए उसकी खोज में नटकना फिरता है। हिरन कस्तूरी की खुशबू को झाड़ियों में रूंदवा है और प्राणी श्रात्मा की सुगध को इन्द्रियों के विषयों में। एक जगह प्रश्न उठाया है-जीव का स्वाभाविक स्वरूप सुख है या दु ख ? जीवन के लक्षण में दु ग्व और सुख, दोनो, पाये जाते हैं । दुख का कारण-अनिद्या या प्रश्नान श्रार्य और बौद्ध दशन इसी एक बात की कल्पना करके शुरू होते हैं कि जीव सुग्व की खोज में लगा हुआ है परन्तु ससार में सबको दुःख ही दिखलाइ देता है। इसका कारण हूँढते हुए सभी दर्शनकार एक ही निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। योग-दशन तो वह कारण विद्या बतलाता है। दाव उसे माया पोर साल्य अश्विक कहता है। इस अविद्या या माया का कारण तृष्णा या विषय वासना है जिसमें जकड़ा हुश्रा मनुष्य भूला फिरता है। भगवद्गीता क्या कहती है ? भगवद्गीवा के अध्याय ३ के श्लाक ३७, ३८ ३८ आदि में कहा गया है कि जिस प्रकार घूयाँ श्राग को ओर धूल शीशे को ढाँप देते हैं उसी प्रकार यह तृष्णा श्रात्मा को दांपकर उसे अशान में डाल देती है। इंद्रियो, मन और बुदि में बैठी हुई यह तृष्णा श्रात्मा पर परदा डाल देवी मेर श्रत समय से विचार है। अपनी इद्रिया को काबू में लायर मनुष्य को पहले इसका नाश करना चाहिए। श्लोक ४३ में कहा गया है.-"इस प्रकार श्रात्मा को और उसकी सहायता से इन्द्रियों को, गरकर हम शनु ( नष्णा ) का वश में करना चाहिए।" दून श्रध्याय के श्लोक ६०, ६१,६२, ६३, ६७और ६८ में मनाया गया है.-"शानी के मन को भी इन्द्रियाँ पड़ लेती है। इनको वश में लाने से ही मनुष्य ध्यान कर सकता है। निपया का चिन्तन करने से मनुष्य उनसरी तरफ सिँच जाता है। इससे तृष्णा उत्पन होती है, ताया से नोध, शोध मे बुद्धि का विनाश । बुद्धि न रहने से मनुष्य स्सिी काम का नहीं रहता। विषयी श्रादमी का मन वैसे ही डागाडोल हाता है जैसे तूफान के अन्र जहाज । इसलिए महागह अर्जुन, तू इन इद्रि को विषयों से घटाकर अपने काबू में ला ।' महाभारत का हटान्त महाभारत ३ स्त्रीपर्व में विदुर ने धृतगष्ट से कहा है दुनिया एक रियानान है। जीवन उसमें एक जङ्गल क समान है । यीमारियाँ इस जाल में शेर, चीते, भेड़िये श्रादि है। बुढापा मनुष्य के गले से नुल को तरह लटक रहा है। इनसे बचने के लिए मनुप्य भागता हुया एवं गहरी व दरान किनार, अर्थात् शरीर में, या गिरता है। रह सिर नीचे करके लटक जाता है। रदरा के स्निारे पर पहुत-सी झाड़ियाँ उगी हुई है (ये झाड़ियाँ विषय हैं)। छ ऋतु) और बारह टॉगा (अथात् पारह मास ) वाला एक हाथा (अर्थात् पर ) मनुष्य को मारने के लिए पड़ा है। जिस शाग्वा के सहारे मनुष्य लटक रहा है उसे दो चूहे, एक सफेद और दूसरा काला (श्रथात् दिन और रात }, काट रहे हैं। फन्दरा के अन्दर एक काला नाग (अथात् काल) मुंह पोले पड़ा है। इन भाडियो में शहद का एक छत्ता है जिससे एक एक बृद शहद नीचे टपकती है। मनुष्य * मुंह में पड़ने पर उसे ऐसी भीठी लगती है कि वह सभी इस कन्दराम पास छ मुंह ( अर्थात् यह है राजयोग मुसीरता और सतरों को भूल जाता है। यह वूद तृष्णा को और भी चढ़ा देती है। प्यास के बढ़ने से पहले से ज्यादा दुख होने पर भी इस मिठास की याशा से वह शहद की ओर टकटकी लगाये रहता है। उसे जीने की लालसा बनी रहती है। प्राप्ति के विभिन्न मार्ग भगवद्गीता अध्याय ७ के श्लोक ३ में कहा गया है-"-जारों में से कोई एक सिद्धि चाहता है। उनमें से कोई बिरला ही यत्न करता है। यत्न करनेवालॊ मे से कोई ही मुझसे जान सकता है।" क्यों ? अध्याय १३ के श्लोक २७ में कहा गया है---"देयता वही है जो समस्त ससार के अन्तस्तल में एक सार को पचानता है।" पिर भी अध्याय ४ के श्लोक ११ में इस कठिनाई को यो दूर कर दिया गया है-"मनुष्य जिस क्सिी मार्ग से श्रारे हैं, मैं उनको उसी मार्ग से स्वीकार करता हूँ।" उस तरफ जाने के कई मार्ग है। अध्याय १३ के श्लोक २४ मे बताया गया है-"इस अज्ञान को दूर करने के कई तरीके हैं। कई लोग ध्यान से, कई कर्म से और कई ज्ञान से पहुँचते हैं। भति माग इनके अतिरिक्त एक और तरीका है।" इन चार बडे मागों में से पहला ध्यान स है। ध्यान करने का तरीका राजयोग कहलाता है। भगवद्गीता के छठे अध्याय में राजयाग का सुन्दर, सक्षिप्त, वणन है। शुद्ध स्थान में प्रासन लगाकर यादमी प्राणायाम करे और ध्यान करने का अभ्यास डाले। यम, नियम यादि पाठ सीढियो का विस्तृत वणन योग-दर्शन में पाया जाता है। मन से स्थिरता ध्यान योग में मन की एकाग्रता प्राप्त करना आवश्यक है। स्थिर करना ध्यान है। श्रॉसे बन्द करके देसिए, मन विघर से कि घूमता है। इसे घूमने से रोकने का यत्न कीजिए। आप जितना यल करेंगे उतना ही ज्यादा यह इधर उधर दौड़गा। मन को ६ मेरे अन्त समय के विचार समता उस रथ से की गई है जिसके घोड़े इन्द्रियाँ है, मन उनकी बाग है श्रोर यात्मा सारथि है। अर्जुन जैसा एकाग्र चित्त मनुष्य योग की व्यारया सुनकर प्रश्न करता है-"मन को काबू में करना ऐसा ही है जैसे गाँधी को बाँधना । इसको क्सि तरह वश में करना चाहिए ?" अर्जुन की ध्यानशक्ति प्राचार्य द्रोण द्वारा ली गई उस परीक्षा से मलो भाति स्पष्ट हो जाती है जिसमें उसे पेड़ पर बैठे हुए, पक्षी की श्रॉस के सिवा और कुछ भी दीव नहीं पड़ता था। मन की चञ्चलता और अभ्यास तथा वैराग्य जानवरों में बन्दर सबसे अधिक चञ्चल है। इसी से मन की तुलना बन्दर से की गई है-एसे बन्दर से जो शराब पिये हो और जिसे विच्छू ने काटा हो। मनुष्य में अभिमान और ईयां ही है क्रमश उक्त शयन और विच्छू। भगवद्गीता में अर्जुन को बताया गया है-"यद्यपि मन बड़ा बलवार है, फिर भी अभ्यास और वैराग्य से यह काबू में आ सकता है।" इस विषय में असम्भर मालूम देनेवाली कुछ नाते अभ्यास से सम्भव हो जाती हैं। सरफस में चन्दर, हाथी श्रादि अभ्यास की बदोलत कैसे अाश्चर्यजनक सेल करते हैं। शारीरिक अम्यास करने से दुबला-पतला आदमी भी पहलवान बन सकता है। मन के अभ्यास का अथ है 'उसको सब योर से हटाकर किसी विशेष वस्तु या विचार पर लगाना'। मन को अन्य चीजों से हटाने का मा यम वैराग्य है। इस काम में सत्सङ्ग और धर्मापदेश सहायक हैं। भगवद्गीता में कहा गया है-"विषयो का ध्यान करने से मनुष्य नष्ट हो जाता है ।" गोस्वामी तुलसीदास ने भी एक जगह इसी बात को कहा है- जा कहँ प्रमु दापण दुग्न देहीं । साकर मति पहले हरि लेही॥ यदि मनुष्य पाप करता है तो ईश्वर उसकी अचल का मार दता है । इन्द्रियों के वश में शेर मन विषयों के अधीन रहता है। विषयों की हवा उसे शान्त नहीं होने देती। भगवद्गीता के अध्याय ६ के श्लोक राजयोग १८, १६और २० में बताया गया है.---"एकाग्र चित्त मनुष्य उस ज्योति के समान है जो हवा से सवथा सुरक्षित गवि-रहित जलती है। मन भी शान्त होकर श्रात्मा को अपने अन्दर देख सकता है।" प्राणायाम और ध्यान भगवद्गीता के श्रध्याय ६ के श्लोक १२ श्रीर १३ में कहा गया है--"प्राणायाम मन को स्थिर करो में सहायता देता है। प्राणायाम या उद्देश साँस को गाकायदा बनाना और साथ ही लम्बा करने की शक्ति पैदा करना है।" अनुमर से सिद्ध है कि सास की नियमितता का नाड़ियों को मजबूती से विशेष सम्मध है और इनके सबल होने से मा की स्थिरता असाधारण रूप से रह जाती है। अध्याय ४ के श्रारम्भ के लोकों में यश का उल्लेस करके २६ और २७ श्लोकों में इन्द्रियों को अपने अन्दर डालो को भी यश कहा गया है। इन्द्रियो के ये यश नाक, मान, श्रॉस श्रादि के द्वारा किये जा सकते हैं। श्राम बात है कि किस प्रकार सम्मानी करनेवाले आदमी एक काला दाग बनाकर शाँख झपकाये गर उसकी तरफ देखते रहने का अभ्यास करते हैं। इससे उनकी दृष्टि में दूसरा पर प्रमाव डालने की शचि या जाती है। तप के साधन मगवद्गीता के अध्याय २ के श्लोक ५८, ५६ और ६४ में कहा गया है---"जन मनुष्य मन को उसी प्रकार इद्रियो से पीछे हटा लेता है, जिस प्रकार कछुपा अपने अङ्गा को सिकोड़ लेता है, वत्र विषय वासना धीरे धीरे कम होने लगती है। श्रत में वासना का विचार भी मन से उद जाता है। तभी आत्मा का दशन होता है ।" श्रागे बताया गया है- "इन्द्रियो को निराहार या भूग्वा रखने से विषयों से पीछा छूट सकता है । इन्द्रियो को व्रत में रखना पड़ा भारी तप है।" यम और नियम इसके + सम्मोहन -Hypnotism नाही-Nerve (नव)। (हिनाटिज्म)।
मेरे अन्त समय के विचार - बड़े साधन हैं। यम पाँच है जिना सम्बन्ध समाज मे है। इनके बिना समाज चल नहीं सक्ता। यम ये है--अहिंसा, सत्य, अस्तेय, नामचय और अपरिग्रह ( सग्रह न करना)। नियम भी पाँच हैं जिनका सम्बन्ध मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन से है। "न पर न चलने से दूसरों की कोई हानि नहीं होती, परन्तु श्रादमी खुट श्रोग्य बन जाता है। नियम ये हैं---शौच (शरीर तथा मन की शुद्धि), सन्तोष, तप, स्वाध्याय और प्रणिधान (परमारमा में विश्वास रग्वना)। जीवन का एक भाग, वानप्रस्थ श्राश्रम, इसलिए भी अलग किया गया कि मनुष्य ध्यान मार्ग पर सफलता पूर्वक चलने के लिए एक समय तक ससार और उसके लोगों से परहेज पसे। यह ग्राश्रम अपने श्रापको नेयार करने के लिए है ताकि मन को जीतने की शक्ति उत्पन्न हो जाय । यदि वानप्रस्थ श्राश्रम में रहकर भी श्रादमी का मन विषयों का चिन्तन करता है तो भगवद्गीता के अध्याय ३, श्लोक ६ के अनुसार (-वह मृद और ठग है। ध्यान की श्रनस्था ध्यान के समय यह देखना कि चित्त किधर जाता है, कौन-सी वस्तु उसके लिए श्राफर्षण है और फिर इस प्राक्पण को तोड़कर चित्त को उधर मे हटाना, यह प्रत्याहार कमलाता है। इसमे पागे चित्त की एका ग्रता है। इससे मनुष्य ध्यान पर पहुँचता है। ध्यान से यह समाधि में प्रवेश करता है। तर श्रात्मा अपने ही अन्दर मग्न हो जाती है। ऐसे मन की व्यवस्था जल से अलिप्त कमल के पत्ते की सी हो जाती है। ध्यानी मनुष्य मसार की चीजों को देखता और सुनता है, परन्तु उसका मन इन्द्रिया में परेहता है। . जिस मनुष्य ने मन को जीत लिया है उमने समस्त जगन् पर विजय पा ली है। जो मनुष्य अपने मन का मालिक है पद ममस्त ब्रह्माण्ड का मालिक है। - ग्यारहवाँ परिच्छेद ज्ञान-मार्ग अज्ञान की अरस्था दूसरा माग अज्ञान दूर करके ज्ञान प्राप्त करना है। अज्ञान में फंसा हुआ जीप दुस उठाता है। किसी वस्तु को गलत या उलटा समझना अज्ञान है। पशुना के अन्दर इसके कई उदाहरण मिलते हैं। गधे में हद दज का अज्ञान पाया जाता है। तोता भी अज्ञान के वशीभूत है। दुख उठाता है। इसको पकड़ने का विचिन सा फन्दा बनाया जाता है। छड़ी के एक सिरे से धागा बाँधकर उसे वृक्ष की टहनी से गाँध दिया जाता है । ज्यो ही तावा उस पर श्राकर बैठता है त्यो ही छड़ी का सिरा झुक जाता है। तोता छड़ी को ज्यादा ज़ोर से पकड़ता है। वह सिरा ओर भी नीचे हो जाता है। इस पर तोता पहले से भी ज्यादा मजबूती के साथ उसको पकड़ता है। यह सयाल उममे दिमाग में बैठ जाता है कि पजे मज़बूत करने से जान पच जायगी। स, इसी हालत में शिकारी उसे श्रासाना से पड़ लेता है। मनुष्य के लिए भ्रमजाल पशु की तरह मनुष्य की भी दशा है। पग पग पर ऐसो परिस्थितिया सामने आती हैं जो उसे अमान में डाल देती है। एक यात्री को तालाब के थन्दर मणि चमकती नज़र श्राइ। पानी खून साफ था। उसने कपड़े उतार दिये और मणि निकालने के लिए गोवा मारो लगा। उसे अॉखों से देखता था, परन्तु हाय से परङ्गीन जावी थी। बारम्बार कोशिश करने के बाद यह थक्कर जमीन पर लेट गया। एक मत बह ११८ मेरे अत समय के विचार वहाँ पहुँचे । उसका हाल पृछा। उसके बताने पर उन्होंने कहा-"वृक्ष के ऊपर देखो। चोटी पर एक पछी बैठा है जिसके मुँह में मणि है। मणि की चमक पानी में पढ़ती है ! इसी ने तुमको हैरान कर वसा है।' श्रज्ञान का कारण-तृष्णा भर्तृहरि ने कहा है-'काल नहीं खतम होता, हम गुज़र जाते हैं । भोग नहीं भागे जाते, हमी भोगे जाते हैं। तृष्णा नहीं मिटती, हम मिट जाते है।" भगवद्गीता में बताया गया है--"यह तृष्णा हमारे सारे शशान का मूल कारण है। यह हमारी श्रात्मा पर परदा डाल देती है। तृष्णा की तृप्ति कभी नहीं हो सकती।" भाग में घी डालने से वह और भी जोर से भड़कती है। तृष्णा की अग्नि में भोग डालने से यह और ज्यादा चमकती है। यह याग जितनी ज्यादा भाती है, दुस उतना ही ज्यादा बढ़ता है। जर्मन दार्शनिक शापनहावर ने बड़े सक्षिप्त रूप से सुख को उस भिन्न में प्रक्ट क्यिा है जिसका अशा भोग है और भाजको भोगों की इच्छा। अश के अधिक और भाजा वे कम होने से सुख बढवा है, इसके विप रीन होने पर दुस। यह बताता है कि हमारे भोग तो व्यक्त श्रेणी के नियम के अनुसार बढ़ते हैं। (५ को २ से गुणा करना, फिर ४ को २ से गुणा करना, फिर ८ को २ से गुणा करना, इत्यादि-इसे व्यक्त श्रेणी कहा जाता है!) परतु हमारी इच्छाएँ गुणोत्तर श्रेणी के नियम से बढ़ती हैं। (२ को २ से गुणा करना, फिर ४ को ४ से गुणा करना, फिर १६ को १६ से गुणा करना । इत्यादि गुणोत्तर श्रेणी कहलाती है।) - * भिन्न-Fraction (फेक्शन)। शि-Numerator (न्युमरेटर)। * भाजक=DDenominator (डिनामिनेटर)। ६ व्या श्रेणी:Anthmetical Progression (अरियमेटिक्ल प्रामेशन)। ॥ गुणोत्तर, श्रेणी=Geometrical Progression (ज्यामेट्रिक्ल प्राग्रेशन)।
ज्ञान-माग तात्पर्य यद कि हम जितने ज्यादा भोग भोगते हैं उतने गुना ज्यादा हमारी इन्धाएँ बढ़ जाती हैं। कारलाइल ने इस भिन से एक श्रय गदय मतलर निराला है। गणित का नियम है कि श्रश युछ भी हो, यदि पिसी मिन के भाजक यो राय पर दिया जाय तो उसरा मुल्य निस्सीम हो जाता है। इसी प्रकार मुस सी इस दिन में विभाजक को शून्य कर दीजिए अर्थात् इच्छाओं या तृष्णा को बिलकुल मिटा दीजिए। पस, सुग रिसीम हो जायगा। प्रायश्यकताएँ और भौतिफ उन्नति इस सिद्धान्त पर यह अापत्ति की जा सकती है-"यावश्यस्ताश्री को कम कर देना गलत यात है। इससे श्रादमी सुस्त हो जाता है। इससे विपरीत श्रावश्यक्ताशा की सरया बढ़ाने में शानद की माना पदवी है। फैलार होना चाहिए न वि सिकुड़ाव । पजार के एक रेलवे स्टेशन पर सरदी के मौसम में तो सर एक ग़रीर यात्री बैठा था। उसके शरीर पर कोई कपड़ा न था। उसे सरदी लग रही थी। यह अपने शरीर को सिकोड़ता चला जाता था। एक सज्जन ने उसकी ओर इशारा करके पहा-"यह अावश्यक्ताओं के सम्बंध में सिकुडाव के सिद्धात को प्रकट करता है।" भौतिक उनति करो की भोर ससार के लोगों का स्वाभावित भुसाव है। यहाँ तक कि यह भौतिक उत्कर्ष ही अपवर्ष उत्पन्न करता लोगों को यह उपदेश करने की ज़रूरत ही नहीं कि ये अपनी इच्छाओं को बढाकर भोगों की वृद्धि फ्रें। ऐसा परने की तो हर एक मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। दर्शन का काम है लोगों को वास्तविक्ता का शान कराना। यह बात दूसरी है कि उसके सुनने, समझो और उस पर भाचरण करने पर कोई बिरला ही तैयार होता है। • सिकुडाव का सिद्धान्त-- Theory of Contraction (थियरी श्राव् कांट्रेक्शन)। है १२२ मेरे अन्त समय के विचार शान का आनन्द और वाणी भगवद्गीता का दूसरा अध्याय आत्मिक शान का समुद्र है। इसके श्लोक ७० में कहा गया है.-"ज्ञानी का मन समुद्र के अतस्तल की तरह शान्त हो जाता है। समुद्र में नदिया गिरती हैं, तूफान आते हैं, परन्तु उसकी तह ज्यो की त्यो अचल और शात रहती है।" श्रयाय ५ के श्लोक २४ और २५ में बताया गया है-"जो योगी अपने श्रान्तरिक श्रानद को प्राप्त कर लेता है वह इस जम में ही मुचि का श्रानन्द हासिल कर लेता है। इस जन्म में वह जनक के समान नीवन-मुक्त है। जाता है। यह श्रानन्द केरल स्व सवेद्य है। इसका अनुभर वही करता है जिसमें अनुभव करने की शक्ति होती है। उपनिपद् में कहा गया है-- "उसके मन की घुण्डियाँ दुल जाती है, सशय मिट जाते हैं, कर्म नष्ट गे जाते हैं और वह अात्मा के स्वरूप को देखने लगता है।" भगवद्गीवा के अध्याय ७ के श्लोक २ में कहा गया है-"यह वह भान है जिसके जानने के बाद और कुछ जानना पानी नहीं रहता।" लोग पूछते हैं- "ऐसे ज्ञान से हमें क्या लाभ होगा? ग, इससे हमें कौन सा भुस मिलेगा" यह सवाल ऐसा ही है जैसे पिता से बेटे का यह पूछना कि 'यदि मैं विद्या लाम करूंगा तो क्या इससे मुझे सिलौने मिलेंगे। गीता अध्याय ५ श्लोर १६ में कहा है-"यह शान ज्ञानी के हृदय को सूर्य के समान प्रकाशमय कर देता है।" पहाड़ की चोटी पर चढ़कर देखने से बादल अक्सर पाँव के तले मालूम होते है और नीचे वरसाव होने पर भी मूर्य सिर पर चमक्ता होता है। इसी प्रकार रासार के सभी बादल जान के पाँव तले रह जाते हैं, उसके ऊपर हमेशा गाा का सूर्य चमकता रहता है। जीवन मुक और सासारिक काम काज ऐमा मनुष्य शरीर धारण करते हुए भी मुक्त हो जाता है। हिंदू पतिप्रवा नारी घर का सब काम-काज करती है, परतु उसका चित्त हर
स्य संवेद्य । धराया अनुभा बद्दी करता है
शक्ति देती है। उपनिषद् में कहा गया है--
angrन जीई, सशय मिट जाते है, कर्म नष्ट
मा के यमायो देशाने लगता"
प्रणाय शलोक २ में पद गया है-"यह र
* पार और उप जानना बाकी नहीं रहता।"
नभान में हम क्या लाभ होगा? दा, इससे हमें कीन
बार मशास माही जमे पिता से बेटे का यह पूछना
र श्रन्त समय के विचार
का मानन्द और वाणी
अध्याय यात्मिक शान या समुद्र है। इसके
-"शानी या मन ममुद्र के श्रतस्तत की तरह
द्र में नदियाँ गिरवी , तुफान पाते हैं, परन्तु
प्रचल और शान्त रहती है।" अध्याय ५ के
थताया गया है.--"ar योगी अपने ग्रान्तरिक
ग। यह इस जन्म में ही मुक्ति या श्रानन्द
हम जन्म में वह जनक के समान जीपन मुक्त है।
.
१२२ मेरे अन्त समय के विचार " शान का आनन्द और वाणी भगवद्गीता का दूसरा अध्याय अात्मिक ज्ञान का समुद्र है। इसके श्लोक ७० में कहा गया है-"जानी का मन समुद्र के अन्तस्तल की तरह शान्त हो जाता है। समुद्र में नदियाँ गिरती हैं, तूफान पाते हैं, परन्तु उसकी तह ज्यो की त्यो अचल और शान्त रहती है।" अध्याय ५ के श्लोक २८ और २५ में बताया गया है.जो योगी अपने आन्तरिक श्रानन्द को प्राप्त कर लेता है पद इस जम में ही मुकि का श्रानन्द हासिल कर लेता है। इस जन्म में वह जनक के समान जीवन मुक्त है। जाता है।" यह श्रानन्द केवल स्व सवेद्य है। इसस अनुमर वही करता है जिसमें अनुभव करने की शक्ति होती है। उपनिषद् में कहा गया है- "उसके मन की घुण्डियाँ खुल जाती हैं, संशय मिट जाते है, कर्म नष्ट हो जाते हैं और यह प्रात्मा के स्वरूप को देसने लगता है।" भगवद्गीता के अध्याय ७ के श्लोक २ में कहा गया है.-"यह वह जान है जिसके जानने के बाद और कुछ जानना बानी नहीं रहता।" लोग पूछते हैं-"ऐसे शान से हमें क्या लाम होगा ? य, इससे हमें कौन सा मुस मिलेगा " यह सवाल ऐसा ही है जैसे पिता से बेटे का यह पूछना कि 'यदि मैं विद्या लाभ करूंगा तो क्या इससे मुझे खिलौने मिलेंगे' गीता अध्याय ५ श्लोक १६ में कहा है--"यह शान ज्ञानी के हृदय को सूर्य के समान प्रकाशमय कर देता है।" पहाड़ की चोटी पर चढ़कर देसने से यादल अक्सर पाँव के तले मालूम होते है और न चे बरसात होने पर भी सर्य सिर पर चमक्ता होता है। इसी प्रकार ससार के सभी बादल जान दे पाँव तले रह जाते हैं, उसके ऊपर हमेशा शान का सूर्य चमक्ता रहता है। जीवन-मुक्त और सांसारिक काम-काज ऐसा मनुष्य शरीर धारए करते हुए भी मुक्त हो जाता है। हिन्दू नारीवर का सब काम-काल करती है, परतु उसका चित्त हर शान मार्ग १२३ समय अपने पति के प्रेम में मगन रहता है । इसी प्रकार जीवन मुस' ससार में रहता हुश्रा भी उससे अलग रहता है । राजा जनक के जीवन-मुच हाने का दृश्यन्त दिया जाता है। (भगवद्गीता में उनको जीवन मुर का नमूना बताया गया है।) एक सयासी ने जना के पास जाकर अपना सशय प्रकट क्यिा-"श्रापको लोग जीवन मुक्त क्यों कहते हैं ! श्राप तो ससार में लिप्त हैं।" जनक ने यज प्रासाद के नदर ही सयासी को हो के लिए जगह दे दी। अचानक एक दिन थोडे फासले पर श्राग लग गई। सिपाही दौड़े-दौड़े श्राये। उन्होंने राजा को सर दी जो उस समय उस सन्यासी के पास बैठे थे। राजा ने श्राग को बुझाने का श्रादेश दिया। पिर सबर श्राइ, श्राग तो महल के पास था पहुँची। यह मुाते ही सयासी उठा और बोला-"मेरी लँगोटी श्रीर लोय पड़ा है। उनको लेने जा रहा हूँ।" इस पर जनक २ सन्यासी को समझाया कि तुम्हारा मन लँगोटी और लोटे ये अन्दर फंसा है इसी से इतनी धनराहट पैदा हुई ।
बारहवाँ परिच्छेद भक्ति-मार्ग जनसाधारण का मार्ग--भक्ति भगरद्गीता अध्याय १२ के श्लोर ६,७,८,५४ श्रादि में, अध्याय १८ के लोर ६५ और ६६ में, और अन्य कई स्थाना में कहा गया है- "तुम मेरी शरण में पायो । मेरा प्रेम ऐसा है कि मेरी शरण में श्राने से तुम सभी ग्लेशो से बच जायोगे।" पारहवें ययाय के आरम्भ में प्रश्न उठाया गया है -"पाप तक फोन-सा माग श्रासानी से पहुँचाता है ?" श्लोक ५, ६ ओर ७ में उत्तर दिया गया है-"जो सब कर्म मुझ पर छोड़ देते हैं और अनय भत्ति से मेरे पास श्राते हैं उन्हें मैं मृत्यु के समुद्र से जल्दी पार करवा देता हूँ।" जान ओर ध्यान, ये दो मार्ग, बहुत थोड़े मनुष्यों के लिए हैं। श्राम लागों के वास्ते भक्ति और कर्म के मार्ग हैं। इन दोना रास्तों पर चलना अपेक्षाकृत नासान है। प्रेम और भक्ति का भाव स्वभारत हर मनुष्य के अन्दर पाया जाता है। स्वार्थ एक पोर चलता है, प्रेम दूसरी पोर । ज्यो-नो प्रेम पढता है, त्यो सो अादमी सासारिक खुदी को भूलता जाता है। किसी मनुष्य में जर यह भाव पराकाष्ठा तक पहुँच जाता है तब उसके लिए शेप ससार का कोई अस्तित्व नहीं रहता। ग्राम तौर पर प्रेम मनुष्य में काम भाव के रूप में पाया जाता है। परन्तु विचार और सुस गति से उसका रूप भक्ति और आध्यात्मिक प्रेम में बदल जाता है।
मति मार्ग तुल्सीदास, सूरदास श्रादि इसपे उदाहरण है। इस प्रकार बहुत सी युवतियाँ भिनुणिया बन जाती हैं। नेता से प्रेम भक्ति का एक रूप साधारण समा-समाजों, मजहबी श्रादालनी और दल-सङ्गठनों में पाया जाता है। मनुष्य प्राय अपने नेता पर इनना प्रेम और विश्वास करते हैं कि उसके लिए ये सब कुछ करने पर तैयार हो जाते हैं। जनसाधारण अपने नेता के अस्तित्व में अपने अस्तित्व को भुला देते हैं। साधारण लोगों में इस प्रकार का भार प्रशसनीय है। परतु भारत में कुछ चाला श्रादमियों ने मजहबी तौर पर इसका गहणीय प्रयाग किया है। एक दल को अपना मत बनाकर उसके श्रदर दासल उत्पन्न कर देना नौच कर्म है। यहाँ के कुछ धूर्त कहते हैं-"इश्सर मेरा मित्र है, मैं उससे प्रतिदिन बाते करता हूँ। इसलिए मेरी बात को तुम अक्षरश. मानो।" कुछ समय बाद वे एक नया तमाशा रच लेते है-"इश्वर का तो ससार में कोई अस्तित्व ही नहीं, मैं ही ईश्वर है। मेरी ही पूजा क्यिा करो।" लेकिन योरप और अमेरिका के समाज ऐसे मूसों से मदा बने है। वहाँ ऐसे पारसएड प्राय नहीं चल पाते। परमात्मा किससे प्रेम करता है? मत्सीनी का सयाल है कि भावी युग का मज़हब मानरता हागा । इसका उद्देश इस बात का प्रचार होगा कि परमात्मा की दृष्टि से प्रेम करा और दूसरों के सुप में अपना सुग्व ममझो। दूसरों के उपकारार्थ काम करना ही सबसे बड़ी इश्वर पूजा है। यो तो प्राय सभी लोग परमात्मा से प्यार करते हैं। परतु गीता पारहवें अध्याय के लोक १२, १३, १४ श्रादि में बताया गया है कि * भिक्षुणियाँ -Nuns (नज)। दिल संगठन=Party organisation (पार्टी आर्गेनिज़शन)। + मानवता= Humanity (हमैनिटी)।
१२६ मेरे अन्त समय के विचार , "जो सर प्राणियों के लिए मित्रता और करुणा का भा रखता है, ममता और अदद्वार से रहित हावा है, मुस-दुप को बराबर समझता है, सदा धैर्य से काम लेता है और मन क्या बुद्धि मेरे अर्पण कर देता है वह मुझको सरसे प्रिय है।" भगवद्गीता के अध्याय ६ के श्लोक ३० में कहा गया है-'जो मनुष्य मेरे अन्दर सभी प्राणी और समी प्राणियों में मुझको देखता है यह मुझमे कभी पृथा ना होता। जिसका किसी से कोई पैर नहीं वह मेरा सचा भक है।" इस श्लोक की तरह कई अन्य स्थानो, उदाहरणाय अध्याय ११, में भी श्रीकृष्ण कहते हैं-"मैं दी ससार की आत्मा हूँ।" लोगा की यह पहेली समझने में बड़ी मुश्किल होती है कि एक मनुष्य ससार की आत्मा क्योंकर बन सम्वा है। इसको समझने के लिए हम एक दृष्टान्त लेते है। मनुष्य की प्रात्मा को हम एक सूक्ष्म विन्दु मान लेते हैं। साधारण अवस्था में हर एक मनुष्य अपनी श्रात्मा को शरीर से सीमित समझता है। यह मनुष्य जो कुछ करता है अपने शरीर के लिए ही। जन मनुष्य इससे उन्नत होकर अगली अवस्था में जाता है तब यह अपनी श्रात्मा (सल्फ) को फैलाकर अपने परिवार तक ले जाता है। इस अवस्था में वह परिवार को ही सब कुछ समझता है। मनुष्य की उनति का अगला दजा यह है जिसमें विरादरी के अन्दर यह अपनी श्रात्मा पैला देता है। इस प्रकार यह बिदु पैलते-फैलते परिवार से कुल वक पहुँच जाता है। श्रात्मा के पैलाव का अगला क्षेत्र जाति है। जो लोग जाति के लिए जीते और मरते है वे जाति में ही अपनी श्रात्मा देखने हैं। ऐसे मनुष्य देश और जाति या राष्ट्र के लिए हर प्रकार का त्याग करते हैं। मनुष्य की उन्नति एक दर्जा और बाकी है। तन मनुष्य प्राणि मान के अन्दर अपनी प्रात्मा को फैला हुआ देसता है। यह अवस्था है जहा पर पहुँच- कर मनुष्य का स्वार्थ और परमार्य एक हो जाते हैं। उसी श्रात्मा समस्त ससार की श्रात्मा हो जाती है और वह उन्नत श्रारमा समस्त ब्रह्माद की भति माग १२७ मात्मा के साथ एक हो जाती है। भगवान कृष्ण को श्रात्मा इस उन्नत श्रयस्था में थी। इसी लिए ये अपो श्रापको सारे ब्रह्मांड की यात्मा कह सकते थे। पूजा का अर्थ परमात्मा की भक्ति की वीणियाँ है--स्तुति, प्राथा और उपा सना। जिस प्रकार हम पिसी माय मग्न या अद्भुत शक्पिाले मनुष्य को देखकर चवित होते है और हमार अन्दर उसके लिए प्रशसा-भाव उत्पन होते हैं उसी प्रकार परमात्मा को समस्त ब्रदर में काम करता हुश्रा दगार हमारे मा में स्तुवि का भार उसन होता है। पिसी विचित्र गुण को देसार हमारे अन्दर उस गुण को प्राप्त करने की इच्छा जर होती है। परमात्मा को और अधिर जानने की इच्छा का नाम प्राथना है- "हमारी बुद्धि वीक्षण हो और हम श्रापको और ज्यादा जान स।" दिन प्रतिदिन अधिक अध्यया करता हुया वचा अधिक भान प्राप्त करवा है। ऐसा करते करते यह गुरु के अधिक निकट हो जाता है। इसे उपासना कहते हैं। हम उसी शक्ति को ब्रह्माट में देखते हैं जिसे अपने श्रदर काम करते पाते हैं। इस सच्ची उपासना से हमें समी प्राणियों के श्रदर परमात्मा की शत्ति नज़र याती है। परमात्मा की संगति में हम उस लोहे ५ समान होते है जो चुम्मा के साथ लगो से चुम्बक हो जाता है। एक कवि की कल्पना है-"सिया बाँस के क्योंकि यह अभिमानी सीधे ऊँचा ही ऊँचा चला जाता है और अन्दर से खोसला होता है-नो मी वृक्ष चन्दन के पास होता है यह चन्दन के समान मुगधित हो जाता है ।" भगवद्गीता के अध्याय ४ के श्लोक ३६ में कहा गया है-"उसको प्राप्त करने के बाद बड़े से बड़ा पापी भी पाप ये समुद्र से पार हो जाता है।" भक्ति और मूर्ति भगवद्गीता के अध्याय ७ के श्लोक २१ से १२३ रतलाते हैं-"जो जिस देवता की पूजा करता है उसी में मैं उसकी श्रद्धा पूरी करता हूँ। वह १२८ मेरे अन्त समय के विचार उस देवता मे पल मान करता है, परन्तु वास्तव में फल देनेवाला मैं हूँ याही समझाले लोग देवताओं की पूजा करते हुए उन तक पहुंचते हैं । मेरे भक्त मुझको पाते हैं।" अल्पबुद्धि लोग इन श्लोकों में मूर्ति-पूजा की सिद्धि हु ढ़ते हैं। भगवद्गीता में देव का अर्थ ज्ञान, विद्या, वीरता आदि गुण हैं जैसा कि अध्याय ४ के श्लोक १२ से प्रकट होता है । मेर पाब्द का अर्थ 'श्रात्मा का है। निस अर्थ में मूर्ति पूजा थानरल भारत में समझी जाती है उसका भगवद्गीता में विचार भी नहीं मिलता। यदि मूति के श्रदर हमें कोई गुण दिसलाई नहीं देता और न हमको यह शात है कि जिसकी यह मूत्ति है उसके क्या गुण हैं तो उस मूति से भक्ति भार कैसे उत्पन्न हो सकता है ? और, यदि हमको किसी देवता के गुणा का वास्तविक शान है तो उसकी मृत्ति बनाकर रखना न रखा बरा- बर है। भगवद्गीता के अध्याय ६ के श्लोक २६ से २६ में कहा गया है.-'यदि कोई मनुष्य प्रेम से एक पत्ता भी मुझे भेंट करता है तो मैं उसे सह्म स्वीकार करता हूँ। यो तो सभी मुझे प्रिय हैं परन्तु जो मनुष्य मुझसे प्रेम करता है वह मुझमें मिल जाता है। तय मैं उसमें होता हूँ और वह मुझमें होता है।" आत्मा का विस्तार ही प्रेम की जड है प्रेम वास्तव में क्या है १ ऐतस्य उपनिषद् में इसका सुन्दर विवेचन है। ऋषि पूछता है--"माता को पुन और पुन को माता क्यो प्रिय है ? पत्नी को पति तथा पति को पत्नी क्यो प्रिय है" आगे चलकर जगान दिया गया है.-"पुन हो के कारण लड़का माता को प्यारा नहीं, रल्कि प्रारमा के कारगा। पली पत्नी के कारण प्यारी नहीं है बल्कि प्रात्मा के कारण। यो स्नी, पुत्र और पिता अगणित है, परन्तु हम उनमें से एक को इमलिए प्यार करते हैं कि हमारी आत्मा का उससे सम्मघ है। कोई मनुष्य दूसरे श्रादमी को उनकी पातिर प्रम नही करता, बल्कि इस लिए कि अपनी आत्मा को फैलाकर उसे दूसरे के अंदर देखता है। यही उसका प्रेम है। ज्ञानी लोग अपनी प्रामा को इतना पैलाते हैं कि " भति-मार्ग १२६ समाज, जाति, मानव समाज बल्कि प्राणि मान में अपने श्रापका ही समझने लगते हैं। यदि इसमें मी खुदी का कुछ अंश है तो वह इतना अधिक पैला हुआ है कि उसका अस्तित्व नहीं के बराबर है। भगवद्गीता के अध्याय १२ के श्लोक ६ और ७ में कहा गया है- "अर्जुन ! तुम मन, बुद्धि और कर्म, सब कुछ मेरे अर्पण कर दो।" अध्याय १८ के लोक ६५ और ६६ में बताया गया है-"ह अर्जुन, सर धर्मों को छोड़ मेरी शरण में ना जा। मुझ पर भरोसा रस | मेरे चरणों में था और मेरा ही भक रन जा। मैं तुझसे कहता हूँ कि तू ऐसा कर, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।" इन श्लोकों को पढ़ने पर मनुष्य एक बार अपना अस्तित्व भूलकर भगवद्गीता में तन्मय हो जाता है। तर प्रेम में मग्न हो पुकार उठता है-"मैं धन नहीं चाहता। न मुझ सुन की इच्छा है, न मुक्ति की। मैं केवल आपके प्रेमामृत का प्यासा हूँ।" प्रेम और विश्वास बल ज्या ज्या प्रेम बढता है त्यो त्यो विश्वास बढ़ता है । तर नि स्वार्थ भाव पाता है और अहङ्कार मर जाता है। अपने पूज्य की भक्ति में भक अपने श्रापको सो देता है। इस विश्वास के अन्दर वह बल पैदा हो जाता है जिसमा मुकाबला दुनिया में नहीं हो सक्ता । इस विषय में एक हिरनी की कहानी याद रखने योग्य है। छोटे बच्चे समेत उसे शिकारी ने पकड़ लिया। शिकारी ने एक तरफ भाग लगा दी, दूसरी तरफ कुत्ते खड़े कर दिये, तीसरी वरफ वाड़ बना दी और चौथी वरफ चीर-कमान लेकर खुद चैट गया। हिरनी को परमात्मा के सिवा कोई सहारा दिखाई न दिया। उसने भगवान् को सच्चे दिल से याद किया। सयोग से प्रॉधी चल पड़ी। इससे बाड को आग लग गई और वह जल गई। उघर से एक सॉप निकला। उसने शिकारी को डस लिया। यह देखकर हिरनी अपने बच्चे को लेकर भाग गई। ६ तेरहवाँ परिच्छेद कर्म-मार्ग विना फर्म के सब कुछ व्यर्थ है सिर्फ शान प्राश कर लेने में मनुष्य का कतव्य पूरा नहीं होता। यदि मनुष्य ने कर्म करना नहीं सीसा तो उसका नाकी सब कुछ सीखा हुना ध्यर्थ हो जाता है। भगवद्गीता के अध्याय ३ के श्लोक ४, ५ श्रादि में कहा गया है-"बिना कर्म के कोई मनुष्य रह नहीं सकता। और, बगर कर्म के काई भी मनुष्य कर्म के फन्दे से निकल नहीं सकता।" बागे चलकर श्लोक २० में बताया गया है-"जनक श्रादि ने कर्म करके ही सिद्धि प्राप्त की थी।" शान और कर्म कर्म और ज्ञान पर विचार करते हुए प्रश्न उठता है---"दोनों में से क्रोन अच्छा है ?" भगवद्गीता के अध्याय ५ के श्लोक ४ और ५ में उत्तर दिया गया है-~"ज्ञान योग और कर्मयोग वास्तव में एक ही हैं। मूर्स ही रहे जुदा-जुदा समझते हैं। जन साधारण के लिए नगर कर्म के अकेले ज्ञान मार्ग पर चलना बहुत कठिन है।" एक राजा ने शनु पर श्राममण किया। उसका मनी शनु से मिल गया । फलत उसे राज-पाट, स्त्री श्रादि छोड़कर भागना पड़ा । यद्यपि उसे शाव था कि उसकी स्त्री और मिना ने उसका साथ छोड़ दिया है तथापि मन उनकी ओर लगा रहने से वह दुख में पड़ा रहता। कर्म और शान एक-दूसरे के अन्दर मिला हुआ फ्ल देते हैं। जब अन्धा लूले को कन्धे पर उठगवा है तभी वृक्ष से फल तोड़कर दोनों खा कर्म मार्ग वद सकते हैं। परेशान ये म अधे के समाा है और पार कर्म के गान लूले के समान है। एक व्यक्ति ने किसी देव को शपो परा में कर लिया। देव ने उससे यद श की--"श्राप जो कुछ मांगेंगे मैं यही प्रस्तुत कर दूंगा। परतु मुझ हर समय प्रापको कुछ न कुछ काम यताना होगा। अगर श्राप मुझे हर यक काम न बवायेंगे तो मैं श्रापको सा जाऊँगा।" शव मजूर कर ली गह। जब यह श्रादमी उस देव से अपनी सभी श्रावश्यक्ता पूरी करवा चुका वर देव के लिए उसे कोई काम न नजर अाया । डर के मारे भाग निकला। देव उसका पीछा कर रहा था । उस शख्स को रास्ते में एक साधु मिला। साधु ने उससे भागने का कारण पूछा। प्रपणी मुसीबत बतलाने पर साधु ने उसे इलाज सुझाया-'जमी7 में एक बाँस गाड़ दीजिए। देव जर दूसरे कामों से निपट जाय तर उसे बाँस के ऊपर नीचे चदो उतरने की श्राशा दे दें।" इस परकीय से उसका छुटकाय हुना। मनुष्य का मन भी उस देव के समान है। यदे माष्य इसे कोई काम न खाये तो यह मनुष्य को ही साने को दौड़ता है। कर्म मार्ग ही इसके लिए याँस है जिसके द्वारा इससे पचार हो सकता है। भगवद्गीता के अध्याय ३ के श्लोक ६ में बताया गया है-“इन्द्रियों को यार से रोककर मन के विषयों का ध्यान करना ठगों का काम है। मनुष्य का स्वभाव भी उससे कर्म करपाता है। शानियों के लिए इस कारण मा कर्म करना श्रापश्यक है कि दूसरे लोग उनका अनुकरण करते हैं। भगवान कृष्ण कहते हैं-"यद्यपि ससार में मेरे लिए कुछ भी करना पाकी नहा है फिर भी मैं कम करता हूँ जिससे जनसाधारण काम छोड़कर अपने विनाश का कारण न हा" (अध्याय ३, श्लोक २२ से २४ ।) कर्म के द्वारा कर्म का त्याग कम और त्याग की समस्या अाने पर भगवद्गीता के श्नध्याय लोक २ में कहा गया है-'यद्यपि सन्यास या त्याग भी अच्छा है, तथापि कर्म मेर अन्त समय के विचार माग इससे ऊँचा है।" अनेक मनुष्य-धर्म को कीचड़,के समान समझते हैं। कारण, जब कर्म के अन्त में कर्म से ही मुक्ति प्राप्त करनी है, वह कर्म करना पहले कीचड़ से हाय सराब करना और फिर पानी से हाथ धोने के राबर है। इसका उत्तर यद्यपि विचित्र सा मालूम देता है, तथापि है सच । फर्म से मुक्ति धर्म के द्वारा ही है। सस्ती है। इसलिए कर्म वीचा के समान नहीं है। यह असम्भव है कि मनुष्य कर्म न करे, क्योंकि कर्म करना मनुष्य का स्वभाव है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि इस स्वमाव का ऐसा उपयोग करे कि फर्म के पन्दे से निकल जाय। यही कर्मयोग का सबसे बड़ा रहस्य है। कर्म के द्वाय स्वार्थ को दूर करना कर्मयोग है। यह बात कठिन है, परतु इसका तरीका श्रासान है। पहले तो सिर्फ इतना जानना जरूरी है कि धर्म वह करना चाहिए जिसमें दूसरों का भला हो। ऐसा करने से कर्म करनेवाले का भला स्वयमेव हो जाता है। व्यक्गित इच्छा धीरे-धीरे कम करके दूसरों की भलाई को अपना उद्देश सना लेना चाहिए। भगवद्गीता के अध्याय ३ के श्लोर ११ और १२ में कहा गया है.-"जिस प्रकार सूर्य, चन्द्रमा, हवा श्रादि सन देवता दूसरों की खातिर अपना-अपना काम करके ससार को चलाते हैं उसी प्रकार मनुष्य को चाहिए कि वह भी दूसरों के लिए कर्म करे ।' वनिक श्रागे चलकर श्लोक में बताया गया है-"जो काम अज्ञानी इल्ला में बँधा हुया करता है ज्ञानी उसे इच्छा छोड़कर करे।" कर्म से फल की इच्छा निकाल देना दूसरी मंजिल में भगवद्गीता के अध्याय २ का लोक ४७ हमारा पथ प्रदर्शन करता है। इसमें कहा गया है---"तुम्हारा कर्तव्य केवल कर्म करना है, फल की इच्छा रमना नहीं।" जब मनुष्य सभी नाम पर उपकार की सातिर करता है तब क्या हुना यदि उसका फल अच्छा है या बुरा १ क्सिी कर्म से दुख तभी होता है जब कर्म के साथ फ्ल की इच्छा मिली होती है। मुभावजा की इच्छा रखकर किसी भला करना एक ५६ कर्म माग प्रकार की दूकानदारी है यम करने का उद्देश ससार की ऐसी भलाई न होनी चाहिए जो नज़र ना सके, बल्कि यह कि न उस फर्म में श्रीर न उसके पल में करनेवाले की अपनी उन्नति का विचार विद्यमान हो। इस प्रकार फर्मयोग का वास्तविक उद्देश पूरा हो जाता है और हमारी मुस्लि हल हो जाती है । काम करता हुआ मनुष्य कर्म से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। भगवद्गीता के चौपे अध्याय के भोक १८ में एक पहेली का उल्लेख है-"वही पूरा शानी है जो यम में अकम और अकम में कर्म देसता है।' यात साफ है, निष्काम कर्म में त्याग और जादिरा त्याग में कम या मन का सना समझना भान है। क्मयोग का रदस्य नि स्वाथपरता की शिक्षा देते हुए मुक्ति का रास्ता रवाता है। जब कर्म समझार कर्म करने की आदत पड़ जाती है तब अन्दर की खुदी स्वयमेव मर जाती है और श्रादमी ब्रह्मानन्द को प्राप्त करने का भागी बन सकता है। फर्मयोगी इस बात की परया नहीं करता कि ससार उसे क्या कहता है। पल का अच्छा या बुरा होना उसको नुस या टुप नहीं देता, प्रशसा या निन्दा उसे प्रसन या अप्रसन नीं कर सस्ती। गीता ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य भगवद्गीता के अध्याय १२ के श्लोक १८ और १६ में बड़े सुदर ढग से एक सच्चे कर्मयोगी का वणन किया गया है--"न वह खुश होता है न रज करता है, न इच्छा करता है न परहेज़ करता है। यह अच्छे और बुरे, दोनों, से परे हो जाता है। स्तुति निन्दा, मान अपमान, सरदी-गरमी, मुस दुस और मिन शनु के विचार से भी आगे हो जाता है।" भगवद्गीता में सभी मागों का उल्लेस है। परन्तु इन सबमें प्रधान क्म मार्ग को ही माना गया है। श्नध्याय २ के श्लोक ३६ में भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं-"अमी तक तुमने ज्ञान योग ही मुना है। अब मैं तुम्हें क्मयोग बतलाता हूँ जिसके फलस्वरूप तुम्हें व्यव सायात्मक बुद्धि प्राप्त होगी।"
मेरे अन्त समय के विचार गया है। अध्याय २ के श्लोक ३१, ३२, ३३ और ३४ में कर्म करने के बारे में युतियां दी गई हैं। इनका समर्थन ३८, ३६, ४० और ४१ में बड़े जोर के साप किया गया है। अध्याय ३ श्लोक २१, २२ श्रादि में एसी यात पर जोर दिया गया है । अन्त में जाकर, अध्याय १८ के श्लोक ७२ में, सारे ज्ञान के विस्तार के बाद, भगवान् कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं- "क्या अशान से उत्पन्न हुधा तुम्हाय मोह दूर हुधा है या नहीं ?" इसका उत्तर (श्लोक ७३ ) अर्जुन यो देता है-"मेरा माह दूर हो गया है। मुझे सत्य ज्ञान मिल गया है। अब मैं वही करूँगा जो आप अाशा देंगे।" यह उद्देश है जिस पर भगवद्गीता हमको ले पाती है। उपनिषद् और निष्काम कर्म उपनिषदों में निष्काम कर्म करने पर बहुत जोर दिया गया है। छादोग्य में एक कथा है जिसमें निष्काम कर्म के महत्व को प्रकट किया एक बार इद्रियों और विषयों में परस्पर युद्ध हुआ । इद्रिया देवताओं और विषय देत्या के समान है। इस मुकाबले में इन्द्रियाँ हारने लगी। अब उन्होने अपना नेता चुनने का विचार किया। पहले अखिों को नेता बनाया गया । यह देसर असुरों ने खूबसूरत चीज़' सामने रख दी। ऑसे उधर पँस गई, इसलिए इन्द्रियाँ हार गई। फिर उन्होंने कानों को चुना। असुरों ने मीठे मीठे स्वर और राग शुरू कर दिये। कान उनमें उलझ गये। तब उन्होंने नाक को नेता बनाया। वह सुगन्धमय वस्तुओं में फंस गया। अन्त में उन्होंने प्राणों को अपना नेता घोपित किया। प्राणों में कोई न था। वे किसी प्रकार असुरों के दाँव में न पैसे । देवताओं की जीत हुई । प्राणों के समान निस्वार्थ होने से ही मनुष्य ससार के युद्ध में विजय लाभ कर सकता है। प्राणवत होना ही देवत्व है। स्व-फर्तव्य पृर्ति ही धडा कर्मयोग है महाभारत में ऐसी कई स्थाएँ पाई जाती है जो कर्म के महत्त्व को अतलाती हैं। उनमें से एक यो है-एक नवयुवक योगी वृक्ष के नीचे फर्म-मार्ग बैठा था। ऊपर से एक पछी ने पीट पर दी। योगी ने शोध पूर्ण दृष्टि से उपर देसा। वह पक्षी जलता हुआ नीचे आ गिरा। वही योगी एक दिन भिक्षा माँगता हुप्रा किसी गृहस्य के घर पहुंचा। गृहिणी उस समय अपने रुग्ण पति की सेवा में सलग्न थी। भिना लाने में उसे कुछ देर हा गा। जब वह भिक्षा देने लगी तर योगी उसकी तरफ भी लाल शाखा से देखने लगा। स्त्री ने देरका कारण यवाकर क्षमा मांगी। परन्तु रोगी शान्त न हुथा। इस पर यह पाली-"महाराज, यहाँ कोई चील-यौए ही है जो श्रापके इस प्रकार देखने से जल जायेंगे।" योगी हेरा हो गया। देवी से उसने शान छोपना चाहा। स्त्री ने पाशी में एक प्रसाई का पता बताया जो प्रक्ट में नीच फर्म करने पर भी वास्तव में शानी था। अपना अपना कर्म ही सबसे बड़ा योग है। स्त्री के लिए कर्मयोग स्त्री के लिए सबसे बड़ा योग उसका पवित्रत धम है, यह बात सावित्री की क्था से भली भाँति प्रकट होती है। सावित्री एक राजा की लड़की थी। वह यही पतिव्रता थी । एक अल्पायु मुनि-कुमार सत्यवान् से उसका विवाह हुअा था । ब्याह से एक वर्ष बाद सत्यवान् की मौत हुइ । यमराज स्य उसके प्राण लेने पाया। लेकिन सावित्री ने अपने पति-परायणता- रूप तप से यमराज को प्रसन्न कर सत्यवान् को पुनर्जीवित करा लिया । अनाहम लिङ्कन ओर कर्मयोग कई अय स्थानों में भी हमको कर्म के अच्छे उदाहरण मिलते हैं। अब्राहम लिङ्कन अमेरिका का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध राष्ट्रपति था। घोड़े पर सवार वह अकेला जा रहा था कि राले में उसने एक सूधरी को कीचड़ में फंसा हुआ देखा । वह निक्लो की कोशिश तो करती थी, पर तु निक्ल न सकती थी। लिङ्कन घोड़े से उतर पड़ा। बड़ी मुश्किल से उसने सूधरी को निकाला। इस प्रयत्न में उसके कपड़ों पर कीचड़ के दाग लग गये। पिर घोड़े पर सवार होकर वह राष्ट्र-समा में चला गया। कुछ सदस्यों ने कीचड़ लगने का कारण पूछा । इस पर उसने सारी बात बताई। इसे सुन- मेरे अन्त समय के विचार कर वे सदस्य कहने लगे-"श्राप रहे दयालु है जो सूअर को भी दुस मैं न देख सके।" लिकन ने उत्तर दिया-"मैंने यह प्रयन उसका दुप दूर करने के लिए नहीं किया था। इसमें मेरा स्वार्थ था। मैं अपने मन के क्लेश को दूर करना चाहता था। उसका दुस मुझे श्रा लगा। उससे छुटकारा पाना मेरे लिए ज़रूरी था।" मालाना कम और काधा मौलाना स्म ने एक शेर लिया है जिसका अर्थ यह है-"दिल को काबू में कर , यह रहा हज है। हजारा काया की निस्वव एक दिल को कान में करना कहीं बेहतर है।" मौलवियों ने मौलाना रूम को काफिर करार दिया। पलत उसके खिलाफ फतवा पास करने की तैयारी होने लगी। अपनी सफाई में उसने इस शेर का कारण बतलाते हुए यह कथा मुनाई-"एक बार में हज करने के लिए काना गया। लेकिन वहाँ मैंने काना को मौजूद न पाया। इधर-उघर से पता लिया, जिधर काया गया था उधर में भी चल पड़ा। गले में काना मिल गया। मैंने जब उसके उपर जाने की वजह पूछी तो उसने बताया कि वह एक बुढ़िया के स्वागत के लिए गया था।" इस पर मुझे उस बुढिया को देखने का शौक पैदा हुआ। उसकी सेवा में उपस्थित होकर मैंने उससे पूछा-'क्या कारण है कि वह सागा, जिसके पास लाखों श्रादमी जाते हैं, यापके स्वागत के लिए ग्राया था। वृद्धा ने उत्तर दिया--'मुझे इसका कुछ भी जान नहीं।" तब मैंने कहा-'मासिर अापने बड़े पुण्य का कोई काम क्यिा होगा।' वृद्धा बोली- 'मुझसे और तो कुछ हुश्रा नहीं। हाँ, अभी पाते हुए रास्ते में मैंने एक कुत्ते को कुएँ के मुंह के गिर्द फिरते वह प्यास से हाँफ रहा था। कुओं बहुत गहरा था। मैंने पत्ता में एक दोना तैयार किया और अपने कपड़े फाड़कर डोरी बनाई । परन्तु होरी छोटी निकली, दोना पानी तक न पहुँचा । जर कोई कपड़ा न रहा तर मी सिर के बालों को उसाडकर एक रस्सी सनाई और पानी निसलकर कुत्ते को पिलाया। यह कथा सुनकर मैंने अपने दिल में देखा।
कर्ममार्ग १३७ सोचा कि जब एक तुच्छ पर दया करने से कावा ने उस बुढ़िया का इतना मान किया तर श्रादमी का दिल हासिल कर लेना निश्चय ही काबा के हजो से बेहतर है।" युधिष्ठिर और कुचा इसी प्रकार का, परन्तु इससे कही बढकर, सुदर दृष्टान्त युधिष्ठिर का है। राजपाट करने के पश्चात् पाँचों भाइयो ने यह निश्चय किया कि हिमालय की बर्फ में जाकर गल जायँ। द्रौपदी को साथ लेकर वे सब हिमालय की ओर चल पड़े। उस रास्ते पर चलते हुए पीछे मुड़कर देखना पाप समझा जाता था। सबसे पहले द्रौपदी भूस श्रीर प्यास के कारण थककर रह गई। उसने प्राण छोड़ दिये। फिर श्रागे चलते चलते पहले तो नकुल और सहदेव मृत होकर गिर पड़े, तब भीम और अर्जुन । अब युधिष्ठिर अकेला रह गया। एक कुत्ता शुरू से उसके साथ चला श्रा रहा था। अन्त में युधिष्ठिर स्वर्गलोक के द्वार पर पहुँच गया। उसके लिए दरवाजा खोला गया। युधिष्ठिर ने कुत्ते को अन्दर प्रवेश करने के लिए इशारा किया। इस पर पहरेदारों ने कहा-"नीच कुत्ता स्वर्गलोक में कैसे प्रविष्ट हो सकता है!” युधिष्ठिर बोला-"परन्तु मैं तो अपने साथी को छोड़कर अकेला इस लोक में पाँव न रक्खू गा।" बहुत वाद- विवाद के पश्चात् कहा गया-"केवल एक शव पर कुत्ता अन्दर जा सकता है, वह यह कि अपने सारे पुण्यो का फल श्ाप कुत्ते को दे दें।" ज्योंही युधिष्ठिर ने इसे स्वीकार किया त्याही सामने से परदा हट गया और दृश्य बदल गया। सभी लोकों में युधिष्ठिर की जयजयकार होने लगी। द्रौपदी और चारों भाई युधिष्ठिर के सामने खड़े थे। इत्ता धर्मराज के रूप में हाथ जोड़कर युधिष्ठिर के साथ था।
३४० मेरे अन्त समय के विचार प्राचीन जातियो की सभ्यता और वर्वमान मज़हनों-यहूदियो के मजहब, इसाइयत और इस्लाम में इतना अतर है कि ये मजहब अज्ञेय रातों में विश्वास पर बहुत जोर देते हैं और प्राचीन जावियाँ अपनी रीतियो पर । इस फल को छोड़कर देखें तो पेगन सभ्यता और वर्तमान मज़हन के अर्य एन प्रयोग एक से मालूम पड़ते हैं। एक नीति-शास्त्र कहता है-"जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा धर्म करता है। जो मनुष्य धर्म को मारता है, धर्म उसका नाश कर देता है।" राष्ट का धर्म भी राष्ट्र का रक्षक है। मजहर और सभ्यता भी राष्ट्र के रक्षक हैं। वास्तव में धर्म, मज़हन, वहजीब या सभ्यता का अर्थ एक ही है। हमारा मजहब हमारा क्योंकर हुआ? जिसे हम अपना मजहर कहते हैं उसके लिए हम सब कुछ बलिदान करने पर तैयार हो जाते हैं। परन्तु इस बात पर बहुत कम लोग ध्यान देते है कि उनका मजहब क्याकर उनका है। जिस मजहर को हम अपना समझकर उससे इतना प्यार करते हैं उसके चुनने में हमारा प्राय कोई हाथ नहा होता। प्राय हमारे माँ-बाप का मजहब ही हमारा मजहर हो जाता है। बचपन में विशेष विचार क्रम हमारे दिमाग पर ऐसा जम जाता है कि हम अपने जीवन में बुद्धि तथा विद्या-सम्बधो चाहे जितनी उन्नति करने पर भी उन विचारों से पीछा नहा छुड़ा सकते। हमारा समाज उसी प्रभार को दृद्ध करता है। अपने मज़हब के साथ लोगों का लगाव इतना ज्यादा हो जाता है कि जो कुछ उसके अनुसार न हो- वह उन्हें चुरा मालूम देने लगता है। यही नहा, अय मज़हनों से घृणा भी हो जाती है। यह मनुष्य के तपस्सुत्र या मज़हनी पक्षात की नार है। इसी कारण ससार में मज़हबी असहिष्णुता पैली है। मजहबी पक्षपात और घृणा प्रकट रूप से मजहब के नाम पर लड़ाइयाँ श्रार स्वून- गरानी नहीं हुई जो पिछने जमाने में होती रही है। इसलिए हम इस युग मत-मतान्तर समझने लग जाते हैं कि दुनिया उन्नति कर गई है, मजाहवी अत्याचार की पुनरावृत्ति का कोई डर नहीं । लेकिन यह केवल नुमाइशी नात है। असल में हर एक मनुष्य अपनी शक्ति को प्राय उन्हीं कामों में सर्च करता है जो या तो प्रेम-वरा किये जाते हैं या घृणा के कारण करने पड़ते हैं। एक मजहब के कई करोड मनुष्य शेष सभी मनुष्यो से मजहब के कारण द्वप रसते हैं। ससार में सबसे अधिक घृणा की सृष्टि मज़हबी मतभेद के कारण होती है। इसका इलाज भगवद्गीता मे बताया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं.-.-"सभी रास्ते मुझ तक पाते हैं। जो जिस रास्ते से श्राता है उसे मैं उसी रास्ते से स्वीकार करता हूँ।" यह सच्ची सहिष्णुता है जो अन्यत्र कहीं नहीं दिखलाई देती । मजहबों का विस्तार प्राचीन जातियाँ भी जहाँ जहाँ जाती थीं, उनकी सभ्यता की अच्छा बातें श्नय जातियाँ स्वयमेव ग्रहण कर लेती थी। परतु जब से क्तमान मज़हनों ने सभ्यता का स्थान ले लिया है तब से उसके प्रसार के तरीके विचित्र से हो गये हैं। यद्यपि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में अपनी भत्ति तथा प्रम पर जोर दिया है परन्तु यह सर एक प्रकार से रूपक है। 'मैं' का श्रथ वहाँ आत्मा है। बौद्धमत ससार में सबसे पहला मजहब है जिसमें गौतम बुद्ध ने अपने नाम पर मज़हम जारी करके प्रचार का पैलाव का साधन बनाया। उनका अनुकरण कर यजाओं के बेटे-बेटिया तक ने धर्म प्रचार का काम किया । बौद्ध मत के बाद इसाइ मज़हब ने अपने आपको फैलाने में प्रेम तथा नम्रता से बहुत काम लिया, साथ ही तलवार से भी कम काम नहीं लिया। इसलाम ने तो अपने पैलाव के लिए प्राय तलवार का ही सहारा लिया। समय आने पर ईसाइयत और इसलाम की वलवारों का मुकाबला हुआ। श्राठवी शवान्दी के पहले भाग में स्पेन ने जीतने के पश्चात् मुस्लिम पौ मांस पर चढ़ गई। तब सारी ईसाई जावियाँ मुकाबले के लिए प्यार हो गई। पेरिस के पास ही इसलाम और ।
२४२ मेरे अन्त समय के विचार इयत का निर्णायक युद्ध हुना, जिसके परिणाम के सम्बध में प्रसिद्ध अँगरेज़ ऐतिहासिक गिरन यो लिसता है-"यदि इस युद्ध में इसलाम जीत जाता तो श्राज आक्सफर्ड और बैंनिज के विश्वविद्यालयों में अँगरेज विद्वान् मुसलिम विद्यार्थियों को कुरान पढ़ाते होते । सचमुच चार्ल्स मार- टल ने योरप को इस गजब से बचा लिया ।" मजहयों के फेलाच के साधन यदि श्राज वर्तमान मजहयों के रसने में लोगों का अपना हाथ नहीं है तो यह देखना बाकी है कि जिन लोगों ने ये मज़हब ग्रहण किये, उहोंने क्या सोच विचार के बाद ऐसा किया था। विभिनमनुष्यों और जातियों ने जिन प्रभावों के अधीन मज़हनी परिवर्तन स्वीकार किये, वे श्राश्चर्यजनक है। हमारा अाश्चर्य और भी बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि यदापि मज़हन रखनेवाले लोग अपने अपने मजहर से इतना प्रेम करते हैं, फिर भी इन परिवर्तनों को पैदा करनेवाली सबसे बड़ी शक्ति तलवार या युद्ध में विजय है। तलपार की ताकत ने मिलवासियां और ईरानवासियों जैसी दो पुरानी मातियों को मुसलमान बनाया तो जर्मनी को ईसाई पनने को बाध्य क्यिा। विवाह-सम्बध ने भी मजहबी परिववन में बड़ा भाग लिया है। फ्रास और इंग्लैंड के इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। अज्ञानता के युग में चमत्यारों के किस्से-कहानियों ने भी मजहबी तबदीली में बहुत काम किया है। प्रचारकों और मिशनरियों के त्याग- मय जीया भी इसे सहायता देते रहे हैं। स्कूलों और अस्पतालों को भी मज़हब फैलाने का साधन बनाया गया है। भारत में अत्यधिक गरीबी के कारण अकाल के दिनों में प्रनाथ यर्चा को कैसे काबू में किया जाता है ! इन यातों पर जितना अधिक विचार किया जाय उतना ही यह तथ्य अधिक स्पष्ट होता है कि जिन लोगों ने इन प्रभावा के अधीन शेकर अपना मज़हब बदला है, उन्होंने न तो कोई नैतिक उन्नति की है, न मजहब के चुनो में सोच-विचार से कुछ काम लिया है।
मत मतान्तर विभिन्न मज़हयों का स्रोत मज़हनों की तुलनात्मक विद्या- इस परिणाम पर पहुंची है कि विमिन मजर एक ही स्रोत से निकले हैं और इनकी प्रकट मिनताएँ वास्तव में उन्हीं सिद्धान्तों के उलट-पलट और बिगड़े हुए रूप हैं। सबसे प्राचीन काल में भारत, बेबेलोनिया और मिस ने उन्नति की थी । इनकी सभ्यतानों के अन्दर बहुत हद तक पारस्परिक समानता दीख पड़ती है। जीवात्मा का श्रावागमन, समाज की वर्ण-व्यवस्था, देवताना का पूजन----ये बातें सबमें मिलती हैं । मासीसी विद्वान् जकालियों ने अपनी "भारत में बाइबल" नाम की पुस्तक, में कई अफाट्य युक्तियों से यह सिद्ध करने का प्रयत किया है कि अपने मजहब और कानून में प्राचीन मिस्र- वासियों ने हिन्दू धर्मशास्त्रों का अनुकरण किया है। इन भावों को यहूदियों ने मिस में निर्वासन के समय सीखा और अपनी तौरेत में दर्ज क्यिा। इसके साथ ही यहूदी कनोले ने बेलोनिया की सभ्यता को भी अपने श्रदर जज्ब कर लिया। पलत चिरकाल तक उनमें देवताओं का पूजन प्रचलित रहा। देवताओं के संघर्ष में मॉलाक जेहोगाई श्रत में जीत गया और वह सबसे बड़ा माना जाने लगा। ईरानियों और हिन्दुओं का सम्बन्ध प्राचीन ईरानियो का भारतीय पार्यों से बहुत घनिष्ठ सम्बध था । एक विद्वान् डामेंटेटर का कहना है कि जद अवेस्ता की शैली और विषय वेद से बहुत मिलते हैं। पारसी मत की रीतियों-होम, अग्नि पूजा, पवित्र सूत्र ( यज्ञोपवीत की तरह) श्रादि-से सिद्ध होता है कि दोनो सभ्यताएँ किसी समय एक थीं। ईरानियों ने यहूदी मजहब पर * मजहबों की तुलनात्मक विद्या=Comparative Theology ( कम्पैरिटिव थियालोजी)।। जकालिये%DJacalliot * भारत में बाइबल=Bible in India मॉलाक जेहोवा-Alalloc Jehova ॥ सार्मस्टेटर%Darmesteter | मेरे अन्त समय के विचार प्रभाव डाला । यूनान और इटली में भी उन्होंने अपनी सभ्यता फैलाई। यूनान और इटली में, जो योरप में सभ्य देश थे, ईसाई ननने से पूर्व, मिया देवता की पूजा प्रचलित थी। यही देवता वेदों में मिन कहलाता है जिसका अर्थ सूर्य है। इटली के लोगों का सबसे बड़ा त्यौहार इस देवता की जातीय पूजा थी जो दिसम्बर मास के अन्त में, सूर्य के उत्तरायण के समय, की जाती थी। वाद को ईसाइयो ने हिकमत से इस त्योहार को ईसा का कल्पित जन्म दिन बताकर क्रिसमस का त्यौहार बना लिया। चौद्धमत का प्रभाव ईसा के जाम से कुछ समय पूर्व बौद्ध प्रचारकों ने ईरान, सीरिया श्रादि में अपने विचारों का पयाप्त प्रचार किया। अफगानिस्तान तो पूण रूप से योद्धमत्र के अधीन था। इधर घरमा, चीन और जापान में भी बौद्धमत जोर पकड़ रहा था। पक्षपात-रहित विद्वानों की राय है कि इसा की शिक्षा में जो ऊँचे नैतिक तथा प्रा यात्मिक विचार पाये जाते ई वे गौतम बुद्ध की शिक्षा के प्रचार के फल हैं। माक्स और नज़* (अर्थात् मिक्ष और भिक्षुणियों), पादरियों की वसीह या सुमिरनी, गिरजी में मूर्तियां, मूर्ति के सामने धूप-दीप जलाना श्रादि सभी रीविया बोद्धमत की थीं। सदियो नाद जन योरप के ईसाई पादरी पहले पहल भारत में आये तब मन्दिरो श्रादि में ये रिवाज देख ये चकित हो गये थे। बौद्ध मत के निर्माण, बुद्धि, योग, बुद्धि युक्त श्रादि शब्द भगवद्गीता में पाये जाते हैं। बौद्धमत के अईत और भगवद्गीता के स्थित प्रज के लक्षण सर्वथा एक से हैं । भगवद्गीता के कई श्लोक, उदाहरणाथ अध्याय २ का ६६, अध्याय ७ का २६ और श्नध्याय १२ का १५, अक्षरश चौद्ध पुस्तकों में। यहूदी परम्पराएं और इसलाम अरन मी सभ्यता और राजनीतिक शक्ति को ससार में इसलाम ने कायम किया । अरब की प्राचीन सभ्यता बेबेलोनिया की सभ्यता की एक * माक्स और नज= Monks and nuns | - मत-मतान्तर शाखा थी। बाल के घर पर से यह रिसर जुरा थी। हजरत मुहम्मद ने एक ऐसी शनि उत्पन कर दी जिसने लड़ने झगड़नेवाले पुराने अना से जलाकर नया जीवन उत्सन्न कर दिया। इसलाम के अतर्गव पैगम्बरी का सिद्धान्त, ससार की उसत्ति, श्रादम और होगा, दोजख र बहिश्त की कल्पना, इत्यादि यहृदी मजह की पाते हैं। फ़क इतना है कि यहृदी दहे अपने कबीले के लिए ही समझते रहे और मुसलमाना ने दूसरा क श्रदर इनमा प्रचार करके उनको अपो मजहन में शामिल कर लिया । योरप में प्राचीन विद्याओं का पुनर्जन्म लगभग एक हजार वप तक योरस ईसाइ मजहर के प्रभुत्व म रहा। यह यारप के इतिहास का अधकार काल है । इसाई चर्च ने सभी विद्याना को अपने कब्जे में करके इन भूतल से मिटा दना चाहा। पंद्रहवीं शताब्दी में जर कुस्तु नतुनिया तुकों के हाथ आया तो विद्या व्यसनी लोग यूनानी और रोमन दर्शन तथा सभ्यता की सभी पुरत- अपने साथ लेकर यारप में फैल गये। तर यारप इन विद्याओं का अध्ययन नये सिर से शुरू हुआ। इस श्रादोलन को विद्याश्रा का पुननमा कहा जाता है। यदि इस समय पुरानी पेगन सभ्यता यारस में न फैलती तो विचार-स्वातन्य और प्रकृति प्रेम का यह भाव कभी न उत्पन होता जो यारप की चवमान उन्नति के अन्तस्वल में काम करता है। इसी विचार- स्वतनता के कारण मज़हबी सुधार का बड़ा आन्दोलन शुरू हुश्रा। यह मुधार के सिद्धान्ता का प्रचार था जिससे श्रत में फ्रान्स की बड़ी मान्ति हुई । इसी आधार पर अब योस में ऐसे विद्वान् विद्यमान हैं जिनकी आंखें खुरा गदवार जो इसाइ मजहर य यतमान रूप से सतुष्ट नहीं हैं। * मजहब में शामिल करना=Plosely tisation ( प्रासेलाइटि जेशन)। 1 दिन्याश्रा का पुनजम= Renna-ance (रेनायसास)। * मज़हबी सुधार = Renaissance (रिफार्मेशन)।
पन्द्रहवाँ परिच्छेद सिद्धान्त सैद्धान्तिक और क्रियात्मक मजहब मोटे तौर पर मजहर के दो बड़े हिस्से हैं-~-एक क्रियात्मक, दूसरा सैद्धान्तिक । पहले में लोगों के लिए हिदायते पोर श्रादेश रहते हैं, उदाहरणार्थ सच बोलना, सर से प्रेम करना इत्यादि । दूसरे में ये सिद्धान्त होते हैं जिनको मानना मजहब के अनुयायियों के लिए आवश्यक है, उदाहरणार्थ ईश्वर एक है जो दुनिया को पैदा करता है, यह मनुष्य को ग्वास तरीके पर सजा और जज़ा-दण्ड और इनाम-देवा है, इत्यादि । जहाँ तक पहले भाग का सम्मध है सभी मज़हर एक जैसे हैं। कोई मज़हब नई बात नहीं सिखलाता। ईसाई प्रचारक कभी-कभी यह कहते हैं कि शन से प्रेम करो। परन्तु ईसा से कई सदिया पूर्व गौतम बुद्ध ने इस सचाई को बड़े अच्छे ढङ्ग पर बताया था-"यानन्द ! घृणा ते धृणा दूर नहीं होती, वह तो प्रेम से दूर होती है ।" यह वात केल सिद्धातों के विषय में है जहाँ विभिन्न मज़हनों के प्रकट रूप में एक दूसरे से मिनता पाई जाती है। द्वेप रसने या झगड़ा पसन्द करनेवाले मनुष्य के लिए तो ये मतभेद जीवन के लिए पर्याप्त कार्य प्रस्तुत कर देते हैं, परतु गहरी नज़र से देसने पर मालूम होता है कि इन प्रकट मिनवाना के नीचे एकवा की बड़ी लहर चल रही है जो अन्त में सरको एक ही स्रोत तक ले जाती है। ईश्यर विश्वास विभिन्न मजा के वाले एक सिद्धान्त, ईश्वर पर विश्वास, साने पड़ा है। इस विषय में प्राय समी सहमत हैं। ईश्वर क्या है-इसरा सिद्धान्त जानना तो असम्भव है। इस विषय में भगवद्गीता में जो कुछ कहा गया है, यह सनसे बढकर है-~"कुछ लोग उसको श्राश्चर्य से देखते हैं। कुछ उसे याश्चय बतलाते हैं। कुछ ऐसे हैं जो उसे पाश्चय से मुनते है। परन्तु सुनते हुए भी उसे कोई नहा जानवा ।" हर एक मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार उसका एक नाशा अपने मन में बना लेता है। संसार में जहाँ थोड़ी सी एक्ता है वह भिनता इतनी है कि हर एक मनुष्य शकल-सूरत इत्यादि में शेप सभी मनुष्यों से भिन है। कई बार श्रादमी सिर्फ चाल से पहचाना जाता है। हर एक की चाल जुदा-जुदा होती है। अक्ल भी हर एक की अलग अलग है। इसलिए ईश्वर भी प्राय सर के लिए भिन्न भिन है। ईश्वर के बारे में असम्य और सभ्य मनुष्यों की धारणात्रो में कितना अन्तर है। बोद्ध, पारसी और मुसल- मान के इश्वरविषयक दृष्टिकोण में जो भिन्नता है उस पर कुछ कहना अनावश्यक है। ईश्वर से मनुष्य का सम्बन्ध दूसय सिद्धात ईश्वर के साथ मनुष्य के सम्बध के बारे में है। श्राम तौर पर सभी मजहर किसी न स्मिी प्रकार इसके साथ अपना सम्बध जोडते हैं। कोई उसे शासक समझते हैं और उसकी प्रशंसा तथा खुशामद करना यावश्यक समझते है। इस कारण विभिन्न मजहर्वा ने विमिन प्रकार की प्रार्थनाएँ श्रोर इबादत के तरीके निश्चित कर रखे हैं। भगवद्गीवा के अयाय ६ के श्लोर ३०, ३१ तथा ३२ श्रोर अध्याय १३ के श्लोक ८ में कहा गया है-'योइ भादमी चाहे कैसा हो पापी हो, जत्र उसने मेरी ओर पाने का निश्चय कर लिया तर वह शीघ्र ही सुधर जाता है। मेरी शरण में थाने से पारी, शूद्र, वैश्य अोर स्त्री, समो सिद्धि को प्रास कर सकते हैं।" मुक्ति का स्वरूप तीसरा सिद्धान्त मुक्ति का है। ऐसा मालूम होता है कि पैगम्बरी या सेमेटिक मजहोंने प्रा यात्मिक समार या चित्र अपने सामने भौविन १४८ मेरे अन्त समय के विचार ससार को रसकर बनाया है। रूपक के तौर पर इस चिन का कुछ अथ हो सस्ता है। परन्तु यदि यह कोरी कल्पना है तो फिर इन सिद्धान्तों का रगातिर लड़ाई-झगड़े और युद्ध की क्या जरूरत १ उम कल्पना चित्र को अक्षरश सही मानने से कई दोष पैदा हो जाते है। यदि सचमुच को बहिश्त या दोज़रा, स्वग या नरक, है तो वह इस दुनिया के कैदरवानों आदि की नस्ल या तो खुदा ने सगाई है या फिर उन लोगों ने खुदाइ दस्तूरी पर चलने का प्रयत्न किया है। बहिश्त के बार में विचार करने पर मालूम होता है कि हर एक दश और हर एक मजहर के लोग अपने अपने विचारा तथा परिस्थिति के अनुसार उसका चित्र बना लेते हैं । नारवे ग्रादि देशों के लोग स्वग वा रीछा से भरा हुआ समझते है तारी उन्हें वहाँ रीछ का शिकार करने का यानन्द प्राप्त हो। अरब के लोग उसे नहरो पीर हूरा श्रादि से भरा हुआ गयाल करते हैं, क्योंकि उनकी तपीयत को यही चीजे पसद याती है। जो लोग ईश्वर को एक महान शचि समझते हैं, उनके लिए इस शक्ति से दूर होना अशान है और अज्ञान दुर है। उसके निस्ट रहना शाा है और ज्ञान मुख है। इसलिए ईश्वर के चरणा म सदा रहना ही उनसी मुक्ति है। एक वेदमन में कहा गया है..-"उसको जानकर ही हम मृत्यु के समुद्र से पार हो सक्ते हैं। इसके सिवा और कोई रास्ता नहा ।" उत्पत्ति का विषय सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में कुरान में कहा गया है कि खुदा ने जर कुन शब्द कह दिया तो सब कुछ बन गया। पाइरिल में बताया गया है कि पहले केवल राब्द था और शब्द खुदा के साथ था , उससे ससार प्रकट हुना। मैक्समिलर ने अपने वेदान्त विषयक व्यारयानो म दिपलाया है कि अँगरेजी शब्द 'वह' सस्कृत धातु से निकला है निसमा मैक्समिलर = Mr Muller - सिद्रात १४६ अथ बोलना है। इमो से ब्रह्म शब्द या है और यह ब्रह्म ही ससार का पारम्भ है। भगवद्गीता के अध्याय ८ के श्लोक १३ में कहा गया है-"एक शब्--या--इस ब्रह्माण्ड को प्रस्ट करता है।" अध्याय १४ के श्लोक ३ में बताया गया है-"महद् ब्राा मेरी योनि है। मैं दममे जीन डालता है और उमसे सर कुछ उत्पन होता है । मनु- स्मृति में इमे श्रएटे के ममान बनाया गया है। इसी कारण ससार को ब्रह्माण्ड कहा जाता है। भगवद्गीता के अन्याय ३ के श्लोक १४ ओर १५ में आया है- "ब्रहा से वेद, वेद से क्म, कम से यज, यज्ञ से पादल, नादला से अन्न ओर अन से सर प्राणी उत्तन होते है ।" मनुस्मृति में लिखा है कि ब्रह्म दो भागा म विभक्त हुयायाधा नर और श्राधा मादा। तौरेत में हवा का यादम के पल्लू से पैदा किया जाना उमी कल्पना को वैसे ही शब्दा मे पणन करता है। इस मसले-विचारणीय विषय- के अन्तस्तल में काम करनेवाला विचार भी एक ही स्रोत से निकला मालूम होता है। बुराई का प्रारम्म ईरानी लोग दुनिया में दो खुदा मारते थे-याहरमज्द (प्राश का देववा) और बाहरमन (अंधेरे का देवता)। इस ससार में इन दोना मे परम्पर युद्ध रहता है। एक गच्छाई उत्पन कराता है, दूसरा बुराई । या मत निन्दू सिद्धान्त से इस प्रकार मिलता है कि हिन्दू शास्त्र ब्रह्म को मानकर ससार में दुख का कारण माया या अजान को समझते हैं। पारसी लोगो ने ग्रहा के मुकारले पर अंधेरे की एक शचि कल्पित कर ली। माया ही बाहरमन की शक्ल इख्तियार करके गद में शैतान का रूप धारण कर लेती है। भगवद्गीता के अयाय ७ के श्लोक १३, १४ और १५ मे कना गया है-“यह ससार माया के तीन गुणों हुया है। जो लोग इम माया में फंस जाते हैं वे मुझ तक नहा पहुँच सक्ने। मुझे वही पाते है जो मेरी इस माया को पार सजाते हैं।
मेरे अन्त समय के विचार बलि का विचार कुरनानी एर और विचारणीय विषय है। यहृदी लोग अपने खुदा को प्रसन्न करने के लिए शुरू से ही जानवरों की कुरबानी करते श्राये हैं। इसलाम भी कुरनानी-बलि-को वैसा ही यावश्यक समझता है । ईसाई कुरनानी को जरूरी समझते है, परतु इसके साथ ही वे यट भी मानते हैं कि मनुष्य-मात्र से कुरबानी का बोझ उतारने के लिए खुदा ने अपने हालौते बेटे-ईसा-यो कुरनान कर दिया । साधारण बुद्धि में भी यह बात नहीं था सस्ती कि क्सिी जीव को मार देने से खुदा को क्या अानन्द प्राप्त हो सकता है या क्सिी जानदार को मारने का खुदा की प्रसरता से सम्बध ही क्या हो सस्ता है। कई हिन्दुनो ने यज शब्द के अर्थ को उलय समझकर पशुओं की बलि को भी यज्ञ का एक प्रावश्यर श्रङ्ग टहराया । प्राय वाममार्ग मत पर यह दोप लगाया जाता है भगवद्गीता के अध्याय ३ के श्लोक ९, १०, १२ तथा १३ और अध्याय ४ क श्लोक २६, २७ श्रादि में स्पष्ट स्प से परोपकार तथा निस्वार्थ कामो को यन नाम दिया गया है। इससे स्पष्ट है कि सबसे बड़ा यज्ञ मनुष्य के अदर अपने लिए पशु प्रकृति को मारना था। अध्याय ३ के लोक ६ में कहा गया है--"प्रजापति ने प्रजा को उत्पन करने के लिए स्वय वा यश किया है। तुम भी इस यज्ञ के द्वारा फलो फ्लो' । रीतियाँ या सरकार मजन के साथ मिली हुई एक चीज़ सस्कार है जो जीवन में परि- वर्तन पैदा कर सकता है। एक पत्थर पहाड़ पर पड़ा है। वहाँ उसकी कोई हैसियत नहीं | जर उसे वहाँ से ला दीवार में लगाते ह तर वर एक लाभकारी चीज़ बन जाती है। उसे तयश र सुन्दर मूर्ति रना देने पर लोग उसके सामने सिर मुनाना शुरू कर देते हैं। पत्थर में ये परिवर्तन सस्वार के कारण पैदा हुए। हर एक मजहब ने रमास पास रस्में या रीतियों और सस्कार आवश्यक टहराये हैं। हिंदू-समाज में वर्ण व्यवस्था प्राचीन समय से चली श्रा सिद्धान्त रही है, जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है--"ये वर्ण मुझसे बने हैं। हर एक मनुष्य अपने अपने कर्म के अनुसार विशेष वर्ण में दाखिल होता है।" अध्याय १८ के श्लोक ४१, ४२, ४३ धीर ४४ में वण धर्म के सम्बध में बड़ी उच्च कोटि की शिक्षा मिलती है । यो तो सस्कार सोलह है, परतु इनमें से चार मुख्य माने गये हैं—पहला गर्भाधान, दूसरा यज्ञोपवीत, तीसरा विवाह और चौथा मृतक-सस्वार । मज़हयों के मुकाबले पर हिन्दुओं का प्रयत्न सभी मजहबों के सिद्धान्त श्रारम्भ में प्राय एक से ही होते है। उन को मानने के तरीकों की दृष्टि से दो बड़े समूह स्पष्ट नज़र आते हैं। एक वो सेमेटिक या पैग़म्बरी समूह और दूसरा श्रार्य। सेमैटिक विचार यहूदी वीले के सानदानी जिस्सों और उसके हसब-नसब के सिलसिले पर श्राश्रित हैं। यहूदी लोग अपने कविया को, जि हे वे पैगम्बरा कहते थे ( दोनों शब्दों का अर्थ एक दृष्टि से एक ही है), सास तौर पर अपना समझते ये। अय लोगों को वे कमी अपने कबीले में शामिल न करते थे। हैरानी की बात है कि एक स्थीले की परम्पराधी को (पुरानी दुनिया में हर एक नवीले की अपनी अपनी परम्पराएँ होती थीं) ईसाई और इसलामी दुनिया ने सभी मनुष्यों के लिए ठीक मान लिया है। इसके मुकाबले पर केवल हिन्दू जाति है जिससे प्राचीन श्राय नसल की सभ्यता को बचाये रखता है। सबसे पहले उसको बौद्धमत का मुकाबला करना पड़ा। एक हजार वर्ष तक दोनों का पारस्परिक सघर्ष जारी रहा। कुमारिल भट्ट और शङ्कराचार्य के प्रयत्न से वैदिक धर्म की विजय हुई- अधिकतर इस कारण कि बौद्धमत में कोई सास नई बात नहीं थी। बौद्ध मत ने प्राय सब कुछ प्राचीन सभ्यता से लिया था। ज्योही यह इससे निवृत्त हुश्रा, हिंदू धर्म को इसलाम का मुकाबला करना पड़ा। इसलाम की एक लहर अफ्रीका से होकर योरस को गई और दूसरी मिल, * कवि=Poet पैगम्बर = Prophet नाई। १५२ मेरे अन्त समय के विचार इंसा और अफगानिस्तान को विजित करती हुई इधर हिंदुस्तान में यह सघय लगभग नाठ सो वर्ष तक नारी रहा। इसमे पान, राजपूताना पोर महाराष्ट्र ने धर्म की रत्ना के लिए त्याग यार चीरा के बलिदान में विशेष रूप से भाग लिया। राणा प्रताप, गुरु गोविदसिंह और शिवाजी इत्यादि के विषय मे ज्यादा कहना व्यर्थ सा है। इस टेश के मभी लोगा से मालूम है कि इन लोगा ने धर्म की रक्षा करने के लिए स्तिनी ही मुसीरता का हँसते हुए सामना किया था। इन दिना ईसाई मजहर अपनी पूरी ताकत से हमारी युगा से रची यारी प्राचीन सभ्यता को मिटा देने की पूरी कोशिश करता या रहा है। योरपीय जाविया ने अपने पूरे उत्कर्ष को इंसाहयत की मदद मे नियोजित कर दिया है। इस कारण हिन्दुत्व और ईसाइयत का सरप लगातार जारी है। हम हिन्दुत्व को ईसाइयत का डटकर मुकाबला करते हए य रहे हैं।
मोलहवा पग्रिडेट आत्म-स्वतन्त्रता 'श्य और पुग्पार्थ देव शोर पुस्गय यहा पेनीदा चिराय है। इसार सम्प्रदाय मनुष्य को पाम करो में म्यतन मारा है तो प्रसिद्ध इमार मुधारक याल्विन के अनुयायो नियति या देर म विश्वास रम्पते हैं । इमलाम के पढ़े हिस्मे का विश्वास तपदीर पर है। संसार के दो र सेनानायर सीज़र और नेगेलियन देर में विश्वास ग्यवे थे। गलियन से एक बार प्रश्न रिया गया--"जब आप माग्य पर इतना विश्वास रचते हैं तत्र इवना काम और उसो तदबार क्या यरते हैं।" उसने उत्तर दिया-"यह सय भी मुझसे मेरा भाग्य करावा है। ऐसा मरो के लिए मैं गाय हूँ।" मनुष्य स्वतन्त्र भी है और परतन्त्र भी हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य पर्म करने में स्वतन भी है और परत भी। कर्म तीन प्रकार के हैं-प्रारम्ध, क्रियमाण और मचित । भीष्म पितामह से प्रश्न किया गया---' T--"देर चलवान् है या पुरपाय !" उहा बहा गृह उत्तर दिया--"ध्यान देने पर मालूम होता है कि ये दोनों नासा में एक ही है। देय या तक्दीर उस छिपी हुइ शक्ति का नाम है जिसमा एक प्राट रूप पुरुषाय या तदीर है।" हमारा प्रारब्ध तीन बड़े नसों से बना है। उनमें से एक प्राकृतिक नियम है। हमने मानव शरीर धारण कर रक्सा है, यह हमारा प्रारध है। इस पर हमाग कोई अधिकार नहीं। हम सभी दिशाना में प्रकृति की शचिया * काल्लिा Colin f नियति Pealk tination (प्रिडेस्टीनेशन)।
१५४ मेरे अन्त समय के विचार से घिरे हुए है। हम उनका मुमारला नहीं कर सस्ते। कर्म कर पर उसका पत हर्म भोगना ही पड़ता है। पैतृक गुणों का प्रभाव प्रारब्ध का दूसरा थाहमारी विरासत है। यह हम अपने माता पिर से विरसे में लेते हैं। इस विरासत मे न केवल शारीरिक रोग सम्मिलि हैं बल्कि बहुत दर्जे तक नैतिक गुण भी। हमारे समाव और श्राद मे बहुत सा भाग हमारे माता पिता रा होता है। इसी कारण हिन्द शास्त्र गर्भाधान सस्कार को श्रावश्यक बतलाते हैं। इसके साथ ही वे मात के लिए अपनी इच्छा के अनुसार नाहाण, क्षत्रिय, वैश्य यादि सतान उत्पन करने के वास्ते विशेष निर्देश करते हैं। परिस्थिति प्रारब्ध का तीसरा श्रङ्ग इर्द-गिर्द के हालात या परिस्थिति है जापानी बालक क्यों सास जापानी मालूम देता है ? उसमा रङ्ग रूप क्य जापानी है ? वह जापान से क्यों प्रेम करता है। जापान के लिए जीवित रहने में क्यों गर्व समझता है। केवल इस कारण कि उसने इर्द गिर्द की परिस्थिति ने उसे ऐसा बनाया है। इस गान को उसने सोच विचार कर चुना या पसन्द नहीं किया है । राष्ट्रों की अवस्था में प्राय स्वतन गवर्नमेन्ट राष्ट्र के नेतिक अाचार को ऊँचा और एक्तन्त्र गवर्नमेट निम्न बना देती है। यही हाल स्कूल के अन्दर बच्चों का होता है। यदि श्रध्यापक डराने और मारने वाला हो तो बच्चे स्वभावत झूठे हो जाते हैं। प्रेम करनेवाला अध्यापक होने पर ये नेक और सत्यवादी बनते हैं। सभी गुणों की जननी दिलेरी है जो खरान परिस्थिति के अन्दर कभी पैदा नहीं हो सकती। स्वतन्त्रता क्या है? भगवद्गीता के श्रध्याय ३ के श्लोक २६, २७ तथा २८म, अध्याय ५वे श्लोक ७, ८ तथा ६ में, अध्याय १३ के श्लोक २६ मे, अध्याय १४ ० इर्द गिर्द के हालात = Environments (इनवायर्नमेंट्स ।)
श्रात्म-स्वतनता १५५ के श्लोक १६ में और अध्याय १८ के श्लोक ५६ और ६० में कहा गया है-"यह ससार प्रकृति के गुणों का एक रोल है।" अभ्याय ११ के श्लोक २८ और २६ में तो स्पष्ट कह दिया गया है.--"जैसे नदिया समुद्र की तरफ बहती हैं और पतङ्गा मजबूर होकर दीये की रोशनी पर जल मरता है वैसे ही ये सय योधा श्रपो सवनाश के वास्ते मेरे मुँह में पा रहे हैं।" वास्तव में हम कम करनेवाले नहीं है, बल्कि प्रकृति हमसे कर्म कराती है। अठारहवें अध्याय में कहा गया है-"ह अर्जुन, तुम लड़ाई से भी हट नहीं सक्ते । तुम्हारा स्वभार ही तुमसे युद्ध करायेगा।" भगवद्गीता के श्रध्याय तीसरे के श्लोक १६ से लेकर २५ तक क श्लोकों में यह बात वदलाई गई है-"पल की इच्छा का त्याग कर देने से शनी वास्तविक स्वतन्त्रता को प्राप्त करता है, इसलिए तुम अपना दिल फंसाये बगैर इस धर्म में लग जाओ।" इसी प्रकार अध्याय ४ के श्लोक १४ से १६ में कहा गया है-"इन क्मों का मुभ पर कोई असर नहीं होता। जो मुझको जान लेता है यह भी कम के फन्दे से बच जाता है। जैसे श्राग बीज के उगने की शक्ति नष्ट कर देती है ऐसे ही ज्ञान कर्म के अंदर पैलने की शक्ति को नष्ट कर देता है।" ਜਿਥੇ मनुष्य में कर्म रूपी बीज जल गया हो वही कर्म के पद से मुच हो- कर स्वतन्त्र हो सकता है। सर्वशता वस्तुत हमें इश्वर के अस्तित्व-वह क्या है ? और उसके गुणों का कोई ज्ञान नहीं हो सकता। इसलिए उनको विचार में लाना या उन पर वाद विवाद करना हमारे सामर्थ्य से बाहर है। अपनी कल्पना स विशेष गुण उसके प्रदर डालकर हम अपने लिए मुश्किल पैदा कर लेते हैं। स्वामी शङ्कराचार्य कहते है कि ज्ञान के वास्ते ज्ञाता (जानने वाला) और शेय (जानने योग्य चीज़) दो की जरूरत है। ब्रह्म की दृष्टि से प्रात्मा एक ही है । इस कारण ज्ञेय के न होने से ज्ञान का प्रश्न ही उत्पन्न १५६ मेरे अन्त समय के विचार नहीं होता | भगवद्गीता के अनाय १३ के श्लोक १७ में भा यही विचार पाया जाता है.---"म ही गाता, ज्ञेय और शान हूँ।" अध्याय ११ के श्लोक ४० में कहा गया है-'तू सनम है, इस लिए सर तू दी है।" इश्वर की सर्वव्यापकता का क्या अर्थ है। जो रस्तु सवव्यापक है नही सर या सर है। जर-ज' के अन्दर रह है। परमाणु के अन्दर वह है। क्या कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जिसमें रह न हो? यदि कुछ नही तो सब कुछ वही है । सबव्यापावा का यह गुण हमारे लिए मुश्किल पैदा कर देता है। परिस्थिति पर विचार यदि सामाजिक प्रोर भौगोलिक अवस्थाएँ मनुष्य को बनाने में चड़ा हाय रखती है तो इसका अर्थ यही है कि इस सामाजिक समूह में सम्मिलित शो से समान का हरएक सदस्य भी शेष सब पर अपना प्रभाव डालता है। इस प्रभार का परिमाण हरएक सदस्य की व्यक्तिगत हसियत पर प्रालम्बित है । लूथर ने बाइरन की एक प्रति पढकर केथालिक सम्प्रदाय के विरुद्ध सुधार अान्दोलन की नाव रवी। एक बार तो उसने ईसाइयत को उसकी जड़ो से हिला दिया। जन एक साधारण मनुष्य भी अधर्म या पाप के लिए सजा पाता है तो उसके परिवारवालों पर कई दृष्टियो से प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त हर एक अादमी श्याने समान और परिस्थिति को जब चाहे पदल नहीं सकता | विरासत ही सब कुछ नही हे यदि निरासत और परिस्थिति ही सब कुछ होते तो इतनी भिन्नता न नजर पाती। एक ही माता पिता एक जैसी अस्थायी के अन्दर उत्तन होते हैं। योर गुद्धि मे एक दूसरे ने मिन होने हैं। एक ही से एर सी भूमि पर भिन भिन्न रूप और कद हरएक प्राणी का अपना अलग व्यक्ति है जो र सस्तार ग्रहण करता है। यह व्यनित ही उमसी नात्म स्वतन्नता बुद्धि और स्वतन्त्रता पशुया मे बुद्धि निसर्ग या नैसगिक प्रेरणा की अवस्था है , अर्थात् पशु जो कर्म करते है स्वभाव से नाध्य होकर करते हैं। उनके अदर नर-मादा के सयोग की इच्छा सिवा पियव समय के भी उत्पन्न नी होती। परन्तु कुत्ता, हाथी और पदर श्रादि समुन्नत पशुवो के अदर सोच विचार के निम्न चिह्न पाये जाते हैं। मनुष्य मे यह नैसर्गिक प्रेरणा बुद्धि का रूप ले लेती है। बुद्धि का अर्थ ही विचार है। पहिचाा का होना भी आवश्यक है। यदि मनुष्य को रिमा काम क विभिन पहलुम्रा पर विचार परो के गाद उसे करने या न करने का अधिकार न हो तो उसके अन्दर बुद्धि के हाने का कुछ अर्थ नहीं। बुद्धि इद्रिया के वश में होरर मनुष्य को प्रकृति का गुलाम बना देती है । गीता के अनुसार व्यवसायात्मिा बुद्धि प्राप्त करने पर ही मनुष्य प्रकृति क गुणा पर अधिकार कर साता है। दो प्रकार के मनुष्य मनुष्य दा प्रसार के है -(१) उदासीन (विचार-स्वातन्य रहित), और (२) नियावान् ! (म्बय सोचार काम करनेवाला) : मनुष्य के मन के दो भाग हैं-(१) ऐच्छिक, (२) अनैच्छिक! 1 ऐच्छिक मन केवल जामत अवस्था में काम करता है, अनैच्छिक हर अवस्था म, चाह मनुष्य सोया हुया हो या जागता । नीद मे आचाले सपने इसी अनैच्छिक मन के काम है । बदर पी वरह यह मन विचारा के एव म से दूसरे की तरफ दौड़ जाता "निसग या नैसर्गिक प्रेरणा=Instinct ( इन्स्टिक्ट)। उदासीन-Presire (पैसिन)। + क्रियावान् = Actre (ऐक्टिव)। ६ ऐच्छिक=Voluntary ( वालटेरा)। । अनैरिक Involuntary (इनपालटैरी)। D मेरे अन्त समय के विचार है। इसे भार-साहचर्य का कानून कहा जाता है। एक नात विचिन सी मालूम होती है, परन्तु देखने में प्राय पाती है। यदि रात को सोने से पूर्व हम दिल से कट दे कि सरेरै चार पजे जगा देना तो प्राय नियत समय पर अन्दर से उठाने की यागज़ या जाती है। जिन श्रादमियों के दिल और भी ज्यादा रहे होते हैं वे और भी अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे मनुष्य सम्मोहन या हिप्नोटिज्म में अच्छे माध्यम बन सकते हैं। दूसरे प्रकार के मनुष्यों का ऐच्छिक मन बलवान होता है। जहाँ ऐसे लोग अधिक हा वहाँ हर असर या कठिनाई में नेता पैदा हो सस्ते हैं। परिस्थिति उहें नहीं घटलती, बल्कि ये ही परिस्थिति को बदल देते हैं। भगवद्गीता के अयाय ४ का श्लोक ४० बताता है-"जिस मनुष्य का मन अशन और सराय में पैसा होता है वह नष्ट हो जाता है। उसके लिए न इस दुनिया में सुस होता है न उसमें।" श्लोक ४१ में कहा गया है--"जिस मनुष्य ने कर्म योग को सहायता से कर्मों को जोत लिया है श्रोर ज्ञान से सशय को टुकड़े-टुकड़े कर दिया है वही श्रात्म-उनव है, वह कर्मों के बन्धन में नहीं फंसता है।" * माथ-साहचार्य का कानून %3 Law of 1ssociation of Ideas (ला श्राफ ऐसोसिएशन नाव श्राइडियाज़)।
सत्रहवाँ परिच्छेद धर्म भोर अधर्म धर्म और अधर्म का विषय यहुत पेचीदा है मजहर पर ईमार लानेवालों का सवाल है कि खुदा अपने पासून लोगों के निदश के लिए पुस्तक-विशेष द्वारा प्रकट कर देता है। इन कानूनों को मानना धर्म है, न मानना अधम । सयाल को स्वीकार करने में बड़ी दिक्त यह है कि विभिन युगा पार विभिन लोगो के लिए खुदा ने परस्पर विरोधी हुक्म क्यो जारी किये ! इसके अतिरिक्त यवमान काल में मी ऐसे व्यक्ति हैं जो पैग़म्बरी का दाया करते। इसका निर्णय कैसे किया जाय दिइनम सद्या दावादार पौन है । श्रान्तरिक आवाज क्या है ? इसी धर्म और अधर्म के प्रश्न का दूसरा बड़ा हल प्रान्तरिक श्रापाज या अन्तयत्मा बताई जाती है, यद्यपि अन्तयत्मा हमारे सामाजिक शिक्षण तथा परिस्थिति का फ्ल है। हरएक मनुष्य की अन्तयत्मा दूसरे से मिन होती है। एक अहले इसलाम को किसी जानवर का वध करना अन्तरात्मा के विरुद्ध नहीं मालूम देता लेकिन एक जैन को अपने शरीर की जू या चारपाई के सटमल मारना भी असह्य है । अन्दर की प्रावाज़ सिफ एक तरह की गूंज होती है जो हमारे एकत्र हुए सम्बारों से उत्पन्न होती है। जिस प्रकार के संस्कार होंगे उसी प्रकार की अन्तरात्मा होगी। स्वय इसका कोई अस्तित्व नहीं। * धम और अधम- Right and Wrong (राइट ऐंड गैंग)।
मेर अन्त समय के विचार सार्वजनिक मत का महत्व इस प्रश्न का निर्णय करने का तीसरा मानदण्ड जनसाधारण की राय है जो उनकी रीतिया अादि म पाई जाती है। जिस सात को सावनित मत अच्छा कहे वह ठीक है, उसके परखिलाफ गलत । किसी मामूला कारोगार के लिए यह राय क्सौटी का काम दे सकती है। परन्तु ऐसी परिस्थिति भी आ जाती है जर इसके अनुसार चलने से रह गतरे का हर होता है। जिन लोगा ने मुकरात जैसे महात्मा की शिक्षा को समाज र तिए बिगाड़नेपाली बतला कर उसे जहर का प्याला पो पर बाध्य रिया उनके सार्वजनिक मत की कीमत फूटी कौडी भी नहीं हो सकती। सुनहला नियम , चीया बड़ा मानदएड, जिसे चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कानफ्यूशियस का बताया जाता है और जिसको पाइपल ने भी पसन्द किया है यह मुाला नियम है—"सरो के माय पाप यही व्यवहार कर जो श्राप चाहते हैं कि दूसर अापर साथ कर " भगवद्गीता क अध्याय ६ के श्लाक २५ मे भी यी कहा गया है-"जो मनुष्य सुग्न और टुप म सर जगह सर को अपो जैसा समझता है वही योगी है।" जहाँ तक सामाजिक बरताव का सम्बन्ध है इससे बेहतर कोई नियम ना हो सकता। व्यक्तिगत मामला मे हम स्वतन्त्र है परन्तु सामाजिक मामलो मे समाज के अधीन हैं। हैक्ल कहता है-"जो मनुष्य समाज मे रहकर उससे लाभ और अानन्द प्राप्त करता है उसका पर्तव्य है कि यह समाज के कानून को न तोड़े। यदि उसे पूर्ण स्वतन्त्रता की जरूरत है तो उसे चाहिए कि समाज से अलग हो जाय।" परन्तु ऐसी परिस्थिति भी अाती है जर यह यसौटी काम नहा दे सकती। जीवन के विध्यात्म धर्म पूरा करने मे कोई मदद नहा मिल सकती। इससे यह प्राट होता कि स्त्री के लिए पवित्रता, माहाण के लिए इस क्सौटी से * वि यात्मा%Po-itive ( पाजिटिर)।
धर्म और अधर्म भूखा रहकर भी धर्म का उपदेश देना, क्षत्रिय के लिए देश तथा जाति के रक्षार्थ प्राणों को सङ्कट मे डालना धम है। सुखवाद पांचवे वे सुसवादी लोग हैं जो रताते हैं कि मनुष्य को अपना सुख सबसे बहकर समझना चाहिए। इस सुखवाद को यूनान मे ऐपिक्युरियन और भारत मे चार्वाफ-दर्शन कहा गया है। उनकी दृष्टि मे सुस का अथ विषया का सुस है। इसमें कुछ सन्देह नहीं कि साधारणतया मनुष्य का स्वभाव उसे ऐसे कामों की ओर ले जाता है जिनसे उसे सुख प्राप्त हो सके। परन्तु इस पर बड़ी आपत्ति यह है कि मनुष्य की तृष्णा कमी पूरी नहीं होती, बल्कि ज्यों-ज्यो मनुष्य किसी विषय का ज्यादा गुलाम होता जाता है, त्यों-त्यों उसे अधिकाधिक दुस उठाना पड़ता है। सारी दुनिया की दौलत भी आदमी की तृष्णा को मिटा नहीं सकती। उपयोगवाद इस प्रकार के सभी मीयारों को अपूर्ण समझकर प्रसिद्ध अँगरेज विद्वान् थम ने उपयोगवादी निकला। इसके अनुसार सबसे अधिक मनुष्यो के सुख की सबसे अधिक मात्रा ही धम अधम की बड़ी क्सौटी है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह बहुत उत्तम मत पेश किया गया है, परन्तु इसको क्रियात्मक रूप से काम में लाना मुश्मिल है। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे यह मालूम हो सके कि सबसे अधिक मनुष्य सबसे अधिक सुरा कोन सी बात से प्राप्त कर सकेंगे। दूसरी कठिनाइ है प्रत्येक मनुष्य, समाज या राष्ट्र के सुख परस्पर विरुद्ध होना। एक तीसरी पेचीदगी भी सामने आती है जब हम दाशनिक मिल को सुरा के दो भेद भी बतलाते देसते हैं। * ऐपिक्चुरियन दशन = Epicurean philosophy | बैंथम का उपयोगवाद=Benthams theory of utility (यम्ज थियरी प्राव युटिलिटी) 1 मिन्न %Dmill १६२ मेरे अन्त समय के विचार 'महाजनो येन गत स पया' महाभारत में कहा गया है.---"वेद एक रास्ता बताते हैं, स्मृतियाँ दूसरा । कोई ऐसा मुनि नहीं जिसमा मत दूसरों से भिन्न न हो। धर्म का तत्व बहुत गृढ है, छिपा हुअा रहस्य है। इस कारण रास्ता वहीं समझो जिस पर महापुरुष चलते हों।" भीष्म पितामह ने इस बारे में अन्तिम निर्णय दिया है..."धम जाँचने का कोई एक नियम निश्चित नहीं है। यह समय-समय पर बदलता रहता है और भिन्न परिस्थिति में भिन्न हो जाता है । दया और सत्य जैसे धर्म भी नाज़ मोकों पर अधर्म हो जाते हैं।" महा मारत के करण पर में इस विषय पर अच्छी तरह से विवेचन किया गया है । व्यक्ति, श्रेणी और राष्ट्र के लिए पृथक पृथक कसोटी यह कठिन पहेली समझने का केवल एक तरीका है। वह यह कि हम व्यक्ति, श्रेणी और गष्ट के धम अधर्म की जांच अलग अलग कसौटियों से करे ओर फिर देखें कि वे तीनो फिर किसी एक क्सोटी पर एक्त की जा सकती है। हिन्दू शास्त्रों में राष्ट्र, वर्ण या श्रेणी और व्यक्ति का पृथक् पृथक् धम निधाारत है। विभिर पाश्रमो मे मनुष्य के जुदा-जुदा धम हैं। इनका उल्लेस भगवद्गीता के अध्याय १८ पे श्लोक ४१, ४२, ४३, ४७ ग्रादि में पाया जाता है। अध्याय ४ के लोक १३ में कहा गया है---"ये वर्ण और श्राश्रम हर मनुष्य के गुण, कम और स्वभाव को लेकर बनाये गये हैं।" इसाई मज़हब और बौद्ध मत का सभी मनुष्यो के लिए त्याग धम का उपदेश करना भूल है। क्षत्रिय का कर्म ब्राहाण के लिए शोर गृहस्थ का धम ब्रह्मचारी के लिए अधम है। धम सयासी का जनसाधारण का नहीं हो सकता। साधारण लोग घणों को जातियों से मिलाकर गड़बड़ पैदा कर देते हैं। वर्ण का जन्म से जरा भी सम्बध नहीं। वए तो समाज का एक स्वा भाविक विभाजन है जिससे हर एक सदस्य समाज की यह सेवा कर सकता है जिसके लिए वह सबसे अधिक योग्य है। भगवद्गीता के अध्याय चह धर्म और अधम १६३ १८ श्लोक ४७ मे इसी विचार को प्रस्ट किया गया है—"हर एक श्रेणी का अपना धम उसके लिए दूसरे सभी धर्मों से ऊँचा शोर पविन है"। ऋषि कणाद ने धर्म की परिभाषा बतलाते हुए कहा है कि धम वह है जिससे इस लोक और परलोक, दोनो की सिद्धि होती है। परन्तु यह प्रश्न फिर भी पाकी रह जाता है कि वह क्या वस्तु है जिससे इस लोक और परलोक में मनुष्य का कल्याण होता है ? इसका उत्तर इस श्लोक से मिलता है-हर एक श्रेणी के लिए देश काल के अनुसार पृथक् पृथक् धर्म होते हैं। इसी नियम के अनुसार पुरुषों का धम स्त्रियों के धम से मवथा भिन है। वे लोग भूल करते हैं जो यह समझते हैं कि स्त्री को भी पुरुष जैसे सभी काम करने चाहिए। स्त्री का सर्वोच्च घम सुसन्तान की उत्पत्ति और उसे शिक्षा देकर जाति तथा देश के लिए तैयार करना है। भगवद्गीता के पहले अध्याय में अर्जुन ने जाति धम और कुल धम का सवाल उठाया है। जिस समय रथ में बैठे हुए अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में अपने प्राचार्यो, गुरुनो और सम्बधियो को देखा तो उसका दिल कॉप गया भोर तीर-कमान हाथ से गिर गया। उमने भगवान कृष्ण से पड़ा भारी प्रश्न किया--"इन लोगा का चित्त लोभ के अंदर फंसा हुआ है। ये देस नहीं सक्ते कि पुल धम नष्ट हो जाने पोर जाति के साथ द्रोह करने का क्या पाप होता है। में इनके साथ कैसे लडू, क्योंकि जहाँ पर ऐसे युद्ध से कुल का नाश हो जाता है वहाँ पर यण-सार उत्पन हो जाते हैं और वर्ण सक्र पैदा होने से कुल तथा जाति के धम सदा के लिए ट जाते हैं।" मेरा अनुभव यह है कि भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट नहीं दिया। उहोंने ज्ञान तथा दशन की बाते और श्रात्मा को श्रमर बताकर अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार कर लिया । परतु इसके साथ यह भी एक तथ्य है कि महाभारत के युद्ध के पश्चात् भारत से कुल एव जाति धर्म के चिद एक प्रकार से मिट ही गये। जो कुछ दुर्योधन ने किया यही वह हज़ार वष बाद जयचन्द जब जयचन्द के सामने उसकी लड़की ने यह प्रश्न रिया कि यह तो हुअा। ने क्यिा।
१६४ मेरे अन्त समय के विचार श्रापके इस देश द्रोह से हिन्दू धर्म उठ जायगा, लासों गौयो का वध किया जायगा और मन्दिर गिराये जायेंगे तर जयचन्द ने उत्तर दिया- "कुछ ही हो जाय, मेरी श्रात्मा तभी प्रसन होगी जब मैं पृथ्वीराज का लहू गिरते हुए देखूगा ।" यदि हम माद के मराठों और सिखों का इतिहास ध्यान मे पढ़े तो उनके अन्दर भी हम यही पायेंगे कि भारत से जाति धम नष्ट हो गया था। यदि यह जाति धर्म विद्यमान होता तो न भारत में इतनी अधियाँ पाती और न देश का इतना विनाश होता। व्यक्तिगत धर्म भगवद्गीता में कहा गया है-"व्यकिगत दृष्टि से मनुष्य के सब काम, यश और तप भी, तीन प्रकार के होते हैं-साचिक, राजसिक और वाम सिक ।" अध्याय १७ का श्लोक ३ बतलाता है-"श्रादमी वैसा ही होता है जैसी उसकी श्रद्धा होती है।" प्राय मन का भाव ही हर एक काम को अच्छा या बुरा पताता है। पात यह है कि मनुष्य वह है जो उसकी श्रद्धा है, जो उसका 'मोटिव' है। सस्कृत का शब्द 'पाप' पे धातु से निकला है जिसका अथ मुसाना है। जो काम मनुष्य को सुखा देता है वह पाप है। इस कारण भगव द्गीता के अध्याय ३ के श्लोक ३७ में कहा गया है, "यह काम है, यह क्रोध है जो हमको पाप में फंसाता है।" काम, अथात् व्यक्तिगत इच्छा ही सारे पाप की जड़ है । जो फायदे के लालच में या कष्ट के भय से किया जाता है वह पाप है और जो केवल धर्म समझकर किया जाता है वह पुण्य है । श्रेणी-धर्म और राष्ट्र धर्म एक श्रेणी तो सास गुणों को धम मोर दूसरी उनको अधर्म कहती है। अमीरों ओर गरीबों के सघर्ष में अमीर रहादुरी को अच्छा कहेंगे, गरीच कमज़ोर की सहायता को। घनियों के लिए अधिकार का अर्थ असमता है और यसमता प्रकृति ने बनाई है। इसके विरुद्ध निधन साम्यवाद के पक्षपाती होंगे। विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बध धम पर वाश्रित हैं या अधम पर १ इसका फैसला करने की एक ही कसौटी है-- ममना जाता। नीति की सफाई मेससार की मलाइका बहाना पेश करता है। इसलिए पम और धाम सरलता। यासर पारस्परिक सपर या मुसामने से हुआ करती है। एक जापानी से प्रश्न किया गया--- सम्म से मना । उसने उत्तर दिया-रुस-मासान युद्ध में मई लाग रूसिया का यध को से। यदि अमेरिया इंग्लैंड के मायने पर युद्ध में साल 7 होता तो याशिंगटन अमरका ये लोगों या दीरो या अधिनायप पाने के बजाय विद्रोही यच्या आर पुरा पया है। जब कभी दो राष्ट्रों के बीत मुगावला या सपर होता है सर स्वभावत दोनो प्रपो प्रारको पर समझते हैं। प्राय प्रत्या राष्ट्र अपनी कि उनको ससार की मनाई का यही पहलू ठ र पाता है जिसमें च रचय अपना मला देखते हैं। युध का यत क्योंकर हो? पारपीय जातियों की नीति एक समय तक योरप हे अन्दर अधिक से अधिक प्रभुत्व प्राप्त करने की थी। इसी कारण उनके पारस्परिक उस हुए। वर्तमान काल में उनकी नीति ससार के श्रय देशों पर ५ ॥ गैर दाब जमाने और धन कमाया है। इस प्रभुत्व और रोग-दाय की कमी-येशी के कारण उनकी पारस्परिक इण्या सभी युद्धों का मूल कारण सिद्ध हुई है। पोप फा गत महायुद्ध क्या था? जो दौलत एशिया की गरीब जातियों के सून से एकत्र की गई थी उससे तोपें और गो) नाय गये। इन तोपा और गोलों ने धन जमा करनेवालों की सवत्ति को नष्ट करने का काम किया। महामारत का युद्ध भी निस्सन्देह इस प्रकार का विनाशकारी था। का सिप इतना है कि उस युद्ध की नींव न तो शरि की इच्छा भी न दुसरों से द्वेष । उसका प्रारम्भ डा लोगा की तरफ से दुना जिाक सम अधिकार दयाकर उनको निवासित कर दिया गया था। इसी १.
१६४ मेरे अन्त समय के विचार आपके इस देश द्रोह से हिन्दू धम उठ जायगा, लागों गौत्रों का वध किया जायगा और मन्दिर गिराये जायेंगे तर जयचन्द ने उत्तर दिया- "पुष ही हो जाय, मेरी श्रात्मा तभी प्रसन होगी जब मैं पृथ्वीराज का लहू गिरते हुए देगूंगा।" यदि हम नाद के मराठों और सिसा का इतिहास ध्यान से पढे तो उनके अन्दर भी हम यही पायेंगे कि भारत से जाति धर्म नष्ट हो गया था । यदि यह जाति धर्म विद्यमान होता तो न भारत में इतनी श्राधियाँ श्राती और न देश का इतना विनाश होता । व्यक्तिगत धर्म भगवद्गीता में कहा गया है-"व्यक्तिगत दृष्टि से मनुष्य के सर काम, या और तप भी, तीन प्रकार के होते हैं-सात्त्विक, राजसिक श्लोर ताम सिक । अध्याय १७ का श्लोक ३ पखलाता है.-"श्रादमी वैसा ही होता है जैसी उसकी श्रद्धा होती है।" माय मन का भाव ही हर एक काम को अच्छा या बुरा बताता है । रात यह है कि मनुष्य वह है जो उसकी श्रद्धा है, जो उसका 'मोटिर' है। सस्कृत का शब्द 'पाप' पे धातु से निकला है जिसका अथ मुरसाना है। जो काम मनुष्य को सुखा देता है वह पाप है। इस कारण भगव द्गीता के अध्याय ३ के श्लोक ३७ में कहा गया है, "यह काम है, यह क्रोध है जो हमको पाप में फंसाता है।" काम, अर्थात् व्यक्तिगत इच्छा ही सारे पाप की जड़ है। जो फायदे के लालच में या कष्ट के भय से किया जाता है वह पाप है और जो केवल धर्म समझार किया जाता है वह पुण्य है । श्रेणी धर्म और गष्ट धर्म एक श्रेणी तो सास गुणों को धम और दुसरी उनको अधर्म कहती है। अमीरों और गरीबों के सघप में अमीर बहादुरी को अच्छा कहेंगे, गरीन कमजोर की सहायता को। धनियों के लिए अधिकार का अथ असमता है और असमता प्रकृति ने बनाई है। इसके विरुद्ध निर्धन साम्यवाद के पक्षपाती होंगे। विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बध धर्म पर नाश्रित हैं या अधर्म पर इसका फैसला करने की एक ही कसौटी है- धर्म और अधर्म सफलता। यह प्राय पारस्परिक सघर्ष या मुकाबले से हुआ करती है । एक जापानी से प्रश्न किया गया-जापान सम्य कैसे बना ! उसने उत्तर दिया-रूस जापान-युद्ध में कई लास रूसियों का वध करने से। यदि अमेरिका इंग्लैंड के मुकाबले पर युद्ध में सफल न होता तो याशिंगटन अमेरिका के लोगो का हीरो या अधिनायक बनने के बजाय विद्रोही समझा जाता। नीति की सफाई अच्छा और बुरा क्या है? जब कमी दो राष्ट्रों के बीच मुकाबला या मघष होता है तब स्वभावत दोना अपने आप को ही हक पर समझते हैं। प्राय प्रत्येक राष्ट्र अपनी ससार की भलाई का बहाना पेश करता है। इसलिए कि उनको ससार की भलाई का वही पहलू ठीक नजर श्राता है जिसमें ये स्यय अपना भला देसते हैं। युद्ध का अन्त क्योंकर हो? यारपीय जातियों की नीति एक समय तक योरप के अन्दर अधिक से अधिक प्रभुत्व प्राप्त करने की थी। इसी कारण उनके पारस्परिक युद्ध हुए। वतमान काल में उनकी नीति ससार के नय देशों पर अपना रोब दाम जमाने और धन कमाने की है। इस प्रभुत्व और रोर दान की कमी-बेशी के कारण उनकी पारस्परिक ईप्या सभी युद्धों का मूल कारण सिद्ध हुई है। योरप का गत महायुद्ध क्या था ? जो दौलत एशिया की गरीब जातियों के खून से एकत्र की गई थी उससे तो और गोले हा तोपों और गोला ने धन नमा करनेवालों की सन्तति को नष्ट करने का काम किया। महाभारत का युद्ध भी निस्स देह इस प्रकार का विनाशकारी था। फर्क सिर्फ इतना है कि उस युद्ध की नाव न तो शनि की इच्छा थी, न दूसरों से कैप। उसका प्रारम्भ 31 लोगों की तरफ से अधिकार दयापर उनको निवासित कर दिया गया था ननाये गये।
मेरे अन्त समय के विचार आपके इस देश द्रोह से हिन्दू धर्म उठ जायगा, लासा गौत्रो का वध किया जायगा और मन्दिर गिराये जायेंगे तर जयचन्द ने उत्तर दिया- "कुछ ही हो जाय, मेरी श्रात्मा तभी प्रसन होगी जर मैं पृथ्वीराज का लहू गिरते हुए देगा।" यदि हम पाद के मराठों और सिखों का इतिहास ध्यान से पढे तो उनके अन्दर भी हम यही पायेंगे कि भारत से जाति धर्म नष्ट हो गया था । यदि यह जाति धर्म विद्यमान होता तो न भारत में इतनी याधियाँ आती और न देश का इतना विनाश होता । न्यक्तिगत धर्म भगवद्गीता में कहा गया है-"व्यक्तिगत दृष्टि से मनुष्य के सर काम, यश और तप मी, तीन प्रकार के होते हैं सात्विक, राजसिक और वाम सिक ।" अध्याय १७ का श्लोक ३ बतलाता है-"श्रादमी वैसा ही होता है जेसी उसकी श्रद्धा होती है । प्राय मन का भाव ही हर एक काम को अच्छा या बुरा बताता है। पात यह है कि मनुष्य वह है जो उसकी श्रद्धा है, जो उसका 'मोटिव' है। संस्कृत का शब्द 'पाप' पे धातु से निकला है जिसका अथ सुरवाना है। जो काम मनुष्य को सुखा देता है वह पाप है। इस कारण भगव द्गीता के अध्याय ३ के श्लोक ३७ में कहा गया है, "यह काम है, यह कोध है जो हमको पाप में फंसाता है।" काम, अथात् व्यक्तिगत इच्छा ही सारे पाप की जड़ है। जो फायदे के लालच में या कष्ट के भय से किया जाता है वह पाप है और जो केवल धम समझार किया जाता है वह पुण्य है । श्रेणी-धर्म और राष्ट्र धर्म एक श्रेणी तो सास गुणों को धम और दुसरी उनको अधर्म कहती है। अमीरों और गरीबों के सघय में अमीर बहादुरी को अच्छा कहेंगे, गरीन कमजोर की सहायता को। धनियों के लिए अधिकार का अर्थ असमता है और असमता प्रकृति ने बनाई है। इसके विरुद्ध निधन साम्यवाद के पक्षपाती होगे। विभिन राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बध धर्म पर नाश्रित हैं या अधर्म पर १ इसका फैसला करो की एक ही कसौटी है- धर्म और श्राम सरलता। यह माय पारस्परिक सपा या मुकारले से हुआ परती है। एक जापानी से प्रश्न किया गया-जापान सभ्य से बना ! उसने उत्तर रा-रूस-जापान-युद्ध में कई लाख रूसियों का यध करने से। यदि अमेरिका इंग्लैंड के मुकारले पर युद्ध में सफल न होता तो वाशिंगटन अमेरिका के लोगों का हीरो या अधिनायर बनने के बजाय विद्रोही जब कमी दा रामों के बीच मुकारला या सघा होता है तब स्यमावत नीति की सफाई में ससार की भलाई या यहाना परा करता है। इसलिए कि उनमो ससार की मलाई का यही पहलू ठीक ननर अाता है जिसमें वे योरपीय जातियों की नीति एक समय तक योरप के अन्दर अधिक से अधिक प्रभुत्व प्राप्त करने की थी। इसी कारण उनके पारस्परिक युद्ध दुए। बतमान काल में उनकी नीति ससार के श्रय देशों पर अपना रदार जमाने और धन कमाने की है। इस प्रभुत्व और रोच-दाब की कमी-बेशी के कारण उनसी पारस्परिक ईष्या सभी युद्धों का मूल कारण सद्ध हुई है। यारप का गत महायुद्ध क्या था? जो दौलत एशिया टीगरी जातियों के खून से एकत्र की गई थी उससे तो और गोले १ प्राय प्रत्येक राष्ट्र अपनी युद्ध का अन्त क्योकर हो? अच्छा और चुरा क्या ह दोना अाने श्रार को ही हक्क पर समझते हैं। स्वय अपना भला देसते हैं। नाये गये। इन तोपों और गोलों ने धन जमा परनेवालों की सन्तति को नष्ट करने का काम किया। महाभारत का युद्ध भी निस्सदह इस प्रकार का विनाशकारी था। - सिर्फ इतना है कि उस युद्ध को नीर न तो शक्ति की इच्छा सरों से देष। उसका श्रारम्भ उन लोगों को तरफ से हुआ जि -घिसार दयावर उनको निवासित कर दिया गया था।
मेरे अन्त समय के विचार श्रीकृष्ण ने उस युद्ध को धर्मयुद्ध कहा और अर्जुन को लड़ाई के वास्ते उभाइना ज़रूरी समझा। मसार में युद्ध का यत कर देने के लिए गष्ट्र-सघ* बनाया गया । महाभारत में यह विचार प्रकट किया गया है कि इस प्रकार के युद्धों को रोक्ने का उपाय यह है कि झगडे की हर एक बात के नारे में कानून पनाने का निर्णय चार सयासियो की सभा के द्वारा हो जिनमें एक एक सयासी दोनों विरोधी दलों का हो, तीसरा निष्पक्ष देश का और चोथा उन में रहनेवाला हो। ससार में युद्ध का अन्त सिफ उस दशा में हो सस्ता है जर अन्तर्राष्ट्रीय कानून की नींव धर्म पर रक्खी जाय । सर्वश्रेष्ठ धर्म यदि व्यक्ति धर्मों , श्रेणी धमों और राष्ट्र धर्मों को एक जगह करके उनकी परीक्षा की जाय तो इन तीनों के अन्दर एक सामान्य सिद्धात काम करता दिखाई देता है। यह सिद्धान्त दूसरों की भलाई है। इसे भग वद्गीता के अध्याय ५ के श्लोक २५ में सर्व भूत हित कहा गया है। इस धर्म का बतानेवाला वह मनुष्य हो सकता है जो सभी प्राणियों को एक नजर से देखता हो। अध्याय १२ के श्लोक ४ में कहा गया है-'समें एक सिद्धि रसनेवाला और सभी प्राणियों के हित के लिए कोशिश करने वाला मुझको पाता है ।" अ याय ६ का श्लोक २६ भी यही कहता है- "पूर्ण ज्ञानी सर प्राणियो को अपने अन्दर और अपनी आत्मा को उनक अन्दर देखता है।" अध्याय ५ के श्लोक २८ में रताया गया है-- tram Trट थी. गधे और कुत्ते को ज्ञानी सम दृष्टि से देखता है।" ।
अठारहवाँ परिच्छेद कर्तव्य न्याय के साथ प्रेम का अर्थ भगवद्गीता कम का रास्ता बतानेगाला ज्ञान शास्त्र है। चौथे अध्याय के सातवें श्लोक में कहा गया है-नब धम की ग्लानि होती है तब मैं साधु लोगा की रक्षा और दुष्टों के विनासाथ ससार में श्राता हूँ।" मानव ससार में कितने ही अवसरों पर महात्मानों ने केवल प्रेम और भत्ति का प्रचार करके दुनिया का ऊपर उठाने का प्रयत्न किया है। कुछ महापुरुषो को अधम दूर करने के लिए, उसके विरुद्ध, युद्ध करना पड़ा है। वास्तव में दोनों माग एक ही हैं। इनका ग्रहण परिस्थिति पर निभर है। भगवद्गोना के ज्ञान का अरमर कौरव और पाएडव दल युद्ध के लिए इक्ठे थे। अर्जुन ने दोनों तरफ नजर दौडाद । उसे अपने गुरुजन और सम्बधी दिखाइ पढ़े। अर्जुन घबरा गया। उसने श्रीकृष्ण से कहा- "इस लड़ाई से तो भीख माँगकर पेट भर लेना बेहतर है।" अजुन फिर कहने लगा--"ये अशानी राज्य के लोभ में से हैं। हम यदि शानी हाकर इहं मारेंगे तो हमारे लिए यह महागप होगा।" श्रीकृष्ण ने कहा-"ये कैसी कायरों की बातें करते हो? ऐसा करना श्रार्यो की शान खिलाफ है। तुम्हारा यह स्याग झूठा है। इससे घम का त्याग होता है।" अध्याय - के श्लोक १६ में श्रतुन को उदोंने साफ बताया है -इसकी चिन्ता मत करो। यह श्रात्मा न तो खुर मरता है और न किसी को मारता ही है। यदि तुमो शन लिया है तो तुम मरने मारने दूर चले गये हो।'
१६८ मेरे अन्त समय के विचार -- - विजय और हातात्म्य मसीनी ने एक जगह कहा है-"जो मनुष्य धर्म के लिए जान देने पर तैयार होता है उसकी रक्षा और पथ प्रदर्शन के लिए विनय और होतारम्य के देवता-~-फतह और शहादत के फरिश्ते-विद्यमान रहते हैं । धर्मयुद्ध में पहले तो विजय प्राप्त होती है। यदि विजय न हो तो शहा दत या फरिश्ता अपने पर फैलाये उसकी आत्मा को श्राफाश पर ले जाता है।" भगवद्गीता के अध्याय २ के श्लोक ३७ में भी यही भार प्रकट किया गया है--"इस धर्मयुद्ध में यदि तुम जीत जानोगे तो राज्य क्रोगे, यदि मारे जाओगे तो स्वर्ग पाओगे। इसलिए अर्जुन, तुम धर्मयुद्ध रे लिए तैयार हो जायो । धृतराष्ट्र ने ऋषि सजात से पूछा-~"क्या मौत का अस्तित्व है ?" ऋषि ने उत्तर दिया--"मौत हे मी और नहीं भी। यह तो देखनेवालों की श्रॉलॉ पर अवलम्बित है। मृत्यु केवल अशान का परिणाम है। शानी के लिए मृत्यु का कोई अस्तित्व नहीं। अशान के कारण इच्छा उत्पन होती है। इच्छा से काम भाव और क्रोध पाते हैं जो मनुष्य को मृत्यु के पजे में फंसाते हैं। जिस मनुष्य में इच्छा नहीं उसे मृत्यु का सटया नहीं।" मृत्यु और जम सिर्फ तबदीली के नाम हैं। यदि मृत्यु न होगी तो परिवर्तन का नियम बद हो जाने से जम मीन होगा। कर्तव्य का शान और देश-काल परिस्थिति को अच्छी तरह समझने से कर्तव्य का ज्ञान होता है। देश, काल और कारण का जानना, परिस्थिति का जानना है। अपने देश तथा जाति की अवस्था जानो के वास्ते थाहा पीछे जाने की जह - वर्तव्य १६६ विभिन्न आन्दोलनों का उद्देश -जाति रक्षण श्रार्यों की जितनी शाखाएँ ससार में फैली हैं उनमें से केवल हिंदुओं ने अपनी नस्ल का सभ्यता को असली हालत में कायम रखने की कोशिश की है। योरप की श्राय शाखाएँ यहूदी विचारों के अंदर मिल गई । एशिया की अन्य प्राय शासाश्रा ने इसलाम के द्वारा अरन की सभ्यता को ग्रहण किया। लेकिन हिदुओं ने अपनी सभ्यता या अस्तित्व बनाये रसने के लिए, मुसलमानी शासन के दिनों में, बडा त्याग किया है। इन दिनों भी विभिन प्रातों में उनकी अनेक संस्थाएँ, इसाई प्रभावों से भारतीय संस्कृति की रक्षा करने में यनशील हैं । इन सबसे बढकर पायसमाज ने अपना असर पैदा क्यिा है। यद्यपि स्वामी दयानदाने श्रायसमाज के नियमों में समय-समय पर श्रावश्यक परिवर्तन किया है, फिर भी उनके मन में, श्रारम्भ से शत तक, वेद धर्म या हिन्दू-सस्कृति के लिए अटल और निस्सीम प्रेम था। यही एक भाव स्वामी दयानद के जीवन और मृत्यु का श्रादश था । वेद धम की रक्षा के लिए स्वामीजी ने अपनी विद्या, बल और जाउन का बलिदान कर दिया । प्रादर्श और उत्कर्ष या अपकर्ष पहुधा सुना जाता है- 'ग्राजक्ल वो ससार उन्नति कर रहा है।" अभी तक योरप की उनति हो हमारा श्रादश रहा है। योरप के गत महा युद्ध ने बताया है कि यह सब उनति किधर का जा रही है। ससार में राष्ट्र उत्पन्न होते, बढते और गिरते हैं। श्रादश की ओर जाने का नाम उत्क्ष और उससे दूर हटने का नाम अपक्प है। धम की रक्षा ही राष्ट्रीय जीवन की रक्षा है। अमन दाशनिक शापनहायर उपनिषदों के फारसी अनुवाद को पढ़ने के याद इस परिणाम पर पहुँचा-"उपनिषद् बनानेवालों की हमारे इसाई मिशनरी क्या सिसलायेंगे । मानव-समाज की प्रारम्भिक कालिलियो के तथ्य और कहानियाँ मिटा नहीं सकती।"
मेरे अन्त समय के विचार मज़हन और राजनोति कोई मजह्न राजनीति से साली नहीं। जहाँ पर मज़हब मौत के बाद की श्रशेय नातों की तरफ हमाग ध्यान दिलाता है वहाँ पर राजनीति सभी सासारिक मामलों को हमारे सामने रखती है। राष्ट्र की आर्थिक, सास्कृतिक, शारीरिक तथा शिक्षा सम्बन्धी उन्नति के सर विषय राजनीति के भीतर हैं। हिन्दुओं के पतन का सबसे बड़ा कारण जनसाधारण का राजनीति से उदासीनता है। राजनीति का एक विशेष पहलू राजनीति का एक और पहलू है जो सम्ट और मुसीबत के समय शत्रुओं के साथ बरताव के सम्बध में है। महाभारत में इसका उल्लेख है। तमान राजनीति का यह एक प्रकार से बीज मन है। एक चूहे के उदाहरण से इसे स्पष्ट किया गया है जिसने अपने तीन शनुमो-बिल्ली, नेवला और उल्लू-से एक साथ घिरे रहने पर भी चालाकी से अपनी जान बचाई। बलवान् शनु का वश में करने के लिए स्वय भली भाँति तैयारी करनी चाहिए। उसी चालों का सूक्ष्म ज्ञान रसना और उहें निष्पल करने के लिए दृढता पूरक प्रयत करना चाहिए । राजनीतिक ससार में शत्रु को गिराने के वास्ते लोभ, भय और स्त्री सदा ही प्रयोग किये गये हैं। राजनीतिक चरिन उसी का है जिसमें इनसे बचने की हिम्मत हो। इन प्रलोभनों में फंसकर मनुष्य राष्ट्रद्रोह करता है। भारत पर अँगरेजी शासन का प्रभाव अँगरेज़ जाति का निश्चय भारत का भला करने का था या नहीं, परतु इसमें सन्दह नहीं कि अँगरेज़ जाति के द्वारा भारत का एक भला जरूर हुश्रा है। वह यह कि हममें अपने को देखने समझने की शक्ति श्रागई है। अँगरेजी सम्पर्क का गहरा प्रभाव भारत में मनुष्का यधिक परदेशमकी लहर कर्तव्य १७१ एक दृष्टि से नया है। यह भाव एक तरह की अग्नि है जिसमें हिदुओं की ऊँच-नीच की प्रवृत्ति और हिन्दू, सिख, मुसलमान श्रादि के मज़हनी मतभेद जलकर रास हो सकते हैं और उनके स्थान में मानवी स्वतन्त्रता तथा समानता की मुगध निकल सकती है। भापा का विनाश और राष्टीयता जहाँ जहाँ अरब लोगो ने विजय पाई, यहाँ वहाँ के लोगों को अपने साथ सम्बद्ध करने के लिए उन्होंने अपनी सभ्यता और भाषा फैलाई। इरान और मित्र में उहोंने पुरानी भाषाओं की जगह अरवी भाषा प्रचलित की। जमन लोगों ने एल्सास और लोरेन के प्रदेशों को विजित करने के पश्चात् उनमें फ्रासीसी भाषा के स्थान में जमन भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने की कोशिश की। अँगरेजी को अदालतों की तथा उच्च शिक्षा की भाषा निश्चित कर अँगरेजा ने भी यही किया है। हिन्दू मुसलमानो का पारस्परिक सम्बन्ध इस देश में मुसलमानो की प्राचादी का सासा हिस्सा है। लेकिन अब तक उनके अन्दर स्वदेश प्रेम के बजाय मजहनी जोश ही काम करता पा रहा है। हमारे जीवन का पड़ा भाग अपनी सासारिक उन्नति में व्यय होता है। राष्ट्र की सासारिक उन्नति में हर एक सदस्य का हित पाया जाता है। इसलिए उचित एव प्रावश्यक यही प्रतीत होता है कि झगड़े की बातों के फैसले का कोई रास्ता निकालकर हम पारस्परिक द्वेष के भाव को दूर करने का यत्न करें। देश के सामा य याथिक लाभ की दृष्टि से हर प्रकार गो-रक्षण का महत्व मुसलमानों को समझना चाहिए। इसके सिवा उहे, अपने हिन्दू पड़ोसियों के दिल पर, बिलकुल मामूली बात के लिए चोट न पहुँ चाना चाहिए। मजहबी रीति-साजों के पानन में दोनों जातियों को विवेक और सहिष्णुता से काम लेना चाहिए।
१७२ मेरे श्रत समय के विचार धन धाय की हिन्दू सस्कृति की रक्षा हमारा कर्तव्य है वेद हिन्दुनों पं धर्म का एक चिह्न है और गी उनकी राजनीतिक एक्ता और आर्थिक उन्नति का । हिन्दू की एक परिभाषा ठीक ही यह की गई है कि गौ और ग्रामण की रक्षा कर। ब्राहाण वेद का रक्षक है । हि दुनों को यह याद रखना चाहिए यदि उनकी सभ्यता का सस्कृति ससार से मिट गई तो उनका अस्तित्व ही मिट गया। धर्म और सस्कृति का त्याग करके न जीना अच्छा है, न मरना । परवा न करके प्राणों की रक्षा करनी चाहिए और प्राणों की परवान करके धर्म की रक्षा करनी चाहिए। इस राष्ट्र ने प्रसस्य तूफान झेलकर ससार की सबसे प्राचीन संस्कृति को बचाया है। गुलामी बुरी चीज़ है और राजनीतिक स्वता की प्रशसा में यहाँ तक कहा गया है कि इसके वास्ते हमें सब कुछ पलिदान करने को तैयार रहना चाहिए । हिन्दुओं के अछूत अस्पृश्यता हिदुओं के लिए क्लङ्क की बात है। हमारी रीतियों में भी यथेष्ट सशोधन की अावश्यकता है। निराशा के अन्धकार में आशा की किरण यदि यह जाति और इसकी सस्कृति इतने युगा के अन्दर विभिन श्रादोलनों से नष्ट नहीं हुई है तो भविष्य के लिए भी हम निराश नहीं है। जातियो का उठना गिरना लगा रहता है। हमारे नेद शास्त्र तथा धम-रक्षा में श्रात्माहुति देनेवाले वीरों के उदाहरण न केवल हमारी अाशा को मज बूत बनाते हैं, वरन् उनसे हमें सच्ची कर्म प्रेरणा मिल सकती है । श्राव श्यक्ता है उनके मनन की तथा उनके चरित्र का अनुशीलन कर स्फूति प्राप्त करने को। राणा प्रताप, महारानी पद्मिनी, गुरु गावि दसिंद, पदा यहादुर और शिवाजी महाराज के त्यागपूर्ण कार्या के चिन्तन से किसी भी मृतप्राय जाति में जीवन शत्ति का सचार हाना असम्भव नहीं।।
पतव्य भगवद्गीता में भासक्ति और मौत से लापरवाही जान तो यह है कि प्रात्मा अमर है, मौत उसे मिटा नहीं सस्ती । इसके साथ ही श्रीरा अजुन से साफ कहते हैं-"तुम अपना तन-मन मेर प्रेम के अपण करो। मैं तुम्हें इस मयानक समार-सागर से पार ले जाऊँगा।" दूसरी शक्ति जो निभयता उत्पन्न करती है, प्रेम या इश्क है। प्रेम भार का अथ है कुरबानी या त्याग । स्याग जितना ज्यादा होता है उतनी ही ज्यादा प्रेम की सचाई मालूम होती है। सच्चा प्रेम त्याग से रना होता है, दिखावे का प्रेम स्वार्थ से । भगवद्गीता का पदनेशला व्यचि चिरला ही होगा जिसके मन में अपने पार को श्रीकृष्ण के अपण करने की इच्छा उत्पन्न न हुई हो। श्रीकृषा क्या है ? ये हिन्दू-राष्ट्रीयता की श्रात्मा हैं। श्रीराम और श्रीकृा-ये दो नाम हिन्दू-जाति प्राण है। हमारी राष्ट्रीयता या जातीयता सरसे पदफर इन दो नामों से बंधी हुई है। यदि ये दो नाम हमसे राहर निस्ल जाये तो हमारा राष्ट्र या जाति मृतप्राय हो जाय । इतिहास को देसने से पता चलता है कि हमारे देश में भिन भिन्न समय में, ऐसे महात्मात्रों का जन्म होता रहा है जे राष्ट्रीय घम की सेवा में, जरूरत पड़ने पर, अरने जीवन को तिनके के बराबर सम झते थे। उनके त्याग और वीरव की कहानियाँ पढ़ सुनकर श्राज भी हमारा शरीर रोमाञ्चित हो उठता है।
(२) बमल कन दयानन्द विलक अरविन्द घोष लाक हाब्ज़ नीटो तुलसीदास गिनन जैकालिये डार्मस्टेटर मैक्समिलर सुकरात (साकेटीज़) बैंथम मिल धूनसाग ग्रन्थ वेद पुराण अजील (बाइबल) न्याय दर्शन वैशेषिक दर्शन माडूक्य उपनिषद् महाभारत रामायण ऐतरेय उपनिषद् कुरान तौरेत छान्दोग्य उपनिषद् योग दशन सारन्य दर्शन वेदान्त दशन
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दैनिक जीवन और
मनोविज्ञान
इस पुस्तक के लेखव है,
पण्डित इलाचद जोशी। हम
रोगा से बहुत-सी गलतियाँ प्रति
दिन हुआ करती है, हम उन
गलतिया का जान बूझकर तो
परते नहीं, फिर भी व हो ही
जाती है। लेकिन क्या हो जाती
है-यह हम स्वय नहीं जानते ।
क्यापि हम और हमारा यह
जीवन साधारण और सरल नहीं,
बडा विचिन, दुर्बोध आर रहस्य
मय है। किंतु मनोविनान की
सहायता से हमारे जीवन की
अनेक गुत्थियां सुलझ जाती है।
यह इस पुस्तक में लेखक ने इतनी
सरलता से समझाया है कि
मामूली पढा लिखा आदमी भी
सब कुछ ठीक-ठीक समझ सक्ता
ह। और यही इस किताब की
विशेषता है।